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" मेरे घोंघा बसन्त ! बल - हठ ठानने से हर चीज तो प्राप्त नहीं होती . अगर मैं भी पायल की जगह होती और उसी की सी परिस्थितियों में होती तो अधिक संभावना इस बात की ही होती कि मैं भी इस भौतिक वादी युग में तुम्हारे प्रति पायल जैसा ही व्यवहार प्रकट करती . दोस्त ! मैं लड़की हूँ - - - इसलिए अच्छी तरह जानती हूँ कि कार , कोठी और वजनी बैंक - पास - बुक हर कॉलेज कढ़ी महत्वाकांक्षी लड़की का ख़्वाब होता है . कोई आश्चर्य नहीं कि ये सपना पायल भी देखती है . और फिलहाल तुम उसके इन ख़्वाबों में सच्चाई का चटकीला रंग भरने की योग्यता नहीं रखते . गुलशन ! अधिकाँश लड़कियां एक नाज़ुक लता के सामान होती हैं - - - जो सदैव संपन्न , बलिष्ठ और समीप के पेड़ का सहारा ढूंढकर उसी से लिपटती हैं - - - ऊपर चढ़ने के लिए . और ये सब गुण - - - ये विशेषताएं पायल ने तुममें नहीं , बल्कि चंचल में देखी हैं . लेकिन तुम्हें ये सब बातें इसलिए नहीं समझ आतीं क्योंकि तुम्हारे प्रेम की न आँखें हैं , न विवेक , न बुद्धि . "
" मगर फिर तुम क्यों मुझसे शादी करना चाहती हो ? "
" तुम भी न - - - नशे में एकदम घोंचू जैसे सवाल कर रहे हो . अब पूछ ही लिया है - - - तो सुनो ! मैं तुमसे इसलिए शादी करना चाहती हूँ - - - क्योंकि पहली बात तो ये है कि मैं तुम्हें पसन्द करती हूँ - - - और दूसरी बात ये है कि तुम्हारे साथ गाँठ जोड़कर मेरे भविष्य को कोई खतरा नहीं - - - क्योंकि मेरा तो एक उच्च आर्थिक स्तर पहले से ही स्थापित है और मैं अपने सहयोग से तुम्हें भी उसी स्तर तक पहुंचा सकती हूँ . मगर ये बात तुम्हारे और पायल के जोड़े पर लागू नहीं हो सकती . "
" ओह ! " उसकी दर्पण सी बातों में अपना चेहरा देखकर गुलशन काफी परेशान सा दिखने लगा .
गुलशन के मनोभावों को ताड़कर गेसू ने कहा -- " दोस्त ! जब परेशानी बढ़ जाए , तो आदमी को विचारों को मोड़ देकर खुली हवा में घूमना चाहिये . आओ चलो ! बाहर कहीं घूम - टहल आयें . "
" मन नहीं है . "
" आखिर यहाँ बैठे - बैठे करोगे भी क्या ? "
" सुबह को दोपहर , दोपहर को शाम और शाम को रात बनाऊंगा . "
गेसू उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए बोली -- " नक्शा मत मारो . अब चलो भी . मैं जो कह रही हूँ . "
गुलशन मुस्कराकर राजी हो गया . दोनों नदी किनारे सैर करने निकल पड़े .
मौसम मसूरी बन गया था . हवायें तेज और बर्फ की तरह ठंढी हो चली थीं . लगता था कि बर्फ गिरकर रहेगी .
दोनों नदी किनारे बैठकर जल - प्रवाह निहारते रहे . लगता था , कुछ सोच रहे हों .
थोड़ी देर में !
गुलशन ने गेसू से पूछा -- " क्या सोच रही हो ? "
" सोच रही हूँ , नदी भी हमें कुछ शिक्षा देती है . "
" क्या ? "
" इसका बहता हुआ नीर हमें ये सिखाता है - - - कि जीवन गतिशील होकर जिया जाता है . मगर एक तुम हो कि पायल में अटक कर रुक गए हो . " इतना कहकर उसने पूछा -- " पर तुम भी तो कुछ सोच रहे थे ? "
" हाँ - - - मैं भी नदी के विषय में ही सोच रहा था . सोच रहा था कि नदी के दोनों पाट लगातार कितने समीप रहकर भी कभी नहीं मिल सकते . जैसे कि - - - . "
" जैसे कि तुम और पायल . यही कहना चाहते हो न ? " वह उसकी बात काटने के बाद झुंझलाकर बोली .
गुलशन ने भोलेपन से स्वीकारा -- " हाँ . "
उसकी इस अदा पर गेसू की हंसी निकल पड़ी . वह बोली -- " दीवाने हो गए हो तुम . "
" मैं दीवाना सही - - - मगर एक बात बताओ , " उसने मुस्कराकर चुहल भरी भरपूर निगाह गेसू पर डाली और कहा -- " आज तुम इतनी खूबसूरत क्यों लग रही हो ? "
" कितनी ? "
" इतनी - - - कि मौसम खिल उठें . हवायें महक उठें . "
और आज - - - पहली बार गुलशन के मुंह से अपने सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर अचानक गेसू के गुलाबी गालों पर शर्म की लाली ने एक मादक अंगडाई ली और आँखों में शराब उतर आयी . गेसू को लगा कि वो मारे खुशी के बेहोश हो जायेगी . और फिर छः बरस से लेकर साठ बरस तक की कौन सी ऐसी स्त्री है , जो अपने रूप की प्रशंसा सुनकर पुलकित न हो जाय .
