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चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़) complete

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"'क्या आपको भी यह बात अलग से बतानी पडेगी की चमन में जहाँ वतंन की जरूरत होती है, वहीं पहुच जाता

है । "

" तो-----तो आज तुम्हारे साथ अपोलो नहीं है ?"

" आज उससे छुपकर आया हूं यहां " वतन ने बताया--विकास ने समझा कि प्रयोगशाला के प्रयोग-कक्ष में लड़ता-लड़ता मैं बेहोश हो गया था । वह बेचारा तो इस भुलावे में भी रहाँ कि मैं उसे आपको समझ रहा हूँ । मुझे राष्ट्रपति भवन में बंधा छोड़कर वह अपोलो और धनुषटंकार से यह वहाना बनाकर चला गया कि वह फिल्मों को सुरक्षित रखने जा रहा है । उसके जाने के बाद जब धनुषटकांर ने अलफांसे समझकर मेरी तलाशी ली तो जाना कि मैं वतन और वह अलफांसे था, जो वतन बनकर निकल गया । अपोलो और धनुषटंकार जो सचमुच मुझसे असीम प्रेम करते हैं, पागल से होकर कथित अलफांसे की तलाश में गए और अपने बन्धन खोलकर मैं यहाँ आ गया हूं ।।"

" तो तुम्हें यह भी मालूम है कि वह विकास था ?"

" ये पूछिए कि क्या नहीं मालूम मुझे ?" वतन का लहजा गम्भीर ही था--"मुझे,तो यह भी मालूम है कि शाम को घूमकर आने से पूर्व अापके मेकअप में हैरी था और तब जबकि हैरी मेरी प्रयोगशाला की चारों सर्चलाइटों का प्रबंध करके लौट रहा था तो टेक्सी ड्राइवर के रूपमें विकास ने उसे पकड़ लिया, उनका टकराव हुआ । हैरी को बेहोश करके विकास उसे यहाँ आपके पास ले आया और यंहां से हैरी और आपका फैसमास्क पहनकर मेरे पास पहुंचा ।"

हैरत से आँखें' फैल गई अलफांसे की । पिशाच की भी बूद्धि चकराकर रह गई ।

"तुम्हें सब कुछ मालूम था तो तुमने वह सव कुछ होने क्यों दिया, जो हुआ ।" अलफांसे ने पूछा ।।

"--क्योंकि मैं चाहता था कि वह सब कुछ हो ।"

" क्या कह रहे हो तुम ।"

’"मैं ठीक कह रहा हूँ लूमड़ चचा । जो भी कुछ हुया है, वह मेरी एक योजना थी ।"

"लेकिन क्यों ? यह सबकुछ तुमने क्यों होने दिया ?" अलफांसे ने पूछा---" यह सब कुछ करवाने के पीछे तुम्हारा मकसद क्या है ?"

-"'सुनिए, मैं बताता हूँ आपको ।" सदा की भांति गंभीर स्वर में कहना शुरू किया वतन ने…"यह सच है किं मैंने पहले वेवज एम और फिर उसके बाद डॉक्टर आवा की आवाज कैच करके 'अणुनाशकों किरणे बनाई । मगर प्रश्न यह हैकि मैंने यह घोषणा विश्वभर के अखबारों में क्यों की। आपने, विकास और विजय चचा ने मेरी इस हरकत को मूर्खतापूर्ण ही कहा । सचमुच, यह मूर्खता ही होती- किन्तु तब जबकि मुझे यह विदित न होता कि मेरी इस घोषणा को पढ़ते ही मेरे दुश्मन इस फार्मूले को प्राप्त करने है कि के लिए दौड पड़ेगे है मुझे मालूम था यह सब और मैं चाहता था कि मेरे दुश्मन चमन की तरफ दौड पड़े । यह चाहकर ही तो मैंने वह स्टेटमेट दिया था ।"

"लेकिन प्रश्न यह है कि तुमने ऐसी विचित्र बात चाही क्यों ?"

"चचा !" धीरे से कहा वतन ने…"यह पता लगाना मेरे लिए बहुत आवश्यक था कि विश्व की कौन-सी हस्ती मेरी दुश्मन है और कौन-सी, दोस्त है सम्पूर्ण विश्व अनेक राष्ट्रोंका एक समूह है ।" इस समूह में मेरा एक राष्ट्र है जो सिर्फ छ: मंहीने पहले ही आजाद हुआ है 'दुनिया के सभी ' राष्ट्र चमन-को अपना मित्र कहते थे, मेरी तरफ दोस्ती का हाथ बढाते थे, मेरे लिए उनमें से यह पहचानना कठिन था कि कौन मुझसे सच्ची दोस्ती चाहता है और कौन बगल में छुरी दबाए हुए है । यही जानने के लिए मैंने एकं तरीका निकाला' और वह तंरीका था-विश्वभर के अखबारों ये अपना स्टेटमेंट छपवा देना । वस…अ्सली चेहरे मेर सामने अा गए। दुश्मन फार्मू'ला गायब करने के केलिए दौड पडे । दोस्त मेरी मदद करने दौड़ पडे । ओर जिन्होंने कुछ नहीं किया वह न मेरे दोस्त हैं न दुश्मन । उन्हें दोस्त भी बनाया जा सकता है ।"

" बेशक ।"अलफांसे प्रशंसा कर उठा----" विश्व राजनीति को झटका देने के लिए तुम्हारा तरीका अच्छा था किन्तु' ....... ।"

"किंन्तु वया ?"

" यहां तक तो बात ठीक थी ।” अलफासे ने कहा ---- " अब तुम जान गए होने कि कौन दुश्मन और कौन दोस्त है फिर तुमने प्रयोगशाला से फामू"ला क्यों निकल जाने दिया ? हैरी को पकड़कर बैठा कयों नहीं लिया?"

जब से वतन यहां आया था, प्रथम बार हल्ले से मुस्काराया वह । वाणी में वहीं गम्भीरता---"जान लेना ही तो काफी नहीं कि कौन दुश्मन, कौन दोस्त है । उस समय तक दुश्मनों के विषय में जानने से ही क्या लाभ जव के उनसे बदला न लिया जाये ? वेचारे अकेले हैरी से मैं क्या बदला लेता ? बदला किसी व्यक्ति से नहीं, पांच राष्ट्र से लेना है ।। रूस, अमेरिका, चीन, इंगलैण्ड और पकिस्तान । सिंगही गुरु का शिष्य हूँ न चचा, जो करता हूँ, डंके की चोट पर करता हूं । स्वयं ही अपनी प्रयोगशाला से फार्मुला निकलवा दिया मैने , न न न यह ना समझना कि वह फार्मूला नकली है । "

जब से वतन यहां आया था, प्रथम बार हल्ले से मुस्काराया वह । वाणी में वहीं गम्भीरता---"जान लेना ही तो काफी नहीं कि कौन दुश्मन, कौन दोस्त है । उस समय तक दुश्मनों के विषय में जानने से ही क्या लाभ जव के उनसे बदला न लिया जाये ? वेचारे अकेले हैरी से मैं क्या बदला लेता ? बदला किसी व्यक्ति से नहीं, पांच राष्ट्र से लेना है ।। रूस, अमेरिका, चीन, इंगलैण्ड और पकिस्तान । सिंगही गुरु का शिष्य हूँ न चचा, जो करता हूँ, डंके की चोट पर करता हूं । स्वयं ही अपनी प्रयोगशाला से फार्मुला निकलवा दिया मैने , न न न यह ना समझना कि वह फार्मूला नकली है । "

"तुम कहना क्या चाहते हो ?"-

"प्रमाणितं करना चाहता हूँ की महान सिंगही का असली शिष्य हूं मैं !"

"हम फिर नहीं समझे ।"

"वे फिल्में अपनी प्रयोगशाला से निकालकर पांच राष्ट्रों को चुनौती दी है मैंने कि जिसमें ताकत है, वह प्राप्त कर ले उन्हें । अपनी फिल्मों के पीछे-पीछे मैं आरहा हूँ मेरा दावा है कि किसी के पास भी वे फिल्में सुरक्षित नहीं छोडूंगा । जिसमें ताकत हो मुझे रोके ले । अन्त में चाहे किसी के पास भी चली जायें मैं उन्हें निकालकर लाऊंगा । हां, भारत को तो वह फार्मूला देना ही चाहता हूं में ।"

"'वडी विचित्र-सी बात है !" अलफांसे ने कहा--"स्वयं ही अपनी प्रयोगशाला से फिल्में चोरी होने देते ,हो और फिर उन्हें प्राप्त करने के निकल पडते हो है तुम्हारी इस ऊटपटांग हरकत का मतलब ही क्या है ?"

एक बार पुन: हल्ले -से मुस्कराया बतन----" मतलब यह है कि दुश्मनों को चमन की शक्ति का पता लग जाए और वतन को पता लग जाए कि महान शक्ति कहलाने वाले ये राष्ट्र आखिर हैं कितने पानी में है ।"

" अजीब आदमी हो ।" अलफांसे ने कहा--"यह भी कौई बात हुई भला ?" "

"चचा !" वतन की वही गंभीर वाणी-------बहुत-सी बातें होती हैं जो पहले पहल ऊपर से देखने पर बडी विचित्र सी लगती हैं, किन्तु जब उन बातों को ध्यान से सोचा जाता है तो पता लगता है कि उनकी गहराई में क्या है ? यह समझिए कि यह लडाई मेरे द्वारा पैदा की गई है । "

आज न लड़ता तो के कल किंसी-न-किंसी ढ़ग से मुझ पर आक्रमण करते । ऐसे महत्त्वपूर्ण लोग भी दुनिया में कम ही होंगे जो अपनी इतनी महत्वपूण चीज को दांव पर लगाकर लडने चला है । मैं स्वयं दुश्मन की शक्ति का अन्दाजा करके उन्हें अपनी शक्ति दिखाना चाहता हूँ ।"

" मैं तुम्हारा मेकसद मकसद समझ गया हूँ" । .अलफांसे ने कहा…"किन्तु फिर भी बात है बिचित्र-सी ही !"

"मुझे अदृश्वर्य है को आपकी मेरी बात विचित्र लग रही है ।" वतन ने' कहा-"जवकि मैंने सुना यह है की आपराध की दुनियाँ में आप एकमात्र ऐसे अपराधी हैं, जिसका अपराध करने का मकसद आज तक कोई नहीं जान सका

"खैर !" अलकांसे ने कहा---" क्या मैँ जान सकता हूं कि तुम आगे क्या करना चाहते हो ?"

" जो भी कुछ करना चाहता हूं, उसमें आपकी और विशेष रूप से पिशाचनाथ की थोडी-सी आवश्यकता है । वतन ने कहा----"अखबारों में स्टेटमेंट के पश्चात् मैंने जाना है कि आप लोग मेरे दोस्त और हमददों में से है । सोचा कि आप मेरी थोडी-सी सहायता अवश्य करेंगे ।"

" बोलौ-क्या सहायता चाहते हो ?"

मैं जो कुछ करूंगा, उसे सारी दुनिया जानेगी ।" वतन ने कहा…"सभी जानेंगे कि वतन क्या कर रहा है । इतना सब कुछ करने के बावजुद भी मैं अन्तर्राष्ट्ररैय अदालत के शिकंजे हैं नहीं फंसनां चाहता । मैं यह चाहता हूँ कि सारी दुनिया यंह तो जाने कि वतन ने क्या किया है, किंतु वह सब कुछ वतन ने ही किया है, यह प्रमाणित करने हैं लिए किसी के पास प्रमाण न हो !"

" हम हर प्रकार से तुम्हारी सहायता करने के लिए तैयार हैं ।"

" मुझे आपसे ऐसी ही आशा थी ।" कहने के बाद वतन धीरे धीरे उन्हें सब कुछ समाझाने लगा ।।

हैरी के मेकअप में हैलीकॉप्टर ड्राईव करता हुआ विकास अपने बराबर में बैठे जैकी के मुंह से निकलने बाली आबाज को सुनकर बुरी तरह चौक पड़ा़ ।। उसका मस्तिष्क सन्ना उठै ।। स्वयं मानो अन्तरिक्ष में चकरा रहा था । उसकेे मुंह से निकंला---"'बाण्ड अकंलं ।"

"'ठीक पहचाना वेटे ।" जेम्स बाण्ड की आवाज---"लेकिन देर से पहचाना याद रहे हमारी रिवॉल्वर, का रूख तुम्हारी तरफ है । कोई भी हरकत करने से पूर्व यह याद रखना कि मैं गोली मारने में एक क्षण का भी विलम्व न कुंरूंगा ।"

एक क्षण स्थिर से नेत्रों से विकास ने बाण्ड को धूरा ।

बाण्ड कहे जा रहा था----मुझे दुख हैं हैरी बेटे कि फार्मूला प्राप्त करने के लिये तुमने जो मेहनत की थी वह------------बेकार हो गई !"

-"'अंकल ।" हरी के ही लह्रजे में विकास ने कहा ----"जो आपने किया, अपने हित में अच्छा नहीं-किया ।"

" मेरा नाम बाण्ड है बेटे ।" अपने रिवॉल्वर का दबाव हल्के से उसकी कनपटी रर बड़ाता हुया बोला-----तुम पैदा भी नहीं हुए थे तब से में अपना _हित और अहित समझता हूँ ।तुमने इस जासूसी के क्षेत्र में अभी कदम रखा है । बेशक इस बात के लिये तुम्हारी प्रर्शसां करनी होगी कि 'तुमने वतन की सुदृढ प्रयोगशाला से खुबसुरती के साथ फिल्में गायब की किंतु इसका यह मतलब नहीं कि उतनी ही खूबसूऱती से तुम इन्हें अमेरिका ले जाने में भी कामयाब हो जाते ।। न-न-कौई चालाकी नहीं, हैलीकॉप्टर चलाते रहो ।"

इस प्रकार, उन कुछ क्षणों के लिये विवश था, विकास ।

उसने जेम्ज बाण्ड पर यह भेद भी नहीं खोला कि वह हैरी नही विकास है । इस विचार से भी उसकां मस्तिष्क सन्ना रहा था कि 'बाण्ड' ने वे फिल्में जंगल में क्यों फेंक दीं ? अब स्वयं उन फिल्मों को कैसे ढूंढ पायेगा ?"

"हैरी वेटे !" अचानक बाण्ड ने उसकी बिचार श्रृंखला भंग की---" मुझे विदित था कि बही होगा, जो हो रहा है, अत: मैं पूरी तैयारी करके अाया था । इस हेलीकॉप्टर में सिर्फ एक पैराशूट है ।" कहते हुये वास्तव में बाण्ड ने सीट के नीचे से एक पैराशट निकाल लिया ।

विकास चुप था ।

-तुम जिस प्रकार; हैलीकाँप्टर चला रहे हो, उसी प्रकार चलाते रहोगे।" बाण्ड ने कंहा----"मैं कूद रहा हूँ ।"

''याद रहे---अगर तुमने भूमि से हैलीकॉप्टर की ऊंचाई लेश मात्र भी कम करने की चेष्ठा की तो अंजाम--ये हैलीकॉप्टर तुम्हारी चिता बन् जायेगा ।"

चुप ही या विकासं ।

"ये न समझना कि हैलीकॉप्टर को उडाने को धमकी अपने रिवॉल्वर के आधार पर दे रहा हूँ ।" बाण्ड ने पुन: कहा----"मेरे पास गन है और किसी भी क्षण तुम्हारा हैलीकॉप्टर मेरी गन की रेंज से बाहर नहीं होगा ।"

एकदम, किसी गूंगे की भाँति चुप था विकास उसका चेहरा सुर्ख हो चुका था-कनपटियों तक सुर्ख ।। नेत्रों में कठोरता । उसी प्रकार सीट पर -वैठा वह हैलीकॉप्टर ड्राईव किये जा रहा था ।।।

' विभिन्न प्रकार की चेतावनियां देता हुया बाण्ड पैराशूट इत्यादि बाँधकर तैयार, हो गया । अन्त में बोला--, "बहुत गुस्से में लग रहे हो हैरी बेटे लेकिन असलियत ये है कि इसमें गुस्से जैसी कोई बात नहीं है । कभी तुम्हारा दांव लगता है, कमी हमारा । अगर तुम बचकर निकलना चाहो तो हैलीकाप्टर वाशिंगटन की ही धरती छुए ।'"

कहकर हैलीकॉप्टर से बाहर अंधकार में कूद गया ।

विकास तो जैसे पहले ही सौचे बैठा था कि उसे कब कहाँ क्या हरकत करनी है । अभी तक वह जैसे सिर्फ समय का प्रतीक्षक था ।

उधर, बाण्ड कूदा ।।।

इधर विकास दूसरी दिशा बाली खिड़की से बाहर कूद गया ।

हैलीकाप्टर चालक रहित रहित हो गया । कूदते ही विकास कुछ दूर तक भूमि की तरफ प्रबल बेग से गिरा, फिर-एक झटका लगा ।

उसकी गति हवा में तैरते-से किसी इन्सान जैसी हो गई । हवा में तैरता विकास बुदबुदा रहा था ---" मैं भी जानता था बाण्ड बेटे कि ऐसा कुछ हो सकता है ।"

सचमुच एक पैराशूट की डोरियों में बंधा विकास हवा में तैर रहा था । उसका पैराशूट न जाने कौन से ऱंग का था कि वातावरण के स्याहीदार अंधेरे में उसका कोई अस्तित्व नजर नहीं आ रहा था ।

उसके ठीक विपरीत बाण्ड का पैरामूट नजर आ रहा था बिकास से थोड़ी ही दूरी पर हबा में तैरता बाण्ड भुमि की तरफ उतर रहा था ।

उधर-चालक रहित हैलीकॉप्टर हवा में लड़खडाया ।

उसी पल--बाण्ड की गन की गर्जना से वातावरण दहल उठा ।।

एक साथ गन की अनेक गोलियां हैलीकॉप्टर के जिस्म से टकराई । कोई गोली शायद टकीं को फाड़कर अंदर भी पहुंच गई थी है उसी के कारणवश सम्पूर्ण हैलीकॉप्टर आग की लपटों में घिर गया ।

विकास ने जलते हुए हैलीकॉप्टर को किसी परकटे पक्षी की भांति हवा में लहराते और अन्त में दूर किसी वृक्ष की चोटी से टकरा कर नष्ट होते देखा ।

न जाने किस विचार के परिणामस्वरूप उसके-होठों पर मुस्कराहट उभर आई ।

दुर-बृक्ष की शाखों में उलझा हैलीकॉप्टर जल रहा था ।

उसके साथ ही जल रंहा था वृक्ष का वह भागं जिसने हैलीकाप्टर को सम्हाल रखा था । पहले बाण्ड और उसके पांच मिनट पश्चात ही विकास भूमी पर पहुंच गया । बाण्ड का पैराशूट क्योंकि अंधेरे में स्पष्ट चमक रहा था , इसलिये विकास सरलता से प्रत्येक पत उस पर नजर रख सकता था ' मृ ३' क्रिन्तु बाण्ड को शायद स्वप्न मैं भी उम्मीद नहीं थी कि विकास भी उसके आसपास कहीं है ।

विकासं बाण्ड से करीब पचास गज दूर था । पैराशूट को लपेटकर सुरक्षित रखने की विकास ने कोई कोशिश की ।

