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उसे शंका हुई, अगर कभी मजूरी न मिली, तो वह क्या करेगा? मगर मजूरी क्यों न मिलेगी? जब वह जी तोड़ कर काम करेगा, तो सौ आदमी उसे बुलाएँगे। काम सबको प्यारा होता है, चाम नहीं प्यारा होता। यहाँ भी तो सूखा पड़ता है, पाला गिरता है, ऊख में दीमक लगते हैं, जौ में गेरूई लगती है, सरसों में लाही लग जाती है। उसे रात को कोई काम मिल जायगा तो उसे भी न छोड़ेगा। दिन-भर मजूरी की, रात कहीं चौकीदारी करलेगा। दो आने भी रात के काम में मिल जायँ, तो चाँदी है। जब वह लौटेगा, तो सबके लिए साड़ियाँ लाएगा। झुनिया के लिए हाथ का कंगन जरूर बनवायगा और दादा के लिए एक मुंड़ासा लाएगा।
इन्हीं मनमोदकों का स्वाद लेता हुआ वह सो गया, लेकिन ठंड में नींद कहाँ! किसी तरह रात काटी और तड़के उठ कर लखनऊ की सड़क पकड़ ली। बीस कोस ही तो है। साँझ तक पहुँच जायगा। गाँव का कौन आदमी वहाँ आता-जाता है और वह अपना ठिकाना ही क्यों लिखेगा, नहीं दादा दूसरे ही दिन सिर पर सवार हो जाएँगे। उसे कुछ पछतावा था, तो यही कि झुनिया से क्यों न साफ-साफ कह दिया - अभी तू घर जा, मैं थोड़े दिनों में कुछ कमा कर लौटूँगा, लेकिन तब वह घर जाती ही क्यों? कहती - मैं भी तुम्हारे साथ लौटूँगी। उसे वह कहाँ-कहाँ बाँधे फिरता?
दिन चढ़ने लगा। रात को कुछ न खाया था। भूख मालूम होने लगी। पाँव लड़खड़ाने लगे। कहीं बैठ कर दम लेने की इच्छा होती थी। बिना कुछ पेट में डाले, वह अब नहीं चल सकता, लेकिन पास एक पैसा भी नहीं है। सड़क के किनारे झड़बेरियों के झाड़ थे। उसने थोड़े से बेर तोड़ लिए और उदर को बहलाता हुआ चला। एक गाँव में गुड़ पकने की सुगंध आई। अब मन न माना। कोल्हाड़ में जा कर लोटा-डोर माँगा और पानी भर कर चुल्लू से पीने बैठा कि एक किसान ने कहा - अरे भाई, क्या निराला ही पानी पियोगे? थोड़ा-सा मीठा खा लो। अबकी और चला लें कोल्हू और बना लें खाँड़। अगले साल तक मिल तैयार हो जायगी, सारी ऊख खड़ी बिक जायगी। गुड़ और खाँड़ के भाव चीनी मिलेगी, तो हमारा गुड़ कौन लेगा? उसने एक कटोरे में गुड़ की कई पिंडियाँ ला कर दीं। गोबर ने गुड़ खाया, पानी पिया। तमाखू तो पीते होगे? गोबर ने बहाना किया - अभी चिलम नहीं पीता। बुड्ढे ने प्रसन्न हो कर कहा - बड़ा अच्छा करते हो भैया! बुरा रोग है। एक बेर पकड़ ले, तो जिंदगी-भर नहीं छोड़ता।
इंजन को कोयला-पानी भी मिल गया। चाल तेज हुई। जाड़े के दिन, न जाने कब दोपहर हो गया। एक जगह देखा, एक युवती एक वृक्ष के नीचे पति से सत्याग्रह किए बैठी थी। पति सामने खड़ा उसे मना रहा था। दो-चार राहगीर तमाशा देखने खड़े हो गए थे। गोबर भी खड़ा हो गया। मानलीला से रोचक और कौन जीवन-नाटक होगा। युवती ने पति की ओर घूर कर कहा - मैं न जाऊँगी, न जाऊँगी, न जाऊँगी।
पुरुष ने जैसे अल्टिमेटम दिया - न जाएगी?
