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चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़) complete

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और इस वक्त दौपहर का एक बजा था ! राष्ट्रपति भवन के एक विशेष कक्ष में वतन, विकास, विजय, अलंफासे, पिशाचनाथ, बागारोफ, धनुषटकार और अपोलो मौजूद थे ।

विकास से मुखातिब होकर वतन ने पूछा था…"वया तुम बता सकते हो कि मैग्लीन को क्या सजा देनी चाहिए ।"

"प्यारे बटन !" विकास के कुछ जवाब देने से पहले ही विजय बोल पड़ा था…"इससे तरीका मत पूछो । ये तरीका तो बताएगा मार्के का, लेकिन पसन्द नहीं अाएगा ।"

"'क्यों भला ?" गम्भील स्वर में वतन ने पूछा…"तरीका अगर अच्छा होंगा तो मुझे पसन्द क्यों नहीं अाएगा ?"

"वटन वारे !" अपनी ही टुन्न में विजय ने कहा-----"' मामला यह है कि तुम दोनों हो बिल्कुल न्यारे, नहीं समझे न -खैर, हम समझाते हैं । बात यह है कि ये साला दिलजला पूरा हिंसावादी है । दुश्मन को चीर-फाढ़कर उसकी खाल में मिर्च भरने के अलावा यह कुछ नहीं जानता और एक तुम हो-बिलकुल इसके विपरीत यानी अहिंसावादी, हिसा से बेहद नफरत करने वाले, फिर भला इसका तरीका तुम्हरे दिमाग में कैसे फिट होगा ?"

-"चचा ।" वतन ने बिल्कुल शान्त और गम्भीर स्वर में जवाब दिया----" इतना तो इाप समझ ही गए हैं कि उन अहिंसा के पुजारियों में से नहीं हूं कि जिनके गाल पर अगर कोई एक थप्पड मारे तो दूसरा और तीसरा...चौथा अागे का दें । अहिंसा को सिर्फ इतना मृहत्व देता हूं कि एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरा अागे कर दूगा लेकिन अगर तीसरी बार कोई वार करे तो महान सिंगहीँ के चरणों की कसम हाथ तोड़ डालूंगा उसके । आज के जुग में बह अहिंसा, जिस पर महात्मा गांधी चले थे, बुजदिली है । सीधा सा सिद्धान्त है कि जब तक अहिंसा से काम चले,चलाओ, लेकिन जब अहिंसा बुजदिली का रूप धारण करने लगे तो ईट का जवाब पत्थर से दो ।"

"कहने का मतलब यह हुआ वतन प्यारे कि तुम आधे अहिंसावादी हो ।" विजय वे कहा---"‘मगर प्यारे, बात कुछ जमी नहीं----या तो गान्धी ही बन जाओ या सुभाष---भगतसिंह ही । ये फिफ्टी-फिफ्टी बनने से वंया लाभ ?'"'

"चचा !" वतन का पुन: गम्भीर स्वर----"' साफ शब्दों में मेरे सिद्धान्त को तुम यूं समझ सकते हो कि पहले घी को सीधी उंगली से निकालने की कोशिश करो । न निकले तो-फौरन उंगली को टेढ़ी कर लो ।"

"कहने का मतलब यह कि मैग्लीन को तुम हिंसात्मक सजा भी देने के लिए तैयार हो?"

" मैग्लीन को सजा देने की एक तरकीब है मेरे पास ।" विकास ने कहा ।

" क्या ?"

जबाव में विकास ने उस सोफे के नीचे' से, जिस पर वह बैठा था, एक मुगदर निकाला । यह देखकर सब दंग रह गए कि यह मुगदर हडिडयों का वना हुआ था, "यह मुगदर तुम्हारी मां और वहन की हडिडयों का वना है, वतन ! आज सारे दिन की मेहनत के वाद मैं इसे वना पाया हूं । तुम्हारी माँ और वहन की हडिडयों के टुकडों को मैंने फेबीकॉल से जोड़ा है । मेरे दिमाग ने कहा है कि मैग्लीन एकमात्र सजा यह मुगदर ।"

हडिडयों के उस मुगदर को देख-कर वतन के मस्तक पर एक बल पड़ गया।

एक क्षण वह ठिठका और बिकास को देखता रहा, फिर भर्राया स्वर…‘बिकास तुमने मेरे दिल की बात कहीं है ।"

" अबे , मुगदर तो सजा है लेकिन इसका उपयोग कैसे होगा ?"

जवाब में विकास सबको बताने लगा कि इस मुगदर के जरिये मैग्लीन को किस किस्म की सजा दी जाएगी । सभी ने सुना और सहमत हो गये ।

ठीक चार बजे-विकास-विजय और अलफासे के घेरे में कैद अाया मैग्लीन ! उसे मैदान में लाया गया । वतन से हाथ जोडकर उसने माफी मागीं तो वतन ने जवाब दिया था’--"मुजरिम तो तुम चमन के नागरिकों के हो । माफ करने का अघिकार मुझे कहां ? "

चीख-चीखकर मैग्लीन ने चमन के नागरिकों से माफी चाही ।

किन्तु हर आंख में मैग्लीन के लिए नफरत थी । उसे किसी ने माफ नहीं किया । मैदान के ठीक बीच में उसे ले जाकर हाथियों के साथ बांध दिया गया । लम्बी रस्सी के बीच का कुछ भाग उसके बदन पर लिपटा हुआ था । एक सिरा मेैग्लीन के दाईं तरफ खडे ह्रथी में जिस्म में ’बंधा था तो दूसरा बाई तरफ खडे हाथी के जिस्म में ।।

पहले वतन ने जनता को खामोश होने का संकेत दिया ।

खामोशी के बीच उसकी आवाज गूंज उठी…"मेरे प्यारे देशवासियों ! यह मुजरिम जो इस वक्त हाथियों के बीच बंधा खड़ा है, मुझ अकेले या चमन के क्रिसी एक नागरिक का मुजरिम नहीं, बल्कि हम सबका मुजरिम है । हमारे देश को गुलाम बनाकर इसने हम सब पर जुल्म किये हैं । अत: हम सभी इसे सजा देने के बराबर हकदार हैं । इसे सजा देने के लिए मेरे दोस्त विकास ने यह हथियार बनाया है ।"

वतन हडिडयों के उस मुगदर को हवा में उठाकर सबको दिखाता हुआ बोला----"मेरी मां और वहन की अन्तिम निशानी यानी उनकी हडिडयों से वना है । इस कुत्ते की इससे ज्यादा बढकर क्या सजा हो सकती है कि यह मुगदर चमन के

हर निवासियों के हाथ में जाए और सभी एक-एक मुगदर इस हरामजादे 'के जिस्म पर मारे ।"

"नहीँ ।" चीख़कर रो पडा मैग्लीन ।

चारों तरफ से हंसी का एक फव्वारा छूट गया । वतन कह रहा था---"हर नागरिक को इस जुल्मी पर इस का सिर्फ एक बार करने का हक प्राप्त है । यह आपकी ताकत पर निर्भर है कि एक बार अाप कितना शक्तिशाली कर सकते हैं । सबसे पहला वार मैं स्वयं करूगा ।"

और…वतन मैग्लीन के नजदीक पहुचा ।

"वतन ! मुझे माफ कर दो बेटे... माफ कर दो बेटे ।" वतन के मस्तक पर वल पड गया, गुर्रायाृ-"मेरे पिता अगर वे गुनाह करते जो तूने किए है, तो इस मुगदर की कसम, उसे भी भयानक सजा देता मैं ।।" कहने के साथ ही बिजली की-सी गति से वतन का' हाथ चला और उसकी मां और बहन की हडिडयों से वनी मुगदर भड़ाक से मैग्लीन के चेहरे पर टकरायी ।

मैग्लीन उस जिन्दे पक्षी की तरह चीख पड़ा जो पर कटते ही अाग में जा गिरा हो ।

उसके चेहरे के विभिन्न भागों से खून के फव्वारे छूट पड़े ।। वतन ने मैग्लीन के चीखते हुए खून से लथपथ चेहरे को देखा , फिर घृना से थूक दिया उस पर बोला ---" एक आदमी सिर्फ एक मुगदर मारेगा तुझे , गिन सके तो गिनना । मुगदरों की गिनती से तुझे पता लगेगा कि तूने कितने आदमियों पर जुल्म किए हैं ।।"

कहने के बाद मुगदर वहीं जमीन पर रख दिया ।।

 


भीड़ से एक आदमी आता , मुगदर उठाता और अपनी पूरी शक्ति से मैग्लीन पर बार करता ।

बच्चे भी आये, महिलाऐं भी आयीं ।।

एक ऐसी मां आई जिसके बेटे को मैग्लीन ने मारा था ।। मुगदर की एक चोट अपने बेटे के हत्यारे पर करके जैसे मां की आत्मा को शान्ति ना मिली हो। जोश में चीखती हुई वह पागलों की तरह मैग्लीन के जिस्म पर मुगदर बरसाती ही चली गई ।

आगे बढ़कर विकास उसे रोक ना लेता तो शायद वह अकेली ही मैग्लीन को मार डालती ।।

एक विधवा आई तो उसने जैसे प्रण कर लिया अपने सुहाग के हत्यारे को वह मार ही दम लेगी । विकास ने उसे भी रोका ।

इस तरह मैग्लीन चीखता रहा , लेकिन किसी के दिल में उसके लिए रहम नहीं था ।। पिटता पिटता लहू लहान हो गया ।

कहां तक सहता मैग्लीन ? मार खाता खाता बेहोश होता तो पिशाचनाथ उसे लखलखा सुंघा कर होश में ले आता ।।।

पुनः वही क्रम !

अभी तो एक हजार नागरिक भी अपना अधिकार पूरा नहीं कर पाये थे कि मैग्लीन मर गया ।।

उसके मरने के बाद भी चमन के नागरिकों को उस पर रहम ना अाया । बहुत से लोगों के दिलों में तो प्रतिशोध की एेसी आग भड़क रही थी कि मुगदर के वार मैग्लीन की लाश पर भी वार करने से बाज ना आए ।।

फिर वतन के कहने पर सब लोग रूके ।।

सब ने वतन से मांग की थी मैग्लीन की लाश को यहां से उठाया ना जाये बल्कि यही सड़ने दिया जाये ।

हालांकि वतन चाहता नहीं था किन्तु यह मांग उसे माननी ही पड़ी ।

अौर फिर शाम को चमन के एयरपोर्ट से दो विशेष विमान उड़ान भर लिये । एक रूस के लिये तो दूसरा भारत के लिये ।।

आजादी के सिर्फ छः माह पश्चात ----

चमन ने पूरे विश्व को चौंका दिया ।

विश्व में प्रकाशित वतन के स्टेटमेंट ने एक बार तो बुरी तरह सारी दुनियां को चौंका दिया ।

अमेरिका रूस , ब्रिटेन , चीन और भारत जैसे महान राष्ट्रों को तो जैसे यकीन ही नहीं आता ।

इतने अल्प समय नें-इतनी जबरदस्त प्रगति ।

निश्चय ही संसार को अस्वाभाविक-सी लगी थी ।

यूं तो समूचा विश्व देख रहा था कि आजादी मिलते ही वतन के नेतृत्व में चमन ने तीव्र वेग से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होना शुरू कर दिया था । इस छोटे से राष्ट्र ने बड़ी तेजी से प्रगति की थी ।

मगर ये स्टेटमेंट--वतन के स्टेटमेंट ने पूरे विश्व में एक हलचल-सी मचा दी थी ।

विश्व के लगभग सभी प्रमुख समाचारपत्रों का मुख्य शीर्षक था ।

विश्व के लगभग सभी प्रमुख समाचारपत्रों का मुख्य शीर्षक था ।

" विज्ञान की दुनिया में एक नया चमत्कार !"

चमन के राजा मिस्टर वतन ने एक ऐसे अजीबो गरीब यंत्र का आविष्कार किया है जिससे ब्रह्मांड में बिखरी आवाजों को समेटा जा सके ।"

अब आयेगा मजा हर कोई यंत्र को पाने के लिये मैदान में उतरेगा ।

वतन का स्टेटमेंट यों था ।

'कहते हैं कि इन्सान मर जाता है लेकिन इन्सान की आत्मा कभी नहीं मरती । आत्मा अज़र अमर है । आज का युग वैज्ञानिक युग कहलाता है ।

कहते हैं कि दुनिया ने किसी भी युग, में उतनी तरवकी नहीं ली जितनी कि इस युग में की है किन्तु मैं इस विचार-से सहमत नहीं, बल्कि मेरी धारणा तो यह है कि आधुनिक वैज्ञानिक युग में मौजूद विज्ञान का हर प्राचीन विज्ञान की नकल है, और अभी उस विज्ञान से हम वहुत पीछे हैं । हमने परमाणु और न्यूट्रॉन बम तो वना लिए किन्तु क्या वैसा ऐसा हथियार वना सके जैसे भारत के महान ग्रंथ 'महाभारत' में बभ्रुवाहन के पास था ? कदाचित कुछ लोगों को पता न होगा कि . किस हथियार की बात कर हूं ?

