S
StoryPublisher
Guest
काफी देर तक हम दोनों ऐसे ही एक दूसरे से नंगे बदन लिपटे रहे और फिर दिव्या उठी और पास में पड़े अपने लोअर से उसने मेरा लंड और अपनी चूत साफ़ की।
चूत सूज कर डबल रोटी जैसी हो गई थी।
वो उठ कर बाथरूम की तरफ जाने लगी तो दर्द के मारे करहा उठी और वापिस बेड पर ही बैठ गई- देखो राज… क्या हाल कर दिया तुमने मेरा…
मैं कुछ नहीं बोला बस मुस्कुरा कर रह गया।
‘उठो मेरी मदद करो… मुझे बाथरूम जाना है…’
उसकी बात सुनकर मैं उठा, दिव्या के नंगे बदन को अपनी बाहों में उठाया और बाथरूम में ले गया।
वो बिना कुछ बोले मेरे सामने ही बैठ कर पेशाब करने लगी, पेशाब करने में भी उसे दर्द का एहसास हो रहा था।
पेशाब करके उसने गीज़र से गर्म पानी लेकर अपनी चूत को धोया और फिर मुझे इशारा किया तो मैं उसको उठा कर वापिस कमरे में ले आया।
कमरे में आकर उसने अपने कपड़े पहन लिए तो मैंने भी अपने कपड़े पहन लिए।
मन तो था कि एक बार और चुदाई की जाए पर पहली चुदाई में ही दिव्या की हालत ख़राब हो गई थी, मुझे लगा कि उसे थोड़ी देर आराम कर लेने देना चाहिए।
मैंने अपने बैग में से उसको एक दर्द कम करने वाली गोली दी और दिव्या को किस करके वापिस अपने कमरे में आ गया।
मैं बहुत खुश था। आखिर आगरा का मेरा टूर डबल कामयाब हो रहा था।
मार्किट से आर्डर भी मनचाहा मिल रहा था, होटल का खर्चा भी बच रहा था और सबसे बड़ी बात दो दो चूत लंड के नीचे थी।
दिव्या की चूत चोद कर तो सच में बहुत खुश था, कई महीनों बाद किसी कुँवारी चूत का उद्घाटन किया था।
थोड़ी देर आराम करने के बाद मैं मार्किट के लिए निकल गया, रास्ते में मुझे आरती आती हुई दिखाई दी, मैंने गाड़ी रोकी तो वो आकर गाड़ी में बैठ गई।
गाड़ी में बैठते ही आरती ने जो सवाल किया इससे साफ़ हो गया कि आरती को पता था कि आज दिव्या चुदने वाली है- राज… कहाँ जा रहे हो… दिव्या को ज्यादा तंग तो नहीं किया ना?
बोलते हुए आरती के चेहरे पर एक कातिल सी मुस्कान थी।
मैं क्या जवाब देता, बस मैं भी मुस्कुरा दिया।
आरती ने घर तक छोड़ने को कहा तो मैंने गाड़ी घुमा दी और वापिस घर पहुँच गया। दरवाजा लॉक था, मैं ही जाते हुए लॉक करके गया था।
मैंने चाबी से दरवाजा खोला और अन्दर गए तो दिव्या अभी भी पेट के बल लेटी हुई सो रही थी।
चादर पर दिव्या की चूत से निकले खून और मेरे वीर्य के धब्बे स्पष्ट नजर आ रहे थे।
‘मेरी चूत में क्या कमी थी राज… जो तुमने दिव्या की भी फाड़ डाली…’ कहकर आरती मेरे गले से लिपट गई और उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए।
मेरे हाथ भी आरती की कमर और कूल्हों पर आवारगी करने लगे। हवस दोनों पर हावी होने लगी थी और फिर अगले कुछ ही पलों में हम दोनों के कपड़े जमीन पर पड़े थे और हम दोनों बाहर सोफे पर ही एक दूसरे से लिपटे अपनी कामवासना शांत करने की कोशिश में लगे हुए थे।
मेरे हाथ आरती के नंगे बदन पर घूम रहे थे, कभी उसकी पहाड़ जैसी चूचियों का मर्दन करने लगते तो कभी मेरी उँगलियाँ उसकी चूत की गहराई में समा जाती।
आरती भी कभी मेरे होंठों पर मेरी छाती पर अपने होंठ घुमा रही थी तो कभी मेरे लंड को अपने मुँह में लेकर मुझे जन्नत की सैर करवा रही थी।
कुछ देर ऐसे ही ऊपर से प्यार करने के बाद मैंने आरती को सोफे की बाजू पर लेटाया और लंड चूत पर रख कर जोरदार धक्के के साथ चुदाई का शुभारम्भ किया।
फिर तो कम से कम बीस मिनट तक आसन बदल बदल कर मैं आरती को चोदता रहा और आरती मस्त होकर चुदती रही।
यह तूफ़ान तब रुका जब आरती की चूत का झरना तीन बार झड़ गया और मेरे लंड ने भी गर्म गर्म वीर्य की बौछार आरती की चूत की गहराई में कर दी।
आग शांत हो चुकी थी और जब नजर ऊपर उठी तो दिव्या भी उठ चुकी थी और हम दोनों की रासलीला देख रही थी।
चुदाई करने में हम इतने खो गये थे कि पता ही नहीं चला की कब दिव्या कमरे से बाहर आ गई।
