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मेरा
लंड अब लोहे की मुसली जैसा उसके चूतदों की गहराई मे उतर गया था. गीता की
गांद बहुत गुदाज और मुलायम थी. मंजू जितनी टाइट तो नही थी पर बहुत गरम
थी, भट्टि जैसी. मैं उस पर लेट गया और उसके मम्मे पकड़ लिए. उसके मोटे
चूतड़ स्पंज की गद्दी जैसे लग रहे थे. उसकी चूंचियाँ दबाते हुए मैं धीरे
धीरे उसकी गांद मारने लगा. शुरू मे हर धक्के पर उसके मुँह से सिसकी निकल
जाती, बेचारी को बहुत दर्द हो रहा होगा. पर साली पक्की चुदैल थी. पाँच
मिनिट मे उसे मज़ा आने लगा. फिर तो वह खुद ही अपनी कमर हिला कर गांद
मरवाने की कोशिश करने लगी. "भैईयाज़ी, मारो ना! और जम कर मारो, बहुत मज़ा
आ रहा है! हाय अम्मा, बहुत अच्च्छा लग रहा है, तेरे को क्यों मज़ा नही
आता? भैया, मारो मेरी गांद हचक हचक कर, पटक पटक कर चोद मेरी गांद को, माँ
कसम मैं मर जाउन्गि" मैने कस कर गीता की गांद मारी, पूरा मज़ा लिया. मैं
बहुत देर उसके चूतड़ चोदना चाहता था इसीलिए मंजू को सामने बैठकर उसकी बुर
चूसने लगा, नही तो बेचारी अपनी बेटी की गांद चुदति देख कर खुद अपनी चूत
मे उंगली कर रही थी. मन भर कर मैने गीता की गांद चोदि और फिर झाड़ा. बचा
दिन बहुत मज़े मे गया. छुट्टी होने के कारण दिन भर चुदाई चली. गीता के
दूध का मैं ऐसा दीवाना हो गया था की चार घंटे भी नही रुकता था. हर घंटे
उसकी चूंचियाँ चूस लेता, जितना भी दूध मिलता पी जाता. रात को मैने मंजू
से कहा की गीता को गाय जैसा दूह कर गिलास मे दूध निकाले. मेरी बहुत
इच्च्छा थी ऐसे दूध दुहते हुए देखने की. मंजू ने गीता को बाजू मे बैठा कर
उसके हाथ मे गिलास थमाया. गीता ने उसे अपनी चूंची की नोक पर पकड़ कर रखा
और मंजू ने अपनी बेटी के मम्मे दबा दबा कर दूध निकाला. गीता के निपल से
ऐसी धार छूट रही थी की जैसे सच मे गाय हो. पूरा दूध निकालने मे आधा घंटा
लग गया. बीच मे मैं गीता का चुम्मा ले लेता और कभी उसके सामने बैठ कर
उसकी चूत चूस लेता. दुहने का यह कार्यकरम देख कर मुझे इतना मज़ा आया की
मेरा लंड कस कर खड़ा हो गया. गिलास से दूध पीकर मैने फिर एक बार गीता की
गांद मारी. मंजू बहुत खुश थी कि गीता के आने से उसकी गांद की जान तो
च्छुटी. दूसरे दिन मुझे टूर पर जाना पड़ा. दूसरे दिन मुझे टूर पर जाना
पड़ा. दोनो माँ बेटी बहुत निराश हो गयी. उन्हे भी मेरे लंड का ऐसा चस्का
लगा था कि मुझे छ्चोड़ने को तैयार नही थी. मैने समझाया की आकर चुदाई
करेंगे, मेरे लंड को भी आराम की ज़रूरत थी. गीता को मैने सख़्त हिदायत दी
कि मेरी ग़ैरहाज़िरी मे अपना दूध निकाल कर फ्रिज मे रख दे, मैं आ कर
पियुंगा. मैं तीन दिन बाद शाम को वापस आने वाला था. पर काम जल्दी ख़तम हो
जाने से दोपहर को ही आ गया. सोचा अब ऑफीस ना जाकर सीधा घर चल कर आराम
किया जाए. लच के समय दरवाजा खोला. मुझे लगा था की अभी वो दोनो घर मे नही
होंगी, मेरी ग़ैरहाज़िरी मे गाँव चली गयी होंगी. पर जब घर के अंदर आया तो
बेडरूम से हँसने की आवाज़ आई. मैं दबे पाँव बेडरूम के दरवाजे तक गया और
उसे ज़रा सा खोल कर अंदर देखने लगा. जो देखा उससे मेरा लंड तुरंत तन्ना
गया. उस दिन चोद्ते समय माँ बेटी के चुम्मे और मंजू ने जिस तरह गीता के
मम्मे सहला दिए थे, उसे देखकर मेरे मन मे जो संदेह उठा था वह सच था. माँ
बेटी के बीच बड़ी मतवाली प्रेमलीला चल रही थी. मंजू बाई बिस्तर पर