बभ्रुवाहन महाभारत काल का एक योद्धा था । वह अपने घर से कोरबों की तरफ से युद्ध करने निकला था ।

श्रीकृष्ण जानते थे कि अगर वह युद्धस्थल में पहुंच गया तो निश्चय ही पाण्डवों की पराजय होगी ।

तभी तो रास्ते में श्रीकृष्ण ने उसे रोककर पूछा…तुम कहाँ जाते हो ?"

…‘"महाभारत के युद्ध में हिस्सा लेने ।'" बभ्रुवाहन ने जवाब दिया ।

किसकी तरफ से युद्ध करोगे ?' ' .

…"हारने बालों की तरफ से !"

नीति-निपुण बासुरी का जादूगर मुस्कराया, बोला---" उस युद्ध मे भला तुम्हारी क्या बिसात है ? वहा कर्ण, दुर्योधन, अर्जुन और भीष्म पितामह जैसे जोद्धा है । उन योद्धाओं के समक्ष भला तुम क्या कर सकोगे? "

'जो भी हो ।' उसने कहा…'मेरी मां ने मुझे इस आज्ञा के साथ भेजा है के मैं हारने वालों की तरफ से युद्ध करू ।

 


माखनचोर तो सारी वास्तविकता जानते थे । दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिज्ञ ने उसे अपने शब्दजाल में फंसाया-वड़े बेवकूफ हो तुम । मां ने कहा और तुन युद्ध के लिए निकल पडे । हम तो देख हैं है कि तुम्हारे तरकश में तीर भी सिर्फ तीन ही हैं ।

युद्ध क्षेत्र मे पहुचने कुछ ही देर बाद तुम्हारे ये तीनों तीर खत्म हो जाएंगे, फिर क्या करोगे ?

गर्व से मुस्कराया बभ्रुवाहन, बोला…'मेरे पास तीन तीर है महाराज ! मुझे मालूम है कि मुझे दूसरा तीर प्रयोग करने की भी जरूरत नहीं पडे़गी । मैं एक ही तीर से सारे दुश्मनों का संहार कर दूंगा ।'

चतुर कृष्ण ने आश्चर्य प्रकट किया…"कैसी बेवकूफी की बात कर रहे हो ? भला यह कैसा तीर है जो संबक्रो एकसाथ मार देगा ?'

'मेरे तीर में ऐसी ही विशेषता है महाराज !' उसने कहा --- और यह सुनकर चौंकेंगे के सबको मारने के बाद भी मेरा तीर नष्ट नहीं-होगा बल्कि सुरक्षित वापस मेरे तरकश में आ जाएगा ।'

-"शायद कोई बेवकूफ ही तुम्हारी इस बात पर यकीन कर सकता है ।'

मुस्कराकर बभ्रुवाहन ने कहा-'युद्ध क्षेत्र में आप स्वयं देख लीजिएगा ।'

तुमने बात कुछ ऐसी कही है कि हम उस पर यकीन नहीं कर सकते ।' कन्हैया ने कहा…"और न ही युद्ध होने तक प्रतीक्षा कर सकते हैं ।‘

" गर्व में फंसे बभ्रुवाहन ने कहा-'तौ फिर आपको मेरी बात की सच्चाई का यकीन कैसे हो ?'

मन-हीँ-मन मुस्कराए मनमोहन । नीति-निपुण ने समीप के ही एक इमली के पेड़ की ओर संकेत करके कहा 'इस पेड़ को देखो, अगर तुम्हारे धनुष से छोड़ा गया एक ही तीर इस वृक्ष के सारे पतों को बेंधकर तरकश में वापस आ जाए तो मुझे तुम्हारी बात का यकीन हो जाएगा ।'

अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए आतुर बभ्रुवाहन ने सहर्ष माखनचोर की यह वात मान ती । उसने तीर छोड़ा ।

कृष्ण तो जानते ही है कि क्या होना है । उधर बभ्रुवाहन का तीर दरख्त के एकएक पते को बेंधने लगा और इधर माखनचोर ने उस दरख्त का एक पत्ता बभ्रुवाहन की दृष्टि बचाकर अपने पैर के नीचे दवा लिया ।।

अपनी इस नीति पर सांवरा मुस्करा रहा था ।

परन्तु-अन्त में सभी पतों को वेंधकऱ तीर जब श्रीकृष्ण के पैर पर लपका तो जल्दी से श्रीकृष्ण ने पैर हटा लिया, एक क्षण के लिये भी विलम्ब हो जाता तो तीर महाराज कृष्ण के पैर को जख्मी तो कर ही देता । उस अन्तिम पते को भी बेंधने के बाद तीर सीधा तरकश में पहुच गया । उसके बाद क्या हुआ ? श्रीकृष्ण ने वध्रुवाहन को युद्ध में भाग लेने से कैसे रोका ?

यह तो महाभारत का कथानक है, और उसे यहाँ कहने की मैं कोई जरुरत महसूस नहीँ करता ।

मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि आज के बैज्ञानियों ने क्या कोई रिवॉल्वर ऐसी बना ली है, एक ही गोली से सारे दुश्मनों को माररकर वापस पुन: अपनी पूर्णशक्ति' जितनी क्षमता कें साथ रिवॉल्वर में अा जाए ?

क्या है आघनिक युग में ऐसा हथियार ? नहीं ।

तो फिर हम कैसे कह सकते है कि आज का बिज्ञान सबसे ऊंचा है ? उपयुक्त किस्म के अनेक उदाहरण देकर मैं यह सिद्ध कर सकता हू प्राचीन युग विज्ञान के मामले में आधुनिक युग से पीछे नहीं बल्कि कुछ आगे ही था ।

वह सभ्यता समाप्त हो गई । उस युग में क्या था, क्या नहीं--' हम पूर्णतया नहीं जानते है ।

हां , भारत के चार महान ग्रन्थ हैं----चार वेद'-उन चारों ही वेदों में अलग-अलग-चार क्षेत्रों का गहरा ज्ञान है, सब जानते हैं क्रि ऋग्वेद में विज्ञान से सम्बन्धित ज्ञान थे । उस महान भारतीय ग्रन्थ के एक-एक दोहे में एक-एक फार्मुला था । भारत का पिछला इतिहास खून से लिखा गया है । पूरा अनगिनत लड़ाइर्यों से भरा पडा है । उन्हीं लड़ाइर्यो के चक्रवात में भारत की न जाने जितनी विशेष चीजें गुम होकर रह गई । चारों वेद भी गुम हो गए ।

कुछ पता न लग सका कि कौन कौन-सी लडाई में उन वेदों की प्रतिलिपियां किसके हाथ लगी ।

सम्भावना यह प्रकट करते हैं कि कोई भी उन वेदों की मूल प्रतिलिपि न'कब्जा सका । वे महान ग्रन्थ पृष्ठों में बदल गए । कोई पृष्ठ किसी के हाथ लगा और कोई पृष्ठ किसी के । अत: उन महान ग्रन्धों में जो ज्ञान था, वह पूर्णतया किसी को भी प्राप्त न हो सका । उस लूटखसोट से संस्कृति का जो ज़र्रा--ज़र्रा जिसके हाथ लगा, वह ले उड़ा ।

ऋग्वेद का भी यही हाल हुआ ।

उसके भी विभिन्न पुर्जे लोगों के हाथ लगे ।

और आज-मेरा बिश्वास है कि आधुनिक युग में जितने भी चमत्कृत करने वाले आविष्कार है, उसमें ज्यादातर का आइडिया उसी ऋग्वेद में से लिया गया है । मेरे विचार से कहीं किसी ने कोई नई बात नहीं निकाली है, आधुनिक युग का समूचा विज्ञान ऋग्वेद की देन है ।

मेरा यह आविष्कार' जो मैंने क्रिया है-यह भी ऋग्वेद की देन है ।

अब सुनिये कि मैंने यह आविष्कार कैसे किया ?

मुझे अपने माता-पिता और बहन से बहुत प्यार था । फलवाली बूढी दादी मां से भी असीम प्यार करता था । न जाने क्यों मेरा दिल चाहता था कि मैं अपने माता-पिता की आवाज पुन: सुनूं

बचपन में मेरी बहन से जो बातें हुंई थीं…उन्हें सुनू ?

लेकिन...सवाल यह था कि कैसे ?

कैसे मैं उनकी बातें सुन सकता हूं ?

आवश्यकता आविष्कार की जननी है ।

मुझे याद अाया--ऋग्वेद में लिखा है कि आवाज कभी नहीं मरती । आवाज आत्मा की तरह अजर अमर है । हम जो कुछ बोलते हैं, आज तक जितने भी इन्सानों ने जो कुछ बोला है, वह " ब्रह्मंड में सुरक्षित है । ऋग्वेद में लिखी इस जानकारी से भी कहीं

ज्यादा मेरा अपना विचार था कि व्रह्मांड में न सिर्फ यह सुरक्षित है जो इन्तान ने बोलता है बल्कि इससे भी ज्यादा यह भी सुरक्षित है जो कभी किसी ने सिर्फ सोचा है, बोला नहीं है । ऋग्वेद ईंसी जानकारी और माता-पिता की आबाज सुनने की आवश्यकता ने मुझे यह प्रेरणा दी कि क्यों न मैं किसी यन्त्र का आविष्कार करूं जिससे ब्रह्माण्ड में बिखरी अपने माता-पिता, बहन और फलबाली दादी मां की आबाज समेट सकू। मैं किसी ऐसे यन्त्र का आविष्कार करने में व्यस्त हो गया ।

इस यन्त्र को बनाने का विचार मेरे दिमाग में चमन की सत्ता संभालने के दो महीने बाद अाया था, अत: चार महीने में मैंने अपनी लगन, परिश्रम और प्रतिभा से वह यन्त्र बनाने में सफलत अर्जित कर ली है ।

आज़ अपने-वनाए इस यन्त्र के माध्यम से मैं खोई हुई आवाजें स्पष्ट सुनता हू!

बस, जब इस यन्त्र में एक और विशेषता यह भी भरनी है यह ब्रह्माण्ड से आवाजों के अलावा उन विचारों को भी समेट ले जो अभी मेरे माता-पिता ने सोचे थे । उम्मीद है, सारी दुनिया क्रो मेरा यह आविष्कार पसन्द आया होगा ।

हर समाचार-पत्र में इसी अाशय का समाचार था ।

 


अलग-अलग अखबारों ने अपनी अलग-अलग शेली-में यह खबर दी थी ।

इस खबर ने'सारी दुनिया में जैसे एक हलचल सी मचा दी ।

चीन, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, भारत, पाकिस्तान इत्यादि दुनिया के सभी राष्ट्र चोंक पड़े ।

खुद को बहुत धुरन्धर वैज्ञानिक समझने वालों की तो खोपड़ी ही झन्ना गई।

सोचने लगे…यह महान आविष्कार हमारे पास क्यों नहीं है । जिस दिन यह समाचार अखबार में प्रकाशित हुआ था, उस दिन विकास को झंझोड़कर धनुषटंकार ने ज़गाया था ।

धनुषटकार के जगाने पर विकास चौंका ।

यह पहला ही मौका था कि जब धनुषटंकार ने उसे सोते से जगाया था । अभी उसने आंखें खोली ही थी, कि उसकी नजर अपनी आंखों के सामने पडे हुए एक अखबार पर पडी, नीद से भरी मिचमिचाती आंखों से उसने वे शब्द पढे जो-अखवार में उसे सबसे ज्यादा मोटे चमके थे । लिखा था…

------चमन के राजा वतन का आबाजों पर कब्जा ।

चौंक कर उठ बैठा विकास !

'जल्दी-जल्दी यह सारी खबर पढ़ गया, पड़ने के बाद उसने' धनुषटंकार की तरफ देखा । बेड के समीप ही एक 'कुर्सी पर बैठा धनुषटंकार बड़े आराम से सिगरेट के सुटॄटे लगा रहा था ।

विकास को अपनी ओर देखकर वह मुस्कुराया, मुस्कराने के प्रयास में बन्दर के मुंह की अजीब-सी आकृति बन गई ।

खुशी की एक किलकारी के साथ विकास को उसने आंख भी मारी और हाथ बढा दिया । विकास ने गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया । वह उसकी खुशी का अनुमान लगा सकता था कि अखबार में अपने भाई वतन की इस सफलता के विषय में पढकर मोण्टी को कितनी खुशी हुई होगी ।।

…तभी तो हाथ मिलाते हुए विकास ने उससे कहा---"बधाइं हो मोण्टो ?"