इस बीच - - - दबे पाँव हल्की - हल्की बर्फ पड़ने लगी और सर्दी बहुत बढ़ गयी . सर्दी से मुकाबले की तैयारी के इरादे से गुलशन ने एक सिगरेट सुलगा ली .
गेसू हथेलियाँ रगड़कर गर्मी लाने का प्रयास करते हुए बोली -- " सर्दी बहुत हो गयी है . "
गुलशन ने जवाब दिया - " बर्फ़बारी में सर्दी नहीं होगी तो और क्या होगा ! "
" बर्फ़बारी में और भी तो बहुत कुछ हो सकता है . " वह भेदपूर्ण मुस्कान के साथ ' बहुत कुछ ' शब्द पर जोर देकर बोली .
गुलशन ने पूछा -- " जैसे ? "
" जैसे डबल न्यूमोनिया . बुद्धू - - - जिसमें दोनों तरफ की पसलियाँ धौंकनी बन जाती हैं . " वह रहस्यमय कहकहा बिखेर कर बोली . उसका ठहाका ऐसा तेज दगा - - - मानो बेशुमार परिन्दे उड़ गए हों - - - मगर होठों के कोर पर रहस्य का एक ढीठ नन्हा जुगनू टस से मस न हुआ .
गुलशन ने नासमझ सा स्वांग रचकर टोका -- " तुम कहकहे बहुत खर्च करती हो . "
" कहकहे इसीलिए होते ही हैं . "
" नहीं - - - इन्हें संभालकर रखना चाहिये . उस वक्त के लिये - - - जब ज़िन्दगी दुखों से भर जाती है . जब सब अपने तीन दूना पांच पढ़ाकर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं . उम्मीद की सारी किरने दामन छुड़ाकर फरार हो जाती हैं और ना उम्मीदी की गहरी धुंध में सभी रास्ते गुम हो जाते हैं . "
" उस वक्त मैं इस दुनिया में नहीं रहूंगी . "
"ये तुम्हारी खुशफहमी है . उस वक्त व्यक्ति ज़रूर ज़िन्दा रहता है . जैसे मैं . "
गुलशन की बात वातावरण को गंभीर बना गयी .
थोड़ी देर बाद !
गेसू बोली -- " आज तुम्हें साफ़ - साफ़ जवाब देना ही होगा कि तुम पायल की मृग तृष्णा में ही भटकते रहोगे या मुझसे शादी करोगे ? "
" गेसू ! बाँधे बज़ार नहीं लगतीं . वैसे भी - - - मुझसे शादी करके तुम्हें मिलेगा ही क्या ? मैं तो कहता हूँ , तुम्हारी चहकती खुशी भी जाती रहेगी . मैं तुम्हें कुछ न दे पाऊंगा . कुछ भी नहीं . "
" दोस्त ! व्यक्ति सदैव कुछ पाने से ही खुश नहीं होता . कभी - कभी कुछ या सब कुछ देने पर भी उसे आत्म संतोष और ख़ुशी प्राप्त होती है . "
" जैसे ? "
" जैसे दिल . "
" ओह - - - ज़रा ये तो बताओ - - - दिल देकर कितनी ख़ुशी मिलती है ? "
" कहा ना - - - बहुत अधिक . "
" जितना की मुझे मिली ? " गुलशन ने आह भरकर पूछा .
गेसू झुंझलाकर बोली -- " ओफ्फोह - - - क्यों वातावरण खराब करने पर तुले हो ! पायल के दीवाने - - - आँख खोलकर तो देखो , दुनिया कितनी खूबसूरत है . कितनी रंगीन और मस्ती भरी है . "
" लेकिन मुझे तो ऐसा कभी नहीं अनुभव हुआ . "
" तो आओ - - - आज मैं अनुभव कराऊँ . " गेसू आवेश में आकर तेजी से बोली और उसने गुलशन को अपनी तरफ घसीटकर , अपनी बाहों में भींचकर , गुदाज़ छाती से लगा लिया और पुनः बोली -- " लो - - - अनुभव करो . कुछ हुआ अनुभव ? "
अचानक में हुए गेसू के इस मादक हमले से हड़बड़ाकर गुलशन किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया . उसकी तो मति ही मारी गयी . विवेक शून्य हो गया . कुछ घड़ी बाद थोड़ा सँभालने पर - - - एक बार तो उसके मन में ख़याल आया कि वो गेसू को जवाब दे दे . उसे जहाँ - तहाँ चूम ले . मन भी मचला - - - फिर भी उसने ऐसा नहीं किया . क्योंकि मुई शराफत बिलार बनकर रास्ता जो काट गई . उसने अपने को जल्दी से गेसू की गिरफ्त से छुड़ा लिया और लम्बी सांस लेकर आश्चर्य से बोला -- " बाप रे बाप . "
" क्या बाप रे बाप ? "
" गेसू ! तुम इतनी सेक्सी क्यों हो ? "
" वो औरत ही क्या - - - जो सेक्सी न हो ! सच्चाई अनुभव करा रही हूँ तो सेक्सी कहते हो !! सेक्स सुखद दाम्पत्य की धुरी है , इस बात को गाँठ बाँध लो . यह भी सच है कि सेक्सी औरतों का वैवाहिक जीवन अपेक्षाकृत अधिक सफल व सुखी रहता है . इसलिए मात्र मेरे बारे में ऐसा सोचना तुम्हारी अज्ञानता या भ्रम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं . सच तो ये है कि मैं तुमसे थोड़ी सी बेतकल्लुफ भर हूँ . ऐ मेरे नासमझ दोस्त ! तुम्हें नहीं मालूम - - - औरतों में मर्दों की अपेक्षा कई गुना सेक्स की चाहत मौजूद रहती है . यदि उनके पास आर्थिक पराधीनता , लाज शरम का आवरण और चुगलखोर शारीरिक संरचना न होते , तो आज दुनिया का कुछ दूसरा ही रूप होता - - - और तुम मर्द दुम दबाये उनसे बचते फिरते . "
हक्का - बक्का गुलशन चुप रहा . वह तो बस दीदे फाड़े टुकुर - टुकुर गेसू की ओर एकटक निहार रहा था . गेसू उसे वक्त से आगे की लड़की नज़र आ रही थी .
