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घाट का पत्थर /गुलशन नंदा

और शुभ समाचार के लिए अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। वह दिन आ ही पहुंचा जब लेडी डॉक्टर ने धीरे-से कमरे के किवाड़ खोले। राज उसे आश्चर्य भरी दृष्टि से देख रहा था। वह मुस्कराकर बोली, 'राज बाबू, बधाई हो! लड़का हुआ है!'

"डॉली कैसी है?'

"सब ठीक है।' लेडी डॉक्टर ने देखा कि यह शुभ समाचार सुनकर राज के मुख पर कोई विशेष प्रसन्नता न आई। उसने सोचा शायद शरमाता है, 'आप अंदर जा सकते हैं।' उसने मुस्कराते हुए कहा।

कोई बात नहीं। राज यह कहते हुए दूसरे कमरे में चला गया। इस प्रकार बीस दिन बीत गए, परंतु राज बच्चे को न देखने गया। डॉली ने यह सब देखा और सिटपिटा-सी गई। फिर क्रोध में भर उठी और राज के पास पहुंची। राज ने उसे देखकर मुंह फेर लिया। 'क्या पूछ सकती हूं कि यह बेरुखी क्यों है?'

'डॉली मैं कुछ दिनों से परेशान हूं, मुझे अकेला छोड़ दो।'

'यह तुम्हें क्या होता जा रहा है? आखिर मैं भी कोई हूं। मुझे भी पता चलना चाहिए।'

'तुम्हें अब यह पूछने का अधिकार नहीं रहा।'

राज का यह उत्तर सुनते ही डॉली का सिर चकरा गया। वह फिर संभली और बोली, 'मेरा अधिकार तो समाप्त हो गया परंतु उस अबोध बालक का क्या अपराध है जिसे तुमने अपनी गोद में अभी तक नहीं लिया? भला ऐसे कठोर हृदय पिता भी होते हैं?'

'तुम सच कहती हो। एक पिता को इतना कठोर हृदय न होना चाहिए। आज्ञा हो तो बुलाऊं इसके पिता को।'

'राज!'

'ठीक कह रहा हूं। बधाई तो अवश्य आई थी परंतु बेचारा स्वयं चलकर न आ सका। शायद लंगड़ी टांग से यह चढ़ाई नहीं चढ़ सकता।'

डॉली स्तब्ध रह गई। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। उसे लगा, अब वह एक क्षण भी अपने को संभाल न सकेगी। वह गिर पड़ी और बेहोश हो गई।

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बरसात की एक तूफानी रात थी। बादल गरज रहे थे। राज अपने कमरे में सो रहा था। दूसरे कमरे में डॉली खिड़की में बैठी चुपचाप कुछ सोच रही थी। वह बहुत उदास थी। राज द्वारा लगाए गए इस आरोप ने उसे असीम दुःख पहुंचाया था। उसका हृदय रो रहा था परंतु आंखों में एक भी आंसू न था। लगता था कि वह सब आंसू पी चुकी हैं और आंखें पथरा चुकी हैं। वह पथराई आंखों से कभी बाहर तूफान को देखती और कभी पालने में पड़े नन्हें बालक को देखती। डॉली ने बरसात के सात दिन और सात रातें इसी प्रकार ऐसे ही बैठे बिता दी। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से इतनी घृणा कर सकता है, वह यह न जानती थी। उसके सामने बार-बार मुंडेर का वह दृश्य आता और राज काले कपड़े पहने उसे मृत्यु का निमंत्रण देता दिखाई देता। वह यह देख मुस्करा देती। अब उसे ऐसी बातें भयभीत न कर सकती थी।

एक रात जब राज अपने कमरे में बैठा था तो उसने डॉली की आवाज सुनी। वह चौंक पड़ा। डॉली कह रही थी, 'मैं कल बंबई जा रही हूं।'

राज ने मुड़कर देखा, डॉली निर्भय होकर उसके सामने खड़ी थी। राज चुपचाप उसे देखता रहा। वह फिर बोली, 'यदि आप चाहें तो कुसुम को भी साथ ले जाऊं?'

'परंतु अचानक यह क्या सूझा तुम्हें?'

'मैं आज्ञा लेने नहीं, सूचना देने आई हूं।'

राज एकटक उसके मुख की ओर देखता रहा। वह अनुभव कर रहा था कि अब उसे डॉली को रोकने का कोई अधिकार नहीं और न ही उसमें अब इतना साहस है। राज को मौन देखकर डॉली ने फिर पूछा, 'तो आपने कुसुम के बारे में क्या सोचा?'

कुछ देर चुप रहकर राज बोला, 'वह तुम्हारे साथ नहीं जा सकती।' यह कहकर राज सामने की खिड़की की ओर देखने लगा।

डॉली वहां से जा चुकी थी। डॉली ने दसरे दिन रात की गाडी से जाने का निश्चय किया। जब जाने का समय आया तो वह राज से मिलने गई। राज अपने कमरे में अकेला बैठा मानों इसी समय की प्रतीक्षा कर रहा था। डॉली अंदर आई, तो उठ खड़ा हुआ। डॉली बोली, 'तो मैं जा रही हूं।' उसने एक अटैची केस मेज पर रखते हुए कहा, 'ये मेरे गहने हैं। जब कुसुम बड़ी हो और उसका विवाह करने लगें तो मेरी ओर से यह कह देना कि तुम्हारी मा ने मरते समय यह तुम्हारे लिए दिए थे।' यह कहकर डॉली उस ओर बढ़ी जिधर कुसुम सो रही थी। यह अच्छा हुआ कि कुसुम इस समय सो रही है। नहीं तो मुझे इतनी सरलता से न जाने देती। यह कहते ही उसने कुसुम को चूम लिया।
 
'घोड़ा गाड़ी नीचे आ गई है बीबीजी।' हरिया ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा।

