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जवानी की तपिश

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मगर मेरे इस काम से टीचर की आहें निकलने लगी। मैं जैसे-जैसे उनका मम्मा चूसता। वो आह्ह… आआह्ह… ऊऊऊह्ह की सेक्स में डूबी हुई आवाजें निकाल रही थी। मैं कभी-कभी अपनी जबान से उनके निपल को भी छेड़ देता। टीचर की बेचैनी बढ़ रही थी, इसलिए वो मचल रही थी। उनके हिलने के कारण कभी-कभी मम्मा मेरे मुँह से निकल जाता, तो मैं गर्दन को हिलाकर दोनों मम्मों में से जो मेरे करीब होता, मैं उसे पकड़कर चूसने लगता।

बारी-बारी मैंने टीचर के दोनों मम्मों को चूस-चूसकर गीला कर दिया था। इस तरह मम्मे चूसने से मुझे भी बहुत मजा आ रहा था और मैं बड़ी ही चाह के साथ अपना काम पूरी इमानदारी से कर रहा था। दोनों मम्मों को चूसने में कोई कमी नहीं कर रहा था कि किसी को कम और किसी को ज़्यादा । कुछ देर इसी तरह चलने के बाद टीचर सोफा से उठकर खड़ी हो गई।

मैं हैरत से टीचर को देखने लगा का क्या हुआ मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई? वो मुकम्मल तौर पर नंगी मेरे सामने खड़ी थी। उनके जिश्म के नसीबो फराज मेरी आँखों के सामने ही थे। दिल कर रहा था उन्हें जकड़कर एक बार फ़िर उन मम्मों का पूरा रस चूस लूँ। मगर मजबूर था। यह मेरी डेमो क्लास थी और टीचर ने प्रामिस लिया था कि वो जो करेंगी मैं करने दूँगा, कोई सवाल नहीं करूँगा। तो में एक फरमावरदार स्टूडेंट की तरह खामोश बैठकर उनको देख रहा था।

टीचर ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया तो मैंने जल्दी से उनका आगे बढ़ा हुआ हाथ पकड़ लिया। मेरी बेचैनी और तड़प को टीचर ने भी महसूस किया और उनके चेहरे पर मुश्कुराहट आ गई। उन्होंने आँखों-आँखों में हाथ के हल्के झटके से मुझे सोफा पर से उठने का इशारा किया, तो मैं जरखरीद गुलाम की तरह उनकी आँख की एक ही जुम्बिश से उठकर खड़ा हो गया। वो मेरा हाथ पकड़कर मुझे बेड की तरफ ले जाने लगी।

वो उल्टे कदमों ही बेड की तरफ चल रही थी। जिसके कारण उनका फ्रंट मेरी तरफ था और चलते हुए उनके मम्मे हल्के-हल्के हिल रहे थे, और उनके हिलने से मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं पूरा हिल रहा हूँ, मेरा दिल हिल रहा है, मेरी धड़कनें तेज हो रही हैं, मेरी नजरें मुसलसल उनके मम्मों पर लगी हुई थीं।

टीचर मुझे बड़े गौर से देख रही थी, मेरी एक-एक हरकत को नोट कर रही थी। जो उन्होंने मुझे डेमो क्लास के बाद बताया था। वो मुझे लेकर बेड के करीब आ गई, और मुझे बेड पर बैठने का इशारा किया। मैं बेड के किनारे बैठ गया। मुझे बेड पर बिठाने के बाद टीचर ने आगे बढ़कर मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू किए। कुछ देर में मेरा ऊपरी धड़ बिल्कुल नंगा हो चुका था। बालों से पाक मेरा सॉफ सीना जो एक्सर्साइज के बदौलत अभी हल्की-हल्की शेप लेना ही शुरू हुआ था, उनकी नजरों के सामने जाहिर हो गया।

वो प्यासी नजरों से मेरे सीने की तरफ देख रही थी। उन्होंने आगे बढ़कर बहुत ही प्यार से मेरे सीने पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। फ़िर उसी हाथ से हल्के से धक्का देकर मुझे बेड पर पीछे की तरफ धकेल कर लिटा दिया। खुद मेरे एक साइड पर आ गई, और मेरे सीने पर झुक गई, और मेरे सीने पर अपने होंठों से प्यार करने लगी। वो बहुत ही खूबसूरत अंदाज में मेरे सीने पर चूम रही थी। फ़िर धीरे धीरे मेरे निप्पलों की तरफ बढ़ गई और उनको अपने मुँह में लेकर हल्के से चूसा।

उनके ऐसा करने से मेरे जिश्म को एक जोरदार झटका लगा और मेरे मुँह से ‘आआअह्ह’ की एक जोरदार आवाज निकली। मैं मजे की ऊँचाइयों पर पहुँच चुका था। फ़िर उन्होंने बारी-बारी मेरे दोनों निपल्स को चूसा और अपनी जबान से कुछ देर के लिए छेड़ा। उसके बाद वो धीरे-धीरे नीचे की तरफ सरकने लगी। वो बहुत प्यार से मेरे पूरे बदन को चूमती और चाटती हुई नीचे जाने लगी। फ़िर उन्होंने रुक कर मेरी पैंट का बेल्ट और बटन खोलकर जिप को भी नीचे कर दिया, और फ़िर एक ही झटके से पैंट को नीचे कर दिया। मगर मेरी पैंट नीचे मेरे जूते में जाकर अटक गई जो मैंने एक बार फ़िर पहन लिए थे।

वो बेड से नीचे उतरी और मेरे जूते उतारने लगी। कुछ ही देर में मेरे जूते और मोजे उतर चुके थे। जिसके बाद मेरी पैंट आसानी से मेरे पैरों से निकल गई और अब वो नीचे पड़ी हुई थी। मैं भी अब पूरी तरह नंगा हो चुका था। टीचर ने एक बार फ़िर बेड पर आते हुए मुझे कमर से पकड़कर पूरा बेड पर आने का इशारा किया, तो मैंने भी अपने दोनों पैर उठाकर बेड के किनारों पर रखे और कमर उठाकर खुद को पैरों की मदद से ऊपर की तरफ धकेला तो मैं अब पूरी तरह से बेड पर आ चुका था।

 
वो बेड से नीचे उतरी और मेरे जूते उतारने लगी। कुछ ही देर में मेरे जूते और मोजे उतर चुके थे। जिसके बाद मेरी पैंट आसानी से मेरे पैरों से निकल गई और अब वो नीचे पड़ी हुई थी। मैं भी अब पूरी तरह नंगा हो चुका था। टीचर ने एक बार फ़िर बेड पर आते हुए मुझे कमर से पकड़कर पूरा बेड पर आने का इशारा किया, तो मैंने भी अपने दोनों पैर उठाकर बेड के किनारों पर रखे और कमर उठाकर खुद को पैरों की मदद से ऊपर की तरफ धकेला तो मैं अब पूरी तरह से बेड पर आ चुका था।