उसकी ये दशा देखकर गेसू ने मुस्कराकर पूछा -- " यूँ टकटकी लगाये मुझे क्या देख रहे हो ! कुछ समझ रहे हो , जो मैं कह रही हूँ ? "
" हाँ - - - समझ भी रहा हूँ और हल्का सा नमूना भुगत भी चूका हूँ . " वह रुआंसा होने का अभिनय करके बोला .
उसके मुख के भाव देखकर गेसू हंस पड़ी . गुलशन भी उसकी हंसी में शामिल हो गया .
गेसू बोली -- " चलो - - - घर लौट चलें . "
" हाँ चलो . बहुत देर हो चुकी है . अब तुम्हें शीघ्र घर पहुंचना चाहिये - - - वरना तुम्हारे पिताजी निश्चित ही परेशान होंगे - - - क्योंकि एक लड़की का पिता होना , काँटों का मुकुट पहनने जैसा होता है . हर पल अनेकों आशंकाये , बहुतेरे कुविचार मन को मथे रहते हैं . खासकर तब - - - जब उसकी लड़की जवान होने के साथ - साथ गज़ब की खूबसूरत भी हो . " गुलशन ये कहते - कहते हँस दिया .
गेसू को समझ न आया कि वह मुस्कराये या शर्माये . सो उसने बीच का रास्ता अपनाया .
और फिर - - - दोनों अपने - अपने घर लौट आये .
और घर पहुँच कर - - - प्रसन्न मन गुलशन आज के दिन और गेसू के आगोश में बीते उन मादक पलों के बारे में विचार कर रहा था . गेसू के साथ उसका आज का दिन , उसके ख़याल में बहुत अच्छा गुज़रा था - - - और वो भी ये सोचने पर मजबूर हो गया था कि आम तौर पर नारी एक ईश्वरीय उपहार है , जिसे स्वर्ग से वंचित धरती के पुरुषों के पास ईश्वर ने उसकी क्षति पूर्ती हेतु दुनिया में भेजा है .
सेठ करोड़ी मल !
पायल की इज्जत का असफल सौदागर !!
आज इसी सेठ के एक ख़ास कमरे में कुछ ख़ास बातों के लिए ख़ास - ख़ास लोग एकत्र हुए थे .
इससे पहले की बात चीत शुरू होती - - - सेठ का ख़ास डॉक्टर उसके स्वास्थ्य - परीक्षण के लिए आ गया - - - क्योंकि सेठ की तबीयत पिछले कुछ रोज़ से ढीली - ढाली चल रही थी .
अब चूंकि डॉक्टर गलत समय पर आ ही धमका था - - - और उसे पहले निपटाना भी ज़रूरी था - - - अतः अखबार पढ़ते - पढ़ते ही सेठ ने कहा -- " चलो - - - शुरू हो जाओ डॉक्टर . "
कुछ देर तक सेठ का स्वास्थ्य - परीक्षण करने के बाद डॉक्टर बोला -- " सेठ ! तुम तो एकदम चकाचक हो - - - फिर मुझे बेकार बुलाया . तुमको कोई मर्ज़ नहीं है . "
" कमाल करते हो डॉक्टर . अगर मुझे कोई मर्ज़ नहीं है तो फिर ये डिलीवरी मार्का दर्द , रेगिस्तान मार्का टेम्प्रेचर , थ्री - डी मार्का आँखों का वर्क , ये - - - ये सब आखिर क्या - क्यूँ है मुझे ? जब रोग पकड़ने की तमीज नहीं , तो क्या ख़ाक डॉक्टरी पढ़ी है तुमने ! " सेठ ने व्यंग्य करते हुए धिक्कारा .
डॉक्टर भी चिढ़कर बोला -- " क्या समझ रखा है तुमने मुझे ! पांच अलग - अलग मुल्कों से डॉक्टरी पढ़ी है मैंने . "
" इससे क्या फर्क पड़ता है ! मैनें पचास जगहों की अलग - अलग लड़कियों का भोग लगाया है . "
" क्यों ? "
" क्योंकि वैध राज धरती धकेल कहा करते थे कि जो पुरुष कुल जमा इक्यावन अलग - अलग लड़कियों से रस प्राप्त करता है - - - उसे बुढ़ापा कभी नहीं आता . "
" फिर ये बुढ़ापा तुम पर क्यों मंडरा रहा है ? "
" क्योंकि इक्यावनवीं नहीं मिली . "
" तब दवा की क्या ज़रुरत ! इक्यावनवीं ढूंढो . " डॉक्टर ने हंसकर कहा .
