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तड़फती जवानी

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Guest
तड़फती जवानी-1

यह कहानी मेरी और मेरी एक सहेली जिसका नाम हेमलता है, उसकी है। मेरी वैसे दो सहेलियाँ हैं जो बचपन से साथ में खेली, पढ़ी और लिखी हैं जिनमें से मैंने तारा के बारे में ‘अंगूर का मजा किशमिश में’ कहानी में बताया था।

हम तीन सहेलियाँ आज भी एक-दूसरे के संपर्क में हैं पर समय के साथ पारिवारिक काम-काज में व्यस्त रहने की वजह से मिलना-जुलना कम हो गया है।

मैं धन्यवाद करना चाहूँगी उन लोगों का जिन्होंने फोन और इन्टरनेट जैसे साधन बनाए जो हमें आज भी जोड़े हुए हैं।

हेमलता भी मेरी तरह एक मध्य वर्ग की एक पारिवारिक महिला है, उम्र 46, कद काफी अच्छा-खासा है, लगभग 5’8″ होगा, उम्र के हिसाब से भारी-भरकम शरीर और 2 बच्चों की माँ है। उसके दोनों बच्चों की उम्र 24 और 21 है और अभी पढ़ाई ही कर रहे हैं।

हेमलता हम तीन सहेलियों में से एक थी, जिसकी शादी सबसे पहले 21 वर्ष की आयु में हुई और बच्चे भी जल्दी हुए। उसके पति एक सरकारी स्कूल में क्लर्क थे और जब उसका दूसरा बच्चा सिर्फ 2 साल का था तब स्कूल की छत बरसात में गिर गई, जिसमें उसके पति के सर पर गहरी चोट आई।

शहर के सरकारी सदर अस्पताल ने उन्हें अपोलो रांची भेज दिया, पर रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई थी। यह समाचार मेरे लिए काफी दु:खद था मैंने उसके बारे में पता किया तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे उसके ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया हो।

वो केवल 28 साल की एक जवान महिला थी जो अब दो बच्चों की विधवा माँ थी।

खैर… उसे इन सबसे उबरने में काफी समय लग गया और एक अच्छी बात यह हुई कि उसे अपने पति की जगह नौकरी मिल गई। उसने अपनी पढ़ाई शादी के बाद भी जारी रखी थी और स्नातक पूरा कर लिया था। जिसके वजह से आज वो अपने पति की कुर्सी पर है और बच्चों का भविष्य अच्छा है।

मैंने और तारा ने अपनी तरफ से उसे इस भारी सदमे से उबरने में हर संभव प्रयास किया जहाँ तक हमारी सीमाएँ थीं।

हेमा की नौकरी लग जाने से परिणाम भी सही निकला, दफ्तर जाने और काम में व्यस्त होने के बाद वो पूरी तरह से इस हादसे से उबर चुकी थी।

चार साल बीत गए थे। इस बीच तारा तो नहीं पर मैं हफ्ते में एक बार उससे बात कर लिया करती थी और कभी उड़ीसा से घर जाती तो मिल भी लेती थी।

एक अकेली जवान औरत किसी शिकार की तरह होती है, जिसके दो शिकारी होते हैं। एक तो मनचले मर्द जो किसी अकेली औरत को भूखे भेड़िये की तरह देखते हैं और दूसरा उसका स्वयं मन भी उसे गलत रास्ते पर ले जाता है।

मनचले मर्दों को तो औरत दरकिनार भी कर दे पर अपने मन से कैसे बचे कोई..!

यही शायद हेमा के साथ भी अब होने लगा था, वो दूसरे मर्दों से तो खुद को बचाती फिर रही थी, पर अपने मन से बचना मुश्किल होता जा रहा था।

हेमा अब 33 साल की एक अकेली जवान विधवा थी और दो बच्चों की माँ भी, इसलिए कोई मर्द उसे पत्नी स्वीकार ले असंभव सा था। ऊपर से आज भी छोटे शहरों में समाज, जो औरतों की दूसरी शादी पसंद नहीं करता।

इसी सिलसिले में मैंने एक बार हेमा के घरवालों से बात की पर वो तैयार नहीं हुए ये कह कर कि हेमा अब किसी और घर की बहू है।

पर मेरे बार-बार विनती करने पर उन्होंने हेमा के ससुराल वालों से बात की, पर जवाब न सिर्फ नकारात्मक निकला बल्कि नौकरी छोड़ने की नौबत आ गई।

उसके ससुराल वालों ने यह शक जताया कि शायद हेमा का किसी मर्द के साथ चक्कर है सो उसे जोर देने लगे कि नौकरी छोड़ दे।

पर हेमा जानती थी कि उसके बच्चों का भविष्य उसके अलावा कोई और अच्छे से नहीं संवार सकता इसलिए उसने सभी से शादी की बात करने को मना कर दिया और दुबारा बात नहीं करने को कहा।

हालांकि उसने हमसे कभी शादी की बात नहीं की थी, बस हम ही खुद भलाई करने चले गए जिसकी वजह से हेमलता से मेरी दूरी बढ़ने लगी।

मैंने सोच लिया था कि अब उससे कभी बात नहीं करुँगी, पर बचपन की दोस्ती कब तक दुश्मनी में रह सकती है।

कुछ महीनों के बाद हमारी बातचीत फिर से शुरू हो गई।

वो शाम को जब फुर्सत में होती तो हम घन्टों बातें करते और मैं हमेशा यही प्रयास करती कि वो अपने दु:खों को भूल जाए। इसलिए वो जो भी मजाक करती, मैं उसका जरा भी बुरा नहीं मानती। वो कोई भी ऐसा दिन नहीं होता कि मेरे पति के बारे में न पूछे और मुझे छेड़े ना।

धीरे-धीरे मैंने गौर किया कि वो कुछ ज्यादा ही मेरे और मेरे पति के बीच जो कुछ रात में होता है उसे जानने की कोशिश करने लगी।

एक बार की बात है मैं बच्चे को स्कूल पहुँचा कर दुबारा सो गई क्योंकि मेरी तबियत थोड़ी ठीक नहीं थी। तभी हेमा ने मुझे फोन किया मेरी आवाज सुन कर वो समझ गई कि मैं सोई हुई थी।

उसने तुरंत मजाक में कहा- क्या बात है.. इतनी देर तक सोई हो… जीजाजी ने रात भर जगाए रखा क्या?

मैंने भी उसको खुश देख मजाक में कहा- क्या करूँ… पति परमेश्वर होता है, जब तक परमेश्वर की इच्छा होती है.. सेवा करती हूँ!

उसने कहा- लगता है.. कल रात कुछ ज्यादा ही सेवा की है?

मैंने कहा- हाँ.. करना तो पड़ता ही है, तूने नहीं की क्या?

मेरी यह बात सुन कर वो बिल्कुल खामोश हो गई। मैंने भी अब सोचा कि हे भगवान्… मैंने यह क्या कह दिया!

वो मेरे सामने नहीं थी, पर मैं उसकी ख़ामोशी से उसकी भावनाओं को समझ सकती थी। पर उसने भी खुद को संभालते हुए हिम्मत बाँधी और फिर से मुझसे बातें करने लगी।

दरअसल बात थी कि मैं अपने एक चचेरे भाई की शादी में घर जाने वाली थी और उसने यही पूछने के लिए फोन किया था कि मैं कब आऊँगी, क्योंकि गर्मी की छुट्टी होने को थी तो वो भी मायके आने वाली थी।

शाम को मैंने उसका दिल बहलाने के लिए फिर से उसे फोन किया। कुछ देर बात करने पर वो भावुक हो गई।

एक मर्द की कमी उसकी बातों से साफ़ झलकने लगी। मैं भी समझ सकती थी कि अकेली औरत और उसकी जवानी कैसी होती है। सो मैंने उससे उसके दिल की बात साफ़-साफ़ जानने के लिए पूछा- क्या कोई है.. जिसे वो पसंद करती है?

उसने उत्तर दिया- नहीं.. कोई नहीं है और मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती.. मैं एक विधवा हूँ..!

तो मैं हैरान हो गई कि अभी कुछ देर पहले इसी तरह की बात कर रही थी, अब अचानक क्या हो गया। मैंने भी उसे भांपने के लिए कह दिया- अगर ऐसा सोच नहीं सकती तो फिर हर वक़्त क्यों किसी के होने न होने की बात करती हो..!

उसने भी मेरी बात को समझा और सामान्य हो गई।

तब मैंने सोचा कि चलो इसके दिल की बात इसके मुँह से आज निकलवा ही लेती हूँ और फिर मैंने अपनी बातों में उसे उलझाने की कोशिश शुरू कर दी।

कुछ देर तो वो मासूम बनने का ढोंग करती रही पर मैं उसकी बचपन की सहेली हूँ इसलिए उसका नाटक ज्यादा देर नहीं चला और उसने साफ़ कबूल कर लिया कि उसे भी किसी मर्द की जरुरत है जो उसके साथ समय बिताए… उसे प्यार करे..! तब मैंने उससे पूछा- क्या कोई है.. जो उसे पसंद है?

तब उसने बताया- हाँ.. एक मर्द कृपा है जो मेरे स्कूल में पढ़ाता है और हर समय मुझसे बात करने का बहाना ढूंढता रहता है.. वो अभी भी कुँवारा है, पर मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि वो मुझे पसंद करता है या सिर्फ मेरी आँखों का धोखा है!

तब मैंने उसे समझाया कि वो उसे थोड़ा नजदीक आने दे ताकि पता चल सके आखिर बात क्या है।

उसने वैसा ही किया और एक दिन हेमा ने मुझे फोन करके बताया कि उस आदमी ने उससे कहा कि वो उससे प्यार करता है और शादी करना चाहता है।

पर हेमा ने उससे कह दिया- शादी के लिए कोई भी तैयार नहीं होगा और सबसे बड़ी मुसीबत तो जाति की हो जाती क्योंकि वो दूसरी जाति का है।

तब मैंने हेमा से पूछा- आखिर तू क्या चाहती है?