'अच्छा, तुम सामान रखो, मैं आती हूं।' यह कहकर वह बरामदे की ओर बढ़ी और अंतिम बार राज की ओर देखा। राज हैरान था कि यह सब होने पर भी डॉली की आंखों में एक भी आंसू न था। वह डॉली की आवाज सुनकर चौंक पड़ा। वह कह रही थी, मैं जा रही हूं। राज मूर्तिवत खड़ा रहा। उसने सोचा लोगों से जाकर क्या कहेगी। लड़की साथ क्यों नहीं लाई। और लड़का-लड़की होती तो मेरा क्या बिगाड़ लेती, परंतु हो सकता है कि कल जब यह बालक बंबई के वातावरण में बड़ा हो जाएगा तो मेरे लिए एक दिन भय का कारण बन सकता है। हो सकता है कि डॉली अपना बदला लेने के लिए उससे कुछ काम ले और अगर न भी ले तो जब इसे पता लगेगा कि इसकी मां क्यों चंद्रपुर से चली गई तो स्वयं बदला लेने के लिए अवश्य आएगा। अचानक इस प्रकार के विचार उसके हृदय में उठने लगे। परंतु वह करता भी क्या।

डॉली की आवाज ने उसे फिर चौंका दिया, मैंने कहा, 'मैं जा रही हूं।'

'ओह, अच्छा , परंतु।'

'क्यों ?'

'इस बच्चे को तुम साथ नहीं ले जा सकती।'

'परंतु क्यों?'

'कोई विशेष बात तो नहीं। ऐसे ही। अपनी एक निशानी तो मेरे पास छोड़ जाओ।'

'अभी तो यह....।'

'इसकी तुम चिंता न करो। सब प्रबंध हो जाएगा।'

'कहीं इसे कुछ....।'

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'मुझ पर विश्वास करो। इसे छोड़ने में ही तुम्हारी भलाई है।'

डॉली कुछ देर मौन खड़ी सोचती रही। यदि वह इस बालक को वहां छोड़ दे तो संभव है कि राज अपने कहे पर शीघ्र ही पछताए। राज ने उसे इस प्रकार जाते देखा और चुपचाप खड़ा रहा। ड्योढ़ी तक पहुंचने पर डॉली ने केवल एक बार मुड़कर देखा और बाहर निकल गई।

'हरिया, हरिया।' राज ने आवाज दी।

'जी!'

'देखो, स्टेशन तक बीबीजी के साथ जाओ। इन्हें अच्छी तरह आराम से गाड़ी में बिठा देना और यह लो पांच सौ रुपये। जब गाड़ी चलने लगे तो डॉली को यह मेरी ओर से दे देना। जाओ जल्दी से।'

हरिया ने रुपये ले लिए और उन्हें अंगोछे के पल्ले में बांधता हुआ जल्दी से ड्योढ़ी के बाहर चला गया। डॉली के जाने के बाद राज ने पालने में पड़े बालक को देखा, वह चुपचाप सो रहा था। उसके मुंह से निकला, 'निशानी, निशानी, अंतिम निशानी... मुझे संभालकर रखनी होगा। मनुष्य के पास तीन वस्तुएं होती हैं, आदर, हृदय और जीवन जिन्हें वह खोना नहीं चाहता। एक मैं हूं। हृदय तो रहा ही नहीं। आदर मेरा मेरे सामने जा रहा है। बाकी रहा यह जीवन जो आदर और हृदय के बिना कुछ भी तो नहीं।'

परंतु राज जीवन में कभी नहीं हारा था। वह प्रत्येक आपत्ति का सामना कर सकता था। वह अपना जीवन हृदय और आदर के बिना बिता सकता था। 'मुनीमजी।' राज ने आवाज दी।

'जी!' मुनीम भागता हुआ आया।

'जाओ. एक आया का प्रबंध करो जो इस बच्चे को पाल सके। परंतु ध्यान रहे कि किसी नीच वंश की न हो।'

'परंतु ऐसी मिलेगी कहां'

'क्या कहा?

खैर चिंता न करो, समझो मिल गई।' यह कहते हुए राज कमरे से जाने लगा।

'हुजूर कौन?' राज रुक गया और मुस्कराते हुए बोला, 'तुम्हारी बहू।'

दूसरे ही दिन से दोनों का पालन-पोषण मुनीमजी की पत्नी सुंदरी को सौंप दिया गया और बालकों को सब प्रकार का आराम पहुंचाने का प्रबंध किया गया। धीरे-धीरे बच्चे उसके साथ घुल-मिल गए। मुनीमजी के अपने बच्चे न थे इसलिए सुंदरी दोनों बच्चों का भली प्रकार ध्यान रख सकती थी। दोनों बालक बड़े होने लगे। लड़के का नाम रंजन रखा गया। कुसुम और रंजन जब चलने, फिरने और समझने लग गए तो सुंदरी मां के स्थान पर उनकी धाय बन गई। कुसुम को तो राज शहर ले गया और वहां बोर्डिंग में भर्ती करा दिया और रंजन को उसने अपने पास ही रखा। रंजन आठ वर्ष का हो गया परंतु राज ने अभी तक उसकी शिक्षा का कोई प्रबंध न किया। वह उसे पढ़ाना न चाहता था। राज की इच्छा यही लगती थी कि जीवन की सब अच्छी से अच्छी बातें कुसुम को सिखाए। परंतु डॉली को लड़के (जैसा कि वह समझता था) के लिए उसके दिल में कोई स्नेह न था बल्कि मन-ही-मन चाहता था कि वह आवारा बने।

रंजन जब थोड़ा बड़ा हुआ तो राज ने उसे संसार के प्रत्येक दुराचार के बारे में कुछ न कुछ बता दिया... कुछ तो कहानियों से और कुछ ताश के पत्तों से। जब कभी वह बुरी संगत की ओर अग्रसर होता तो राज उसे न रोकता। शंकर ने इस अवधि में दो-चार बार राज से मिलने का प्रयत्न किया परंतु राज ने उससे बात करना अस्वीकार कर दिया। डॉली के पत्र भी शंकर के पास आते थे ताकि उसे अपने बच्चों का समाचार मिलता रहे। डॉली और शंकर के बीच जो पत्र-व्यवहार होता था, उसका मुनीमजी के द्वारा राज को पता लगा गया। वह यह सुनकर जल उठता।
 
