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टुकड़ा - टुकड़ा सच complete

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टुकड़ा - टुकड़ा सच

उपन्यासकार : डॉ. राकेश श्रीवास्तव

निरंकुश हवा उदण्ड तूफ़ान में परिवर्तित होने की धमकी दे रही थी और भटकती मनहूस दुष्टात्मा की भांति अजीब डरावनी आवाजें बिखेरती हुई अंगद के पाँव से मज़बूत विशाल वृक्षों से सर टकरा रही थी----जैसे युगों - युगों से अटल विश्वास को उखाड़ फेंकना चाहती हो . सनसनाते नम ठण्डे झोंके ----शरीर में शूल की भांति चुभकर ----गर्म खून को जमा देने की जिद पकड़े थे . नीले मखमली आकाश में पैबंद से टंके जल से बोझल बादल के टुकड़े ----नीचे----बहुत नीचे तक झुककर पेड़ों के झुरमुट में कुछ खोज सा रहे थे . संभवतः दूर बाहें पसारे बूढ़े गरीब पीपल की अधनंगी टहनियों में अटके - उलझे चाँद को ढूँढ रहे थे . ऊंची चढ़ाई पर लाज से सिकुड़ी सर्पिल सड़क किसी रूपसी की पतली कमर की भांति बलखाती - लहराती हुई दूर ----बहुत दूर ----ऊँचाई तक अविराम चली जा रही थी . जैसे ऊंचे आकाश को छू लेना चाहती हो .मूर्ख सड़क नहीं जानती थी कि भला हरि - कथा – से अनन्त आकाश को कभी कोई छू सका है !

सामान्य जनों के लिए खराब और नवविवाहितों के लिए बेहद हसीन व दिल को शरारती बनाने वाले इस मौसम में - - - इसी पतली सी सड़क पर एक खूबसूरत कार भागी चली जा रही थी - - - उस विलंबित कमसिन लड़की की तरह , जिसका प्रेमी दूर खड़ा देर से उसे सम्मोहक आमंत्रण दे रहा हो .

नवयौवना - सी निखरी कार पर सवार चंचल के सावधान पाँव एक्सेलरेटर पर दबाव बढ़ाते जा रहे थे . वह पगलाए मौसम के कुछ कर गुजरने से पूर्व सकुशल घर पहुँच जाने की उतावली में था .

अचानक उसकी सांस रुकी , धड़कन बढ़ी और जबड़े भिंच गए . उसने संयमित घबराहट में ब्रेक पर पूरी ताकत के साथ अपने जीवन का सम्पूर्ण ड्राइविंग - कौशल पल भर में उड़ेल दिया . कार एक तेज चीत्कार करके जहाँ की तहाँ चिपक गयी .

पुराने सयानों ने सच ही कहा है कि गाड़ी भली - भाँति चला लेना ही कला नहीं है . कला है - - - सामने से सुरसा - सा मुँह बाए चली आ रही विपत्ति को ठेंगा दिखाकर कुशलता पूर्वक अपना बचाव करना और दुर्घटना को टाल देना .

बहरहाल - - - सब कुछ पलक झपकते हो गया . ये पल , वो पल था - - - जिस पल सावधान न रहे - - - चूके तो टिड्डियों के विध्वंसक दल - सा ये पल - - - पल भर में जीवन की पूरी फसल ही चट कर जाता है . या फिर अपशगुनी काली बिल्ली का रूप धरे उम्र भर रास्ता काटा करता है . या तो उल्लुओं - सी मनहूस शक्ल लिए ये पल जबरदस्ती कन्धों पर सवार होकर जीवन भर भयानक कहकहे लगाकर घटना विशेष की कडुवी स्मृतियों को मन - मस्तिष्क से मिटने नहीं देता और उस भारी पल के अनचाहे बोझ को ढोते रहना व्यक्ति की नियति बन जाती है .

खैर - - - उस पल पर सकुशल पार पाते ही - - - इस ठण्ढे मौसम में भी चंचल के माथे पर स्वेद - कण चुचुआ आये और सम्पूर्ण शरीर के रोयें खतरे में फंसी जंगली साही के काँटों की भाँति तनकर खड़े हो गये , क्योंकि नियंत्रित कार के आगे दन्न से कूदकर किसी लड़की ने अपनी जिंदगी के दस्तावेज को बंद करने की कोशिश की थी . एक नाकामयाब कोशिश . आत्महत्या का असफल प्रयास .

संभवतः उस खास लड़की की सोच भी ऐसी आम रही होगी कि उसका चाहा हुआ ही घटित होगा . किन्तु क्या सदैव ऐसा हुआ है ! प्रायः तो नहीं . कोई अपने ही अतीत में झांके - - - तो पायेगा कि उसके जीवन में वह काल - खण्ड भी मुस्कराया है , जब उसने मिट्टी को भी हाथ लगाया तो सोना होता चला गया . चाहे - अनचाहे उपलब्धियों की झड़ी लग गयी . और वक्त का दौर ऐसा भी भारी पड़ा , जब सर्वोत्तम प्रयासों के पश्चात भी अधकचरे या फिर प्रतिकूल परिणाम प्रकट भये . और कभी - कभी तो जीवन में वह सब स्वतः घटित होता चला जाता है , जिसके विषय में कभी सोचा ही न गया हो . कोई तैयारी , कोई योजना ही न रही हो . योजनाबद्ध प्रयास के फलीभूत होने - - - न होने - - - कम या अधिक होने के लिए सूत्रधार तो कोई और ही है . शायद ईश्वर - - - या फिर भाग्य . जो कह लो .

तन - मन पर यथासंभव नियंत्रण आते ही , झट से कार खोलकर चंचल पट से बाहर निकला और ढोल की तरह बज रही दिल की थापों के बीच उसने बेसब्र निगाहों से धराशायी लड़की को भरपूर निहारा . यह देख जानकर कि लड़की लगभग सही सलामत है , उसने वैसे ही भरपूर चैन की सांस ली , जैसी कि कोई मुल्जिम अदालत से बा इज्जत बरी होने पर लेता है .

कार के आगे पड़ी मरने की असफल आकांक्षा रखने वाली लड़की उसकी तरफ ऐसी बेबस नजरों से निहार रही थी जिसमे जिन्दगी और मौत - - - दोनों के ही हाथों से फिसल जाने का दोहरा दर्द छलछला रहा था , उसकी डबडबायी आँखें और फड़फड़ाते होंठ मानो शिकायत कर रहे थे कि क्यों बचा लिया मुझे ! मुझे बचाकर ज़ुल्म किया तुमने .

चंचल ने उसकी केले के छिले ताने - सी स्निग्ध बांह को सहारा देकर उसे खड़ा कर दिया . देखा - - - कि सामान्य सांसारिक पुरुषों की भाँति ईश्वर ने भी उस आकर्षक युवती के प्रति ज़रुरत से कुछ ज्यादा ही नरमी बरती थी . क्योंकि चोट अधिक नहीं आई थी . कूदकर गिरने से कुछ खरोंचें भर आयीं थीं उसकी कमनीय काया पर .

" ए लड़की ! क्यों जान देना चाहती थी ? " चंचल स्वाभाविक क्रोध वश पूछ कर बड़बड़ाया -- " किस्मत थी , जो बच गयी - - - वर्ना तुम्हारी मौत का अनचाहा बोझ मुझ बेगुनाह को भी बेवजह जिन्दगी भर ढोना पड़ता . "

" मुझे मर जाने देते . मरने क्यों न दिया ! क्यों बचाया आपने ? " एक सांस में कहकर लड़की किसी असहाय बच्चे की भाँति सुबक - हिचक कर रोने लगी . उसकी आँखों से अनवरत उमड़ती गंगा - जमुना ने सैलाब का रूप ले लिया .

चंचल उसमे बिना बहे झुंझलाया -- " तुम्हे मर जाने देता और खुद जेल की चक्की पीसकर अपनी ज़िन्दगी को घुन लगा लेता ? आखिर मरना क्यों चाहती थी ? "

" क्योंकि मै जीना नहीं चाहती ."

"वो तो समझा - - - लेकिन भाग्य का लिखा तो कोई मिटा नहीं सकता . चॉक और डस्टर तो विधाता के हाथ है और शायद वो नहीं चाहता कि तुम अभी मरो . इसलिए तुम दैवयोग से बच गयी .

" मगर मै जीना नहीं चाहती . अब तक की ज़िन्दगी को प्याज की परतों की तरह खूब उधेड़ कर परखा - - - मगर सिवाय बदबू के कुछ हाथ नहीं आया . अब तो मेरे सारे सपने ही मर चुके हैं . जीने की चाहत ही ख़त्म हो गयी है . क्योंकि ये घिनौनी बदबूदार ज़िन्दगी मुझे चैन से जीने नहीं देती . पग - पग , पल - छिन दगा देती है . "वह रोते - रोते बोली और उसके दम तोड़ चुके सपने मानो सड़ - पिघल कर कतरा - कतरा उसकी आँखों से बहते रहे

अब लड़की के प्रति चंचल के मन - आँगन में दया उमड़ आयी . वैसे ये तो होना ही था . नारी के आंसुओं का गुनगुनापन तो पत्थर को भी पिघला कर मोम बना देता है . चंचल तो मात्र हाड़ - मांस का धड़कता भावुक पुतला था .

उसने अपनी उम्र से बड़ा होकर शिक्षकों की तरह समझाया -- " सुनो - - - सपनों के मर जाने से अधिक खतरनाक स्थिति और कुछ भी नहीं . सबसे अधिक विपन्न वो होते हैं , जिनके पास सपनों का अभाव है . सपने थमे तो विकास थमा . सपना ही तो मनुष्य और जानवर के बीच भेद करने वाली रेखा है . व्यवहारिक सपने ही तो तरक्की का राज हैं . इसीलिये , मेरी मानो तो सपनों को कभी मरने मत दो . और देखो- - - ज़िन्दगी अगर सरासर बेवफाई पर ही उतर आये तो इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम मौत से याराना गाँठ लो . तुम्हें मौत से लड़ना चाहिए . किसी उम्मीद के छोटे से कतरे को जीने का सहारा बना लेना चाहिए . और फिर - - - अगर मरना ही है तो हथियार डाल कर क्यों मरो ! लड़ते - जूझते , कुछ कर गुजर कर क्यों न मरो -- बहादुरों - सी यादगार मौत . खैर - - - अब मै तुम्हे मरने तो नहीं ही दूंगा . "

" देखिये - - - मुझ पर रहम समझ कर अन्जाने में ज़ुल्म न कीजिये . जिसने मरने की ही ठान ली , उसे भला कोई कब तक बचा सकता है ! मै हर हाल में मरना चाहती हूँ . कृपया अपनी कार तले रौंद कर मुझे इस ज़िन्दगी के नर्क से आजाद करने का उपकार कर दीजिये . इस सन्नाटे सुनसान में कोई भी यह दृश्य देख नहीं पायेगा . जमाने की निगाहों में आपके उजले दामन पर कोई दाग भी न आएगा और मुझे भी इस तिल - तिल मरती ज़िन्दगी के कष्ट से एकबारगी छुटकारा मिल जाएगा . "
 
" क्या खूब दर्शन समझा रही हो मुझे ! इस सुनसान में तुम्हारी निराशा - जनित इच्छा पूरी कर दूं तो जमाने की निगाहों से तो बचा रहूँगा , मगर खुद से खुद को कहाँ छिपाता फिरूंगा ! एक अपराध - बोध उम्र भर मेरा पीछा करता रहेगा . क्योंकि आदमी दुनिया से तो नज़र बचाकर भाग सकता है लेकिन स्वयं से भाग कर कहाँ जा सकता है ! अतीत के अंधेरों में जान - समझ कर किये गए गुपचुप पाप उम्र भर प्रज्ञापराधी का निरंतर पीछा करके उसे इस कदर झिंझोड़ा करते हैं कि इनको ढकने - छिपाने में अपनी समस्त ऊर्जा खपाता व्यक्ति वर्तमान को कभी ठीक से जी ही नहीं पाता . " चंचल उम्र से अधिक लम्बे बुरे तजुर्बे झेल चुकी लगती अभागी को समझाता रहा . फिर बोला -- " लगता है , लाचार हो - - - बेबस हो ! "

" हाँ - - - क्योंकि औरत हूँ . " वह रोते - रोते बोली .

" मगर मानो तो - - - अब तो तुम्हें एक नई ज़िन्दगी मिली है - - - अब क्यों रोती हो ? "

" रोना तो सृजन के साथ ही हर स्त्री का भाग्य है - - - और रोते - रोते अब तो जीवन में मेरी रूचि ही समाप्त हो चली है . "

"किन्तु हाथ पर हाथ धरे भाग्य को कोस - कोस कर अकारथ आंसू बहाते रहने से तो ज़िन्दगी पार न होगी . हाँ - - - एक बात यदि खूब ध्यान से समझ लो तो तुम्हारे आँसुओं का शायद कोई उपाय निकल आये . देखो - - - ज़िन्दगी योजनाबद्ध तरीके से गढ़ी मिली तीन घंटे की कोई रोचक रंगीन फिल्म नहीं . ये तो बिना आवेदन ही सुखद संयोग से हाथ लगा कोरा स्केच मात्र है . जिसमें परिस्थितियों से तालमेल बैठाते हुए बड़े जतन से खुद ही रंग भरते - बदलते रहना पड़ता है . इसके बावजूद - - - यदि किसी की शरारत या वातावरण की मार अगर मन पसन्द चटक रंगों को बदरंग भी कर दे तो उसे पुनः - सजाते - संवारते रहना पड़ता है . अनमोल ज़िन्दगी को निरंतर खूबसूरत बनाए रखने के लिए अनवरत कठोर प्रयासों की आवश्यकता पड़ती है . सारी बातों का सार - संक्षेप ये है कि ज़िन्दगी को बड़े जतन से खुद ही बुनना पड़ता है . जो मन - मेहनत नहीं लगाते , उन्हें सादी काम चलाऊ कंबली से ही सन्तोष करना पड़ता है . इसके विपरीत जो लोग एकाग्रता से बारम्बार सवोत्तम प्रयास करते हैं , वो अपनी ज़िन्दगी को खूबसूरत ईरानी कालीन सा बुन डालते हैं . इसलिए जब मनोदशा सामान्य हो जाए तो फुर्सत में मेरी बातों के अर्थ तलाशने की कोशिश करना . शायद काफी कुछ हाथ लग जाए . अभी तो चलो - - - आस पास के किसी दवाखाने में तुम्हारी मरहम - पट्टी करवा दूं . " अचानक कुछ सोचने के बाद चंचल ने मुस्कराते हुए उससे पूछा -- " लेकिन क्या मेरे साथ - - - एक अन्जान अकेले पुरुष के साथ - - - कार में बैठने में तुम्हे स्त्री सुलभ डर नहीं लगेगा ? "

चंचल के व्यंग को समझ कर - - - आंसू पोंछकर - - - उसने जवाब दिया -- " जिसे मौत को गले लगाने में भय नहीं लगा - - - वो भला एक आदमी से क्योंकर डरेगी ! और वो भी उस व्यक्ति से - - - जो उसका जीवन - रक्षक हो . वैसे भी मेरा जीवन जिस अवस्था पर आ पहुंचा है , वहां भय अथवा साहस , ख़ुशी या फिर गम - - - इन सबकी अनुभूतियाँ - - - इन सबके भेद इस समय समाप्त हो चले हैं ."

सच ही तो है - - - भय साहस , ख़ुशी गम - - - ये समस्त भाव व्यक्ति की मनोदशा और काल विशेष पर आश्रित हैं . कभी - कभी व्यक्ति विशेष की मनोदशा प्रयास वश या फिर परिस्थितियों वश स्थायी अथवा अस्थायी रूप में उस अवस्था को छू लेती है - - - जहाँ ख़ुशी या गम , भय या साहस - - - इन सबमें भेद करने की , इन्हें अनुभव करने की प्रवृत्ति शून्य हो जाती है . सभी कुछ समान और तटस्थ रूप से ग्राह्य हो जाता है .

लड़की कार में , ड्राइवइंग - सीट के बगल में बैठ गई . चंचल भी निर्धारित जगह पर पसर कर कार चलाने लगा . उसने कार यथासंभव अधिकतम गति पर झोंक दी . यह सोचकर कि लड़का यदि कार तेज चलाये , तो बगल विराजी लड़की या तो डरकर सहम जाती है - - - या फिर लड़के के ड्राइवइंग - कौशल पर मुग्ध हो जाती है - - - और प्रभाव तो दोनों ही स्थितियों में पड़ता है . वैसे भी लड़कियों पर प्रभाव गांठने का कोई भी अवसर हाथ से न फिसलने देना , लड़कों के जन्मजात स्वभाव में शामिल होता है .

चलती कार में चुप्पी ठहरी थी . मानो दोनों जन लखनवी अन्दाज ओढ़े पहले आप - पहले आप की उम्मीद में मौन साधे हुए थे . अचानक लड़की चंचल की दबी नज़रों के स्पर्श की सुरसुरी से सिकुड़ कर छुई मुई हो गई . शायद भगवान औरतों को एक छठी इन्द्रिय भी देता है - - - और इतनी संवेदनशील देता है कि आँखों की तो जाने दो , उनका शरीर भी पुरुषों के मनोभावों तक को बहुत सहजता से पकड़ लेता है . वह भी चंचल की निगाहों के शालीन स्पर्श की गुदगुदी अपने सम्पूर्ण शरीर में क्रमशः अनुभव कर रही थी . सचमुच - - - चंचल बीच - बीच में मौका तलाश कर कनखियों से लड़की की तरफ निहार कर पुरुष - स्वभाव का परिचय दे रहा था . उसकी चोर नज़र लड़की के रेशमी चेहरे से फिसलती हुई - - - यौवन के ढलान से अटकते - लुढ़कते उसके गोरे नाज़ुक चरण कमलों तक जा पहुंची . कुल मिलाकर उसने अपनी चोर नज़रों की पद - पट्टिकाओं पर चंचल मन को सवार कराकर लड़की के बर्फ - से चिकने बदन पर दूर - दूर चहुँओर जी भरकर मजेदार स्कीइंग करा डाली और बेमन से रुका तभी , जब आत्मा के ब्रेक ने उसे मजबूर कर दिया . इस बहाने पहली बार उसकी अनुभव हीन उत्सुक आँखों ने अपने इस विशिष्ट अन्दाज़ से लड़की के शरीर के चप्पे - चप्पे का स्वाद जी भरकर चखा - छका और उसके सम्पूर्ण सौन्दर्य को अपने भीतर तक अनुभव किया . अपने इस सुखद निरीक्षण के बीच उसने पाया कि लड़की की जुल्फ जन्नत की गलियों जैसी थीं . उसके दांत मोतियों और कान सीपियों जैसे थे . उसके होठ किसी खूबसूरत ग़ज़ल की दो पंक्तियों जैसे थे . शरीर गदराये यौवन के बोझ से झुका - झुका और रंग - - - हाय - - - मत पूछो - - - ऐसा लगता था , जैसे दूध से भरे कांच के बर्तन में चुटकी भर गुलाल गिर गया हो . काली साड़ी उसके गोरे बदन से इस तरह लिपटी थी , जैसे चमकते चाँद से बदली . पतली कमर उन्नत उरोजों का भार वहन करते - करते लचकी पड़ रही थी . आँखों की मदिरा छलकी पड़ रही थी . ऐसा मनभावन था उसका रूप . लगता था , जीवन्त हो उठी खजुराहो की कोई मूरत चल - भटक कर उसके बगल में आ बैठी हो , जिसके शरीर से महुआ की मादक महक आ रही थी . चंचल की तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि मात्र एक शरीर के अन्दर इतना सौन्दर्य समा कैसे गया ! प्रभु की लीला , प्रभु ही जाने .

उसने मौन तोड़ा -- " नाम क्या है तुम्हारा ? "

" पायल . " छोटा सा उत्तर दिया उसने - - - और उसकी वाणी कार में ऐसे छनकी , जैसे खेत में पकी खड़ी अरहर की फलियाँ पुरवा का झोंका पाकर पायल - सी बज उठी हों .

" देखो पायल - - - तुम मुझे अपना हितैषी समझो और सच - सच बताओ - - - तुम कौन हो और किन कारणों वश ज़िन्दगी की अनमोल धुन पर संगत बिठाने में असफल होकर ज़िन्दगी को ही ख़त्म करने पर तुली थी . " चंचल ने प्रश्न के साथ - साथ मुस्करा कर मीठा सा मजाक भी किया -- " कहीं किसी लड़के ने प्यार में बेवफाई तो नहीं की ? वैसे मै तो यही सुनता आया हूँ कि औरतें बेवफाई को अपना ही सुरक्षित अधिकार समझती हैं . "

मगर पायल ने इस व्यंग को दिल पर न लेकर अपने अतीत पर से पर्दा उठाना शुरू कर दिया . वह बोली -- " कुछ समय पूर्व तक मेरा भी एक सुखी सम्पन्न परिवार था . परिवार में मैं , मेरे माता - पिता और पिता का दूर का लगा - छुआ एक अधेड़ उम्र का रिश्तेदार था . जिसका शेष परिवार दूर गाँव में रहता था . वो मेरे पिता के फल फूल रहे व्यवसाय में उनकी सहायता करता था और बदले में प्राप्त होने वाली धनराशि से अपने परिवार का भरण - पोषण करता था . मै उसे स्वाभाविक रूप से अंकल कहकर संबोधित करती थी . कुल मिलाकर हमारा जीवन खूब हंसी - ख़ुशी बीत रहा था - - - लेकिन शायद हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के प्रतिफल स्वरूप ईश्वर की आँख में हमारी ख़ुशी खटकने लगी और उसने हमारे खुशहाल परिवार पर अपने ज़ुल्म कि बिजली गिरा दी . अचानक एक दुर्घटना में मेरे माता - पिता मारे गए . अभी मै इस सदमे से उबर भी न पायी थी कि अनायास अपने संरक्षण में आयी मेरे पिता की दौलत ने अंकल की मति भ्रष्ट कर दी . उसकी छिपी हुई बुराइयां कछुए की गर्दन की तरह निकल कर सामने आ गयीं . उसने जुए , शराबखोरी और अय्याशी में मेरी सारी संपत्ति खानी - उड़ानी शुरू कर दी . साथ ही उसने मौके का फायदा उठाकर एक और काम बड़ी चतुराई से किया . वो था अपनी चार - चार सयानी लड़कियों की ताबड़तोड़ शादी करना . चार की चारों बहनें बदकिस्मती से बदसूरत थीं . इसीलिये उसको हर लड़की की शादी के वक्त एक मोटी रकम बदसूरत बेटी पैदा करने के जुर्म में बतौर हर्जाने के दहेज़ की शक्ल में अदा करनी पड़ती थी . उसकी समस्या ये भी थी कि एक लड़की हाथ पीले करके बंदरगाह से अपना लंगर छुड़ा भी न पाती थी कि दूसरी तैयार बैठी लड़की रवानगी की सीटी बजाने लगती थी . नतीजा ये निकला कि उनको फटाफट निपटाते - निपटाते उसने मुझे कंगाल कर दिया . उसके बाद मोटी रकम के लालच में उसने मुझे एक ऐसे शराबी रईस बूढ़े के साथ ब्याहना चाहा जो कि शरीर के मामले में गीले आटे जैसा ढीला और लुजलुजा हो चुका था . जिसके गले यदि बंध जाती तो निश्चित ही शादी निभाते उसका दम फूलने पर डर बना रहता कि कहीं उसी मेरी वक्त कलाइयाँ और मांग खाली न हो जायें . सो मैंने दृढ़ता से इनकार कर दिया . इसलिए निकम्मे हो चुके अंकल को जब धन - प्राप्ति का कोई दूसरा उपाय न सूझा तो उसकी शराबी नज़र मुझ पर अटक गई . उसने मुझे बहलाने - फुसलाने का प्रयास शुरू कर दिया . वह मुझसे वेश्यावृत्ति करवाकर - - - मेरी कमाई से खुद गुलछर्रे उड़ाना चाहता था . मेरे इन्कार करने पर उसने मुझे मारना - पीटना शुरू कर दिया . बदनामी के डर से - - - मै ये बातें किसी से बताने में भी झिझकती थी . किन्तु मै अपने फैसले पर डटी रही और मेरा शराबी अंकल अपनी जिद पर अड़ा रहा . आखिर एक दिन उसने मुझे बेचने का फैसला कर लिया . और जैसा कि प्रायः होता आया है कि पहली - पहली बार औरतों के ज़िन्दा गोश्त का मूल्य अधिक होता है - - - सो एक कामी सेठ करोड़ीमल ने मेरी एक रात कि कीमत बीस हज़ार रूपये लगा दी . और दस हजार रूपये मेरे शराबी अंकल को अग्रिम दे दिये . मेरे लाख रोने - चिल्लाने और मना करने के बावजूद मेरे अनोखे अंकल का दिल नहीं पसीजा - - - और उसने मुझे उस बदमाश सेठ के गंदे हाथों मैला होने के लिए सौंप दिया . जब वो कामान्ध सेठ अपनी कोठी पर मेरे साथ जबरदस्ती अपना मुंह काला करने की कोशिश कर रहा था तो अचानक मैंने मौका पाकर कमरे में रखा स्टूल उसके सर पर दे मारा . चोट खाकर वो बेहोश हो गया . और इस तरह मै आज़ाद होकर भाग निकली ." इतना कहकर वह एक पल को शांत हो गयी - - - मगर फिर कुछ याद आते ही पुनः बोली -- " ये देखो - - - ये - - -मेरे पर्स में वो दस हज़ार रूपये अब भी हैं , जो उसने मुझे बाद में देने के लिये - - - लड़की से औरत बनाने के लिये स्टूल पर रख छोड़े थे . "

पायल की छोटी सी जिंदगी की बड़ी - बड़ी मुसीबतें सुनकर चंचल को समझते देर न लगी कि इतने बड़े - बड़े हादसे झेल चुकने के पश्चात सामान्य व्यक्ति उस दोराहे पर पहुँच जाता है , जहां से एक रास्ता तो आक्रामक प्रतिशोध की ओर जाता है ओर दूसरा पलायन वादी आत्महत्या की तरफ . अब भावावेश में राह विशेष का चयन तो काफी कुछ भुक्तभोगी की तात्कालिक मनःस्थिति पर निर्भर करता है .

पायल के परिस्थितिजन्य आत्महत्या के फैसले के कारणों से दयाद्र हो उठे चंचल ने समझाया --" लेकिन तुम्हे वो रूपये अपने साथ नहीं लाने चाहिए थे . तुम्हे वो रूपये लेने का नैतिक अधिकार तब तक नहीं बनता था - - - जब तक कि स्वेच्छा से तुम सेठ को रुपयों की मनचाही कीमत अदा न कर देती . मुझे तो डर है कि बेवकूफी वश तुम अपने पर्स में रूपये नहीं बल्कि वो अनैतिक भ्रूण डालकर ले आई हो , जो भविष्य में किसी बड़ी समस्या की शक्ल भी ले सकता है . "

पायल अपनी गलती अनुभव करती हुई बोली -- " हाँ - - - शायद तुम ठीक ही कह रहे हो - - - लेकिन उस वक्त जल्दी - जल्दी में - - - बदहवासी की हालत में तत्काल जो सूझा , सो किया . पहले मैंने सोचा था कि रूपये लेकर कहीं दूर भाग जाऊंगी और शान्त जीवन व्यतीत करूंगी - - - और यही सोचकर मैंने रूपये उठाये भी थे - - - लेकिन बाद में विचार आया - - - जहाँ जाऊंगी- - - ऐसे कामी सेठ और शराबी अंकल मिलते ही रहेंगे . जबकि मै अकेली थी -- बिल्कुल अकेली . सच - - - उस समय मैंने समझ लिया था कि स्त्री कभी भी बालिग नहीं होती . बचपन में उसे बाप की अंगुली की , जवानी में पति के आसरे की और बुढ़ापे में लड़के के सहारे की जरूरत होती है . और मेरे पास - - - मेरे पास इनका तो क्या - - - किसी का भी सहारा न था . हाँ - - - दुश्मन जरूर थे . एक नहीं , कई दुश्मन -- मेरा अंकल , मेरा रूप , मेरा अकेलापन , मेरी जवानी . और यही सब - - - ."

" यही सब सोचकर तुमने आत्महत्या का नकारात्मक फैसला कर डाला . बिना लड़े ही हथियार डाल दिए . भावना के प्रवाह में बहकर , बिना तैरने की कोशिश के ही डूब मरने को राजी हो गयी . यह तो सरासर बेवकूफी थी . एक नादान निर्णय . " चंचल ने उसकी बात काट कर कहा -- " देखो - - - हरि हर हारे को हमेशा अपनी तरफ से एक मौका और देता है . अब जबकि ईश्वर ने तुम्हें मुझसे टकरा ही दिया है तो अगर चाहो तो मन मजबूत करके फ़िलहाल तुम मेरे यहाँ रह सकती हो -- यदि यकीन हो तो . इस वक्त इतना विश्वास तो मै तुम्हें दिला ही सकता हूँ कि दुनिया केवल वैसी ही नहीं है - - - जैसी संयोग वश अब तक तुम्हारी आँखों ने देखी है . "

चंचल के अन अपेक्षित प्रस्ताव ने पायल पर संजीवनी सा कार्य किया . वह एहसान भरी नज़रों से उसकी तरफ देखती रह गई . उसकी जबान कुछ बोल न पायी मगर आँखें जबान की भरपाई कर रही थीं और इस क्षण चंचल ने पायल की पुनर्ज्योति पायी झील सी गहरी आँखों में कल - कल करते झरनों को बहते देखा . कुलांचे मारते मस्त हिरणों को लपकते देखा . टिमटिमाते दियों को अचानक भड़कते देखा . गदराई चटक - रंग कलियों को दीवार से उतरती धूप की रफ़्तार से चटक कर फूल बनते देखा . बौराए आम के बगीचों को अमियाते और उन पर कोयलों को फुदक कर कूकते देखा . जीवन की बुलबुलों को मौजों के नग्में गाते देखा . उजाले पाख की पुरवाई रात में फुलयाई नीम की डोलती डाल पर दमकते चाँद को झूलते देखा . और - - - और मासूम बया को फटाफट खूबसूरत घोसला बुनते - बनाते देखा . उसे ऐसा लगा - - - उसने पायल की आँखों में कोई अछूती किताब शुरू से अन्त तक पढ़ ली हो -- पूरी की पूरी .

थोड़ी ही देर में एक बीमार सा दवाखाना दिखा . चंचल ने मजबूरन वहीँ पायल की मरहम - पट्टी करवा दी - - - फिर अपने घर ले जाकर , अपनी छोटी बहन गेसू और पिता प्रोफ़ेसर साहब से उसका परिचय करवाकर उसे फ़िलहाल घर में ही रहने की मनचाही अनुमति ले ली .
 