विकास स्वयं को अंधेरे में रखता हुआ धीरे धीरे बाण्ड की तरफ बड़ा । अभी वह अपने और वाण्ड के बीच की दूरी ही तय कर सका था कि-----

बाण्ड की दिशा में एक टार्च चमकी ।।

विकास ठिठक गया ।।

ठिठककर गौर से देखने लगा ।

 


टार्च से बाण्ड हाथ में मौजूद किसी चीज को देख रहा था ।

विकास यह न देख सका कि टार्च की रोशनी में बाण्ड ने क्या देखा है ।

फिर --- रोशन टार्च हाथ में लिये बाण्ड एक तरफ को बड़ गया ।।

जिसने की आवश्यकता, नहीं कि स्वयं को अंधेरे में रखकर विकास उसके पीछेे लपका । इतना तो विकास समझ ही चुका था कि जंगल के इस अंधेरे में बाण्ड ने फिल्में यूं ही नहीं फेंक दी ।

खोजने के लिये बाण्ड के पास कोई-न-कोई साधन अवश्य होगा । यह साधन क्या है ? जब तक विकास को यह पता न लग जाये, तब तक वह वाण्ड के सामने अाना उपयुत्त नहीं समझता था ।।

बाण्ड के हाथ में क्योंकि रोशन टॉर्च थीं इसलिये विकास को निरन्तर उसका पीछ् करने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं हो रही थी ।। बीच बीच में बाण्ड टॉर्च का प्रकाश अपनी हथेली में दबी किसी चीज पर डालकर देख लेता और फिर आगे बढ़ जाता ।

कठिनता से पन्द्रह कदम की दूरी का अन्तराल रखता हुआ विकास उसका पीछा कर रहा था ।

कोई तीस मिनट तक यही सिलसिला जारी रहा।

फिर, एकाएक बाण्ड उस समय ठिठका ।

जब टार्च के प्रकाश में अपनी हथेली दबी चीज को देख रहा था ।

कुछ देर तक बाण्ड गौर से उस चीज को देखता रहा ।

उस समय विकास एक पेड के पीछे उससे सिर्फ इतनी दूर पर था कि बाण्ड की बुदबुदाहट भी उसने सुन ली । बाण्ड बुदबुदाया था----"इसका मतलब फिल्में किसी के हाथ लग गयी है ।"

विकांस ने उसका यह वाक्य सुना और समझ लिया कि मामला क्या है । टार्च के प्रकाश में वह बार-बार किस चीज कों देखता है ।। कई प्रकार के विचार तेजी से विकास के दिमाग में चकरा उठे । यह समझने में उसे की प्रकार की कंठिनाई नही हुई की बाण्ड बार बार दिशा और दूरी बताने वाली विरामघड़ी देखता है ।

यह समझने में भी उसे देर न लगी कि विरामघड़ी का सम्बन्ध उस पर्स से होगा । पर्स में कोई ऐसा ट्रांसमीटर होगा जिसकी दिशा और दूरी बाण्ड के बायें हाथ में दबी वह विरामंधडी बता रही होगी ।

घडी की सुइयों को गतिमान देखकर ही बाण्ड इस नतीजे पर पहुंचा होगा कि पर्स किसी के हाथ लग गया है ।

उधर बाण्ड पहले से अधिक तेजी के साथ एक तरफ को बड़ गया ।।

सावधानीवश बाण्ड ने टार्च बुझा दी थी । परिणामस्वरुप, विकास को अब उसका पीछा करने से मुश्किल हो रही थी ।।

हालांकि विकास काफी सतर्कता से आगे बढ़ रहा था मगर यह बात बाण्ड से अधिक देर न छूप सकी कि कोई उसका पीछा कर रहा है ।

एकाएक गजब की तीव्रता के साथ बाण्ड पलट पड़ा ।। झनाक से टार्च की रोशनी विकास की तरफ लपकी ।

साथ ही बाण्ड की आवाज-" कौन है ?"

किन्तु उससे अधिक तेजी के साथ हवा में सन्नाया विकास का आलपिन।

सूं--सूं की हल्की सी ध्वनि के साथ आलपिन जेम्स बाण्ड की कलाई में घूस गया । बौखलाहट में टॉर्च उसके हाथ से गिर गई ।

अभी वह उसे पुन: उठाने के लिये फुर्ती से झुका ही था कि----" नहीं अंकल, टार्च उठाने की कोशिश न करना, वर्ना मैं फायर कर दूंगा ।

ठिठक गया बाण्ड, मुंह से निकला----"हैरी ।"

आप क्या समझते है अंकल, कि मैं इतनी सरलता से हैलीकॉप्टर में जलकर राख हो जाऊंगा ?"

"तुम विकास हों-विकास ।। तुम हैरी नहीं हो सकते ।"

"जानता हूं अंकल , आपको विदित है कि आलापिन को हथियार के रूप में सिर्फ विकास इस्तेमाल करता है ।"

इस बार विकास अपनी वास्तविक स्वर में बोला था----" पहचाना तो ठीक अंकल लेकिन काफी देर से पहचाना ।"

" त-----तुम----लड़खड़ा गई बाण्ड की जुबान----"हैरी में भेष में ?"

"क्यों---जब आप जैकी के रुप में हो सकते है तो क्या में हैरी के रुप में नहीं हो सकता ?"

" किन्तु....."

बाण्ड अभी कुछ कहना ही चाहता था कि विकास की आवाज गूजीं --" किन्तु -विन्तु कुछ नहीं अंकलं------------------ कोई भी हरकत की तो भेजा फोड़ दूगां ।"

जेम्स बाण्ड ने देखा -----

उपर्युक्त शब्दों के साथ ही लम्बा लड़का उसके ठीक सामने खड़ा हो गया था । बाण्ड के समीप ही जमीन पर रोशन टार्च पड़ी हुई थी । उसका प्रकाश ना बाण्ड पर पड़ रहा था ना विकास पर , किन्तु उसके प्रकाश में एक--दूसरे को साये को भली भातीं देख सकते थे ! बाण्ड ने विकास के हाथ में दबी रिवॉ्ल्वर का साया भी देख लिया था ।

" अंकल ।" विकास ने कहा ---" जब तुम्हारे गंजे "एम" ने तुम्हें काम सौंपा था तो वह भूल गया कि वतन यार है विकास का ?"

" विकास !" गुर्रा उठा बाण्ड ---" चीफ के बिषय में जुबान संभालकर बात करो ।"

" छोड़ो चीफ की बात ।" विकास हंसा ----" अंकल क्या तुम भी भूल गये थे कि विकास की जान दोस्तों के लिये है ? क्या ---तुमने नहीं सोचा था कि उन फिल्मों को प्राप्त करने जाओगे तो तुम्हारा टकराब विकास से भी होगा ?"

" जानता था ----फिर ....?"

" फिर भी इस अभियान में कूदने की हिम्मत हो गई तुम्हारी ?"

अन्दर ही अन्दर कांप उठा बाण्ड ।

दुनिया में विकास ही ऐसा लड़का था जिसका सामना करने में बाण्ड स्वयं को नर्वस समझा करता था ।।

ना जाने क्यों विकास के सामने आते ही वह घबराहट सी महसूस करता था , किन्तु उस घबराहट को उसने कभी प्रकट नहीं कीया ।

तभी तो बोला ----" क्यों , क्या तुमसे कुछ डरता हूं मैं ?"

" मैं जानता हूं अंकल , जो दिल में है , उसे प्रश्न बनाकर पुछ रहे हो मुझसे ।"

ह्रदय भले ही कांप रहा हो बाण्ड का, किन्तु ऊपर से मुस्कराया , बाण्ड बोला ----" अपने बारे मे तुम्हें बहुत बड़ी गलती होगयी है विकास बेटे ! जिस दिन बाण्ड को तुम जैसे छोकरों से डरना पडा, उस दिन बाण्ड जीवित रहने से वेहतर आत्महत्या करना समझेगा ।'"

" आत्महत्या करोगे कैसे अंकल , मौत तो तुरूहारी विकास के हाथों लिखी है ।"

-“यह तो वक्त वतायेगा बटे कि किसकी मौत किसके हाथ लिखी है ।" बाण्ड गुर्राया---"काम की बात करो ।"

" वह विरामधड़ी मेरे हबाले कर दो ।"

" कौन-सी बिरामघड़ी ?"

"वंही जिसके आधार पर उस पर्स तक पहुंचना चाहते है जिसमे......"

किन्तु--पूर्ण न हो सका विकास का वाक्य ।।

उससे पूर्व ही ऐसी हरकत कर दी बाण्ड ने जिसकी विकास ने आशा नहीं की थीं । अपने कदमों में पड़ी रोशन टार्च कों उसने एक ठोकर मारकर विकास की तरफ उछाल दिया ।।

निशाना इतना सटीक कि सन्नाती हुई टॉर्च विकास के हाथ में दबे रिवॉल्बर से जाकर टकराई ।

उस अप्रत्याशित हमले के प्रति विकास सतर्क न था और यही कारण था कि एक पल केलिये उस से चूक होगई ।

रिबाँल्वर जाके हाथ से छिटकर कहीं अंधेंरे में दुर जा गिरा।

अभी वह संभलने ही वाला था की हवा में सन्नाता हुअा जेम्स बाण्ड का शरीर उसके-ऊपर आ गिरा ।।

विकास अभी स्वयं की बाण्ड के मुकाबला करने हेतु तैयार भी नहीं कर पाया था कि-----" ये जो विरामंधडी ।"

बाण्ड के इस बाक्य के साथ ही एक जबरदस्त घूंसा बिकास की कनपटी पर पडा ।।

घूंसा इतना शक्तिशाली था की फिरकनी की भांति घूमकर विकास धड़ांम से जमीन पर गिरा ।।

भयानक फुर्ती के साथ वह उछल कर खड़ा हो गया । इस कार्य में अगर उसे एक क्षण का भी बिलम्ब हो जाता तो बाण्ड के बूट की ठोकर पूरी शक्ति से उसके चेहरे पर टकराती ।

किन्तु अब----अब वह हबा में घूमकर रह गयी बाण्ड की टांग ।

उसी पल विकास के सिर की एक जोऱदार टक्कर उसके चेहरे पर पडी है न चाहते हुए भी बाण्ड के कण्ठ से चीख निकल गई ।

टक्कर सीधी उसकी नांक पर बैठी थी और नाक से खून किसी टूटे हुए बांध की भाति बहने लगा था । बाण्ड पहली चोट के कारण ही अपने दिमाग को नियन्त्रित न कर पाया था कि विकास की लम्बी टांग धूम गई ।

बूट की जौरदार ठोकर बाण्ड के पेट में पडी ।

कराहकर बाण्ड पेट पकड़कर दुहरा हो गया । उसी समय बाण्ड की गुद्दी पऱ विकास का दुहत्तड़ पड़ा ।

मुंह के बल विकास के कृदमो में जा गिरा बाण्ड । इससे पूर्व कि विकास उस पर अपना कोई अगला बार करता, बाण्ड ने उसकी दोनों टांगे पकड़कर एक झटके के सांथ खीच दीं ।

विकास के पैर धरती से हटे और वह बिचित्र से ढंग से चकराकर जमीन पर गिरा ।

गिरा अौर गिरने के उपरान्त भयानक फुर्ती के साथ वह उठकर खड़ा भी हो गया , किन्तु---इस बार जब उसने बाण्ड पर जम्प लगानी चाहीं तो एकाएक ठिठक गया ।।

टार्च की रोशनी में उसे चमक रहा था-अपने सामने खड़ा बाण्ड का साया, साथ ही उसने बाण्ड के हाथ में चमचमाता हुआ एक चाकू देख लिया था । उस चाकू को देखकर ही ठिठका था, वह गुर्राया-----"क्यों अंकल, उतर अाये बुजदिली पर ?"

-'"रिवॉल्वर मेरी तरफ तानकर खड़े रहना बुजदिली नहीं है ?" कहने के साथ हीं बाण्ड ने विजली की गति से झपटकर विकास पर चाकू का बार किया ।

विकास ने हबा में ही बाण्ड की चाकू वाली कलाई थाम ली और बोला---" शेर का कलेजा है अंकल तो मुझे भी एक चाकू ......."

उसका वाक्य पूरा होने से पूर्व ही बाण्ड का घूटना उसकी टांगों के जोड पर पडा ।।

निश्चय ही दर्द से तिलमिला उठा विकासं, किन्तु उसके चक्कर में वाण्ड की चाकू बाली कलाई कों छोड़ने के स्थान पर इतनी जौर से मरोडा कि बाण्ड के कंठ से चीख निकल गई । मुंह से चीख निकालता हुआ वाण्ड विकास की कमर पर से होता हुआ जमीन-पर गिरा ।

इलना सव कुछ करने के बावजूद भी उसने बाण्ड की चाकू वाली कलाई नहीं छोड़ी । एक टांग उस कलाई के जोड़ पर रखी अौर इस तरह कलाई की खींचने लगा मानौ उसे बाण्ड के जिस्म से तोड़कर अलग फेंक देने का इरादा रखता हो । इधर विकास इस प्रयास में था और उधर बाण्ड ने अपनी दोनों टांगे उठाकर विकास की गर्दन में फंसा दी।

बड़ा विचित्र-सा दांव फंसा था ।

विकास उसकी कलाई नहीं छोड़ रहा था और बाण्ड उसकी गर्दन । बाण्ड उसे गिराने के लिये झटका देता तो दर्द उसकी कलाई में होता । काफी देर तक दौनो उसी स्थिति में रहे । फिर------------

जैसे एकसाथ दोंनों ने निश्चय किया ।

 
बाण्ड का मूट विकास के चेहरे से टकराया और विकास का बाण्ड के चेहरे से । एक साथ दोनों के कंठ से चीख निकल गई । छिटककर दोनों एक साथ दूसरे अलग होगये ।

विकास उछल कर खड़ा होगया।

उससे पहले खडा हो गया था जेम्स बाण्ड ।

विकास किसी चिते की तरह उस पर झपटा । बिजली की सी गति से बाण्ड का चाकू बाला हाथ चला ।

एक भयानक चीख विकास के मुंह से निकल गई ।

हुआ यूं था कि बाण्ड का चाकू विकास के दायें कन्धे में एक गहरा घाव करता हुआ निकल गया ।

कन्धे से बुरी तरह खून वहने लगा । बायें हाथ से उस घाव को दबाकर पीछे हटा विकास ।

पहले जैसी फूर्ती के साथ बाण्ड ने उस पर दूसरा वार किया ।

किन्तु अब ----- अब विकास भेड़िया बन चुका था ।

जेम्स बाण्ड से अधिक फूर्ती का परिचय देकर वह न सिर्फ स्वयं को वचा गया , बल्कि साथ ही उसकी लम्बी टांग भी चल गई । इस बार बूट की ठोकर बाण्ड के उस पंजे पर पड़ी , जिसमें चाकू दबा था ।

हाथ से चाकू निकल कर न जाने कहां गिरा ?

अभी चाकू के चक्कर में ही था बाण्ड कि विकास के एक जबरदस्त घूंसे ने उसके जबड़े पर लगकर उसे आतिशबाजी का कमाल दिखा दिया । पलक झपकते ही लम्बे विकास की ठोकर घुमकर उसके चेहरे पर पड़ी ।

गर्म गर्म खून से बाण्ड का मुंह भर गया ।

दो दांत भी टूट गये उसके ।

खून का कुल्ला किया तो टूटे दांत भी गिर गये ।

इधर वह कुल्ली कर रहा था कि विकास की एक और ठोकर ने उसकी पसलियों को चरमराकर रख दिया ।

चाकू लगते ही न जाने क्या हुआ था विकास को कि बिजली के पुतले की भांति उसके जिस्म का हरेक अंग काम करने लगा ।

इस फूर्ती के साथ उसके हाथ पैर चल रहे थे कि बाण्ड को सम्भलने के लिये एक क्षण भी तो ना दिया जालिम ने ।

वार ----वार पर वार । चोट पर चोट ।

अन्त यह कि जेम्स बाण्ड बेहोश हो गया ।

सरलता से विकास ने यह भी नहीं माना कि वह बेहोश होगया ।

चैक करने के उपरान्त जब उसे विश्बास होगया कि वह बेहोश होगया है तो बाण्ड के कपड़ो की तलाशी ली उसने ।

जेव से विरामंधडी़ निकाल ली ।

टार्च के प्रकाश में उसने समीप की झाड़ीयों में पड़ी बाण्ड की वह गन भी उठा ली , जिससे उसने हैलीकॉप्टर नष्ट कीया था ।

फिर ---- विरामंधडी़ की सुईयों को ध्यान से देखा । देखकर हल्के से मुस्कराया विकास ।

बाण्ड के बेहोश जिस्म को कन्धे पर डाला और लम्बे-लम्बे कदमों के साथ एक तरफ को बढ़ गया ।।।।।

" तुगलक अली ।"

" हां मेरी भाभी के प्यारे नुसरत-खान ।"

."जहां से इस समय हम गुजर रहे हैं यह एक भयानक जंगल है ।"

" वेशक है ।"

"'रात का समय है ।" नुसरत खान कह रहा था---" करीब बारंह बजे है ।"

अपने हाथ में बंधी रिस्टवांच देखी तुगलक ने, रेडियम डायल चमक रहा था ---बोला ---" पूरा डेढ़ बजा है ।"

"चारों तरफ अधेंरा है ।"

" सन्नाटा भी ।"

" ऐसे मौसम में मुझे एक बात याद आ रही है ।"

" उगल' दो ।"

"ऐसा ही मौसम था जब मेरे अब्बा अम्मी की आँखों से वनी चाट खा गये ।" नुसरत अली कहने लगा---" मेरी अम्मी की आखों से बनी वह चाट अब्बा को इतनी पसन्द आई कि वे उसे बार-बार खाने लगे । वियावान जंगल था रात का समय था, चारों तरफ सन्नाटा । जानवंर बोल रहे थे ।

ऐसे में मेरी अम्मी और अब्बा के ताशे बज गये । एक-दूसरे के प्यार में बजरबटटू बनेे तो अम्मी कहने लगी-'" मेरे दिल के शरबत, मुझे इश्क की कोई ऐसी निशानी दे कि जो हमेशा मुझे तुम्हारी याद दिलाया करे ।

और अब्बा ने एक ऐसी निशानी दे दी ।

" क्या निशानी दी तुम्हारे अम्बा ने ?" तुगलक ने पुछा ।

"तू ही बता सोच कर----" इश्क की सबसे बढ़िया निशानी क्या ही सकती है ।"

तुगलक बताने लगा ।

बहुत-सी निशानियों के नाम ले डाले उसने, किन्तु नुसरत था कि इंकार में ही गर्दन हिलाये जा रहा था ।

स्थिति ऐसी आ गयी कि तुगलक इश्क की निशानियां बताता बताता थक गया ।। अतः तुगलक बोला-"अबे तो और क्या भिण्डी का मुरब्बा देदिया ?"

"हां ।" नुसरत ने एकदम कहा…"अब पहुंचे तुम असली निशानी पर ।"

चौका तुगलक, बोला --"क्या कहते हो ?"

"भिण्डी के मुरब्बे जैसा ही तो हू मैं ।"

" क्या मतलब ?"

"अबे मैं ही तो हूं प्यार की निशानी जो मेरे अब्बा ने मेरी अम्मी को दी ।"

" ओह ।" तुगलक ने कहा ---" तो तुम उसी रात की औलाद हो ?"

