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टुकड़ा - टुकड़ा सच complete

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" मेरे घोंघा बसन्त ! बल - हठ ठानने से हर चीज तो प्राप्त नहीं होती . अगर मैं भी पायल की जगह होती और उसी की सी परिस्थितियों में होती तो अधिक संभावना इस बात की ही होती कि मैं भी इस भौतिक वादी युग में तुम्हारे प्रति पायल जैसा ही व्यवहार प्रकट करती . दोस्त ! मैं लड़की हूँ - - - इसलिए अच्छी तरह जानती हूँ कि कार , कोठी और वजनी बैंक - पास - बुक हर कॉलेज कढ़ी महत्वाकांक्षी लड़की का ख़्वाब होता है . कोई आश्चर्य नहीं कि ये सपना पायल भी देखती है . और फिलहाल तुम उसके इन ख़्वाबों में सच्चाई का चटकीला रंग भरने की योग्यता नहीं रखते . गुलशन ! अधिकाँश लड़कियां एक नाज़ुक लता के सामान होती हैं - - - जो सदैव संपन्न , बलिष्ठ और समीप के पेड़ का सहारा ढूंढकर उसी से लिपटती हैं - - - ऊपर चढ़ने के लिए . और ये सब गुण - - - ये विशेषताएं पायल ने तुममें नहीं , बल्कि चंचल में देखी हैं . लेकिन तुम्हें ये सब बातें इसलिए नहीं समझ आतीं क्योंकि तुम्हारे प्रेम की न आँखें हैं , न विवेक , न बुद्धि . "

" मगर फिर तुम क्यों मुझसे शादी करना चाहती हो ? "

" तुम भी न - - - नशे में एकदम घोंचू जैसे सवाल कर रहे हो . अब पूछ ही लिया है - - - तो सुनो ! मैं तुमसे इसलिए शादी करना चाहती हूँ - - - क्योंकि पहली बात तो ये है कि मैं तुम्हें पसन्द करती हूँ - - - और दूसरी बात ये है कि तुम्हारे साथ गाँठ जोड़कर मेरे भविष्य को कोई खतरा नहीं - - - क्योंकि मेरा तो एक उच्च आर्थिक स्तर पहले से ही स्थापित है और मैं अपने सहयोग से तुम्हें भी उसी स्तर तक पहुंचा सकती हूँ . मगर ये बात तुम्हारे और पायल के जोड़े पर लागू नहीं हो सकती . "

" ओह ! " उसकी दर्पण सी बातों में अपना चेहरा देखकर गुलशन काफी परेशान सा दिखने लगा .

गुलशन के मनोभावों को ताड़कर गेसू ने कहा -- " दोस्त ! जब परेशानी बढ़ जाए , तो आदमी को विचारों को मोड़ देकर खुली हवा में घूमना चाहिये . आओ चलो ! बाहर कहीं घूम - टहल आयें . "

" मन नहीं है . "

" आखिर यहाँ बैठे - बैठे करोगे भी क्या ? "

" सुबह को दोपहर , दोपहर को शाम और शाम को रात बनाऊंगा . "

गेसू उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए बोली -- " नक्शा मत मारो . अब चलो भी . मैं जो कह रही हूँ . "

गुलशन मुस्कराकर राजी हो गया . दोनों नदी किनारे सैर करने निकल पड़े .

मौसम मसूरी बन गया था . हवायें तेज और बर्फ की तरह ठंढी हो चली थीं . लगता था कि बर्फ गिरकर रहेगी .

दोनों नदी किनारे बैठकर जल - प्रवाह निहारते रहे . लगता था , कुछ सोच रहे हों .

थोड़ी देर में !

गुलशन ने गेसू से पूछा -- " क्या सोच रही हो ? "

" सोच रही हूँ , नदी भी हमें कुछ शिक्षा देती है . "

" क्या ? "

" इसका बहता हुआ नीर हमें ये सिखाता है - - - कि जीवन गतिशील होकर जिया जाता है . मगर एक तुम हो कि पायल में अटक कर रुक गए हो . " इतना कहकर उसने पूछा -- " पर तुम भी तो कुछ सोच रहे थे ? "

" हाँ - - - मैं भी नदी के विषय में ही सोच रहा था . सोच रहा था कि नदी के दोनों पाट लगातार कितने समीप रहकर भी कभी नहीं मिल सकते . जैसे कि - - - . "

" जैसे कि तुम और पायल . यही कहना चाहते हो न ? " वह उसकी बात काटने के बाद झुंझलाकर बोली .

गुलशन ने भोलेपन से स्वीकारा -- " हाँ . "

उसकी इस अदा पर गेसू की हंसी निकल पड़ी . वह बोली -- " दीवाने हो गए हो तुम . "

" मैं दीवाना सही - - - मगर एक बात बताओ , " उसने मुस्कराकर चुहल भरी भरपूर निगाह गेसू पर डाली और कहा -- " आज तुम इतनी खूबसूरत क्यों लग रही हो ? "

" कितनी ? "

" इतनी - - - कि मौसम खिल उठें . हवायें महक उठें . "

और आज - - - पहली बार गुलशन के मुंह से अपने सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर अचानक गेसू के गुलाबी गालों पर शर्म की लाली ने एक मादक अंगडाई ली और आँखों में शराब उतर आयी . गेसू को लगा कि वो मारे खुशी के बेहोश हो जायेगी . और फिर छः बरस से लेकर साठ बरस तक की कौन सी ऐसी स्त्री है , जो अपने रूप की प्रशंसा सुनकर पुलकित न हो जाय .

इस बीच - - - दबे पाँव हल्की - हल्की बर्फ पड़ने लगी और सर्दी बहुत बढ़ गयी . सर्दी से मुकाबले की तैयारी के इरादे से गुलशन ने एक सिगरेट सुलगा ली .

गेसू हथेलियाँ रगड़कर गर्मी लाने का प्रयास करते हुए बोली -- " सर्दी बहुत हो गयी है . "

गुलशन ने जवाब दिया - " बर्फ़बारी में सर्दी नहीं होगी तो और क्या होगा ! "

" बर्फ़बारी में और भी तो बहुत कुछ हो सकता है . " वह भेदपूर्ण मुस्कान के साथ ' बहुत कुछ ' शब्द पर जोर देकर बोली .

गुलशन ने पूछा -- " जैसे ? "

" जैसे डबल न्यूमोनिया . बुद्धू - - - जिसमें दोनों तरफ की पसलियाँ धौंकनी बन जाती हैं . " वह रहस्यमय कहकहा बिखेर कर बोली . उसका ठहाका ऐसा तेज दगा - - - मानो बेशुमार परिन्दे उड़ गए हों - - - मगर होठों के कोर पर रहस्य का एक ढीठ नन्हा जुगनू टस से मस न हुआ .

गुलशन ने नासमझ सा स्वांग रचकर टोका -- " तुम कहकहे बहुत खर्च करती हो . "

" कहकहे इसीलिए होते ही हैं . "

" नहीं - - - इन्हें संभालकर रखना चाहिये . उस वक्त के लिये - - - जब ज़िन्दगी दुखों से भर जाती है . जब सब अपने तीन दूना पांच पढ़ाकर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं . उम्मीद की सारी किरने दामन छुड़ाकर फरार हो जाती हैं और ना उम्मीदी की गहरी धुंध में सभी रास्ते गुम हो जाते हैं . "

" उस वक्त मैं इस दुनिया में नहीं रहूंगी . "

"ये तुम्हारी खुशफहमी है . उस वक्त व्यक्ति ज़रूर ज़िन्दा रहता है . जैसे मैं . "

गुलशन की बात वातावरण को गंभीर बना गयी .

थोड़ी देर बाद !

गेसू बोली -- " आज तुम्हें साफ़ - साफ़ जवाब देना ही होगा कि तुम पायल की मृग तृष्णा में ही भटकते रहोगे या मुझसे शादी करोगे ? "

" गेसू ! बाँधे बज़ार नहीं लगतीं . वैसे भी - - - मुझसे शादी करके तुम्हें मिलेगा ही क्या ? मैं तो कहता हूँ , तुम्हारी चहकती खुशी भी जाती रहेगी . मैं तुम्हें कुछ न दे पाऊंगा . कुछ भी नहीं . "

" दोस्त ! व्यक्ति सदैव कुछ पाने से ही खुश नहीं होता . कभी - कभी कुछ या सब कुछ देने पर भी उसे आत्म संतोष और ख़ुशी प्राप्त होती है . "

" जैसे ? "

" जैसे दिल . "

" ओह - - - ज़रा ये तो बताओ - - - दिल देकर कितनी ख़ुशी मिलती है ? "

" कहा ना - - - बहुत अधिक . "

" जितना की मुझे मिली ? " गुलशन ने आह भरकर पूछा .

गेसू झुंझलाकर बोली -- " ओफ्फोह - - - क्यों वातावरण खराब करने पर तुले हो ! पायल के दीवाने - - - आँख खोलकर तो देखो , दुनिया कितनी खूबसूरत है . कितनी रंगीन और मस्ती भरी है . "

" लेकिन मुझे तो ऐसा कभी नहीं अनुभव हुआ . "

" तो आओ - - - आज मैं अनुभव कराऊँ . " गेसू आवेश में आकर तेजी से बोली और उसने गुलशन को अपनी तरफ घसीटकर , अपनी बाहों में भींचकर , गुदाज़ छाती से लगा लिया और पुनः बोली -- " लो - - - अनुभव करो . कुछ हुआ अनुभव ? "

अचानक में हुए गेसू के इस मादक हमले से हड़बड़ाकर गुलशन किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया . उसकी तो मति ही मारी गयी . विवेक शून्य हो गया . कुछ घड़ी बाद थोड़ा सँभालने पर - - - एक बार तो उसके मन में ख़याल आया कि वो गेसू को जवाब दे दे . उसे जहाँ - तहाँ चूम ले . मन भी मचला - - - फिर भी उसने ऐसा नहीं किया . क्योंकि मुई शराफत बिलार बनकर रास्ता जो काट गई . उसने अपने को जल्दी से गेसू की गिरफ्त से छुड़ा लिया और लम्बी सांस लेकर आश्चर्य से बोला -- " बाप रे बाप . "

" क्या बाप रे बाप ? "

" गेसू ! तुम इतनी सेक्सी क्यों हो ? "

" वो औरत ही क्या - - - जो सेक्सी न हो ! सच्चाई अनुभव करा रही हूँ तो सेक्सी कहते हो !! सेक्स सुखद दाम्पत्य की धुरी है , इस बात को गाँठ बाँध लो . यह भी सच है कि सेक्सी औरतों का वैवाहिक जीवन अपेक्षाकृत अधिक सफल व सुखी रहता है . इसलिए मात्र मेरे बारे में ऐसा सोचना तुम्हारी अज्ञानता या भ्रम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं . सच तो ये है कि मैं तुमसे थोड़ी सी बेतकल्लुफ भर हूँ . ऐ मेरे नासमझ दोस्त ! तुम्हें नहीं मालूम - - - औरतों में मर्दों की अपेक्षा कई गुना सेक्स की चाहत मौजूद रहती है . यदि उनके पास आर्थिक पराधीनता , लाज शरम का आवरण और चुगलखोर शारीरिक संरचना न होते , तो आज दुनिया का कुछ दूसरा ही रूप होता - - - और तुम मर्द दुम दबाये उनसे बचते फिरते . "

हक्का - बक्का गुलशन चुप रहा . वह तो बस दीदे फाड़े टुकुर - टुकुर गेसू की ओर एकटक निहार रहा था . गेसू उसे वक्त से आगे की लड़की नज़र आ रही थी .

उसकी ये दशा देखकर गेसू ने मुस्कराकर पूछा -- " यूँ टकटकी लगाये मुझे क्या देख रहे हो ! कुछ समझ रहे हो , जो मैं कह रही हूँ ? "

" हाँ - - - समझ भी रहा हूँ और हल्का सा नमूना भुगत भी चूका हूँ . " वह रुआंसा होने का अभिनय करके बोला .

उसके मुख के भाव देखकर गेसू हंस पड़ी . गुलशन भी उसकी हंसी में शामिल हो गया .

गेसू बोली -- " चलो - - - घर लौट चलें . "

" हाँ चलो . बहुत देर हो चुकी है . अब तुम्हें शीघ्र घर पहुंचना चाहिये - - - वरना तुम्हारे पिताजी निश्चित ही परेशान होंगे - - - क्योंकि एक लड़की का पिता होना , काँटों का मुकुट पहनने जैसा होता है . हर पल अनेकों आशंकाये , बहुतेरे कुविचार मन को मथे रहते हैं . खासकर तब - - - जब उसकी लड़की जवान होने के साथ - साथ गज़ब की खूबसूरत भी हो . " गुलशन ये कहते - कहते हँस दिया .

गेसू को समझ न आया कि वह मुस्कराये या शर्माये . सो उसने बीच का रास्ता अपनाया .

और फिर - - - दोनों अपने - अपने घर लौट आये .

और घर पहुँच कर - - - प्रसन्न मन गुलशन आज के दिन और गेसू के आगोश में बीते उन मादक पलों के बारे में विचार कर रहा था . गेसू के साथ उसका आज का दिन , उसके ख़याल में बहुत अच्छा गुज़रा था - - - और वो भी ये सोचने पर मजबूर हो गया था कि आम तौर पर नारी एक ईश्वरीय उपहार है , जिसे स्वर्ग से वंचित धरती के पुरुषों के पास ईश्वर ने उसकी क्षति पूर्ती हेतु दुनिया में भेजा है .

सेठ करोड़ी मल !

पायल की इज्जत का असफल सौदागर !!

आज इसी सेठ के एक ख़ास कमरे में कुछ ख़ास बातों के लिए ख़ास - ख़ास लोग एकत्र हुए थे .

इससे पहले की बात चीत शुरू होती - - - सेठ का ख़ास डॉक्टर उसके स्वास्थ्य - परीक्षण के लिए आ गया - - - क्योंकि सेठ की तबीयत पिछले कुछ रोज़ से ढीली - ढाली चल रही थी .

अब चूंकि डॉक्टर गलत समय पर आ ही धमका था - - - और उसे पहले निपटाना भी ज़रूरी था - - - अतः अखबार पढ़ते - पढ़ते ही सेठ ने कहा -- " चलो - - - शुरू हो जाओ डॉक्टर . "

कुछ देर तक सेठ का स्वास्थ्य - परीक्षण करने के बाद डॉक्टर बोला -- " सेठ ! तुम तो एकदम चकाचक हो - - - फिर मुझे बेकार बुलाया . तुमको कोई मर्ज़ नहीं है . "

" कमाल करते हो डॉक्टर . अगर मुझे कोई मर्ज़ नहीं है तो फिर ये डिलीवरी मार्का दर्द , रेगिस्तान मार्का टेम्प्रेचर , थ्री - डी मार्का आँखों का वर्क , ये - - - ये सब आखिर क्या - क्यूँ है मुझे ? जब रोग पकड़ने की तमीज नहीं , तो क्या ख़ाक डॉक्टरी पढ़ी है तुमने ! " सेठ ने व्यंग्य करते हुए धिक्कारा .

डॉक्टर भी चिढ़कर बोला -- " क्या समझ रखा है तुमने मुझे ! पांच अलग - अलग मुल्कों से डॉक्टरी पढ़ी है मैंने . "

" इससे क्या फर्क पड़ता है ! मैनें पचास जगहों की अलग - अलग लड़कियों का भोग लगाया है . "

" क्यों ? "

" क्योंकि वैध राज धरती धकेल कहा करते थे कि जो पुरुष कुल जमा इक्यावन अलग - अलग लड़कियों से रस प्राप्त करता है - - - उसे बुढ़ापा कभी नहीं आता . "

" फिर ये बुढ़ापा तुम पर क्यों मंडरा रहा है ? "

" क्योंकि इक्यावनवीं नहीं मिली . "

" तब दवा की क्या ज़रुरत ! इक्यावनवीं ढूंढो . " डॉक्टर ने हंसकर कहा .

सेठ भी हंसकर बोला -- " हाँ - - - यही करना होगा . "

डॉक्टर ने पूछा -- " सेठ ! एक बात बताओ !! तुम जैसे कुछ मर्दों में औरतों के मामले में नित नयेपन की इच्छा क्यों होती है ? "

सेठ अखबार रखते हुए बोला -- " बस यूं समझो प्यारे ! औरत और अखबार मुझे एक से लगते हैं . सोचो - - - सुबह जब नया अखबार आता है , तो कैसी बेचैनी होती है . उसका इन्तज़ार होता है . फिर सरसरी नज़र से उसे पढ़ा जाता है . एक बार - - - दो बार - - - तीन बार - - - . लगता है - - - कहीं कोई कोना छूट न जाये . किसी ख़ास चीज़ को कितनी लगन से कई बार पढ़ते - दोहराते हैं . और फिर जब पूरा - - - चप्पा - चप्पा पढ़ लिया जाता है , तो ख़त्म हो जाता है . दिलचस्पी समाप्त हो जाती है . अब क्या करें ! दूसरे दिन फिर नया अखबार तो चाहिये ही . नहीं समझे ? "

" समझ गया . "

" क्या समझे ? "

" यही - - - कि सचमुच तुम्हें इक्यावनवीं की सख्त ज़रुरत है . जल्दी ढूंढो . लेकिन सेठ ! मैं तो लम्बी उम्र के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि औरतें वो अनन्त खांईं हैं , जिनमें आदतन बार - बार झाँकने वाले कभी न कभी उनकी गहराई में गिरकर ऐसे गुम हो जाते हैं कि उनका पता - ठिकाना खोजना असंभव हो जाता है . इसलिए वो खुशनसीब हैं जिन्हें ख़ुदा नई - नई औरतों के चस्के से बचाये - - - वरना कभी न कभी ढोल की तरह गले मढ़कर कोई न कोई अबला ज़िन्दगी का तबला बजा डालती है . "

इतना कहकर डॉक्टर हँसता हुआ चला गया .

और सेठ ने अपने पालतू गुण्डों की ओर आँखें तरेर कर शहंशाही जिद की -- " क्यों बे ! लल्लू - कल्लू !! कुछ सुना तुमने ? डॉक्टर कहता है इक्यावनवीं ढूंढो . जाओ - - - लेकर आओ . "

" मगर किसे बॉस ? लल्लू ने पूँछा .

" पायल को . वो इसी शहर में कहीं है . "

" कैसे जाना बॉस ? "

" अपना पुराना मुच्छड़ चौकीदार एक दिन आकर बता रहा था . अबे वही - - - जिसे चोरी करने पर मैंने ठोंक - पीट कर काम से हटा दिया था . "

" कुछ पता तो बताया होगा उसने बॉस ! "

" नहीं . साला पूरा सही पता बताने के वास्ते मुझसे बड़ी ढिठाई से लम्बी रकम मांगनें की जुर्रत कर रहा था . उस वक्त मैं भी पिनक में था . सो मैंने गुस्से में उसके पिछवाड़े जहां पर लात मारी - - - ससुरा वहीँ से थैंक यू की आवाज़ छोड़ता हुआ भाग निकला . "

" तब तो उसे ढूँढने में काफी मुश्किल होगी बॉस . "

" अबे तो क्या तुम लोगों को आसान काम के लिये पाल - पोस कर सांड बनाया है मैंने . जाओ ! दो दिन में ढूंढ कर उसे मेरे पहलू में हाज़िर करो . और कान खोलकर सुन लो - - - न ला सके , तो तुम बेकारों को मारकर अपने फ़ार्म के वास्ते तुम लोगों की खाद बनवा दूँगा . "

कल्लू ने समझाया -- " बॉस ! अपने सिर पर सवार बैताल को काबू करो - - - वरना कहीं लेने के देने न पड़ जायें . मेरी मानो तो भूखी मछली की तरह केवल आटा ही न देखो , काँटा भी देखो - - - क्योंकि वो कॉलेज - कढ़ी छोकरी है . चान्स वो लेती होगी , डान्स वो करती होगी . स्वीमिंग - टैंक में वो नहाती होगी , किसी की याद में आँसू वो बहाती होगी . डेटिंग वो करती होगी , वेटिंग वो करती होगी . बोतल वो फोड़ती होगी , दिल वो तोड़ती होगी . मुर्गा वो छीलती होगी , मछली वो लीलती होगी . लौंडिया खतरनाक भी साबित हो सकती है . और फिर - - - हम और कोई राजी लड़की भी तो खरीद सकते हैं ! क्या ज़रुरत है , चालबाजी से उसे यहाँ तक लाने की !! "

सेठ बोला -- " अबे बांगडू - - - तुझे नहीं मालूम , ज़िन्दगी एक जुआ है . जीतने के लिये जुए की बाजियों में तरह - तरह की चाल चलना बहुत जरूरी है . "

" ज़िन्दगी एक जुआ है - - - ये माना बॉस ! पर हम जुए को शराफत और ईमानदारी के साथ भी तो खेल सकते हैं . क्या ज़रुरत है की जुआ बेईमानी से ही भरा हो ! "

" हाँ बॉस ! " लल्लू ने कल्लू का समर्थन किया -- " दुनिया में बिकाऊ माल की कुछ कमी तो है नहीं - - - फिर क्या ज़रुरत है कि एक भले मानस की इज्जत का मोती चुगा जाय . "

" अबे चो s s s प . सालों ! किराये के टट्टुओं के मुँह में जुबान शोभा नहीं देती . काट के रख दूँगा . " सेठ तैश में आकर बोला -- " हरामखोरों ! तुम्हें क्या मालूम - - - वो कीमत पहले ही ले उड़ी है . वो साली मेरा दस हज़ार रुपया लेकर भागी थी जबकि दस उसका भडुवा अंकल पहले से डकार चुका था . एक बार हत्थे चढ़ जाय तो कोका पंडित की पूरी किताब रटा दूँगा उसे . "
 
कल्लू बोला -- " मगर बॉस आप तो बताते थे कि वो लोमड़ी से ज्यादा चालाक और मछली से अधिक चिकनी है . फिर हम लोग उसे आप तक कैसे लायें ? ज़रा खुलकर बतायें . "

" मछली पकड़ी है कभी ! तरीका ये है कि मोती और चालाक मछली फांसने के लिए जाल हमेशा गहरे जल में डालना पड़ता है . चालाक मछली आसानी से कभी सतह पर नहीं मिलती . "

" मैं अब भी आपका मतलब नहीं समझा बॉस . थोड़ा और खोलकर समझायें . "

" उफ़ - - - फूटी मेरी किस्मत . पता नहीं कहाँ - कहाँ के फार्मी अंडे इकट्ठे करके से रहा हूँ मैं . कोई नतीजा निकलता नहीं दिखता . अबे ढक्कन ! और कितना खोलूँ !! अब क्या खोल - खोल कर पूरा नंगा ही देख लेने पर समझोगे तुम मुझे ? अबे तेरी जात का अभिमन्यु तो पेट के भीतर ही चक्र व्यूह भेदन जैसा टेढ़ा काम सीख गया था - - - और तू हंडिया फोड़ कर बाहर निकल आने के बावजूद इतनी सीधी सी बात नहीं समझ पा रहा . अबे खाली खोपड़ी के - - - वो जहाँ कहीं भी हो , उसे अगवा कर लो . और सुनो ! अगर दो दिनों में , तुम दोनों ने ये काम न किया - - - तो तुम लोगों का काम तमाम कर दिया जायेगा ."

" मगर हम उसे पहचानेंगे कैसे ? " “ थोड़ी ही देर में उसकी फोटो तुम्हें मिल जायेगी . उसी के सहारे पहचानना . वर्ना तुम निठल्लों की मौत तुम्हें पहचान लेगी . समझे ! " सेठ ने कुटिल मुस्कान बिखेर कर कहा और पलट कर दूसरे कमरे में चला गया .

पायल को जिस घड़ी का बेसब्री से इन्तजार था , वो नज़दीक आ गयी थी . चंचल और पायल की शादी की तारीख सांचे में ढलकर स्पष्ट आकार ले चुकी थी . कार्ड भी छप चुके थे .

पायल गुलशन के घर उसको अपनी शादी का निमंत्रण - पत्र देने जा रही थी . आज उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी , गुलशन से नज़रें मिलानें की . एक तरफ उसे अपनी और चंचल की शादी तय होने की ख़ुशी थी , तो दूसरी और अंध प्रेम के कारण गुलशन की बर्बादी का गम था . वह जानती थी कि गुलशन अभी तक आस लगाए बैठा है कि वो चंचल से दूर छिटककर उसकी बाहों में कभी न कभी आ गिरेगी .

जब वो गुलशन के घर पहुँची , तो उसने देखा कि वह दरवाजे की तरफ पीठ किये बैठा है और हाथ में उसी की तस्वीर लिये देख रहा है .

पायल के पसीज गए दिल की नमी आँखों में उतर आयी . वह दबे पाँव गुलशन के सामने खड़ी हो गयी .

