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‘‘मेरा दावा है अगर उस वक़्त तुम दोनों के नज़दीक कोई दीवार या कुर्सी या पेड़ का तना होता तो यक़ीनन तुम्हारे माथे ज़ख्मी हो जाते!’’
‘‘बात तो ठीक है! मगर क्यों?’’
‘‘फ़ितरत! अपनी हिफ़ाज़त आप करने की कोशिश! जब हम मुँह के बल गिरते हैं तो कोशिश किये बग़ैर ही हमारी हथेलियाँ या कुहनियाँ ज़मीन से टिक जाती हैं! इस तरह फ़ितरत ख़ुद ही हम से हमारे जिस्म के बेहतरीन और सबसे ज़्यादा क़ीमती लेकिन कमज़ोर हिस्सों की हिफ़ाज़त कराती है।’’
‘‘यार, बात तो ठीक कह रहे हो!’’ फ़ैयाज़ सिर हिला कर बोला।
‘‘रूशी, चाय....!’’ इमरान ने फिर हाँक लगायी और फिर धीरे से बोला। ‘‘यार, एक-आध केस लाओ! इस शहर की औरतें बेग़ैरत मालूम होती हैं। मैं सोच रहा हूँ कि कम-से-कम एक माह तक रोज़ाना इश्तहार देता रहूँ। क्या ख़याल है?’’
‘‘इमरान, तुम उसे बेवक़ूफ़ बनाना जो तुम्हें बेवक़ूफ़ समझता हो।’’
‘‘उसे भला मैं क्या बेवक़ूफ़ बना सकूँगा।’’
‘‘मैं इसलिए आया था कि तुम लाश देख लेते।’’
‘‘क्या वह अब भी मौक़ा-ए-वारदात पर है?’’
‘‘नहीं! मुर्दाघर में है। अभी पोस्ट मॉर्टम नहीं हुआ?’’
‘‘जब वह मौक़ा-ए-वारदात से हटा ली गयी है तो देखने से क्या फ़ायदा होगा?’’
‘‘तुम चलो तो....नाश्ता कहीं और करेंगे।’’
‘‘वह तो ठीक है! मगर खायेंगे कहाँ से! भला तुम्हारे इस केस में मुझे क्या मिल जायेगा?’’
‘‘बस, उठो....बोर मत करो....! उस वक़्त तुम पर ग़ुस्सा तो बहुत आ रहा था....मगर ख़ैर उस गिरने के सिलसिले में एक काम की बात मालूम हुई! मगर तुमने इस बेचारी को भी गिराया था।’’
‘‘क्या करता....मजबूरी थी....तजरुबा तो करना ही था।’’
‘‘बड़े सुअर हो।’’
‘‘आच....छा!’’ इमरान उठता हुआ बोला। ‘‘मैं चलूँगा....मगर यह न भूल जाना कि मैंने अभी नाश्ता नहीं किया....और हाँ, पहले हम ऐलफ़्रेड पार्क चलेंगे?’’
इमरान जानता था कि रूशी इस वक़्त नाश्ता हरगिज़ तैयार नहीं करेगी! इसलिए उसने सोचा कि फ़ैयाज़ के सामने शर्मिन्दगी उठाने से यही बेहतर है कि यहाँ से कहीं टल जाये।
बाहर आ कर उन्होंने एक छोटे-से रेस्तराँ में नाश्ता किया और ऐलफ़्रेड पार्क की तरफ़ रवाना हो गये....
‘‘हाँ। कल वह लेडी तनवीर क्यों आयी थी?’’ फ़ैयाज़ ने पूछा।
‘‘कहने के लिए कि अगर सर तनवीर हमारी फ़र्म की ख़िदमत हासिल करना चाहे तो उसे फ़ौरन खबर कर दिया जाये। शायद लेडी तनवीर तलाक़ नहीं लेना चाहती!’’