" अबे तू कौन सा सुबह की औलाद है ?" नुसरत ने कहा --- " मुझे तेरी सारी हिस्ट्री मालुम है मुझे । तू दोपहर के समय शहतूत के पेड़ से टपका था ।"

इस प्रकार ऊटपटांग बातें करते चले जा रहे थे नुसरत ओर तुगलक ।

पोशाक से जासूस कम पाकिस्तानी शायर ज्यादा लगते थे ।

चूड़ीदार पजामा, पैरों में जूती । घुटनों तक बन्द गले का कोट । सिरों पर काली टोपी । मुंह में पान थे । बात करते हुए बीच-बीच में पान का पीक थूक देते थे ।।

" भाई नुसरत ।"

" हां बहन तुगलक बानो !" नुसरत ने लपककर कहा ।

" थक गये यार ये साला चमन अभी कितनी दूर और है ?"

बस सुबह होते होते हम चमन के ही किसी बाग में एक दूसरे की बेगमों की कमी को पूरी कर रहे होंगे ।

" यार तुझे चमन में इस तरह जंगल के रास्ते से पैदल जाने की क्या सूझी ?"

अचानक दोनों रूक गये । दोनों के कान कुछ सुनने की चेष्टा कर रहे थे ।

आकाश की ओर देखता हुआ तुगलक बोला ---" लगता है आसमान से साला कोई हबाई जहाज गुजर रहा है ।"

" हबाई जहाज नही मूर्ख आबाज हेलीकॉप्टर की है ।" नुसरत ने कहा ।

अड़ा नहीं तुगलक , बोला---" तू ठीक कहता है । लेकिन यार साला कहीं नजर नहीं आ रहा है ।"

अचानक ..............

हबा में लहराकर आकाश से नीचे गिरती हुई कोई चीज फटाक से नुसरत के चेहरे पर आ पड़ी।

" अबे तेरी की......!"

" क्या हुआ ---- क्या था ?" तुगलक ने पुछा ।

" मुझे लगता है कि हेलीकॉप्टर का पुर्जा टूटकर मेरे चेहरे पर गिरा है , उसे ढूंढों --- हो सकता है कि उसे देखकर हम यह जान सकें कि वह हैलीकॉप्टर कौन से सन् में बना था ?"

दोनों ही उस चीज को तलाश करने लगे , जो ऊपर से गिरी थी ।

" अबे !" तुगलक के मुंह से निकला--------" ये साला पर्स किसका पड़ा है ?"

तुगलक ने झुककर पर्स उठा लिया ।।

" इसमें माल होगा ।" कहते हुए तुगलक ने पर्स की चेन खोल दी ।

" अबे इस में तो फिल्में हैं --- दो रील ।"

तुगलक ने आईडिया फिट किया ---" लगता है को प्रोडयूसर इस जंगल में अपनी किसी जासूसी फिल्म की शूटिंग करने आया होगा । उस बेचारे ने फिल्में अपने पर्स में रखी होंगी और पर्स यहां गिर गया ।।

" मुझे तो कुछ और ही लगता है । "

" क्या ?"

" किसी जेबकतरे ने किसी बहुत ही अमीर आदमी की जेब काट ली होगी ।" नुसरत खान ने राय प्रकट की ---" पर्स से पैसे निकाल कर उसने पर्स यहां फैंक दिया होगा ।"

तुगलक ने राय प्रकट की ----" अबे कहीं ये पर्स ही तो वह चीज नहीं जो मेरे चेहरे पर आकर लगी थी ?"

" हां ।" खिल्ली उड़ाने वाले भाव से तुगलक ने कहा , " कोई चील ईसे अपनी चोंच में दबाकर उड़ी चली जा रही होगी , अन्धेरें में तेरी शक्ल देखी तो फिदा हो गई । अपनी मोहब्बत के इकरानामे पर दसतख्त कराने के उसने चोंच खोली होगी और ये पर्स ......"

" तुझे कभी अक्ल नहीं आयेगी साले जामुन की औलाद ।" नुसरत ने कहा ---" अबे क्या ये नहीं हो सकता कि यह पर्स उस हैलीकॉप्टर में बैठे किसी आदमी की जेब से गिरा हो ? इत्तफाक से हमें मिल गया ।"

" तो फिर तेरे विचार से इस फिल्म में क्या होगा ?"

" यह तो इन्हें देखने से ही पता लगेगा!" कहकर तुगलक फिल्मों को टार्च की रोशनी में देखने का प्रयास करने लगा ।।।।।

अभी फिल्में निकालकर टार्च की रोशनी से चेक कर ही रहे थे कि ----

--- उसी समय --- वातावरण किसी गन के गर्जने से कांप उठा ।।

वे दोंनो ही सहमकर एक दूसरे से लिपट गये । बस गन की इस गर्जना के बाद वे किसी प्रकार की कोई आवाज न सुन सके ।

पहले वे एक दूसरे से चिपके थर थर कांपते रहे , फिर नुसरत बोला ---" तुगलक ।"

" हां नुसरत ।"

" साले , लगता है कोई पागल जासूस इस जंगल में आ गया है ---" भागो ।"

" सचमुच --- जासूस अगर अक्लमंद होता तो , इस तरह संगीत बजा कर हमें सतर्क न करता बल्कि चुपचाप हमें इस तरह दबोच लेता जैसे बिल्ली चूहे को दबोच लेती है ।" तुगलक कहे चला जा रहा था ----" महान जासूस तो बिना मारधाड़ के काम करते हैं ।"

" बिल्कुल ।" नुसरत ने कहा ----" हमें बेवकूफ जासूसों की जासूसी से फायदा उठाना चाहिए ।"

" भागो ।" तुगलक ने नारा लगाया और आपस में हाथ पकड़ कर दोनों ही भाग लिये ।

पर्स सहित दोंनों फिल्में तुगलक के हाथों में सही सलामत थी ।

वे अंधेरे जंगल में वेतहाशा भागे चले जा रहे थे । इस प्रकार मानों भूतों कोइ टोली उनका पीछा कर रही हो ।

अन्धेरें में कई स्थान पर ठोकर खाकर गिरे भी , किन्तु उठ कर फिर दौड़ने लगते ।

अन्त में जंगल के बीच वनी एक इमारत को देखकर वे रूक गये ।।।।

बुरी तरह फूली हुई सांसें लेकर उन्होंने एक-दूसरे को देखा, फिर इमारत को और फिर एक-दूसरे को ।।

दोनों डी आखें एक--दूसरे से पूछ रही थीं कि जंगल के बीच यह इमारत कैसी है ? अपनी फूली हुई सांस पर पहले संयम पाया । नुसरत ने बेला कौन बेवकूफ है, जो इस जंगम में रहता है ।।

" बेवकूफ तुम हो जो तुमने यह सवाल किया ।"

खा जाने वाली नजरों से नुसरत ने तुगलक को घूरा बेले---" क्या मतलब।"

" अबे यही सवाल तो मैं तुमसे करने बाला था ।"

" जरा सोचने दे ।" कहने के उपरान्त तुगलक ने ऐसा पोज बना लिया मानो वह दुनिया का सवोंत्तम विचारक हो । कोई प्रेमी बात सोचने में तल्लीन हो होगया हो जो मानव जाति को नया मार्ग दिया सके । फिर उसने अपनी समाधि तोड़ी बोला ---" सोच लिया ।"

" क्या सोचा ?" नुसरत ने पुछा ।

" निश्चित रूप किसी लकड़वग्घे ने यह इमारत अपनी लकड़वग्घी केलिये बनाई है ।" अपने दीम्ग का मलीदा निकालते हुए तुगलक ने बतीया-"उसे अपनी लकड़वग्घी से उतनी ही मोहब्बत होगी जितनी मेरे अब्बा को अम्मी से ...."

"अबे चुप देगची के ।"

"गाली देता है ।"
 
किन्तु तुगलक पर लेशमात्र भी तो असर न हुआ । वह कहता हीं चला गया-"तुझे नहीं पता ये, पुराने जमाने के राजा-महाराजा शेर का शिकार किया भी करते थे । बार-बार पड़ाब डालते की किल्लत' से बचने के लिये वो जंगल में इमारत बनवा लिया कंरते थे । ये सब बातें मुझे एक दिन ख्बाब में चमकी थीं । यह ही चमका था कि इमारत को शिकारगाह कहते हैं ।"

"सच ।" नुसरत बोला-"ऐसा ख्बाब तो मुझे मी चमका था ।"

-"ये शिकारगाह ही है ।"

"अबे सुन तो सही, मुझे क्या ख्वाब चमका था ।" नुसरत कहता चला गया---" मुझे चमका था कि अम्मी की बजाय अब्बा के पेट से पैदा......."

"नुसरत ।" उसकी बात बीच में ही काटकर तुगलक ने कहा ----" ख्बाब की बात छोड यार, तू ये क्यों भूल रहा है कि हम जासूस हैं-और जासूस भी छोटे मोटे नहीं-दुनिया के सबसे महान जासूस है ।"

"इस हकीकत को मैं कभी नहीं भूलता ।"

" तो फिर इस शिकारगाह में छुप जायें । तुगलक ने राय दी----"साला कितना भी बड़ा जासूस आ जाये किसी को शक नहीं होगा कि हम यहां हैं । तू वीं सोच कभी कोई ये सोच सकता है कि शेर की मांद मे चुहा होगा? "

" कभी नहीं ।"

" तो आ फिर ।" तुगलक ने कहा ----" अन्दर इन फिल्मों का जोड़ घटाना देंखेंगें ।"

इस प्रकार----ये हमारे दोनों महान जासूस शिकारगाह के अंदर चले गये ।" सचमुच बहुत पहुच किसी राजा द्वारा बनाया गया शिकारगाह ही था ।

घूमते घूमते वे एक कमरे में पहुंचे । कमरे में अंधेरा था, जिसे पहले तो उन्होंने' टार्च की रोशनी से दूर किया, फिर कमरे की एक दीबांर में लगी मशाल जला कर , प्रकाश हो गया ।

कमरा देखने से ही आभास होता था कि कम-से-कम एक वर्ष से किसी इन्सान ने यहां कदम नहीं रखा है ।

-"'अब हम जानी पाकिस्तानं के बीर सपूत सुरक्षित है ।"

" तुम कुछ सुरक्षित नहीं हो चमगदड़ के बच्चो !" एक अन्य आवाज गूंजी ।!।!!!!!

पलक झपकते ही दोंनों ने रिवॉ्ल्वर निकाल ली थी ।

"कौन है बे ?" नुसरत गुर्राया --" किस भिण्डी की औलाद ने हम जैसे महान जासूसों को गाली देने की हिम्मत की है ?सामने आ साले----मुसल्लम बनाकर हलम कर जायेंगे ।"

"तुम दोनों का सिर मुंडवाकर चुटिया एक साथ बांध दूंगा ।" कमरे के बाहर से आवाज अाई ।

बौखलाकर तुगलक ने अपने शायरों जैसे लम्बे बालों पे हाथ फिराया । नुसरत की परेशानी यह थी कि वे प्रकाश मे-थे और कमरे के बाहर था अंधेरा ।इस वात की वह भलीभांति समझ रहा था कि बाहर बाला उन्हें आसानी से देख रहा होगा और. वे उसे नही देख पा रहे हैं, तभी तो उसमे तुरन्त कहा--"मेरा अब्बा साला उल्लू का गोश्त खाता था, तभी तो मुझे अंधेरे में भी दिखता है ।"

अभी वह कह हीं रहा था कि दरवाजे के बाहर किसी कै जूतों की आवाज गूंजने लगी "टक्…टक्-टक् !"

" अा जा बेटा ।" नुसरत ने कहा तो तुगलग बोल पड़ा---"बनायेगे लोटन!"

.स्थिर और' सन्तुलित कदमों से कोई चल रहा था ।

दरवाजे पर एक परछाई उभरी-लम्बी तगडी है दोनों के पंजों की पकड़ रिवॉल्बर पर मजबूत हो गई ।।

कमरे से प्रविष्ट होकर वह परछाई मशाल के प्रकाश मे… आ गई ।

साथ ही उसने कहा--" तुम्हें बाल्टी जरूर वना दूंगा उल्लू के पट्ठो !"

-"रूसी चचा ?" एक साथ दोनों क मुहं से निकला ।

बोगारोफ ही था वह,बोला --“चचा नहीं बाप कहो ।

दोनों की नजरे मिली । रिवॉल्बर झुक गये । नुसरत ने कहा----" हमारी गलती कों क्षमा की टोकरी में फेंक दो चचा हमें क्या पता था तुम भी जंगल में तुम कवड्डी खेलने आये हो, वर्ना कसम मियां भुट्टो की ---हम कभी......"

" तुम्हारी कवड्डी बहुत देर से देख रहा हूं मैं ।" बागरोफ ने कहा--- "

पाकिस्तान के ढक्कनों वह फिल्म मुझे दे दो जो तुम्हारे हाथ लगी है ।"

" हम तो तुम्हारे ताबेदार हैं चचा---------" कहकर एक साथ दोनों ही वागारोंफ की तरंफ बढे । समीप पहुचे । चरणों में झुक ग्रये । अन्तर्राष्ट्रीय जासूस मण्डली में सर्वाधिक उम्र का जासूस बगारोफ ही था । हर राष्ट्र का जासूस चचा कहता था । उसे सम्मान करता था । पैर छूता था ।

नुसरत तुगलक ने भी परम्परा निभाई ।

एक मुस्कान बामारोफ के होंठों पर उभरी दोनों के सिर पर हाथ फेरकर बोला-----"जीते रहो कबूतर के बच्चे........."

औरं हद करदी उन्होंने ।

बागारोफ का वाक्य बीच में ही रह गया अौऱ वह धड़ाम से चारों खाने चित गिरा ।

हुआ यूं कि दोंनों' महान जासूसों ने एकसाथ, झटके से बागारोफ़ की दोनों टांगें खीच ली ।

स्वप्न में भी बागरोफ को ऐसी उम्मीद न थी । तभी वह मात खा गया । सिर का पिछला हिस्सा फर्श से इतनी जोर से टक्कराया कि सन्नाकर रह गया बागारोफ ।

दोनों बागरोफ के ऊपर सवार थे, तुगलक कह रहा था---"देखा नुसरत भाई. कैसी धोड़ी पछाड मारी है ?।"

" बुढ़ापे में चचा, फिल्म देखना चाहते थे ।" नुसरत हँसा ।

" देखी चचा !" नुसरत ने बागारोफ से कहा----"कितनी बढिया फिल्म दिखाई । इसे कहते हैं दुलती मार ।"

उसकी इस हरकत पर बुरी तरह बौखलागया था बागरोफ बोला----"तुम्हें छोडुंगा नहीं मच्छर के अण्डों ।"

" छोड़ने का सवाल तुम्हारे लिये नहीं चचा हमारे लिए है।" नुसरत ने कहा----" जामुन के पेड़ पर से टपका था मैं । जब कोई जामून खाता है तो उसकी जीभ नीली हो जाती है । जब मै किसी का किर्या कर्म करता हूं तो उसका शरीर नीला पड़ जाता है ।"

बागरोफ कसमसाया ।।।

कसमसा कर उनके बंन्धन से मुक्त होने हेतु बागरोफ ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति का प्रयोग किया , किन्तु टस से मस न हो सका वह ।

"पिछले जन्म में अंगद का पैर था मैं ।" नुसरत ने कहा ।

" मैं था वह धनुष जिसे सीता ही उठा सकती थी । " तुगलक ने तान लगाई ।

और सचमुच-ऐसा ही लगा था बागारोफ को । पहले कभी ऐसा मौका नहीं आया था कि वह नुसरत-तुगलक है भिड़ा हो । हमेशा उन्हें मूर्खतापूर्ण बाते करते ही पाया था । उस समय बागारोफ सोचा करता था कि न जाने पाकिस्तान ने अपनी सीक्रेट सर्विस में कैसे-कैसे रंगरूटों को भर्ती कर लिया है, किन्तु अब जबकि वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति का उपयोग करने के उपरान्त भी उनके वह वन्धनें से मुक्त नहीं हो पा रहा था, उसे सोचनां पड़ा कि नुसंरत और तुगलक में कोई विशेष बात अवश्य है जो इन्हें पाकिस्तान ने इस अभियान पर है भेजा है ।

" चचा !"अपने शिकंजे जैसे बन्धन् में जकड़े नुसरत बोला---"अव मैं तुम्हें अपनी बेगम का किस्सा सुनाता हूं । "

" चुप वे जामुन की औलाद ! " बागारोफ को जकड़े तुगलक ने नुसरत को डांटा-"पहले मैं चचा को अपनी लाल छडी का हाल ......!"

"अवे मुझे छोडो़ तो सही हरामी के पिल्लो" बागरोफ दहाड़ा-…"सालो मेरा गजरवत ।"

कहते कहते ही बागारोफ ने एक-एक उंगली दोनों कों आंख में मारी ।

" मर गया नुसरत ।"

"बचा तुगलक ।"

चीखते हुए दोनों ने बागारीफ को छोड़ दिया ।

उछलकर खडा हो गया बागारोफ । देखा-सामने वे दोनों खडे़ है ।

बागारोफ ने जिस आंख में उँगली मारी थी, बागारोफ की अोर देखते हुये उसी आंख को बार-वार: दबा रहे थे।

नुसरत कह रहा था… ये तुमने क्या किया चचा, मैं तो तुम्हें अपनी बेगम का किस्सा सुना रहा था ।

--"अव मैं तुम्हारी उडनतस्तरी बना दूंगा भूतनी वालों-बागारोफ दहाड़ा----"तुमने मुझे समझ क्या रखा है !"

"दूध का वीज ।" तुगलक बोला ।

नुसरत ने कहा--"कुत्ते का अण्डा !"