और खुशी में उछलकर धनुषटंकार विकास की गर्दन पर लटक गया और उसके चेहरे पर बेशुमार चुम्बन लेने लगा ।

विकास सोचने लगा-कैसा मजबूर है मोण्टो । जुबान से अपनी खुशी भी जाहिर नहीं कर सकता। न जाने कब तक वह विकास का चेहरा चूमता रहा, अगर उसी वक्त फोन की घण्टी न बज गई होती, वह विकास से अलग हुआ , विकास ने रिसीवर उठाया और बोला---" यस ,मैं विकास बोल ' रहा हूं ।"

" रोका किसने है---बोलते रहो ।" दूसरी तरफ से आवाज आई ।

" कौन, गुरु ?" बिकास ने कहा-"गुरु आपने आज का अखवार पढ़ा हैं" -

"पढा नहीं प्यारे, बल्कि यूं कहो कि चाट लिया है ।" विजय ने कहा ---" जिस लिये तुम पूछ रहे हो, वह खबर भी हमने पढ ली है ।"

-'"तो फिर बधाई हो गुरु !" विकास ने कहा"--"वाकई मानना पडेगा कि वतन दुनिया का सबसे बहा वैज्ञानिक है । उसका पहला आविष्कार यानी समुद्र के पानी से असली गोल्ड जैसा ही नकली गोल्ड बनाना तो तारीफ के लायक था ही, लेकिन यह,यह ब्रह्माण्ड में बिखरी आवाज को. समेटना-वास्तव में गुरु, वतन इस युग में सबसे महान वैज्ञानिक है ।"

"और इस दूनिया का सबसे बड़ा मूर्ख भी वही, प्यारे दिलजले?" विजय कहा ।

-"क्या मतलब नं गुरु ?" विकास चौंका ।

…"कई बार कहा प्यारे दिलजले कि जब तक मूंग की दाल में भीमसेनी काजल डालकर खाना शुरु नहीं करोगे तब तक हमारी बातों का मतलब तुम्हारी समझ में ना अायेगा । फिर भी अगर मतलब समझना चाहो तो हमारे दौलतखाने पर अा जाओ ।" इतना कहने के साथ ही दूसरी तरफ से विजय ने सम्बन्ध विच्छेद कर दिया ।

"क्या बात है गुरू, आप कुछ सुस्त से क्यों हैं ?" विकास के रिसीवर क्रेडिल पर रखते ही धनुषटंकार ने लिखा हुआ एक कागज का टुकडा उसकी आंखों के सामने का दिया ।

………"गुरु का कहना है मोण्टो प्यारे कि इस दुनिया में वतन से ज्यादा बढकर मुर्ख कोई नहीं ।" विकास ने कहा ।

धनुषटंकार चीखकर इशारे से पूछा-"ऐसी क्या बात हुई ?"

"बात का तो मुझे भी नहीं पता ।" विकास ने कहा---"लेकिन यह तो तुम समझते ही हो कि की बात कभी गलत नहीं होती । हम कई वार गलत सलत पर उनसे लढ़ पड़ते हैं ।--मगर थिंकिंग हमेशा उनकी ही सही निकलती है जब वतन को उन्होंने दुनिया का सबसे बड़े मुर्ख की संज्ञा _ दी है तो इसमें कोई शक नहीं कहीं ना कहीं कोई गड़बड़ जरूर है । "

-"तो क्या स्वामी के पास चलें ?" धनुषटंकार ने लिखकर पूछा ।

" बिल्कुल ।" विकास ने कहा…"बस पन्द्रह मिनट में मैं निबट लूं और फोरन चलते हैं ।"

कहने के साथ ही विकास ने सीधी जम्प बैड से बाथरूम में लगा दी ।

 
करीब तीस मिनट बाद वे दोंनों विजय के बेडरूम में, बेड के समीप पडे़ सोफों पर बैठे विजय का मुंह देख रहे थे वे और वेड पर समाधि-सी-लगाए बैठा था विजय । विजय उन्हें इसी पोज़ में मिला था और वे दोनों विज़य के चरणस्पर्श करने के बाद सोफों पर बैठ गये थे ।

" पुर्ण सिंह !" विजय के कुछ कहने से पहले विकास चीखा ।

" आया सरकार ।" इस तरह प्रविष्ट हो गया जैसे इस बात के इन्तजार में कमरे के बाहरं ही खडा था कि कब उसे आवाज लगे और कब बह अन्दर जाए । "

" गुरु की समाधि तोड़ने के लिए जरा एक बाल्टी पानी लाओ ।"

" नलों में पानी नहीं है बच्चा ।" बिजय उसी तरह समाधी लगाए किसी सन्त की तरह बोला…"ज़ब से हमारे देश ने दूसरी आजादी पाई है तब से पानी गायब है । बिजली गायब है, ये मत समझना कि सब कुछ गायब है---है भी वहुत कुछ । गुन्डागर्दी है, महंगाई ने भी पैंतरा बदल लिया है । अब जरा सौंने को बेचकर महंगाई को उल्टा करके पंखे पर लटकाने की तैयारी है ।"

. …"मैं अभी नहाकर अाया हूं…नल आ रहे है ।" विकास ने कहा-"पूर्णसिंह, तुम पानी लेकर आओ ।"

" अजी पानी साले को क्या अाते-जाते देर लगती है ।" विजय ने कहा---"जितनी देर में तुम अपनी क्रोठी से यहाँ तक अाये हो, उतनी देर में तो पानी हमारे नलों से गायब होकर गांवों की टूयूबवेल में पहुंच चुका होगा ।

"मैंने रात पानी भरकर रख लिया था । ठण्डा भी होगा ।पीते ही मजा आएगा ।" पुर्ण सिंह ने कहा --" हुक्म हो तो लाऊं ?"

'"अबे चल नमकहराम ।” विजय ने आंखें खोल एकदम पूर्णर्सिंह को डांटा-साले, हमारा ही नमक खाता है और उसी नमक में किरकिल मिलाता है । कल्लो भटियारी की कसम, जिस तरह देश से कांग्रेस का पत्ता साफ हो गया उसी तरह अपनी कोठी से हम तेरा सफाया कर देगे " इस तरह-काफी देर तक विजय ऊबड़-खाबड़ बाते करता रहा ।

इस हद तक कि आज तो विकास भी परेशान हो गया उससे

आज सुबंह-सुबह से न जाने उसे क्या दौरा पंडा था कि हर बात' को राजनीति में घसीट लेता ।

बडी मुश्किल से बह बिज़य को लाइन पर लाने में सफल हुआ ।

जब से यह आया था, न जाने जितनी बार वया प्रश्न कर चुका था कि फोन पर वतन क्रो उन्होंने मुर्ख क्यों कहा था ?

उस वक्त विकास को राहत मिली जब विजय ने कहा …'"मूर्ख नहीं प्यारे, दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख कहा था ।"

" लेकिंन क्यों ?"

इसलिये कि उसने अखबारों के द्वारा अपने इस आविष्कार का दिंढोरा पीटा ।"

"क्या मतलब है ?"

" लगाता है, मूंग की दाल खाकर नहीं अाए हो ?" विजय ने कहा ।"

" मेरा कहने का मतलब यह है गुरू कि अखबारों को उस आविष्कार के बारे में बताकर उसने क्या मूर्खता की ?" विकास ने पूछा…"जब भी कोई देश बड़ा काम करता है, बह अपनी सफलता को दुनिया के सामने रखता है । अमेरिका ने जब बम बनाया----- अखबार में दिया । न्युट्रान खबर भी अखबार दी गई । रूस या अमेरिका का भी यान अन्तरिक्ष की तरफ रवाना होता है तो महीनों पहले उसृका प्रचार क्रिया जाता है । इससे विश्व के अन्य राष्ट्रों की नजर में उस देश का सम्मान बढता हैं ।"

"‘मातूम है, ऐसी ही एक मुर्खता भारतीय वैज्ञानिक डाँक्टर भावा ने भी एक बार की थी ।" विजय ने कहा-"उसने कहा था कि वह भारत के ऊपर कुछ किरणों का जाल बिछा देगा कि अणुबम भारत का कुछ नहीं सकेगा ।"

-"क्या कहना चाहते हैं आप ?-"

" इस घोषणा के बाद मालूम हैं डॉक्टर भावा का क्या अन्जाम हुआ था ?" विजय ने पूछा ।

"उनका विमान क्रेश हो गया था और वे मारे गए थे ।" विकास ने कहा ।

"डॉक्टर भावा का विमान क्रेश हुआ नहीं था प्यारे दिलजले, बल्कि क्रेश किया गया था ।" विजय ने बताया-----"पहाडी पर विमान टकराकर चूर चूर हुआ था, मालूम है, बाद में परीक्षण में पाया गया कि उस पहाडी में कृत्रिम रूप से चुम्बकीय शक्ति पैदा की गई थी । यह तो आज तक पता नहीं लग सका कि यह हरकत किस देश की थी, मगर हां यह सारी दुनिया को पता था कि डॉक्टर 'भावा' का विमान उस पहाड़ी के उपर से गुजरेगा । बस दुश्मन ने उस पहाडी में चुबकीय शक्ति पैदा की और जिस उद्देश्य ' उन्होंने यह काम क्रिया था, बह पूरा हो गया यानी उस पहाडी की चुम्बकीय शक्ति ने विमान को अपनी और खींचा और पहाडी से टकराकर विमान टुकडे-टुकडे हो गया ।"

"मगर यह कहानी को -दोहराकर अाप कहना क्या चाहते हैं ?"

"यही कि विश्व की कोई शकित किसी दूसरे ढंग से इस कहानी को दोहरा सकती है ।"

सुर्ख हो गया विकास का चेहरा, गुर्रा उठा उस नापाक शक्ति को जलाकर खाक न कर दूंगा मैं ।"

"जब वह पहले ही वतन को समाप्त कर देगी तो तुम्हारे खाक करने से क्या लाभ होगा ?" विजय ने कहा---"तुम दिमाग से काम न लेकर व्यर्थ के जोश में अाते हो प्यारे दिलजले । मैं कहता हूं कि वतन के मरने के बाद अगर तम सारी दुनिया क्रो भी जलाकर खाक कर दो तो क्या वतन लौट अाएगा ? क्या उसका बह आविष्कार लौट अाएगा जो उसने किया है ?"

विकास ने उपने दिमाग को नियंत्रण में किया, बोला--" तो क्या करें गुरू ?"

 
" क्या कर सकते हैं हम ?"' विजय ने कहा…"जब वतन ने ही ढिढोरा पीटने की मूर्खता की है । अवे, ठीक है तुमने . आबिष्कार किया है, लेक्रिने इसमें ढोल गले में लटकाकर शोर मचाने की क्या बात है ? याद रखो'-दुनिया की महाशक्तियां कभी यह नहीं चाहतीं कि कोई अन्य देश उसके बराबर में अाए । वे भारत को ही बढता हुआ नहीं देख सकती और चमन, चमन तो अमेरिका के वाशिंगटन और रूस के मास्को से भी छोटा है । "

-"’वह तो मैं सब समझ गया गुरू, लेकिन अव सवाल तो यह है कि हमें क्या करना चाहिए ?"

" फिलहाल इस मामले में हम कोई खास हथेली तो लगा नहीं सकते । विजय ने कहा…“लेकिन हां, फिर भी जो हम कर सकते थे, हह हमने किया है । रूस, अमेरिका, चीन, और पाकिस्तान में स्थित अपने एजेन्टों को हमने सचेत कर दिया है । उनके सुपर्द यह काम दिया गया है कि वे अपनी-अपनी जगह पर दुश्मन की गतिविधियों पर नज़र रखें और तीन दिन के अन्दर रिपोर्ट भेजें । हर देश के छोटे-से-छोटे व गुप्तचर संगठन से लेकर सीक्रंट सर्विसों तक नजर रखी जा हैं । हर देश में स्थित अपने प्रत्येक एजेण्ट को यह अादेश भेज दिये हैं कि विशेष रूप से उन्हें यह ध्यान रखना है कि किस देश में वतन के इस स्टेटमेंट पर क्या प्रतिक्रिया होती है ।"

" अोह !" विकास ने कहा…"इसका मतलव फिलहाल हमें अपने एजेण्ट की रिपोर्ट का इन्तजार करना है ?"

" फिलहाल इस के अलावा हमारे पास अन्य कोइ चारा नहीं ।"

"मैं सोच रहा हूं गुरू, क्यों न मैं आज ही चमन के लिए रवाना हो जाऊं ?" विकास ने कहा ।

" वहां जाकर क्या अण्डे दोगे तुम ?"

-‘वतन की सुरक्षा के लिए तो मैं पहुंच ही जाऊंगा ।" विकास ने कहा---'"इससे ज्यादा फिलहाल वतन की क्या मदद हो सकती है?"

