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जहन्नुम की अप्सरा

‘‘मेरा दावा है अगर उस वक़्त तुम दोनों के नज़दीक कोई दीवार या कुर्सी या पेड़ का तना होता तो यक़ीनन तुम्हारे माथे ज़ख्मी हो जाते!’’

‘‘बात तो ठीक है! मगर क्यों?’’

‘‘फ़ितरत! अपनी हिफ़ाज़त आप करने की कोशिश! जब हम मुँह के बल गिरते हैं तो कोशिश किये बग़ैर ही हमारी हथेलियाँ या कुहनियाँ ज़मीन से टिक जाती हैं! इस तरह फ़ितरत ख़ुद ही हम से हमारे जिस्म के बेहतरीन और सबसे ज़्यादा क़ीमती लेकिन कमज़ोर हिस्सों की हिफ़ाज़त कराती है।’’

‘‘यार, बात तो ठीक कह रहे हो!’’ फ़ैयाज़ सिर हिला कर बोला।

‘‘रूशी, चाय....!’’ इमरान ने फिर हाँक लगायी और फिर धीरे से बोला। ‘‘यार, एक-आध केस लाओ! इस शहर की औरतें बेग़ैरत मालूम होती हैं। मैं सोच रहा हूँ कि कम-से-कम एक माह तक रोज़ाना इश्तहार देता रहूँ। क्या ख़याल है?’’

‘‘इमरान, तुम उसे बेवक़ूफ़ बनाना जो तुम्हें बेवक़ूफ़ समझता हो।’’

‘‘उसे भला मैं क्या बेवक़ूफ़ बना सकूँगा।’’

‘‘मैं इसलिए आया था कि तुम लाश देख लेते।’’

‘‘क्या वह अब भी मौक़ा-ए-वारदात पर है?’’

‘‘नहीं! मुर्दाघर में है। अभी पोस्ट मॉर्टम नहीं हुआ?’’

‘‘जब वह मौक़ा-ए-वारदात से हटा ली गयी है तो देखने से क्या फ़ायदा होगा?’’

‘‘तुम चलो तो....नाश्ता कहीं और करेंगे।’’

‘‘वह तो ठीक है! मगर खायेंगे कहाँ से! भला तुम्हारे इस केस में मुझे क्या मिल जायेगा?’’

‘‘बस, उठो....बोर मत करो....! उस वक़्त तुम पर ग़ुस्सा तो बहुत आ रहा था....मगर ख़ैर उस गिरने के सिलसिले में एक काम की बात मालूम हुई! मगर तुमने इस बेचारी को भी गिराया था।’’

‘‘क्या करता....मजबूरी थी....तजरुबा तो करना ही था।’’

‘‘बड़े सुअर हो।’’

‘‘आच....छा!’’ इमरान उठता हुआ बोला। ‘‘मैं चलूँगा....मगर यह न भूल जाना कि मैंने अभी नाश्ता नहीं किया....और हाँ, पहले हम ऐलफ़्रेड पार्क चलेंगे?’’

इमरान जानता था कि रूशी इस वक़्त नाश्ता हरगिज़ तैयार नहीं करेगी! इसलिए उसने सोचा कि फ़ैयाज़ के सामने शर्मिन्दगी उठाने से यही बेहतर है कि यहाँ से कहीं टल जाये।

बाहर आ कर उन्होंने एक छोटे-से रेस्तराँ में नाश्ता किया और ऐलफ़्रेड पार्क की तरफ़ रवाना हो गये....

‘‘हाँ। कल वह लेडी तनवीर क्यों आयी थी?’’ फ़ैयाज़ ने पूछा।

‘‘कहने के लिए कि अगर सर तनवीर हमारी फ़र्म की ख़िदमत हासिल करना चाहे तो उसे फ़ौरन खबर कर दिया जाये। शायद लेडी तनवीर तलाक़ नहीं लेना चाहती!’’

‘‘बकवास है! तुम बताना नहीं चाहते।’’

‘‘भला मैं तुम्हें अपने बिज़नेस की बातें कैसे बता सकता हूँ।’’

थोड़ी देर बाद वे दोनों ऐलफ़्रेड पार्क में थे....और फिर फ़ैयाज़ उसे उस जगह ले गया जहाँ लाश पायी गयी थी।

‘‘यही जगह है। ठीक यहीं पर लाश मिली थी।’’

‘‘औंधी पड़ी थी?’’ इमरान ने पूछा।

‘‘हाँ....!’’

‘‘लेकिन इतनी जल्दी यह कैसे मालूम कर लिया कि वह कोई ज़हरीली चीज़ थी जो माथे के ज़ख्म के ज़रिये जिस्म में दाख़िल हो गयी हो।’’

‘‘फिर और क्या कहा जा सकता है! इसके अलावा जिस्म पर और कोई निशान नहीं। गला घोंट कर भी नहीं मारा गया।’’

‘‘तुमने यहाँ से लाल बजरियाँ तो ज़रूर समेटी होंगी।’’

‘‘क्यों....? नहीं तो....!’’

‘‘यार, तुम डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन के सुपरिन्टेंडेण्ट हो....! या....!’’

‘‘मैं गधा हूँ और तुम्हें इससे क्या मतलब? मैंने इसे ज़रूरी नहीं समझा था कि यहाँ से बजरियाँ समेटी जायें, क्योंकि मुझे इस पर यक़ीन नहीं है कि वह यहीं और इसी जगह मरा होगा। आख़िर वह कितना पावर वाला ज़हर था कि मरने वाला गिरने के बाद उठने की कोशिश नहीं कर सका। लाश को मैंने यहाँ पड़ा देखा था....

उसकी पोज़ीशन यही ज़ाहिर कर रही थी कि वह गिरने के बाद हिल भी न सका होगा।’’

‘‘वेरी गुड....! फिर तुम मुझे क्यों लाये हो?’’

‘‘मैं जानता हूँ कि लाश यहाँ फेंकी गयी होगी....! मौत कहीं और हुई होगी।’’

‘‘अब बहुत ज़्यादा अक़्लमन्द बनने की कोशिश मत करो।’’ इमरान मुस्कुरा कर बोला....‘‘उसकी मौत यहाँ भी हो सकती है और वह इसी जगह गिर कर मर भी सकता है।’’

‘‘बात का बतंगड़ मैं भी बना सकता हूँ।’’

‘‘अच्छा मैं बात बनाता हूँ, तुम बतंगड़ बनाने की कोशिश करो....! फ़ैयाज़ साहब....! यह ऐलफ़्रेड पार्क है....और आप यह भी जानते होंगे कि यहाँ साँप बहुत ज़्यादा रहते हैं....! मान लीजिए, उसे साँप ने काटा हो....! अभी पोस्ट मॉर्टम भी नहीं हुआ....ज़हर वाली बात़ भी साबित हो सकती है....! वह तो कहो कि मैंने इस वक़्त नाश्ता भी तुम्हारे पैसों से किया है, वरना बताता....मुझे बेकार में यहाँ तक दौड़ाया है तो अब लाश भी दिखा दो।’’

‘‘बहरहाल, तुम मुझसे सहमत नहीं हो।’’

‘‘लाश का पोस्ट मॉर्टम हो जाने दो, उसके बाद देखा जायेगा।’’

फिर इस सिलसिले में आगे बातचीत नहीं हुई और वे सरकारी मुर्दाघर की तरफ़ चले गये।

लाश शायद पोस्ट मॉर्टम के लिए ले जायी जाने वाली थी, क्योंकि मुर्दा ढोने वाली गाड़ी कम्पाउण्ड में मौजूद थी। फ़ैयाज़ ने इमरान को धक्का दे कर आगे बढ़ाया।

और फिर मुर्दाघर में पहुँच कर फ़ैयाज़ ने जैसे ही लाश के चेहरे पर से कपड़ा हटाया, इमरान की आँखें हैरत से फैल गयीं....वह बड़ी तेज़ी से लाश पर झुक गया....थोड़ी ही देर में उसे यक़ीन हो गया कि वह लाश उस बूढ़े के अलावा और किसी की नहीं हो सकती, जिसका पिछली रात वह पीछा कर चुका था।

‘‘ये माथे का ज़ख़्म देखो।’’ फ़ैयाज़ ने कहा।

‘‘देख रहा हूँ....’’ इमरान सीधा खड़ा होता हुआ बोला। ‘‘मुझे तो इसमें कोई ख़ास बात नज़र नहीं आती।’’

‘‘हूँ! अच्छा, ख़ैर परवाह नहीं....अब तुम बहुत घमण्डी हो गये हो!’’ फ़ैयाज़ मुँह बनाते हुए कहा। ‘‘तुम समझते हो शायद दुनिया में तुम ही सबसे ज़्यादा अक़्लमन्द हो....!’’

‘‘नहीं तो....मेरा ख़याल है कि तुम न तो अक़्लमन्द हो और न घमण्डी....चलो छोड़ो....ज़िस्म नीला पड़ गया है....!ज़हर ही हो सकता है....पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट ही बता सकेगी कि ज़हर जिस्म में क्योंकर दाख़िल हुआ....इसलिए रिपोर्ट मिलने तक अगर हम इस मामले को कैंसिल ही रखें तो बेहतर है।’’

‘‘वैसे क्या उसके जिस्म पर कपड़े हैं....’’

‘‘नहीं....कपड़े....लेबोरेट्री में है।’’

‘‘लेबोरेट्री में क्यों?’’

‘‘शक है कि कपड़ों पर से लॉण्ड्री के निशान मिटाने की कोशिश की गयी है।’’

‘‘आ हा....!’’ इमरान कुछ सोचने लगा। फिर धीरे से बोला। ‘‘क्या उसकी जेब से कुछ काग़ज़ात वग़ैरह भी बरामद हुए हैं?’’

‘‘कमाल करते हो! जिन लोगों ने निशान मिटाये हैं, उन्होंने काग़ज़ात वग़ैरह क्यों छोड़े होंगे।’’

‘‘निशान....ओ हो....हो सकता है कि निशान ख़ुद मरने वाले ही ने अपनी ज़िन्दगी में मिटाये हों।’’

‘‘अच्छा, बस ख़त्म करो।’’ फ़ैयाज़ ने हाथ उठा कर कहा। ‘‘वरना अभी ये भी कहोगे कि मरने वाला प्रिंस ऑफ़ डेनमार्क था।’’

वह दोनों मुर्दाघर से बाहर आ गये।

‘‘अच्छा, मैं चला।’’ इमरान ने कहा। ‘‘पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट आने के बाद मुझे ख़बर करना।’’

‘‘अगर ज़रूरत समझी गयी!’’ फ़ैयाज़ बोला। उसकी आवाज़ में भी कड़कपन मौज़ूद था।

‘‘मुझसे उलझोगे तो सिर पकड़ कर रोना पड़ेगा....! जानते हो कि मेरी फ़र्म किस क़िस्म का कारोबार करती है।’’

इतने में वहाँ मुर्दाघर का इनचार्ज आ पहुँचा....! उसने फ़ैयाज़ से बातचीत शुरू कर दी और इमरान वहाँ से हट कर उस जगह आया जहाँ फ़ैयाज़ की मोटर साइकिल खड़ी हुई थी।

उसने बहुत इत्मीनान से उसे स्टार्ट किया। फ़ैयाज़ ने देखा और सिर्फ़ मुँह फुला कर रह गया....! मुर्दाघर के इनचार्ज के सामने वह बेतहाशा दौड़ भी तो नहीं सकता था....! वह बेबसी से इमरान की उस हरकत को देखता रहा। मोटर साइकिल फ़र्राटे भरती हुई कम्पाउण्ड के बाहर निकल गयी।

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थोड़ी देर बाद इमरान लेडी तनवीर के ड्रॉइंग-रूम में बैठा उसका इन्तज़ार कर रहा था।

‘‘तुम यहाँ क्यों चले आये?’’ लेडी तनवीर ने कमरे में दाख़िल होते हुए कहा।

‘‘आख़िरी खबर देने के लिए!’’ इमरान उसका चेहरा ग़ौर से देख रहा था।

‘‘मैं नहीं समझी!’’ लेडी तनवीर की आवाज़ में कँपकँपाहट थी।

‘‘ग़ज़ाली चला गया।’’

‘‘ओह....अच्छा!’’ लेडी तनवीर एक लम्बी साँस ले कर बैठते हुए बोली। ‘‘अच्छा....तो तुम्हारी बाक़ी रक़म परसों तक पहुँचा दी जायेगी।’’

‘‘लेकिन अब मैं रक़म ले कर क्या करूँगा!’’ इमरान ने अफ़सोस के अन्दाज़ में बोला।

‘‘क्यों....?’’

