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चोदने को मिली तो चोद दी।

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Guest
चोदने को मिली तो चोद दी।

दोस्तो नमस्कार, मैं आपका दोस्त राज आज एक बार फिर से आप सबके लिए एक मस्त मादक कहानी ले कर आया हूँ।

जो मुझे जानते हैं उन्हें पता है कि मैं चूत का कितना रसिया हूँ, चूत देखते ही बस उसको खा जाने की तमन्ना एकदम से दिल में उभर पड़ती है।

मैंने आज तक चुदाई करते हुए यह नहीं देखा, सोचा कि चूत किसकी है। बस अगर चोदने को मिली तो चोद दी।

अपने परिवार में मैंने ऐसा कभी नहीं किया पर रिश्तेदारी में मैंने कभी इस बारे में सोचा नहीं।

यही कारण है कि मैं अपनी रिश्तेदारी में कई हसीन चूतों का मज़ा ले चुका हूँ और आज भी जो मिल जाए चोदने को तैयार रहता हूँ। ऊपर वाले की दया से कभी चूत के लिए नहीं तरसा हूँ।

चलो अब आज की कहानी की बात करते हैं।

कुछ दिन पहले की बात है, मैं अपने बिज़नस के सिलसिले में आगरा जा रहा था। मुझे आगरा में लगभग एक हफ्ते का काम था।

जब मेरे एक दोस्त को पता चला कि मैं आगरा जा रहा हूँ तो वो मेरे पास आया और मुझे कुछ सामान देते हुए बोला- आगरा में मेरी बुआ जी रहते हैं, प्लीज ये सामान उन्हें दे देना।

मैंने वो सामान अपने दोस्त से ले लिया और उसी रात आगरा के लिए निकल पड़ा।

आगरा में मैं होटल में रहने वाला था।

सुबह सुबह आगरा पहुँच कर मैंने एक दो होटल देखे पर कुछ समझ नहीं आया।

फिर सोचा कि पहले दोस्त का सामान ही दे आता हूँ, दोस्त की बुआ के यहाँ चाय पीकर फिर आराम से होटल देखते हैं।

बस फिर मैंने अपनी गाड़ी दोस्त के बताये एड्रेस की तरफ घुमा दी।

दस मिनट के बाद मैं दोस्त के बताये पते के सामने था।

मैंने बेल बजाई तो कुछ देर बाद एक लगभग पैंतीस चालीस की उम्र की भरे भरे शरीर वाली औरत ने दरवाजा खोला।

मैंने अपने दोस्त का नाम बताया और बताया कि उसने अपनी आरती बुआ के लिए कुछ सामान भेजा है।

तो वो बोली- मैं ही आरती हूँ, आप अंदर आ जाइए!

जैसे ही वो मुड़ कर अन्दर की तरफ चली तो उसकी मटकती गांड देख कर मेरे लंड ने एकदम से सलामी दी। आखिर ठहरा चूत का रसिया।

वैसे मेरे दोस्त की बुआ जिसका नाम आरती था, थी भी बहुत मस्त औरत… पूरा भरा भरा शरीर, मस्त बड़ी बड़ी चूचियाँ जो उसके सीने की शोभा बढ़ा रही थी, हल्का सा उठा हुआ पेट जोर पतली कमर के साथ मिलकर शरीर की जियोग्राफी को खूबसूरत बना रहा था, उसके नीचे मस्त गोल गोल मटकी जैसे थोड़ा बाहर को निकले हुए कुल्हे जो उसकी गांड की खूबसूरती को चार चाँद लगा रहे थे।

आप भी सोच रहे होंगे कि शरीर की इतनी तारीफ़ कर दी, चेहरे की खूबसूरती के बारे में एक भी शब्द नही लिखा।

अजी, इतने खूबसूरत बदन को देखने में इतना खो गया था कि चेहरे की तरफ तो निगाह गई ही नहीं।

खैर जब अन्दर पहुंचे तो आरती बुआ ने मुझे बैठने के लिए कहा तो मेरी नजर उनके चेहरे पर पड़ी।

जब बदन इतना खूबसूरत था तो चेहरा तो खूबसूरत होना ही था।

रंग जरूर थोड़ा गेहुआ था पर चेहरे की बनावट और खूबसूरती में कोई कमी नहीं थी, ऐसी खूबसूरती की देखने वाला देखता रह जाए। कमजोर लंड वालो का तो देख कर ही पानी टपक पड़े।

मुझे बैठा कर आरती बुआ रसोई में चली गई और कुछ देर बाद चाय और नाश्ता लेकर वापिस आई।

जब से आया था तब से मुझे घर में आरती बुआ के सिवा कोई भी नजर नहीं आया था।

अभी तो सुबह के लगभग नौ बजे का समय था और बुआ अकेली थी।

नाश्ता करते समय बुआ मेरे सामने ही बैठ गई और दोस्त की फॅमिली के बारे में बात करने लगी।

मुझे आये लगभग आधा घंटा हो चुका था, अब मुझे वहाँ से निकलना था, आखिर होटल भी तो देखना था हफ्ता भर रुकने के लिए। बुआ की खूबसूरती को देखते हुए मैं इतना खो गया था कि मेरा मन ही नहीं कर रहा था वहां से जाने का… पर जाना तो था ही!

कहते हैं ना भगवान अपने भक्तों की बहुत परीक्षा लेता है… पर यह भी सच है कि कमीनों की बहुत जल्दी सुनता है।

यही कुछ मेरे साथ भी हुआ।

जब चलने लगा तो बुआ ने पूछा कि कितने दिन के लिए आये और कहाँ रुक रहे हो?

तो मैंने बोल दिया- अभी एक हफ्ता रुकूँगा और अभी जाकर कोई होटल देखूँगा रुकने के लिए।

‘अरे… होटल में क्यूँ… तुम्हारे दोस्त की बुआ का घर है तो होटल में क्यों रुकोगे?’

‘नहीं बुआ जी, मेरा काम कुछ ऐसा है कि रात को देर सवेर तक काम करना पड़ता है और घर पर रहकर आप लोगों को तकलीफ होगी, होटल ही ठीक है।’

‘तुम ठीक हो, बुआ भी कहते हो और बुआ की बात भी नहीं मानते… मुझे कोई तकलीफ नहीं होगी तुम्हारे यहाँ रहने से, उल्टा मुझे कंपनी मिल जायेगी तुम्हारे यहाँ रहने से!’

‘वो कैसे..?’

‘तुम्हारे फूफा जी एक महीने के लिए सिंगापुर गये हुए हैं, उनका कोस्मटिक का काम है ना, तो घर पर सिर्फ मैं और मेरी ननद ही है… तुम्हारे यहाँ रहने से हम अकेली औरतें भी सेफ महसूस करेंगी।’

‘पर…मैं…’

‘राज बेटा जैसा मेरे लिए विकास (मेरा दोस्त, जिसकी आरती बुआ लगती थी) वैसे तुम… अगर तुम हमारे पास रुकोगे तो हमें ख़ुशी होगी… बाकी तुम्हारी मर्जी!’ आरती बुआ ने थोड़ा सा मायूसी भरी आवाज में कहा तो मैं रुकने के लिए राज़ी हो गया।
 
सच कहूँ तो मेरे अन्दर का कमीनापन जागने लगा था, दिमाग में बार बार आ रहा था कि अगर पास रहेंगे तो शायद आरती जैसी खूबसूरत बला की जवानी का रसपान करने का मौका मिल जाए।

वैसे आरती बुआ ने अपनी ननद का जिक्र भी किया था पर वो इस समय घर पर नहीं थी।

दो दो चूत घर पर अकेली मिले तो कमीनापन कैसे ना जाग जाए।

मैंने गाड़ी में से अपना सामान निकाला और अन्दर ले आया।

बुआ ने मेरे लिए एक कमरा खोल दिया जिसका एक दरवाजा बाहर की तरफ भी खुलता था।

मैंने सामान रख लिया तो बुआ ने एक चाबी मुझे दी और बोली- देर सवेर जब भी आओ, यह दरवाजा खोल कर तुम आ सकते हो। जब तक यहाँ हो, इसे अपना ही घर समझो।

बिजनेसमैन हर चीज का हिसाब लगा लेता है। यहाँ रहने से कम से कम दस हजार तो होटल के बच रहे थे और फिर घर जैसा खाना होटल में थोड़े ही नसीब होता है।

फिर होटल में अगर चूत का इंतजाम करता तो पैसा खर्च करना पड़ता पर यहाँ अगर आरती बुआ से बात बन गई तो चूत भी फ्री में और अगर ननद की भी मिल गई तो एक्स्ट्रा बोनस।

मैंने अपना सामान कमरे में रखा ही था कि आरती बुआ आई, बोली- नहाना हो तो दरवाजे से निकलते ही बाथरूम है।

नहाना तो था ही, रात भर के सफ़र की थकान जो उतारनी थी, मैं आरती बुआ के साथ गया तो बुआ ने बाथरूम दिखा दिया।

बाथरूम का दरवाजा कमरे में तो नहीं था पर था कमरे से बिल्कुल लगता हुआ।

मैंने बैग में से अपने कपड़े और तौलिया निकाला और नहाने के लिए बाथरूम में घुस गया।

बाथरूम में घुसते ही पहले फ्रेश हुआ फिर कपड़े निकाल कर नहाने लगा।

नहाने के बाद जब कपड़े पहनने लगा तो देखा कि अंडरवियर तो बैग में ही रह गया है।

जो पहना हुआ था वो गीला हो चुका था।

घर पर होता तो आवाज लगा कर मांग लेता पर यहाँ तो आवाज भी नहीं लगा सकता था।

मैंने तौलिया लपेटा और जल्दी से कमरे में घुस गया।

कमरे में घुसा तो देखा कि एक अट्ठारह बीस साल की लड़की पौंछा लगा रही थी, मैं उसको देख कर चौंक गया और वो मुझे देख कर!