'न जाऊँगी।'
'न जाएगी?'
'न जाऊँगी।'
पुरुष ने उसके केश पकड़ कर घसीटना शुरू किया। युवती भूमि पर लोट गई।
पुरुष ने हार कर कहा - मैं फिर कहता हूँ, उठ कर चल।
स्त्री ने उसी दृढ़ता से कहा - मैं तेरे घर सात जलम न जाऊँगी, बोटी-बोटी काट डाल।
'मैं तेरा गला काट लूँगा!'
'तो फाँसी पाओगे।'
पुरुष ने उसके केश छोड़ दिए और सिर पर हाथ रख कर बैठ गया। पुरुषत्व अपने चरम सीमा तक पहुँच गया। उसके आगे अब उसका कोई बस नहीं है।
एक क्षण में वह फिर खड़ा हुआ और परास्त हो कर बोला - आखिर तू क्या चाहती है?
युवती भी उठ बैठी और निश्चल भाव से बोली - मैं यही चाहती हूँ, तू मुझे छोड़ दे।
'कुछ मुँह से कहेगी, क्या बात हुई?'
'मेरे माई-बाप को कोई क्यों गाली दे?'
'किसने गाली दी, तेरे माई-बाप को?'
'जा कर अपने घर में पूछ।'
'चलेगी तभी तो पूछूँगा?'
'तू क्या पूछेगा? कुछ दम भी है। जा कर अम्माँ के आँचल में मुँह ढाँक कर सो। वह तेरी माँ होगी। मेरी कोई नहीं है। तू उसकी गालियाँ सुन। मैं क्यों सुनूँ? एक रोटी खाती हूँ, तो चार रोटी का काम करती हूँ। क्यों किसी की धौंस सहूँ? मैं तेरा एक पीतल का छल्ला भी तो नहीं जानती!'
राहगीरों को इस कलह में अभिनय का आनंद आ रहा था, मगर उसके जल्द समाप्त होने की कोई आशा न थी। मंजिल खोटी होती थी। एक-एक करके लोग खिसकने लगे। गोबर को पुरुष की निर्दयता बुरी लग रही थी। भीड़ के सामने तो कुछ न कह सकता था। मैदान खाली हुआ तो बोला - भाई, मर्द और औरत के बीच में बोलना तो न चाहिए, मगर इतनी बेदरदी भी अच्छी नहीं होती।
पुरुष ने कौड़ी की-सी आँखें निकाल कर कहा - तुम कौन हो?
गोबर ने नि:शंक भाव से कहा - मैं कोई हूँ, लेकिन अनुचित बात देख कर सभी को बुरा लगता है।
पुरुष ने सिर हिला कर कहा - मालूम होता है, अभी मेहरिया नहीं आई, तभी इतना दरद है!
'मेहरिया आएगी, तो भी उसके झोटे पकड़ कर न खींचूँगा।'
'अच्छा, तो अपने राह लो। मेरी औरत है, मैं उसे मारूँगा, काटूँगा। तुम कौन होते हो बोलने वाले। चले जाओ सीधे से, यहाँ मत खड़े हो।'
गोबर का गर्म खून और गर्म हो गया। वह क्यों चला जाय? सड़क सरकार की है। किसी के बाप की नहीं है। वह जब तक चाहे, वहाँ खड़ा रह सकता है। वहाँ से उसे हटाने का किसी को अधिकार नहीं है।
पुरुष ने होंठ चबा कर कहा - तो तुम न जाओगे? आऊँ?