‘‘उस बेचारे का पूरा जिस्म नीला पड़ गया है और शायद इस वक़्त डॉक्टरों के चाकू उसके गोश्त के टुकड़े-टुकड़े कर रहे होंगे।’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं? तुम कह क्या रहे हो?’’

इमरान ने उसे पूरी बात बताते हुए कहा। ‘‘सर तनवीर भी उसमें दिलचस्पी ले रहे थे, लेकिन पुलिस को अभी इसकी जानकारी नहीं है। वैसे अब मेरा इरादा है कि मैं पुलिस को ख़बर कर दूँ।’’

लेडी तनवीर थोड़ी देर तक चुपचाप हाँफती रही फिर मुश्किल से बोली। ‘‘तो अब तुम मुझे ब्लैकमेल करना चाहते हो। तुमने मुझसे कहा था कि तुम मेरे लिए उसे क़त्ल भी कर सकते हो।’’

‘‘अच्छी बात है! जब पुलिस आपसे पूछगछ करे तो आप बता दीजिएगा....कह दीजिएगा....कह दीजिएगा कि मैंने ही उसे क़त्ल किया है। फिर पुलिस मुझसे पूछेगी तो मैं साफ़ कह दूँगा कि मुझे इस पर लेडी तनवीर ने मजबूर किया था....फिर लेडी तनवीर को बताना पड़ेगा कि उन्होंने क्यों मजबूर किया था। वे क्यों चाहती थीं कि ग़ज़ाली यहाँ से चला जाये और इतने-से काम के लिए उन्होंने इतनी बड़ी रक़म क्यों दी थी....फिर ग़ज़ाली के पड़ोसी सर तनवीर को भी पहचान लेंगे जो घण्टों उसके कमरे का दरवाज़ा खुलवाने की कोशिश किया करते थे....फिर क्या होगा। लेडी तनवीर....और फिर आपको वह आदमी शिनाख़्त करेगा जो उस दिन मेरे दफ़्तर में मौजूद था और उसने आपको वहाँ देख कर हैरत भी ज़ाहिर की थी। आप जानती हैं वह कौन था। नहीं जानतीं....! अच्छा तो सुनिए, वह सी.बी.आई. का सुपरिन्टेंडेण्ट कैप्टन फ़ैयाज़ था....इसलिए आप पुलिस से यह भी नहीं कह सकतीं कि आप मेरे बारे में जानती नहीं हैं।’’

‘‘तुम क्या चाहते हो?’’ लेडी तनवीर ने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा।

‘‘हक़ीक़त मालूम करना चाहता हूँ! ग़ज़ाली कौन था....और इस तरह क्यों मार डाला गया? वह किन लोगों से नाराज़ था....और वह....वह....’’

इमरान अपना सिर सहलाने लगा। उसे वह नाम याद नहीं आ रहा था जिसका हवाला पिछली रात बातचीत के दौरान ग़ज़ाली ने दिया था....! ऐसा नाम जो किसी औरत ही का हो सकता था....इटली त़र्ज का नाम....

‘‘मैं नहीं जानती कि वह किन लोगों से ख़फ़ा था....! मगर....ठहरो....तुम बहुत चालाक हो....मुझे यक़ीन है कि ग़ज़ाली ज़िन्दा है। तुम मुझसे मेरा राज़ उगलवाना चाहते हो।’’

‘‘क्या आपने आज का अख़बार नहीं देखा?’’

‘‘देखा है। मगर तुम एक दूसरे मामले को भी इस सिलसिले में इस्तेमाल कर सकते हो....!

‘‘हाँ, हो सकता है....! शायद मैं नाम भी ग़लत बता रहा हूँ!’’

‘‘नहीं, नाम ठीक है। तुम उससे मिल चुके होगे।’’

‘‘अगर आप लाश देखना चाहती हों तो मैं पोस्ट मॉर्टम रुकवा दूँ!’’

‘‘हाँ, मैं देखूँगी....’’ लेडी तनवीर ने ऐसी आवाज़ में कहा जिससे ये पता चल रहा था कि उसे इमरान की बात पर यक़ीन नहीं आया।

‘‘अच्छी बात है....क्या आप मुझे अपना फ़ोन इस्तेमाल करने की इजाज़त देंगी?’’

‘‘नहीं....!’’

‘‘अच्छा, तो मेरे साथ चलिए।’’

‘‘नहीं जाऊँगी....तुम शौक़ से मेरे बारे में पुलिस को इत्तला दे सकते हो। तुम मुझे ब्लैकमेल नहीं कर सकते, समझे। हो सकता है कि जो आदमी तुम्हारे दफ़्तर में उस दिन मौजूद था, सी.बी.आई. का अफ़सर रहा हो। फ़ॉर योर काइंड इनफ़र्मेशन मैं तुमको बता दूँ कि सी.बी.आई. के डायरेक्टर जनरल रहमान साहब मेरे गहरे दोस्तों में से हैं।’’

‘‘तब तो मैं ज़रूर आपके ख़िलाफ़ कोई-न-कोई कार्रवाई करा दूँगा, क्योंकि रहमान साहब मेरे गहरे दुश्मनों में से हैं। उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया है, इसलिए मजबूरन मुझे फ़ॉरवर्डिंग ऐण्ड क्लीयरिंग ब्यूरो क़ायम करना पड़ा।’’

‘‘अच्छा, शायद तुम ग़लत समझे हो। मैं अभी तुम्हारी मौजूदगी में उन्हें फ़ोन करती हूँ।’’

‘‘साथ ही यह भी कह दीजिएगा कि ब्लैकमेलर अली इमरान एम.एस-सी., पी-एच.डी. है।’’

‘‘अली इमरान!’’ लेडी तनवीर चौंक कर उसे घूरने लगी। ‘‘अली इमरान....! तुम बकवास कर रहे हो। यह रहमान साहब के लड़के का नाम है और वह भी उसी डिपार्टमेंट में....’’

‘‘कभी था....!’’ इमरान ने जुमला पूरा करते हुए कहा। ‘‘लेकिन डायरेक्टर जनरल साहब ने उसका पत्ता काट दिया। अब वह शहर की सारी औरतों से उनके शौहरों का पत्ता कटवा देगा।’’

‘‘क्या तुम वाक़ई इमरान हो। यानी रहमान के लड़के।’’

‘‘ख़त्म भी कीजिए लेडी तनवीर....मुझसे ग़ज़ाली की बात कीजिए। आप यह भी जानती होंगी कि....ख़ैर जाने दीजिए....!

‘‘मैं कुछ नहीं जानती। तुम जा सकते हो। यक़ीन करो तुम मेरा कुछ भी नहीं कर सकते।’’ लेडी तनवीर ने कहा और उठ कर ड्रॉइंग-रूम से चली गयी।

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इमरान ने एक पी.सी.ओ. बूथ से फ़ैयाज़ को फ़ोन किया कि वह उसके लिए काम शुरू कर चुका है, इस्लिए वह अब अपना पेट्रोल फूँकने की बजाय उसकी मोटर साइकिल वापस नहीं देगा....फ़ैयाज़ ने फ़ोन ही पर उसे गालियाँ बकीं....लेकिन इमरान हर गाली पर उसकी हौसला अफ़ज़ाई करता रहा...

उसके बाद वह मज़दूरों की उसी बस्ती की तरफ़ चला गया जहाँ ग़ज़ाली ठहरा हुआ था। उसने उसके कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ देखा, कमरे में दाख़िल हुआ, लेकिन वहाँ सफ़ाई नज़र आयी, एक तिनका भी नहीं दिखाई दिया। पड़ोसियों में से एक ने, जो अपनी रात की ड्यूटी ख़त्म करके सुबह चार बजे वापस आया था, बताया कि ग़ज़ाली के कमरे के सामने एक बड़ी-सी वैन खड़ी हुई थी और उस पर ग़ज़ाली का सामान रखा जा रहा था.... यह वाक़या सुन कर एक बार फिर इमरान ख़ाली कमरे में वापस आ गया....और चारों तरफ़ हैरत से देखने लगा....और फिर अचानक दरवाज़े की तरफ़ मुड़ कर तेज़ी से झपटा। दूसरे पल में वह झुक कर सिगरेटों का एक पैकेट उठा रहा था.... लेकिन पैकेट ख़ाली था। वह उसे उलट-पलट कर देखने लगा।

फिर वह उसे रोशनी में देखने के लिए दरवाज़े के सामने आ गया। उस पर पेन्सिल से महीन अक्षरों में जगह-जगह कुछ लिखा हुआ था। ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी ने काम के लिए कुछ लिखा हो, लेकिन यह किसी और भाषा में लिखा हुआ था जो इमरान की समझ में न आ सका.... वैसे उसका ख़याल था कि वह रूसी लिखावट भी हो सकती है। सारे अक्षर एक जैसे ही लग रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने जगह-जगह कोई एक ही चीज़ लिखी हो। इमरान ने पैकेट जेब में डाल लिया। कमरे में इसके अलावा उसे कुछ नहीं मिला। थोड़ी देर बाद वह यूनीवर्सिटी की तरफ़ जा रहा था। उसे उम्मीद थी कि प्रोफ़ेसर सईद जो पश्चिमी ज़बानों का माहिर था, इस पर ज़रूर रोशनी डाल सकेगा।

प्रोफ़ेसर सईद इमरान के दोस्तों में से था। उसने इमरान के ख़याल के मुताबिक ही बताया कि वह लिखावट रूसी थी और वह दरअसल किसी ‘‘आर्टामोनॉफ़’’ के दस्तख़त थे। यूनीवर्सिटी से वापसी पर इमरान सोच रहा था कि कुछ लोग बेकारी के पलों में यूँ ही काम के तौर पर अमूमन अपने ही दस्तख़त किया करते हैं। बस क़लम या पेन्सिल हाथ में होनी चाहिए। जो चीज़ भी सामने पड़ गयी, बस उस पर दस्तख़त हो रहे हैं।

फिर वह ग़ज़ाली के बारे में सोचने लगा। वह रूसी तो क्या, रूस से ताल्लुक़ रखने वाली किसी दूसरी रियासत का भी रहने वाला नहीं मालूम होता था। देखने के एतबार से वह अपनी ही तरफ़ का रहने वाला हो सकता था।

अब इमरान ने फ़ैयाज़ के दफ़्तर की राह ली....और वहाँ कुछ ज़्यादा गालियाँ उसका इन्तज़ार कर रही थीं। उसे देख कर फ़ैयाज़ आपे से बाहर हो गया।

‘‘उनको आता है मेरे प्यार पर ग़ुस्सा।’’ इमरान ने कान पर हाथ रख कर हाँक लगायी।

‘‘मैं धक्के दे कर बाहर निकलवा दूँगा समझे।’’

‘‘लोग यही समझेंगे तुम्हारी बीवी जल्द ही तलाक़ लेने वाली है। वैसे अगर तुम बाहर से आने वालों में से किसी आर्टामोनॉफ़ का पता लगा सको तो दीन और दुनिया का भला होगा।

‘‘बस, तुम चुपचाप यहाँ से चले जाओ, ख़ैरियत इसी में है।’’

‘‘अच्छा पेट्रोल का दाम ही दे दो, क्योंकि अब टंकी में थोड़ा ही रह गया है।’’

‘‘क्या?’’ फ़ैयाज़ झुँझला गया। ‘‘अब मोटर साइकिल को हाथ भी न लगाना।’’

‘‘हाथ सिर्फ़ हैंडिल पर रहेंगे। इसके अलावा अगर कहीं और लगाऊँ तो कटवा लेना। वैसे मैं आर्टामोनॉफ़ के मामले में संजीदा हूँ....! उसका ताल्लुक़ ग़ज़ाली की मौत से भी हो सकता है।’’

‘‘कौन ग़ज़ाली। क्या बक रहे हो?’’