' होश काबू में न रख सका वागारोफ । वह झपट पड़ा । परन्तु इस बार लेशमात्र भी लापरवाह नहीं था वह ।

जान चुका था कि नुसरत और तुगलक के शरीरों में अपरिमित शक्ति है । उसका एक जवंरदस्त घुंसा नुसरत के चेहरे पर पड़ा । गजब की फुर्ती के साथ तुगलक की तरफ घूमा

किन्तु तुगलक-" नंहीं--नहीं,.....चचा !" कहता हुआ चेहरे पर हाथ रखे इस तरह पीछे हट रहा था मानो बागरोफ का घुसा नुसरत के नहीं, उसके चेहरे पर लगा----"चचा मुझे मत मारो । मैं बचा हूं तुम्हारा, नादान हूं-नासमझ हूँ ।"

पूरी सतर्कता के साथ बागारोक तुगलक की तरफ व्रढ़ रहा था, किन्तु 'नुसरत की तरफ से आवाज' आई------" तुझसे पहले ही कहा था साले, प्यार के हथगोले कि चचा को मत छेड़ चचा बहुत खतरनाक हैं, लेकिन नहीं माना चल, माफी मांग लें ।"

एक क्षण-सिर्फ एक क्षण के लिये बागारोफ की दृष्टि तुगलक से हटकर नुसरत पंर गयी कि----

कमाल कर दिया तुगलक ने ।

उस एक ही क्षण में बागरोफ के चेहरे पर ऐसा घूंसा पड़ा कि उसकी आंखों के-सामने लाल-पीले तारे नाच उठे । एक फूट हवा में उछलकर वह धड़ांम से फर्श पर जाकर गिरा ।

जबरदस्त फुर्ती के साथ उठकर खड़ा हो गया था बागारोफ ।

बागारोफ का दिमाग बुरी तरह झन्ना रहा था ।

एक नजर उसने दोंनों को देखा।।

नुसरत हाथ जोडे़ खडा़ था । कह रहा था--------"इस नालायक की तरफ से ने माफी मांग रहा हूँ ! चचा ये नादान है, 'तुम्हारा बच्चा है। इसे माफ कर दो ।।।

इस बार बागरोफ ने उनमें से किसी पर जम्प लगाने की मूर्खता नहीं की।

अपनी एक आंख से वह नुसरत की देख रहा था तो दूसरी तुगलक पर स्थिर थी ।

" अबे नुसरत ।" बागरोफ पर दृष्टी जमाये तुगलक कह रहा था ---" ये क्या होगया चचा को , ये तो भैंगें होगये ।"

मैँने पहले ही कह था न तुझसे चंचा से मजाक मत कर ।" तुगलक की वात को जबाव अवश्य दे रहा या वह, किन्तु दृष्टि बागारोफ पर ही स्थिर थी-----"अवे देख ले, चचा की आँखें घूम गयी हैं । यहां जंगल में साला डॉक्टर भी नहीं मिलेगा ।"

" मैं तुम्हारा---डमरू बजा दूंगा सालो हुकम के इक्कों ।" उसी तरह एक-एक आंख से दोनों को देखता हुआ बागारोफ बोला----"

थोड़ी देर में पता लग जायेगा कि तुममें से किसकी आंख घुमती है, और किसकी नाक । किसके दांत टूटते हैं और किसकी आँत ?"

" नही चचा, ऐसा मत करना ।" तुगलक गिड़गिड़ा उठा ।
 
बागरोफ अच्छी तरह समझ चूका था, बातों से जितने मूर्ख नजर आत्ते हैं, ये असल में उतने ही खतरंनाक है। कहने को तो वह न जाने क्या कह रहा था किन्तु दिल में सोच रहा था कि वह एकसाथ इन दोनों पर काबू कैसे पाये ? उसका दिमाग बडी तेजी से काम कर रहा था । ईतना वह समझ चुका था कि, अगर वे एक बार वह हावी हो गये तो फिर वह बच न सकेगा है अचानक उसकी नजर मशाल पर गई।

वह फुर्ती के साथ मशाल पर झपटा तो---

"अरे…अरे...रे ... चचा पागल हो गये तुगलक --इन्हें पकड़ ।"

किन्तु, इससे' पूर्व कि इनमें से कोई वागारोफ के झपटे बागारोफ ने मशाल सम्भाल ली और विद्युत की तीव्रता के साथ उनकी तरफ घूम गया । उस पर झपटने का प्रयास कर रहे दोनों ही ठिठक गये ।

नुसरत कह रहा था --"मै कहता न था तुगलक, हमारे मजाक को चचा गलंत समंझेंगे वही हुआ । अब तुझे नहीं छोड़ेगे चचा । मर साले मैं तेरी क्या मदद कर सकता हूं ?"

हाथ में मशाल लिये बागारोफ नुसरत की तरफ ही बढ़ रहा था ।

उधर तुगलक कह रहा था नुसरत की क्या गलती है चचा, गलती तो मेरी है । मजाक तो मैंने किया था, सजा मुझे दो ।"

" सच चचा !" कान पकड़ लिये नुसरत ने -----" मेरी कोई गल्ती नहीं है । सजा देनी है तो इसे ही दो चचा मैं तो ......"

तेजी से घुमाकर मशाल का एक बार बागरोफ ने नुसरत पर किया ।

गजब की फुर्ती के साथ स्वयं को वचाता हुया नुसरत चीखा-"अबे ओ उल्लु के पदृठे तुगलक की दुम, साले मरवा दिया मुझे ।"

और…जैसे रो पड़ा तुगलक-"नहीं चचा, मेरे गुनाहों की सजा नुसरत को न दो । कहता हुआ तुगलक अभी उस पर झपटने ही बाला था कि बागरोफ ने तीव्रता के साथ उसकी तरफ मशाल घुमा दी ।

मशाल सटाक से उसके चेहरे पर लगी ।

" मर साले और कर चचा से मजाक ।" नुसरत चीखा ।

सचमुच, तुगलक के चेहरे पर मशाल बहुत जोर टकराई थी । उसके मुंह से चीख निकल गई, किंतु- बागरोफ की तरफ से तुरन्त ही होने वाले वार से उछलकर स्वंयं को बचाता हुआ वह रो पडा बोला--" माफ कर दो चचा,मैं उसे चिमटे की कसम खाकर कहता हैं, जिससे पकड़कर मेरे अब्बा ने मुझे अम्मी क पेट से निकाला था । अब तुमसे कभी मजाक नहीं करुगाँ ।"

"अब रोता क्या है साले चचा के पैरों में गिरकर माफी मांग।" नुसरत ने उसे डांटा ।

तुगलक ने जैसे ही बागरोफ के कदमों में झुकना चाहा, बागारोफ ने पुन: उस पर मशाल का वार किया ।

" नहीं चचा , ऐसा न करो ।" तुगलक ने 'कहा-"मुझे माफी मांगने का मौका तो दो ।"

तुगलक गिड़गिड़ाता रहा ।

' रह-रहकर नुसरत तुगलक को कोस रहा था कि उसने चचा से मजाक किया ही कयों ? बीच बीच में वह बागरोफ से तुगलक को क्षमा कर देने का भी अनुरोध करता है मगर

तुगलक और नुसरत की चाल बागारोफ समझ चुका था । वह समझ चुका था कि जिस तरह मुर्खता पूर्ण बाते करने में वे एक दूसरे से काफी आगे हैं, उसी प्रकार बातों में फंसाकर बार करने में भी एक से आगे एक है ।

वे दोनों इसी चक्कर में थे कि जिसका भी मौका लगे, यह बागारोफ को दबोच ले जबकि बागरोफ का प्रयास था कि इतना अवसर उनमें से किसी को भी न मिल सके ।

बे दोनों ऊटपटांग बातों के-साथ अपने बचाव में रहे किन्तु--विजयी हुआ यागारोफ । .

करीब तीस मिनट पश्चात् एक प्रकार से वे दोनों बागारोक की कैद में थे ।कई पलों के लिये तीनों के दिल की धड़कनें मानों बन्द हो गई ।

किसी बुत की भांति वे खड़े रह गये -- सागर तट पर ।

उन तीनों के सामने वतन पड़ा था । झुलसा हुआ --- जला हुआ वतन । मस्तक पर पडा़ बल इस बात का प्रमाण था कि वह वतन ही है । चमन का मसीहा । धनुषटंकार का भाई । अपोलो का मालिक ।

गीले रेत पर जला हुआ वतन पड़ा था ।

फूट-फूटकर रो पड़ा नादिर । अपोलो चीख चीखकर अपने सींग रेत में पटकने लगा । धनुषटंकार है मुंह से एक डरावनी आवाज निकली रोने की आवाज । वह भी सिर पटक पटककर अपोलो की तरह रोने लगा ।

नादिर किसी बच्चे की तरह कुट-कूटकर रो रहा था ।

ना जाने कितनी देर तक वतन के दीवाने पागलो की तरह रोते रहे ।

जब उन्हें होश आया तो देखा-चमन के हजारों नागरिक उन्हें घेरे खड़े थे ।

सभी रो रहे थे । सारा चमन रो रहा था। रोता क्यों नहीं, उनका मसीहा-उनका देवता जो सामने पड़ा था----जला हुआ ।।

अचानक-वतन के मुंह से एक कराह निकली ।

नादिर के साथ साथ अपोलो और धनुषटंकार चौके । उन दोनों के मस्तक उन्हीं के खून से सने थे ।

"अभी महाराज जिन्दा हैं ।" रोते हुए नादिर के मुंह से खुशी की एक किलकारी निकली-"इन्हें महल में ले चलो ।"

फिर जले हुए वतन को महल में लाया गया । शरीर पर से इस तरह के तिनके उतर रहे थे जैसे जले हुये गत्ते पर से उतरते है । चमन के यौग्यतम जसूसों ने राष्ट्रपति भवन के उस विशेष कक्ष में पडे़ पलंग को धेर लिया ।

अभी वे अधिक कुछ नहीं, कर पाये थे कि वतन ने कराहकर नेत्र खोल दिये । फफोलेयुक्त आखों से उसने चारों तरफ देखा । यह समझते ही कि वह राष्ट्रपति भवन में है, बिस्तर पर उठकर बैठ गया ।

डॉक्टरों ने इन्कार किया तो वतन की वाणी गूँज उठी -"बतन मरा नहीं है साथियों---सिर्फ जला है औरर जलकर कुन्दन सी तरह चमका है ।"

सुनने बाले रो पड़े । धनुषटंकार और अपोलो उससे लिपट गए ।

फिन्तु-देखने बालों ने देखा वतन के जले हुए होंठों पर एक दर्द युक्त मुस्कान उभरी ।।।

वतन बोला, "रोते नहीं पागलो, इस दुनिया ने वतन की दिखा दिया है कि दुनिया कितनी धिनौनी हैं ? कितनी डरावनी और बदसूरत है, मेरी तरह । मैं इस दुनिया को जवाब दूंगा--जबाव ।" कहकर धनुषटंकार अौर अपोलो को अलग-अच्चा हटा दिया उंसने ।

मुलाजिम रोकते ही रह गये अौर वतन उठकर खड़ा हो गया । डॉक्टर यह कहते ही रह गये कि अभी उसका उठना ठीक नहीं है, लेकिन वह नहीं माना । चमन में किसका साहस था जो वतन की इच्छा का विरोध करता.

यूं जला हुआ वतन बाहर आ गया । ।

चमन का बच्चा-बच्चा राष्ट्रपति भवन के बाहर खडा था ।

एक दृष्टि वतन ने सागर की भांति उमड़ते विशाल ज़न् समुदाय 'पर डाली । मस्तक पर वल पड़ गया । आंखों से नीर तैर उठा ।।

वातावरण में मौत का सा सन्नाटा था । अभी कुछ कहने ही जा रहा था वतन कि सफेद, बेदाग--दूध जैसे कपडे लिये उसके पास अपोलो पहुंचा । सुनहरे फ्रेम का एक काला चश्मा भी था उसके पास। रोते हुए अपोलो ने वतन का वह सामान उसके आगे कर दिया ।

हल्के से मुस्कराया वतन ।अंपोलो को प्यार किया । तड़प-तड़प-खूब चूमा उसे ।

फिर-अपनी प्रजा के समक्ष ही सफेद कपड़े पहने उसने आँखों पर चश्मा लगाया ।

सारा चमन वहाँ मौजूद था, लेकिन संन्नटा ऐसा कि सुई भी गिरे तो बम जैसा विस्फोट हो । एक बार पुन: बंतन ने अपने दीवानों को चश्मे के अन्दर से देखा । फिर-वतन की वाणी जन-जन् के कानों तक-पहुंची---'" प्यारे देशा वासियों ! मैं देख रहा हैं कि आज तुम्हारी आँखों में आसू हैं ।

हर आँख में आंसू देख रहा हूँ । मुझे ये अाॉसू पसंद नहीं । जो आंसुओं को न रोक सकता हो, वह उन्हें काले चश्मे से ढक ले । क्यों--मेरे जिगर के टुकडों की आँखों में आँसू क्यों हैं ? अपने वतन की सूरत देखकर ? यह देखकर कि कल का खूबसूरत वतन आज जलकर दुनिया का सबसे वदसूरत व्यक्ति बन गया है ? इसमें रोने की कोई वात नहीं है प्यारे चमन के निवासियों । रोने की बात तो यह है कि ये दुनिया-तुम्हारे वतन की तरह वदसूरत है । उसी दुनिया ने तुम्हारे वतन को अपनी तरह बदसूरत बना दिया है । अभी नहीं बताऊँगा प्यारे देशवासियों कि मुझे बदसूरत किसने बनाया ा है ? यह रहस्य मैं तुम्हें नहीं, एक साथ सारी दुनिया को वतलाऊंगा । तभी आप भी जान लेंगे। मैं अपनी प्रयोगशाला में जा रहा हूँ । कुछ ही देर पश्चात दुनिया के हर टी० वी० सेट पर मेरा चेहरा उभरेगा । सारी दुनिया के साथ आप भी जान तेने कि यह दुनिया कितनी बदसूरत है ।"

एक क्षण सांस लेने हेतु रूका वतन, फिर बोला-"आप लोगा से सिर्फ इतना ही कहना है की कोई भी घवराये नहीं । वतन अभी जिन्दा है । आज मैं आपका खूबसूरत वतन न सही, जला हुआ वतन तो हूँ । बदसूरत वतन तो है । कम-से-कम उस समय तक जब तक कि वतन किंसी भी सूरत में जीवित है--चमन को दुनिया से नहीं, दुनिया को चमन से डरना होगा । अगर तुम्हें वतन क् चेहरे से नहीं, दिल से मुहब्बत है तो तुम सबको कसम है अपने वतन की, कोई भी एक भी आँसू आँखों में न आने दे । जो भी यह जानना चाहता हैकि मैं आगे क्या करने जा रहा हूँ, वह कुछ ही देर बाद टी० बी० पर मेरी आबाज सुन ले । जो कुछ मुझे करना है, उसकी घोषणा मुझे सारी दुनिया के सम्मुख करनी ।"
 
पुन: एक क्षण के लिए चुप होकर वतन ने जनसमुदाय को देखा । पूर्णतया सन्नाटा । कोई पक्षी तक भी तो नहीं चहचहा रहा था ।

सन्नाटे कों बेंधती वतन की वाणी पुन: जनसमुदाय के कर्ण पर्दों से टकराई----"फिलहाल सिर्फ इतना ही कहना है मुझे आपसे कि आप लेशमात्र भी न घबराएँ है तनिक भी चिंतित न हों । आपके वतन में सिर्फ उतना ही परिवर्तन आया है कि वह बदसूरत बन गया । यह बदसूरती अच्छी ही है, जो मुझे देखेगा उसे याद आ जाएगा कि ये दुनिया कितनी है

बदसूरत है । मुझे बिदित है कि आपके ह्रदय में विभिन्न प्रकार के प्रश्व चकरा रहे हैं । मैं वादा-करता हूँ कि आपके सभी प्रशन का उत्तर मैं कुछ, हो देर बाद टी ० दी ० पर दूंगा । फिलहाल मुझे प्रयोगशाला जाना ।"

वतन का वाक्य पूर्ण होते-हौते धनुषटंकार मुख्य द्वार पर वतन की सफेद कार लेकर पहुंच गया।

वतन कार में बैठा।

स्वयं ड्रांइविग सीट पर ।

अपीलों और धनुपटकार ने बैठना चाहा तो----

"तुम नहीं मोण्टों । अपोलो, तुम भी नहीं ।" वतन ने ,गंभीरता के साथ कहा…"आज हमें अकेलेे ही प्रयोगशाला-जाना । राष्ट्रपति भवन का टी.वी खोल कर तुम भी तुम भी सुनो हम क्या कहते है ?"

अवाक् से खड़े रहगए दोंनों।

कार एक झटके के साथ आगे बढा दी थी वतन ने । काई की भांति कटकर भीड़ ने उसके लिए रास्ता छोड़ दिया ।

"हमारा देवता ।" भावावेश में नादिर चीख पडा ।

"जिन्दाबाद " जनसमुदाय के जयघोष से गगन कांप उठा ।

"वतन जिन्दाबाद !" के नारों से समस्त दिशायें नाद कर उठी ।

कार ड्रराइव करते वतन के होंठों पर ऐसी मुस्कान उभरी थी मानो इन नारों ने पुन: जलने से पूर्व जैसा सुन्दर बना दिया हो ।

अपोलो और धनुषठंकार अबाक् से खड़े रह गये ।

पन्द्रह्र मिनट पश्चात टी. बी पर डरावऱना भंयकर और बदसूरत वतन का चेहरा उभरा । वह कह रहा था----"आपके टी. बी प्रोग्राम में बिघ्न पडा.. इसके लिये मैॉ क्षमा चाहता हूँ । कुछ कहने से पूर्व आपको ये बता दूं कि दुनिया के प्रत्येक उस टी..बी सेट पर जो इस समय आँन है, मेरा ही चेहरा और आवाज है । कुछ लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात होंगी कि उनके चलते हुए टी . वी प्रोग्राम बन्द क्यों हो गए और मेरा चेहरा कैसे उभर आया । इस प्रश्न के उत्तर में मैं सिर्फ इतना ही कहना उचित समझता--कि मेरे पास ऐसे साधन हैं कि मैं जब भी चाहूं । रेडियो अथवा टी. वी के माध्यम से एकसाथ सम्पूर्ण, दुनिया से संबन्ध स्थापित कर सकता हूँ ।

मै चाहता तो रेडियो पर आपको सिर्फ अपनी आवाज भी सुना सकता था ।

किन्तु नहीं-अंबाज के साथ-साथ आप लोगों को में अपना चेहरा भी दिखाना चाहता था ।

संभवत: आपने पहचाना भी हो मुझे ।

मेरी सूरत में थौड़ा परिवर्तन आ गया है, अत: संभव है कि आप मुझे पहचान न सके हों । अतः आपको अपना परिचय देदेना चाहता हूँ । मैं महान सिंगही का शिष्य औऱ नंन्हे -से देश चमन का राजा वतन हूं।

सबने मुझे देखा है, किन्तु वह वतन वहुत सुन्दर था ।

मेरी सूरत देख आप यह भी सोच सकते हैं कि वतन के नाम से यह कौन बदसूरत व्यक्ति बोल रहा है, परन्तु किसी प्रकार के भ्रम का शिकार न हों । वास्तव मे मैं दुनिया की सूरत में तो अब आया हूं । अाप भी शायद इस बात को जानते होंगे कि मेरी तरह ही बदसूरत है दुनिया ।

सच --- मेरे गुरू महान सिंगही सच ही कहते थे कि -- बड़ी बदसूरत है यह दुनिया ।

मैं कहता था ---- दुनिया बड़ी खूबसूरत है उसी तरह जैसे पहले मैं खूबसूरत था ।

मेरा भ्रम टूट ग़या ।

सिंगही गुरू जीत गये ।

मैंने वेवज एम बनाया था ।

हर देश ने यह आदेश देकर अपने जासूसों को चमन के लिए रबाना कर दिया कि चमन से या बेवज एम का फार्मूला गायब कर दो अथवा वतन का अपहरण कर लो ।

मैं जानता हूँ -कि जिन महाशक्तियों ने यह घृणित्र कार्य किया है, सारी दुनिया के साथ-साथ वे भी इम समय मेरा चेहरा देख और आवाज सुन रही हैं । सुन रही हैं तो गौर से सुने । वतन का एक एक लफ्ज विशेष रूपसे उन्हीं के लिए है । मैं उनका नाम सारी दुनिया को बता रहा हूँ वे देश हैं रूस, अमेरिका, चीन, इंग्लैड और नादान पाकिस्तान भी । इन् पांच देशों ने अपने-जासूस चमन भेजे ।

अन्तर्राष्ट्रीय अदालत और यु.एन.ओ सुन ल कि मैं इन्हें किसी अन्य राष्ट्र में घुसकर महत्त्वपूर्ण चीज चूरने का दण्ड दूंगा । सारी दुनिया सुन ले कि वतन इन्हें दण्ड देगा ।

चीन---चीन के कर्णधार सुन लें जिसके जसूसों ने मेरे चेहरे पर यह परिवर्तन किया है । मुझे जला डाला है । वे सतर्क रहे---कहीं उनका चीन भी मेरे चेहरे की भांति जलकर राख न हो जाये । मैं उनसे प्रतिशोध लूंगा--- वतन का प्रतिशोध कितना भयानक होगा, सारी दुनिया उसे अपनी आंखों से देख सकेगी । जिस देश ने मेरे विरुद्ध चीन की सहायता की उसका हश्र भी चीन के समान ही होगा ।

उन शब्दों के बाद दुनिया के टी.बी स्क्रीनों से वतन का चेहरा गायब ।

वतन की पूरी बात सुनने के पश्चात् अलफांसे ने कहा---"लेकिन इससे तो तुम्हारे ही देशवासियों को असीम दुख होगा ।"

एक क्षण के लिए वतन के गुलाबी होंठों पर-चिर-परिचित मुस्कान दौड़ गई--- हल्के से बोला---"मेरे देशवासीयों का दुख अस्थाई होगा, चचा ! मैं जानता हूं कि जब वे अपने वतन को जला हुआ देंखेंगे तो उन्हें कितना दुख होगा-किन्तु उन्हें यह अस्थायी दुख देना मेरे लिए आवश्यक है।"

'"लेकिन तुम्हारा उद्देश्य क्या है ?"