सुबह के उजले पंछी ने अपने पंख पसार लिए थे और रात अपनी काली बाहें सिकोड़ चुकी थी . सूरज अपना सोना बिखेर रहा था . सुनहरी धूप खिड़की से छलांग लगाकर कमरे में आ रही थी और अपने साथ ईश्वर का ये शुभ सन्देश भी ला रही थी कि हर रात के बाद सवेरा होता ही है .

भोर की पवित्र बेला में बेला की मनमोहक महक हवा में तैर रही थी . प्रोफ़ेसर साहब कमरे से बाहर निकल कर लॉन में टहलने लगे . यह उनका प्रतिदिन का नियम था और साथ ही उनके अच्छे स्वास्थ्य का राज भी . लगभग पचपन वर्ष के युवा थे वो . क्योंकि कोई भी उन्हें सरसरी नज़र से देखकर पैंतालिस वर्ष से ऊपर का नहीं कह सकता था. कठोर परिश्रम में विश्वास करने वाले प्रोफ़ेसर साहब जेब के साथ ही स्वास्थ्य के सम्बन्ध में भी काफी संपन्न थे .किसी भी कार्य को छोटा या बड़ा नहीं समझते थे - - - न ही उसे करने में कोई शर्म - संकोच करते थे . दुर्भाग्य के प्रकोप ने भरी जवानी में ही उन्हें विधुर बनाकर उनकी खुशियों पर डाका डालने का प्रयास तो किया था - - - मगर वो थे कि इससे थोड़ा ठिठकने के बाद जीवन को सम्पूर्णता के साथ जीने की कला में स्वयं को ऐसा पारन्गत बना लिया कि हँसते ही जा रहे थे . जब गेसू दो और चंचल पांच वर्ष के थे , उस वक्त उनकी माँ का आकस्मिक निधन हुआ था . इसके बाद सौतेली माँ के संभावित दुर्व्यवहार की आशंका वश उन्होंने दूसरा विवाह करने का जोखिम नहीं लिया - - - यह सोचकर कि आने वाली कहीं ममता की जगह बच्चों की जेबों में नफरत न डाल दे . और तब से लेकर अब तक उन्होंने अपने अरमानों को , कुदरती भूख को , शारीरिक मांगों को दबाये रखा और बच्चों के वास्ते बाप के साथ - साथ माँ भी बन गए . उन्हें संवारते - बनाते अपना ख़याल तक भूल गए . अब यही बच्चे उनके लिए ऊर्जा का वो सूर्य थे जिसकी परिक्रमा मात्र ही उनका जीवन - धर्म बन गया था . पोंगा पंथी पुरातन विचार उन्हें छू तक नहीं सके थे . संकीर्णताओं से उन्हें परहेज ही नहीं , बल्कि घृणा थी . जीवन के हर क्षेत्र में कुछ ख़ास होना उनके किये आम बात थी . नए पुराने की उत्तमताओं के समन्वय से जिस व्यक्तित्व का संश्लेषण हुआ था - - - उसकी संज्ञा थे प्रोफ़ेसर साहब . उर्दू जैसी मीठी ज़ुबान , हिंदी जैसा आम चेहरा , संस्कृत जैसे सात्विक विचार , पंजाबी जैसे फड़कते और अंग्रेजी जैसे बोल्ड व बेपरवाह अन्दाज़ थे उनके . सामजिक कुरीतियों की परवाह न करते हुए , उनकी धज्जियां उड़ाने वाले बेहद खुले दिमाग के और खूब मजाकिया स्वभाव के थे प्रोफ़ेसर साहब .

रोज सुबह के नियमानुसार जाग - उठ कर चंचल और गेसू कमरे से बाहर आये और उन्होंने अपने पिता प्रोफ़ेसर साहब के चरण स्पर्श कर उनमे प्रवाहित ऊर्जा - पुंज का कुछ अंश आशीर्वाद - स्वरूप स्वयं में उतारने का दैनिक प्रयास किया .

जब गेसू ने उनके पैर छुए तो अपनी आदत के अनुसार वातावरण को हास्यमय बनाने के उद्देश्य से उन्होंने चुटकी ली -- " जीती रहो बेटी - - - खुश रहो . तुम्हें राजा - सा दूल्हा और महलों - सा सुख मिले ."

" शर्मायी गेसू तुनक कर बोली -- " ये क्या - - - पिताजी आप भी - - - . "

"अच्छा बाबा , मुँह मत फुला . जा तुझे बन्दर - सा दूल्हा और झोपड़ी - सा सुख मिले . अब तो हुई खुश ? " प्रोफ़ेसर साहब उसकी बात काट कर , हंसकर बोले .

" जाइये हम आपसे नहीं बोलते . " गेसू ने बनावटी गुस्सा बिखेर कर कहा . वैसे तो वो अपने भावी दूल्हे की चर्चा से मन में एक मादक सी गुदगुदी अनुभव कर रही थी - - - लेकिन ऊपरी तौर पर गुस्सा तो प्रकट ही था - - - क्योंकि ऐसा तो सभी जवान लड़कियां करती हैं

बाप - बेटी में नोक - झोंक चल ही रही थी कि पायल भी आ गयी . सब लोग नाश्ते के लिए डाइनिंग - टेबल के इर्द - गिर्द बैठ गये . नौकरानी - - - सुन्दर व गुदाज जिस्म की चालीस वर्षीय रधिया नाश्ता ले आई . सभी लोग नाश्ता करने लगे .

तभी प्रोफ़ेसर साहब को अनुभव हुआ कि गेसू के चेहरे का प्रभा मण्डल कुछ फीका उतरा सा है . उनकी दुनिया देखी आँखों को गेसू के मन की बेचैनी भांपने में कोई कठिनाई न हुई . वैसे भी जो बाप अपने बच्चों के चेहरे के भाव देख कर उनके मन की थाह नहीं लगा लेता - - - समझो कि वो बच्चों के प्रति लापरवाह है .

" तुम कुछ उदास हो गेसू ? देख रहा हूँ - - - तुम्हारा चेहरा कुछ बुझा - बुझा सा है . " प्रोफ़ेसर साहब ने गेसू को कुरेदा .

गेसू ने बल पूर्वक मुस्करा कर बात को टालने का प्रयास किया -- " नहीं - - - ऐसी तो कोई बात नहीं . मेरे चेहरे पर रौशनी तो है - - - बस नींद पूरी न होने से - - - जरा सा वोल्टेज कम है "

चंचल और पायल उसके जवाब पर हँस दिए मगर ऐसी कई बरखा झेल चुके प्रोफ़ेसर साहब पूर्ववत गंभीर रहे .

उन्होंने शब्दों पर जोर देते हुए कहा -- " देखो बेटी - - - पैर चाहे कितने भी ऊंचे क्यों न हो जायें - - - पर रहेंगे कमर के नीचे ही .तुम अपने खोखले शब्दों पर मुस्कान की कलई चढ़ाकर मुझे फुसला नहीं सकती . सच - सच बताओ - - - बात क्या है ? "

अपने बहाने को रुई सा धुनकता देख , गेसू ने समर्पण कर कहा -- " जी - - - कल मै बैंक से साढ़े तीन हजार रूपये निकाल कर ला रही थी - - - रास्ते में पर्स कहीं गिर गया , इसी से मन परेशान था . "

" ओह - - - तो ये है तुम्हारी परेशानी का कारण ! भला इस बात से अब मन - मस्तिष्क में तनाव पैदा करने से क्या लाभ ? " जो खो गया - - - निश्चित ही वो तो अब मिलने से रहा . फिर हम - - - जो बची है - - - उस मानसिक शान्ति को क्यों खोयें ! "

" लेकिन पिताजी मुझे इस बात का बेहद दुःख है . "

" बेटी - - - जिस दुःख का कोई तात्कालिक उपाय न सूझे - - - उसका मजा लेना सीख लो तो जिन्दगी और भी खूबसूरत हो जायेगी . "

"दुखों का मजा ! भला ये कौन सी बात हुई ? "

" बेटी - - - यही तो जीने की कला है . इसे ऐसे समझो . दुःख असंतोष से उत्पन्न होता है - - - जबकि सुख संतोष से मिलता है . तुम्हें तो जीवन में बस ऐसा दृष्टिकोण विकसित करना होगा कि तात्कालिक असंतोष के कारणों के दूरगामी परिणामों की पर्तें उधेड़ कर जैसे - तैसे जबरन उनमें सन्तोष को तलाश लो . बस - - - सुख तो अपने आप हाथ आ जाएगा . "

" मै अब भी ठीक से नहीं समझी . "

" समझने की जिज्ञासा उत्पन्न हो रही है तो भविष्य में सुखी सन्तुष्ट व्यक्तियों की जीवन - पद्धति पर निरंतर पैनी नजर रख कर उसका अनुकरण करने की अच्छी आदत डालो . सुखद परिणामों का स्वाद धीरे - धीरे सब समझा देगा . " प्रोफ़ेसर साहब ने समझाया और गेसू की पीठ थपथपाकर पुनः बोले -- " अच्छा चलो - - - अब सामान्य हो जाओ . यह सोचकर उदासी दूर भगाओ और तसल्ली पाओ कि लक्ष्मी चंचला है . वह किसी के पास अधिक दिनों कब ठहरी है . हो सकता है - - - तुमसे रूठ - छिटक कर वह किसी अन्य जरूरत मन्द के पास जाये और उसके बिगड़े काम बनाए . इस सूरत में भी तुम्हें उस अन्जाने की खूब दुआएं मिलेंगी - - - जो जीवन की अचल संपत्ति बन कर आड़े वक्त में जरूर तुम्हारे काम आएँगी . यही एक अब सर्वोत्तम सुखमय तरीका है तुम्हारे पास - - - मन को धीरज धराने का . "

इतना कहकर प्रोफ़ेसर साहब आँखों में सुरभीला स्नेहिल आकाश और होठों के कोर पर निश्छल मुस्कान लिए कमरे से बाहर निकल लिये . गेसू भी काफी कुछ हल्की होकर कमरे से बाहर हो ली . चंचल - पायल ही अब शेष बचे .

ऐसी अनुकूल तन्हाई में दो जवाँ दिल हों और वो गुटर गूं - गुटर गूं न करें - - - ऐसा कैसे संभव है !

" चंचल. " पायल ने राग छेड़ा .

"हूँ . " चंचल ने संगत दी .

" चंचल - - - सोचती हूँ - - - मुझ पर एहसान करके तुम अपने लिए शायद अच्छा नहीं कर रहे . "

" क्यों ? "

"क्योंकि एक जवान लड़का - - - एक जवान लड़की की मदद करे - - - और वो भी इतने बड़े पैमाने पर - - - अपने घर तक में रखने जैसी मदद करे - - - तो लोग शायद एक ही बात सोचेंगे - - - . "

" एय !" चंचल ने पायल की बात काटी .

" क्या ? " पायल नज़रें उठा कर बोली .

" कहीं तुम ही तो नहीं कुछ सोच रही , ऐसा - वैसा ? "

" कैसा ? " सिटपिटायी पायल की नज़रें झुक गयीं , चंचल की बात सुनकर .

चंचल हिम्मत जुटा कर बोला -- " पायल ! पता नहीं - - - दुनिया वाले सोचे या न सोचें - - - मैं तो इधर बीच कई दिनों से लगातार एक ही बात सोच रहा हूँ . जब से तुम मिली हो - - - मेरी साँसों में महकने लगी हो . लगता है , मै तुम्हारी जरूरत अनुभव करने लगा हूँ . अपनी जिंदगी को और बेहतर बनाने के लिए - - - तुम्हारी तमन्ना करने लगा हूँ . लगता है - - - तुमसे मिलने से पहले मै एक नीरस किताब था , जिसके कुछ ख़ास पन्ने फटकर कहीं बिखर - खो गए थे . तुम मिली , मानों वो पन्ने मिल गए . अब अगर ये पन्ने अधूरी किताब से चिपक जाएँ , तो किताब पूरी हो जाये . सच पायल - - - अगर साफ़ - साफ़ सुनना चाहो , तो मै यही कहूँगा कि तुम मुझे बेहद खूबसूरत लगने लगी हो . तुम वही हो , जो मेरे अचेतन मस्तिष्क में बसती थी . तुम मिल जाओ , तो मेरी ज़िन्दगी का नक्शा तितलियों के पंख - सा रंगीन हो जाए . एक वाक्य में - - - ज़िन्दगी के हसीं सफ़र में - - - मैं तुम्हें - - - बस तुम्हें ही हमसफ़र , हमदम और हमराज बनाना चाहता हूँ . बोलो - - - क्या मेरा साथ दोगी ? "

इतना कहकर चंचल ने भावावेश में पायल के हाथ पर हौले से अपना हाथ रख दिया . उसे लगा - - - जैसे उसने किसी मुलायम पंखों वाली चिड़िया पर हाथ रख दिया हो .

कहने को तो चंचल भावावेश में ये सब कुछ धाराप्रवाह कह गया था - - - मगर वह इस बीच नज़रें नीची ही किये था . सोचता था - - - क्या पता - - - पायल की क्या प्रतिक्रिया हो .

और तभी - - - हाँ , ठीक तभी चंचल के उस हाथ पर , जो पायल के हाथ के ऊपर था - - - दो - तीन गुनगुनी बूँदें टपकीं -- टुपुर - टुपुर - - - टप .

अचकचाए चंचल ने सकुचाई गर्दन ऊपर उठाकर देखा . देखा - - - पायल की गऊ - सी निर्मल आँखें रिस रहीं थीं

उसे रोता देखकर चंचल घबरा कर सिटपिटा गया . बोला -- " तुम बुरा मान गयी पायल ? "

" मै कौन होती हूँ बुरा मानने वाली ! सारे अधिकार तो तुमने छीन लिए हैं मुझसे . कर्तव्य भर ही अब शेष बचे हैं मेरे पास . "

इतना कहकर पायल और भी तेजी से फफक पड़ी और पागलों की तरह चंचल के हाथ को अपने सुर्ख नर्म - गर्म होटों से चूमने लगी . इधर से , उधर से , अगल से , बगल से .

अब चंचल की हलक में छलक कर अटक चुकी जान फिर से उसके दिल में लौट आयी तो उसने चैन की लम्बी सांस ली और खड़े होकर - - - पायल को अपनी ओर अधिकार पूर्वक खींचकर बलिष्ट बाहों के बंधन में भरपूर भींच लिया . उसे लगा जैसे कोई मुलायम सी गुनगुनाहट उसके सीने में दो तरफ़ा उतर जाने पर उतारू हो गयी है .

और उधर - - - पायल ने अनुभव किया कि उसकी नाज़ुक पसलियाँ कड़कडा कर कर टूट भी सकती हैं . उसके गले से एक मादक सिसकारी निकल पड़ी . फिर भी वो निर्विरोध खड़ी रही . क्योंकि उसे चंचल की बाहों में अपनी भटकती ज़िन्दगी के लिए उद्देश्य और रास्ता नज़र आने लगा . बेहतरीन मंजिल और सुरक्षित रास्ता . उसे लगा - - - उसकी अब तक की ज़िन्दगी , जो बदसूरत हकीकत थी , अब हसीं ख़्वाब बनने को है .

संयोगवश छज्जे पर खड़ी गेसू , ये दृश्य देखकर एक संतोष भरी मुस्कान बिखेर रही थी .

एक बात तो है - - - कि जिस घर में डाइनिंग - टेबल पर या अन्यत्र यथा संभव एक साथ बैठ कर परिवार के सभी सदस्य नियमित रूप से नाश्ते तथा भोजन का आनन्द लेते हैं - - - उस सौभाग्यशाली परिवार के सदस्यों में संवाद की निरंतरता निश्चित ही बनी रहती है . वहां संवादहीनता नहीं पनपने पाती . यदि परिवार के किन्हीं दो सदस्यों में वैचारिक भिन्नतावश मनमुटाव प्रारंभ भी हो जाता है तो उसका त्वरित समाधान इस स्थान विशेष पर संवाद के जरिये स्वतः निकल आता है . यदि दो सदस्यों में किसी विषय विशेष को लेकर अनबन की कोई स्थिति उत्पन्न भी हो जाए तो उनके चेहरों पर छलक आये मनोभावों को पढ़कर घर के पारखी बुज़ुर्ग अपने तजुर्बे व कौशल से तत्काल ही मध्यस्थता कर कोई सर्वमान्य समाधान निकाल कर उनके मन - मस्तिष्क पर जमे एक दूसरे के प्रति मैल को धो देते हैं . इस प्रकार परिवार में क्रमशः संवाद हीनता , मन मुटाव तथा विलगाव की स्थिति यथा संभव टल जाती है - - - और परस्पर प्रेम भाव बना रहता है . यही एक बहुत महत्वपूर्ण लाभ है -- प्रतिदिन साथ बैठकर खाने - पीने का .

यह अच्छी आदत प्रोफ़ेसर साहब ने भी अपने परिवार में डाली थी . इसी आदत के अनुरूप - - - मेज के इर्द - गिर्द चंचल , गेसू और प्रोफ़ेसर साहब शाम के नाश्ते के इन्तज़ार में बैठे थे . जबकि पायल किसी आवश्यक कार्य वश कहीं बाहर गई हुई थी .

कमरे में लगी दूधिया विद्युत - ट्यूब मुस्कराती हुई सुखद रौशनी बिखेर रही थी . खिड़की पर लगे खूबसूरत रेशमी परदे हवा की छेड़खानी के चलते किसी हसीना की जुल्फों की तरह लहरा रहे थे . कमरे से बाहर - - - गोधूल - बेला में शाम और रात गलबहियां करके कल फिर मिलने का वादा कर रहे थे - - - कसमें खा रहे थे -- प्रेमी - प्रेमिका की भाँति . बाहर बगीचे में खिलखिलाते बेला की भीनी - भीनी ख़ुश्बू खिड़की फलांग कर कमरे में अनवरत रूप से दाखिल हो - होकर नाक के रस्ते सभी के मस्तिष्क में घुसकर मन को खुशहाल करने पर तुली हुई थी .

और तभी !

ठीक उसी समय - - - नौकरानी रधिया ने आकर सूचना दी कि कोई साहब गेसू से मिलना चाहते हैं .

" उन्हें सादर अन्दर बुला लो . " प्रोफ़ेसर साहब बोले .

रधिया बाहर चली गई . थोड़ी देर में एक नवयुवक कमरे में दाखिल हुआ . कसी लम्बी कद काठी वाले युवक के चेहरे से पौरुष छलछला रहा था . ऐसा सुता चेहरा था , जिसे लड़कियां कनखियों से देखना पसंद करती हैं .

सभी ने संस्कार वश थोड़ा सा खड़े होकर उस अपरचित के स्वागत की औपचारिकता निभायी .

दुआ - सलाम के बाद प्रोफ़ेसर साहब सामने की कुर्सी की ओर इशारा करके बोले -- " कृपया बैठें . "

" धन्यवाद . " कहकर युवक बैठ गया .

"माफ़ कीजिये ! मैंने आपको पहचाना नहीं ." गेसू ने कहा .

" एक प्याला चाय खर्चा कीजिये . अभी जान - पहचान हुई जाती है . " युवक ने हंसकर जवाब दिया .

प्रोफ़ेसर साहब ने मुस्कराकर चाय का एक प्याला युवक को देकर पूछा -- " फिर भी - - - आपकी तारीफ़ ? "

युवक भी मुस्कराकर बोला -- " सर जी ! तारीफ़ तो उस खुदा की है , जिसने मुझे लापरवाही में बनाया . वैसे बन्दे को गुलशन कहते हैं . गुलशन ' बावरा '- - - ."

" बावरा क्यों ? आप बावरे कैसे हो ? " गेसू ने बीच में ही रोककर मध्यम हंसी में मुलायम चुटकी ली .

ली गयी चुटकी क्योंकि किसी युवती की थी - - - इसलिए गुलशन ने दिल पर न लेकर , उसका मजा ही लिया और दो कदम आगे बढ़कर हाज़िर जवाबी दिखाई -- " वास्तव में - - - पहले तो मै था सादा - सूदा गुलशन - - - और चूंकि गुलशन में गुल खिलते - खिलते रह गया - - - इसलिए गुलशन बावरा हो गया . "

इतना कहकर गुलशन ने हंसकर गेसू से पूछा -- " अपने चेहरे - मोहरे का भी वर्णन करूँ क्या ? "

" हाँ -हाँ - - - क्यों नहीं - - - जरूर . " गेसू भोर के गुलाब की तरह मुस्कराकर चहकी .

" तो सुनिए ! " गुलशन लम्बी सांस भरकर कहने लगा --" मेरी कद काठी हिन्दुस्तानी और भाग्य बेमानी किस्म का है . चेहरा मर्दाना - -- - मगर मूंछें गुजरे बाप की याद दिलाती सफाचट हैं . औसत पतलून व बुश - शर्ट पहनता हूँ और जनता की भाषा में बोलता हूँ - - - लेकिन अंग्रेजी में सोचता हूँ . सोचता - बोलता ज्यादा - - - मगर करता कम हूँ . इसीलिए मेरा मन एकदम भारतीय बुद्धिजीवी सरीखा हो गया है . मेरी कल्पना पेशावरी घोड़े की तरह जमीनी सतह से थोडा ऊपर ही हवा में दौड़ती है . यानी मिजाज शायराना है . पर कुल मिलकर मै एक हिन्दुस्तानी किस्म का आदमी हूँ . मेरी आमदनी में किसी इनकम - टैक्स वाले ने कभी कोई दिलचस्पी नहीं ली - - - इसलिए कुल मिलाकर मै औसत हिन्दुस्तानी ही हूँ . "

इतना कहकर और हँसकर गुलशन ने एक बिस्किट उठाकर मुंह में कैद कर लिया .

सभी हंस पड़े उसकी बात पर . गेसू भी हंसी -- घुँघरू खनकने वाली हंसी .

" आप बहुत दिलचस्प आदमी हैं . " वह हँसते - हँसते बोली .

" कभी - कभी . " गुलशन ने गंभीर होकर कहा .

अबकी चंचल ने अपना मौन तोड़ा -- " क्या आप बताएँगे कि आपका हमारे यहाँ कैसे आना हुआ और हम आपके किस काम आ सकते हैं ? "

" अभी तो शायद किसी काम नहीं . जी - - - बात ये है - - - मुझे पिछले माह एक पर्स पड़ा मिला था - - - . "

पर्स की बात सुनकर सभी चौंक पड़े . सबके दिलों में हर्ष मिश्रित उत्सुकता कुलबुलाने लगी , आँखों में उम्मीद के दिए लपलपाने लगे और कान कुछ सुखद सुनने के लिए फड़फड़ाने लगे .

उनके मनोभावों को बांचकर , गुलशन बिना विलम्ब अपनी बात को जारी रखते हुए बोला -- " उस पर्स में गेसू जी की फोटो युक्त बैंक - पास - बुक थी , मय साढ़े तीन हज़ार रुपयों के . किन्तु मेरे लिए यह भी एक सुखद संयोग ही था कि उसी वक्त मुझे कुछ रुपयों की अत्यधिक आवश्यकता थी . मै तो धनाभाव में निराश ही हो चुका था . बेबसी का मोटा माड़ा मेरी आँखों पर छा चुका था - - - लेकिन पड़े मिले रूपये हाथ आते ही मैंने इसे ईश्वर का संकेत और मेहरबानी मान कर उसमे से जरूरत भर रूपये कार्य विशेष में खर्च कर दिए . खर्च करने से पूर्व मैंने पास - बुक का अध्ययन कर अनुमान लगा लिया था कि इन रुपयों के अभाव में गेसू जी के किसी कार्य में कोई विशेष व्यवधान नहीं पड़ेगा . और फिर - - - कुछ दिनों के अंतराल पर पर जब मैंने रूपये पुनः एकत्र कर लिए तो फ़ौरन ही इन्हें इनके असली हकदार तक पहुंचाने चला आया . हाँ - - - इस वापसी में मेरे कारण जो थोड़ा विलम्ब हुआ -- - - उसके लिए मै क्षमा चाहता हूँ . "

गुलशन ने अपने कंधे पर लटके कम्युनिस्टी थैले से पर्स निकाल कर मेज पर रख दिया और सचमुच हाथ जोड़ दिए .

" अरे - - - रे - - - ये तुम क्या कर रहे हो ! " चंचल व प्रोफ़ेसर साहब साथ - साथ बोल पड़े .

बाप और बेटे इस गला काट महगाई के जमाने में ईमानदारी की ऐसी जिन्दा मिसाल मशाल की तरह अपने सामने लपलपाती देख आश्चर्य चकित हो उठे . उनकी आँखें निहाल और सुधियाँ मालामाल हो गयीं . इस छोटे से पल उन्होंने उस दुर्लभ पल को भरपूर जिया - - - जब कुछ खोकर नहीं बल्कि कुछ पाकर भी व्यक्ति ठगा - सा रह जाता है . उन्हें लगा जैसे उन्होंने भेड़ को बकरी जनते हुए देखा हो . जैसे गूलर पर फूल उगते देखा हो . जैसे तपते विशाल रेगिस्तान के बीच कहीं कोई जल - स्रोत फूटते देखा हो . और गेसू - - - वो तो सम्मोहित सी , कभी पर्स तो कभी गुलशन को देख रही थी . और कभी - कभी तो जागती आँखों में तैरते सपनों में उसको अपने बगल में बिठा कर कुछ आंकलन सा कर रही थी .
 
गुलशन ने कहा -- " अच्छा - - - तो अब मुझे चलना चाहिए . "

" अभी नहीं जाने देंगे . तुम जैसे ईमानदार आदमी के साथ मै अपना अपना अधिक से अधिक समय बिताना पसन्द करूंगा . वास्तव में तुम ईमानदार और नेक आदमी हो - - - और अगर इसी तरह चलते रहे तो बहुत दूर तलक जाओगे . यह मेरी सोच भी है और कामना भी . न जाने आज सांझ - ढले मेरी किस्मत का कौन सा सितारा मुस्कराया है , जो तुम जैसे नेक इंसान से मुलाक़ात हुई . " प्रोफ़ेसर साहब के दिल की गहराइयों से आवाज आई .

" आपने रूपये नहीं गिने ! " अधिक प्रशंसा का स्वाद पाकर गुलशन की जबान कुछ फिसल गई .

" आप हमें शर्मिंदा कर रहे हैं " बाईस बसंतों से लदी - - - गदराई जवानी के खुमार से बोझल पलकों के भीतर कैद - - - गेसू की जादुई आँखों में मानो शिकायत उभर आई .

गेसू ! बाईस साल की उफनती जवानी . ऐसी - - - जैसे टेसू पर फूल गदरा आये हों -- मादक , रस भरे . भादों के जामुन की सबसे ज्यादा लदी लचलची डाल - सा उसका यौवन था . उसका भरा सानुपातिक मखमली शरीर एक खूबसूरत बगीचे की तरह खिला हुआ था . उसके होठ बड़े प्यारे थे . कितने रसीले - - - शहतूती होठ ! यदि उंगली रख कर दबा दें तो रस छलछला कर बाहर आ जाए . उसकी शरबती आवाज वातावरण को मीठा बनाने में माहिर थी . उसकी सम्मोहक नज़र किसी को भी उम्र कैद सुनाने का बूता रखती थी . उसकी मुस्कान ऐसी थी , जैसे सुबह के खिलते पवित्र कमल की सात्विक मुस्कान . चलते समय उसकी कमर ऐसे बलखाती थी - - - ऐसे लहराती थी , जैसे कटी हुई खूबसूरत पतंग . कुल मिलाकर वह बेहद खूबसूरत थी और हुस्न का ऐसा धधकता सूरज थी , जिसकी तरफ सूर्यमुखी के फूल की तरह सदा निहारते रहना युवा पुरुष अपना परम धर्म समझें . ऐसा लगता था - - - विधाता ने फुर्सत में उसे बड़े सधे हाथों से गढ़ा हो . तभी तो उसकी हर बात सधी हुई थी . उसका हर अंदाज़ सधा हुआ था . वह बड़े सधे हुए ढंग से चलती थी . सधे हुए तरीके से उठती - बैठती थी . और - - - और बातचीत का ढंग भी बेहद सधा हुआ था . उसके बात करने के अंदाज़ और शब्दों के चयन से ही प्रतीत होता था कि कोई बुद्धिजीवी महिला बात कर रही है .

क्योंकि वह खूबसूरत थी , इसलिए गुलशन ने उसे गौर से देखा . और फिर - - - खूबसूरत लड़कियों को ध्यान से कौन नहीं निहारता ! लड़का सोचता है - - - काश ये मेरी बीबी होती . बूढ़ा सोचता है - - - काश ये मेरी बहू होती . लड़की सोचती है - - - ये मेरी भाभी होती . तात्पर्य ये है कि सभी अपने - अपने ढंग से सोचते हैं कि खूबसूरती जितना अधिक संभव हो - - - किसी न किसी बहाने आँखों के सामने रहे . दिल - दिमाग को सुख पहुँचाये . और यही बात - - - बिल्कुल यही बात खूबसूरत लड़कों पर भी लागू होती है .

प्रोफ़ेसर साहब ने गुलशान का ध्यान भंग किया -- " घर कहाँ है तुम्हारा ? "

" कहीं नहीं . "

" क्या मतलब ? आखिर कहीं तो रहते होगे ? " प्रोफ़ेसर साहब ने चौंक कर पूछा

" हाँ - - - रहता तो हूँ - - - पर घर में नहीं - - - मकान में . और घर और मकान में बड़ा अन्तर होता है . घर उसे कहते हैं , जहां भरा पूरा परिवार हो . शान्ति और सौहाद्र का साम्राज्य हो . और मकान - - - मकान में इन सबका अभाव होता है ."

" ओ s s s ह - - - तो क्या तुम्हारा परिवार नहीं है ? " गेसू की जिज्ञासा पसीजी .

गुलशन की पीड़ा मुखरित हुई -- " परिवार ही क्या - - - मेरा अपना कोई नहीं - - - कोई भी नहीं . "

और उस क्षण - - - गेसू , चंचल और प्रोफ़ेसर साहब ने एक साथ गुलशन की उदास आँखों में टीस के बादलों को उमड़ते - घुमड़ते , गरजते - तरजते देखा . दर्द के दरिया की भंवर के बीच में उलझ कर सुख को डूबते - छटपटाते देखा . भरी बहार के आबाद गुलशन में मनहूस बदशक्ल उल्लुओं को डरावनी आवाजें निकालते देखा . खड़ी फसल को जलाभाव में दम तोड़ते मुरझाते देखा . और - - - और बहार की छाती पर सवार पतझड़ को क्रूरता पूर्वक हँसते - खिलखिलाते देखा .

" सुनो ! " प्रोफ़ेसर साहब ने टोंका .

" हूँ . " गुलशन चौंका .