वो हतप्रभ सी मेरी ओर देख रही थी और मैं उसे!

अचानक उसने शर्मा कर अपना मुँह दूसरी और फेर लिया।

उसके मुँह फेरने के बाद मुझे कुछ होश आया तो देखा कि मेरा तौलिया खुल कर मेरे पाँव में पड़ा था और मैं नंगा खड़ा था उस लड़की के सामने।

लंड तना हुआ तो नहीं था पर हल्की हल्की औकात में जरूर था।

मैंने हाथ में पकड़े हुए कपड़े बेड पर फेंके और झुक कर अपना तौलिया उठाया।

वो लड़की हँसती हुए मेरे पास से निकल कर बाहर चली गई।

क्या यह आरती बुआ की ननद है?

मैं सोच रहा था।

पर वो आरती बुआ की ननद नहीं थी बल्कि वो घर पर झाड़ू पौंछा करने वाली थी।

नाम पहले मैंने नहीं पूछा था पर बाद में आरती बुआ ने बताया था, उसका नाम शबनम था पर सब उसको शब्बो कहते थे।

तीसरी चूत… सोच कर ही लंड अंगड़ाइयाँ लेने लगा था, उसे समझ में आ रहा था कि तीन में से एक आध चूत तो जरूर उसको मिलने वाली थी अगले पाँच-सात दिन में।

तीन तीन चूतों के बारे में सोच सोच कर ही लंड करवटें लेने लगा था।

तीसरी चूत वाली के अभी दर्शन नहीं हुए थे पर उम्मीद थी की वो भी मस्त ही होगी।

मैं तैयार हुआ और अपने काम पर निकल गया।

काम करते करते मार्किट में ही मुझे शाम के पांच बज गए, मुझे खाली हाथ वापिस जाना अच्छा नहीं लग रहा था सो मैंने कुछ मिठाई और फल ले लिए।

गाड़ी की पार्किंग के पास ही एक फूल वाला बैठा हुआ था तो बिना कुछ सोचे समझे ही मैंने एक छोटा सा गुलाब के फूलों का बुके भी ले लिया।

छ: बजे वापिस आरती बुआ के घर पहुँचा।

घण्टी बजाई तो दरवाजा एक तेईस-चौबीस साल की लड़की ने खोला, चेहरा खूबसूरत था तो मेरी नजरें उसके चेहरे पर चिपक गई।

अभी वो या मैं कुछ बोलते कि आरती बुआ आ गई और मुझे देखते ही बोली- तुम आ गए राज!

उस लड़की ने बुआ की तरफ मुड़ कर देखा तो आरती बुआ ने मेरा परिचय करवाया।

यह लड़की आरती बुआ की ननद थी, नाम था दिव्या!

उन्होंने मुझे अन्दर आने के लिए कहा तो मैं उनके पीछे पीछे अन्दर आ गया।

मैंने फल और मिठाई मेज पर रखी तो बुआ ने उसके लिए थैंक यू बोला।

मैं सोफे पर बैठ गया तो दिव्या मेरे लिए पानी लेकर आई।
 
जब वो मेरे सामने से मुझे पानी दे रही थी यही वो क्षण था जब मैंने दिव्या को ध्यान से देखा।

दिव्या का कद तो कुछ ज्यादा नहीं था पर उसके पतले से शरीर पर जो चूची रूपी पहाड़ियाँ बनी हुई थी वो किसी की भी जान हलक में अटकाने के लिए काफी थी। उसकी कसी हुई टाइट टी-शर्ट में ब्रा में कसी चूचियों की गोलाइयाँ अपने खूबसूरत आकर को प्रदर्शित कर रही थी। पतला सा पेट और साइज़ के साथ मेल खाते मस्त कूल्हे… अगर कद को छोड़ दिया जाए तो कुल मिलाकर मस्त क़यामत थी।

बुआ और मैं बैठे घर परिवार की बातों में मस्त थे तभी दिव्या चाय बना कर ले आई और हम तीनों बैठ कर चाय पीने लगे।

मैंने दिव्या से बात शुरू करने के लिए पूछा- आप क्या करती हैं दिव्या जी?

‘दिव्या जी… राज जी, आप मुझे सिर्फ दिव्या कहो तो मुझे ज्यादा अच्छा लगेगा।’

‘सॉरी फिर तो तुम्हें भी मुझे राज ही कहना पड़ेगा… राज जी नहीं!’

तभी बुआ भी बोल पड़ी- फिर ठीक है, तुम मुझे भी आरती कह कर बुलाओगे, बुआ जी नहीं… बुआ जी सुनकर ऐसा लगता है जैसे मैं बूढ़ी हो गई हूँ!’ कहकर आरती बुआ… सॉरी आरती हँस दी, साथ में हम भी हँस पड़े।

कुछ देर की बातों में दिव्या और आरती मुझसे घुलमिल गई थी।

कुछ देर बातें करने के बाद मैं अपने रूम में चला गया और फिर चेंज करने के बाद तौलिया लेकर बाथरूम में घुस गया।

बाथरूम में जाकर नहाया और लोअर और बनियान पहन कर जैसे ही मैं अपने रूम में आया तो दिव्या कमरे में थी। उसका कुछ सामान उस कमरे में था जिसे वो लेने आई थी।

इतनी चूतों का मज़ा लेने के बाद मुझे यह तो अच्छे से पता है कि कोई भी लड़की या औरत सबसे ज्यादा खुश सिर्फ अपनी तारीफ़ सुनकर होती है।

जैसे ही दिव्या अपना सामान लेकर कमरे से जाने लगी तो मैंने बड़े प्यार से दिव्या को बोल दिया- दिव्या.. अगर बुरा ना मानो तो एक बात बोलूँ?

‘क्या?’

‘तुम बहुत खूबसूरत हो… मैंने आज तक तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की नहीं देखी।’

‘हट… झूठे…’

‘सच में दिव्या… झूठ नहीं बोल रहा.. तुम सच में बहुत खूबसूरत हो!’

‘ओके… तारीफ के लिए शुक्रिया… अब जल्दी से तैयार होकर आ जाईये… भाभी ने खाना तैयार कर लिया होगा।’ कह कर दिव्या एक कातिल सी स्माइल देते हुए कमरे से बाहर निकल गई।

दिव्या की स्माइल से मुझे इतना तो समझ आ चुका था कि अगर कोशिश की जाए तो दिव्या जल्दी ही मेरे लंड के नीचे आ सकती है। पर आरती भी है घर में… थोड़ा देखभाल कर आगे बढ़ना होगा।

अभी सिर्फ आठ बजे थे और इतनी जल्दी मुझे खाना खाने की आदत नहीं थी, मैंने अपना लैपटॉप खोला और दिन में किये काम की रिपोर्ट तैयार करने लगा।

कुछ देर काम करने के बाद मुझे बोरियत सी महसूस होने लगी तो मैंने लैपटॉप पर एक ब्लू फिल्म चला ली और आवाज बंद करके देखने लगा।

ब्लूफिल्म देखने से मेरे लंड महाराज लोअर में तम्बू बना कर खड़े हो गए। मुझे ब्लूफिल्म की हीरोइन आरती बुआ सी नजर आने लगी थी।

अचानक मेरे मुँह से निकला- हाय… आरती बुआ क्या मस्त माल हो तुम..

और यही वो क्षण था जब आरती बुआ ने कमरे में कदम रखा।

आरती बुआ को कमरे में देख मैं थोड़ा घबरा गया, मैंने जल्दी से लैपटॉप बंद किया और आरती की तरफ देखने लगा।

‘राज… कहाँ मस्त हो… कब से आवाज लगा रही हूँ… खाना तैयार है आ जाओ..’

‘वो बुआ… सॉरी आरती… मुझे जरा लेट खाने की आदत है तो बस इसीलिए..’