उसने खुल कर तो नहीं कहा, पर उसकी बातों में न तो ‘हाँ’ था न ही ‘ना’ था। मैं समझ गई कि हेमा चाहती तो थी कि कोई मर्द उसका हाथ दुबारा थामे, पर उसकी मज़बूरी भी थी जिसकी वजह से वो ‘ना’ कह रही थी।

खैर… इसी तरह वो उस आदमी से बातें तो करती पर थोड़ा दूर रहती, क्योंकि उसे डर था कहीं कोई गड़बड़ी न हो जाए।

पर वो आदमी उसे बार बार उकसाने की कोशिश करता।

एक दिन मैंने हेमा से कहा- मेरी उससे बात करवाओ।

तो हेमा ने उसकी मुझसे बात करवाई फिर मैंने भी उसे समझाया।

वो लड़का समझदार था सो वो समझ गया पर उसने कहा- मेरे लिए हेमा को भूलना मुश्किल है।

शादी का दिन नजदीक आ गया और मैं घर चली आई और हेमा से मिली।

मैंने उसके दिल की बात उसके सामने पूछी- क्या तुम उस लड़के को चाहती हो?

उसने कहा- चाहने न चाहने से क्या फर्क पड़ता है जो हो नहीं सकता, उसके बारे में सोच कर क्या फ़ायदा!

मैंने उससे कहा- देखो अगर तुम उसे पसंद करती हो तो ठीक है, जरुरी नहीं कि शादी करो समय बिताना काफी है, तुम लोग रोज मिलते हो अपना दुःख-सुख उसी कुछ पलों में बाँट लिया करो।

तब उसने कहा- मैं उसके सामने कमजोर सी पड़ने लगती हूँ.. जब वो कहता है कि वो मुझसे प्यार करता है।

मैंने उससे पूछा- क्या लगता है तुम्हें..!

मेरा सवाल सुन कर उसकी आँखों में आंसू आ गए और कहने लगी- जब वो ऐसे कहता है.. तब मुझे लगता है उसे अपने सीने से लगा लूँ, उसकी आँखों में इतना प्यार देख कर मुझसे रहा नहीं जाता!

मैं उसके दिल की भावनाओं को समझ रही थी, पर वो रो न दे इसलिए बात को मजाक में उड़ाते हुए कहा- तो ठीक है.. लगा लो न कभी सीने से.. मौका देख कर..!

और मैं हँसने लगी।

मेरी हँसी देख कर वो अपने आंसुओं पर काबू करते हुए मुस्कुराने लगी।
 
तड़फती जवानी-2

मेरा सवाल सुन कर उसकी आँखों में आंसू आ गए और कहने लगी- जब वो ऐसे कहता है.. तब मुझे लगता है उसे अपने सीने से लगा लूँ, उसकी आँखों में इतना प्यार देख कर मुझसे रहा नहीं जाता!

मैं उसके दिल की भावनाओं को समझ रही थी, पर वो रो न दे इसलिए बात को मजाक में उड़ाते हुए कहा- तो ठीक है.. लगा लो न कभी सीने से.. मौका देख कर..!

और मैं हँसने लगी।

मेरी हँसी देख कर वो अपने आंसुओं पर काबू करते हुए मुस्कुराने लगी।

मैंने उसका दिल बहलाने के लिए कहा- एक काम कर.. शादी-वादी भूल जा सुहागरात मना ले..!

वो मुझे मजाक में डांटते हुए बोली- क्या पागलों जैसी बातें करती है।

मैंने कहा- चल मैं भी समझती हूँ तेरे दिल में क्या है, अच्छा बता वो दिखने में कैसा है?

उसने तब मुझे बताया- वो दिखने में काफी आकर्षक है।

मैंने उससे कहा- मैं अपने भाई को बोल कर शादी में उसे भी बुला लेती हूँ, ताकि तुम दोनों मिल भी सको और घर का कुछ काम भी हो जाए।

वो बहुत खुश हुई, पर नखरे करती रही कि किसी को पता चल जाएगा तो मुसीबत होगी।

मैंने उसे समझाया- डरो मत, मैं सब कुछ ठीक कर दूँगी..!

वो बुलाने पर आ गया, पर हैरानी की बात ये थी के वो मेरे पड़ोस के एक लड़के सुरेश का दोस्त था जो हमारे साथ ही स्कूल में पढ़ा था।

यह सुरेश वही था जो मुझे पसंद करता था, पर मैं अपने घर वालों के डर से कभी उसके सवाल का उत्तर न दे सकी थी। आज भी मैं जब सुरेश से मिलती हूँ तो मुझे वैसे ही देखता है, जैसे पहले देखा करता था। वो मुझसे ज्यादा नहीं पर स्कूल के समय हेमा से ज्यादा बातें करता था।

सुरेश ने हेमा के जरिये ही मुझसे अपने दिल की बात कही थी।

मैंने सोचा चलो अच्छा है सुरेश के बहाने अगर हो सके तो हेमा को उसके प्यार से मिलवा दिया जाएगा।

मैंने सुरेश से बातें करनी शुरू कर दीं, फिर एक दिन मैंने बता दिया कि हेमा उसके दोस्त को पसंद करती है इसलिए उसे यहाँ बहाने से बुलाया था, पर अगर वो साथ दे तो हेमा को उससे मिलवाने में परेशानी नहीं होगी और सुरेश भी मान गया।

अब रात को हम रोज सारा काम खत्म करने के बाद छत पर चले आते और घन्टों बातें करते। हेमा को हम अकेला छोड़ देते ताकि वो लोग आपस में बात कर सकें।

कुछ दिनों में घर में मेहमानों का आना शुरू हो गया और घर में सोने की जगह कम पड़ने लगी तो मैं बाकी लोगों के साथ छत पर सोने चली जाती थी।

गर्मी का मौसम था तो छत पर आराम महसूस होता था। बगल वाले छत पर सुरेश और कृपा भी सोया करते थे।

एक दिन कृपा ने मुझसे पूछा कि क्या कोई ऐसी जगह नहीं है, जहाँ वो हेमा से अकेले में मिल सके।

मैं समझ गई कि आखिर क्या बात है, पर मेहमानों से भरे घर में मुश्किल था और हेमा सुरेश के घर नहीं जा सकती थी क्योंकि कोई बहाना नहीं था।

तो उसने मुझसे कहा- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हेमा रात को छत पर ही सोये?

मैंने उससे कहा- ठीक है.. घर में काम का बहाना बना कर मैं उसके घर पर बोल दूँगी कि मेरे साथ सोये।

मैंने उसके घर पर बोल दिया कि शादी तक हेमा मेरे घर पर रहेगी, काम बहुत है उसके घर वाले मान गए। रात को हम छत पर सोने गए।

कुछ देर हम यूँ ही बातें करते रहे क्योंकि सबको पता था कि हम साथ पढ़े हैं किसी को कोई शक नहीं होता था कि हम लोग क्या कर रहे हैं।

जब बाकी लोग सो चुके थे, तब मैंने भी सोचा कि अब सोया जाए। मैंने सुरेश की छत पर ही मेरा और हेमा का बिस्तर लगा दिया और सुरेश और कृपा का बिस्तर भी बगल में था।

कृपा और हेमा आपस में बातें कर रहे थे और मैं अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी और बगल में सुरेश अपने बिस्तर पर लेटा था।

तभी सुरेश ने मुझसे पूछा- तुम्हारे पति कैसे हैं?

मैंने कहा- ठीक हैं!

कुछ देर बाद उसने मुझसे पूछा- उसने जो मुझसे कॉलेज के समय कहा था, उसका जवाब क्यों नहीं दिया?

मैंने तब उससे कहा- पुरानी बातों को भूल जाओ मैं अब शादीशुदा हूँ।

फिर उसने दुबारा पूछा- अगर जवाब देना होता तो मैं क्या जवाब देती?

मैंने कुछ नहीं कहा, बस चुप लेटी रही, उसे लगा कि मैं सो गई हूँ.. सो वो भी अब खामोश हो गया।

रात काफी हो चुकी थी, अँधेरा पूरी तरह था हर चीज़ काली परछाई की तरह दिख रही थी।

कुछ देर बाद मैंने महसूस किया कि हेमा मेरे बगल में आकर लेट गई है। गौर किया तो कृपा भी उसके बगल में लेटा हुआ था।

मुझे लगा अब सब सोने जा रहे हैं सो मैं भी सोने का प्रयास करने लगी। तभी मुझे कुछ फुसफुसाने की आवाज सुनाई दी। उस फुसफुसाहट से सुरेश भी करवट लेने लगा तो फुसफुसाहट बंद हो गई।

कुछ देर के बाद मुझे फिर से फुसफुसाने की आवाज आई।

यह आवाज हेमा की थी, वो कह रही थी- नहीं.. कोई देख लेगा.. मत करो।

फिर एक और आवाज आई- सभी सो गए हैं किसी को कुछ पता नहीं चलेगा!