" करते क्या हो ? "

" जूतों की घिसाई . "

" मतलब ? "

" बेकार हूँ - - - बेरोजगार . स्ट्रीट लाइट की रौशनी में पढ़कर एम . ए . किया - - - फिर भी . "

" ओह . " प्रोफ़ेसर साहब के मुंह से एक सर्द आह निकली . बेहद ईमानदार व्यक्ति की बेरोजगारी पर . उसकी बेबसी और परेशानी पर .

सच ही तो है ! इस दुनिया में प्रायः दो ही तरह के व्यक्ति फटेहाल और ठनठन गोपाल हैं -- एक बेअक्ल और दूसरे अति ईमानदार . आम तौर पर किताबों में मिलने वाली चीज - - - ईमानदारी अपने दिल में किन - किन दर्दों के समंदर समेटे रहती है - - - और उसे अपने किये की क्या - क्या सजा भुगतनी पड़ती है , ये जानने की फुर्सत इस तेज रफ़्तार जमाने की जेब में कहाँ है !

प्रोफ़ेसर साहब ने कुरेदा -- " खर्चा कैसे चलता है ? "

" कहानी - कविता लिखता और ट्यूशन पढ़ाता हूँ . उसी से होने वाली सीमित आय से पेट को बहलाने की कोशिश करता हूँ और नौकरी तलाशने का असीमित धर्म निभाता हूँ ."

" ओह - - - तो तुम लेखक हो ! "

" हाँ - -- - दुर्भाग्य से हिन्दुस्तानी लेखक हूँ ." गुलशन ने थका - हारा जवाब दिया .

" सुनो - - - एक बात कहूं ! "

" कहिये ."

" मेरा घर मेरी आवश्यकताओं से अधिक बड़ा है . यकीन मानो - - - यह घर ही है , मकान नहीं . और इसका अधिकाँश भाग खाली पड़ा रहता है . जबकि तुम अकेले रहते हो . क्या तुम मेरे यहाँ रहना पसन्द करोगे ? बल्कि मै तो ये कहूँगा कि तुम हमारे साथ रहो . "

" हमदर्दी के लिए शुक्रिया . आपने मेरे साथ अपनापन दिखाया - - - यही क्या कम एहसान है मुझ पर . "

" अरे नहीं ! इसमें एहसान की कौन सी बात है बेटे !! आदमी ही आदमी के काम आता है - - - जानवर तो नहीं !!! " इतना कहकर प्रोफ़ेसर साहब ने मुस्करा कर फिर दबाव बनाया -- " अब देखना ये है - - - कि तुम मुझे आदमी समझते हो या जानवर . यदि मै तुम्हे आदमी नज़र आता हूँ , तब तो तुम्हे मेरी बात माननी ही पड़ेगी . "

" अरे - - - ये क्या कह डाला आपने ! वैसे इस समय तो आप मुझे देवता जान पड़ रहे है - - - देवता . " गुलशन शर्मिंदगी के साथ बोला .

" अरे नहीं भई , आदमी इंसान ही बन जाए - - - यही क्या कम है . देवता तो बड़ी दूर की चीज है . वास्तव में- - - आदमी और इंसान के बीच में ही बड़ी दूरी है . लोग प्रायः इसी सफ़र में थक जाते है . आगे के कहने ही क्या . हाँ - - - तो बताओ , तुम्हे मेरा प्रस्ताव मंजूर है ? "

" माफ़ कीजियेगा - - - नहीं . " गुलशन ने कुछ सोच कर जवाब दिया और बोला -- " सर जी ! मेरी और आपकी परिस्थितियों व स्तर में बहुत अंतर है . और मेरे विचार में - - - अपनी इज्जत व स्वाभिमान बनाए रखने के लिए आदमी को अपनी सीमाएं मानकर चलना चाहिए . आपकी मदद मेरी मुश्किलें तो आसान कर सकती है , मगर इसके बोझ तले दबकर मेरे स्वाभिमान की जान जाने का खतरा है . और वैसे भी - - - मैंने अपनी एकाकी ज़िन्दगी से बहुत कुछ समझौता कर लिया है . मुझे अकेले रहने में विशेष तकलीफ नहीं होती . "

प्रोफ़ेसर साहब ने समझाने का प्रयास किया -- " हो सकता है की तुम मेरी बात से सहमत न हो और प्रजातंत्र में तुम्हे इसका हक़ भी है - - - लेकिन मेरी एक सीमा तक कामयाब ज़िन्दगी का अनुभव तो ये कहता है कि आदमी को अपनी रोजाना की जिन्दगी में छोटी - छोटी बातों के बीच स्वाभिमान को लाना ही नहीं चाहिए . सरल और सफल ज़िन्दगी के लिए सुविधाजनक ये रहता है कि दोस्तों - परिचितों के खूब काम आना चाहिए . उनकी मदद का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए . ये बड़े सौभाग्य और संतोष की बात होती है . इसी प्रकार यदि कोई दोस्त - - - सगा - सम्बन्धी तुम्हारी मदद करने में सक्षम और तत्पर दिखे तो उसका सहारा लेने में भी कोई शर्म - संकोच नहीं करना चाहिए . इससे उसका भी कुछ नहीं बिगड़ता और तुम्हारा भी काम आसान हो जाता है . दुनिया यूँ ही आसानी से चल सकती है . मेरे विचार से - - - संबन्धों की नीव ही रखी जाती है , सुविधाओं के त्वरित महल खड़े करने के लिए . जब - तब , जगह - जगह स्वाभिमान की आड़ - बाड़ व्यक्ति को संकुचित और उसके जीवन को बड़ी सीमा तक तकलीफ देह बना सकती है . " प्रोफ़ेसर साहब इतना कहकर कुछ रुके और गुलशन की आँखों में देखकर पुनः बोले --" वैसे भी - - - जैसा कि तुमने अभी कहा था कि अकेले रहने में कुछ ख़ास तकलीफ नहीं होती , इसी से स्पष्ट है कि कुछ न कुछ परेशानी तो होती ही है . अच्छा छोड़ो - - - अब ये बताओ - - - क्या तुमने अच्छी तरह सोचकर फैसला लिया है -- हमारे साथ न रहने का . मै तो कहता हूँ - - - एक बार और सोच लो ."

" सौ बार सोच लिया है . कोई भी काम करने से पहले , उसके प्रत्येक पक्ष पर बहुत बार सोचने की मेरी आदत है . एक बार कोई फैसला कर लेने के पश्चात मै सोचना बन्द कर देता हूँ . और फिर - - - तब करने की बारी आती है - - - और करते समय मै पुनः सोचा नहीं करता - - - सिर्फ करता हूँ . क्योंकि करते वक्त बार - बार सोचने से फैसले प्रायः कमजोर हो जाते हैं . " गुलशन ने दृढ़ता से कहा .

" तुम्हारी उम्र के नवयुवकों में यही तो एक कमी होती है - - - कि तुम लोग अपने रास्ते और सोच खुद बनाने में यकीन रखते हो . बड़े - बुजुर्गों के अनुभवों का लाभ नहीं उठाते . खैर - - - जैसी तुम्हारी मर्जी . " प्रोफ़ेसर साहब ने हथियार डाल दिये .

गेसू - - - जो अभी तक बैठी सुन और गुन रही थी - - - अब सोच रही थी कि गुलशन थोडा हंसोड़ , बहुत शान्त और खूब गंभीर है - - - और अपने भीतर दर्द के गहरे सोते छुपाये हुए है .

" अच्छा - - - मै अब चलता हूँ . " गुलशन ने खड़े होकर - - - हाथ जोड़कर सबसे अनुमति मांगी .

" अपना पता नहीं बताओगे ? " प्रोफ़ेसर साहब ने कहा .

" हाँ - हाँ क्यों नहीं ! ये रहा मेरा पता . " गुलशन ने जेब से अपना साधारण सा विजिटिंग - कार्ड निकाल कर रख दिया और चलने को मुड़ा .

प्रोफ़ेसर साहब बड़ी आत्मीयता से बोले -- " कभी - कभार आते रहना . वैसे मेरे दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा खुले है . तुम हमारे घर को अपना घर भले ही न बनाओ - - - लेकिन ये सच है कि तुमने हम सबके दिलों में अपना घर बना लिया है . जाओ - - - आना न भूलना . "

कंपकंपाते होठों से इतना कहकर प्रोफ़ेसर साहब ने अपना मुंह दूसरी तरफ फेर लिया - - - और उनकी उँगलियाँ , पलकों की कोरों पर छलक आयी अपनी कमजोरी को चुपके से मिटाने लगीं .

गुलशन ने जवाब दिया -- " जी - - - जरूर आऊंगा . आता रहूँगा ,"

" चलो तुम्हें बाहर तक छोड़ दें . " चंचल ने औपचारिकता दर्शाई . सभी बाहर की ओर मुड़ने को हुए .

" अरे नहीं - - - आप लोग बेवजह कष्ट न करे . " गुलशन ने आभारी नज़रों से देखते हुए कहा .

" अच्छा - - - गेसू तुम जाओ , गुलशन को बाहर तक छोड़ दो . " प्रोफ़ेसर साहब ने निर्देश दिया .

अबकी गुलशन मना न कर सका . उसने मना करना भी न चाहा . क्योंकि आकर्षक नारी के अधिकाधिक सानिध्य की कामना पुरुषों के अचेतन मन में सामान्यतः होती ही है .

पिता के निर्देश पर ' जी अच्छा ' कहकर गेसू गुलशन के साथ हो ली . वह तो यही चाहती ही थी .

गेट के बाहर आकर - - - गेसू ने गुलशन पर अचूक मुस्कान मारकर पूछा -- " तो कब आ रहे हैं जनाब ? "

" फुर्सत मिलते ही ."

"रविवार का वादा करो ! "

" वादा नहीं करता . हाँ - - - कोशिश जरूर करूंगा . फिर भी - - - तुम मेरी प्रतीक्षा मत करना . "

" क्यों ? "

" क्योंकि प्रतीक्षा व्यक्ति को निराश बना सकती है . प्रतीक्षा यदि असफल रहे तो चिंता और मानसिक पीड़ा होती है ."

" लेकिन प्रतीक्षा के बिना भी कोई जीवन है ! जिसकी कोई प्रतीक्षा नहीं करता - - - समझ लो वह जीवन में असफल व्यक्ति है - - - और जो किसी की प्रतीक्षा नहीं करता - - - समझो उसके पास जीवन ही नहीं है . "

" वाह ! बड़ा सीधा सा है - - - तुम्हारा सफलता - असफलता का मापदण्ड . " गुलशन हंसकर बोला -- " अच्छा बाबा , आऊँगा - - - जरूर आऊंगा . बस- - -अब खुश ? "

" वादा ? "

" वादा . "

" बदलोगे तो नहीं , वादे से ? "

" बदलने वाला मौसम होता है गेसू - - - और मै आदमी हूँ . गरीब आदमी - - - जिसके पास भरोसा करने लायक एक - - - बस एक चीज होती है -- उसकी जबान . "

" ये तो रविवार को पता चलेगा . " गेसू कथक सी आँखें नचा कर बोली .

" अच्छा - - - तो अब चलता हूँ . " गुलशन मुड़ने को हुआ .

" हाथ नहीं मिलाओगे , चलते समय ? " गेसू ने शिकायती अंदाज़ में हाथ आगे बढ़ाकर कहा .

" उं - - - हूंअ - - - नहीं . मैंने सुना है - - - सुन्दर और जवान लड़कियों के शरीर में एक करेंट होता है . तुमसे हाथ मिलाने पर मुझे शॉक लग सकता है . मेरा मतलब है , झटका . और अब मै किसी तरह का झटका झेलने के लिए तैयार नहीं हूं . विशेषकर खूबसूरत झटका . "

" मतलब - - - तजुर्बा रखते हो , झटका खाने का ! बातों से तो ऐसा ही लगता है . " वह पलकें टिमटिमाकर हंसी .

उसकी बात सुनकर - - - गुलशन पहले तो अचानक गंभीर हुआ - - - फिर तत्काल हंसी का लबादा ओढ़ लिया - - - और न जाने कैसे उसके मुंह से अनायास निकल पड़ा -- " क्या तुम कुँवारी हो ? "

" हाँ - - - मै अविवाहित हूँ . " भेदभरी मुस्कान बिखेर कर गेसू बोली -- " अच्छा - - - अब विदा . रविवार को - - - . "

" आना नहीं भूलूंगा . शुभ विदा . " गुलशन ने गेसू की बात काटकर जवाब दिया और पलटकर वहां से चलने लगा . वैसे उसकी ये हरकत उसके पैरों को थोड़ा ना गवार लग रही थी .

जबकि गेसू उसे काफी दूर तक - - - देर तक देखती रही . यहाँ तक कि - - - जब वह चला गया - - - उसकी दृष्टि से ओझल हो गया - - - तब भी बहुत देर तक उसे देखती रही .
 
पार्क के भीतर घुसते ही महकते फूलों की ख़ुश्बू ने उनका स्वागत किया . वहां चारों ओर फूलों का साम्राज्य स्थापित था . एक छोटा सा साम्राज्य - - - जिसे अगर विस्तार के सम्पूर्ण अवसर मिल जायें तो वह पूरी दुनिया को खूबसूरत बना डालें .

मौसम भी मोहब्बत के लिए पूर्णतः अनुकूल व प्रेरक था . अचानक पायल का हाथ पकड़ कर चंचल ऐसे भागा , जैसे सुगंध का हाथ पकड़ कर पवन भागता है . वह भागता रहा - - - भागता ही रहा , तब तक , जब तक कि पायल थक कर चूर न हो गयी .

भागते - भागते - - - अचानक पायल एक गढ़ी - तराशी झाड़ी की ओट में धम्म से मखमली घास पर भरभरा कर बिखर गयी . वह काफी थक गयी थी . उसकी सांस फूलने लगी थी -- इस्नोफीलिया के मरीज की तरह . उसका वक्ष धौंकनी की भाँति उठ - बैठ रहा था . चंचल भी पायल के सामने बैठ गया . वह पीठ के बल लेटी हुई पायल की तरफ एक टक निहार रहा था . तभी उसके दिमाग में एक अजीब से विचार ने जन्म लिया . इस समय - - - हाँफ रही पायल का तेजी से उठता - बैठता वक्ष स्थल देख कर उसे ऐसा लग रहा था , जैसे दो नन्हें मासूम स्कूली बच्चों को उनकी अध्यापिका ने किसी शरारत पर सजा दी हो - - - और वो बच्चे एक साथ उठक - बैठक लगा रहे हों . पहले तो चंचल ने सोचा कि वह अपने इस मौलिक विचार से पायल को अवगत करा दे - - - मगर फिर उसने ऐसा नहीं किया , क्योंकि उसे खुद अपना ख़याल काफी फूहड़ लग रहा था . वह चुप चाप आँखों ही आँखों , उसकी रूप माधुरी पीने लगा .

" एय ! " अचानक पायल ने उसका ध्यान भंग किया .

" हूँ ! " चौंकते हुए चंचल बोला -- " क्या ? "

" यूँ एक टक क्या देख रहे थे ? " वह मुस्करायी .

" कुछ नहीं . कुछ भी तो नहीं . मै क्या देखूँगा ! तुम कोई ताजमहल हो क्या , जो तुम्हें एक टक देखूँगा !! " चंचल ने हड़बड़ा कर सफाई दी .

" अच्छा जी अब ज्यादा बातें न गढ़ों . नज़ारा बाजी कर रहे थे न ! तुम मर्दों को तो आँख सेंकने का पुराना मर्ज है . वैसे भी प्रेमी को प्रेमिका ताजमहल से कम नहीं दिखती . "

चोरी पकड़ी जाने पर झेंप गया चंचल सटीक चतुराई से बात बदलते हुए बोला -- " आज तुम्हारी आँखें लाल क्यों है जानम ? रतजगा किया है क्या ? "

" तुम ठीक कह रहे हो . बात कुछ ऐसी ही है . मै रात भर सो न सकी . " तीर निशाने पर लगा था और पायल मस्ती में आ गयी .

" चंचल ने कुरेदा -- " क्यों - - - बात क्या है ? "

" चंचल ! जब से तुमने मेरे जीवन में प्रवेश किया है , नींद मेरी आँखों से ओझल हो गयी है . सिर्फ सपने आते हैं - - - सपने . और सपनों में आते हो तुम .

" सच ? "

" नहीं क्या झूठ ! " पायल पर दबे पाँव सुरूर चढ़ने लगा -- " तुम्हें क्या पता चंचल - - - रात भर तुम्हारे सपने ब्लैक - मार्केट से खरीदती हूँ . " उसने चंचल की जाँघों का तकिया बना , उसके कान के निचले मुलायम हिस्से को अपनी नाज़ुक उँगलियों से सहलाकर कहा .

" इधर अपना भी तो यही हाल है जानी . यानि - - - दोनों तरफ है आग बराबर लगी हुई . सच तो ये है कि तुमसे मिलने के बाद समझ आया की ज़िन्दगी में एक लड़की क्या आती है , पूरी की पूरी कायनात ही खींचे लिए आती है . "

" अच्छा जी - - - ये बात है ! " वह इतरायी , फिर बोली -- " मगर ये तो बताओ - - - कल रात तुम सपने में नहीं आये . क्या नाराज थे मुझसे ? "

" धत पगली . तुमसे नाराज होकर भला मै जी सकूंगा ! " उसने पायल के खट मिट्ठे गालों को प्यार से थपकाकर कहा .

" चंचल ! सच मानो - - -- जब से तुम मेरी दुनिया में आये हो , मेरी रातों की नींद और दिन का चैन जाता रहा . जब तुम मेरे पास होते हो , तब तो होते ही हो - - - जब नहीं होते - - - तब भी आस - पास ही होते हो . न पता किस जादू के वश में हूँ . खुद को खुद ही भाने लगी हूँ . हर घड़ी आईने के सामने खड़ी रहने को मन करता है . सोने से पहले सोने का स्वांग करती हूँ और बन्द आँखों से तुम्हारी विविध मुद्राओं का स्वाद छकती हूँ . लगता है - - - मेरी दुनिया - - - जैसे अचानक सिकुड़कर बहुत छोटी हो गयी है . सारी सोच तुम्ही से शुरू होकर - - - तुम्ही पर ख़त्म हो जाती है ." पायल ने बच्चों की सी मासूमियत से अपने दिल को बेपर्दा कर दिया .

उसकी इस अदा पर चंचल कहकहा लगाकर हँस पड़ा . पायल भी अपनी हँसी रोक सकी . वह हंसी-- दो प्याले टकरा जाने वाली कोमल मधुर जलतरंगी हंसी .

फिर एकाएक वह गंभीर होकर कह बैठी -- " चंचल ! एक बात पूछूँ !! सच - सच बताओगे ? "

" तुम्हें यकीन नहीं ? "

" सो तो है - - - मगर न जाने क्यूँ - - - कभी - कभी दिल डरता है . "

" किस बात से ? "

क्या तुम मुझे हमेशा इतना ही प्यार दोगे ?

" ये भी कोई पूछने की बात है ! " इतना कहकर चंचल ने पायल को तनिक ऊपर उठाकर अपनी बाहों में भर लिया . उसे लगा - - - जैसे उसने सेमल के मुलायम ढेर को छाती से लगाया हो .

पायल की काली निराली आँखें विचित्र तरह से नाच - नाच कर रस उड़ेलने लगीं . उसकी रीढ़ का पोर - पोर पायल की तरह छनछना उठा और वो बांस की तरह दूर लहरा कर बोली -- " हटो जी ! बड़े वो हो . "

उसकी वाणी में कोयल ने अपनी कूक भर दी हो , ऐसा लगा . उसकी मादक आवाज से पार्क का चप्पा - चप्पा मदहोश हो गया . पत्ता - पत्ता पीने लगा - - - उसकी शरबती स्वर लहरी को .

रोमांचित चंचल ने बलपूर्वक उसे उठाकर अपने और नज़दीक लाने की कोशिश की तो वह थोड़ा और छिटकते हुए इठलाकर बोली -- " अरे ज जा ! नारी का बोझ संभालने की शक्ति है तुममे ? "

" तुम क्या जानो - - - फूलों का भार चाहे कितना भी हो - - - मगर मादक और हल्का ही लगता है . "

" अच्छा जी ! आज तो कवियों जैसी बातें हो रही हैं . "

" सच पायल ! कवि , पागल और प्रेमी में कोई ज्यादा अन्तर नहीं होता . "

" सो कैसे ? "

" वो ऐसे ! " चंचल मसखरी से बोला -- " प्रेमी यदि प्रेम में असफल हो जाए तो पी - पीकर कवि बन जाता है और सबको जबरन घेर - पकड़ कर अपनी दुःख भरी कविता सुनाता है और यदि कोई भी सुनने को तैयार न हो तो वह पागल हो जाता है . "

पायल हँसकर बोली -- " बिना प्रेम में असफल हुए अभी से ये क्या तुकबन्दी मिला रहे हो ! ज़रा सी पी तो नहीं ली ? "

" नहीं - - - मगर पीने का मन तो कर रहा है . "

" पीते हो ? "

" हाँ ! इधर बीच रोजाना ."

" कौन सी ? "

" तुम्हारी आँखों की . " वह पायल की नाक हिलाकर हँसा .

पायल के अछूते गुलाबी गालों पर शर्म की लाली ने अंगडाई ली और उसकी आँखें और भी सुरमई हो गयीं .

वह बलखाकर बोली -- " हटो जी - - - दिल्लगी करते हो . "

" नहीं - - - मै दिल्लगी नहीं करता . मै तो दिल - लगी करता हूँ . "

" मगर मेरे शब्द - कोष में दिल - लगी के मायने हैं रोमांस . "

वह चंचल हो उठी . बोलती आँखों के इशारे , जो वक्त - बेवक्त तीर बनकर चंचल के कलेजे को छलनी कर दिया करते थे - - - उसकी लड़खड़ाती पलकों की ओट में छटपटाने लगे .

बेचैन चंचल ने आगे झुक कर उसके माथे पर अपने फड़कते होठों से चूमना चाहा .

उसने छिटक कर मीठी बनावटी उलाहना दी -- " हाय दइया - - - बिना चेतावनी हमला बोल दिया ."

इसी के साथ - - - एक बिजली सी कौंध गयी , पायल की नसों में . उसे लगा - - - जैसे इस वक्त उसकी नसों में रक्त नहीं , शराब दौड़ रही हो . उसका पूनमी चाँद सा चेहरा डूबते सूरज सा सुर्ख हो गया , जैसे खून फटकर बाहर निकलना ही चाह्ता हो - - - और पलकें कुछ इस तरह झुकीं , जैसे उन्हें नींद आने लगी हो .

चंचल ने उसका हाथ पकड़ लिया . उसे लगा जैसे जाड़े की मुलायम धूप खाए गुनगुने मखमल पर हाथ रख दिया हो उसने . उसके अचेतन ने पायल को अप्रत्याशित झटका देकर अपनी तरफ खींच लिया . वह गदराये संतरों से बोझल डाल सी चिटक कर चंचल के सीने पर बिछ गयी . उसका सुडौल वक्ष - - - जिसमे हजारों अरमान और लाखों धड़कने कैद थीं , चंचल के कलेजे से भिड़ गया .

चंचल के अन्दर मचल रही चंचलता ने पायल को चिकोटी काटनी चाही - - - मगर वह उसका इरादा भांप कर परे लुढ़क गयी - - - और उठ चुका हाथ गलत जगह पड़ गया .

पायल के मुंह से एक तीखी व मादक सिसकारी निकल पड़ी . साथ ही वह हंसी -- थमी बरसात की इन्द्रधनुषी हंसी .

चंचल अचानक बात बनाते बोला -- " आज तुम कुछ अधिक ही सुन्दर दिख रही हो . '

" जरूरत के वक्त हर लड़की बहुत ज्यादा खूबसूरत दिखती है . "

" अरे नहीं - - - मैं सच कह रहा हूँ . "

" मेरी कसम ? "

" तुम्हारी कसम . "

पायल अपनी प्रशंसा सुनकर सोनजुही सी खिल उठी . उसके रोम - रोम में सुरसुरी दौड़ गयी और अंग - अंग प्रफुल्लित हो उठा .

प्रायः हर नारी अपने रूप की प्रशंसा सुनकर खिल उठती है . और फिर - - - जवानी की दहलीज़ को चूमने वाली कुँवारी अल्हड नवयौवना तो अपनी प्रशंसा का झोंका पाकर फूलों से लदी डाल सी झुक जाती है - - - और खुशियों में खोकर कभी - कभी तो अपना समर्पण तक कर बैठती है .

अपनी प्रशंसा की डोंगी में हिचकोले लेती पायल बोली -- " चंचल ! मै जवानी के सतरंगी इन्द्र धनुष को अपने भीतर पाना चाहती हूँ .उसके सारे रंगों को अलग - अलग देखना और मन की गहराइयों तक अनुभव करना चाहती हूँ . रंग - बिरंगी कलियों को अपने भीतर चिटक कर सुर्ख फूल बनते देखना चाहत हूँ ."

चंचल ने हाथ बढ़ाकर पायल की उँगलियों में अपनी उँगलियाँ फंसा दीं . यह पकड़ . लगता था - - - पायल की उँगलियों में बिजली की धाराएं बह रही हों . जबकि चंचल को अहसास हो रहा था - - - जैसे पायल धीरे - धीरे सारा बसन्ती मौसम ही उसके भीतर सरसाये दे रही हो .

वह बोला -- " पायल . "

" क्या ? "

" अब तो हम दो दिल एक जान हो गये है . पिताजी ने हमें शादी की अनुमति भी दे दी है . तब क्यों न मै अपने प्यार पर एक पक्की मोहर लगा दूं ! "

" भला कैसे ? "

" तुम्हें चूमकर . जी करता है - - - तुम्हारे गाल चूम लूं . चूम लूँ ? "

" हिश - - - कोई देख लेगा . "

" तब ? "

" देख लेने दो . "

पायल बहक गयी . चंचल मचल उठा .

चंचल ने लपक कर पायल के कुंवारे गालों को चूम लिया . ज़िन्दगी में पहली बार अपनी लाटरी लगी देख , उसके गाल तो मानों निहाल हो गए . चुम्बन का नशा फ़ौरन पायल पर छा गया . वह मदहोशी में अनियंत्रित होकर चंचल की बाहों में ढेर हो गयी . उसका अंग - अंग दिल बनकर धड़कने लगा और पोर - पोर छुई - मुई की तरह लाज से सिकुड़ गया . उसकी नसों के रक्त में जलतरंग बज उठी और नाड़ियाँ कुछ इस तरह झनझना उठीं जैसे सितार पर किसी ने अचानक सीधे झाला बजा दिया हो .

जैसा की इस उम्र में - - - इस माहौल में होता है - - - पायल उत्तेजना के सागर में प्रवाहित हो गयी . उत्तेजना ! वासना !!.जहां पहुँच कर दुनिया के सभी भेद समाप्त हो जाते हैं . सभी का आचरण एक सामान हो जाता है . व्यक्ति आदिम युग में लौट आता है . प्रकृति के निकट आ जाता है .

पायल चाह रही थी कि इस वक्त कोई जालिमों कि तरह उसके शरीर को झिंझोड़ डाले . बेदर्दी से कुचल - मसल दे . यहाँ तक कि उसकी नाजुक पसलियाँ चरमरा जाएँ और शरीर लहूलुहान हो जाए .

उसके बेकाबू हाथ ने चंचल को अपनी ओर खींच लिया . चंचल ने पागलों की तरह उसे जहाँ - तहां चूमना शुरू कर दिया . उसके शरीर में एक आग सी लगी हुई थी .

और लगभग निश्चित था कि उसकी तथाकथित नैतिकता इस आग में - - - कुछ पलों में भस्म हो जाती . धैर्य का बाँध टूट जाता . मगर तभी - - - चंचल के मस्तिष्क में विवेक की एक बिजली सी कौंधी और उसकी विस्तार पायी उत्तेजना अचानक सिकुड़ कर शान्त पड़ गयी . वासना की आग ठंढी पड़ गयी . वो छिटक कर पायल से दूर हो गया . जबकि तूफ़ान से गुज़र रही पायल यूँ खुच्चड़ हो चुके खेल में खुद को अकेली पाकर बेचैनी व बेबसी से उसे निहारती रह गयी .

चंचल बोला -- " पायल ! हमें अपनी भावनाओं पर अंकुश रखना चाहिये . कम से कम शादी तक . मैं समझता हूँ - - - आज एक बड़ा पाप होने से बच गया . "

" - - - - - - - - -" पायल कुछ न बोली . वह विवशा अनुभव करती रही - - - जैसे उसकी तेज साँसों की गर्मी से उसी के भीतर हौले -हौले कुछ पिघला जा रहा हो . शायद उसके अरमान . चंचल पुनः बोला -- " पायल ! "

" हूँ . "

" अगर मै बहक भी जाऊं तो कम से कम तुम्हें तो अपने पर नियंत्रण रखना चाहिये . "

" पता नहीं - - - तुम मर्द , हम औरतों से ही नियंत्रण की उम्मीद क्यों रखते हो ! और वैसे भी - - - जब दो जवाँ दिल हों और ऐसा अनुकूल एकांत हो - - - चुम्बनों की बौछार हो और बाहों के घेरे हों - - - तो आखिर कब तक खुद पर नियंत्रण रखा जा सकता है ! ! "

" कुछ भी हो - - - नियंत्रण तो रखना ही होगा खुद पर .यही सभ्य समाज का नियम है . सामाजिक नियमों - बन्धनों का पालन करना हमारी नियति है . क्योंकि हमें इसी समाज के बीच जीवन बिताना है . पायल ! शादी से पहले - - - स्त्री - पुरुष के सम्बन्ध विशेष को मैं भी अच्छा नहीं मानता . बल्कि यूँ समझो , पाप की संज्ञा देता हूँ . शादी तक तुम्हे ईमान की तरह अपने शरीर को संभाल कर रखना चाहिए . मुझसे भी . यूँ समझो - - - संयमित आचरण से भावी जीवन में बहुत सी संभावित समस्याओं से बचा जा सकता है . "

" - - - - - - - " पायल की सुराहीदार गर्दन ग्लानि के बोझ से लोच खाकर झुक गयी . उसने कहा तो कुछ नहीं - - - लेकिन उसे लगा जैसे चंचल सारा दोष उसी के मत्थे मढ़कर नाइंसाफी कर रहा हो .