डॉली बार-बार शंकर को लिखती कि वह किसी प्रकार राज को समझाए कि वह उस बालक का जीवन क्यों नष्ट कर रहा है परंतु शंकर विवश था। राज घृणा के प्रवाह में पड़कर बिल्कुल अंधा हो चुका था। वह यह न समझ सका कि घृणा का पौधा जो वह बड़ा कर रहा है, एक दिन उसे ही ले डूबेगा। बुरी संगत और जान-बूझकर दी गई ढील के कारण रंजन बिगड़ता गया। छोटी आयु में भी उसने पास के गांवों के जुए के अड्डे छान मारे। कई-कई दिन वह घर से बाहर रहता। अभी वह पंद्रह वर्ष का ही था कि उसकी गणना बदमाशों में होने लगी। राज छट्रियों में भी कसम को घर न बलाता। वह उसे वहीं से कहीं और सैर के लिए ले जाता और फिर वापस बोर्डिंग में छोड़ जाता। जब कभी वह रंजन के बारे में पूछती तो यही कहकर टाल देता कि वह उसकी अनुपस्थिति में जमीनों का ध्यान रख रहा है। राज के देखते-देखते रंजन काफी बिगड़ गया और उसे यह जानकर संतोष-सा हुआ। राज को थोड़ा होश उस दिन आया जब उसे सूचना मिली कि उसकी सेफ की नकली चाबी बनवाकर कई सौ रुपया निकल गया है। उसने रंजन से इसके बारे में पूछा तो उसने यही उत्तर दिया, जरूरत थी, इसलिए ले गया।

राज ने उसका यह साहस देखकर उसे बैंतो से मारा परंतु रंजन पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा। राज ने रंजन का सब खर्च इत्यादि बंद कर दिया, परंतु एक दिन मुनीमजी रुपया लेकर घर लौट थे तो रास्ते में ही रंजन ने पिस्तौल से धमकाकर सब रुपया छीन लिया। राज का माथा ठनका। अब उसे अपनी भूल का पछतावा होने लगा। प्रतिदिन कोई-न-कोई नई बात हो जाती जो उसे चिंतित रखने के लिए पर्याप्त थी। रंजन रात को देर से घर लौटता और बहुत सवेरे ही घर से निकल जाता। उसका कोई पता न चलता कि वह कहां जाता है, कहां बैठता है और क्या करता है।

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हवा के हल्के-हल्के झोंके इधर-उधर बिखर रहे थे। प्रातःकाल का सुहावना समय था। सूर्य की प्रथम किरणों ने अभी-अभी चंद्रपुर की पहाड़ियों को चूमा था। चंद्रपुर के छोटे-से सुनसान स्टेशन पर दूर पड़े एक बैंच पर एक पक्की उम्र का व्यक्ति बैठा गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था। उसका मुख प्रभावशाली था। प्लेटफार्म पर यात्री कम दिखाई दे रहे थे। यह व्यक्ति अपनी दृष्टि भूमि पर गाड़े चींटियों की पंक्ति को देख रहा था। अचानक वह किसी के पैर की ठोकर से चौंक गया। आने वाला सिग्नलमैन था जो उसे देखते ही बोला, 'जमींदार साहब क्षमा कीजिएगा, जल्दी में था।'

'कोई बात नहीं रामू। क्यों गाड़ी में कितनी देर है?'

'बस आने को ही है, सिग्नल ठीक करने जा रहा हूं। आप गाड़ी के इंतजार में....।'

'हां, गाड़ी की प्रतीक्षा में बैठा हूं।'

"क्यों कोई आ रहा है?'

'मेरी बेटी आज शहर से शिक्षा समाप्त हो जाने पर लौटकर आ रही है। अभी बी.ए. पास किया है उसने।'

'अच्छा तो आप चलिए अंदर बैठ जाइए, बाबूजी के कमरे में।'

'नहीं, यहां खुली हवा में ठीक हूं।'

'अच्छा।' यह कहकर सिग्नलमैन सिग्नल की ओर चला गया

और जमींदार साहब फिर चींटियों की चलती हुई पंक्ति देखने में लग गए। थोड़ी-थोड़ी देर के बाद वह व्याकुल दृष्टि से सिग्नल की ओर देख लेते। सिग्नल डाउन होने के साथ ही उनकी विकलता भी बढ़ गई। आज चौदह वर्ष के बाद कुसुम चंद्रपुर लौट कर आ रही थी। राज सोच रहा था कि 'कितना अच्छा होता यदि डॉली भी आज उसके साथ आज कुसुम को लेने जाती।'

थोड़ी ही देर के बाद राज बाबू ने दूर गाड़ी का धुआं देखा और धड़कते हृदय से बैंच पर से उठे। वह संभलकर खड़े हो गए। गाड़ी प्लेटफार्म पर आ पहुंची और धीरे से बारी-बारी सब डिब्बे... राज बाबू प्रसन्नता से उस ओर लपके, 'कुसुम तुम आ गई।'

'जी मैंने सोचा शायद पत्र न मिला हो।'

'यह भला कैसे हो सकता है। आओ, नीचे उतर आओ।'

'और सामान....।'

'कोचवान, सामान बाहर निकालो।'

'यह सामने का बिस्तर, ट्रंक और यह टोकरी।' यह कहकर कुसुम नीचे उतर आई। राज बाबू ने अपने हाथ का सहारा दिया। जब डॉली पहले-पहले इस स्टेशन पर उतरी थी तब उसे भी उन्होंने इसी प्रकार सहारा देकर उतारा था। राज ने देखा कि कुसुम भी बिल्कुल मां पर गई है। वही लंबा कद, सुराहीदार गर्दन, सफेद चेहरा और मोटी-मोटी चंचल आंखें, होंठों पर वही शरारत भरी मुस्कराहट। बिल्कुल अपनी मां की जीती-जागती तस्वीर थी वह।

'यह आप मेरी ओर इस प्रकार क्या देख रहे हैं?'