मैं मौन होकर सब देखने की कोशिश करने लगी पर कुछ साफ़ दिख नहीं रहा था बस हल्की फुसफुसाहट थी।

थोड़ी देर में मैंने देखा तो एक परछाई जो मेरे बगल में थी वो कुछ हरकत कर रही थी, यह हेमा ही थी, मैंने गौर किया तो उसके हाथ खुद के सीने पर गए और वो अपने ब्लाउज के हुक खोल रही थी, फिर उसके हाथ नीचे आए और साड़ी को ऊपर उठाने लगे और कमर तक उठा कर उसने अपनी पैंटी निकाल कर तकिये के नीचे रख दी।

मैं समझ गई कि आज दोनों सुहागरात मनाने वाले हैं और मेरी उत्सुकता बढ़ गई।

मैंने अब सोचा कि देखा जाए कि कृपा आखिर क्या कर रहा है।

मैंने धीरे से सर उठाया तो देखा उसका हाथ हिल रहा है, मैं समझ गई कि वो अपने लिंग को हाथ से हिला कर तैयार कर रहा है।

तभी फिर से फुसफुसाने की आवाज आई हेमा ने कहा- आ जाओ।

और कुछ ही पलों में मुझे ऐसा लगा कि जैसे एक परछाई के ऊपर दूसरी परछाई चढ़ी हुई है।

कृपा हेमा के ऊपर चढ़ा हुआ था, हेमा ने पैर फैला दिए थे जिसकी वजह से उसका पैर मेरे पैर से सट रहा था। उनकी ऐसी हरकतें देख कर मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा था। मैं सोच में पड़ गई कि आखिर इन दोनों को क्या हुआ जो बिना किसी के डर के मेरे बगल में ही ये सब कर रहे हैं।

उनकी हरकतों से मेरी अन्तर्वासना भी भड़कने लगी थी, पर मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी। मैं ऐसी स्थिति में फंस गई थी कि कुछ समझ में नहीं आ रहा था, क्योंकि मेरी कोई भी हरकत उन्हें परेशानी में डाल सकता था और मैं हेमा को इस मौके का मजा लेने देना चाहती थी इसलिए चुपचाप सोने का नाटक करती रही।

अब एक फुसफुसाते हुई आवाज आई- घुसाओ..!

यह हेमा की आवाज थी जो कृपा को लिंग योनि में घुसाने को कह रही थी।

कुछ देर की हरकतों के बाद फिर से आवाज आई- नहीं घुस रहा है, कहाँ घुसाना है.. समझ नहीं आ रहा!

यह कृपा था।

तब हेमा ने कहा- कभी इससे पहले चुदाई नहीं की है क्या.. तुम्हें पता नहीं कि लण्ड को बुर में घुसाना होता है?

कृपा ने कहा- मुझे मालूम है, पर बुर का छेद नहीं मिल रहा है।

तभी हेमा बोली- हाँ.. बस यहीं लण्ड को टिका कर धकेलो..!

मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, पर उनकी बातों से सब समझ आ रहा था कि कृपा ने पहले कभी सम्भोग नहीं किया था। इसलिए उसे अँधेरे में परेशानी हो रही थी और वो अपने लिंग से योनि के छेद को टटोल रहा था। जब योनि की छेद पर लिंग लग गया, तो हेमा ने उससे कहा- धकेलो!

तभी हेमा की फिर से आवाज आई- क्या कर रहे हो.. जल्दी करो.. बगल में दोनों (मैं और सुरेश) हैं.. जाग गए तो मुसीबत हो जाएगी!

कृपा ने कहा- घुस ही नहीं रहा है, जब धकेलने की कोशिश करता हूँ तो फिसल जाता है।

तब हेमा ने कहा- रुको एक मिनट!

और उसने तकिये के नीचे हाथ डाला और पैंटी निकाल कर अपनी योनि की चिकनाई को पौंछ लिया और बोली- अब घुसाओ..!

मैंने गौर किया तो मुझे हल्का सा दिखा कि हेमा का हाथ उसके टांगों के बीच में है, तो मुझे समझ में आया कि वो कृपा का लिंग पकड़ कर उसे अपनी योनि में घुसाने की कोशिश कर रही है।

फिर हेमा की आवाज आई- तुम बस सीधे रहो.. मैं लण्ड को पकड़े हुए हूँ, तुम बस जोर लगाओ, पर थोड़ा आराम से.. तुम्हारा बहुत बड़ा और मोटा है।

तभी हेमा कसमसाते हुए कराह उठी, ऐसे जैसे वो चिल्लाना चाहती हो, पर मुँह से आवाज नहीं निकलने देना चाहती हो और बोली- ऊऊईईइ माँ…आराम से…डाल..!

तब कृपा रुक गया और हेमा को चूमने लगा। हेमा की कसमसाने और कराहने की आवाज से मुझे अंदाजा हो रहा था कि उसे दर्द हो रहा है, क्योंकि काफी समय के बाद वो सम्भोग कर रही थी।

हेमा ने कहा- इतना ही घुसा कर करो.. दर्द हो रहा है..!

पर कृपा का यह पहला सम्भोग था इसलिए उसके बस का काम नहीं था कि खुद पर काबू कर सके, वो तो बस जोर लगाए जा रहा था।

हेमा कराह-कराह कर ‘बस.. बस’ कहती रही।

हेमा ने फिर कहा- अब ऐसे ही धकेलते रहोगे या चोदोगे भी?

कृपा ने उसके स्तनों को दबाते हुआ कहा- हाँ.. चोद तो रहा हूँ..!

उसने जैसे ही 10-12 धक्के दिए कि कृपा हाँफने लगा और हेमा से चिपक गया।

हेमा ने उससे पूछा- हो गया?

कृपा ने कहा- हाँ, तुम्हारा हुआ या नहीं?

हेमा सब जानती थी कि क्या हुआ, किसका हुआ सो उसने कह दिया- हाँ.. अब सो जाओ!

मैं जानती थी कि कृपा अपनी भूख को शांत कर चुका था, पर हेमा की प्यास बुझी नहीं थी, पर वो भी क्या करती कृपा सम्भोग के मामले में अभी नया था।

तभी कृपा की आवाज आई- हेमा, एक बार और चोदना चाहता हूँ!

हेमा ने कहा- नहीं.. सो जाओ..!

मुझे समझ नहीं आया आखिर हेमा ऐसा क्यों बोली।

तभी फिर से आवाज आई- प्लीज बस एक बार और!

हेमा ने कहा- इतनी जल्दी नहीं होगा तुमसे… काफी रात हो गई है.. सो जाओ फिर कभी करना..!

पर कृपा जिद करता रहा, तो हेमा मान गई और करवट लेकर कृपा की तरफ हो कर लेट गई।

मैंने अपना सर उठा कर देखा तो कृपा हेमा के स्तनों को चूस रहा था, साथ ही उन्हें दबा भी रहा था और हेमा उसे लिंग को हाथ से पकड़ कर हिला रही थी।

कुछ देर बाद हेमा ने उससे कहा- अपने हाथ से मेरी बुर को सहलाओ…!

कृपा वही करने लगा।

कुछ देर के बाद वो दोनों आपस में चूमने लगे फिर हेमा ने कहा- तुम्हारा लण्ड कड़ा हो गया है जल्दी से चोदो, अब कहीं सारिका या सुरेश जग ना जाएँ!

उसे क्या मालूम था कि मैं उनका यह खेल शुरू से ही देख रही थी।

हेमा फिर से सीधी होकर लेट गई और टाँगें फैला दीं। तब कृपा उसके ऊपर चढ़ गया और उसने लिंग योनि में भिड़ा कर झटके से धकेल दिया।

हेमा फिर से बोली- आराम से घुसाओ न..!

कृपा ने कहा- ठीक है.. तुम गुस्सा मत हो!

कृपा अब उसे धक्के देने लगा। कुछ देर बाद मैंने गौर किया कि हेमा भी हिल रही है। उसने भी नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए थे।

दोनों की साँसें तेज़ होने लगी थीं और फिर कुछ देर बाद कृपा फिर से हाँफते हुए गिर गया, तो हेमा ने फिर पूछा- हो गया?

कृपा ने कहा- हाँ.. हो गया..!

तब हेमा ने उसे तुरंत ऊपर से हटाते हुए अपने कपड़े ठीक करने लगी और बोली- सो जाओ अब..!

हेमा की बातों में थोड़ा चिढ़चिढ़ापन था जिससे साफ़ पता चल रहा था कि वो चरम सुख से अभी भी वंचित थी।

कृपा अब सो चुका था, पर हेमा अभी भी जग रही थी। उसने मेरी तरफ देखा मैंने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं। वो शायद देख रही थी कि कहीं उसकी चोरी पकड़ी तो नहीं गई।

मेरा किसी तरह का हरकत न देख उसने अपनी साड़ी के अन्दर हाथ डाल और अपनी योनि से खेलने लगी थोड़ी देर में वो अपने शरीर को ऐंठते हुए शांत हो गई।

मैं यूँ ही खामोशी से उसे दखती रही पर काफी देर उनकी ये कामक्रीड़ा देख मुझे भी कुछ होने लगा था। साथ ही एक ही स्थिति में सोये-सोये बदन अकड़ सा गया था, तो मैंने सोचा कि अब थोड़ा उठ कर बदन सीधा कर लूँ, सो मैं पेशाब करने के लिए उठी तो देखा कि सुरेश जगा हुआ है और मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा रहा था।

 
तड़फती जवानी-3

कृपा अब सो चुका था, पर हेमा अभी भी जग रही थी। उसने मेरी तरफ देखा मैंने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं। वो शायद देख रही थी कि कहीं उसकी चोरी पकड़ी तो नहीं गई।

मेरा किसी तरह का हरकत न देख उसने अपनी साड़ी के अन्दर हाथ डाल और अपनी योनि से खेलने लगी थोड़ी देर में वो अपने शरीर को ऐंठते हुए शांत हो गई।

मैं यूँ ही खामोशी से उसे देखती रही पर काफी देर उनकी कामक्रीड़ा देख मुझे भी कुछ होने लगा था। साथ ही एक ही स्थिति में सोये-सोये बदन अकड़ सा गया था, तो मैंने सोचा कि अब थोड़ा उठ कर बदन सीधा कर लूँ, सो मैं पेशाब करने के लिए उठी तो देखा कि सुरेश जगा हुआ है और मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा रहा था।

मैं उसे नजरअंदाज करते हुए उठ कर चली गई। पेशाब करके वापस आई और लेट गई। तब सुरेश ने धीरे से पूछा- क्या हुआ नींद नहीं आ रही क्या?