‘‘बकवास है! तुम बताना नहीं चाहते।’’
‘‘भला मैं तुम्हें अपने बिज़नेस की बातें कैसे बता सकता हूँ।’’
थोड़ी देर बाद वे दोनों ऐलफ़्रेड पार्क में थे....और फिर फ़ैयाज़ उसे उस जगह ले गया जहाँ लाश पायी गयी थी।
‘‘यही जगह है। ठीक यहीं पर लाश मिली थी।’’
‘‘औंधी पड़ी थी?’’ इमरान ने पूछा।
‘‘हाँ....!’’
‘‘लेकिन इतनी जल्दी यह कैसे मालूम कर लिया कि वह कोई ज़हरीली चीज़ थी जो माथे के ज़ख्म के ज़रिये जिस्म में दाख़िल हो गयी हो।’’
‘‘फिर और क्या कहा जा सकता है! इसके अलावा जिस्म पर और कोई निशान नहीं। गला घोंट कर भी नहीं मारा गया।’’
‘‘तुमने यहाँ से लाल बजरियाँ तो ज़रूर समेटी होंगी।’’
‘‘क्यों....? नहीं तो....!’’
‘‘यार, तुम डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन के सुपरिन्टेंडेण्ट हो....! या....!’’
‘‘मैं गधा हूँ और तुम्हें इससे क्या मतलब? मैंने इसे ज़रूरी नहीं समझा था कि यहाँ से बजरियाँ समेटी जायें, क्योंकि मुझे इस पर यक़ीन नहीं है कि वह यहीं और इसी जगह मरा होगा। आख़िर वह कितना पावर वाला ज़हर था कि मरने वाला गिरने के बाद उठने की कोशिश नहीं कर सका। लाश को मैंने यहाँ पड़ा देखा था....
उसकी पोज़ीशन यही ज़ाहिर कर रही थी कि वह गिरने के बाद हिल भी न सका होगा।’’
‘‘वेरी गुड....! फिर तुम मुझे क्यों लाये हो?’’
‘‘मैं जानता हूँ कि लाश यहाँ फेंकी गयी होगी....! मौत कहीं और हुई होगी।’’
‘‘अब बहुत ज़्यादा अक़्लमन्द बनने की कोशिश मत करो।’’ इमरान मुस्कुरा कर बोला....‘‘उसकी मौत यहाँ भी हो सकती है और वह इसी जगह गिर कर मर भी सकता है।’’
‘‘बात का बतंगड़ मैं भी बना सकता हूँ।’’
‘‘अच्छा मैं बात बनाता हूँ, तुम बतंगड़ बनाने की कोशिश करो....! फ़ैयाज़ साहब....! यह ऐलफ़्रेड पार्क है....और आप यह भी जानते होंगे कि यहाँ साँप बहुत ज़्यादा रहते हैं....! मान लीजिए, उसे साँप ने काटा हो....! अभी पोस्ट मॉर्टम भी नहीं हुआ....ज़हर वाली बात़ भी साबित हो सकती है....! वह तो कहो कि मैंने इस वक़्त नाश्ता भी तुम्हारे पैसों से किया है, वरना बताता....मुझे बेकार में यहाँ तक दौड़ाया है तो अब लाश भी दिखा दो।’’
‘‘बहरहाल, तुम मुझसे सहमत नहीं हो।’’
‘‘लाश का पोस्ट मॉर्टम हो जाने दो, उसके बाद देखा जायेगा।’’
फिर इस सिलसिले में आगे बातचीत नहीं हुई और वे सरकारी मुर्दाघर की तरफ़ चले गये।
लाश शायद पोस्ट मॉर्टम के लिए ले जायी जाने वाली थी, क्योंकि मुर्दा ढोने वाली गाड़ी कम्पाउण्ड में मौजूद थी। फ़ैयाज़ ने इमरान को धक्का दे कर आगे बढ़ाया।
और फिर मुर्दाघर में पहुँच कर फ़ैयाज़ ने जैसे ही लाश के चेहरे पर से कपड़ा हटाया, इमरान की आँखें हैरत से फैल गयीं....वह बड़ी तेज़ी से लाश पर झुक गया....थोड़ी ही देर में उसे यक़ीन हो गया कि वह लाश उस बूढ़े के अलावा और किसी की नहीं हो सकती, जिसका पिछली रात वह पीछा कर चुका था।
‘‘ये माथे का ज़ख़्म देखो।’’ फ़ैयाज़ ने कहा।
‘‘देख रहा हूँ....’’ इमरान सीधा खड़ा होता हुआ बोला। ‘‘मुझे तो इसमें कोई ख़ास बात नज़र नहीं आती।’’
‘‘हूँ! अच्छा, ख़ैर परवाह नहीं....अब तुम बहुत घमण्डी हो गये हो!’’ फ़ैयाज़ मुँह बनाते हुए कहा। ‘‘तुम समझते हो शायद दुनिया में तुम ही सबसे ज़्यादा अक़्लमन्द हो....!’’