'कुछ नहीं।' राज ने उसके मुख पर से दृष्टि हटाते हुए कहा।

'नहीं, कोई बात अवश्य है। क्यों, मेरी वेशभूषा अच्छी....।'
 
'नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। समय की गति के साथ बढ़ना तो स्वयं भी मुझे पसंद है। लो गाड़ी चली भी गई और हमें पता भी न लगा। चलो, सामान बाहर ले चलो।' राज ने कोचवान से कहा। 'आओ कुसुम।'

दोनों द्वार की ओर बढ़े। स्टेशन मास्टर ने हाथ में टिकट लेते हुए कहा, 'तो यह है आपकी बिटिया जो शहर में शिक्षा पा रही थी। भगवान इसकी आयु बनाए रखे।' दोनों स्टेशन से बाहर पहुंचे। एक सुंदर फिटन स्टेशन के बाहर खड़ी थी। कुसुम उसे देखते ही बोली, 'यह कब ली बाबा?'

'थोड़े ही दिनों में, मैंने सोचा कि मेरी बेटी को यहां घूमने में कष्ट न हो।'

'कितने अच्छे हैं आप!'यह कहते ही कुसुम लपककर घोड़ागाड़ी में बैठ गई। राज भी उसके पास ही बैठ गए। थोड़ी देर के बाद गाड़ी गांव की सड़क पर हो ली। आज पूरे चौदर वर्ष बाद कुसुम वापस गांव लौट रही थी। उसने सोचा कि इस छोटे से स्थान में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हआ। जब वह बचपन में इसे छोड़कर गई थी तब से अब तक उसकी याददाश्त के अनुसार सब ठीक उसी प्रकार था।

'क्या सोच रही हो कुसुम?'

'कुछ नहीं। हां बाबा, आज तो रंजन को स्टेशन पर ले आते।'

राज यह सुनकर कांप गया, संभलकर बोला, 'काम पर गया है।'

'ऐसा भी क्या काम जो उसे इतना भी समय न मिला कि चौदह वर्ष से बिछुड़ी हुई बहन को लेने ही आ जाए।'

'क्या तुम्हें वह बहुत अच्छा लगता है?'

'यह भी भला कोई पूछने की बात है? मेरा भाई है और वह भी एक।'

"ठीक है...।'

'बाबा, अब तो वह बहुत बड़ा हो गया होगा?'

"बहुत बड़ा।'

'मुझे रात से तो बहुत याद आ रहा है और मैं उसे देखने को व्याकुल हूं।'

'पर क्यों?'

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'बाबा आज ट्रेन में कोई आधी रात का समय था। एक आदमी हमारे डिब्बे में घुस आया और वह भी चलती ट्रेन में। मेरे साथ की दोनों स्त्रियां आनंद से सो रही थीं और मैं भी

आंखें बंद करके सोने का प्रयत्न कर रही थी।'

'तो फिर क्या हुआ?'

'वह चुपके से मेरी सीट के पास आ खड़ा हुआ। मैं उसे इस प्रकार देखकर डर-सी गई और अपनी आंखें जोर से बंद कर लीं। मेरा दिल धड़कने लगा। डर से मेरा गला सूखा जा रहा था। मैंने कुछ साहस किया और अपनी एक आंख थोड़ी-सी खोलकर देखने लगी। वह दोनों हाथ आगे किए मेरी ओर बढ़ा आ रहा था। में उसका इरादा जान गई। वह मेरे गले का हार उतारना चाहता था। मैं चीखना चाहती थी परंतु मेरे गले से आवाज न निकल सकी। जब उसके हाथ मेरे बहुत पास आ गए तो मेरी दोनों आंखे खुल गई।

वह यह देखकर कांप गया और पहले दरवाजे के निकट जा खड़ा हुआ।' कुसुम बोलती-बोलती सांस लेने के लिए रुक गई।

"फिर क्या हुआ?'

'मैंने देखा कि वह किसी भले घर का जान पड़ता था। वह फिर ऐसा काम क्यों करता है। मुझे क्रोध के साथ-साथ उस पर दया आने लगी। मुझे न जाने उस समय क्या सूझी कि....।'

"कि मैंने गले से अपना हार उतारकर उसकी ओर बढ़ा दिया और बोली, तुम प्रसन्नता से ले जा सकते हो।'

'वह मेरी ओर आश्चर्यचकित हो देखता रहा और कांपती आवाज में बोला, बहन मुझे क्षमा कर देना। और चलती गाड़ी से उतरने के लिए दरवाजा खोला। यह तुम क्या कर रहे हो? तुम्हें अपने प्राणों की भी चिंता नहीं' मैंने निःसंकोच उससे कहा।

'मैं मृत्यु से नहीं डरता परंतु तुमसे मुझे आज डर लग रहा है।'

वह यह कहता हुआ दरवाजे के डंडे से लटक गया।
 
'इस प्रकार प्राणों को संकट में न डालो। आखिर तुम हो कौन? तुम्हें अपने माता-पिता पर दया नहीं आती? क्या नाम है तुम्हारा?'

'यह तो कभी सोचा ही नहीं। हां, मैंने आज तक अपना नाम किसी को नहीं बताया परंतु तुम्हें बता देता हूं। मेरा नाम रंजन है... यह कहते ही वह गाड़ी से कूद पड़ा। मैंने खिड़की से सिर बाहर निकाला परंतु चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा थी। रंजन का नाम सुनते ही मैं कांप गई, परंतु फिर यह सोचकर अपनी मूर्खता पर हंसने लगी कि हमारा रंजन भला ऐसा हो सकता है!'

कुसुम जब यह सब कुछ कह चुकी तो उसने देखा कि राज बाबू का चेहरा पीला पड़कर पसीने से तर हो गया है। 'क्यों बाबा, क्या हमारा रंजन ऐसा हो सकता है?'

'कुसुम।' राज ने चिल्लाकर कहा और कुसुम सहमकर रह गई। राज ने उसे इस प्रकार भयभीत देखकर पुचकारते हुए कहा, 'ऐसे ही तुमने आते ही भयानक बातें छेड़ दीं।' और राज बाबू ने कुसुम का सिर अपनी छाती से लगा लिया और उसके बालों में प्यार भरा हाथ फेरने लगे।

'रंजन एक-दो दिन के लिए कहीं बाहर गया है। उसे तो यह पता ही नहीं कि तुम आ रही हो। नहीं तो क्या वह स्टेशन पर आए बिना रह सकता था?'

