हेलो दोस्तो आरएसएस पर अपनी मस्ती से भरपूर कहानी लेकर आई हूँ मेरी उम्र 18 साल है. मैं एक आकर्षक युवती हूँ. मेरे परिवार में कुल 4 सदस्य हैं. मेरे मम्मी - पापा. मैं और मेरी छोटी बहन. बहन का नाम सुभांगी है. वह बेहद शरारती किस्म की लड़की है. वह मेरे से 3 साल छोटी है और इसी साल हाइयर सेकेंडरी यानी कि 11थ में गयी है. पर उस'की अदाओं और हर'कतों को देख कोई नहीं कह सक'ता कि यह कॉलेज में नहीं पढ़'ती है. और तो और उसके कयी बाय्फ्रेंड भी हैं. मैं कॉलेज में पढ़ती हूँ, और बी.ए. फाइनल में हूँ. एक दिन मैने देखा कि वो मेरे बाय्फ्रेंड के साथ घूम रही थी और चल'ते समय उसके बदन से चिपकने की कोशिश कर रही थी. मुझे उस पर भी गुस्सा आया और अपने बाय्फ्रेंड पर भी. वैसे तो वो मुझसे प्यार करने का दम भरता था और अब मेरी बहन को ही फसाने की चेष्टा कर रहा है.
उस वक़्त तो मैने उन दोनो को कुच्छ नहीं कहा मगर बाद में जब सुभांगी घर आई तो मैने उसे डाँटने का मन बनाया. मेरा विचार था कि मेरे दोस्त से ज़्यादा दोष सुभांगी का था. क्योंकि सुभांगी ही उससे चिपकने की कोशिश कर रही थी. ज़ाहिर है कि जब सुभांगी जैसी खूबसूरत और फेश्नबल लड़की उसे इतना लिफ्ट देगी तो वो तो उसकी ओर फिसलेगा ही.
मैं सुभांगी के कमरे में जाने वाली थी कि तभी मम्मी ने उसे किसी काम से बाहर भेज दिया. उस वक़्त मैने उसे कुच्छ नहीं कहा. रात को खाने के बाद वो अपने कमरे में चली गयी. मैं अपने कमरे में आ गयी थी. कुच्छ देर बाद उठी और सुभांगी के कमरे के सामने पहुँची तो देखा कमरे का दरवाज़ा खुला छोड़े लेटी हुई थी. उसका हाथ तेज़ी से हिल रहा था. बदन पर चादर डाल रखा था उसने. मैं अंदर चली गयी. उसने मुझे देखा तो एका एक हड़बड़ा कर बोली.
दीदी तुम! उसने अपना हाथ रोक लिया था. मुझे कुच्छ अजीब सा लगा कि आख़िर वो चादर के नीचे अपने हाथ को इतना क्यों हिला रही है. मैं उसके पास बैठी तो वो अपनी टाँगो को ठीक से ढकने का प्रयास करने लगी. उसी वक़्त मैने देख लिया कि उसकी टॅंगो का कुच्छ हिस्सा नंगा था. अब मेरी जिगयासा और भी बढ़ गयी और मैने ये देखने का निश्चय कर लिया कि वो चादर के नीचे क्या कर रही थी. मैं ये भूल ही गयी कि मैं उससे क्या कहने आई थी. मैने कहा.
"क्या कर रही है?"
"क...कू... कुच्छ नहीं दीदी." उसने घबरा कर कहा तो मेरा शक़ और भी बढ़ गया और मैने उसकी टाँगो पर पड़ी चादर को खींचा तो उसने मुझे रोकने की कोशिश की. मैं खींच कर ही मानी. यह देखकर मैं चौंक ही पड़ी कि उसकी कमर से नीचे तक का बदन नंगा था और उसकी चूत में एक बैंगन घुसा पड़ा था. मैं मुस्कुरा कर बोली.
"ओह्ह तो यह कर रही थी, यानी कि चुदाई का नकली मज़ा ले रही थी". जब उसने देखा कि मैं मुस्कुरा रही हूँ तो उसकी भी हिम्मत कुच्छ और बढ़ गयी और उसने कहा.
"क्या करूँ दीदी कोइ लड़का मिलता ही नहीं जिससे चुदाई करवा कर अपने तन मन की प्यास भुझा सकूँ. उसमें बहुत से ख़तरे भी तो हैं. इसीलिए मैने अपने हाथ से ही......" मैं मुस्कुरा दी. उसके पास बैठ गयी. मैं उसकी चूत के अंदर आधे घुसे पड़े बैंगन को पकड़ कर हिलाते हुए बोली.
"इसे तो मैं भी बुरा नहीं मानती. आख़िर लड़के भी तो अपना लंड हाथ में लेकर चुदाई का नकली मज़ा लेते हैं. ऐसे में हम लड़कियाँ मज़ा क्यों ना ले". वो मेरी बात सुनकर और भी मुस्कुराने लगी. उसके मन का डर पूरी तरह ख़तम हो गया था. मैं उसके पास बैठ गयी और चादर को पूरी तरह उसके बदन से हटा ही दिया. उसका निचला बदन काफ़ी सेक्सी था. चूत पर सुनहरे रंग के बाल थे. मैं उसे डांटना पूरी तरह भूल कर अपना हाथ चलाते हुए उसे चुदाई का मज़ा देने लगी. वो बोली.
"दीदी क्या तुम भी इसी तरह का मज़ा लेती हो?"
"हां. कभी कभी. मगर मैं बैंगन की बजाए अपनी चूत में मूली डालना ज़्यादा पसंद करती हूँ. मूली लंबी होती है ना. तो चूत के आख़िरी कोने तक आराम से पहुँच जाती है".
तुमने कभी किसी से चुदाई नहीं करवाई क्या" मैने उसके चहरे की तरफ देखा और कहा .
नहीं. और तुमने?
मैने भी कभी नहीं करवाई. वैसे एक लड़का मेरे साथ चुदाई करना चाहता था. मैं भी चाहती थी. मगर कोइ अच्छी जगह नहीं मिली जहाँ चुदाई कर पाते. आज ही की बात है. उसने स्कूल के टाय्लेट में लेजाकर मेरी चूत को नंगा कर दिया. उसने मेरी चूचियों को भी थोड़ा सा खोल दिया था. उसके बाद उसने अपना लंड निकाल लिया.
उसका मोटा सा लंड देख कर मैं चुदाई करवाने के लिए पूरी तरह उतावली तो हो गयी और उसने लंड को चूत में डालने की कोशिश भी की थी मगर उसका लंड इतना मोटा था और मेरी चूत का सुराख इतना छोटा की बहुत ज़ोर देने के बाद भी उसका लंड मेरी चूत में नहीं जा पाया. ज़्यादा ज़ोर देने लगा तो मुझे दर्द महसूस होने लगा. मारे दर्द के मेरे मूह से चीख निकलने लगी. इसीलिए मैने उसे मना कर दिया. क्योंकि अगर वो ज़बरदस्ती अपना लंड मेरी चूत में घुसा देता तो मेरी चूत फट भी सकती थी. ऐसे में ज़ाहिर था की मुझे बहुत दर्द भी होता और मैं चीखने लगती. उसके लिए मुझे चाहिए थी ऐसी जगह. जहाँ मैं जितना भी चीखून की किसी को पता भी ना चले. मैं उसकी बातें ध्यान से सुन रही थी. बड़ी मज़ेदार लग रही थी उसकी बातें. मैं बेगन को पहले की तरह उसकी चूत के अंदर हिलाते हुए बोली.
"क्या वाकई बहुत मोटा लंड था उसका?"
हां दीदी. इतना मोटा कि मेरी चूत में जा ही नहीं रहा था. इसी से अंदाज़ा लगाइए. लंबा भी बहुत था. करीब 8 या 9 इंच. सुभांगी की बात सुनकर मेरे बदन में ख़ासकर मेरी चूत में भी सुरसूराहट होनी शुरू हो गयी. वैसे तो मैं सुभांगी की छूट में बैंगन डाल कर धक्के मार रही थी. मगर उसकी बातें सुनकर मेरी छूट में गुदगुदी होने लगी थी. मैं सहसा ही कह उठी.
"काश मुझे इतना लंबा और मोटा लंड मिल जाता. फिर तो मैं उसे अपनी चूत में डलवा कर ही दम लेती. चाहे कुच्छ भी हो जाता.
तो दीदी कहो तो मैं उसे किसी दिन घर ले आऊँ. सुभांगी आँख मार कर बोली " हम दोनो को मज़ा आ जाएगा" ना जाने क्या सोच कर मैने मना कर दिया. बोली.
"नहीं रे मैं तो मज़ाक कर रही थी. घर मत लाना. मम्मी को पता चल गया तो........ चुदाई का मज़ा तो हम बैंगन मूली से ही ले लेते हैं". वो चुप हो गयी. मुझे सॉफ लग रहा था कि उसका मन अपने दोस्त के साथ चुदाई का मज़ा लेने का था. मैने कहा.
"तेरा मूड क्यों खराब हो गया. दोस्त को बुलाना चाहती है".
"नहीं दीदी यह बात नहीं है".
"मगर तेरा चहरा तो कह रहा है कि यही बात है". वो मुस्कुरा कर बोली.
"बुलाना तो चाहती हूँ मगर तुम इज़ाज़त दे दो तब".
"ओके! बुला लेना".
"थॅंक्स दीदी. यू आर ग्रेट". वो मेरे बदन से लिपट गयी और मेरे होंठो को चूमने लगी. उसके चुंबन लेने पर मैने भी उसे चूमना शुरू कर दिया. फिर मैं उसकी चूत के अंदर बैंगन को घुसाने लगी तो एकाएक मेरे होंठो को मुक्त करके बोली.
दीदी आज तुम भी नकली चुदाई का मज़ा ले लो ना. अच्छा लगेगा. मैं किचन से मूली ले आउन्गि. मज़ा आ जाएगा".