" हां चचा, आपका यह प्रश्ऩ अति महत्वपुर्ण है ।" वतन ने कहा-"मैं इन महांशक्तियों को जी भी दण्ड देना चाहता हूँ, खुलकर दूंगा । सारी' दुनिया जानेगी कि वतन क्या कुछ कर रहा है । यू.एन.ओ. और अदालत की दृष्टि में मैं अपराधी होऊंगा । चीन निश्चय ही मुझ पर मुकदमा करेगा । अदालत में वह यह भी प्रमाणित करने ही चेष्टा करेगा कि मैंने क्या कुछ किया है । भले ही सभी देश आजाद हों , किन्तु यू.एन.ओं माध्यम से सभी निश्चित कनूनों के दायरे में बंधे हैं । मैं उस दायरे से बाहर रहना चाहता हूं ।"

" किस प्रकार ?"

एक क्षण तक अलफासे की तरफ देखता रहा वतन, फिर उसकी बात का कोई उत्तर न देकर वह पिशाचनाथ की तरफ देखता हुआ बोला---" पहले तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो पिशाच ।"

अगर उत्तर बन पड़ा तो अवश्य दूंगा ।" सतर्क होकर पिशाच सम्मानित स्वर में बोला । दिल-ही दिल में पिशाच वतन की महानताओं से प्रभावित हो चुका था । वह: वतन का बहुत सम्मान करता था ।"

"जो योजना मैंने तुम्हे बताई है ।" वतन ने कहा-" वह चचा के साथ-साथ तुम भी सुन चुके हो । यह भी समझ गए हो कि मेरी योजना का मुख्य अंग तुम हो । हकीकत पूछो तो तुम्हें दिमाग में रखकर ही मैंने यह योजना तैयार की है । तुम्हारे ही मुंह से सुनना चाहता हूँ कि क्या वह सव कुछ तुम सफलतापूर्वक कर सकते हो जो कुछ मेरी योजना में करना है ?"

" कर तो सकता हैं, किन्तु ....!"

हल्के से मुस्कराया वतन बोला----"तुम्हारी किंन्तु का अर्थ समझता हूँ । तुम्हारी हिचक का कारण भी जानता हैं, लेकिन इस किन्तु को बीच में से हटाने से पूर्व तुमने यह जानंना चाहता हूं कि क्या तुम अपने चेहरे पर मेरी सूरत का ऐसा मेकअप कर सकते हो कि कभी कोई यह न जान सके कि तुम वतन नहीं, पिशाच हो ?"

"आप स्वयं भी कभी नही जाने सकेंगे ।"

"क्या तुम अपने शरीर को उस हद तक जला हुआ दिखा सकते हो, जितना मैंने बताया है ?"

"राक्षसनाथ के तिलिस्म से प्राप्त मेरे पास ऐसे-ऐसे लेप है कि किसी का भी शरीर जले नहीं अौर देखने बाले यही समझे कि वह जलकर राख होगया है ।" पिशाचनाथ ने थोड़े गर्व से कहा… बड़े बड़े डाक्टर भी उसका शरीर देख कर यह नहीं कह सकते किं वह जला हुआ नहीं है ।"

"चलने-फिरने , बोलने में मेरी नक्ल तो तुम कर ही लोगे ?"

"'इस काम में तो महारथ हासिल है मुझे ।" पिशाचनाथ ने कहा-"मैं किसी की भी हू-ब-हू नकल कर सकता हूं ।"

एक क्षण की चुप्पी के पश्चात वतन ने पुन: कहा---"अब मैं तुम्हारी "किन्तु' का निदान करता हूं ।"" कहने के पश्चात् अलफांसे पर दृष्टि जमाकर वतन बोला---"चचा पिशाचनाथ को मैं जला हुआ वतन बनाकर चमन में पहुंचाऊंगा । हम तीनों के अतिरिक्त सभी यही जानेंगे कि वतन जल गया है, वहां पहुंचकर पिशाच को क्या कुछ करना है, वह मैं बता ही चुका हूं । इधर मैं चीन में घुसकर अपना काम कर रहा होऊंगा, उधर मेरे मेकअप में पिशाचऩाथ जला हुआ वतन बनकर राष्ट्रपति भवन में पड़ा होगा । जले हुए वतन के रूप में पिशाचनाथ सारी दुनिया के टैलीविजनों पर यह घोषना करेगा कि वह महाशक्तियों से बदला लेगा । चमन के नागरिक पिशाचनाथ से प्रार्थना करेंगे कि जब वह ठीक हो जायें तब वह महाशक्तियों से बदला लें । जले हुए वतन के रुप में पिशाच इस प्रार्थना को स्वीकार लेगा । बह आराम करेगा। इधर जो कुछ करना है--मैं करूंगा ।"

" इससे क्या होगा ?"

" जव महाशक्तियाँ यह प्रचार करेगी-कि वतन यह सब कुछ कर रहा है तो जला हुआ वतन विश्व के सभी टैलीविजनों पर यह घोषणा करेगा कि बह महाशक्तियों को ख्बाव चमक रहा है । अभी तो वह ठीक भी नहीं हुआ है ।"

"ओह !" अलकांसे के मुंह से निकला----" तो यह यू.एन.ओ. और अंतर्राष्ट्रीय अदालतों से बचाव का रास्ता है ? तुम जो कुछ कहना चाहते हो, वह खूलकर अपने नाम से करोगे और दुसरी तरफ यह भी प्रमाणित करते रहोगे कि वतन तो अभी बिस्तर से नहीं उठा है ।

" बेशक---यही सोचा है मैंने ।"

"बिल्कुल ठीक सोचा है तुमने ।" अलफांसे ने मुस्कान के साथ कहा--" तुम्हारा समर्थन करता हूँ ।"

" तो फिर पिशाच की किन्तु सुलझा दीजिए चचा !" वतन ने कहा--" मैं समझता हूं कि 'किन्तु' का कारण सिर्फ यह है कि जो कुछ मैंने इन्हें करने के लिए कहा है, वह करने का आदेश अभी तक इन्हें आपकी तरफ से नहीं मिला है"

"'मेरा आदेश है ।"

पिशाचनाय का चेहरा चमचमा उठा ।

उसने अलफासे के चंरणस्पर्श कर लिए ।

वतन कह रहा था---"बस तो चचा, हम जले हुए वतन को एक हैलीकाँप्टर में लटकाकर पहले सारे चमन के ऊपर घुमएंगें, अन्त में सागार में डाल देंगें। होश में आने पर पिशाचनाथ प्रयोगशाला में जायेगा । जिस ढंग से मैंने समझाया है, उसी ढंग से सारे विश्व से सम्बन्ध स्थापित करेगा ।"

-"सारा काम आपकी योजनानुसार ही होगा ।" पिशाचनाथ ने कहा ।

और---पाठक पढ चुके हैं-वैसा ही हुआ भी है।।।

बागारोफ ने तुगलक की जेब से अभी पर्स निकाला ही था कि बह बुरी तरह बौखला उठा!

" अबे कौन चटनी का है ?" कहता हुआ वह उछल कर खड़ा हो गया ।

उसे ऐसा लगा था कि जैसे अचानक किसी ने उस पर छलांग लगा दी हो । बड़ी फुर्ती के साथ पलटकर देखा, कमरे के फ़र्श पर नुसरत और तुगलक के अतिरिक्त एक अन्य बेहोश शरीर पड़ा था ।

बागारोफ ने उसे ध्यान से देखा । ।पहचान लिया ।।

" मुंह से निकला----" ये साला इंग्लैंड की चाय कम्पनी का एजेंट यहाँ कैसे आ पड़ा ।"

ठीक पहचाना चचा, ये जेम्स बाण्ड है ।'" आवाज अाई ।

-"कौन है वे ।" बीखलाया बागारोफ-----"असली हींजड़े की औलाद है तो सामने आ ।"

" तुम्हारा बच्चा है चचा ।" कहता हुआ विकास कमरे में आ गया--" ये दूसरी बात है कि आप क्या है ।"

“"अबे......." उसे देखते ही उछल पड़ा बागरोफ-----"पौदीने के तू यहाँ कहाँ से आ गया ।"

विकास ने यहां पहुंचने से पहले ही बाण्ड के चेहरे पर से जैकी का फेसमास्क और अपने चेहरे से हैरी का फेसमास्क उतार लिया था ।

बागारोफ के सामने खड़ा लम्बा लड़का कह रहां था----"ये पर्स हैलीकाँप्टर में से बाण्ड ने फेका था । परिणाम आप देख रहे हैं । पर्स मेरे हवाले कर-दीजिए ।"

" वाह चिड़ी के इक्के ।'" सतर्क होकर पै'तरा बदला बागारोंफ ने…"ये खूब रही । इन साले पाकिस्तानी मुर्गों ने तो हमें इस फिल्म के चक्कर में मुर्ग-मुस्लम बना दिया और एक तुम हो कि दाल-भात में मुसलचंद के पोते बनकर आगये।"

"मैं तुम्हें धनिये की चटनी बना दूगा चचा ।"

" अबे....." बागारोफ ने आंखें निकाली-"ये तुने क्या कहा देंकची के ।"

गंभीर था विकास, बोला---"' ठीक कह रहा हूँ चचा, इन दोंनों फिल्मों कों चमन से मैंने गायब किया है, अतः इन पर मेरा अधिकार है । अच्छा है कि शराफत से ये फिल्में आप मेरे हबाले कर दें।"

" और अगर न करूं तो ?"

-"तो........" विकास का लहजा कठोर हो----" दुनिया की कोई ताकत मुझे ये फिल्में प्राप्त करने से नहीं रोक सकती, मैं आपसे....."

"बोलती पर ढक्कन लगा चिड़िया कें बच्चे । चलता बन जहां से

।जाकर नाड़ा बांधना सीख जाकर ।"

"क्या कहना चाहते हो चचा ?"

" मैं कहना चाहता हूं उल्लू की दुम फाख्ता किं हमारा नाम बागारोफ है । फूचिंग, हुचांग, ग्रीफित या बाण्ड नहीं ।" एक ही सांस में बागारोफ कहे चला गया-तेरी इन आंखों ,से माइक डरता होगा----तेरी धमकियों का खौफ बाण्ड खाता होगा ।। तेरे नाम से चीन और अमेरिका कांपता होगा…। मैं रूसी हूं ।। रूसी हूं-----------जन्मजात रूसी ! बागारोफ है मेरा नाम । तुम जैसी छटंकी तो जेब में रहती है मेरी । फिल्म का ख्याल छोड़ कर भारत लौट जा, मां की गोद में बैठकर दूध पी । नाडा बांधना सीख ।"

"विकास को आंखें सुर्ख हो गई । हल्के से गुर्रा उंठा वह है-" अाप मुझे मजबूर कर रहे हैं चचा ।"

'"अबे तू अगर मजबूर भी हो जाये बछिया के ताऊ, तो कौन सा मुुझे सूली पर लटका देगा ।" बागारोफ बिगड़ गया…"हरेक को फूचिंग नहीं समझते ईंट के छक्के । अपनी, औकात नहीं भूलते ! मैंनें फिल्में इन चिडी के गुलामों से प्राप्त की है और......."

आगे के शब्द कहने का अवसर नहीं दिया विकास ने ।

एकदम किसी गौरिल्ले की तरह लम्बे तड़के ने छलांग लगा दी बागरोंफ पर ।।

किन्तु बागारोफ लड़के की नस-नस से वाकिफ ।। बागरोफ जानता था कि विकास किसी भी क्षण उस पर जम्प लगा सकता है । विकास के किसी भी हमले का सामना करने के लिए बागरोफ प्रत्येक पल तैयार था ।। लोमड़ी जैसी चालाकी साथ बागरोंफ ने खूद को बचाया ।

एक ही पल पूर्व जहाँ बागरोफ खडा था, उस स्थान के ऊपर से हवा में सन्नाता हुया विकास नुसरत के बेहोश शरीर पर जा गिरा ।

"अबे ।" दूसरी तरफ खड़ा बागारोफ कह रहा था----"ये क्या कर रहा है रायते की औलाद !"

फुर्ती से उठकर विकास ने अभी दूसरी जम्प लगाई ही थी कि

रेट.........-रेट........रेट....

जंगल में छाये भयंकर संन्नाटे को किसी गन ने झंझेड़ कर रख दिया ।

एकसाथ विकास और बागारोफ के मुंह से चीखें' निकल गई ।

दो गोलियाँ विकास, की टांगों में तो एक बायें कंधे में लगी थीं ।

दो गोलियों ने बागारोफ के कंधे तोड़ दिए । पर्स उसके हाथ से उछलकर कमरे की हवा में चकरा उठा ।

चीखकर दोनों उठे अौर अभी उनमे से कोई संभल भी नहीं पाया था कि---

-"एक भी हिला तो अनगिनत गोलियां उसके सीने में धंस जायेंगी ।" इस चेतावनी के साथ ही धड़धड़ाते हुए नौ व्यक्ति अन्दर घुस आये ।

सभी के हाथों में गनें थीं ।

दोनों में से कोई संभल भी नहीं पाया था कि बुरी तरह घिर गए ।

किंतु....... किन्तु...... उफ कमाल कर दिया लडके नै !

यह देखते ही कि उन्हें चीनियों ने घेरा है, विकास का जिस्म हवा में कलाबाजियां खा उठा । उन दो चीनियों नौ चीनियों में सबसे लम्बे चीनी पर झपटा वह ।। चीनियों की गनें गर्जनें ही जा रही थी कि-----

" नहीं ...... ।" स्वयं को बचाता हुआ लम्बा चीनी चीखा----"फायर कोई न करे ।"

मुंह के बल एक अन्य चीनी के कदमों में जा गिरा विकास ।

अभी इतना समय भी नहीं मिला था कि कोई दूसरा हमला कर पाता कि उसके कंठ से चीख निकल गई । टांग के ताजे घाव में लम्बे चीनी के नोकीले बूट की ठोकर पड़ी । साथ ही उस चीनी की आवाज ---" मेरा नाम सांगपोक है विकास बेटे---" फूचिंग का लड़का हूं मैं ।"

बिकास अभी अपने होशो-हंवास ठीक से काबू भी न कर पाया था कि------

एक बहुत ही नाटे से चीनी ने उसका गिरेबान पकड़ लिया । दांत पीसता हुआ बोला---"मुझे देख विकास, मेरी आँखों में झांक । तेरी-मौत का फरमान मेरी आँखों में लिखा है। मैं उसी हुचांग का साला हूँ, जिसे तूने मार डाला । मेरा नाम तो सुना होगा? मुझे हवानची कहते हैं ।" कहने के साथ ही नाटे ने अपने सिर की जोरदार टक्कर विकास के चेहरे पर मारी ।

विकास का सारा चेहरा खून से पुत गया ।

एक चीख के साथ अभी वह गिरने ही वाला था कि , किसी ने उसके बाल पकड़ लिए । अपने सिर के बालों पर ही झूल-सां उठा विकास । अभी संभल भी न पाया या कि एक चीनी महिला की आवाज--"मुझे सिंगसी कहते हैं ।"

विकास उस महिला का चेहरा न देख सका ।।

न ही महिला ने विकास पर कोई वार किया।

इस प्रकार जैसे कसाई बकरे को पकड लेता है , सिंगसी ने उसके बाल पकड़ रखे थे ।

धटनाक्रम कुछ इस तेजी से घटा था कि विकास कुछ ना कर सका ।

उसका सारा ध्यान उस समय सिर्फ बागरोफ पर ही स्थिर था जब तीन शोलों ने उसे चीखते हुए गिरने पर मजबूर कर दिया ।

वह यही देख सका था कि चीनियों ने

उन्हें घेर लिया है । यह देखनेमें एक क्षण भी गंवाये विना कि वे कितने चीनी हैं, विकास सबसे लम्बे चीनी पर झपट ही जो पड़ा था, लेकिन संभलने के लिए एक पल भी तो न मिला उसे ।

दुश्मनों ने उसकी स्थिति का खूब लाभ उठाया ।

इस समय सिंगसी ने उसके बाल जकड़ ऱखे थे । वह अकेली होती तो एक ही मिनट में वह सिंगसी को समझा देता कि विकास के बाल पकडने को परिणाम क्या होता है,

किन्तू विकास देख रहा था---नौ गनों के साये में था वह ।।।

एक चीनी फर्श पर पंड़े जख्मी बागरोफ के सीने पर पैर रखे खड़ा था ।।

विकास के ठीक सामने खड़ा था सांगपोफ । फूचिग की तरह ही लम्बा । अपने पिता की भांति ही उसे चीनी होने के बावजूद लम्बा होने का फख्र प्राप्त था । विकास को ही धूर रहा था वह--स्थिर आँखेॉं में खून लिए ।

आँखों में वही भाव लिए उसके समीप ही खड़ा था--हबानची । लोटा ! गोल--मटोल ! ठीक किसी लोटे की तरह ।

" मैनें कसम खाई है विकास बेटे कि अपने पिता की कब्र को तेरे खून से धोऊंगा ।"

अभी सांगपोक का वाक्य पूरा हुआ ही था कि हबानची गुर्रा उठा-"मेरा जिन्दगी का आखिरी कत्ल तेरा कत्ल होगा ।"

खून से लिथड़ चुका था विकास का चेहरा । आखें तो अंगारे वन ही चुकी थी । जैसे शेर गुर्रा उठे-"तेरा बाप तेरी

तरह नामर्द नहीं था सांगगोक । दुश्मनों को नों गनों के साये में लेकर नहीं धमकाता था वह । उसका असली बेटा है तो.........."

"वह समय भी आयेगा ।" विकास की बात पूरी होने से पहले ही सांगपोक गुर्रा उठा---"अपने पिता की कब्र को तेरे खून से धोने से पहले तुझे पूरा मौका दूंगा मैं । मैं नही, हवानची मारेगा तुझे । अपनी जिन्दगी का आखरी कत्ल करेगा ये ।"

"ये लोटा ....."