इसी दौरान मेरी नजर मेरे लण्ड पर पड़ी, जो पैंट से बाहर निकलते ही पूरा तरह से अकड़कर मेरे पेट का साथ लगा हुआ था। मैंने टीचर की तरफ देखा तो उनकी नजरें मेरे लण्ड की तरफ लगी हुई थी और मुझे एक हवस और चमक वाजेह तौर पर नजर आ रही थी। उन्होंने अपना एक हाथ आगे बढ़ाकर मेरे लण्ड को अपने हाथ में पकड़ लिया। टीचर के हाथों में तो जादू था। उनके हाथ में जाते ही मेरे को लण्ड को मस्ती सूझने लगी जिस पर मेरा कोई कंट्रोल नहीं था। वो एक ख़ूँख़ार भैंसे के नथुनों को तरह फूलने और पिचकने लगा उसकी रगें उभर आई थीं।

मैं हैरत से अपने लण्ड की तरफ देख रहा था। मैं खुद भी हैरान था कि आज तक मैंने भी कभी अपने लण्ड को इस हालत में नहीं देखा था। आज तो यह कुछ अलग ही रूप में दिख रहा था। टीचर की नजरें ऐसे मेरे लण्ड के साथ चिपकी हुई थीं, जैसे मेरे लण्ड ने उसे हेप्नोटाइज कर दिया हो। वो धीरे-धीरे मेरे लण्ड पर झुकने लगी। वो अभी लण्ड से दूर ही थी कि उनकी खूबसूरत गुलाबी जबान उनके मुँह से बाहर आ चुकी थी और उनका मुँह पूरी तरह खुल चुका था।

मैं बड़ी हैरत से टीचर को देख रहा था। बेड पर बगैर तकिये के सिर रखे मुझे यह सब देखने में थोड़ी तकलीफ हो रही थी और गर्दन उठाकर देखने से मुझे गर्दन में दर्द महसूस हो रहा था, तो मैंने बेड के सिरहाने की तरफ देखा तो वहाँ तकिए मौजूद थे। मैं एक हाथ बढ़ाकर तकिया खींचकर अपने सिर के नीचे रख लिया, जिसके कारण मेरी गर्दन अब ऊपर उठ गई थी और मैं अब वाजिए तौर पर टीचर को सब कुछ करते हुए देख सकता था। अब वो अपनी जबान की नोक से मेरे लण्ड के ऊपरी हिस्से से खेल रही थी। जिसके कारण मेरे पूरे बदन में चीटियाँ सी रेंग रही थीं। मेरी आँखें बंद होने लगी थीं। मगर अब मैं अपनी डेमो क्लास का कोई भी हिस्सा मिस करना नहीं चाहता था। एक-एक हिस्से को सीखना, समझना और एंजाय करना चाहता था।

मगर मजे का क्या करता? वो मेरे बदन में आग लगा रहा था और मैं सोचने और समझने की हद से बाहर जा रहा था। लेकिन एंजाय खूब कर रहा था। टीचर अब मेरे लण्ड को पूरा लेकर चूस रही थी तो कभी नीचे से लेकर ऊपर तक और ऊपर से लेकर नीचे तक चाट रही थी। मैं तो अंदाज़ा नहीं लगा सकता था कि उनके लण्ड को चूसने का स्टाइल सबसे आला है। पर यह जरूर कह सकता हूँ कि मुझे मजा बहुत आ रहा था।

कुछ देर की चुसाइ के बाद टीचर ने अपना सिर मेरे लण्ड से हटाया और अपनी एक टाँग क्रॉस करके मेरे ऊपर आ गई। अब उन्होंने मेरी टाँगों के ऊपर बैठते हुए एक हाथ से मेरे लण्ड को पकड़ा और खुद अपनी चूत के सुराख को मेरे लण्ड के ऊपर सेट करने लगी। मेरा लण्ड ज्योन्ही उसकी चूत पर लगा तो मुझे ऐसा महसूस हुआ कि किसी ने मेरे लण्ड को गरम तंदूर के करीब कर दिया हो। उसकी चूत बहुत ही हाट हो रही थी, जिसकी तपिश अब मेरे लण्ड के टोपे पर भी महसूस हो रही थी।

कुछ देर की सेदटिंग के बाद टीचर ने खुद को मेरे लण्ड के ऊपर दबाया। जिसके कारण मेरा लण्ड एक झटके से 2” तक उनकी चूत में घुस गया। लण्ड के अंदर जाते ही टीचर के मुँह से एक जोरदार सिसकी सी निकली-“स्स्स्स्ि… अह्ह…”

मेरे जिश्म को भी एक मजे की नई लहर का अहसास हुआ। लण्ड के ऊपर उसके चूत की तपिश कुछ और बढ़ गई थी। चन्द सेकेंड इंतजार करने के बाद टीचर एक झटके से ही मेरे लण्ड के ऊपर बैठ गई, और थोड़ी देर पहले मेरा बाहर अकड़ता हुआ लण्ड टीचर की चूत में गुम हो चुका था। मुझे ऐसे लगने लगा कि जैसे मेरे लण्ड को आग पर सेंका जा रहा है।

इस तरह झटके से बैठने के कारण टीचर की भी एक लंबी सी ‘आआआअह्ह’ निकली। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर ली और उनके दोनों हाथ अपने बालों से खेलते हुए उनके सिर पर पहुँच चुके थे। वो अपने चेहरे को बालों और अपनी दोनों बाजू से लगाकर सहला रही थी।

कुछ देर ऐसे ही इंतजार करने के बाद टीचर ने बगैर लण्ड को थोड़ा भी बाहर निकाले अपनी कमर को गोल-गोल घुमाने लगी। जिसके कारण उनकी चूत के पास की चमड़ी मेरे लण्ड के ऊपर की चमड़ी और नीचे मेरे टट्टों के पास रगड़ खा रही थी। जिसकी वजह से मुझे चमड़ी के खिंचने से थोड़ा-थोड़ा दर्द महसूस हो रहा था। मगर मैं खामोश ही रहा कुछ बोला नहीं। क्योंकी इस दर्द के मुकाबले मुझे लण्ड के अंदर होने से उसकी हाट चूत की तपिश और हिलने से जो मजा रहा था मैं उसको गँवाना नहीं चाहता था।

 
कुछ देर ऐसे ही इंतजार करने के बाद टीचर ने बगैर लण्ड को थोड़ा भी बाहर निकाले अपनी कमर को गोल-गोल घुमाने लगी। जिसके कारण उनकी चूत के पास की चमड़ी मेरे लण्ड के ऊपर की चमड़ी और नीचे मेरे टट्टों के पास रगड़ खा रही थी। जिसकी वजह से मुझे चमड़ी के खिंचने से थोड़ा-थोड़ा दर्द महसूस हो रहा था। मगर मैं खामोश ही रहा कुछ बोला नहीं। क्योंकी इस दर्द के मुकाबले मुझे लण्ड के अंदर होने से उसकी हाट चूत की तपिश और हिलने से जो मजा रहा था मैं उसको गँवाना नहीं चाहता था।