"ठीक है मगर उससे पहले मैं तुझे मज़ा तो दे दूं". कह कर मैं बैंगन को और भी तेज़ी से उसकी चूत के अंदर बाहर करने लगी. उसे और भी मज़ा आने लगा और उसके मूह से सिसकारी निकलने लगी. उसने मेरी चूची को पकड़ लिया और दबाने लगी. मुझे अच्छा लगा तो मैने कहा.
"अगर तुझे अच्छा लग रहा है तो मेरी चूची को नंगा कर दे." उसने मेरी नाइटी को पकड़ कर ऊपर कर दिया और ब्रा को खोलने लगी तो ज़रा देर के लिए मैने अपने हाथ को रोक लिया और अपनी ब्रा को खुद ही उतारते हुए उसको बोली.
"चाहे तो मूह में लेकर मेरी चूची के निपल को चूसना. मुझे अच्छा लगता है." मैने चूची को नंगा कर दिया तो उसने मेरी चूची को अपने दोनो हाथो में कस लिया और दबाते हुए बोली.
"एक बात पूच्छू दीदी. कभी किसी लड़के ने तुमहरि चूचिको मूह में लिया है या नहीं?" उसकी बात सुनकर मैं आहें भर कर बोली.
"अभी तक तो ऐसा मौका नहीं मिल पाया है. तू बता."
"एक बार मेरे एक बाय्फ्रेंड ने मेरे निपल को मूह में लिया था. और कुच्छ देर तक चूसा था. बड़ा मज़ा आता है दीदी." उसकी बात सुनकर मैं मुस्कुरा कर रह गयी. बोली कुच्छ नहीं क्योंकि मैं अब तक उस मज़े से अंजान ही थी. मैने उसे मेरे निपल को मूह में लेने को कहा तो उसने जल्दी से मेरे निपल को मूह में भर लिया और चूसने लगी. मुझे मज़ा आने लगा और मैं तेज़ी से बैंगन को उसकी चूत में अंदर बाहर करने लगी.
उसके मूह से सीकारियाँ उबल रही थी. मैने उसकी चूत के काफ़ी अंदर कर दिया था बैंगन को. वो भी तेज़ी से मेरी चूची को चूसने लगी. मुझे बेहद आनंद आने लगा. मैने इससे पहले कभी इस प्रकार लेज़्बीयन संबंध का आनंद नहीं लिया था और उसके द्वारा निपल को चूसे जाने पर मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे कोइ प्रेमी ही मेरे निपल को चूस रहा हो. कुच्छ देर बाद वो झड गयी तो उसके मूह से निकल रही सिसकारी में और भी तेज़ी आ गयी और उसने मना कर दिया और रगड़ने के लिए. मैने हाथ को रोक लिया. वो सिसकी लेकर बोली.
"दीदी. अब बैंगन निकाल लो. मैं झड चुकी हूँ." मैने बैंगन बाहर निकाल लिया. वो बोली.
"दीदी बहुत मज़ा आया."
"मुझे भी मज़ा दे दे." मैने कहा तो वो मेरी पैंटी पर हाथ रखकर बोली.
"तो फिर इसे उतारो ना. मैं भी मूली से तुम्हे मस्त कर देती हूँ." मैने सिर्फ़ पैंटी ही नहीं बदन के दूसरे कपड़े भी उतार दिए. उसने मेरी चूत पर हाथ रखा तो मुझे अहसाह हुआ कि मेरी चूत में भी सनसनाहट होने लगी थी और चुदाई की इच्छा बुरी तरह से होने लगी थी. वो चूत को सहलाने लगी. मुझे अच्छा लगने लगा तभी उसने अपनी एक उंगली को मेरी चूत के अंदर कर दिया और इस प्रकार उंगली को अंदर की तरफ धकेलने लगी मानो अंदर की गहराई का अनुमान लगा रही हो. उसके बाद उसने कहा.
"दीदी तुम्हारी चूत तो वाकई बहुत गहरी है. तुम्हे लंबे लंड की ही ज़रूरत है."
"तभी तो तेरे से तेरे दोस्त को लाने को कह रही थी. तभी तो कह रही हूँ कि तू किसी दिन अपने दोस्त को ले आना. मैं भी तो देखूं की उसका लन्ड़ कितना लंबा है."
"उसका लंड तो तुम देख ही लोगि दीदी. अभी यह करू कि मैं किचन से मूली ले आऊँ?"
"ओ यार नेकी और पूच्छ पूच्छ." मैने मुस्कुरा कर कहा तो वो भी मुस्कुरा उठी. फिर उठ कर अपने कपड़े पहनने लगी. कुच्छ देर में ही उसने कपड़े पहन लिए और कमरे से बाहर निकल गयी. मैं झुक कर अपनी चूत को मसल्ने लगी. दिल कर रहा था कि कोइ मर्द आ जाए और मैं उसके लंड को अपनी चूत में समाहित करवा करवा कर चुदाई का मज़ा ले लूँ. मगर ऐसा हो पाना कठिन था. कम से कम आज की तारीख में किसी मर्द के आने की कोइ गुंजाइश नहीं थी. कुच्छ देर में सुभांगी वापस आ गयी. उसके हाथ में मोटी और बहुत लंबी मूली थी. शायद छील कर भी लाई थी क्योंकि कहीं से भी कोइ नुकीला भाग निकला हुआ नहीं था. पूरी तरह चिकना था. वो मेरे पास आ कर बैठ गयी और मूली को मेरी चूत में घुसाने लगी तो मैने कहा.
"चुन कर मूली लाई है. लंबी भी और मोटी भी." वो मुस्कुरा दी. फिर उसने मूली को मेरी चूत में डालते हुए कहा.
"दीदी. तुमहरि चूत के लिए इतनी ही लंबी मूली ठीक है." जब वो अंदर सरकाने लगी तो मैने चूत के होंठो को पकड़ कर चूत को और भी खोल दिया. ऐसा इसलिए किया था ताकि मूली के अंदर जाने से किसी प्रकार की परेशानी ना आए. फिर भी वो इतनी मोटी थी कि अंदर जाते समय मुझे तकलीफ़ होने लगी. मैं सिसकी लेकर बोली.
"धीरे - धीरे घुसा यार. दर्द हो रहा है." वो मुस्कुरा कर बोली.
"दीदी ये मूली थोड़ी मोटी ज़रूर है मगर मैने सुना है कि मोटे लंड से चुदाई करने पर बाद में बहुत मज़ा आता है. वैसे ही इससे चुदाई करने पर तुमको बहुत मज़ा आएगा." मैने मुस्कुरा कर कहा.
"तूने यह बात कहाँ से जानी?"
"मेरी एक सहेली ने बताया था. उसने कयी लड़को से चुद्वाया है, कयी बार. उसी ने मुझे पहली बार बैंगन से चुदाई का मज़ा लेना सिखाया था." मैने कहा.
"लंबे लंड से मज़ा तो आता होगा मगर दर्द भी बहुत होता होगा. जैसे इस समय मुझे हो रहा है." वो मूली को चूत के और भी अंदर कर'ने का प्रयास करते हुए बोली.
"मगर मज़ा भी तो आएगा दीदी." मैं सिसकारी लेने लगी थी. कारण यह था कि मूली ने मेरी चूत की गहराई में प्रवेश कर लिया था. और उसने हाथ को हिलाना प्रारंभ कर दिया था. मैं उसके और भी करीब सरक गयी और उसकी एक चूची को हाथ से पकड़ कर दबाने लगी. उसने तुरंत ही अपनी चूची को नंगा कर लिया. उसके निपल में अभी ठीक से कठोरता नहीं आई थी. कुल ** साल की ही थी. जिसके कारण उसके मम्मे भी पूरी तरह से निकले नहीं थे. मगर उसे पकड़ कर दबाने में मुझे अच्छा लगा. इसका कारण यह था कि मेरी चूत में मूली का आना जाना हो रहा था. इस घर्षण से मुझे आनंद आने लगा और मैं तेज़ी से उसके निपल को चूसने लगी.
कुच्छ देर बाद उसने निपल को छोड़ने को कहा तो मैने उसके निपल को मुक्त कर दिया. उसने मेरी चूत की गहराई में मूली को प्रवेश करा दिया. मैं दर्द से तड़प कर रह गयी. ऐसा लगा जैसे मेरी चूत का कुमारी परदा फट गया हो. किसी प्रकार मैने मूली के धक्के को बर्दाश्त करने का प्रयास किया. वो तेज़ी से मूली को अंदर करने लगी. मुझे आनंद आने लगा था. मगर इतना भी नहीं कि मैं उसे ये कह देती तू जड़ में घुसा दे. एका एक उसी ने कह दिया.
"दीदी कहो तो मैं इस मूली को तुम्हारी चूत की जड़ में पहुँचा दूँ?"
"नहीं रे. ऐसा मत करना. चूत का बुरा हाल हो जाएगा."
"मज़ा भी तो आएगा दीदी." वो मुस्कुरा कर बोली. उसकी बात सुनकर मैं सोचने लगी कि मैं उसे जड़ में पहुँचाने के लिए कह दूं या नहीं. एका एक उसने मेरे मना करने के बावजूद मूली को मेरी चूत की गहराई में घुसा दिया. मैं ज़ोर से उई कर उठी. ऐसा लगा मानो मूली मेरे पेट में प्रवेश कर गयी हो. मैं उसे मना करने लगी कि अब और मत करना मेरा पेट फट जाएगा मगर वो तो पूरी की पूरी मूली अंदर करने के प्रयास में लगी हुई थी.