‘‘वही ग़ज़ाली जिसकी लाश तुमने मुझे दिखाई थी।’’

फ़ैयाज़ कुर्सी से टेक लगा कर इमरान को घूरने लगा। फिर बुरा-सा मुँह बना कर बोला। ‘‘बेकार में मुझ पर रौब डालने की कोशिश न करो। तुम लेबोरेट्री से आ रहे हो....और वहीं से तुम्हें यह नाम मालूम हुआ है....मगर यह ज़रूरी नहीं कि वह अँगूठी मरने वाले ही की हो.... उसके कोट के अन्दर की जेब का अस्तर फटा हुआ था। हो सकता है उसने अँगूठी कभी जेब में डाली हो और वह सूराख़ से कोट के अस्तर और ऊपर के बीच में पहुँच गयी हो। अगर वह ख़ुद उसकी होती तो जेब में डाले रखने का क्या तुक हो सकता है? वैसे मैं लेबोरेट्री वालों से जवाब तलब करूँगा कि वह इस क़िस्म की इत्तला उन लोगों को क्यों देते हैं जो डिपार्टमेंट से ताल्लुक़ नहीं रखते।’’

‘‘उनसे यह भी पूछना कि उन्होंने मुझे मरने वाले के घर का पता भी क्यों बता दिया?’’

‘‘बेकार में बात बनाने की कोशिश न करो।’’

‘‘अँगूठी का क्या क़िस्सा है प्यारे फ़ैयाज़!’’ इमरान उसे चुमकार कर बोला।

फ़ैयाज़ कुछ पल उसे ग़ौर से देखता रहा फिर बोला। ‘‘क्या यह हक़ीक़त है कि तुम्हें यह नाम लेबोरेट्री से नहीं मालूम हुआ।

‘‘यह हक़ीक़त है। वैसे अगर तुम लेबोरेट्री इनचार्ज से झगड़ा ही करना चाहते हो तो मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा, क्योंकि तुमने आज मुझे बहुत गालियाँ दी हैं और मैं इसके बदले में यक़ीनन यह चाहूँगा कि कोई तुम्हारे हाथ-पैर तोड़ कर रख दे।’’

‘‘फिर तुम्हें यह नाम कैसे मालूम हुआ?’’

‘‘बस हो गया। तुम फ़िलहाल इसकी परवाह न करो और यह हक़ीक़त है कि मैं उसके ठिकाने को भी जानता हूँ। अगर यक़ीन न आये तो मेरे साथ चलो। लाश की तस्वीरें शायद तैयार हो कर तुम्हारे पास आ गयी होंगी।’’

‘‘हाँ, आ गयी हैं। क्यों?’’

‘‘मैं उसके पड़ोसियों से तस्दीक़ करा दूँगा।’’

‘‘क्या तुम संजीदगी से बात कर रहे हो?’’

‘‘ओ....हो! क्या तुम यह समझते हो कि मैं यूँ ही में तुम्हारा पेट्रोल फूँकता फिर रहा हूँ। नहीं डियर! ऐसी बात नहीं.... चलो उठो। लेकिन लाश के चेहरे का क्लोज़ अप ज़रूर साथ ले लेना। ताकि तुम्हें इत्मीनान हो सके।’’

‘‘आख़िर तुमने किस तरह पता लगा लिया?’’

‘‘इलहाम हुआ था। तुम्हें इससे मतलब?’’

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१०

ग़ज़ाली के उन पड़ोसियों ने, जो उसे देख चुके थे, उसकी तस्वीर देख कर इमरान के बयान की तस्दीक़ कर दी....फ़ैयाज़ ने उनसे बहुत-से सवाल किये, लेकिन वे उससे ज़्यादा न बता सके जो उन्होंने इमरान को बताया था।

‘‘अच्छा फ़ैयाज़ साहब....’’ इमरान ने थोड़ी देर बाद कहा। ‘‘अब तुम आर्टामोनॉफ़ के बारे में जानकारी हासिल करो और तुम अपनी मोटर साइकिल भी ले जा सकते हो।’’

‘‘आर्टामोनॉफ़ कौन है?’’

‘‘मेरा भतीजा है। तुम इसकी परवाह मत करो। ज़्यादा बोर मत करो, नहीं तो मैं स्विट्ज़रलैण्ड चला जाऊँगा।’’

फ़ैयाज़ से पीछा छुड़ा कर वह उन लोगों को तलाश करने लगा, जिन्होंने पिछले दिन सर तनवीर को ग़ज़ाली के दरवाज़े पर दस्तक देते देखा था।

उनमें से एक उसे जल्द ही मिल गया। इमरान दरअसल यह जानना चाहता था कि ग़ज़ाली से मुलाक़ात करने की कोशिश करने वालों में सर तनवीर के अलावा और कितने लोग थे। चूँकि इमरान भी पिछले दिन से यहाँ मौजूद था, इसलिए सर तनवीर का हवाला दे कर बातचीत आगे बढ़ाने में कोई परेशानी नहीं हुई और उसने बताया कि सर तनवीर के अलावा भी दो आदमी यहाँ आते थे, लेकिन उन्होंने कभी दरवाज़े पर दस्तक नहीं दी। वे बस दूर ही से कमरे की निगरानी किया करते थे। उनके हुलिये के बारे में वह सिर्फ़ इतना ही बता सका कि उनके चेहरों पर घनी काली दाढ़ी थी और आँखों पर काले शीशे की ऐनकें हुआ करती थीं।

‘‘मेक-अप!’’ इमरान धीरे से बड़बड़ाया।

फिर बस्ती से निकल कर उसने एक टैक्सी ली और सर तनवीर के दफ़्तर की तरफ़ चला गया।

सर तनवीर देश के बहुत बड़े बिज़नेसमैन थे और उनके दफ़्तर दुनिया के कई देशों में थे। उन तक पहुँचने के लिए इमरान को बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ा....बहरहाल, किसी-न-किसी तरह उसकी पहुँंच उन तक हो ही गयी। सर तनवीर ने नीचे से ऊपर तक उसे घूर कर देखा।

‘‘मैं महामारी का टीका लगाने के लिए नहीं आया।’’ इमरान बेवक़ूफ़ों की तरह बोल पड़ा।

‘‘क्या बात है?’’ सर तनवीर की गूँजती हुई आवाज़ से कमरे में झंकार-सी पैदा हुई।

‘‘ग़ज़ाली की लाश....ऐलफ़्रेड पार्क....कल रात!’’ इमरान इस तरह बोला, जैसे वह सर तनवीर से डरा हुआ हो।

‘‘क्या बकवास है?’’

इमरान जेब से ग़ज़ाली की तस्वीर निकाल कर मेज़ पर रखता हुआ बोला। ‘‘उसकी लाश।’’

‘‘तो मैं क्या करूँ?’’

‘‘सिर्फ़ आपकी इत्तला के लिए! वह अपने पड़ोसियों के लिए बड़ा रहस्यमय था और वे लोग उससे भी ज़्यादा रहस्यमय थे जो उसके लिए इस बस्ती के चक्कर लगाया करते थे।’’

‘‘हूँ!’’ सर तनवीर ने दोनों होंट भींच कर कुर्सी से टेक लगायी। उनकी आँखें इमरान के चेहरे पर थीं। ‘‘फिर?’’ उन्होंने थोड़ी देर बाद कहा।

‘‘उन गधों ने मुझे भी बीच में लपेट कर रख दिया है। हुआ यह कि आज मैं फिर वहाँ पहुँच गया। मुझे हालात मालूम नहीं थे। वे गधे शायद आपके बारे में पुलिस को बता रहे थे। गवाह के तौर पर उन्होंने मुझे पेश कर दिया। मगर भला मैं उन्हें कैसे बता देता कि वे आप थे। बस्ती में घुसते ही एक मज़दूर ने मुझे सारी बात बतायी। मैंने पुलिस को बताया कि एक शरीफ़ आदमी कार में ज़रूर आये थे, मगर मैं उन्हें पहचानता नहीं, अलबत्ता दूसरी बार देखने पर ज़रूर पहचान लूँगा। अब मेरी इज़्जत आपके हाथ में है।’’

‘‘क्यों तुम्हारी इज़्ज़त क्यों?’’

‘‘मैं दरअसल सरकारी डॉक्टर नहीं हूँ....बस, यह समझिए कि चार सौ बीस करके पेट पालता हूँ। हाँ, किसी ज़माने में एक प्राइवेट डॉक्टर का कम्पाउण्डर ज़रूर रह चुका हूँ। सादे पानी के मुफ़्त इंजेक्शन लगा कर लोगों पर अपनी अहमियत जताता हूँ, इसलिए कोई ख़ास ज़रूरत पड़ने पर लोग मेरे ही पास दौड़े आते हैं। मैं अपनी कमाई करता हूँ....जी हाँ....मगर अब शायद मेरी पोल खुल जायेगी। यह बहुत बुरा हुआ जनाब। अब आप ही मुझे कोई मशविरा दीजिए।’’

‘‘मशविरा....किसी वकील से लो....वक़्त हो चुका है....अब तुम जा सकते हो....! मगर ठहरो। तुम्हें ये तस्वीर कहाँ से मिली?’’

‘‘अब मैं क्या कहूँ! आप न जाने क्या सोचेंगे।’’

‘‘बताओ?’’ सर तनवीर गरजा।

‘‘मैं पुलिस से पीछा छुड़ा कर वापस आ रहा था कि पीपल वाली गली के मोड़ पर एक आदमी मिला। उसके चेहरे पर घनी काली दाढ़ी थी और आँखों में काले शीशों वाली ऐनक....उसने मुझे तस्वीर दे कर कहा कि यह ग़ज़ाली की तस्वीर है और उसकी मौत के ज़िम्मेदार सर तनवीर ही हो सकते हैं।’’

‘‘ब्लैकमेल करना चाहते हो मुझे?’’ सर तनवीर दाँत पीस कर बोले।

‘‘अरे तौबा-तौबा!’’ इमरान अपना मुँह पीटने लगा। ‘‘मैं जा रहा हूँ जनाब.... आइन्दा आप मेरी शक्ल न देखेंगे। मेरी चार सौ बीसी सिर्फ़ डॉक्टरी तक महदूद है और मैं ज़्यादा लम्बे हाथ मारने की कोशिश नहीं करता।’’

‘‘तुम्हें तस्वीर कहाँ से मिली थी?’’ सर तनवीर ने फिर अपना सवाल दोहराया।

‘‘मैंने हक़ीक़त आपको बता दी और हाँ, उसने यह भी कहा था कि सर तनवीर को फँसवा दो! मैं इस जुमले से समझ गया था कि आपका कोई दुश्मन आपको बेकार में परेशान करना चाहता है।’’

‘‘तुम क्या चाहते हो?’’ सर तनवीर ने थोड़ी देर बाद पूछा।

‘‘हक़ीक़त मालूम करना चाहता हूँ।’’

‘‘क्यों? तुम्हें इससे क्या सरोकार?’’

