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जिम्मेदारी
लेखक - गुड्डूसिंह (कुंदन )
जिम्मेदारी
संध्या अपने जीवन के उस मोड़ पर आ चुकी थी, जहाँ से इंसान अपनी नयी जिंदगी के साथ – साथ जिम्मेदारियों का भी सबक सिखलेता है। संध्या आर्ट कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन की पढाई पूरी करने के बाद गाँव के एक छोटे से प्राईवेट स्कूल में सहायक शिकक्षिका की नौकरी करने लगी थी। संध्या के माँ और पिताजी की मौत आज से तीन साल पहले कार दुर्गटना में हो गई थी। माँ और पिताजी के मौत के बाद संध्या अपने ताऊजी और ताईजी के यहाँ कानपूर चली आई थी। संध्या के ताऊजी की एक छोटी बेटी थी .. राधिका जो संध्या की बहन के साथ – साथ एक अच्छी दोस्त भी थी।
आज राधिका का जन्म दिन था जिसकी वजह से ताईजी ने संध्या को घर जल्दी आने को कहा था.. मगर स्कूल में ज्यादा काम होने की वजह से संध्या को जल्दी छुट्टी नहीं मिल पाई। किस जन्म का पाप है जो मेरे माथा पर आ गई| माँ – बाप तो मर गये मगर मेरे सर पर एक बोझ छोड़ दिया। कमसे कम उस दुर्घटना में ये भी मर जाती तो चैन से जीती।
ताईजी चूल्हे पर तवा चढ़ाती हुई मन ही मन बुदबुदाते हुये बोली। ताईजी अक्सर संध्या को हर छोटी सी भी गलती पर शब्दों का ऐसा तीव्र बाण चलती |
जिससे संध्या को पूरी तरह से झटझोर कर रख देता। गाँव वाले तो मनहूस ,अभागन जैसे कई साड़ी फबित्या करते| मगर ताईजी ने भी संध्या को तार – तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी...
इसलिए क्योकि मै उनकी सगी बेटी नहीं हूँ ? आज मेरे मम्मी और पापा जिन्दा होते तो ये दिन कम से कम देखना तो नहीं परता
...इतना सोचते ही संध्या की आँखो से अश्रु के कुछ बुँदे छलक आते। संध्या को रोती हुई देखकर राधिका –संध्या कमरे में आती और प्यार से संध्या पुचकारते हुए बोलती - ओ – हो दीदी आप भी ना माँ की बातों का तुरंत बुरा मान जाती हो। आपको पताहै न माँ हर किसी को छोटी – छोटी बातों पर डाटती रहती है चलो अब हसो।
इतना बोल कर राधिका संध्या केपैर में गुदगुदी लगाने लगती। संध्या के ताऊजी राधिका और संध्या में कोई फर्क नहीं समझते थे। वो हमेशा संध्या को अपनी बड़ी बेटी की तरह मानते थे |
इसलिए संध्या अपना ज्यादातर वक्त ताऊजी के साथ ही गुजरती थी। एक दिन संध्या स्कूल से जब घर आ रही थी ....तभी रास्ते में एक छोटा बच्चा संध्या के पास गया और बोला – दीदी दस रूपये दो ना दो दिन से कुछ भी नहीं खाया है। उस बच्चे ने एक हाफ पैंट पहना था और एक कमीज जिसमे कई सारे छोटे – छोटे छिद्र थे। संध्या अपनी पर्स से दस रूपये निकाल कर उस बच्चे को देदी। बेटा तुम्हारी माँ कहाँ है ? संध्या उस बच्चे को स्नेह से उसके सर को सहलाती हुई पूछी?
दीदी मेरी माँ नहीं है ...... दस दिन पहले ही भगवन के पास चली गई। उस बच्चे की बात सुनकर संध्या का दिल एकदम से काप गया और इससे आगे संध्या कुछ न बोल सकी। वह बच्चा दस रूपये लेकर एक दुकान में गया और दो पाव लेकर बड़ी तेजी से खाने लगा
। कितने बदनशीब होते है वो लोग जिनके सर पर किसी का साया नहीं होता। भगवान क्यों किसी को माँ – बाप से अलग करताहै| सारी दुनियाँ उसे तुच्छ नजरो से देखती है। इतना सोचते ही संध्या के गला और आँखे नम होगई। शाम हो चूका था संध्या भगवान के पास दिया जला रहीथी .......