उसने एक ज़ोरदार झटका मारा और मेरी आँखो के सामने अंधेरा सा छा गया. उस पर गुस्सा आ रहा था कि उसने मेरे मना करने के बाद भी इतना ज़ोर का झटका क्यों मार दिया. मगर जब वो मूली को आगे पीछे करने लगी तो मुझे मज़ा भी आने लगा और मैं उसे कुच्छ और ज़ोर से मूली को अपनी चूत के अंदर बाहर करने को बोली. मूली अब मेरी चूत के अंतिम सिरे को छूने लगी थी. ऐसा आनंद आ रहा था जिसके बारे में केवल कल्पना ही करती थी. लग रहा था कि मोटे लंड से ही आनंद प्राप्त कर रही हूँ. कुच्छ देर बाद मैं झड गयी. उसने हाथ को रोक लिया तो मैं कुच्छ देर तक पड़ी पड़ी गहरी गहरी साँस खींचती रही. वो बोली.
"दीदी कैसा लगा?"
"मज़ा आ गया!". मैं उन्मुक्त कंठ से बोली. वो मुस्कुरा कर बोली
"दीदी अगर मेरा बाय्फ्रेंड हो तो तुम्हे और भी मज़ा आएगा. उसका लंड भी इस मूली जितना ही लंबा है. और सबसे बड़ी बात है उसकी शरारत. वो लड़कियों की चूत को ऐसे चूस्ता है कि लड़कियाँ मस्त हो जाती हैं. जैसे मैं हो गयी थी. काश उस दिन मुझे कम दर्द होता और मैं उसके लंड को आसानी से अपनी चूत में डलवा पाती. उसी दिन मुझे चुदाई का मज़ा मिल जाता.
"हम दोनो मिलकर उसके लंड से चुदाई का मज़ा लेंगे. किसी दिन उसे लेकर आजा तो सही." वो इकरार में सिर हिला कर रह गयी. मैने उठ कर कपड़े पहने और अपने कमरे में चली आई. उसे अपने बाय्फ्रेंड के बारे में मैने पूछा ही नहीं. जिस काम के लिए मैं उसके पास गयी थी. मैने सोचा कि जब वो अपने बाय्फ्रेंड को मुझसे मिलवा रही है तो मैं उसे अपने बाय्फ्रेंड के बारे में क्या कहूँ.
सुभांगी ने तीसरे दिन ही अपना वादा पूरा कर दिया. जिस दिन मम्मी कहीं जाने वाली थी उसी दिन उसने अपने दोस्त को बुलाने का फ़ैसला कर लिया. स्कूल जाने से पहले ही उसने मुझे इशारा कर दिया था कि आज शाम को मैं ख़ास तौर पर घर में ही रहूं. वो सुधीर को अपने साथ लेकर आएगी. मम्मी दोपहर में किसी समय जाने वाली थी. शाम को वो अपने दोस्त के साथ आई. उसके दोस्त को देखते ही मैं समझ गयी कि वो वाकई में आकर्षक है. और उसके बारे में जो भी सुभांगी ने बताया था वो सब सच होगा. कारण यह था कि वो बड़ा ही आकर्षक लड़का था. सुभांगी ने हम दोनो का परिचय करा दिया. उसने काफ़ी खुले मन से मुझसे बात की. कुच्छ देर बाद सुभांगी बोली.
"दीदी मैं चाइ बनाकर लाती हूँ. आप दोनो बातें कीजिए." सुभांगी के जाने के बाद मैने उसकी और मुस्कुराहट भरी निगाहो से देखते हुए कहा.
"मुझे सुभांगी ने तुम्हारे बारे में काफ़ी कुच्छ बताया है." वो झट से बोला.
"और सुभांगी ने मुझे आपके बारे में भी सब कुच्छ बता दिया है." मैं चौंक कर बोली.
"सब कुच्छ?"
"जी हां सब कुच्छ." उसकी मुस्कान कुच्छ और गहरी हो गयी. उसने मेरे मम्मो की ओर घूर कर देखा तो मैं मुस्कुरा कर बोली.
"तो फिर तुम्हारा क्या ख़याल है?
"किस बारे में?"
"मेरे बारे में."
"यह तो परदा हटने के बाद ही पता लगेगा कि अंदर जलवा कैसा है." मैं उसके इशारे वाली इस बात पर मुस्कुरा उठी. मैने कहा.
"परदा हटा कर देख लो कि जलवा कैसा है." कहकर मैने मादक ढंग से अंगड़ाई ली. जैसे मैं खुद भी उसे अपना सब कुच्छ अर्पित करने के लिए तैय्यार हूँ. वो मुस्कुरा दिया उसकी निगाह मेरी चूची पर ही टिकी हुई थी. बोला
"ऊपर से देखने पर तो लग रहा है कि जलवा हसीन ही होगा."
"ऊपर से क्यों. नीचे से भी देख लो." कहकर मैने उसका हाथ पकड़ा और अपनी चूची पर रख दिया. वो मेरी दोनो चूची को पकड़ कर मसल्ने लगा. मैं उसके बदन से लिपट कर उसके होंठो को चूमने लगी. मेरे अंदर इतनी प्यास भरी हुई थी कि उसके द्वारा नंगे किए जाने का इंतेज़ार भी ना कर पाई और मैने खुद ही अपने कपड़े को पकड़ कर ऊपर किया तो उसने हाथ बढाकर मेरी नंगी चूची को पकड़ लिया.
उसने मेरी ब्रा को खोला भी नहीं और उसके ऊपर से ही मेरी चूची को इस तरह मसल्ने लगा कि मैं मस्त होने लगी. उसने हाथ बढ़ा कर मेरी ब्रा की स्ट्रॅप खोल दी और मेरी दोनो मोटी मोटी चूचिया छलक कर बाहर आ गयी. मेर निपल में बहुत कठोरता आ गयी थी. चुदाई के बारे में सोच सोच कर ही मेरे अंदर उत्तेजना का भाव पैदा हो रहा था और उसी भाव के कारण मैने उसे अपनी चूची को चूसने को बोला. उसने निपल को पकड़ कर मसला फिर बोला.
"जलवा तो बड़ा नशीला है."
"अभी तुमने असली जलवा देखा कहाँ है. मैं उसकी बात कर रही हूँ जो मेरी जाँघो के बीच में छुपि हुई तुम्हारे होंठो का स्पर्श पाने को बेकरार हो रही है." वो मुस्कुरा दिया. उसे मेरी ये सेक्सी बात बहुत पसंद आई थी. उसने हाथ नीचे लेजाकर कपड़े के ऊपर से ही मेरी चूत को दबाया. फिर बोला.
"उसका तो मैं जल्द ही चुंबन लूँगा. मगर मेरी भी एक शर्त होगी. तुम्हे भी उसका एक चुंबन लेना होगा जो मेरी पॅंट में फड़फड़ा रहा है." मेरे बदन में सनसनाहट होने लगी. क्योंकि मैं समझ चुकी थी कि उसका इशारा किस ओर था. मगर मैं अंजान बनते हुए बोली.
"किसकी बात कर रहे हो?" "उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपने लंड पर ले गया. एक प्रकार से उसने लंड को मेरे हाथ में थमा दिया था. लंड पूरी तरह अंदर क़ैद होने के बावजूद भी मैं उसकी मौजूदगी का अहसास कर रोमांच से भर गयी. कारण कि मुझे काफ़ी मोटा लंड लगा था. मैं मन ही मन सोचने लगी कि जब यह कपड़े के ऊपर से स्पर्श करने पर ही इतना मज़ेदार लग रहा है तो पूरी तरह नंगा होने पर कैसा लगेगा. वो बोला.
"इसका चुंबन लोगि ना?" मैने कहा.
"इसका चुंबन तो मैं ज़रूर लूँगी. मगर पहले इसका रूप तो दिखाओ. सुभांगी ने इसकी बहुत तारीफ की है." मैं लंड को पकड़ कर टटोलते हुए बोली. वो बोला.
"पहले उसका जलवा तो देख लूँ जो तुम्हारी जाँघो के बीच में छुप कर मेरे होंठो का स्पर्श पाना चाहती है." वो चूत को खोलने लगा तो मैं और भी उत्तेजित होने लगी. उसने मेरी पैंटी तक उतार दी और चूत को देखने के लिए जाँघो पर झुका तो मैने उसे चूत को दिखाने के लिए अपनी जाँघो को और भी अच्छी तरह खोल दिया. उसने मेरी चूत को स्पर्श किया. मेरे दिल में गुदगुदाहट होने लगी. मूह से सिसकारी निकलने लगी. वो चूत को दबा दबा कर छेड़ रहा था. तभी उसने झुक कर चूत का चुंबन लेना चाहा. तभी सुभांगी चाइ लेकर आ गयी. ठिठक कर बोली.
"मैं आ सकती हूँ?" सुधीर चूत को छोड़ कर अलग हट गया. मैं बोली.
"सुधीर पहले किस कर लो मेरी चूत को. उसके बाद चाइ पी लेना." मैने सुभांगी की मौजूदगी को अनदेखा कर दिया. सुधीर ने झट से मेरी चूत को अपने होंठो के बीच में कस लिया और एक गहरा किस लेकर बोला.
"हाई क्या मस्त है." मैं उसके एक ही किस से इस कदर उत्तेजित हो चुकी थी कि मेरे दिल में आया कि मैं उसके लंड को निकाल कर अपने मूह में ले लूँ और जी भर कर चूस लूँ. मगर सुभांगी की मौजूदगी के कारण मैं एक दम से ही अपने मन की बात को अंजाम नहीं दे पाई. उसने चूत को छोड़ दिया था. फिर चाइ पीने लगा. सुभांगी मेरी ओर चाइ का प्याला बढ़ा कर बोली.