उसे सामने देखकर गुलशन बोला -- " बैठो . "

बैठते हुए पायल ने बात शुरू करने की गरज से पूछ लिया -- " किसकी तस्वीर देखी जा रही थी ? "

गुलशन निराशा से बोला -- " जिसे पाने की आस लिये जिन्दा हूँ . "

उसकी बात सुनकर पायल ने सोचा कि वो बिना कार्ड दिए ही वापस लौट जाये . मगर फिर उसके दिमाग में दूसरा विचार आया कि उसे अँधेरे में रखना उचित नहीं . बता देना ही ठीक रहेगा . सच्चाई से मुंह मोड़ना हितकर नहीं .

पायल ने अपराधी सा सर झुकाकर अपनी शादी का एक कार्ड गुलशन की ओर बढ़ा दिया .

गुलशन ने लिफाफा हाथ में थामते हुए पूछा -- "क्या है ? "

जवाब देने के लिये पायल के होठ काँपे , मगर जुबान कमजोर पड़कर गूँगी हो गयी .

गुलशन ने लिफाफा खोलकर जैसे ही कार्ड देखा , उसका पूरा शरीर सूखे पत्ते कि भाँति काँप गया और चेहरा अचानक इस कदर अपशगुनी पीला पड़ गया जैसे कि लिफ़ाफ़े पर लगी शगुन की हल्दी का रंग . उसे लगा - - - उसकी आँखों में खूब बड़े दो मोतियाबिन्द उभर आये हैं , जिनके चलते उसके दिमाग में कुछ देर को अँधेरा छा गया हो . और सहमी पायल ने उस क्षण उसकी पथराई आँखों में भयंकर पीड़ा को पसीजते देखा . गुलशन ने अपनी बाईं छाती को हाथ से मसलकर थोड़ी देर तक अपने फड़कते होठ काटे , चेहरे पर बेचैनी लाया और फिर लगातार पायल की तरफ कातर दृष्टि से निहारने लगा . पायल की नज़रें स्वतः झुक गईं .

थोड़ी देर बाद !

पायल बिना आँख मिलाये ही उससे बोली -- " गुलशन ! एक बात पूछूँ ? "

वह धीमी पराजित आवाज़ में बोला -- " अभी भी कुछ पूछने को बचा है ? "

" हाँ . तुम्हें अपना वादा याद है न ? जो तुमने चंचल के घर पर पहली मुलाक़ात में मुझसे किया था . "

और उसके इस प्रश्न के साथ ही अपमान और पीड़ा की न जाने कितनी सूइयाँ गुलशन के शरीर में घुस गयीं . ऐसा लगा , जैसे उसे किसी ने तमाचा मारकर तेज़ाब से भरे टब में धकेल दिया हो .

वह तड़पकर बोला -- " वादा ! मात्र वादे की बात करती हो . अरे मुझे तो कॉलेज के जमाने के वो फागुनी बयार में डूबे सतरंगी दिन भी याद हैं , जिन्हें तुम भूल चुकी हो . फिर भी पायल - - - मेरे वादे पर यकीन रखो . वादा खिलाफी नहीं होगी . क्योंकि मैं तुम्हें प्यार करता हूँ . पवित्र प्यार . और असली प्यार वादे से कभी मुकर नहीं सकता . "

पायल बोली -- " गुलशन ! मैं चाहती हूँ कि शादी करके तुम भी सुख का जीवन व्यतीत करो . मानोगे न मेरी बात ? करोगे न विवाह ? "

" विवाह - - - शादी - - - ब्याह ! ये किसी और ही देश की जुबाने हैं पायल . मैं ये भाषा नहीं जानता . मै तो सिर्फ गम की जुबान बोलता हूँ . सच तो ये है पायल - - - कि जिस तरह कोई कांटेदार बेल नन्हे से पौधे को अपनी लपेट में ले लेती है , उसी तरह तुम्हारे प्यार ने मुझे अपनी बाहों में समेट लिया है . "

पायल चुप रही . वह बोलती भी क्या .

गुलशन ने बड़ी मासूमीयत व बेबसी से कहा -- " एक बात पूछूँ पायल ? क्या तुम्हें मुझ पर बिल्कुल दया नहीं आती ? "

इतना कहकर गुलशन पायल के कन्धों पर अपने कंपकपाते हाथ टिकाकर और उसकी आँखों में आँखें डालकर रो पड़ा . उसके आँसू एकबारगी भरभरा कर बह उठे . मानो कोई पहाड़ी बादल अचानक फट पड़े और अपने भीतर तैर रहे कुल पानी को एक साथ ज़मीन पर छोड़कर त्वरित बाढ़ का कारण बन जाये . ऐसी वेग वान बाढ़ ! जिसकी चपेट में आकर बड़े - बड़े स्थिर पत्थर भी लुढ़क कर बह जायें .

पायल के लिये ये बड़ी असमंजस की घड़ी थी . उसके लिये गुलशन की यह ह्रदय विदारक स्थिति असहनीय हो गयी . उसे लगा कि वह गुलशन की आँखों से उमड़ रहे आंसुओं की बाढ़ में डूबी - बही जा रही है . उसकी आँखों से भी आंसुओं की तेज़ धारायें फूट पड़ीं . उससे रहा न गया और दिल के हाथों मजबूर होकर वह गुलशन से लिपट गयी . गुलशन के प्रति उसके मन में करुणा इस तरह फूट पड़ी , जैसे पुत्र - वत्सला जननी के स्तनों से ममता की निर्झरनी दुग्ध - धारा . जब कुछ न सूझा तो उसके सिर को अपनी छाती से टिकाकर वह अपने हाथों से जहाँ - तहां गुलशन को सहलाकर उसे मौन सांत्वना देने लगी .

कुछ देर बाद !

भावुक भयी पायल ने कहा -- " गुलशन ! लगता है तुम जैसा विशाल मना भी भावना में बहकर मेरे आचरण का तटस्थ व उचित मूल्यांकन नहीं कर सका . सुनो ! प्रत्येक व्यक्ति की सोच - - - उसकी प्राथमिकतायें और जीने के तरीके प्रथक - प्रथक होते हैं . कोई ज़रूरी तो नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति तुम्हारे ही दृष्टिकोण से तुम्हारी सुविधानुसार सोचे व करे . स्वनिर्मित पूर्वाग्रहों के कारण शायद तुम यह सोच भी नहीं सकते कि मेरे मन में तुम्हारे प्रति कितना श्रृद्धा - भाव है . मैं तुम्हारी भलमनसाहत की बड़ी कद्र करती हूँ . किन्तु इज्जत करना एक बात है और प्यार व शादी करना बिल्कुल उलट दूसरी . इज्जत किसी भी श्रेष्ठ व्यक्ति की - की जा सकती है मगर गंभीर प्यार करने व उसे सफल विवाह तक पहुंचाने के वास्ते खुले व विस्तृत दिमाग से काम लेना पड़ता है . जबकि तुम प्यार और शादी के सन्दर्भ में दिमाग से नहीं बल्कि एकतरफा दिल से काम ले रहे हो . सच पूछो तो मैं स्वयं से अधिक तुम्हें पसन्द करती हूँ . इसीलिये तुम्हारा दुःख मुझसे देखा नहीं जाता . तुम्हारी दशा देखकर एक अपराध - बोध सा मुझ पर गहरा प्रभाव डाल रहा है . लगता है - -- - तुम्हारे इस बिगड़े हाल के लिये मैं और सिर्फ मैं ही जिम्मेदार हूँ . यदि कहीं यह प्रभाव स्थायी रूप धारण कर गया तो शायद मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकूंगी . लेकिन हकीकत ये भी है कि मैं चंचल से अत्यधिक प्यार करती हूँ . उसके बगैर अपने भविष्य की कल्पना भी नहीं कर सकती . यह जानने सुनने के बावजूद भी अगर तुम सोचते हो कि मुझसे विवाह करने के अतिरिक्त तुम्हारे पास सुख से रहने का कोई और विकल्प नहीं है तो मैं अपने ह्रदय में तुम्हारे प्रति असीम श्रृद्धा कि खातिर तुम्हारे प्यार पर अपना प्यार कुर्बान कर दूँगी . चंचल को बेमन से त्याग कर तुमसे शादी कर लूंगी . क्योंकि युगों - युगों से स्त्री जाति से त्याग की ही अपेक्षा तो की जाती रही है और अबला स्त्री चाहे - अनचाहे मन - बेमन से प्रायः ऐसा करती भी आयी है . जाओ गुलशन - - - तुम भी क्या याद करोगे कि कोई लड़की तुम्हारी ज़िन्दगी में आयी थी . मगर हाँ - - - एक बात अभी से साफ़ करे देती हूँ - - - कि सच्चे मन से तुम्हें प्यार दे पाऊंगी या नहीं - - - ये तो अभी मैं भी नहीं कह सकती . ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा . चलो - - - तुमसे सहानुभूति और श्रृद्धा वश ही सही - - - किन्तु आज मैं स्वयं को तुम्हारे संरक्षण में , तुम्हारे फैसले पर समर्पित कर रही हूँ - - - आगे तुम्हारी मरजी . मैं जानती हूँ - - - अगर मैनें ऐसा न किया तो औरत जात पर बेवफाई का एक और बेमानी ठप्पा लग जायेगा . "

पायल का प्रस्ताव सुनकर गुलशन को अपने कानों पर पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ . उसे यकीन नहीं हो रहा था कि पायल पके आम सी यूँ अचानक उसकी झोली में टपक पड़ेगी . मगर ज्यों ही एक साथ उसके जिस्म , रूह और एहसास ने भी सुनने की गवाही दी और जब देर तक बिना रुके पायल के समर्पण के शब्द उसके दिमाग में शहनाई की तरह गूंजते रहे तो उसे अपने कानों पर भरोसा करना ही पड़ा . इसी के साथ उसकी नम आँखों के सामने तिरमिरे से नाचने लगे और वो कुछ बोलना भी चाहा , मगर आवाज़ में कम्पन आ गया और ऐसे नाज़ुक मौकों पर जैसा कि अक्सर होता है - - - शब्द जवाब दे गये .

और ऐसे समय पीने वालों को सिगरेट बहुत सहारा देती है . उसने एक सिगरेट मुंह से लगा कर सुलगा ली . इसी के साथ उसका दिमाग कम्प्यूटर की सी तेजी से चलने लगा .

बड़ी अजीब उलझन मुंह बाये खड़ी हो गयी थी गुलशन के सम्मुख . ऐसे हालात - - - जहाँ आवेदक भी वही था और निर्णायक भी वही . एक तरफ आवेदक की सी स्वच्छन्दता और दूसरी ओर निर्णायक की भारी भरकम ज़िम्मेदारी . वह दोनों में कोई तालमेल ही नहीं बैठा पा रहा था . आकांक्षा और उत्तरदायित्व के दो पाटों के बीच स्वयं को फंसा - पिसता अनुभव कर रहा था वह . कहाँ तो विगत कई वर्षों से वह पायल और उसके प्यार को पाने के लिये तड़प रहा था और कहाँ अब जब वह उसे नसीब भी हो रही थी तो बिना प्यार की गारन्टी के - - - उस पर रहम खाकर - - - भीख की तरह . इस हेतु उसने उसी के कन्धों पर फैसले की ज़िम्मेदारी भी डाल दी थी - - - समर्पण सहित उसका संरक्षण स्वीकार करके . वह सोच रहा था कि यदि वह चंचल के प्यार में डूबी - नहायी पायल की क्षणिक व तात्कालिक अनुकूल भावनाओं का लाभ उठाकर उससे शादी कर भी ले तो क्या इस अनमने बन्धन से उसका वैवाहिक जीवन सुखमय और सफल हो पायेगा . उसका चंचल मन बारम्बार कह रहा था कि वह पायल के द्रवित ह्रदय में अंकुरित सहानुभूति के ज्वार का लाभ उठाकर उससे शादी की हामी भर दे किन्तु उसकी सत्यवादी आत्मा इन विशेष परिस्थितियों में उसे ऐसा करने से रोक रही थी . और जैसा कि संस्कारवान लोगों में प्रायः होता है - - - मन और आत्मा के द्वंद्व में आत्मा की आवाज़ विजयी रही . इस रीति विशेष से जीतने की अपेक्षा हारने को उसके विवेक ने अधिक श्रेयस्कर समझा .

और उधर !

सुलग कर क्षीण होती सिगरेट के साथ - साथ गुलशन के निर्णय हेतु बेचैनी से प्रतीक्षारत पायल का धैर्य भी समाप्त होता जा रहा था . गुलशन की आकाश से भी लम्बी लगती खामोशी के मध्य उसके उत्सुक कानों से जब और अधिक बर्दाश्त न हुआ तो उसके धड़ - धड़ धड़कते दिल ने डरे - दबे पाँव जबान पर आकर गुलशन से जिज्ञासा प्रकट की -- " क्या फैसला रचा तुमने ? किस विधि लिखी मेरी तकदीर ? "

" हँ हं ! " गुलशन ने संतोष से लबालब मंद मुस्कान बिखेर कर कहा -- " हम कौन होते हैं किसी की तकदीर लिखने वाले ! ईश्वर का लिखा भला कोई पलट सका है !!हम तो अधिक से अधिक उसे बांचने का अधकचरा प्रयास भर कर सकते हैं . "

" फिर भी - - - क्या बाँचा ? मैं भी तो कुछ सुनूँ . " उसके शरीर का एक - एक रोम - कूप कान बनकर सुनने को चौकन्ना हो गया .

गुलशन परिपक्वों की तरह बोला -- " पायल ! जिस घड़ी तुमने परम विश्वास से मुझे अपना संरक्षक कहकर निर्णय का अधिकार भी मुझे ही सौंप दिया , उसी पल मुझ पर यह जिम्मेदारी स्वतः नियत हो गयी थी कि मैं खुद से ऊपर उठकर तुम्हारे हितों को सर्वोपरि रखूँ ."

" गुलशन ! यूँ पहेलियाँ न बुझाओ . ज़रा जल्दी स्पष्ट कहो - - - मुझे करना क्या होगा ? "

" करना क्या है - - - तुम्हारी व चंचल की शादी के जो कार्ड छपे हैं - - - उन्हें जल्द से जल्द बांटना भर होगा . " उसने बुजुर्गों की तरह पायल के सिर पर हाथ सहलाकर पूछा -- " समझी कि नहीं ? ''

पायल आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी से आँखें नम करके रुंधे कंठ से बोली -- " समझी ! खूब समझी . "

" पगली ! क्या समझी ? "

" यही - - - कि अब तक मैं ये समझती थी कि केवल ऐफिल टॉवर ही बहुत ऊँचा है - - - किन्तु आज तुम्हें और भी ठीक से समझने के बाद समझी कि अब तक मैं गलत समझती थी . " इतना कहकर उसने अपने पांवों के पंजों पर खूब तनकर बड़ी मुश्किल से गुलशन के चौड़े बुलंद मस्तक को श्रृद्धा वश चूम लिया . न जाने आज क्यों उसे गुलशन का कद कुछ बढ़ा - बढ़ा सा लग रहा था .

" चहचहाकर पायल पुनः बोली -- " अच्छा - - - अब मैं चलती हूँ . मुझे अपनी एक सहेली को कार्ड देने जाना है . अभी तो जल्दी है . अगली बार जब मिलूंगी - - - तो बड़े अधिकार पूर्वक तुम्हारे वास्ते भी दो गाँठ हल्दी का प्रबन्ध करने का प्रयास करूंगी . तुम पर दबाव बनाकर . तुम्हें राजी करके . तुम्हारी तन्हाई की दवा की खातिर . किसी सुशीला के साथ तुम्हें गृहस्थी में जकड़ने के लिये . जिससे तुम्हें मेरी छाया से भी मुक्त होने में आसानी रहे . " इसी के साथ - - - गुज़रे ग्रहण के पश्चात भय मुक्त होकर नीड़ से बाहर उजाले में निकले पँछी की भांति वह फुर्र से कमरे के बाहर उड़ - सी गयी . और - - - और उसकी प्रसन्नता को आँखों से नापकर , स्वयं को अपनी उम्र से बड़ा अनुभव करते गुलशन ने यह सोचकर मुस्कान भरी संतोष की एक गहरी सांस ली - - - कि जोड़े निश्चित ही ऊपर से तय होकर नीचे आते हैं . व्यक्ति तो बस अपने तय जोड़ीदार की तलाश में तब तक भटकता है , जब तक वह मिल नहीं जाता .
 
यूँ तो दूंढ - ढूंढ कर लड़कियाँ ताकना सदैव उनका प्रिय शगल था किन्तु इन दिनों ये उनका कुत्सित मनोरंजन नहीं बल्कि भय जन्य विवशता थी . हाँ - - - दो दिनों से पायल की तलाश में लल्लू - कल्लू शहर के गली - कूचों की ख़ाक छान रहे थे - - - मगर पायल तो क्या - - - उसका साया भी उनकी दूरबीन सी आँखों को नसीब नहीं हुआ था . उन्हें इसका डर था कि यदि आज भी वो लोग पायल को न पा सके तो जालिम सेठ उनके साथ न जाने कैसा सलूक करे . दोनों ने कार को सड़क किनारे लगा रखा था और वो सिगरेट फूंक - फूंक कर हर राहगीर मादा चेहरे की तुलना जेब में रखी और आँखों में बसी तस्वीर से कर रहे थे .

और तभी !

लल्लू अपनी ओर आती हुई एक लड़की को देख कर चौंक पड़ा . उसने जल्दी से जेब में रखी फोटो निकाली और लड़की के चेहरे से मिलायी . हाँ - - - आने वाली पायल ही थी .

ख़ुशी के मारे स्प्रिंग सा उछल कर लल्लू कल्लू से बोला -- " देख तो प्यारे ! छोकरी मिल गयी .

कल्लू ने उसकी बात को मज़ाक समझकर दूसरी तरफ ही देखते हुए जवाब दिया -- " हुँह - - - इतना आसान नहीं है , नौकरी और छोकरी का मिल जाना . "

" नहीं यार ! तेरी बहन की कसम . सच कहता हूँ . वो - - - उधर देख तो सही . "

" अबे - - - साले ! काट के धर दूँगा . तू होश में तो है ! कहाँ ? " अब वो भी गंभीर हो गया .

" वो देख - - - वो . वो इधर ही चली आ रही है , बसन्ती साड़ी पहने . "

" हाँ यार ! है तो वही . बिल्कुल वही . लगता है - - - गदराया बसन्ती सरसों का समूचा खेत ही खुद चलकर चला आ रहा है , सांड़ सेठ के चरने के खातिर . "

" क्या बात है , क्या हुस्न है ! " लल्लू होठों पर कामुक जबान फेरकर बुदबुदाया .

" हाँ प्यारे ! माल फुल्ली फ्रेस है और अधपका हुआ है . ना तो कच्चा है और ना ही ज्यादा पका हुआ है . "

" वाह - - - क्या कहने , कुछ ना पूछो . लगता है - - - अभी - अभी कसी चोली फट जायेगी और उसमें कसमसाते जवान पंक्षी फुर्र से हवा में उड़ जायेंगे . बिल्कुल असल मामला है , असल . आजकल की तरह नहीं कि ऊपर मचाये बम्पर शोर , अन्दर निकले बिल्कुल बोर . "

" यार ! गारन्टी से कह सकता हूँ - - - अभी बीस बसन्त ही देखी है . "

" हाँ - हाँ ! तुझे क्यों न मालूम होगी उसकी उम्र !! जैसे हर साल उससे राखी ही तो बंधवाता रहा है तू . " लल्लू ने हंसकर कल्लू की चुटकी ली .

" साले ! बहन बनाता है . " कल्लू झेंप गया और खिसियानी हंसी हंसने के बाद अचानक गंभीर होकर बोला -- " यार ! सच पूछो तो मुझे तो दया आ रही है इस कमसिन हसीना पर . मन नहीं करता , इसे उस भैंसे के लिये उड़ाने का . साला अच्छे - भले भूगोल को रौंद कर इतिहास बना देगा . "

लल्लू ने समझाया -- " अबे - - - मन में पनपे दया के बीज को फ़ौरन मसल दे , वरना मारा जाएगा . बेटे ! बदमाश और दया का पुराना बैर है . शरीफ बनने की कोशिश की तो मंहगी पड़ेगी . साले सेठ की नज़र टेढ़ी हुई तो हमें उसकी मूंछ के बाल से नाक का बाल बनते देर न लगेगी और फिर वो अपुन को मंदिर के घंटे की तरह पीट - बजा कर हड्डियों तक का सुरमा बना देगा . याद रख - - - दुनिया शरीफ को बदमाश बनने के तो हज़ार मौके देती है मगर बदमाश को शरीफ बनने का एक भी नहीं . और फिर - - - सेठ का हुक्म नहीं बजायेगा , तो खायेगा क्या ? "

" - - - - - - . " कल्लू चुप रहा .

लल्लू पुनः बोला -- " जा ! जाकर शिकार पर जाल डाल . "

इन दोनों के नापाक इरादों से बेखबर , पायल हाथों में शादी का कार्ड लिये एक सहेली को देने जा रही थी .

जब वह इनकी कार के नज़दीक पहुंची , तो कल्लू उससे बड़े अदब से बोला -- " बहन जी ! जरा सुनिए तो . "

" कहिये ! " पायल अपनी बदकिस्मती के एकदम समीप आ गयी .

और तभी - - - -पीछे से कल्लू ने उसकी नाक पर क्लोरोफार्म से भीगा रूमाल रखकर उसे कार में ढकेल दिया .

कल्लू लपक कर कार चलाने लगा . उसे चन्दन की लकड़ी चील के घोसले तक पहुंचाने की जल्दी जो थी .

होश में आने पर पायल ने स्वयं को एक कमरे में पाया . वो पलंग पर पड़ी थी . उसका सिर पीड़ा से फटा जा रहा था , जैसा कि क्लोरोफार्म का नशा टूटने पर प्रायः होता है . उसने गर्दन घुमा कर खोजी नज़रों से चारों तरफ देखा . कमरे की सभी खिड़कियाँ बन्द थीं . दरवाज़ा भी . वह सोचने लगी कि यहाँ तक वो कैसे आयी . तभी कोई आवाज़ सुनकर उसका ध्यान दरवाज़े की तरफ गया . आवाज़ दरवाज़ा खुलने की ही थी .

दरवाज़ा खुलते ही पायल चौंक पड़ी - - - क्योंकि अन्दर आने वाला व्यक्ति सेठ करोड़ी मल था . उसे देखते ही पायल का सम्पूर्ण शरीर डरे हुए कबूतर की भाँति काँप उठा . दरवाज़ा बन्द करके सेठ ने भीतर से चिटकनी चढ़ा दी और फिर वो पायल की ओर मुड़ा .

उसने पायल की ओर पहला कदम बढ़ाया , तो उसकी आँखों से शराब झाँक रही थी .

उसने पायल की ओर दूसरा कदम बढ़ाया , तो उसकी आँखों से एक अजीब सी भूख झाँक रही थी . दुनिया की सबसे पुरानी भूख , जो कभी नहीं मरती .

उसने पायल की ओर तीसरा कदम बढ़ाया , तो उसकी आँखों में डरावनी कहानियों के क्रूर खलनायक झाँक रहे थे .

उसने पायल की ओर चौथा कदम बढ़ाया , तो उसकी मरोड़ी मूछों की बड़ी - बड़ी नोकें शराफत के सीने में चुभने को विकल नज़र आ रहीं थीं .

उसने पायल की ओर पांचवां कदम बढ़ाया .

वह पायल की ओर बढ़ता ही रहा .

उसे अपनी ओर बढ़ता देखकर पायल के शरीर में भय की तरंग दौड़ गयी . वह घबड़ाकर पलंग के नीचे कूद गयी .

सेठ ने सड़े हुए अंगूरों के रस में डूबा एक भयानक कहकहा लगाया , जिसकी वजह से उसका पूरा शरीर कम्पन करने लगा .

अचानक वह शांत होकर बोला -- " आखिर मिल ही गयी ! मिलती क्यों न !! हमने तुम्हारी खोज में कुओं तक में बांस जो डलवा दिए थे . कहाँ - कहाँ नहीं ढूँढा तुम्हें . "

इस वक्त सेठ पायल को मौत का परमिट काटने वाला जिन्न मालूम दे रहा था . उसने डरते - डरते पूछा -- " मुझे क्यों कैद किया है ? आखिर तुम्हें मुझसे क्या चाहिये ? "

" आय - - - हाय - - - हाय ! " सेठ बेशर्मी से बोला -- " मेरी जान !! अब तुम इतनी बच्ची भी नहीं रही कि तुम्हें दूध का रंग बताया जाय . सृष्टि की शुरुवात से लेकर आज तक एकान्त में एक मर्द जवान औरत से क्या चाहता रहा है ? तुम अच्छी तरह जानती हो कि मुझे तुमसे क्या चाहिये . इजाज़त हो तो बत्ती बुझा दूं ! तुम्हें भी सुविधा रहेगी और देश में बिजली की भी कुछ बचत हो जायेगी . कहो गुलबदन ! क्या इरादा है ? "

" नहीं s s s . " वह कानों पर हाथ लगाकर क्रोध में चीखी . सेठ के शब्द उसे ऐसे लगे जैसे किसी ने खौलता हुआ शीशा उसके कानों में उड़ेल दिया हो .