तभी ताऊजी ने संध्या को आवाज दिए। संध्या भगवान के पास दिया जलाकर तुरंत
ताऊजी के पास गई और बोली – जी ताऊजी।
बेटा मैं कल तुम्हारे लिए लड़का देखने गया था। येफोटो है लड़के का एक बार तुम देखलो फिर बात आगे बढ़ायेंगे। संध्या के ताऊजी स्नेह से संध्या के सर पर हाथ रखते हुए बोले।
ताऊजी अभी मैं शादी नहीं करना चाहतीहूँ। संध्या सर निचे करके नीरस स्वर बोली।
पर क्यों बेटा ? मै चाहता हूँ जीतनी जल्दी हो मैं अपने दोनों बेटियों का हाथ पिला कर दू ....... अब मेरी तबियत भी ठीक नहीं रहती न जाने कब कोई अन्होनि हो जाये कौन जनता है। ताऊजी के मुँह से इस तरह की बात सुनकर संध्या एकदम से मुरझा गई।
ताऊजी आप इस तरह की बात न किया कीजिये हमें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता है। संध्या नाराज होते हुए बोली।
ठीक है बेटा गलती होगई अब दुबारा ऐसी बात नहीं बोलूंगा। संध्या के ताऊजी अपना कान पकरते हुए बोले।
ताऊजी को अपना कान पकरते हुए देखकर संध्या अपने मुँह को चुनड़ी से दाबकर खिल-खिलाकर हसने लगी।
कितनी प्यारी है मेरी दोनों बेटियाँ। हस्ती है तो ऐसा लगता है जैसे आसमान से फूलो की वर्षा होरही है। दोनों को एक दूसरे के साथ खेलते –झगरते देखकर मेरा दिल आनंद से झूम उठता है। जब ब्याह करके संध्या अपने घर चली जायेगी तो सारा घर सुना – सुना हो जायेगा। इस घर की हर ईट में संध्या की छवी दिखाई देती है। ये छवी भी वक्त के साथ धुंधली हो जाएगी।
अगले दिन संध्या स्कूल से छुट्टी होने के बाद जब घर आई तो ताऊजी को देखकर संध्या के पैरो तले से जमीन खिसक गया. ..... पैर को जैसे किसी ने जोर से जकड़ लिया हो। ताऊजी का पैर टूट चूका था। संध्या दौड़ती हुई ताऊजी के पास गई और बोली। चाचाजी ये सब कैसे हुआ और आपने स्कूल में हमें फोन क्यों नहीं किया।
बेटा तुम खामोख़ा परेशान हो रही हो सीढ़ियों से पैर फिसल गया था। मामूली सा जख्म है डॉक्टर ने बिना वजह के पट्टी लगा दी है। दस पंद्रह दिनों में अपने
आप ठीक हो जायेगा। तुम जाकर फ्रेश हो जाओ। संध्या के ताऊजी अपनी तकलीफ छुपाने की कोशिस करते हुए बोले।
संध्या वहाँ से अपने कमरे में जाने लगी तभी राधिका आई और बोली | दीदी स्कूल में फी देना है........ जो भी थोड़े बहुत पैसे थे | वो पिताजी के पैर के इलाज में खर्च होगये। अगर टाईम पर स्कूल में फी जमा नहीं हुआ तो हमें परीक्षा में नहीं बैठने दिया जायेगा।
"मैं हूँ ना" तुम चिंता मत करो। संध्या राधिका के सर को प्यार से सहलाती हुए बोली।
ताऊजी का पैर टूट जाने की वजह से घर की आर्थिक स्तिथि एकदम से ख़राब हो गई थी। राधिका की पढाई भी जरुरी थी......... इसलिए संध्या घर की सारी जिम्मेदारी अपने सर ले ली।
कितनी समझदार है मेरी संध्या ,एक बेटे का फर्ज निभा रही है। मैं संध्या की ताई होने के बाद भी ताई नहीं बन पाई लेकिन संध्या मुझे एक माँ से भी बढ़कर सम्मान देती रही। आज शायद मेरा बेटा भी होता तो मेरी इतनी फिक्र नहीं करता जितना संध्या करती है। कितना सताया है मैंने इस फूल सी बच्ची को फिर भी कभी संध्या हमसे एक बार भी आँख उठाकर बात तक नहीं की | आज अगर संध्या न होती तो राधिका की पढ़ाई भी रुक जाती| इतना सोचते – सोचते ताईजी के आँखो से आँसू आ
गया।
समाप्त।