‘‘मैं दरअसल जासूसी कहानियाँ भी लिखता हूँ, हो सकता है कि मैं इससे कोई अच्छा-सा प्लॉट बना कर थोड़े-से पैसे ही कमा लूँ।’’

सर तनवीर कुछ पल इमरान को घूरते रहा। फिर मेज़ का दरा ज़खोल कर नोटों की एक गड्डी निकाली और उसे इमरान की तरफ़ फेंकते हुए बोले। ‘‘जाओ, अपनी ज़बान बन्द रखना! ये दस हज़ार हैं।’’

‘‘दस लाख पर भी लानत!’’ इमरान बिगड़ गया। ‘‘आप एक शरीफ़ आदमी को ब्लैकमेलर समझ रहे हैं....डॉक्टरी वाली चार सौ बीसी की और बात है। उसमें काफ़ी मेहनत, वक़्त और पैसा बर्बाद होता है, और इस तरह अपनी कमाई हलाल कर लेता हूँ, समझे जनाब.... लाहौल विला क़ूवत....मैं एक इज़्ज़तदार लेखक हूँ। अगाथा क्रिस्टी ने मेरे दर्जनों नॉवेलों का अंग्रेज़ी तरजुमा किया है।’’

‘‘तुम मेरा वक़्त बर्बाद कर रहे हो....रुपये उठाओ....और चलते बनो।’’

‘‘मैं हक़ीक़त मालूम करना चाहता हूँ! ग़ज़ाली कौन था? और आप जैसा बड़ा आदमी उसमें क्यों दिलचस्पी ले रहा था और यह तो मैं जानता हूँ, कि उसकी मौत में आपका हाथ नहीं है, वरना आप ख़ुद को सामने न आने देते।’’

‘‘मुझसे खुल कर बात करो। तुम कौन हो?’’ सर तनवीर ने आगे झुकते हुए धीरे से कहा।

‘‘मैंने अभी तक बन्द हो कर कोई बात नहीं की।’’

‘‘सी.बी.आई. के आदमी हो?’’

‘‘नहीं, मेरी शादी नहीं हुई। मैं किसी सी.बी.आई. को नहीं जानता।’’

सर तनवीर ने नोटों की गड्डी उठा कर फिर मेज़ के दराज़ में डाल ली और मेज़ पर रखी हुई घण्टी पर हाथ मारते हुए बोले। ‘‘अब चुपचाप चले जाओ....वरना चपरासी धक्के दे कर निकाल देगा।’’

घण्टी की आवाज़ के साथ ही चपरासी भी आ गया था।

‘‘आख़्ख़....अस्सलाम अलैकुम!’’ इमरान ने उठ कर न सिर्फ़ चपरासी को सलाम किया, बल्कि ज़बर्दस्ती हाथ भी मिलाने लगा और चपरासी बेचारा बुरी तरह बौखला गया। चपरासी ही नहीं, बल्कि सर तनवीर भी इस हरकत से परेशान हो गये थे।

‘‘चपरासी!’’ उन्होंने मुश्किल से फँसी-फँसी-सी आवाज़ निकाली, लेकिन इमरान तब तक जा चुका था।

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११

इमरान ने फिर एक पी.सी.ओ. बूथ से कैप्टन फ़ैयाज़ का नम्बर डायल किया....और उससे आर्टामोनॉफ़ के बारे में पूछा।

‘‘तुम आख़िर क्या करते फिर रहे हो?’’ फ़ैयाज़ ने दूसरी तरफ़ से कहा। ‘‘मुझे बताओ....वरना मजबूरन....मुझे....’’

‘‘सब्र करना पड़ेगा।’’ इमरान ने जल्दी से जुमला पूरा कर दिया।

‘‘आर्टामोनॉफ़ के बारे में उस वक़्त तक नहीं बताऊँगा जब तक कि तुम मुझे सारे हालात से आगाह न करो।’’

‘‘अच्छा मेरी जान....मुझे न ग़ज़ाली में कोई दिलचस्पी है और न आर्टामोनॉफ़ से....मैं घर जा रहा हूँ। वैसे घर भी तुम्हारा ही है, लेकिन तुम्हारे फ़रिश्ते भी वहाँ से मुझे नहीं निकाल सकते।’’

इमरान रिसीवर रख कर बूथ से बाहर आ गया। वह जानता था कि फ़ैयाज़ अभी ख़ुद ही दौड़ा आयेगा। इसलिए अब उससे कुछ पूछने की ज़रूरत नहीं। उसे यक़ीन था कि वह ख़ुद ही आ कर सब कुछ उगल देगा।

इस भाग-दौड़ में चार बज गये थे और रूशी फ़्लैट में उसका इन्तज़ार कर रही थी। न सिर्फ़ रूशी, बल्कि लेडी तनवीर भी।

इमरान लेडी तनवीर को देख कर बोला। ‘‘आप यहाँ से फ़ौरन चली जाइए। क्योंकि कैप्टन फ़ैयाज़ यहाँ आने वाला है।’’

‘‘सिर्फ़ एक बात सुन लो।’’

‘‘सुना जाइए जल्दी से।’’

‘‘ग़ज़ाली की मौत के बारे में मुझे कुछ नहीं पता। यह ज़रूरी नहीं कि उसकी मौत में मेरा हाथ हो....और मेरा राज़ इतना अहम नहीं हो सकता कि उसे क़त्ल करा दिया जाये।’’

‘‘मैं आपका राज़ नहीं मालूम करना चाहता....आप जा सकती हैं, लेकिन इतना मैं जानता हूँ कि सर तनवीर बड़ी मुसीबतों में फँस जायेंगे....पुलिस उन्हें सूँघ चुकी है। एक सरकारी डॉक्टर ने उन्हें ग़ज़ाली का कमरा खुलवाने की कोशिश करते देखा था....बस, अब जाइए....अगर कैप्टन फ़ैयाज़ ने आपको यहाँ देख लिया तो....घपला हो जायेगा। बस, जाइए।’’

लेडी तनवीर कुछ पल सोचती रही फिर धीरे से बोली, ‘‘बाक़ी चालीस हज़ार लायी हूँ।’’

‘‘उसे आप वापस ले जाइए। अगर मैं उसे हटाने में कामयाब हो गया होता तो ये रुपये यक़ीनन मेरे थे।’’

‘‘अब भी तुम्हारे ही हैं।’’

‘‘ज़बान बन्द रखने के लिए। क्यों?’’

‘‘ज़बान तो हर हाल में बन्द रखनी ही पड़ेगी....और हाँ मैंने पता लगा लिया है, तुम रहमान साहब ही के लड़के हो। ‘‘रहमान साहब, सर तनवीर के गहरे दोस्तों में से हैं और वे कभी हम लोगों की बदनामी बर्दाश्त नहीं करेंगे।’’

‘‘अच्छा....अच्छा....अब आप जाइए। कैप्टन फ़ैयाज़....’’

उसका जुमला पूरा भी नहीं हुआ था कि लेडी तनवीर उठ कर चली गई।

रूशी उर्दू नहीं जानती थी, इसलिए उनकी बातचीत उसकी समझ में नहीं आयी। लेडी तनवीर के जाने के बाद रूशी ने मेज़ के दरा ज़से नोटों की गड्डियाँ निकाल कर इमरान के सामने रख दीं।

‘‘ये क्या?’’

‘‘लेडी तनवीर ने दिये थे।’’

‘‘तुमने क्यों लिये?’’

‘‘ज़बर्दस्ती दे गयी है। मैं क्या करती। उसने कहा था कि तुम उसके दोस्त के लड़के हो।’’

बात इससे ज़्यादा नहीं बढ़ने पायी, क्योंकि फ़ैयाज़ सचमुच पहुँच गया....उसने नोटों की तरफ़ तीखी नज़रों से देखते हुए कहा, ‘‘बड़े मालदार हो रहे हो।’’

‘‘कब नहीं था। आओ बैठो दोस्त, बहुत दिनों बाद मुलाक़ात हुई। क्या आजकल बहुत बिज़ी हो?’’

‘‘लफ़्ज़ों में उड़ाने की कोशिश न करो।’’

‘‘मैं इस जुमले का मतलब नहीं समझा।’’ इमरान ने आँखें फाड़ कर कहा।

‘‘आर्टामोनॉफ़....!’’

‘‘आहा समझा....’’ इमरान ने उसकी बात काट दी। ‘‘मेरी क़ाबिलियत का इम्तहान लेना चाहते हो। आर्टामोनॉफ़ ख़ानदान का बयान मैक्सिम गोगोल ने अपने नॉवेल में किया था।’’

‘‘मैक्सम गोर्की....!’’ फ़ैयाज़ ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।

‘‘नहीं गोगोल, मैं शर्त लगाने के लिए तैयार हूँ।’’

‘‘तुम जाहिल हो....गोर्की....आर्टामोनॉव्स....गोर्की का नॉवेल है।’’

‘‘गोगोल! अगर ज़्यादा ताव दिलाओगे तो गोल-गोल कहूँगा। देखता हूँ कि तुम मेरा क्या....बना नहीं, बिगाड़....नहीं हुश....बना....क्या कहते हैं....जहन्नुम में जाये। हाँ, तो मैं अभी क्या कह रहा था।’’

‘‘इमरान, मैं बहुत बुरी तरह पेश आऊँगा!’’ फ़ैयाज़ भन्ना गया।

‘‘आप के लिए चाय लाओ।’’ इमरान ने रूशी से अंग्रेज़ी में कहा....और रूशी दूसरे कमरे में चली गयी। फ़ैयाज़ उसे जाते देखता रहा फिर उसने एक लम्बी साँस ली।

‘‘आय हाय।’’ इमरान ने अपनी आँखें नचायीं। ‘‘ख़बरदार, बल्कि होशियार....तुम मेरी पार्टनर को देख कर ठण्डी आहें नहीं भर सकते। सुपर फ़ैयाज़, मैं तुम पर मुक़दमा चला दूँगा।’’

‘‘मैं यहाँ पर तुम्हारी फ़ालतू बातें सुनने नहीं आया।’’

‘‘तुम्हारी बड़ी मेहरबानी है कि कभी-कभी चले आते हो....मगर....ख़ैर टालो....तुम्हें आज हरी चाय पिलवाऊँगा।’’

‘‘तुम्हें ग़ज़ाली के कमरे का पता कैसे मालूम हुआ था?’’

‘‘कौन ग़ज़ाली?’’ इमरान ने आँखें फाड़ कर हैरत से पूछा।

‘‘इससे काम नहीं चलेगा। मैं तुम्हें दफ़्तर में तलब कर लूँगा।’’

‘‘और शायद उस दफ़्तर में वह तुम्हारा आख़िरी दिन होगा....’’ इमरान च्यूइंगम चबाता हुआ बोला।

फ़ैयाज़ कुछ देर ख़ामोशी से इमरान को घूरता रहा। फिर उसने कहा। ‘‘आख़िर तुम चाहते क्या हो?’’

‘‘मरने के बाद सिर्फ़ दो गज़ ज़मीन।’’ इमरान ठण्डी साँस ले कर मायूसी में बोला। ‘‘हाथी नहीं चाहता, घोड़ा नहीं चाहता....महल और मोहल्ला नहीं चाहता।

‘‘ये ज़िन्दगी के मेले दुनिया में कम न होंगे।

अफ़सोस हम न होंगे, अफ़सोस हम न होंगे।।’’

शेर पढ़ने के बाद इमरान ने एक बड़ी लम्बी आह भरी....और ख़ामोश हो गया....