सेठ कुत्सित मुस्कान के साथ बोला -- " वा s s वाह ! जाने जाँ !! गुस्से में तो और भी क़यामत ढा रहा है तुम्हारा रूप . और किस - किस को क़त्ल करने का इरादा है ? नज़दीक आ जाओ मेरे . भूस में अँगार गिराकर दूर क्यों खड़ी हो ? " उसके भीतर वासना गरजने लगी - तरजने लगी .

उसने आगे बढ़कर ठीक उसी तरह झटक कर पायल को अपनी बाहों में ले लिया , जिस तरह से कोई बाज़ किसी मासूम चिड़िया को झपट लेता है .

" कमीने . " वह कसमसाई और एक झापड़ कामांध सेठ के गाल पर मार कर उसे झटका दिया . सेठ की पकड़ ढीली हो गयी . वह उसकी गिरफ्त से निकलकर दूर हो गयी , जैसे दाढ़ों के बीच भिंचा हुआ ग्रास फिसल जाये . चोट खाकर सेठ गुर्राया . उस कुत्ते की तरह , जिसे हड्डी के टुकड़े को सामने देखकर घिनौने ढंग से गुर्राने की आदत होती है .

वह बोला -- " ज्यादा चालाक बनने की कोशिश मत करो . मैंने ज़िन्दगी भर आदमी ही चराये हैं , जानवर नहीं . "

इसी के साथ - - - उसने लपककर पायल की साड़ी का एक छोर पकड़ लिया . वह अपनी कलाई लगातार घुमाकर साड़ी को अपने हाथ पर लपेटने लगा . उसकी लार से सनी जबान उसके होठों पर तेजी से फिर रही थी .

" कमीने - - - मैं तेरा खून पी जाऊंगी . " पायल ने चीखकर कहा .

साथ ही वह घूमने लगी , ताकि सेठ की पकड़ में न आ सके . इसी प्रयास में उसकी साड़ी , जो कि द्रोपदी कि चीर नहीं थी , पूरी तरह खुलकर गुलाबी - गोरे बदन से अलग हो गयी . वह ओट तलाशने दीवार की तरफ भागी . उसे ऐसा लग रहा था , जैसे वह किसी हिंसक पशु की मांद में दाखिल हो गई है .

अपनी दशा देखकर वह गिड़गिड़ाने लगी -- " मुझ पर दया करो . देखो ! मुझे अपवित्र मत करो . "

सेठ ने तेज़ कहकहा छोड़कर कहा -- " अच्छा - - - तो तुम अभी तक पवित्र हो ? क्या कहने मेरी सरकार के . घर से भागकर - - - न जाने किस - किस घाट का पानी पीकर आयी होगी और चली हो पवित्र बनने . बिना डकारे सौ - सौ चूहे खाकर बिल्लो रानी हज को जा रही हैं . हा - - हा - - हा . " सेठ की आँखें नशे में लाल हो रहीं थीं . वह बोलता रहा -- " हरामजादी ! पिछली बार तू स्टूल से मेरा सिर फोड़कर भागी थी . आज मैं तेरी किस्मत ही फोड़ दूंगा . साली ! तुझे तबले की थाप और सारंगी की झंकार के बीच न पहुंचा दिया , तो मेरा नाम सेठ करोड़ीमल नहीं . तुझे तो आज की रात मैं वो बनाकर छोडूंगा , जो रुपयों से गर्म बिस्तर पर पराये मर्दों से लापता बाप वाले पुत्तर पाती हैं . "

" मैं तेरी इच्छा कभी न पूरी होने दूँगी . मैंने अपनी इज्जत तुम जैसे कमीनों के लिए सहेज कर नहीं रखी है . "

" ससुरी - - - इज्जत वाली बनती है . आवारा शराबी भडुवे अंकल के साए में वर्षों रही लौंडिया बदचलन न होगी क्या ? "

" तू समझता है कि बांस के वंश में सब बांस ही रहते हैं . ये क्यों भूलता है कि जिस बांस कि लाठी बनती है , उसी बाँस की पवित्र बाँसुरी भी बनती है . "

" और आज वही बाँसुरी मैं बजाऊंगा . जी भरकर बजाऊंगा . सारे सुर निकालूँगा . कोई राग नहीं छोडूंगा . रात भर बजाऊंगा . हा - - हा - - हा . " सेठ अपने भद्दे दांतों का प्रदर्शन करते हुए हंसा .

इसके तुरन्त बाद उसने पायल पर चीते सी छलांग लगाकर उसे अपनी बाहों के घेरे में ले लिया .

पायल उसकी बाहों में फंसी हिरनी की भाँति तड़पने लगी . सेठ के हांथों की हरकत से ' चर्र s s s ' की एक आवाज़ हुई और उसका ब्लाउज फट गया . उसकी सुडौल गोरी देह का कुछ हिस्सा बेपर्दा होकर सेठ को ललचाने लगा .

वह कसमसाई -- " मुझे छोड़ दे कमीने . "

सेठ बोला -- " कैसे छोड़ दूं ! अभी तो तुम्हारे फूल जैसे शरीर को मसला भी नहीं है . "

" मैं - - - मैं कहती हूँ , जाने दे मुझे . "

" कहाँ जाओगी जान ! सेठ करोड़ी मल को जो माल पसन्द आ जाता है , वो एक रात उसका बिस्तर जरूर गर्म करता है . "

पायल सिसकने लगी . वह हिम्मत हारने लगी थी .

मगर सेठ ढिठाई से तर कहकहे छोड़ता रहा और कहता रहा -- " वाह - - - क्या बात है ! बिल्कुल पटाखा लग रही हो - - - पटाखा . आज की रात तुम्हारे रूप और जवानी की आतिशबाजी हमारे दिल में जगमगायेगी . "

पायल कमरे में रखी मेज़ से टकरा गयी . अपना सन्तुलन कायम न रख पाने के कारण वह पीठ के बल फर्श पर गिर पड़ी . सेठ भी उसी के ऊपर लड़खड़ाकर ढेर हो गया . सेठ का बोझ बर्दाश्त न कर पाने के कारण वह चीखने लगी .

" मुझे छोड़ दे कमीने - - - वर्ना मैं चीख - चीख कर भीड़ इकट्ठी कर लूंगी ."

" हा - - हा - - हा . " सेठ हँसा -- " चीखो ! जी भर कर चीखो . मेरी जान , ऐसे ही ख़ास कामों के लिए बना ये ख़ास कमरा - - - एक पूँजीपति , सेठ करोड़ीमल का है . इसीलिये इसका दरवाजा भी काफी समझदार है . से सिक्कों की खनक तो बाहर जाने देता है मगर अबला की सिसक को भीतर ही कैद कर लेता है . जानेमन ! कमरा साउण्ड - प्रूफ है . तुम्हारी चीखें दीवारों से टकराकर दम तोड़ देंगी . "

" उफ़ - - - कुत्ते . "

" चलो मैं कुत्ता ही सही मेरी जान , मगर तुम भी तो लावारिस दोना ही हो . लावारिस दोने में तो कोई भी कुत्ता मुंह मार सकता है . "

सेठ पायल के शरीर के चारों तरफ पड़े हुए अपनी बाहों के घेरे को तंग करने लगा . उसकी बाहों में कैद पायल फड़फड़ाती रही - - - जैसे कसाई के हाथ में जकड़ी हुई मुर्गी , जैसे शेर के पंजे में कसमसाती हुई हिरनी , जैसे बगुले की चोंच में तड़पती हुई मछली .

तभी उसके मस्तिष्क - पटल पर कोई विचार बिजली की तरह कौंध गया . उसने भरपूर ताकत से सेठ की कलाई में अपने दांत गड़ा दिये . सेठ की कलाई लहूलुहान हो गयी . पायल ने भी अपने मुंह में खून का स्वाद अनुभव किया . दर्द के कारण सेठ बिलबिला रहा था . उसकी पकड़ ढीली पड़ गयी . पायल ने मौके का पूरा फायदा उठाया . वह पाप की बाहों से छिटक कर दूर जा खड़ी हुई .

तभी निराशा के काले बादलों के बीच आशा रुपी बिजली चमकी . उसकी आँखों में अलमारी पर धरी फलों की टोकरी में रखा चाक़ू लपलपा उठा . उसने लपक कर चाकू उठा लिया .

" अब अगर एक भी कदम आगे बढ़ाया , तो मैं ये चाकू तेरे दिल में घुसेड़ दूँगी . " वह साहस बटोर कर बोली .

सेठ अब तक स्वयं को संतुलित कर चुका था . पायल के हाथ में फनफनाता चाकू देखकर पहले तो वह कुछ अचकचाया , मगर फिर हिम्मत जुटा , कृतिम मुस्कान बिखेरते हुए बोला -- " ज़ालिम ! जिस दिल में तुम उतर चुकी हो - - - चाहो तो उसमे चाक़ू भी उतार दो . मगर ज़रा अपना ख्याल करके वार करना - - - क्योंकि मेरे दिल में तुम भी छुपी बैठी हो . चोट खा जाओगी . "

इतना कहकर वह पायल की ओर बड़ी सावधानी पूर्वक बढ़ने लगा . सेठ को अपनी तरफ बढ़ता देखकर पायल ने अत्यधिक फुर्ती दिखाते हुए उसके रीति कालीन दिल पर वीर कालीन वार करना चाहा . मगर पुराना खिलंदड़ सेठ उससे भी ज्यादा फुर्तीला साबित हुआ . वह बिजली की सी तेजी से अपनी जगह छोड़कर बगल को हट गया और साथ ही साथ उसने एक हाथ में पायल की चाकू वाली कलाई थामकर मरोड़ दी और चाकू छीनकर अपनी जेब के हवाले करके दूसरा हाथ उसकी कमर में डालकर उसे अपनी तरफ घसीट लिया .

वह दांत किटकिटाकर बोला --" साली ! हम शिकारपुर में नहीं बसते , जो तेरा शिकार हो जायें . समझ ले ! अब अगर नखरे दिखाये , तो ऐसे करारे तीन हाथ मारूंगा कि छः का पहाड़ा पढ़ती नज़र आयेगी . सुन ! विश्वामित्र ने भी अकाल में कुत्ते का मांस स्वीकार किया था . तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम मेरे सामने आत्म समर्पण कर दो , वर्ना मारकर जंगल में फिंकवा दूंगा , जहां मुझसे भी खतरनाक जानवरों की भूख मिटाओगी . "

पायल ने धमकी दी -- " तुम्हारे चंगुल से निकलते ही मैं तुम्हारे खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दूँगी . तुम पकडे जाओगे . "

धमकी बेअसर साबित हुई .

सेठ लापरवाही भरे अंदाज़ में बोला -- " नहीं - - - नहीं . तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती - - - क्योंकि मेरी जेब चुस्त और ताल्लुकात दुरुस्त हैं . वैसे भी कई लम्बी नाक वालों की नाक मेरे पास गिरवी रखी है . मेरे गिरफ्तार होते ही उनके बीच नाक - संकट उत्पन्न हो जायेगा और वो मुझे इस संकट से उबार लेंगे . और फिर - - - तुम्हें अपनी बदनामी का ख्याल भी तो - - - . "

सेठ अपनी ही शान में कसीदे पढ़ता जा रहा था , मगर पायल अनुभव कर रही थी कि सेठ की पकड़ कुछ ढीली पड़ती जा रही थी .

पायल ने बचाव का आखिरी उपाय करने का फैसला किया . उसने सेठ की दोनों जाँघों के बीच की नाज़ुक मगर ख़ुराफ़ात की जड़ पर भरपूर ताकत से एक लात जड़ दी . यह सोचकर कि न रहेगा बाँस , न बजेगी बाँसुरी .

सेठ दर्द से बिलबिला उठा . वह पायल को छोड़ , चोट खाए अंग को पकड़कर बैठ गया .

मौका अच्छा देखकर पायल दरवाजे की तरफ भागी . दरवाजे के पास पहुंचकर उसने चिटकनी गिराकर दरवाजा खोलना चाहा . मगर निष्ठुर दरवाजा न खुला . वह समझ गयी कि उसकी किस्मत के सारे दरवाजे अब बन्द हो चुके हैं . आखिरी उम्मीद भी दम तोड़ बैठी . वह मुड़कर सेठ की तरफ कातर दृष्टि से देखने लगी . बिल्कुल वैसे ही , जैसे कोई पस्त शिकार चारों तरफ से घिरकर बेबसी से क्रूर शिकारी को निहारता है .

उसे पूरी तरह बेबस देखकर सेठ विजयी कहकहा लगाने लगा -- " बिल्ली आखिरी एक दांव अपने लिए भी बचाकर रखती है मेरी जान . मेरे आदमियों ने दरवाज़ा बाहर से बन्द कर रखा है . वैसे भी हम अपने मंदिर में आने वाले किसी भी व्यक्ति को बिना चरणामृत लिये नहीं जाने देते . अब बोलो ! क्या इरादा है ? " उसका स्वर जीते हुए खिलाड़ी की तरह दृढ़ था .

पायल को महसूस हुआ , जैसे उसके दिमाग में सैकड़ों पंखे चल रहे हैं . उसका शरीर सूखे पत्ते की भाँति काँप गया , सर चकराने लगा , पिंडलियाँ थर्रा उठीं और दिल मुहर्रम के ढोल की तरह बजने लगा . वह जहाँ खड़ी थी , वहीँ ढह गयी .

सेठ ने आगे बढ़कर उसे अपनी बाहों में उठाकर पलंग पर पटक दिया . उसके सुन्न शरीर और पराजित मस्तिष्क में प्रतिरोध की शक्ति समाप्त हो चुकी थी .

और फिर !

इसके बाद पक्षाघात से पीड़ित सरीखी पायल ने महसूस किया , जैसे उसके ऊपर कोई भूखा चमगादड़ पँख बिखराकर लिपटा हुआ है , जो थोड़ी ही देर में अपनी नुकीली जीभ से उसका खून चूसकर अपनी भूख मिटा लेगा .

पायल की आँखों से बेबस सितारे टूट - टूट कर तकिया भिगोने लगे . वह गरीब - लाचार की आशाओं की तरह सिसकियाँ लेती रही , कराहती रही - - - शायद कुछ बोली भी , मगर आवाज़ जगह - जगह से दरक गई और उसके निर्बल बोल सेठ के ऊपर से इस तरह लुढ़कते रहे , जैसे किसी चिकने पत्थर से पानी फिसल रहा हो -- बेअसर . सचमुच वो पत्थर - दिल था . पिघल जाना जिसकी शान के खिलाफ था .

विवश पायल को अचानक ऐसा लगा , जैसे किसी विशाल अज़गर ने उसे डस लिया हो . दर्द से दरक कर उसकी तेज़ चीख निकल पड़ी . बावज़ूद इसके , वह अज़गर सदृश सेठ की गिरफ्त में फँसी अपने जिस्म की हड्डियाँ तुड़वाती रही . उसकी दयनीय दशा से बोझल पलंग लगातार कराहता रहा .

एक , दो , तीन , चार , पांच , छः - - - - - - और बारह .

दीवार घड़ी के घन्टे ने अपनी समस्त संचित ऊर्जा का उपयोग कर बारहवीं चोट मार कर , जब रात के बारह बजने का ऐलान किया , तो सेठ ने महसूस किया कि अचानक वह काफी हल्का हो गया है .

कुछ ही देर में सब कुछ शान्त हो गया था , जैसे किसी तेज़ आंधी ने लम्बी यात्रा के बाद चुप्पी साध ली हो . अब पायल के पास पड़ा सेठ आँधी से गिरे पेड़ की भाँति निश्चेष्ट पड़ा था और पायल का भीतर - बाहर उस झाड़ी की तरह हिल रहा था , जो तूफ़ान के थपेड़े झेल रही हो .

वो महसूस कर रही थी कि वो एक ऐसा मैदान है , जिस पर की सारी पगडंडियाँ तक मिट गयी हों . एक ऐसी डाल है , जिस पर के सारे फूल झर गये हों , सारे घोसले उजड़ गये हों और जिस पर मनहूस उल्लुओं ने बसेरा कर लिया हो . वह सेठ के लिये अब एक ऐसी किताब थी , जिसका पन्ना - पन्ना सेठ कई बार पढ़ चुका था .

काफी कुछ सोचते रहने के बाद , सब कुछ खो चुकी पायल अपना होश भी खो बैठी .
 
होश में आने पर पायल को अपना पोर - पोर चूसा हुआ और टूटता अनुभव हुआ . उसने अपने अस्त - व्यस्त कपड़े ढीक किये और फिर घुटनों के बीच सिर डालकर मेले में खो गये किसी बेबस बच्चे की भाँति बैठी सुबकने लगी .

उसकी निस्तेज आँखों से आँसुओं की धार फूट पड़ी और होठ कांपने लगे . वह अनुभव कर रही थी कि आबाद जंगल वीरान हो चुके हैं . पंक्षी डालों पर से उड़ चुके है . झरने सूख गये हैं . बौर लगे पेड़ों को कीड़ा चाट चुका है . अब कुछ नहीं हो सकता -- कुछ भी नहीं .

पायल की ज़िन्दगी की काली रात का उदय हो चुका था . जबकि बाहर सूरज काफी पहले डूब चुका था और सेठ की अपवित्र कोठी के नज़दीक अँधेरे में खिले हुए फूलों की उदास सुगंधों के बीच पवित्र कैथोलिक चर्च का अन्धकार में डूबा ऊँचा मीनार जंग लगे आकाश को छूकर मानों कुछ शिकायत दर्ज करा रहा था .

पायल के बगल में करवट बदलकर निढाल पड़ा सेठ थकान से बोझल डरावने खर्राटे ले रहा था . वो उसे इस तरह डरी हुई नज़रों से देख रही थी , जैसे उसके बगल में कोई भूत लेटा हो . भूत - - - जो उसके भविष्य पर हमेशा सवार रहेगा .

बहुत देर तक विचारों में गुम रहने के बाद , अचानक वो जोर - जोर से सेठ के बदन को पीटने लगी .

पायल के नाज़ुक हाथों की चोट खाकर सेठ की नींद टूट गयी . वो उसके हाथों को झटककर हँसते हुए बोला -- " देखा ! मेरे हाथ कितने लम्बे हैं !! "

" - - - - - - - " पायल चुप रही .

वो कहता रहा -- " मैंने तुम्हारे कुछ फोटो वक्त - ज़रुरत के लिये चुपके से खिंचवा लिये हैं - - - और ये तो तुम समझ ही सकती हो कि आज की काली रात के फोटो कैसे रंगीन होंगे . अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि जब भी तुम्हें बुलवा भेजूं - - - बिना चूँ - चपड़ के चली आया करना , वरना इन्हें छपवाकर शहर की दीवारों पर सजवा दूंगा -- तुम्हारी इज्ज़त में चार चाँद लगवाने की ख़ातिर . "

सुनकर सन्न हुई पायल पत्थर के बुत की तरह बैठी रही .

सेठ बोला -- " अब तुम जा सकती हो . "

वो पूर्ववत रही .

सेठ चीखा -- " सुना नहीं ! अब फूटती हो - - - या सारे सबक आज ही सिखाऊँ ? "

सुनकर सिहर उठी पायल उठकर दरवाजे के बाहर हो ली . चलते समय उसके मन को अपने कांपते पाँव मन - मन भर के महसूस हो रहे थे .

आज पहली बार !

प्रोफ़ेसर साहब के पूरे घर में उदासी और बेचैनी पसरी पड़ी थी . क्योंकि पायल सुबह की गई , अभी तक वापस न आयी थी . सभी का उदास और बेचैन होना स्वाभाविक था - - - क्योकि पालतू जीव तक के खो जाने पर भी परिवार को दुःख होता है - - - जबकि पायल तो अब इस घर की सदस्य सी बन गयी थी और कुछ ही दिनों में बहू बनने वाली थी .

प्रोफ़ेसर साहब बेचैनी और बेबसी से इधर - उधर घूम रहे थे . गेसू हर आहट पर बार - बार दरवाज़े की तरफ देखती थी कि कहीं पायल तो नहीं . और शहर की कौन सी ऐसी जगह बची थी जहाँ चंचल ने पायल की चप्पा - चप्पा तलाश न की हो . वह उन दूर - दराज़ की गलियों तक की ख़ाक छान आया था , जहाँ इससे पहले वह कभी नहीं गया था . पायल के गुम हो जाने का गम उसे दीमक की तरह चाटे जा रहा था . उसका दिल किसी अमंगल के बोझ तले बैठा जा रहा था . उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे , क्या न करे . एक वाक्य में - - - एक गंभीर उदासी और बेचैनी का बादल पूरे घर के मन - आँगन में मूसलाधार बरस रहा था .

यहाँ तक कि प्रोफ़ेसर साहब की घरेलू नौकरानी रधिया भी एक कोने में बैठी आंसू बहा रही थी . पायल के लापता हो जाने का उसे भी बहुत अफ़सोस था - - - क्योंकि घरेलू नौकर - नौकरानी जब काफी पुराने हो जाते हैं , तो परिवार के सदस्य सरीखे बन जाते हैं . उस घर पर उनके कुछ अधिकार ठहरते हैं - - - और वो अधिकार ही ऐसा बंधन बन जाते हैं कि उसी परिवार में उनकी पूरी ज़िन्दगी बीत जाती है . वो परिवार के सुख में सुखी और दुःख में दुखी होते हैं . इसीलिए इस दुःख की बेला में रधिया का आंसू बहाना स्वाभाविक ही था .

घर में लगे विद्दयुत बल्ब वोल्टेज कम हो जाने के कारण बहुत धीमी , मातमी व बीमार रौशनी दे रहे थे - - - और उससे भी ज्यादा बीमार प्रोफ़ेसर - परिवार अपने को अनुभव कर रहा था .

गुलशन को भी गेसू ने खबर कर दी थी . वो भी आ गया था . उसे बताया गया था कि जब से पायल उसके व अपनी सहेली के घर अपनी शादी का निमंत्रण - पत्र देने निकली थी , नहीं लौटी थी .

आखिर इतनी देर तो लगेगी नहीं , इस काम में . और फिर - - - बिना बताये आज तक वो कभी कहीं रुकी भी नहीं थी .

दो बज गए थे रात के .

धीरे - धीरे दो बजे का समय तीन में बदल गया , जो एक युग से लम्बा बीता और दीवार घड़ी ने तीन आवाजें कीं .

घबराहट और बेचैनी के कारण गुलशन कमरे में इधर - उधर चक्कर काट रहा था और अपनी बायीं हथेली पर रह - रह कर दायाँ मुक्का दे मारता था . वह तय नहीं कर पा रहा था कि पायल किसी दुर्घटना का शिकार हो गयी या फिर - - - .

और तभी !

हाँ - - - ठीक उसी समय लुटी - पिटी सी काया लिये पायल ने सिर झुकाये हुए कमरे में प्रवेश किया . उसके प्रवेश के साथ ही सबकी समस्त इन्द्रियां आँख बन गयीं . उसके बाल बिखरे हुए थे , वस्त्र अस्त - व्यस्त और चेहरा निस्तेज था . कपड़ों पर सिलवटों से लिखी इबारत साफ़ पढ़ी जा सकती थी .

पायल की दशा देखकर सभी हक्के - बक्के रह गये और उनकी पथराई आँखों ने आंसुओं से उसकी अगवानी की .

पायल उन लोगों से नज़रें मिलाने में झिझक रही थी . उसका मन चाह रहा था कि वह किसी दीवार के छेद में चींटी बनकर घुस जाये . किसी को चेहरा न दिखाये . बड़ी विषम परिस्थिति थी उसकी , जिसमे दोष किसी का होता है और मुंह कोई और चुराता है .

पिटी हुई गोटियों सा मुंह लिये पायल को सामने देखकर सभी ने आधे चैन की सांस ली .

प्रोफ़ेसर साहब लपककर उसके नज़दीक पहुंचे और उसको अपनी बाहों में लेकर उसकी पीठ सहलाकर पूछने लगे -- " क्या बात है बेटी ? कैसे देर हुई ? "

" - - - - - - - . " वो चुप रही .

" बोलती क्यों नहीं पायल ! क्या हुआ ? "

एकाएक जैसे बाँध टूट गया . वह भरभरा कर रोते हुए बोली -- " सेठ ने मेरी इज्जत लूट ली . उसने मेरे फोटो भी खींचे . प्रोफ़ेसर साहब ! आदमी क्या हमेशा कुत्ता ही रहेगा और औरत बिस्तर ? "

सभी पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा , ये बात सुनकर - -- - और कुछ देर के लिये प्रोफ़ेसर साहब को तो लगा जैसे उनके चेहरे परे ढेर सारी झुर्रियां उभर आयीं हों और वो अचानक बूढ़े हो गये हों .