"दीदी तब तक तुम भी चाइ पी लो." मुझे इच्छा नहीं हो रही थी. फिर भी मैने चाइ का प्याला थाम लिया. इस दौरान सुभांगी भी अपने कपड़े उतारने लगी. कुच्छ देर में उसने अपने सारे कपड़े उतार दिए और सुधीर के पास जाकर उसके कपड़े उतारने का प्रयास करने लगी. मैने कुच्छ ही देर में चाइ का कप एक ओर रख दिया. इस बीच सुधीर ने भी चाइ का प्याला एक ओर रख दिया था. सुधीर ने जब अपने कपड़े उतारे तो मैं उसका मोटा तगड़ा लंड देख कर हैरानी और खुशी में भर गयी. उसके मोटे लंड को मैं पकड़ने के लिए जैसे ही उसकी ओर बढ़ी सुभांगी ने लपक कर उसका लंड अपने हाथो में ले लिया. अब हम तीनो के बदन पर कोइ कपड़ा नहीं था. मैं भी लंड को पकड़ने का प्रयास करने लगी तो सुभांगी ने कहा.
"दीदी पहले मुझे इसको चूसने दो. बहुत मन कर रहा है."
"मेरा मन तुझसे ज़्यादा मचल रहा है मेरी बहन." मैने उसके हाथ से लंड छीन'ने का प्रयास किया. वो मूह खोल कर लंड पर झुकी तो मैने उसे जल्दी से कहा.
"तुझे मेरी कसम सुभांगी. प्लीज़ मूह में मत लेना. पहले मुझे लेने दे."
"दीदी एक बार मूह में लेकर छोड़ दूँगी." एक ओर तो मैं उसके लंड को पहले चूसना चाहती थी और दूसरी ओर मेरी छोटी बहन भी चूसने के लिए बेकरार हो रही थी. इस बात का फ़ैसला करने के लिए कि पहले कौन उसके लंड को चूसेगा. मैने सुधीर से पूछा तो उसने कहा.
"पहले मैं तुम दोनो बहनो की चूत देख लूँ. उसके बाद ही फ़ैसला करूँगा."
"जिसकी चूत ज़्यादा पसंद आएगी. मैं उसकी चूत को चूस्ता रहूँगा और दूसरी मेरे लंड को चूस्ति रहेगी." मुझे उसकी बात पसंद आ गयी. मेरा ख़याल था कि उसे सुभांगी की चूत ही ज़्यादा पसंद आएगी क्योंकि उसकी चूत पर जो सुनहरे रंग की झाँटे थी वो किसी भी लड़के को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर सकते थी. जबकि मेरी चूत मेट्यूर्ड हो जाने के कारण कुच्छ काली सी हो गयी थी. झाँटे भी खूब घनी काले रंग की थी. मगर हम दोनो की ही चूत उसे पसंद आई. कहने लगा.
"मुझे तो दोनो की चूत सेक्सी लग रही है. अपनी अपनी जगह. एक काम करो तुम दोनो ही मेरे लंड को एक साथ चूसो." मुझे उसका यह सुझाव पसंद आया. सुभांगी ने भी अपनी रज़ामंदी दे दी. फिर एक हाथ से मैने उसके लंड को पकड़ा और एक हाथ से सुभांगी ने पकड़ा फिर हम दोनो ही उसके मोटे सुपाडे को जीभ से चाटने लगी. अगर मैं अकेली होती तो अब तक मैं सुधीर के लंड को मूह में डाल लेती. इतना प्यारा लग रहा था मुझे वो. मगर सुभांगी के कारण मैं उसे मूह में लेने का इरादा करके भी उसे अमल में ना ला सकी.
मैने सोचा कि थोड़ी देर बाद जब सुभांगी का मन भर जाएगा तो मैं उसे आराम से मूह में ले सकूँगी. मगर वो तो उसके लंड की इस कदर दीवानी लग रही थी कि उसने सुधीर के लंड को छोड़ने का नाम तो नहीं लिया उल्टे मूह में लेने की कोशिश कर रही थी. तभी मैने सोचा कि इससे अच्छा है कि मैं सुधीर को कहती हूँ कि वो मेरी चूत चूसे. सो मैने लंड को मुक्त करते हुए कहा.
"सुभांगी अब तू आराम से सुधीर का लंड चूस्ति रह. मेरा तो कुच्छ और ही मन कर रहा है." सुभांगी ने लंड को मूह में ले लिया और मज़े से अपनी आँखे बंद करके लंड को चूसने लगी. मैं सुधीर के सामने अपनी टांगे खोल कर खड़ी हो गयी थी. उसने मेरी चूत की ओर देखा तो मुस्कुराने लगा. मैने कहा.
"मेरी मस्त चूत को नहीं चूसोगे?" उसने जवाब देने की बजाए अपने होंठो को आगे किया और चूत को चूमने के लिए झुका तो मैं उसके और करीब सरक गयी. उसने चूत को हल्का सा किस किया. मैं बोली.
"हाई गहरा किस करो ना." उसने होंठो के बीच चूत की पंखुड़ियों को दबा कर चूत का खूब गहरा किस किया. मेरे मूह से सिसकारी निकल गयी. उसके एक ही मस्त चुंबन से मुझे ऐसा लगा था जैसे मेरी चूत गरम हो गयी हो. मैं सिसकारी लेकर बोली.
"हाई और कस कर चूसो यार." मेरी सिसकारी सुनकर उसकी समझ में आ गया कि मैं वाकई में गरम हो रही हूँ. सो वो चूत की पंखुड़ियों को अपने होंठो के बीच दबा कर ज़ोर ज़ोर से चूसने लगा. मुझे बहद मज़ा आने लगा. वो चूत को चाट ता रहा. फिर जीभ से इस कदर छेड़ने लगा की गुदगुदी के मारे मेरी चूत से रस टपकने लगा. वो देर तक मेरी चूत चूस्ता रहा. इस बीच सुभांगी मज़े से उसके लंड को चूसने में लगी हुई थी. मैं पूरी तरह गरम हो गयी थी और चूत का सारा रस सुधीर चूसने में लगा हुआ था.
उसने कुच्छ देर बाद मेरी चूत को मुक्त किया. शायद या उसका दिल भर गया था. मगर बात यह नहीं थी. उसने सुभांगी के मूह से लंड निकाला और मुझे मेरी पीठ के बल लिटा कर लंड को मेरी चूत से सटाने लगा तो मैं उसका इरादा भाँप गयी. समझ गयी कि उसका इरादा मेरी चूत में अपना लंड घुसाने का है. मैं तो खुद ही उसके लंड को चूत में डलवाने के लिए पागल हो रही थी. सो जैसे ही उसने अपना लंड चूत के मुहाने पर रखा. मैने उसका लंड पकड़ा और अपनी चूत में ठेलने लगी. मगर उसका लंड मोटा था और मेरी चूत का सुराख छोटा सो अंदर जाने का नाम ही नहीं ले रहा था. मैने ज़ोर लगाने को कहा तो उसने ज़ोर से ठेल दिया. मुझे सॉफ तौर पर अनुभव हुआ कि मानो मेरी चूत का सुराख फट कर चौड़ा हो गया हो. ऐसा भयंकर दर्द हुआ की मैं कराह कर बोली.
"हाई... सस्स्स्स्सस्स..... फट...... गइईईईई........ प्लीज़......... मत घुसाओ मैं मर जाउन्गी........" उसने जैसे मेरी बात की कोइ परवाह ही नहीं की और लंड को अंदर करने के लिए ज़ोरदार दबाव देने लगा. मैने मूह से चीख को रोकने के लिए अपने होंठो को ज़ोर से भींच लिया था. तभी सुभांगी ने उठ कर लंड को दोनो हाथो से पकड़ लिया. फिर बोली.
"घबराओ मत दीदी. मैं पकड़े रखती हूँ. कोशिश करती हूँ कि आराम से अंदर जाए." सुधीर पूरा दबाव दे रहा था. जैसे अंदर करने के लिए पूरी तरह उतावला हो. मैं उसके लंड के दबाव के कारण छटपटाने लगी. कारण कि मुझे सॉफ तौर पर लग रहा था कि वो मेरी चूत को फाड़ कर ही अपने मोटे और लंबे लंड को अंदर समाहित करने का इरादा रखता है. एकाएक उसने ज़ोर से तेल दिया. सॅट से लंड चूत की गहराई में चला गया. मैं दर्द से मचल उठी. बोली.
"हाई....... ये........ क्या......... कर......... डाअलाआाआअ......... तुमने तो मेरी चूत ही फाड़ दी. उईईए........ दैयया...... ससिईईईईई..... सस्स्स्स्सिईईईई...... अब मेहरबानी करके थोड़ी देर धक्के मत लगाना. मैं ज़रा इस दर्द को बर्दाश्त कर लूँ." मेरी बात उसने मान ली. मैने शुक्र मनाया. क्योंकि मैं जानती थी कि अगर वो जोश में आ कर धक्के लगाना शुरू कर देता तो मैं मर ही जाती. इस दौरान वो सुभांगी की चूत को चाटने लगा. सुभांगी मस्ती में अपने दोनो हाथो से अपनी छोटी छोटी चूचिया मसल रही थी. इतनी कम उम्र में उसके अंदर इतना सेक्स भरा हुआ था कि उसे देखकर मैं हैरान रह गयी. वो अपनी नाज़ुक सी चूत को सुधीर के होंठो से रगड़ने लगी.
उसकी चूत इतनी नाज़ुक थी कि उस पर अभी ठीक से झाँटे भी नहीं आई थी. हल्के हल्के सुनहरे रंग के बाल दिखाई दे रहे थे. उसने सुधीर के होंठो पर कुच्छ देर तक अपनी चूत को रगड़ा. फिर मैं जब कुच्छ सामान्य अनुभव करने लगी तो मैने सुधीर के लंड को पकड़ कर चूत में धक्के मारते हुए उसका ध्यान अपनी ओर दोबारा मोड़ने का प्रयास किया. उसने जब सुभांगी की चूत को मुक्त किया तो मैं ये देख कर हैरान रह गयी कि सुभांगी की चूत गरम होकर लाल रंग की हो गयी थी. रस से पूरी तरह भीगी हुई थी. उसकी आँखे मस्ती के मारे बंद थी. अगर ऐसे समय मे सुधीर मेरी चूत को छोड़ कर उसकी चूत में लंड डालने का प्रयास करता तो वो एक सेकेंड भी नहीं लगती और सीधे चूत की जड़ में प्रवेश करवा लेती.