सेठ भी हंसकर बोला -- " हाँ - - - यही करना होगा . "
डॉक्टर ने पूछा -- " सेठ ! एक बात बताओ !! तुम जैसे कुछ मर्दों में औरतों के मामले में नित नयेपन की इच्छा क्यों होती है ? "
सेठ अखबार रखते हुए बोला -- " बस यूं समझो प्यारे ! औरत और अखबार मुझे एक से लगते हैं . सोचो - - - सुबह जब नया अखबार आता है , तो कैसी बेचैनी होती है . उसका इन्तज़ार होता है . फिर सरसरी नज़र से उसे पढ़ा जाता है . एक बार - - - दो बार - - - तीन बार - - - . लगता है - - - कहीं कोई कोना छूट न जाये . किसी ख़ास चीज़ को कितनी लगन से कई बार पढ़ते - दोहराते हैं . और फिर जब पूरा - - - चप्पा - चप्पा पढ़ लिया जाता है , तो ख़त्म हो जाता है . दिलचस्पी समाप्त हो जाती है . अब क्या करें ! दूसरे दिन फिर नया अखबार तो चाहिये ही . नहीं समझे ? "
" समझ गया . "
" क्या समझे ? "
" यही - - - कि सचमुच तुम्हें इक्यावनवीं की सख्त ज़रुरत है . जल्दी ढूंढो . लेकिन सेठ ! मैं तो लम्बी उम्र के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि औरतें वो अनन्त खांईं हैं , जिनमें आदतन बार - बार झाँकने वाले कभी न कभी उनकी गहराई में गिरकर ऐसे गुम हो जाते हैं कि उनका पता - ठिकाना खोजना असंभव हो जाता है . इसलिए वो खुशनसीब हैं जिन्हें ख़ुदा नई - नई औरतों के चस्के से बचाये - - - वरना कभी न कभी ढोल की तरह गले मढ़कर कोई न कोई अबला ज़िन्दगी का तबला बजा डालती है . "
इतना कहकर डॉक्टर हँसता हुआ चला गया .
और सेठ ने अपने पालतू गुण्डों की ओर आँखें तरेर कर शहंशाही जिद की -- " क्यों बे ! लल्लू - कल्लू !! कुछ सुना तुमने ? डॉक्टर कहता है इक्यावनवीं ढूंढो . जाओ - - - लेकर आओ . "
" मगर किसे बॉस ? लल्लू ने पूँछा .
" पायल को . वो इसी शहर में कहीं है . "
" कैसे जाना बॉस ? "
" अपना पुराना मुच्छड़ चौकीदार एक दिन आकर बता रहा था . अबे वही - - - जिसे चोरी करने पर मैंने ठोंक - पीट कर काम से हटा दिया था . "
" कुछ पता तो बताया होगा उसने बॉस ! "
" नहीं . साला पूरा सही पता बताने के वास्ते मुझसे बड़ी ढिठाई से लम्बी रकम मांगनें की जुर्रत कर रहा था . उस वक्त मैं भी पिनक में था . सो मैंने गुस्से में उसके पिछवाड़े जहां पर लात मारी - - - ससुरा वहीँ से थैंक यू की आवाज़ छोड़ता हुआ भाग निकला . "
" तब तो उसे ढूँढने में काफी मुश्किल होगी बॉस . "
" अबे तो क्या तुम लोगों को आसान काम के लिये पाल - पोस कर सांड बनाया है मैंने . जाओ ! दो दिन में ढूंढ कर उसे मेरे पहलू में हाज़िर करो . और कान खोलकर सुन लो - - - न ला सके , तो तुम बेकारों को मारकर अपने फ़ार्म के वास्ते तुम लोगों की खाद बनवा दूँगा . "
कल्लू ने समझाया -- " बॉस ! अपने सिर पर सवार बैताल को काबू करो - - - वरना कहीं लेने के देने न पड़ जायें . मेरी मानो तो भूखी मछली की तरह केवल आटा ही न देखो , काँटा भी देखो - - - क्योंकि वो कॉलेज - कढ़ी छोकरी है . चान्स वो लेती होगी , डान्स वो करती होगी . स्वीमिंग - टैंक में वो नहाती होगी , किसी की याद में आँसू वो बहाती होगी . डेटिंग वो करती होगी , वेटिंग वो करती होगी . बोतल वो फोड़ती होगी , दिल वो तोड़ती होगी . मुर्गा वो छीलती होगी , मछली वो लीलती होगी . लौंडिया खतरनाक भी साबित हो सकती है . और फिर - - - हम और कोई राजी लड़की भी तो खरीद सकते हैं ! क्या ज़रुरत है , चालबाजी से उसे यहाँ तक लाने की !! "
सेठ बोला -- " अबे बांगडू - - - तुझे नहीं मालूम , ज़िन्दगी एक जुआ है . जीतने के लिये जुए की बाजियों में तरह - तरह की चाल चलना बहुत जरूरी है . "
" ज़िन्दगी एक जुआ है - - - ये माना बॉस ! पर हम जुए को शराफत और ईमानदारी के साथ भी तो खेल सकते हैं . क्या ज़रुरत है की जुआ बेईमानी से ही भरा हो ! "
" हाँ बॉस ! " लल्लू ने कल्लू का समर्थन किया -- " दुनिया में बिकाऊ माल की कुछ कमी तो है नहीं - - - फिर क्या ज़रुरत है कि एक भले मानस की इज्जत का मोती चुगा जाय . "