मैंने कहा- मैं तो सो चुकी थी, अभी नींद खुली।

तब उसने कहा- तुमने कुछ देखा क्या?

मैंने कहा- क्या?

उसने कहा- वही.. जो तुम्हारे बगल में सब कुछ हुआ?

मैं अनजान बनती हुई बोली- क्या हुआ?

उसने कहा- तुम्हें सच में पता नहीं या अनजान बन रही हो?

मैंने कहा- मुझे कुछ नहीं पता, मैं सोई हुई थी।

उसने कहा- ठीक है, चलो नहीं पता तो कोई बात नहीं.. सो जाओ!

मैं कुछ देर सोचती रही फिर उससे पूछा- क्या हुआ था?

उसने कहा- जाने दो, कुछ नहीं हुआ।

मैंने जोर देकर फिर से पूछा तो उसने कहा- तुम्हारे बगल में हेमा और कृपा चुदाई कर रहे थे।

मैंने उसे कहा- तुम झूठ बोल रहे हो, कोई किसी के सामने ऐसा नहीं करता.. कोई इतना निडर नहीं होता।

उसने तब कहा- ठीक है सुबह हेमा से पूछ लेना, कृपा ने हेमा को दो बार चोदा।

मैं समझ गई कि सुरेश भी उन्हें देख रहा था, पर मैं उसके सामने अनजान बनी रही। फिर मैं खामोश हो गई और मेरा इस तरह का व्यवहार देख सुरेश भी खामोश हो गया।

मैं हेमा और सुरेश का खेल देख कर उत्तेजित हो गई थी। फिर मैंने सोचा कि जब मैं उत्तेजित हो गई थी, तो सुरेश भी हुआ होगा। यही सोचते हुए मैं सोने की कोशिश करने लगी, पर नींद नहीं आ रही थी।

कुछ देर तक तो मैं खामोश रही फिर पता नहीं मुझे क्या हुआ मैंने सुरेश से पूछा- तुमने क्या-क्या देखा?

उसने उत्तर दिया- कुछ ख़ास तो दिख नहीं रहा था क्योंकि तुम बीच थीं, पर जब कृपा हेमा के ऊपर चढ़ा तो मुझे समझ आ गया था कि कृपा हेमा को चोद रहा है।

मैं तो पहले से ही खुद को गर्म महसूस कर रही थी और ऊपर से सुरेश जैसी बातें कर रहा था, मुझे और भी उत्तेजना होने लगी, पर खुद पर काबू किए हुई थी।

तभी सुरेश ने कहा- तुमने उस वक़्त मेरे सवाल का जवाब क्यों नहीं दिया था?

मैंने कहा- मुझे डर लगता था इसलिए।

फिर उसने कहा- अगर तुम जवाब देतीं, तो क्या कहतीं.. ‘हाँ’ या ‘ना’..!

मैंने उसे कहा- वो पुरानी बात थी, उसे भूल जाओ मैं सोने जा रही हूँ।

यह बोल कर मैं दूसरी तरफ मुँह करके सोने चली गई, पर अगले ही पल उसने मुझे पीछे से पकड़ लिया और कहा- सारिका, मैं आज भी तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ।

मैंने उसे धकेलते हुए गुस्से में कहा- क्या कर रहे हो.. तुम जानते हो कि मैं शादीशुदा हूँ।

वो मुझसे अलग होने का नाम नहीं ले रहा था उसने मुझे जोरों से पकड़ रखा था और कहा- हेमा भी तो शादीशुदा है, फिर तुम उसकी मदद क्यों कर रही हो। मुझे मालूम है हेमा और कृपा की यहाँ सम्भोग करने की इतनी हिम्मत इसलिए हुई क्योंकि तुमने ही मदद की है।

अब मेरे दिमाग में यह डर बैठ गया कि सुरेश कहीं किसी को बता तो नहीं देगा कि हेमा और कृपा के बीच में कुछ है और मैं उनकी मदद कर रही हूँ।

सुरेश कहता या नहीं कहता पर मैं अब डर गई थी सो मैंने उससे पूछा- तुम क्या चाहते हो?

उसने कहा- मैं तुमसे अभी भी प्यार करता हूँ और यह कहते-कहते उसने मुझे अपनी तरफ घुमा लिया और मेरे होंठों से होंठ लगा दिए।

उसके छूते ही मेरे बदन में चिंगारी आग बनने लगी।

हालांकि मैं जानती थी कि मैं शादीशुदा हूँ, पर मैं डर गई थी और मैंने सुरेश का विरोध करना बंद कर दिया था।

मैंने उससे कहा- प्लीज ऐसा मत करो, मैं शादीशुदा हूँ और बगल में हेमा और कृपा हैं। उनको पता चल गया तो ठीक नहीं होगा।

उसने मुझे पागलों की तरह चूमते हुए कहा- किसी को कुछ पता नहीं चलेगा, बस तुम चुपचाप मेरा साथ दो.. मैं तुम्हें बहुत प्यार करूँगा।

और वो मेरे होंठों को चूमने लगा और मेरे स्तनों को ब्लाउज के ऊपर से दबाने लगा।

मैं भी उसके हरकतों का कितनी देर विरोध कर पाती, क्योंकि हेमा और कृपा का सम्भोग देख कर मैं भी गर्म हो चुकी थी।

मैंने भी उसका साथ देने में ही भलाई सोची, पर मेरे मुँह से विरोध भरे शब्द निकलते रहे।

तब उसने कहा- तुम अगर ऐसे ही बोलती रहीं तो कोई न कोई जग जाएगा।

तो मैंने अपने मुँह से आवाजें निकालना बंद कर दीं।

उसने अब अपनी कमर को मेरी कमर से चिपका दिया और लिंग को पजामे के अन्दर से ही मेरी योनि के ऊपर रगड़ने लगा।

उसने अब मेरे स्तनों को छोड़ कर हाथ को मेरी जाँघों पर फिराते हुए सहलाने लगा। फिर मेरी साड़ी को ऊपर कमर तक उठा मेरी नंगी मांसल जाँघों से खेलने लगा।

उसके इस तरह से मुझे छूने से मेरी योनि भी गीली होने लगी थी और मैं भी उसे चूमने लगी।

मैंने उसे कस कर पकड़ रखा था और हम दोनों के होंठ आपस में चिपके हुए थे।

तभी उसने मेरी पैंटी को खींचना शुरू किया और सरका कर घुटनों तक ले गया। फिर अपने हाथ से मेरी नंगे चूतड़ को सहलाने लगा और दबाने लगा मुझे उसका स्पर्श अब मजेदार लगने लगा था।

उसके स्पर्श से मैं और भी गर्म होने लगी थी और मैंने एक हाथ से उसके पजामे का नाड़ा खोल दिया और उसके लिंग को बाहर निकाल कर हिलाने लगी।

अब मुझसे सहन नहीं हो रहा था, सो मैंने उससे कहा- सुरेश अब जल्दी से चोद लो.. वरना कोई जग गया तो देख लेगा..!

उससे भी अब रहा नहीं जा रहा था सो मुझे सीधा होने को कहा और मेरी पैंटी निकाल कर किनारे रख दी।

मैंने अपने पैर मोड़ कर फैला दिए और सुरेश मेरे ऊपर मेरी टांगों के बीच में आ गया।

उसने हाथ में थूक लेकर मेरी योनि पर मल दिया फिर झुक कर लिंग को मेरी योनि के छेद पर टिका दिया और धकेला, उसका आधा लिंग मेरी योनि में चला गया था।

अब वो मेरे ऊपर लेट गया और मुझे पकड़ कर मुझसे कहा- तुम बताओ न, क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करती थी?

मैंने भी सोचा कि यह आज मानने वाला नहीं है सो कह दिया- हाँ.. करती थी.. पर डर लगता था!

उसने फिर मुझे प्यार से चूमा और अपना पूरा लिंग मेरी योनि में धकेल दिया और कहा- मैं तो तुम्हें आज भी प्यार करता हूँ और करता रहूँगा, बस एक बार कहो ‘आई लव यू..!’

मैं भी अब जोश में थी सो कह दिया ‘आई लव यू..!’

मेरी बात सुनते ही उसने कहा- आई लव यू टू…!

और जोरों से धक्के देने लगा। मैं उसके धक्कों से सिसकियाँ लेने लगी, पर आवाज को दबाने की कोशिश भी करने लगी।

उसका लिंग मेरी योनि में तेज़ी से अन्दर-बाहर होने लगा था और मुझे बहुत मजा आ रहा था। मैं उसके धक्कों पर छटपटाने लगी। कभी टाँगें ऊपर उठा देती, तो कभी टांगों से उसे जकड़ लेती, कभी उसे कस कर पकड़ के अपनी और खींचती और अपने चूतड़ उठा देती। सुरेश को भी बहुत मजा आ रहा था वो भी धक्के जोर-जोर से लगाने लगा था।

हम दोनों मस्ती के सागर में डूब गए। फिर सुरेश ने कहा- सारिका तुम्हारी बुर बहुत कसी है, बहुत मजा आ रहा है चोदने में..!

मैंने भी उसे मस्ती में कहा- हाँ.. तुम्हारा लण्ड कितना सख्त है.. बहुत मजा आ रहा है.. बस चोदते रहो ऐसे ही..आह्ह..!