‘चलो कोई बात नहीं कल से लेट बना लिया करेंगे पर आज तो तैयार है तो आज तो जल्दी ही खा लेते है नहीं तो ठंडा हो जाएगा।’

‘ओके… आप चलिए मैं आता हूँ।’

जैसे ही आरती वापिस जाने के लिए मुड़ी मैं खड़ा होकर अपने लंड को लोअर में एडजस्ट करने लगा और तभी आरती मेरी तरफ पलटी। मेरा लंड लोअर में तन कर खड़ा था, आरती हैरानी से मेरी तरफ देख रही थी।

मैंने उसकी नजरों का पीछा किया तो वो मेरे लंड को ही देख रही थी जो अपने विकराल रूप में लोअर में कैद था।

वो बिना कुछ बोले ही कमरे से बाहर निकल गई। मैं थोड़ा घबरा गया था कि कहीं वो बुरा ना मान जाए।

पर मेरे अनुभव के हिसाब से बुरा मानने के चांस कम थे।

मैं अपने लंड को शांत कर लगभग पाँच मिनट के बाद बाहर आया तो टेबल पर खाना लग चुका था और वो दोनों मेरा इंतजार कर रही थी। वो दोनों टेबल के एक तरफ बैठी थी तो मैं टेबल के दूसरी तरफ जाकर बैठ गया।

दिव्या एक खुले से गले की टी-शर्ट पहने हुई थी और आरती अभी भी साड़ी पहने हुए थी।

जैसे ही मैं अपनी जगह पर बैठा तो दिव्या उठ कर सब्जी वगैरा मेरी प्लेट में डालने लगी।

क्यूंकि वो मेज के दूसरी तरफ थी तो उसको ये सब थोड़ा झुक कर करना पड़ रहा था, झुकने के कारण उसके खुले गले में से उसकी मस्त गोरी गोरी चूचियाँ भरपूर नजर आ रही थी।

उसने नीचे ब्रा नहीं पहनी थी, इस कारण उसकी चूचियों का मेरी आँखों के सामने भरपूर प्रदर्शन हो रहा था। ऐसी मस्त चूचियां देखते ही मेरे लंड ने फिर से करवट ली और लोअर में तम्बू बन गया।
 
तभी मेरी नजर आरती पर पड़ी तो झेंप गया क्योंकि वो मेरी सारी हरकत को एकटक देख रही थी।

दिव्या मेरी प्लेट में खाना डालने के बाद अपनी जगह पर बैठ गई और फिर हम तीनों खाना खाने लगे।

खाना खाते खाते मैंने कई बार नोटिस किया कि आरती बार बार मेरी तरफ देख देख कर मुस्कुरा रही थी, उसके होंठों पर एक मुस्कान स्पष्ट नजर आ रही थी।

पर उस मुस्कान का मतलब समझना अभी मुश्किल था।

आज मेरा पहला ही दिन था और जल्दबाजी काम बिगाड़ भी सकती थी।

खाना खाने के बाद मैं उठ कर सोफे पर बैठ गया और टीवी देखने लगा, दिव्या और आरती रसोई में थी।

तभी दिव्या एक प्लेट में आगरे का मशहूर पेठा रख कर ले आई और बिलकुल मेरे सामने आकर खड़ी हो गई।

मेरी नजर टीवी से हट कर दिव्या पर पड़ी तो आँखें उस नज़ारे पर चिपक गई जो दिव्या मुझे दिखा रही थी।

वो प्लेट लेकर बिलकुल मेरे सामने झुकी हुई थी और उसकी ढीली सी टी-शर्ट के गले में से उसकी नंगी चूचियों के भरपूर दर्शन हो रहे थे।

मैं तो मिठाई लेना ही भूल गया और एकटक उसकी गोरी गोरी चूचियों को देखने लगा।

‘राज बाबू… कहाँ खो गए… मुँह मीठा कीजिये ना..’

दिव्या की बात सुन मैं थोड़ा सकपका गया- दिव्या… समझ नहीं आ रहा कि कौन सी मिठाई खाऊँ?

‘मतलब?’

‘कुछ नहीं…’ कह कर मैंने एक टुकड़ा उठा लिया और दिव्या को थैंक यू बोला।

दिव्या ने भी एक टुकड़ा उठाया और मेरे मुँह में देते हुए बोली- यू आर वेलकम!

और हँसते हुए वहाँ से चली गई।

हरा सिग्नल मिल चुका था पर आरती का थोड़ा डर था। डरने की आदत तो थी ही नहीं पर थोड़ा सावधानी भी जरूरी थी।

कहते हैं ना सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी।

करीब आधे घंटे तक मैं अकेला बैठा टीवी देखता रहा, फिर आरती और दिव्या दोनों ही कमरे में वापिस आ गई।

आरती मेरे सामने वाले सोफे पर बैठ गई पर दिव्या आकर मेरे वाले सोफे पर मुझ से चिपक कर बैठ गई।

हम सब इधर उधर की बातें करने लगे पर बीच बीच में कई बार मैंने महसूस किया की शायद दिव्या जानबूझ कर अपने बूब्स मेरी कोहनी से टच कर रही थी… गुदाज चूचों के स्पर्श से मेरे लंड महाराज की हालत खराब होने लगी थी।

कुछ देर बातें करने के बाद आरती उठ कर अपने कमरे में जाने लगी और उसने दिव्या को भी आवाज देकर अपने साथ चलने को कहा। दिव्या ने कहा भी कि उसे अभी टीवी देखना है पर आरती ने उसे अन्दर चल कर बेडरूम में टीवी देखने को कहा और फिर वो दोनों कमरे में चली गई।

मैं अब अकेला बोर होने लगा तो मैं भी उठ कर पहले बाथरूम गया और फिर अपने कमरे में घुस गया, लैपटॉप पर कुछ देर काम किया फिर ब्लू फिल्म देखने लगा।

मुझे रात को बहुत प्यास लगती है, अपने घर में तो मैं सोते समय पहले से ही एक जग पानी का भर कर रख लेता हूँ। पर यहाँ मैं आरती या दिव्या को पानी के लिए कहना ही भूल गया था।

कुछ देर सोचता रहा कि आरती या दिव्या को आवाज दूँ फिर सोचा की खुद ही रसोई में जाकर ले लेता हूँ।

मैं उठा और कमरे से बाहर निकला और रसोई की तरफ चल दिया।

आरती के कमरे की लाइट अभी तक जल रही थी, सोचा कि दिव्या टीवी देख रही होगी। पर चूत के प्यासे लंड की तमन्ना हुई कि सोने से पहले एक बार उन हसीनाओं के थोड़े दर्शन कर लिए जाएँ ताकि रूम में उनको याद करके मुठ मार सकूँ। बिना मुठ मारे तो नीद भी नहीं आने वाली थी।

रूम के दरवाजे पर जाकर अन्दर झाँका तो अन्दर का नजारा कुछ अलग ही था, दीवार पर लगी स्क्रीन पर एक ब्लूफिल्म चल रही थी। मैं तो हैरान रह गया।

जब नजर बेड पर गई तो मेरे लंड ने एकदम से करवट ली, आरती बेड पर नंगी लेटी हुई थी और दिव्या भी सिर्फ पेंटी पहन कर बुआ के बगल में बैठी हुई थी।

बुआ अपने हाथों से अपनी चूचियां मसल रही थी और दिव्या एक हाथ से अपनी चूचियाँ दबा रही थी, दूसरे से बुआ की नंगी चूत सहला रही थी।

दोनों का ध्यान स्क्रीन पर था।

मेरे कदम तो जैसे वहीं चिपक गये थे।

वो दोनों बहुत धीमी आवाज में बातें कर रही थी, मैंने बहुत ध्यान लगा कर सुना तो कुछ समझ आया- दिव्या… मसल दे यार… निकाल दे पानी…

‘मसल तो रही हूँ भाभी…’

‘जरा जोर से मसल… कुछ तो गर्मी निकले…’

‘भाभी… हाथ से भी कभी गर्मी निकलती है… तुम्हारी चूत की गर्मी तो भाई का लंड ही निकाल सकता है!’ कह कर दिव्या हँसने लगी।

‘तुम्हारे भाई की तो बात ही मत करो… बहनचोद महीना महीना भर तो हाथ नहीं लगाता मुझे… और जब लगाता भी है तो दो मिनट में ठंडा होकर सो जाता है..’

‘ओह्ह्ह्ह… इसका मतलब मेरी भाभी जवानी की आग में जल रही है…’

‘हाँ दिव्या… कभी कभी तो रात रात भर जाग कर चूत मसलती रहती हूँ… तुझे भी तो इसीलिए अपने पास रखा है कि तू ही अपने भाई की कुछ कमी पूरी कर दे।’

‘भाई की कमी मैं कैसे पूरी कर सकती हूँ… मेरे पास कौन सा लंड है भाई की तरह…’ दिव्या खिलखिलाकर हँस पड़ी।

‘अरे लंड नहीं है तो क्या हुआ… तू जो चूत को चाट कर मेरा पानी निकाल देती है, उससे ही बहुत मन हल्का हो जाता है।’

‘भाभी… जो काम लंड का है, वो लंड ही पूरा कर सकता है, जीभ से तो बस पानी निकाल सकते हैं, चुदाई तो लंड से ही होती है।’

‘तू बड़ी समझदार हो गई है… पर तेरा भाई तो अब एक महीने से पहले आने वाला नहीं है, तो लंड कहाँ से लाऊं?’