" अबे चो s s s प . सालों ! किराये के टट्टुओं के मुँह में जुबान शोभा नहीं देती . काट के रख दूँगा . " सेठ तैश में आकर बोला -- " हरामखोरों ! तुम्हें क्या मालूम - - - वो कीमत पहले ही ले उड़ी है . वो साली मेरा दस हज़ार रुपया लेकर भागी थी जबकि दस उसका भडुवा अंकल पहले से डकार चुका था . एक बार हत्थे चढ़ जाय तो कोका पंडित की पूरी किताब रटा दूँगा उसे . "
" मगर फिर तुम क्यों मुझसे शादी करना चाहती हो ? "
" तुम भी न - - - नशे में एकदम घोंचू जैसे सवाल कर रहे हो . अब पूछ ही लिया है - - - तो सुनो ! मैं तुमसे इसलिए शादी करना चाहती हूँ - - - क्योंकि पहली बात तो ये है कि मैं तुम्हें पसन्द करती हूँ - - - और दूसरी बात ये है कि तुम्हारे साथ गाँठ जोड़कर मेरे भविष्य को कोई खतरा नहीं - - - क्योंकि मेरा तो एक उच्च आर्थिक स्तर पहले से ही स्थापित है और मैं अपने सहयोग से तुम्हें भी उसी स्तर तक पहुंचा सकती हूँ . मगर ये बात तुम्हारे और पायल के जोड़े पर लागू नहीं हो सकती . "
" ओह ! " उसकी दर्पण सी बातों में अपना चेहरा देखकर गुलशन काफी परेशान सा दिखने लगा .
गुलशन के मनोभावों को ताड़कर गेसू ने कहा -- " दोस्त ! जब परेशानी बढ़ जाए , तो आदमी को विचारों को मोड़ देकर खुली हवा में घूमना चाहिये . आओ चलो ! बाहर कहीं घूम - टहल आयें . "
" मन नहीं है . "
" आखिर यहाँ बैठे - बैठे करोगे भी क्या ? "
" सुबह को दोपहर , दोपहर को शाम और शाम को रात बनाऊंगा . "
गेसू उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए बोली -- " नक्शा मत मारो . अब चलो भी . मैं जो कह रही हूँ . "
गुलशन मुस्कराकर राजी हो गया . दोनों नदी किनारे सैर करने निकल पड़े .
मौसम मसूरी बन गया था . हवायें तेज और बर्फ की तरह ठंढी हो चली थीं . लगता था कि बर्फ गिरकर रहेगी .
दोनों नदी किनारे बैठकर जल - प्रवाह निहारते रहे . लगता था , कुछ सोच रहे हों .
थोड़ी देर में !
गुलशन ने गेसू से पूछा -- " क्या सोच रही हो ? "
" सोच रही हूँ , नदी भी हमें कुछ शिक्षा देती है . "
" क्या ? "
" इसका बहता हुआ नीर हमें ये सिखाता है - - - कि जीवन गतिशील होकर जिया जाता है . मगर एक तुम हो कि पायल में अटक कर रुक गए हो . " इतना कहकर उसने पूछा -- " पर तुम भी तो कुछ सोच रहे थे ? "
" हाँ - - - मैं भी नदी के विषय में ही सोच रहा था . सोच रहा था कि नदी के दोनों पाट लगातार कितने समीप रहकर भी कभी नहीं मिल सकते . जैसे कि - - - . "
" जैसे कि तुम और पायल . यही कहना चाहते हो न ? " वह उसकी बात काटने के बाद झुंझलाकर बोली .
गुलशन ने भोलेपन से स्वीकारा -- " हाँ . "
उसकी इस अदा पर गेसू की हंसी निकल पड़ी . वह बोली -- " दीवाने हो गए हो तुम . "
" मैं दीवाना सही - - - मगर एक बात बताओ , " उसने मुस्कराकर चुहल भरी भरपूर निगाह गेसू पर डाली और कहा -- " आज तुम इतनी खूबसूरत क्यों लग रही हो ? "
" कितनी ? "
" इतनी - - - कि मौसम खिल उठें . हवायें महक उठें . "
और आज - - - पहली बार गुलशन के मुंह से अपने सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर अचानक गेसू के गुलाबी गालों पर शर्म की लाली ने एक मादक अंगडाई ली और आँखों में शराब उतर आयी . गेसू को लगा कि वो मारे खुशी के बेहोश हो जायेगी . और फिर छः बरस से लेकर साठ बरस तक की कौन सी ऐसी स्त्री है , जो अपने रूप की प्रशंसा सुनकर पुलकित न हो जाय .
इस बीच - - - दबे पाँव हल्की - हल्की बर्फ पड़ने लगी और सर्दी बहुत बढ़ गयी . सर्दी से मुकाबले की तैयारी के इरादे से गुलशन ने एक सिगरेट सुलगा ली .
गेसू हथेलियाँ रगड़कर गर्मी लाने का प्रयास करते हुए बोली -- " सर्दी बहुत हो गयी है . "
गुलशन ने जवाब दिया - " बर्फ़बारी में सर्दी नहीं होगी तो और क्या होगा ! "
" बर्फ़बारी में और भी तो बहुत कुछ हो सकता है . " वह भेदपूर्ण मुस्कान के साथ ' बहुत कुछ ' शब्द पर जोर देकर बोली .