उसकी मनोदशा का अनुमान लगाकर चंचल ने समझाया -- " पायल ! मैं ये मानता हूँ कि भविष्य में शीघ्र ही हमें एक होना है . हमारा विवाह निश्चित है . पर फिर भी थोड़ी देर के लिए ये मान लो - - - यदि आज हमारा शारीरिक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है और तुम संयोगवश गर्भवती हो जाती - - - लेकिन कल को मै आवारा निकल जाऊं या शादी से इन्कार कर दूं - - - अथवा किसी दुर्घटना में मारा जाऊं - - - तो भुगतना किसे पड़ेगा ! तुम्हें - - - और केवल तुम्हें . याद रखो - - - जवानी की संयुक्त भूल की कीमत सदा अकेले स्त्री को ही अदा करनी पड़ती है . इसीलिए कहता हूँ - - - हमें इन गलतियों से बचना चाहिए . विशेषकर लड़कियों को . "

" बस करो - - - अब चुप भी रहो . क्यों मरने - खपने का अपशगुन अलापते हो ! " पायल ने चंचल के मुंह पर अपना हाथ रख दिया और उसकी आँखों में ग्लानि छलछला आई .

" आओ - - - अब घर लौट चलें . " चंचल ने कहा .

बोझल हो चुके वातावरण को सामान्य बनाने की गरज से पायल ने बड़े सयानेपन से अपने होठों पर कृतिम मुस्कान और आँखों में शिकायत उकेर कर कहा -- " नसीहतें तो इतनी ढेर सी पिला दीं गुरूजी - - - अब कहीं बैठाल कर कुछ खिला तो दो निष्ठुर . "

अपनी बेवकूफी को समझ और उसकी होशियारी को ताड़ - - - चंचल पहले तो कुछ झेंपा , फिर मुस्कराकर बोला -- " तुम बड़े साफ़ दिल की व्यवहारिक पत्नी सिद्ध होओगी . चलो - - - इसी बात पर किसी आइसक्रीम पार्लर में चलते हैं . शायद इससे उबलते अरमान भी शादी तक के लिए ठंढे पड़ जाएँ . है न ! "

इतना कहकर हँसते हुए चंचल ने हाथ का सहारा देकर पायल को उठा लिया . दोनों पिछली बातों को भूलकर हाथों में हाथ डाल पार्क से बाहर निकल पड़े .
 
रविवार !

गुलशन भूला नहीं था .

व्यक्ति जिस बात में दिलचस्पी रखता है - - - उसे भूलता नहीं .

रविवार को ही गुलशन ने गेसू से उसके घर पहुँचने का वादा किया था . वादे के अनुसार - - - गुलशन के उत्साही कदम लय पूर्वक स्वतः गेसू के घर का रास्ता तय करने लगे .

वह सोच रहा था , गेसू के विषय में . गेसू उसे कुछ अजीब सी , बेहद बेबाक मालूम पड़ रही थी . गेसू का यह जवाब कि ' मै अविवाहित हूँ ' , उसे बड़ा अटपटा लग रहा था . जबकि उसने पूछा था , ' क्या तुम कुँवारी हो ' . वह सीधे - सपाट यह भी तो कह सकती थी , ' हाँ - - - मैं कुँवारी हूँ ' . मगर उसने ऐसा नहीं किया था . और हाँ - - - जवाब देते समय - - - वह मुस्कराई भी तो बड़ी अजीब तरह से थी . भेद पूर्ण और जिज्ञासा उत्पन्न करने वाली मुस्कान .

अन्य लड़कियों कि अपेक्षा - - - कुछ अलगाव , कुछ नयापन जरूर था गेसू में . और जहां सामान्य से अलगाव होता है , नयापन होता है , वहीँ तो आकर्षण उत्पन्न होता है . गुलशन भी गेसू के प्रति अपने को इस आकर्षण से बचा नहीं पाया था .

सोचते - सोचते ही गेसू का घर कब आ गया , समय का कुछ पता ही न चला . रूचि पूर्वक किये गए कार्य देखते ही देखते पूरे हो जाते हैं .

गुलशन भीतर चला गया .

खुले घर में खामोशी का विस्तार था . इससे पता चलता था की गेसू घर में नहीं है . क्योंकि पहली मुलाकात में ही गुलशन ने जान - समझ लिया था कि जहाँ गेसू हो वहाँ खामोशी के लिए कोई स्थान नहीं बचता . बचते है तो शोख - चटक किन्तु गरिमामय कहकहे .

गुलशन को अपने आने की निरर्थकता का आभास हो चुका था . फिर भी - - - उसने आवाज़ दी -- " गेसू s s s ."

" कौ s s s न ? " संभवतः किनारे वाले कमरे से किसी लड़की का प्रश्न उभरा .

आवाज़ सुनकर गुलशन चौंका . उसे लगा- - - ये आवाज़ शायद उसके लिए नयी नहीं है .

तभी पायल कमरे से बाहर आई और गुलशन को देख कर इस तरह से चौंकी , जैसे उसने भूल से बिजली के नंगे तार पर पैर रख दिया हो .

गुलशन ने पायल को देखा देखा . पायल ने गुलशन को देखा . दोनों ने आश्चर्य से फैली अपनी आँखों को झपकाया और फिर देखा . कोई अंतर नहीं . वही शक्ल . बिलकुल वही .

" तुम यहाँ s s s ? " एक साथ - - - दोनों के मुंह से आश्चर्य में डूबी आवाज़ निकली .

और इसी के साथ - - - गुलशन और पायल के मस्तिष्क में बीते हुए दिन आकाशीय बिजली की तरह कड़क उठे . जिसके झटके ने उन्हें अतीत में धकेल दिया .

गुलशन और पायल कॉलेज में साथ - साथ पढ़ते थे . गुलशन हमेशा उससे प्रेम का शालीन प्रस्ताव करता था - - -- लेकिन पायल ने कभी भी उसके प्यार का उचित उत्तर न दिया था . वह गुलशन की इज्जत करती थी और उसे एक सच्चे दोस्त के रूप में देखती थी - - -- मगर कभी भी उसको जीवन - साथी के रूप में स्वीकार न कर पायी थी . और इस अस्वीकृति के पीछे उसके अपने कुछ पूर्वाग्रह एवं विचार थे , कुछ तर्क एवं सपने थे .

पायल अतीत की खाईं से शीघ्र ही बाहर निकल कर बोली --" ओह - - - तो तुम्हीं वो हो , जिसके विषय में गेसू मुझसे चर्चा कर रही थी . "

" हाँ - - - लेकिन तुम यहाँ - - - इस जगह कैसे ? "

" भाग्य था - - - जो ले आया . बेसहारों का भी कोई न कोई सहारा तो होता ही है ."

" काश - - - तुमने मुझ पर भरोसा किया होता ! " ठंढी आह भरकर गुलशन ने कहा -- " लेकिन तुम यहाँ आई कैसे ? "

पायल ने अपनी आप बीती गुलशन को सुना दी .

सुनकर - - - द्रवित गुलशन ने पूछा -- " उस दिन , जब मै यहाँ आया था , तब तुम कहाँ थी ? "

" बाहर गयी थी . "

" सब लोग कहाँ गये ? "

" प्रोफ़ेसर साहब और चंचल तो अचानक मिली एक जरूरी दावत में चले गये . रधिया सब्जी लेने गयी . जबकि गेसू तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी - - - तभी फोन पर उसे खबर मिली कि उसकी किसी सहेली की तबीयत अचानक काफी खराब हो गयी . वह उसी के यहाँ गयी है . कह गयी है - - - थोड़ी देर में आ जायेगी . जाते समय उसने मुझसे कहा था कि तुम्हें बैठा लूंगी . " पायल ने बताया .

उचित एकान्त जान - - - गुलशन ने नाज़ुक मोड़ देकर उसे टटोला -- " मैं अब भी तुमसे वैसा ही प्यार करता हूँ , जैसा पहले करता था . पायल ! मुझ पर भरोसा करके तो देखो . "

" लेकिन मेरा दिल , जो पहले भी तुम्हारा न ठा , अब किसी और की अमानत है ."

" कौन है - - - वो चमकीली भाग्य रेखाओं वाला खुश - नसीब ? "

" चंचल ."

" ओह - - - तो वो चंचल है . यही चंचल - - - जिसने तुम्हें शरण दी है ? "

" तुमने ठीक समझा . "

" तो इसका मतलब ये है - - - कि जो व्यक्ति तुम्हारी सहायता कर दे , तुम उसके एहसान तले दबकर उससे प्यार करने लगो ! "

" लेकिन एहसान करने वाले से लगाव हो जाना तो स्वाभाविक है . और फिर चंचल भी मुझसे प्यार करता है . पहल उसी ने की थी . "

" मगर मै भी तो तुमसे प्यार करता हूँ . पहल मैंने भी तो की थी . और - - - और मेरी पहल चंचल से पहले की है . बहुत पहले की . पायल ! मैं तुम्हें प्यार करता था , करता हूँ और करता रहूँगा ."

इतना कहते - कहते गुलशन की ऑंखें छलक उठीं और वह रो पड़ा . एक मर्द रो पड़ा - - - - - - और मर्द की रुलाई किसी भीषण अंदरूनी तकलीफ की सूचक है .

उसके दुःख को अनुभव कर - - - पायल आगे बढ़ी . उसने गुलशन के आंसुओं को अपने दामन में सोख लिया और बोली -- " क्या करूँ गुलशन ! मेरी सोच - - - मेरे और तुम्हारे बीच में शुरू से अवरोध उत्पन्न करती रही . और अब तो काफी वक्त गुज़र चुका है . बहुत देर हो चुकी है - - - और मै और चंचल काफी कुछ दूरी तय कर चुके है . "

" लेकिन मुझमें क्या कमी थी ? मै भी तो कुछ सुनूँ . कुछ जानूँ . "

" जानना ही चाहते हो तो सच - सच सुनो . क्योंकि तुम एक अच्छे इंसान हो और मै तुम्हारी बहुत इज्जत करती हूँ , इसीलिए मै तुम्हें अब अँधेरे में नहीं रखूंगी . "

" कुछ बोलो भी तो . " गुलशन परिणाम जानने के लिए उत्सुक किसी आवेदक की भाँति अधीर हो उठा .

" गुलशन ! एक उम्र के बाद भी बेरोज़गारी कि अनचाही मैली चादर तले ढंककर पुरुष की समस्त अच्छाइयाँ धूमिल पड़ जाती हैं . क्योंकि तुम भी अब तक बेरोजगार हो , इसलिए तुम मुझे भरपूर प्यार तो दे सकते हो - - - भरपेट रोटी नहीं . जबकि प्यार के निरंतर प्रवाह के लिए जिन्दा रहना ज़रूरी है - - - और जिन्दा रहने की पहली शर्त है रोटी -- ज़िन्दगी कि बुनियादी ज़रूरतें . गुलशन ! प्यार कोई कैक्टस नहीं , जो हर हाल में मस्त - मुस्कराता रहे . प्यार तो बहुत नाज़ुक चीज़ है -- छुई - मुई के पौधे की तरह . " पायल कहती रही -- " यदि मैं तुमसे शादी कर लेती , या कर लूँ , तो कुछ समय तक तो हम प्यार के खुमार के सहारे अपनी जीवन - नौका खे सकते हैं - - - मगर कुछ ही दिनों में हमारी भौतिक ज़रूरतें , जीने की पहली शर्त - - - बुनियादी आवश्यकताओं के जालिम सर्द थपेड़े , हमारे प्यार की गर्मी को ठंढा कर देंगे . पेट की धधकती आग के सामने प्यार की गर्मी शरमा जायेगी . और तब हमें - - - कम से कम मुझे अपने किये पर पछताना पड़ सकता है ."

" लेकिन मैं अपने सर्वोत्तम प्रयास तो कर रहा हूँ . संभव है - - - मुझे कुछ ही दिनों में नौकरी मिल जाय . भाग्य ने यदि साथ दिया तो हमारी समस्याएं सुलझ सकती हैं ."

" पर भाग्य के सहारे बैठी रहकर मैं अपनी ज़िन्दगी का जुआं खेलूँ - - - उसे दांव पर लगा दूं ! क्या तुम ऐसा चाहोगे ? "

" नहीं पायल - - - नहीं . मैंने ऐसा कब कहा ! -- मेरी तरफ देखो पायल ." गुलशन ने उसके कंधे पर दम तोड़ती उम्मीदों सा अपना बोझल हाथ रखकर कहा -- " पायल ! ये सच है कि मै तुम्हें दौलत नहीं दे सकता , महल नहीं दे सकता - - - पर मेरी मासूम मोहब्बत यूनानी गुलामों की तरह हर वक्त तुम्हारा हुक्म बजाएगी . मुझ पर यकीन करके तो देखो . तुम अगर साथ दो - - - तो तुम्हारे वास्ते मैं अपनी ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के लिये ज़मीन आसमान एक कर सकता हूँ . उलझी हुई तकदीर के ताने - बाने को तोड़कर एक नया नक्शा दे सकता हूँ . खूबसूरत आकार को साकार कर सकता हूँ . "

" वो तो मेरी भी तमन्ना है गुलशन . मैं चाहती हूँ , तुम खूब आगे बढ़ो . लेकिन जहां तक मेरा सवाल है , तो यूं समझ लो - - - जिस तरह पुलों के नीचे से गुज़रा हुआ नदी का पानी वापस नहीं लौट सकता - - - कुछ वैसे ही , मैं भी तुम्हारी सीमाओं से से काफी बाहर निकल चुकी हूँ - - - क्योंकि अब चंचल मेरी ज़िन्दगी में बहुत गहरे दाखिल हो चुका है - - - और हम दोनों ने एक दूजे को काफी गंभीरता से लिया है . इसीलिये फिर कहती हूँ , मेरा ख़याल छोड़ दो . "

" नहीं - - - नहीं - - - नहीं . " गुलशन रोते - रोते चीख पड़ा -- " मैं तुम्हारा ख़याल कैसे छोड़ सकता हूँ ! मैं तुम्हें कैसे बिसार सकता हूँ ! ! मैं तुम्हें नहीं भूल सकता . कभी भी नहीं . पायल ! बेशक तुम मुझे प्यार नहीं करती - - - मगर मैं तुम्हें हमेशा प्यार करूंगा . मैं तुम्हें उस तरह प्यार करूंगा , जैसे टूटे - हारे लोग तन्हाई से करते हैं . मैं तुम्हें ऐसा प्यार करूंगा , जैसे बसंत रंग - बिरंगे फूलों को करता है - - - किसान अपने खेतों से करता है . मैं तुम्हें उतना ही चाहूंगा , जितना चित्रकार अपने चित्रों को और माली अपने बगीचों को चाहता है . मैं हमेशा तुम्हें उस तरह याद करूंगा , जैसे कोई राहगीर सफ़र के बाद उस नदी को याद करता है , जिसके जल से उसने अपनी प्यास बुझाई थी . मैं तुम्हें नहीं भूलूंगा . मैं तुम्हारा हूँ , तुम्हारा रहूँगा . "

" गुलशन ! मैं तुम्हारी भावनाओं की इज्जत करती हूँ और इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकती . मैं चाहती हूँ - - - तुम हमेशा उन्नति करो . "

" उन्नति करूँ ! " गुलशन चौंक कर बोला -- " क्या ख़ाक उन्नति करूँ !! अरे जब प्रेरणा का श्रोत ही दामन छुड़ा रहा है , तब उन्नति कैसे संभव है ? "

" उफ़ ! अब मैं तुम्हें कैसे अपनी मजबूरी समझाऊँ !! "

" - - - - - - - ."

" गुलशन ! एक बात कहूं ? "

" अभी कुछ शेष है क्या ? "

" हाँ . मेरी शादी चंचल से होने वाली है . उसने मुझे भद्र वचन दिया है . तुम भी वादा करो कि तुम मेरी खुशियों के बीच दीवार नहीं बनोगे . "

सुनकर - - - वह तो सन्न रह गया . जैसे कली चूने पर पानी पड़ गया हो . ढेर सारी भाप , ताप और सनसनाहट . उसे लगा जैसे उसे छिछोरा समझ कर किसी ने जोर का तमाचा जड़ दिया हो .

वह बिलबिला कर चीख पड़ा -- " पा s s s यल ! " लेकिन फिर यकायक पुनः स्वयं पर नियंत्रण करके बोला -- " हाय - - - क्या कह गयी तुम !! तुम्हारा प्यार सलामत रहे . कम से कम मुझसे ऐसी गिरी हुई बातों की आशंका तो मत करो . क्या मै तुम्हें छिछोरा नज़र आता हूँ ? मेरा प्यार तो चढ़ते हुए सूरज का प्यार है . वो तो रौशनी बनकर फैला है . उसने अंधेरों को उजाला देना सीखा है - - - और रौशनी कभी भी तुम्हारे रास्ते की दीवार नहीं बन सकती - - - बल्कि वो तो वक्त ज़रुरत खुद जलकर तुम्हें रास्ता ही दिखाएगी . " इतना कहकर गुलशन सिसकने लगा .

आशंका के बादल छंटे जान - - - पायल राहत की सांस लेकर बोली -- " मुझे तुमसे यही उम्मीद थी गुलशन . मैं तुम्हारी बहुत इज्जत करती हूँ मेरे दोस्त . पर बदकिस्मती से - - - . "

उसका गला रुंध गया . वह गुलशन के नज़दीक आ गयी . उसने गुलशन की ठोढ़ी के नीचे हथेली लगाकर उसके निराशा से बोझल झुके हुए सिर को ऊँचा किया , उसके आँखों के शून्य में झाँका और उससे लिपट गयी . गुलशन भी उसे पकड़ कर सिसकने लगा . ठीक उस बेबस बच्चे की तरह , जिसे आर्थिक अभाव के चलते उसका सबसे पसन्दीदा खिलौना नसीब नहीं होता .

थोड़ी देर बाद - - - गुलशन ने खुद को पायल की गिरफ्त से छुड़ाकर और अपने अकारथ आंसुओं को पोंछ कर कहा -- " अच्छा - - - अब मै चलता हूँ . "

" बैठो ! गेसू आती ही होगी . चाय पीकर जाना . "

" नहीं ! धन्यवाद . क्या करूंगा चाय पीकर ! आंसू क्या कम मिले हैं पीने को !! " गुलशन रुंधे गले से बोला -- " चलता हूँ . भगवान न करे - - - अगर कभी तुम्हें ज़िन्दगी की ऊबड़ - खाबड़ राहों में ठोकर लगे तो तुम मेरी ही बाहों में गिरने की कोशिश करना . वहां तुम्हें सहारा मिलेगा . एक भरोसेमंद सहारा . वैसे इस बात का शुक्रिया कि तुमने मुझे आईना दिखा दिया . "

" - - - - -- " पायल क्या कहती . वह चुप रही .

अचानक जैसे गुलशन को कुछ याद आया . वह बोला -- " यह रहा मेरा पता . "

गुलशन के हाथों ने पायल को अपना विजिटिंग - कार्ड पकड़ा दिया और उसके पाँव तेजी से मुड़कर दरवाजे के बाहर हो लिए .

और गेसू - - - हाँ वही - - - वो जल्दी से बगल में छिप गयी .

गेसू ने उन दोनों का सारा वार्तालाप संयोगवश सुन लिया था . वह बहुत देर पहले ही लौट आयी थी और दरवाजे की ओट में होकर उत्सुकतावश सब कुछ देख सुन रही थी . दरवाजे की ओट ! जो हमारे देश में आम तौर पर औरतों की ख़ास जगह रही है .

गुलशन जा चुका था - - - मगर पायल अब भी मेज पर सर झुकाए सिसक रही थी .

पायल सोच रही थी कि काश वो भी अँधा प्रेम करना जानती . काश - - - वो प्यार में दिमाग से नहीं , बल्कि पूरी तरह दिल से काम लेती . या फिर वो किसी जंगली जाति में पैदा हुई होती , जहां जीने की शर्तें बहुत आसान हुआ करती हैं -- लाज ढकने को चाँद पत्ते और पेट भरने को कन्द मूल . तब उसे गुलशन को जीवन - साथी बनाने में कोई परहेज़ न होता .

पायल से हुई इस आकस्मिक भेंट ने गुलशन के ज़ख्मों पर पड़ चली पपड़ियों को खुरच डाला था . उम्मीद का एक दीपक - - - जो पायल की तलाश में उसने अब तक बड़े जतन से जला रखा था , वो पायल का जवाब पाकर दम तोड़ने की जिद कर रहा था . उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे , क्या न करे . एक तरफ पायल से उसका किया हुआ वादा , उससे पायल की याद भुलाने की सिफारिश कर रहा था - - - तो दूसरी ओर पायल के प्रति उसका असीम प्रेम - - - उसे पायल को याद रखने और प्राप्त करने की ईमानदार कोशिश करते रहने के लिए मजबूर कर रहा था . ज़िन्दगी के दोराहे पर खड़ा गुलशन ये निर्णय नहीं ले पा रहा था कि वह किस राह का मुसाफिर बने . कभी तो वह पायल को भूलने की बात सोचता था और कभी उसे प्राप्त करने की . इन्हीं दोनों विचारों के मध्य लटका हुआ गुलशन - - - इस वक्त खुद को किसी चमगादड़ का हमनस्ल अनुभव कर रहा था , जो कभी चिड़ियों के साथ रहना चाहता है और कभी चूहों के साथ - - - और दोनों में से किसी एक का भी हमसाया नहीं बन पाता .

अंततः विचारों के बवन्डर में उड़ता - भटकता गुलशन - - - वर्तमान के टीले से लुढ़क कर अतीत की गहरी खाईं में जा गिरा .

कॉलेज के दिनों में गुलशन और पायल बी . ए . में साथ - साथ पढ़ते थे .

पहली ही नज़र में गुलशन पायल की चुम्बकीय खूबसूरती की तरफ आकर्षित हो गया था . आकर्षित करने का प्रायः आसान और पहला साधन तो खूबसूरती ही है - - - भले ही वह आकर्षण बाद में अस्थायी सिद्ध हो . चारित्रिक गुण आदि की बात तो पीछे आती है .

पायल ने भी गुलशन की आँखों में उमड़े प्यार को स्वभावतः पढ़ लिया था . औरतों में यही तो एक गजब की विशेषता होती है कि वो आदमी की आँखों में झाँक कर और उसके व्यवहार का अतिसूक्ष्म विश्लेषण करके तत्काल समझ जाती है कि उस आदमी के ह्रदय में उसके प्रति कैसी भावनाएं हिलोरें ले रही हैं . अब ये एक अलग बात है कि वो अपनी सोच और सुविधानुसार इसकी कैसी प्रतिक्रिया प्रकट करे - - - या फिर इसे सिरे से ही अनदेखा करके बिल्कुल अनजान बनी रहे .

धीरे - धीरे गुलशन पायल से किसी न किसी बहाने मिलने लगा . व्यक्ति जिसे पसन्द करता है - - - उससे बार - बार मिलने के बहाने भी अपने संस्कारों के अनुरूप तलाश लेता है . वो पायल से शैक्षिक - नोट्स का आदान - प्रदान करने लगा .

पायल भी धीरे - धीरे गुलशन में मौन रूचि लेने लगी . क्योंकि गुलशन एक भला आदमी था और भले आदमी में सभी दिलचस्पी लेते हैं . पढ़ाई में तेज और गंभीर गुलशन कॉलेज के लड़के - लडकियों में शराफत और सच्चाई का उदाहरण बन चुका था .

पायल को ख़ुशी थी कि गुलशन उसमें रस लेता था . वैसे ये बात किसी भी कॉलेज - बाला के लिए ख़ुशी और गुदगुदी का विषय है कि कोई लड़का उसमें रस ले - - - और तब तो सोने पर सुहागा वाली बात हो जाती है , जब रस लेने वाला लड़का शराफत और पढ़ाई में भी रस लेता हो .

धीरे - धीरे गुलशन तो पायल पर अपने प्रेम को प्रकट करने लगा - - - किन्तु इसी के साथ वह यह भी अनुभव कर रहा था कि पायल काफी कुछ संयम बरतते हुए उससे खुलकर कभी अपने मनोभाव व्यक्त नहीं करती थी . न जाने क्यों - - - वो सदैव मध्यमार्ग अपनाती रही और गुलशन के प्रति अपनी भावनाओं को उसके समक्ष स्पष्ट रखने में कतराती रही . गुलशन जब भी उससे अपने बारे में उसके विचार जानना था - - - तो वो सदैव भेद पूर्ण मादक मुस्कान के साथ चुप मार जाती . गुलशन का हसीं सपनों से सराबोर मन इस मादक मौन को सौन्दर्य द्वारा प्रेम की सहमति की एक अदा मान बैठा .

सच ही तो है - - - हमारे अजब मन के रंग - ढंग भी गज़ब निराले होते हैं . पहले तो वह किसी आकर्षक व्यक्तित्व के साथ एकतरफा प्रेम में पड़ता है - - - फिर अपने कथित प्रियतम के साधारण व्यवहार में भी अपने प्रेम का ऐसा अनुकूल प्रत्युत्तर जबरन ढूंढ निकालने की कला उसे आती है , जिसका वास्तव में कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं होता .

बी . ए . की परीक्षा संपन्न हुई . परिणाम निकला . दोनों पास हो गए . गुलशन प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ . दोनों ने साथ - साथ एम . ए . में प्रवेश लिया .

परन्तु गुलशन चूंकि पुरुष था - - - इसलिए एक काम उसने और प्रारम्भ किया . उसने अपने लिए नौकरी की तलाश शुरू कर दी - - - क्योंकि बिना नौकरी के गरीब गुलशन पायल के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखने में सकुचाता था . उसके अकेले की बात और थी , जो वह ट्यूशन पढ़ाकर खुद पढ़ता व पेट पालता था . उसके विचार में , उसके लिए नौकरी अब बहुत जरूरी हो चुकी थी - - - अतः वह नौकरी ढूँढता रहा .

ऑफिसों के चक्कर काटते - काटते वह चकरघिन्नी हो गया - - - मगर वह नौकरी ढूँढता रहा . नौकरी ढूंढते - ढूंढते उसके पैर बगावत करने लगे - - - मगर वह नौकरी ढूँढता रहा . उसका धैर्य दामन छुड़ाने लगा - - - मगर वह नौकरी ढूँढता रहा . उसकी आँखें उदास और मन निराश होते गए - - - मगर वह नौकरी ढूँढता रहा .

मगर अब वो ज़माना तो ज़िन्दा है नहीं - - - कि योग्यता को आवश्यकतानुसार शीघ्र ही उसका उचित पुरस्कार मिले . एक वही क्यों - - - आज के ज़माने में तो गुलशन जैसे न जाने कितने जरूरतमंद बेकारी की बीमारी के शिकार हैं . वैसे भी इस कम्प्यूटर - युग में नौकरी का अकाल पड़ा है . नौकरी निकलती ही कितनी हैं ! ज्यादातर तो पेटू कम्प्यूटर के पेट में समाती जा रही हैं . हाँ - - - उसे नौकरी नहीं मिली . वह बेकार का बेकार रहा .

गुलशन अनुभव कर रहा था कि ज्यों - ज्यों उसे नौकरी पाने में देर होती जा रही थी , पायल उसके हाथ से रेत की भाँति सरकती जा रही थी . दूर होती जा रही थी . पायल द्वारा उससे की जाने वाली मधुर मुलाकातें क्रमशः कम होकर अब औपचारिकता में बदलती जा रही थीं . लेकिन अपनी आँखों पर पायल के प्रेम का गहरा चश्मा चढ़ाये गुलशन ठीक - ठीक देख - समझ नहीं पा रहा था . वैसे भी जिसे मन नहीं मानता , उसे आँखें भी नहीं देख पातीं .

होते - करते - - - घंटे दिन का भोजन बन गये , दिन महीनों के पेट में समा गये और महीने वर्षों की खुराक बन गये . और इस बीच गंगा - जमुना के पुलों के नीचे से काफी पानी उसके अरमानों को लेकर बह गया - - - मगर न नौकरी मिलनी थी , न उस भाग्य हीन को मिली .

यहाँ तक कि गुलशन और पायल एम . ए . फाइनल की परीक्षा में जुट गये . और क्योंकि जुट गये थे - - - इसलिए पास हो गये . व्यक्ति पूरे मनोयोग से जिस कार्य में जुट जाता है , उसे पूरा होना ही पड़ता है .

कॉलेज की पढ़ाई की समाप्ति - - - उन दोनों दोनों की मुलाकातों के बीच खाँई बन गयी . वैसे तो पायल ने गुलशन को स्थान विशेष पर मिलते रहने का दिलासा दिया - - - मगर वो न आई . ये और बात है कि गुलशन बहुत दिनों तक - - - प्रायः उस स्थान पर जाकर पायल की प्रतीक्षा में बड़ी ललक से अपनी पलकों की कालीन बिछाता रहा और दिल में निराशा लपेट कर आता रहा .

और आज !

अब गुलशन की धारणा थी कि प्रायः औरत का दिल एक व्यवसायी का होता है . जो प्यार भी करती है - - - तो दिमागी तराज़ू पर तौल कर .

अचानक गुलशन को जैसे कुछ याद आ गया - - - और उसके हाथ सामने मेज पर रखी बोतल और गिलास की तरफ भटक गये .
 
बहुत सी साधारण , छोटी - मोटी दिखने वाली चीजें आदमी के आस - पास बिखरी - चिपकी रहती हैं - - - मगर इस तेज रफ़्तार व्यस्त ज़माने में , उसे अपने ढंग से कभी यह सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलती कि ये सब आखिर है क्यों . इनके अस्तित्व का औचित्य क्या है ? अब कमीज कि जेब को ही लें . छाती पर ही क्यों होती है . वह भी बायीं ओर , दिल के ऊपर ही क्यों चस्पा रहती है . कागज़ कलम या रूपये भर रखना ही अगर उद्देश्य होता तो दायीं ओर या फिर तोंद के ऊपर भी तो रखी जा सकती थी . उसके नियत स्थान के पीछे कुछ तो शुरुवाती कारण रहा होगा . कोई चीज प्रारम्भ होकर , अनवरत रहकर , यूं ही तो परम्परा नहीं बन जाती . है न ? दिल के ऊपर जेब का आविष्कारक निश्चित ही कोई मौलिक व सच्चा आशिक रहा होगा . तभी तो उसने इसके लिए यह ख़ास व संवेदनशील जगह चुनी . संभवतः उसकी कोई प्रेमिका रही होगी . उसकी अनुपस्थिति में भी , उसकी मधुर यादों को दिल से चिपकाये रखने की , इससे अधिक उपयुक्त जगह इस स्थान विशेष पर स्थित जेब के अतिरिक्त और हो भी क्या सकती थी . और अगर उस दिलदार आविष्कारक का विचार मौलिक , ह्रदय स्पर्शी , सर्व प्रिय और सर्व मान्य न होता तो बायीं तरफ जेब - रुपी परम्परा बनकर आज तक जिंदा नहीं रह सकता था . आखिर हर व्यक्ति की ज़िन्दगी में किसी न किसी की तस्वीर जेब में रखने - बसाने का वक्त कभी न कभी तो आता ही है .