"इस मूर्खतापूर्ण _विचार को संभालकर अपनी जेब में रख लो, प्यारे दिलजले !" विजय ने यहा----" कुछ नहीं कहा जा सकता कि किस देश से किस एजेण्ट की क्या रिपोर्ट आ जाए । यह, फैसला हमें रिपोर्ट मिलने के बाद ही करना होगा कि हमें क्या करना ।"

-"लेकिन रिपोर्ट अाने से पहले ही चमन जाने में क्या हर्ज 'है गुरु ?" विकास ने पूछा ।

“वहीँ हर्ज है दिलजले, जो "थमसप' में चाय डालकर पीने में है ।" विजय बोला----"मियां खां , यह तो तुम भी देख ही चुके को कि वतन वह रसगुल्ला नहीं है, जिसे एकदम -हीं कोई हजम कर जाएगा । दूसरी बात ये कि न जाने कौन से देश से क्या रिपोर्ट आ जाए । यह फैसला तो सूचनाओ के आधार पर ही होगा कि हमें किया करना है । फिलहाल तो यह भी पता नहीं कि इस केस के संबन्ध में हमें चीन, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, चमन या दुनिया के किसी अन्य मुल्क में जाना पडे़ । हां-हमें किसी भी देश की यात्रा के लिए तैयार रहना चाहिए । माना कि तुम चमन चले गए और हमारे क्रिसी एजे्नट ने किसी अन्य देश क्री ऐसी रिपोर्ट भेजी कि हमें वहां जाना पडे़ तो क्या लाभ होगा ?"

-"गुरु ।" विकास ने कहा…"ज़ब मुझे खतरा स्पष्ट चमक रहा है तो सच, आराम से यहां बैठकर इतजार‘ नहीं होगी मुझसे ।"

-"एक अच्छे जासूस के लिए धैर्य भी वहुत आवश्यक चीज है प्यारे ।" विजय ने कहा…"फिलहाल धैर्य की जरूरत है । ये ठीक है कि खतरा स्पष्ट चमक रहा है, लेकिन जब तक यह स्पष्ट न हो जाए कि इस खतरे से बचा किस दिशा से जा सकता है, उससे पहले खतरे में कूद पड़ना उसी तरह है, जिस तरह बीच समुद्र में फंसे क्रिनारे की जानकारी से अनभिज्ञ किसी आदमी का किसी दिशा में तैरना ।"

-"'क्या मतलब गुरू ?"

"माना कि तुम बीच समुद्र में फंस गए हो भी विजय ने समझाया…"तुम्हें मालूम नहीं है क्रि, जहां तुम हो वहा से किनारा किस दिशा में कितनी दूर है । अब तुम्हारा पहला फर्ज यह होगा और कि किनारे की जानकारी प्राप्त करों या यह कहो क्रि यूही विना किसी जानकारी के तैर लोगे ?" विजय ने कहा ।

-"माना कि बुद्धिमानी किनारे की जानकारी लेने में ही है" विकास ने कहा-लेकिन जब किनारे की जानकारी -न तो किसी दिशा में तो बढ़ना ही होगा ।"

"लेकिन अगर तुम्हें यह पता लग जाए कि दो दिन वाद , किनारे के विषय में जानकारी मिल जाएगी तो ?"

. …"तो हमें जानकारी मिलने तक इन्तजार करना चाहिए ।" विकास ने कहा-"लेकिन खाली बैठकर इन्तजार करना भी . महाबोरियत का काम है, अत्त: कछ-न कुछ करते रहना चाहिये ।"

"अगर किसी दिशा में तैरैनै का काम करोगे तो प्यारे, यह बेवकूफी भी हो सकती है कि अाप किनारे से दूर ही होते चले जाएं ।" विजय विना रुके कहे जा रहा था…"हां, इंतजार का गुड़ खाने में समय ही गुजारने की बात है तो अखण्ड कीर्त्तन किया जा सकता है । बस, इसके 'अलावा कोई चारा नहीं है ।"

-'"हे गुरू । " विकास बोला…'क्यो न हम झकझकी और दिलजली का मुकाबला करके इन्तजार का यह समय गुजार दें ।"

"'अबे, बात को कहने का ढंग है ।" विजय ने कहा----और कीर्तन में क्या हम भजन गाएंगे ?"

-"तोफिर गुरू हो जाओ शुरू ।"

और…बिना भूमिका के वास्तव मैं विजय शुरू हो गया ।

. उसने वेहद लम्बी झकझकी सुनाई । इतनी लम्बी कई बार विकास को ऐसा लगा कि अब समाप्त होने वाली है लेकिन विजय की झकझकी किसी लम्बे तार की तरह खिंचती ही चली गई ।

समाप्त होने पर विकास ने कहा--"आपकी इस झकझकी ने

तो बोरियत को दूर करने के स्थान पर और बढ़ा दिया गुरु !"

"'ऐसी बात है तो दूसरी सुनो ।" विजय शुरू होने ही जा रहा .था कि…

" रूको गुरू , ठहरो ।" हाथ उठाकर विकास ने कहा-"कायदे की बात यह कि आपने एक झकझकी कह ली । अब नम्बर दिलजली का है । पहले मैं अपनी दिलजली सुना लूं उसके बाद जाप झकझकी सुनाएं ।"

"यह भी ठीक है ।" विजय ने कहा ।

फिर…विकास ने दिलजली छेढ़ दी । वह भी क्या विजय से कम था ? उसने विजय से कुछ लम्बी ही सुनाई, जबाब में विजय की झकझक्री उस दुगनी लम्बी और फिर उससे भी दुगनी लम्बी विकास की दिलजली ।

इस तरह-मजाल थी कि दोनों में से कोई भी पीछे हट जाता ! जैसे यह मुकाबला हो गया हो कि एक दुसरे को कौन ज्यादा बोर कर सकता है । उनमें से क्रोइं बोर हुआ या न हुआ हो लेकिन हां ,उनके मुकाबले में बेचारा धनुषटंकार पिस रहा था । कुछ देर

तक तो वह सोफे पर बैठा शराब और सिगार पीता रहा, वतन के विषय में सोचता रहा ।

फिर इस कदर _बोर हुआ वह कि अन्त में सोफे पर ही सो गया ।

गुरु चेले का मुकाबला चलता रहा, ठीक इस तरह जैसे शतरंज के धस्कीआपस अड गए हों ।

दूसरे दिन तव जबकि विकास लम्बी तानकर सो ही रहा था कि उसके सिरहाने मसहरी पर रखे फोन की घण्टी घंनघना उठी ।

रिसीवर उठाकर उसने कान से लगाया और नीद के स्वर में बोला---" हैलो...चेला..अाफ विजय दी ग्रैट स्वीक्रिग ।"

" यस प्यारे...ये हम बोल रहे है यानी गुरू आँफ विकास ।"

" ओह, गुरु ! हाँ, कया बात है ?"

"अवे, अभी तक सो रहे हो मियां ? कल के अधूरे रह गए मुकाबले को पूरा करने नहीं आओगे क्या ?"

…'"गुरु, लगता है, हमारा मुकाबला जिन्दगी-भर भी चलती रहा तो पूरा नहीं होगा ।" विकास कह रहा था--" अखण्ड कीर्तन की जगह अगर सोचकर समय निकाला जाए तो ज्यादा उचित होगा । क्यों न अाज हम यह शर्त लगाएं कि कौन ज्यादा देर सोए ?"

"तुम सोते ही रहोगे प्यारे,और मैं चीन पहुंच जाऊंगा ।"

हल्के चौंका, बोला----'' कहना चाहते हो गुरु ?"

"'यही कि अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, रूस और पाकिस्तान से रिपोर्ट अा गई है ।" विजय ने बताया । "

विकास एकदम सीधा‘ 'होकर बिस्तर' पर बैठं गया और बोला----"क्या रिपोर्ट है ?"

" जानना चाहते हो तो अपने प्यारे काले लड़के के पास आजाओ ।" विजय ने कहा--"गुप्त भवन में ।"

 


बिकास अभी कुछ कहना ही चाहता था कि वह रुक गया । दूसरी तरफ से बिजय ने उपयुक्त अल्फाज बोलकर सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया था । एक पल तो लह सांय-सांय करते रिसीवर को घूरता रहा, फिर उसे क्रेडिल पर रखकर बिस्तर से उतारा ।

तभी हाथ में चाय लिए कमरे में प्रविष्ट हुई रैना ।

"अरे मम्मी ।" रैना को देखते ही विकास ने कहा…"आप खुद चाय लाई ! नौकर नहीं था क्या ?"

" चाय लाने के बहाने कम-से-कम तेरी सूरत तो देख ली ।" रैना ने शिकायत-भरे स्वर में कहा---"बहुत आवारा हो गया है तू । सुबह-ही-सुबह न जाने कहाँ निकल जाता है, और फिर रात को उस समय अाता है जब सब सो जाते हैं । मालूम है वो क्या कह रहे थे ?"

'"क्या " ?" विकास ने रैना के हाथ में है कप प्लेट लेते हुए पूछा ।

" यह कि उन्हें तो एक ही घर में रहने के बावजूद भी तू कई-कई दिन तक नहीं मिलता ।" रैना ने कहा'…" कुछ तो यह पुलिस की नौकरी ही ऐसी है कि वे कब घर में रहते और कब बाहर ? फिर, एक तू है कि सारा दिन घर से बाहर रहता है ।"

"'क्या बात करती हो मम्मी । हां । इसे इत्तफाक ही कहा जा श्री सकता है कि जब डैडी घर में अाते है तो मैं नहीं होता और जब मैं घर में होता हूँ तो डैडी नहीं आ पाते ।" कहने के बाद बिकास ने चाय का एक लम्बा घूंट भरा ।

"'ऐसी बात नहीं विकास ।" रैना ने कहा…"वे नौकरी करते हैं, फिर भी तुम से ज्यादा देर घर में रहते हैं । .और एक तू ' _ है कि कुछ न करते हुए भी जाने सारे दिन कहां रहता है ?

अरे बिकास, जाना है क्या ?"

विकास चौंका ---बौखलाया , कहने लगा---"क्यों-नहीं तो मम्मी ।"

" बहका रहा है मुझे ?" रैना ने कहा-----देख नहीं रही हूं कि तू चाय जिस ढंग से पी रहा है ?"

"नहीँ' मम्मी ऐसी तो कोई बात नहीं है ।" विकास खुद को सभालता हुआ बोला ।।

"अच्छा, यह बता, काला लड़का कौन है ?"

और-रैना के इस सवाल पर विकास इतनी बूरी तरह उछल पडा जैसे एकाएक किसी बिच्छू ने उसे डंक मारा हो परन्तु चौंकने का एक भी भाव उसने अपने चहरेे पर नहीं आने दिया । उसने संभलकर सवाल किया…"काला लड़का-कौन काला लडका ?"

"औंर...ये गुप्त भवन क्या है ?"

विकास के सिर पर जैसे बम गिरा । कप प्लेट जैसे उसके हाथ से छूटते छूटते बचे,बोला---"गुप्त भवन ?"

दूसरे फोन पर तुम्हारी बातें सुन ली हैं जो तेरे और विजयं भैया के बीच हो रही थीं ।"

रैना के इस वाक्य ने विकास के दिमाग में चकराते इस प्रश्न का ज़वाब 'तो दे दिया क्रि रैना 'काले लड़के' और 'गुप्त पवन-के बारे में कैसे जानती है मगर-रैना का इतना जान लेना ही कम खतरनाक नहीं था । वह बोला-----"ओह । मम्मी ! अाप उस फोन की बात कर रही हैं । वह तो विजय अकल का फोन था न । तुम्हें तो मालूम ही है----वे मजाक करते हैं । कुछ दिन से उन्हें न जाने क्या भूत सवार हुआ है कि अपनी कोठी -को गुप्त भवन कहने लगे और उनका एक दोस्त है-उसे काला लडका कहते है ।"

"'काले लड़के को तुझसे क्या काम हैं. ?" रैना ने कहा…"यानी उससे मिलने के लिए विजय भैया ने तुम्हें क्यों बुलाया है । "

"ओह, हाँ, विजय गुरू का वह दोस्त अमेरिका से अाया हुआ है । आजकल वह मुझे जूडो और कराटे सिखाया करता है ।"

" मुझसे कुछ छुपा रहे हो बिकास !” उसे घूरती हुई रैना ने कहा ।

विकास यह महसूस कर रहा था कि वह बुरी तरह फंस गया है । फिर भी, बात क्रो सभालने की कोशिश करता हुआ वह बोला…"मैँ आपसे क्या और क्यो छिपाऊगा मम्मी ?"

" तो बता कि रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, चीन आदि से क्या के रिपोर्ट अाने वाली है ?"

एक बार पुन: विकास का दिमाग बुरी तरह झनझना उठा । बोला-"'वो मम्मी, इन सब देशों से अकल .ने कुछ और लोग बुलाए हैं न ! मुझे दांब सिखाने के लिए ।

अंकल का कहना वे दुनिया का कौई भी दांवं ऐसा नहीं छोडेंगे जो मुझे ना आता ।"

"क्या तुझे दांव सिखाने की जरूरंत है है ?" रैना ने पूछा ।

"'क्यों नहीं मम्मी, अभी मैंने सीखा ही क्या है ?"