‘किसी को पटा लो…’

‘हट… मैं तेरे भाई से बेवफाई नहीं कर सकती… आजकल नहीं चोदते है तो क्या हुआ… पहले तो मेरे बदन का पोर पोर ढीला कर दिया करते थे… बहुत प्यार करते हैं वो मुझे!’

‘भाभी एक बात कहूँ…’

‘हाँ बोलो मेरी रानी..’

भाभी… तुम्हारे साथ ये सब करते करते मेरी चूत में बहुत खुजली होने लगती है… तुम तो बहुत चुद चुकी हो पर मेरी चूत ने तो बस तुम्हारी उंगली का ही मज़ा लिया है अब तक… मेरी चूत को अब लंड चाहिए वो भी असली वाला!’

‘अच्छा जी… मेरी बन्नो रानी को अब लंड चाहिए… आने दे तेरे भाई को… तेरी शादी का इंतजाम करवाती हूँ।’

‘भाभी अगर बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ…’

‘हाँ बोलो..’

आरती बुआ और उसकी ननद दिव्या नंगी होकर लेस्बीयन सेक्स कर रही थी, दिव्या अपनी भाभी की चूत में उंगली करते हुए अपने लिए लंड की ख्वाहिश जाहिर कर रही थी।

‘ये जो राज आया हुआ है…’

‘हाँ… तो..’

‘आपने गौर किया… कितना बड़ा लंड है उसका?’

‘अरे… तुमने कब देख लिया उसका लंड…’

‘देखा नहीं है भाभी… जब वो बाथरूम से नहा कर बाहर आया था तो उसके लोअर में तम्बू बना हुआ था बस उसी से अंदाजा लगाया किबहुत लम्बा और मोटा लंड होगा उसके लोअर के अन्दर…’

‘हाँ… देखा तो मैंने भी है… पर तेरा इरादा क्या है?’

‘इरादा अभी तक तो नेक ही है… सोच रही हूँ की अपनी भाभी की जलती सुलगती चूत को राज के लंड से ठण्डा करवा दूँ… मेरी भी रोज रोज की मेहनत कम हो जायेगी…’

‘कमीनी… मैं सब समझती हूँ… तू किसकी चूत को ठंडा करवाना चाहती है…’

‘तो इसमें बुरा क्या है भाभी… ऐसे तड़प तड़प के जीना भी कोई जीना है?’

‘दिव्या वो मेरे भतीजे का दोस्त है… वो क्या सोचेगा हमारे बारे में…’

‘अरे भाभीजान… मर्द है वो… और जहाँ तक मुझे पता है सारे मर्द चूत के गुलाम होते हैं… चूत देखते ही सब भूल जाते हैं।’

‘अच्छा… तेरी चूत में अगर इतनी ही आग लगी है तो तू अपनी चूत चुदवा ले… मैं ये सब नहीं कर सकती!’

‘पर भाभी मैंने आज तक लंड नहीं लिया है… पहली बार लेने में डर लग रहा है… अगर तुम मदद करोगी तो मैं भी जन्नत के मजे ले लूँगी।’

‘ना बाबा ना… मुझे तो डर भी लगता है और शर्म भी आती है ये सब सोचते हुए भी…’

‘अच्छा जी… अपनी ननद से चूत चटवा कर, चूत में उंगली करवा के मज़ा लेती हो तब तो शर्म नहीं आती?’

‘मेरी बन्नो… लगता है तेरी चूत का दाना कुछ ज्यादा ही फुदक रहा है जो राज के लंड को खाने के लिए तड़प रही है?’

‘भाभी… सच में जब से राज के लोअर में खड़े लंड का अहसास हुआ है, तब से चूत पानी पानी हो रही है।’

‘चल अब बातें छोड़ और मेरी चूत का पानी निकाल… कल सुबह कोशिश करना राज को पटाने की… अगर वो मान गया तो चूत चुदवा लेना… मुझे कोई ऐतराज नहीं!’

‘मेरी अच्छी भाभी…’ कहकर नंगी दिव्या नंगी आरती से लिपट गई और फिर वो दोनों अधूरा काम पूरा करने में व्यस्त हो गई।

मैं भी चुपचाप अपने कमरे में आया और एक बार जोरदार मुठ मारी और फिर सुबह का इंतज़ार करते हुए सो गया।

अगले दिन सुबह आरती ने मुझे उठाया, आँख खुली तो वो मेरे सामने खड़ी थी चाय का कप लेकर…

आरती को देखते ही रात का नजारा एक दम से आखों के सामने घूम गया, मन में तो आया कि पकड़ कर अभी चोद दूँ पर जब आग उधर भी लगी थी तो मैंने पहल करना सही नहीं समझा।

आरती नहा कर तैयार होकर आई थी, बढ़िया सा परफ्यूम लगाया हुआ था, बदन महक रहा था आरती का… मुझे खुद पर काबू करना मुश्किल हो रहा था।

आरती चाय मेरे हाथ में पकड़ा कर जाने लगी तो मैंने तारीफ़ करते हुए बोल ही दिया– आरती क्या बात है… आज तो सुबह सुबह ही तैयार हो गई?

‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं है… मैं तो हर रोज सुबह सुबह ही तैयार हो जाती हूँ।’

‘वैसे एक बात कहूँ… बहुत खूबसूरत लग रही हो!’

आरती ने कोई जवाब नहीं दिया बस एक स्माइल दे कर वो कमरे से बाहर चली गई।
 
घड़ी देखी तो दस बजने वाले थे, क्लाइंट ने ग्यारह बजे का समय दिया था, मैं जल्दी से उठा और तौलिया लेकर बाथरूम की तरफ भागा।

जैसे ही बाथरूम के पास पहुँचा, तभी दिव्या बाथरूम से बाहर निकली, मुझे देख कर उसने एक सेक्सी सी स्माइल दी और चली गई।

नहाने के बाद याद आया कि मैं आज भी अंडरवियर कमरे में ही भूल गया था पर अब शर्माने की जरूरत नहीं थी बल्कि आरती और दिव्या को कुछ दिखाने की जरुरत थी।

मैंने बनियान पहनी और तौलिया लपेट कर ही बाथरूम से बाहर आ गया।

दिव्या रसोई में थी और आरती बाथरूम के सामने बनी एक अलमारी में से कुछ सामान निकाल रही थी।

जैसे ही मैं बाथरूम से बाहर आया, दरवाजे की आवाज सुनकर आरती का ध्यान मेरी तरफ हुआ, तभी मैंने जानबूझ कर अपने हाथ में पकड़े हुए कपड़े नीचे गिरा दिए।

आरती मेरे पास आकर मेरे कपड़े उठाने लगी। उसी समय मैं भी कपड़े उठाने के लिए नीचे बैठा।

यही वो क्षण था जब मेरे तौलिये ने मेरे बदन का साथ छोड़ दिया, मेरा साढ़े सात इंच का लम्बा और लगभग तीन इंच का मोटा लंड एकदम से आरती के सामने सलामी देने लगा।

मैं जल्दी से उठा तो तौलिया नीचे गिर गया, लंड अब बिलकुल आरती के मुँह के सामने था।

मैंने सॉरी बोलते हुए जल्दी से तौलिया उठाया और भाग कर कमरे में चला गया।

मैंने अपना काम कर दिया था, अब जो भी होना था वो आरती या दिव्या की तरफ से होना था।

कमरे में जाकर मैं तैयार हुआ, तभी दिव्या कमरे में आई और मुझे नाश्ते के लिए बुलाने लगी।

बाहर आया तो मैंने देखा आरती और दिव्या टेबल पर बैठे मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे।

मैं सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया और चुपचाप नाश्ता करने लगा। आरती मुझे ही घूरे जा रही थी जबकि दिव्या बिना इधर उधर देखे नाश्ता कर रही थी।

नाश्ता करने के बाद दिव्या बर्तन उठा कर रसोई में चली गई।

मैंने मौका देखा और आरती को देखते हुए बोला– आरती… जो कुछ भी हुआ मैं उसके लिए शर्मिंदा हूँ… तभी मैं होटल में रुकने को बोल रहा था। अगर तुम बुरा ना मानो तो मैं आज किसी होटल में चला जाता हूँ।

‘अरे राज… तुम इतना परेशान क्यूँ हो रहे हो… हो जाता है ऐसा कभी कभी… और हाँ… कहीं जाने की जरूरत नहीं है… जब तक आगरा में हो, तब तक तुम हमारे साथ ही रहोगे… समझे…’ बोलकर आरती ने एक कातिलाना स्माइल दी।

मैं तो खुद भी यही चाहता था, मैंने अपना लैपटॉप उठाया और फिर घर से निकल गया।

क्लाइंट से मिलने के बाद मैं लगभग एक बजे फ्री हो गया। वैसे तो मुझे एक दो और क्लाइंट्स से मिलना था पर चूत के रसिया को अब चूत नजर आने लगी थी तो सोचा कि अब बाकी काम शाम को करेंगे।

मैंने गाड़ी उठाई और वापिस घर की तरफ चल पड़ा।

रास्ते में से मैंने कुछ खाने पीने का सामान लिया और दस मिनट के बाद ही मैं आरती के घर के सामने था, दरवाजे पर पहुँच कर डोर-बेल बजाई।

दरवाजा आरती ने खोला, अभी तक वो सुबह की तरह ही महक रही थी- अरे राज आज तो बड़ी जल्दी आ गए?