उन्होंनें पूछा -- " कौन सेठ ? "

" करोड़ी ! सेठ करोड़ीमल . " वह रोती रही .

गुलशन के जबड़े भिंच गये . उसका चेहरा उसकी परेशानी से उपजे किसी संकल्प की कहानी कह रहा था .

किसी ने पायल से अधिक कुछ न पूछा . वैसे अब पूछने को बचा भी क्या था !

पायल प्रोफ़ेसर साहब की बाहों में पड़ी रोती रही और वो केवल उसका सिर सहलाकर मौन सांत्वना देते रहे . उन्होंने उसे रोने से रोकने की कोई कोशिश न की . यह सोचकर - - - कि आंसू यदि बह जाये तो पानी , रह जाये तो जहर .

परिवार पर अचानक गिरी इस गाज से गेसू का दिमाग कुन्द हो गया - - - जबकि चंचल के मन - मस्तिष्क में विभिन्न विचारों के बवंडर उत्पात मचाने लगे .

उस दिन की घटना ने पायल पर बहुत बुरा असर छोड़ा था - - - मगर प्रोफ़ेसर साहब , गुलशन और गेसू की तसल्ली उसे कुछ सामान्य बनने में मदद कर रही थी - - - किन्तु चंचल के तार कुछ बेसुरे से लग रहे थे . तारों का ढीलापन उसे साफ़ महसूस हो रहा था . उसका व्यवहार उसे कुछ बदला - बदला सा लग रहा था . वह उससे कतराने लगा था . भरसक नज़रें चुराने लगा था .

आजकल वह घर में ही पड़ी रहती थी .

एक दिन अनुकूल एकांत मिलने पर उसने चंचल से पूछ ही लिया -- " क्या बात है चंचल ? देखती हूँ - - - आजकल मेरे प्रति तुम्हारा व्यवहार कुछ बदल सा गया है . उपेक्षा बढ़ती ही जा रही है . तुम वो न रहे , जो थे . "

" नहीं ! ऐसी तो कोई बात नहीं ." वह टालने लगा .

" चंचल ! पायल गंभीर होकर बोली -- " औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण में भले ही एक बार को भूल कर जाये , लेकिन अपने प्रति होने वाली बेरुखी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भी भूल नहीं कर सकती . बोलो ! बताओ - -- - आखिर बात क्या है ? "

" क्या बताऊँ ! कुछ बात हो - - - तब न बोलूँ !! "

" बात तो कुछ है जरूर ! तभी तो , शादी की तारीख सिर पर खड़ी है और तुम चुप मारकर बैठे हो . मुझे तो दाल में कुछ काला नज़र आ रहा है . क्या शादी का इरादा छोड़ दिया है ? '

" यूँ ही समझ लो . " वह पत्थर बन गया .

चंचल ने जो कहा - - - वो पायल के लिये खौलते पानी से कुछ कम न था . छाले - फफोले से पड़ गये उसके दिल पर . चंचल के प्रति उसकी मोतीचूर सी श्रृद्धा जैसे आकाश से अचानक गिरकर चकनाचूर हो गयी . दाल में कुछ काला नहीं - - - बल्कि पूरी दाल ही काली जानकर पायल का दिल किसी बड़ी बाज़ी हारे हुए जुआरी की तरह बैठ गया . उसकी बुद्धि को काठ मार गया . वह चंचल की ओर ऐसी निगाहों से देखने लगी , जिसमे कब्र मुंह फाड़कर दिखायी दे रही थी .

वह आश्चर्य भरी बाणी में बोली -- " क्या कहते हो तुम ! होश में तो हो !! क्या उसी बात को लेकर - - - ? "

" हाँ ! ठीक समझी तुम . "

" पर मेरे सतरंगी सपनों का क्या होगा चंचल ? मेरी रंगीन कल्पनाओं पर क्या गुजरेगी ? मैं तो अपनी बदरंग जिंदगी जी रही थी . वो तुम्ही तो थे , जिसने मेरे जीवन को तितलियों से रंग - ढंग दिये . सपनों , उम्मीदों , आशाओं को पंख पहनाकर उड़ना सिखाया . और अब - - - . " वह मरी आवाज़ में बोली -- " मैंने कभी सोचा भी न था कि अचानक यूँ इतना बड़ा तूफ़ान आएगा , जिसकी काली धूल में घिरकर हमारी दिशायें बदल जायेंगी . हमारे रिश्ते चिटक जायेंगे . और वो कहानी - - - जिसे हम प्यार कि चटक स्याही से लिखा करते थे , अधूरी रह जायेगी . बोलो , चंचल बोलो - - - जवाब दो - - - मेरा कुसूर क्या है - - - मुझे सजा क्यों ? " वह सिसकने लगी .

" - - - - - - " चंचल पत्थर का बुत बना रहा .

वह चंचल का कन्धा हिलाते हुए बोली -- " चंचल ! मेरे अपने चंचल देखो - - - मुझ पर पर रहम करो . मुझ बेसहारा पर तरस खाओ . जीने का उपदेश सुनकर मौत की खांईं में मत ढकेलो . मुझे अपना लो , वर्ना मैं लुट जाऊंगी - - - कहीं की न रहूंगी . आखिर उस घटना में मेरा क्या दोष ? मैंने सहयोग तो नहीं किया था उसमे ! फिर मुझे दण्ड किस बात का ? "

" कुछ भी हो - - - इस तरह , तन की पवित्रता नष्ट होने के बाद लड़की को बीबी बनाने की हिम्मत मुझमे नहीं . पायल मैं समाज भीरू एक साधारण आदमी हूँ . हो सके तो मुझे भूल जाओ . मैं भी कोशिश करूंगा , तुम्हें भूलने की . "

आँख झुकाये , बड़ी कोशिश से इतना कहकर अनमना सा चंचल ज्यों ही कमरे से बाहर निकला , उसका पाँव दरवाजे के किनारे रखे सजावटी गमले से टकरा गया . गमला विश्वास के पात्र की तरह तड़ाक से टूटकर बिखर गया और पायल घूमता माथा पकड़कर बैठने को मजबूर हो गयी .

एक बार फिर , सदा की भांति , आदमी के गुनाह की सजा बेगुनाह औरत को सुनायी गयी थी .
 
गमला गिरने की आवाज़ सुनकर , उसी के सहारे रधिया कमरे में लपकी . एक बार तो उसे कमरा विधवा की मांग की तरह सूना नज़र आया - - - मगर फिर हर कोना नज़रों से खंगालने पर कमरे के एक कोने में पायल अचेत नज़र आयी . चेहरे पर पानी के छीटे मारने व गाल थपथपाने के बाद काफी प्रयास से वह उसे होश में ला पायी . होश आते ही पायल उसकी गोद में मुँह डालकर बच्चों की तरह मानो ममता तलाशते हुए रोने लगी . काफी कुछ पहले से ही जान रही रधिया द्वारा कारण पूछने पर पायल ने अपने बोझल मन की गठरी खोल दी .

रधिया ने उसकी पीठ सहलाते हुए दिलासा दी -- " भगवान का शुक्र मनाओ बेटी - - - चंचल ने तुम्हें शादी से पहले छोड़ा है . यह सोचकर सब्र करो कि यदि शादी के बाद ये नौबत आती - - - तब तो तुम कहीं की न रहती . देखना ! अभी तो तुम्हारे सामने ज़िन्दगी के और भी रास्ते खुलेंगे . "

" किन्तु मेरी ज़िन्दगी तो चंचल के इन्कार के साथ ख़त्म हो गयी है . "

" नहीं बेटी ! ऐसा मत कहो . जब तक ज़िन्दा हो - - - ज़िन्दगी ख़त्म नहीं होती . बस - - - हादसों से ठिठक कर कुछ देर थोड़ा ठहरती भर है . गुज़रते वक्त के साथ - - - हादसों के धूमिल पड़ते ही ज़िन्दगी कुछ नये सबक सीख कर फिर से रफ़्तार पकड़ लेती है . "

" मगर मुझे लगता है - - - मैं चंचल के बिना जी न पाऊंगी . "

" हर जान से प्यारे के सदा के लिये बिछड़ने पर पहले - पहल ऐसा ही जान पड़ता है - - - जैसे जान ही चली जायेगी - - - पर बाद में धीरे - धीरे स s s s ब ठीक हो जाता है . पहले सी , वो बात भले ही न रहे ---मगर ज़िन्दगी तो रहती ही है . वैसे भी - - - तुम्हें हो न हो - - - मुझे तो यकीन है कि कुछ ही दिनों में सब ठीक हो जायेगा . जहां तक मैंने समझा है - - - चंचल कुल मिलाकर अच्छा लड़का है . बस - - - ज़माने की छीटा - कशी से थोड़ा सहम गया है . तुम धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करो . देखोगी , कि घुटने पेट की ही तरफ आकर मुड़ते हैं . मेरा मन कहता है - - - बीतता समय निश्चित ही उसे साहस और सद्बुद्धि देगा . और एक बार को यदि ऐसा न भी हुआ , तो भी तुम उसे काफी कुछ भूल तो जाओगी ही . उसके बगैर जीने की आदत पड़ते - पड़ते पड़ ही जायेगी . एक दिन तुम खुद देखोगी कि साधारण सा दिखने वाला इन्सान असाधारण दुखों से भी कैसे पार पा लेता है . "

" इतने बड़े दुःख को सहने के लिये मन भर का मन चाहिये . कहाँ से लाऊँ ! मेरी ज़िन्दगी तो जैसे तूफानों से घिर गयी है . कुछ उपाय नहीं सूझता . "

" जब ज़िन्दगी के सफ़र में कोई तूफ़ान आया हो तो सबसे अच्छा उपाय ये रहता है कि चुपचाप जमकर खड़ी हो जाओ और सही समय की प्रतीक्षा करो . जब तूफ़ान गुज़र जाय तो फिर से अपनी राहें तलाशो . हाँ ! एक उपाय और भी है , दुखों से उबरने का . जब अपने दुःख असह्य हो जाएँ तो अपने से अधिक दुखी लोगों की ज़िन्दगी में झांको . इससे तुम्हें अपने दुःख अपेक्षाकृत हल्के लगने लगेंगे और उन्हें कतरा - कतरा ज़िन्दगी के लिये दुखों से जूझता देखकर तुम्हें जीने की नयी प्रेरणा मिलेगी . और सुनो - - -अगर तुम्हें कभी भी मुझ गरीब के सहारे कि आवश्यकता अनुभव हो तो बिना संकोच मेरे घर चली आना . ये एक दुखी औरत का दूसरी दुखियारी से वादा है कि अगर तुम चाहोगी तो मैं तुम्हारी जवानी की छतरी बन जाऊँगी . शायद इस उम्मीद में कि कभी तुम मेरे बुढ़ापे की लकड़ी बनोगी . "

रधिया की सांत्वना और प्रस्ताव विशेष से कृतज्ञ हुई पायल उसकी ममत्व से लबालब आँखों में झांककर ये महसूस कर रही थी कि आर्थिक रूप से गरीब होने का अर्थ ये कतई नहीं कि व्यक्ति विचारों और भावनाओं से भी गरीब हो .

मुस्कराहट - - - पायल के होठों पर अधिक दिन न टिक सकी . चंचल के प्रतिकूल व्यवहार और परिस्थितियों की आंच ने उसकी मुस्कान को पिघलाकर आँखों की राह बह जाने पर मजबूर कर दिया था . वह उड़ती हुई पतंग की तरह सतरंगी अभिलाषा लिये ऊँचे आकाश में मंडरा रही थी , किन्तु बीच में ही डोर टूट जाने के कारण उसे लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर जाना पड़ा था . चंचल उसकी अँधेरी ज़िन्दगी में कुछ समय के लिये जुगनू की तरह चमक कर चला गया था . किन्तु जुगनुओं के चमकने से अँधेरे तो ख़त्म नहीं होते . अब फिर उसका जीवन उस पालकी की तरह था , जो दुल्हन बिना सूनी हो . वह अपने को ऐसी डाल अनुभव कर रही थी , जिसकी रौनक को पतझड़ की नज़र लग गयी हो . पायल ने कभी सोचा भी न था कि चंचल के वियोग का थैला ज़िन्दगी के कंधे पर लटकाकर अब अकेले ही उम्र काटनी होगी . उसे क्या पता था कि धूप - छाँव सी पल छिन बदलती हरज़ाई ज़िन्दगी में एक दिन वो चंचल को ख़्वाबों की तरह खो बैठेगी . अगर वो जानती होती कि आशिक की बेवफाई दर्द की कहानी और आंसुओं का समन्दर होती है , तो वह कभी भी इश्क का गुनगुनापन कलेजे में बसाकर आग पैदा न करती . ऐसी आग ! जो अब उसके भविष्य को जलाने पर तुली है .

ज्यों - ज्यों दिन अपने चौबीस - चौबीस घंटों की बरात लेकर गुज़रते जा रहे थे , त्यों - त्यों पायल व चंचल में फासला बढ़ता ही जरह था . गुज़रते वक्त के साथ पायल की भरी - पूरी बरगद सी देह बाँस बनती जा रही थी . दिनों दिन उसकी हालत भूकंप झेल चुकी पुरानी इमारत की तरह ढहने लगी .

ये संभावना लगभग दम तोड़ रही थी कि चंचल अपना फैसला बदलेगा . उसे लगने लगा था कि अब तो चंचल की यादों को वक्त के ताबूत में बन्द करके ही जीना होगा . उसकी जंग खायी हुई आशा एक मोमबत्ती की तरह गल रही थी , घुट - सिसक रही थी . ऐसा लगता था - - - ससुराल से लांक्षित तिरस्कृता , किसी बेबस की बेटी सी उसकी आशा को क्षय रोग हो गया हो और वह तिल - तिल कर घटती जा रही है - - - और एक दिन अचानक उसका ह्रदय - स्पंदन रुक जाएगा .

वह अपने आशान्वित जीवन को दुखद मोड़ देने का ज़िम्मेदार सेठ करोड़ीमल को मानती थी , जिसने उसकी शहद सी ज़िन्दगी एक ही झटके में नीम कर दी थी . कभी - कभी तो वह उस नर पिशाच का खून तक कर देने की बात सोचती थी . परन्तु वास्तव में वह एक निरीह अबला ही तो थी , जो सोच तो बहुत कुछ सकती थी , पर कर कुछ भी नहीं सकती थी .

वह भली - भाँति जानती थी कि यदि सचमुच ही चंचल ने उससे शादी नहीं की तो वह इस घर में चन्द दिनों की ही मेहमान है . उसे नया ढौर खोजना ही होगा . क्या रधिया की शरण ! लेकिन खुद दूसरों के सहारे पलने वाली कमजोर औरत चाहकर भी उसे किस विधि - बूते पालेगी !! कहीं ऐसा न हो कि उसे सहारा देने के प्रयास में चंचल की नज़र से गिरकर वह खुद बेसहारा - बेकार बन जाये . तब - - - कौन सा होगा नया ठिकाना !

उसकी दिमागी उथल - पुथल में अनेकों अपरिपक्व विचार बारम्बार करवटें ले रहे थे . कभी उसे लगता कि वह आत्महत्या कर ले , तो कभी सोचती कि समाज से बदला ले , जिसने उसे बर्बाद किया है . कहीं का नहीं छोड़ा . तब क्या करे ! कहाँ जाये !!

कोठे पर ?

हाँ ! कोठा ही ठीक रहेगा . सेठ ने भी तो उस अभागी रात यही कहा था कि वो मुझे तबले की थाप और सारंगी की झंकार के बीच पहुँचने को मजबूर कर देगा .

हाँ ! वेश्या बनना ही ठीक है , बदला लेने के लिये . और चारा ही क्या है दूसरा . और फिर - - - एक उसी के फिसल जाने से क्या ! शरीर का व्यापार तो आजकल फैशन की तरह फ़ैल रहा है . जब आबरू संभाले न संभली तो और दूसरा रास्ता भी क्या ! उसे वेश्या बनना ही पड़ेगा - - - क्योंकि उसे अब कोई नहीं अपनायेगा . हाँ ! वो समाज से बदला लेकर रहेगी .

वो ऐसी म्यान बनेगी , जिसमे एक नहीं - - - सैकड़ों तलवारें रहती हैं -- कभी कोई , कभी कोई . वेश्या ! जिसके यहाँ न नाज़ , न नखरा , न चालाकी , न हठ , न जिद - - - . जो गहरी विशाल झील सी उदार व आवेगहीन होती है . जिसके किनारे चाहे लेटो , पियो या उतरकर दस - बीस गोते लगा लो . और शांत झील तेज़ नदी की तरह उठाकर पटकती नहीं . सहज भाव से सब कुछ सह - स्वीकार लेती है .

हाँ ! अब मुझे भी शहर की उन वासनामय गलियों में बसना पड़ेगा , जहाँ हुस्न की बदशक्ल और दर्दनाक गाथाएँ गूँजा करती हैं . हुस्न ! जिसकी जवानी को समय के जालिम थपेड़े बहकने और बिकने पर मजबूर कर देते हैं .

अब मुझे भी कोठे की साँच की आँच में शेष उम्र स्वाहा करनी पड़ेगी . कोठा ! जहाँ मसली हुई कलियाँ झुर्री पड़े गालों पर खुशबूदार खड़िया की पर्त पोतकर पीतल पर सोने का मुलम्मा चढ़ाती हैं . और फिर - - - फिर मर्द धोखा खा जाता है . कोठा ! जहां रूप का हाट सजता है - - - यौवन की बिक्री होती है . जहाँ मर्द - - - जो किसी का बेटा था , किसी का भाई था - - - औरत - - - जो किसी की माँ थी , किसी की बहन थी - - - दोनों अपने - अपने रिश्तों को भूल जाते हैं . उन्हें याद रहती हैं तो सिर्फ वासनामय गर्म साँसें .

अब मैं उन दहकती हुई गलियों में बसूँगी , जहां मेरे हमदम , मेरे यार , मेरी मरी हुई आरजूओं से बेखबर मजनूँ , मेरी कमसिन उम्र पर नज़र डालेंगे . लिपस्टिक से पुते मेरे मधुमय होठों को निहारेंगे और फिर अप्सरा से मेरे रूप की चकाचौंध में उनका ईमान डगमगा जाएगा . वो मेरे हुस्न की आँच में पसीज कर मुझे अपनी विकल बाहों में लेने के लिये बेकरार हो जायेंगे .

मैं महकते कृतिम सौन्दर्य प्रसाधनों से युक्त ऐसी दहकती नारी बनूंगी , जो समूचे समाज में आग लगा देगी . मैं समाज का ऐसा कोढ़ हूँ , जिसे समाज ने ही कोढ़ी बना दिया है - - - लेकिन मैं पूरे समाज को ही कोढ़ी बना डालूंगी . जिस समाज ने मुझे बर्बाद किया है , मैं उसे भरसक नेस्त नाबूद करके ही दम लूँगी .

अगर मैंने ऐसा न किया , तो राह चलते आवारा कामी कुत्ते मुझे जबरन नोच डालेंगे . हर मनचला मुझे लावारिस कटी पतंग जानकार ललचाई नज़रों से लूटने दौड़ेगा . कोई सहारा देने न पहुंचेगा . फिर जो काम हार हालत में होना ही है , तो क्यों बेबसी में किया जाय ! क्यों न स्वेच्छा से करें !!

पायल न जाने क्या - क्या ऊट पटाँग सोच रही थी - - - रात से ही . और सोचने - सोचने में ही रात के पत्ते झड़ चुके थे और सुबह की कोपलें निकल आयी थीं .

भावी जीवन के प्रति उसके दिमाग में कई विचार आ - जा रहे थे . अचानक उन्हीं लगभग एक समान बदरंग विचारों के बुलबुलों की बजबजाती भीड़ में एक अलग रंग का बुलबुला भी उभरा और वही चमचमाता बुलबुला उसके पिछले विचारों पर पश्चाताप का कारण और आगे के लिये उम्मीद की किरन बन गया . जिसने उसे जीवन का द्वार एक बार फिर से खटखटाने की हिम्मत प्रदान की .

धड़कते दिल में उम्मीद का एक छोटा सा दीपक जलाकर वह गुलशन के घर की तरफ चल दी . समय और परिस्थितियाँ व्यक्ति से क्या कुछ नहीं करवा डालते .
 
आज का पुरुषार्थ कल का भाग्य रचता है .

इसी धुन में गुलशन अपने घर में बैठा बड़े मनोयोग से कोई प्रतियोगिता - पुस्तक पढ़ रहा था . तभी उसने देखा कि पायल ने कमरे में प्रवेश किया है . देखा कि पायल का मुख मण्डल बासी गुलाब की तरह मुरझाया हुआ है . वह उसके सामने खड़ी होकर गाय की सी बड़ी- बड़ी निरीह आँखों से उसकी तरफ निहारने लगी . उसकी असहनीय पीड़ा उसके चेहरे से झमाझम बरस रही थी .

पायल की परेशानी को पढ़कर गुलशन ने पूछा -- " क्या बात है ? काफी परेशान दिख रही हो . सब ढीक तो है ? "

पायल एकदम से बुक्का फाड़कर रोते हुए बोली -- " चंचल मुकर गया है . वो शादी से फिर गया है . मैं बर्बाद हो गयी . मेरा हरा - भरा गुलशन वीरान हो गया गुलशन . "

वह उस बच्चे की भाँति गुलशन से लिपट गयी , जिसे मानो अपना खोया हुआ अभिभावक मिल गया हो .

'' क्या कहती हो तुम ? " आश्चर्य से गुलशन की आँखें फ़ैल गयीं .

अभी तक उसे यह बात नहीं मालूम थी . पता भी कैसे होती ! पायल ने बताई ही नहीं थी .

पायल उसकी छाती पर सिर रखे रोती जा रही थी . उसके आंसू लगातार बहते जा रहे थे - - - और नारी के आंसुओं में जमाने को बहाने की शक्ति होती है . उसकी आह में पत्थर को भी मोम बना देने का गुण होता है . फिर गुलशन तो एक इन्सान और उसका चाहने वाला था . वह अपने को रोक नहीं पाया .

वह बोला -- " मत लुटाओ ये मोती . इन आंसुओं को रोक लो , वर्ना मेरा दिल इन आंसुओं में डूब जाएगा . "

मगर पायल के आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे . उसने अपनी गीली आँखें गुलशन की हथेलियों पर टिका दीं - - - और गुलशन अनुभव कर रहा था कि पायल के नर्म - गर्म आंसू उसकी हथेली में सोखकर नसों के जरिये उसके ह्रदय में पहुँच रहे हैं - - - और जब ह्रदय आंसुओं से लबालब भर गया , तो वो आंसू गुलशन की आँखों के रस्ते बाहर रिसने लगे .

पायल बोली -- " अब मेरा क्या होगा गुलशन ! जिसे अपना समझी थी वो चंचल भी बीच राह में छोड़कर बेगाना बन गया . दुर्भाग्य मेरे साथ कदमताल कर रहा है . मुझे नहीं मालूम था - - - मेरी बड़े जतन से लिखी कहानी इस तरह पन्ना - पन्ना बिखर जायेगी . न जाने ईश्वर भी मुझसे किस जनम - करम का बदला ले रहा है .

गुलशन ने ढाढस बंधाते हुए कहा -- " अच्छे लोगों पर शुरुवाती तकलीफें आती हैं - - - यही भगवान का कुछ अजीब सा अन्याय है . फिर भी - - - यकीन रखो ! मैं तुम्हें गम के सागर में डूबने के लिए मजबूर नहीं होने दूंगा . ईश्वर ने चाहा तो कुछ दिनों में सब कुछ ठीक हो जायेगा . एक दिन नयी रौशनी आयेगी और दुर्भाग्य के अँधेरे छंट जायेंगे . विश्वास रखो पायल ! अँधेरा अमर नहीं है . उसे हर रोज़ उगकर सूरज ये बताता है कि वो उसके रहते लोगों के जीवन पर कालिख नहीं पोत सकता . वक्त ऐसा ही सूरज है पायल . "

मगर अब मैं क्या करूँ ! किस भरोसे और उम्मीद पर जियूं ? " पायल ने उसके सीने पर सिर रखे - रखे सुबकते हुए कहा .

गुलशन उसके सिर पर हाथ सहला रहा था . इस वक्त उसे अपने आप पर किसी ऐसे जहाज का गुमान हो रहा था , जिसके सीने में समुद्र की किसी छिपी हुई चट्टान से टक्कर खाकर गहरा छेद हो गया हो और जो अपने डेक पर डूबने वाले बच्चों , बूढ़ों और औरतों की दर्दनाक चीखों और दम तोड़ती प्रार्थनाओं के बावजूद गहरे पानी में डूबता चला जा रहा हो - - - उन्हें किनारे पर नहीं लगा पा रहा हो .