" कुछ सीखा ही नहीं है तूने ।"रैना ने कहा-----" लोग जल्लाद के नाम तुझे जानने लगे हैं । देश-विदेश के जासूस तेरे कटटर दुश्मन बन गए हैं । यहाँ तक सुना है कि तू पूरी पूरी फौजों के के वश में 'नहीं अाता और कहता ये है कि तूने अभी सीखा ही क्या ?"

"ओह मम्मी?" प्यार से कहता हुआ वह रैना से लिपट गया…"बड़ी पगली हो तुम भी । इतने बड़े दुश्मनों से निबटने के लिए अंकल मुझे दुनिया का हर दांव सिखा रहे हैं-क्या गलत रहें हैं वह ?"

" लेकिन वेटे, तुझे इतने -खतरनाक जासूस और मुजरिमों से दुश्मनी लेने की जरूरत ही क्या है है"' रैना ने कहा---" तुझे क्या जरूरत पड़ी है कि इतने खतरनाक लोगों से उलझे ?विदेशों के मामलों को हमारे देश की सरकार जाने, देश की फौजें और जासूस जाने ।"

"‘मम्मी !" रैना से लिपटा विकास बोला-----" ये तो तुम जानती हो कि जेम्स बाण्ड, माइक,फुचिंग और ग्रीफित से तो मेरी दुश्मनी है तुम्हारे देश गुलशनगढ़ में ही गई थी । उस 'अभियान में तुम भी थी -- तुम्हें सब कुछ मालुम ही है ।"

(गुलशनगढ़ के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए पढे, क्रांति सीरीज. की दो पुस्तकें-"पहली दूसरी क्रांति‘ तथा 'क्रांति का देवता । )

""वह दुश्मनी वहीं की वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी ।" रैना ने कहा…" और फूंचिंग और ग्रीफित को तो तूने मार ही डाला ।"

" मैं तो खत्म ही समझता हूं मम्मी, लेकिन जब वे अपने को खत्म नहीं समझते तो मैं क्या करू ?" विकास ने कहा---"फूचिंग क्रो मैंने मार डाला इसलिए पूरा चीन मेरा दुश्मन है । ग्रीफित को मार डाला इसलिए जेम्स बाण्ड और पूरा ब्रिटेन मेरा दुश्मन है । माइक मुझे अपना दुश्मन इसलिए समझता है । क्योंकि गुलशनमढ में वह मुझसे हार चुका है । अब तुम ही बताझो मम्मी, जब वे मुझे अपना दुश्मन समझते हैं तो कभी मुझ पर हमला कर सकते हैं । क्या ये ठीक नहीं होगा कि उनसे सुरक्षा के मैं सारे दांव सीख लूं ?"

" न जाने क्यों रैना की आंखें छलछला उठी । क्रिसी भावना के वशीभूत रैना ने उसे बांहों में कस लिया । रोती हुई वह बोली…"विकास कैसा पागल है रे तू । मुझे तो डर लगता है, केसे-केसे खतरनाक लोगों को तूने अपना दूश्मन वना लिया है ।"

बडी मिन्नतें करने के बाद भगवान ने मेरी गोद भरी है । मेरी गोद में सिर्फ एक तू हेमेरे लाल । तुझे कुछ हो गया तो...तो.... और फूट फूटकर रो पड़ी रैना ।

कौन समझाए ? कौन समझाए ममता में पागल हुई इस मां क्रो कि जिसे उसने गले से लगा रखा है, उसके नाम मात्र से दुश्मनों के कलेजे थर्रा उठते हैं । रूह कांप जाती है । अमेरिका और चीन में मौत के नाम से मशहूर है उसका यह लाल !

विकास----वह जल्लाद-देखों तो सही, मौत को थर्रा देने वाला दरिंदा कैसे मासूम और अबोध बच्चे की तरह अपनी मां के कलेजे के से लिपट गया ! कह रहा है--‘"अरे...रोती क्यों हो मम्मी ! तुम डरती क्यों हो ? विजय गुरु और अलफांसे अंकल जो मेरे साथ है ।"

-"'न जाने क्यों ये कुत्ते… मेरे मासूम लाल को अपना दुश्मन समझने लगे हैं ।" भावावेश के भंवर फसीं रैेना कहती ही चली गई-"कहों वे हत्यारे जासूस और कहां मेरा अबोघं लाल ।"

कौन समझाए उस मां को कि उसका अबोध लाल दरिंदा है, दुर्दान्त,बेरहम और वक्त पढ़ने पर राक्षस है । कौन समझाए उसे जिन्हें वह खतरनाक समझ रही है, वे विकास की परछाईं से भी कांपते हे । कौन समझाए.......

बड़ी कठिनाई से विकास रैना को संभाल सका । . . अपनी मां को भावनाओं के भंवर से निकाल सका । बड़ी कठिनाई से वह रैना से इजाजत ले सका कि वह विजय की कोठी पर चला जाए ।

तैयार होने के बाद जब यह कार लेकर सडक पर अाया तो वह पूरे आधे घण्टे लेट था ।

उधर-विकास कोठी से बाहर निकला या, इधर रैना ने रिसीवर उठाकर विजय की कोठी के नम्बर रिग किए । कुछ देर तक दूसरी तरफ से बजने वाली घण्टी की आवाज जाती रही । काफी देर के बाद दूसरी तरफ़ से फोन उठाया गया ।

आवाज अाई-----"' कौन साहब बोल रहे हैं ?"

"' कौन पूर्णसिंह ?'-' विजय के नौकर की आवाज पहचानकर रैना ने कहा --यह मैं बोल रही हूं रैना ।"

" ओह, बीबीजी !" पुर्णसिंह ने कहा------" हां मैं पूर्णसिंह ही हूं ।"

"विजय भैया को फोन दो ।"

" वे तो यहां हैं नहीं, बीबीजी !"

 
पुर्णसिह के इस वाक्य ने रैना के मस्तिष्क में एक भयानक विस्फोट क्रिया । एक बार तो उसे चक्कर सा ही अा गया । खुद को संभालकर वह बोली…'कहां गए हैं कब गए?”

" वे तो अाज सुबह-सवेरे ही चल गए बीबीजी !" पूर्णसिंहृ ने वताया-" किसीं का फोन अाया और वे बिना नाश्ता किए ही चले गए ।"

रैना के मस्तिष्क में जैसे रह-रहकर विस्फोट होने लगे । उसने पूछा…"बिजय भैया से मिलने आज कोई आदमी अाया था ?"

--"नहीँ तो बीबीजी ! लेकिन बात क्या है ? आज अाप कुछ परेशान-सी हो?"

"नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है ।" खुद को संभालकर रैना ने कहा-"हां सुना, कुछ देर बाद विकास वहीं पहुंचेगा । उसके पहुंचते ही तुम फोन कर देना ।" उसकी बात का पूर्णसिंह ' ने क्या जवाब दिया यह सुने बिना ही रैना ने रिसीवर फेडिंल पर पटक दिया ।

धम्म से सोफे पर गिर पड़ी ।।

वह बेहद परेशान हो उठी थी ।।

रह…रहकर उसके दिमाग में विचार उठ रहे थे कि विकास ने उससे झूठ क्यों बोला ?

"काला लड़का' "गुप्त भवन' ये सब क्या है ?

विदेशों से क्या रिपोर्ट अाने वाली है, और इससे विकास का क्या सम्बन्ध है ?

काफी देर तक इन्हीं ख्यालों में खोई. वह फोन की घण्टी बजने का इन्तजार करती रही, किन्तु वह नहीं बजी ।

कुछ देर बाद तब, जबकि उसे यकीन हो गया विकास अगर विजय की कोठी पर गया होगा तो पहुंच गया होगा, उसने पुन: विजय की कोठी के नम्बर डायल किए और दूसरी तरफ से बोलने वाले पूर्णसिंह से विकास के बारे में पूछा तो नकारात्मक जवाब दिया ।

फिर…लगातार दो घन्टे तक विजय की कोठी पर दो बार फोन करने के बावजूद भी रैना को यह सुनने को न मिला कि ,विकास वहाँ पहुच गया है ।

"ये मामला तो बड़ा गलत हुआ प्यारे दिलजले ।" गुप्त भवन के 'साउण्डप्रूफ कमरे में बैठा विजय बिकास की सारी बात सुनने के बाद कह रहा था…"खैर, फिर भी तुमने अच्छा किया कि गुप्त भवन मेरी कोठी को बना दिया काला लड़का "अमेरिका से अाया जूडो और कराटे का मेरा एक दोस्त ! अगर रैना बहन को पता लग जाए कि काला लडका उसका भाई ही है तो गजब हो जाए ।"

'

"सर !" सीक्रेट सर्विस के चीफ की कुर्सी पर बैठे अजय ने कहा…"मेरा ख्याल है कि अागे से इस बात का प्रबन्ध किया जाना चाहिए कि जिस तरह आज रैना बहन ने फोन पर सब कछ सुन लिया, अागे से, कोई न सुन सके, वरना सीक्रेट सर्विस का राज-र-राज नहीं रहेगा । वैसे अगर रैना बहन क्रो विकास की बातों पर यकीन नहीं आया होगा तो मामला बढ़ सकता है ।"

" सीक्रेट सर्विस का राज तो हमें राज ही रखना हे प्यारे ।" विजय ने कहा…"चाहे जैसे भी हो ।"

"'लेकिन रैना बहन जान गई तो ।"

"'अंकल ।" ब्लैक व्वाय की बात बीच में ही काटकर विकास-गुर्रा उठा --" मम्मी पर तो क्या, सीक्रेट सर्विस का कोई भी राज कभी किसी पर नहीं खुलेगा और अगर खुल भी गया तो किसी दूसरे को बताने के लिए वह जिन्दा नहीं रहेगा । अपने हाथ से मैं मैं मम्मी को गोली मार दूंगा ।"

"विकास ।।" ब्लैक ब्वाय के मुंह से तो चीख-सी निकल पड़ी ।

और विजय-वह तो विकास के चेहरे को देखता ही रह गया । विकास का चेहरा तमतमा रहा था । उसने विजय की तरफ देखा, गम्भीर स्वर में बोला--"क्यों गुरु, क्या गलत कहा मैंने ? सीक्रंट सर्विस का हर सदस्य बनते से पहले हर सदस्य यही कसम तो खाता है ।"

" विकास । " विजय के नेत्र छलछला गए । विकास को उसने अपने कलेजे से लिपटा लिया । मुंह से सिर्फ एक ही लफ्ज निकला-"मेरे बेटे ।"

मगर जल्दी ही विजय ने खुद को संभाल लिया था । एक मिनट , के लिए उसके दिमाग में यह बिचार अाया कि वह भावुक हो गया है, और अगले पल उसने अपने सिर को झटका देकेर खुद को सामान्य किया और बोला-----" छोड़ो। तुम विदेशों से अाए एजेण्टों की रिपोर्ट सुनो ।"

"हाँ ।" विकास-सामान्य स्थिति में अा गया बोला…"जल्दी बताइए क्या हुआ ?"

-"सबसे पहले चीन की रिपोर्ट सुनो तुम ।" विजय ने कहा-"'चीन में हमारी एक लेडी जासूस है । वेसे उससे तुम पहले भी मिल चुके हो । उस समय जब तुम तलवारों के सिलसिले में चीन गये थे ।"

" कौन क्रिस्टीना ?" विकास ने पूछा ।

" हां" विजय ने कहा---"यह काम हमने क्रिस्टीना को ही सौंपा था । उसने रिपोर्ट भेजी है कि वतन का स्टेटमेंट पड़ते ही चीन में हलचल मच गई और फौरन ही सीक्रेट सर्विस के सभी सदस्यों 'की एक आपातकालीन मीटिंग बुलाई गई । उसके फैसले के मुताबिक चीन के तीन जासूसों, जो चीन के अच्छे जासूस माने जाते हैं , के नेतृत्व में छ: जासूसों की एक टुकडी चमन के लिए रवाना होगी । उन तीन जासूसों के नाम है…सांगपोक,

हवानची

और एक लेडी जासूस है

सिंगसी ।

तुम्हारी जानकारी के लिए यह बता दूं कि सांगपोक फूचिंग का लड़का है और इसी से तुम अनुमान लगा सकते हो कि वह किस कदर तुम्हारे खून का प्यासा होगा । यूं समझो कि अब अगर दुनिया में रहने का उसका कोई मकसद है तो वह है सिर्फ तुम से अपने पिता की मौत का बदला लेना । उसने कसम खाई कि वह फूचिंग़ की कब्र को तुम्हारे खून से धोएगा ।"

"ओह !"' विकास के मुंह से निकला ।

" जहां तक मैं समझता हूं प्यारे दिलजले, चीनियों को यह अनुमान हो गया है कि वतन कि हिमायत में तुम जरूर आओगे । इसीलिए उन्होंने तुम्हारे सारे दुश्मनों को एकत्रित कर लिया है !"