‘‘नहीं तो....मेरा ख़याल है कि तुम न तो अक़्लमन्द हो और न घमण्डी....चलो छोड़ो....ज़िस्म नीला पड़ गया है....!ज़हर ही हो सकता है....पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट ही बता सकेगी कि ज़हर जिस्म में क्योंकर दाख़िल हुआ....इसलिए रिपोर्ट मिलने तक अगर हम इस मामले को कैंसिल ही रखें तो बेहतर है।’’
‘‘वैसे क्या उसके जिस्म पर कपड़े हैं....’’
‘‘नहीं....कपड़े....लेबोरेट्री में है।’’
‘‘लेबोरेट्री में क्यों?’’
‘‘शक है कि कपड़ों पर से लॉण्ड्री के निशान मिटाने की कोशिश की गयी है।’’
‘‘आ हा....!’’ इमरान कुछ सोचने लगा। फिर धीरे से बोला। ‘‘क्या उसकी जेब से कुछ काग़ज़ात वग़ैरह भी बरामद हुए हैं?’’
‘‘कमाल करते हो! जिन लोगों ने निशान मिटाये हैं, उन्होंने काग़ज़ात वग़ैरह क्यों छोड़े होंगे।’’
‘‘निशान....ओ हो....हो सकता है कि निशान ख़ुद मरने वाले ही ने अपनी ज़िन्दगी में मिटाये हों।’’
‘‘अच्छा, बस ख़त्म करो।’’ फ़ैयाज़ ने हाथ उठा कर कहा। ‘‘वरना अभी ये भी कहोगे कि मरने वाला प्रिंस ऑफ़ डेनमार्क था।’’
वह दोनों मुर्दाघर से बाहर आ गये।
‘‘अच्छा, मैं चला।’’ इमरान ने कहा। ‘‘पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट आने के बाद मुझे ख़बर करना।’’
‘‘अगर ज़रूरत समझी गयी!’’ फ़ैयाज़ बोला। उसकी आवाज़ में भी कड़कपन मौज़ूद था।
‘‘मुझसे उलझोगे तो सिर पकड़ कर रोना पड़ेगा....! जानते हो कि मेरी फ़र्म किस क़िस्म का कारोबार करती है।’’
इतने में वहाँ मुर्दाघर का इनचार्ज आ पहुँचा....! उसने फ़ैयाज़ से बातचीत शुरू कर दी और इमरान वहाँ से हट कर उस जगह आया जहाँ फ़ैयाज़ की मोटर साइकिल खड़ी हुई थी।
उसने बहुत इत्मीनान से उसे स्टार्ट किया। फ़ैयाज़ ने देखा और सिर्फ़ मुँह फुला कर रह गया....! मुर्दाघर के इनचार्ज के सामने वह बेतहाशा दौड़ भी तो नहीं सकता था....! वह बेबसी से इमरान की उस हरकत को देखता रहा। मोटर साइकिल फ़र्राटे भरती हुई कम्पाउण्ड के बाहर निकल गयी।
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‘‘बात तो ठीक है! मगर क्यों?’’