लेखक - गुड्डूसिंह (कुंदन )
जिम्मेदारी
संध्या अपने जीवन के उस मोड़ पर आ चुकी थी, जहाँ से इंसान अपनी नयी जिंदगी के साथ – साथ जिम्मेदारियों का भी सबक सिखलेता है। संध्या आर्ट कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन की पढाई पूरी करने के बाद गाँव के एक छोटे से प्राईवेट स्कूल में सहायक शिकक्षिका की नौकरी करने लगी थी। संध्या के माँ और पिताजी की मौत आज से तीन साल पहले कार दुर्गटना में हो गई थी। माँ और पिताजी के मौत के बाद संध्या अपने ताऊजी और ताईजी के यहाँ कानपूर चली आई थी। संध्या के ताऊजी की एक छोटी बेटी थी .. राधिका जो संध्या की बहन के साथ – साथ एक अच्छी दोस्त भी थी।
आज राधिका का जन्म दिन था जिसकी वजह से ताईजी ने संध्या को घर जल्दी आने को कहा था.. मगर स्कूल में ज्यादा काम होने की वजह से संध्या को जल्दी छुट्टी नहीं मिल पाई। किस जन्म का पाप है जो मेरे माथा पर आ गई| माँ – बाप तो मर गये मगर मेरे सर पर एक बोझ छोड़ दिया। कमसे कम उस दुर्घटना में ये भी मर जाती तो चैन से जीती।
ताईजी चूल्हे पर तवा चढ़ाती हुई मन ही मन बुदबुदाते हुये बोली। ताईजी अक्सर संध्या को हर छोटी सी भी गलती पर शब्दों का ऐसा तीव्र बाण चलती |
जिससे संध्या को पूरी तरह से झटझोर कर रख देता। गाँव वाले तो मनहूस ,अभागन जैसे कई साड़ी फबित्या करते| मगर ताईजी ने भी संध्या को तार – तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी...
इसलिए क्योकि मै उनकी सगी बेटी नहीं हूँ ? आज मेरे मम्मी और पापा जिन्दा होते तो ये दिन कम से कम देखना तो नहीं परता
...इतना सोचते ही संध्या की आँखो से अश्रु के कुछ बुँदे छलक आते। संध्या को रोती हुई देखकर राधिका –संध्या कमरे में आती और प्यार से संध्या पुचकारते हुए बोलती - ओ – हो दीदी आप भी ना माँ की बातों का तुरंत बुरा मान जाती हो। आपको पताहै न माँ हर किसी को छोटी – छोटी बातों पर डाटती रहती है चलो अब हसो।
इतना बोल कर राधिका संध्या केपैर में गुदगुदी लगाने लगती। संध्या के ताऊजी राधिका और संध्या में कोई फर्क नहीं समझते थे। वो हमेशा संध्या को अपनी बड़ी बेटी की तरह मानते थे |
इसलिए संध्या अपना ज्यादातर वक्त ताऊजी के साथ ही गुजरती थी। एक दिन संध्या स्कूल से जब घर आ रही थी ....तभी रास्ते में एक छोटा बच्चा संध्या के पास गया और बोला – दीदी दस रूपये दो ना दो दिन से कुछ भी नहीं खाया है। उस बच्चे ने एक हाफ पैंट पहना था और एक कमीज जिसमे कई सारे छोटे – छोटे छिद्र थे। संध्या अपनी पर्स से दस रूपये निकाल कर उस बच्चे को देदी। बेटा तुम्हारी माँ कहाँ है ? संध्या उस बच्चे को स्नेह से उसके सर को सहलाती हुई पूछी?
दीदी मेरी माँ नहीं है ...... दस दिन पहले ही भगवन के पास चली गई। उस बच्चे की बात सुनकर संध्या का दिल एकदम से काप गया और इससे आगे संध्या कुछ न बोल सकी। वह बच्चा दस रूपये लेकर एक दुकान में गया और दो पाव लेकर बड़ी तेजी से खाने लगा
। कितने बदनशीब होते है वो लोग जिनके सर पर किसी का साया नहीं होता। भगवान क्यों किसी को माँ – बाप से अलग करताहै| सारी दुनियाँ उसे तुच्छ नजरो से देखती है। इतना सोचते ही संध्या के गला और आँखे नम होगई। शाम हो चूका था संध्या भगवान के पास दिया जला रहीथी .......