कुछ देर इस तरह अपनी गाण्ड गोल-गोल घुमाने के बाद टीचर ने अपने दोनों हाथ मेरे कंधों के पास रख दिए, और फ़िर अपनी कमर को उठाकर लण्ड को अपनी चूत से थोड़ा बाहर निकाला, मगर इतना नहीं कि पूरा ही लण्ड बाहर निकल जाए। और फ़िर एक जोरदार झटके से उसको वापिस अंदर ले लिया। पहले-पहले तो वो यह झटके आराम-आराम से लगाती रही। और हल्की-हल्की सिसकियाँ भी भरती रही। लेकिन फ़िर उनके झटकों और सिसकियों में तेजी आती गई।

वो बड़ी महारत और नपे तुले अंदाज में अपनी कमर को ऊपर उठाती और फ़िर उसी अंदाज में नीचे करती। जिसकी वजह से मेरा लण्ड उनकी चूत में तेजी से अंदर-बाहर होने लगा। उनकी गरम चूत की तपिश और रगड़ मुझे बेचैन कर रही थी। मेरी आँखें कभी बंद हो जाती, तो कभी मैं उन्हें खोलने की कोशिस करता तो मेरे सामने ही टीचर के खूबसूरत मम्मे झूलते हुए दिखाई देते।

मैंने गैर इरादी तौर पर अपने हाथ उठाकर उन झूलते हुए मम्मों को अपने हाथों में पकड़ने को कोशिस की। मगर वो तो इस तेजी से ऊपर-नीचे हो रहे थे, कि हर बार मेरे हाथों से निकल जाते। मैं भी मुकम्मल तौर पर मजे में खोया हुआ था, और मेरे हाथों में भी इतना दम नहीं था कि में उन्हें मजबूती से पकड़ सकता। इस दौरान मुझे महसूस होने लगा का मेरा जिश्म अकड़ने लगा था। मेरे मुँह से आवाजें निकलने लगी थीं, जिस पर मेरा कोई कंट्रोल नहीं था-“ऊओह्ह… ओह्ह… ओह्ह… आह्ह…”

मेरी आवाजें और जिश्म की अकड़न देखकर टीचर ने आँखें खोली और उनको आवाजें सुनाई दी। लेकिन उन्होंने बात करते हुए रोकने की कोशिस की-“नहीं थोड़ा और… रुक जाओ… मैं भी… मैं भी आ रही हूँ…”

मुझे टीचर की कोई बात समझ में नहीं आई। मेरा खुद पर से कंट्रोल खतम हो चुका था। मेरा जिश्म पूरी तरह अकड़ गया। मैंने गैर इरादी तौर पर अपने निचले धड़ को ऊपर की तरफ उठाना शुरू कर दिया जिसके कारण अब टीचर को ऊपर-नीचे होने में थोड़ी तकलीफ होने लगी, तो वो रुक गई और बड़ी तेजी से उन्होंने मेरे कंधों के पास से हाथ हटाकर मेरी कमर के पास रखे, और उसे नीचे की तरफ दबा दिया। मेरी कमर एक बार फ़िर बेड से लग गई। टीचर जल्दी से मेरे पूरे लण्ड को अपने अंदर रखते हुए कमर को आगे पीछे करने लगी, जिसके कारण अब मेरा लण्ड डाइरेक्ट टीचर की सामने वाली जगह से रगड़ खा रहा था।

चन्द ही लम्हे इस हालत में होने का बाद रूम टीचर की और मेरी एक साथ ही जोरदार-“आआअह्ह… मर गई… आह्ह… कम ओन अह्ह… ओईईई… ऊऊईईई… अह्ह…” की आवाजों से गूँज उठा।

मेरे लण्ड से कुछ धारें निकलकर टीचर की चूत में भरती जा रही थी। मुझे भी अपने लण्ड पर कुछ गरम-गरम लिक्विड़ का अहसास हुआ। टीचर ने चूत को बड़ी मजबूती से मेरे लण्ड के ऊपर दबा रखा था। उनके जिश्म को जोरदार झटके लग रहे थे। उनकी आँखें कभी खुलती तो, कभी बंद हो जाती थी। दो से तीन मिनट तक इस हालत में रहने के बाद टीचर बेसूध सी होकर मेरे ही ऊपर गिर गई। उनके नरम-ओ-गुदाज मम्मे मेरे सीने में दब गये थे, और टीचर का ढलका हुअ सिर मेरे बायें साइड पे गिरा हुआ था।

***** *****फ्लेशबैक से वापिस

सारा के सेक्सी बदन के नशेबो फराज को कपड़ों की ही कैद से देख-देखकर जो मैं इतने दिन से हाट हो रहा था, और फ़िर वो चादर वाली। मैंने बहुत दिन सबर किया था। लेकिन आज मैं खुद को रोक नहीं पाया। फूफो और सारा के जाने के बाद मेरे जेहन में सारा को चोदने की प्लाननिंग चल रही थी। इसी दौरान मैं कब अपने जेहन में अपनी लाइफ के पहले सेक्स, जो कि अपनी टीचर के साथ किया था उसको सोचते-सोचते सो गया।

आज मुझे खाना खाने का भी खयाल ना रहा था। सुबह जब मेरी आँख खुली तो मुझे महसूस हुआ कि शायद कोई मेरे लण्ड पर बहुत धीरे-धीरे से हाथ को घुमा रहा है। नीचे से ऊपर फ़िर ऊपर से नीचे उसके छूने से महसूस हो रहा था कि जैसे वो मेरे लण्ड की साइज़ और मोटाई का अंदाज़ा लगाने की कोशिस कर रहा है। मैं इस बात को महसूस करते ही सोने की एक्टिंग करता रहा, और हल्के से आँखों में झिर्री बनाकर देखा तो मेरे बेड की एक साइड पर सारा को बैठे देखकर मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा। मैं यह देखकर खुश हो गया कि मुझे तो कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी थी, और सारा खुद ही मेरे लण्ड को देख रही थी। उसकी आँखें मेरे लण्ड की तरफ लगी हुई थी, जो सुबह के वक्त मेरे खयालों में अकड़ा हुआ टेंट बनाकर खड़ा था।

सारा की आँखों में हवस और सेक्स के डोरे वाजिए तौर पर तैर रहे थे। वो मेरे लण्ड की साइज़ और मोटाई को देखकर शायद उसमें गुम थी। उसको इस बात का भी होश नहीं था कि मेरी आँख भी खुल सकती है? मैंने उसे इतना अपने लण्ड में खोया हुआ देखकर अपनी आँखें पूरी खोल ली, मगर अपनी जगह से कोई हरकत नहीं की। अब मैं पूरी आँखें खोलकर उस देख रहा था। मगर वो सिर्फ़ हल्के-हल्के हाथों से मेरे लण्ड को सहला रही थी, उसे पकड़ने की कोशिस नहीं की थी। सारा को अपने सामने इस तरह देखकर, मेरे लण्ड में मजीद ऐंठन होने लगी, और उसने एक जोरदार झटका लिया।