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दो दिन बीत गए परंतु रंजन लौटकर न आया। कुसुम ने बाबा से पूछा तो यह उत्तर पाकर रह गई कि हो सकता है कि काम अधिक होने से कुछ दिन के लिए रुक गया हो। रंजन का नाम सुनते ही बाबा इतने परेशान क्यों हो जाते हैं। उसके हृदय में नाना प्रकार के संदेह उत्पन्न होने लगते। जब कई दिन तक रंजन का कुछ पता न चला तो उसे विश्वास हो गया कि हो न हो इसमें कोई भेद अवश्य ही है।

एक दिन संध्या समय जब जमींदार साहब हवेली की पिछली खिड़की में से बाहर नदी की ओर देख रहे थे तो कुसुम ने आकर पूछा, 'बाबा, अभी तक रंजन लौटकर नहीं आया?'

'हां, इसीलिए तो मैं चिंतित हूं।'

'तो आप स्वयं जाकर क्यों नहीं देखते कि बात क्या है?'

'यही सोच रहा हूं कि यहां का काम....।'

'आप सदा कोई-न-कोई काम का बहाना बना देते हैं।'

'मैं जानता हूं कि तुम उसे देखने के लिए कितनी व्याकुल हो। जहां इतना संतोष किया है कुछ समय के लिए और प्रतीक्षा कर लो।'

'संतोष की भी तो कोई सीमा होती है बाबा।'

'तुम्हारा हृदय बहुत दु:खी है। और होना भी चाहिए। शहर के जीवन से नई-नई इन सुनसान जंगलों में आई हो, कुछ दिन तो ऐसा लगेगा ही।'

'नहीं, ऐसी बात तो नहीं। ये प्राकृतिक दृश्य तो मुझे शहर की फीकी रंगीनियों से कई गुना अधिक अच्छे जान पड़ते हैं।'

'और लगने भी चाहिए। देखो ना।' वह बात बदलते हुए बोले, 'हमारे गांव में अस्त होते हुए सूर्य का दृश्य प्रायः बहुत सुहावना होता है। इस समय जो आनंद आता है वह देखते ही बनता है। देखो नदी के पार पहाड़ियों में सूरज की किरणें कितनी अच्छी प्रतीत होती है। अब थोड़ी ही देर में इन चंचल लहरों पर चांदनी खेलने लगेगी और दूर नदी किनारे बैठा कोई बांसुरी बजाएगा। बांसुरी का मधुर स्वर उस समय कितना मनोहर लगता है, यह तुम भली प्रकार से अनुभव कर सकती हो!' राज बाबू जब वह सब कहे जा रहे थे तो कुसुम एकटक उनके मुख की ओर देख रही थी। आज यह कविता कैसे आरंभ कर दी उन्होंने! जब राज बाबू ने उसे इस प्रकार आश्चर्य भरी दृष्टि से अपनी ओर देखते पाया तो मौन हो गए

और अपनी जीभ अपने होंठों पर फेरने लगे।

'बाबा, जान पड़ता है कि आप मुझसे कोई बात छिपाना चाहते हैं।' कुसुम ने कहा।

'नहीं तो, ऐसा भी क्या है जो मैं....।'

'तो फिर आप मुझसे ठीक-ठीक क्यों नहीं कहते?'

'क्या?'

"कि रंजन कहां है?'

'तुम क्या समझती हो?'

'कहीं वह हमसे...।'

'नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। वह जीवित है।'

'वह जल्दी ही आने वाला है।' किसी की आवाज सुनाई ही। दोनों ने मुड़कर दरवाजे की ओर देखा। शंकर दरवाजे पर खड़ा था। उसे अचानक इस प्रकार देखकर राज बाबू कुछ घबरा-से गए।

'आओ कैसे आना हुआ?' और वह धीरे-धीरे भारी कदम रखते हुए शंकर की ओर बढ़े। राज ने देखा कि शंकर की दृष्टि उनकी ओर न होकर कुसुम की ओर लगी है। राज बोला, 'यह कुसुम है। बेटा, जरा दूसरे कमरे में चली जाओ।'

और कुसुम दूसरे कमरे में चली गई। राज ने दरवाजा बंद कर दिया और शंकर को संबोधित करके बोला, 'कहिए कैसे आना हुआ?'
 
'मैंने भरसक प्रयत्न किया कि इस हवेली की ओर न आऊं परंतु मुझसे रहा न गया।'

'ऐसी भी क्या लाचारी थी?'

'रंजन।'

'कहो!बहुत दिन बाद याद आया। क्या डॉली ने बुलावा भेजा था?'

'नहीं। बल्कि तुम्हारे लाडले की करतूतों ने मुझे आने पर मजबूर किया है। कल सवेरे मेरे चार घोड़े खुलवाकर ले गया है।'

'तो मैं क्या कर सकता हूं! मैंने जमीन किराये पर दे रखी है उसकी चौकीदारी का जिम्मा तो नहीं है मेरा।'

'परंतु जब मालिक ही चोर हो तो क्या करू!'

'अधिकार के नाते यदि मुझसे कुछ लेना चाहते हो तो यह असंभव है। वैसे यदि एक लुटे हुए मनुष्य के नाते सहायता लेने आए हो तो तुम्हें चार घोड़ों का मूल्य दिया जा रहा है। वह भी इसलिए कि तुम्हारा चोर से और उसकी.... से गहरा संबंध है।'

'राज, क्या अभी तक यह वहम तुम्हारे दिल में जड़े जमाए है? अपने हाथों अपने बेटे का जीवन नष्ट करके भी क्या अभी तक तुम स्वप्न ही देख रहे हो?'

'परंतु जब यह स्वप्न न होकर वास्तविकता हो तो मैं....।'

'स्वप्न में वास्तविकता का धोखा नहीं हो सकता। स्वप्न के प्राणी औरों के पर्दो में ढंकी हुए तस्वीरों की भांति होते हैं और कभी-कभी तो स्वप्न के बाद सावधान हो जाने पर भी ऐसा जान पड़ता है मानों उन्होंने कभी उजाला देखा ही नहीं।'

'मैं स्वप्न में रहूं या वास्तविकता में, इससे तुम्हें कोई मतलब नहीं। कहो, अब तुम क्या चाहते हो?'

'मैं तुम्हारे पास अपने नुकसान की फरियाद लेकर नहीं आया, तुम्हें समझाने आया हूं।'

'तुम कौन हो मुझे समझाने वाले?'

