और अगर किया भी तो यात्रियों को एक और कमाल देखने का अवसर मिल जाएगा ।
विमान लगातार दो घंटे तक हवा में चकराता क्या फिर एक पहाडी पर लैंड कर गया ।
चालक-कक्ष से बाहर निकलकर टुम्बकटू बाहर आया ।
यात्रियो कै चेहरे पुन: सफेद पड़ गए, लेकिन टुम्बकटू ने उन्हें बाकायदा सम्मान देते हुए कहा…"शाहबानों, आपका खादिम दरख्वास्त करता है कि आप लोग यहीं पर उतर जाएं I”
बस, यही तो यात्रियों के मन की बात थी । वे किसी भी प्रकार इस मुसीबत से पीछा छुड़ाना चाहते थे । टुम्बकटू ने सीढी लगा दी और सारे यात्री एकदम एक-दूसरे से पहले उतरने के लिए दरवाजे की ओर लपके । तभी...
"अनुशासन सबसे बडी चीज है I” टुम्बकटू ने कहा…“लाइन बनाकर उतरो ।"
टुम्बकटू ने कहा और लाइन एकदम बन गई! देखते ही देखते सारे यात्री बिमान से बाहर आ गए I विमान की सीडी ऊपर खिंची और दरवाजा बंद हो गया । उनके देखते-ही देखते विमान हवा में उठ गया ।
यात्री हवा में अपने से दूर होते हुए विमान को देखते रहे और जिस अनुपात में विमान दूर होता चला गया उसी अनुपात में यात्रियों से मौत का भय घटता गया । मौत उनसे दूर होती जा रही थी I
उन्हे इस बात की चिंता नहीं थी किं उन्हें कहां छोड़ दिया गया है । अब यहां पहाडियों मेँ भटकने से क्या होगा? जबिक उन्हें इस बात की खुशी थी कि साक्षात मौत उनके बिल्कुल पास होकर गुजर गई है I
वे जानते थे कि किसी भी शहर तक पहुंचने मेँ उन्हें काफी परेशानियां उठानी पडेगी, लेकिन ये वे अच्छी तरह जान चुके थे कि दुनिया में टुम्बकटू से बडी परेशानी कोई नहीं है । फिलहाल वे खुद को आजाद-सा पा रहे थे ।
फिनिश
“तो प्यारे दिलजले, हुआ यूं कि हफ्ते से जो कुतिया पाली थी वो साली एक चूहे के इश्क में इतनी पागल हो गई कि कहने लगी शादी करूंगी तो उसी चूहे से करूंगी वरना सारा जीबन क्वारी ही बिता दूंगी ।" विजय ने विकास को अपनी बात में उलझाते हुए कहा…"अब प्यारे, तुम ही बताओ, हम इस बात को कैसे स्वीकार कर लेते! पहली बात तो ये कि भारत में दहेज विरोधी आंदोलन चल रहा है और इसके बावजूद भी चूहे मियां की मांग थी कि वह दहेज में एक रेलगाडी अवश्य लेगा l खैर, उसकी ये मांग भी हम खिलौने वाली रेलगाडी देकर पूरी करते तो समस्या ये आई कि अगर हमने कुतिया की शादी चूहे से कर दी तो पैदा क्या होगा? इसके अलावा हमे अपने पडोसी के उस कुत्ते का भी ख्याल था जो हमारी कुतिया से प्रेम करता था और उसने कसम खाई थी कि जिस दिन हमारी कुतिया की डोली उठेगी उसी दिन उसका जनाजा उठेगा ।"
"फिर क्या हुआ गुरु?" बिकास ने इस प्रकार पूछा मानो विजय उसे बहुत काम की बात बता रहा है ।
"होना क्या था प्यारे दिलजले I” बिजय बोला…"हम साले कुतिया के गार्जियन थे, हमने कुतिया से साफ़ कह दिया कि ये शादी किसी भी कीमत पर नही हो सकती, लेकिन ये इश्क का रोग बडा खराब है मियां I साले दोनों बालिग थे यानी क्रोर्ट में शादी करके रहने लगे I”
"आपने क्या किया?"
"हम क्या करते-सोचा है इस बार चूहा पालेंगे I”
"गुरु I” विकास बोला…"'इस यात्रा पर निकले हमें पांच दिन गुज़र गए हैं और इन पांच दिनों मेँ आपने मेरा भेजा खाली कर दिया है । अब वह जगह आने वाली है जो हमारो मंजिल है, मैं गोताखोरी की पोशाक पहनकर समुद्र मेँ जा रहा हू और टुम्बकटू के यान को ढूंढ़ता हूं।”
"तो प्यारे, क्यों न गुरु…चेले साथ-साथ चले?”
"मीठी-मीठी बातों से मुझें चमका देने की कोशिश मत करो, गुरु I" विकास बोला-“आपको याद होना चाहिए कि आपने मुझसे वादा किया है कि इस केस मेँ आप किसी प्रकार की मेरी सहायता नहीं करोगे I मैं अकेला ही जाऊंगा I”
"लेकिन मियां, हम यहां क्या मटर भुनाएंगे?"