खैर जब उसने मेरी चूत के अंदर लंड को और आगे बढ़ाया तो मेरे मूह से सिसकारी निकलने लगी. सुभांगी उसके पास ही खड़ी थी और अपनी चूत को उसके होंठो पर ही रगड़ रही ही. वो मेरी चूत में लंड को धक्के मारते हुए और भी अंदर करने का प्रयास करने लगा तो मुझे बहुत दर्द महसूस होने लगा. मगर मैने उसे रोका नहीं. सोचा कि जितना भी दर्द क्यों ना हो. मैं उसके मोटे लंड का मज़ा पूरा पूरा लेकर रहूंगी.
उसने झटके मार कर लंड को चूत की काफ़ी गहराई में पहुँचा दिया था. उसके बाद तेज़ी से अंदर बाहर करने लगा तो मुझे बेहद मज़ा आने लगा. मैं अपनी कमर हिला हिला कर उसका साथ दे रही थी. उसने स्पीड और बढ़ा दी तो उसके झटके से मेरा बदन हिलने लगा. वो सुभांगी की चूत को भी तेज़ी से चाट रहा था. उसके लंड के धक्के से मुझे इतना मज़ा आने लगा कि मैं मस्ती से सिसकारी लेने लगी. दिल में आया कि वो और भी तेज़ी से चूत को रगड़ दे. मैं स्पीड बढ़ाने को बोली तो उसने धक्के और भी तेज़ कर दिए. उसके बाद तो लंड मेरी चूत का कोना कोना छूने लगा. धक्को के साथ ही मैं चरम पर पहुँचने लगी. मैं ज़ोर ज़ोर से सीसीयाने लगी. एकाएक उसने सुभांगी की चूत को मुक्त कर दिया और बोला.
"मेरा माल निकलने वाला है. मैं झड़ने वाला हूँ. कहो तो चूत के अंदर ही गिरा दूं. या तुम मेरा माल पीना पसंद करोगी?"
लंड के माल को पीने के बारे में मैने कुच्छ सहेलियों से सुना था. यह कि मर्द का गाढ़ा माल पीने में बहुत मज़ा आता है. मैने पीना स्वीकार कर लिया. उसके बाद मैं जल्दी से उसे लंड निकालने के लिए बोली. क्योंकि मैं झड चुकी थी और मेरा इरादा भी हो रहा था उसके वीर्य को पीने का. उसने खींच कर अपने लंड को मेरी चूत से बाहर निकाला. फिर जल्दी से मेरे मूह में देते बोला.
"जल्दी से मूह में ले लो. मैं झड़ने ही वाला हूँ." मैं मूह में लंड को लेने के लिए झुकी ही थी कि तभी पिछ्ह से वीर्य की पिचकारी छूट निकली और मेरे चहरे पर सीधी गिरी. फिर भी मैने लपक कर लंड को मूह में ले ही लिया और चूसने लगी. सुभांगी मेरे चहरे पर लगे वीर्य को उंगली से लेकर चाटने लगी थी. फिर बोली.
"दीदी बड़ा लाजवाब टेस्ट है. है ना?" मैने कुच्छ जवाब नहीं दिया और चूस्ति रही. मगर मेरे मूह में उसके लंड के पानी का थोड़ा ही हिस्सा गया था. क्योंकि सारा का सारा तो मेरे चहरे पर ही लग गया था जिसे सुभांगी स्वाद ले कर चख रही थी. तभी सुभांगी ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा और उसके चहरे पर अपनी चूत को झुका कर बोली.
"अब मेरी चूत चाट कर मुझे भी मस्त कर दो. इसके बाद हम तीनो की हालत एक जैसी हो जाएगी." सुभांगी की बात सुनकर सुधीर ने मूह झुका कर उसकी चूत को चाटना शुरू कर दिया. पहले तो चाट ता रहा जब सुभांगी सीसीयाने लगी तो उसने चूत को मूह में ज़ोर से दबा लिया और चूसने लगा. अब तो सुभांगी और भी मस्ती से सिसकारी लेने लगी. उसने मेरी ओर देख कर कहा.
"दीदी मेरे निपल को चूस कर मुझे और मस्ती प्रदान कर दो." मैं सॉफ तौर पर देख रही थी कि उत्तेजना के कारण उसका चहरा लाल हो रहा था और उसका मन हो रहा था कि वो पूरी तरह मस्त हो जाए. मैने उसकी चूची को दोनो हाथो से पकड़ा और गुलाबी रंग के मुलायम से निपल को मूह में लेकर चूसने लगी. सुधीर उसकी चूत के अंदर जीभ घुसाए गुदगुदी कर रहा था.
जब दोनो ओर से उसे मज़ा मिलने लगा तो वो और भी मस्त होने लगी. उसके मूह से पहले से भी ज़्यादा ज़ोर से सिसकारी निकलने लगी. मुझे सॉफ तौर पर अहसास हो रहा था कि वो झड़ने वाली है. उसने सुधीर को और ज़ोर से चूत पर जीभ रगड़ने के लिए बोला. मुझे भी वो कस कस कर चूसने को कहे जा रही थी. मैं दोनो निपल को बारी बारी से चूस्ति रही. उसके दोनो निप्प्लो का रंग अब पूरी तरह लाल हो गया था. और मेरा विचार था कि उसकी चूत का भी यही हाल हो गया था. तभी वो सीसीया कर बोली.
"आअहह...... बस...... बस...... सस्स्सिईईईई..... सीईईईईईई... छोड़ दो सुधीर उउऊईईई.... मैं..... मर ....... ज़ाउन्गी........ सुधीर ने उसकी चूत को मुक्त कर दिया और मूह हटाया तो सुभांगी ने गहरी साँस ली वो पीठ के बल लेट गयी. उसके अंदाज से ही ज़ाहिर हो रहा था कि वो पूरी तरह थक गयी थी. जब सुभांगी पूरी तरह मस्त हो गयी तो मैं भी कुच्छ देर के लिए आराम करने के लिए लेट गयी. मगर सुधीर पूरी तरह थका नहीं था. वो मुझे उल्टा लिटा कर मेरी गान्ड को सहलाने लगा. मैं समझ गयी कि लगता है अब उसका इरादा मेरी गान्ड मारने का है. मुझे गान्ड मरवाने में कोइ ऐतराज़ नहीं था. और अगर वो करने के लिए तैय्यर हो जाता तो मैं मना नहीं करती. क्योंकि मेरी चूत थकि थी. मेरी गान्ड नहीं.
वो कुच्छ ही देर में उत्तेजित हो गया. और मेरी गान्ड के बीच में लंड रख कर रगड़ने लगा. जब मैने पूरी तरह महसूस कर लिया कि अब उसका इरादा मेरी गान्ड मारने का हो चुका है तो मैने अपनी कमर को थोड़ा ऊपर किया और घोड़ी की तरह आगे की ओर झुक गयी. उसने मेरी कमर को थाम लिया और लंड को गान्ड के छेद पर रख कर आगे की तरफ धकेलने लगा.
मैने अपनी दोनो टॅंगो को और भी फैला लिया था. ताकि लंड के अंदर जाने में किसी प्रकार की कठिनाई ना आए. कुच्छ देर बाद जब उसने लंड को मेरी गान्ड में डालने के लिए सरकाया तो मैने महसूस किया कि उसका लंड भीगा हुआ था. शायद उसने अपने लंड पर थूक लगा लिया था. मैं सिसकी लेने लगी. तभी उसने झटका मारा तो मेरे मूह से चीख निकल गयी. लंड गान्ड को फाड़ता हुआ उसमें आधे से ज़्यादा घुस चुका था. और इतने मोटे लंड को और ज़ोर ज़ोर से धक्के मार कर अंदर करने का प्रयास करने लगा तो मैं मचल कर बोली.
"धीरे धीरे घुसाओ वरना मैं मर जाउन्गी." उसने मेरी बात जैसे सुनी ही ना हो और लगातार झटके मार मार कर लंड को मेरी गान्ड में प्रवेश कराता रहा. मैं सिसकियाँ लेने लगी. ऐसा अहसास मुझे पहले कभी नहीं हुआ था इसी कारण मैं उसके लंड की रगड़ को गान्ड के भीतर बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी.
सुभांगी उठ कर बैठ गयी थी. और हम दोनो की ओर देख रही थी. वो सुधीर का उत्साह बढ़ाने लगी. उसके उत्साहित करने से सुधीर और भी तेज़ी से लंड को झटके दे देकर मेरी गान्ड के अंदर घुसाने लगा. मुझे पहले तो दर्द हो रहा था मगर जब उसने लंड को कुच्छ और अंदर सरकाया तो दर्द की जगह मज़ा आने लगा. दर्द का अहसास कम हो गया था. उसने धक्के मार मार कर मेरी गान्ड को सूजा दिया था. इसके बाद उसके लंड ने पिचकारी छोड़ दी. मैं इतनी देर में ही इतनी मस्त हो गयी थी कि अब और मज़ा लेने का मन ही नहीं कर रहा था.
कुच्छ देर बाद सुभांगी उसके पास गयी और उसे अपनी चूची चुसाने लगी. उसके निपल चूस्ते चूस्ते ही फिर से सुधीर के लंड में तनाव पैदा होने लगा. मैं सॉफ देख रही थी कि उसका लंड खड़ा हो रहा था. तभी सुभांगी ने झुक कर उसके लंड को जीभ से सहलाया और सुपाडे को कुच्छ देर तक चाटती रही. उसे बड़ा मज़ा आ रहा था, ये मैं उसके चहरे को देख कर ही कह सकती थी. सुभांगी ने कुच्छ देर तक उसके लंड के सुपाडे को चाटने के बाद उसे मूह में डाल लिया और चूसने लगी.