‘वो क्लाइंट ने शाम को मिलने का समय दिया है तो सोचा कि घर ही चल पड़ता हूँ… कहाँ शाम तक भटकता फिरूँगा।’

‘यह तुमने बहुत अच्छा किया… मैं भी अकेली बोर हो रही थी… खाना खाओगे?’

‘नहीं आरती… वो जिस क्लाइंट के पास गया था उसने बहुत कुछ खिला दिया… खाना खाने का बिल्कुल भी मन नहीं है।’

‘ओके जैसी तुम्हारी मर्जी… भूख लगे तो बता देना..’

‘दिव्या… कहाँ है?’

‘वो अपने कॉलेज गई है… चार बजे तक आएगी।’ बोलकर आरती रसोई में चली गई।

मैं कुछ देर तो वहीं बैठा रहा फिर उठकर कमरे में चला गया, जाकर मैंने अपने कपड़े बदले और एक टी-शर्ट और लोअर डाल कर वापिस बाहर आकर बैठ गया।

तभी आरती ट्रे में दो गिलास जूस के लेकर आ गई।

जब उसने मेरे सामने झुक कर मुझे गिलास पकड़ाया तो मन किया कि अभी आरती के चूचे पकड़ लूँ।

‘आरती एक बात पूछूँ?’

‘अरे.. पूछो ना..’

‘सुबह वाली बात का तुम्हें बुरा तो नहीं लगा?’

‘नहीं यार… तुमने कौन सा जानबूझ कर कुछ किया था… फिर तुम तो घर के ही हो…’

थोड़ी देर चुप रही पर मैंने महसूस किया कि मेरे सुबह वाली बात शुरू करने से आरती थोड़ा अलग रंग में आने लगी थी।

‘सच कहूँ मुझे तो बहुत शर्म आई जब देखा कि मैं तुम्हारे सामने बिल्कुल नंगा खड़ा हूँ…’

फिर भी आरती कुछ नहीं बोली पर उसकी आँखें उसके मन का राज खोल रही थी जिनमे मुझे थोड़ा थोड़ा वासना के डोरे नजर आने लगे थे।

‘आरती… तुमने तो मुझे बिल्कुल नंगा देख लिया…’ मैंने आरती की आँखों में झांकते हुए कहा।

‘राज… प्लीज कुछ और बात करो ना…’

‘और क्या बात करूं आरती… झूठ नहीं बोलूँगा… जब से मैं आगरा आया हूँ तुम्हारी खूबसूरती का दीवाना सा हो गया हूँ!’

आरती चुप रही।

‘सच कहता हूँ आरती… अगर तुम मेरे दोस्त की बुआ ना होती तो मैं कब का तुम्हें अपनी दोस्ती का ऑफर कर चुका होता।’

‘रहने दो रहने दो… अब इतना भी मत चढ़ाओ मुझे… मुझे जमीन पर ही रहने दो!’

‘आरती… एक बात पूछूँ?’

‘हाँ पूछो..’

‘आपके पति आपसे इतने इतने दिन दूर रहते हैं… दिल लग जाता है तुम्हारा?’ मैंने आरती की दुखती रग को छेड़ा।

आरती मेरी बात सुनकर कुछ चुप सी हो गई, उसके चेहरे के भाव उसके दिल का हाल बयाँ कर रहे थे।

वैसे तो मैं उसके दिल का हाल रात को ही जान गया था।

मैं उठा और आरती के पास जाकर बैठ गया, मेरे बैठते ही आरती उठ कर जाने लगी तो मैंने बिना अंजाम की परवाह किये आरती का हाथ पकड़ लिया।

आरती अपना हाथ छुड़वाने की कोशिश करने लगी तो मैंने थोड़ा जोर लगा कर आरती को अपनी तरफ खींचा तो वो कटे पेड़ की तरह मेरे ऊपर गिर गई।

मैंने उसको सँभालते हुए उसकी कमर में हाथ डाला तो आरती के मुलायम और गुदाज बदन के एहसास ने मेरे दिल में हलचल पैदा कर दी।

आरती ने उठने की कोशिश की तो मैंने उसको कसके पकड़ लिया, उसकी बड़ी बड़ी चूचियाँ मेरी छाती पर धंसी जा रही रही थी, उसकी साँसें तेज हो गई थी और दिल की धड़कन स्पष्ट सुनी जा सकती थी।

कुछ देर ऐसे ही पकड़े रहने के बाद मैंने जब पकड़ थोड़ी ढीली की तो वो एकदम से मेरी बाहों में से निकल कर अपने कमरे में भाग गई।

चिंगारी मैंने सुलगा दी थी बस अब आग भड़कने की देर थी।

मैं करीब दो मिनट बाद उठा और आरती के कमरे के पास पहुँच गया, मैंने दरवाजा धकेला तो दरवाजा अन्दर से बंद था, मैंने दरवाजा खटकाया तो आरती ने कोई जवाब नहीं दिया।

मैंने दो तीन बार और जब दरवाजा खटकाया तो आरती ने दरवाजा खोला, दरवाजा खुलने पर जब मैं कमरे में जाने लगा तो आरती ने मुझे रोक दिया- राज… जो तुम चाहते हो, वो नहीं हो सकता… प्लीज मत करो ये सब…

‘आरती… मुझे पता है कि तुम्हें मेरी जरूरत है…’ फिर मैंने उसको रात वाली सारी बात बता दी।

मेरी बात सुनकर वो सुन्न रह गई, वो भौंचक्की सी मेरी तरफ देखने लगी, यही वो पल थे जब मैंने आरती को अपनी बाहों में ले लिया और अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए।

मेरी पकड़ से छूटने की आरती ने एक नाकाम सी कोशिश की और फिर उसने समर्पण कर दिया और मेरी बाहों में समा गई। मेरी तो जैसे मुराद ही पूरी हो गई थी।
 
मैं आरती को चूमते चूमते उसे बेड तक ले गया और फिर हल्का सा धक्का देकर आरती को बेड पर लेटा दिया। आरती के लेटते ही मैं भी आरती पर छा गया, आरती ने भी अपनी बाहें फैलाकर मेरा स्वागत किया, मेरे दोनों हाथ आरती की मस्त तनी हुई चूचियों का मर्दन करने लगे और होंठ कभी आरती के होंठ, कभी गाल, कभी कान की लटकन तो कभी सुराहीदार गर्दन पर घूम रहे थे।

आरती की आँखें बंद थी और मुँह से मादक सिसकारियां निकलने लगी थी।

मैंने आरती के कपड़े उतारने शुरू किये तो उसने मुझे रोकने की कोशिश की पर इतना हो जाने के बाद भी कोई रुक सकता है क्या…

फिर मैं तो ठहरा चूत का रसिया… अगले ही कुछ पलों में वो सिर्फ पैंटी में थी।

आरती का नंगा बदन देख कर लंड फड़क उठा था मेरा। मैंने भी बिना देर किये अपने सारे कपड़े उतारे और आरती के सर के पास जाकर लंड को आरती के गालों से स्पर्श किया।

लंड की गर्मी महसूस होते ही आरती ने आँखें खोली और जब उसकी नजर मेरे लंड पर पड़ी तो उसने झट से लंड को अपने कोमल कोमल हाथों में पकड़ लिया- ‘राज… क्या खिलाते हो अपने इस हथियार को… मस्त पहलवान लग रहा है?

‘मेरी जान… ये तो तुम्हारे खूबसूरत जिस्म को देख कर ख़ुशी से फ़ूला हुआ है…’

‘सच में बहुत बड़ा है… मेरे पति के लंड से भी बड़ा…’

‘अब से यह तुम्हारा है आरती!’