इन दिनों गुलशन भी कुछ ऐसे ही दौर से गुज़र रहा था . उसने पायल की फोटो को अपनी बांयी छाती पर धड़कती जेब से निकालकर गुमसुम नज़रों से निहारा और दूसरा पैग हलक के नीचे उड़ेल कर बुरा - सा मुंह बनाया - - - जैसे नीम का अर्क पी गया हो .

और तभी !

गेसू कमरे में दाखिल हुई . घुसते ही उसके मस्तिष्क पर आश्चर्य का एक भरपूर हथौड़ा पड़ा और उसके हाथों के तोते उड़ गए . हतप्रभ हुई गेसू को गुलशन का ये रूप देख कर ऐसा लगा , जैसे उसने खुदा को खून करते देख लिया हो . उसके मन में गुलशन के लिए बड़ी इज्जत थी और उसने उसके इस रूप के बारे में कभी कल्पना तक नहीं की थी . सच ही है - - - प्रायः हम दूर से सितारों को जितना चमकदार समझते है - - - वास्तव में नज़दीक से वो उतने रौशन होते नहीं .

दोनों की निगाहें चार होते ही - - - गुलशन ने हड़बड़ा कर बोतल को छिपाने का प्रयास किया . और क्योंकि प्रयास हड़बड़ाहट में किया गया था , अतः उसे तो असफल होना ही था .

विस्मय भरे अंदाज़ में गेसू पलंग पर उसके समीप बैठते हुए बोली -- " ओह - - - तो नशा करते हो ! "

" नहीं ! दर्द पर शराब का छिड़काव करता हूँ - - - उसे कम करने की गरज से . " गुलशन ने कराहता जवाब दिया .

" आखिर दर्द काहे का है ? "

" क्या करोगी जानकर ! " गुलशन ने उसकी बात को टालना चाहा .

गेसू उसकी मंशा भांपकर बोली -- " गुलशन ! मेरे दोस्त !! लगता है - - - तुम मेरी बात का जवाब नहीं देना चाहते . टालना - टरकाना चाहते हो . मगर मैं समझती हूँ - - - कि तुम्हारे इस व्यवहार से मेरे विचारों का दमन होगा . और ध्यान रखो - - - विचारों के दमन से श्रृद्धा नहीं , विरोध जागता है . अगर कोई कुछ समझना चाहता है - - - तो उसकी बात का समाधान होना ही चाहिए . तुम्हें मेरे प्रश्न का उत्तर देना ही चाहिए . मुझे अपने दर्द में साझीदार बनाकर तो देखो . "

" लेकिन हम - तुम अभी इतने अधिक परिचित भी तो नहीं - - - कि मैं तुम्हें अपने दर्द में शामिल करूँ ."

" मगर अब - - - हम लोग एक दूसरे के लिए अपरिचित भी तो नहीं रह गए . दोस्त ! मुलाक़ात चाहे घंटों की हो या वर्षों की - - - ये तो सामीप्य का प्रश्न है . यदि आत्मीयता है - - - तो अपना दर्द सुनाया जा सकता है . किसी नजदीकी के सामने अपने दर्द को बेपर्दा करके मन का बोझ थोड़ा हल्का किया जा सकता है - - - और इससे कभी - कभी दर्द से उबरने का उपाय भी सामने आ जाता है . "

" - - - - - - " गुलशन चुप रहा .

गेसू ही पुनः बोली -- " वैसे शायद - - - मैं ये जानती हूँ कि तुम्हें दर्द काहे का है . उसी का न ! जिसकी फोटो तुम्हारी जेब में है - - - और जिसे थोड़ी देर पहले तुम बड़े ध्यान से देख रहे थे !! लेकिन जहां तक मेरा ख़याल है - - - वो तुम्हें मिलने से रही . "

" तो क्या हुआ ! एक खूबसूरत दुर्लभ फूल को - - - जिसे आदमी पा नहीं सकता - - - छूना चाहता है - - - और जिसे छू भी नहीं सकता - - - उसे मात्र देखना चाहता है . तसल्ली का कोई न कोई तरीका तो तलाशना ही पड़ता है . "

" हाँ - - - सो तो ठीक है - - - पर इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम अपनी तलाश में बौखला कर अपना खोया हुआ ऊँट गगरी में तलाशो . शराब के प्याले में डूब कर अपना भविष्य चौपट करो . उसे अन्धकार मय बनाओ !! "

" अंधकार मय ! " गुलशन दर्द में पगी कुम्हलाई मुस्कान बिखेर कर बोला -- " अरे - - - मेरा तो कोई भविष्य ही नहीं है . "

" मैं ये मानती हूँ मेरे दोस्त - - - कि तुम्हारे साथ - - - तुम्हारे ख़याल में एक बड़ी त्रासदी घट गयी है - - - मगर शराब से समस्यायें तो हल नहीं होतीं . "

" राहत तो मिलती है . मैं इसमें शान्ति तलाश करता हूँ . "

" शान्ति बाहरी वस्तुओं में तलाशना व्यर्थ है दोस्त . वो तो इंसान के अन्दर छुपी रहती है . बस - - - उसे तलाशने का सही तरीका आना चाहिये . और ज़रा सोचो - - - शराब भी क्या शान्ति दे सकती है ? "

" कम से कम उलझे हुए विचारों और उबलते हुए उद्गारों को कदाचित सामयिक तौर पर दबा तो देती है . "

" अरे क्या ख़ाक दबा देती है ! मैं तो कहती हूँ , चेतना ही मार देती है . शराब पीने से चेतना ही लुप्त हो जाती है . जबकि चेतना ही मनुष्य को ईश्वर से मिली सबसे बड़ी नियामत है और चेतना ही यदि लुप्त हो जाए तो मनुष्य जानवर भर है - - - क्योंकि जानवरों का स्वभाव होता है कि वो दुखों को उतनी सूक्ष्मता से अनुभव नहीं करते , जितना कि मनुष्य . " गेसू समझाने लगी -- " गुलशन ! तुम्हारा ह्रदय प्रेम की असफलता में जल रहा है - - - और तुम - - - तुम आग से आग बुझाने का बचकाना प्रयास कर रहे हो . "

" नहीं - -- - मैं आग से आग बुझा नहीं रहा - - - बल्कि मैं तो आग से आग लगा रहा हूँ . " गुलशन हारी - भारी आवाज़ में बोला -- " गेसू ! ये बात और है - - - कि वो निर्मित न हो सकें , वैसे हर मस्तिष्क में कुछ ताजमहल होते हैं . और मैं - - - मैं चाहता हूँ कि दहकती हुई इस आग में जलकर मेरे दिमाग का ताजमहल राख हो जाए ."

" देखती हूँ - - - ये तुम नहीं बोल रहे . तुम्हारा नशा बोल रहा है . शराब में डूबकर आदमी - आदमी नहीं रह जाता . सिर्फ नशा बन जाता है . एक बदसूरत नशा . "

" लेकिन मैं इस नशे में वो ख़ुशी पाता हूँ - - - जो सामान्य अवस्था में नहीं मिलती . नशे की अवस्था में - - - कम से कम मैं हंस - मुस्करा तो सकता हूँ - - - और कुछ क्षण जी भी लेता हूँ . " इतना कहकर गुलशन सचमुच हँस पड़ा -- " ह - - - हा - - - हा . "

किन्तु उसकी इस हंसी पर गेसू के मन में दया उमड़ आयी . वह पूर्ववत गंभीर मुद्रा में ही बोली -- " मेरे दोस्त ! इन कहकहों से तुम खुद को बहला रहे हो या फिर मुझे बहकाना चाहते हो !! मै अच्छी तरह देख - परख रही हूँ - - - तुम्हारी हंसी बीमार है , खोखली है , झूठ है , फरेब है , एक नकली ओढ़ी हुई जिंदगी को उम्र देने का बहाना है ." वह कहती रही -- " और सरकार की जालिम कृपा से ये जहर --शराब -- सरेआम बिकती है . अनाज काले बाजार के गोदामों में पड़ा रोता है और ये निगोड़ी दिलजलों को बर्बाद करने के लिए चौराहों पर सजी दुकानों में चमचमाती है . "

" हुँह - - - - - -." गुलशन ने एक छोटी और फीकी मुस्कान फेंकी .

" गुलशन ! आदतों पर यदि अंकुश न रखा जाए तो वो निरंकुश ज़रूरतें बन जाती हैं . मै एक हितैषी के नाते तुम्हें समझाती हूँ कि शराब की आदत अच्छी नहीं होती ."

" आदत कोई भी हो कभी अच्छी नहीं होती . फिर भी - - - आदत तो आखिर आदत ही होती है . "

" हाँ - - - आदत वो मोटी रस्सी है - - - जिसको धीरे - धीरे व्यक्ति स्वयं बटता है और मजबूत हो जाने पर खुद ही उसे तोड़ने में अपने को असमर्थ पाता है . "

" - - - - - - - - ." गुलशन खामोश रहा .

गेसू बात की दिशा बदल कर बोली -- " गुलशन ! मुझे पता चल चुका है कि तुम्हें पायल से प्यार है . "

" तो इसमें आश्चर्य क्या . ये तो आगे - पीछे होना ही था . इश्क और असली व्यक्तित्व अधिक दिनों तक छुपाये नहीं छुपते . "

" मगर मेरी समझ में ये नहीं आता कि जब पायल इश्क में तुम्हारी संगत को तैयार नहीं - - - तो तुम क्यों उसी का राग छेड़े पड़े हो ! "

" काश - - - तुमने कभी प्यार किया होता तो मेरा दर्द जानती . "

" हँह - - - ज्यादातर चोट खाए व्यक्ति इसी गलत फहमी में जीते हैं की उन्हीं का दर्द सबसे बड़ा है . "

" - - - - - - - -- "

" गुलशन ! मेरे दोस्त !! इस दुनिया में हर व्यक्ति अपने - अपने स्तर पर अपने - अपने महत्व के युद्ध लड़ रहा है किन्तु तुम प्रेम के मैदान में पराजित होकर , इस तरह अपना जीवन बर्बाद करके एक तरह से आत्महत्या ही कर रहे हो . जबकि मोहब्बत तो हर हाल में अमृत है . पूरी हो जाए तो सोने पर सोहागा की तरह गृहस्थी संवार देती है और अधूरी रहने पर भी ये दर्पण की तरह आदमी को उसकी कमियों - कमजोरियों का एहसास कराकर उसे महानता की बुलन्दियों तक पहुंचा सकती है . मोहब्बत में असफल व्यक्ति - - - मोहब्बत की प्रेरणा के सहारे - - - क्या से क्या नहीं कर सकता ! किसी के प्यार को न पाने के बाद व्यक्ति का जीवन कुछ ऐसी करवट लेता है कि वह ज़िन्दगी के क्षेत्र विशेष में कुछ चमत्कार भी कर सकता है . लेकिन अफ़सोस - - - कि मैं तुममे ऐसी किसी संभावना कि आहट नहीं पा रही . तुम तो तालाब के बंधे जल की तरह ठहर गए हो . जहाँ निरर्थक जलकुम्भी - सी बे लगाम विस्तार पायी किसी की दुखद यादों ने तुम्हारे समूचे व्यक्तित्व को ही ढक - जकड़ कर सीमित कर दिया है . तुम तो बस पायल के प्यार का ही रोना लिए बैठे हो . तुम्हें तो उसके ख़याल से ही फुर्सत नहीं . "

" तुम ठीक कह रही हो गेसू . जैसे पपड़ीयाए घाव को छेड़ने में कुछ अजीब सा दर्द भरा सुख मिलता है , वैसा ही सुख मुझे पायल की याद में - - - उसके ख़यालों के घेरे में मिलता है . "

" लेकिन इन सबसे पायल न मिल सकेगी दोस्त . तुम्हारे लिए उसको भूलने की कोशिश करना ही अच्छा है . "

" कैसे भूलूँ ! पायल मेरी ज़िन्दगी में आने वाली पहली औरत है - - - और पहली औरत को भुला पाना संभव नहीं है . "

" ज़रा कोशिश करके तो देखो . समय गुज़रते - गुज़रते - - - पानी पर बने अक्स की तरह - - - उसकी यादों के काले बादल तुम्हारे दिल - दिमाग से छंट जायेंगे , मिट जायेंगे . "

" गेसू ! समय पुरानी यादों के झरनों को परिस्थितियों की झाड़ियों तले ढांक जरूर सकता है , उसे सुखा - मिटा नहीं सकता . "

" ऐ दोस्त ! भावनाओं के झरने में बहने से पहले जीवन की वास्तविकताओं के बारे में मनन करो - - - तो बेहतर होगा . "

" लेकिन मुझे तो पायल के विचारों से ही फुर्सत नहीं . मैं केवल ये जानता हूँ - - - कि मैं पायल को चाहता हूँ ."

" किन्तु केवल चाहने भर से तो सब कुछ नहीं मिलता . योग्यता चाहिए , प्रयास चाहिए और चाहिए भाग्य . बिना इन तीनों का संगम हुए अनुकूल परिणाम असंभव ही समझना चाहिये . मैं फिर कहूँगी कि तुम पायल को भूल जाओ . "

" कुछ गम भुलाए नहीं जाते गेसू . "

" मै जानती हूँ - - - लेकिन मेरा अनुभव ये कहता है कि बीतते समय के साथ गम धीरे - धीरे स्वतः हल्का हो जाता है . "

" यह तो समय ही बतायेगा - - - पर अभी तो मुझे पायल कि स्मृतियाँ , उसकी यादें , क्षण प्रतिपल कचोटती रहती हैं . " गुलशन धीरे - धीरे वाक्य को घसीटते हुए बोला -- " मगर करूँ क्या ! अब वही स्मृतियाँ ही तो जीवन का सहारा हैं . और शेष है भी क्या ! "

" तुम्हारा ख़याल एकतरफा है गुलशन . मेरी समझ में तो स्मृतियाँ ही ह्रदय पर बोझ डालकर कचोटती हैं , डुबो देना चाहती हैं - - - और वही डूबते को सहारा भी देती हैं . "

" वो कैसे ? "

" वो ऐसे - - - कि जब हम अपनी स्मृतियों को जीवन की अमूल्य निधि मानकर पथ - प्रदर्शक की भाँति उन्हें बनाए रखना चाहते हैं , उनसे सबक लेते हैं - - - तो वो सहारा देती है - - - और जब उन्ही स्मृतियों को फिर से जीवन के व्यवहार में लाना - दोहराना चाहते हैं , तो वो अभाव बनकर व्याकुल करने लगती हैं . "

" लेकिन जब मुझे पायल की स्मृति मात्र से बल मिलता है तो उसे पाने की इच्छा को कैसे भुला सकता हूँ ! " गुलशन नशे की झोंक में दीवानों की तरह बोला .

उसकी तोता रटन्त से झुंझलाकर गेसू कहने लगी -- " ओफ्फोह - - - पता नहीं किस मिट्टी के बने हो तुम . तुम्हारा जीवन भी कितना अजीब है . "

" हाँ गेसू मुझे अपना जीवन - - - जैसा हो गया और जैसा मैं चाहता था - - - उसका द्वन्द जान पड़ता है . "

" गुलशन ! तुम्हारी सोच एक सामान्य सच के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं . इसमें विशेष क्या है ! क्योंकि ऐसा तुम अनोखे के साथ ही नहीं है . ऐसा तो प्रायः होता है . आदमी जो होता है और जो होना चाहता है - - - केवल वही नहीं रह जाता . बहुत कुछ और भी अनचाहा अकल्पित जुड़ जाता है उसके साथ . गुजरते वक्त के साथ , परिस्थितियों के सांचे में ढलकर , आदमी का आकार बदल जाता है . जैसे कि तुम्हारा . मैं तो कहती हूँ - - -ज़िन्दगी की राहों में जो कुछ मिलता है - - - स्वीकार कर लो - - - क्योंकि उसे नकारा नहीं जा सकता . यही ज़िन्दगी का मूलमंत्र है . मेरे हिसाब से - - - आदमी के लिए बेहतर ये रहता है कि वो ज़िन्दगी के साथ जबरन चस्पा हो गयी इन अनपेक्षित चीजों - घटनाओं से ताल मेल बैठाकर इन्हीं के साथ सन्तोष पूर्वक जीना सीख ले . वर्ना दुःख के सिवाए कुछ हाथ न आएगा , " गेसू ने कहा -- " समझ में नहीं आता कि प्रतिकूल वास्तविकताओ से मुंह चुराकर कब तक तुम पायल के दुःख को सहन करते रहोगे . "

" जिस दुःख का उपाय नहीं , सीमा नहीं , उसे भाग्य मानकर सहते रहने के अतिरिक्त और किया भी क्या जा सकता है ! " गुलशन निराशा के भाव में बोला .

गेसू दयाद्र हो उठी -- " उफ़ - - - कितनी कडुवाहट बटोरे हो तुम , अपने जीवन में . "

" सच ही कहा तुमने गेसू . मेरी जिंदगी बहुत कडुवी है . नीम की पत्ती की तरह . जब तक रहेगी - - - कडुवापन लिए रहेगी - - - और धीरे - धीरे पीली पड़कर एकदिन अचानक झड़ जायेगी . सच्चाई तो ये है कि मेरी ज़िन्दगी मुझे हर मर्ज की एक कडुवी खुराक से मिलाकर बनायी गयी लगती है "

" दोस्त ! समय रहते अपने आपको संभालो . अगर बीता हुआ कल तुम्हारे बीच इसी तरह आता रहा - - - तो तुम आज को कभी भी ईमानदारी से जी नहीं पाओगे . उस लड़की के इंतज़ार ने तुम्हें बर्बाद करके छोड़ा है . तुम्हारा सुख - चैन - - - . "

गेसू अभी अपना वाक्य पूरा भी न कर पायी थी कि गुलशन नें अपनी सख्त अंगुलियाँ उसके नर्म होठों पर रख दीं और बोला -- " न - - - ``- - - ऐसा मत कहो . उसने दिया भी मुझे कुछ कम नहीं . सच तो ये है कि पायल ने अन्जाने में मुझे जो दिया है - - - कोई और दे भी नहीं सकता . उसने मुझे प्रेरणा दी है और मेरी सोई हुई कला को प्रेरित किया है . उसकी याद में जब मेरा दिल तड़पता है तो मेरी कला की देवी व्याकुल हो उठती है और - - - . "

" और तुम एक हाथ में जाम और दूसरे में कलम उठा लेते हो . यही ना ! " गेसू व्यंग्य कसने के बाद धीरे से बोली -- " गुलशन ! मुझे तो तुम जीवन की सबसे ऊंची इमारत से गिरी हुई एक अजूबी मूर्ति मालूम पड़ते हो , जिसके टुकड़े - टुकड़े हो गए हैं - - - और हर टुकड़ा अपना अलग जीवन गुजार रहा है . कोई टुकड़ा कलम संभाले है , तो कोई जाम . कोई ठहाके लगा रहा है , तो कोई उदास है मातम मना रहा है ."

गुलशन ने बात को दूसरी दिशा देने के विचार से कहा -- " अच्छा ये बताओ गेसू ! तुमने अब तक शादी क्यों नहीं की ? "

" कोई बढ़िया आदमी ही नहीं मिला था अब तक . "

" कमाल करती हो . इतनी बड़ी दुनिया - - - और एक अदद मनपसन्द आदमी न मिला अब तक तुम्हें ! आखिर कैसा आदमी पसन्द करती हो तुम ? शादी के लिए किस तरह के आदमी की तलाश है तुम्हें ? "

" मै ऐसे आदमी की तलाश में हूँ , जो पर्वतों की तरह महान हो . दरिया की भाँति तेज और संगीतमय हो . फूल की तरह कोमल , कांटे के सदृश कठोर , सीप की भांति बन्द और कमल की तरह खुला हो ."

" फिर तो वह किसी किताब में मिलेगा . "

" उं - - - हुंअ - - - नहीं . वो मिल गया है . वो तुम हो . पर थोड़ा सा ऐब है तुममें . बस - - - तुम्हारी शराब छुड़ानी पड़ेगी . " इतना कह - - - गेसू ने थोड़ा भावुक होकर पूछा - - - " दोस्त गुलशन ! एक बात कहूं !! क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मैं - मैं न रहूँ - - - तुम - तुम न रहो - - - बल्कि मैं और तुम मिलकर हम बन जायें ? "

उसकी बात सुनकर पहले तो गुलशन चौंका - - - मगर फिर गंभीर होकर कहने लगा -- " नहीं . कम से कम इस या शादी के मामले में नहीं . गेसू ! अमावस और पूनम की रातों के बीच बहुत सी तिथियों के अवरोध हैं . दोनों का मिलन कभी नहीं हो सकता . "

"लेकिन मैं तुम्हारे ही साए में रहकर तुम्हें संवारना चाहती हूँ . "

" गेसू शून्यताओं को सीने में लिपटाए , भूख और तंगी से जूझता हुआ मैं बड़ा हुआ हूँ . मेरे पास तुम्हें क्या मिलेगा ! मात्र गिरती हुई दीवारों का साया . समय और दुर्भाग्य के थपेड़ों ने मुझे खंडहर बना दिया है . सच तो ये है कि मैं सिर्फ पायल से प्यार करता हूँ . सिर्फ पायल से ."

" नहीं ! तुम खुद और दूसरों को धोखा देते हो . सच तो ये है कि उसे आकर्षित करने लायक तुम्हारे पास दूसरा कोई जरिया न होने के कारण तुम उस महत्वाकांक्षी लड़की को प्यार की ओट में पाना चाहते हो . जबकि मैं - - - मैं तुम्हारी बाहों में प्यार का नाटक रचाए बिना ही आना चाहती हूँ . "

" आखिर तुम प्यार को समझती क्या हो ? "

" खूब समझती हूँ . अच्छी तरह जानती हूँ . व्यक्ति प्रेम का प्रदर्शन सिर्फ उस जगह करता है - - - जहाँ वह कीमत देने में असमर्थ होता है . हर वह वास्तु - - - जिसे बिना कीमत के प्राप्त करने का प्रयास किया जाय - - - उस स्वांग को प्यार कहते हैं . जो बिकाऊ नहीं है , जिसे आदमी खरीद नहीं सकता , उसे प्यार की ओट में पाना चाहता है . जैसे कि तुम पायल को . किन्तु मै तुम्हे बगैर किसी बहाने - - - बिना किसी पर्दे - प्रपंच के - - - सीधे - सीधे पाना चाहती हूँ . "

" पर मुझे तो तुम्हारे प्रस्ताव में प्यार नहीं , सेक्स नज़र आता है . "

" लेकिन मेरी नज़र में सेक्स ही वो है , जिसे तुम प्यार कहते हो . और इस तरह सेक्स ही प्यार है . प्यार का प्रमुख अंश है . बाकी सभी कुछ उसकी तैयारी है . उसके लिए एक समुचित वातावरण और विश्वास का निर्माण करना भर है . "

" गेसू मुझे तो लगता है - - - तुम्हें लगता है कि स्त्री - पुरुष के बीच सिर्फ सेक्स का ही रिश्ता है . "

" बेशक . यही एक प्रमुख रिश्ता है . गुलशन ! मुझमें इतनी हिम्मत है कि मैं कह सकूँ कि यही एक कुदरती रिश्ता है आदमी - औरत के बीच . बाकी सब व्यवस्था बनाए रखने के लिये खड़े किये गये सामाजिक अवरोध मात्र हैं . मेरे ख़याल से पारिवारिक रिश्तों को यदि छोड़ दें तो नवपरिचित हमउम्र आदमी और औरत के रिश्तों का प्रारम्भ चाहे जो भी स्वघोषित नाम देकर किया जाय - - - अगर वो लम्बे चले , तो अनुकूल एकान्त में फल - फूल कर उनका अन्त प्रायः निश्चित शारीरिक संबन्धों पर ही होता है . "

" किन्तु मुझे तो मेरे - तुम्हारे संबन्धों में ऐसी कोई संभावना नहीं दिखती ! "

" थोड़ा सब्र करो . संभावना भी बनेगी और मूर्त रूप भी लेगी . ज़रा गुजरते समय के साथ सम्बन्ध प्रगाढ़ तो होने दो . देखना ! आने वाला कल मेरी बातों का सबूत बन कर आएगा . "

इतना कहते - कहते वह भावुक हो उठी . उसने अधीर हो पूछा -- " बताओ दोस्त ! क्या तुम मुझे अपनी बाहों में जगह देना पसन्द करोगे ? "

" अक्ल से काम लो गेसू . फिलहाल मैं गरीब हूँ . मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ . मेरे पास तुम्हारे स्तर को बनाए रखने के लिये धन - साधन , जमीन - जायदाद नहीं है . "

" तुम्हारे पास कोई जायदाद नहीं , यह सच है - - - लेकिन मेरी नज़र में तुम्हारे पास एक बहुत बड़ी व आकर्षक चीज़ है , जो आम आदमी , विशेष कर अमीरों में प्रायः नहीं होती . "

" क्या ? मैं समझा नहीं . "

" शराफत . तुम बेहद शरीफ हो . "

" केवल शराफत को क्या तुम शहद लगाकर चाटोगी ? "

" तब फिर पायल को किस बूते पर पाना चाहते हो ? वह भी तो तुमसे पूछ सकती है कि तुम्हारी सूखी शराफत को वह ओढ़ेगी या बिछाएगी - - - या फिर पतीली में पकाकर अपने पेट की आग बुझाएगी क्या ?"

" लेकिन मैं क्या करूँ ! मैं दिल के हाथों मजबूर हूँ . मैं उसके बगैर अपने जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकता . सोच तक नहीं सकता ."

" तुम्हारे सोचने न सोचने से क्या ! तुम क्या सोचते हो कि तुम्हारी दीवानगी पर रहम खाकर पायल तुम्हारी बाहों में आ जायेगी !! " गेसू तनिक कटु होकर बोली -- " सच - सच सुन लो दोस्त ! फिलहाल तुम कवि ह्रदय लेखक हो और कल्पना की लम्बी पतंगें उड़ाते हो - - - लेकिन सच्चाई तो यही है कि कुछ रिश्तों , कुछ अपवादों को यदि छोड़ दें , तो दुनिया में कोई किसी से मोहब्बत नहीं करता . ये सब बेकार कि बातें हैं . बेकार का रोना है . व्यक्ति बस अपने आपसे - - - अपनी इच्छाओं से मोहब्बत करता है , जैसे कि तुम्हारी इच्छा है कि तुम पायल को पाओ - - - क्योंकि पायल तुम्हें अच्छी लगती है - - - और इसीलिये तुम उससे मोहब्बत का ढोंग रचाते हो . "

" तुम भी तो मुझे पाने की बात करती हो ! "

" हाँ - - - करती हूँ . लेकिन मैं तुम्हारी तरह टेसुए बहाकर गली - गली मोहब्बत कि डुग्गी नहीं पीटती . मैं तो अपनी इच्छाओं के जंगल में उड़ता हुआ आज़ाद पँछी हूँ . मेरे भीतर जो भी नैसर्गिक इच्छा पैदा होती है , मैं यथा संभव तुरत - फुरत पूरा कर डालती हूँ . जैसे - - - ."

" जैसे ? "

" जैसेकि इस वक्त मेरी प्रबल इच्छा है कि मैं तुम्हें चूम लूँ ." इतना कहकर - - - गेसू ने सचमुच ही झटपट गुलशन को चूम लिया .

गुलशन इस आकस्मिक हमले से हड़बड़ाकर बोला -- " उफ़ - - - बड़ी स्पष्ट हो ."

" हाँ - - - इसीलिए उलझाव से दूर हूँ . " वह कहती रही -- " दोस्त ! मैं उन लोगों में से नहीं हूँ - - - जो सोचते कुछ और हैं , कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं . मेरा दिल - - - मेरी जबान पर आकर बोलता है और जबान दिल का साथ देती है . एक वाक्य में - - - मैं तुम्हें बहुत पसन्द करती हूँ और सामाजिक रूप से प्राप्त करना चाहती हूँ . गुलशन ! मैंने अपना दिल तुम्हारे सामने खोलकर रख दिया है . बिल्कुल उसी तरह , जैसे कोई मासूम बच्चा बड़े प्यार से अपने किसी दोस्त को अपने घर लाता है और अलमारी में से अपने सारे खिलौने निकालकर उसके सामने रख देता है , भले ही वो उसे पसन्द आयें या न आयें . "

" लेकिन अब मैं आगे औरतों पर भरोसा करने पर यकीन नहीं रखता ."

" तुम साँप से डरे हो और रस्सी की तरफ हाँथ बढ़ाने में कतरा रहे हो . " गेसू ने कहा -- " आखिर तुमने औरतों को समझ क्या रखा है ? "

" औरत ! हुं ह !! औरत शराब से भरा एक जाम है - - - जो देखने में तो बेहद आकर्षक है - - - मगर अपने ह्रदय में एक मीठा जहर संजोये रहता है . "

" मेरे नादाँ दोस्त ! कुछ जामों में जहर होता है और कुछ में अमृत . अब इसे आदमी की किस्मत या दृष्टि का पैनापन ही कहना चाहिए कि वो अपनी प्यास बुझाने के लिए किस जाम को चुनता है . "

" - - - - - - - . " गुलशन चुप रहा .

" गेसू ने बातों को मोड़ देते हुए पूछा -- " ये बताओ - - - तुम्हें शादी कि इच्छा नहीं होती ? "

" दुनिया के भीतर अपनी एक छोटी सी दुनिया बसाने का ख़्वाब कौन नहीं देखता ! लेकिन सबके सपने तो हकीकत में नहीं ढलते . "

" गुलशन ! मेरे दोस्त !! एक बार मेरा हाथ थाम कर तो देखो - - - अपनी किस्मत कि लकीरों में मुझे बसा करके तो देखो - - - फिर जानोगे कि ज़िन्दगी कितनी हसीन और जायकेदार है . "

" जानता हूँ . ज़िन्दगी से ज्यादा उसकी उम्मीद जायकेदार है - - - क्योंकि ज़िन्दा रहने के लिए कीमतें इतनी ज्यादा बढ़ गयी हैं - - - फिर भी हम उससे लटके जा रहे हैं . " गुलशन ने बुरा सा मुंह बना कर कहा - - - जैसे उसके मुंह का जायका बिगड़ गया हो . कसैला सा .