'एक पुराना मित्र, जो गलतफहमियों का शिकार बनकर ठुकरा दिया गया।'

'मित्रता की आड़ लेकर मुझे और परेशान न करो। मैं पहले ही बहुत दुःखी हूं।'

'जीवन तो परेशानी का दूसरा नाम है। इसका आरंभ हृदय को प्रसन्न करने वाले गीतों और सुरीली तानों से होता है और अंत गरम-गरम आंसुओं और दर्द भरी ठंडी आहों में।'

'मैं आग में जल रहा हूं और तुम ऊपर से लेक्चर देकर मेरी हंसी उड़ाना चाहते हो?'

'मैं क्या, प्रकृति ही तुम्हारी हंसी उड़ा रही है। जीवन आग है और हम उसके ईधन। जिस प्रकार लकड़ियां और कोयले जलते हुए चटकते हैं, उसी प्रकार संसार के रंग-ढंग देखकर तुम कराह रहे हो।'

'कौन कहता है कि मैं कराह रहा हूं? मैं पराजित प्राणी नहीं हूं? सब ओर मेरी जीत है।'

'अभी तो तुम अपने-आप कह रहे थे कि मैं जल रहा हूं और जिसे तुम अपनी जीत समझते हो, वह जीत नहीं हार है। ऐसी हार, जिसने तुम्हें आज तक उठने नहीं दिया और यदि यही समझते रहे तो कभी उठने न देगी।'

'तुम मुझे परेशान न करो और यहां से चले जाओ। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।'

'मैं तुम्हें मंझदार में कैसे छोड़ दूं? तुमने एक भ्रम में पड़कर अपने जीवन को एक अंधेरे मार्ग पर डाल दिया और एक मनुष्य को दानवता का मार्ग दिखाकर मनुष्य से दानव बना दिया क्या यही तुम्हारी जीत है?'

'इसमें मेरा क्या अपराध? कौवा कोयल के अंडों को अपने अंडे समझकर कितने प्यार से सेता है परंतु उसने से निकलते हैं वही कोयल के बच्चे।'

'इसलिए कि तुम कह रहे हो? कभी ध्यान से उसकी सूरत देखी तुमने वही चौड़ा माथा, लंबी नाक, मोटी-मोटी आंखें। अंतर केवल यह है कि बुरे काम करने से चेहरे पर गंभीरता नहीं रही जो तुममें है और वह तुम भी क्रोध में आकर खो बैठते हो...कछ भी तो अंतर नहीं है तुम दोनों में।'
 
राज के सामने रंजन का चित्र घूमने लगा और अनायास ही उसे ऐसा अनुभव हुआ मानों सारी भूल उसी की है, शंकर सब ठीक कह रहा है। उसको लगा मानों उसके सामने कमरे की सारी चीजें घूम रही हैं.... और वह जोर से चिल्लाया, 'शंकर मुझे अकेला छोड़ दो।' राज भागकर दूसरे कमरे में जाकर पलंग पर गिर पड़ा।

शंकर थोड़ी देर अकेला खड़ा रहा। फिर निराश होकर बाहर निकल गया। जब वह ड्योढ़ी में पहुंचा तो किसी नारी कंठ से निकली हल्की और पतली आवाज सुनाई दी जो पुकारकर

कह रही थी, 'सुनिए, जरा ठहरिए।'

शंकर आवाज सुनकर रुक गया और उसने घूरकर देखा। अंधेरे में एक छाया उसकी ओर बढ़ रही थी और पास आकर बोली, 'मैंने ही आपको पुकारा था।'

'ओह कुसुम! कहो क्या बात है?'

'मैं आपको जानती तो नहीं परंतु एक बात पूछना चाहती हूं। क्या आप...'

'क्यों नहीं, क्या पूछना है तुम्हें?'

'क्या आप रंजन का पता बतला सकते हैं?'

'क्या तुम नहीं जानतीं?'

"मुझे कुछ ठीक मालूम नहीं।' "देखिए, छिपाने का प्रयत्न न कीजिए। मैं आपकी और पिताजी की सब बातें सुन चुकी हूं।'

'ओह! यह बात है। परंतु जानकर क्या करोगी!'

'उससे मिलने जाऊंगी। आप जानते हैं, मुझे उससे मिले आज पूरे चौदह वर्ष हो चुके हैं।'

'तो सवेरे नीचे खेतों पर पहुंच जाना, मेरा आदमी तुम्हें साथ ले जाएगा, परंतु जमींदार साहब को पता लग गया तो....।'

'आप उनकी चिंता न करें। मेरे जाने से शायद बाबा का रुख बदल जाए।'

'यदि ऐसा हो तो इससे अधिक प्रसन्नता सब लोगों को और क्या हो सकती है। भगवान तुम्हारी अवश्य सहायता करेगा कुसुम।' यह कहकर शंकर अपने घर की ओर चला गया।

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सवेरा होते ही जब जमींदार साहब काम पर गए तो कुसुम शंकर के घर जा पहुंची। शंकर ने एक घोड़ा और अपना आदमी साथ किया। वह कुसुम को सामने की पहाड़ियों पर ले गया। घोड़े बाहर ही छोड़ वे दोनों एक तंग रास्ते को पार करके हुए, एक मोड़ पर पहुंचे। कुसुम के साथी ने आगे जाने से इंकार कर दिया और बोला, 'इस पत्थर के पीछे सामने ही कुछ डाकू बैठे होंगे। तुम वहां जाकर रंजन से मिल सकती हो।'

कुसुम एक बार तो घबराई और डर-सी गई। फिर सोचने लगी कि जब वह यहां तक पहुंच गई है तो वहां तक जाने से क्यों घबराए और फिर रंजन तो उसका भाई है। यह सोचते ही वह हिम्मत बांधे आगे बढ़ी। पत्थर से मडते ही उसने देखा, कछ मनुष्य बैठे ताश खेल रहे थे। जब उन्होंने उस सूने स्थान से एक सुंदर युवा लड़की को इस प्रकार अपनी ओर धीरे-धीरे बढ़ते देखा तो ताश छोड़ सबके सब खड़े हो गए और आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगे। जब तक वह उनके एकदम पास न पहुंच गई तब तक सब-के-सब पत्थर की भांति मौन खड़े रहे।

'रंजन कहां है?'