मेरा ऐसा कहते ही आरती ने बिल्कुल भी देर नहीं की और झट से लंड को मुँह में भर लिया, लंड को लोलीपॉप बना कर चूसने लगी। आरती इतना मस्त चूस रही थी कि मेरी सिसकारियां निकलने लगी थी।

मेरा हाथ अब आरती की पैंटी में घुस कर आरती की चूत का जायजा ले रहा था।

क्लीन शेव चूत पर हाथ लगते ही लंड और जोश में आ गया, मैंने बिल्कुल भी देर नहीं की और आरती की पैंटी भी उसके बदन से अलग कर दी।

गुलाबी चूत को देखते ही मेरे मुँह से लार टपकने लगी और मैंने लंड को आरती के मुँह से निकाले बिना ही अपने होंठ आरती की चूत पर रख दिए।

आरती की चूत पानी पानी हो रही थी, मेरी जीभ के स्पर्श से आरती उछल पड़ी और उसने अपनी टाँगें खोल दी।

टांगें खुलते ही चूत पूरी खुल कर मेरे सामने आ गई और मैं जीभ को अन्दर घुसा घुसा कर आरती की रसीली चूत चाटने लगा।

कुछ देर बाद आरती की चूत ने और पानी छोड़ दिया, मैंने आरती के मुँह से अपना लंड निकाला और उसकी टांगों के बीच जाकर लंड चूत पर टिका दिया, आरती ने भी गांड उठा कर मेरे लंड का स्वागत किया, मैंने दबाव बनाना शुरू किया तो लंड अन्दर घुसता चला गया।

आखिर खेली खाई चूत थी आरती की… जब करीब तीन इंच लंड घुस गया तो मैंने लंड को बाहर खींचा और एक जोरदार धक्के के साथ पूरा लंड आरती की चूत में उतार दिया।

‘आह्ह्ह… मरररर… गई…’ आरती चिल्लाई- आराम से करो मेरे राजा… जान ही निकाल लोगे क्या अपनी आरती बुआ की?

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और लम्बे लम्बे शॉट लगा कर आरती की चूत चोदने लगा। कमरे में आरती की सिसकारियां गूंज रही थी- आह्ह… ओह्ह… उईईईई… उम्म्म्म.. चोदो… चोदो मेरे राजा… आह्ह्ह… बहुत मज़ा आ रहा है… निकाल दो सारी गर्मी इस निगोड़ी चूत की… उम्म्म्म… बहुत मस्त चोदते हो राजा… मज़ा आ गया!

आरती की बातें मुझे जोश दिला रही थी और मैं भी अपनी गांड का जोर लगाकर उसकी चूत का भोसड़ा बनाने में जुटा हुआ था- हाय.. आरती क्या गर्म चूत है तुम्हारी… मज़ा आ गया…

‘हाँ… हाँ… चोदो मुझे… निकाल दो सारी गर्मी मेरी चूत की… निगोड़ी ने मुझे बेवफ़ा बना दिया…’

मैंने आरती के होंठों पर अपने होंठ रखे और धकाधक आरती की चूत में लंड पेलता रहा।

पाँच मिनट की चुदाई के बाद मैंने आरती को घोड़ी बनाया और पीछे से लंड उसकी चूत में पेल दिया। बेड पर जैसे भूचाल आ गया था।

ना जाने कितनी देर मैंने आरती की चुदाई की। आरती तीन बार झड़ चुकी थी और बुरी तरह से थक गई थी।

अब मेरा लंड भी अपना लावा उगलने को तैयार था, मैंने आरती से पूछा कि कहाँ निकालूँ तो उसने चूत में ही निकालने को कहा।

बस फिर क्या था, मैंने राजधानी की स्पीड से चुदाई शुरू कर दी और एक मिनट के बाद ही गर्म गर्म वीर्य की पिचकारियाँ आरती की चूत में छूटने लगी।

मैं लंड को अन्दर डाले डाले ही आरती के ऊपर लेटा रहा, दोनों की गर्मी शांत हो चुकी थी।

कुछ देर बाद लंड सिकुड़ कर बाहर निकला तो मैं आरती के ऊपर से उठा। आरती ने सीधे होकर पास पड़े एक रुमाल से मेरा लंड और अपनी चूत साफ़ की और फिर खड़े होकर मेरे सीने से लग गई और फिर होंठो से होंठ चिपक गए हम दोनों के।

आरती ने अपने कपड़े पहने और रसोई में चली गई।
 
तभी मेरे भी क्लाइंट का फ़ोन आ गया और मैं भी तैयार होने के लिए कमरे में चला गया।

तैयार होकर आया तो आरती मेरे लिए दूध गर्म करके लाई थी। मैं जाकर सोफे पर बैठा तो आरती आकर मेरी गोद में बैठ गई और मुझे अपने हाथ से दूध पिलाने लगी- राज… आज मैंने पहली बार अपने पति से बेवफाई की है… पर तुम जैसे मर्द से चुद कर मुझे इस बात का बिलकुल भी बुरा नहीं लग रहा है… तुमने आज सच में मुझे जन्नत दिखाई है… तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद…

कहकर आरती ने एक बार फिर अपने होंठ मेरे होंठों से मिला दिए।

‘आरती मैंने भी आज तक तुम्हारे जैसी मस्त औरत नहीं देखी है… धन्यवाद तो मुझे तुम्हारा करना चाहिए!’ मैंने थोड़ा मक्खन लगाते हुए कहा।

आप सब तो जानते ही हो कितना कमीना हूँ मैं।

आरती चुद चुकी थी, अब मेरी नजर दिव्या की चूत पर थी।

पूरी उम्मीद थी कि आज रात दिव्या की चूत भी चुदने वाली थी।

पर अभी काम जरूरी था, मैंने अपना बैग उठाया और क्लाइंट से मिलने चल पड़ा।

कब रात के दस बज गए क्लाइंट से मीटिंग करते करते, पता ही नहीं चला। मीटिंग से फ्री होते ही जब मैंने अपना मोबाइल देखा तो लगभग बीस मिस कॉल तो अकेले आरती की ही थी।

क्लाइंट ने डिनर करके जाने का बहुत अनुरोध किया पर उसे कैसे बताता कि आज मुझे एक कमसिन कुँवारी चूत का डिनर करना है और मुझे खाने से ज्यादा चूत की भूख लगी है।

खैर जल्दी जल्दी घर आया पर फिर भी ग्यारह बज गए थे पहुँचते पहुँचते।

बेल बजाने की जरुरत ही नहीं पड़ी क्यूंकि जैसे ही मैं दरवाजे पर पहुँचा दरवाजा एकदम से खुल गया और सामने आरती और दिव्या दोनों खड़ी थी।

मैंने देर से आने के लिए सॉरी बोला और अपने कमरे में चला गया और जितना जल्दी हो सकता था अपने कपड़े बदल कर वापिस कमरे में आ गया।

आरती ने खाने के लिए पूछा पर मेरा मन नहीं था खाना खाने का तो मना कर दिया, भूख तो चूत की लगी थी।

तभी दिव्या उठ कर चली गई।

मैंने आरती से रात के प्रोग्राम का पूछा तो आरती शर्मा गई और बोली- बस दिव्या के सोने का इंतज़ार है…

‘आरती… कल मैंने सुना दिव्या भी चुदवाने के मूड में है… तो उसको भी शामिल कर लो ना… वैसे भी वो तुमसे पहले ही खुली हुई है।’

‘अरे नहीं… ऐसे कामों में कुछ तो पर्दादारी जरूरी है।’

अब मैं क्या कहता… आरती ने मुझे अपने कमरे में जाने को कहा, वो बोली- मैं दिव्या के सोने के बाद आती हूँ तुम्हारे कमरे में।

मैं उठ कर जाने लगा तो आरती मेरे पास आई और उसने एक जोरदार किस मेरे होंठों पर कर दिया, साथ ही एक हाथ से मेरे लंड को मसल दिया जो आरती के किस करने से अपनी औकात में आने लगा था।

चुपचाप मैं अपने कमरे में चला गया। नींद तो कहाँ आनी थी सो बेड पर लेट कर लैपटॉप चला कर काम करने लगा।

पर मन तो अभी भी आरती की चूत पर ही अटका हुआ था।

रात को करीब दो बजे आरती मेरे कमरे में आई और फिर चुदाई का खेल शुरू हो गया। मैंने उस रात आरती की दो बार चुदाई की और फिर पाँच बजे वो उठ कर अपने कमरे में जाकर सो गई।

सारी रात जागने की वजह से सुबह नींद नहीं खुली, करीब दस बजे दिव्या चाय लेकर कमरे में आई।

रात को आरती की चुदाई के बाद मैंने कपड़े नहीं पहने थे, मैं ऐसे ही चादर ओढ़ कर सोया हुआ था।

दिव्या ने मुझे आवाज दी तो मेरी आँख खुली।

दिव्या ने अचानक मेरी चादर पकड़ कर खींच ली- उठो राज जी… दिन चढ़ आया…

वो बस इतना ही बोल पाई थी क्योंकि जैसे ही उसने मेरी चादर खींची तो उसकी नजर मेरे नंगे बदन पर पड़ी तो वो चौंक गई।

उसने शर्मा कर अपना मुँह घुमा लिया।

मुझे भी अपने नंगेपन का एहसास हुआ तो मैंने जल्दी से चादर अपने ऊपर ले ली।

‘सॉरी!’ मैंने दिव्या से माफ़ी मांगते हुए कहा।

‘आप क्या ऐसे ही सोते हो..’

‘ऐसे ही मतलब?’

‘ऐसे ही मतलब नंगे..’

