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Guest
अपडेट-82
लेकिन माधवी के लाख मना करने के बाद भी मुनीश नही माना और लगातार मिन्नतें करता रहा…आख़िर मजबूर हो कर माधवी ने भी हाँ कर दी.
दोनो पूर्ण रूप से निर्वस्त्र हो कर काम क्रीड़ा मे लिप्त हो गये…किंतु मुनीश को आज संभोग करने मे बिल्कुल भी आनंद नही आ रहा
था….उसे कल की तुलना मे माधवी की चूत आज बहुत ज़्यादा ढीली लग रही थी.
मुनीश (सोचते हुए)—माधवी की चूत आज इतनी ज़्यादा ढीली क्यो लग रही है….? रोज तो ज़ोर से ताक़त लगाने पर मेरा लंड अंदर जाता था उसकी चूत मे, जबकि आज चूत मे लंड रखते ही कब घुस गया पता ही नही चला बिना कोई मेहनत किए ही….ऐसा लग रहा है जैसे कि मैं
किसी बहुत बड़े तालाब मे तैर रहा हूँ….एक ही दिन मे माधवी की चूत इतनी चौड़ी कैसे हो गयी…..? कहीं ऐसा तो नही कि मेरे आने से पहले…………………….
अब आगे……….
मुनीश (मन मे)—नही…नही..मैं भी ना क्या क्या बिना मतलब की बाते सोचने लगा…..ऐसा कुछ भी नही होगा, ये सिर्फ़ मेरा वहम है, ऐसा सोचना भी पाप है…….लेकिन जब आदी का मानसिक संतुलन पूरी तरह से कंट्रोल मे नही होता तब वो ऐसी ही हरकते करता है और पहले
भी कर चुका है, जब मैने उसको शक्तिया दी थी….ऐसा अगर सच मे कहीं फिर हो गया तो मेरा क्या होगा…..?
मुनीश (मन मे)—नही आदी ऐसा बिल्कुल नही करेगा….वो मेरा दोस्त है…..माधवी उसकी भाबी है और भाभी तो माँ समान होती है……लेकिन धरती लोक मे तो देवर भाभी मे अक्सर ऐसे संबंध बनते रहते हैं….मैं सच मे पागल हो जाउन्गा लगता है…..मुझे आदी को हर पल
अपने साथ रखना होगा….जिससे वो कुछ कर ही नही पाएगा मेरे होते हुए……हाँ, ये ही ठीक रहेगा.
मुनीश यही सब मन मे सोचते हुए माधवी के बगल मे लेट कर सो गया…..माधवी तो कब की मीठी नीद मे जा चुकी थी.
अगले दिन मुनीश सुबह थोड़ा लेट उठा…लेकिन माधवी को अपने साथ ना देख कर जल्दी से आदी के कमरे की तरफ भागा लेकिन आदी को ध्यान मे बैठे देख कर खुश हो गया.
मुनीश (मन मे)—मैं भी ना कितना पागल हूँ….ये भी भूल गया कि दिन मे उसको सिर्फ़ ऋषि की यादे ही रहती हैं अब से मैं रात मे ध्यान दूँगा.
मुनीश डेली दिन मे सो जाता और रात मे आदी को लेकर घूमने निकल जाता या फिर अपने रूम मे जागता रहता जिसकी वजह से आदी और माधवी के बीच कुछ नही हो सका….इस दौरान ऋषि दिन मे ध्यान मे मग्न रहता और अपनी शक्तियो को नियंत्रित करने की कोशिश करता पर कुण्डलिनी को जागृत करने से पहले ही उसका ध्यान टूट जाता था.
ऐसे ही एक दिन मुनीश जब दिन के समय थोड़ा बाहर चला गया किसी काम से पर जब वापिस लौटा तो अपने कक्ष मे माधवी और ऋषि दोनो को पसीने से लथपथ देखा तो चौंक गया.
मुनीश—क्या बात है ऋषि भाई…..? आज तुम्हे इतना पसीना क्यो निकल रहा है….?