फिर भी उसने दिलासा दिया -- " दिल छोटा न करो पायल ! जीवन में ऐसे अवसर भी आते हैं , जब हम बिना किसी उद्देश्य के जीते हैं और बिना मौत मर भी जाते हैं . "

" मगर देखती हूँ - - - मैं जी न पाऊंगी . दुनिया मुझे जीने न देगी . क्योंकि मुझपर दाग लग चुका है . गुलशन ! आँचल के दाग तो साबुन से धुल जाते हैं , मगर तन के दाग - - - . मेरे माथे पर दाग लग गया है . मेरा मन सुलग रहा है . मेरे भीतर की लड़की टूट चुकी है - - - और इसी आधार पर मेरा सहारा चंचल भी मुझसे दामन छुड़ा रहा है . "

" पायल ! जहाज़ जब डूबने को होता है , तो सबसे पहले चूहे उसका साथ छोड़ते हैं . लेकिन अब तुम मुझे अपने जहाज़ का कप्तान समझो . मेरे रहते तुम्हारा जीवन रुपी जहाज़ डूबने नहीं पायेगा . मैं तुम्हें डूबने नहीं दूंगा . मैंने तुम्हें एक फूल की तरह चाहा था . विश्वास रखो - - - मैं ये फूल मुरझाने नहीं दूंगा .

समय अलज़बरा के प्रश्न की तरह गंभीर था और कमरे में मद्धिम सी रौशनी बिखेरता हुआ बल्ब टिमटिमा रहा था -- उम्मीद के सितारे की तरह .

असुरक्षा की भावना व्यक्ति को स्वार्थी बना देती है .

असुरक्षा की भावना से ग्रस्त पायल के स्वार्थ ने डरते - सकुचाते कहा -- " गुलशन ! एक बात पूछूं ? "

" पूछो . "

" क्या तुम अब भी मुझे उतना ही चाहते हो ? "

" उससे भी अधिक . "

" तुम मुझसे शादी करना चाहते थे न ! "

" हाँ . "

" क्या अब भी तुम मुझसे शादी कर सकते हो ? मैं तैयार हूँ गुलशन . हाँ , मैं तैयार हूँ . " पायल जल्दी से बोली -- " बताओ - - - जवाब दो ! "

उसका यह अप्रत्याशित प्रश्न सुनकर गुलशन के आश्चर्य चकित कानों ने उसके मन - मस्तिष्क को असमंजस में डाल दिया .वह तत्काल अनिर्णय की स्थिति में पहुँच गया . उसे समझ नहीं आ रहा था कि किस्मत किस रूप में उसका दरवाज़ा बार -बार खटका रही है .

उलझन की इस घडी में अंततः उसने अपनी आदत के अनुसार एक सिगरेट अपने होठों से लगाकर सुलगा ली और विचारमग्न होकर उसके गंदले धुंएँ के बीच कोई साफ़ रास्ता तलाशने लगा .

इस समय पायल को एक - एक पल वैसे ही एक - एक युग जितना लम्बा प्रतीत हो रहा था , जैसे कि न्यायाधीश द्वारा फैसला सुनाने से ठीक पूर्व किसी आरोपी को प्रतीत होता है .

उसके मौन से उतावली होकर पायल कह उठी -- " बोलो गुलशन ! बोलो . चुप क्यों हो ? कुछ बोलते क्यों नहीं ? "

गुलशन धीमे से बोला -- " मुझे सोचने दो पायल . ज़िन्दगी के बड़े फैसले जल्दबाजी में नहीं करने चाहिये . "

पायल बेमन से चुप हो गयी .

थोड़ी देर बाद जब उसकी पूरी सिगरेट गुल बन गयी तो उसने फिर पूछा -- " कुछ सोचा ? "

" हाँ - - - सोच लिया . "

" क्या ? " उसका पूरा शरीर कान बन गया .

गुलशन ने अपना निर्णय दागा -- " यही - - - कि अब मैं तुमसे शादी नहीं करूंगा . "

उसका जवाब सुनकर पायल का दिल धक् से रह गया - - - जैसे पहाड़ से गिर पड़ी हो . उसे लगा - - - जैसे वो कोई जूठी पत्तल हो , जिसमें अब और कोई भला आदमी खाना पसन्द न करेगा . क्योंकि लड़की चाहे सोने की ही क्यों न बनी हो , इज्जत खोयी लड़की को कोई भी पुरुष पत्नी - रूप में बर्दाश्त नहीं कर पाता . फिर भी उसने बस पूछने के लिये चीखकर पूछा -- " मगर क्यों ? "

" क्योंकि ऐसा नहीं कि अब तुम्हें मुझसे प्यार हो गया है , जो तुम मुझसे शादी करना चाहती हो . वास्तव में प्यार तो तुम अभी भी चंचल से ही करती हो - - - किन्तु उसके मुकर जाने और अपने असहाय होने के कारण विवशता में मुझसे शादी करना चाहती हो . क्योंकि स्त्री प्रायः असहाय अकेली नहीं रह सकती . पायल ! ये तुम्हारी असुरक्षा की भावना से उपजी विवशता कह रही है कि तुम मुझसे शादी करना चाहती हो . और यही सब सोचकर मैं बड़ी विनम्रता पूर्वक मना कर रहा हूँ . "

पायल ने आरोप जड़ा -- " इसका मतलब - -- - तुम भी वही निकले , जो चंचल है . मात्र इन्कार कि तर्ज़ अलग है . अब समझी - - - मर्द होते ही ऐसे हैं . लेकिन गुलशन ! कान खोलकर गाँठ बाँध लो - - - अगर तुमने भी साथ न दिया - - - तो मैं मर जाऊंगी - - - आत्महत्या कर लूंगी . "

वो दरवाजे की तरफ लपकी . गुलशन ने उसे झट से पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया - - - मगर पायल चिल्लाती रही -- " मुझे छोड़ दो . मर जाने दो . जब संवार नहीं सकते , तो बिगड़ने से रोकने का भी तुम्हें कोई अधिकार नहीं . छोड़ो - - - मैं कहती हूँ छोड़ो मुझे - - - जाने दो . "

उसने पूरी ताकत लगाकर अपने को छुड़ाने का प्रयास किया . वह लगभग विक्षिप्त सी हो गयी थी . उस पर दौरा सा पड़ा था .

और ऐसे दौरे को दूर करने का सबसे सुगम उपाय है झटका . गुलशन ने एक झन्नाटेदार झापड़ पायल के नर्म गाल पर मारा . थप्पड़ पड़ते ही एकाएक शान्त होकर वह मूर्खों की तरह गुलशन की तरफ ताकने लगी और फिर उससे लिपट कर बुक्का फाड़कर रोने लगी .

गुलशन उसकी पीठ पर हाथ फेरकर समझाने लगा -- " पायल ! बेहूदा बातें किसी भी बहस या आवेश से सही नहीं ठहराई जा सकतीं . व्यक्ति जीने के लिये पैदा होता है और उसके हाथ में सिर्फ जिन्दा रहना है . अपने को पैदा करना या ख़त्म करना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है . ये ईश्वर की मर्जी का खेल है . इसमें नाहक हस्तक्षेप नहीं करना . न चाहते हुए भी ज़िन्दगी को कभी - कभी ऐसे दौर से गुजरना पड़ता है जब सब्र करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं होता . ईश्वर धीरज रखने वालों की लाज रखता है . इसलिए थोड़ा धीरज से काम लो . "

इतना कहने के बाद गुलशन खुद ब खुद बुदबुदाया -- " समझ में नहीं आता - - - भाग्य और व्यक्ति क्या मजाक करते हैं आपस में . कुछ लोग भागकर ज़िन्दगी के पास पहुंचना - - - और कुछ दूर चले जाना चाहते हैं . "

पायल बोली -- " मेरा विवेक नष्ट हो गया है गुलशन . मेरी तो समझ में नहीं आता कि क्या करूँ , क्या न करूँ . आशा की कोई किरन नहीं दिखती . पता नहीं - - - मेरा क्या होगा . उफ़ - - - परिस्थितियाँ इन्सान को कितना असुरक्षित और विवश बना देती हैं . "

" निराशा बहुत बड़ा पाप है पायल . उसे मन में घर मत बनाने दो . ज़रा दुनिया पर नज़र दौड़ा कर तो देखो - - - बड़े - बड़े दुखों के बावजूद भी हर व्यक्ति जीने की छोटी सी चाह लिये कैसे हाथ - पाँव मार रहा है . और फिर - - - अब तुम घबराओ मत . मैं जो हूँ . मैं अपने ईमान और स्वाभिमान कि तरह तुम्हारी रक्षा करूंगा . अब तुम तक आने वाली हर मुसीबत को मुझसे होकर गुज़ारना होगा . "

" मगर उनका क्या होगा ? वो तो मेरी ज़िन्दगी की नासूर बनकर रहेंगी . "

" क्या ? "

" वो तस्वीरें . मेरे फोटो - - - जो सेठ के पास हैं . जिनके सहारे वो मुझे आजीवन कठपुतली की तरह नचाना चाहता है . "

उसकी इस बात के साथ ही गुलशन के मस्तिष्क - पटल पर कुछ असहनीय अश्लील दृश्य तेजी से कौंध गए . उसने फट से अपनी आँखें भींच लीं . मगर आँखें बंद करने से विचारों का चित्रण तो रुकता नहीं .

उसने आँखों में छलक आये आंसुओं को पोछ कर कहा -- " समस्या के ऊँट को अब मुझे ही किसी करवट बैठाना होगा . फिलहाल मैं चाहता हूँ कि मैं एक बार स्वयं चंचल को समझाने का प्रयास करूँ . तुम एक काम करो . जाकर चंचल तक मेरा ये विनम्र अनुरोध पहुँचाओ कि मैं अपने निवास पर एकान्त में उससे कुछ वार्ता का इच्छुक हूँ . उससे कुछ बात करने के पश्चात ही आगे कुछ करना ठीक होगा . "

" मैं कोशिश करती हूँ . " कहकर पायल कमरे के बाहर हो गयी .

अगले ही दिन !

चंचल जब गुलशन के घर पहुंचा तो औपचारिक बात चीत के पश्चात , सब कुछ जानते - समझते हुए भी उसने पूछा -- " कहो गुलशन ! मुझे क्यों याद किया ? "

गुलशन बोला -- " चंचल ! सुना है - - - तुमने पायल से शादी के इरादे को दफ़ना दिया है !! "

उसकी इस बात से चंचल का मन खिन्न हो गया . वह बोला -- " ठीक ही सुना है तुमने . "

" मगर क्यों ? "

" क्योंकि उसकी एक रात एक बदमाश के ऊपर न्योछावर हो चुकी है . "

" इससे क्या होता है ? "

" बहुत कुछ होता है इससे . "

" मगर क्या ? "

" बनो मत . ये तुम खुद और खूब समझते हो . जरूरी नहीं कि हर बात अपने नंगे स्वरूप में ही प्रस्तुत की जाय . "

" यार ! मैं तो कहूँगा - - - मिट्टी डालो उस घटना पर . कुत्ता कपास के खेत से होकर गुज़र गया , तो कौन सी चादर बनवाकर ले गया ! "

" मगर पाख़ाना तो कर गया . "

" छि ! तुम - - - और ऐसी बातें . चंचल ! उसे अपना लो . उसे अपना लो चंचल . "

" नहीं - - - अब ये मुझसे संभव नहीं . "

" मगर क्यों ? "

" क्योंकि समाज कहता है कि स्त्री मिट्टी की हाँडी होती है , जो एक बार पाखाने में पहुँच जाय , तो रसोई के काबिल नहीं बचती . "

" तो इसका मतलब ये है कि - - - . "

" कि तुम पायल के वकील की हैसियत से बोल रहे हो . " चंचल ने उसकी बात काटकर रूखे स्वर में कहा .

गुलशन ने उसकी बात का बुरा न मानने का प्रदर्शन करते हुए कहा -- " नहीं चंचल - - - नहीं . मैं तो एक निर्दोष के सन्तोष की भीख मांग रहा हूँ . चंचल ! मेरी मानो , तो पायल को सहारा दो . अभी भी वक्त है - - - वरना चिटकते रिश्ते टूट जायेंगे . "

" गुलशन ! सामाजिक नियमों के घेरे में सामान्य आदमी के अपने कुछ सिद्धांत होते हैं - - - और सिद्धांतों की कुछ अपेक्षायें होती हैं . तुम क्या सोचते हो कि मैं रिश्ते टूटने के भय से अपने सिद्धांत व सामाजिक मान्यतायें तोड़ने का दुस्साहस करूँ ? "

" हुँह - - - जरा मैं भी तो सुनूँ ! क्या हैं तुम्हारे सिद्धांत ? "

" ये की घर की बहू बनाने के लिये लड़की चाहिए , औरत नहीं . और वैसे भी - - - आम आदमी सब कुछ सहन कर सकता है लेकिन ये बिल्कुल नहीं कि उसकी पत्नी का भूत या वर्तमान में किसी अन्य के साथ शारीरिक सम्बन्ध रहे . "

" वाह - - - क्या ख़ूब है तुम्हारे सिद्धांत . ज़रा सोचो - - - अगर तुम्हारी शादी किसी दूसरी कथित लड़की से भी हो जाये , तो क्या तुम डंके की चोट पर कह सकते हो कि तुम्हारी पत्नी सर्व प्रथम तुम्हारे ही शारीरिक संपर्क में आयी है ? और फिर - - - ज़रा पायल कि सच्चाई पर भी तो दृष्टि दौड़ाओ , जिसने घर लौट कर सारी वास्तविकता जस की तस बता दी . वो उस घटना पर आंशिक आवरण भी तो डाल सकती थी . उसे अपने अनुकूल तोड़ - मरोड़ कर भी तो प्रस्तुत कर सकती थी . जिससे उसे तुम्हें खोने का खतरा भी न रहता . "

" गुलशन ! बात तो तुम्हारी सच है , किन्तु अब मैं जान - बूझ कर मक्खी तो नहीं निगल सकता ! ! भला नीम की निम्बोली सा कड़ुवा यथार्थ कैसे पचा पाऊंगा मैं !!! "

" मैं फिर कहता हूँ चंचल ! केवल मूर्ख और मृतक ही अपने सिद्धांतों को कभी नहीं बदलते . जबकि तुम तो एक पढ़े - लिखे आदमी हो . तुम्हें तो विवेक से काम लेना चाहिये . "

" हुँह - - - विवेक ! क्या होता है विवेक ? "

" यही - - - कि परिस्थिति विशेष के अनुरूप दिल की कही की जाय . "

" तो - - - वही तो कर रहा हूँ मैं . मेरा दिल - दिमाग यही करने को कह रहा है . "

" उफ़ चंचल ! " गुलशन बोला -- " क्या तुम उसे स्वयं से दूर करके उसकी याद को दिल से भुला सकोगे ? "

चंचल ने कृतिम निष्ठुरता से उत्तर दिया -- " हाँ ! प्रयास करूंगा . भूलते - भूलते भूल ही जाऊंगा . '

" ओह - - - तो इसका मतलब , तुम्हारा दिल , दिल न हुआ , सराय हो गया , जहां लोग आते , ठहरते और जाते रहते हैं - - - और सराय किसी को याद नहीं रखती . " गुलशन झिड़कते हुए बोला -- " चंचल ! आज तुम्हारे इस रूप को देखकर और तुम्हारे सिद्धांतों के जिद्दीपने को जानकार मुझे ये कटु अनुभव हो रहा है कि लोग बहुत स्वार्थी होते जा रहे हैं और दुनियां में कल उन लोगों की समाधियाँ तक नहीं बनेंगी , जो मरने से पूर्व कफ़न से लेकर फूलों तक का प्रबंध खुद नहीं कर जायेंगे . "

चंचल चुप रहा .

गुलशन ने पुनः पूछा -- " तुम्हारे सिद्धांत ही तुम्हारी और पायल की शादी में टांग मार रहे हैं , या और भी कोई बात है ? "

" हाँ - - - और भी बात है - - - जो सर्वाधिक प्रमुख है . उससे शादी के बाद जिसका मुझे सामना करना पड़ सकता है . जिसके सम्मुख अन्य समस्त बातें गौड़ हैं . जिसका इशारा मैं इससे पूर्व भी तुम्हें दे चुका हूँ . "

" वो क्या ? ज़रा खुलकर कहो . "

" समाज का डर . " चंचल बोला -- " कल जब शहर भर को ये बात मालूम होगी कि पायल एक बदमाश कि बिछावन बन चुकी है , तो क्या कहेंगे लोग ! लोग मुझे हेय दृष्टि से देखेंगे . ताने मार - मार कर मेरा जीना हराम कर देंगे . "

" चंचल ! कीड़े - मकोड़ों की भिनभिनाहट के भय से कोई अपने घर में शमा जलाना तो बन्द नहीं कर देता - - - और वैसे भी , समाज को क्या पता है इस बात का !! "

" पता चल तो सकता है . सेठ द्वारा लोगों के जान सकने की संभावना तो है . संभावनाओं को नकारा तो नहीं जा सकता . हमें दूर तक सोच कर समझदारी से चलना चाहिए . "

" वाह ! किस खूबसूरती से तुमने अपनी बुजदिली को समझदारी का नाम दे दिया . चंचल ! समाज के डर से कमजोर न बनो , वर्ना शैतान के हौसले बुलन्द और उम्र लम्बी होती जायेगी , जबकि पायल जैसे इंसान घुटते - पिसते और मरते चले जायेंगे . "

पायल की त्रासदी का दुष्प्रभाव झेल रहा चंचल गुलशन की बार - बार की नसीहतों से चिढ़कर झुंझलाया -- " गुलशन दुनिया में उपदेश का धंधा करने वालों की कमी नहीं , पर ज़िन्दगी की सच्चाइयों से जिसे जूझना पड़ता है - - - वही जानता है . उससे शादी कर लेने पर दुनिया दबी जुबान यही कहेगी कि मेरी पत्नी मुझसे पहले किसी अन्य द्वारा भी भोगी जा चुकी है . और फिर - - - अगर तुम्हें उससे इतनी हमदर्दी है और समाज की परवाह नहीं , तो सूखे उपदेश क्यों देते हो ? शादी क्यों नहीं कर लेते उससे ? "

" उफ़ - - - काश तुम मेरी मजबूरी समझ सकते . " उसने पुनः समझाना चाहा -- " हिम्मत से काम लो चंचल . सफलता तुम्हारे चरण चूमेगी . छोटे से दिखने वाले व्यक्ति को लोग दूरबीन लगाकर देखेंगे . तुम तो पढ़े - लिखे समझदार हो . समाज के फेर में मत पड़ो . अपनी आत्मा की आवाज़ पर ध्यान दो . मुक्त मस्तिष्क से किये गए अपने स्वतन्त्र फैसले पर अमल करो . "

" लेकिन मुझे समाज में रहना है - - - और समाज सामाजिक कार्यों में एकाकी फैसलों को नहीं मानता . "

" श्रेष्ठ जीवन पद्धति के लिए हम स्वयं ही तो मिल - बैठ कर सामाजिक नियम रचते हैं और वक्त के जल से उनकी जड़ों को सींचकर मज़बूत करते हैं . तब अवरोध उत्पन्न करने की दशा में क्या हम स्वयं ही व्यक्तिगत रूप से उन्हें तोड़ नहीं सकते ? "

" मगर तब समाज से हमारा बैर हो जायेगा . वो हम पर ताना मारेगा . हमारा जीना हराम कर देगा . जबकि मुझे समाज के भीतर ही शान्ति से रहना है . "

" बैर हो जायेगा तो हो जाने दो . चंचल ! समाज से लड़ो . कुछ शुरुवाती कठिनाइयाँ तो अवश्य आएँगी . पर याद रखो - - - कठिन रास्ते प्रायः खूबसूरत मंजिल तक पहुंचाते हैं . समाज एक न एक दिन अपने आप थक - हार कर चुप हो जायेगा . तुम सुख - चैन से जी सकोगे . "

" और उस दिन के इंतज़ार में - - - मैं अपनी ज़िन्दगी का सुनहरा हिस्सा ताने खाते - खाते बर्बाद कर दूं ? न - - - न ! मुझ साधारण आदमी में इतनी हिम्मत नहीं . मुझसे न होगा ये . "

" आदमी जब कोई पाप कर गुज़रता है - - - या करने लगता है , तो नाना प्रकार के तर्कों से उसे सही ठहराने की कोशिश करता है . तुम भी यही कर रहे हो चंचल ."

बहस द्रोपदी के चीर की तरह खिचती ही जा रही थी .

गुलशन ने फिर समझाया -- " चंचल ! कीचड़ में अपना सोना गिर गया हो , तो उसे उठाने के लिए झुकना तो पड़ता ही है - - - और इस प्रयास में गन्दगी के कुछ छींटे भी पड़ सकते हैं , लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हम छीटें पड़ने के डर से अपने सोने को कीचड़ में ही पड़ा रहने दें . अभी भी वक्त है कि तुम पायल - - - . "

" गुलशन ! तुम बेकार ही खली से तेल निकालने का प्रयास कर रहे हो . " चंचल उसकी बात काट कर बोला .

गुलशन ने अफ़सोस जाहिर किया -- " समझ में नहीं आता --- तुम्हारी बुद्धि को किसकी नज़र लग गयी है ! "

" कुछ भी कहो , मगर सुन लो , तुम अगर आँखें खोल कर देखने से लाचार हो , तो मैं अपनी आँखें बन्द नहीं रख सकता - - - समझे . गुलशन ! ज़िन्दगी छोटी होती है - - - और उसे भोगने की उम्र उससे भी छोटी . क्या जरूरत है कि हम इस छोटी सी अनमोल ज़िन्दगी में जान - बूझ कर मुसीबतों को न्योता दें . हमें ज़िन्दगी के सफ़र में पहले से ही सोच समझ कर साफ़ और सुरक्षित रास्ते चुनने चाहियें . सुनो ! पायल समाज की नज़र में खोटा सिक्का है - - - और खोटा सिक्का जेब का वज़न तो बढ़ाता ही है , साथ ही दुनिया के बाज़ार में चलता भी नहीं . तब मैं क्यूंकर उसको साथ लेकर चलूँ ! "

गुलशन ने बात की दिशा बदलकर पूछा - " पर क्या तुम उसके बगैर ठीक से जी लोगे ? "

" हाँ . कुछ ही दिनों में सब कुछ सामान्य हो जाना चाहिये . जैसे - तैसे जी ही लूँगा . जीना तो पड़ता ही है . "

" किन्तु याद रखो चंचल ! सिर्फ जिंदा रहना ही ज़िन्दगी नहीं कहलाती . अगर ऐसा होता , तो मैला खाकर सुअर और कीड़े - मकोड़े भी ज़िन्दा रहते हैं . महत्त्व इस बात का नहीं कि हम जिये और कितना जिये - - - महत्त्व इस बात का है कि हम कैसे जिये . इसलिये कुछ ऐसा करो कि मरकर भी ज़िन्दा रहो , ऐसा नहीं कि जीते जी मर जाओ . "

चंचल को गुलशन के ये शब्द ऐसे लग रहे थे , जैसे उसे धक्का दे - दे कर घर से बाहर निकाल रहे हों .