गुलशन ने पूछा -- " जैसे ? "
" जैसे डबल न्यूमोनिया . बुद्धू - - - जिसमें दोनों तरफ की पसलियाँ धौंकनी बन जाती हैं . " वह रहस्यमय कहकहा बिखेर कर बोली . उसका ठहाका ऐसा तेज दगा - - - मानो बेशुमार परिन्दे उड़ गए हों - - - मगर होठों के कोर पर रहस्य का एक ढीठ नन्हा जुगनू टस से मस न हुआ .
गुलशन ने नासमझ सा स्वांग रचकर टोका -- " तुम कहकहे बहुत खर्च करती हो . "
" कहकहे इसीलिए होते ही हैं . "
" नहीं - - - इन्हें संभालकर रखना चाहिये . उस वक्त के लिये - - - जब ज़िन्दगी दुखों से भर जाती है . जब सब अपने तीन दूना पांच पढ़ाकर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं . उम्मीद की सारी किरने दामन छुड़ाकर फरार हो जाती हैं और ना उम्मीदी की गहरी धुंध में सभी रास्ते गुम हो जाते हैं . "
" उस वक्त मैं इस दुनिया में नहीं रहूंगी . "
"ये तुम्हारी खुशफहमी है . उस वक्त व्यक्ति ज़रूर ज़िन्दा रहता है . जैसे मैं . "
गुलशन की बात वातावरण को गंभीर बना गयी .
थोड़ी देर बाद !
गेसू बोली -- " आज तुम्हें साफ़ - साफ़ जवाब देना ही होगा कि तुम पायल की मृग तृष्णा में ही भटकते रहोगे या मुझसे शादी करोगे ? "
" गेसू ! बाँधे बज़ार नहीं लगतीं . वैसे भी - - - मुझसे शादी करके तुम्हें मिलेगा ही क्या ? मैं तो कहता हूँ , तुम्हारी चहकती खुशी भी जाती रहेगी . मैं तुम्हें कुछ न दे पाऊंगा . कुछ भी नहीं . "
" दोस्त ! व्यक्ति सदैव कुछ पाने से ही खुश नहीं होता . कभी - कभी कुछ या सब कुछ देने पर भी उसे आत्म संतोष और ख़ुशी प्राप्त होती है . "
" जैसे ? "
" जैसे दिल . "
" ओह - - - ज़रा ये तो बताओ - - - दिल देकर कितनी ख़ुशी मिलती है ? "
" कहा ना - - - बहुत अधिक . "
" जितना की मुझे मिली ? " गुलशन ने आह भरकर पूछा .
गेसू झुंझलाकर बोली -- " ओफ्फोह - - - क्यों वातावरण खराब करने पर तुले हो ! पायल के दीवाने - - - आँख खोलकर तो देखो , दुनिया कितनी खूबसूरत है . कितनी रंगीन और मस्ती भरी है . "
" लेकिन मुझे तो ऐसा कभी नहीं अनुभव हुआ . "
" तो आओ - - - आज मैं अनुभव कराऊँ . " गेसू आवेश में आकर तेजी से बोली और उसने गुलशन को अपनी तरफ घसीटकर , अपनी बाहों में भींचकर , गुदाज़ छाती से लगा लिया और पुनः बोली -- " लो - - - अनुभव करो . कुछ हुआ अनुभव ? "
अचानक में हुए गेसू के इस मादक हमले से हड़बड़ाकर गुलशन किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया . उसकी तो मति ही मारी गयी . विवेक शून्य हो गया . कुछ घड़ी बाद थोड़ा सँभालने पर - - - एक बार तो उसके मन में ख़याल आया कि वो गेसू को जवाब दे दे . उसे जहाँ - तहाँ चूम ले . मन भी मचला - - - फिर भी उसने ऐसा नहीं किया . क्योंकि मुई शराफत बिलार बनकर रास्ता जो काट गई . उसने अपने को जल्दी से गेसू की गिरफ्त से छुड़ा लिया और लम्बी सांस लेकर आश्चर्य से बोला -- " बाप रे बाप . "
" क्या बाप रे बाप ? "
" गेसू ! तुम इतनी सेक्सी क्यों हो ? "
" वो औरत ही क्या - - - जो सेक्सी न हो ! सच्चाई अनुभव करा रही हूँ तो सेक्सी कहते हो !! सेक्स सुखद दाम्पत्य की धुरी है , इस बात को गाँठ बाँध लो . यह भी सच है कि सेक्सी औरतों का वैवाहिक जीवन अपेक्षाकृत अधिक सफल व सुखी रहता है . इसलिए मात्र मेरे बारे में ऐसा सोचना तुम्हारी अज्ञानता या भ्रम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं . सच तो ये है कि मैं तुमसे थोड़ी सी बेतकल्लुफ भर हूँ . ऐ मेरे नासमझ दोस्त ! तुम्हें नहीं मालूम - - - औरतों में मर्दों की अपेक्षा कई गुना सेक्स की चाहत मौजूद रहती है . यदि उनके पास आर्थिक पराधीनता , लाज शरम का आवरण और चुगलखोर शारीरिक संरचना न होते , तो आज दुनिया का कुछ दूसरा ही रूप होता - - - और तुम मर्द दुम दबाये उनसे बचते फिरते . "
हक्का - बक्का गुलशन चुप रहा . वह तो बस दीदे फाड़े टुकुर - टुकुर गेसू की ओर एकटक निहार रहा था . गेसू उसे वक्त से आगे की लड़की नज़र आ रही थी .