रूशी चाय की ट्रे लिये हुए कमरे में दाख़िल हुई। फ़ैयाज़ ख़ूँख़ार नज़रों से इमरान को देख रहा था....लेकिन रूशी को देखते ही उसकी मदद करने के लिए खड़ा हो गया। छोटी मेज़ खींच कर बीच में रखी और रूशी के हाथों से ट्रे ले कर उस पर रखने लगा।

‘‘इसे अपना ही घर समझो!’’ इमरान आँखें बन्द करके सिर हिलाने लगा। चाय के दौरान ज़्यादातर ख़ामोशी ही रही....फ़ैयाज़ और रूशी ने दो-एक रस्मी बातें कीं।

चाय ख़त्म करने के बाद फ़ैयाज़ ने सिगरेट सुलगाया और उसका मूड अचानक बदल गया। वह अच्छी तरह जानता था कि इमरान उसे ज़िन्दगी भर बातों में उड़ाता रहेगा।

‘‘हाँ! वह बात तो रह ही गयी!’’ फ़ैयाज़ मुस्कुरा कर बोला। ‘‘एक आर्टामोनॉफ़ का सुराग़ मिल गया है।’’

‘‘मिल गया न....हा-हा-हा।’’ इमरान पागलों की तरह हँसा। ‘‘मैं पहले ही जानता था कि मिल कर रहेगा।’’

‘‘एक हफ़्ता बीता यहाँ स्पेन की एक डांसिंग पार्टी आयी है। आर्टामोनॉफ़ उसी का एक मेम्बर है।’’

‘‘मगर आर्टामोनॉफ़ तो रूसी नाम है।’’ इमरान बोला।

‘‘क्या हुआ....स्पेन में रूस के बहुत-से लोग आबाद हैं।’’

‘‘हाँ ठीक है....!’’ इमरान कुछ सोचने लगा। फिर थोड़ी देर बाद बोला।

‘‘इसमें लड़कियाँ भी होंगी और एक स्पेशल डांसर तो यक़ीनन होगी।’’

‘‘यूरोप की मशहूर डांसर....मोरीना सलानियो!’’

‘‘मोरीना....मोरीना....सलानियो....!’’

इमरान ने रुक-रुक कर दोहराया। उसे अचानक याद आ गया कि ग़ज़ाली ने यही नाम लिया था। सौ फ़ीसदी यही।

‘‘प्लाज़ा....में प्रोग्राम हो रहे हैं। आज के ख़ास प्रोग्राम का नाम जहन्नुम की अप्सरा है....यह मोरीना का बहुत ही मशहूर डांस है.... यूरोप में उसे काफ़ी शोहरत हासिल हुई है.... वह आग में नाचती है।’’

इमरान कुछ न बोला। वह किसी गहरी सोच में था।

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१२

डांस का प्रोग्राम आठ बजे शुरू होने वाला था....इमरान ने साढ़े सात बजे तक बहुत-सी जानकारियाँ हासिल कर लीं.... आर्टामोनॉफ़ वाली पार्टी पन्द्रह लोगों की पार्टी थी, जिन में से पाँच लड़कियाँ थीं। उन्हीं में मोरीना भी शामिल थी....पार्टी स्पेन से आयी थी और पूरे एशिया का दौरा उसके प्रोग्राम में शामिल था।

इमरान को ऑर्केस्ट्रा का टिकट हासिल करने के लिए घूस देनी पड़ी, क्योंकि ज़्यादातर सीटें एडवांस बुकिंग में रिज़र्व हो गयी थीं।

पूरा हॉल भर गया था....और बाहर हाउस फ़ुल का बोर्ड लगा दिया गया था, लेकिन फिर भी लोगों का यह आलम था कि बुकिंग हाउस की बन्द खिड़कियों पर टूटे पड़ रहे थे। आख़िर हालात इतने नाज़ुक हो गये कि पुलिस को भीड़ पर क़ाबू करने के लिए लाठी चार्ज करना पड़ा।

अन्दर हॉल में स्टेज का पर्दा दो हिस्सों में बँट कर दोनों कोनों की तरफ़ खिसकता चला गया। पूरे स्टेज पर आग की लपटें नज़र आ रही थीं, आग बनावटी नहीं, बल्कि असली थी, क्योंकि अगली सीटों पर बैठे हुए लोगों को सचमुच जहन्नुम का मज़ा आ गया था।

स्टेज सीटों की सतह से काफ़ी ऊँचा था। इसलिए इस बात का अन्दाज़ा करना मुश्किल था कि आग पूरे स्टेज पर फैली हुई थी या बीच में कुछ जगह ख़ाली भी रखी गयी थी। वैसे देखने से यही लगता था कि पूरे स्टेज पर आग की लपटों के अलावा और कुछ नहीं है।

अचानक सारा हॉल साज़ों की आवाज़ से गूँजने लगा....और आग की लपटों के बीच एक ख़ूबसूरत चेहरा दिखा। वह भी आग ही का मालूम होता था।

आग....संगीत....और आतिशीं चेहरे ने कुछ ऐसी फ़िज़ा पैदा कर दी कि तमाशाइयों को डांस की शुरुआत और ख़त्म होने का एहसास ही न हो सका। शायद ही कोई यह बता सकता कि डांस कितनी देर तक होता रहा था।

तालियों की गूँज पर लोग चौंके और उन्हें एहसास हुआ कि वे मशीनी तौर पर तालियाँ पीट रहे हैं। इसमें उनके इरादे का दख़ल नहीं था।

लगातार डेढ़ घण्टे तक स्टेज पर आग नज़र आती रही और उतनी देर में मोरीना ने तीन डांस पेश किये। एक में वह अकेली थी और दो डांस उसने चार लड़कियों के साथ पेश किये थे।

प्रोग्राम के ख़त्म होने पर ग्रीन रूम के सामने आदमियों का समन्दर ठाठें मार रहा था.... वे सब मोरीना को क़रीब से देखने के ख़्वाहिशमन्द थे, इसलिए इमरान को यक़ीन था कि वह किसी चोर दरवाज़े से निकल कर अपनी होटल की तरफ़ भागेगी।

प्लाज़ा की बिल्डिंग दोमंज़िला थी। नीचे हॉल था और ऊपरी मंज़िल पर ग्रैण्ड होटल। मोरीना भीड़ से बचने के लिए होटल ही को फ़रार होने का रास्ता बना सकती थी। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं था।

होटल की दो सीढ़ियाँ थीं। एक तो सड़क पर ले जाता था और दूसरा गली में। इमरान ने सड़क वाली सीढ़ियों को भी ज़ेहन से निकाल दिया। दूसरे पल वह गली की तरफ़ बढ़ रहा था। गली पतली ज़रूर थी, लेकिन अँधेरी नहीं थी और वहाँ सचमुच इमरान को एक लम्बी-सी कार खड़ी दिखाई दी। गली में उसकी मौजूदगी का कोई तुक नहीं था। इमरान बड़ी तेज़ी से गली से निकल कर अपनी टू-सीटर के क़रीब आया और उसे यह देख कर बिलकुल हैरत नहीं हुई कि इसमें कैप्टन फ़ैयाज़ विराजमान था।

उसे शाम ही से इसका एहसास था कि कैप्टन फ़ैयाज़ उसका पीछा कर रहा है।

उसने उसकी तरफ़ ध्यान दिये बग़ैर दरवाज़ा खोला और स्टीयरिंग के सामने बैठ कर इंजन स्टार्ट किया। फिर गाड़ी प्लाज़ा की पिछली गली की तरफ़ रेंगने लगी। इमरान इतनी बेताल्लुक़ी से स्टीयरिंग करता रहा जैसे उसे अपने क़रीब फ़ैयाज़ की मौजूदगी मालूम न हो।

‘‘किधर चल रहे हो?’’

अचानक फ़ैयाज़ ने पूछा और इमरान ‘‘अरे बाप’’ कह कर इस तरह उछल पड़ा कि गाड़ी एक दीवार से टकराते-टकराते बची....और फिर इमरान के मुँह से कुछ इस क़िस्म की आवाज़ें निकलने लगीं जैसे वह नींद की हालत से डर कर जाग पड़ा हो।

‘‘क्या बेहूदगी है! गाड़ी सँभालो।’’ फ़ैयाज़ ने स्टीयरिंग पर हाथ रखते हुए कहा।

‘‘नहीं! मेरी जेब में कुछ नहीं है।’’ इमरान रो देने वाली आवाज़ में बोला। ‘‘क़सम ले लो भाई।’’

‘‘ओ इमरान के बच्चे।’’

‘‘आँ....हाँय....तो यह तुम हो! फ़ैयाज़....!’’ इमरान बड़बड़ाया। ‘‘अगर मेरा हार्टफ़ेल हो जाता तो....’’

‘‘सच कहता हूँ, किसी दिन तुम्हारी सारी शेख़ी निकाल दूँगा!’’ फ़ैयाज़ ने ना ख़ुश होते हुए कहा। इमरान कुछ न बोला। उसने अपनी टू-सीटर गली में खड़ी कर दी। वह लम्बी कार से काफ़ी दूरी पर थे और टू-सीटर अँधेरे में थी। इमरान ने इंजन बन्द कर दिया।

‘‘यहाँ क्यों आये हो?’’ फ़ैयाज़ ने पूछा।

‘‘तुमसे इश्क़ हो गया है मुझे!’’ इमरान एक ठण्डी आह भर कर सीने पर हाथ मारता हुआ बोला। ‘‘बहुत दिनों से सोच रहा था कि इश्क़ का इज़हार कर दूँ....लेकिन हिम्मत नहीं पड़ती थी....आज पड़ गयी है, क्योंकि आज तुम अपनी बीवी को साथ नहीं लाये....ज़ालिम समाज के डर से....अरे, बाप-रे-बाप....मज़हब के ठेकेदारों के डर से....और वह सब क्या होता है....वग़ैरह-वग़ैरह वही सब कुछ जो नॉवेलों में होता है....वह सब कुछ कहने के बाद मैं यह कहता हूँ कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है....आओ, हम तुम बहुत दूर भाग चलें....बहुत दूर.... मिसाल के तौर पर कुतुब शुमाली या कुतुब जुनूबी या कुतुब लाट....हाय मेरे पेट में यह मीठा-मीठा दर्द क्यों हो रहा है.... शायद इसी का नाम मोहब्बत है कोफ़्ता....अरे, बाप-रे-बाप भूख लगी है....और मैं इस वक़्त कोफ़्ते खाना पसन्द करूँगा! फ़ैयाज़ माई डियर....हिप....! श् श श् श....ख़ामोश....!’’

मोरीना सीढ़ियों से उतर कर कार की तरफ़ बढ़ रही थी। उसके साथ तीन आदमी भी थे।'

अगली कार के गली से निकलते ही इमरान की टू-सीटर भी आगे बढ़ गयी.... फ़ैयाज़ खामोशी से सब कुछ देखता रहा। टू-सीटर अगली कार का पीछा कर रही थी। फ़ैयाज़ ने मोरीना को पहचाना नहीं था, क्योंकि उसके कोट के कॉलर पर लगे हुए समोर की ऊँचाई उसके कानों के ऊपरी हिस्से तक थी.... और उसके सिर पर हैट भी था। इमरान ने भी सिर्फ़ अन्दाज़े से उसे मोरीना समझ लिया था। मगर यह हक़ीक़त थी कि उसने अन्दाज़ा लगाने में ग़लती नहीं की थी।

‘‘हाँ, पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट क्या कहती है?’’ इमरान ने अचानक पूछा।

‘‘ज़हर और माथे का ज़ख़्म....ज़ख़्म के अन्दर छोटे-छोटे पत्थर मिले हैं और उनमें से कुछ तो हड्डी में घुसते चले गये थे। ऐसा मालूम होता है जैसे वे पत्थर किसी प्रेशर वाली मशीन से फेंके गये हों। और हालात के एतबार से वे हीरे जैसे किसी पत्थर के छोटे-छोटे दाने लगते हैं।’’

‘‘हाँ तो....मेरा ख़याल गलत नहीं निकला।’’

‘‘तुम्हारा ख़याल गलत कभी निकला है प्यारे!’’ फ़ैयाज़ उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगा।

इमरान कुछ न बोला। वह बड़ी संजीदगी से किसी मामले पर ग़ौर कर रहा था। थोड़ी देर बाद फ़ैयाज़ ने कहा।

‘‘हाँ, एक दूसरी ख़ास बात जो हालात के एतबार से अजीब है। वह अँगूठी अब बहुत ज़्यादा शक के दायरे में आ गयी है।’’

‘‘क्यों? शक के दायरे में क्यों?’’