जिससे सारा चौंक गई और वो अपनी मदहोशी की काफ़ियत से बाहर आ गई। उसने जल्दी से मेरे चेहरे की तरफ देखा तो मेरी आँखें खुली देखकर वो घबरा गई, और झट से बेड पर से उठकर खड़ी हो गई। मैं मुश्कुराती हुई नजरों से सारा को देख रहा था।

वो मुझे अपनी तरफ देखते हुए देखकर झट से बोली-“वो… वो छोटे साईं। मैं तो… मैं तो बस आपको लेने के लिए आई थी। वो जनानखाने में बड़ी बीबी साईं आपका इंतजार कर रही हैं…” यह कहकर उसने अपनी नजरें नीचे झुका ली और अपने दुपट्टे के पल्लू को एक हाथ में लेकर दूसरे हाथ की उँगली पर लपेटने लगी।

मैं मुश्कुराता हुआ उठा, और थोड़ा सा खिसक कर बेड के सिरहने से टेक लगा ली। और फ़िर सारा की तरफ देखकर बड़े ही प्यार से उसे अपने करीब आने को कहा-“इधर आओ सारा…”

सारा अभी तक अपनी नजरें नीचे झुकाए खड़ी थी, उसने कोई जवाब नहीं दिया मगर खामोशी से बस दो कदम आगे बढ़कर बेड की साइड से लगकर खड़ी हो गई। मैंने थोड़ा आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ पकड़ते ही मुझे महसूस हुआ कि वो धीरे-धीरे काँप रही है। मेरे हाथ पकड़ते ही सारा ने एक लम्हे के लिए अपनी नजरें उठाकर मेरी तरफ देखा। मैं अब भी उसके चेहरे पर नजरें गाड़े उसको मुश्कुराकर देख रहा था। उसने मुझे इस तरह अपनी तरफ देखते हुए पाकर जल्दी से अपनी नजरें नीची कर ली।

 
सारा अभी तक अपनी नजरें नीचे झुकाए खड़ी थी, उसने कोई जवाब नहीं दिया मगर खामोशी से बस दो कदम आगे बढ़कर बेड की साइड से लगकर खड़ी हो गई। मैंने थोड़ा आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ पकड़ते ही मुझे महसूस हुआ कि वो धीरे-धीरे काँप रही है। मेरे हाथ पकड़ते ही सारा ने एक लम्हे के लिए अपनी नजरें उठाकर मेरी तरफ देखा। मैं अब भी उसके चेहरे पर नजरें गाड़े उसको मुश्कुराकर देख रहा था। उसने मुझे इस तरह अपनी तरफ देखते हुए पाकर जल्दी से अपनी नजरें नीची कर ली।

मैंने उसे कहा कुछ नहीं बस हल्के से उसके हाथ को अपनी तरफ खींचकर उसे बेड के साइड पर अपने पास बिठा लिया। वो भी जैसे मेरे लण्ड के ट्रांस में आई हुई मुझे महसूस हुई वो फौरन ही बेड की साइड पर बैठ गई।

मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा-“सारा यह तुम क्या कर रही थी?”

मेरी बात सुनकर उसने जल्दी से अपने दूसरे हाथ से अपना चेहरा छुपा लिया, और कोई जवाब नहीं दिया।

मैंने एक बार फ़िर उससे पूछा-“सारा तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। तुम यह क्या कर रही थी?” इस बार मैंने अपने लहजे में थोड़ी सी सख्ती पैदा की और अपने चेहरे पर आने वाली मुश्कुराहट को भी बड़ी मुश्किल से छुपाया।

मेरे लहजे की सख्ती को महसूस करते हुए। सारा ने अपने चेहरे से हाथ हटा लिया और मेरी तरफ देखा तो इस बार मेरे चेहरे पर संजीदगी देखकर उसने जल्दी से अपनी नजरें झुका ली। और धीरे से हकलाते हुए जवाब दिया-“छोटे… छोटे साईं वो…। वो आपका यह… बहुत… बहुत बड़ा है तो… तो मैं देख… देखकर हैरान हो गई थी… इस लिए…”

सारा की बात सुनकर मैं थोड़ा हैरान भी हुआ और समझ गया कि लण्ड सारा के लिए कोई नई चीज नहीं है।

सारा शायद इसकी मौजूदगी और इश्तेमाल से वाकिफ है। इसीलिए तो उसे मेरे बड़े लण्ड ने अपने होश-ओ-हवस गवाँने पर मजबूर कर दिया था। मैंने सारा की बात के जवाब में उससे कहा-“क्यों, क्या तुमने पहले कभी इतना बड़ा नहीं देखा, जो मेरा देखकर तुम इतनी हैरान हो गई हो?”

मेरी बात सुनकर उसने सिर्फ़ ना में गर्दन हिलाई। मगर जबान से कोई जवाब ना दिया।

“ह्म् म्म्म…” की एक आवाज मेरे मुँह से निकली और मैं कुछ सोचने लगा। फ़िर कुछ सोचते हुए मैंने सारा से पूछा-“इसका मतलब कि तुमने पहले भी किसी का देखा है? क्या तुम मुझे बताओगी कि तुमने किसका देखा है?”

मेरी बात सुनकर उसके गाल लाल हो गये, और उसने अजीब सी नजरों से मेरी तरफ देखकर कहा-“छोटे साईं, हम दासियों को ऐसी बातें बताने की इजाजत नहीं होती। यह ना पूछें…”

मैं उसकी बात, उसकी नजरें और उसका लहजा सुनकर हैरान रह गया। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। लेकिन मैं इस कैफ़ियत को समझ नहीं पाया, और दिल की धड़कनों पर काबू पाते हुए उसको कहा-“क्यों, किसकी इजाजत नहीं है तुम्हें? मुझे बताओ…”

मेरी बात सुनकर सारा एक झटके से बेड पर से उठ गई, और बोली-“अभी तो हवेली में आए हैं आप। यहाँ रहेंगे तो आपको सब पता चल ही जाएगा। फ़िलहाल तो आप जल्दी से तैयार हो जाइए। बड़ी बीबी साईं आपका इंतजार कर रही हैं…”

सारा की यह बात सुनकर मेरे तो चारों तबाक रोशन हो गये। मैं जो यह सोच रहा था, सारा ने ही पहला कदम उठा लिया है, तो अभी हवेली में जाने से पहले ही सारा को चोदकर संतुष्ट कर लेता हूँ। वो सारे खलायत सारा की बात सुनकर मेरे दिमाग़ से भक्क करके उड़ गये। सारा के इस जवाब ने हवेली की पुर्सररियत मेरे दिल में और बढ़ा दी थी। अब मेरा फ़ितरती जासूस मुझे चैन नहीं लेने देगा, जब तक कि मैं अपने सारे सवालों का जवाब ना ढूँढ लूँ।