उसकी ये दशा देखकर गेसू ने मुस्कराकर पूछा -- " यूँ टकटकी लगाये मुझे क्या देख रहे हो ! कुछ समझ रहे हो , जो मैं कह रही हूँ ? "
" हाँ - - - समझ भी रहा हूँ और हल्का सा नमूना भुगत भी चूका हूँ . " वह रुआंसा होने का अभिनय करके बोला .
उसके मुख के भाव देखकर गेसू हंस पड़ी . गुलशन भी उसकी हंसी में शामिल हो गया .
गेसू बोली -- " चलो - - - घर लौट चलें . "
" हाँ चलो . बहुत देर हो चुकी है . अब तुम्हें शीघ्र घर पहुंचना चाहिये - - - वरना तुम्हारे पिताजी निश्चित ही परेशान होंगे - - - क्योंकि एक लड़की का पिता होना , काँटों का मुकुट पहनने जैसा होता है . हर पल अनेकों आशंकाये , बहुतेरे कुविचार मन को मथे रहते हैं . खासकर तब - - - जब उसकी लड़की जवान होने के साथ - साथ गज़ब की खूबसूरत भी हो . " गुलशन ये कहते - कहते हँस दिया .
गेसू को समझ न आया कि वह मुस्कराये या शर्माये . सो उसने बीच का रास्ता अपनाया .
और फिर - - - दोनों अपने - अपने घर लौट आये .
और घर पहुँच कर - - - प्रसन्न मन गुलशन आज के दिन और गेसू के आगोश में बीते उन मादक पलों के बारे में विचार कर रहा था . गेसू के साथ उसका आज का दिन , उसके ख़याल में बहुत अच्छा गुज़रा था - - - और वो भी ये सोचने पर मजबूर हो गया था कि आम तौर पर नारी एक ईश्वरीय उपहार है , जिसे स्वर्ग से वंचित धरती के पुरुषों के पास ईश्वर ने उसकी क्षति पूर्ती हेतु दुनिया में भेजा है .
सेठ करोड़ी मल !
पायल की इज्जत का असफल सौदागर !!
आज इसी सेठ के एक ख़ास कमरे में कुछ ख़ास बातों के लिए ख़ास - ख़ास लोग एकत्र हुए थे .
इससे पहले की बात चीत शुरू होती - - - सेठ का ख़ास डॉक्टर उसके स्वास्थ्य - परीक्षण के लिए आ गया - - - क्योंकि सेठ की तबीयत पिछले कुछ रोज़ से ढीली - ढाली चल रही थी .
अब चूंकि डॉक्टर गलत समय पर आ ही धमका था - - - और उसे पहले निपटाना भी ज़रूरी था - - - अतः अखबार पढ़ते - पढ़ते ही सेठ ने कहा -- " चलो - - - शुरू हो जाओ डॉक्टर . "
कुछ देर तक सेठ का स्वास्थ्य - परीक्षण करने के बाद डॉक्टर बोला -- " सेठ ! तुम तो एकदम चकाचक हो - - - फिर मुझे बेकार बुलाया . तुमको कोई मर्ज़ नहीं है . "
" कमाल करते हो डॉक्टर . अगर मुझे कोई मर्ज़ नहीं है तो फिर ये डिलीवरी मार्का दर्द , रेगिस्तान मार्का टेम्प्रेचर , थ्री - डी मार्का आँखों का वर्क , ये - - - ये सब आखिर क्या - क्यूँ है मुझे ? जब रोग पकड़ने की तमीज नहीं , तो क्या ख़ाक डॉक्टरी पढ़ी है तुमने ! " सेठ ने व्यंग्य करते हुए धिक्कारा .
डॉक्टर भी चिढ़कर बोला -- " क्या समझ रखा है तुमने मुझे ! पांच अलग - अलग मुल्कों से डॉक्टरी पढ़ी है मैंने . "
" इससे क्या फर्क पड़ता है ! मैनें पचास जगहों की अलग - अलग लड़कियों का भोग लगाया है . "
" क्यों ? "
" क्योंकि वैध राज धरती धकेल कहा करते थे कि जो पुरुष कुल जमा इक्यावन अलग - अलग लड़कियों से रस प्राप्त करता है - - - उसे बुढ़ापा कभी नहीं आता . "
" फिर ये बुढ़ापा तुम पर क्यों मंडरा रहा है ? "
" क्योंकि इक्यावनवीं नहीं मिली . "
" तब दवा की क्या ज़रुरत ! इक्यावनवीं ढूंढो . " डॉक्टर ने हंसकर कहा .