‘‘कोट के अन्दर की जेब का अस्तर फटा हुआ नहीं था....! कहीं भी कोट में कोई रुकावट मौजूद नहीं है जिसके ज़रिये अँगूठी ऊपर के कपड़े और अस्तर के बीच में पहुँच सके। तुम ख़ुद सोचो कि ऐसी सूरत में इसके अलावा और क्या कहा जा सकता है कि अँगूठी जान-बूझ कर कोट के अन्दर रखवायी गयी थी।’’

‘‘लेकिन वह निकाली किस तरह गयी?’’ इमरान ने पूछा।

‘’कोट के दामन को थोड़ा चीर कर।’’

‘‘हाँ तो अच्छा वह कोट! उसे मेरे पास भिजवा देना।’’

‘‘भिजवा दूँगा....मगर इसका मक़सद क्या हो सकता है।’’

‘‘मक़सद बताने की फ़ीस साढ़े चार रुपए होती है।’’

‘‘यार इमरान, ख़ुदा के लिए मज़ाक़ न करो।’’

‘‘यही जुमला अगर तुमने नाक पर उँगली रख कर कहा होता तो तुम्हारी बीवी सीधी मेरे दफ़्तर चली आती और मुझे उससे काफ़ी फ़ायदा पहुँचता।’’

‘‘बकवास मत करो।’’ फ़ैयाज़ फिर उखड़ गया।
 
अगली कार होटल अलास्का के सामने रुक गयी। मोरीना और उसके तीनों साथी उतर कर होटल में चले गये और इमरान अपनी गाड़ी काफ़ी दूरी पर रोक कर फ़ैयाज़ को वहीं बैठने का इशारा करता हुआ आगे बढ़ गया। होटल के पोर्च में दरबान अकेला खड़ा था और वे उसके क़रीब से गुज़र कर अन्दर गये थे। इमरान पोर्च में ही रुक कर दरबान से ग़प्पें लड़ाने लगा। बातों-ही-बातों में उसने न सिर्फ़ मोरीना के उस होटल में रहने के बारे में मालूम किया, बल्कि यह भी पूछ लिया कि वह और उसके साथी किन नम्बरों के कमरों में ठहरे हुए हैं।

मोरीना ने अपने ठहरने की जगह के बारे में कोई ऐलान नहीं किया था। इसलिए कुछ लोग ही उसके रहने के बारे में जानते थे। उसने दरबान से यह भी मालूम किया कि वह किस वक़्त होटल में होती है।

वापसी पर फ़ैयाज़ ने उससे पूछा। ‘‘यह किस औरत का पीछा हो रहा था?’’

‘‘एक ऐसी औरत का जिसका शौहर उसे तलाक़ देना चाहता है और मैं तलाक़ के लिए सबूत तलाश कर रहा हूँ। सुपर फ़ैयाज़! तुम मेरे बिज़नेस के मामले में टाँग मत अड़ाया करो। जासूसी से मेरा पेट नहीं भरता।’’

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१३

दूसरी सुबह इमरान ने एक पी.सी.ओ. बूथ से कैप्टन फ़ैयाज़ को ग़ज़ाली के कोट के लिए फ़ोन किया। जवाब में फ़ैयाज़ ने बताया कि वह बहुत ज़्यादा मसरूफ़ है, लेकिन किसी-न-किसी तरह एक घण्टे के अन्दर ही कोट उसे भिजवा देगा।

इमरान अपने फ़्लैट में वापस आ कर उसका इन्तज़ार करने लगा, लेकिन कोट से पहले लेडी तनवीर पहुँच गयी। उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था। ऐसा लग रहा था जैसे वह सारी रात जागती रही हो।

‘‘येस माई लेडी।’’ इमरान कुर्सी से उठता हुआ बोला।

‘‘बैठो, बैठो।’’ लेडी तनवीर ने ग़ुस्से के अन्दाज़ में कहा। और ख़ुद भी एक कुर्सी पर बैठ गयी। रूशी किचन में नाश्ता तैयार कर रही थी।’’

‘‘मैं तुमसे बहुत कुछ कहने आयी थी, मगर अब मेरी समझ में नहीं आता कि क्या करूँ। अब मैं तुमसे एक काम और लेना चाहती हूँ।’’

‘‘तौबा, तौबा।’’ इमरान अपने कान पकड़ कर मुँह पीटता हुआ बोला। ‘‘आप काम लेना चाहती हैं या मेरा काम तमाम करना चाहती हैं?’’

‘‘मेरी बात तो सुनो।’’

‘‘सुनाइए साहब!’’ इमरान बेबसी से बोला।

‘‘एक बोगस डॉक्टर के बारे में जानकारी हासिल करनी है जो इसी मामले में सर तनवीर को ब्लैकमेल करना चाहता है। उसने शायद उन्हें ग़ज़ाली के दरवाज़े पर दस्तक देते देख लिया था।’’

इमरान ने एक लम्बी साँस ली। उसके चेहरे पर इत्मीनान दिखने लगा। जैसे कोई बहुत बड़ा मसला हल हो गया हो।

‘‘अच्छा, तो आप दोनों ही यही चाहते थे कि ग़ज़ाली यहाँ से चला जाये।’’

‘‘हाँ, यह सही है।’’ लेडी तनवीर ने जवाब दिया।

‘‘तो फिर आप अब तक यह क्यों ज़ाहिर करती रही थीं कि आप यह सब कुछ सर तनवीर की जानकारी में नहीं कर रही हैं।’’

‘‘ज़रूरत! अगर मैं ऐसा न करती तो तुम्हें मेरा काम म़ज़ाकिया मालूम होता और तुम ग़ज़ाली को छोड़ कर मेरे पीछे पड़ जाते और अगर मैं यह न करती तो पचास हज़ार की पेशकश मसख़रापन होती। मैं दरअसल अपने रवैये से यह ज़ाहिर करना चाहती थी कि मुझे ग़ज़ाली की तरफ़ से ब्लैकमेलिंग का डर है, लेकिन हक़ीक़त यह नहीं थी।’’

‘‘फिर हक़ीक़त क्या है?’’

‘‘कुछ भी हो! लेकिन वह ऐसी नहीं है जिसकी बिना पर ग़ज़ाली की मौत में हमारा हाथ हो सके।’’

‘‘आप नहीं बताना चाहतीं?’’

‘‘मैं सिर्फ़ यह चाहती हूँ कि तुम उस वाक़ये को भूल जाओ। कोई ऐसी हरकत न करो जिससे मेरा भी बुरा हो जाये....और अगर तुम नक़ली डॉक्टर को रोक सको तो उसकी मज़दूरी अलग! वह भी मामूली रक़म न होगी समझे।’’

‘‘समझा। अगर आप दोनों यानी आपके साथ सर तनवीर भी इस मामले में किसी एक ही मक़सद के तहत दिलचस्पी ले रहे हैं तो मुझे इत्मीनान है। लेकिन एक-न-एक दिन तो आपको अपना राज़ मुझे बताना ही पड़ेगा।’’

‘‘बेकार की बातें छोड़ो। उस नक़ली डॉक्टर के लिए क्या करोगे?’’

‘‘भला मैं उसे कहाँ ढूँढता फिरूँगा और फिर अगर उसकी लाश से भी मुलाक़ात हो गयी तो ख़ुदा को क्या मुँह दिखाऊँगा।’’

‘‘इमरान....बेटे.... ख़ुदा के लिए मुझ पर रहम करो।’’

‘‘अच्छा तो जाइए, सर तनवीर से कह दीजिएगा कि जैसे ही डॉक्टर फिर नज़र आये, उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दें, फिर मैं सब कुछ देख लूँगा। आप....मगर....आप....मुझे सब कुछ बतायेंगी।’’

‘‘सर तनवीर से सलाह लिये बग़ैर मैं कुछ नहीं कह सकती.... हाँ, तुम उस बोगस डॉक्टर वाले मामले के लिए कितनी माँग करोगे?’’

‘‘कुछ भी नहीं। मैं यह नेक काम फ़्री करूँगा....!’’

‘‘मैं तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जानकारी हासिल कर चुकी हूँ। तुम आख़िर रहमान साहब की म़र्जी के मुताबिक़ ज़िन्दगी क्यों नहीं गुजारते।’’

‘‘वे ख़ुद मेरी म़र्जी के मुताबिक़ ज़िन्दगी क्यों नहीं गुज़ारते....’’ इमरान घड़ी की तरफ़ देखता हुआ खड़ा हो गया और फिर धीरे से बोला। ‘’अब मैं इजाज़त चाहूँगा।’’

लेडी तनवीर चली गयी। लेकिन उसने इमरान के इस रवैये पर बहुत बुरा-सा मुँह बनाया था।

इमरान मेज़ पर तबला बजाने लगा। फिर चौंक कर रूशी को आवाज़ दी।

थोड़ी देर बाद दोनों नाश्ता कर रहे थे....रूशी कुछ उखड़ी-उखड़ी नज़र आ रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह झगड़ा करने के लिए कोई बहाना तलाश रही हो।

नाश्ते के दौरान ही कैप्टन फ़ैयाज़ का आदमी ग़ज़ाली का कोट ले कर आया और वापस भी चला गया।

‘‘कारोबार तो अच्छा चल रहा है।’’ इमरान ने रूशी से कहा था और रूशी ने जवाब में ज़मीन और आसमान एक कर दिये। इमरान की शख़्सियत का कोई पहलू ऐसा नहीं बचा जिस पर रूशी ने नुक़्ता-चीनी न की हो।

‘‘परवाह न करो।’’ इमरान बड़बड़ाया। ‘‘एक दिन तुम भी इसकी आदी हो जाओगी।’’

‘‘नहीं, मैं तन्हाई में पागल हो जाऊँगी। तुम मुझे अपने दोस्तों से क्यों नहीं मिलाते।’’

‘‘मिलाऊँगा....ज़रा हालात ठीक हो जाने दो....अच्छा.... हिप....अब मैं काम करना चाहता हूँ।’’

इमरान ने कहा और ग़ज़ाली का कोट उलट-पलट कर देखने लगा। दामन में नीचे की तरफ़ एक छोटा-सा सूराख़ था। जो शायद अँगूठी को अन्दर से निकालने के लिए बनाया गया था। बहरहाल, कोट का अच्छी तरह जायज़ा लेने पर फ़ैयाज़ के बयान की तसदीक़ हो गयी। हक़ीक़त में दूसरा कोई ऐसा सूराख़ मौजूद नहीं था जिस से अँगूठी अस्तर और अपर के बीच में पहुँच सकती हो....फिर वह अँगूठी अन्दर किस तरह पहुँची। इमरान सोचने लगा कि दूसरी सूरत यही हो सकती है कि वह जान-बूझ कर अपर और अस्तर के बीच रखवायी गयी हो। मगर मक़सद....? क्या ख़ुद अँगूठी की हिफ़ाज़त! मगर अँगूठी फ़ैयाज़ के बयान के मुताबिक़ ज़्यादा क़ीमती नहीं थी। उस पर नगीना भी नहीं था। नगीने की जगह बराबर थी और उस पर ‘‘ग़ज़ाली’’ ख़ुदा हुआ था। वह सोच रहा था कि अँगूठी पर नाम खुदवाना भी कम-से-कम मौजूदा दौर में चलन नहीं है। फिर मक़सद....?

वह काफ़ी देर तक ख़यालों में डूबा रहा फिर उसने ग़ज़ाली के कोट का अस्तर उधेड़ना शुरू कर दिया....देर ज़रूर लगी, लेकिन मेहनत बेकार नहीं हुई....सीने पर बकरम की जगह....ट्रेसिंग क्लाथ लगा हुआ देख कर इमरान चौंका....और फिर दूसरे ही पल उसने एक लम्बी साँस ली....! ट्रेसिंग क्लॉथ पर काले रंग की लिखावट थी....

इमरान उसे पढ़ता रहा....और उसके होंट भिंचते रहे....!
 