लॉलिपोप की तरह चूस्ते हुए उसने सुधीर को इतना उत्तेजित कर दिया की उसका मोटा लंड और भी लंबा और मोटा प्रतीत होने लगा. सॉफ तौर पर ज़ाहिर हो रहा था कि उसके अंदर फिर से चुदाई करने की इच्छा जाग गयी है. अब फिर से मेरा मन कर रहा था कि मैं एक बार फिर चुदाई का मज़ा लूँ. जहाँ कुच्छ देर पहले तक मेरा विचार था कि अब मुझे चुदाई करवाने का मन नहीं करेगा और ना मुझे इसकी ज़रूरत महसूस होगी वहीं अब शिद्दत से चुदाई करवाने की प्यास तन मन में जागने लगी थी.
मैं उसी समय उठी और सुधीर के पीछे आ कर उसकी पीठ पर अपनी चूचियों को रगड़ने लगी. सुभांगी उसके लंड को ही चूसने में लगी हुई थी. और उसके चहरे को देख कर लग रहा था कि उसको लंड चूसने में बहुत मज़ा आ रहा है. कुच्छ देर बाद उसने लंड मूह से निकाल लिया और दोनो टाँगो को उसके कंधे पर रख कर बोली.
"सुधीर अब लंड घुसा दो मेरी चूत में. मैं बहुत देर से तड़प रही हूँ तुम्हारे लंड को चूत में डलवाने के लिए. चाहे मेरी चूत फट ही क्यों ना जाए. प्लीज़ भीतर डाल दो अपने लंड को मेरी चूत में."
सुभांगी की बात सुनकर सुधीर ने लंड पर थूक लगाया और सुभांगी की चूत पर रख कर उसके बदन को अपनी ओर खींचा तो दबाव से चूत के अंदर प्रविष्ठ होने लगा. उसी समय सुभांगी छटपटाने लगी.
मैने देखा कि उसकी चूत से खून निकलने लगा था. मगर उसने बहुत बहादुरी से काम लिया और उसके लंड को बर्दाश्त करने की कोशिश करती रही. धीरे धीरे उसकी चूत का कसाव लंड पर कम होने लगा था. क्योंकि चूत कुच्छ अधिक ही खुल रही थी. एकाएक सुधीर ने ज़ोर का धक्का मार कर लंड को सुभांगी की चूत की गहराई में पहुँचा दिया. सुभांगी ज़ोर से चीख पड़ी. उसकी नाज़ुक सी चूत खून से लथ पथ हो गयी थी. मैने सुधीर से कहा.
"सुधीर प्लीज़ धक्के मत मारो. लगता है सुभांगी की चूत फट गयी है."
"रहने दो दीदी......." सुभांगी बोली . "धक्के मारने दो...... मैं आज चाहती हूँ कि मेरी चूत का मूह पूरी तरह खुल जाए ताकि भविष्य में लंड डलवाने में मुझे किसी प्रकार की तकलीफ़ ना हो."
मैं सुभांगी के साहस को देख कर हैरान थी. उसने सुधीर के 8 इंच लंबे लंड को पूरा का पूरा अपनी चूत में डलवा लिया था. और उसके बाद सिसकारी लेते हुए उससे चूत में धक्के लगवाने लगी. उसके अंदाज से ही ज़ाहिर हो रहा था कि उसे बहुत मज़ा आ रहा है. कुच्छ देर बाद तो सुधीर की रफ़्तार और भी बढ़ गयी. उसने ज़ोरदार तरीके से धक्के लगाने शुरू किए और उसको झाड़ कर ही दम लिया. उसके बाद जब वो झड़ने के करीब आया तो वो बोला.
"मैं झड़ने वाला हूँ. लंड का पानी पीना पसंद करोगी?" मैने कहना चाहा कि मैं पीना चाहती हूँ. मगर उससे पहले ही सुभांगी ने कहा.
"पीना तो नहीं हां लंड को चूसना ज़रूर पसंद करूँगी. एक काम करो मेरी चूत के अंदर ही माल गिरा दो. उसके बाद निकाल कर मेरे मूह में दे देना. मैं पहले तो ये देखना चाहती हूँ कि जब गरम गरम माल चूत के अंदर गिरता है तो कैसा मज़ा आता है. उसके बाद मैं उसे चाटना पसंद करूँगी."
उसकी बात सुनकर सुधीर मुस्कुरा दिया. अब मेरा भी मन कर रहा था कि मैं भी उसके लंड के रस को अपनी चूत में गिरवा कर देखती. सुधीर ने अपने धक्को की रफ़्तार फिर तेज़ कर दी और ज़ोरदार धक्के मारते हुए मंज़िल की तरफ बढ़ने लगा. कुच्छ ही देर में सुभांगी बुरी तरह सीसीयाने लगी. वो एकाएक बहुत मस्त लगने लगी. सीसीया कर बोली.
"हाई...... गरम..... गरम...... रस के स्पर्श से एम्म........ कितना मज़ा आ रहा है. उउऊईईईईई...... सस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सिईईईईईईईईई....... सस्स्स्स्स्स्सिईईईईईईईई..... किस कदर गुदगुदी हो रही है ये मैं कैसे बताऊं."
सुधीर कुच्छ देर तक धक्के लगाता रहा. उसके बाद उसने झटके से लंड बाहर निकाला और सुभांगी के मूह में पेल दिया. सुभांगी लंड पर लगे रस को चाटने लगी. बेहद सेक्सी लगा यह सीन. अब मेरी चूत की सिहरन और भी तेज़ हो गयी थी. सुभांगी ने उसके लंड को मुक्त किया ही था कि मैने झट से लंड को पकड़ लिया और बोली.
"सुधीर मेरे राजा....... अब मुझे भी ये मज़ा दोबारा दे दो..."
"थोड़ा टाइम लगेगा मुझे फिर से तैइय्यार होने में." उसकी बात सुनकर मैं उसके लंड से खेल कर उसे खड़ा करने की कोशिश करती रही. इस बार सुधीर का लंड खड़ा होने में काफ़ी टाइम लगा. मैं काफ़ी देर तक लंड को मूह में लेकर चूस्ति भी रही. ये सोच कर कि ऐसा करने पर शायद जल्दी खड़ा हो जाए. और लंड खड़ा हुआ भी. सुधीर ने मेरी चूत की पंखुड़ियों को दोनो ओर से पकड़ कर चूत का मूह खोल दिया और लंड को एक हाथ से पकड़ कर चूत पर रगड़ने लगा.
वैसे तो मेरी चूत पहले से ही बहुत गरम हो गयी थी. पर उसके लंड की रगड़ पाकर और भी गरम हो गयी. कुच्छ देर बाद उसके लंड में पूरी तरह तनाव आ गया और वो मेरे निपल को भी चूसने लगा. मेरे निपल बहुत कठोर हो गये. दोनो चूचियों में जैसे रस भर गया था. और वो उन्हे चूस चूस कर और भी कठोर कर रहा था. फिर मैने सुधीर के लंड को अपनी चूत में अंदर करना चाहा सफलता तो नहीं मिली मगर उसकी उत्तेजना कुच्छ और ज़रूर बढ़ गयी.
उसने ज़ोर से लंड को आगे की तरफ धकेला तो सर्र्र्र्र्र्ररर से लंड चूत की गहराई में पहुँच गया. उसके बाद वो झटके मार मार कर अपने लंड को चूत की जड़ में पहुँचाने की चेष्टा करने लगा. मुझे उसके झटको में इतना मज़ा आने लगा कि मैं भी अपनी कमर उचका उचका कर उसका साथ देने लगी. करीब 8-10 मिनट. बाद वो झड गया. उसके लंड से गिरते गरम गरम रस से मेरी चूत का स्पंदन भी बढ़ गया. इसी बीच मैं भी झड गयी.
गरम गरम रस चूत के भीतर गया तो वाकई बेहद आनंद का अनुभव हुआ. मैं जान गयी थी कि लंड के रस को पीने में उतना मज़ा नहीं है जितना चूत के अंदर गिरवाने में है. गुदगुदी के मारे मेरी पूरी चूत सनसना रही थी और ऐसा अहसास हो रहा था कि ऐसा मज़ा मुझे इससे पहले कभी नहीं मिला. अब हम अक्सर मैं और मेरी बहन एकांत पाकर सुधीर से चुदवा लेती हैं
Meri umr 18 saal hai. Main ek akarshak yuvti hoon. Mere pariwaar mein kul 4 sadasya hain. Mere Mummy - Papa. Main aur meri Chhoti bahan. Bahan ka naam Subhangi hai. Vah behad shararti kism ki ladki hai. Vah mere se 3 saal chhoTee hai aur isee saal higher secondary yani ki 11th men gayee hai. Par us'kee adaaon aur har'katon ko dekh koee naheen kah sak'ta ki yah college men naheen paDh'tee hai. Aur to aur uske kayee boyfriend bhi hain. Main college mein padhti hoon, aur B.A. final men hoon. Ek din maine dekha ki wo mere boyfriend ke saath ghoom rahi thi aur chal'te samay uske badan se chipakne ki koshish kar rahi thee. Mujhe us par bhi gussa aaya aur apne boyfriend par bhi. Waise to wo mujhse pyaar karne ka dam bharta thaa aur ab meri bahan ko hi fasane ki cheshta kar raha hai.