‘‘फ़ितरत! अपनी हिफ़ाज़त आप करने की कोशिश! जब हम मुँह के बल गिरते हैं तो कोशिश किये बग़ैर ही हमारी हथेलियाँ या कुहनियाँ ज़मीन से टिक जाती हैं! इस तरह फ़ितरत ख़ुद ही हम से हमारे जिस्म के बेहतरीन और सबसे ज़्यादा क़ीमती लेकिन कमज़ोर हिस्सों की हिफ़ाज़त कराती है।’’
‘‘यार, बात तो ठीक कह रहे हो!’’ फ़ैयाज़ सिर हिला कर बोला।
‘‘रूशी, चाय....!’’ इमरान ने फिर हाँक लगायी और फिर धीरे से बोला। ‘‘यार, एक-आध केस लाओ! इस शहर की औरतें बेग़ैरत मालूम होती हैं। मैं सोच रहा हूँ कि कम-से-कम एक माह तक रोज़ाना इश्तहार देता रहूँ। क्या ख़याल है?’’
‘‘इमरान, तुम उसे बेवक़ूफ़ बनाना जो तुम्हें बेवक़ूफ़ समझता हो।’’
‘‘उसे भला मैं क्या बेवक़ूफ़ बना सकूँगा।’’
‘‘मैं इसलिए आया था कि तुम लाश देख लेते।’’
‘‘क्या वह अब भी मौक़ा-ए-वारदात पर है?’’
‘‘नहीं! मुर्दाघर में है। अभी पोस्ट मॉर्टम नहीं हुआ?’’
‘‘जब वह मौक़ा-ए-वारदात से हटा ली गयी है तो देखने से क्या फ़ायदा होगा?’’
‘‘तुम चलो तो....नाश्ता कहीं और करेंगे।’’
‘‘वह तो ठीक है! मगर खायेंगे कहाँ से! भला तुम्हारे इस केस में मुझे क्या मिल जायेगा?’’
‘‘बस, उठो....बोर मत करो....! उस वक़्त तुम पर ग़ुस्सा तो बहुत आ रहा था....मगर ख़ैर उस गिरने के सिलसिले में एक काम की बात मालूम हुई! मगर तुमने इस बेचारी को भी गिराया था।’’
‘‘क्या करता....मजबूरी थी....तजरुबा तो करना ही था।’’
‘‘बड़े सुअर हो।’’
‘‘आच....छा!’’ इमरान उठता हुआ बोला। ‘‘मैं चलूँगा....मगर यह न भूल जाना कि मैंने अभी नाश्ता नहीं किया....और हाँ, पहले हम ऐलफ़्रेड पार्क चलेंगे?’’
इमरान जानता था कि रूशी इस वक़्त नाश्ता हरगिज़ तैयार नहीं करेगी! इसलिए उसने सोचा कि फ़ैयाज़ के सामने शर्मिन्दगी उठाने से यही बेहतर है कि यहाँ से कहीं टल जाये।
बाहर आ कर उन्होंने एक छोटे-से रेस्तराँ में नाश्ता किया और ऐलफ़्रेड पार्क की तरफ़ रवाना हो गये....
‘‘हाँ। कल वह लेडी तनवीर क्यों आयी थी?’’ फ़ैयाज़ ने पूछा।
‘‘कहने के लिए कि अगर सर तनवीर हमारी फ़र्म की ख़िदमत हासिल करना चाहे तो उसे फ़ौरन खबर कर दिया जाये। शायद लेडी तनवीर तलाक़ नहीं लेना चाहती!’’