"क्यों ?" इनमें से और किसको मुझसे व्यक्तिगत दुश्मनी है ?"

"हवानची को जानते हो, कौन है ?"'

"कोंन है ?"

"हुचांग का साला ।" विजय ने बताया-उसने भी हथियार तुमसे अपने जीजा की मौत का बदला लेने के लिए उठाए हैं ।

उसने बडी़ अजीव कसम खाई है । उसका कहना है कि अपनी जिन्दगी का अाखिरी कत्ल वह तुम्हारा करेगा ।"

हल्के से सकराया विकास, बोला'-"उसने तो बहुत गलत कसम खाई गुरू । मेरा कत्ल करने के बाद तो उसे और कत्ल करने होंगे, जैसे आपका, क्राइमर अकल का वरना आप दोंनो उस वेचारे को कत्ल कर दोगे ।"

" सवाल ये नहीं प्यारे कि कौन किसको कत्ल करेगा ।" विजय ने कहा…"सवाल यह है कि इन दोनों का परिचय मैंने तुम्हें इसलिए दिया है ताकि तुम मामले की भयानकता को समझ सको। हर कदम संभालकर उठाना है ।"

" वह तालीम तो आप मुझे दे ही चुके हैं ।"

" मेरा मतलब ये है कि इस मामले में विशेष सावधानी की आवश्यकता है ।" विजय ने कहा ।

"विशेष सावधानी तो मैं हर मामले में रखता हूं।" विकास ने मुस्कराते हुए कहा----"बस , यूं कहो कि आपकी भूमिका से यह बात मेरी समझ में अा गई है कि इस बार टकराव में मजा खूब जाएगा ।"

"सोचने का अपना-अपना अलग तरीका है प्यारे दिलजले?" विजय ने कहा-----"जहाँ तक सवाल विजय दी ग्रेट के सोचने का है, वह हमेशा ही अाम के अचार की तरह खटटा किन्तु स्वादिष्ट होता है । इससे पहले कि तुम मेरी बात का मतलब पुछो, मैं तुम्हें पहले ही बताए देता हूं । वतन का स्टेटमेंट अखबार में छपते ही हमने कह दिया था कि यह स्टेटमेंट रंग जाएगा----लही हुआ । अब हमारा सीधा-सा सवाल है कि चीन सरकार यह समझ गई हैं कि वतन की हिमायत में तुम जरूर जाओगे और मौत के दरवाजे खोलने के लिए ही सांगपोक और हवानची को मैदान में लाया गया है । तुम कहते हो कि इनके रहते केस में मजा अाएगा और मैं कहता हूं कि दुश्मन को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए ।"

"लेकिन अाप बार-बार उन दोनों के नाम लेकर क्या मुझे डराना चाहते हैं हैं" विकास ने पुछा ।

" मालूम है कि तुम किसी से डरने वाली चीज नहीं बल्कि दुनिया को डराने वाली चीज हो ।"

"'तो फिर गुरु !" विकास ने यह बार-बार मुझे सांगपोक और हवानची की धमकी क्यों ?"

"'एक बात याद रखना प्यारे दिलजले, यानी कि गुड़ के डले ।" विजय ने कहा---“जब डूबता है तो तैराक डूबता है जो तैरना नहीं जानता, वह ज्यादा गहराई में ही नहीं जाता, तो डूबेगा ही केसे ? बिल्कुल नहीं डूवेगा है वार-बार उनकर नाम लेने के पीछे मेरी यह भावना बिल्कुल नहीं कि तुम्हें डरा दू वल्कि सचेत करना चाहता हूं कि इस में बहुत संभलकर अागे बढने की जरूरत है ।।

" ऐसा ही करूंगा ।"

"जानते हो, चीन से रिपोर्ट भेजने वाली क्रिस्टीना ने क्या लिखा है ?"

"क्या ?"

" उसने लिखा है के इस अभियान पर विकास को न भेजा जाये । उसका कहना है कि सांगपोक और हवानची प्रतिशोध की अाग में जलती उस नागिन की तरह हैं जिसके नाग की किसी नाग ने हत्या कर दी हो । उन दोनों की आंखों में विकास की तसवीर है, और जानते हो-ये भी लिखा है क्रिस्टीना ने कि उसने तुम्हें देखा है । वह जानती है कि तुम मासूम हो । उसने कहा है---मासूम और प्यारे विकास को इन दरिन्दों के सामने न जाने दिया जाए है"

" फिर ?” विकास ने गम्भीर स्वर में पूछा'-"क्या आप मुझे इस केस में नहीं जाने देगे?"

हल्के से मुस्कराया विजय, बोला ---" तुम्हें न भेजने वाली बात होती तो यहां बुलाते ही नहीं प्यारे दिलजले ! वैसे ही हम जानते हैं कि किसी के रोकने से रुकोगे नहीं तुम । लेकिन हा, सारा काम एक योजनाबद्व तरीके से हो, इसलिए तुम्हें यहा बुलाया है ।"

"तो हुक्म कीजिए।"

" अभी तो चीन की ही रिपोर्ट सुनी हे-अन्य देशों की तो -- अन्य देशों की तो सुनो ।"

"जरूर ।"

"अमेरिका में मौजूद हमारे जासूस नागपाल ने रिपोर्ट भेजी हैअमेरिकन सीक्रेट सर्विस ने यह काम हेरी को सौपा' है कि वह चमन में वतन के बनाए यन्त्र और उसके फार्मूले को गायब करें । हैरी सीक्रेट सर्विस के चीफ की तरफ से यह खास हिदायत दी गई है कि इस सारे अभियान में कोई यह न जान सके कि वह हैरी हैं । सच पूछा जाए तो अमेरिकन सरकार वतन से बहुत डरने लगी है और यह नहीं चाहती कि वतन को पता लगे कि अमेरिका पुन: उसके खिलाफ कोई कदम उठा रहा है ।"

" ब्रिटेन से क्या रिपोर्ट है गुरू ?" विकास ने पूछा ?

""यह कि इसी काम के लिए वहां से जेम्स बाण्ड को भेजा जा रहा हैं। पाकिस्तान से दो जासूस-तुगलक अली और नुसरत खान ।

रूस से बागारोफ को यह काम सौपा गया है । इन सभी को अलग अलग इनके देशों ने यह काम सौंपा है कि ये चमन से यन्त्र और फार्मूला गायब करें ।"

" क्या इम सव 'देशों के जासूस को यह जानकारी है कि उसकी तरह ही दूसरे देशों ने अपने जासूसो को यह काम सौंपा है ?"

" नहीं ।"

" तो अव हुक्म बोलिये गुरू ।" विकास ने पूछा ।

"सुनो, धनुषटकार को साथ लेकर तुम्हें चमन के लिए रवाना हो जाना है ।" विजय ने कहना शुरु किया----" हम चीन जाएंगे,

प्यारे विक्रमादित्य को रूस भेजा जाएगा।

अशरफ को अमेरिका,

परवेज पाकिस्तान और

आशा को ब्रिटेन ।"

"यानी आपने तो पूरी सीक्रेट सर्विस को ही हरकत में ला दिया ।"

" काम उसी ढंग से करना चाहिए प्यारे, जिस ढंग की जरूरत हो ।" विजय ने कहा---अलग-अलग देशों से मोहरे चले हैं, कह नहीं सकते के इनमें से कामयाब कौन हो ? सबसे महत्त्वपूर्ण काम , तुम्हारे हवाले किया गया । हर देश का जासूस चमन में पहुंचेगा।

 


अत: इस व्यूह का केन्द्र चमन में है, और केंन्द्र पर हमने तुम्हें नियुक्त किया है । जहाँ तक हमारा अनुमान है, अगर सारे जासूस एक ही समय पर चमन में पहुंचे तो चमन में बेशक दुनिया के महान जासूसों का जबरदस्त टकराव होगा । हमारी राय यह है कि उस टकराव में तुम शरीक नहीं होगे ।”'

" तो फिर वहाँ क्या तमाशा देखूंगा ?"

-"'बेशक ।"

"'क्या मतलब हैं" विकास चौंका।

" वैसे तो हम जानते हैं प्यारे दिलजले कि काम अपने ढंग से करोगे और हमारे समझाने से कुछ नहीं होगा ।" ने , कहा-"लेकिन फिर भी आदत खराब हो गई-समझाए बिना रहेंगे नहीं । सुनो, तुम वहा पहुंचोगे, लेकिन वतन के अलावा कोई यह नहीं जान सकेंगा कि विकास वहां पहुच गया है तुम्हारा काम् वतन, उसके आविष्कार और फार्मूले की हिफाजत करना होगा । जिस वक्त हैरी, बागारोफ, जेम्स बाण्ड, तुगलक अली , नुसरत खान, सांगपोक, हवानची और सिंगसीं वहां पहुंच जाएंगे तो एक-दूसरे के बारे में निश्चित रूप से पता लग जाएगा । लक्ष्य एक ही है । अत: मिलकर वे काम नहीं कर सकेंगे। एक

दूसरे का विरोध करेंगें टकराव होगा । सम्भव है कि उस टकराव में इनमें से एकाध का कल्याण हो जाए । इनके बीच नहीं कुदोगे । आपसी लड़ाई में जीतने के बाद जो भी वतन तक पहुंचने की कोशिश करे, उसे संभालना तुम्हारा काम होगा ।"

लेकिन अाप सब लोग चीन, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और पाकिस्तान में क्या करेंगे ?"

" अखण्ड कीर्तन ।" झुझलाकर विजय ने कहा---"अवे, पहले पूरी बात सुन लिया करो, तब चोंच खोला करो । ये माना कि तुम अभिमन्यु बनकर उस व्यूह में घुसे होगे, लेकिन प्यारे, मालूम है न कि अभिमन्यु व्यूह में फंस कर ही रह गया था । बही डर हमें भी है, माना कि तुम कामयाब न हो सहे और इनमें से कोई यन्त्र और फार्मूला प्राप्त करने में कामयाब हो गया तो क्या केरोगे ?"

"मेरे ख्याल से ऐसा होगा ही नहीं गुरु ।"

" तुम्हारे ख्याल रेत की दीवारों से ज्यादा मज़बूत नहीं होते प्यारे ।" विजय ने कहा…"और हमारे ख्याल अक्सर पत्थर की लकीर कहलाते हैं । अपने ख्यालों को जेब में रखो और हमारी बात को कान में आंवले का अचार डालकर सुनो । तुम्हें एक विशेष ट्रांसमीटर दिया जाएगा। उसकी मदद से जब चाहो----- विक्रमादित्य, झान-झरोखे, गोगियापाशा से सम्बन्ध्र स्थापित कर सकते हो । माना कि दुश्मनों में से कोई अपने अभियान में कामयाब हो गया तो तुम यह सूचना उसके देश में मौजूद हममें से किसी 'को भी दे दोगे । मानो कि जेम्स बाण्ड कामयाब हो जाता है तो तुम फौरन यह सूचना मिस रोगियापाशा को दे दोगे, क्यों ? …-वयोंकि ब्रिटेन में वही होगी । अत: फिर जेम्स बाण्ड को अपने चीफ तक न पहुंचने देने का काम उसका होगा है"

"मतलब यह कि अगर चीनी जासूस कामयाब हो तो उसकी सुचना मैं आपको दे दूं ?" बिकास ने कहा ।

" वो मारा साले पापढ़ वाले को--अब समझे न हमारी बात…गधे की लात ।"-विजय ने कहा--"हेरी कामयाब हो जाए तो झानझरोखे क्रो, तुगलक और नुसरत कामयाब हों, तो परवेज को कहने का तात्पर्य ये कि जिस देश का कामयाब हो, उसी देश में मौजूद भारतीय सीक्रेंट सर्विस के एजेण्ट को सूचना दे दी जाएगी!"

"यह तो मैं समझ गया गुरू !" विकास ने कहा’--“लेकिन माना कि चचा बागारोफ कामयाब हो जाते हैं, तो सीधी…सी बात है कि मैं रूस में मौजूद- विक्रम अंकल को सूचित कर दूं, वे हरकत में अा जायेगे । यह ठीक है-मगर अन्य देशों में मौजूद साथी जैसे चीन में आपका क्या काम रह जायेगा ?"