वह चिढ़कर बोला -- " सुनो ! मखमल में लपेटकर मारने से पत्थरों की चोट कम नहीं हो जाती . गुलशन ! तुम हद से आगे बढ़ रहे हो . "

" तुम मजबूर जो कर रहे हो . " गुलशन कहता रहा -- " सुन लो ! कुछ ही दिनों में तुम अनुभव करोगे कि पायल को न अपनाकर तुम अपनी ही नज़रों से गिर रहे हो . और चंचल ! आदमी ठोकर खाकर तो संभल सकता है , किसी की नज़रों से उठकर भी गिर सकता है , मगर अपनी ही नज़रों से गिरा हुआ व्यक्ति कभी नहीं उठ पाता . वह तिल - तिल कर जलता है . ऐसा व्यक्ति जब आईने के सम्मुख जाता है तो उसकी लज्जा मुंह चिढ़ाती है उसे . मौत भी उसे सहारा नहीं देती - - - दूर भागती है . "
 
" गुलशन ! कम से कम मेरे दामन में इतने सारे दोष , इतने आरोप तो मत भरो . बहुत कह लिया , अब बस भी करो . मैं तुम जैसे किताबी आदमी से फालतू बहस नहीं करना चाहता . मगर सौ बात की सीधी एक बात सुन लो - - - मैं पायल को चाहता तो हूँ - - - पर उसके प्यार में दीवाना होकर इतना अव्यवहारिक भी नहीं हुआ कि आगा - पीछा कुछ न सोचूँ . सच तो ये है कि उस गिरी को उठाने के फेर में खुद को इतना गिराने का बूता मुझमे नहीं , कि मैं उम्र भर उसका भड़ुआ बनकर जियूं . ज़रा दिमाग से काम लो और सोचो कि यदि उससे शादी के बाद बदमाश सेठ पायल के अश्लील फोटो के बल पर ब्लैक - मेल करके उसे अपने घर जब - तब बुला भेजेगा तो मेरी क्या मनोदशा होगी . क्या तुम मुझसे उम्मीद करते हो कि मैं अपनी पत्नी का भड़ुआ बनकर उसे सेठ के घर बार - बार जीवन भर भेजा करूंगा ! और अगर यदि मैंने ऐसा न किया तो निश्चित ही वो कमीना उन गंदी तस्वीरों को सार्वजनिक करके समाज में पायल के साथ - साथ मुझे भी मुंह दिखाने लायक न छोड़ेगा . तुम तो केवल पायल के पक्ष में तर्क दिए जा रहे हो . मैं तुम्हारा दुश्मन तो नहीं ! ज़रा मेरी बेबसी का भी तो कुछ ख़याल करो . सिक्के के इस पहलू पर भी तो विचार करो . "

अपने अकाट्य तर्कों से गुलशन को निरुत्तर करके चंचल कमरे के बाहर निकल गया और गुलशन धीरे से बुदबुदाया -- " घबराओ नहीं पायल ! मेरे रहते तुम बेसहारा नहीं होने पाओगी . क्योंकि मैंने तुम्हें प्यार किया है . सच्चा प्यार . "

गुलशन अपने घर में बैठा पायल के जीवन की गुत्थी सुलझाने की जुगत सोच रहा था मगर कोई भी सिरा हाथ न आने से उसका दिमाग उलझ गया था . बातचीत से हल होने योग्य कोई उपाय ही नहीं सूझ रहा था . चंचल से बात करने के बाद उसे उसकी बातों में भी वज़न लग रहा था . उसकी शंकायें अपनी जगह जायज़ थीं . वह सोच रहा था कि यदि चंचल की शंकाओं को सही ठहराते हुए उन्हें स्वीकार कर वह इस प्रकरण को यहीं विराम दे - दे तो निश्चित ही पायल की बेबस ज़िन्दगी चिंदी - चिंदी बिखर जायेगी . तब फिर वह क्या करे ! इसी उधेड़ - बुन में अन्य संभव विकल्पों पर विचार करने लगा . अचानक कोई विचार उसके मस्तिष्क में कौंधा , जिससे उसकी गर्दन एक विशेष ढंग से यूं तन गयी , मानो उसने कोई दृढ़ निश्चय कर लिया हो .

और तभी !

गुलशन - चंचल की वार्ता का परिणाम जानने की उत्सुकता से पायल वहां आ पहुंची .

उसका पक्के इरादों वाला तना हुआ चेहरा देखते ही , अपनी बात भूलकर , उसने पूछा -- " क्या सोच रहे हो गुलशन ? "

" सोच रहा हूँ , मुझे सेठ से वो तस्वीरें प्राप्त करनी ही होंगी ."

" अरे नहीं . ऐसा दुस्साहस भी मत करना . "

" वह बाईं हथेली पर अपना दायाँ मुक्का उत्तेजना वश मार कर बोला -- " पायल ! तुम निश्चिन्त रहो . देखना ! मैं उसके शैतानी जाल के ताने - बाने को तोड़कर फेंक दूंगा . "

" न - - -ना ! " उसने टोका -- " ऐसा मत सोचो . जोर जबरदस्ती से काम लेने पर उसके खतरनाक इरादे और भी खुंखार हो उठेंगे . और फिर - - - काम भी तो आसान नहीं है . अजगर के पेट में घुसकर अंतड़ियाँ निकालने जैसा काम है और इसमें दिलेरी और ताकत की जरूरत है . "

" अभी शायद तुम्हें प्यार की ताकत का अंदाजा नहीं पायल . "

" मगर - - - . "

" तुम चिन्ता मत करो . शठ के शठ - सा व्यवहार ही उचित होता है . मैं जानता हूँ कि शैतानों के पैरों के नीचे की ज़मीन बहुत कमजोर होती है , इसीलिए अगर कोई हिम्मत से मुकाबला करे तो उनके पाँव बहुत जल्दी उखड़ जाते हैं . "

" लेकिन फोटो मिल जाने से क्या समस्या पूरी तरह हल हो जायेगी ? क्या कहा चंचल ने ? कुछ उम्मीद है क्या ? "

" कहा तो कुछ नहीं . कोई उम्मीद भी नहीं . फिर भी किसी समस्या के समाधान हेतु सर्वोत्तम प्रयास करना मनुष्य का धर्म है . फल ऊपर वाले पर छोड़ देना चाहिये . क्या पता कब ईश्वर तुम्हारे सितारे रौशन करके सामने वाले की मति फेर दे . वैसे भी यदि मैं फोटो पाने में सफल रहा तो समस्या आंशिक रूप से आसान तो हो ही जायेगी . और इस सूरत में पुनः मैं चंचल को शादी के लिए राजी करने की भरसक कोशिश करूंगा . "

" और यदि फिर भी असफल रहे तो ? "

" तो " वह जोश में आकर बोला -- " तब मैं तुम्हारे जीवन के मटमैले रंगों को खुद धोकर उन्हें अपने बूते सतरंगी बना दूंगा . यानि ऐसी सूरत में मैं तुमसे शादी करने के लिए खुद हाज़िर हो जाऊंगा , वर्ना दुनिया की नज़र में प्यार बदनाम हो जाएगा . वैसे ये सुन लो पायल ! अब तुम मुझे मिलो या न मिलो , किन्तु यदि तुम खुश रह सकी , अपनी ज़िन्दगी से संतुष्ट रही , तो मेरा प्यार सुखी रहेगा . "

पायल की आँखों में कृतज्ञता के आंसू उमड़ आये . वह गुलशन के रोवेंदार मर्दाने सीने पर सिर टिकाकर सुबकने लगी .

गुलशन उसके सिर पर हाथ फेरकर बोला -- " चलो - - - मुझे सेठ का घर दिखाओ . "

दोनों बाहर निकल कर गंतव्य की ओर चल पड़े .

कुछ देर बाद , पायल ने सेठ का घर दिखाकर कहा -- " जाओ - - - पर जल्दी लौटना . मैं घर पर बेसब्री से तुम्हारा इंतज़ार करूंगी . "

गुलशन शून्य भाव से बोला -- " संभव है - - - मैं न भी लौट सकूँ . "

" तब भी मैं हमेशा तुम्हारा इंतज़ार करूंगी . " पायल ने भाव विभोर होकर कहा .

बड़ी सी रहस्यमय कोठी के एक खूबसूरत कमरे के बेश कीमती विदेशी सोफे पर पसरा हुआ सेठ देसी शराब सुड़क रहा था .

और तभी !

उढ़के हुए दरवाजे पर भड़ाक से लात मारकर गुलशन धड़ाक से कमरे के भीतर घुस गया .

उसके अन्दर प्रवेश करने के तरीके से सेठ को ये समझते देर न लगी की आने वाला अपरिचित व्यक्ति खतरनाक इरादों से लैस उसका कोई विरोधी ही हो सकता है . फिर भी उसने जान - बूझ कर उसे ऐसी नज़र से देखा जैसे कि वह कोई बेकार की वस्तु हो .

उसने संयम मगर व्यंग्य सहित उससे पूछा -- " दरवाज़ा टूटा तो नहीं ? "

क्रोध में उफनते गुलशन ने जवाब दिया -- " चक्रवात केवल दरवाजे को ही अपना शिकार नहीं बनाता - - - बल्कि उसकी चपेट में आने वाली हर चीज़ नेस्त नाबूत हो सकती है . "

" कभी - कभी हवा का नव सिखुवा झोंका भी अपने को तूफान समझ लेता है . "

" वो तो अभी तुम्हें मालूम हो जाएगा कि तूफ़ान और हवा के झोंके में क्या अंतर होता है . " गुलशन दांत किटकिटा कर बोला -- " कमीने ! तो तुम्हीं वो शैतान हो जिसके कारण पायल का भविष्य चकनाचूर हो गया . "

" अबे बेवकूफ ! शीशे टूटने के ही लिए होते हैं . वो चाहे आज टूटें या कल . मुझसे टूटें या किसी और से . टूटना तो उनकी किस्मत है . "

" सुनो ! अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि पायल की तस्वीरें मुझे दे दो . "

" ओह - - - समझा . तो तुम उसके भाई साहब हो . "

" बदमाश ! मैं तेरा बाप हूँ . "

" बेटे ! अगर गीदड़ की मौत आती है , तो वह शहर कि ओर भागता है - - - और अगर किसी बदकिस्मत आदमी के दिन नज़दीक आते हैं , तो वह मेरे करीब आता है . जान की सलामती चाहते हो तो फ़ौरन दफ़ा हो जाओ . "

" मैं भागने के लिए नहीं आया सेठ . "

" बेटे ! क़ाज़ी ओसामा नियाज़ी का लिखा अफगान इनसाईक्लोपीडिया पढ़ा है ? दुनिया के कुछ नामी जिन्न हैं . उनमें से एक मैं भी हूँ - - - अगर ज़िन्दगी प्यारी है , तो दफ़ा हो जाओ - - - और हाँ - - - यदि मौत से मोहब्बत है , तब रुक सकते हो . " उसने बेहयाई से खींसें निपोर कर धमकाया .

गुलशन ने अपनी ज़िन्दगी में ऐसे कई बेहया आदमी देखे थे , जिनकी आँखों में सुअर को बाल था - - - मगर यहाँ तो सेठ की मैली आँखों में समूचा सुअर ही लोटता नज़र आ रहा था .

वह बोला -- " मैं कहता हूँ , तस्वीरें दे दो . "

" तस्वीर लेने आया है , पायल के भड़ुए . साले ! तस्वीरें तो क्या मिलेंगी - - - हाँ , मैं तुम्हें मार कर तेरी हड्डियाँ तलक जरूर हज़म कर जाऊंगा -- बगैर डकार लिये . "

" बेटा चींटे ! मैं कपास हूँ . मुझे गुड़ समझकर खाने का ख़याल महंगा पड़ेगा . "

" अबे - - - मैं कपास को धुनकना भी अच्छी तरह जानता हूँ . ऐसी जमकर धुनाई करूंगा तेरी , कि तियाँ - तियाँ बिखर जायेगा . "

" अच्छा - - - तो फिर कोशिश करके देखो . मालूम पड़ जायेगा कि कपास किस किस्म की है . कहता हूँ , तस्वीरें दे दो . और सुनो - - - अगर सभ्यता से काम नहीं चला , तो मैं तुम जैसों के वास्ते असभ्यता पर भी उतर सकता हूँ . मैं लखनऊ का रहने वाला नहीं हूँ , जो हर हाल में सभ्यता को ही जीवन में अव्वल दर्ज़ा देते हैं . "

क्रोध ने गुलशन को पागल बना डाला था . उसे अपनी नसों में लहू की जगह तेज़ाब दौड़ता लग रहा था . सेठ का भी चेहरा तमतमाया हुआ था . जैसे चेचक निकलने से पहले चेहरे पर लालिमा उग आती है .

सेठ गुस्से में बोला -- " तुम शायद मेरे नाम से अंजान हो , वर्ना यूं मौत से खेलने न निकलते . बेटे ! मेरे बारे में इतना ही जान लो कि मैंने उन्हें ही शागिर्द बनाया है , जो अपने को उस्ताद कहा करते थे . कह रहा हूँ - - - भाग जाओ , वरना मेरे हाथों से पचासवां खून हो जायेगा . "

" ये तो वक्त ही बतायेगा सेठ - - - कि मरना किसे है . मगर सुन लो ! सितारे शैतान का साथ हमेशा नहीं देते . ये सच है कि उनकी ज़िन्दगी रौबदार होती है , लेकिन ये भी झूठ नहीं कि उनकी मौत बहुत बदसूरत होती है . मैं भी अपनी ज़िन्दगी का पहला और आखिरी क़त्ल नहीं करना चाहता . न ही पुलिस की मदद लेकर पायल की ज़िन्दगी का तमाशा बनाना चाहता हूँ . मैं तो सिर्फ इतना चाहता हूँ कि तुम मुझे तस्वीरें दे दो और मैं लौट जाऊं . "

" क्या कहा ! लौट जाऊं ! ! अबे - - - वो लोग कम अक्ल होते हैं जो शेर की मांद में घुसने के बाद वापस लौटने की बात करते हैं . " इतना कहकर सेठ ने जेब से चाकू निकालकर हवा में गुलशन पर फेंक मारा .

गुलशन झुककर वार बचा गया और उसने उछलकर सेठ के मुंह पर एक घूँसा जड़ा . घूँसा पड़ते ही उसके ऐनक ने गिरकर फर्श की शरण ली . ऐनक का एक लेंस फ़ौरन शहीद हो गया और दूसरा गंभीर रूप से घायल .

सेठ जल्दी से दराज़ में रखा रिवाल्वर निकालकर बोला -- " सुनो ! जो आदमी अपनी ज़िन्दगी की परवाह नहीं करता , उसे दूसरों की जान लेते देर नहीं लगती . इन्सानी खून को बाहर निकालना मेरे रिवाल्वर का शौक है . मैं तुम्हारा खून कर दूंगा . हैंड्स अप - - - अ s s s प . "

उसने आदेश दिया . शहंशाही आदेश . सारी शहंशाही रिवाल्वर में होती है और रिवाल्वर उसके हाथ में था .

गुलशन ने तत्काल हाथ ऊपर उठा दिये लेकिन फिर - - - वह चीते की सी फुर्ती से सेठ के ऊपर उछला . सेठ ने फ़ौरन रिवाल्वर का घोड़ा दबा दिया . एक अंधी गोली निकली , जो गुलशन के कंधे के निचले किनारे को खुरचती हुई निकल गई . वो सेठ के ऊपर ढेर हो गया . सेठ उसका युवा वज़न बर्दाश्त न कर पाने के कारण लुढ़क गया गया , मगर रिवाल्वर उसके हाथ में ही थी - - - किन्तु रिवाल्वर पर अब गुलशन की भी पकड़ हो चुकी थी .

जान बड़ी प्यारी होती है . दोनों कस कर रिवाल्वर पकड़े रहे . दोनों ही पूरी ताकत लगाकर रिवाल्वर की नली में मुंह फैलाए बैठी मौत को अपने से परे ठेलने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे . भूखी नली का विकराल मुंह कभी सेठ की तरफ घूम जा रहा था , तो कभी गुलशन की ओर . बार - बार की इसी कोशिश में एक बार अचानक रिवाल्वर का घोड़ा दबकर हिनहिना उठा . रिवाल्वर ने एक शोला थूका और फिर एक उभरी हुई दर्दनाक चीख लहूलुहान लाश बनकर फर्श पर ढेर हो गयी .

गुलशन को सेठ का घर पहचनवाकर पायल उसके घर लौट आयी थी , बल्कि गुलशन ने ही उसे अपने घर लौट जाने को कहा था . वो बेचैनी से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी . उसका एक - एक पल उसे सौ - सौ उलाहने दे रहा था .

न जाने कैसे - कैसे बुरे विचार उसके मस्तिष्क को मथ रहे थे . वो सोच रही थी कि उसने गुलशन को सेठ के यहाँ भेजकर अच्छा नहीं किया . सेठ बड़ा कमीना आदमी है . बेचारे गुलशन की जान पर बनी होगी . न जाने क्या बीत रही होगी उसपर . काश ! एक बार वो सही सलामत लौट आये . कितना अधिक मानता है उसे गुलशन . उसके लिए जान हथेली पर लेकर मौत से जूझने गया है .

जैसे - जैसे देर होती जा रही थी - - - उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी . कभी - कभी उसके दिमाग में आता था कि वो सेठ के हाथों कहीं - - - . नहीं . नहीं - नहीं . उसे ऐसा नहीं सोचना चाहिये . ऐसा नहीं हो सकता . वो भला आदमी है और कहते हैं कि भले लोगों के सिर पर सदा भगवान का हाथ रहता है . हे भगवान ! तू ही उसकी रक्षा करना . उसका दिल आज भगवान से मन्नतें मांगनें को मजबूर हो गया था . अच्छे - अच्छे नास्तिक भी जीवन में कभी न कभी ' बुद्धम शरणम् गच्छामि ' हो ही जाते हैं .

गुलशन के लिए बेचैन पायल उसे मौत के मुंह में धकेलने के लिए स्वयं को जिम्मेदार मान रही थी . बीतते समय के साथ पायल की आँखों की नमी बढ़ती जा रही थी . उसका भारी मन जोर - जोर से रोने को कर रहा था . वह पलंग पर औंधी लेटकर तकिया में मुंह छिपाकर जोर - जोर से सिसकने लगी .

रोते - रोते तकिया गीला हो गया था . तभी पीछे से गुलशन ने कमरे में प्रवेश करके पायल के सिर पर स्नेह भरा हाथ रखा .

पायल ने चौंककर मुंह उठाया , तो अपने सामने गुलशन को खड़ा देखकर तेजी से बोली -- " गु - - ल - - श - - न तुम ! तुम ठीक तो हो न !! हाय - - - मेरी तो जान ही निकल गयी थी . कहाँ लगा दी इतनी देर ? "

झट से ज़मीन पर उतर कर वह जल्दी - जल्दी गुलशन को टटोलने लगी . इधर से , उधर से , आगे से , पीछे से . जैसे उसे यकीन ही न आ रहा हो , उसके लौट आने का . वह उसे लगातार सहलाती जा रही थी .

और तभी - - - उसने अपने हाथ में खून लगा देखा , तो चीख कर बोली -- " ये क्या गुलशन ! क्या हुआ तुम्हें ? "

जवाब की प्रतीक्षा किये बिना ही उसने घूमकर उसके कन्धे की तरफ देखा तो कमीज़ के पिछले हिस्से को खून से लथपथ पाया .

उसने पुनः घबड़ाकर पूछा -- " यह क्या हुआ ? "

" कुछ नहीं ! गोली लग गयी थी . "

" हाय राम ! गोली - - - और कहते हो कुछ नहीं . "

" हाँ - - - कुछ नहीं होगा . गोली कन्धे को खुरचते हुए निकल गयी थी . बाल - बाल जान बच गई . "

" गु - - ल - - श - - न ! " उसके गले से एहसान भरा स्वर उभरा और वह जोर से गुलशन से लिपट गयी , जैसे उसे अपनी बाहों में सुरक्षित कर लेना चाहती हो .

गुलशन ने जेब से तस्वीरों का लिफ़ाफा निकालकर पायल से कहा -- " ये रहीं तुम्हारी तस्वीरें . "

" तस्वीरें ! " वह उससे अलग होकर आश्चर्य से पूछने लगी -- " मिल गईं ! क्या सच ? लाओ देखूं . " पायल ने उत्सुक हाथ बढ़ाये .

" ना - - - न ! इन्हें न देखो , तो ही अच्छा है . "

उसका आशय समझ , पायल ने जिद नहीं की .

अचानक जैसे उसे कुछ ख़ास याद आ गया हो . वह बोली -- " तुम्हें गोली लगी है - - - इसका मतलब है कि सेठ से झगड़ा हुआ था . क्या हुआ उसे ? "

" ऊपर चला गया . चिराग के देर तक धुआं छोड़ते रहने से कहीं अच्छा है उसका बुझ जाना . उसे उसके कुकर्मों की सजा मिल गई . बुरे व्यक्ति का अंत कभी अच्छा नहीं होता ."

" क्या कहते हो ! मर गया ? " वह आश्चर्य मिश्रित भय से सिहर उठी और रोते हुए बोली -- " गुलशन ! मुझे माफ़ कर दो . मैं शर्मिंदा हूँ कि मैंने पहले तुम्हारा सही मूल्यांकन न किया - - - और एक तुम हो कि - - - . "

" अब छोडो भी इन बातों को . " गुलशन उसकी बात काटकर बोला -- " आगे की सुनो ! जब सेठ मर गया , तो मैंने उसके घर की तलाशी ली . बड़ी मुश्किल से ये फोटो हाथ लगे हैं . और ये भी एक सुखद संयोग ही रहा कि इस पूरे प्रकरण के समय सेठ घर पर अकेला ही था . काम जब बनने होते हैं तो परिस्थितियाँ खुद - ब - खुद अनुकूल होती चली जाती हैं . "

पायल बोली -- " चलो तुम्हें किसी अस्पताल ले चलूँ . "

" पगला गई हो क्या ! गोली लगने का मामला है . पुलिस - केस हो जाएगा . "

" मगर बिना इलाज के तो तुम्हारी जान को खतरा हो सकता है ! "

" नहीं - - - कुछ नहीं होगा . गोली थोड़े ही मांस में अटकी है . मात्र गहरा खुरच कर निकल गयी है . और फिर - - - अगर मेरी अब तक की नाकाम ज़िन्दगी तुम्हारे काम आ जाये , तो मुझे गम न होगा . "

" चुप भी रहो . क्या मरने - जीने की बातें करते हो . " उसके होठों पर ऊँगली रखकर उसने कहा - - - और उसके आंसू पुनः तेज हो गये .

गुलशन चुप हो गया .

पायल ने रोते - रोते कहा -- " क़त्ल का मामला है . पुलिस तुम तक भी तो पहुँच सकती है ! "

" उम्मीद तो नहीं . मैंने अपने वहां जाने के सभी सबूत भरसक मिटा दिये है . बाकी ईश्वर मालिक . होता तो उसी का चाहा है . अच्छा अब तुम जल्दी से पानी गरम करके मेरा घाव साफ़ करो . " गुलशन ने कहा .

कलेजे में काफी कुछ ठंढक लेकर पायल पानी खौलाने के लिए रसोई की तरफ चल दी .
 
कन्धे के ज़ख्म ने गुलशन को परेशान कर रखा था . वह पिछले तीन दिन से पलंग पकड़े था . पुलिस - केस हो जाने के डर से उसे अस्पताल में भरती नहीं कराया जा सकता था और घर पर घाव जल्दी ठीक न होने की जिद ठाने था . जख्म पक चला था और प्रोफ़ेसर साहब के एक परिचित व भरोसे के डॉक्टर का उपचार चल रहा था . वो भी इतना गुप - चुप कि किसी बाहरी को कानोंकान खबर न हो सके .

जब गोली लगी थी , तब तो क्रोध व आवेश में होने के कारण तकलीफ दबी रह गयी थी - - - मगर अब उसका ज़ख्म मचल उठा था और किसी नटखट बच्चे की तरह उसे परेशान करने पर तुला हुआ था .

और उधर !

चंचल के सदमे की मारी और गुलशन की चिन्ता में दोहरी हुई अशक्त पायल को भी लम्बे ढीठ बुखार ने धर - पकड़ा था . वो भी बिस्तर की मेहमान बनी थी . इसीलिये वो प्रबल इच्छा होने पर भी गुलशन की देखभाल के लिये न जा पा रही थी .

मगर गेसू ने गुलशन की सेवा में कोई कसर न उठा रखी थी . और यदि चाहें , तो औरतों में जितनी सेवा - शक्ति होती है , मर्दों में नहीं . तभी तो प्रोफ़ेसर साहब और चंचल तो दिनभर में कुछ एक बार उसके घर पर जाकर उसे देख सुन आते थे - - - मगर गेसू को इतने भर से संतुष्टि कहाँ होने वाली थी .

वह रात - रात भर गुलशन के घर रहकर उसकी सेवा करती थी . समय से पट्टी बदलती , दवा पिलाती और जब कभी गुलशन की जलती हुई आँखों पर रहमदिल नींद अपनी मेंहदी रची खुशबूदार उंगलियाँ रखकर उसे अपनी मखमली बाहों में ले लेती , तो वो स्टूल पर बैठी - बैठी - - - उसके पैरों पर सिर टिकाकर एक - आध जिम्मेदार झपकियाँ लेकर खुद को बहला लेती थी .

यह सच है कि आदमी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाये , कितना भी आधुनिक और हिम्मती क्यों न बन जाये , लेकिन जब वो बीमार पड़ जाता है , तो एक बच्चे की तरह असहाय हो जाता है - - - और उस वक्त उसे माँ जैसी किसी ममता व त्याग की मूर्ति की सख्त जरूरत पड़ती है . और उन्हीं दिनों - - - इन बीमारी के दिनों में गुलशन भली - भाँति अनुभव कर रहा था कि गेसू माँ हो गयी - - - फिर नर्स , दोस्त , प्रिया और पत्नी . और औरत एक साथ इतना कुछ हो सकती है - - - ये उसने पहली बार देखा , जाना और महसूस किया था .

आज भी ! दर्द से दोहरा गुलशन पूरी रात सो न सका .

सुबह के समय , गुलशन को सुलाकर - - - न चाहते हुए भी गेसू को नींद की झपकी लग गयी . वह स्टूल पर बैठे - बैठे पलंग पर सो रहे गुलशन के पैरों पर सिर रखकर नींद की वादियों में खो गयी . सो गयी .