‘अरे नहीं वो तो रात को गर्मी लग रही थी तो कपड़े उतार दिए थे।’

‘अंडरवियर भी…’ दिव्या ने मेरी तरफ मुड़ते हुए कहा।

उसके होंठो पर मुस्कान तैर रही थी।

उसको मुस्कुराते देख मैंने भी सहज महसूस किया, मैं कुछ बोल नहीं पाया बस मुस्कुरा कर रह गया।

वो मुझे चाय पकड़ा कर बोली– जल्दी से नहा लो.. बहुत देर हो गई है।

मैंने उसके हाथ से चाय ले ली।

जैसे ही वापिस मुड़कर जाने लगी मुझे ना जाने क्या सूझी मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

‘राज जी… मेरा हाथ छोड़ी प्लीज..’

मैंने चाय का कप साइड में मेज पर रखा और दिव्या को अपनी तरफ खींचा तो वो थोड़ा कसमसाते हुए मेरी तरफ खिंचती चली गई। मैंने उसको किस करने की कोशिश की तो उसने हल्का सा प्रतिरोध किया और मेरी पकड़ से छुट कर जाने लगी।

उसको पकड़ने के चक्कर में मेरे बदन की चादर भी मेरे बदन से उतर गई, मैंने नंगे बदन ही दिव्या को पकड़ कर अपनी बाहों में जकड़ लिया और उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके नाजुक नाजुक होंठों पर अपने होंठ टिका दिए।

एक जोरदार किस के बाद जैसे ही मैंने पकड़ थोड़ी ढीली की उसने मुझे धक्का दे दिया और हँसती हुए कमरे से बाहर चली गई।

मैं उठा और बनियान लोअर पहना, तौलिया उठा कर नहाने के लिए बाथरूम की तरफ बढ़ गया।

कमरे से बाहर निकला तो सिर्फ दिव्या ही नजर आई।

मैंने जब उससे आरती के बारे में पूछा तो वो बोली की आरती की तबियत कुछ ठीक नहीं है। इसीलिए वो अभी सो रही है अपने कमरे में।
 
मैंने दिव्या को अपने पास आने को कहा तो वो मुझे ठेंगा दिखा कर रसोई में चली गई।

मैंने भी तौलिया कपड़े सोफे पर फेंके और दिव्या के पीछे पीछे रसोई में घुस गया।

दिव्या मुझे रसोई में देख कर हड़बड़ा गई। इससे पहले वो कोई प्रतिक्रिया करती, मैंने उसको अपनी बाहों में भर लिया।

वो थोड़ा छटपटाई- राज… क्या करते हो… छोड़ो मुझे… भाभी आ जायेगी..

‘पर आरती तो सो रही है… अभी तो तुमने बताया..’

‘प्लीज छोड़ो ना…’ दिव्या ने मिन्नत करते हुए कहा।

‘ओके… छोड़ दूंगा… पर उस से पहले तुम्हें एक किस करनी पड़ेगी मेरे होंठों पर..’

‘नहीं.. मुझे शर्म आती है…’

‘ठीक है तो आ जाने दो आरती को… जब तक किस नहीं करोगी मैं तुम्हे छोड़ने वाला नहीं..’

‘बस एक किस… वादा करो उसके बाद तुम मुझे छोड़ दोगे..’

कहकर दिव्या ने मुझे किस करने की कोशिश की पर उसकी लम्बाई कम होने के कारण वो कर नहीं पा रही थी। मैंने उसको गोद में उठाकर रसोई की स्लैब पर बैठाया और अपने होंठ उसके सामने कर दिए।

दिव्या ने थोड़ा शर्माते हुए मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए।मैंने भी एक हाथ उसकी कमर पर रखा और उसको किस करते हुए दूसरे हाथ से उसकी कड़क चूची को पकड़ कर हल्के से मसल दिया।

चूची पर हाथ लगते ही दिव्या को जैसे करंट सा लगा, उसने मेरी पकड़ से छूटने की कोशिश की पर मैंने उसकी चूची को मसलते हुए ही दोबारा अपने होंठ उसके होंठों से जोड़ दिए।

दिव्या मदहोश होने लगी थी मेरी बाहों में… मैंने धीरे धीरे उसके टॉप को ऊपर उठाना शुरू किया।

दिव्या इतनी मस्त हो चुकी थी कि उसको पता ही नहीं लगा कि कब उसकी चूची नंगी हो गई थी।

मैंने उसके होंठ छोड़े और झुक कर जब उसकी चूची को अपने होंठों में दबाया तो दिव्या मस्ती के मारे सीत्कार उठी।

आज पहली बार उसकी चूची को किसी मर्द ने स्पर्श किया था।

तभी बाहर कुछ हलचल हुई तो हम दोनों जल्दी से एक दूसरे से अलग हुए और दोनों ने अपने कपड़े ठीक किये।

बाहर वाले कमरे में कोई नहीं था।

मैं कपड़े उठाकर सीधा बाथरूम में घुस गया।

जब नहाकर बाहर आया तो आरती सामने ही बैठी थी नाईट सूट में।

‘क्या बात आरती… आज तो बहुत देर तक सोई..’

‘सब तुम्हारी ही मेहरबानी है जनाब… सारी रात तो सोने नहीं दिया.. अब नींद तो देर से खुलनी ही थी।’

तभी दिव्या कमरे में आ गई तो मैं अपने कमरे में घुस गया तैयार होने के लिए।

क्लाइंट के फ़ोन आने शुरू हो गए थे तो मैं जल्दी से तैयार होकर बाहर आया।

दिव्या ने टेबल पर नाश्ता लगा दिया था, मैंने जल्दी से नाश्ता किया और क्लाइंट से मिलने चल पड़ा।

अभी क्लाइंट के पास पहुंचा भी नहीं था कि फ़ोन बज पड़ा। दिव्या का था- बड़े जालिम हो तुम राज…

‘क्यों जी, मैंने क्या किया?’

‘मैंने क्या किया… जानते हो आग लगी पड़ी है बदन में… और तुम हो कि प्यासी छोड़ कर ही चले गए?’

‘मेरी रानी.. मन तो मेरा भी नहीं था… पर क्या करूं… क्लाइंट से मिलना भी जरूरी था और फिर घर पर आरती के रहते कुछ कर भी तो नहीं सकते थे।’

‘जानते हो, मैंने आज सिर्फ तुम्हारे लिए ही कॉलेज से छुट्टी मारी थी… और भाभी को भी अपनी सहेली के घर जाने के लिए मना लिया था पर तुम रुके ही नहीं… बड़े गंदे हो तुम…’

‘अरे अगर ऐसा है तो बस तुम तैयारी करो मैं यूँ आया और यूँ आया!’

‘जल्दी आना राज… बदन जल रहा है मेरा..’

कह कर दिव्या ने फ़ोन काट दिया और मैं भी क्लाइंट के पास पहुँच गया।
 
दो घंटे का काम पंद्रह मिनट में निपटा कर जल्दी से वापिस पहुँच गया।

दिव्या गेट पर ही खड़ी थी, जैसे ही मैं घर के अन्दर घुसा दिव्या आकर मुझसे लिपट गई।

मैंने आरती का पूछा तो उसने बताया कि अपनी सहेली के घर गई है और दो तीन बजे तक आएगी।

मैंने दिव्या को अपनी बाहों में लिया और अपने होंठ तपती तड़पती दिव्या के होंठो पर रख दिए, दिव्या मुझ से लिपटती चली गई। कुछ देर ऐसे ही खड़े खड़े चुम्बन करने के बाद मैंने दिव्या को गोद में उठाया और आरती के बेडरूम में ले गया।

कमरे में घुसते ही मैंने दिव्या को बेड पर लेटाया और उसकी मस्त चूचियों को कपड़े के ऊपर से ही मसलने लगा, दिव्या के हाथ मेरी शर्ट के बटन खोलने में व्यस्त थे।

मैं भी अब दिव्या के नंगे बदन को देखने के लिए बेचैन था, मैंने भी बिना देर किये दिव्या के बदन से कपड़े अलग करने शुरू कर दिए। पहले दिव्या का टॉप उतारा और उसकी गोरी गोरी दूध की टंकियों पर अपने होंठ रख दिए।

दिव्या ने ब्रा नहीं पहनी हुई थी, नंगी चूचियों पर गुलाबी निप्पल बहुत जंच रहे थे।

जब मैंने दिव्या के निप्पल को अपने होंठ में लेकर चुसना और काटना शुरू किये तो दिव्या मचल उठी और सीत्कार करने लगी- आह्ह्ह्ह… उम्म्म…राज्ज… ओह्ह्ह… चूस लो…. राज… आह्ह…

दिव्या ने नीचे इलास्टिक वाला लोअर पहना हुआ था, दिव्या की चूचियों को चूसते चूसते ही मैंने उसके लोअर को भी उसके बदन से अलग कर दिया।

दिव्या ने पैंटी भी नहीं पहनी हुई थी, बिना बालों वाली साफ़ चिकनी चूत पर हाथ लगते ही दिव्या की चूत से टपकते रस से मेरी उंगलियाँ गीली हो गई।