सबके सब मौन थे। उसने फिर अपना प्रश्न दोहराया। तब उनमें से एक व्यक्ति जोर से चिल्लाया, 'सरदार, सरदार।' उसकी पुकार के साथ ही सामने की गुफा से एक युवक जिसका चेहरा लाल था, कमर के चारों ओर चमड़े की पट्टी बंधी थी जिसमें एक पिस्तौल लटक रहा था, निकला।

कुसुम को देखते ही वह रुक गया और दोनों एक-दूसरे को खोई-खोई नजरों से देखने लगे। कुछ देर तक वह इसी प्रकार देखते रहे।

'रंजन। कुसुम के मुंह से निकला।'

'जान पड़ता है मैंने आपको कहीं देखा है!'

'कुछ दिन हुए तुम मुझे ट्रेन में.....।'

'हां, मैं आपसे कितना लज्जित हूं। रंजन ने आंखें नीची कर लीं। परंतु आप यहां कैसे?'

'एक बहन अपने भाई से मिलने आई है।'

'तुम... यह... क्या?'

'क्या तुम मुझे नहीं पहचानते? मैं हूं तुम्हारी कुसुम।'

'कुसुम....।' उसके मुख से अनायास निकला और उसने आगे बढ़कर कुसुम को गले से लगा लिया। उसकी आंखों से आंसू बह निकले। वह उसे अंदर गुफा में ले गया और एक चटाई बिछा दी। कुसुम उस पर बैठ गई।

'तुम आज पहली बार मेरे घर आई हो और मैं तुम्हारी कोई सेवा भी नहीं कर सकता।'

'तुम मुझे मिल गए। यह क्या कुछ कम है?'

'परंतु तुम इस प्रकार अपने प्राणों को संकट में डालकर यहां आ कैसे गई?'

"तुम्हारा प्रेम खींच लाया।'

'क्या पिताजी को मालूम है?'

'नहीं।'

'यह तुमने अच्छा नहीं किया। यदि उन्हें पता चल गया तो खैर नहीं।'

'इसकी तुम चिंता न करो। आओ चलो।'

'कहां?'

'मैं तुम्हें लेने आई हूं।'

'क्यों?'

'तुम्हें यहां से निकालकर ले जाना चाहती हूं।'

'तुम बहुत देर से पहुंची, अब मैं नहीं जा सकता।'

"परंतु क्यों?'

'इसका उत्तर मेरे पास नहीं।'

'क्या तुम्हें अपने जीवन पर दया नहीं आती रंजन? अपने पिता और बहन पर दया नहीं आती?'

'दया और अपने जीवन पर! नहीं! अपने पिता पर! नहीं कभी नहीं। फिर ऐसे पिता पर जिन्होंने मुझे अपने आप ही अंधेरे कुएं में धकेला।'

'यह तुम क्या कह रहे हो?'

"ठीक कह रहा हूं, तुम नहीं जानतीं... मुझे जिस रास्ते पर डाला गया है उसके जिम्मेदार केवल पिताजी ही हैं। परंतु जो कुछ भी उन्होंने किया सब ठीक है। अब मैं इसी में प्रसन्न हैं

और शायद उनसे अधिक।'

'यह कैसे हो सकता है? कोई पिता अपने पुत्र का जीवन नष्ट नहीं कर सकता। मनुष्य अपनी ही कमजोरियों से नष्ट होता है और अपराधी दूसरे को ठहराता है।'

'इसलिए कि वह एक कमजोर प्राणी है और दूसरे उसकी कमजोरी से लाभ उठाते हैं।' 'रंजन, मैं नहीं जानती थी कि तुम अपने पिता पर ऐसा दोष लगाओगे।'

'तुम्हारे हृदय में जो अपने बाबा के लिए स्थान है वह मेरे लिए तो नहीं?'

'ठीक है, तुम्हें कभी अपने बाबा के बराबर स्थान नहीं दे सकती। जो बाबा अपनी लड़की का जीवन बनाने में अपना जीवन दे दे, क्या वह अपने लड़के को कभी ऐसे भयानक रास्ते पर डालेगा जो तुमने अपनाया है? यह असंभव है।'

'यही सोचकर तो मैं हैरान हूं कि मेरे जीवन से वह ऐसा भयानक खेल क्यों खेले?'

'जो भी तुम समझते हो सब ठीक है। मैंने बहुत बड़ी भूल की जो यहां तुम्हें लेने के लिए आ गई।' कहकर वह उठी और जाने के लिए तैयार हो गई।

तो तुम जा रही हो और मुझसे नाराज होकर? ठहरो, मैं तुम्हें गांव तक छोड़कर आऊं।''

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'मुझे कोई आवश्यकता नहीं है।' यह कहकर वह तेजी से कदम बढ़ाती हुई जाने लगी।

'कुसुम ठहरो।' रंजन ने पुकारकर कहा। कुसुम ठहर गई। रंजन ने पास आकर कहा, 'क्यों कुसुम बिगड़ गई?' रंजन ने कुसुम के आंसू पोंछे। 'तुम न घबराओ, मैं जल्दी ही तुम्हारे पास पहुंच जाऊंगा।'

'सच?'

'कुछ विचार तो ऐसा ही है।' यह कहकर रंजन ने उसे गले से लगा लिया।

'चलो, अब मुझे गांव तक छोड़ आओ।' कुसुम ने कहा। कुसुम जब घर पहुंची तो दिन बहुत चढ़ चुका था। वह डरते-डरते ड्योढी से निकलकर आंगन में आई। राज बाब सामने ही तख्त पर बैठे थे। उसे देखते ही बोले, 'क्यों मिल आई रंजन से?'
 
'परंतु यह आप?'