मैं इतनी गर्म हो गई थी कि सुरेश से सम्भोग के दौरान धीमी आवाज में कामुक बातें भी करने लगी थी। मुझे ऐसा लगने लगा था कि जैसे मेरे सोचने समझने कि शक्ति खत्म हो गई है। बस उसके लिंग को अपने अन्दर महसूस करना चाह रही थी।

वो मेरी योनि में अपना लिंग बार-बार धकेले जा रहा था और मैं अपनी टांगों से उसे और जोरों से कसती जा रही थी और वो मेरी गर्दन और स्तनों को चूमता हुआ मुझे पागल किए जा रहा था।

उसने मुझसे कहा- तुमने बहुत तड़फाया है मुझे… मैं तुम्हें चोद कर आज अपनी हर कसर निकाल लूँगा… तुम्हारी बुर मेरे लिए है।

मैंने भी उसे कहा- हाँ.. यह तुम्हारे लिए है मेरी बुर.. इसे चोदो जी भर कर और इसका रस निकाल दो..!

हम दोनों बुरी तरह से पसीने में भीग चुके थे। मेरा ब्लाउज गीला हो चुका था और हल्की-हल्की हवा चलने लगी थी। सो, जब मेरे ऊपर से हवा गुजरती थी, मुझे थोड़ा आराम मिल रहा था। मेरी योनि भी इतनी गीली हो चुकी थी कि सुरेश का लिंग ‘फच.. फच’ करता हुआ अन्दर-बाहर हो रहा था और पसीने से मेरी जाँघों और योनि के किनारे भीग गए थे।

जब सुरेश अपना लिंग बाहर निकलता तो हवा से ठंडी लगती, पर जब वापस अन्दर धकेलता तो गर्म लगता। ये एहसास मुझे और भी मजेदार लग रहा था।

मैं अब झड़ने को थी, सो बड़बड़ाने लगी- सुरेश चोदो.. मुझे.. प्लीज और जोर से चोदो.. बहुत मजा आ रहा.. है.. मेरा पानी निकाल दो…

वो जोश में जोरों से धक्के देने लगा और कहने लगा- हाँ.. मेरी जान चोद रहा हूँ.. आज तुम्हारी बुर का पानी निचोड़ दूँगा!

मैं मस्ती में अपने बदन को ऐंठने लगी और उसे अपनी ओर खींचने लगी, अपनी कमर को उठाते हुए और योनि को उसके लिंग पर दबाते हुए झड़ गई।

मैं हल्के से सिसकते हुए अपनी पकड़ को ढीली करने लगी, साथ ही मेरा बदन भी ढीला होने लगा पर सुरेश ने मेरे चूतड़ों को अपने हाथों से पकड़ कर खींचा और धक्के देता रहा।

उसने मुझे कहा- क्या हुआ सारिका, तुम्हारा पानी निकल गया क्या?

मैं कुछ नहीं बोली, बस यूँ ही खामोश रही जिसका इशारा वो समझ गया और धक्के जोरों से देने लगा।

करीब 5 मिनट वो मुझसे ऐसे ही चोदता रहा फिर मैंने उसके सुपारे को अपनी योनि में और भी गर्म महसूस किया, मैं समझ गई कि वो भी अब झड़ने को है। उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं और धक्के इतनी तेज़ जैसे ट्रेन का पहिया…!

फिर अचानक उसने रुक-रुक कर 10-12 धक्के दिए, फिर उसका जिस्म और भी सख्त हो गया और उसने मेरे चूतड़ को जोरों से दबाया और उसकी सांस कुछ देर के लिए रुक गई और मेरी योनि के अन्दर एक गर्म धार सी छूटी। फिर उसने धीरे-धीरे सांस लेना शुरू किया और अपने लिंग को मेरी योनि में हौले-हौले अन्दर-बाहर करने लगा।

मैं समझ गई कि वो भी झड़ चुका है।

सुरेश धीरे-धीरे शान्त हो गया और मेरे ऊपर लेट गया।

मैंने उससे पूछा- हो गया?

उसने कहा- हाँ.. मैं झड़ गया.. पर कुछ देर मुझे आराम करने दो अपने ऊपर..!

मैंने उससे कहा- लण्ड बाहर निकालो.. मुझे अपनी बुर साफ़ करना है।

उसने कहा- कुछ देर रुको न.. तुम्हारी बुर का गर्म अहसास बहुत अच्छा लगा रहा है, तुम्हारी बुर बहुत गर्म और कोमल है।

मैंने उसे यूँ ही कुछ देर लेटा रहने दिया फिर उसे उठाया और अपनी बुर साफ़ की और कपड़े ठीक करके सो गई।
 
तड़फती जवानी-4

उसने कहा- कुछ देर रुको न.. तुम्हारी बुर का गर्म अहसास बहुत अच्छा लगा रहा है, तुम्हारी बुर बहुत गर्म और कोमल है।

मैंने उसे यूँ ही कुछ देर लेटा रहने दिया फिर उसे उठाया और अपनी बुर साफ़ की और कपड़े ठीक करके सो गई।

अगले दिन सुबह हेमा काफी उदास सी लग रही थी, मैंने उससे पूछा भी कि क्या हुआ पर उसने कुछ नहीं बताया।

शाम को बहुत जोर दिया तो उसने कहा- मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।

मैंने उससे पूछा- क्या गलती हुई?

तो वो रोते हुए बोली- मैंने अपनी सीमाएं लांघ दीं और रात को कृपा के साथ सम्भोग कर लिया जो मुझे नहीं करना चाहिए था, मैं बहक गई थी।

मैंने उसे धीरज देते हुए कहा- इसमें गलती क्या है तुम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हो और शादी नहीं कर सकते, पर जरूरी नहीं कि शादी किया तो ही पति-पत्नी बन के रहो। तुम दिल से अगर उसे चाहती हो तो वो बिना किसी नियम-कानून के तुम्हारा पति है और अगर तुमने उसके साथ सम्भोग कर लिया तो कोई बड़ी बात नहीं है।

मेरी बात सुन कर उसे बहुत राहत मिली और वो पहले से ज्यादा खुश दिखने लगी। मुझे भी बहुत अच्छा लगा कि इतने सालों के बाद वो खुश थी।

पर उसके मन में एक और बात थी जो उसे परेशान कर रही थी और वो ये बात कि उसने इतना जोखिम उठा कर उसके साथ सम्भोग किया पर संतुष्टि नहीं हुई।

हम दोनों जानते थे कि कृपा ने कभी पहले सम्भोग नहीं किया होगा, तभी ऐसा हुआ है। पर हेमा को सिर्फ इस बात की चिंता थी कि ऐसा मौका फिर दुबारा मिलेगा या नहीं..!

रात होते-होते मैंने उससे पूछा- क्या आज भी तुम दोनों सम्भोग करोगे क्या?

उसने जवाब दिया- पता नहीं, और फ़ायदा भी नहीं है करके!

मैंने उससे पूछा- क्यों?

उसने तब बता दिया- फ़ायदा क्या.. वो तो करके सो जाता है.. मैं तड़पती रह जाती हूँ..!

मैंने तब उसे पूछा- अच्छा.. ऐसा क्यों?

तब उसने खुल कर कह दिया- वो जल्दी झड़ जाता है!

मैंने तब उसे कहा- नया है.. समय दो, कुछ दिन में तुम्हें थका देगा!

और मैं जोर से हँसने लगी।

मेरी बातें सुन कर उसने भी मुझे छेड़ते हुए कहा- पुराने प्यार के बगल में तो तू भी थी क्या तुम थक गई थी क्या?

मैं डर गई कि कहीं उसने मेरे और सुरेश के बीच में जो हुआ वो देख तो नहीं लिया था। सो घबरा कर बोली- पागल है क्या तू?

पर कुछ ही देर में मुझे अहसास हो गया कि वो अँधेरे में तीर चला रही थी, पर मैं बच गई।

रात को फिर हम छत पर उसी तरह सोने चले गए।

हेमा ने मुझे चुपके से कान में कहा- तू सो जा..जल्दी।

तब मैंने उससे पूछा- क्यों?

तो उसने मुझे इशारे से कहा- हम दोनों सम्भोग करना चाहते हैं।

तब मैंने उसे बता दिया कि मैंने कल रात उनको सब कुछ करते देख लिया था और आज भी देखूंगी!

पर वो मुझे जिद्द करने लगी कि नहीं, तो मैं चुपचाप सोने का नाटक करने लगी।

इधर सुरेश भी मेरे लिए तैयार था, वो भी मुझे चुपके-चुपके मेरे जिस्म को छूता और सहलाता, पर मैं मना कर देती, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि हेमा और कृपा को कुछ पता चले। क्योंकि मैं पहले से शादीशुदा थी।

काफी रात हो चुकी थी, पर हेमा और कृपा अब भी चुपचाप थे। मैं सोच रही थी कि आखिर क्या हुआ इनको.. क्योंकि मैं खुद उनके सोने का इंतजार कर रही थी।

काफी देर बाद मैं पेशाब करने उठी मेरे पीछे हेमा भी चली आई और कहा- तुम सोई क्यों नहीं अब तक?

मैंने उससे कहा- नींद नहीं आ रही क्या करूँ, तुम जो मर्ज़ी चाहे करो मैं किसी को बताउंगी नहीं..!

तब उसने कहा- इतनी बेशर्म समझा है मुझे तूने?

मैंने उससे तब कहा- कल रात शर्म नहीं आई करने में… मेरे बगल में.. आज आ रही है..!

तब उसने मुझसे विनती करनी शुरू कर दी। मैंने भी उसे कहा- नीद आ गई तो ठीक है वरना मैं कुछ नहीं कर सकती। इस पर वो मुँह बनाती हुई चली गई और लेट गई। मैं भी वापस आकर लेट गई और सोने की कोशिश करने लगी। यह सोच कर कि हेमा इतने दिनों के बाद खुश है, क्यों बेचारी को परेशान करूँ।

पर पता नहीं मुझे नींद नहीं आ रही थी। जब भी नींद आने को होती तो कृपा के हेमा के ऊपर हरकत से तो कभी सुरेश की हरकत से उठ जाती।

तभी हेमा मेरी तरफ मुड़ी और मेरे कान में फुसफुसा कर बोली- सोती क्यों नहीं.. तुझे भी कुछ करना है क्या?