अभी विकास आगे एक शब्द भी न कह पाया था कि -सचमुच हवानची का शरीर हर्वा में इसतरह कलावजियां खा उठा जैसे किसी ने घुमाकर लोटे को फेंक दिया हो हवा में लोटे की तरह घूमता हुआ वह विकास के समीप अाया और-------

फटाक से दोनों पैरों का प्रहार उसने विकास की छाती पर किया ।

अपनी छाती की हड्डियां विकास को चरमराती-सी महसूस दी ।

"जो भी हवानची को पहली बार देखता है इसके लौटा शब्द का ही प्रयोग करता है ।"' सांगपोक ने कहा -"लेकिन दुनिया में आज तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसने कभी दूसरी बार इसे लोटा कहा हो । यह शब्द इसे पसंद नहीं विकास । जो भी हवानची के लिए इस शब्द का प्रयोग करता है या तो यह उसे दुनिया में और कुछ बोलने के लिए जिन्द ही नहीं छोड़ता अथवा उसे इस हद तक सबक सिखा देता है कि जिन्दगी में लोटा शब्द उसकी जुबान पर नहीं आता । कई बार तो यह भी देखा गया है कि इसी बात पर हवानची से पिटा आदमी सचमुच के लोटे को गिलास कहता है ।" पहले तो सांगपोक की इस बात पर धीरे से हंसा कोई,

फिर बोला----"बाह क्या शायराना बात की है ।

विकास सहित सभी ने पलटकर उस तरफ देखा।।।।

तुगलक उठकर खड़ा हो रहा था ।

"तुम " उसे धूरता हुआ सांगपोक गुर्रा उठा---"तुम होश में हो ?"

"और हम जोश में हैं ।"

इन शब्दों के साथ नुसरत खान को खड़ा होता देखकर बागरोफ की आँखें आश्चर्य से फैल गई।

खूनी दृष्टि से उन दोनों की घूरता हुया सांगपोक गुर्रायां---"तुम दोनों होश में हों ?"

तुगलक बौखला उठा ।

नुसरत कांपने लगा था ।

कांपता हुआ बोला---"अभी आपको बताया तो था माई बाप कि ये साला जामुन की औलाद होश में था और मैं जोश में ।। आप की आवाज सुनी तो सच, किसी क्बाँरी कन्या---"

" बको मत ।"

हवर्तिबी के गुर्राते ही सकपकाकर नुसरत चुप हो गया। तुगलक बोल उठा----" इस साले प्यार की निशानी को कई बारं समझाया है माई बाप कि ज्यादा मत बोला कर, लेकिन… "

 
साँगपोक के चीखते ही तुगलक की जुबान पर ब्रेक लग गए तो तुरन्त ही नुसरत ने तुगलक से कहा--"ले बेटा, और कर मेरी चुगली । तुझसे पहले ही कहा था साले, कि माई बाप से मेरा बहुत पहला याराना है, तेरे सिखाये में नहीं आयेंगे ।"

"अबे चलचक्की के !" तुगलक ने नुसरत से कहा--" तुझसे पहली मुलाकात तो माई-बाप से मेरी ही है है"

"तुम चूप रहो ।" हवानबी गुर्रा उठा ।

" चुप क्यों नहीं रहता वे तुगलक की दुम ?" फोरन ही नुसरत तुगलक पर बिगड गया---" माई बाप का कहना नहीं मानता ?"

"मैं कहता हूँ, बको मत तुम ।" सांगपोक भूनभुना उठा ।।

"'मैं पहले ही कहता था साले नुसरत कि माई बाप को गुस्सा आ जायेगा "

तुगलक अभी आगे भी कुछ कहना चाहता था किं -----

चटाक............

झन्नाटे के साथ हवानचीं का हाथ उसके गाल से टकराया ।

" ले बेटा । " नुसरत कब चूकने वाला था ----" मैंने पहले ही कहा था कि माई बाप को गुस्सा आ गया तो मार देंगें ।"

नुसरत की बात पूरी होते-होते सांगपोक की ठोकर उसके पेट में लगी । चीखकर दुहरा होगया वह ।

"ले बेटा--अौर बोल ....."

तभी तुगलक के मुंह पर हवानची का घूंसा पडा । वड़ा ही अजीब-सा सिलसिला शुरू हो गया है हवानवी तुगलक को मारता तो नुसरत बोल पडता । सांगपोक नुसरत का मारता तो तुगलक । काफी देरत तक यही क्रम चलता रहा। एक स्थिति ऐसी आई कि दोनों ही चुप हो गए ।

नुसरत के लम्बे बाल पकड़कर झंझोड़ता हुआ सांगपोक बोला-----" अब आई अक्ल टिकाने ?"

" माई बाप...... " नुसरत ने कहा-"बोलने की इजाजत हो तो कुछ कहूं ?"

" मेरी बातों का जबाव दो ।" सांगपोक गुर्राया ।

"मैँ तो आपका खादिम हुं माई बाप-हुक्म करो ।"'

" होश टिकाने आया या नहीं ?"

" मेरे होश तो पहले ही ठिकाने थे माई-बाप !" नुसरत ने कहा-----" बदमाश तो साला ये जामुन की औलाद है । यह भी नहीं देखता कि किसके सामने बोलना है और किसके सामने नहीं । इसे मैं कई बार समझा चुका हैं कि हर आदमी को एक ही लाठी से नहीं हांकना चाहिए । लेकिन ये सुनता ही नहीं है अपने साथ मुझे भी फंसवा देता है । सारी गलती तो इसकी है माई बाप । "

ठीक यही शब्द तुगलक ने हवानची से कहे थे ।

तुगलक ने हबानची को और नुसरत ने सांगपोक को जो जबावं दिया था, वह एफ-दूसरे ने सुना । सांगपोक और

हवानची ने एक-दूसरे को देखा फिर-

सांगपोक ने नूसरत से और हबानची ने तुगलक से एक ही प्रश्न किया…........"इसका मतलब ये हुआ कि तुम बेहोश नहीं हुए थे ?"

कनखियों से तुगलक और नुसरत ने एक-दूसरे को देखा । दोनों एक ही सुर में बोले----" इस तुगलक को कई बार समझाया है कि चचा से…मजाक मत किया करो । चचा हमारे मजाक को समझते नहीं, बुरा मान जाते हैं, लेकिन ये नहीं माना : मजाक ही मजाक में इसने चचा की टांग खींच दी । नतीजा ये कि चचा बुरा मान गए । इसने मुझे भी मरवा दिया, जब हमने देखा कि चचा हमें मार ही डालेंगे तो बेहोशी का नाटक करके अपनी जान बचाई ।" नुसरत ने तुगलक का नाम लिया था और तुगलक ने नुसरत का ।

उत्तर सुनकर सांगपेक और हबानची की दृष्टि मिली ।

सांगपोक ने कहा---"ये हमारा समय नष्ट कर रहे है ।"

फिर हबानची और सांगपोक के हाथ एक साथ चले है दोनों के हाथों की बनी कैरेटें पाकिस्तानी जासूसों की -कनपटियों की नस से टकराई कि एक-दूसरे का नाम लेकर वे फर्श पर गिर गये । अच्छी तरह से तसल्ली करने के उपरान्त कि वे बेहोश हो गए है, सांगपोक ने हबानची से कहा----" जाने पाकिस्तानी कैसे, कैसे रंगरूटों की सीर्केट सर्बिस में भर्ती कर लेते है ।"

" बातों से तो ये मूर्ख किन्तु व्यवहार से चलते-पुर्जे नजर आते हैं ।" कहता हुआ हबानची विकास की तरफ मुड़ा ।

विकास के पीछे बाल पकड़े खडी सिंगसी की तऱफ देखकर बोला-----हमारे पास अधिक समय नहीं है सिंगसी !"

विकास अभी समझ भी नहीं पाया था हबा ची के शब्दों पर सिंगसी क्या प्रतिक्रिया करने वाली है कि पीछे से सिंगसी ने एक जबरदस्त ठोकर इतनी जोर से विकास की कमर पर मारी कि लड़खड़ाकर विकास अभी मुंह के वल गिरने हीं बाला था कि---------------

फटाक से सांगपोक के जूते की ठोकर उसके जवडे़ पर पडी ।

विकास अभी संभल भी नहीं पाया था कि हवानची का घुटना उसके पेट में ।

"अबे अो चीनी चमगादड़ों ।" फर्श पर पड़ा बागारोफ भावावेश में चीख पडा-----"औरतों की तरह गनों के साये में लेकर मेरे शेर के बच्चे को क्या मारते हो ? मर्द की अौलाद हो तो ये गने हटा लो---तब देखो इसका कमाल ।"

" तू चुप रह बूड्ढे ।" बागारोफ के सीने पर पैर रखे चीनी गुर्राया ।"

" बुड्ढा बोलता है गंजे की औलाद ।" दहाड उठा बोगरोफ---" बुड्ढी होगी तेरी मां । अरे सीने पर गन रख, कर क्या गुर्राता है । ये गन हटा ले, बताऊं कि बुड्ढा कौन है ! ऐसी चीख निकलेगी, तरे मुंह से कि चीन में बठा तेरा हरामजादा बाप बहरा हो जाएगा !"

उत्तर मुंह से देने के स्थान पर उसने गन की नाल बागरोफ के सीने मे गाड़ दी ।

विकास-------इस युग का सर्वाधिक खतरनाक लडका !

सांगपोक, हबानची और सिंगसी के त्रिकोण में फंसा हुआ था । विकास कों संभलने का एक भी मौका दिए बिना वे रह रह कर उस पर बार कर रहे थे । बागारोफ चीखे जा रहा था ।

हबा में चकराकर एक चीनी ने अपने दोनों पैरों का प्रहार विकास की छाती पर किया तो विकास चारों खाने चित फर्श पर जा गिरा । गुर्राया-----याद रखना हबानची तेरी लाश कों चीर-फाड़ पिकिंग के किसी चौराहे पर लटकां दूंगा ।"

तभी सांगपोक का बार सहना पड़ा उसे ।

विकास को पिटता देखकर बागरोंफ वेचारा चीखता रहा, चिल्लाता रहा । यहाँ तक रो पड़ा, रोता हुआ बोला…"ये कैसा हरामजादा लड़का है ? देख रहा है कि गनों के साये में हैं, लेकिन चूप नहीं रहता......झुकता नही ।"

इस हद तक उन तीनों ने विकास की धुनाई की कि वह बेहोंश होकर लुढक गया ।

चीन में…क्रिस्टीना ने अभी अभी टेलीविजन बन्द किया था ।।

उसका चेहंरा गंभीर था । रसीले नेत्र बता रहे थे कि वह कुछ सोच रहीं है है स्विच आँफ करके वह पीछे घूमी ।

सोफे पर बैठे विजय को देखा । उसने उस एक पल के लिए विजय के उस चेहरे कों गम्भीर देखा था जिसके विषय में उस ने पिछले चार-बाच दिनों में यह निर्णय कर लिया था कि उस

चेहरे पर गम्भीरता आ ही नहीं सकती ।

" विजय भैया ।" क्रिस्टीना बोली---" क्या सोच रहे हो ?"

विजय सम्हाला स्वंय को, पुन: अपने चेहरे की सामान्य करता हुआ बोला----"बारह तो तुम्हारे चेहरे पर बजे हैं ।"

गम्भीर ही रही क्रिस्टीना, बोली---"गम्भीरता की बात ही है विजय भैया ।चीनियों ने वतन को जला डाला है ।"

" अजी जला डाला है तो तुम्हारी सेहत पर क्या क्या फर्क पड़ता है ?"

"'भैया ।" विजय के समीप अा गई क्रिस्टीना---" वतन से कभी मिली नहीं हूं ।उनकी कहानी सुनी है । अजीब से दर्द में डूबी है उसकी कहानी । कई बार उसके फोटो देखे हैं । एक बार पहले टी . बी . पर भी देखा पा था । कितना सुदंर था वतन और अब........अब-देखा तो उफ-इन जालिमों ने किस तरह जलाकर राख कर दिया है उसे ? कैसा भयानक डरावना और बदसूरत हो गया है वतन !"

"लगता है क्रिस्टीना ! दिल में कहीं दर्द है तुम्हारे "

"क्या मतलब भैया ।"

"सुना है, दिलों में जब मुहब्बत का अचार पकने लगता है तो आंखों से सड़ा हुआ गन्ने का रस निकलने लगता है ।" विजय कहे चला गया…"मुझे लगता है कि वतन का अचार तुम्हारे दिल में पक रहा है ।"

"भैया !" गम्भीर थी क्रिस्टीना---"मुझे गर्व है कि आपका नाम लेकर आपको भैया कहती हूँ मैं । यह भाग्य है मेरा कि आप जैसे महान जासूस को मैं अपना भाई कह सकती हूं । विजय-भैया, महान हैं आप, जो आपने मुझे यह अधिकार दिया । मैं स्पयं नहीं समझ सकती कि मेरा हृदय आपको इतना -सम्मान क्यों देता है ?"

"हमें बनाने की कोशिश मत करो क्रिस्टी ! इन बातों में वतन की बात को घुमाने की चेष्टा मत करो ।"

हल्के से मुस्काई क्रिस्टीना--- बोली--- " आप मेरी बातों में कहां आयेंगे । "

'‘बिरुकुल नहीं आयेंगे ।" अपने ही अन्दाज में विजय ने कहा---" और जनाब आने की ही क्या बात है, हम तो जायेंगे भी नहीं । ताड़ने बाले कयामत की नजर रखते हैं ।

बोलो---" तुम यहाँ वतन की मुहब्बत के बताशों में आलू-पाना भर रही हो न ।" "ऐसी तो कोई बात नहीं है ।" क्रिस्टीना ने कहा चाहा ।

किन्तु विजय कहां मानने बाला था, बोला… " झूठ काला, सफेद, हरा, नीला पीला झूठ ।"

-"'भैया पुनः गम्बीर हो गई क्रिस्टीना----"ऐसी बात नहीं है । बतन मिली नहीं हूँ, उसकी कहानी जानी है, उसकी तस्वीर देखी है । उत्कंठा है उसे देखने की । कैसा होगा वह ? कैसा लगता होगा ? कैसा होगा वतन, जिसने आठ वर्ष की उम्र में जिम का कत्ल कर डाला ? पूरे अमेरिका को झुकाकर जो आज चमन का राजा बन बैठा, अभी विजय कुछ कहनां ही चाहता थां कि लॉकेट रूपी ट्रांसमीटर स्पाक्क करने लगा ।

शीध्रता से आन कर , ट्रासंमीटर को मुंह के करीब ले जाकर बोला ---" हेलो प्यारे बर्फ की सिल्ली ! मैं बोल रही हूं गिल्ली ।"

" मैं डण्डा बोल रहा हूं जासूस प्यारे ।" दूसरी तरफ से अलफांसे की आबाज उभरी ।

" गुच्चिक कहां है ?" विजय ने पूछा ।

"अभी अभी उसे तुमने टीबी पर देखा होगा ।'" अलफांसे की आवाज आई----"देखा ना भी हो तो सुन अवश्य लिया होगा कि वतन विश्व भर के टीवीज पर बोला है ।"

" देखा भी है और सुना भी है प्यारे लूमड़ खान ।" विजय ने कहा-पूछ रहे हैं खाकर बनॉरसी पान कि तुम वहां क्या कर रहे हो लगाकर ध्यान ?"

"जिस वतन को तुमने अभी अभी टीबी पर देखा है, वह वतन नहीं जासूस प्यारे, जले हुए वतन के रुप में पिचासनाथ था ।"

" अमां ये तुम क्या कह रहे हो, लूमड़ भाई ?"

" मुझे आश्चर्य है कि बात तुम्हारी समझ मैं क्यों नहीं आई ?" दूसरी तरफ से अलफांसे ने तुक मिलाई------वतन निश्चय कर चुका है कि इस बार उसे चीन में तबाही मचानी है । " मुझे आश्चर्य है कि बात तुम्हारी समझ मैं क्यों नहीं आई ?" दूसरी तरफ से अलफांसे ने तुक मिलाई------वतन निश्चय कर चुका है कि इस बार उसे चीन में तबाही मचानी है ।---------- तुम समझ सकते हो कि वतन एक स्वतन्त्र देश का राजा है । अगर वह ऐसा कुछ करेगा तो आतर्राष्ट्रीय अदालत में मुजरिंम साबित हो जाएगा । जो कुछ उसने करने की ठानी है, वह उसी दौरान करेगा, जिसमें जला वतन बना के

पिशाचनाथ चमन में ठीक होने के लिए पडा़ है । टीबी पर पर जो शब्द उसने कहे, वे भी उसी योजना के अंग हैं ।"

"अमां मियां लूमड़ खान, यह तो पता लगे कि वह योजना क्या है ?" उत्तर में अलकांसे ने सब कुछ बता दिया ।

सुनने के बाद विजय ने कहा--लेकिन प्यारे वतन को चीन ही से क्या दुश्मनी है ?"

" क्योकि उसे पता लग चुका है कि उसका फार्मूला चीनी जासूसों के हाथ लग गया है ।''

चौका विजय, बोला----क्या कह रहे तो लूमड़ भाई जो बात साली हमें नहीं पता वह उस साले बटन को पता है ?"

""बिकास मैदान में कूदने से बाज नहीं आया विजय ।"

"क्या मतलब ?"

" मतलब ये कि हैरी को विकास ने गिरफ्तार कर लिया ।" अलफांसे ने बताया-"वह अभी तक मेरी कैद में है।। विकास स्वयं हैरी बनकर वतन की प्रयोगशाला में गया । फार्मुला चुराया । हैरी बनकर जैकी से मिला ।"

" फिर ?"

"उसके बाद की कहानी मुझे अभी-अभी विकास ने ट्रांसमीटर पर बताई है ।"

"क्या कहानी ?"

"सुनो विजय ।" अलफांसे बताने लगा,""मैंने विकास को बहुंत रोका, वहुत समझाया कि फिलहाल वह भी हमारी तरह ही आराम से बैठकर तमाशा देखे लेकिन वह नहीं माना,

इस विषय में विकास के बारे में मुझसे ज्यादा तुम जानते हो, वह जो करने की ठान लेगा, करेगा । किसी के रोकने से रुकेगा नहीं । मैंने भी उसे खूब रोका, लेकिन बोला कि-- घुस कर तमाशा देखने में कुछ और ही मजा आता है ।परिणाम यह कि वह घुस गया । सिर्फ यहां तक मुझे पता लगा कि वह फिल्मों सहित हैरी बना जैकी के साथ हैलीकॉप्टर में जा बैठा, बाद में यह भी सूचना मिली कि वह हैलीकॉप्टर " किसी पहाडी से टकराकर नष्ट हो गया, । मैं यहां विकास की कोई भी सूचना पाने के लिए व्यग्र रहृा । इस बीच, वतन से बातें हुई । पिशाचनाथ को बतन बना कर उसकी योजना कार्यान्वित की । अभी कुछ देर पहले ट्रांसमीटर पर विकास ने मुझ से सम्बन्ध स्थापित्त किया।"

" क्या ?"