'मैं सब जानता हूं। इतना मूर्ख न समझो मुझे।'

'मैं क्षमा चाहती हूं।'

'कोई बात नहीं। आखिर तुम्हारा भाई है। मिलने तो जाना ही था। यह अच्छा हुआ तुम स्वयं मिल आई। तुमसे यहां मिलता तो अच्छा न होता।'

'बाबा, उसने मुझे ठीक रास्ते पर आने का विश्वास दिलाया है और वह शीघ्र ही हमारे पास आ जाएगा।'

मुझे उसकी कोई आवश्यकता नहीं है और वह अब नीचे रास्ते पर क्या आएगा? केवल तुम्हारा मन रखने के लिए उसने ऐसा कह दिया है।

'नहीं बाबा, मुझे उस पर विश्वास है।'

'तुम्हें उस डाकू पर विश्वास है और मुझ पर नहीं?' बाबा क्रोध से कड़ककर बोले।

'नहीं, नहीं... हो सकता है कि मैं गलत होऊ।' कुसुम सहम

गई और चुप हो गई। थोड़ी देर बाद बाबा ने कहा, 'और क्या-क्या बातें हुई?'

"विशेष कोई बात नहीं। मैं उसे समझाने की कोशिश करती रही, पहले तो बोला कि मेरा जीवन तुम्हारे बाबा ने नष्ट किया है। मैंने यह सुनते ही उसे बहुत खरी-खोटी सुनाई और नाराज होकर बाहर निकल आई। फिर वह मुझे मनाने आया और अपनी भूल मान गया। तुम ही कहो बाबा, वह कितना मूर्ख है! क्या कोई पिता अपने पुत्र को ऐसे भयानक रास्ते पर डाल सकता है? पिता तो पिता, कोई दुश्मन भी किसी के बच्चे का जीवन इस प्रकार नष्ट नहीं कर सकता।' कुसुम यह कहते-कहते रुक गई।

राज बाबू ने मुंह फेर लिया। वह बोले नहीं।

'क्यों, क्या बात है बाबा?'

"कुछ नहीं... कुछ नहीं... ऐसे ही...।'

'मैं भी कितनी पागल हूं। बिना सोचे-समझे जो मुंह में आ रहा है, बके जा रही हूं। चलिए अंदर चलकर आराम कर लीजिए।'

"हां, तो उसने... तुम्हें पहचाना कैसे?' राज बाबू ने बात बदलते हुए पूछा और तख्त पर से उठ खड़े हुए।

कुसुम ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा, 'आपको यह बताना तो भूल गई कि यह रंजन वही था जिसने ट्रेन में मेरे गले का हार उतारने का प्रयत्न किया था।'

'मैं तो उसी दिन....।' और वह चुप हो गए।

भगवान की करनी भी ऐसी हुई जो मैंने इतने साहस से काम लिया। यदि मैं चीख पड़ती और दूसरे यात्रियों को पता लग जाता तो भैया का क्या होता?

'जेल, और क्या?'

'हां बाबा।' कुसुम बहुत धीमे स्वर में बोली और दूसरे कमरे में चली गई।

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इस प्रकार दिन बीतते गए। रंजन ने अपना वायदा पूरा न किया और न आया। कुसुम ने सोचा, बाबा सच ही कहते थे कि उसने केवल मेरा मन रखने के लिए मुझे वचन दे दिया। ऐसे मनुष्य का क्या विश्वास? रात्रि का समय था। कुसुम सो रही थी। किसी की आवाज सुनकर वह चौंक पड़ी। उसने बाबा के कमरे में कुछ शोर-सा सुना। पहले वह डरी, फिर साहस करके वह धीरे-धीरे पग बढ़ाती दरवाजे तक पहुंची और कान लगाकर सुनने लगी। दूसरी आवाज रंजन की थी। बाबा कह रहे थे "किसी और वक्त आ जाते। इस समय आधी रात को आने का मतलब?'

'चोर और डाकुओं के लिए तो रात ही है जो किसी सेठ से मेल-मुलाकात कर सकें। दिन के समय तो आराम करना होता है।'

'या उल्लुओं की भांति मुंह छिपाना होता है। अपने-आपको ऐसे नीच पेशे का सरदार कहते तुम्हें लज्जा न आती होगी?'

'लज्जा तो आपने बचपन में ही उतार ली।'

'निर्लज्जता की भी कोई सीमा होती है।' ।

'आप ही की दी हुई शिक्षा पर चल रहा हूं।'

'बेहूदगी छोड़ दो और मतलब की बात करो। ऐसा क्या काम आ पड़ा जो तुम इतनी रात गए...।'

'हां, कहिए। मतलब की बात करो। मैं तो जल्दी में हूं और आप भी।'

'कहो, क्या कहना चाहते हो?'

आप यह जानते ही हैं कि मैं आपका नालायक बेटा हूं और आपको मुझसे कोई आशा नहीं जो एक बाप को अपने होनहार बेटे से होती है। आपको तो मुझसे हानि का ही भय है

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'मैं तुम्हारी बुद्धिमानी की प्रशंसा करता हूं जो तुम यह सब कुछ समझते हो।'

'और यह भी हो सकता है कि आप मुझे नालायक बेटा ठहराकर अपनी जायदाद से अलग रखने की चिंता में हों।'

'इसमें क्या संदेह है? तुम्हारा और मेरा रास्ता अलग-अलग है। न मैंने तुम्हें कभी किसी बात से रोका है और न तुम्हें मेरे कामों में बाधा डालने का अधिकार है।'

'परंतु मैं अपने कामों में तो दखल दे सकता हूं?'

'आखिर तुम चाहते क्या हो?'

'इससे पहले कि आप मेरे अधिकार छीने, मैं अपना जीवन बदल लेना चाहता हूं।'

'वह कैसे?'

'इस तरह चोरों की तरह छिप-छिपकर रहने से तो यही अच्छा होगा कि मैं अपनी जमींदारी संभाल लूं।'

'परंतु तुम जो सपना देखना चाहते हो वह कभी पूरा न हो सकेगा।' राज ने क्रोध में कहा।

'वह पूरा होकर रहेगा।' रंजन ने पैर फर्श पर पटकते हुए कहा।

'मेरी इच्छा के बिना तुम कुछ नहीं कर सकते।'

'शायद आप भूल रहे हैं कि यह जायदाद पैतृक है। आपकी संपत्ति नहीं। मैं अपना अधिकार मांगता हूं। भीख नहीं।'

'भीख मांगी होती तो शायद दया करके दे ही देता। परंतु अब मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं।'
 
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