आरती ने उठ कर दिव्या को गले से लगा लिया और दिव्या को पहली चूत चुदाई की मुबारकबाद दी।
तब तक मैंने अपने कपड़े पहन लिए थे।
चूत सूज कर डबल रोटी जैसी हो गई थी।
वो उठ कर बाथरूम की तरफ जाने लगी तो दर्द के मारे करहा उठी और वापिस बेड पर ही बैठ गई- देखो राज… क्या हाल कर दिया तुमने मेरा…
मैं कुछ नहीं बोला बस मुस्कुरा कर रह गया।
‘उठो मेरी मदद करो… मुझे बाथरूम जाना है…’
उसकी बात सुनकर मैं उठा, दिव्या के नंगे बदन को अपनी बाहों में उठाया और बाथरूम में ले गया।
वो बिना कुछ बोले मेरे सामने ही बैठ कर पेशाब करने लगी, पेशाब करने में भी उसे दर्द का एहसास हो रहा था।
पेशाब करके उसने गीज़र से गर्म पानी लेकर अपनी चूत को धोया और फिर मुझे इशारा किया तो मैं उसको उठा कर वापिस कमरे में ले आया।
कमरे में आकर उसने अपने कपड़े पहन लिए तो मैंने भी अपने कपड़े पहन लिए।
मन तो था कि एक बार और चुदाई की जाए पर पहली चुदाई में ही दिव्या की हालत ख़राब हो गई थी, मुझे लगा कि उसे थोड़ी देर आराम कर लेने देना चाहिए।
मैंने अपने बैग में से उसको एक दर्द कम करने वाली गोली दी और दिव्या को किस करके वापिस अपने कमरे में आ गया।
मैं बहुत खुश था। आखिर आगरा का मेरा टूर डबल कामयाब हो रहा था।
मार्किट से आर्डर भी मनचाहा मिल रहा था, होटल का खर्चा भी बच रहा था और सबसे बड़ी बात दो दो चूत लंड के नीचे थी।
दिव्या की चूत चोद कर तो सच में बहुत खुश था, कई महीनों बाद किसी कुँवारी चूत का उद्घाटन किया था।
थोड़ी देर आराम करने के बाद मैं मार्किट के लिए निकल गया, रास्ते में मुझे आरती आती हुई दिखाई दी, मैंने गाड़ी रोकी तो वो आकर गाड़ी में बैठ गई।
गाड़ी में बैठते ही आरती ने जो सवाल किया इससे साफ़ हो गया कि आरती को पता था कि आज दिव्या चुदने वाली है- राज… कहाँ जा रहे हो… दिव्या को ज्यादा तंग तो नहीं किया ना?
बोलते हुए आरती के चेहरे पर एक कातिल सी मुस्कान थी।
मैं क्या जवाब देता, बस मैं भी मुस्कुरा दिया।
आरती ने घर तक छोड़ने को कहा तो मैंने गाड़ी घुमा दी और वापिस घर पहुँच गया। दरवाजा लॉक था, मैं ही जाते हुए लॉक करके गया था।
मैंने चाबी से दरवाजा खोला और अन्दर गए तो दिव्या अभी भी पेट के बल लेटी हुई सो रही थी।
चादर पर दिव्या की चूत से निकले खून और मेरे वीर्य के धब्बे स्पष्ट नजर आ रहे थे।
‘मेरी चूत में क्या कमी थी राज… जो तुमने दिव्या की भी फाड़ डाली…’ कहकर आरती मेरे गले से लिपट गई और उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए।
मेरे हाथ भी आरती की कमर और कूल्हों पर आवारगी करने लगे। हवस दोनों पर हावी होने लगी थी और फिर अगले कुछ ही पलों में हम दोनों के कपड़े जमीन पर पड़े थे और हम दोनों बाहर सोफे पर ही एक दूसरे से लिपटे अपनी कामवासना शांत करने की कोशिश में लगे हुए थे।
मेरे हाथ आरती के नंगे बदन पर घूम रहे थे, कभी उसकी पहाड़ जैसी चूचियों का मर्दन करने लगते तो कभी मेरी उँगलियाँ उसकी चूत की गहराई में समा जाती।
आरती भी कभी मेरे होंठों पर मेरी छाती पर अपने होंठ घुमा रही थी तो कभी मेरे लंड को अपने मुँह में लेकर मुझे जन्नत की सैर करवा रही थी।
कुछ देर ऐसे ही ऊपर से प्यार करने के बाद मैंने आरती को सोफे की बाजू पर लेटाया और लंड चूत पर रख कर जोरदार धक्के के साथ चुदाई का शुभारम्भ किया।
फिर तो कम से कम बीस मिनट तक आसन बदल बदल कर मैं आरती को चोदता रहा और आरती मस्त होकर चुदती रही।
यह तूफ़ान तब रुका जब आरती की चूत का झरना तीन बार झड़ गया और मेरे लंड ने भी गर्म गर्म वीर्य की बौछार आरती की चूत की गहराई में कर दी।
आग शांत हो चुकी थी और जब नजर ऊपर उठी तो दिव्या भी उठ चुकी थी और हम दोनों की रासलीला देख रही थी।
चुदाई करने में हम इतने खो गये थे कि पता ही नहीं चला की कब दिव्या कमरे से बाहर आ गई।
आरती ने उठ कर दिव्या को गले से लगा लिया और दिव्या को पहली चूत चुदाई की मुबारकबाद दी।
तब तक मैंने अपने कपड़े पहन लिए थे।