सिरहाने से टिक कर बैठी थी. गीता उसकी गोद मे थी. मंजू उसके बार बार
चुंबन ले रही थी. मंजू का एक हाथ गीता की चूंचियों को दबा रहा था. गीता
अपनी माँ के गले मे बाँहे डाले उसके चुम्मों का जवाब दे रही थी. बीच बीच
मे माँ बेटी जीभ लड़ाती और एक दूसरे की जीभ चूसने लगती थी. मैं अंदर जाना
चाहता था पर अपने लंड को मुठियाता हुआ वहीं खड़ा रहा. सोचा ज़रा देखें तो
आगे ये चुदैल माँ बेटी क्या करती है. गीता बोली "अम्मा, बहुत अच्च्छा लग
रहा है. तू कितना मस्त करती है मेरी बुर को. पर चूंचियाँ फिर टपक रही है,
बर्तन ले आ ना रसोई से और निकाल दे मेरा दूध. बहुत भारी भारी लग रहीं
है." मंजू गीता को चूम कर बोली "कोई ज़रूरत नही बिटिया, दो दिन मे ही सेर
भर दूध जमा हो गया है बाबूजी के लिए, उनके लिए बहुत है, इससे ज़्यादा दूध
वो कहाँ पिएँगे?" गीता मचल कर बोली "पर मैं क्या करूँ अम्मा? बहुत दुख
रही है चुचियाँ" मंजू ने झुक कर उसके मम्मे को प्रेम से चूमते हुए कहा
"तो मैं काहे को हूँ मेरी रानी? मैं खाली कर देती हूँ दो मिनिट मे!" गीता
मंजू बाई से लिपट कर खुशी से चाहक पड़ी "सच अम्मा? बड़ी छुपि रुस्तम
निकली तू? मुझे नही पता था कि तुझे मेरे दूध की आस होगी!" मंजू बाई गीता
को नीचे लिटाते हुए बोली "मुझे तो बहुत दिन की आस है बेटी, सिर्फ़ तेरे
दूध की ही नही, तेरे बदन की भी आस है. जब से बाबूजी से चुदाई शुरू हुई
है, मेरे दिल मे आग सी लग गयी है. मैं तो उनके सामने ही पी लेती पर क्या
पता वो नाराज़ ना हो जाएँ इसीलिए चुप रही. उनके हिस्से का दूध पीने मे
हिचक होती थी. अब आ, तेरी छाति हल्की कर दूं, फिर तेरी बुर हल्की करूँगी"
क्रमशः............
लंड अब लोहे की मुसली जैसा उसके चूतदों की गहराई मे उतर गया था. गीता की
गांद बहुत गुदाज और मुलायम थी. मंजू जितनी टाइट तो नही थी पर बहुत गरम
थी, भट्टि जैसी. मैं उस पर लेट गया और उसके मम्मे पकड़ लिए. उसके मोटे
चूतड़ स्पंज की गद्दी जैसे लग रहे थे. उसकी चूंचियाँ दबाते हुए मैं धीरे
धीरे उसकी गांद मारने लगा. शुरू मे हर धक्के पर उसके मुँह से सिसकी निकल
जाती, बेचारी को बहुत दर्द हो रहा होगा. पर साली पक्की चुदैल थी. पाँच
मिनिट मे उसे मज़ा आने लगा. फिर तो वह खुद ही अपनी कमर हिला कर गांद
मरवाने की कोशिश करने लगी. "भैईयाज़ी, मारो ना! और जम कर मारो, बहुत मज़ा
आ रहा है! हाय अम्मा, बहुत अच्च्छा लग रहा है, तेरे को क्यों मज़ा नही
आता? भैया, मारो मेरी गांद हचक हचक कर, पटक पटक कर चोद मेरी गांद को, माँ
कसम मैं मर जाउन्गि" मैने कस कर गीता की गांद मारी, पूरा मज़ा लिया. मैं
बहुत देर उसके चूतड़ चोदना चाहता था इसीलिए मंजू को सामने बैठकर उसकी बुर
चूसने लगा, नही तो बेचारी अपनी बेटी की गांद चुदति देख कर खुद अपनी चूत
मे उंगली कर रही थी. मन भर कर मैने गीता की गांद चोदि और फिर झाड़ा. बचा
दिन बहुत मज़े मे गया. छुट्टी होने के कारण दिन भर चुदाई चली. गीता के
दूध का मैं ऐसा दीवाना हो गया था की चार घंटे भी नही रुकता था. हर घंटे
उसकी चूंचियाँ चूस लेता, जितना भी दूध मिलता पी जाता. रात को मैने मंजू
से कहा की गीता को गाय जैसा दूह कर गिलास मे दूध निकाले. मेरी बहुत
इच्च्छा थी ऐसे दूध दुहते हुए देखने की. मंजू ने गीता को बाजू मे बैठा कर
उसके हाथ मे गिलास थमाया. गीता ने उसे अपनी चूंची की नोक पर पकड़ कर रखा