"पीर्किग की ठण्डी सडकों पर टहलकर वापस आ जाएंगे ।"

मेरे ख्याल से तो बेकार में इतना लम्बा लफड़ा फैला रहे हो गुरु ।" विकास ने कहा ।

" जिस दिन से तुम्हारी तुच्छ बुद्धि में हमारी महान बातें फिट होने लगेंगी प्यारे दिलजले, उस दिन से लोग तुम्हे विकास नहीं, विजय कहेंगे ।" विजय कहता ही चला गया…"तुम एक ही बार में यह योजना सुन लो जो हमने बनाई है, उसे शान्तिपुर्वक सुनने के बाद शायद तुम्हें किसी तरह का कोई सवाल करने की जरूरत न पडे । सुनो-हम सब लोग उन देशों को रवाना होंगे जो वतन के स्टेटमेंट से हरकत में अाए है । हमारी सबसे पहली कोशिश यह होगी कि हम उस देश के जासूस को चमन तक न पहुंचने दे, जहा तुम हों । माना कि मैं चीन जाता हूं । मेरा प्रयास यह होगा

कि सागपोक एण्ड पार्टी को मैं चमन में न पहुंचने दूं लेकिन अगर वो मेरे चीन पहुंचने से पहले ही चीन से निकेल लें अथवा अपनी कोशिश के बावजूद भी मैं उन्हें न रोक पाऊं तो चमन में उनका टकराव 'तुमसे होगा । हालांकि तुम भी उन्हें उनके अभियान में कामयाब नहीं होने दोगे लेकिन अगर मान भी लिया जाए कि कामयाब हो जाते हैं तो चीन में हम फिर होंगे ! क्योंकि अभी यह कोई नहीं कह सकता कि कौन कामयाब होगा ? जो भी सफल होगा उसी के देश में मौजूद भारतीय सीक्रेटस सर्विस का एजेण्ट हरकत में अा जाएगा । बाकी लोग चुपचाप भारत लौट जाएंगे ।"

"चक्रव्यूह तो आपने बनाया गुरू ।"

" अजी हमारे क्या कहने ।" विजय सीना तानकर बोला----" हम तो न जाने क्या-क्या बना डालते हैं ।"

विकास और ब्लेक बंवाय सिर्फ मुस्कराकर रह गए ।

फिर कुछ देर की बातों और ब्लेक व्वाय द्वारा दिया गया कुछ ऐसा सामान जो इस अभियान में उसके काम आने वाला था-लेकर वह गुप्त भवन से निकल गया । दुनिया के महान जासूसों से टकराब के ख्वाब देखता विकास घर पहुंचा । "

पहुंचते ही रैना ने उसे आडे़ हाथों लिया । बिकास जब इधर-उधर के बहाने वनाने लगा तो रैना ने कहा ---मुझे मालूम है कि अब तू वतन के पास जाएगा ।"

खोपड़ी बुरी तरह झन्ना उठी उसकी, बोला…"क्या मतलब ?"

"मतलब ये ।" कहने के साथ ही रैना ने उसके हाथ पर एक कागज रख दिया ।

धड़कते दिल से यह सोचता हुआ विकास कागज की तह खोलने लगा कि यह कागज किसका अौर इसमें क्या लिखा है ।

और उसने खोला,-पढा---

"प्यारे गुरुदेव, चरण सपर्श !"

आप तों विजयं गुरु के केहने में चलते हो ना ? न जाने वतन की मदद के लिए चमन में कव आओगे, शायद उस वक्त जव मेरे भाई का अन्जाम खत्म हो चुका होगा जो डॉक्टर भावा-का हुआ । मगर...मैं चुप नहीं बैठ सकता । मैं आज़ ही चमन जा रहा हूं अापके चरणों की कसम, वतन की तरफ कोई आंखें भी उठाए तो मैं उसकी आखें न निकाल लूं तो मेरा नाम मोणटो नहीं । मैं जा रहा हूं---मगर जरूरत समझो तो अपने बच्चे की मदद के लिए चमन जा जाना । ज़रूरी न समझो तो आपकी इच्छा । "

अपका धनुषंटकार ।

विकास ने पढ़ा । एक पल के लिए तो-दिमाग चकराकर रह गया उसका।

उसने देखा…कागज में सबसे ऊपर तारीख पड़ी थी । पिछले दिन की तारीख । सचमुच कल शाम से ही धनुषटंकार उसे नहीं चमका था ।

मगर उसे तो ख्वाबों में भी उम्मीद नहीं थी कि धनुषटंक्रार अकेला ही चमन पहुच जाएगा ।

घण्टियों की आवाज सुनते ही धनुषटंकार उछलकर खड़ा हो गया था । वह जान गया था कि उसका भाई आ रहा है वतन ! उसने जाल्दी से पब्बे का ढक्कन, बन्द करके जेब में डाला, और जैसे ही उसने कक्ष के दरवाजे की तरफ देखा-- दूध जैसा सफेद बकरा कमरे में प्रविष्ट हो रहा था । धनुषटंकार उसकी तरफ झपटा, अपोलो धनुषटंकार की तरफ । बड़े अजीब ढंग से एक दूसरे के गालों को प्यार क्रिया उन्होंने । अभी वे प्यार कर ही रहे थे कि दरवाजे पर नजर आया-वतन । दूध जैसे सफेद कपडे, आखों पर चढ़ा सुनहरे फ्रेम और गाढे-काले शीशों का शानदार चश्मा ।

इस बार वतन के हाथ में एक नई चीज थी…एक छडी़ का रग भी दूध जैसा सफेद था । उसे देखते ही धनुषटंकार अपालो से अलग हुआ ।

उसकी तरफ देखता वतन मुस्करा रहा था ।।

धनुकांकार ने एकदन जम्प लगा-दी और बांहें वतन के गले में डालकर उसके सीने पर लग गया, न सिर्फ झूल गया, बल्कि पागलों की, तरह वह वतन गाल चूम रहा था । वतन ने भी प्यार से उसे लिपटा लिया ।

"अकेले ही आए हो क्या ?" वतन ने सबसे पहला सबाल यही किया था ।

धनुषटंकार ने इशारे से ‘हां' कहा । .

यह थी वतन और धनुषटकार की वह पहली मुलाकात जब भारत से चमन पहुचने पर लह वतन से मिला ।

राष्ट्रपति भवन के मुलाजिमों ने उसे यह कहकर कक्ष में बैठा दिया था, कि वे अभी महाराज को सूचना देते हैं ।

और-----कुछ ही देरे बाद कक्ष में अपोलो और वतन पहुंचे थे ।

फिर-राष्ट्रपति-भवन में धनुषटंकार की जबरदस्त खातिर की गई । अतिधि हॉल में तब, वे नाश्ता कर रहे थे । वतन की छडी उसकी कुर्सी से सटी रखी थी । नाश्ते के 'बीच ही वतन ने उससे पूछा था…"मोण्टो !. यूं ही घूमने चले अाए या कोई खास बात ?"

जवाब में धनुषटंकार ने उसे अपनी डायरी का एक लिखा हुआ पृष्ठ पकडा दिया । उस कागज में धनुषटंकार ने लिखा था आपने आविष्कार के विषय में अख़बारों में स्टेटमेंट देकर अच्छा नहीं क्रिया । दुनिया क्री महाशक्तियां, माने जाने वाले राष्ट्र, उस आविष्कार को प्राप्त करने की कोशिश करेंगे । इस आविष्कार के कारण ही आपकी (वतन) जान भी खतरे में है । आपकी मदद के लिए ही मैं यहां आया हुं । "

पढ़कर बडे आकर्षक ठंग से मुस्कराया वतन, बोला --"तुम वहुत ही पगले हो, मोण्टो ।"

"क्यों ?" धनुषटंकार ने इशारे से पूछा ।

" इसलिए कि तुम व्यर्थ ही चिन्तित हो उठे ।" वतन ने कहा…"जिस देश का शासन मैं चला रहा हूं , वह छोटा जरुर है, लेकिन इस देश का शासक दुनिया की महाशक्तियों के हथकण्डों

से पूर्णतया परिचित है । मैं जानता हूं कि मेरे स्टेटमेंट से दुनियां में खेलती मच गई है । यहीं चाहता भी था मैं ।"

"क्यो ?" धनुषटंकार ने पुन: इशारे से पूछा ।

"इसलिए कि सारी दुनिया को यह बता सकू कि दुनिया में सिर्फ अमेरिका और रूस ऐसे देश नहीं हैं जिनके बिज्ञान की दुनिया पर एकाधिकार है । मैंने साबित कर दिया कि उनके मुकाबले चमन जैसा छोटा राष्ट्र भी कुछ कर सकता है । क्या दुनिया की महाशक्तियां चमन के इस आविष्कार से चिंतित न ही उठी है?"

"'दुनिया की ये महाशक्तियां सिर्फ चित्तित होकर ही नहीं रह जाती हैं ।" धनुषटंकार ने डायरी के पेज पर लिखकर वतन को दिया--"बल्कि जलने लगती हैं । ईर्ष्या से जलती ही रहे -तब भी वे शायद हमारा कुछ न बिगाड़ सकें, लेकिन इनकी आदत है कि ये किसी: भी तरह उस शक्ति को समाप्त कर डालती है, जो उनके करीब जाना चाहती हैं । डाँक्टर भावा का नाम तो सुना ही होगा भैया, उन्होंने भी तुम्हारी ही तरह यह धोषणा कर दी थी कि उन्होंने एक ऐसा आविष्कार कर लिया है जिससे वे समूचे है भारत पर किरणों का एक ऐसा जाल बिठा देगे कि दुनिया का कोई भी अणु/बम भारत को लेशमात्र भी क्षति ऩ पहुचा सकेगा उनका अन्जाम तो तुम..."

" अच्छी तरह जानता हूं ।" हल्के से मुस्कराकर वतन ने कहा-"लेकिन मैं डॉक्टर भावा नहीं हू मोण्टो ! डॉक्टर भावा-इन दरिन्दो को जानते नहीं थे और ठीक उनके विपरीत मैं इन हरामजादों की नस-नस से वाकिफ हूं । मैं अच्छी तरह जानता हू कि कौन-से पल में, क्रिस हद तक घिनोनी चाल चल सकते हैं । तो ऐसा नहीं है मोण्टो, कि मैंने अखबारों को बिना कुछ सोचे समझे स्टेटमेंट दे दिया है । अखबारों को मैंने जो कुछ दिया है, बहुत अच्छी तरह सोच-समझकर दिया है । मुझे मालुम था कि मेरे इस स्टेटमेंट से दुनिया में हलचल मचेगी । महाशक्तियों को चमन के रूप में मंडराती अपने उपर मौत नजर आएगी । अपनी ताकत के मद में चूर जो राष्ट्र अन्धे हुए जा रहे हैं, उन्हें एक ठोकर लगेगी । वे पलटकर चमन की शक्ति का कारण यानी वह यन्त्र छीन लेना चाहेंगे जो मैंने बनाया है । उनका प्रयास तो यही होगा कि वे चमन की शक्ति के ,स्रोत यानी वतन को ही खत्म कर दें ।"

धनुषटंकार ने पुन: लिखा----" इतना सब कुछ जानते हुए यह स्टेटमेंट..... "

वतन ने पढा, धीरे…से मुस्कराया, बोता-----" हां , क्योंकि मैं उन्हें बता देना चाहता था कि हर भारतीय डॉक्टर भावा नहीं है । मैं तो चाहता ही यह हूं कि वे अपनी कोशिशें करें । तुम लोगों को यहाँ से गये छ: महीने हुए हैं न मोण्टो ! हां छ: महीने हुए हैं, मेरे चमन को आजाद हुए । इन छ: महीनों में मैंने यही एकमात्र काम किया ' है । जो तुमने अखबारों में पढ़ा है, इसके अतिरिक्त भी बहुत-से काम किए हैं । ऐसे कि इन महाशक्तियों को इनकी किसी भी गलत हरकत का मुंह-तोड़ जवाब दे सकू।"

"जैसे ?"' धनुषटंकार ने लिखा ।

 


वतन ने पढा, पढकर जबाव दिया-----"अभी तो बताने का वक्त नहीं है । यहीं रहोगे तो सब कुछ अपनी आंखों से देख लोगे । अाओ चलें ! फिलहाल दरबार का समय हो रहा है । बाकी बाते दरबार के बाद करेंगे ।" कहने के साथ ही वतन अपनी छड़ी संभालकर उठ खड़ा हुआ ।

तभी धनुषटंकार ने एक हाथ उठाकर उसे एक मिनट रुकने का इशारा किया । "

" बोलो ।" वतन मुस्कुराया-" क्या पुछना चाहते हो ?"

धनुषटंकार जल्दी-जल्दी डायरी में कुछ लिख रहा था। वतन को कुछ ही देर इन्तजार करना पड़ा कि धनुषटकरर को जो लिखना था, यह लिखकर उसके हाथ में डायरी पकड़ा दी । वतन ने उसे अपने होंठों पर मुस्कान लिए पड़ना शुरू किया, पर पूरा पड़ते-पड़ते उसके होंठों मुस्कान गायब हो गई । मस्तक पर एकमात्र बल उभर आया । उसने उस इबारत को पढा, लिखा था--पिछली बार जब हम सब यहां से गए थे तो किसी ने भी तुम्हारे हाथ में कभी कोई छड्री नहीं देखी थी भैया, लेकिन इस बार देख रहा हूं अाप इस छडी को एक मिनट के लिए भी खुद से जुदा नहीं कर रहे हैं । जिस तरह बेदाग सफेद कपडे और ये काला चश्मा आपकी प्रिय है उसी तरह इस बार यह छडी भी लग रही है । क्या मैं इस लायक हूं कि इस छडी के बारे में कुछ जान सकू ?"