“आप यहां बैठकर झकझकियां बनाओ, गुरु I" कहकर बिकास उस कक्ष से बाहर निकल गया ।
"यानी गुरु का बंटाधार I” विजय चिल्लाया और चेयर पर अघलेटी सी स्थिति में जाने क्या-क्या ऊटपटांग झकझकी गाने लगा । एकाएक उसकी कैची की भांति चलती जुबान पर एकदम ब्रेक लग गए । उसके ठीक सामने एक आदमकद शीशा था I
उसने ध्यान से शीशे में खुद को देखा और फिर ठीक किसी लडकी की भांति शरमाकर बोला…"मैं कितना हसीन हू।” फिर उसने झुकी-सी गर्दन ऊपर उठाई और पुनः बोला---""प्यारे विजय ये क्या ऊटपटांग करते हो , अगर कोई देखेगा तो क्या कहेगा ?
कुछ काम करना चाहिए l” खुद से खुद ही कहकर उसने कक्ष में अंधेरा कर दिया । इसके पश्चात उसने प्रोजेक्टर पर एक फिल्म चढा दी, उसी समय कक्ष में बिकास प्रविष्ट हुआ बोला…"क्या बात है गुरु, ये अंधेरा क्यो कर लिया?”
"यार दिलजले, आखिर पिक्चर देखने का शोक हमें भी तो चर्राता है ।" कहने के साथ ही बिजय ने प्रोजेक्टर चालू कर दिया । प्रोजेक्टर के सामने एक पर्दा था । प्रोजेक्टर पर फिल्म चलने लगी l कमरे में हत्का-सा प्रकाश हो गया । बिकास भी प्रोजेक्टर के करीब आकर ध्यान से पर्दे पर देखने लगा । फिल्म तेजी से चलती हुई दो मिनट में खत्म हो गई, अब केवल प्रोजेक्टर के बल्ब का प्रकाश पर्दे पर पड़ रहा था ।
"यार दिलजले ।” बिजय बोला…“साली क्या बक्वास फिल्म है । टिकट के पैसे भी बेकार गए । कोई रोमांटिक गाना तो है ही नहीं I”
"समय कम है गुरु I” विकास गम्भीरता के स्वर में बोला…“जरा फिल्म के एक-एक सीन को अच्छी तरह देखने दो ।" कहते हुए उसने कक्ष की लाइट आंन करके प्रोजेक्टर से फिल्म निकाली और उसे सीधी करके पुन: प्रोजेक्टर पर चढा दी I कमरे में अंधेरा करने के बाद उसने पुन: फिल्म स्टार्ट कर दी । विकास ने फिल्म के पहले ही सीन पर प्रोजेक्टर की गति स्थिर कर दी । पहला ही दृश्य प्रोजेक्टर पर स्थित होकर रह गया I
इस दृश्य में पानी में डूबा हुआ एक विचित्र-सा बेहद विशाल अंतरिक्ष यान नजर आ रहा था । पांच कोनों वाला ये यान पानी मे पड़ा था ।
बैसे इस आकृति से कोई समझ नहीं सकता था कि ये यान है, बिजय और विकास अगर उसे यूं ही देखते हो उसे सागर में डूबी हुई कोई चट्टान ही समझते लेकिन वे टुम्बकटू की सारी फिल्मों क्रो कई बार देख चुके थे । उनमें एक फिल्म ऐसी थी जिस पर चारों तरफ फिल्मों के दृश्यों के बारे में स्पष्ट लिखा हुआ था । उसी फिल्म को पढने के बाद वे जाने ये कि आकृति चंद्रमा के मेक अंतरिक्षयान की है । दृश्य पर्दे पर स्थिर था और विजय और विकास पर्दे के करीब पहुच गए ।
"तो प्यारे ये है वो यान जिसके जरिए ये कार्टून चंद्रमा से धरती पर उतर आया । विजय बोला-“ये है वो भानुमति का पिटारा जिसमें इतने-इतने बिभिन्न रहस्य छुपे हुए है I” एक स्थान पर उंगली रखकर बोला-*और ये है उस अलीबाबा के खजाने का दरवाजा I”
"अब देखना है गुरु कि आखिर टुम्बकटू के पास वो कौन-सी बिचित्र वस्तु है । जिसके बारे में वह यह कहा करता है कि अगर मानव ने वह वस्तु प्राप्त कर ली तो मानव भगवान पर बिजय पा लेगा I" कहने के साथ ही वह पुन: प्रोजेक्टर के करीब वापस आ गया ।
इसके बाद उसने फिल्म के एक दृश्य क्रो बड़े ध्यान से देखा । फिल्म की समाप्ति पर वह बोला…"अब मैं चलता हूं गुरू l”
"जाने वाले को आज तक कोई नहीं रोक सका प्यारे, हम क्या रोकेंगे? "
"ये बात बहुत पुरानी है गुरु, लेकिन फिर भी गलत है I”
बिकास मोहक ढंग से मुस्कराता हुआ बोला--'"सुना है सत्यवान के लिए भगवान के घर से बुलावा आ गया था लेकिन फिर भी जाते हुए सत्यवान को सावित्री ने रोक लिया था I"
"तो प्यारे, ना तो तुम सत्यवान हो और ना ही हम सावित्री हैं अर्थात् तुम्हें हम रोक नहीं सकते ।"
"ये बात तीसरी है गुरु ।" कहकर विकास पुन: कक्ष से बाहर चला गया । बिजय ऊंट की तरह मुंह ऊपर उठाए जुगाली-सी करता रहा ।
पांच मिनट पश्चात ही बिकास के जिस्म पर गोताखोरी की पोशाक थी । उसके सिर पर एक हैट था, हैट के अग्रिम . भाग में एक शक्तिशाली टॉर्च थी । टॉर्च में एक मझरगन पीठ पर आक्सीजन से भरा गेस सिलेंडर यानी पूरी तरह गोताखोर बनकर वह कक्ष से बाहर आया ।