गुलशन की भाव - भंगिमा देखकर गेसू पुनः बोली -- " दोस्त ! मुझे तुमपर कभी तरस आता है , कभी क्रोध - - - और ये सच है कि मुझसे तुम्हारा दुःख व निराशा नहीं देखी जाती . तुम्हारी सारी तकलीफों की दवा बहुत आसान और एक है . मेरी मानो तो शादी कर लो . मैं तैयार हूँ . मैं न सही - - - किसी और से भी कर सकते हो - - - मगर कर लो . "

" पायल को अनदेखा करके मुझे शादी की कोई जरूरत नहीं . "

" आखिर सामान्य जीवन भी तो अपने आप में एक जरूरत है ! "

" लेकिन हर जीवन तो सामान्य नहीं हुआ करता . "

" लेकिन सामान्य होने के लिए ईमानदार कोशिश तो करता है . "

" हाँ , तब - - - जब जीवन में कुछ आकर्षण बचा हो . "

"पूर्वाग्रही ! आकर्षण उत्पन्न करने के लिए ही तो बार - बार तुम्हारी शादी पर जोर दे रही हूँ . शादी कर लोगे तो गाँठ बँधी स्त्री के व्यक्तित्व की गहराइयों में डूबकर जो कर्तव्य हाथ आयेंगे , उनके निर्वाह की जिम्मेदारियों में उलझकर धीरे - धीरे पायल को स्वतः भूल जाओगे . तुम्हारे वीरान और उजाड़ गुलशन में फिर से बहार आ जायेगी . और फिर - - - साधारणतः अकेला व्यक्ति जीवन में पूर्णता भी तो अनुभव नहीं करता . "

" किन्तु जीवन की पूर्णता या सार्थकता के लिए शादी - विवाह के अतिरिक्त दूसरे साधन भी तो हो सकते हैं . "

" जैसे ? "

" जैसे साहित्य या लेखन . "

" दोस्त ! जीवन संघर्षों की रणभूमि है . कला या साहित्य की क्रीडा - स्थली नहीं . और फिर - -- - साहित्य या लेखन या और कुछ - या और कुछ - - - ज़िन्दगी के शौक तो हो सकते हैं - - - उद्देश्य नहीं . जिंदगी का उद्देश्य तो ज़िन्दगी ही है . एक पूर्ण ज़िन्दगी . भरपूर जी हुई ज़िन्दगी . जिसके लिए औरत और मर्द एक दूसरे के पूरक हैं - - - एक दूसरे के ईष्ट हैं . गुलशन ! जब तक पुरुष किसी स्त्री से नहीं बँधता - - - वह नहीं जान पाता कि वह क्या है . सुबह के शुरुवाती उजाले में जैसे पहाड़ और नगर उभरने लगते हैं - - - वैसे ही स्त्री के संसर्ग में पुरुष का व्यक्तित्व आकार लेने लगता है और उसमें छिपी समस्त संभावनाएं मूर्त हो उठती हैं . इसीलिए कहती हूँ - - - तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए . "

" इसका उत्तर मैं दे चुका हूँ . "

" यही ना - - - कि तुम पायल के अलावा किसी दूसरी लड़की से शादी नहीं करोगे . और जहाँ तक मैं समझती हूँ - - - पायल तुमसे शादी नहीं करेगी . और अगर ऐसा हुआ तो तुम्हें उम्र भर कुंवारा रहना पड़ेगा ."

" क्या फर्क पड़ता है ! " वह थोड़ा सा मुस्करा कर बोला -- " कहावत है कि कुंवारों का जीवन काफी लम्बा होता है . "

" नहीं ! सच्ची बात तो ये है कि ऐसा होता नहीं , बस तन्हाई के कारण जीवन लम्बा लगता भर है . "

" लगने दो . परवाह नहीं ." वह झुंझलाया .

" हँ ह - - - ' परवाह नहीं ' कहना जितना आसान है - - - आजीवन अविवाहित रहना उतना ही कठिन . गुलशन ! शादी का सेक्स कि पुर्ति से सीधा सम्बन्ध है - - - और सेक्स मानव की बुनियादी , मौलिक और आदि आवश्यकता है . जिस तरह अन्य जरूरतों व क्षुधा की पूर्ति आवश्यक है - - - उसी तरह जीवन को सामान्य ढंग से चलाने और संतुलित विकास हेतु यौन - तृप्ति होना भी परम आवश्यक है . और फिर - - - सामान्यतः जो लोग अधिक उम्र तक या उम्र भर अविवाहित रहते हैं - - - वो भी तो वासना से दूर नहीं रह पाते . विवाह नहीं करते - - - लेकिन अप्राकृतिक या समाज द्वारा अस्वीकृत उपायों का प्रयोग करते हैं . चाहे वो स्त्री हों या पुरुष . "

" क्या तुम भी ऐसा करती हो ? " गुलशन ने मुस्कराकर उसे उसी की बातों में फाँस कर अपनी जिज्ञासा शांत करनी चाही .

" दोस्त ! हर बात बतायी तो जाती है , पर हर व्यक्ति से नहीं . " वह हंसकर बड़ी चतुराई से बोली -- " और वैसे भी - - - अभी मेरी उम्र ही क्या है ! बाली उमर है . बोलो है कि नहीं . बोलो न ! "

"- - - - - - - -" गुलशन की तो बोलती ही बन्द हो गयी . थोड़ी देर कुछ सोचते रहने के पश्चात वह गंभीरता पूर्वक बोला -- " सोचता हूँ - - - वो भी क्या वक्त था , जब मैं पायल की तरफ से निराश नहीं था . पायल और मैं - - - कॉलेज में साथ - साथ उठते - बैठते थे . और अब - - - . हुं ह - - - , गेसू ! क्या हम वक्त को रोक नहीं सकते ? "

" रोक क्यों नहीं सकते ! रोक सकते हैं . बस उतनी देर के लिए - - - जब तक हमारी बाहें एक - दूसरे के गले में पड़ी हों , होठ एक - दूसरे के होठों पर रखे हों और धड़कनें एक - दूसरे के दिलों की संगत कर रही हों ." इतना कहते - कहते वह झुंझला पड़ी -- " मगर तुम चाहते ही नहीं , "

" मैं तो सिर्फ पायल को चाहता हूँ . "

" लेकिन तुम्हारे आंसुओं से पायल का दिल मोम नहीं होगा ."

" पत्थर भी कभी न कभी पसीज उठते हैं . उसे पिघलाने के लिए प्यार का सच्चा ताप चाहिये . "

" देखती हूँ - - - उसे पिघलाते - पिघलाते तुम खुद पत्थर होते चले जा रहे हो . " उसकी आँखें नम हो गयीं . वह बोली -- " सच तो ये है - - - कि तुम्हारी उम्मीदों के चिराग बुझ चुके हैं - - - लेकिन फिर भी तुम उन्हें जलाए रखने का असफल प्रयास कर रहे हो . "

" प्रयत्न करना तो आदमी का धर्म है . "

" तो ठीक है . तुम अपना प्रयत्न करो और मैं अपना . " समझ में नहीं आता - - - आखिर पायल में ऐसा क्या है , जो मुझमें नहीं ."

" गेसू तुम दिल , दिमाग और चेहरा - - - सभी से खूबसूरत हो . तुम्हें पाकर कोई भी निहाल हो जाएगा . मगर मैं अपने दिल का क्या करूँ ! ये - - - ."

" कोई बात नहीं . " गेसू उसकी बात काटकर तेज भरभराई आवाज में बोली -- " लेकिन सुन लो ! हुस्न की तलवार बहुत पैनी हुआ करती है . उसका वार कभी न कभी भरपूर पड़ ही जाया करता है . और कोई नहीं जानता कि - - - उसे औरत कि कौन सी अदा किस वक्त भा जाय . देखना मैं तुम्हें बदल कर रहूंगी . "

" गेसू ! मुझे तुमसे सहानुभूति है - - - मगर - - - . "

" सहानुभूति प्रेम की पहली सीढ़ी है . मैं ऐसी ही सीढ़ियाँ चढ़कर तुम तक पहुँचूँगी . धीरे - धीरे तुम्हें पायल की तरफ से मेरी ओर मुड़ना ही पड़ेगा . वो भी खुशी - ख़ुशी . "
 
" ओफ्फोह ! छोड़ो भी इन बातों को . चाय नहीं पियोगी ? मैं बनाऊँ या तुम बना लोगी ? रसोई में सब सामान सामने ही दिखेगा . "

" रसोई ! क्या तुम्हें खाना बनाना आता है ? "

" मैडम ! दुनिया के सारे बेहतरीन बावर्ची मर्द ही होते हैं . कहिये तो नमूने के तौर पर बेहतरीन चाय बनाकर पिलाऊँ ? "

" नहीं शेखी मत बघारो . मैं ही जाती हूँ . " कहकर गेसू मुंह बिसूर कर रसोई की ओर बलखाकर चल दी .

थोड़ी देर में वो चाय बनाकर ले आयी .

चाय की चुस्की लेते हुए गुलशन मुस्करा कर बोला -- " बड़ी सोंधी - स्वादिष्ट बनी है चाय . क्या मिला दिया है इसमें ? "

" बताऊँ ? "

" हाँ -- हाँ ! बोलो न . "

" थोडा सा प्यार मिला दिया ही इसमें . " गेसू ने हौले से मुस्कराकर मादक जवाब दिया .

गुलशन भी बिना मुस्कराये न रह सका -- " ओह - - - अच्छा - - - ये बात है . "

बात के रुख को मोड़ते हुए गेसू बोली -- " मुझे तुम्हारा ये कमरा कुछ जँचा नहीं . तुम इस छोटे से पिंजरेनुमा कमरे में कैसे रहते हो ? तुम्हारा ये कमरा - - - . "

" हँ ह - - - ये कमरा ही क्यों - - - सारी दुनिया मुझे यही जान पड़ती है . एक पिंजरा . इससे कोई फर्क नहीं पड़ता - -- - पिंजरा चाहे सोने का ही हो - - - वह पिंजरा है . एक कैद खाना . जिसमे हम खुलकर सांस नहीं ले सकते . हमारी इच्छायें पंख नहीं खोल सकतीं . लगता है - - - सीलन और कीड़े - मकोड़े से भरे अँधेरे तहखाने को दुनिया का नाम दे दिया गया है . और हम - - - हम इसमें जीने के लिए मजबूर हैं . मेरा बस चले तो - - - . "

" ओफ्फोह गुलशन ! देखती हूँ - - - तुम बहक रहे हो . " गेसू ने उसकी बात काट कर कहा - - - और फिर अचानक कुछ याद आते ही बोली -- " एक बात बताओ दोस्त ! रसोई में - - - जब मैं चाय बना रही थी , तो मुझे लगा , जैसे छत पर से फ्लश चलने की बेहूदी आवाज़ आयी हो . "

" ओ s s s हाँ s s s . " गुलशन ने हंसकर जवाब दिया -- " यही तो इन लॉज - टाइप मकानों में खराबी है . किसी की रसोई के ऊपर किसी की लैट्रिन होती है , तो किसी की लैट्रिन के ऊपर किसी की रसोई . सच गेसू ! रसोई में बैठकर कभी कुछ खाते - पीते समय यदि फ्लश की आवाज़ आ जाती है , तो मुझे अनुभव होता है - - - ऊपरी मंजिल के कोई साहब मेरे सिर पर बैठ कर जैसे हल्के हो रहे हैं . तन - बदन में एक आग सी लग जाती है उस वक्त . "

गेसू चुटकी लेती हुई बोली -- " लेकिन इसमें तुम्हें क्यों नाराजगी ? आखिर तुम्हारी लैट्रिन भी तो किसी के बेड - रूम के ऊपर ही होगी ! "

" मजाक करती हो ! "

" अच्छा - - - अब चलती हूँ . " गेसू ने हँसकर उठते हुए कहा -- " दोस्त परसों मेरा बर्थ - डे है . ज़रूर आना . "

" कौन सा जन्म - दिन है मैडम का ? "

" बुद्धू ! स्त्रियों से उनकी आयु और साधुओं से उनकी जाति नहीं पूछनी चाहिए - - - शिष्टाचार के विरुद्ध बात है . "

" अरे मैनें तो यूं ही उम्र जानने की उत्सुकता वश पूछ लिया था . "

" तो सुनो ! स्त्री की उम्र उतनी ही समझो , जितने की वो नज़र आये . " उसने हँसकर सीख दी और बोली -- " आना जरूर . मैं इन्तज़ार करूंगी . "

" आऊँगा तो - - - मगर तुम फिर अपनी बीमार सहेली के यहाँ न चली जाना . "

" अरे नहीं - - - वो तो मात्र संयोग था . अच्छा फिर मिलेंगे . बर्थ - डे - पार्टी में . "

इतना कह कर गेसू चली गयी . साथ ही वो मादक महक भी कमरे के वातावरण से लुप्त हो गयी - - - जो पदमिनी श्रेणी की स्त्रियों के बदन से ही निकलती है .

आज प्रोफ़ेसर साहब की कोठी ब्यूटी -पार्लर से सजकर आयी किसी नई नवेली दुल्हन की तरह बेहद खूबसूरत लग रही थी . उसके बनाव - श्रृंगार अगल - बगल के बंगलों को बगलें झाँकने के लिए मजबूर कर रहे थे . साँवली शाम को - - - कोठी पर लटकी चाइनीज़ विद्दयुत बल्ब की लड़ियाँ - - - जुगनुओं की तरह जगमगा रहीं थीं . जिस तरह सड़क पर कोई हसीना दिख जाने पर - - - लोग उसे देखने के लिए दिल के हाथों मजबूर हो जाते है , ठीक उसी तरह - - - राह चलन्तू मुसाफिरों की निगाहें , इस हसीन कोठी को कम से कम एक नज़र देखने के लिए बरबस उठ जा रही थीं . कोठी अपनी सजावट से लोगों का ध्यान आकर्षित करने की जी - तोड़ कोशिश कर रही थी , जिस तरह लड़कियां अपने चटकीले मेक अप और चुगलखोर भड़कीली पोशाकों से लड़कों को आकर्षित करने का करती हैं .

हॉल में काफी भीड़ एकत्र हो चुकी थी . प्रोफ़ेसर साहब बाहर दरवाजे पर हर आने - जाने वाले की अगवानी कर रहे थे .

सभी मेहमान बारी - बारी से गेसू को जन्म - दिन की बधाई और तोहफे दे रहे थे . अजीब तरीका है - - - लोग जन्म - दिन पर - - - ज़िन्दगी का न लौटने वाला एक बेश कीमती साल कम होने पर खुशियाँ मनाते हैं - - - तोहफे देते हैं और दीर्घायु होने की कामना करते हैं . आश्चर्य है - - - लोग जीवन को बढ़ाना चाहते हैं , उसे सुधारना नहीं .

गेसू का शरीर उपहार ले - लेकर बधाइयाँ स्वीकार कर रहा था - - - किन्तु उसका मन कहीं और था . उसे तो गुलशन का बेसब्री से इंतज़ार था . गुलशन ! जो अभी तक नहीं आया था , गेसू के ख़याल से - - - अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था . उसके दिल की हालत कुछ वैसी ही थी , जैसे रमजान - माह की विदाई पर ईद के चाँद की प्रतीक्षा में खुदा के किसी नेक बन्दे की होती है .

गेसू की आँखें बार - बार दरवाजे की ओर उठ जाती थीं - - - और निराशा समेट कर दूसरी तरफ फिर जाती थीं . दिल की गहराइयों से की गयी प्रतीक्षा का अर्थ आज उसने अनुभव किया था . सचमुच प्रतीक्षा की घड़ियाँ बहुत लम्बी होती हैं . इन घड़ियों में - - - दुनिया की कीमती से कीमती घड़ियों की गति भी मन्द पड़ जाती है .

और तभी !

अचानक गेसू की मुस्कराकर चमक उठी आँखों की रौशनी में खुशियों के कबूतर ऊंची उड़ान भरने लगे . मन में बज उठी मृदंग से उसका पूरा बदन उत्साह से फड़कने लगा और दिल की ख़ुशी बेकाबू होकर चेहरे पर छलक आयी . इंतज़ार की ज़ालिम घड़ियाँ ख़त्म हुईं . गुलशन जो आ गया .

उसके हाथ में औरत के बाद दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज थी -- फूल . वह अरब की कमसिन राज कुमारियों के रेशमी गाल - सी चिकनी पंखुड़ियों वाले फूलों का गुच्छा हाथ में लिए था . इन फूलों में फ़्रांस की ख़ुश्बू , स्वीडन की शोखी और इटली का सौन्दर्य था .

गुलशन और गेसू एक दूसरे की और बढ़े .

" जन्म - दिन मुबारक हो . " कहकर गुलशन ने गुलदस्ता गेसू के पतली अँगुलियों और मुलायम गदेली वाले बुद्धिजीवी हाथों में थमा दिया .

गेसू ने फूलों को अपने फूल की पंखुड़ियों जैसे होठों से चूमकर गुलाबी गालों से सहलाया और दिल से बोली -- " शुक्रिया . "

" फूल अच्छे लगे ? "

" हाँ . जो व्यक्ति अच्छा लगता है , उसकी हर चीज अच्छी लगती है . लेकिन यह तो बताओ ! तुम्हें इतनी देर कैसे हो गयी ? "

" बस की वजह से . आजकल की सिटी बसें भी तो नखरीली लड़कियों से कुछ कम थोड़े ही हैं . क्या मजाल - - - जो कभी वक्त पर आ जायें . देर से बस मिली - - - देर से आया . " गुलशन ने मुस्कराकर बताया .

गेसू हँसकर बोली -- " बस देर से आई - - - या किसी यार - दोस्त के यहाँ जम गए थे ! सच - सच बोलो !! मुझे तुम जैसे गैर शादी शुदा शरीफों की बदमाशियाँ अच्छी तरह मालूम हैं . जिस किसी शादी शुदा दोस्त की बीबी अच्छी और बातूनी दिखती है - - - उसी के यहाँ किसी न किसी बहाने घुसे रहकर मन की गुदगुदी तलाशा करते हैं . लगता है - - - तुम्हें भी वहीँ कहीं देर लगी है . बोलो ठीक पकड़ा न ! "

" अरे नहीं ! ऐसी कोई बात नहीं . " गुलशन ने उसके हसीन आरोप को हँसकर टाला .

और इससे पहले - - - कि गेसू शराफत की और अधिक बखिया उधेड़े - - - कोठी के बाहर एक कार आकर रुकी . कार से एक मोटी बेडौल औरत के साथ हनीमून से लौट रही नारी सा तृप्त सौन्दर्य समेटे एक लड़की इठलाकर उतरी . बेहद खूबसूरत लड़की . माँ तो ज़िन्दगी के असाधारण तजुर्बे लेकर साधारण बन चुकी थी - - - मगर बेटी अभी हूर थी . लगता था - - - कार की तरह उसके शरीर का हर अंग जैसे खराद की मशीन पर ढल - तराश कर आया हो . उसके उत्तेजक बदन का हर कोण उसकी कार की तरह स्पष्ट और नपा तुला था . मगर उसकी माँ ! उसके ढीले मोटे कूल्हे !! ऐसा लगता था - - - जैसे उसने अपनी साड़ी के अन्दर काशी के दो कद्दू लटका रखे हों . उसके कूल्हे देखकर आदमी ये सोचने पर मजबूर हो सकता था कि फैशन डिजायनरों को शीघ्र ही चोली की तरह कूल्हे कसने के लिए भी एक आकर्षक झोली का आविष्कार करना चाहिये . और अगर आदमी की ये सोच सच साबित हो जाय तो फिर वो दिन कतई दूर नहीं होगा , जब रेडियो में ये गीत बजता सुनाई दे कि ' झोली के पीछे क्या है , झोली के पीछे - - - . "

माँ - बेटी हॉल में दाखिल हुईं . लड़की की तरफ सभी ने नज़रें उठाईं . बल्कि यूं कहें - - - कि देखने को मजबूर हो गये . दरअसल - - - वो चीज़ ही कुछ ऐसी थी .

लड़की का नाम ग़ज़ल था . नाम के ही अनुरूप उसकी हर अदा गज़लमय थी . उसकी उम्र जैसे अपनी ही देह से फटकर बाहर निकली पड़ रही थी . छलकते जाम सी उसकी जवानी अमेरिकी सरकार के भरे तैयार पिस्तौल की तरह बेहद खतरनाक थी और हर किसी को निशाना बनाने को आतुर थी . वह यौवन का ऐसा उठता - उमड़ता सैलाब थी , जो ठंढी नसों में भी आग फूंक दे . जवानी की आंधी के पहले झोंके ने उसे अभी छुआ भर था , फिर भी छातियों पर ऐसे सुडौल उभार थे की चुनौतियों चुनौतियाँ फेंक रहे थे . उसकी नागिन सी बलखाती लटें रह - रह कर उसके जोबन को डस - डस कर और भी नशीला बना रहीं थीं . खुलते रंग पर बन्द होती आँखें और भूखी आँखों में चंचल जंगली तितलियों के रंग थे . चेहरा ऐसा था - - - जिसे देखकर कोई भूली हुई थ्योरी याद आ जाये . वक्ष खूब भारी और कमर शास्त्रानुसार बेहद पतली थी . हमारे शास्त्रों में भी तो स्त्री की कमर पतली और ऊपरी हिस्सा भारी होना अच्छा माना गया है . कुल मिलाकर - - - इस लड़की की जवानी में कोई कोर कसर नहीं थी . इस कलयुगी जमाने के हिसाब से उसे पूरी तरह एक भद्र महिला की संज्ञा दी जा सकती थी - -- - क्योंकि वह काफी कुछ चालू किस्म की औरत दिखती थी .

अब तक - -- - लगभग सभी मेहमान आ चुके थे . मेहमानों में हिन्दू , मुसलमान , सिक्ख और क्रिश्चियन - - - हर तरह के लोग थे . इनमें साड़ियाँ , सलवारें , पैन्ट , जीन्स और नेफ्थलीन की बू छोड़ती अचकनें - - -- पुराने मगर बड़े प्यार से प्रेस किये - - - फर्श पर मुफ्त झाड़ू लगाते बॉल बॉटम - - - खूब रगड़ कर शेव किये चेहरे - - - क्रीम , पावडर और लिपस्टिक की सुगन्ध - - - मैले पाइप और सिगारों के धुवें - - - चौड़े डॉग कॉलर , तनी हुई सूखी गर्दनें , भड़कीली टाइयाँ और चुस्त चोलियाँ - - - शम्पू किये लहराते बाल , आकर्षक गड्ढे पड़े गुदाज़ गाल , काली रंगी तराशी भवें , सकारण तिरछी आँखें और अकारण खुली हुई बत्तीसियाँ भी थीं .

जैसा कि हमेशा होता है - - - जो औरतें जितनी बदसूरत थीं - - - उनकी पोशाक और मेक अप उतने ही भड़कीले थे . अधिकाँश स्त्रियाँ कम से कम कपड़े पहन कर - - - या यूं कहें कि अधिक से अधिक कपड़े उतार कर - - - अपने आधुनिक होने का डंका पीट रहीं थीं . वाह रे जमाने ! कोई मजबूरी के मारे नंगा है तो कोई फैशन के मारे . लड़कियों की चुगलखोर चुस्त नोकीली पोशाकें देखकर लगता था , जैसे हर लड़की एक - दूसरे से मुकाबले पर अमादा है -- ज्यादा निर्लज्जता , ज्यादा निर्बन्धता और ज्यादा फूहड़ मजाकों के आदान - प्रदान में .

कचर - कचर बतियाती काली औरतों के चेहरों पर पावडर ऐसा लग रहा था , जैसे जामुन पर नमक - - - और उनके लाल लिपस्टिक से सने होठ कुछ ऐसा दृश्य उपस्थित कर रहे थे - - - मानो कोयले में आग लग गयी हो .

गेसू ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच केक काट दिया .

थोड़ी ही देर में खाना आ गया . बड़े लोगों का छोटा सा खाना . सभी खाने पर पिल पड़े . भूखे देश भारत महान के इन नागरिकों के सामने विकट समस्या ये थी - - - कि क्या खायें , क्या न खायें ! रसगुल्ला , आइसक्रीम , चाउमिन , चिकन तंदूरी , वेज - नान वेज , कोल्ड ड्रिंक , कॉफ़ी , दही बुंदिया - - - बहुत कुछ - - - और सभी कुछ था . दही बुंदिया के दही में छोटी - छोटी बुंदिया कुछ इस तरह छितरी पड़ी थीं , जैसे विशाल भारत की छोटी - छोटी राजनैतिक पार्टियाँ .

खाते समय सबके हाथ उन व्यस्त क्लर्कों की तरह तेजी से सक्रिय थे , जिनके सिर पर बॉस खड़ा हो . प्रोफ़ेसर परिवार के स्नेह और स्वादिष्ट व्यंजनों की बाढ़ में सभी मेहमान डुबकियाँ खाते रहे .

ये लोग खा रहे थे . बेयरे परोस रहे थे . बेचारे बेयरे . सुबह से इंतजाम करते , थके बेयरे . बेयरों का भूख व थकान से बुरा हाल था . उनका मन बैठने को कर रहा था - - - मगर मेहमान पसरे थे . उनका दिल खाने को कर रहा था - - - मगर वो परोस रहे थे . जबकि मेहमान थोड़ा खा रहे थे और खूब बहा रहे थे - - - और दूसरे मेहमानों से आँखें चार होते ही बेहयाई से आँखों - आँखों में ये सन्देश उड़ेल रहे थे की मुफ्त का चन्दन , घिस मेरे लल्लन .

पार्टी में नौकरों ने खाया या नहीं - - - इसकी चिन्ता अक्सर बड़े आदमी भला कब करते हैं ! बड़ों के इस आचरण की प्रतिक्रिया स्वरूप यदा - कदा छोटों में अलग - अलग तरीकों से प्रतिशोध की भावना भी प्रकट हो उठती है . इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पार्टी में मौजूद घनी मूछों व खुंखार चेहरे वाला एक वरिष्ट बेयरा भी था , जो मेहमानों के आगे केक वाली प्लेट पारी - पारी पेश करता था - - - और फिर भवें सिकोड़ कर कुछ इस तरह गज़बनाक निगाहों से देखता - - - की अधिकाँश मेहमानों कि हिम्मत ही न होती , केक उठाने की .

लेकिन पता नहीं क्यों - - - पायल पर तो जैसे वो कुछ ख़ास ही मेहरबान हो गया था . घूम फिर कर जब पांचवीं बार उसने घूर कर उसकी तरफ केक की प्लेट पेश की तो उस बेचारी को कुढ़कर उसे झिड़कना पड़ा - - - कि क्या मैं ही एक अकेली बची हूँ पूरी पार्टी में . जाओ - - - जाकर औरों को पूछो .

धीरे - धीरे मेहमान जबड़ों की चाल क्रमशः मन्द होकर रुक गयी . जेब से निकले रुमालों ने मुंह को पोंछ लिया . इस तरह खाने का सिलसिला ख़त्म हो गया .

अब नृत्य का कार्यक्रम था . ग़ज़ल का नृत्य . जिसके लिए वो ख़ास तौर पर आमंत्रित थी . गेसू ने उद्घोषणा की . लोगों ने तालियाँ बजायीं - - - और ग़ज़ल थिरकने लगी .

नाचते वक्त ग़ज़ल का स्वस्थ भरा शरीर फड़क रहा था - - - और अधिकाँश लोग उसे यूँ ललचा कर देख रहे थे , जैसे आदमी बाग़ में उस ऊंचे वृक्ष को देखता है - - - जिसकी पहुँच से दूर डालियाँ आकर्षक फलों से लदी हों . मीठे रसीले मनपसन्द फलों से .

ग़ज़ल ने नाचते - नाचते अपनी अदाओं को ताश के पत्तों की तरह एक - एक करके फेंकना शुरू किया और पार्टी में शामिल मर्दाने चेहरे दिल के हाथों बाजी हारने को मजबूर हो गये . वो सभी उसके महकते रूप और दहकते यौवन का नज़ारा करने लगे .

मादक धुन के सहारे ग़ज़ल नाच रही थी . नाचते समय उसके धुंधले - धुंधले से नक्श नज़र आ रहे थे . ऐसे नक्श ! जो अच्छे - भले आदमी को बेचैन कर देते हैं -- क्योंकि वो पूरे नज़र नहीं आते .

और तभी - - - नाचते - नाचते ग़ज़ल ने अपनी बांकी बाँह उठाई - - - और वो दृश्य सबको चार सौ चालीस वोल्ट का झटका दे गया - - - क्योंकि देसी चोली के नीचे से उसकी विलायती अंगिया ने बड़ी नजाकत के साथ भरपूर आँख जो मारी थी .

पार्टी चलती रही - - - और ये हसीन रात - - - किसी हसीना के हुस्न की तरह अपने जलवे बिखेर कर धीमे - - - बहुत धीमे - धीमे ढलती रही .

अब ग़ज़ल नृत्य ख़त्म करके गाना गाने लगी थी . और क्योंकि वह अपने दिल में सभ्य हिन्दुस्तानी होने का भरम पाले थी , इसीलिए अंग्रेजी में गा रही थी . लेकिन वो अच्छा गा रही थी . उसका अंग - अंग गा रहा था .

ग़ज़ल गा रही थी - - - और गेसू गुलशन के नज़दीक आ रही थी . ग़ज़ल गा रही थी - - - और गेसू गुलशन की आँखों में झाँक रही थी . ग़ज़ल गा रही थी - - - और गेसू अपनी नाभि के नीचे एक मादक सी सुरसुरी अनुभव कर रही थी . ग़ज़ल गा रही थी - - - और गेसू गुलशन की बांहों में बाँहें फंसाकर उसकी अँगुलियों से आयु विशेष का कोई रोचक खेल - खेल रही थी - - - उससे सटी जा रही थी , उसमें समा जाना चाह रही थी .

ग़ज़ल गा रही थी --

" आई लव यू डियरली

एण्ड वेरी क्लीयरली

एण्ड आई होप

यू लव मी डिअरली

एण्ड वेरी क्लीयरली

बिकॉज़ आई लव यू

आई लव यू - - - "

गाना ख़त्म होते ही लोगों की तालियों की जोरदार गड़गड़ाहट शुरू हो गयी - - - ग़ज़ल के इस गीत की प्रशंसा में .

जैसे किसी बादशाह के दरबार में आदाब बजाया जाता है - - - उसी तरह झुककर , चारों ओर घूमकर , ग़ज़ल ने सबको फर्शी सलाम किया . और उसके इस झुकने पर - - - कई लोग तो तनकर उछल से गये . उनका कलेजा मुंह को आ गया . मानों उन्होंनें खुशकिस्मती से कोई ख़ास चीज़ देख ली हो .

ग़ज़ल अपनी माँ के पास आकर बैठ गयी - - - और गेसू गुलशन के साथ .

सिवाय दुआ - सलाम के - - - पायल ने अब तक इस पार्टी में गुलशन से कोई बात न की थी . वो प्रग्यापराधी की भाँति गुलशन से नज़रें चुरा रही थी . और एक गुलशन था - - - कि रह - रह कर पायल को अपनी नज़रों में उतारे जा रहा था . जबकि गेसू बार - बार गुलशन का ध्यान भंग किये दे रही .

अंततः पार्टी ख़त्म हो गयी . मेहमान साझा सरकार की तरह चर - खाकर बिखर गये . अपने - अपने घर चल दिए .