धनुषटकार ने देखा-इबारत को दोबारा पढ़ने के बाद वतन के मस्तक पर पडा़ बल और ज्यादा गहरा हो गया । उसने धनुषटंकार की तरफ देखा, फिर उसके होंठों से एक अत्यन्त ही गम्भीर स्वर निकला----"छड़ी के बारे में जाऩना चाहते हो--------देखो ।"

कहने के साथ ही उसने छडी को ऊपर उठाकर एक हाथ से उसका उपरी हैंडिल पकडा ।

फिर-----एक तेज झटका दिया।

ठीक इस तरह, जैसे क्रिसी म्यान में से तलवार निकले । छड़ी के अन्दर से मुगदर निकल आया हडिडयों का बना मुगदर । वह मुगदर अभी तक खुन से सराबोर था । हडिडयों के बने मुगदर पर लगा खून सूखकर काला पढ़ चुका था । धनुषटंकार अभी अवाक-सा को देख ही रहा था

कि वतन की आवाज ने उसकी तद्रा भग की ।

वह कह रहा था----"इसे पहचाना मौण्टो यह मेरी माँ और बहन की' हुहिड़यों का बना वही मुगदऱ है जिसे विकास ने बनाया था । जिसके वार सहता-सहता कमीना मैग्लीन मर गया । ये इस पर लगा खून देख रहे हो न…ये मेग्लीन का खून है ये मुगदर कभी नहीं धुलेगा मोण्टों, कभी नहीँ ! अपनी मा आर बहन की इन. हडिडयो को कभी साफ नहीं करूंगा मैं, मैंने कसम खाई है कि हर जुल्मों के खून का कुछ-न्-कुछ अंश इस हडिडयों पर, जरूर लगेगा । इसे हमेशा अपने साथ रखूंगा मैं -- हमेशा ।"

धनुषटंकार के जिस्म का रीयां रोयां खडा हो गया ।

आगे कुछ पूछने के लिए उसे जैसे कोई प्रश्न ही न मिला ।।

वतन ने खुद को -संभाला, मुगदर को छड्री-रूपी म्यान में रखा और बेला---"आओ दरबार में चलें ।"

धनुषटंकार ने ऐक नजर छड़ी को देखा, फिर चुपचाप वतन क पीछेे चल दिया । अपोलो वतन से आगे अपने गले में पड़ी घण्टियां बजाता चला जा रहा था । धण्टियों की वह आवाज वतन के आगमन का प्रतीक था ।

दरबार में प्रविष्ट होते ही धनुषटंकार की खोपड़ी सनसना कर रह ग ई ।

दरबार में अन्य जो-विशेष बातें थीं, वे तो थी हो, किंतु वह - चीज जिसने धनुषटंकार क्रो चकरा दिया था----------वह थी---फलवाली वह वुढिया , जिसे वतन दादी मां कहा करता था । वह दरबार के सर्वोच्च सिंहासन पर विराजमान थी ।

मस्तक पर वही ताज जो वतन ने उसे पहनाया था ।

धनुषटंकार के दिमाग में विचार-उभरा-पह बुढ़िया तो मर गई धी, उसकी तो जलती चिता भी सबने देखी है फिर ..... फिर क्या चक्कर है हैं फ़लवाली बूढी दादी मां इस सिंहासन् पर कैसे धनुषटंकार का दिमाग| बुरी तरह चकरा रहा था ।

उस पर रहा न गया तो झपटकर वह वतन के कधो पर चढ़ गया । फिर सांकेतिक भाषा में उसने वतन से उस बुढिया कें बारे में पूछा । तब-जबकि वतन उसका इरादा समझा हंस पड़ा था । दरबार के कोने कोने में उसकी खिलखिलाहट गूंज उठी ।।

धनुषटंकार आश्चर्य के साथ उसे देखने लगा । पहली बार उसने वतन को इस तरह खुलकर हंसते देखा था । न सिर्फ उसने ही बल्कि दरबार में मौजूद हर इन्सान-ने वतन को जिन्दगी में पहली बार इस कदर हंसते देखा था ।

सारा दरबार उसकी हंसी की आवाज से गूंज रहा था । कुछ देर बाद अपनी हंसी को काबू में करके वतन बोला…"विकास जैसे जासूस का शिष्य होकर तुम धोखा खा गए मोण्टो । अब तो मानना पडेगा कि चमन के संग तराश दुनिया में बेमिसाल है ।"

धनुषट'कार ने इशारे से पूछा -"क्या मतलब ?”

…"जरा दादी मां को करीब से जाकर देखो । मतलब तुम्हें खुद पता लग जाएगा ।" वतन कह रहा था…"ये दादी मां नहीं, उनका स्टैच्यू है । चमन के ही एक संगतराश ने इसे तैयार किया है । जब वह सगतराश इसे लेकर दरबार में पहुंचा तो हम सहित दरबार में मौजूद हर इन्सान की मनोदशा बैसी ही थी जैसी कि इस वक्त तुम्हारी है । सचमुच दूर से देखकर कोई भी नहीं कह सकता कि सचमुच की दादी मां नहीं बल्कि स्टैच्यू हैं । जैसा कि तुम जानते हो मोण्टो, चमन पर असती हुकूमत इन्हीं की है, मैं इनका प्रतिनिधि हूं ।" यह सव कहता हुआ वतन उस सिंहासन के बराबर ही मौजूद अपने सिंहासन पर बैठ रहा था ।

वतन का सिंहासन फलवाली बूढ़ी मा से कुछ नीचा था । सिंहासन पर बैठने का संकेत था । धनुषटंकार उस दूसरे सिंहासन पर बैठ गया ।

बैठने के बाद पहली बार उसने दरबार को ध्यान से देखा ।

अभी तक दरबार में अाने के बाद उसने देखा ही क्या था? दादी मां के स्टैव्यू के अलावा वह कुछ भी तो नहीं देख सका था, अब…दरबार की स्थिति को भरपूर नजर से देखा ।

बेहद खूवसूरती से सजा दरबार ।

बेशकीमती झालरें । हाँल की छत से लटके फानूस ! दाईं तरफ कतार में कई रंग की बर्दी पहने सशस्त्र सेनिक सावधानी की मुद्रा में खडे़ थे । उन कतारों के अागे एक कतार कुर्सियों की भी पड़ी थी ।

उन पर बैठे उच्च सेनिक अधिकारी ।

बाई तरफ-सफेद वर्दी में और जल सेनिर्कों की कतारे,

कतारों के अागे कुर्सियोॉ पर दोनों सेनाओं के अधिकारी । सिंहासन

के ठीक नीचे कपडों में बैठे कुछ व्यक्ति । उनके बैठने का स्थान और तरीका ही बता रहा था कि इस दरबार में उन्हें सम्मानित स्थान _प्राप्त है ।

सिंहासन के ठीक सामने कुछ कुर्सियां पड़ी थी ।

उन पर चमन के साधारण नागरिकों को बड़े सम्मान के साथ बैठाया गया था ।

-"अब दरबार की कार्यवाही प्रारम्भ की जाए ।"

इन शब्दों के साथ वतन अपने सिंहासन से खड़ा हो गया । साथ ही दरबार में बैठा हर व्यक्ति खडा हो गया । वतन अपने करीबी यानी दादी मां के सिंहासन के करीब पहुंचा और बडी श्रद्धा से हाथ जोडकर नतमस्तक होता हुआ बोला-"तुम्हारा बच्चा, तुम्हें साक्षी मानकर, तुम्हारे दरबार की कार्यवाही शुरु करता है ।"

सभी दादी मा के समक्ष नतमस्तक हो गए ।

फिर दादी मां' की स्तुति की गई…ऐसे, जैसे वह कोई देबी रही हो ।

स्तुति के बाद…

सभी ने अपनी-अपनी रिपोर्ट वतन को देनी शुरु की ।

सिंहासन के ठीक नीचे सादे वस्त्रों में जो लोग बैठे हुए थे, धनुषटंकार ने जब उनकी रिपोर्ट सुनी तो उसने जाना ये चमन के गुप्तचर विभागों से सम्बन्धित हैं ।

दरबार की सम्पूर्ण कार्यवाही को धनुषटकार भी चुपचाप सुनता रहा ।

हा, इस सारी कार्यवाही के बीच उसने यह जान लिया कि वतन ने चमन का शासन बेहद निपुणता के साथ चला रखा है सेनिक अधिकारियों और जासूसों की रिपोर्ट लेने के बाद उसने चमन के नागरिकों की शिकायतें सुनकर उनका समाधान क्रिया ।।

सबसे अन्त में दरबार में कुछ पेटियां खोली गई ।

परन्तु वे सब खाली ही निकली ।

अंतिम पेटी की सील तोड़कर यह देखने पर कि वह भी खाली है, पेटियाँ खोलने बाला मुलाजिम बोला----" ये सारी पेटियों आज भी खाली हैं महाराज ।" एक पल चुप रहकर वतन ने कहा----"' विभिन्न स्थानों पर ये पेटियों इसलिए रखी जाती है कि चमनके किसी भी निवासी क्रो हमसे यानी चमन के वर्तमान शासन से किसी तरह की शिकायत हो अथवा किसी भी विषय से सम्बन्धित कोई ऐसी शिकायत हो जिसे कोई अपने नाम के साथ किसी वज़ह से हम तक न पहुचाता हौ, यह शिकायत इसमें लिखकर डाली जा सकतती हैं । अावश्यक नहीं कि शिकायतकर्ता अपना नाम भी लिखे ।

" इसमें किसी भी शिकायती पत्र का न पाया जाना इस बात का द्योतक है महाराज,कि चमन के किसी नागरिक को ऐसी कोई शिकायत नहीं है जिसको अाप तक पहुंचाने के लिए किसी को अपना नाम छुपाने की जरूरत पड़े ।"

"अगर ऐसा है तो शायद हम दुनिया के सबसे खुशनसीब शासक हैं ।" वतन ने कहा---"लेकिन आवश्यक नहीं कि शिकायत-पत्र के न होने का यही कारण हो ! इसका एक और कारण भी हो सकता है, और वह यह कि इन पेटियों का अभी चमन में व्यापक प्रचार न हुआ हो । "

--"ऐसी बात नहीं है महाराज ! इन पेटियों के बारे में चमन का हर नागरिक जानता है ।" मुलाजिम ने बताया ।

--"फिर भी ।" वतन ने कहा----"इन पेटियों का प्रचार बढ़ाया जाए । हम नहीं चाहते कि हमारे शासन से कोई घुटता रहे ।"

" जो आज्ञा !" यह कह कर मुलाजिम नतमस्तक हो गया ।

इस तरह दरबार बरखास्त हुआ।

दोपहर के भोजन के बाद वतन ने धनुषटंकार को अराम की सलाह दी, उसने यह भी कहा बह उस दरबार की कार्यवाही के बाद उसे अपनी विशेष प्रयोगशाला दिखायेगा । वह प्रयोगशाला जिसमें दरबार की कार्यवाही के वाद वह ज्यादातर वक्त गुजारा करता है, जिसमें उसने ब्रह्मांड से आवाज कैच करने वाला यन्त्र बनाया है ।

धनुषटंकार ने तो जिद की थी कि वह आज ही उस प्रयोगशाला में घूमना और उस यन्त्र को देखना चाहता है । किंतु न जाने क्यों वतन धनुषटंकार की यह ,जिद टाल गया ।।

धनुषटंकार आराम से राष्ट्रपति भवन के उस कमरे में सो गया जिसमें उसके रहने का प्रबन्थ किया गया था । उसका अपना ख्याल था कि वतन और अपोलो प्रयोगशाला में चले गए हैं । वह शाम को पांच बजे उठा-उठते ही उसने देखा कि राष्ट्रपति भवन का एक मुलाजिम उसकी सेवा हेतु हाथ बांधे खड़ा हैं । उसने एक कागज पर लिखकर उसे दिया---" भैया कहां हैं ।"

" प्रयोगशाला में ।" कागज पढने के बाद मुलाजिम ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया ।

….."प्रयोगशाला कहां है ।" धनुषटंकार ने लिखकर पूछा…"मुझे भी वहीं ले चलो ।"

…"क्षमा कीजिए ।" मुलाजिम का जवाब-----" इस वक्त महाराज अपने प्रयोगशाला में व्यस्त होंगे । किसी को भी वहाँ जाने की इज्जत नहीं हैं ।"

अभी धनुषर्टकार अपनी डायरी पर कुछ और लिखने के लिए उंगलियों में दबे पेन को सीधा कर ही रहा था कि एकाएक राष्ट्रपति भवन में धण्टियों की मधुर आवाज गूंज उठी ।

मुलाजिम ने एकदम कहा-महाराज़ अा गए ।"

उसका वाक्य पूरा होते ही कमरे में प्रविष्ट हुअा--अपोलो ।

 
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