मैंने अपने होंठ नीचे चूचियों से हटाये और सीधा दिव्या की टपकती चूत पर रख दिए।

मेरी जीभ अब दिव्या की कुँवारी चूत के रस का स्वाद ले रही थी। दिव्या भी मेरी जीभ से स्पर्श से अब सातवें आसमान पर थी, उसका बदन बार बार अकड़ रहा था और चूत से निरंतर रस निकल रहा था।

बेशक दिव्या का कद छोटा था पर उसका बदन एकदम सांचे में ढला हुआ था। जब मैं दिव्या की चूत का स्वाद ले रहा था तो दिव्या भी हाथ बढ़ा कर मेरे लंड का जायजा लेने लगी थी।

मैं भी अब कण्ट्रोल नहीं कर पा रहा था, मैंने बिना देर किये अपने सारे कपड़े उतारे और नंगा होकर बेड पर दिव्या के पास लेट गया। जल्दी ही हम 69 की अवस्था में थे, मैं दिव्या की चूत का स्वाद ले रहा था तो दिव्या ने भी मेरे लंड को अपने होंठो में लेकर चूसना और चाटना शुरू कर दिया था।

एकदम लाल लाल गुलाबी चूत और वो भी वर्जिन चूत… लंड की तो आज जैसे लाटरी लग गई थी। चूत के छेद को देख कर पता लग रहा था कि आज लंड को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी।

दिव्या की चूत का छेद बहुत छोटा सा लग रहा था।

कुछ देर ऐसे ही चूत चाटने और लंड चुसवाने के बाद अब मेरा लंड दिव्या की चूत में घुसने को बेचैन हो गया था। चूत मस्त टाइट लग रही थी तो मैंने पास में रखी वेसलिन की डब्बी उठाई और उंगली भर कर वेसलीन दिव्या की चूत पर लगाईं और थोड़ी वेसलीन मैंने अपने लंड के सुपारे पर भी लगा ली।

लंड और चूत को चिकना करने के बाद अब तैयारी थी चूत के मुहूर्त की… मैंने लंड को दिव्या की चूत पर घिसना शुरू किया तो दिव्या ने गांड उठा कर लंड का स्वागत किया- राज… बहुत तड़पा लिया यार… अब देर ना करो, घुसा दो अपना मूसल मेरी चूत में…

मैंने दिव्या की जांघों को मजबूती से पकड़ा और लंड के सुपारे को चूत के मुहाने पर सही से सेट करके थोड़ा दबाव बनाया।

सुपारा जैसे ही अन्दर घुसने लगा और चूत फ़ैलने लगी तो साथ में दिव्या की आँखें भी दर्द से फ़ैलने लगी थी।

मुझे पता लग चुका था कि मुझे पूरा जोर लगाना पड़ेगा।

मैंने थोड़ा सा उचक कर एक धक्का लगाया तो सुपारा चूत का छेदन भेदन करता हुआ चूत में समा गया, दिव्या के मुँह से घुटी हुई सी चीख निकल पड़ी और वो एकदम से ऊपर की तरफ खिसकी- आह्ह्ह ह्ह… राज… बहुत दर्द हो रहा है…
 
मैंने उसकी बात को अनसुना कर दिया और उचक कर पहले से थोड़ा तेज एक और धक्का लगा कर लगभग दो इंच लंड और दिव्या की चूत में सरका दिया।

दिव्या का बदन दर्द के मारे अकड़ गया, उसने अपनी टांगों को मेरी छाती पर अड़ा कर मेरे नीचे से निकलने की कोशिश की पर मैं भी कोई कच्चा खिलाड़ी नहीं था, मैंने झुक कर उसकी चूचियों को अपनी हथेलियों में जकड़ा और उचक कर एक और जोरदार धक्का लगा कर आधा लंड दिव्या की चूत में पेल दिया।

कमरे में दिव्या की जबरदस्त चीख गूंज उठी- राज….. छोड़ दो मुझे…. मुझे नहीं चुदवाना… फट गई मेरी…. प्लीज निकालो बाहर!

दिव्या मेरे नीचे दबी हुई तड़प रही थी, चूत से खून टपकने लगा था, दिव्या दर्द से तड़प रही थी।

मैं कुछ देर के लिए रुका और पहले उसकी आँखों से निकलते आँसू चाटने के बाद अपने होंठ दिव्या के होंठों पर रख दिए।

मेरे रुकने से दिव्या का तड़पना कुछ कम हुआ तो मैंने उसके होंठ छोड़े और उसकी चूची को मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया।

‘राज… मुझे बहुत दर्द हो रहा है… अगर मुझे पता होता कि इतना दर्द होगा तो मैं कभी ना चुदवाती… तुमने तो मेरी फाड़ दी… राज प्लीज निकाल लो…’ दिव्या थोड़ा करहाते हुए बोली।

‘मेरी रानी… जो दर्द होना था, हो लिया! अब तो बस मज़ा ही मजा है मेरी जान..’

मैंने दिव्या की चूची को चूसते चूसते हल्के हल्के लंड को अन्दर बाहर करना शुरू किया और आधे लंड से ही दिव्या की चुदाई करने लगा।

शुरू में तो दिव्या तड़प रही थी पर जब एक दो मिनट तक ऐसे ही हल्की चुदाई होती रही तो उसको भी मजा आने लगा था, अब तो वो भी गांड उठा कर लंड का स्वागत करने लगी थी।

मौका सही था तो मैंने भी धीरे धीरे धक्के ज्यादा अन्दर तक लगाने शुरू किये और आठ दस धक्के में ही पूरा लंड दिव्या की चूत में उतार दिया।

चुदाई अब थोड़ा स्पीड पकड़ने लगी थी, दिव्या भी अब दर्द से तड़पने की बजाय मस्ती में आने लगी थी, कुँवारी टाइट चूत की चुदाई का भरपूर आनन्द आने लगा था अब।

लंड ने धीरे धीरे दिव्या की चूत में अपनी जगह बना ली थी, दिव्या की चूत ने भी अब भरपूर पानी छोड़ दिया था जिससे चूत चिकनी हो गई थी और दिव्या अब मस्ती में गांड उठा उठा कर मेरे लंड का स्वागत कर रही थी।

‘आह्ह… चोदो… राज… बहुत मज़ा आ रहा है… चोदो… जोर से चोदो… फाड़ दो… आईईई.. उम्म्म… चोदो.. मेरे राजा… चोदो… जोर से… और जोर से…’ दिव्या मस्ती में बड़बड़ा रही थी और मैं उसकी टांगों को पकड़े जोर जोर से धक्के लगा कर उसकी चुदाई कर रहा था।

सच कहूँ तो बहुत दिनों बाद.. या यूँ कहो कि महीनों बाद कोई कुँवारी शीलबंद चूत मिली थी। टाइट चूत की चुदाई का मज़ा ही अलग होता है यार… मैं तो एकदम जन्नत का मज़ा ले रहा था।

चुदाई करते हुए लगभग दस मिनट हो चुके थे और दिव्या का बदन अब अकड़ने लगा था, वो झड़ने वाली थी, मैंने धक्कों की स्पीड बढ़ा दी और तभी दिव्या का शरीर कांपने लगा और वो झड़ गई।

झड़ने के बाद दिव्या का शरीर सुस्त पड़ गया पर मेरा अभी नहीं हुआ था, मैंने धक्के लगाना चालू रखा।

कुछ देर सुस्त पड़े रहने के बाद दिव्या फिर से रंग में आने लगी तो मैंने उसको घोड़ी बनाया और लंड पीछे से उसकी चूत में घुसा कर चुदाई शुरू कर दी।

दिव्या बीच बीच में कराह उठती थी पर मैं उसकी मस्त गोरी गांड को अपने हाथों में दबोचे हुए पूरी ताकत से उसकी चुदाई कर रहा था।

अब एहसास होने लगा था कि मेरा भी काम होने वाला है, मैंने झुक कर दिव्या की दोनों चूचियों को अपने हाथो में पकड़ा और घचाघच उसकी चूत में लंड पेलने लगा।

जबर्दस्त चुदाई का यह फायदा हुआ कि अब दिव्या भी दूसरी बार झड़ने को तैयार थी। कोई दो तीन मिनट की चुदाई और चली और फिर दिव्या की चूत से कामरस का झरना फ़ूट पड़ा।

ठीक उसी समय मेरे लंड से भी गर्म गर्म वीर्य की पिचकारियाँ दिव्या की चूत को भरने लगी।

दिव्या धम्म से बेड पर गिर गई और मैं भी उसको दबोचे हुए उसके ऊपर ही ढेर हो गया। लंड अभी भी दिव्या की चूत में ही था और दोनों ही परम सुख का आनन्द ले रहे थे, दोनों ही लम्बी लम्बी साँसें ले रहे थे।

कुछ देर बाद जब लंड सुकड़ कर बाहर निकला तो मैं दिव्या के ऊपर से उठा और उसके बगल में लेट गया। दिव्या ने भी मेरी तरफ करवट ली और मुझ से लिपट गई।
 
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