तभी ताऊजी ने संध्या को आवाज दिए। संध्या भगवान के पास दिया जलाकर तुरंत
ताऊजी के पास गई और बोली – जी ताऊजी।
बेटा मैं कल तुम्हारे लिए लड़का देखने गया था। येफोटो है लड़के का एक बार तुम देखलो फिर बात आगे बढ़ायेंगे। संध्या के ताऊजी स्नेह से संध्या के सर पर हाथ रखते हुए बोले।
ताऊजी अभी मैं शादी नहीं करना चाहतीहूँ। संध्या सर निचे करके नीरस स्वर बोली।
पर क्यों बेटा ? मै चाहता हूँ जीतनी जल्दी हो मैं अपने दोनों बेटियों का हाथ पिला कर दू ....... अब मेरी तबियत भी ठीक नहीं रहती न जाने कब कोई अन्होनि हो जाये कौन जनता है। ताऊजी के मुँह से इस तरह की बात सुनकर संध्या एकदम से मुरझा गई।
ताऊजी आप इस तरह की बात न किया कीजिये हमें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता है। संध्या नाराज होते हुए बोली।
ठीक है बेटा गलती होगई अब दुबारा ऐसी बात नहीं बोलूंगा। संध्या के ताऊजी अपना कान पकरते हुए बोले।
ताऊजी को अपना कान पकरते हुए देखकर संध्या अपने मुँह को चुनड़ी से दाबकर खिल-खिलाकर हसने लगी।
कितनी प्यारी है मेरी दोनों बेटियाँ। हस्ती है तो ऐसा लगता है जैसे आसमान से फूलो की वर्षा होरही है। दोनों को एक दूसरे के साथ खेलते –झगरते देखकर मेरा दिल आनंद से झूम उठता है। जब ब्याह करके संध्या अपने घर चली जायेगी तो सारा घर सुना – सुना हो जायेगा। इस घर की हर ईट में संध्या की छवी दिखाई देती है। ये छवी भी वक्त के साथ धुंधली हो जाएगी।
अगले दिन संध्या स्कूल से छुट्टी होने के बाद जब घर आई तो ताऊजी को देखकर संध्या के पैरो तले से जमीन खिसक गया. ..... पैर को जैसे किसी ने जोर से जकड़ लिया हो। ताऊजी का पैर टूट चूका था। संध्या दौड़ती हुई ताऊजी के पास गई और बोली। चाचाजी ये सब कैसे हुआ और आपने स्कूल में हमें फोन क्यों नहीं किया।
बेटा तुम खामोख़ा परेशान हो रही हो सीढ़ियों से पैर फिसल गया था। मामूली सा जख्म है डॉक्टर ने बिना वजह के पट्टी लगा दी है। दस पंद्रह दिनों में अपने
आप ठीक हो जायेगा। तुम जाकर फ्रेश हो जाओ। संध्या के ताऊजी अपनी तकलीफ छुपाने की कोशिस करते हुए बोले।
संध्या वहाँ से अपने कमरे में जाने लगी तभी राधिका आई और बोली | दीदी स्कूल में फी देना है........ जो भी थोड़े बहुत पैसे थे | वो पिताजी के पैर के इलाज में खर्च होगये। अगर टाईम पर स्कूल में फी जमा नहीं हुआ तो हमें परीक्षा में नहीं बैठने दिया जायेगा।
"मैं हूँ ना" तुम चिंता मत करो। संध्या राधिका के सर को प्यार से सहलाती हुए बोली।
ताऊजी का पैर टूट जाने की वजह से घर की आर्थिक स्तिथि एकदम से ख़राब हो गई थी। राधिका की पढाई भी जरुरी थी......... इसलिए संध्या घर की सारी जिम्मेदारी अपने सर ले ली।
कितनी समझदार है मेरी संध्या ,एक बेटे का फर्ज निभा रही है। मैं संध्या की ताई होने के बाद भी ताई नहीं बन पाई लेकिन संध्या मुझे एक माँ से भी बढ़कर सम्मान देती रही। आज शायद मेरा बेटा भी होता तो मेरी इतनी फिक्र नहीं करता जितना संध्या करती है। कितना सताया है मैंने इस फूल सी बच्ची को फिर भी कभी संध्या हमसे एक बार भी आँख उठाकर बात तक नहीं की | आज अगर संध्या न होती तो राधिका की पढ़ाई भी रुक जाती| इतना सोचते – सोचते ताईजी के आँखो से आँसू आ
गया।
समाप्त।