ऋषि—ऋषि…..? कौन ऋषि….? दोस्त मेरा नाम आदी है….क्या मेरा नाम भी भूल गये….? और जहाँ तक पसीने का सवाल है तो मैं मेहनत का काम कर रहा था इसलिए आया होगा.
ये सुन कर मुनीश के होश उड़ गये…..वो कभी माधवी को तो कभी आदी को देखता लेकिन उसको कुछ समझ मे नही आ रहा था.
मुनीश—माधवी तुम्हे पसीना क्यो आ रहा है…?
माधवी—वो मैं आदी की मदद कर रही थी.
मुनीश (मन मे)—ये आदी कैसे बन गया…? अभी तो इसको ऋषि होना चाहिए था……लगता है कि धरती लोक की तरह इसको भी एक हफ्ते मे शिफ्ट चेंज करने की आदत है….ऐसे मे तो मैं बर्बाद हो जाउन्गा….ये तो स्वर्ग लोक मे भी मुझे नरक के दर्शन करवा रहा है….इसको
इतना बड़ा संभोग अस्त्र और सम्मोहन शक्ति देकर मैने खुद अपने ही पैर मे कुल्हाड़ी मार ली है…..अब मैं हमेशा दिन रात इसके साथ रहूँगा.
वही दूसरी तरफ परी लोक का हाल बहाल हो चुका था.....हर तरफ अंधकार ही अंधकार फैला हुआ था…..ऐसा लग रहा था जैसे कि यहाँ के लोगो ने सदियो से सूर्योदय के दर्शन ही ना किए हो…सभी इस बात से अंजन थे की एक बहुत बड़ा ख़तरा तेज़ी से उनके द्वार तक आ पहुचा है.
एक लाश परी लोक मे उस आलीशान महल के बाहर खड़ी होकर अपनी आग्नेय नेत्रो से उसकी बुलंदियो को घूर रही थी..उसने दाँत किट
किटाये, अपनी नर कंकाल जैसी टाँग की ठोकर परी लोक के प्रवेश द्वार पर मारी.
लेकिन माधवी के लाख मना करने के बाद भी मुनीश नही माना और लगातार मिन्नतें करता रहा…आख़िर मजबूर हो कर माधवी ने भी हाँ कर दी.
दोनो पूर्ण रूप से निर्वस्त्र हो कर काम क्रीड़ा मे लिप्त हो गये…किंतु मुनीश को आज संभोग करने मे बिल्कुल भी आनंद नही आ रहा
था….उसे कल की तुलना मे माधवी की चूत आज बहुत ज़्यादा ढीली लग रही थी.
मुनीश (सोचते हुए)—माधवी की चूत आज इतनी ज़्यादा ढीली क्यो लग रही है….? रोज तो ज़ोर से ताक़त लगाने पर मेरा लंड अंदर जाता था उसकी चूत मे, जबकि आज चूत मे लंड रखते ही कब घुस गया पता ही नही चला बिना कोई मेहनत किए ही….ऐसा लग रहा है जैसे कि मैं
किसी बहुत बड़े तालाब मे तैर रहा हूँ….एक ही दिन मे माधवी की चूत इतनी चौड़ी कैसे हो गयी…..? कहीं ऐसा तो नही कि मेरे आने से पहले…………………….
अब आगे……….
मुनीश (मन मे)—नही…नही..मैं भी ना क्या क्या बिना मतलब की बाते सोचने लगा…..ऐसा कुछ भी नही होगा, ये सिर्फ़ मेरा वहम है, ऐसा सोचना भी पाप है…….लेकिन जब आदी का मानसिक संतुलन पूरी तरह से कंट्रोल मे नही होता तब वो ऐसी ही हरकते करता है और पहले
भी कर चुका है, जब मैने उसको शक्तिया दी थी….ऐसा अगर सच मे कहीं फिर हो गया तो मेरा क्या होगा…..?