गेसू गुलशन को छोड़ने के लिए बाहर आ गयी तो सड़क पर थोड़ी दूर उसके साथ मौन चलती रही . गुलशन ने उसकी ओर निहारा तो पाया कि वो सपनों के समन्दर में गोताखोरी कर रही है .

" एय ! " गुलशन ने उसे संबोधित किया .

" क्या ? " वह चौंक कर बोली .

" क्या सोच रही थी ? "

" सोच रही थी - - - काश वो गीत मैं गाती - - - जो ग़ज़ल ने अभी गाया था . "

" तब क्या होता ? "

" मेरे दिल की बात पुनः तुम तक और भी खूबसूरत तरीके से पहुँच जाती . " गेसू ने आह भरकर चलते - चलते कहा .

" - - - - - - ." गुलशन मौन रहा .
 
यह तो उसे पहले ही पता चल चुका था की गेसू उसमें दिलचस्पी ले रही है -- गंभीर दिलचस्पी . ऐसी दिलचस्पी , जो प्रायः हर जवान लड़की - - - किसी न किसी लड़के में - - - कभी न कभी लेती ही है .

गेसू ने मौन तोड़ा -- " गुलशन ! मेरे दोस्त !! तुम्हें शायद अन्दाज़ा नहीं - - - कि मैं तुम्हें कितना अधिक चाहती हूँ . "

" मैं भी तुम्हें एक सीमा तक पसन्द करने लगा हूँ गेसू . " गुलशन ने धीरे से कहा .

" सच ? " गेसू के होंठ कंपकंपाने लगे . उसकी आवाज़ भरभरा उठी . विजय के फाख्ते ऊंची उड़ान भरने के लिये उसकी आँखों में फड़फड़ाने लगे लगे - - - और उसे लगा जैसे वह सातवें आसमान में उड़ रही है .

" हाँ ! मैं तुम्हें चाहने और पसन्द तो करने लगा हूँ - - - लेकिन मात्र एक दोस्त की तरह .प्यार तो मेरा पायल के लिये आरक्षित है . मुझे दुःख है मेरी दोस्त - - - कि मैं एक प्रेमी के रूप में तुम्हारी चाहत का उत्तर नहीं दे सकता . हाँ - - - एक दोस्त के रूप में मेरी हमदर्दी और लगाव तुम्हारे लिये हमेशा हाज़िर रहेंगे ." गुलशन ने सारे पर्दे सरका दिये .

उसकी पूरी बात सुनकर पायल की आँखों में अँधेरा सा छाने लगा . उम्मीदें , सोच , सपने , ऊपरी पायदान पर पहुँच कर अचानक धम्म से नीचे आ गिरे . दो घड़ी पहले - - - उसके दिमाग में उपजे ख़ुशी के बुलबुले फूट गये और विजय के फाख्ते घायल होकर तड़पने लगे . लेकिन फिर भी - - - वो अपने को संयत करके बोली -- " चलो - - - फिलहाल यही सोच कर सब्र किये लेती हूँ कि बेहद अपने से लगने वाले किसी अजनबी ने कम से कम दोस्ती का दम तो भरा . आगे के लिये उम्मीद कि किरण अभी जिंदा तो है . गुलशन ! चाहे तुम मुझे कभी चाहो या न चाहो - - - लेकिन मेरे मन में तुम्हारे प्रति वो चाहत सदा बनी रहेगी , जिसे दुनिया प्यार का नाम देती है . मेरे दिल में आगे भी तुम्हारे लिये उतनी ही इज्जत रहेगी , जितनी कि अब से पहले थी . "

दयाद्र गुलशन आह भरकर कहने लगा -- " वास्तव में ये भी हमारी ज़िन्दगी का अजीब संयोग है - - - कि तुम मुझ पर जान छिड़कती हो - - - लेकिन मैं तुम्हें प्यार देने में असमर्थ हूँ - - - जबकि मैं पायल से प्यार की विनती करता हूँ - - - मगर वो मुझे अपने योग्य ही नहीं पाती और चंचल को पसन्द करती है . "

" दोस्त यही तो सारे दुखों व असंतोष का मूल है कि व्यक्ति के पास जो उपलब्ध होता है , वो उस ईश्वरीय कृपा का आनन्द न लेकर - - - जो नहीं है , उसके पीछे भागता रहता है ."

गुलशन बोला -- " अच्छा जाओ - - - अब तुम लौट जाओ . वर्ना तुम अगर यूं ही मेरे साथ चलती रही - - - तो कहीं ऐसा न हो कि हम काफी दूर निकल जायें . "

देवी - देवताओं से हम आरामतलब भारतीयों को और कोई लाभ हो न हो - - - मगर एक निश्चित और बंधा - बंधाया फायदा तो है ही . वो है मनचाहा सदा प्रतीक्षित सार्वजनिक अवकाश

. क्योंकि हिन्दुस्तान में देवी - देवताओं की भीड़ बहुत अधिक है -- लगभग चार व्यक्तियों के पीछे एक -- अर्थात तैंतिस करोड़ . फलस्वरूप कार्यालयों में छुट्टियाँ भी खूब होती हैं . कभी किसी का जन्म

दिवस - - - तो कभी किसी का निर्वाण - दिवस . कभी - कभी तो लगता है कि इसी स्वार्थ परता के चलते निरन्तर शिक्षित व आधुनिक होते जाने के बावजूद इस कलियुग में भी हमारी आस्था इन

लाभदायी देवी - देवताओं में जस की तस बनी हुई है .

ऐसे ही किसी तथाकथित शुभ - दिवस के उपलक्ष में - - - आज चंचल की छुट्टी थी .

गेसू ने सबको टटोल और सहमत कर एक रोज़ पहले ही पिकनिक मनाने का फैसला कर लिया था . क्योंकि ज़िन्दगी को एक ही तरह जीते - ढोते व्यक्ति ऊब जाता है और नव स्फूर्ति अर्जित करने की गरज से कुछ बदलाव की अपेक्षा व प्रयास करता है .

गुलशन व चंचल बाहर ड्राइंग - रूम में बैठ कर समय बिताने के लिए बातचीत कर रहे थे . उन्हें गेसू और पायल के तैयार होकर आने की प्रतीक्षा थी . जबकि वे दोनों दूसरे कमरे में ड्रेसिंग - टेबल के सामने बैठ कर वो कोशिश कर रहीं थीं - - - जो कि आदिकाल से हर उम्र में हर स्त्री की हुआ करती है . वे अपने रूप में निखार लाने का प्रयत्न कर रहीं थीं -- यानि कि मेक अप कर रहीं थीं .

रेशमी बालों में कंघी फेरते - फेरते अचानक पायल का ध्यान गेसू के वस्त्रों पर गया . उसने झिड़का -- " ये क्या ! आज फिर तुमने मर्दाने कपड़े पहन लिए -- जींस और टॉप . कितनी बार कह चुकी हूँ - - - मर्दाने कपड़े और मर्दाने काम , केवल मर्दों को शोभा देते हैं , औरतों को नहीं . "

गेसू पायल की तरफ आँखें तरेर कर बोली -- " तो क्या - - - मैं वो काम नहीं कर सकती - - - जो मर्द कर सकते है ? "

" अच्छा - - - तो क्या तुम मर्दों वाले काम खुद ही कर लेती हो ? " पायल ने मुस्कराते हुए आँख मार कर चुटकी ली .

गेसू शरमा कर बोली -- " धत्त शैतान . तू बड़ी वो है . "

पायल बेहयाई से हंसने लगी . ठीक वैसे ही - - - जैसे कि बन्द कमरों की आज़ादी में स्वभावतः खुली चुहलबाजियों के बीच लड़कियां हंसती हैं .

थोड़ी ही देर में - - - दोनों ने अन्तिम बार - - - आईने में उतर आये अपने सौन्दर्य को निहारा और सन्तोष की सांस ली .

" हाय मर जाऊँ . तेरा सजना सफल हुआ . आज तो राहगीरों पर बिजलियाँ गिरा देगा , तुम्हारा यह कड़कता रूप . " पायल के निखरे हुए रूप पर नज़र डालकर गेसू बोली और मस्ती में आकर उसने अकस्मात उसे एक पुरुष की भाँति अपनी बाहों में कसकर भींच लिया .

उसकी बांहों में कसमसाती हुई पायल बोली -- " हाय अब बस भी करो . बस - - - उफ़ - - - उई - - - आह . अब छोड़ो भी . क्या एक - एक नस तोड़ कर ही दम लोगी ज़ालिम ! "

" न बाबा ना . ये काम मैं न करूंगी . अगर मैनें ही तेरी एक - एक नस तोड़ दी , तो बेचारे चंचल भैया के लिए क्या काम बचेगा ! और फिर टूटी नसों वाली लड़की भला किसी लड़के को कहीं सोहाती है ! ! " गेसू ने उसे छोड़ते हुए हँसकर कहा .

पायल को भी एक हसीं बदला सूझा . वह बोली -- " एक बात बताऊँ गेसू ! चंचल ने मुझे बताई थी . "

" बोलो . "

" ऐसे नहीं . कान में बताने लायक है . "

उत्सुकतावश गेसू पायल के मुँह के निकट अपना कान लगाकर बोली -- " बताओ . "

पायल पहले तो उसके कान के पास अपना मुँह ले गयी - - - और फिर - - - उसने एक ही झटके से गेसू के गाल को चूमकर तेजी से काट खाया .

गेसू उछल कर परे हट गयी और एक तीखी सिसकारी लेकर बोली -- " उई माँ . यही बताया था भैया ने ? मेरे गाल खा जाने का इरादा था क्या ? "

" सेव खाने के लिए ही होते हैं जॉनी . " पायल मज़ा लेते हुए चूड़ियों की तरह खनक कर खिलखिलायी .

दर्द से अभी तक बिलबिला रही गेसू ने कुढ़कर पलट वार किया -- " अच्छा एक बात सच - सच बताओ ! चंचल वाली ये जो बात अभी तुमने मुझे बतायी - - - वो भैया ने तुम्हें एक ही बार बतायी थी , या कि अक्सर बताते रहते हैं ? "

और बाहर !

ड्राइंग - रूम में प्रतीक्षारत गुलशन ने ऊब कर चंचल से कहा -- " बड़ी देर लगा दी . पता नहीं क्या कर रहीं हैं दोनों ! "

चंचल ज्ञानियों सी मुस्कान बिखेर कर बोला -- " औरतों को कुछ कामों में बहुत समय लगता है , उनमें से एक मेक अप भी है . वही कर रही होंगी . इनका बस चले तो ये रंग - पोत कर अपने चेहरे को ऐसा बना डालें , जैसा कि वास्तव में वो है ही नहीं . "

दोनों ठठाकर हंस पड़े .

तभी गेसू और पायल ने ड्राइंग - रूम में प्रवेश किया . उन्हें हँसता हुआ पाकर पायल ने पूछा -- " किस बात पर हँसी का खजाना खोला जा रहा है . "

" स्त्रियों के क्रिया कलापों पर . " गुलशन ने जवाब दिया .

दोनों फिर हंस दिए . पायल और गेसू मूर्खों की तरह उनका मुँह ताकने लगीं .

उनका गाढ़ा मेक अप देख कर गुलशन ने व्यंग्य किया -- " मेरी समझ में एक बात नहीं आती - - - कि औरतें बाहर जाते वक्त ही इतना बनाव श्रृंगार क्यों करती हैं ! घर में रहती हैं - - - तो मैले - कुचैले वस्त्रों में - - - मगर ज्यों ही बाहर चलने को हुईं - - - कि रानी साहिबा की कीमती ड्रेस निकल आयी . जूड़े में फूल उग आये . गहनों से अंग - प्रत्यंग दमकने लगा . इत्र - लेवेंडर से एक फर्लांग चारों तरफ का रास्ता - बाज़ार गहरी सांस खींचने पर मजबूर हो उठा . घर में बालों से जूँ बेशक झड़ते रहें , कपड़ों से सड़ांध और शरीर से पसीने की बदबू भले ही निकलती रहे - - - मगर क्या मजाल कि उन्हें ज़रा भी ख़याल हो . पति - पिता , देवर - भाई ,जैसे उनकी अच्छी सूरत और भली सीरत के कद्र दान ही नहीं हैं . अगर उनकी खूबसूरती कि कहीं कद्रदानी है , तो बस बाहर बाजार में . राहगीरों और मनचलों की नज़रों में . और फिर - - - अगर कोई लफंगा बोली बोल दे , तो लड़ने जाए मय्या - भय्या . नहीं तो - - - . "

" अच्छा - अच्छा - - - अब भाषण बन्द करो . चलना नहीं है क्या ? " गेसू ने चिढ़ कर उसकी बात काटी .

गुलशन ने डरने का प्रदर्शन करते हुए मुस्करा कर कहा -- " जो हुकुम सरकार का . "

सभी चल दिए .

सांझ शैशवावस्था में थी . मौसम भी गुलाबी ठंढा था . दूर - दूर चहुँ ओर सन्नाटों का शोर पसरा हुआ था और धूल भरे रास्तों पर नाग की तरह फन पटकती फुफकारती तेज हवाएं चल रहीं थीं - - - जिनमें किसी के लिए नशीला आकर्षण था , तो किसी के लिए गहरी ऊब .

अंततः करीब घंटे भर को लाँघती कार - यात्रा के पश्चात वो चारों पूर्व निर्धारित स्थल के मोहाने पर आ पहुंचे और सुरक्षित जगह तलाश कर कार खड़ी कर दी .

करीब सौ गज का फासला क़दमों से नापकर वो चारों पिकनिक - स्थल तक पहुँच गए . पिकनिक - स्थल क्या था , प्रकृति का साम्राज्य था .

सबसे पहले वो फूलों के मामले में अमीर एक पार्क के भीतर दाखिल हुए . मगर गेट के भीतर कदम रखते ही उन चारों का माथा भन्ना गया . प्रथम ग्रासे , मक्षिका पाते . क्योंकि किसी फूहड़ औरत ने बड़ी उच्छृंखल आज़ादी के साथ , गेट के पास , सांझ के समय , रात की आह और दिन की वाह का कूड़ा फेंक रखा था . कूड़े पर निगाह पड़ते ही - - - चारों ने एक - दूसरे की तरफ देखा . सभी के चेहरों पर भेद भरी मुस्कान तैर गयी . मगर फिर गेसू और पायल ने नारी सुलभ शर्म से अपना मुंह फेर लिया और तेज कदमों से आगे बढ़ गयीं .

गुलशन मुस्कराकर चंचल से बोला -- " भारत से नेकी ख़त्म हो सकती है , मित्रता ख़त्म हो सकती है , वफ़ा ख़त्म हो सकती है , लेकिन गन्दगी कभी ख़त्म नहीं हो सकती . यहाँ के लोग अधिकारों के प्रति तो जागरूक हैं - - - किन्तु कर्तव्यों के प्रति उदासीन . "

चंचल ने हंसकर तुरुप जड़ा -- " मुझे तो लगता है - - - किसी उत्साही औरत ने अपनी आह और वाह में बरकत बनाये रखने के वास्ते यहाँ पर कोई टोटका रख छोड़ा है ."

दोनों हँसते हुए तेज क़दमों से गेसू और पायल से जा मिले .

थोड़ा आगे बढ़कर चारों ने अपने - अपने हाथों में गिरफ्तार सामान को मखमल सरीखी घास पर रखकर आज़ाद कर दिया . पायल ने डोलची से एक चादर निकाल कर ज़मीन पर बिछा दिया . सभी ने बैठकर अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया .

तभी एक खूबसूरत औरत अपने भागते हुए चंचल बच्चे को पकड़ने के लिये उधर से दौड़ी . चंचल उसके संगमरमर से तराशे ताजमहली बदन को देखने लगा जबकि कोई भी लड़की ये बिल्कुल सहन नहीं कर सकती कि उसके रहते उसका प्रेमी किसी दूसरी स्त्री पर ध्यान दे . अतः इसी भावना से प्रेरित होकर पायल ने चंचल को टोका -- " क्या बात है ! वो काँटा औरत चुभ गयी क्या दिल में ? देखती हूँ , बड़ी तल्लीनता से देख रहे हो उसे . "

ध्यान भंग होने पर चंचल ने सफाई दी -- " तो क्या बुरा कर रहा हूँ ! सौन्दर्य को देखने की लालसा तो सभी में होती है . "

" मगर उससे फायदा क्या ? "

" मानसिक शान्ति मिलना क्या कम फायदा है . "

" चलो हटो ! बातों के तो दरोगा हो !! बहाने खूब गढ़ लेते हो . अरे देखना ही है , तो मुझे देखो - - - मेरे कपड़ों को देखो . " पायल ने स्वयं धारण किये हुए काले सलवार कुर्ते की ओर इशारा करके कहा -- " अच्छा ये बताओ - - - इन नए वस्त्रों में मैं कैसी लग रही हूँ ? "

" बिल्कुल बुरी . ऐसे मातमी रंग मुझे कतई पसन्द नहीं . " चंचल ने मजाकिया जवाब दिया .

पायल भी चिढ़कर शरारती स्वर में बोली -- " तब वो देखो - - - अपनी पसंद . " उसने दूर खड़ी एक काली लड़की की ओर इशारा किया , जो सफ़ेद कपड़े पहने हुए थी .

चंचल ने उसे देखते ही - - - तेजी से मुंह फेरकर कहा -- " उंह - - - अरे बाप रे बाप . वो तो तुम्हारी तस्वीर की निगेटिव मालूम पड़ रही है . "

चंचल के इस जवाब से गेसू गुलशन ठहाका मार कर हंस पड़े . पायल भी हंसी -- सप्त सुरों में लिपटी हुई लयदार मादक हंसी .

हंसी शान्त होने पर गेसू और पायल प्लेटों में नाश्ता निकालने लगीं . चंचल भी परोसने में उन्हें सहयोग देने लगा . इस बीच गुलशन को अपने बगल में मखमली घास के बीच जमीन का एक नंगा टुकड़ा दिखा . विचारों में खोये गुलशन की उँगलियों ने एक कंकड़ उठाकर गंजी जमीन पर कुछ खुरचना शुरू कर दिया .

अचानक चंचल का ध्यान ज़मीन पर उकेरी उस लिखावट पर गया - - - जो गुलशन के दिमाग की ताज़ी कारस्तानी थी .

लिखा था ----

लड़का + लड़की = ?

लड़का - लड़की = ?

लड़का x लड़की = ?

लड़का / लड़की = ?

" ये क्या पहेली लिखी है तुमने ? " चंचल ने हंसकर पूंछा . चंचल के प्रश्न पूछने पर - - - गेसू और पायल भी पढ़कर हंस पड़ीं .

गुलशन बोला -- " तुम्हीं लोग बूझो तो जानें ! "

किसी का दिमाग काम नहीं किया . सभी निरुत्तर रहे .

चंचल ने कहा -- " तुम्ही बताओ , इसका अर्थ ! "

गुलशन ने चारों पंक्तियों के सामने से प्रश्न - चिन्ह मिटाकर कुछ और लिख दिया .

अब वाक्य यूं थे ----

लड़का + लड़की = ज़न्नत

लड़का - लड़की = शायर

लड़का x लड़की = बच्चा

लड़का / लड़की = तलाक

पूरे वाक्यों को पढ़कर - - - सभी फिर हँसे - - - सिवाय गुलशन के .

चंचल ने मज़ाक करते हुए कहा -- " लगता है - - - तभी तुम शायर बन गए हो ! "

" तभी मतलब ? "

" लड़का माइनस लड़की की वजह से . किसी बेवफा लड़की ने झटका दिया है क्या तुम्हें ? "

" कैसे कह सकते हो ? "

" तुम्हारे हिसाब से . शायर जो हो . "

" अरे भाई - -- - मैं कहाँ शायर ! सच तो ये है कि दिल पर जब ठेस लगती है , तो आह निकल पड़ती है . हाँ - - - अगर इसी का नाम शायरी है , तब तो तुम मुझे शायर कह सकते हो . " उसने पायल की तरफ देख कर कहा . "

उसकी बातें सुनकर पायल की नज़रों का चोर बगलें झाँकने लगा और उसका दिल पसीज गया . संभावनाओं की आहट सी उसके मन में उठी और उसका तन - बदन सिहर उठा . उसे लगा - - - कहीं गुलशन की आह बद दुआ बनकर उसके भविष्य को न डस ले .

चंचल ने कुरेदा -- " सच - सच बताओ यार ! क्या तुम्हें कोई लड़की नहीं मिली ? "

" मिलतीं तो बहुत हैं . जैसे - - - . "

" जैसे ? "

" जैसे , " गुलशन गंभीर मुस्कान बिखेर कर कहने लगा -- " स्कूल में मिलती हैं कच्ची उम्र की बच्चियां - - - जिन पर ध्यान देना खतरे से खाली नहीं है . कॉलेज में मिलतीं हैं - - - लेकिन जिस दिन से रोमान्स शुरू होता है , उसके दूसरे रोज से अधिकतर परिवारदार लड़कियां शादी की फरमाइश शुरू करके सारा मज़ा किरकिरा कर देती हैं . गली - मोहल्ले में भी मिलती हैं - - - मगर उसके भय्या - अम्मा दूरबीन लगाए देखते रहते हैं कि कहीं मीलों तक कोई लड़का उनकी लड़की की ताक में तो नहीं है . शादीशुदा औरतें भी मिलती हैं , जो आमतौर पर अपने थैले व साड़ी बाँधने के लापरवाह अन्दाज़ और खतरनाक लाल सिन्दूर , छके - थके शरीर तथा निगाहों के परम सन्तोष से पहचानी जा सकतीं हैं - - - जैसे उन्होंने अपने चेहरे पर ' हाउस - फुल ' का बोर्ड लगा रखा हो . वहां ज्यादा देर ठहरने से भी क्या फायदा ! मगर वो , जो अकेली हैं - - - और गैर शादीशुदा हैं , वो - - - . "

" क्या ? "

" वो शायर बनाकर छोड़ती हैं . " गुलशन ने पायल की तरफ तिरछी निगाह उछाल कर कहा .

पायल सकपका कर रह गयी . गेसू पायल की तरफ देखकर मुस्करा दी - - - और ना समझ चंचल भोंदुओं की तरह हँस दिया .

पार्क के बीचोबीच एक शहीद स्वतंत्रता - सेनानी की आदमकद मूर्ति आँखों में आस लिए स्थापित थी , जिसने अपना अनमोल आज दे दिया था - - - हमारे सुनहरे कल के लिए . मूर्ति के ऊपर साया करता हुआ अतीत का गवाह एक बूढ़े पीपल का पेड़ था , जिस पर चिड़ियों ने अपनी कचहरी लगा रखी थी . पंक्षियों की चीं - चूँ ने मौसम को और भी खुशगवार बना रखा था .

सामने ही एक मंदिर था .

गुलशन ने प्रस्ताव रखा -- " क्यों न हम लोग मंदिर में दर्शन को चलें ! "

" हाँ - हाँ - - - क्यों नहीं ! " चंचल ने समर्थन किया .

मगर पायल पिछड़ी -- " मैं तो नहीं जाऊंगी मंदिर - मस्जिद . "

चंचल ने टोका -- " क्यों ? "

" क्योंकि न तो मुझे धर्म के ढकोसलों पर भरोसा है और न ही धर्म परस्त लोग पसन्द हैं . "

" मगर क्यों ? हम भी तो जानें . "

" क्योंकि सभी धर्म और उनके कट्टर अनुयायी औरत को पेशाब खाना समझते हैं . पेशाब खाना ! जो स्वास्थ्य और सुविधा के लिए जरूरी तो है - - - मगर गन्दी चीज है . "

उसके कटु विचारों से मर्माहत चंचल झुंझला पड़ा और उसे डाँटते हुए बोला -- " अच्छा अपना दर्शन अपने पास रखो और सीधे से चली चलो - - - वरना दूंगा एक चपत . " फिर थोड़ा समझाते हुए कहा -- " पायल ! जरा सोचो - - - कि मनुष्य यदि एक अदृश्य शक्ति को अपना प्रणेता मानकर अगर संयमित रहता है - - - तो इस भ्रम के बने रहने में बुराई क्या ? "

मजबूर होकर पायल बेमन से सबके साथ हो ली .

थोड़ी देर बाद - - - मंदिर से बाहर निकलने पर पायल न जाने कैसे अपनी ही शामत को न्योता देकर गुलशन से पूछ बैठी -- " कहो -- - - तुमने क्या माँगा ? क्या कहा उससे ? "

" किससे ? "

" अपने भगवान से . उस पत्थर से . "

गुलशन पायल के चेहरे पर निरीह दृष्टि डालकर शायराना अंदाज़ में बोला -- " बुत बन गए जब आप , तो पत्थर से क्या कहें ! "

गुलशन के इस उत्तर से पायल सिटपिटा गयी . गेसू चौंक पड़ी और अन्जान चंचल मूर्खों कि तरह उन्हें ताकने लगा .

और तभी !

गुलशन के पाँव में चलते - चलते ठोकर लगी . वह अपना सन्तुलन खोकर गिर पड़ा . पाँव में हलकी सी मोच आ गयी . चलने में कुछ असुविधा अनुभव करने लगा . गुलशन बोला -- " अब तो मैं कहीं दूर जाऊंगा नहीं . तुम लोगों को जाना है तो जाओ . "

" मैं भी नहीं जाऊंगी . कुछ थकान सी हो रही है . " गेसू ने कहा .

चंचल ने पायल से पूछा - " तब तुम्हें चलना है या नहीं ? "

" कहाँ ? "

" सुना है- - - यहाँ से लगभग आधा मील की दूरी पर बहुत सुन्दर झरना है . "

" तब चलूंगी . " पायल ने हामी भरी .

चंचल गुलशन व गेसू को सम्बोधित करके बोला -- " हम लोग करीब घन्टे भर में वापस लौट आयेंगे . यहीं आस - पास मिलना . "

दोनों चले गये .

गुलशन ने गेसू से पूछा -- " तुम क्यों नहीं गयी ? "

" तुम जो नहीं गये . " गेसू ने मुस्कराकर कहा -- " तुम्हें क्या मंदिर के बाहर पायल की बाबत भगवान से मन्नतें मांगनें के लिये यहाँ अकेले छोड़ने की बेवकूफ़ी करती ! "

उसकी बात का जवाब न देकर गुलशन ने स्वयं एक प्रश्न पूछ लिया -- " अच्छा ये बताओ ! तुमने मन्दिर में भगवान से क्या प्रार्थना की ? "

गेसू ने चंचलता से मुस्करा कर कहा -- " बताऊँ ? "

" पूछ तो रहा हूँ . "

" मैनें कहा - - - हे दया निधान ! तुम्हारी दया से अमीर कलाकन्द और गरीब शकरकन्द खाते हैं . तुमने क्लर्क को रोटी और अफसर को डबलरोटी दी . तुमने भेड़ों को पैदायिशी ऊनी ओवरकोट दिया और मनुष्य को नंगा पैदा किया . तुमने आदमी को दाढ़ी और औरत को साड़ी दी . तुम आशिक को माशूक देते हो , माशूक को बच्चा देते हो और बच्चे को कच्छा देते हो . तुम्हारी दया से कोई मिल चलाता है और कोई चरखा चलाता है . अब हमारा भी चक्कर चला दो ना . "

" कैसा चक्कर ? किससे ? " हंसकर गुलशन ने पूछा .

गेसू ने इठलाकर जवाब दिया -- " इश्क का . तुमसे . "

अचानक गुलशन गंभीर होकर बोला -- " गेसू ! तुम्हारी बातों और व्यवहार से साफ़ झलकने लगा है कि तुम मेरे प्यार में गहरे डूबने लगी हो . और ये बात मुझ बदनसीब के लिए गर्व कि होती , मगर - - - पर याद रखो गेसू ! जो लोग इश्क को फूल समझते हैं - - - वो अक्ल के दुश्मन है . जिनमें से एक मैं भी था . ये मेरा भोग हुआ यथार्थ है कि इश्क एक टीस है , दर्द है , जलन है , तड़प है , यन्त्रणा है , कसक है , शूल है - - - लेकिन ये फूल किसी भी दशा में नहीं है . इसीलिये कहता हूँ कि कम से कम तुम समय रहते इश्क की बांहों में गिरफ्तार होने से बचो . काश ये बात - - - जो मैं तुमसे अब कह रहा हूँ , मुझे पहले पता होती , तो आज मेरा हाल यूँ बेहाल न हुआ होता . "

इतना कहते - कहते गुलशन की तबीयत कुछ बेचैन सी हो गयी - - - और ऐसे समय बदनाम सिगरेट बहुत काम आती है . उसने एक सिगरेट होठों से लगाकर सुलगा ली और एक लम्बा कश खींच कर गेसू की तरफ देखा . देखा कि वह कुछ सोच रही है .

गुलशन ने धुआं छोड़कर पूछा -- " क्या सोच रही हो ? "

" सोच रही हूँ - - - मुझसे तो मुई सिगरेट का भाग्य ही अच्छा है , जो बार - बार तुम्हारे होठों से लगती है . "

" चाहो तो तुम भी होठों से लगाकर देखो . " गुलशन ने मुस्कराकर कहा .

गेसू ने बच्चों सी मासूम मुस्कान बिखेरते हुए पूछा -- " किसे - - - तुम्हें या सिगरेट को ? "

" फिलहाल मैं सिगरेट की बात कर रहा हूँ शैतान . "

इस बीच सांझ ढल चुकी थी . मौसम की धीमी करवट के साथ उजाले पर सुरमई धुंधलके ने कब्ज़ा जमा लिया था . चाँद बादलों का घूंघट सरकाकर जमीं का नज़ारा कर रहा था .

दोनों पार्क के निकट स्थित एक झील के किनारे बैठ गए . झील के शान्त निर्मल जल में चांदी सा चमचमाता चाँद तैर रहा था . जैसा कि लोग प्रायः करते हैं - - - गेसू ने बेवजह एक कंकड़ उठाकर झील में उतराते चाँद पर बेदर्दी से दे मारा . सीधे शान्त पानी में कंकड़ गिरते ही - - - चोट से बचने के लिए , चंचल चाँद सिमट - सिकुड़कर न जाने कहाँ छुप गया - - - और थोड़ी ही देर में , खतरा टल गया जानकार फिर से ऊपर झाँक - झाँक कर शरारती बच्चे कि भाँति निशानेबाज़ को मुंह चिढ़ाने लगा .

झील के किनारे लगे मरकरी लैम्पों की तेज़ रौशनी में , पानी में तैर रही मछलियाँ साफ़ नज़र आ रही थीं . राहु की महादशा से गुज़र रहे गुलशन ने रोटी के कुछ टुकड़े पानी में फेंकने शुरू कर दिए . बार - बार पानी में गिर रहे रोटी के टुकड़ों ने मछलियों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया , और मछलियाँ उनके इर्द - गिर्द जमा हो गयीं - - - जैसे चुम्बक के इर्द - गिर्द लौह - कण खिंचे आते हैं .