 
सारा की यह बात सुनकर मेरे तो चारों तबाक रोशन हो गये। मैं जो यह सोच रहा था, सारा ने ही पहला कदम उठा लिया है, तो अभी हवेली में जाने से पहले ही सारा को चोदकर संतुष्ट कर लेता हूँ। वो सारे खलायत सारा की बात सुनकर मेरे दिमाग़ से भक्क करके उड़ गये। सारा के इस जवाब ने हवेली की पुर्सररियत मेरे दिल में और बढ़ा दी थी। अब मेरा फ़ितरती जासूस मुझे चैन नहीं लेने देगा, जब तक कि मैं अपने सारे सवालों का जवाब ना ढूँढ लूँ।

तो फ़िलहाल मैं तमाम चीजों को अपने जेहन से निकालते हुए फौरन बेड से उठ गया और वाशरूम में घुस गया। और शावर खोलकर उसके नीचे खड़ा हो गया। कुछ देर वो सारे सवाल मेरे जेहन को डिस्टर्ब करते रहे। मगर गरम पानी की फुहार मुझे उन तमाम सवालों को अपने जेहन से झटकने में मदद दे रही थी। मैं अपने जेहन को इन तमाम सवालों से खाली करना चाहता था, और आज मैं खुले और फ्रेश दिमाग़ के साथ हवेली के जनानखाने में जाना चाहता था। ताकी मैं अपने उन तमाम रिश्तों को खुली आँखों और खुले जेहन के साथ देख और परख सकूँ, जिनसे मैं आज तक दूर रहा था।

मैं देखना और समझना चाहता था। क्या वो रिश्ते वाकई मुझसे वो मुहब्बत और तड़प रखते हैं, जिनका वो किसी ना किसी रवैये से मेरे साथ इजहार कर चुके थे। कुछ देर इसी तरह शावर के नीचे खड़े होने के बाद मैं फ्रेश होकर तौलिया बाँधकर बाहर रूम में आ गया था। अब मुझे सारा से वो परदा महसूस ना हुआ जो चन्द दिन पहले था। इसीलिए मैं सारा से वाशरूम में ही कपड़े माँगने के बजाए बाहर निकल आया था।

सारा मेरे कपड़े निकालकर बेड पर रखे मेरे वाशरूम से कपड़े माँगने का इंतजार कर रही थी कि मुझे अचानक से वाशरूम से बाहर आते देखकर चौंक गई। लेकिन जब उसने मेरी तरफ देखा तो वो अपनी नजरें मुझे पर से चाहकर भी हटा ना सकी।

और यह मेरे साथ पहली बार नहीं हुआ था। ऐसे तजुर्बे से मैं कितनी ही बार गुजर चुका था। मेरा गोरा-चिट्टा बालों से पाक कसरती बदन, मेरे लंबे कद के साथ पूरी तरह से मैच खाता था। चौड़ा सीना, बाजुओ के मिल, रोजाना की कसरती, और कराटे की प्रेक्टिस ने मेरे जिश्म पर बहुत वाजिए तब्दीलियाँ असर अंदाज की थी। मैं 17 साल की उमर में ही अपनी उमर के नौजवानों से ज़्यादा बड़ा दिखता था। मेरी हल्की-हल्की शेव और मूछें भी निकल आई थीं, जिसके पूरे काले बाल मेरे गोरे चेहरे पर बहुत जचते थे।

मैंने मुश्कुराती हुई नजरों से सारा की तरफ देखा तो उसने झट से अपनी नजरें नीची कर ली। मैंने उसपर से नजरें हटाते हुए बेड की तरफ देखा तो उसने बेड पर मेरा सफेद काटन सूट और उसके साथ एक आजरक और सिंधी टोपी भी रखी हुई थी। यह हमारे सिंध के पूरे कैजुअल लिबास था। मैंने तौलिए के ऊपर से ही सलवार पहनी और फ़िर तौलिया खींचकर निकाल दिया। इस दौरान मुझे महसूस हो रहा था कि सारा चोर नजरों से बार-बार मुझे ही देख रही है।

मैंने उसके ऊपर ध्यान ना देते हुए कपड़े पहन लिए। फ़िर सिंधी टोपी उठाकर अपने सिर पर रखी, और आजरक को फोल्ड करके अपने गले में डाल लिया। अब मुझे बहुत सख़्त भूख महसूस होने लगी थी। क्योंकी मैंने कल रात का भी खाना नहीं खाया था।

मैंने सारा की तरफ देखते हुए कहा-“आज तुम मेरा नाश्ता नहीं लाई…”

सारा-“आज आपका नाश्ता जनानखाने में है। वो आपको वहीं मिलेगा…”

मैं सारा की बात सुनकर मुश्कुरा दिया। एक नजर साइड पर लगी ड्रेसिंग टेबल के आदमकद आईने में खुद को देखा तो एक लम्हे के लिए मुझे खुद पर ही प्यार आ गया। मैं इन कपड़ों में बहुत अच्छा लग रहा था। सफेद काटन पर रेड रंग की सिंधी टोपी जिसमें मुख्तलिफ कलर्स के नगीने लगे हुए चमक पैदा कर रहे थे। और उसी टोपी से मैच खाती हुई अपने रिवाती रंग से बनी आजरक मेरी शख्सियत को और उजागर कर रही थी।

मेरे चेहरे के भाव देखते हुए सारा ने मुश्कुराकर कहा-“चलिए छोटे साईं। कहीं आईने में खुद को ही ना नजर लगा बैठें…”

सारा की बात सुनकर मैं थोड़ा सा झेंप गया, और चेहरे पर खिसियानी सी मुश्कुराहट लाते हुए जवाब दिया-“मुझे तो तुम्हारा डर था कि कहीं तुम मुझे देखते-देखते होश-ओ- हवास गवाँ बैठी तो मुझे जनानखाने कौन ले जाएगा?”