तहरीर पढ़ने के बाद उसने ट्रेसिंग क्लॉथ के टुकड़े को बहुत ही हिफ़ाज़त से मेज़ के दराज़ में रख लिया और बायीं तरफ़ का अस्तर उधेड़ने लगा....उधर भी बकरम की बजाय ट्रेसिंग क्लॉथ ही निकला। लेकिन यह बिलकुल सादा था....इमरान ने उसे भी निकाल कर दराज़ में डाल दिया।

रूशी बेकार बैठी थी। उसने एक बार फिर इमरान से अपनी उकताहट का तज़किरा किया।

‘‘हाँ वाक़ई।’’ इमरान मुस्कुरा कर बोला। ‘‘बेकारी आदमी को बीमारी में डाल देती है। अच्छा तो बेकार मत बैठो। इस कोट का अस्तर दोबारा सी डालो।’’

‘‘तुमने उसे उधेड़ा क्यों और यह किसका है?’’ रूशी ने पूछा। वह उस वक़्त कमरे में मौजूद नहीं थी जब इमरान ने उसका अस्तर उधेड़ कर ट्रेसिंग क्लॉथ निकाला था।

‘‘मेरा ही है।’’ इमरान ने संजीदगी से कहा। ‘‘मैं हमेशा पुराने कोट ख़रीद कर पहनता हूँ। इस तरह कई कोट हो जाते हैं और यह तो तुम जानती ही हो कि हर रोज़ कोट बदलने वाले हमेशा बड़े आदमी हुआ करते हैं।’’

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१४

उसी शाम इमरान फिर प्लाज़ा जा पहुँचा....लेकिन आज उसके साथ उसका दोस्त प्रोफ़ेसर भी था। वही जिससे इमरान ने सिगरेट के पैकेट पर पेन्सिल से किये हुए दस्तख़त पढ़वाये थे।

आर्केस्ट्रा के टिकटों का इन्तज़ाम पहले ही से कर लिया गया था....और इस बात का ख़ास ख़याल रखा गया था कि पिछली सीटों की लाइन में जगह मिले।

‘‘मगर आज डांस नहीं होगा।’’ प्रोफेसर ने कहा। ‘‘वही आग वाला।’’

‘‘परवाह नहीं!’’ इमरान सिर हिला कर बोला। ‘‘बस, जैसे ही मैं रेडी कहूँ, अपने होश और हवास सँभाल लेना.... समझे!’’

‘‘लेकिन आख़िर इस हरकत से फ़ायदा ही क्या....अगर पकड़े गये तो....तुम ख़ुद सोचो, मेरी कितनी बदनामी होगी। एक नहीं, मेरे दर्जनों स्टूडेन्ट हॉल में मौजूद होंगे।’’

‘‘इस सूरत में क़तई यह न ज़ाहिर होने पायेगा कि तुम मेरे साथ हो। बस प्यारे....!’’

‘‘तुमसे पीछा छुड़ा लेना आसान काम नहीं है।’’ प्रोफ़ेसर ने बेबसी से कहा। डांस शुरू हुआ, वह बड़े सुकून के साथ मज़े लेते रहे।

चौथे दौर का आग़ाज़ होते ही इमरान ने प्रोफ़ेसर की तरफ़ झुक कर धीरे से रेडी कहा और प्रोफ़ेसर सँभल कर बैठ गया। मोरीना स्टेज पर एक डांस पेश कर रही थी। अचानक एक चमगादड़ उसके चेहरे से टकराया और वह बेतहाशा चीख़ मार कर पर्दे के पीछे उलट गयी। चमगादड़ पहले तो नीचे गिरा फिर स्टेज से उड़ कर ‘‘टचक-टचक’’ करता हुआ हाल के अँधेरे कोने में चक्कर लगाने लगा। पर्दा फ़ौरन ही गिरा दिया गया और सारा हाल दर्शकों के शोर से गूँजने लगा। उधर प्रोफ़ेसर इमरान से कह रहा था।

‘‘तुम आदमी हो या जादूगर.... तुमने आख़िर उसे किस तरह फेंका कि मुझे भी एहसास न हो सका।’’

‘‘उसे छोड़ो।’’ इमरान बोला। ‘‘यह बताओ कि वह किस भाषा के शब्द थे।’’

‘‘जर्मन!’’ प्रोफ़ेसर ने कहा। ‘‘और उर्दू में इनका मतलब ‘ ख़ुदा ग़ारत करे’ के अलावा और किन्हीं दूसरे शब्दों में नहीं अदा हो सकता?’’

‘‘तुम्हें यक़ीन है कि जर्मन ही के शब्द थे?’’

‘‘सौ फ़ीसदी।’’ प्रोफेसर बोला।

‘‘शुक्रिया! दोस्त तुम्हें मेरी वजह से ख़ासी तकलीफ़ उठानी पड़ी।’’

‘‘मगर आख़िर इसका मक़सद क्या था?’’

‘‘कुछ नहीं; बस एक तजरुबा....और अब यह हक़ीक़त मुझ पर साफ़ हो गयी है कि हर आदमी बेख़बरी और ख़ौफ़ की हालत में हमेशा अपनी मादरी ज़ुबान बोलता है....सुबहान अल्लाह....क्या कुदरत के कारख़ाने हैं....कुर्बान जाइए....!’’

‘‘मैं अब भी नहीं समझा!’’

‘‘यह बेचारी हक़ीक़त में जर्मन है मगर ख़ुद को इटली की ज़ाहिर करती है।’’

‘‘ओ हो! अच्छा!’’ प्रोफ़ेसर ने हैरत से कहा। ‘‘तब तो तजरुबा वाक़ई बहुत कामयाब रहा। मैं समझा था कि तुम पर वही स्टूडेन्ट के ज़माने वाला लफ़ंगापन सवार हो गया है....मगर इमरान क्या चक्कर है। कोई ख़ास बात....ओ हो, मैं तो यह भूल ही गया था कि तुम आज कल सी.बी.आई. में काम कर रहे हो....!’’

‘‘कभी कर रहा था। अब इस्तीफ़ा दे दिया है। नहीं, इस तजरुबे का ताल्लुक़ किसी अहम बात से नहीं था! बस, यूँ ही ख़याल पैदा हुआ था, क्योंकि उस औरत के नाक-नक़्श इतालवी नहीं हैं। इसलिए मैंने कहा ये तजरुबा भी हो जाये।’’

‘‘मगर फिर आख़िर उसने ये ढोंग क्यों रचाया है।’’ प्रोफ़ेसर कुछ सोचता हुआ बड़बड़ाया।

‘‘यह भी कोई ख़ास बात नहीं।’’ इमरान ने लापरवाही से कहा। ‘‘दूसरी बड़ी जंग के बाद से यूरोप में जर्मनों की तरफ़ से नफ़रत पायी जाती है। इसलिए ख़ुद को जर्मन ज़ाहिर करके वह इतनी ज़्यादा मशहूर न हो सकती।’’

प्रोफ़ेसर कुछ न बोला....इमरान ने बड़ी ख़ूबसूरती से बात बनायी थी।

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१५

होटल अलास्का में एक हफ़्ता पहले बुकिंग कराये बग़ैर कमरा हासिल कर लेना आसान काम नहीं था, लेकिन इमरान को उसके क़रीबी दोस्त भूत भी कहते थे, इसलिए वह भूत ही ठहरा। उसने एक छोड़, दो कमरे हासिल किये। एक अपने लिए और एक रूशी के लिए। और उसी माले पर हासिल किये जिसमें मोरीना सलानियो और उसके साथियों के कमरे थे।

रूशी अब स्कर्ट की बजाय कमीज़ और शलवार में रहती थी। कभी-कभी जम्पर और ग़रारे में भी दिख जाती थी। उसे पूरबी लिबास बहुत पसन्द थे और सिर्फ़ पूरब और पश्चिम के त़र्ज की वजह से मोरीना की पार्टी के मर्द उसमें ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगे थे। जब रूशी उनमें घुल-मिल गयी थी तो इमरान कैसे न घुलता-मिलता....! उसने बहुत जल्द उन पर अपनी बेवक़ूफ़ी का सिक्का जमा लिया। ख़ास तौर पर मोरीना के लिए तो वह एक ऐसा लतीफ़ा था जिसके बग़ैर खाने की मेज़ पर उसे मज़ा नहीं आता था।

दूसरी तरफ़ उसकी पार्टी के मर्दों का ख़याल था कि अगर उन्हें ऐसे ही दो-चार बेवक़ूफ़ क़िस्म के लोग और मिल गये तो उनका वक़्त काफ़ी दिलचस्पियों में बीतेगा।

बहरहाल, इमरान उन लोगों को बहुत क़रीब से देख रहा था.... मोरीना अपने साथियों पर हुक्म चलाती थी। बिलकुल उसी अन्दाज़ में जैसे वे उसके नौकर हों और उनसे हमेशा अंग्रेज़ी में बातचीत करती थी जिसका मतलब यह था कि वे सब अंग्रेज़ी के अलावा और कोई ज़बान नहीं समझ सकते थे। आर्टामोनॉफ़ पर इमरान ने ख़ास तौर पर नज़र रखी थी। वह बिलकुल बेडौल क़िस्म का आदमी था। उसका चेहरा भी बेडौल-सा मालूम होता था। चलने का अन्दाज़ कुछ ऐसा था कि हल्की-सी लँगड़ाहट का पता चलता था। हालाँकि वह हक़ीक़त में लँगड़ी नहीं थी।

आज इमरान फिर मोरीना का पीछा कर रहा था। वह अपने सारे साथियों समेत एक बड़ी-सी स्टेशन वैगन में सफ़र कर रही थी और एक स्थानीय आदमी भी उनके साथ था। रात के दस बजे थे और वह प्लाज़ा का प्रोग्राम ख़त्म करके वापस हुई थी। मगर स्टेशन वैगन उन रास्तों पर नहीं चल रही थी जो होटल अलास्का की तरफ़ जाते थे।

इमरान की टू-सीटर पीछा करती रही। इमरान अकेला ही था....

फिर स्टेशन वैगन एक ऐसी बस्ती में दाख़िल हुई जहाँ ऊँचे घराने के लोग आबाद थे....और यहाँ दूर-दूर तक शानदार इमारतें नज़र आ रही थीं। लेकिन आबादी घनी नहीं थी। हर इमारत अलग हैसियत रखती थी और एक से दूसरी के बीच में कुछ-न-कुछ दूरी ज़रूर थी। बस्ती के बाहर दोनों तरफ़ जंगलों और खेतों की क़तारें थीं।

स्टेशन वैगन एक इमारत के सामने रुक गयी। इमरान बहुत ज़्यादा एहतियात बरत रहा था। उसने अपनी कार की हेडलाइटें पहले ही से बुझा रखी थीं।

दो-तीन आदमी स्टेशन वैगन से उतरे और फिर सब-के-सब नीचे आ गये। वे गाड़ी से कोई बहुत भारी चीज़ उतारने की कोशिश कर रहे थे और उसे नीचे उतारने में देरी का सबब इमरान की समझ में न आ सका जबकि एक साथ कई आदमी कोशिश कर रहे थे। आख़िर थोड़ी ही देर बाद हक़ीक़त सामने आ गयी। उन्होंने एक बहुत बड़ा गट्ठर उतारा....लेकिन उसे फिर ज़मीन पर डाल देना पड़ा और दो-तीन आदमी उसे दबाये रहे। बिलकुल ऐसा लग रहा था जैसे वह कोई जानवर हो और उन्हें इस बात का डर हो कि अगर वे उसे दबाये न रहे तो वह उनके क़ब्ज़े से निकल जायेगा।

बहुत मुश्किल से वे उसे उठा कर सामने वाली इमारत में चले गये।

इमरान ने ग़ुस्से के अन्दाज़ में अपने कन्धों को हिलाया, वह कुछ पल उसी जगह खड़ा रहा। फिर बड़ी तेज़ी से एक तरफ़ चलने लगा। उसे याद आ गया था कि इस बस्ती में एक सरकारी हस्पताल था, जहाँ पब्लिक के इस्तेमाल के लिए टेलीफ़ोन बूथ भी बना हुआ है।

उसने बूथ में दाख़िल हो कर बड़ी तेज़ी से कैप्टन फ़ैयाज़ का नम्बर डायल किया....उसे यक़ीन था कि वह इस वक़्त घर ही पर होगा, क्योंकि उसकी बीवी इन दिनों बीमार थी।

‘‘हैलो! फ़ैयाज़....! मैं इमरान बोल रहा हूँ....रूपनगर से....हाँ....और मैं सुरैया लॉज मैं ग़ैरक़ानूनी तौर पर घुसने जा रहा हूँ। अगर तुम चाहो तो तुम्हें एक घण्टे बाद वहाँ मेरी लाश तैयार मिलेगी....हिप। अगर इससे पहले पहुँच गये तो हो सकता है कि ग़ज़ाली के क़ातिलों का दीदार कर सको। समझ गये न....हाँ....बस....खत्म....!’’