गेसू बोली -- " दोस्त गुलशन ! देखो - - - मछलियाँ किस तरह तेजी से रोटी की तरफ खिंची चली आ रही हैं . जैसे रोटी चुम्बक हो . "

गुलशन दार्शनिक अंदाज़ में बोला -- " ये तो प्रकृति का नियम है गेसू . मछली ही क्या - - - प्रत्येक जीव ' रोटी ' की तरफ भागता है . सच पूछो तो रोटी दुनिया में सबसे बड़ा चुम्बक है . "

" लेकिन मेरी रोटी तो तुम हो जी . जी करता है - - - तुम्हें समूचा निगल जाऊं . बस - - - हुज़ूर की हाँ की जरूरत है . "

दोनों हंस पड़े . लेकिन फिर - - - गेसू गंभीर हो गयी

वह बोली -- " गुलशन ! दोस्त - - - क्या सचमुच हम - तुम नहीं मिल सकते ? "

" गेसू ! आसमान बहुत ऊंचा है - - - और मैं धरती पर चल रहा हूँ . धरती और आसमान का मिलन कभी नहीं हो सकता . कभी भी नहीं . "

" लेकिन जरा ध्यान से दूर तक देखो , तो धरती और आसमान साफ़ मिलते नज़र आयेंगे . "

" ये तो मात्र आँखों का भ्रम है गेसू . ये संभव नहीं ."

गेसू निरुत्तर हो गयी . गुलशन विचारों में उलझ गया .

गेसू ने पूछा - " क्या सोचने लगे दोस्त ? "

" एक उलझी हुई बात याद आ गयी थी . उसी के बारे में सोच रहा था . "

" क्या ? "

" यही - - - कि कभी - कभी तुम मुझे बेहद अजीब सी लगती हो . जैसे - - - जब मेरी - तुम्हारी पहली मुलाक़ात हुई थी , तो चलते समय मैंने तुमसे एक प्रश्न पूछा था . उस वक्त तुमने जवाब बहुत उलझा हुआ और घुमाकर दिया था . "

गेसू जानबूझकर अन्जान बनते हुए बोली -- " क्या पूछा था . याद नहीं . कुछ याद दिलाओ . "

" मैंने तुमसे पूछा था - - - क्या तुम कुँवारी हो , मगर - - - . "

" मगर अब तुम पहले मेरे एक प्रश्न का ईमानदार उत्तर दो . "

" पूछो . "

" क्या तुम ब्रम्हचारी हो ? " गेसू अति ज्ञानी की तरह मुस्करायी .

गुलशन अपने ही सवाल की गिरफ्त में आकर सिटपिटा गया और गले की हड्डी उगल कर जान बचाने की नीयत से बोला -- " खैर - - - छोड़ो भी इन पेचीदा बातों को . क्या जरूरत है कि हम एक - दूसरे के सामने बेवजह बेनकाब हों ! "

" जरूरत है . दोस्त ! दोस्त - दोस्त एक - दूसरे के सामने जितना ही बेपर्दा होंगे - - - दोस्ती उतनी ही गहरी होगी . बताओ ! जवाब दो !१ "

" उंह ! अब छोडो भी . कोई और बात करो . " गुलशन ने पुनः बचना चाहा .

गेसू हंस दी - - - और उसे पुनः झेंपना पड़ा .

सामने झील के गहरे खामोश जल में एक खूबसूरत नाव तैर रही थी - - - और उस पर उसका नाम लिखा था -- ' जन्नत ' . जन्नत के ऊपर एक बोर्ड लटक रहा था ' किराए के लिए खाली ' का . यानि की जन्नत किराये पर उपलब्ध थी .

दोनों उस किराये की जन्नत के मालिक से उसका किराया पूछने चल पड़े .

और उधर !

पायल और चंचल जब थोड़ी दूर चल चुके तो झरने का रास्ता उनकी समझ से बाहर हो गया . तभी एक ग्रामीण बूढ़ा व्यक्ति दिखा . कुटिलता से लबालब उसकी चौकन्नी कंजी आँखों में जवानी की शेष शैतानी साफ़ छलक रही थी .

चंचल ने उससे पूछा -- " दादा ! झरने का रास्ता कौन सा है ? "

देहाती बूढ़े ने बड़ी ढिठाई से कहा -- " बताने का क्या दोगे बच्चा ? "

" बताने का भी लोगे ? "

" क्यों न लूँ ? आजकल जब तुम शहर वाले पानी का भी मोल लेते हो , तो पानी के झरने का रास्ता बताने का क्यों न हो ? "

" पर दादा - - - हम तो परदेसी ठहरे . बता भी दो . "

" अच्छा - - - परदेसी हो तो बताये देता हूँ . सुनो ! जिस तरफ से चाँद निकलता है , उधर बढ़ो . फिर ढलान उतर कर ध्रुव तारा निकलने की दिशा में घूम जाओ . इसके बाद नाक की सीध में चले जाओ . फिर दाहिने मुड़ो , फिर बायें जाओ . फिर बायें मुड़ो , फिर दायें जाओ . राम - राम जपते जाओ . राम जी चाहेंगे , तो पहुँच ही जाओगे . "

चंचल झुंझलाकर बोला -- " वाह ! क्या रास्ता बताया है दद्दू !! कुछ पल्ले ही नहीं पड़ा . "

" मुफ्त में रास्ता ऐसे ही बताया जाता है पुत्तर . अच्छा राम - राम . राम जी चाहेंगे , तो फिर भेंट होगी . " देहाती खींसे निपोर कर बोला और सर्र से आगे सरक लिया . वह कभी न कभी शहरी दुलत्ती झेल चुका आक्रोशित बन्दा लगता था .

पायल भौचक्की होकर उसे देखती रह गयी और चंचल अपना माथा पीटकर बोला -- " हे भगवान ! ये कौन सी बयार बहाई है तूने , जो हमारे देश के देहाती भी अब शहरी सरीखे होते जा रहे हैं . "

पायल ने दूर जाते उस बूढ़े को कुढ़ी हुई तेज आवाज़ देकर ललकारा -- " अरे बुढ़ऊ ! अपना नाम तो बताते जाओ ? बताने का दूँगी . "

" अलोका s s s . "

" हाय ! तुझे पैदा होने से किसी ने न रोका !! " पायल ने तेज आवाज़ में तुकबंदी भिड़ाई .

पायल और चंचल - - - दोनों हंस पड़े . अब दोनों ने अपने आप ही झरना ढूँढने की ठानी और आगे बढ़ने लगे .

रास्ते में फूलों से खिलखिलाती जंगली झाड़ी की फुनगी पर हवा से फुदकते एक खूबसूरत फूल को तोड़कर चंचल ने उसे काँटों की दुनिया से दूर ले जाकर पायल के रेशमी बालों में सजा दिया - - - उसकी ठोढ़ी उठाकर उसके और भी निखर आये सौन्दर्य को गौर से देखा और फिर एक चुटकी काटकर उसके गुलाबी गालों को लाल कर दिया .

घायल गालों के दर्द से तिलमिलायी पायल किटकिटायी -- " ठहर बदमाश . "

चंचल भाग लिया . पायल उसका पीछा करते - करते असफल होकर अचानक एक कंकड़ उठाकर बोली -- " रुक जाओ , वरना मार दूँगी . "

चंचल पर कोई असर नहीं पड़ा . वो लगातार भागता रहा . "

पायल ने पुनः प्रेम - पगी धमकी दी -- " मैं सच कहती हूँ , मार दूँगी . मेरा निशाना कभी नहीं चूकता . "

उसका इतना कहना था की चंचल जस का तस रुक गया और दिल पर हाथ रखकर आशिकाना अंदाज़ में आह भरकर बोला -- " हाँ जानी ! ये तो हम भी मानते हैं . "

" जाओ हम तुमसे नहीं बोलते . " उसने रूठने का अभिनय किया .

" चलो अब छोडो गुस्सा . तुम पर फबता भी नहीं . उल्टे दूनी सुन्दर दिखती हो . " इतना कहकर चंचल अधिकार पूर्वक पायल का हाथ पकड़कर आगे बढ़ने लगा .

पायल भी गुस्से का हाथ छोड़ खुलकर हंस पड़ी . जैसे हीरे - मोती की डिब्बी सी खुल गयी .

झरना सामने झलकने लगा . झर - झर झरते झरने की तेज आवाज़ सन्नाटे में कुछ भय ही पैदा कर रही थी . गिरते पानी से उठता झाग ऐसा लग रहा था , जैसे पानी को मिर्गी का दौरा पड़ गया हो और उसके मुंह से झाग निकल रहा हो .
 
दोनों झरने के पास पहुँच , पानी में पाँव लटका कर बैठ गए - - - और झाग से दूधिया हुए पानी को देखने लगे .

हलकी - हलकी हवा चल रही थी और इस मंद हवा में पायल का दुपट्टा यूँ काँप रहा था , जैसे पेठे की मिठाई पर लगा चाँदी का वरक . अचानक नम हवा का एक तेज झोंका आया और पायल के महकते रेशमी बालों को उसके सलोने चेहरे पर गिरा गया .

बेपरवाह पायल ने काफी देर तक उन्हें चेहरे से नहीं हटाया , तो चंचल ने कहा -- " ये क्या ! ऊपर का चाँद निकल आया और तुम नीचे के चाँद को मुझसे छिपा रही हो . " उसकी आँखों में चुहल के परिन्दे चहकने लगे थे .

मुस्कराती पायल ने बालों का गुच्छा सा बनाकर उसे काँधे के पीछे फेंक दिया और बोली -- " चंचल ! अब हमें जल्दी ही शादी कर लेनी चाहिए . "

चंचल चुस्की लेकर बोला -- " क्यों ! बहुत मन कर रहा है क्या - - - शादी का !! या मुझ पर से भरोसा उठने लगा है ? "

" नहीं - - - ये बात नहीं . तुम्हें तो हर वक्त ठिठोली सूझती रहती है . सच्चाई ये है - - - कि हमारे देश में प्यार को यदि अधिक दिनों तक शादी नसीब न हो , तो प्यार बदनाम हो जाता है . और मैं अपने प्यार को बदनाम होते नहीं देख सकती . "

" तब ठीक है . मैं पिता जी से शादी की तारीख के बारे में मौका देखकर बात करूंगा . भगवान ने चाहा तो बात जल्द ही बन जायेगी . तुम भी भगवान से प्रार्थना करो . मगर तुम्हें तो ईश्वर पर भरोसा ही नहीं . " इतना टुकड़ा जड़कर चंचल हंसने लगा .

पायल झुंझला पड़ी -- " तुम तो बात का बतंगड़ बनाते हो . "

चंचल खामोश हो गया और उसकी ओर टकटकी लगाकर कुछ सोचने लगा .

पायल ने कुछ देर बाद टोका -- " क्या सोचने लगे ? "

चंचल मुस्करा कर बोला -- " अपनी शादी के बाद की परिस्थितियों पर सोच रहा था . सोच रहा था कि जब हम लोग शादी कर लेंगे , तो कुछ साल बाद , सारा दिन ऑफिस की नौकरी बजाने के बाद - - -जब मैं थका - हारा घर लौटा करूंगा , तो मेरी आँखों में तुम्हारा खिले गुलाब सा निखरा चेहरा हुआ करेगा और साँसों में महकती हुई मुस्कराहट . मीठे सपने संजोये - - - दरवाजे का परदा हटाकर अन्दर दाखिल हुआ करूंगा तो आँगन में पहुँचते ही तुम्हारी सुरीली आवाज़ की गुनगुनाहट के बजाय आधा दर्ज़न अनचाहे बच्चों की कान फोड़ देने वाली चिल्ल पों मुझे बौखला देगी - - - फिर मुझे तुम दिखोगी - - - नंगे पाँव - - - कोहनियों तक आटे में सने हाँथ - - - बाल बिखरे हुए , जिनमे लगी आटे की सफेदी तुम्हारे आने वाले कल का नक्शा सामने ला खड़ा करेगी - - - और तुम गला फाड़ - फाड़ कर दहाड़ रही होगी - - - मन्टू के बच्चे - - - अरे एक रोटी की लोई लेकर भाग गया -- चिड़िया बनाने के वास्ते . तेरा सत्यानाश हो . अरे ओ नीतू की बच्ची - - - बेवकूफ - - - सारी पकी - पकाई दाल ही बिखेर दी . अभी तुम्हारा बाप क्या मेरे कलेजे से रोटी खायेगा ? अरे सारा दूध कौन पी गया ? अब उनको कौन से दूध की चाय पिलाऊंगी ? अरे ओ पप्पू - - - क्या तेरी मौत आई है मेरे हाथों ? कल ही तो तुम्हारे बाप ने अपने ऑफिस के क्लर्क की पेन्सिल चुराकर दी थी - -- - और तूने आज चबा - चबा कर भुरकुस बना दी . अरे कुल नासों ! भगवान करे तुम्हें ढाई घडी का हैजा हो . तुम्हारी माँ न मरे , बाप जिये . और - - - ."

" बस - - बस - - बस ." पायल उसकी बात काटकर बेतहाशा हंसने लगी .

चंचल भी हँसते - हँसते बोला --" चलो - - - अब लौट चलें . "

दोनों वापस लौट पड़े और थोड़ी ही देर में पार्क में बैठे गेसू और गुलशन के पास पहुँच गये .

कुछ देर गप शप के बाद पायल बोली -- " अब हमें घर लौट चलना चाहिये . हम लोग अधिक रात तक यहाँ बैठेंगे , तो पुलिस हमें आवारा ठहरा कर भीतर कर देगी ."

गुलशन ने भी समर्थन किया --" पायल ठीक कह रही है . अब हमें भोजन आदि करते हुए घर चलना चाहिये . "

सभी उठ खड़े हुए . कर में सवार हो वो होटल तलाशते घर की ओर बढ़ चले . होटल के नाम पर चंचल की दबी भूख कुलाचें मारने लगी थी - - - और वो बड़ी बारीकी से अनुभव कर रहा था की गरीब और अमीर का फर्क कितना नगण्य है , कि चन्द घन्टों की भूख दोनों को सामान बना देती है .

काफी देर व दूरी पर एक होटल प्रकट हुआ . वो भी एकदम नालायक किस्म का था . मजबूरी का नाम महात्मा गांधी - - - सब उसी में हो लिए .

होटल क्या था - - - दिल्ली कि जुबान में उसे ढाबा और पंजाबी बोली में रोटी की दुकान कह सकते थे . होटल में बैठे - बैठे समन्दर सा लम्बा और पहाड़ सा भारी वक्त गुज़र गया , तब कहीं बनियान व कच्छा पहने एक भोंदू सा बेयरा मेहरबान हुआ .

उसने भूख से ऐंठते चंचल से पूछा -- " हुक्म साब ! "

चंचल ने पूछा -- " क्या - क्या चीजें मिल सकती हैं ? "

" जो आप मांगें साब . "

" छोले - भठूरे हैं ? "

" नहीं साब ."

" डोसा है ? "

" नहीं साब . "

" आलू - पराठा तो होगा ? "

" वो भी नहीं है साब . "

" तब क्या है ? "

" जो आप मांगें साब . " बेयरा ने रटा - रटाया वाक्य दोहराया .

चंचल झुंझलाकर बोला -- " अच्छा जाओ - - - मेनू लेकर आओ . "

" होश में बात करो साब . मीनू मेरी बीबी है . मैं उसके बारे में ऐसी - वैसी बात नहीं सुन सकता . और फिर - - - ये होटल है , चकला नहीं साब . " बेयरा गुस्से में शोले की तरह भड़कता हुआ बोला .

सभी इस छोटे से होटल के बेयरे की नादानी पर हंस दिए . वो समझ गए की बेयरा मेनू को मीनू समझा था और मेनू का अर्थ नहीं समझता .

बेयरा सामान्य होकर पुनः बोला -- " बताइये साब ! क्या लाऊँ ? "

" भेजा . " झुंझलाए चंचल को लगा - - - बेयरा उसका भेजा चाट रहा है .

मगर बेयरा चौंके बिना बोला -- " ये शुद्ध शाकाहारी वैष्णव होटल है साब . यहाँ ऐसी - वैसी चीज़ , मांस - मछली नहीं मिलती . "

एक बार पुनः सबकी हंसी छूट गयी .

चंचल ने बेयरे की बौनी बुद्धि पर तरस खाते हुए कहा -- " अच्छा भइये - - - अपनी मर्जी से जो लाना हो ले आओ . "

बेयरा चला गया और थोड़ी देर में साधारण से भी निचले दर्जे का खाना ले आया . सभी भूखे पेट में जबरन खाना ठूंसने लगे .

बगल की मेज पर पसरे कब्र में पैर लटकाये दो बूढ़े खाने के इन्तजार में धीरे - धीरे खांस रहे थे . कव्वालों के जंगी मुकाबले की तरह , जब एक खांसना बन्द कर देता , तो दूसरा शुरू हो जाता . ऐसा मालूम होता था - - - दोनों में कोई मौन समझौता हो चुका है -- पारी - पारी खाँसने का .

सब्जी में मिर्च अधिक होने के कारण सभी सी - सी कर रहे थे . गुलशन को तो क्रोध ही आ रहा था .

तभी वही बेयरा नज़दीक आकर बोला - " कुछ और साब ? "

" हाँ - - - एक प्लेट केकड़ा और एक प्लेट मोहब्बत . " गुलशन ने गुस्से में फरमाइश की .

" हें - - हें - - हें ! क्यों मज़ाक करते हैं साब !! " बेयरा खींसें निपोर कर चला गया .

गेसू ने गुलशन से उत्सुकता वश पूछा -- " एक बात समझ में नहीं आयी - - - कि केकड़े के साथ मोहब्बत का क्या सम्बन्ध ? "

" है - - - बहुत गहरा सम्बन्ध है . " वह पायल की ओर देखकर बोला -- " मोहब्बत भी उतनी ही बदसूरत होती है , जितना केकड़ा . मोहब्बत भी उतनी ही लज़ीज़ होती है , जितना कि छिले - भुने केकड़े का गोश्त . और कभी - कभी मोहब्बत भी उतनी ही जहरीली होती है , जैसे कोई - कोई केकड़ा . "

उसकी बातें सुनकर पायल ने आँखें चुरा लीं , गेसू मुस्करा दी , जबकि चंचल हंस पड़ा .

खाना निपटाकर सभी काउन्टर पर आ गये .

चंचल ने रुपया देते हुए होटल मालिक से कहा -- " तुम्हारे खाने में मिर्चे बहुत अधिक थीं . न जाने तुम लोग खाने में इतनी मिर्चें क्यों झोंकते हो ! "

" क्योंकि इतनी तीक्ष्णता खाने के स्वाद को बढ़ा देती है . " होटल मालिक बोला -- " साहब ! आम भारतीयों की जहाँ और सब इन्द्रियाँ मर चुकी हैं , वहीँ चखने कि शक्ति अभी तक बनी हुई है . बल्कि निरन्तर भूखा रहने से और भी अधिक तीक्ष्ण हो गयी है . इसीलिये तीक्ष्ण मिर्चों की अधिकता रहती है , हमारे खाने में . "

" ओह - - - अब समझा . तो ये बात है . आदमी काबिल लगते हो . "

" मगर टुटपुंजिया होटल चलाता हूँ - - - पर एक बात बताओ साहब . कुल मिलाकर खाना कैसा रहा ? "

" वाह - - - क्या बात थी . यदि सब्जी उतनी ही गर्म होती , जितना कि पानी था - - - यदि रोटी उतनी ही मुलायम होती , जितना कि पापड़ था - - - यदि चावल उतना ही पुराना होता , जितना कि दाल में घी था - - - तब तो भोजन बहुत अच्छा होता . " व्यंग्य के बाद गुस्से में चंचल ने रौब झाड़ा -- " तुम्हें शर्म नहीं आती , ऐसे होटल का मालिक होने पर ? "

" नहीं साहब ! क्योंकि मैं खाना दूसरे बढ़िया होटल में खाता हूँ . " वह चंचल को चिढ़ाने कि नीयत से बड़ी ढिठाई से बोला .

और खिसियाए चंचल ने अब होटल से भाग निकलने में ही भलाई समझी .

सभी कार में बैठकर घर की ओर चल दिये .

शराब डायन की तरह एक बार जिसके गले पड़ जाये , उसे आसानी से नहीं छोड़ती .

गुलशन के घर के उदास कमरे में गेसू और गुलशन बैठे थे . गेसू के लाख मना करने के बावजूद भी वह पी रहा था .

उसकी इस लत से आजिज आकर गेसू बोली -- " दोस्त ! देखती हूँ - - - आजकल तुम बहुत अधिक पीने लगे हो . नुकसान करेगी . आदत नहीं छूटती , तो कम से कम सोडा मिलाकर तो पी सकते हो . शुद्ध व्हिस्की तुम्हारे दिल - जिगर को नुकसान पहुँचायेगी . "

" हुंह - - - अब दिल - जिगर की जरूरत भी क्या ! वैसे सोडा इसलिये नहीं मिलाता क्योंकि इसकी असली ख़ुश्बू मारी जाती है , मिलावट से . "

" ख़ुश्बू ! " गेसू चौंक कर बोली -- " अजीब होते हैं पियक्कड़ . तुम्हें ख़ुश्बू मिलती है शराब में ! मुझे तो बदबू आती है . मरे हुए जीव की सी बदबू . "

" उफ़ - - - क्यों नशा हिरन करती हो मेरा ! '

" ठीक ही तो कहती हूँ . मरे जीव की बदबू ही तो आती है इससे . शराब की बदबू और मरे हुए जीव की बदबू में कौन सा ज्यादा फर्क है ! दोनों तरह की बदबू चीजों के सड़ने से ही तो पैदा होती हैं . इसीलिये इन दोनों में समानता भी स्वाभाविक है . " इतना कहकर वो पलंग से उठी और कमरे में अव्यवस्थित पड़ी चीजों को ठीक - ठाक करते हुए बोली -- " कमरा ठीक से सजा तक नहीं . जैसे - तैसे सब चीजें रख छोड़ी हैं . तुम्हें मालूम होना चाहिए - - - चीजों के रख रखाव मात्र को सरसरी नज़र से निहार कर ही सयाना आगन्तुक घर के स्वामी की अभिरुचियों और मनोदशा को पूरा पढ़ लेता है . अब आगे से मुझे तुम्हारा घर सजा - संवरा मिलना चाहिए - - - समझे ! "

गुलशन आह भरकर बोला -- " कोई सजाने वाली हो , तब न . "

गेसू पुनः पलंग पर बैठकर बोली -- " तभी तो कहती हूँ दोस्त - - - शादी कर लो . घर भी संवर जाएगा और धीरे - धीरे गृहस्थी में खोकर , गम और शराब दोनों ही छूट जायेंगे . कुछ सोचा इस बारे में ? कुछ उम्मीद है शादी की - - - या नहीं ? "

" नहीं - - - कुछ भी नहीं . " गुलशन ने उस पूर्णता से जवाब दिया , जहां धरती और आकाश - - - दोनों समाप्त हो जाते हैं . उम्मीद के पँछी पिंजरा तोड़कर फुर्र हो जाते हैं . आने वाली आशायें खूंखार चमगादड़ों की तरह घर के कोने में उलटी लटक कर फड़फड़ाने लगती हैं - - - और निगाहों में दूर - दूर तक रेगिस्तान तैरने लगते हैं .

गेसू उसकी बचकानी जिद की हंसी उड़ाकर बोली -- " तुम भी अज़ब किस्म के प्रेमी हो , जो महाराणा प्रताप सरीखा हठ योग धारण किये हो कि जब तक पायल को नहीं पाओगे , नहीं सुधरोगे . मुझे तो लगता है कि ग्रामोफोन के रेकार्ड कि सुई की तरह एक ही जगह अटक कर तुम बार - बार एक ही बेसुरी आवाज़ निकाल रहे हो और मैं चाहती हूँ कि तुम्हारी पायल पर अटकी सुई को थोड़ा सा आगे बढ़ाकर तुम्हें फिर से सुर प्रदान कर दूं . दोस्त ! सच कहती हूँ - - - शादी न करके तुम अधर्मी हुए जा रहे हो . मेरी मानों तो अब ये अधर्म की राह छोड़ो . जवानी का धर्म निभाओ .जालिम ! तुम पर जवानी भी तो ऐसी टूटी है कि - - - . जानते हो ! तुम शादी न करके सिर्फ अपने शारीरिक अरमानों का गला ही नहीं घोट रहे हो , बल्कि अपनी अगली पीढ़ियों का भी अग्रिम खून कर रहे हो . "

" नहीं भई - - - मैं अपने बच्चों का पेशगी खून नहीं कर रहा . वो तो पैदा हो ही रहे हैं . " गुलशन भी मजाक में बोला .

गेसू उसका मजाक न समझ कर चौंकी -- " क्या मतलब ! तुम्हारी तो शादी ही नहीं हुई - - - फिर बच्चे - - - बताओ कौन कहाँ हैं तुम्हारे बच्चे ? "

" अब छोड़ो भी ये बात . वैसे भी मैं उनका नाम लेकर पतिव्रताओं को संकट में नहीं डालना चाहता . " गुलशन ने हंसकर जवाब दिया .

गेसू उसकी बात पर हंसकर अचानक गंभीर हो गयी और बोली -- " दोस्त ! ज़िन्दगी की गंभीर बातें यदि यूं ही मजाक में टालते रहे , तो ज़िन्दगी खुद एक मज़ाक बनकर रह जायेगी . मजाक छोड़ो और किसी अच्छी सी लड़की से शादी कर लो . "

" तब पायल को राजी करो . "

" पायल - - - पायल - - - पायल ! तुम भूत से चिपके हुए हो . " गेसू एकाएक गरमाकर लगभग चीख ही पड़ी और फिर अपनी ही गर्मी की आंच में थोडा नरमाकर समझाने लगी -- " गुलशन ! मेरे दोस्त !! अगर भूत कडुआ है , तो उसे मुंह में आये थूक की तरह थूक देना ही बेहतर होता है . "

" लेकिन भूत की बुनियाद पर ही तो भविष्य का स्वप्नीला मज़बूत महल खड़ा किया जाता है . "

" ओफ्फोह - - - अब तुम्हें कौन समझाये कि गरीबी सपने देखने का हक़ छीन लेती है . गुलशन ! मैं चाहती हूँ , पहले तुम पर्याप्त अमीर बनो , फिर सपने देखो . " गेसू ने सलाह दी -- " दोस्त ! क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम मेरे पिता जी से कुछ हजार रूपये कर्ज लेकर अपना कोई व्यवसाय शुरू करो ? "

" कर्ज़ से व्यवसाय ! न बाबा ना . कर्ज़ का एक रुपया भी हिमालय से भारी होता है . हजारों का बोझ मैं कैसे उठा पाऊँगा ! मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा ये बोझ . "

" तब फिर तुम मुझसे शादी कर लो . पिताजी की संपत्ति में मेरे हिस्से की रकम से तुम अपना व्यवसाय शुरू कर सफल हो सकते हो . "

" ऐसा नहीं हो सकता . "

" क्यों ? "

" क्योंकि किसी की यादें -- - - मेरी साँसें बन चुकी हैं . पायल की याद चन्दन की सुगंध की तरह मेरे मस्तिष्क में हमेशा छाई रहती हैं . और अगर मैं तुमसे शादी कर भी लूं . तो तुम्हारे प्रति पूरी ईमानदारी नहीं बरत पाऊँगा . ऐसा मुझे विश्वास है . उस हालत में मेरी बाहों में तुम रहोगी और दिमाग में पायल और सिर्फ पायल ही घूमती रहेगी . गेसू ! मैं नहीं चाहता की तुम मेरी कटी - फटी ज़िन्दगी में एक पैबंद की भूमिका अदा करो और मैं नाटक का एक मजबूर कलाकार बनकर रह जाऊँ . मेरी हमदर्द ! मुझे मालूम है कि शादी के बाद मैं तुम्हें सच्चा प्रेम नहीं दे सकूँगा - - - क्योंकि मेरे विचार में प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है . बाद में किया गया प्रेम तो खुद को भूलने का , भरमाने का समझौता मात्र है . "

" एक बात पूछूँ दोस्त ! क्या प्रथम प्रेम नासमझी नहीं हो सकती ? "

" गेसू ! कुछ नासमझियां मजबूरियाँ भी तो बनकर रह जाती हैं . इसीलिए कहता हूँ - - - मेरा ख़याल छोड़ दो - - - क्योंकि मेरा मन वो वीरान गुलशन है , जिसके वृक्षों की शाखाओं पर मनहूस उल्लू बसेरा करते है . मेरे पास तुम्हें क्या मिलेगा ! तुम बेकार ही मुझसे दिल लगाकर खुद को परेशान कर रही हो . मेरा दिल टूट चुका है . "

" मैं टूटे हुए दिल को प्यार का मरहम लगाकर जोड़ दूँगी . तुम्हारी जिंदगी में फिर से बहार ला दूँगी . "

" नहीं - - - ये संभव नहीं होगा . टूटे हुए कांच को जोड़ने पर भी दरार रह जाती है - - - फिर दिल तो दिल है . मुझे भूल जाओ गेसू - - - बिसार दो . मेरे जीवन में बहार लाने का तुम्हारा सपना पूरा न हो सकेगा . मैं कभी भी फूल - फल नहीं सकता . मेरी ज़िन्दगी पतझड़ के उस बबूल की तरह है , जिसका जिस्म काँटों से छिदा है और शाखें नंगी हैं . "

" बारिश गिरे तो सूने बबूल पर भी नई कोपलें आ जाती हैं दोस्त . मेरे प्यार की रिमझिम फुहारें तुम्हारे जीवन से पतझड़ को दूर भगाकर बहारों को फिर से न सजा दें , तो कहना . मेरे प्यार और उसके जादुई असर पर यकीन करके तो देखो . "

" मैंने कब कहा कि यकीन नहीं ! भरोसा है - - - मुझे तुम्हारी दोस्ती पर . गेसू ! मैं तुम्हें एक अच्छे दोस्त के रूप में तुम्हें कभी नहीं भूल पाऊंगा . मुझे मालूम है - - - कि दोस्त अच्छे वही होते हैं , जो बुरे वक्त में पैदा होते हैं . लेकिन पायल - - - . "

" फिर पायल . " गेसू ने उसे लगभग डांट ही दिया -- " आज कुछ ज्यादा ही चढ़ा ली है क्या ! हज़ार बार कह चुकी हूँ , उसकी आकांक्षा छोड़ दो . उसकी नज़र में तुम उसके लायक ही नहीं . "

" क्यों नहीं ! जब तुम्हारे योग्य हूँ , तो उसके लायक क्यों नहीं ? "
 
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