और मंजू ने अपनी बेटी के मम्मे दबा दबा कर दूध निकाला. गीता के निपल से
ऐसी धार छूट रही थी की जैसे सच मे गाय हो. पूरा दूध निकालने मे आधा घंटा
लग गया. बीच मे मैं गीता का चुम्मा ले लेता और कभी उसके सामने बैठ कर
उसकी चूत चूस लेता. दुहने का यह कार्यकरम देख कर मुझे इतना मज़ा आया की
मेरा लंड कस कर खड़ा हो गया. गिलास से दूध पीकर मैने फिर एक बार गीता की
गांद मारी. मंजू बहुत खुश थी कि गीता के आने से उसकी गांद की जान तो
च्छुटी. दूसरे दिन मुझे टूर पर जाना पड़ा. दूसरे दिन मुझे टूर पर जाना
पड़ा. दोनो माँ बेटी बहुत निराश हो गयी. उन्हे भी मेरे लंड का ऐसा चस्का
लगा था कि मुझे छ्चोड़ने को तैयार नही थी. मैने समझाया की आकर चुदाई
करेंगे, मेरे लंड को भी आराम की ज़रूरत थी. गीता को मैने सख़्त हिदायत दी
कि मेरी ग़ैरहाज़िरी मे अपना दूध निकाल कर फ्रिज मे रख दे, मैं आ कर
पियुंगा. मैं तीन दिन बाद शाम को वापस आने वाला था. पर काम जल्दी ख़तम हो
जाने से दोपहर को ही आ गया. सोचा अब ऑफीस ना जाकर सीधा घर चल कर आराम
किया जाए. लच के समय दरवाजा खोला. मुझे लगा था की अभी वो दोनो घर मे नही
होंगी, मेरी ग़ैरहाज़िरी मे गाँव चली गयी होंगी. पर जब घर के अंदर आया तो
बेडरूम से हँसने की आवाज़ आई. मैं दबे पाँव बेडरूम के दरवाजे तक गया और
उसे ज़रा सा खोल कर अंदर देखने लगा. जो देखा उससे मेरा लंड तुरंत तन्ना
गया. उस दिन चोद्ते समय माँ बेटी के चुम्मे और मंजू ने जिस तरह गीता के
मम्मे सहला दिए थे, उसे देखकर मेरे मन मे जो संदेह उठा था वह सच था. माँ
बेटी के बीच बड़ी मतवाली प्रेमलीला चल रही थी. मंजू बाई बिस्तर पर
सिरहाने से टिक कर बैठी थी. गीता उसकी गोद मे थी. मंजू उसके बार बार
चुंबन ले रही थी. मंजू का एक हाथ गीता की चूंचियों को दबा रहा था. गीता
अपनी माँ के गले मे बाँहे डाले उसके चुम्मों का जवाब दे रही थी. बीच बीच
मे माँ बेटी जीभ लड़ाती और एक दूसरे की जीभ चूसने लगती थी. मैं अंदर जाना
चाहता था पर अपने लंड को मुठियाता हुआ वहीं खड़ा रहा. सोचा ज़रा देखें तो
आगे ये चुदैल माँ बेटी क्या करती है. गीता बोली "अम्मा, बहुत अच्च्छा लग
रहा है. तू कितना मस्त करती है मेरी बुर को. पर चूंचियाँ फिर टपक रही है,
बर्तन ले आ ना रसोई से और निकाल दे मेरा दूध. बहुत भारी भारी लग रहीं
है." मंजू गीता को चूम कर बोली "कोई ज़रूरत नही बिटिया, दो दिन मे ही सेर
भर दूध जमा हो गया है बाबूजी के लिए, उनके लिए बहुत है, इससे ज़्यादा दूध
वो कहाँ पिएँगे?" गीता मचल कर बोली "पर मैं क्या करूँ अम्मा? बहुत दुख
रही है चुचियाँ" मंजू ने झुक कर उसके मम्मे को प्रेम से चूमते हुए कहा
"तो मैं काहे को हूँ मेरी रानी? मैं खाली कर देती हूँ दो मिनिट मे!" गीता
मंजू बाई से लिपट कर खुशी से चाहक पड़ी "सच अम्मा? बड़ी छुपि रुस्तम
निकली तू? मुझे नही पता था कि तुझे मेरे दूध की आस होगी!" मंजू बाई गीता
को नीचे लिटाते हुए बोली "मुझे तो बहुत दिन की आस है बेटी, सिर्फ़ तेरे
दूध की ही नही, तेरे बदन की भी आस है. जब से बाबूजी से चुदाई शुरू हुई
है, मेरे दिल मे आग सी लग गयी है. मैं तो उनके सामने ही पी लेती पर क्या
पता वो नाराज़ ना हो जाएँ इसीलिए चुप रही. उनके हिस्से का दूध पीने मे
हिचक होती थी. अब आ, तेरी छाति हल्की कर दूं, फिर तेरी बुर हल्की करूँगी"
क्रमशः............