‘‘बकवास है! तुम बताना नहीं चाहते।’’
‘‘भला मैं तुम्हें अपने बिज़नेस की बातें कैसे बता सकता हूँ।’’
थोड़ी देर बाद वे दोनों ऐलफ़्रेड पार्क में थे....और फिर फ़ैयाज़ उसे उस जगह ले गया जहाँ लाश पायी गयी थी।
‘‘यही जगह है। ठीक यहीं पर लाश मिली थी।’’
‘‘औंधी पड़ी थी?’’ इमरान ने पूछा।
‘‘हाँ....!’’
‘‘लेकिन इतनी जल्दी यह कैसे मालूम कर लिया कि वह कोई ज़हरीली चीज़ थी जो माथे के ज़ख्म के ज़रिये जिस्म में दाख़िल हो गयी हो।’’
‘‘फिर और क्या कहा जा सकता है! इसके अलावा जिस्म पर और कोई निशान नहीं। गला घोंट कर भी नहीं मारा गया।’’
‘‘तुमने यहाँ से लाल बजरियाँ तो ज़रूर समेटी होंगी।’’
‘‘क्यों....? नहीं तो....!’’
‘‘यार, तुम डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन के सुपरिन्टेंडेण्ट हो....! या....!’’
‘‘मैं गधा हूँ और तुम्हें इससे क्या मतलब? मैंने इसे ज़रूरी नहीं समझा था कि यहाँ से बजरियाँ समेटी जायें, क्योंकि मुझे इस पर यक़ीन नहीं है कि वह यहीं और इसी जगह मरा होगा। आख़िर वह कितना पावर वाला ज़हर था कि मरने वाला गिरने के बाद उठने की कोशिश नहीं कर सका। लाश को मैंने यहाँ पड़ा देखा था....
उसकी पोज़ीशन यही ज़ाहिर कर रही थी कि वह गिरने के बाद हिल भी न सका होगा।’’
‘‘वेरी गुड....! फिर तुम मुझे क्यों लाये हो?’’
‘‘मैं जानता हूँ कि लाश यहाँ फेंकी गयी होगी....! मौत कहीं और हुई होगी।’’
‘‘अब बहुत ज़्यादा अक़्लमन्द बनने की कोशिश मत करो।’’ इमरान मुस्कुरा कर बोला....‘‘उसकी मौत यहाँ भी हो सकती है और वह इसी जगह गिर कर मर भी सकता है।’’
‘‘बात का बतंगड़ मैं भी बना सकता हूँ।’’
‘‘अच्छा मैं बात बनाता हूँ, तुम बतंगड़ बनाने की कोशिश करो....! फ़ैयाज़ साहब....! यह ऐलफ़्रेड पार्क है....और आप यह भी जानते होंगे कि यहाँ साँप बहुत ज़्यादा रहते हैं....! मान लीजिए, उसे साँप ने काटा हो....! अभी पोस्ट मॉर्टम भी नहीं हुआ....ज़हर वाली बात़ भी साबित हो सकती है....! वह तो कहो कि मैंने इस वक़्त नाश्ता भी तुम्हारे पैसों से किया है, वरना बताता....मुझे बेकार में यहाँ तक दौड़ाया है तो अब लाश भी दिखा दो।’’
‘‘बहरहाल, तुम मुझसे सहमत नहीं हो।’’
‘‘लाश का पोस्ट मॉर्टम हो जाने दो, उसके बाद देखा जायेगा।’’
फिर इस सिलसिले में आगे बातचीत नहीं हुई और वे सरकारी मुर्दाघर की तरफ़ चले गये।
लाश शायद पोस्ट मॉर्टम के लिए ले जायी जाने वाली थी, क्योंकि मुर्दा ढोने वाली गाड़ी कम्पाउण्ड में मौजूद थी। फ़ैयाज़ ने इमरान को धक्का दे कर आगे बढ़ाया।
और फिर मुर्दाघर में पहुँच कर फ़ैयाज़ ने जैसे ही लाश के चेहरे पर से कपड़ा हटाया, इमरान की आँखें हैरत से फैल गयीं....वह बड़ी तेज़ी से लाश पर झुक गया....थोड़ी ही देर में उसे यक़ीन हो गया कि वह लाश उस बूढ़े के अलावा और किसी की नहीं हो सकती, जिसका पिछली रात वह पीछा कर चुका था।
‘‘ये माथे का ज़ख़्म देखो।’’ फ़ैयाज़ ने कहा।
‘‘देख रहा हूँ....’’ इमरान सीधा खड़ा होता हुआ बोला। ‘‘मुझे तो इसमें कोई ख़ास बात नज़र नहीं आती।’’
‘‘हूँ! अच्छा, ख़ैर परवाह नहीं....अब तुम बहुत घमण्डी हो गये हो!’’ फ़ैयाज़ मुँह बनाते हुए कहा। ‘‘तुम समझते हो शायद दुनिया में तुम ही सबसे ज़्यादा अक़्लमन्द हो....!’’