मेरे जवाबी हमले से सारा ने खुद को संभालते हुए जल्दी से कहा-“इसमें कोई शक नहीं कि आप बहुत खूबसूरत लग रहे हो, और आज तो वाकई मुझे आप झटके पे झटके दे रहे हो। मैं किसी भी वक्त अपने होश गवाँ सकती हूँ…”

 
मेरे जवाबी हमले से सारा ने खुद को संभालते हुए जल्दी से कहा-“इसमें कोई शक नहीं कि आप बहुत खूबसूरत लग रहे हो, और आज तो वाकई मुझे आप झटके पे झटके दे रहे हो। मैं किसी भी वक्त अपने होश गवाँ सकती हूँ…”

उसकी बात सुनकर मैं दिल ही दिल में थोड़ा सा खुश हुआ कि चलो हवेली में आज नहीं तो कल एक इबतदा तो हो ही जाएगी। क्योंकी अब मुझे नहीं लगता था कि सारा के लिए मुझे कोई ख़ास मेहनत करनी पड़ेगी। फ़िर उसकी बात के जवाब देते हुए मैंने कहा-“तो फ़िर जल्दी चलो। अगर तुमने यहाँ अपने होश खो दिए तो फ़िर शायद मैं भी अब खुद पर काबू ना रख सकूँ…”

मेरी बात समझकर सारा के गाल लाल हो गये थे और उसने अपनी नजरें झुका ली थी। फ़िर जल्दी से उसने बाहर की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए, और मैं भी उसके पीछे-पीछे रूम से बाहर निकल आया। सारा मुझसे कुछ ही कदम आगे चल रही थी। आज उसकी चाल में अजीब लहक थी। वो इस तरह इठला-इठला के चल रही थी, जैसे वो हवाओं में उड़ रही हो। और उसके इस तरह चलते हुए जब उसकी गाण्ड के दो हिस्से बारी-बारी हिलते तो मेरे दिल की बेचैनी बढ़ जाती थी।

एक लम्हे के लिए तो मुझे खयाल आया कि मैं सारा को यहाँ से पकड़कर वापिस अपने कमरे में ले जाऊँ और उसकी खूबसूरती का ऐसा खिराज अदा करूँ कि उसको भी पता चले कि जब खूबसूरती का खिराज अदा किया जाता है तो… तो जो फटीज होता है वो अपने ही मफ्तूह को किराज अदा करता है। वो जीत कर भी उसके जिश्म की सल्तनत पर अपना सब कुछ हार चुका होता है।

लेकिन मैंने बड़ी मुश्किल से दिल और लण्ड को समझाया कि थोड़ा सबर। पहले इस हवेली से पूरी तरह वाकिफ तो हो जाओ, फ़िर यह भी तुमसे दूर नहीं। बकौल सब लोगों के अब इस हवेली और यहाँ की हर चीज का मैं ही तो मालिक हूँ, तो फ़िर यहाँ की कोई चीज मुझसे कैसे दूर रह सकती थी? हम लोग सीढ़ियाँ उतरकर जनानखाने के दरवाजे पर पहुँच चुके थे।

अब मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। यह वो दरवाजा था जिसके पीछे मेरे वो तमाम रिश्ते कैद थे, जिनसे मैं आज तक वाकिफ नहीं था। मेरे खून के रिश्ते, मेरी दादी, मेरी फूफो, और मेरी वो बहनें, जो थी तो सौतेली लेकिन मेरे ही बाप का खून थी, मेरा अपना खून थी। मेरे बाप का खून। हमारी रगों में एक ही बाप का खून था, और बहनों का वो रिश्ता था, जिसके लिए मैं बचपन से ही तड़पा था। उनका खत पढ़कर ही मैं यहाँ रुकने पर मजबूर हुआ था, और अब मैने अपनी उन छोटी बहनों से दूर नहीं रह सकता।

सारा ने जनानखाने का मुख्य दरवाजा खोला और अंदर दाखिल होकर मुझे आगे बढ़ने का इशारा किया तो मैं भी उसके पीछे-पीछे जनानखाने के दरवाजे में दाखिल हो गया। यह एक लंबी राहदरी थी जो बहुत आगे तक चली गई थी। राहदरी के दोनों तरफ दीवार में बड़े-बड़े शीशे लगे हुए थे, जिससे बाहर का मंज़र नजर आता था। इन शीशों के दूसरी तरफ दोनों साइड पर खूबसूरत लान बना हुआ था जिसमें मुख्तलिफ इक्साम के फूल और और दरख़्त लगे हुए थे। यह पूरा लान जादील और सुंदर सुंदर फूलों से भरा हुआ था।

 
सारा मेरे आगे-आगे राहदरी के दूसरे सिरे की तरफ बने एक और दरवाजे की तरफ बढ़ रही थी। उस शानदार दरवाजे पर लकड़ी का बहुत ही आला काम बना हुआ था। उसपर उभरे हुए नक़्शो निगार करीगर की कारीगरी का मुँह बोलता सबूत थे। मैं सारा के पीछे-पीछे इन तमाम चीजों को देखता हुआ आगे बढ़ रहा था। सारा ने आगे बढ़कर उस दरवाजे को खोला और खुद अंदर ना दाखिल होते हुए मुझे पहले अंदर दाखिल होने का इशारा किया। मेरे दिल की धड़कन बढ़ चुकी थी। दिलो दिमाग़ पर जज़्बात हावी हो चुके थे। शायद यही वो आखिरी दीवार थी जो मेरे अनमोल रिश्तों के बीच में खड़ी थी। और अब मैं भी जल्द से जल्द इस दीवार को तोड़कर उन तक पहुँच जाना चाहता था।

मैंने धड़कते दिल के साथ उस दरवाजे की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए। मेरे उस दरवाजे से अंदर दाखिल होते ही मैं एक बड़े से हाल में पहुँच गया था। मेरी नजर सबसे पहले ही हाल के बीचोबीच लगे एक खूबसूरत से फ़ानूस पर पड़ी। जो हाल की छत से लटका यहाँ के मकीनो के अर्मट की गवाही दे रहा था। चारों तरफ की दीवारें बड़ी-बड़ी खूबसूरत तसवीरोज़ से सजी हुई थीं। अभी मैं उस हाल की ताजीन-ओ-आरैश को सही से देख भी नहीं पाया था कि मेरे ऊपर फूलों की पत्तियाँ निछावर होने लगीं।

पहले तो मैं इस अचानक इफ्तियाद से चौंक गया। मगर अपने ऊपर फूलों की बारिश होते देखकर हैरत और खुशी के मिले जुले भाव के साथ नजर दौड़ाई तो कुछ खूबसूरत लड़कियाँ मुनासिब से लिबास में अपने हाथों में फूलो से भरे थाल उठाए मुझ पर फूल बरसा रही थी। और सिंधी जबान में खुश-आमदीद का सेहरा (कुलत्रूल घाना) गाने लगी।

मैं अभी उनको देख ही रहा था कि एक जोरदार आवाज ने मुझे अपनी तरफ देखने पर मुतवीजा कर दिया-“भाई…”

भाई का लफ्र्ज सुनकर ही मेरे दिल की धड़कन और बढ़ गई और मैंने झट से सामने की तरफ देखा तो मुझे सामने कुछ औरतें खड़ी नजर आई। मैं उन्हें अभी सही से देख भी नहीं पाया था की दो नौजवान और खूबसूरत ऐसी की लगता था की आसमान से उतरी कोई परिया हों, मेरी तरफ भागने लगी। मैं अभी उनको पूरी तरह से देख भी नहीं पाया था कि वो दोनों भागती हुई आकर मेरे सीने से लग गई।