गोबर ने अँगोछा कमर में बाँध लिया और समर के लिए तैयार हो कर बोला- तुम आओ या न आओ। मैं तो तभी जाऊँगा, जब मेरी इच्छा होगी।
'तो मालूम होता है, हाथ-पैर तुड़ा के जाओगे?'
'यह कौन जानता है, किसके हाथ-पाँव टूटेंगे।'
'तो तुम न जाओगे?'
'ना।'
पुरुष मुट्ठी बाँध कर गोबर की ओर झपटा। उसी क्षण युवती ने उसकी धोती पकड़ ली और उसे अपनी ओर खींचती हुई गोबर से बोली - तुम क्यों लड़ाई करने पर उतारू हो रहे हो जी, अपने राह क्यों नहीं जाते? यहाँ कोई तमासा है? हमारा आपस का झगड़ा है। कभी वह मुझे मारता है, कभी मैं उसे डाँटती हूँ। तुमसे मतलब?
गोबर यह धिक्कार पा कर चलता बना। दिल में कहा - यह औरत मार खाने ही लायक है।
गोबर आगे निकल गया, तो युवती ने पति को डाँटा - तुम सबसे लड़ने क्यों लगते हो? उसने कौन-सी बुरी बात कही थी कि तुम्हें चोट लग गई। बुरा काम करोगे, तो दुनिया बुरा कहेगी ही, मगर है किसी भले घर का और अपने बिरादरी का ही जान पड़ता है। क्यों उसे अपने बहन के लिए नहीं ठीक कर लेते?
पति ने संदेह के स्वर में कहा - क्या अब तक कुँआरा बैठा होगा?
'तो पूछ ही क्यों न लो?'
पुरुष ने दस कदम दौड़ कर गोबर को आवाज दी और हाथ से ठहर जाने का इशारा किया। गोबर ने समझा, शायद फिर इसके सिर भूत सवार हुआ, तभी ललकार रहा है। मार खाए बगैर न मानेगा। अपने गाँव में कुत्ता भी शेर हो जाता है, लेकिन आने दो।
लेकिन उसके मुख पर समर की ललकार न थी, मैत्री का निमंत्रण था। उसने गाँव और नाम और जात पूछी। गोबर ने ठीक-ठीक बता दिया। उस पुरुष का नाम कोदई था।
कोदई ने मुस्करा कर कहा - हम दोनों में लड़ाई होते-होते बची। तुम चले आए, तो मैंने सोचा, तुमने ठीक ही कहा - मैं हक-नाहक तुमसे तन बैठा। कुछ खेती-बारी घर में होती है न?
गोबर ने बताया - उसके मौरूसी पाँच बीघे खेत हैं और एक हल की खेती होती है।
'मैंने तुम्हें जो भला-बुरा कहा है, उसकी माफी दे दो भाई! क्रोध में आदमी अंधा हो जाता है। औरत गुन-सहूर में लच्छमी है, मुदा कभी-कभी न जाने कौन-सा भूत इस पर सवार हो जाता है। अब तुम्हीं बताओ, माता पर मेरा क्या बस है? जनम तो उन्हीं ने दिया है, पाला-पोसा तो उन्होंने है। जब कोई बात होगी, तो मैं जो कुछ कहूँगा, लुगाई ही से कहूँगा। उस पर अपना बस है। तुम्हीं सोचो, मैं कुपद तो नहीं कह रहा हूँ? हाँ, मुझे उसके बाल पकड़ कर घसीटना न था, लेकिन औरत जात बिना कुछ ताड़ना दिए काबू में भी तो नहीं रहती। चाहती है, माँ से अलग हो जाऊँ। तुम्हीं सोचो, कैसे अलग हो जाऊँ और किससे अलग हो जाऊँ! अपनी माँ से? जिसने जनम दिया? यह मुझसे न होगा। औरत रहे या जाए।'
गोबर को भी राय बदलनी पड़ी। बोला - माता का आदर करना तो सबका धरम ही है भाई। माता से कौन उरिन हो सकता है?