Us waqt to maine un dono ko kuchh nahin kaha magar baad mein jab Subhangi ghar aayee to maine use daantne ka man banaya. Mera vichaar thaa ki mere dost se jyada dosh Subhangi ka thaa. Kyonki Subhangi hi usse chipakne ki koshish kar rahi thee. Zahir hai ki jab Subhangi jaisi khoobsurat aur faishnable ladki use itna lift degi to wo to uski aur fislega hi.
Main Subhangi ke kamre mein jaane waali thee ki tabhi mummy ne use kisi kaam se bahar bhej diya. Us waqt maine use kuchh naheen kaha. Raat ko khaane ke baad wo apne kamre mein chali gayee. Main apne kamre mein aa gayee thee. Kuchh der baad uthi aur Subhangi ke kamre ke saamne pahunchi to dekha kamre ka darwaaza khula chhode leti huee thee. Uska haath tezi se hil raha thaa. Badan par chaadar daal rakhkha thaa usne. Main andar chali gayee. Usne mujhe dekha to eka ek hadbada kar boli.
Didi tum! Usne apna haath rok liya thaa. Mujhe kuchh ajeeb sa laga ki aakhir wo chaadar ke neeche apne haath ko itna kyon hila rahi hai. Main uske paas baithi to wo apni tango ko theek se dhakne ka prayaas karne lagi. Usi waqt maine dekh liya ki uski tango ka kuchh hissa nanga thaa. Ab meri jigyaasa aur bhi badh gayee aur maine ye dekhne ka nishchay kar liya ki wo chaadar ke neeche kya kar rahi thee. Main ye bhool hi gayee ki main usse kya kahne aayee thee. Maine kaha.
"Kya kar rahi hai?"
"K...Ku... Kuchh nahin didi." Usne ghabra kar kaha to mera shaque aur bhi badh gaya aur maine uski tango par padi chaadar ko kheencha to usne mujhe rokne ki koshish ki. Main kheench kar hi maani. Yah dekhkar main chaunk hi padi ki uski kamar se neeche tak ka badan nanga thaa aur uski choot mein ek baingan ghusa pada thaa. Main muskura kar boli.
"Ohh to yah kar rahee thee, yani ki chudai ka nakli maza le rahi thee". Jab usne dekha ki main muskura rahi hoon to uski bhi himmat kuchh aur badh gayee aur usne kaha.
"Kyaa karoon didi koiee ladka milta hi nahin jisse chudai karwa kar apne tan man ki pyaas bhujha sakoo. Usmein bahut se khatre bhi to hain. isiliye maine apne haath se hi......" Main muskura di. Uske paas baith gayee. Main uski choot ke andar aadhe ghuse pade baingan ko pakad kar hilaate hue boli.
"ise to main bhi bura nahin maanti. Aakhir ladke bhi to apna lund haath mein lekar chudai ka nakli maza lete hain. Aise mein ham ladkiyan maza kyon na le". Wo meri baat sunkar aur bhi muskuraane lagi. Uske man ka dar poori tarah khatam ho gaya thaa. Main uske paas baith gayee aur chaadar ko poori tarah uske badan se hata hi diya. Uska nichla badan kaafi sexy thaa. Choot par sunahre rang ke baal the. Main use daantna poori tarah bhool kar apna haath chalate hue use chudai ka maza dene lagi. Wo boli.
"Didi kya tum bhi isi tarah ka maza leti ho?"
"Haan. Kabhi kabhi. Magar main baingan ki bajaye apni choot mein mooli daalna jyada pasand karti hoon. Mooli lambi hoti hai na. To choot ke aakhiri kone tak aaraam se pahunch jaati hai".
Tumne kabhi kisi se chudai nahin karwaayee kya" Maine uske chahre ki taraf dekha aur kaha .
Nahin. Aur tumne?
Maine bhi kabhi nahin karwaayee. Waise ek ladka mere saath chudaai karna chahta thaa. Main bhi chahti thee. Magar koiee achchi jagah nahin mili jahan chudai kar paate. Aaj hi ki baat hai. Usne school ke toilet mein lejaakar meri choot ko nanga kar diya. Usne meri choochiyon ko bhi thoda sa khol diya thaa. Uske baad usne apna lund nikaal liya. Uska mota sa lund dekh kar main chudaai karwaane ke liye poori tarah utaawali to ho gayee aur usne lund ko choot mein daalne ki koshish bhi ki thee magar uska lund itna mota thaa aur meri choot ka suraakh itna chhota ki bahut zor dene ke baad bhi uska lund meri choot mein nahin jaa paaya. Jyada zor dene laga to mujhe dard mahsoos hone laga. Mare dard ke mere mooh se cheekh nikalne lagi. isiliye maine use mana kar diya. Kyonki agar wo jabardasti apna lund meri choot mein ghusa deta to meri choot fat bhi sakti thee. Aise mein zahir thaa ki mujhe bahut dard bhi hota aur main cheekhne lagti. Uske liye mujhe chahiye thee aisi jagah. Jahan main jitna bhi cheekhoon ki kisi ko pata bhi na chale. Main uski baatein dhyaan se sun rahi thee. Badi mazedaar lag rahi thee uski baatein. Main baigan ko pahle ki tarah uski choot ke andar hilaate hue boli.
"Kya waakai bahut mota lund thaa uska?"
Haan didi. itna mota ki meri choot mein jaa hi nahin raha thaa. isi se andaza lagayiye. Lamba bhi bahut thaa. Kareeb 8 ya 9 inch. Subhangi ki baat sunkar mere banda mein khaaskar meri choot mein bhi sursurahat honi shuru ho gayee. Waise to main Subhangi ki choot mein baingan daal kar dhakke maar rahi thee. Magar uski baatein sunkar meri choot mein gudgudi hone lagi thee. Main sahsa hi kah uthi.
"Kaash mujhe itna lamba aur mota lund mil jaata. Phir to main use apni choot mein dalwaa kar hi dam leti. Chahe kuchh bhi ho jaata.
To didi kaho to main use kisi din ghar le aaoon. Subhangi aankh maar kar boli " Ham dono ko maza aa jayega" Na jaane kya soch kar maine mana kar diya. Boli.
"Nahin re main to mazaak kar rahi thee. Ghar mat laana. Mummy ko pata chal gaya to........ Chudai ka maza to ham baingan mooli se hi le lete hain". Wo chup ho gayee. Mujhe saaf lag raha thaa ki uska man apne dost ke saath chudai ka maza lene ka thaa. Maine kaha.
"Tera mood kyon kharaab ho gaya. Dost ko bulaana chahti hai".
"Nahin Didi yah baat nahin hai".
"Magar tera chahra to kah raha hai ki yahi baat hai". Wo muskuraa kar boli.
"Bulaana to chahti hoon magar tum izaazat de do tab".
"Ok! Bula lena".
"Thanks Didi. You are great". Wo mere badan se lipat gayee aur mere hontho ko choomne lagi. Uske chumban lene par maine bhi use choomna shuru kar diya. Phir main uski choot ke andar baingan ko ghusaane lagi to ekaek mere hontho ko mukt karke boli.
Didi aaj tum bhi nakli chudai ka maza le lo na. Achcha lagega. Main kitchen se mooli le aaungi. Mazaa aa jayega".
"Theek hai magar usse pahle main tujhe maza to de doon". Kah kar main baingan ko aur bhi tezi se uski choot ke andar bahar karne lagi. Use aur bhi maza aane laga aur uske mooh se siskaari nikalne lagi. Usne meri choochi ko pakad liya aur dabane lagi. Mujhe achcha laga to maine kaha.
"Agar tujhe achcha lag raha hai to meri choochi ko nanga kar de." Usne meri nighty ko pakad kar oopar kar diya aur Bra ko kholne lagi to zara der ke liye maine apne haath ko rok liya aur apni Bra ko khud hi utaarte hue usko boli.
"Chahe to mooh mein lekar meri choochi ke nipple ko choosna. Mujhe achcha lagta hai." Maine choochi ko nanga kar diya to usne meri choochi ko apne dono haatho men kas liya aur dabate hue boli.
"Ek baat poochhon didi. Kabhi kisi ladke ne tumahri choochiko mooh mein liya hai ya nahin?" Uski baat sunkar main aahen bhar kar boli.
"Abhi tak to aisa mauka nahin mil paaya hai. Tu bata."
"Ek baar mere ek boyfriend ne mere nipple ko mooh mein liya thaa. Aur kuchh der tak choosa thaa. Bada maza aata hai didi." Uski baat sunkar main muskuraa kar rah gayee. Boli kuchh nahin kyonki main ab tak us maze se anjaan hi thee. Maine use mere nipple ko mooh mein lene ko kaha to usne jaldi se mere nipple ko mooh mein bhar liya aur choosne lagi.. Mujhe maza aane laga aur main tezi se baingan ko uski choot mein andar bahar karne lagi.
Uske mooh se sikaariyan ubal rahi thee. Maine uski choot ke kaafi andar kar diya thaa baingan ko. Wo bhi tezi se meri choochi ko choosne lagi. Mujhe behad anand aane laga. Maine isse pahle kabhi is prakaar lesbian sambandh ka anand nahin liya thaa aur uske dwaara nipple ko choose jaane par mujhe aisa prateet hone laga jaise koiee premi hi mere nipple ko choos raha ho. Kuchh der baad wo jhad gayee to uske mooh se nikal rahi sikaari mein aur bhi tezi aa gayee aur usne mana kar diya aur ragadne ke liye. Maine haath ko rok liya. Wo siski lekar boli.
"Didi. Ab baingan nikaal lo. Main jhad chuki hoon." Maine baingan bahar nikaal liya. Wo boli.
"Didi bahut maza aaya."
"Mujhe bhi maza de de." Maine kaha to wo meri panty par haath rakhkar boli.