मैंने उससे कहा- पागल है क्या, अब नींद नहीं आ रही तो मैं क्या करूँ, मैं तेरी बैचैनी समझ सकती हूँ।

तब उसने कहा- मुझे पता है तू भी सुरेश के साथ कुछ करने के लिए बेताब है।

मैंने उसे कहा- तेरा दिमाग खराब है, अगर तुझे करना है कर, वरना मेरे सोने का इंतज़ार कर।

तब उसने कहा- मुझे पता है कल रात तूने भी सुरेश के साथ क्या किया, कृपा ने मुझे बता दिया सब।

मैं उसकी बात सुन कर हैरान हो गई कि आखिर उसे कैसे पता चला..!

मैंने तुरत पलट कर सुरेश की तरफ देखा तो उसने खुद ही कह दिया कि उसने आज सुबह कृपा को बता दिया था।

मुझे बहुत गुस्सा आया और चुपचाप सोने चली गई।

पर कुछ देर में सुरेश ने मेरे बदन को सहलाना शुरू कर दिया, पर मैं उसे बार-बार खुद से दूर कर देती।

तब उसने कहा- देखो हम सब अच्छे दोस्त हैं और एक-दूसरे के बारे में सब पता है। फिर किस बात का डर है.. हम जो भी करेंगे वो हमारे बीच ही रहेगा।

उसके काफी समझाने के बाद पता नहीं मेरा भी मन बदल गया और फिर उसके साथ चूमने-चूसने में व्यस्त हो गई और भूल गई कि बगल में हेमा और कृपा भी हैं।

उधर हेमा और कृपा भी अपने में मग्न हो गए। मुझे सुरेश ने आज इतना गर्म कर दिया कि मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब नंगी हो गई।

रात के अँधेरे में कुछ पता तो नहीं चल रहा था पर नंगे होने की वजह से गर्मी में बड़ी राहत थी।

हम दोनों इधर अपनी चुदाई में मग्न थे उधर हेमा और कृपा अपनी तान छेड़ रहे थे।

जब हम दोनों झड़ कर अलग हुए, तो मैंने देखा कि हेमा और कृपा हम दोनों को देख रहे हैं।

मुझे बड़ी शर्म सी आई, पर तभी सुरेश ने कहा- तुम दोनों का बहुत जल्दी हो गया क्या बात है?

इस पर हेमा भी थोड़ी शरमा गई।

मैंने गौर किया तो देखा कि हेमा भी पूरी तरह नंगी है और मेरी तरह खुद को अपनी साड़ी से छुपा रही है।

वैसे मैं और हेमा तो चुप थीं पर कृपा और सुरेश आपस में बातें कर रहे थे।

सुरेश ने मुझे चुपके से कहा- हेमा संतुष्ट नहीं है, मैं हेमा को चोदना चाहता हूँ।

मुझे गुस्सा लगा कि यह क्या बोल रहा है, पर मैं इससे पहले कुछ कह पाती उसने हेमा से खुद ही पूछ लिया और ताज्जुब तो तब हुआ जब हेमा ने ‘हाँ’ कर दी।

पर मैं जानती थी कि हेमा क्यों तैयार हो गई, सो उसकी खुशी के लिए चुपचाप रही।

कृपा भी मान जाएगा ऐसा सोचा नहीं था, पर मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं था, क्योंकि लोगों को अपनी जिंदगी जीने का अधिकार होता है।

हेमा मेरी जगह पर आ गई और सुरेश से चिपक गई और फिर उनका खेल शुरू हो गया। उन दोनों ने बड़े प्यार से एक-दूसरे को चूमना शुरू कर दिया और अंगों से खेलने लगे।

हेमा ने सुरेश का लिंग बहुत देर तक हाथ से हिला कर खड़ा किया इस बीच सुरेश उसके स्तनों और चूतड़ों को दबाया और चूसता रहा।

फिर हेमा को अपने ऊपर चढ़ा लिया और उसे कहा- हेमा.. लण्ड को बुर में घुसा लो।

हेमा ने हाथ नीचे ले जाकर उसके लिंग को पकड़ कर अपनी योनि में घुसा लिया फिर धक्के लगाने शुरू कर दिए।

इधर मैं और कृपा उनको देखे जा रहे थे और हम दोनों अभी भी नंगे थे। कृपा हेमा और सुरेश की चुदाई देखने के लिए मेरे करीब आ गया जिससे उसका बदन मेरे बदन से छुए जा रहा था। मेरा पीठ कृपा की तरफ थी और वो मेरे पीछे मुझसे सटा हुआ था।

मैंने महसूस किया कि कृपा का लिंग मेरे चूतड़ों से रगड़ खा रहा है और धीरे-धीरे खड़ा होने लगा। उसका लिंग काफी मोटा था और मुझे भी हेमा और सुरेश की चुदाई देख कर फिर से सम्भोग की इच्छा होने लगी थी।

मैंने कृपा से कहा- ये क्या कर रहे हो?



सने कहा- मुझे फिर से चोदने का मन हो रहा है।

मैंने तब कहा- मन कर रहा है तो क्या हुआ, हेमा को तुमने किसी और के साथ व्यस्त कर दिया अब इंतज़ार करो।

तब उसने कहा- वो व्यस्त है पर तुम तो नहीं हो..!

मैंने कहा- क्या बकवास कर रहे हो, तुम ऐसा कैसे सोच सकते हो?

उसने कहा- प्लीज.. इसमें कैसी शर्म.. हम सब एक ही हैं, मजे लेने में क्या जाता है, हम हमेशा थोड़े साथ रहेंगे।

मैंने कुछ देर सोचा फिर दिमाग में आया कि कृपा कुछ गलत नहीं कह रहा और फिर मेरे मन में उसके लिंग का ख़याल भी आया।

सो मैंने उसको ‘हाँ’ कह दी और उसका लिंग पकड़ लिया।

सच में उसका लिंग काफी मोटा था, लम्बा ज्यादा नहीं था। पर मोटाई इतनी कि मेरी जैसी दो बच्चों की माँ को भी रुला दे।

उसने मेरी योनि को हाथ से सहलाना शुरू कर दिया। फिर कुछ देर मैंने भी उसके लिंग को हाथ से हिलाया और उसे अपने ऊपर आने को कहा।

उधर हेमा सुरेश के लिंग पर बैठ मस्ती में सिसकारी भरती हुई मजे से सवारी किए जा रही थी।

कृपा अब मेरे ऊपर आ चुका था मैंने अपनी दोनों टाँगें फैला कर उसे बीच में लिया और वो मेरे ऊपर अपना पूरा वजन देकर लेट गया।

उसने मेरे स्तनों को चूसना शुरू कर दिया और मैंने उसके लिंग को पकड़ के अपनी योनि में रगड़ने लगी।

थोड़ी देर रगड़ने के बाद मैंने उसे अपनी योनि के छेद पर टिका कर कहा- धकेलो।

उसने जैसे ही धकेला मैं दर्द से कराह उठी, मेरी आवाज सुनकर हेमा और सुरेश रुक गए और हेमा ने कहा- क्या हुआ, बहुत मोटा है न..!

मैंने खीसे दिखाते हुए हेमा को कहा- तू चुपचाप चुदा, मुझे कुछ नहीं हुआ।

मैंने कृपा को पकड़ कर अपनी और खींचा और अपनी टाँगें उसके जाँघों के ऊपर रख दिया और कहा- चोदो..!

कृपा ने धक्के देने शुरू कर दिए, कुछ देर के बाद मुझे सहज लगने लगा और मैं और भी उत्तेजित होने लगी। उधर सुरेश ने हेमा को नीचे लिटा दिया और अब उसके ऊपर आकर उसे चोदने लगा।

कृपा ने भी अब धक्के दे कर मेरी योनि को चोदना शुरू कर दिया, मुझे शुरू में ऐसा लग रहा था जैसे मेरी योनि फ़ैल गई हो, क्योंकि जब जब वो धक्के देता मेरी योनि में दोनों तरफ खिंचाव सा लगता और दर्द होता, पर कुछ देर के बाद उसका लिंग मेरी योनि में आराम से घुसने लगा।

थोड़ी देर में हेमा की आवाजें निकालने लगी और वो सुरेश से विनती करने लगी- बस.. सुरेश हो गया, बस करो.. छोड़ दो..!’

सुरेश सब कुछ अनसुना करते हुए हेमा को बुरी तरह से धक्के देकर चोद रहा था। हेमा झड़ चुकी थी, पर सुरेश ने उसे ऐसे पकड़ रखा था कि हेमा कहीं जा नहीं सकती थी और उसे जोरों से धक्के देते हुए चोदे जा रहा था।

‘बस.. हेमा.. थोड़ी देर और बस.. मेरा निकलने वाला है..!’

हेमा बार-बार कह रही थी- प्लीज.. सुरेश छोड़ दो न.. दर्द हो रहा है… मार डालोगे क्या… क्या करते हो.. कितना जोर से चोद रहे हो..!’

इधर कृपा मुझे चोद रहा था और मुझे भी अब मजा आने लगा था, पर मेरी उत्तेजना अभी आधे रास्ते पर ही थी कि कृपा झटके देते हुए मेरे ऊपर गिर गया।

उसने अपना लावा मेरी योनि में उगल दिया और शांत हो गया।

मैं अब भी प्यासी थी, पर हेमा और सुरेश अब भी चुदाई किए जा रहे थे और हेमा विनती पे विनती किए जा रही थी।

सो मैंने सुरेश से कहा- छोड़ दो सुरेश वो मना कर रही है तो..!