‘‘नहीं तो....मेरा ख़याल है कि तुम न तो अक़्लमन्द हो और न घमण्डी....चलो छोड़ो....ज़िस्म नीला पड़ गया है....!ज़हर ही हो सकता है....पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट ही बता सकेगी कि ज़हर जिस्म में क्योंकर दाख़िल हुआ....इसलिए रिपोर्ट मिलने तक अगर हम इस मामले को कैंसिल ही रखें तो बेहतर है।’’
‘‘वैसे क्या उसके जिस्म पर कपड़े हैं....’’
‘‘नहीं....कपड़े....लेबोरेट्री में है।’’
‘‘लेबोरेट्री में क्यों?’’
‘‘शक है कि कपड़ों पर से लॉण्ड्री के निशान मिटाने की कोशिश की गयी है।’’
‘‘आ हा....!’’ इमरान कुछ सोचने लगा। फिर धीरे से बोला। ‘‘क्या उसकी जेब से कुछ काग़ज़ात वग़ैरह भी बरामद हुए हैं?’’
‘‘कमाल करते हो! जिन लोगों ने निशान मिटाये हैं, उन्होंने काग़ज़ात वग़ैरह क्यों छोड़े होंगे।’’
‘‘निशान....ओ हो....हो सकता है कि निशान ख़ुद मरने वाले ही ने अपनी ज़िन्दगी में मिटाये हों।’’
‘‘अच्छा, बस ख़त्म करो।’’ फ़ैयाज़ ने हाथ उठा कर कहा। ‘‘वरना अभी ये भी कहोगे कि मरने वाला प्रिंस ऑफ़ डेनमार्क था।’’
वह दोनों मुर्दाघर से बाहर आ गये।
‘‘अच्छा, मैं चला।’’ इमरान ने कहा। ‘‘पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट आने के बाद मुझे ख़बर करना।’’
‘‘अगर ज़रूरत समझी गयी!’’ फ़ैयाज़ बोला। उसकी आवाज़ में भी कड़कपन मौज़ूद था।
‘‘मुझसे उलझोगे तो सिर पकड़ कर रोना पड़ेगा....! जानते हो कि मेरी फ़र्म किस क़िस्म का कारोबार करती है।’’
इतने में वहाँ मुर्दाघर का इनचार्ज आ पहुँचा....! उसने फ़ैयाज़ से बातचीत शुरू कर दी और इमरान वहाँ से हट कर उस जगह आया जहाँ फ़ैयाज़ की मोटर साइकिल खड़ी हुई थी।
उसने बहुत इत्मीनान से उसे स्टार्ट किया। फ़ैयाज़ ने देखा और सिर्फ़ मुँह फुला कर रह गया....! मुर्दाघर के इनचार्ज के सामने वह बेतहाशा दौड़ भी तो नहीं सकता था....! वह बेबसी से इमरान की उस हरकत को देखता रहा। मोटर साइकिल फ़र्राटे भरती हुई कम्पाउण्ड के बाहर निकल गयी।
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