"कहता था कि वह एक जलपोत से बोल-रहा है ।"

"जलपोत ?" विजय हल्के से चौका ।

" हां ।" अलफांसे ने कहा--"उसके साथ जो भी कुछ हुआ, उसमें संक्षेप-में मुझे बताया । उसका कहना है कि

जैकी के रूप में वाण्ड था । पहले बाण्ड से उसका टकराव हुआ ।" इत्यादि सब कुछ बताने के बाद अलफांसे ने कहा…उसने बताया कि इस समय वह एक चीनी जलपोत से बोल रहा है । यह जलपोत उसे, जेम्स बाण्ड, बागारोफ, नुसरत और तुगलक को लिए पिकिंग की तरफ़ बढ रहा है । फिल्में इम समय सांगपोकं इत्यादि के कब्जे में हैं । विकास का कहना है कि उन्हें जलपोत में इस प्रकार कैद किया गया है कि फिलहाल वे कुछ भी करने में समर्थ नहीं है ।"
 
" देख लिया साले ने घुसकर तमाशा ?"

" जिस समय विकास मुझे - यह सब कुछ बता रहा था, उस समय वतन भी मेरे पास था । " अलफांसे ने बताया----" इसने भी सब कुछ सुना और उसी समय से वतन भी गायब है ।"

" कहां चला गया ?

"कदाचित विकास की तरह घुसकर … तमाशा देखने !"

--"क्या मतलब ।"

" वतन के यहां से जाने के बाद मुझे वतन का 'एक पत्र मिला है ।" "कैसा पत्र ?"

'"मैं पढकर सुनाता हूँ तुम्हे ।" कहने के उपरांत अलकांसे ने पत्र सुनाना किया, "प्यारे अलकांते चचा ! मुझे विदित हो गया है कि चीनी कुत्ते न सिर्फ मेरी फिल्में लेकर पिकिंग जा रहे हैं, बल्कि मेरे यार को भी कैद कर लिया है । बस----इतना जान लेना मेरे लिए काफी है । अब चीन में वतन जो तबाही मचाएगा, उसे आप ही नहीं… सारा दुनिया-सुनेगी ।।

इस हरामजादी कौम को मैं बताऊंगा कि वतन के फार्मूले पर दृष्टि डालने अौर वतन के यार को बन्दी बनाने का परिणाम क्या होता है ? मैं जा रहा हूँ चचा, मेरे बिषय में किसी भी प्रकार की फिक्र न करना है बस---पिचासनाथ को समझा देना कि मैंने उसे जो कुछ समझाया है, वही करे ।" यह बहुत आवश्यक है कि बीच-बीच में दुनिया पहचानती रहे कि वनत चमन में है और इलाज करा रहा है-आपका भतीजा -- वतन ।"

"ये साला बटन कहां चला गपा ?" पुरा पंत्र सुनते ही विजयं ने कहा ।

"यह तो मैं स्वयं नहीं जानता विजय ।" अलफांसे ने केहा----' जैसे ही उसे यह पता लगा कि विकास, बागारोफ, बाण्ड, नुसरत और तुगलक चीनी जासूसों के चूंगल में पहुंच चुके हैं और दोनों फिल्में लेकर वे जलपोत के माध्यम से पिकिंग की तरफ बढ़ रहे हैं तो उसके चेहरे पर कुछ ऐसे भाव उभरे जैसे वह इसी धटना का प्रतीक्षक था । उसके बाद से मुझे वतन नहीं, सिर्फ वतनं का यह पत्र मिला है ।"

"इसका मतलव ये हुआ लूमड़ भाई कि दोनों छोकरे तुम्हारा बजरबटटू बना गए ?"

" शायद तुम्हारी बनाने चीन आ रहे हैं ।"

"इसका मतलव ये हुआ लूमड़ भाई कि दोनों छोकरे तुम्हारा बजरबटटू बना गए ?"

" शायद तुम्हारी बनाने चीन आ रहे हैं ।"

" मेरी फिक्र मत करें प्यारे लूमड़ भाई । अपने राम ने तो बजरबटटू बनाना सीखा है बंनना नहीं ।" विजय कहे चला गया ---" उचित समझो तो तुम भी चीन आ जाओ, किन्तु आने से पूर्व जो हिदायत तुम्हें पिशाचनाथ को देनी है, वह न भूलना ।"

" हैरी का क्या करू ?"

अलकांसे द्वारा पूछे गए इस प्रश्न ने एक पल के लिए .. विजय को निरुत्तर-सा कर दिया, फिर बोला, "अजी लगता है लुमड़ मियाँ कि अपनी बुद्धि का कुछ भाग तुम भी डाई अान किलो के हिसाब से बेचकर खा गए हो । अमां. उय साले का करना ही क्या है ? पिशाचनाथ के हवाले कर अाना यह जरूर वता देना उसे कि अपने गुरु का वह पट्ठा हरामी कितना है । कहीं ऐसा न हो कि वह किसी तरह कैद निकल भागे ।"

" ठीक है ।" अलफांसे ने यह कहकर सम्बन्ध विच्छेद कर दिया--" मैं चीन आ रहा हूँ ।"

"सम्बन्ध विच्छेद होते ही विजय ने क्रिस्टीना की तरफ देखा है उसके चेहरे पर चमक थी कदाचित उसने विजय और अलफांसे के बीच होने वाली संपूर्ण 'वार्ता सुन ली थी ।

विजय ने कहा-----" तुम्हारा सारा चेहरा बिल्ली की आंखें बन रहा है क्रिस्टी !"

" क्या मतलब ?"

-"'अपने शिकार को देखकर जिस तरह बिल्ली की आंखें चमकती हैं, उसी तरह इस समय तुम्हारा चेहरा चमक रहा है ।"

हल्के से हंसीं क्रिस्टीना बोली-"मैंने कौन-सा शिकार देख लिया है?"

…"बटन ।" विजय ने कहा--"बोलो, क्या कुछ गलत कहा मैंने ?"

"शिकांर बाली तो कोई बात नहीं है विजय भैया ।"

क्रिस्टीना--- ने कहा --" "लेकिन हां, यह जानकर खुशी अवश्य हुई कि जिस वतन को हमने कुछ ही देर पहले टीबी पर देखा था, वह वतन नहीं था है वतन पहले जैसा ही खूब' सूरत है, वह चीन आ रहा है ।"

-'"इसी को कहते हैं अड़गीमार इश्क है"' कहने के पश्चात विजय किसी अन्य से सम्बन्ध स्थापित करने का

प्रयास करने लगा । उसे ऐसा अवश्य लगा था कि उसकी बात का क्रिस्टीना ने कोई जवाब दिया है, किन्तु उस जवाब को सुनने का उसने कोई प्रयास न किया ।

विजय निरन्तर किसी से सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास में व्यस्त था । क्रिस्टीना की आवाज उसके कानों में पडीं --- " किससे बातें करता चाहते हो विजय भैया ?"

उसकी बात का कोई जवाव देने के स्थान पर विजय ने हाथ उठाकर उसे चुप रह का संकेत किया । उसका पूरा ध्यान ट्रांसमीटर की तरफ था, और धीरे धीरे बह सेट पर कह -कह रहा था ---"हैलो हैलो" प्यारे झानझरोखे ।"

"हेलौ !" दूसरी तरफ से स्वर उभरा---"में बोल हूं ।"

"कौन ?" विजय ने पुछा---"झानझरोखे ?"

"'झानझरोखे नहीं बिजय लेटे, यह हम बोल रहे है ।" दूसरी तेरफ से आवाज आई ।

हल्के से चौक पडा विजय, मुंह से निकला--" कौन… गुरुदेव ?"

"ठीक पहचाना बेटे ।" दुसरी तरफ से सचमुच जैकी वोल रहा था ।

" -पांव लागूं गुरु !" स्वर को संभालते हुए विजय ने एकदम कहा-. "लेकिन इस ट्रांसमीटर पर आप कहाँ से टपक पड़े ।

'"तुम समझ सकते हो विजयकि तुम्हारा झानझरोख इस समय हमारी ही कैद में है ।'.' जैकी ने कहा-"मुझे अफसोस है कि अशरफ यहां से 'आँपरेशन --वेवज. एम से सम्बन्धित सारी सूचनायें तुम्हें देता रहा, किन्तु हम उसके बिषय में कुछ न जान सके।। उसने पीछा भी किया, किन्तु मैं न जान सका कि कोई मेरे पीछे है । सच मुझे सख्त अफसोस है , किन्तु-अफसोस अब तुम्हें भी होगा ।"

" अरे हम तो तुम्हारे बच्चे हैं गुरुदेव ।" विजय ने कहा---अपने झानझरोखे को तुमने कैसे पकड़ लिया ?"

"उसने सोचा था कि वह जैकी बनकर, हैलीकॉप्टर लेकर चमन से हैरी को लेने चला जाएगा ।" जैकी ने बताया -"यह सोचकर वह मेरे घर में घुस आया मुझ पर और --- जूलिया पर उसने एक साथ हमले किए, किन्तु............"

" उसी समय बांण्ड आ गया और उसने झानझरोसे सहित तुम सबका तीया-पांचा कर दिया ।" जैकी की बात पूर्ण होने से पहले ही विजय ने कहना शुरू कर दिया-जो काम अपना झानझरोखे करना चाहता था, वह जेम्स वाण्ड ने किया ।"

जैकी के चौकने का स्वर----"यह सब कुछ तुम्हें कैसे मालूम ?"

"'हमारा नाम विजय दी ग्रेट है गुरुदेव !" सीना अकड़ाकर विजय ने कहा…"हमें तो यह भी मालूम है कि इस समय हैरी कहां है ? लेकिन पहले तुम यह बताओ कि अपने झांनझरोखे मियां इस समय कहां हैं ?"

--'"हमारी कैद में ।"

" उसे छोड़ दो !"

" क--क्या मतलब ?" निश्चित . रूप से विजय के इस विचित्र आदेश पर जैकी चौका था -"यह बात तुमने "कैसे-कही?"

-"गुरुदेव !" विजय ने मानो जैकी को पुचकार'-"और उसका करोगे क्या ?'"

" आँपरेशन वेवज एम' वाले इस अभियान से तुम्हें हटाने के काम तो अशरफ ही आएगा ।'" जैकी ने कहा------."सुनो विजय, ध्यान से मेरी बात सुनो । इस अभियान पर तुम्हारे बच्चे को भेजा गया है…हैरी को उसका काम है, . वेवज एम का फामुँला सुरक्षित अमेरिका पहुँचाना । मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि वह अपने इस अभियान में उस समय तक सफल नहीं होगा जब तक कि बीच में तुम हो, यह समझो कि तुम्हें आदेश देता हैं मैं---तुम इसअविन्यान से हट जाओं ! अगर तुमने मेरे इस आदेश की अवहेलना की तो याद रहे, तुम्हें जीवित अशरफ को देखने का अवसर कभी नहीं मिलेगा ।"

…"वाहं गुरुदेव----यह भी खूब रही ।" विजय ने कहा----"आपने वह कहावत तो सुनी ही होगी फि चूहे के हाथ कत्तर लग गई तो वह स्वयं को बजाज यानी कपडे का व्यापारी ही समझ बैठा ।"

"'क्या कहना चाहते हो ?"

"यह कि हैरी हैमारीे कैद में है ।" विजय ने कहा--" तुम्हारा मेकअप करके वाण्ड आया था तो हैरी के भेष में उससे विकास मिला । हैरी को विकास ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया था ।"

"यह सब बकवास है ।" जैकी चीख पड़ा ।

"कभी--कभी बकवास भी सच होती है गुरुदेव !" विजय ने यहा---" बकवास ही सही, लेकिन सच है । हैरी इस समय हमारी कैद में है और आप भी यह याद रखें कि जो कुछ आपकी कैद में पड़े हमारे झानझरोखे के साथ होगा ठीक वही हैरी के साथ ।"

" बकवांस मत करो विजय ।" दूसरी तरफ से बोलने वाला जैकी चीख पड़ा था--- "जासूसी तुम्हें मैंने सिखाई है । उसी जासूसी का पैतरा तुम मुझ पर चला रहे हो, । मैं जानता हूँ कि हैरी-वेरी कोई नहीं है तुम्हारे पास है यह 'झूठ तुम इस लिये बोल रहे हो, क्योंकि अशरफ को मारने की धमकी जो दी है मैंने । मैं तम्हारी इस चाल में आने वाला नहीं हूँ विजय । "

"अगर इस गलतफहमी में रहें , तो निश्चित रुप से आप वहुत बड़ा धोखा खायेंगे" । विजय ने कहा--" ये सच है कि हैरी हमारे पास है और झानझरोखे के साथ जो भी करो, इस बात को अच्छी तरह-सोच-समझकर करना वही व्यवहार हैरी के साथ भी हो रहा होगा। एक क्षण के लिये सेट पर सन्नाटा छा गया, फिर जैकी की आवाज---" मुझे तुम्हारी बात पर बिलकुल यकीन नहीं है ।"

" और मैं आपकों यकीन दिलाना भी नहीं चाहता ।"

'"तुम्हारे पास क्या सबूत है ?"

"'क्या ये सबुत कम| है मुझे यह पता है कि तुम्हारे मेकअप में हैरी को लेने जेम्स बाण्ड आया था ।” विजय ने

कहा----"जरा सोचो गुरुदेव, अमेरिका में घटी धटना की जानकारी मुझे कैसे हो गई ? एक ही माध्यम था---ये कि

विकास ने हैरी को गिरफ्तार कर लिया था । स्वयं विकास हैरी के मेकअप में बाण्ड से मिला । उसने वाण्ड को पहचान लिया । तुम स्वयं समझ सकते हो कि विकास ने बाण्ड का क्रिया-कर्म किस ढंग से किंया हौगा ।। बस, स्वयं बाण्ड ने वताया कि क्या कुछ हुआ था ।"

-"ये झूठ है ।" जैकी चीख पड़ा---- "तुम्हारी यह बात प्रभावित नहीं करती कि हैरी तुम्हारी कैद में है सम्भव है कि किसी अन्य माध्यम से तुम्हें यह जानकारी हुई हो । तुम्हारी इस खोखली दलील मैं नहीं मान सकता कि हैरी--------!"

"अगर में ये कहूं गुरूदेव कि आप भी झूठ बोल रहे है----अशरफ आपके पास हैं ही नहीं तो ?"

"'मैं तुम्हारी तरह खोखली धमकियां नहीं दिया करता ।"' जैकी ने कहा---"अशरफ मेरी कैद में है, इसका प्रमाण मैं तुम्हें अभी ट्रांसमीटर पर उसकी आवाज सुनाकर भी दे सकता हूं बोलो----वया तुम सुनवा सकते हो हैरी की आवाज ?"

" गुरु चाहूँ तो अभी अपने ही मुंह से हैरी की आवाज निकालकर आपको यकीन दिला दू ।।" विजय वे कहा…लेकिन फिलहाल मुझे यह हथकंडा अपनाने की कोई अाबश्यकता नहीं है । यह भी जानता हुं कि आपके लिये भी अशरफ की आवाज की नकल करना कोई कठिन काम नहीं है, किन्तु मुझे विश्वास है कि अपना झानझरोखेे आपकी कैद में है और तुम्हें भी विश्वास करना पड़ेगा गुरुदेव----यह कि हैरी हमारी कैद में है । याद रखना, जैसा व्यवहार उसके साथ होगा, वैसा ही हैरी के साथ..........!"कहते के पश्चात् विजय ने एकदम सम्बन्ध विच्छेद कर दिया । दूसरी तरफ से जैकी हैलो -हैलो ही करता रह गया है

पनडुब्बी से बाहर समुंद्र के अथाह जल में जो व्यक्ति अभी-अभी कूदा था उसके हाथ में एक छड़ी थी ।

सम्पूर्ण जिस्म पर गोताखोरी का लिबास ।

पीठ पर दो आक्सीजन के सिलेण्डर रखे थे और पनडुब्बी से कूदते- ही उसने जलपोत के उस हिस्से में मौजूद एक रॉड पकड़ ली थी जो पानी में डूबी थी ।

मस्त हाथी की भांति जलपोत्त सागर के कलेजे पर दनदना रहा था ।

छड़ी को सम्बाले वह रॉड के सहारे चलता हुआ सागर की सतह पर अा गया ।
 
इस समय उसका गर्दन से ऊपर का भाग पानी के ऊपर था शेष पानी के अन्दर । धीरे धीरे पानी के अन्दर का भाग भी ऊपर आता जा रहा था ।

रॉड के सहारे चलता हुआ वह जलपोत के पिछले भाग में आ गया है । फिर छपकली की तरह वह जलपोत की ऊंची और चिकनी दीवार पर चिपक गया ।

उसके हाथ-पैरों के चारों पंजों में विचित्र-सी किस्म के दस्ताने थे । ऐसा प्रतीत होता था मानो उसके दस्तानों में हवा भरी हुई हो ।जलपोत को दीवार से उसने दायाँ हाथ हटाया उस हाथ का दस्ताना इस प्रकार फूलता चला गया जैसे किसी माध्यम से उसमें हवा भरी जा रही हो । उसने हाथ सीधा किया, कुछ ऊपर, जलपोत की दीवार पर उसने हाथ रखा ।

उस हाथ के दस्ताने की हवा निकलती चली गई । ज्यों-ज्यों हवा निकलती जा रही पी त्यों-त्यों उस हाय की उंगलियाँ एक विचित्र से ढंग से जलपोत की दीबार पर जमती जा रही थी ।। जब वह हाथ पूर्णतया दीवार पर जम गया तो उसने बायां हाथ दीवार से हटाया । दांयें हाथ की भांति दीवार से हटते ही उस हाथ के दस्ताने में भी हवा भरत्ती चली गयी, फिर दायें हाथ से ऊपर, दीवार पर उसने बायां हाथ जमाया । दस्ताने की हया निकंली और यह हाथ दीवार पर जम गया । फिर दायां हाथ उसने दीवार से हटाया। उसमें हवा भरी दायें से ऊपर चिपकाया ।। इस प्रकार ठीक किसी छपकली की भांति यह जलपोत की ऊंची , सपाट और चिकनी दीबार पर चढ़ता चला गया । जलपोत अपनी स्थायी गति से बढ़ता चला जा रहा था ।

पूरी दीवार पर चढ़ कर: डेक पर पहुंचने में उसे तीस मिनट लग गये ।

डेक पर पहुंचकर उसने निरीक्षण किया । किसी इन्सान की मौजूदगी न पाकर वह डेक पर उतर गया । छडी़ सम्बाले वह एक शेड के नीचे पहुंचा है सर्वप्रथम उसने अपनी पीठ को सिंलेण्डरों के भार से मुक्त किया, कैप उतारी । उसके चेहरे पर चौडे फ्रेम वाला काला चश्मा लगा हुआ था ।

गोताखोरी का लिबास उतरा तो जिस्म पर मौजूद सफेद कपडे चमचमा उठे ।

पैरों में क्रैपसोल के सफेद जूते थे , अपना शेष सामान वहीं छोड़कर उसने छड़ी उठाई और डेक से नीचे जाने वाली सीढियों की तरफ बढ़ गया । उसका रंग गोरा था…दृध जैसा । कद लम्बा । विकास की भांति ही लम्बा ।। लम्बे-लम्बे कदमों के साथ वह बढ रहा था ।।

सीढियां उतरकर वह एक गैलरी में पहुंचा ।

सीढ़ियों के नीचे समीप ही खडे़ एक चीनी सैनिक ने उसे देख लिया था । देखते ही सैनिक ने फुर्ती के साथ उसकी तरफ गन तान ली और चिल्लाया…"कौन हो तुम ? कहां चले आते हो ? "

किन्तु जबाब में दूध जैसे कपडों बाला उसके ऊपर अा गिरा था ।

सफैद बूट की ठोकर इतनी जोर से उसकी कनपटी पर पडी थी कि अपने कंठ से चीख निकालता हुया वह धड़ाम से जलपोत के फर्श पर गिरा उसके हाथों से निकलकर गन तो हवा में लहराती हुई बहुत दूर जा गिरी थी ।।

वह फुर्ती के साथ खड़ा हुआ।

अब भी नहीं पहचाना मुझे गुलाबी अधरों से निकली वाणी के साथ ही उसके मस्तक पर बल पड़ गया----" मै

" व....व....वतन !" सैनिक का पोर-पोर कांप उठा ।।

एक जहरीली मुस्कान गुलाबी होंठों पर उभरी । ऐसे, जैसे कोई लड़का म्यान से तलवार निकाले । छडी के अन्दर से खींचकर हहिडयों का बना मुगदर निकाल लिया वतन ने ।

सैनिक की आंखों में साक्षात मौत नृत्य कर रही थी । भय के कारण चेहरां पीला पड़ा हुआ था । वह पीछे हट रहा था और धीरे-धीरे लम्बे कदमों के साथ वतन उसकी तरफ बढ रहा था ।

सैनिक के पीछे दीवार आ गई । अब वह और अधिक पीछे नहीं हट सकता था ।

वतन का मुगदर वाला हाथ ऊपर उठा मुगदर हवा में लहरा उठा और सन्नाकर वह अभी सैनिक के जिस्म के किसी भाग से टकराने ही वाला था कि सैनिक गिड्रगिड़ा उठा-"न---न---नहीं मुझे मत मारो , मैंने कुछ नहीं किया ।" हाथ रुक गया वतन का , मस्तक पर पडा बल, गहरा बहुत गहरा हो उठा। बोला---"' तुम्हारे चेहरे पर आतंक देख रहा हूँ । मौत के भय की परछाइयां कभी यह परछाइयां मैंने अपनी मां और बहन के चेहरों पर देखी थीं किन्तु किन्तु उन-जालियों ने उन्हें छोड़ा नही था ।। मैं तुम्हें छोड सकता हूँ।"

रो पडा सैनिक--" तुम्हें छोड़ने की कुछ शर्त हैं मेरी ।"

सैनिक की आंखों में प्रश्न उभर आया । जैसे पूछ रहा हो…" क्या ?"