कोदई ने उसे अपने घर चलने का नेवता दिया। आज वह किसी तरह लखनऊ नहीं पहुँच सकता। कोस दो-कोस जाते-जाते साँझ हो जायगी। रात को कहीं टिकना ही पड़ेगा।
गोबर ने विनोद किया - लुगाई मान गई?
'न मानेगी तो क्या करेगी।'
'मुझे तो उसने ऐसी फटकार बताई कि मैं लजा गया।'
'वह खुद पछता रही है। चलो, जरा माता जी को समझा देना। मुझसे तो कुछ कहते नहीं बनता। उन्हें भी सोचना चाहिए कि बहू को बाप-माई की गाली क्यों देती है। हमारी भी बहन है। चार दिन में उसकी सगाई हो जायगी। उसकी सास हमें गालियाँ देगी, तो उससे सुना न जायगा? सब दोस लुगाई ही का नहीं है। माता का भी दोस है। जब हर बात में वह अपनी बेटी का पच्छ करेंगी, तो हमें बुरा लगेगा ही। इसमें इतनी बात अच्छी है कि घर से रूठ कर चली जाय, पर गाली का जवाब गाली से नहीं देती।'
गोबर को रात के लिए कोई ठिकाना चाहिए था ही। कोदई के साथ हो लिया। दोनों फिर उसी जगह आए, जहाँ युवती बैठी हुई थी। वह अब गृहिणी बन गई थी। जरा-सा घूँघट निकाल लिया था और लजाने लगी थी।
कोदई ने मुस्करा कर कहा - यह तो आते ही न थे। कहते थे, ऐसी डाँट सुनने के बाद उनके घर कैसे जायँ?
युवती ने घूँघट की आड़ से गोबर को देख कर कहा - इतनी ही डाँट में डर गए? लुगाई आ जायगी, तब कहाँ भागोगे?
गाँव समीप ही था। गाँव क्या था, पुरवा था, दस-बारह घरों का, जिसमें आधे खपरैल के थे, आधे फूस के। कोदई ने अपने घर पहुँच कर खाट निकाली, उस पर एक दरी डाल दी, शर्बत बनाने को कह, चिलम भर लाया। और एक क्षण में वही युवती लोटे में शर्बत ले कर आई और गोबर को पानी का एक छींटा मार कर मानो क्षमा माँग ली। वह अब उसका ननदोई हो रहा था। फिर क्यों न अभी से छेड़-छाड़ शुरू कर दे।
इन्हीं मनमोदकों का स्वाद लेता हुआ वह सो गया, लेकिन ठंड में नींद कहाँ! किसी तरह रात काटी और तड़के उठ कर लखनऊ की सड़क पकड़ ली। बीस कोस ही तो है। साँझ तक पहुँच जायगा। गाँव का कौन आदमी वहाँ आता-जाता है और वह अपना ठिकाना ही क्यों लिखेगा, नहीं दादा दूसरे ही दिन सिर पर सवार हो जाएँगे। उसे कुछ पछतावा था, तो यही कि झुनिया से क्यों न साफ-साफ कह दिया - अभी तू घर जा, मैं थोड़े दिनों में कुछ कमा कर लौटूँगा, लेकिन तब वह घर जाती ही क्यों? कहती - मैं भी तुम्हारे साथ लौटूँगी। उसे वह कहाँ-कहाँ बाँधे फिरता?