इमरान रिसीवर हुक से लगा कर फिर बाहर आ गया और बहुत तेज़ी से अपनी कार की तरफ़ वापस जा रहा था।

कार के क़रीब पहुँच कर उसने उसकी डिकी खोली और अन्दर हाथ डाल कर कुछ टटोलने लगा....इस डिकी में दुनिया भर की बलाएँ भरी रहती थीं और इमरान उसे हमेशा ताला लगाये रखता था....

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१६

मोरीना सलानियो इस वक़्त औरत नहीं लग रही थी। वह उस देसी आदमी को भूखी शेरनी की तरह घूर रही थी जो उसके सामने एक कुर्सी में रस्सी से जकड़ा बैठा था.... इसके अलावा एक देसी आदमी और भी था....लेकिन वह मोरीना के आदमियों के साथ थोड़ी दूरी पर खड़ा बेपरवाही से सिगरेट के हल्के-हल्के कश ले रहा था....

‘‘बताओ!’’ मोरीना गरजी! ‘‘हड़ताल क्यों नाकाम हुई थी?’’

‘‘मैं नहीं जानता!’’ कुर्सी में बँधे हुए आदमी ने जवाब दिया।

‘‘आर्टामोनॉफ़....!’’ मोरीना ने आर्टामोनॉफ़ की तरफ़ देखे बग़ैर उसको पुकारा।

‘‘हाँ मादाम!’’

‘‘उसके बाज़ुओं पर ख़ंजर की नोक से इंक़लाब लिखो।’’

आर्टामोनॉफ़ जेब से एक बड़ा-सा चाक़ू निकाल कर देसी की तरफ़ बढ़ा और देसी डर से चीख़ने लगा, ‘‘तुम मुझे डरा नहीं सकते....तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते....’’

आर्टामोनॉफ़ ने चाक़ू की नोक उसके बाज़ू में उतार दी....देसी ने अपने होंट भींच लिये।

अब वह ख़ामोश हो गया था....उसमें कोई हरकत नहीं हो रही थी....सिर्फ़ उसकी आँखों से तकलीफ़ के एहसास ज़ाहिर हो रहा था....

‘‘बस, अब हट जाओ!’’ मोरीना बोली।

आर्टामोनॉफ़ ने चाक़ू हटा लिया....देसी की आस्तीनों से खून की बूँदें टपक रही थीं।

‘‘अब बताओ?’’ मोरीना ने उससे पूछा।

‘‘हाँ....अब मैं ज़रूर बताऊँगा....! सुनो!’’ देसी दाँत पीस कर बोला। ‘‘मैं तुम्हारे साथ था। मैं अपनी ज़िन्दगी से खेला हूँ। मैंने तुम्हारे लिए क्या नहीं किया....लेकिन अब तुम्हारी पोल खुल चुकी है....! तुम्हारे संगठन का दावा है कि सारी दुनिया के आदमियों की वह मदद करता है, लेकिन यह दावा एक खुला झूठ है....तुम्हारा संगठन सारी दुनिया में एक ख़ास क़िस्म का इंक़लाब लाना चाहता है। सिर्फ़ इसलिए कि दुनिया के किसी कोने में उसके दुश्मन न रह जायें....और वह मुल्क सारी दुनिया पर अपनी चौधराहट क़ायम करे जो उस सोसाइटी का सेंटर है....!’’

‘‘आर्टामोनॉफ़!’’ मोरीना ने बहुत ही ठण्डे दिमाग़ से कहा। इसकी रान पर इंक़लाब लिखो।’’

आर्टामोनॉफ़ ने उसकी रानों पर चाक़ू की नोक से वही काम शुरू किया।

देसी अपना निचला होंट दाँतों में दबाये पत्थर के बुत की तरह मोरीना को घूर रहा था।

‘‘अब क्या कहते हो।’’ मोरीना ने थोड़ी देर बाद कहा।

‘‘मैं तुम पर थूकता हूँ।’’ देसी ने काँपती हुई आवाज़ में कहा। ‘‘तुम जहन्नुम की अप्सरा नहीं, बल्कि जहन्नुम की रण्डी हो, कुतिया। जहाँ भयंकर-भयंकर दानव तुम्हारी टाँगें उठाया करते हैं।’’

‘‘आर्टामोनॉफ़ उसके दायें कान का निचला हिस्सा काट दो।’’ मोरीना ने इतने इत्मीनान से कहा जैसे वह उसे इनाम दिलवा रही हो।

आर्टामोनॉफ़ ने उसके दायें कान की लौ उड़ा दी! देसी अपनी चीख़ किसी तरह न रोक सका।

मोरीना ख़ामोशी से उसे देखती रही, फिर उसने आर्टामोनॉफ़ को अलग हट जाने का इशारा किया। देसी के कान से ख़ून की धार निकल कर गर्दन पर फैल रही थी।

‘‘तुम अपनी ज़िन्दगी से क्यों उकता गये हो,’’ उस देसी आदमी ने कहा जो दूर खड़ा सिगरेट पी रहा था।

‘‘भाई!’’ज़ख़्मी कराहा ‘‘ ख़ुदा तुम्हें अक़्ल दे....एक दिन तुम्हारा भी यही हश्र होने वाला है....मगर उस वक़्त चाकू तुम्हारे अपने ही किसी भाई के हाथ में होगा....मुल्क और क़ौम से ग़द्दारी करने वाले का यही अंजाम होना चाहिए....और मैं तो ख़ुश हूँ कि मुझे इन्हीं लोगों के हाथों से सज़ा मिल रही है, जिन्होंने मुझे बहकाया था।’’

‘‘ख़ामोश रहो!’’ मोरीना चीख़ी! ‘‘तुम्हारी हड्डियों पर से एक-एक बोटी करके गोश्त उतारा जाएगा।’’

‘‘यह भी करके देख लो....लेकिन तुम्हें हड़ताल की नाकामी की वजह मालूम न हो सकेगी। तुम मुझे मार डालो तब भी....!’’

‘‘आर्टामोनॉफ़....! दूसरे कान की लौ भी उड़ा दो।’’

इस बार देसी के मुँह से एक लम्बी चीख़ निकली और वह बेहोश हो गया।

‘‘इरशाद....!’’ मोरीना ने दूसरे देसी को मुख़ातिब किया।

‘‘हाँ....मादाम!’’

‘‘अब क्या किया जाये।’’

‘‘कुछ भी नहीं....वह हरगिज़ नहीं बतायेगा।’’

‘‘ख़ैर....परवाह नहीं!’’ मोरीना ने लापरवाही से कहा। ‘‘आर्टामोनॉफ़! उसे ख़त्म ही कर दो।’’

आर्टामोनॉफ़। बेहोश आदमी की तरफ़ फिर बढ़ा।

‘‘ठहरो!’’ इरशाद चीख़ा....! उसके दायें हाथ में रिवॉल्वर था और वह उछल कर दूर जा खड़ा हुआ था।

‘‘क्या मतलब?’’ आर्टामोनॉफ़ पलट कर ग़ुर्राया।

‘‘तुम सब अपने हाथ ऊपर उठा लो....इससे पहले मैं मरूँगा मैंने तुम्हारे इंक़लाब की तस्वीर देख ली....और अब मैं भी उस पर लानत भेजता हूँ....काश! मैं उसकी जगह होता!’’

‘‘मोसियो इरशाद, तुम पागल हो गये हो....’’ मोरीना ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘नहीं, अब होश में आया हूँ। पागल तो पहले था....! भलाई इसी में है कि इसे खोल दो। और मैं इसे यहाँ से ले जाऊँ, क्योंकि मेरी ही बदौलत ये तुम्हारी पकड़ में आया था।’’

‘‘आर्टामोनॉफ़! मोसियो इरशाद का कहना मानो।’’ मोरीना नर्म आवाज़ में बोली।

आर्टामोनॉफ़ झुक कर रस्सी खोलने लगा....!

ये एक शैतानी पल था....इरशाद का पूरा ध्यान आर्टामोनॉफ़ की तरफ़ था और वह उस पल में ये भूल गया था कि वहाँ कई दूसरे आदमी भी हैं। अचानक मोरीना के साथियों में से एक ने इरशाद पर छलाँग लगायी, एक फ़ायर हुआ और सामने वाली दीवार का बहुत-सा प्लास्टर चिटक कर ज़मीन पर आ गिरा। रिवॉल्वर इरशाद के हाथ से निकल कर कई फ़ुट ऊँचा उछल गया....वे दोनों एक-दूसरे से लिपट गये थे। इरशाद उस विदेशी से ज़्यादा ताक़तवर नहीं मालूम होता था।

‘‘नख़लियॉफ़! गला घोंट दो उसका!’’ मोरीना ने ठहाका लगाया।

लेकिन अचानक ख़ुद उसके गले में फँसी हुई आवाज़ें निकलने लगीं....क्योंकि उसकी गर्दन में देखने वालों को एक फन्दा पड़ा हुआ दिखा....रस्सी का दूसरा सिरा रोशनदान तक पहुँच कर ग़ायब हो गया था। वे बौखला कर उसकी तरफ़ दौड़े, लेकिन वह आदमी भी उछल कर अलग हट गया जो इरशाद से लिपटा था। मोरीना के पैर ज़मीन से लगभग एक फ़ुट ऊपर थे और उसने दोनों हाथों से रस्सी पकड़ रखी थी, वरना उसकी गर्दन कभी की टूट चुकी होती....गर्दन पर फन्दे का ज़ोर नहीं पड़ रहा था....वह उसी तरह लटकी हुई हिटलरी अन्दाज़ में चीख़ती रही।

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१७

इमरान ने रस्सी का दूसरा सिरा ऊपरी मंज़िल के एक खम्भे के पास लपेट कर गाँठ लगा दी थी। इमारत में उन लोगों के अलावा और कोई नहीं था....और उसने यह हरकत सिर्फ़ इसलिए की थी कि वह उन्हें इस चक्कर में फँसा कर ख़ूब आसानी से उनके बाहर निकलने के सारे रास्ते बन्द कर दे।

और हक़ीक़त में हुआ भी यही। वे सब मोरीना को फन्दे से छुटकारा दिलाने की कोशिश में लग गये और इमरान ने नीचे उतर कर उस कमरे के दरवाज़ों को बाहर से बन्द करना शुरू कर दिया। अन्दर वालों को इसकी ख़बर भी न हो सकी। अब ऐसी सूरत में इमरान उनसे अकेला भी निपट सकता था, लेकिन उसने इस क़िस्म की कोई हरकत नहीं की....अगर वह अब भी डिपार्टमेंट आफ़ इन्वेस्टिगेशन से बाक़ायदा तौर पर जुड़ा होता तो शायद कुछ-न-कुछ कर भी चुका होता, अब तो उसे बहरहाल, कैप्टन फ़ैयाज़ के आने का इन्तज़ार करना था।

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