वो दोनों भी रगो-ओ-रूप की तरह कड़ो कामत मैं भी आम लड़कियों से कुछ हटकर ही थी। वो दोनों बड़ी जोर से आकर मेरे सीने से लगी थी। मैं एक लम्हे के लिए लड़खड़ा गया था। मगर मैंने अपने दोनों बाजू पहले ही खोलकर उनको भी थाम लिया और खुद को लड़खड़ाने से बचा लिया। वो मुसलसल रोए जा रही थी। उन दोनों ने अपना सिर मेरे चौड़े सीने में छुपाया हुआ था। मुझे उन दोनों के मिले जुले जो अल्फाज समझ में आ रहे थे, वो मैं यहाँ लिख रहा हूँ। मगर उस वक्त मैं अंदाज ना लगा पाया था कि कौन क्या कह रहा है।

“भाई, बाबा हमें छोड़ गये। भाई हम यतीम हो गये। भाई अब हमारा कौन है? आप भी हमसे बहुत दूर थे। हम डरे हुए थे कि आप हमारे पास आएँगे भी कि नहीं? भाई बाबा हमें छोड़ गये। भाई आप हमें ना छोड़ना। भाई इस दुनियाँ में हमारा और कोई नहीं हैं। इन बंद दीवारों में, इस हवेली की ऊँची-ऊँची दीवारों की कैद में हम आपके बगैर घुट-घुट कर मर जायेंगे। भाई हम मर जाएँगे, आप हमें छोड़कर मत जाना…”

 
“भाई, बाबा हमें छोड़ गये। भाई हम यतीम हो गये। भाई अब हमारा कौन है? आप भी हमसे बहुत दूर थे। हम डरे हुए थे कि आप हमारे पास आएँगे भी कि नहीं? भाई बाबा हमें छोड़ गये। भाई आप हमें ना छोड़ना। भाई इस दुनियाँ में हमारा और कोई नहीं हैं। इन बंद दीवारों में, इस हवेली की ऊँची-ऊँची दीवारों की कैद में हम आपके बगैर घुट-घुट कर मर जायेंगे। भाई हम मर जाएँगे, आप हमें छोड़कर मत जाना…”

उनकी बातें सुनकर मैं खुद पर से कंट्रोल खो बैठा था। जज़्बात मुझपर पूरी तरह हावी हो चुके थे। बाबा की मुहब्बत उनकी शफकत मुझे याद आ रही थी। मैंने अपनी बहनों को अपने साथ भींच लिया, और खुद भी रोने लगा। हवेली के इस बड़े हाल में हम भाई बहनों के रोने की आवाजों के साथ दूसरे लोगों के रोने की आवाजें भी शामिल हो गई थीं। हमारी तड़प, हमारा दुख, और हमारा मिलन शायद किसी के भी जज़्बात को रोक नहीं पाया था। अब जो थोड़ी देर पहले यहाँ सहरो की गूँज थी उसकी जगह आहों ने ले ली थी। मेरी बहनों की आवाज में बहुत दर्द था।

मैंने गैर इरादी तौर पर अपनी बहनों के सिर पर चूमा और बोलने लगा-“मैं हूँ ना। भाई की जान मैं हूँ, मैं तुम्हें बाबा का प्यार दूँगा। मैं तुम्हें कभी छोड़कर नहीं जाउन्गा। तुम मेरी जान हो और तुम दोनों के लिए ही तो अब मैं जिंदा हूँ और इस हवेली में आया हूँ। हवेली की दौलत और जागीर मुझे नहीं चाहिए। मेरी जागीर और दौलत तो बस तुम हो मेरी बहनों तुम हो। मैं तुम्हें कभी कोई तकलीफ नहीं होने दूँगा…”

हम तीनों भाई बहन एक दूसरे में चिपके हुए रो रहे थे कि मुझे बड़ी फूफो की आवाज सुनाई दी जो कब हमारे करीब आई मुझे पता ही नहीं चला। उनकी आँखों में भी आँसू जारी थे। वो हमारी एक साइड पर खड़े हम लोगों की पीठ और सिर पर बड़ी शफकत से हाथ फेर रही थी, और हमें तसल्ली दे रही थी-“बस करो बेटा। अब रोना बंद करो। देखो तुम्हारा भाई पहली बार हवेली में आया है। तुम्हारे पास आया है तो क्या तुम उसे यू ही रूलाती रहोगी?”

फूफो की बात सुनकर दोनों ने मेरे सीने पर से अपना सिर हटाकर गर्दन उठाकर मुझे देखा, और बारी-बारी दोनों अपने मासूम हाथों से मेरे आँसू पोंछने लगी। और उनमें से एक ने जो दूसरी से थोड़ी बड़ी लग रही थी, उसने अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को थामकर थोड़ा झुकाया और खुद अपने पंजों पर थोड़ा ऊपर उठते हुए मेरे माथे को चूम लिया। इस चूमने में जो राहत थी, मैं उसको यहाँ अल्फाज में बयान नहीं कर सकता। एक सकून की लहर थी। मेरा पूरा बदन उस सकून और मुहब्बत की लहर से भर गया।

फ़िर उसने कहा-“हमारा भाई तो शेर है। वो कभी नहीं रोएगा। बस बहनों की मुहब्बत में थोड़ा कमजोर हो गया था…” यह कहकर वो रोती हुई आँखों से हँसने लगी। इस दौरान मेरी दूसरी बहन ने भी पहली की तरह मेरा माथा चूमा, और बड़ी की बात सुनकर वो भी मुश्कुराने लगी।

 


फ़िर उसने कहा-“हमारा भाई तो शेर है। वो कभी नहीं रोएगा। बस बहनों की मुहब्बत में थोड़ा कमजोर हो गया था…” यह कहकर वो रोती हुई आँखों से हँसने लगी। इस दौरान मेरी दूसरी बहन ने भी पहली की तरह मेरा माथा चूमा, और बड़ी की बात सुनकर वो भी मुश्कुराने लगी।

मैंने भी बारी-बारी दोनों के आँसू पोंछे और कहा-“तुम्हारा भाई वाकई शेर है। दुनियाँ की कोई भी ताकत उसे रुला नहीं सकेगी। लेकिन तुम्हारी मुहब्बत उसकी अब बहुत बड़ी कमजोरी बन गई है। तुम अगर कभी रोई तो यह भाई भी रो देगा…”

मेरी बात सुनकर वो दोनों एक बार फ़िर मेरे गले लग गई। इसी दौरान एक दूसरी खूबसूरत सी खातून आगे बढ़ आई, उनके चलने और बात करने में एक अजीब ही वेकार और दबदबा था, उनकी आँखों से भी आँसू की झड़ी लगी हुई थी। उन्होंने करीब आकर मेरी बहनों की पीठ पर हाथ रखा और और जबरदस्ती मुश्कुराते हुए कहा-“अच्छा अब अगर बहनों का दिल भाई से मिलकर भर गया हो तो, हम भी अपने भाई की निशानी से मिल लें?”

तब मुझे अंदाज़ा हुआ कि वो खातून शायद मेरी छोटी फूफो हैं। उनकी बात सुनकर दोनों बहनों ने मुड़कर उन्हें देखा और छोटी वाली ने कहा-“छोटी फूफो साईं। हम नहीं छोड़ेंगे अपने भाई को। क्या इतनी जल्दी हमारा दिल अपने भाई से भर जाएगा?”