दिन चढ़ने लगा। रात को कुछ न खाया था। भूख मालूम होने लगी। पाँव लड़खड़ाने लगे। कहीं बैठ कर दम लेने की इच्छा होती थी। बिना कुछ पेट में डाले, वह अब नहीं चल सकता, लेकिन पास एक पैसा भी नहीं है। सड़क के किनारे झड़बेरियों के झाड़ थे। उसने थोड़े से बेर तोड़ लिए और उदर को बहलाता हुआ चला। एक गाँव में गुड़ पकने की सुगंध आई। अब मन न माना। कोल्हाड़ में जा कर लोटा-डोर माँगा और पानी भर कर चुल्लू से पीने बैठा कि एक किसान ने कहा - अरे भाई, क्या निराला ही पानी पियोगे? थोड़ा-सा मीठा खा लो। अबकी और चला लें कोल्हू और बना लें खाँड़। अगले साल तक मिल तैयार हो जायगी, सारी ऊख खड़ी बिक जायगी। गुड़ और खाँड़ के भाव चीनी मिलेगी, तो हमारा गुड़ कौन लेगा? उसने एक कटोरे में गुड़ की कई पिंडियाँ ला कर दीं। गोबर ने गुड़ खाया, पानी पिया। तमाखू तो पीते होगे? गोबर ने बहाना किया - अभी चिलम नहीं पीता। बुड्ढे ने प्रसन्न हो कर कहा - बड़ा अच्छा करते हो भैया! बुरा रोग है। एक बेर पकड़ ले, तो जिंदगी-भर नहीं छोड़ता।
इंजन को कोयला-पानी भी मिल गया। चाल तेज हुई। जाड़े के दिन, न जाने कब दोपहर हो गया। एक जगह देखा, एक युवती एक वृक्ष के नीचे पति से सत्याग्रह किए बैठी थी। पति सामने खड़ा उसे मना रहा था। दो-चार राहगीर तमाशा देखने खड़े हो गए थे। गोबर भी खड़ा हो गया। मानलीला से रोचक और कौन जीवन-नाटक होगा। युवती ने पति की ओर घूर कर कहा - मैं न जाऊँगी, न जाऊँगी, न जाऊँगी।
पुरुष ने जैसे अल्टिमेटम दिया - न जाएगी?
'न जाऊँगी।'
'न जाएगी?'
'न जाऊँगी।'
पुरुष ने उसके केश पकड़ कर घसीटना शुरू किया। युवती भूमि पर लोट गई।
पुरुष ने हार कर कहा - मैं फिर कहता हूँ, उठ कर चल।
स्त्री ने उसी दृढ़ता से कहा - मैं तेरे घर सात जलम न जाऊँगी, बोटी-बोटी काट डाल।
'मैं तेरा गला काट लूँगा!'
'तो फाँसी पाओगे।'
पुरुष ने उसके केश छोड़ दिए और सिर पर हाथ रख कर बैठ गया। पुरुषत्व अपने चरम सीमा तक पहुँच गया। उसके आगे अब उसका कोई बस नहीं है।
एक क्षण में वह फिर खड़ा हुआ और परास्त हो कर बोला - आखिर तू क्या चाहती है?
युवती भी उठ बैठी और निश्चल भाव से बोली - मैं यही चाहती हूँ, तू मुझे छोड़ दे।
'कुछ मुँह से कहेगी, क्या बात हुई?'
'मेरे माई-बाप को कोई क्यों गाली दे?'
'किसने गाली दी, तेरे माई-बाप को?'
'जा कर अपने घर में पूछ।'
'चलेगी तभी तो पूछूँगा?'
'तू क्या पूछेगा? कुछ दम भी है। जा कर अम्माँ के आँचल में मुँह ढाँक कर सो। वह तेरी माँ होगी। मेरी कोई नहीं है। तू उसकी गालियाँ सुन। मैं क्यों सुनूँ? एक रोटी खाती हूँ, तो चार रोटी का काम करती हूँ। क्यों किसी की धौंस सहूँ? मैं तेरा एक पीतल का छल्ला भी तो नहीं जानती!'
राहगीरों को इस कलह में अभिनय का आनंद आ रहा था, मगर उसके जल्द समाप्त होने की कोई आशा न थी। मंजिल खोटी होती थी। एक-एक करके लोग खिसकने लगे। गोबर को पुरुष की निर्दयता बुरी लग रही थी। भीड़ के सामने तो कुछ न कह सकता था। मैदान खाली हुआ तो बोला - भाई, मर्द और औरत के बीच में बोलना तो न चाहिए, मगर इतनी बेदरदी भी अच्छी नहीं होती।
पुरुष ने कौड़ी की-सी आँखें निकाल कर कहा - तुम कौन हो?