गुलशन की आँख खुली तो उसने देखा कि गेसू उसके दोनों पैरों के बीच अपना थका उदास चेहरा छुपाये नींद की चादर ताने पड़ी है . उसकी इस मुद्रा को देखकर उसे अनुभव हुआ कि वह बेकार ही अपने आप को आजतक अकेला समझता रहा . वो अकेला नहीं है . दुनिया में उसके आगे पीछे भी कोई है . सोचते - सोचते सुप्त गेसू को निहारते - निहारते उसका मन गेसू के प्रति एक अजीब सी अनुभूति से ओत - प्रोत हो गया . इस अनुभूति का नाम तलाशते - तलाशते उसकी आँखें भर आयीं .

वो बिना पैर हिलाए , हाथों का सहारा लेकर , कमर के बल धीरे से उठ बैठा और पंखे के तेज शरारती झोंकों की छेड़खानी से बिखर गये गेसू के बालों को समेट कर उसकी कनपटी में हौले से फंसाने लगा . उसका दिल चाह रहा था कि वह गेसू को अपने सीने से लगा ले . मगर फिर - - - न जाने क्या सोचकर उसने गेसू की पलंग पर खुली पड़ी हथेलियों को धीरे से चूम लिया . और तभी - - - उसकी सीप सी आँखों से कुछ नर्म - गर्म मोती छलक कर गेसू की हथेलियों पर बिखर गये .

हाथों में कुछ गुनगुनी सी गर्मी अनुभव करते ही गेसू कीं कच्ची नींद चिटक गयी . उसे जागा देखकर गुलशन ने जल्दी से अपने मुंह को उसकी हथेलियों से दूर कर लिया और कुछ सोचने की सी मुद्रा बना ली .

सब कुछ जान - समझ कर भी गेसू अनजान बनते हुए बोली -- " क्या सोच रहे हो दोस्त ? "

" सोच रहा हूँ ! तुम्हारे इतने रूप !! गेसू - - - मैं तुम्हें आज तक समझ न सका . "

" वह फीकी हंसी बिखेर कर बोली -- " औरत कभी भी समझ में नहीं आ सकती मेरे दोस्त ! मर्दों को उन्हें समझने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिये . "

" हाँ गेसू - - - हाँ . तुम ठीक कहती हो शायद . " वह रुंधे कंठ से बोला .

और तभी - - - जैसे धीरज कहीं अस्त हो गया . जैसे विवेक मचल उठा . जैसे मन का बाँध टूट गया - - - और तभी गुलशन ने अधीर होकर , कंधे की पीड़ा की परवाह किये बिना , उसे अपनी बाहों में बांधकर उसके रेशमी गालों को चुम्बनों से मालामाल कर दिया .

गेसू फफक कर रो उठी - - - और उसने खुद को गुलशन की बाहों में ढीला छोड़ दिया . उसी के भरोसे . उसी की मरजी पर .

कुछ देर बाद !

गेसू ने पूछा -- " गुलशन पता चला है कि पायल ने तुम्हारे सामने शादी का प्रस्ताव रखा था . तुमने क्यों मना कर दिया ? पहले तो तुम उससे शादी के लिए बेहद उतावले हुआ करते थे . उसके प्रति कितने भावुक थे . '

" गेसू भावुक तो उसके प्रति मैं आज भी बहुत हूँ . किन्तु जहाँ तक मैंने समझा - - - पायल की पहली पसन्द तो आज भी चंचल ही है . मैं तो उसकी हमदर्दी अथवा विवशता वश उपजा विकल्प मात्र हूँ . जबकि उसे इस प्रकार इस रूप में पाने की तमन्ना तो मैंने कभी न की थी . और वैसे भी - - - इधर बीच , धीरे - धीरे मेरे विचार अब करवट बदलने लगे हैं . या यूं कहो मेरी तन्द्रा टूटने लगी है . अब धीरे - धीरे मेरी समझ में आता जा रहा है कि भावना और यथार्थ में काफी लम्बा फासला है . पहले शायद मैं भूल कर बैठा था और यथार्थ की महत्ता को अनदेखा करके भावनाओं को महत्व दे बैठा था . और उन्हीं जरूरत से ज्यादा भावना वश संचालित मेरे व्यवहारों ने मुझे रुलाया भी बहुत . "

" लेकिन मैं तो अच्छाई इसी में समझती हूँ कि तुम्हें पायल का प्रस्ताव मान लेना चाहिए था . "

" माना तो है . हाँ - - - ये बात और है कि आंशिक रूप से -- चंचल से उसका विवाह न हो पाने की दशा में . और मैं समझता हूँ कि उस वक्त की परिस्थितियों को देखते हुए , मेरे इस निर्णय के नीचे यथार्थ की बुनियाद है . और - - - . "

और इससे पहले कि गुलशन कुछ और कहता - - - कि बाहर से डाकिये की आवाज़ आयी -- " पोस्ट - मैन - - - रजिस्ट्री ले लें . "

गुलशन चौंक कर बुदबुदाया -- " कैसी रजिस्ट्री ! " उसने गेसू से कहा -- " जाओ - - - बाहर जाकर ले लो . "

गेसू बाहर चली गयी .

थोड़ी देर में वो लिफाफा लेकर लौटी और उसने उसे गुलशन को पकड़ा दिया .

गुलशन प्रेषक का नाम देखकर चौंका - - - और फिर बेहद फुर्ती से उसे खोलकर भीतर रखा कागज़ पढ़ने लगा . इसके बाद पागलों की तरह ख़ुशी से झूमकर गेसू को बाहों में लेकर नाचने सा लगा .

उसकी ख़ुशी देखकर गेसू भौचक्की रह गयी . उसने अपने को उसकी बाहों से आज़ाद करा कर पूछा -- " क्या बात है दोस्त ! क्या पढ़ लिया - - - जो अचानक आज पहली बार इस कदर बम - बम हुए जा रहे हो ? "

" बात ही कुछ ऐसी है गेसू . " उसने उसे पुनः अपनी बाहों में खींच कर कहा -- " मुझे नौकरी मिल गयी . एक आकर्षक नौकरी . अब जाना - - - भगवान के घर देर है - - - अन्धेर नहीं . "

" स - - - च ? " गेसू ने आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी में पूछा .

गुलशन चहका -- " हाँ गेसू - - - सच . मुझे नौकरी मिल गयी . अब मै बेरोजगार नहीं रहा . मेरा चयन प्रतिष्ठित बहु राष्ट्रीय कम्पनी में एक बड़े अधिकारी के रूप में हो गया . अब जाकर निश्चिन्त हुआ . लगता है , सही समय आ गया है . देखो तो - - - बदसूरत ज़िन्दगी अचानक कैसी खूबसूरत करवट ले लेती है . "

" हाय - - - मुझे तो विश्वास ही नहीं आ रहा , अपने कानों पर . क्या तुम प्रतियोगिताओं में बैठते थे ? "

" तो क्या तुम समझती हो कि डूब रहा आदमी अपनी पूरी ताकत से हाथ पाँव नहीं मारता ! "

" गुलशन ! मै तो सचमुच आश्चर्यचकित हूँ - - - यह खबर सुनकर . "

" तुम्हारे लिए इससे भी आश्चर्य की एक सुखद बात और सुनाऊँ ? "

" क्या ? जरा जल्दी बताओ . "

" तुम्हें नहीं मालूम कि इस पद के लिये साक्षात्कार देने दूर दूसरे शहर मै तुम्हारे पड़े मिले रुपयों की मदद से ही गया था . सच्ची - - - तुम मेरे लिये बड़ी भाग्यशाली साबित हुई . अगर ऐन वक्त पर संयोगवश तुम्हारे पड़े मिले रूपये सहारा न देते तो निश्चित ही आज मुझे ये सुखद दिन देखने को न मिलता . सच ही है - - - कोई - कोई किसी के लिये कितना शुभ होता है . "

यह सुखद संयोग सुनकर वह और भी फूलकर कुप्पा हो गयी और बोली - " गुलशन ! मेरे दोस्त !! ईश्वर तुम्हें खूब आगे बढ़ाये . " इतना कहकर वह गुलशन की बाहों से चिपक कर मुस्कराते हुए पुनः बोली -- " मेरे पेट में स्त्री सुलभ अफारा हो रहा है . मैं तो चली - - - घर पर सबको यह खुशखबरी सुनाने . "

वह फुर्र से किसी चिड़िया की भाँति दरवाजे के बाहर हो गयी और अपने पीछे एक ऐसी ख़ुश्बू छोड़ गयी - - - जो सिर्फ तरुणियों के बदन से ही आती है -- और वो भी किसी - किसी के .

प्रोफ़ेसर साहब अपने इर्द - गिर्द तेजी से घट रहे घटनाक्रम पर पैनी निगाह गड़ाये उसका सूक्ष्म विश्लेषण कर रहे थे . वो अभी तक मौन साधे थे तो सिर्फ इसलिए क्योंकि अच्छी तरह जानते थे कि हर बात को कहने का एक उचित अवसर होता है . समय से पहले या बाद में कहे जाने पर महत्वपूर्ण बात अपना प्रभाव खो बैठती है . अब जबकि घटना चक्र काफी कुछ ठहर गया था तो उन्होंने एकान्त तलाश कर चंचल से दो टूक बात कर लेना उपयुक्त समझा .

उन्होंने चंचल से कहा -- " बेटा ! मैं तुमसे तुम्हारे विषय में कुछ बात करना चाहता हूँ . "

" मेरे विषय में ! " चंचल ने पूछा -- " कैसी बातें ? "

" पायल से तुम्हारे विवाह - सम्बन्धी बातें . "

" लेकिन इस सन्दर्भ में अब कौन सा पक्ष बचा है बात करने का ? क्योंकि मैंने तो फैसला कर लिया है , शादी न करने का . "

" यही तो वह पहलू है , जिस पर मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ . "

" क्यों - - - क्या मैं अपनी ज़िन्दगी के व्यक्तिगत फैसले भी स्वयं नहीं ले सकता ? "

" बेटे ! कोई भी ऐसा फैसला या कार्य जिससे दूसरों को असुविधा हो , वह व्यक्तिगत हो ही नहीं सकता . "

" फिर तो - - - आपके हिसाब से मैं अपनी ज़िन्दगी के अहम् निर्णय भी अकेले नहीं ले सकता . चलिए - - - आप ही बताइये - - - आप को क्या लगता है - - - क्या मेरा फैसला गलत है ! "

" तुम्हारा फैसला गलत है अथवा सही - - - यह विषय गौण है . पहला और मुख्य प्रश्न तो ये है कि कोई फैसला करने का फैसला तुम अकेले ने कैसे ले लिया . "

" पिताजी ! घुमा - फिरा कर आप मुझसे यही अपेक्षा तो कर रहे हैं कि मैं स्वयं से सम्बंधित महत्वपूर्ण निर्णय भी अकेले न लूं . "

" अवश्य लो . लेकिन क्या ये अनुचित नहीं कि सामूहिक रूप से लिए गए किसी पारिवारिक निर्णय को तुम बिना विचार - विमर्श के अकेले ही उलट दो ! क्या तुम्हारा ये आचरण हम लोगों के लिए असुविधा जनक न होगा ! "

" क्या मतलब ! मैं आपका तात्पर्य नहीं समझा . "

" मेरे कहने का सीधा सा अर्थ ये है कि जब तुम्हारे अकेले के अनुरोध पर हमारे पूरे परिवार ने तुम्हारी व पायल की शादी का सामूहिक निर्णय लिया था , तो तुम्हारे अकेले द्वारा ही मनमाने तरीके से , बिना हम लोगों को भरोसे में लिए , हमारी सहमति की परवाह किये बगैर , उसे बदल दिया जाना कहाँ तक नीति - सम्मत है ? क्या ये आचरण परिवार की अनदेखी करना नहीं है ? "

" आपकी बात सही है और इसका मुझे खेद है . किन्तु मेरा निर्णय गलत है क्या ? "

" कम से कम तुम्हारी नज़र में तो नहीं है गलत . लेकिन जहाँ तक मेरा विचार है , वो तुम्हारे निर्णय से भिन्न है . बेटे ! खूब आगा- पीछा सोच समझ कर संक्षेप में मैं ये कहना चाहता हूँ कि तुम पायल से शादी कर लो . गेसू की भी यही इच्छा है . "

" पिता s s s जी - - - आप - - - . "

" हाँ - - - मेरी यही सलाह है . और ये एक ऐसे आदमी की सलाह है , जिसने दुनिया को तुमसे अधिक देखा , जाना और समझा है . इसीलिए मैं चाहता हूँ कि तुम पायल से शादी कर लो . "

" पिताजी ! यह आप कह रहे हैं ! ! ये जानते हुए भी कि किसी बदमाश के हाथों उसकी इज्जत लूटी जा चुकी है . "

" लेकिन इसमें उस बेचारी का क्या दोष ? उसका सहयोग तो नहीं था उस कार्य में ? "

" मगर पिताजी ! पायल किसी पर पुरुष के संपर्क में - - - ."

" चंचल बेटे ! स्त्री को देह के दायरे में बाँध कर परिभाषित मत करो . देह से परे भी उसका अपना एक अस्तित्व होता है . घटनावश देह मैली होने का मतलब चरित्र मैला होना कतई नहीं . वैसे भी ये तुम नहीं , तुम्हारे भीतर समाज द्वारा भरे गए अधकचरे पूर्वाग्रह बोल रहे हैं . अछूती कन्या से ही विवाह का प्राविधान तो हमारे सभ्य समाज ने व्यक्ति को निरंकुश होने से बचाए रखने के लिए बनाया है . यदि ऐसा नियम न हो तो लोग अव्यवस्था उत्पन्न कर दें . भावनाओं पर नियंत्रण न रखकर खुलकर खेलने लगें . किन्तु अपवादों में तो नियम लागू नहीं होते . वहां शिथिलता स्वीकार्य होती है . पायल के साथ घटी घटना तो एक अनैच्छिक विवशता थी . वो अपवाद की श्रेणी में है . आखिर पाश्चात्य देशों में भी तो औरतें अपने जीवन में प्रायः कई - कई शादियाँ करके नये - नये आदमियों के संपर्क में आती हैं . वहां ऐसी औरतों से सहर्ष शादी करने वालों की पर्याप्त संख्या है . यह तो मात्र सोचने का फर्क है . "

" किन्तु सोचने का ये अन्तर तो भिन्न - भिन्न समाजों की देन है . पाश्चात्य व भारतीय समाज की सोच का फर्क आपसे छुपा तो नहीं . पिताजी ! जरा सोचिये !! हम जिस तरह के समाज में रहते हैं , यदि उसे मालूम पड़ा तो मेरी सामाजिक स्थिति पर भी तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा . लोग क्या कहेंगे ! "

" चंचल ! लोग क्या कहेंगे - - - इस दायरे में सोचना साधारण आदमी की बहुत बड़ी कमजोरी है . इसका उसे प्रतिपल मूल्य चुकाना पड़ता है . ऐसा सोचने वाला व्यक्ति झिझकने और व्यक्त न हो पाने के कारण अपने जीवन में कुछ ख़ास नहीं कर पाता . जबकि मैंने तुम्हें साधारण नहीं बल्कि कुछ ख़ास बनाने के लिये , तुम्हारे व्यक्तित्व को निजता प्रदान करने की नीयत से , तुम्हें उच्च शिक्षा दिलवाई थी . यह सोचकर कि उच्च शिक्षा मनुष्य की सोच को विशिष्ट एवं लचीला बनती है . उच्च शिक्षित व्यक्तियों के विचारों का दायरा व्यापक हो जाता है . ऐसे लोग अपनी पहल पर सामाजिक विचारों को परिष्कृत करने का निरन्तर प्रयास करते हैं और अपने विवेक के कहे अनुसार अपनी इच्छाओं से अपनी शर्तों पर जिन्दगी जीकर समाज में अपनी स्वतन्त्र पहचान स्थापित करते हुए समाज के लिये नये व्यवहारिक मार्ग प्रशस्त करते हैं . "

" हुंह - - - अपना जीवन , अपने अरमान , अपनी पहचान - - - . पिताजी ! ये शब्द बोलने - सुनने में जितने आसान लगते है , वास्तव में उतने हैं नहीं . कोई भी व्यक्ति स्वयं अपनी सोची - चाही ज़िन्दगी भला जी ही कितनी पाता है . अगर ध्यान से देखें तो हम पूरी उम्र प्रायः दूसरों द्वारा थोपी हुई ज़िन्दगी ही तो जीते हैं .क्योंकि हर पल छिन हमें यही विचार तो घेरे रहता है कि लोग क्या सोचेंगे , समाज क्या कहेगा . और इस प्रकरण में तो मेरी शर्तिया सोच ये है कि लोग मेरा नाना प्रकार से प्रबल विरोध करेंगे . राह चलते मज़ाक उड़ाकर मेरा जीना हराम कर देंगे . "

" बेटे ! समाज में प्रारम्भिक व सर्वाधिक विरोध तो निकटतम लोग ही करते हैं . उन्हीं का प्रश्रय पाकर विरोध समाज में विस्तार पाता है . जबकि हम - - - जो तुम्हारे निकटतम हैं - - - परिवार के रूप में समाज की सूक्ष्मतम इकाई हैं - - - जब हमारा हार्दिक सहयोग और अभयदान तुम्हारे साथ रहेगा , तो वह प्रतिपल तुम्हें संबल प्रदान करेगा . सोचो ! अगर तुम पर कोई टीका - टिप्पणी करेगा भी , तो इस निर्णय में सम्मिलित रहने के कारण तुम्हारा पूरा परिवार स्वाभाविक रूप से इसे सहने में साझीदार रहेगा , जो तुम्हारे लिये निश्चित ही ढाल का काम करेगा . हम सब मिल - जुल कर परिस्थितियों का सामना करेंगे . एक बात जान लो बेटा ! समाज में बनी - बनायी लीक से हटकर जो साहसी लोग कुछ नया व अटपटा करते हैं - - - इतिहास गवाह है कि समाज का जो वर्ग पहले उनकी खिल्ली उड़ाता है , फिर भी वह निडर यदि डटा रहे तो उसे धमकाता और बातों व हाथों के पत्थर से मारता है . इसके बावजूद भी वह नहीं डिगे तो वही विरोधी समाज भीड़ की शक्ल धारण कर उसकी जय - जयकार करता हुआ उसी के पीछे चल निकलता है . "

" मगर क्या मेरा यह आचरण सामाजिक नीति के विरूद्ध न होगा ? '

" बेटे ! क़ानून जिसकी अनुमति देता है , वह कार्य नीति - विरुद्ध हो ही नहीं सकता . क्योंकि क़ानून के निर्माता नीति के मर्मज्ञ एवं बहुसंख्य समाज की भावना के प्रखर प्रतिनिधि होते हैं . और फिर - - - अब तुम समाज की इतनी चिन्ता क्यों करते हो ! अब तो सूचना के प्रमुख स्रोत को ही गुलशन ने ख़त्म कर दिया है . फिर तुम्हें काहे का भय ! कहीं ऐसा तो नहीं कि समाज के संभावित उलाहने की आड़ लेकर अपने पूर्वाग्रह विशेष के चलते तुम पायल को त्यागने का प्रयास कर रहे हो ! यदि तुम्हारे मन में ऐसी कोई छुपी भावना हो तो ज़रा विचार करो कि यदि कहीं विवाह के उपरान्त पायल के साथ ऐसा कोई हादसा हो जाता तो क्या तुम उसे ऐसी आसानी से छोड़ सकते थे ! तब यही समाज आड़े न आ जाता क्या ? इसलिए मैं फिर कहूँगा कि यदि तुम इन जटिल परिस्थितियों में पायल से शादी कर लेते हो तो उसके मन में निश्चित ही तुम्हारा दर्जा बढ़ जाएगा . वो सारी उम्र तुम्हारे पाँव धोकर पीयेगी . सो अक्लमन्दी इसी में है कि परिस्थितियों के अनुसार ढलना सीखो . वक्त हाथ से निकल गया तो पूरी उम्र हाथ मलते गुज़र जायेगी . बेटे ! अगर गंभीरता से ली जाय तो ज़िन्दगी शतरंज की बिसात से कम नहीं , जहाँ पर एक गलत चाल भी पूरा खेल बिगाड़ देती है . इसीलिए जोर देकर कहता हूँ कि सही राह पर लौटने के लिये कभी भी देर नहीं होती बल्कि हर वक्त सही होता है . इसलिये अब और अधिक देर न करो . जाओ - - - जाकर पायल का हाथ थाम लो . मुझे पूरा भरोसा है - - - सब ठीक हो जायेगा ."

" मगर पिताजी ! आप इतने आत्म विश्वास के साथ कैसे कह रहे हैं कि अन्ततोगत्वा सब कुछ ठीक हो ही जायेगा ? "

" बेटे ! आत्म विश्वास अनुभवों से उत्पन्न होता है और अनुभव बढ़ती उम्र के साथ स्वतः बढ़ते रहते हैं . साथ ही बड़ों के बीते हुए कल के अनुभव छोटों का आज संवारने में काफी सहायक हो सकते हैं . बशर्ते छोटे अपने से बड़ों का विश्वास करके उनके अनुभवों का लाभ उठायें . "

" पिताजी ! फ़िलहाल मैं कुछ सोचना चाहता हूँ . क्योंकि अभी मेरी मनःस्थिति दुविधा और भ्रम से भरी है . मुझे थोड़ा सोचने का अवसर दीजिये . "

" हाँ - हाँ - - - जरूर सोचो . खूब सोचो . लेकिन जब इस विषय में सोचना तो यह भी जरूर सोचना कि आखिर वो कौन से मानवीय कारण हैं , जिसके वशीभूत होकर गुलशन ने पायल के लिये इतना बड़ा जोखिम उठाया . "

" हाँ पिताजी ! ये प्रश्न तो मुझे कई दिनों से मथ रहा है और मैं चकित हूँ . किन्तु मैंने सोचा कि गुलशन की तबीयत सही हो जाने के बाद ही इसका उत्तर मैं उसी से पूछूंगा . "

" बेटे ! तुम सोचते ही रह गये और मैंने गेसू के माध्यम से इसका उत्तर तलाश भी लिया . "

" क्या ? "

" सुनो ! गुलशन व पायल कभी सहपाठी थे . कॉलेज के दिनों से ही गुलशन पायल को एकतरफा प्यार करता था . किन्तु उसमे जीवन साथी की व्यवहारिक छवि न पाकर पायल केवल दोस्ती तक ही सीमित रही और बाद में तुमसे प्यार करने लगी . सब कुछ जानते - समझते हुए भी उस सच्चे प्रेमी ने विपत्ति में पायल की निस्वार्थ सहायता करके अपना कर्तव्य बखूबी निभाया . मेरे ख़याल से - - - अब तुम्हारी बारी है - - - अपना धर्म निभाने की . अगर तुमसे बन पड़े तो . "

इतना सुनकर अवाक रह गये चंचल की आँखों में गुलशन के प्रति श्रद्धा पसीज उठी और उसके मस्तिष्क में उठी भावनाओं की आँधी ने उसके क़दमों को कमरे के बाहर ठेल दिया .
 
यह सत्य है कि व्यक्ति ऐसे लोगों की बातों को अपेक्षाकृत आसानी से और शीघ्र मानता है जो उसके आदर्श होते हैं और जिनकी वह इज्जत करता है . क्योंकि अतीत के अनुभवों के आधार पर वह आश्वस्त रहता है कि वो उसके शुभ चिन्तक हैं और किसी भी दशा में उसे गलत सलाह नहीं देंगे .

यही चंचल के साथ हुआ .

अपने पिताजी के साथ हुई वार्ता विशेष के सन्दर्भ में काफी चिंतन - मनन करने के पश्चात चंचल के मस्तिष्क में एक वैचारिक क्रान्ति सी आ गयी थी . आमूल चूल परिवर्तन उत्पन्न हो गये थे . पिता द्वारा प्राप्त संबल एवं गुलशन के त्याग ने उसके दिग्भ्रमित मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव छोड़ा कि उसने अपने मन में खुद के पूर्व निर्णय को रद्द करके पायल को अपनाने का विचार दृढ़ कर लिया .

अब उसे पायल के प्रति पिछले दिनों किये गये अपने निष्ठुर व्यवहार पर अत्यधिक ग्लानि हो रही थी . एक अपराध - बोध ने बसेरा कर लिया था उसके मन - मस्तिष्क में . वह सोच रहा था कि पता नहीं उसके कठोर आचरण से घायल पायल उसको क्षमा करेगी भी या नहीं .

उस अनुभवहीन को अभी ये नहीं मालूम था कि बेचारी आम औरत के पास चाहे - अनचाहे क्षमा करने के अतिरिक्त दूसरा चारा भी क्या है . युगों - युगों से वो विकल्पहीन विवशता वश पुरुषों को क्षमा ही तो करती आ रही है और पुरुष सदा यह कहकर उसे बहलाता आ रहा है कि स्त्री क्षमा की देवी है - - - महान है . बड़े लीलाधर होते हैं पुरुष .

