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डाक बंगला
गुलफ़ाम ख़ान
ऑफ़िस के काम से मुझे यूपी के एक छोटे से कस्बे में जाना पड़ा. हमारी कंपनी एक मल्टी नैशनल कंपनी है. कंपनी की ओर से मुझे होटल, खाने पीने और सफ़र के सारे ख़र्चे मिल जाते हैं. जैसा कि हर आम आदमी का ये उसूल है कि कंपनी को चूतिया बनाओ और पैसे बचाओ. वैसे ही मैं भी ऑफ़िस से मिले पैसों को बचाने की कोशिश करता हूं और फिर उन पैसों से ऐश करता हूं.
उस कस्बे का नाम था मावली पोरा. वहां मुझे कंपनी के प्रॉडक्ट की रिसर्च करनी थी. सबसे पहले तो मैने सोचा कि कोई बहुत ही सस्ता सा होटल या गेस्ट हाउस ढूंढ़ा जाए और वहां के मैनेजर को पटा कर बहुत बड़ा सा बिल बनाया जाए, ताकि ऑफ़िस में सबमिट करके पैसे बना सकू. मावली पोरा जाने के लिए मुझे जमाल पुर स्टेशन उतरना था. जमाल पुर उतर कर मैने रिक्शे वाले को तलाश करना शुरू किया. शाम हो चली थी. स्टेशन के बाहर रिक्शे वाले नहीं थे, लोग बैल गाड़ी ले कर खड़े थे. ट्रांसपोर्ट का यहां यही साधन था. मैने एक नौजवान बैलगाड़ी वाले को बुलाया और पूछा कि मावली पोरा जाने का वो क्या लेगा. वो बोला, साब कुछ भी दे देना. आप जैसे साब लोग तो यहां कभी कभी ही आते हैं. आप तो हमारे मेहमान हैं. कुछ भी दे देना.
मैं उसकी बैल गाड़ी में बैठ गया. बैलगाड़ी चल पड़ी. उसने किसी फ़िल्मी बैल गाड़ी वाले की तरह एक स्थानीय गीत गाना शुरू कर दिया. धीरे धीरे अंधेरा छाने लगा था. मैंने उससे पूछा... तुम्हारा नाम क्या है.
वो बोला... साब वैसे तो हमारा नाम हरि प्रसाद है, लेकिन लोग हमें हरिया कहते हैं. फिर उसने पूछा... साब, यहां किससे मिलने आए हो ?
किसी से भी नहीं. मैं अपनी कंपनी के काम से आया हूं. दो दिन रहूंगा.''
* किस के घर पर रहोगे ?'
घर पर कहां. होटल में.''
वो हंस कर बोला, “होटल कहां है यहां साब, एक गेस्ट हाउस है....
'' हां तो वहीं रह लूंगा.''
मेरी बात मानिए साब तो यहां के डाक बंगले में रहिए... सस्ता पड़ेगा.
'' डाक बंगले में ? पर वो तो सरकारी होता है.''
“काहे का सरकारी साब... जब भी आप जैसा कोई साब यहां आता है, वहीं रहता है... वहां का चौकीदार कुछ पैसे ले कर रहने, खाने पीने का प्रबंध कर देता है.
" ठीक है तो मुझे वहीं ले जाओ.'' लगभग बीस मिनट के बाद मावली पोरा गांव आ गया. बैल गाड़ी वाला मुझे डाक बंगले ले गया और बोला, “साब आप यहीं ठहरो, मैं गोपाल को बुला कर लाता हूं...''
गोपाल कौन?'' मैंने पूछा. वही इस डाक बंगले का चौकीदार.'' वो चला गया और फिर थोड़ी देर बाद एक बूढ़े आदमी को साथ ले कर आ गया.
साब ये गोपाल है. आप बात कर लीजिए.''
मैंने कहा, “ कितने पैसे लोगे भाई दो रात गुजारने के?''
वो चापलूसी से मुस्कुराया और बोला...“साब आप तो हमारे मेहमान हैं... कुछ भी दे देना.''
मैं हंस कर बोला...“ यहां जो भी आता है, गांव वालों का मेहमान होता है क्या... चलो बताओ, कितना लोगे ?'
वो कुछ झिझकते हुए बोला...“ सौ रुपये दे देना साब'
मैं मन ही मन में खुश हो गया. कंपनी को दो हज़ार का चूना लगाऊंगा. मैंने कहा, ठीक है... ये बताओ, कुछ खाने पीने को मिलेगा क्या अभी ?
वो बोला, क्यों नहीं साब... अभी हम अपनी लड़की को बोल देते हैं... फटाफट तैयार कर देगी. आप क्या खाते हैं... बैजिटेरियन या नान बैजिटेरियन ?
मुझे फिर हंसी आ गई .... नॉन वेज मिल जाए तो मजा आ जाए.
अभी लो साब.... अभी आपके लिए एक देसी मुर्गी तैयार कर देते हैं. आप आराम करो जब तक.
मैने बैल गाड़ी वाले को दस रुपये दिए. वो खुश हो कर चला गया. चौकीदार मुझे डाक बंगले में ले गया. मैने देखा कि डाक बंगला अच्छा खासा था. एक साफ सुथरा बेड था और रूम भी काफी बड़ा था. उसने पंखा चालू कर दिया और खाने का इंतज़ाम करने चला गया.