गोबर ने नि:शंक भाव से कहा - मैं कोई हूँ, लेकिन अनुचित बात देख कर सभी को बुरा लगता है।
पुरुष ने सिर हिला कर कहा - मालूम होता है, अभी मेहरिया नहीं आई, तभी इतना दरद है!
'मेहरिया आएगी, तो भी उसके झोटे पकड़ कर न खींचूँगा।'
'अच्छा, तो अपने राह लो। मेरी औरत है, मैं उसे मारूँगा, काटूँगा। तुम कौन होते हो बोलने वाले। चले जाओ सीधे से, यहाँ मत खड़े हो।'
गोबर का गर्म खून और गर्म हो गया। वह क्यों चला जाय? सड़क सरकार की है। किसी के बाप की नहीं है। वह जब तक चाहे, वहाँ खड़ा रह सकता है। वहाँ से उसे हटाने का किसी को अधिकार नहीं है।
पुरुष ने होंठ चबा कर कहा - तो तुम न जाओगे? आऊँ?
गोबर ने अँगोछा कमर में बाँध लिया और समर के लिए तैयार हो कर बोला- तुम आओ या न आओ। मैं तो तभी जाऊँगा, जब मेरी इच्छा होगी।
'तो मालूम होता है, हाथ-पैर तुड़ा के जाओगे?'
'यह कौन जानता है, किसके हाथ-पाँव टूटेंगे।'
'तो तुम न जाओगे?'
'ना।'
पुरुष मुट्ठी बाँध कर गोबर की ओर झपटा। उसी क्षण युवती ने उसकी धोती पकड़ ली और उसे अपनी ओर खींचती हुई गोबर से बोली - तुम क्यों लड़ाई करने पर उतारू हो रहे हो जी, अपने राह क्यों नहीं जाते? यहाँ कोई तमासा है? हमारा आपस का झगड़ा है। कभी वह मुझे मारता है, कभी मैं उसे डाँटती हूँ। तुमसे मतलब?
गोबर यह धिक्कार पा कर चलता बना। दिल में कहा - यह औरत मार खाने ही लायक है।
गोबर आगे निकल गया, तो युवती ने पति को डाँटा - तुम सबसे लड़ने क्यों लगते हो? उसने कौन-सी बुरी बात कही थी कि तुम्हें चोट लग गई। बुरा काम करोगे, तो दुनिया बुरा कहेगी ही, मगर है किसी भले घर का और अपने बिरादरी का ही जान पड़ता है। क्यों उसे अपने बहन के लिए नहीं ठीक कर लेते?
पति ने संदेह के स्वर में कहा - क्या अब तक कुँआरा बैठा होगा?
'तो पूछ ही क्यों न लो?'
पुरुष ने दस कदम दौड़ कर गोबर को आवाज दी और हाथ से ठहर जाने का इशारा किया। गोबर ने समझा, शायद फिर इसके सिर भूत सवार हुआ, तभी ललकार रहा है। मार खाए बगैर न मानेगा। अपने गाँव में कुत्ता भी शेर हो जाता है, लेकिन आने दो।
लेकिन उसके मुख पर समर की ललकार न थी, मैत्री का निमंत्रण था। उसने गाँव और नाम और जात पूछी। गोबर ने ठीक-ठीक बता दिया। उस पुरुष का नाम कोदई था।
कोदई ने मुस्करा कर कहा - हम दोनों में लड़ाई होते-होते बची। तुम चले आए, तो मैंने सोचा, तुमने ठीक ही कहा - मैं हक-नाहक तुमसे तन बैठा। कुछ खेती-बारी घर में होती है न?