गुलशन के साथ किये गये शुष्क व्यवहार पर भी चंचल को अब बहुत पश्चाताप हो रहा था . उसने निर्णय कर लिया था कि वह अवसर मिलते ही गुलशन से अपने आचरण के प्रति खेद व्यक्त करेगा . उसे पूरी आशा थी कि गुलशन उस प्रकरण को बिसार देगा . क्योंकि उसकी नज़र में वो विशालमना है . ऐसे व्यक्ति तो क्षमा करने और भूल जाने की आदत के चलते निरंतर महान और सर्व प्रिय होते चले जाते हैं .

लेकिन वो पायल का क्या उपाय करे . वह तो औसत व्यक्तित्व की ही स्वामिनी है . पता नहीं उसके शुष्क व्यवहार का तीर उसने अपने कोमल ह्रदय में कितने गहरे तक अनुभव किया है . और जब दिल टूटता है तो सीधे दिमाग पर असर पड़ता है . कहीं सामान्य व्यक्ति की सी प्रतिक्रिया स्वरूप चोट खाकर उसके मस्तिष्क में विद्रोह ने जन्म तो नहीं ले लिया .

अपराध बोध के सशंकित साए तले वह उस पल की निरन्तर प्रतीक्षा कर रहा था - - - जब अनुकूल एकान्त पाकर वह पायल से वार्ता का साहस जुटा सके .

और ईश्वरीय अनुकम्पा से शीघ्र ही ऐसा समय आ गया .

इस वक्त घर में केवल चंचल और पायल ही थे . उदास पायल सूने आँगन में रखे एक गमले में लगे हुए अपनी तरह लगभग मुरझा चुके पौधे को पानी देने जा रही थी .

दबे पाँव चंचल भी उसके पीछे सकुचाकर खड़ा हो गया .

चंचल की समझ में नहीं आ रहा था कि वह संवाद को कहाँ से व कैसे शुरू करे . ये द्वन्द उसके मन को मथ रहा था . सच तो ये था कि इतने दिनों की निष्ठुरता के बाद उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी कि वह पायल से बात करे .

थोड़ी देर तक यूँ ही खड़ा - खड़ा वह पायल के बेरौनक हो चले बदन को देखता रहा और फिर कुछ हिम्मत जुटाकर उसके कन्धे पर पीछे से थपकी देकर किसी तरह शब्दों के धक्के से अधर खोलकर बोला -- " चलो - - - जल्दी से तैयार हो जाओ पायल . "

" क्यों ? " पायल ने पलटकर आश्चर्य से पूछा . जबकि उसका हाथ गमले में पानी छोड़ने से पहले ही झुका का झुका रह गया .

" चलना नहीं है क्या ? "

"कहाँ ? " वह वैसे ही हाथ झुकाए - झुकाए मुंह उसकी तरफ करके बोली .

" बाज़ार . आखिर सारी खरीददारी हम ही लोगों को तो करनी है . शादी की तारीख कितनी नज़दीक आ गयी है हमारी . "

ये सुनते ही पायल के हाथ में थमा पानी का बर्तन लगभग सूख रहे पौधे वाले गमले में खुद - ब - खुद गिर पड़ा और गमला पानी से सराबोर हो उठा . साथ ही उसके कुम्हलाये चेहरे पर अचानक एकबारगी सावन की हरियाली सी छा गयी .

उसके हाथ तेजी से थरथराये और मुंह से निकला -- " क्या - - - सच - - - चंचल ? "

" हाँ पायल ! - - - हाँ . बिलकुल सच . " चंचल ने अपनी बाँहें फैला दीं . "

" पायल उससे लिपटकर उसकी बाहों में समा गयी - - - जैसे उसे इसी पल का सदियों से इन्तजार था . उसके मुंह से हलकी सी आवाज़ निकली -- " चंचल ! मेरी ज़िन्दगी !! तुम मेरी रूठी हुई किस्मत हो . मेरा खोया हुआ चैन हो . तुम मिल गए - - - मुझे सुकून मिल गया . अब मुझे और कुछ न चाहिए चंचल . कुछ भी नहीं . "

उसकी डबडबायी आँखों से आंसुओं की फागुनी पिचकारियाँ छूट पड़ीं और वो अपनी दृष्टि ऊपर नीले - चमकीले आकाश में जमाये रही - - - जहाँ उसके प्यार के बिखरे घोसले का तिनका - तिनका फिर से इकठ्ठा हो रहा था . बड़े खूबसूरत आकार में .

चंचल ने पायल का माथा चूमकर कहा -- " मुझे माफ़ कर दो पायल . मैंने तुमको बहुत सताया . "

मगर पायल ने कुछ भी न सुना . वो तो चंचल के सीने से सटी हुई एक नई ज़िन्दगी के सुनहरे सपने बुनती हुई खुशियों के समन्दर में हिलोरें ले रही थी . अब उसका मुरझाया हुआ चेहरा ऐसे खिल उठा था , जैसे किसी सूख रहे पौधे को पानी मिल गया हो .

पायल से विवाह हेतु चंचल के राजी हो जाने का समाचार गुलशन को मिल चुका था और वह ठीक से समझ नहीं पा रहा था कि यह समाचार उसके लिए सुखद है या दुखद . काफी माथा - पच्ची के पश्चात उसने ऐसी दुविधा के विशेष क्षणों हेतु सर्वोत्तम तरीका अपनाते हुए तटस्थ भाव से सब कुछ ईश्वर के हाथ छोड़ दिया और अपने उदास कमरे में बैठा अपने भावी जीवन की रूप रेखा तैयार करने लगा .

आज न जाने क्यों उसके तन - मन में यह बात बार - बार और बड़ी जोर - जोर से कुलबुला रही थी कि घरनी बिन घर भूत का डेरा . आज उसे अपना ही घर भांय - भांय करता नजर आ रहा था . उसकी इच्छा हो रही थी कि उसे भी अपना घर अब बसा ही लेना चाहिये . गेसू उसे कितना चाहती है - - - वह भी उस समय से , जब वह कुछ भी नहीं था . खूब जानी समझी लड़की है . बुरे दिनों की अच्छी प्रमाणिक संगिनी . सुघढ़ - सफल पत्नी के लगभग सभी गुणों से युक्त है . हाँ - - - निश्चित ही यही चयन सर्वोत्तम रहेगा . आज ही जाकर गेसू को अपने निर्णय से अवगत कराकर आश्चर्य चकित कर दूंगा . ख़ुशी से गदगद हो उठेगी वह तो .

तभी गेसू उसके कमरे में दाखिल हुई . लगता है उसकी उम्र बहुत लम्बी होगी . तभी तो याद करते ही आ धमकी थी . ख़ुशी से चहकते हुए गुलशन ने उसे हाथों हाथ लिया .

थोड़ी देर तक औपचारिक बातचीत करते रहने के पश्चात अचानक गेसू बन्दूक की तरह दग पड़ी -- " दोस्त ! पिताजी ने मेरी शादी तय कर दी है . उनका कहना है कि चंचल - पायल के साथ - साथ मेरे भी हाथ पीले कर देंगे . "

उसकी बात की चोट से गुलशन की सारी सोच ही जैसे छितरा गयी . मानो पहाड़ टूट पड़ा हो उस पर . उसका तो चेहरा पीला पड़ गया . वह चौंक कर बोला -- " और तुमने हाँ कर दी ? "

" क्या करती ! चाहती तो बहुत थी कि मेरी शादी तुमसे ही हो - - - प्रयास भी कुछ कम नहीं किये - - - मगर तुम्हारी ढुल मुल नीति के कारण मुझे पिताजी की बात माननी ही पड़ी . गुलशन ! मेरे दोस्त !! इधर बीच मैं अनुभव कर रही थी कि मेरे लिए तुम्हारे इंतज़ार की मोमबत्ती अधिक दिनों तक चलने - जलने वाली नहीं . लौ बुझने से पहले मैं अपना रास्ता ढूंढ लेना चाहती थी . "

गुलशन को तो जैसे काठ ही मार गया था .

गेसू कहती रही -- " और चारा भी क्या था ! ये तो तुम जानते ही हो कि औरत इन्तज़ार कर सकती है , उसकी जवानी नहीं . और जीने के लिए कोई स्थायी सहारा तो चाहिये ही . आखिर कब तक तुम्हारा इन्तज़ार करते - करते अपनी उम्र को घुन लगाती . उम्र गुज़र जाने के बाद मुझे कौन पूछता ! "

गेसू इतना कह गयी - - - मगर गुलशन तो कुछ और ही सोच रहा था . उसके चुप हो जाने पर उसने कहा -- " गेसू ! "

" क्या ? "

" एक बात पूछूं ? "

" पूछो . "

" आदमी जिस मकान में रहने की तमन्ना करे , उसकी छत अगर गिर जाये , तो क्या दूसरी छत नहीं डाली जा सकती ? "

" हाँ - हाँ - - - क्यों नहीं ! जरूर डाली जा सकती है दूसरी छत . "

" तो क्या - - - तुम दूसरी छत डालने में मेरी मदद करोगी ? '

इतना कहते - कहते हवा से डरे दीपक की लौ की तरह गुलशन की मार्मिक आवाज़ काँप उठी और गेसू उसकी औचक बातों का अर्थ निकाल उसे आठवें आश्चर्य की तरह भौचक देखने लगी . गेसू ने कुछ कहना भी चाहा मगर आवाज़ दगाबाजी कर गयी . ये वो क्षण था , जब शब्दों की संपत्ति समाप्त हो जाती है और सशक्त भाषा अशक्त होकर मौन हो जाती है .

गेसू को लग रहा था , जैसे अचानक उसके चारों ओर एक साथ हज़ारों फुलझड़ियाँ और पटाखे फूट पड़े हों . जैसे सैकड़ों झरने एक साथ गुनगुना उठे हों . जैसे समूचा आर्केस्ट्रा उफान पर आ पहुंचा हो . उसका तन - मन खुशियों के नगमें अलापने लगा और उसकी तेज़ साँसे साज बनकर झंकृत सी होने लगीं .

एक बार तो उसे गुलशन की बात पर यकीन ही नहीं हुआ . मगर फिर करना ही पड़ा . क्योंकि यह दिन पहली अप्रैल का नहीं था और न ही फागुन का महीना था , जो इस तरह ठिठोली की जाय .

गुलशन की तरफ देखने पर , जिस क्षण उससे आँखें चार हुईं - - - तो उसने उन कुछ क्षणों में उतना कुछ सोच डाला , जितना की मनुष्य पूरी जिंदगी में करता है . उसने आँखों ही आँखों में गुलशन द्वारा प्रस्तावित संधि - पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये .

" मैं तुम्हारी हूँ गुलशन ! तुम्हारी . " आखिर खुशियों में आकंठ डूबी बाईस वर्ष की भरपूर जवानी बोल पड़ी -- " मुझे विश्वास नहीं हो रहा मेरे दोस्त , कि मई की ये गर्म शाम अपने दहकते हुए दामन में महकते हुए इंद्र धनुषी फूलों के ढेर भी लेकर आ सकती है . "

इतना सुनते ही गुलशन ने गेसू को गले लगाकर उसका मखमली मुंह चूम लिया और उसे लगा जैसे उसने किसी ताज़ा खिले गुलाब पर अपने होठ रख दिये हों . जबकि गेसू की कजराई पलकें मादक होकर उठीं और फिर लड़खड़ाकर झुक गयीं , मानो कोई दुल्हन सुहाग - सेज पर शर्मा रही हो .

गुलशन ने गेसू के चेहरे को अपने हाथों में लेकर आज पहली बार उसे ऊपर से नीचे तक एक विशेष नज़र से सिर्फ देखने के लिए देखा . बल्कि यूँ कहें कि उसकी आँखों ने गेसू के सम्पूर्ण शरीर को छुआ तो उसने अनुभव किया कि दुनिया की सबसे नरम और सोंधी मिट्टी से निर्मित गेसू की सम्मोहक आँखों में बंगाल का जादू और अंगों में राजस्थानी कसाव है . उसकी रंगत कश्मीर की और स्वास्थ पंजाब का है . उसमे गोवा की अल्लढ़ता और हिमांचली सरलता है . उसके चेहरे में सिक्किमी युवतियों सी अपील और बदन में महाराष्ट्रियन मछेरिनों जैसा लोच है . संक्षेप में वह काया से कामिनी , महक से पद्मिनी और कंठ से रागिनी है .

उसकी इस कवितामय सुन्दरता पर मुग्ध होकर गुलशन बोला -- " गेसू ! जानती हो - - - आज तुम मुझे कैसी लग रही हो ? "

" तुम ही बताओ ? "

" बेहद आकर्षक और कीमती औरत . " गुलशन ने उसका माथा चूमकर मुस्कराते हुए कहा .

गेसू भी हंसकर बोली -- " दोस्त ! ज़रुरत के वक्त औरत ही क्या - - - हर चीज़ आकर्षक और कीमती हो जाती है . "

इसके बाद गेसू ने उसकी बाहों से परे हटकर कहा -- " गुलशन ! मुझे लगता है - - - अब तुम्हें अनुभव हो चुका है कि पहले भावुकता और जल्दबाजी में आकर तुमने अदूरदर्शिता से काम लिया था - - - और अब तुम्हारा ये ख़याल दृढ़ हो चला है कि संसार में केवल भावुकता की बुनियाद पर आधारित प्रेम कभी सफल नहीं हो सकता . शायद तुम्हारा ये भ्रम भी दूर हो चुका है कि केवल प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है . "

" हाँ गेसू - - - हाँ . तुमने और समय ने मिलकर मुझे ये अनुभव करा दिया कि प्रेम को व्यक्ति या वक्त नहीं बाँध सकते और कोई जरूरी नहीं कि पहला प्रेम ही अंतिम और सच्चा प्रेम हो - - - बाद का प्रेम समझौता मात्र . अब मैं भली - भांति अनुभव कर रहा हूँ कि प्रथम प्रेम नासमझी भी हो सकता है . गेसू ! सच में तुम धन्यवाद की पात्र हो , क्योंकि तुमने मेरे अव्यवस्थित और भटके हुए विचारों को व्यवस्था और उचित दिशा दी . "

" अच्छा - - - एक बात बताओ दोस्त . मेरी शादी दूसरी जगह तय होने की बात जानकार क्या तुम्हें ऐसा अनुभव हुआ था कि तुम मुझसे दूर रहकर अधूरे रह जाओगे ! ठीक से जी न सकोगे ? "

" हाँ ! बिलकुल यही लगा था . बल्कि एकबारगी तो ऐसा लगा , जैसे मैं मर ही जाऊंगा , "

" धत - - - मरें तुम्हारे दुश्मन . अभी तो तुम्हारी उम्र और काया ऐसीं है कि तुम पर अनेकों मर सकती हैं . इसी भावना को - - - इसी एहसास को प्रेम कहते हैं गुलशन . यही प्यार है . चाहे यह पहला हो या फिर दूसरा . "

गुलशन चुप रहा .

अचानक गेसू ने गंभीर होकर पूछा -- " दोस्त ! सोचती हूँ - - - उस व्यक्ति के दिल पर क्या बीतेगी , जिससे मेरा रिश्ता तय हो चुका है . तुमसे शादी कर लेने पर उस बेचारे को तो बहुत दुःख होगा . "

" हाँ - - - उसे दुःख तो जरूर होगा , मगर बहुत थोड़ा . क्योंकि अभी तुम्हारे और उसके रिश्तों में प्रगाढ़ता नहीं है . और दुःख के आधिक्य का सम्बन्ध रिश्तों की प्रगाढ़ता से है . जबकि तुम्हारी व मेरी शादी हो जाने पर मुझे और तुम्हें - - - दोनों को ही बहुत अधिक ख़ुशी होगी . इस प्रकार - - - होने वाले कुल दुःख की अपेक्षा , कुल सुख की मात्रा बढ़ेगी . अंततः कुल सामाजिक कल्याण में वृद्धि ही होगी . वैसे भी वह व्यक्ति तो ख़ुशी के साथ कहीं और भी शादी कर सकता है , लेकिन मैं - - - . "

" बस - - - दोस्त बस . " गेसू ने जोर से हंसकर उसकी बात काटी और बोली -- " अब बस भी करो . यहाँ गणित की कक्षा नहीं चल रही - - - और न ही समाज शास्त्र की . अपने हक़ में आदमी पता नहीं कहाँ - कहाँ से तर्क तोड़कर ले आता है . "

उसकी सच्ची बात सुनकर गुलशन सचमुच झेंप गया .

गेसू मुस्कराकर पुनः बोली -- " दोस्त ! एक बात कहूं ? "

" कहो न . "

" मैं तुमसे झूठ बोली थी . " वह हंस दी .

गुलशन ने चौंककर पूछा -- " कब ! क्या ? "

" अभी थोड़ी देर पहले - - - जो मैंने अपनी शादी तय होने की बात बतायी थी , वह सरासर गप्प थी . " वह हंसती रही .

गुलशन आँखें फाड़कर बोला -- " स s s s च ? "

" हाँ - - - सच . वास्तव में - - - मैं वो निश्छल झूठ बोलकर अपने प्रति तुम्हारे मन के भाव जानना चाहती थी - - - और वो मैंने जान लिए . पगलू ! मेरी शादी - वादी थोड़े ही तय हुई थी . "

" अच्छा s s ! तो ये बात है . " उसने राहत की सांस ली .

" और नहीं तो क्या ! क्या तुम समझते हो कि मैंने जिसकी बुरे वक्त में अच्छी पहचान की , अच्छे समय में उसे छुट्टा छोड़ देने की बेवकूफी करती !! वैसे तुम्हारी मौन स्वीकृति तो मुझे उसी दिन मिल गयी थी , जब अपनी बीमारी के वक्त तुमने मुझे आलिंगनबद्ध किया था - - - लेकिन फिर भी मैं चाहती थी कि तुम यह बात अपने मुंह से जल्दी से जल्दी कहो . "

" और यह बात अंततः तुमने मुझसे कहलवाकर ही छोड़ी . : इतना कहकर हौले से हँसते हुए गुलशन ने गेसू के सिर पर एक प्यार भरी चपत जड़कर कहा -- " यकीन मानो गेसू ! आज मैं तुमसे शादी का प्रस्ताव स्वयं रखने वाला था किन्तु तुमने तो पहले ही स्वांग रच दिया . मानना पड़ेगा - - - औरतें वाकई बड़ी नौटंकी होती हैं . मगर ये तो बताओ - - - तुम्हें यह बात मेरे मुंह से कबुलवाने की ऐसी भी क्या जल्दी आन पड़ी ? "

" ये बात शायद तुम नहीं समझोगे . ये बात और इसकी जल्द जरूरत कोई लड़की पक्ष ही बेहतर समझ सकता है . "

" क्या मतलब ? '

"मतलब ये मेरे भोले शंकर - - - कि अब तुम्हें एक सम्मानित नौकरी मिल गयी है और ये खबर फैलते ही अनेकों लड़की वाले , जो पहले तुम्हारी तरफ नज़र उठाकर देखते भी नहीं थे , अब मधुमक्खियों की तरह तुम्हें घेरकर नाना प्रकार और प्रलोभनों से तुम्हारी मति फेरकर तुम्हें मुझसे दूर कर सकते हैं . "

" अव्वल तो इसमें कोई सफल होगा नहीं - - - और एक बार को मान लो कि यदि ऐसा हो भी जाए तो तो तुम्हें अच्छे कमाऊ लड़कों की क्या कमी ! "

" वो तो ठीक है . मेरी शिक्षा सहित मेरे परिवार का जो सामाजिक स्तर है - - - उसके हिसाब से तो मुझे तुम्हारे समकक्ष अथवा डॉक्टर - इन्जीनियर वर कभी भी आसानी से मिल सकता है . लेकिन दिल की गहराइयों तक असलियत ये है कि मैं यथासंभव तुम्हें खोने का कोई खतरा उठाना नहीं चाहती . "

" क्यों ? "

" क्योंकि तुम थोड़े से लल्लू और ढेर से नासमझ हो - - - और ऐसे लड़कों से टांका भिड़ाने से उनका शादी के बाद मनमाफिक संचालन करना काफी आसान रहता है . " इतना कहकर वह जोर से हँसते हुए बोली -- " पगलू ! हर बात न तो पूछी जाती है और न ही समझायी जा सकती है . थोड़ा - बहुत तो महसूस करने पर भी छोड़ देना चाहिये . समझे ? "

" समझा . "

" सुनाओ - - - क्या समझे ? "

वह मुंह पर कृतिम डरी मुस्कान लाकर बोला -- " यही - - - कि शादी के बाद , लगता है कि तुम मुझे दाब कर रखने की कोशिश करोगी . "

" तो इसमें कौन सी नई बात होगी ! " वह हंसकर अधिकार पूर्वक बोली -- " एक मशवरा अभी से गाँठ बाँध लो - - - अच्छे - अच्छे दारा सिंह भी घर - दाम्पत्य में शान्ति बनाये रखने के वास्ते अपनी बीबी से दबकर रहने की तरकीब अपनाते हैं . "

उसकी बिन मांगी नेक सलाह पर गुलशन अपनी तेज हंसी का फव्वारा न रोक सका . गेसू तो पहले से ही हंस रही थी .

अचानक गुलशन ने गंभीर होकर पूछा -- " गेसू ! प्रोफ़ेसर साहब क्या सहमत होंगे - - - हमारी शादी के लिये ? "

" क्यों नहीं ! उन्हें क्या आपत्ति होगी भला !! मेरी ख़ुशी ही उनकी ख़ुशी है . इन्कार करने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं दिखती . मेरे पिताजी तो वैसे भी तुम्हारी काफी इज्जत करते हैं . और फिर - - - भला ऑफिसर लड़का किसे काटता है ! ये क्यों भूलते हो दोस्त - - - कि अब तुम एक अधिकारी हो . "

" हाँ गेसू ! मुझे ज्यादा अच्छे से ये भी याद है कि तुम मुझे तब से चाहती हो , जब मैं कुछ भी नहीं था . बस - - - मलाल है तो सिर्फ इतना कि तुम्हें समझने में मुझे थोड़ी देर हुई . "

" इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं - - - क्योंकि आँखों के बहुत अधिक नज़दीक रखी किताब की लिखावट थोड़ी देर से ही समझ आती है . खैर - - - छोड़ो इन बातों को . आज एक वादा करो . "

" क्या ? "

" ये - - - कि अब तुम कभी शराब न पियोगे . "

" अरे - - - ये कौन सी असंभव बात है . चलो वादा रहा - - - अब कभी भी बोतल वाली शराब न पियूंगा . अब दूसरी शराब जो मिल गयी है . "

" कौन ? '

" तुम . तुम क्या शराब से कोई कम नशीली हो ! खूबसूरत लड़कियों का साथ अपने आप में एक नशा होता है . " उसने गेसू के गाल पर एक थपकी मारी .

गेसू शरमाकर बोली -- " धत . "

और इसी के साथ अचानक जैसे गेसू को कुछ ध्यान आ गया . उसने पूछा -- " ये बताओ ! क्या नौकरी से सम्बंधित तुम्हारी कोई ट्रेनिंग भी होगी ? "

" हाँ . एक खूबसूरत पहाड़ी इलाके में . अगले महीने जाना होगा . "

" स s s s च ! " गेसू ख़ुशी और मजाक के सम्मिलित स्वर में बोली -- " तब तो जल्दी से शादी करके कुछ दिनों के लिये मुझे भी अपने साथ लेते चलना . दोस्त ! शायद दयालु भगवान की भी यही मर्ज़ी है कि हम दोनों का हनीमून खूबसूरत वादियों में जोरदार और खूबसूरत ही मने . "

" हो बड़ी बदमाश . " कहकर गुलशन ने गेसू को अपनी बांहों में समेट लिया और बोला -- " डियर ! सुना है - - - उस स्थान पर प्रकृति ने अपने जलवे बिखेर रखे हैं . "

" गेसू ने गुलशन की आँखों में गहरे झांककर हौले से कहा -- " डार्लिंग ! जलवों की क्या बात करते हो - - - वो तो तुम्हारे भाग्य से भगवान ने मुझे भी कुछ कम नहीं सौंपे . ज़रा शादी हो जाने दो - - - तो एक - एक करके ऐसे - ऐसे जलवे दिखाऊंगी कि तुम्हारी आँखें चुंधिया जायेंगी और तबीयत बाग़ - बाग़ हो उठेगी . "

" तुम भी न , बंद गोभी की तरह पर्त दर पर्त खुल रही हो . देखता हूँ - - - तुम दिन - ब - दिन बहुत ढीठ होती जा रही हो . जब देखो - - - बातों के पंख लगाए उड़ती फिरती हो . शादी के बाद एक - एक करके तुम्हारे सारे पंख न कतर डाले - - - तो कहना . "

उस जायकेदार जालिम घड़ी का तो सभी लड़कियों को हर घड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता है जॉनी . "

" वह खिलखिला कर हंस पड़ी . गुलशन के होठों के कोने पर भी हंसी का एक नन्हा सा जुगनू झिलमिला उठा .

( समाप्त )
 
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