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जमीन से निकली आफत

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जमीन से निकली आफत

मेरे अम्मी और अब्बा शादी के खिलाफ थे क्यूँ की रफीक की कमाई काफी कम थी। पर फिर भी मेंने दिल के हाथों मजबूर हो कर रफीक से निकाह कर लिया था। हमेशा छोटी छोटी जरूरतों को ले कर रफीक के साथ मेरी हर दिन बहस होती रहती थी। सिर्फ प्यार से घर नहीं चलता यह एक हकीकत है। और मेरी इसी ज़्यादा दौलत पाने की भूख का फाइदा एक जिन्नात ने उठाया।शबनम मंजिल के पास हमारा छोटा सा मकान है, वहीं से मेरी बरबादी और तकलीफ़ों की शुरुआत हुई। निकाह के बाद से ही मुजे रात के सन्नाटे में एक बुजुर्ग पहाड़ी इन्सान की आवाज़ सुनाये देती थी।

दिन पर दिन यह सिलसिला बढ़ता गया।मेंने रफीक से भी कहा पर उसने मेरा वहेम होगा ऐसा कह कर बात टाल दी। एक रात जब रफीक काम से बाहर थे। और बच्चे मेरे भाई जान के घर गये थे, तब अंधेरे में एक परछाई मेरे पलंग के पास आ कर खड़ी हो गयी। और मेरा नाम पुकारने लगी। में चीखना चाहती थी पर मेरी आवाज हलक में ही अटक गयी।मेंने थोड़ी देर में हिम्मत समेटी, और जान मार कर चीख लगाई। घर पे तो कोई न था, पर हमारी पड़ोसन रज़िया दौड़ कर मेरे घर आई। मेरे साथ रज़िया को भी वह परछाई दिखी और अब वह विकराल परछाई मेरा और रज़िया का, दोनों का नाम पुकार रही थी।

रज़िया ने मुजे और मेंने रज़िया को कस के पकड़ लिया और हम दोनों कांप रहीं थी।काँपती आवाज में उस परछाई से मेंने पूछा की ” कौन हो तुम? क्या चाहिए? “उसने जवाब में इतना ही कहा की वह इस जमीन के नीचे रहता है। और उसे कुछ देना है मुजे। फिर उसने कहा अपना तौफा बाहर निकाल लो। इतना बोल कर वह परछाई गायब हो गई। मेरी तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा अब मुजे यकीन हो चला था की ज़मीन के नीचे ज़रूर कोई गढ़ा हुआ खजाना है।

मै और रज़िया कूद कूद कर नाचनें लगी। मेंने रज़िया को भी कुछ हिस्सा देने का वादा कर लिया। और तुरंत ही पलंग हटा कर रज़िया की मदद से ज़मीन खोदने लगी। सुबह चार बजे तक पूरे रूम में एक मिटर तक का लंबा चौड़ा गड्ढा खोद डाला हमने। पर जमीन में से कंबक्त मट्टी और पत्थर के अलावा कुछ ना निकला ।हिम्मत हार कर हम ने गड्ढा पैक करने का फैसला किया। और गुस्से में आ कर गड्ढे में आखरी वार किया। तभी एक गढ़ी हुई काँच की बोतल फूटी और उसमे से आवाज के साथ गरम हवा निकली जो सीधी मेरे अंदर घुस गयी। पिछले साल हुए इस वाकये के बाद से मेरी जिंदगी जहन्नुम बन गयी है।

में कितना भी खाना खाऊ मेरा पेट नहीं भरता, बार बार मुजे नशा करने का दिल करता है। खून की गंध मुजे अच्छी लगने लगी है। लोगों से मिलना जुलना भी मेंने छोड़ दिया है। बार बार खुद को मार देने का जी करता है।मेरी पड़ोसन रज़िया भी अचानक शहर छोड़ कर चली गयी है। और मेरी इस तकलीफ के इलाज के लिए मेरी अम्मी ने दरगाह का धागा मेरे हाथ में बांधा है। रफीक भी दिन में तीन बार मेरी खैरियत जानने के लिए मंडी से फोन करता है।

दरगाह का धागा बांधने के बाद वह परछाई मुजसे दूर खड़ी रहती है। और हाथ पर बंधा धागा निकालने के लिए कहती रहती है। में अपनी सच्ची कहानी इसी लिए बयान कर रही हूँ ताकि कोई और बेकसूर इन्सान मेरे जैसी मुसीबत में ना फसे। मेरी तकलीफ़ का मेरे से छुटकारा हो सके, इसके लिए आप लोग अल्लाह ताला से दुआ करना।
 
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