गोबर ने बताया - उसके मौरूसी पाँच बीघे खेत हैं और एक हल की खेती होती है।
'मैंने तुम्हें जो भला-बुरा कहा है, उसकी माफी दे दो भाई! क्रोध में आदमी अंधा हो जाता है। औरत गुन-सहूर में लच्छमी है, मुदा कभी-कभी न जाने कौन-सा भूत इस पर सवार हो जाता है। अब तुम्हीं बताओ, माता पर मेरा क्या बस है? जनम तो उन्हीं ने दिया है, पाला-पोसा तो उन्होंने है। जब कोई बात होगी, तो मैं जो कुछ कहूँगा, लुगाई ही से कहूँगा। उस पर अपना बस है। तुम्हीं सोचो, मैं कुपद तो नहीं कह रहा हूँ? हाँ, मुझे उसके बाल पकड़ कर घसीटना न था, लेकिन औरत जात बिना कुछ ताड़ना दिए काबू में भी तो नहीं रहती। चाहती है, माँ से अलग हो जाऊँ। तुम्हीं सोचो, कैसे अलग हो जाऊँ और किससे अलग हो जाऊँ! अपनी माँ से? जिसने जनम दिया? यह मुझसे न होगा। औरत रहे या जाए।'
गोबर को भी राय बदलनी पड़ी। बोला - माता का आदर करना तो सबका धरम ही है भाई। माता से कौन उरिन हो सकता है?
कोदई ने उसे अपने घर चलने का नेवता दिया। आज वह किसी तरह लखनऊ नहीं पहुँच सकता। कोस दो-कोस जाते-जाते साँझ हो जायगी। रात को कहीं टिकना ही पड़ेगा।
गोबर ने विनोद किया - लुगाई मान गई?
'न मानेगी तो क्या करेगी।'
'मुझे तो उसने ऐसी फटकार बताई कि मैं लजा गया।'
'वह खुद पछता रही है। चलो, जरा माता जी को समझा देना। मुझसे तो कुछ कहते नहीं बनता। उन्हें भी सोचना चाहिए कि बहू को बाप-माई की गाली क्यों देती है। हमारी भी बहन है। चार दिन में उसकी सगाई हो जायगी। उसकी सास हमें गालियाँ देगी, तो उससे सुना न जायगा? सब दोस लुगाई ही का नहीं है। माता का भी दोस है। जब हर बात में वह अपनी बेटी का पच्छ करेंगी, तो हमें बुरा लगेगा ही। इसमें इतनी बात अच्छी है कि घर से रूठ कर चली जाय, पर गाली का जवाब गाली से नहीं देती।'
गोबर को रात के लिए कोई ठिकाना चाहिए था ही। कोदई के साथ हो लिया। दोनों फिर उसी जगह आए, जहाँ युवती बैठी हुई थी। वह अब गृहिणी बन गई थी। जरा-सा घूँघट निकाल लिया था और लजाने लगी थी।
कोदई ने मुस्करा कर कहा - यह तो आते ही न थे। कहते थे, ऐसी डाँट सुनने के बाद उनके घर कैसे जायँ?
युवती ने घूँघट की आड़ से गोबर को देख कर कहा - इतनी ही डाँट में डर गए? लुगाई आ जायगी, तब कहाँ भागोगे?
गाँव समीप ही था। गाँव क्या था, पुरवा था, दस-बारह घरों का, जिसमें आधे खपरैल के थे, आधे फूस के। कोदई ने अपने घर पहुँच कर खाट निकाली, उस पर एक दरी डाल दी, शर्बत बनाने को कह, चिलम भर लाया। और एक क्षण में वही युवती लोटे में शर्बत ले कर आई और गोबर को पानी का एक छींटा मार कर मानो क्षमा माँग ली। वह अब उसका ननदोई हो रहा था। फिर क्यों न अभी से छेड़-छाड़ शुरू कर दे।