सेठ भी हंसकर बोला -- " हाँ - - - यही करना होगा . "
डॉक्टर ने पूछा -- " सेठ ! एक बात बताओ !! तुम जैसे कुछ मर्दों में औरतों के मामले में नित नयेपन की इच्छा क्यों होती है ? "
सेठ अखबार रखते हुए बोला -- " बस यूं समझो प्यारे ! औरत और अखबार मुझे एक से लगते हैं . सोचो - - - सुबह जब नया अखबार आता है , तो कैसी बेचैनी होती है . उसका इन्तज़ार होता है . फिर सरसरी नज़र से उसे पढ़ा जाता है . एक बार - - - दो बार - - - तीन बार - - - . लगता है - - - कहीं कोई कोना छूट न जाये . किसी ख़ास चीज़ को कितनी लगन से कई बार पढ़ते - दोहराते हैं . और फिर जब पूरा - - - चप्पा - चप्पा पढ़ लिया जाता है , तो ख़त्म हो जाता है . दिलचस्पी समाप्त हो जाती है . अब क्या करें ! दूसरे दिन फिर नया अखबार तो चाहिये ही . नहीं समझे ? "
" समझ गया . "
" क्या समझे ? "
" यही - - - कि सचमुच तुम्हें इक्यावनवीं की सख्त ज़रुरत है . जल्दी ढूंढो . लेकिन सेठ ! मैं तो लम्बी उम्र के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि औरतें वो अनन्त खांईं हैं , जिनमें आदतन बार - बार झाँकने वाले कभी न कभी उनकी गहराई में गिरकर ऐसे गुम हो जाते हैं कि उनका पता - ठिकाना खोजना असंभव हो जाता है . इसलिए वो खुशनसीब हैं जिन्हें ख़ुदा नई - नई औरतों के चस्के से बचाये - - - वरना कभी न कभी ढोल की तरह गले मढ़कर कोई न कोई अबला ज़िन्दगी का तबला बजा डालती है . "
इतना कहकर डॉक्टर हँसता हुआ चला गया .
और सेठ ने अपने पालतू गुण्डों की ओर आँखें तरेर कर शहंशाही जिद की -- " क्यों बे ! लल्लू - कल्लू !! कुछ सुना तुमने ? डॉक्टर कहता है इक्यावनवीं ढूंढो . जाओ - - - लेकर आओ . "
" मगर किसे बॉस ? लल्लू ने पूँछा .
" पायल को . वो इसी शहर में कहीं है . "
" कैसे जाना बॉस ? "
" अपना पुराना मुच्छड़ चौकीदार एक दिन आकर बता रहा था . अबे वही - - - जिसे चोरी करने पर मैंने ठोंक - पीट कर काम से हटा दिया था . "
" कुछ पता तो बताया होगा उसने बॉस ! "
" नहीं . साला पूरा सही पता बताने के वास्ते मुझसे बड़ी ढिठाई से लम्बी रकम मांगनें की जुर्रत कर रहा था . उस वक्त मैं भी पिनक में था . सो मैंने गुस्से में उसके पिछवाड़े जहां पर लात मारी - - - ससुरा वहीँ से थैंक यू की आवाज़ छोड़ता हुआ भाग निकला . "
" तब तो उसे ढूँढने में काफी मुश्किल होगी बॉस . "
" अबे तो क्या तुम लोगों को आसान काम के लिये पाल - पोस कर सांड बनाया है मैंने . जाओ ! दो दिन में ढूंढ कर उसे मेरे पहलू में हाज़िर करो . और कान खोलकर सुन लो - - - न ला सके , तो तुम बेकारों को मारकर अपने फ़ार्म के वास्ते तुम लोगों की खाद बनवा दूँगा . "
कल्लू ने समझाया -- " बॉस ! अपने सिर पर सवार बैताल को काबू करो - - - वरना कहीं लेने के देने न पड़ जायें . मेरी मानो तो भूखी मछली की तरह केवल आटा ही न देखो , काँटा भी देखो - - - क्योंकि वो कॉलेज - कढ़ी छोकरी है . चान्स वो लेती होगी , डान्स वो करती होगी . स्वीमिंग - टैंक में वो नहाती होगी , किसी की याद में आँसू वो बहाती होगी . डेटिंग वो करती होगी , वेटिंग वो करती होगी . बोतल वो फोड़ती होगी , दिल वो तोड़ती होगी . मुर्गा वो छीलती होगी , मछली वो लीलती होगी . लौंडिया खतरनाक भी साबित हो सकती है . और फिर - - - हम और कोई राजी लड़की भी तो खरीद सकते हैं ! क्या ज़रुरत है , चालबाजी से उसे यहाँ तक लाने की !! "
सेठ बोला -- " अबे बांगडू - - - तुझे नहीं मालूम , ज़िन्दगी एक जुआ है . जीतने के लिये जुए की बाजियों में तरह - तरह की चाल चलना बहुत जरूरी है . "
" ज़िन्दगी एक जुआ है - - - ये माना बॉस ! पर हम जुए को शराफत और ईमानदारी के साथ भी तो खेल सकते हैं . क्या ज़रुरत है की जुआ बेईमानी से ही भरा हो ! "
" हाँ बॉस ! " लल्लू ने कल्लू का समर्थन किया -- " दुनिया में बिकाऊ माल की कुछ कमी तो है नहीं - - - फिर क्या ज़रुरत है कि एक भले मानस की इज्जत का मोती चुगा जाय . "
" अबे चो s s s प . सालों ! किराये के टट्टुओं के मुँह में जुबान शोभा नहीं देती . काट के रख दूँगा . " सेठ तैश में आकर बोला -- " हरामखोरों ! तुम्हें क्या मालूम - - - वो कीमत पहले ही ले उड़ी है . वो साली मेरा दस हज़ार रुपया लेकर भागी थी जबकि दस उसका भडुवा अंकल पहले से डकार चुका था . एक बार हत्थे चढ़ जाय तो कोका पंडित की पूरी किताब रटा दूँगा उसे . "