"To phir ise utaaro na. Main bhi mooli se tumhe mast kar deti hoon." Maine sirf panty hi nahin badan ke doosre kapde bhi utaar diye. Usne meri choot par haath rakhkha to mujhe ahsaah hua ki meri choot mein bhi sansanahat hone lagi thee aur chudai ki ichcha buri tarah se hone lagi thee. Wo choot ko sahlaane lagi. Mujhe achcha lagne laga tabhi usne apni ek ungli ko meri choot ke andar kar diya aur is prakaar ungli ko andar ki taraf dhakelne lagi maano andar ki gahraai ka anumaan laga rahi ho. Uske baad usne kaha.
"Didi tumhari choot to wakai bahut gahri hai. Tumhe lambe lund ki hi jaroorat hai."
"Tabhi to tere se tere dost ko lane ko kah rahi thee. Tabhi to kah rahi hoon ki tu kisi din apne dost ko le aana. Main bhi to dekhoon ki uska lnd kitna lamba hai."
"Uska lund to tum dekh hi logi didi. Abhi yah kahoo ki main kitchen se mooli le aaoon?"
"O yaar neki aur poochh poochh." Maine muskura kar kaha to who bhi muskura uthi. Phir uth kar apne kapde pahanne lagi. kuchh der mein hi usne kapde pahan liye aur kamre se bahar nikal gayee. Main jhuk kar apni choot ko masalne lagi. Dil kar raha thaa ki koiee mard aa jaye aur main uske lund ko apni choot mein samahit karwaa karwaa kar chudai ka maza le loon. Magar aisa ho paana kathin thaa. Kamse kam aaj ki taarikh mein kisi mard ke aane ki koiee gunjaish nahin thee. kuchh der mein Subhangi wapas aa gayee. Uske haath mein moti aur bahut lambi mooli thee. Shayad chheel kar bhi layee thee kyonki kahin se bhi koiee nukeela bhaag nikla hua nahin thaa. Poori tarah chikna thaa. Wo mere paas aa kar baith gayee aur mooli ko meri choot mein ghusaane lagi to maine kaha.
"Chun kar mooli laayee hai. Lambi bhi aur moti bhi." Wo muskura di. Phir usne mooli ko meri choot mein daalte hue kaha.
"Didi. Tumahri choot ke liye itni hi lambi mooli theek hai." Jab wo andar sarkaane lagi to main choot ke hontho ko pakad kar choot ko aur bhi khol diya. Aisa isliye kiya thaa taaki mooli ke andar jaane se kisi prakaar ki pareshaani na aaye. Phir bhi wo itni moti thee ki andar jaate samay mujhe takleef hone lagi. Main siski lekar boli.
"Dheere - dheere ghusa yaar. Dard ho raha hai." Wo muskura kar boli.
"Didi ye mooli thodi moti jaroor hai magar maine suna hai ki mote lund se chudai kane par baad mein bahut maza aata hai. Waise hi isse chudai karne par tumko bahut maza aayega." Maine muskura kar kaha.
"Tune yah baat kahan se jaani?"
"Meri ek saheli ne bataya thaa. Usne kayee ladko se chudwaaya hai, kayee baar. Usi ne mujhe pahli baar baingan se chudai ka maza lena sikhaaya thaa." Maine kaha.
"Lambe lund se maza to aata hoga magar dard bhi bahut hota hoga. Jaise is samay mujhe ho raha hai." Wo mooli ko choot ke aur bhi andar kar'ne ka prayaas karte hue boli.
"Magar mazaa bhi to aayega didi." Main siskaari lene lagi thee. Kaaran yah thaa ki mooli ne meri choot ki gahraayee mein pravesh kar liya thaa. Aur usne haath ka hilaana praarambh kar diya thaa. Main uske aur bhi kareeb sarak gayee aur uski ek choochi ko haath se pakad kar dabane lagi. Usne turant hi apni choochi ko nanga kar liya. Uske nipple mein abhi theek se kathorta nahin aayee thee. Kul 15 saal ki hi thee. Jiske kaaran uske mamme bhi poori tarah se nikle nahin the. Magar use pakad kar dabane mein mujhe achcha laga. iska kaaran yah thaa ki meri choot mein mooli ka aana jaana ho raha thaa. is gharshan se mujhe anand aane laga aur main tezi se uske nipple ko choosne lagi.
Kuchh der baad usne nipple ko chhodne ko kaha to maine uske nipple ko mukt kar diya. Usne meri choot ki gahraayee mein mooli ko pravesh kara diya. Main dard se tadap kar rah gayee. Aisa laga jaise meri choot ka kumaari parda fat gaya ho. Kisi prakaar maine mooli ke dhakke ko bardasht karne ka prayaas kiya. Wo tezi se mooli ko andar karne lagi. Mujhe anand aane laga thaa. Magar itna bhi nahin ki main use ye kah deti tu jad mein ghusa de. Eka ek usi ne kah diya.
"Didi kaho to main is mooli ko tumahri choot ki jad mein pahuncha doon?"
"Nahin re. Aisa mat karna. Choot ka bura haal ho jayega."
"Maza bhi to aayega didi." Wo muskura kar boli. Uski baat sunkar main sochne lagi ki main use jad mein pahunchaane ke liye kah doon ya nahin. Eka ek usne mere mana karne ke baawajood mooli ko meri choot ki gahraayee mein ghusa diya. Main zor se uee kar uthi. Aisa laga maano mooli mere pet mein pravesh kar gayee ho. Main use mana karne lagi ki ab aur mat karna mera pet fat jayega magar wo to poori ki poori mooli andar karne ke prayaas mein lagi huee thee.
Usne ek zordaar jhatka maara aur meri aankho ke saamne andhera sa chhaa gaya. Us par gussa aa raha thaa ki usne mere mana karne ke baad bhi itna zor ka jhatka kyon maar diya. Magar jab wo mooli ko aage peeche karne lagi to mujhe maza bhi aane laga aur main use kuchh aur zor se mooli ko apni choot ke andar bahar karne ko boli. Mooli ab meri choot ke antim sire ko chhoone lagi thee. Aisa anand aa raha thaa jiske bare mein kewal kalpana hi karti thee. Lag raha thaa ki mote lund se hi anand prapt kar rahi hoon. Kuchh der baad main jhad gayee. Usne haath ko rok liya to main kuchh der tak padi padi gahri gahri saans kheenchti rahi. Wo boli.
"Didi kaisa laga?"
"Maza aa gaya!". Main unmukt kanth se boli. Wo muskura kar boli
"Didi agar mera boyfriend ho to tumhe aur bhi maza aayega. Uska lund bhi is mooli jitna hi lamba hai. Aur sabse badi baat hai uski shararat. Wo ladkiyon ki choot ko aise choosta hai ki ladkiyan mast ho jaati hain. . Jaise main ho gayee thee. Kaash us din mujhe kam dard hota aur main uske lund ko aasaani se apni choot mein dalwaa paati. Usi din mujhe chudai ka maza mil jaata.
"Ham dono milkar uske lund se chudai ka maza lenge. Kisi din use lekar aaja to sahi." Wo ikraar mein sir hila kar rah gayee. Maine uth kar kapde pahne aur apne kamre mein chali aayee. Use apne boyfriend ke bare mein maine poocha hi nahin. Jis kaam ke liye main uske paas gayee thee. Maine socha ki jab wo apne boyfriend ko mujhse milwa rahi hai to main use apne boyfriend ke bare mein kya kahon.
Subhangi ne teesre din hi apna waada poora kar diya. Jis din Mummy kahin jaane waali thee usi din usne apne dost ko bulaane ka faisala kar liya. School jaane se pahle hi usne mujhe ishaara kar diya thaa ki aaj shaam ko main khaas taur par ghar mein hi rahoon. Wo Sudhir ko apne saath lekar aayegi. Mummy dopahar mein kisi samay jaane waali thee. Shaam ko wo apne dost ke saath aayee. Uske dost ko dekhte hi main samajh gayee ki wo wakai mein akarshak hai. Aur uske bare mein jo bhi Subhangi ne bataya thaa wo sab sach hoga. Kaaran yah thaa ki wo bada hi akarshak ladka thaa. Subhangi ne ham dono ka parichay kara diya. Usne kaafi khule man se mujhse baat ki. Kuchh der baad Subhangi boli.
"Didi main chai banakar laati hoon. Aap dono baatein kijiye." Subhangi ke jaane ke baad maine uski aur muskurahat bhari nigaaho se dekhte hue kaha.
"Mujhe Subhangi ne tumahre bare mein kaafi kuchh bataya hai." Wo jhat se bola.
"Aur Subhangi ne mujhe aapke bare mein bhi sab kuchh bata diya hai." Main chaunk kar boli.
"Sab kuchh?"
"Ji haan sab kuchh." Uski muskaan kuchh aur gahri ho gayee. Usne mere mammo ki or ghoor kar dekha to main muskura kar boli.
"To phir tumahra kya khayaal hai?
"Kis bare mein?"
"Mere bare mein."
"Yah to parda hatne ke baad hi pata lagega ki andar jalwaa kaisa hai." Main uske ishaare waali is baat par muskura uthi. Maine kaha.
"Parda hata kar dekh lo ki jalwaa kaisa hai." Kahkar maine maadak dhang se angdaai li. Jaise main khud bhi use apna sab kuchh arpit karne ke liye taiyyar hoon. Wo muskura diya uski nigaah meri choochi par hi tiki huee thee. Bola
"Oopar se dekhne par to lag raha hai ki jalwaa haseen hi hoga."
"Oopar se kyon. Neeche se bhi dekh lo." Kahkar maine uska haath pakada aur apni choochi par rakh diya. Wo meri dono choochi ko pakad kar masalne laga. Main uske badan se lipat kar uske hontho ko choomne lagi. Mere andar itni pyaas bhari huee thee ki uske dwaara nange kiye jaane ka intezaar bhi na kar payee aur maine khud hi apne kapde ko pakad kar oopar kiya to usne haath badhakar meri nangi choochi ko pakad liya.