उसकी बात सुनकर सबके चेहरे पर मुश्कुराहट आ गई।

मैंने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा-“तुम्हारा भाई अब यहाँ है। लेकिन अब बड़ों से ना मिलकर अपने भाई को नाफरमान तो ना बनाओ…”

मेरी बात सुनकर बड़ी फूफो के मुँह से फौरन निकला-“मैं सदके मेरी जान। हमारा खून नाफरमान हो ही नहीं सकता…” यह कहकर उन्होंने आगे बढ़कर मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों में भर लिया और मेरे माथे को चूमते हुए, मुझे अपने गले से लगा लिया।

कुछ देर तक तो उन्होंने मुझे अपने गले से लगाए रखा, और फ़िर दूर होते हुए बोली-“मेरी जान मैं हूँ तुम्हारी बड़ी फूफो, तुम्हारे बाबा की बड़ी बहन…” उन्होंने यह तारूफ करवाकर मुझे जता दिया था कि मैं गलती से भी उनसे हुई मेरी पहली मुलाकात का इजहार ना करूँ और ना ही उनसे किसी शहनसाइ महसूस कारवाऊूँ।

मैंने एकदम से झुक कर बड़ी फूफो के पैर छू लिए।

जिस पर उन्होंने जल्दी ही पीछे हाथ करके मुझे दोनों बाजू से पकड़कर ऊपर उठा दिया और कहा-“नहीं मेरे बच्चे, तुम्हारी जगह तो हमारे दिल में है…”

मैंने मुश्कुराते हुए उन्हें देखकर कहा-“लेकिन बड़ी फूफो। मैं बड़ों का सम्मान और खानदानी रिवायत से भी तो रोगाडानी नहीं कर सकता…”

मेरी बात सुनकर उन्होंने एक बार फ़िर मेरे चेहरे को अपने हाथों में भरते हुए, मेरे माथे को चूम लिया, और दो आँसू के कतरे उनकी आँखों से बह गये। मैंने अपने हाथों से उनके आँसू सॉफ करते हुए गर्दन हिलाकर उनको रोने से मना किया। इसी दौरान किसी ने पीछे से आकर मेरी पीठ को थपथपाया।

मैंने गर्दन घुमाकर देखा तो छोटी फूफो मेरे पीछे खड़ी मुश्कुरा रही थी। उनकी भी आँखें आँसुओं से भरी थीं, मगर उनके होंठों पर मुश्कुराहट थी। उन्होंने भी मेरे चेहरे को अपने हाथों में भरते हुए मेरे माथे पर चूमा और कहा-“बिल्कुल हमारे बाबा का दूसरा रूप हो तुम, वही कद, वही आँखें, वैसा ही नैन नक्श। ऐसा लगता है कि बाबा… पीर सैयद बादशाह अली शाह फ़िर से हमारे सामने आ गये हों…”

 
मैंने गर्दन घुमाकर देखा तो छोटी फूफो मेरे पीछे खड़ी मुश्कुरा रही थी। उनकी भी आँखें आँसुओं से भरी थीं, मगर उनके होंठों पर मुश्कुराहट थी। उन्होंने भी मेरे चेहरे को अपने हाथों में भरते हुए मेरे माथे पर चूमा और कहा-“बिल्कुल हमारे बाबा का दूसरा रूप हो तुम, वही कद, वही आँखें, वैसा ही नैन नक्श। ऐसा लगता है कि बाबा… पीर सैयद बादशाह अली शाह फ़िर से हमारे सामने आ गये हों…”

मैं हैरत से उन्हें देखा रहा था। वो बहुत ही खूबसूरत खातून थी। एक भरपूर खातून। उनके बातें करने के अंदाज में वेकार था। उनके देखने का अंदाज, किसी की भी रगों में खून की तेजी बढ़ा सकता था। वो मुझे बहुत ही प्यार से देखे जा रही थी। मैंने आगे बढ़कर उनको अपने सीने से लगा लिया, उनके बदन से शहर अंगेज खुश्बू उठ रही थी। जिसने मुझे चन्द लम्हों तक उनसे दूर होने ना दिया। मैं उनकी शख्सियत के शहर में जैसे खो सा गया। फ़िर दिल पर बहुत जबर करते हुए मैं उनसे थोड़ा अलग हुआ और फ़िर उनके चेहरे को भी हाथों में भरकर मैंने उनका माथा चूम लिया।

वो खामोशी से मुझे बस देखे जा रही थी। उनके लबों पर एक खूबसूरत मुश्कुराहट तैर रही थी जो कि शायद उनकी शख्सियत का ख़ास थी। फ़िर उन्होंने मुझे एक बाजू से पकड़ा और बीच हाल की तरफ ले जाने लगी। मैं उनकी शख्सियत के शहर में गुम उनके साथ आगे बढ़ने लगा। हाल के बीचोबीच उन्होंने मुझे लाकर खड़ा कर दिया, और फ़िर सामने जाती हुई एक बड़ी सी सीढ़ी के उपरी हिस्से की तरफ इशारा किया।

तब मैंने उनकी इशारे की तरफ देखा। सामने से ही 8 फीट चौड़ी सफेद मार्बल से मजीन सीढ़ियाँ 5 फीट की ऊँचाई तक जा रही थीं। फ़िर वहाँ से दायें और बायें को दो और सीढ़ियाँ ऊपर की मंज़िल की तरफ जाती दिखाई दी।

लेकिन 5 फीट की ऊँचाई तक बनी सीढ़ियों के पहले स्टॉप पर सामने की तरफ एक बहुत बड़ी तस्वीर एक खूबसूरत फ्रेम में लगी इस हवेली की शानो शौकत में मजीद इजाफा कर रही थी। चन्द लम्हे तो मैं उस तस्वीर को देखता ही रहा। फ़िर मैं हैरत के समुंदर में डूब गया।

वो तो मेरी ही तस्वीर थी। लेकिन तस्वीर में मेरे जैसे दिखाई देने वाले शख्स के चहेरे पर घनी सफेद दाढ़ी और बगलों से बल खाकर ऊपर को उठी हुई बड़ी-बड़ी सफेद मूछें थी। उन्होंने सिर पर एक बहुत बड़ा पटका। (बाजस्क के कपड़े एक लंबे हिस्से से सिर पर बाँधा जाता है जैसा अक्सर बलोच लोगों को आपने देखा होगा) बँधा हुआ है। उन्होंने अपने सहानो पर आजरक लिए हुए है, और एक बहुत बड़ी शानदार कुसी पर शाहाना अंदाज में बैठे हुए हैं। यह तस्वीर हाथ से पेंट की हुई लगती थी। मगर जिस पेंटर ने भी इसे पेंट किया था उसने अपनी पूरी कला इस तस्वीर को बनाने में लगा दी थी।

 
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