सुरेश ने कहा- बस थोड़ी देर और..!

मैंने तब सुरेश से कहा- ठीक है मेरे ऊपर आ जाओ।

उसने कहा- नहीं.. बस हो गया..!

तब तक तो हेमा फिर से गर्म हो गई, उसका विरोध धीरे-धीरे कम हो गया और उसने अपनी टांगों से सुरेश को जकड़ लिया।

मैं समझ गई कि हेमा अब फिर से झड़ने को है तभी दोनों ने इस तरह एक-दूसरे को पकड़ लिया है जैसे एक-दूसरे में समा जायेंगे। दोनों के होंठ आपस में चिपक गए उनका पूरा बदन शांत था बस कमर हिल रही थीं और जोरदार झटकों के साथ दोनों एक-दूसरे से चिपक कर शांत हो गए, दोनों एक साथ झड़ चुके थे।

कुछ देर बाद सुरेश उठा और हेमा से बोला- मजा आया हेमा?

हेमा ने कहा- हाँ.. बहुत..!

फिर वो दोनों अलग हो गए और हेमा कृपा के बगल में आकर सो गई पर मेरी अग्नि अभी भी भड़क रही थी। सो मैंने सुरेश को कहा- और करना है?

सुरेश ने कहा- कुछ देर के बाद करेंगे।

और फिर हमने फिर से सम्भोग किया। मुझे अपने ऊपर चढ़ा कर मुझे वो चोदता रहा और जब वो झड़ने को हुआ तो मुझे नीचे लिटा कर चोदा। उसके झटके समय के साथ काफी दमदार होते चले जाते थे, जो मुझे दर्द के साथ एक सुख भी देते थे।
 
तड़फती जवानी-5

बात दरअसल तब की थी जब हम दोनों खूब मस्ती किया करते थे, उन दिनों तो ऐसा लगने लगा था जैसे अमर ही मेरे पति हैं।

अमर के साथ एक दिन में 11 बार सम्भोग करने के बाद मैं इतनी डर गई थी कि करीब एक महीने में मैंने सिर्फ पति के साथ 3 बार सम्भोग किया।

अमर से तो मैं दूर भागने लगी थी, वो मेरे साथ सहवास करना चाहते तो थे, पर मैं कोई न कोई बहाना बना लेती थी, पर ये सब ज्यादा दिन नहीं चल सका।

मेरी भी अतृप्त प्यास बढ़ने लगी थी जो पति के जल्दी झड़ जाने से अधूरी रह जाती थी।

इस बीच मैंने अमर के साथ फिर से सम्भोग करना शुरू कर दिया, पर उन्हें एक दिन में कभी भी 3 बार से ज्यादा नहीं करने देती थी।

हम अब ज्यादा नहीं मिलते थे बस कभी-कभार छत पर बातें करते या फिर जब सम्भोग करना हो तभी मिलते थे, बाकी समय हम फोन पर ही बातें करते थे। रात को जब पति रात्रि के समय काम पर जाते तो हम करीब 3-4 बजे तक बातें करते रहते।

एक दिन हम यूँ ही अपने पहले सम्भोग के बारे में बातें कर रहे थे, बातों-बातों में प्रथम प्रणय-रात्रि यानि सुहागरात की बात छिड़ गई।

उन्होंने मुझे उनकी इच्छा सुहागरात के समय की बताई कि उन्हें कैसे करना पसंद था, पर वो हो नहीं सका।

वैसे जैसे उन्होंने बताया था वैसा मेरे साथ भी कभी नहीं हुआ था।

तभी उन्होंने कहा- मैं फिर से तुम्हारे साथ सुहागरात जैसा समय बिताना चाहता हूँ।

मैंने भी बातों की भावनाओं में बह कर ‘हाँ’ कह दी।

शुक्रवार का दिन था अमर ने मुझसे कहा- अगर तुम आज रात मेरे कमरे में आ जाओ तो मैं तुम्हें एक तोहफा दूँगा।

मैंने कहा- मैं बच्चों को ऐसे छोड़ कर नहीं आ सकती।

तब उन्होंने कहा- बड़े बेटे को सुला कर छोटे वाले को साथ लेकर आ जाओ।

मैंने उनसे कहा- आप मेरे कमरे में आ जाओ।

पर उन्होंने कहा कि जो वो मुझे देना चाहते हैं वो मेरे कमरे में नहीं हो सकता इसलिए उसके कमरे में जाना होगा।

मैंने बहुत सोचा-विचारा और फिर जाने का फैसला कर लिया। पति रात को खाना खाकर काम पर चले गए और बड़े बेटे को मैंने सुला दिया।

फिर करीब साढ़े दस बजे रात को उनके कमरे में गई, कमरे में जाते ही उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया, फिर मेरे पास आए और कहा- दूसरे कमरे में तुम्हारे लिए कुछ है।

मेरा बच्चा अभी भी सोया नहीं था सो अमर ने उसे गोद में ले लिया और कहा- तुम जाओ, मैं इसे सुला दूँगा।

मैंने बच्चे को उनके हाथ में देकर कमरे के अन्दर चली गई, अन्दर एक दुल्हन का जोड़ा रखा था और बहुत सारे गहने भी थे, मैं समझ गई कि अमर सुहागरात वाली बात को लेकर ये सब कर रहे हैं।

वे कपड़े दिखने में काफी महंगे थे, पर मैंने सोचा कि मेरे लिए इतने सारे गहने वो कहाँ से लाए, पर गौर से देखा तो वो नकली थे, उन पर सोने का पानी चढ़ा हुआ था। सो मुझे थोड़ी राहत हुई कि उन्होंने ज्यादा पैसे बर्बाद नहीं किए।

बगल में श्रृंगार का ढेर सारा सामान रखा था और ख़ास बात यह थी कि सारे कपड़े लाल रंग के थे, लाल साड़ी, लाल ब्लाउज, लाल पेटीकोट, लाल ब्रा, लाल पैंटी और लाल चुनरी।

मैंने पहले कपड़े बदले, फिर श्रृंगार किया, लिपस्टिक लगाई, गालों पर पाउडर और लाली, मांग में सिंदूर, पूरे बदन में परफ्यूम छिड़का।

फिर मैंने जेवर पहने, हाथों में कंगन और चूड़ियाँ, मेरे पूरे बाजू में भर गईं, कानों में झुमके, नाक-कान, माथा, कमर और पैर मेरे सारे अंग गहनों से भर गए थे।

इतने गहने तो मैंने अपनी शादी में भी नहीं पहने थे।

मैंने खुद को आईने में देखा मैं सच में बहुत सुन्दर दिख रही थी, पर मेरे मन में हँसी भी आ रही थी कि एक गतयौवना दुल्हन आज सुहागरात के लिए तैयार है।

मैं बाहर आई तो अमर मुझे देखते ही रह गए, काफी देर मुझे निहारने के बाद उन्होंने मुझसे कहा- तुम दूसरे कमरे में जाओ, वहाँ तुम्हारे लिए दूसरा तोहफा रखा है।

मेरा बच्चा सो गया था, सो मैंने उसे गोद में लिया और उसे उसी कमरे में सुलाने को चली गई।

तब तक अमर ने कहा- अब मैं तैयार होने जा रहा हूँ।

मैं जैसे ही कमरे के अन्दर गई और बत्ती जलाई, मेरा मन ख़ुशी से झूम उठा, कमरा पूरी तरह से सजाया हुआ था और बिस्तर की सजावट का तो कुछ कहना ही नहीं था।

पूरे कमरे में अगरबत्ती की खुश्बू आ रही थी और बिस्तर फूलों से सजाया हुआ था जो सच में किसी भी औरत का दिल जीत ले।

हर एक लड़की चाहती है कि उसकी सुहागरात यादगार हो और उसकी सुहारात की सेज फूलों से सजी हो। मेरी भी यही ख्वाहिश थी, पर वो सब नहीं हो सका था।

ये सब देख कर आज मैं बहुत खुश थी और मैंने दिल ही दिल में अमर को धन्यवाद दिया।

सुहाग की सेज ज्यादा बड़ी नहीं थी, केवल एक आदमी के सोने लायक थी, पर मुझे वो अच्छा लगा क्योंकि ऐसे छोटे पलंग पर एक औरत और मर्द चिपक कर आराम से सो सकते हैं।

दूसरे तरफ एक और बिस्तर था जिस पर मैंने अपने बच्चे को सुला दिया और फिर वापस सेज पर आकर बैठ गई।

बिस्तर को अमर ने गद्देदार बनाया था और दो तकिये भी थे और गुलाब के फूल बिखेरे हुए थे, बिस्तर पर भी खुश्बू का छिड़काव किया था।

बगल में एक मेज थी जिस पर पानी का मग और गिलास था, साथ ही एक छोटे सी प्लेट में चॉकलेट और सुपारी के टुकड़े भी थे।

मैं सब कुछ देख कर बहुत खुश थी और मैंने भी तय कर लिया कि जब अमर ने मेरे लिए इतना कुछ किया है तो आज मैं भी अमर को खुश करने में कोई कमी नहीं रहने दूँगी।

मैं बिस्तर पर घूँघट डाल कर एक नई-नवेली दुल्हन की तरह बैठ गई और अमर का इंतज़ार करने लगी।

थोड़ी देर बाद अमर अन्दर आए और मुझसे आते ही कहा- देखो मुझे… कैसा लग रहा हूँ?