मुनीश (मन मे)—नही आदी ऐसा बिल्कुल नही करेगा….वो मेरा दोस्त है…..माधवी उसकी भाबी है और भाभी तो माँ समान होती है……लेकिन धरती लोक मे तो देवर भाभी मे अक्सर ऐसे संबंध बनते रहते हैं….मैं सच मे पागल हो जाउन्गा लगता है…..मुझे आदी को हर पल
अपने साथ रखना होगा….जिससे वो कुछ कर ही नही पाएगा मेरे होते हुए……हाँ, ये ही ठीक रहेगा.
मुनीश यही सब मन मे सोचते हुए माधवी के बगल मे लेट कर सो गया…..माधवी तो कब की मीठी नीद मे जा चुकी थी.
अगले दिन मुनीश सुबह थोड़ा लेट उठा…लेकिन माधवी को अपने साथ ना देख कर जल्दी से आदी के कमरे की तरफ भागा लेकिन आदी को ध्यान मे बैठे देख कर खुश हो गया.
मुनीश (मन मे)—मैं भी ना कितना पागल हूँ….ये भी भूल गया कि दिन मे उसको सिर्फ़ ऋषि की यादे ही रहती हैं अब से मैं रात मे ध्यान दूँगा.
मुनीश डेली दिन मे सो जाता और रात मे आदी को लेकर घूमने निकल जाता या फिर अपने रूम मे जागता रहता जिसकी वजह से आदी और माधवी के बीच कुछ नही हो सका….इस दौरान ऋषि दिन मे ध्यान मे मग्न रहता और अपनी शक्तियो को नियंत्रित करने की कोशिश करता पर कुण्डलिनी को जागृत करने से पहले ही उसका ध्यान टूट जाता था.
ऐसे ही एक दिन मुनीश जब दिन के समय थोड़ा बाहर चला गया किसी काम से पर जब वापिस लौटा तो अपने कक्ष मे माधवी और ऋषि दोनो को पसीने से लथपथ देखा तो चौंक गया.
मुनीश—क्या बात है ऋषि भाई…..? आज तुम्हे इतना पसीना क्यो निकल रहा है….?
ऋषि—ऋषि…..? कौन ऋषि….? दोस्त मेरा नाम आदी है….क्या मेरा नाम भी भूल गये….? और जहाँ तक पसीने का सवाल है तो मैं मेहनत का काम कर रहा था इसलिए आया होगा.
ये सुन कर मुनीश के होश उड़ गये…..वो कभी माधवी को तो कभी आदी को देखता लेकिन उसको कुछ समझ मे नही आ रहा था.
मुनीश—माधवी तुम्हे पसीना क्यो आ रहा है…?
माधवी—वो मैं आदी की मदद कर रही थी.
मुनीश (मन मे)—ये आदी कैसे बन गया…? अभी तो इसको ऋषि होना चाहिए था……लगता है कि धरती लोक की तरह इसको भी एक हफ्ते मे शिफ्ट चेंज करने की आदत है….ऐसे मे तो मैं बर्बाद हो जाउन्गा….ये तो स्वर्ग लोक मे भी मुझे नरक के दर्शन करवा रहा है….इसको
इतना बड़ा संभोग अस्त्र और सम्मोहन शक्ति देकर मैने खुद अपने ही पैर मे कुल्हाड़ी मार ली है…..अब मैं हमेशा दिन रात इसके साथ रहूँगा.
वही दूसरी तरफ परी लोक का हाल बहाल हो चुका था.....हर तरफ अंधकार ही अंधकार फैला हुआ था…..ऐसा लग रहा था जैसे कि यहाँ के लोगो ने सदियो से सूर्योदय के दर्शन ही ना किए हो…सभी इस बात से अंजन थे की एक बहुत बड़ा ख़तरा तेज़ी से उनके द्वार तक आ पहुचा है.
एक लाश परी लोक मे उस आलीशान महल के बाहर खड़ी होकर अपनी आग्नेय नेत्रो से उसकी बुलंदियो को घूर रही थी..उसने दाँत किट
किटाये, अपनी नर कंकाल जैसी टाँग की ठोकर परी लोक के प्रवेश द्वार पर मारी.