"बताओ कि विकास इत्यादि इस जलपोत में कहा कैद हैं ?"

सैनिक के चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव उभर अाये ।

"'तुम्हारा नाम तो नहीं जानता मैं ।" बेहद गम्भीर स्वर में वतन ने कहा--"यह भी सुन लो कि तुम्हारी कौम से घृणा है मुझे । नजानते हो, क्यों? इसलिये, क्योंकि तुम समझते हो कि दुनिया में जीवित रहने का अधिकार सिर्फ तुन्हीं का है ।

तुम्हारा वस चले तो सारी दुनिया को अाग लगा दौ तुम । स्वयं जीवित रहने के लिये दूसरों को फाड़कर खा जाओ । मैं अहिंसा को मानने वाला हूँ, हिंसा का क्या परि'गाम होता है, वह मैंने अपनी मां, बहन और पिता को लाशों पर देखा है । सोचता हूं कि मेरे कारण दुनिया का कोई भी इन्सान उस हिंसा का शिकार न हो, किंतु ऐसी बात भी नहीं कि मैं हिंसा का प्रयोग नहीं कर सकता । मैग्लीन और उसके बेटे का अंजाम सारी दुनिया को पता है । मैं महात्मा गांधी की तरह महान नहीं, जो हिंसा का प्रयोग करने की कसम ही उठा लूँ । हां यह अवश्य मानता हूं कि जहाँ अहिंसा से काम हो सके वहां हिंसा प्रयोग नीच व्यक्ति करते हैं । जो सोदेश्य के लिए हिंसा का प्रयोग नहीं करता, मैं उसे भी नीच समझता हूँ । मेरे सिद्धान्त पर गौर करो और फिर सोचो कि तुम्हें क्या करना है, वे लोग कहाँ कैद हैं ? यह बताना है या.....?"

" मैं वता रहा हूँ ।" बुरी तरहसे गिड़गिड़ा उठा सैनिक ।

" बोलो ?"

"जलपोत की सबसे निचली मंजिल के कमरा नम्बर दस में ।" 'सैनिक ने जबाब दिया ।

मुगदर छडी के अन्दर रख लिया वतन ने बोला------"इस बात के लिए धन्यवाद कि तुमचे मुझे-हिंसा का प्रयोग करने पर विवश नहीं किया, लेकिन याद रखना, तुम जहां खड़े हो जिस, पोजीशन में खड़े थे, उसी. तरह वही खडे हो जाओगे । मेरे विषय में किसी से भी कुछ नहीं कहोगे। यूं समझो कि तुम्हें यह पता ही नहीं है कि वतन यहाँ से गुजरा . है"

" जी हां ।" उसकी जुबान सूख गई थी ।

"उम्मीद हैकि तुम मुझे हिंसा अपनाने के लिए विवश नहीं करोगे ।" कहने के साथ ही वतन उसके पास से मुडा है छड़ी टेकता हुअा वह गैलरी में इस प्रकार आगे बढ गया, मानो उसके पीछे कोई हो ही नहीं । लम्बे लम्बे कदमों के साथ वह गैलरी में ठीक इस प्रकार बढा चला जो रहा था, मानो वह चमन के राष्ट्रपति भवन में ही टहल रहा हो ।

जैसे ही वह गेलेरी कें एक मोड पऱ मुड़ा उसने देखा एक सैनिक उसकी तरफ आ रहा था ।

वतन को देखते ही वह बुरी तरह चौककर ठिठका । गजब की तेजी के साथ उसने कन्धे पर से गन उतारी, किन्तु अभी वह उस गन को किसी पर फायर करने की पोजीशन में भी नहीं ला पाया था कि वतन का मुगदर इतनी जोर है उसकी कनपटी पर पड़ा कि वह चीख पडा ।

एक ही वार में उसकी कनपटी की कोई नस फट गई ।।

कोई बाँध टूट गया मानो---- फव्बारे जैसा रूप धारण करके बह उठा । गन तो कभी की उसके हाथ से निकलकर फर्श पर गिर चुकी थी । उसके कंठ से निकलने वाली वह भयानक चीख--उसके इस जीवन की अन्तिम चीख थी ।

वतन से डरी हुई रूह, उसके जिस्म पर लात मारकर ईश्वरपुरी जा पहुंची थी और अब इस प्रयास में थी कि यमराज अपने खाते-में उसकी एण्ट्री कर ले जब तक उसके शरीर को जलपोत के फर्श पर पड़ा देखकर वतन के मस्तक पर बल पड़ गया ।

हहिडयों से बने मुगदरं पर उसके खून का अंश आ गया था ।

वतन ने मुगदर छडी में ऱखा और निश्चित भाव से आगे वढ़ गया ।
 
इस मंजिल की शेष गौलरी में उसे कोई नहीं टकराया । सीढि़यां लय करता हुआ जब वह नीचे की मंजिल की तरफ़ बढ़ रहा था तो सीढियों के नीचे, खड़ा एक सैनिक सतर्क हो गया, किंतु', अभी वह अपनी सतर्कता का कोई लाभ भी नहीं , उठा पाया था कि हवा में संनाती हुई मुगदऱ ने कनपटी पर चोट करके उसकी रूह को भी शरीर त्यागकर ईश्वरपुरी की तरफ रवाना पर दिया ।।

पुन: मुगदर को छेड़ी में रखकर वतन आगे बढ गया ।

उस मंजिल को गैलरी में घूमतां वह एक हलि कमरे में गया ।

हाँल एकदम खाली था और हाँल जिस दरवाजे से अन्दर प्रविष्ट हुआ था, ठीक उसके सामने हाल का एक दूसरा दरवाजा चौपट खुला पडा़ था ।

हाँल मं से गुजरकर उस दरबाजे में से ही निकल जाने का निश्चय किया था वतन ने । अभी वह हाँल के ठीक बीचोबीच ही पहुँचा था कि बिधुत की सी गति से हाँल में खटाखट की आवाजें गुजं उठी ।

वतन ने देखा--पूरे-हॉल में अनगिनत दरवाजे उत्पन्न हो गये थे । प्रत्येक दरवाजे पर तीन-तीन सैनिक उसकी तरफ गन ताने खड़े थे ।

एक पल के लिये वतन ठिठका ।

चेहरे पर किसी भी प्रकार की घबराहट का एक भी चिन्ह न उभरा ।

अगले ही पल--वह इस प्रकार आगे बड़ गया मानो उसे किसी की उपस्थिति का आभास न हो ।

" वतन !"

इस आवाज ने विद्युत की सी गति से उसे पलटने पर विवश कर दिया ।

देखा-----एक नाटा चीनी खडा़ था । होठों पर कूर मुस्कान लिये वोला-----"मेरा नाम हवानची है ।"

वतन की दृष्टि हवानची के बराबर में खडे उस सैनिक पर स्थिर हो गई थी…जिसे वह अहिंसा का प्रयोग करता हुआ जीवित छोड़ आया था ।

हवानची के बराबर में खड़े उस चेहरे पर भी करीब-करीब हवानची जैसी मुस्कान थीं ।।

उसे घूरता हुआ वतन गुर्रा उठा…..."तुम जैसे व्यकित ही मेरे अहिंसा के सिद्धांत को ताक पर रखवा देते हैं ।"

"मूर्ख हो तुम, जो इस ज़माने में अहिंसा की पोटली को बांधे फिरते हो । सैनिक गुर्राया ।

उत्तर में तेजी के साथ उनकी तरफ बढा वतन ।

सहमकर सैनिक हवानची के पीछे आ गया ।

बेपैदी के लोटे की तरह घूमकर हवानची वतन की तरफ बढा, बोला-"हवानची है मेरा नाम ।"

एक पल के लिये वतन ठिठका, बोला---" तुम्हारा नाम नहीं पुछा मैंने ।"

"लेकिन मैंने बता दिया है।"

वतन ने वैसी दृढता के साथ ही उससे आगे बढ़करं कहा -----" तुम्हारा नाम कोई ऐसी तोप नहीं है, जिससे मैं डरूं । सच पूछो तो अपना नाम बताकर तुमने अपने अब तक के जीवन की सबसे बडी भूल की है । उम्मीद मुझे ये है कि यह तुम्हारे जीवन की अंतिम भूल सांवित होगी । इससे बड़ी या छोटी भूल करने के लिए मैं तुम्हें जिन्दा छोडुंगा नहीं । क्या बताया था तुमने अपना नाम एक बार फिर कहना ।

"हवानची ।" वह वतन से बिना तनिक भी प्रभावित हुए गुर्राया ।।

--"'हूं ।" जैसे जहर से बुझ गये वतन के के अधर ----" तो तुम हो वह हवानची जिसने अपनी जिदगी का आखिरी खून विकास का करने की कसम खाई है ? हुचांग का साला ? तुम । हत्या करोंगे विकास की ?"

पुन: मुस्कराया हवानची बोला----तुम्हें शक है कुछ ?"

" कभी देखा है विकास को ?" पूछा वतन ने ।

" मेरी कैद में है वह ।"

-"इसीलिये उसकी हत्या की बात सोच ली ।" वतन ने कहा---"स्वंतन्त्र होता तो स्वयं को बचाते फिरते!"

--"घवरांओ नहीं ।" हवानची ने कहा----" अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोडुंगा विकास की हत्या मेरे द्वारा की गई अंतिम हत्या होगी । अब यह आवश्यक है कि उससे पहले मैं तुम्हें मारू ।

" ख्बाब देखने छोड दो हवानची !" वतन मुस्कराया ----"मुझे तुमसे हमदर्दी है । शायद इसलिये कि तुम विकार से अपने जीजां के खून का बदेला लेना चाहते हो । अपनी बहन की मांग का सिंदुर उजड़ने का बदला लेना चाहते हो , किंन्तु ये सोचो कि बिकास ने तुम्हारे जीजा की हत्या , इसलिये की हैं क्योंकी वह मानवता के मस्तक पर एक कलंक था । धरती मां उसका बोझ नहीं सह सकती थी । "

" वतन ।" हवानची दहाड उठा ।

"’चीखो मत, चीखने से कोई समस्या हल नहीं होती है ।" वतन ने शान्ति के साथ कहा----" सच्चाई बदल नहीं जायेगी । तुम्हारे चीखने से नर्कमें पड़ा तुम्हारा जीजा उछल कर स्वर्ग में नहीं जा गिरेगा ।"

मैं कहता जुबान सम्भालकर बात करो !"

'"दूसरे की नही, अपनी जुबान पर ध्याना-दो हबानची , शायद तुम जानते नहीं कि वह क्या-वया कह रही है !"

वतन ने कहा--"तुम्हें तो पता है हिंसा का प्रयोग सिर्फ उसी स्थिति में करता हूं मैं, जब अहिंसा से काम न चले !"

"क्या कहना चाहते हो ?"

"यह कि तुम लोगों के बीच मैं अकेला जरूर हूं , लेकिन वास्तव में अकेला हूँ नहीं हूं !" वतन ने कहा-"यह याद रखना कि अगर मुझे , इस जलपोत में कुछ हो गया तो इसे जलपोत की पेंदी में एक वडा छेद हो जायेगा । वह छेद कहाँ हुआ है, यह रहस्य भी तुम्हें उस समय पता लगेगा, जव जलपोत डूबने लगेगा ।"

कुटिलता के साथ मुस्कराया हवानचीं, बोला---इस किस्म की झूठी बातों में-फंसने वाला नहीं हूँ मैं ।" -

" सच को झूठ समझना सबसे बड़ी बेवकूफी है ।"'

"अौर सबसे वडी बेवकूकी है समझदाऱ आदमी के सामने झूठ बोलना ,जो उसके सामने चल न सके!" हवानवी ने कहा -" मैं दावे के साथ कह सकता कि कम-से-कम तुम्हारा आदमी इस जलपोत में कोई ऐसा छद नहीं करेंगे जिसके परिणामस्वरूप यह जलपोत डूबे । जानते हो, क्यों ? इसलिये कि तुम उन्हें कभी ऐसा आदेश दे ही नहीं सकते है क्योंकि तुम्हे: मालूम है कि इम जलपोत पर विकास भी है । हम जलपोत में डूवेंगे तो विकास भी बचा नहीं रहेगा !"

वतन के मस्तिष्क की एक झटका सा लगा ।

यह बात सच थी कि उसने झूठ बोला था है इस मकसद से कि इस झांसे में आकर वे किसी भी प्रकार की हिंसात्मक वारदात करने का साहस न कर सकें, किन्तु…किन्तु हवानची? वतन को लगा सचमुच हवानची एक खतरनाक जासूस है ।

मगर अपने किसी भी भाव को वतन ने चेहरे से स्पष्ट न होने दिया ।

वतन बोला--"कभी-कभी अपने ही दिमाग का कोई… ख्याल, अपने लिये मौत का कारण बन जाता है !" वतन ने कहा-मेरा सिद्धान्त यह भी है कि अगर सौ नीच व्यक्तियों की मारना हो और एक सच्चा इन्तान भी मारना आवश्यक तो-----"

"छोडो इन बातों को ।" उसने वतनं का रोक दिया ----"यह जलपोत डूबने लगेगा तो मैं स्वयं फैसला कर लूगा कि मुझे क्या करना है फिलहाल तुम मुझे यह बताओ कि इस जलपोत पर क्या करने आये हो ?"

"अपने दोस्त विकास को यहां से निकालने और फिल्में लेने जो इस समय तुम्हारे कब्जे मैं है ।"

--"'मुझे दुख है कि इनमें से तुम्हारा कोई भी ख्वाब पूरां नहीं होगा ।"

"और मुझे दुख है कि तुम्हारा लोटे जैसा शरीर मुझे रोक नहीं सकेगा !"

कहने को वतन ने कह तो दिया, किन्तु प्रतिक्रियास्वरू� � उसने जब हबानची का चेहरा देखा, जो किसी शुगरमिल के बायलर की तरह तप रहा था । नेत्र मानो मोटे-मोटे खून के गोले बन गये थे ।

वतन ने उसके चेहरे को एक बिचित्र सी अनुभूती के बीच तनते देखा ।

उसने यह भी देखा कि चारों . . तरफ खडे सैनिक, सतर्क हो गए हैं ।

वतन ने स्थिति को भांपा स्वयं भी सतर्क हुआ और बीला-----"क्या लोटा शब्द अच्छा नहीं लगता तुम्हें ?'"

" कोई फायर नहीं करेगा !" इतनी जोर है चीखा …हवानची कि सम्पूर्ण जलपोत कांपता सा महसूस हुया-------- बहुत नाम सुना है इसका । इसे मैं ही देखूंगा । सुना है विकास के बाद दुनिया का सबसे खतरनाक लडका यही है ।"

मुस्कान थी वतन के होंठों पर, बोला…"तुम शायद हिसा का सहारा लेना.........!"

"मिस्टर वतन !" जैसे शेर की मौत पर शेरनी दहाड उठे------" सुना है कि विकास के बाद, दुनिया के दूसरे खतरनाक लडके तुम हो है चाहूँ तो मेरे एक ही इशारे पर सैकडों गोलियां तुम्हारे शरीर में धंस जायें है"

"कोशिश करके देख लो !" वतन मुस्कराया ।

"कोशिश तो ये है कि मैं तुम्हारा वह खतरनाकपन देखना चाहता हूं !" हवानची गुर्रा उठा--------"तुम पर कोई गोली नहीं चलेगी । मेरे अलावा कोई तुम पर किसी प्रकार का हमला नहीं करेगा मुझसे बचना है तुम्हें यह देखना है कि यह लोटा ...........!"

और अपनी बात बीच में ही छोड़कर नाटा हवानची उछल पड़ा । ठीक इस तरह, मानो उसके पैरों में स्प्रिंग लगे हो । ठीक किसी कबूतर की भांति हवा में कलाबाजियाँ खाता हुआ वह वतन के ऊपर पहुंचा और अपनी दोनों टागों का वतन के चेहरे पर इतना तेज प्रहार किया उसने कि वतन के कंठ से चीख निकल गई ।

हवा में उछलकर वतन दूर जा गिरा । आँखों से चश्मा उतरकर गिर गया था !

दूसरे ही पल उठा सिंगही का वह शिष्य तो उसने देखा--------

ठीक उसके सामने बडी-बड़ी आँखों से आग उगल रहा था हवानची !

वतन की नीली झील-सी गहरी आंखों में पानी तैर रहा था ।

स्थिर से नेत्रों से उसने हवानची को देखा और बोला----"मुझे मेरे सिद्धांत के दूसरे पहलू पर आने के लिये विवश न करो हवानची !"

किन्तु उसकी बात का जबाव अपनी जुबान से देने के मूड में नहीं था हैवानची ।

सचमुच उसका शरीर किसी बिना पेंदी के लौटे को तरह जमीन पर लुढ़का और कब वह जोक की तरह आकर वतन की टांगों से चिपट गया, यह स्वयं वतन भी न जान सका !

उसे तो इस बात का आभास उस समय हुआ, जब बह धड़ाम से गिरा !
 
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