गुलफ़ाम ख़ान
ऑफ़िस के काम से मुझे यूपी के एक छोटे से कस्बे में जाना पड़ा. हमारी कंपनी एक मल्टी नैशनल कंपनी है. कंपनी की ओर से मुझे होटल, खाने पीने और सफ़र के सारे ख़र्चे मिल जाते हैं. जैसा कि हर आम आदमी का ये उसूल है कि कंपनी को चूतिया बनाओ और पैसे बचाओ. वैसे ही मैं भी ऑफ़िस से मिले पैसों को बचाने की कोशिश करता हूं और फिर उन पैसों से ऐश करता हूं.
उस कस्बे का नाम था मावली पोरा. वहां मुझे कंपनी के प्रॉडक्ट की रिसर्च करनी थी. सबसे पहले तो मैने सोचा कि कोई बहुत ही सस्ता सा होटल या गेस्ट हाउस ढूंढ़ा जाए और वहां के मैनेजर को पटा कर बहुत बड़ा सा बिल बनाया जाए, ताकि ऑफ़िस में सबमिट करके पैसे बना सकू. मावली पोरा जाने के लिए मुझे जमाल पुर स्टेशन उतरना था. जमाल पुर उतर कर मैने रिक्शे वाले को तलाश करना शुरू किया. शाम हो चली थी. स्टेशन के बाहर रिक्शे वाले नहीं थे, लोग बैल गाड़ी ले कर खड़े थे. ट्रांसपोर्ट का यहां यही साधन था. मैने एक नौजवान बैलगाड़ी वाले को बुलाया और पूछा कि मावली पोरा जाने का वो क्या लेगा. वो बोला, साब कुछ भी दे देना. आप जैसे साब लोग तो यहां कभी कभी ही आते हैं. आप तो हमारे मेहमान हैं. कुछ भी दे देना.
मैं उसकी बैल गाड़ी में बैठ गया. बैलगाड़ी चल पड़ी. उसने किसी फ़िल्मी बैल गाड़ी वाले की तरह एक स्थानीय गीत गाना शुरू कर दिया. धीरे धीरे अंधेरा छाने लगा था. मैंने उससे पूछा... तुम्हारा नाम क्या है.
वो बोला... साब वैसे तो हमारा नाम हरि प्रसाद है, लेकिन लोग हमें हरिया कहते हैं. फिर उसने पूछा... साब, यहां किससे मिलने आए हो ?
किसी से भी नहीं. मैं अपनी कंपनी के काम से आया हूं. दो दिन रहूंगा.''
* किस के घर पर रहोगे ?'
घर पर कहां. होटल में.''
वो हंस कर बोला, “होटल कहां है यहां साब, एक गेस्ट हाउस है....
'' हां तो वहीं रह लूंगा.''
मेरी बात मानिए साब तो यहां के डाक बंगले में रहिए... सस्ता पड़ेगा.
'' डाक बंगले में ? पर वो तो सरकारी होता है.''
“काहे का सरकारी साब... जब भी आप जैसा कोई साब यहां आता है, वहीं रहता है... वहां का चौकीदार कुछ पैसे ले कर रहने, खाने पीने का प्रबंध कर देता है.
" ठीक है तो मुझे वहीं ले जाओ.'' लगभग बीस मिनट के बाद मावली पोरा गांव आ गया. बैल गाड़ी वाला मुझे डाक बंगले ले गया और बोला, “साब आप यहीं ठहरो, मैं गोपाल को बुला कर लाता हूं...''
गोपाल कौन?'' मैंने पूछा. वही इस डाक बंगले का चौकीदार.'' वो चला गया और फिर थोड़ी देर बाद एक बूढ़े आदमी को साथ ले कर आ गया.
साब ये गोपाल है. आप बात कर लीजिए.''
मैंने कहा, “ कितने पैसे लोगे भाई दो रात गुजारने के?''
वो चापलूसी से मुस्कुराया और बोला...“साब आप तो हमारे मेहमान हैं... कुछ भी दे देना.''
मैं हंस कर बोला...“ यहां जो भी आता है, गांव वालों का मेहमान होता है क्या... चलो बताओ, कितना लोगे ?'
वो कुछ झिझकते हुए बोला...“ सौ रुपये दे देना साब'
मैं मन ही मन में खुश हो गया. कंपनी को दो हज़ार का चूना लगाऊंगा. मैंने कहा, ठीक है... ये बताओ, कुछ खाने पीने को मिलेगा क्या अभी ?
वो बोला, क्यों नहीं साब... अभी हम अपनी लड़की को बोल देते हैं... फटाफट तैयार कर देगी. आप क्या खाते हैं... बैजिटेरियन या नान बैजिटेरियन ?
मुझे फिर हंसी आ गई .... नॉन वेज मिल जाए तो मजा आ जाए.
अभी लो साब.... अभी आपके लिए एक देसी मुर्गी तैयार कर देते हैं. आप आराम करो जब तक.
मैने बैल गाड़ी वाले को दस रुपये दिए. वो खुश हो कर चला गया. चौकीदार मुझे डाक बंगले में ले गया. मैने देखा कि डाक बंगला अच्छा खासा था. एक साफ सुथरा बेड था और रूम भी काफी बड़ा था. उसने पंखा चालू कर दिया और खाने का इंतज़ाम करने चला गया.