मैंने उनसे कहा- दुल्हन तो घूँघट में है, और यह घूंघट तो दूल्हे को ही उठाना होगा।

मेरी बात सुनकर वो हँसने लगे और फिर मेरे पास आकर मेज पर दूध का गिलास रख दिया फिर मेरे बगल में बैठ गए और मेरा घूँघट उठा दिया।

हम दोनों ने एक-दूसरे को मुस्कुराते हुए देखा।

फिर अमर ने मुझसे कहा- तुम आज बहुत सुन्दर दिख रही हो, एकदम किसी नई-नवेली दुल्हन की तरह।

मैंने उनसे कहा- हाँ.. एक बुड्ढी दुल्हन…

तब उन्होंने कहा- दिल जवान रहता है हमेशा… मुझे तो तुम आज एक 20 साल की कुंवारी दुल्हन लग रही हो, जिसकी मैं आज सील तोडूंगा ।

मैंने उनसे कहा- क्या सील? वो क्या होता है?

तब उन्होंने कहा- सील मतलब योनि की झिल्ली, जिसको नथ उतारना भी कहते हैं।

मैंने तब हँसते हुए कहा- मैं दो बच्चों की माँ हूँ… अब मेरी झिल्ली तो कब की टूट चुकी है।

अमर ने कहा- मुझे पता है, पर मैं बस ऐसे ही कल्पना कर रहा हूँ और वैसे भी ये हमारी असली सुहागरात थोड़े है, बस मस्ती के लिए नाटक ही तो कर रहे हैं।

तब मैंने शरारत करते हुए कहा- अच्छा तब ठीक है, मुझे लगा कि सचमुच की सुहागरात है और हम सच में सम्भोग करेंगे।

तब वो मुझे घूरते हुए बोले- क्या मतलब? सुहागरात का नाटक है, पर सम्भोग तो सच में ही करेंगे न।

मैं उनको और छेड़ते हुए बोली- नहीं जब सुहागरात नाटक है तो सम्भोग का भी नाटक ही करेंगे।

मेरी बात सुनते ही उन्होंने मुझे बिस्तर पर पटक दिया और मेरे ऊपर चढ़ गए और बोले- सच का सम्भोग करेंगे और वैसे भी अब तुम चाहो भी तो नहीं जा सकती… मेरी बाँहें इतनी मजबूत है कि आज मैं जबरदस्ती भी कर सकता हूँ।

मैंने कहा- मेरे साथ जबरदस्ती करोगे… किस हक से?

उन्होंने कहा- आज की रात तुम मेरी दुल्हन हो… मतलब तुम मेरी बीवी हो इसलिए मेरा हक है कि मैं जो चाहूँ, कर सकता हूँ और अब ज्यादा नाटक करोगी तो तुम्हारा बलात्कार भी कर सकता हूँ।

मैंने कहा- अपनी बीवी का कोई बलात्कार करता है क्या?

उन्होंने कहा- क्या करें.. अगर बीवी साथ नहीं देती तो मज़बूरी में करना पड़ेगा।

फिर हम हँसते हुए एक-दूसरे के होंठों को चूमने लगे।

थोड़ी देर बाद अमर ने मुझसे कहा- चलो अब बताओ कि मैं कैसा दिख रहा हूँ

और वो बिस्तर से उठ कर खड़े हो गए।

मैंने देखा कि वो एक धोती और कोट पहने हुए हैं, जो ज्यादातर पुराने जमाने में लोग पहनते थे और वो अच्छे भी दिख रहे थे।

उन्होंने बताया- मैंने धोती नई खरीदी है पर कोट शादी के समय का है।

मैंने उन्हें देख कर फिर से चिढ़ाते हुए कहा- काफी जंच रहे हैं.. मेरे बूढ़े दुल्हे राजा…!

और मैं हँसने लगी।

तब उन्होंने मुझे फिर से बिस्तर पर पटक दिया और कहा- वो तो थोड़ी देर में पता चल जाएगा कि मैं बूढ़ा हूँ या जवान… जब तुम्हारी सिसकारियाँ निकलेगीं।

हमने एक-दूसरे को चूमना शुरू कर दिया, फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने दूध का गिलास लिया और मुझे दिया और बोले- पियो।

मैंने उनसे पहले पीने को कहा उन्होंने एक घूँट पिया फिर गिलास मुझे दिया। मैंने भी एक घूँट पिया, फिर वो पीने लगे इस तरह दूध खत्म हो गया।

दूध खत्म करने के बाद उन्होंने मुझे फिर से चूमना शुरू किया और कहा- अब तुम्हारा दूध पीने की बारी है।

और मेरे स्तनों को दबाने लगे, जिससे मेरा दूध निकल गया और ब्लाउज भीग गया।

 
तड़फती जवानी-6

हमने एक-दूसरे को चूमना शुरू कर दिया फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने दूध का गिलास लिया और मुझे दिया और बोले- पियो।

मैंने उनसे पहले पीने को कहा उन्होंने एक घूँट पिया फिर गिलास मुझे दिया। मैंने भी एक घूँट पिया, फिर वो पीने लगे इस तरह दूध खत्म हो गया।

दूध खत्म करने के बाद उन्होंने मुझे फिर से चूमना शुरू किया और कहा- अब तुम्हारा दूध पीने की बारी है और मेरे स्तनों को दबाने लगे, जिससे मेरा दूध निकल गया और ब्लाउज भीग गया।

उन्होंने मेरी साड़ी निकाल दी थी और इधर-उधर की उठा-पटक की वजह से उनकी धोती भी खुल गई थी, वो सिर्फ अंडरवियर और कोट में रह गए थे।

कुछ देर के मस्ती के बाद उन्होंने चॉकलेट निकाली और अपने मुँह में भर कर मेरे मुँह के सामने रख मुझे खाने का इशारा किया।

मैंने भी चॉकलेट को मुँह से काटते हुए उनके होंठों को चूमा और चॉकलेट खा ली।

चॉकलेट खत्म होने के बाद उन्होंने मुझे सुपारी दी और कहा- मुँह में रख लो।

मैंने पूछा- क्यों?

तो वो बोले- सुपारी मुँह में रख लेने से ज्यादा देर सम्भोग किया जा सकता है और जब गीली हो जाएगी तो वो उसे अपने मुँह में भर लेंगे।

अमर बिस्तर पर लेट गए और मुझे अपने बगल में अपनी बांहों में समेट लिया और मेरे बदन को सहलाने और बातें करने लगे।

कुछ देर बाद उन्होंने मुझसे कहा कि सुपारी को मैं उनके मुँह में डाल दूँ।

मैंने उनसे इशारा किया कि मैं थूक कर आती हूँ क्योंकि मेरा मुँह सुपारी की वजह से लार से भर गया था।

उन्होंने कहा- सुपारी का रस थूकना नहीं चाहिए बल्कि निगल जाना चाहिए, तुम मेरे मुँह में रस के साथ सुपारी को डाल दो।

मुझे थोड़ा अजीब लगा, पर सोचा चलो जब सब किया तो यह भी कर लेती हूँ, मैंने उनके मुँह से मुँह लगाया और सारा रस सुपारी के साथ उनके मुँह में डाल दिया।

उन्होंने सारा रस पी लिया और कहा- इस तरह हम लोग काफी देर तक झड़ेंगे नहीं।

मैंने कहा- और कितनी देर तक नहीं झड़ना चाहते आप? एक बार मेरे ऊपर चढ़ते हो तो मेरी हालत जब तक खराब न हो जाए तब तक तो रुकते नहीं हो, आज क्या मुझे मार डालने का इरादा है?

उन्होंने हँसते हुए कहा- अरे मेरी जान आज सुहागरात है न, देर तक मजा लेना है।

उन्होंने मुँह से सुपारी निकाल दी और दूसरी भर ली और कुछ देर बाद मुझसे कहा कि अब मैं उनका रस पी जाऊँ।

मैंने मना किया पर उनके जोर डालने पे मैं भी पी गई।

अब मैंने सुपारी को मुँह से निकाल दी और फिर एक-दूसरे के होंठों को चूमने लगे। थोड़ी देर में हम एक-दूसरे के होंठों को चूसने लगे, फिर जीभ को बारी-बारी से चूसते चले गए।

इसी बीच हम चूमते हुए एक-दूसरे के कपड़े उतारने लगे और कुछ ही पलों में अमर ने मुझे पूरी तरह से नंगा कर दिया मेरे बदन पर अब सिर्फ गहने थे।

मैं उन्हें उतारना चाहती थी, पर अमर ने कहा- गहनों को रहने दो ताकि और भी मजा आए।

मैं सर से पाँव तक गहनों में थी और शायद ये बात अमर को और भी अधिक उत्तेजित कर रही थी।

अमर भी पूरी तरह से नंगे हो चुके थे और उनका लिंग खड़ा हो कर सुहागरात मनाने को उतावला हो रहा था।

मैंने उनके उतावलेपन को समझा और अपने हाथ से लिंग को प्यार करने लगी।

और अमर ने भी मेरे स्तनों को दोनों हाथों में लेकर पहले तो खूब दबाया और फिर बारी-बारी से चूसने लगे और दूध पीने लगे।

मुझे नंगे बदन पर गहने चुभ रहे थे, पर अमर उन्हें निकालने नहीं दे रहे थे, उन्होंने मेरे बालों को खोल दिया था।

जी भर कर दूध पीने के बाद वो मेरे नाभि से खेलने लगे और फिर जीभ नाभि में घुसा कर उसे चूसने लगे।

धीरे-धीरे वो नीचे बढ़ने लगे, मैं बहुत उत्तेजित हो रही थी, अब तो मेरी ऐसी हालत हो गई थी और मेरी योनि गर्म और गीली हो चुकी थी कि अमर कुछ भी करें चाहे ऊँगली डालें या जुबान या लिंग डालें।

मैं मस्ती में अपने पूरे बदन को ऐंठने लगी और टाँगों को फैला दिया।

अमर को मेरा इशारा समझ आ गया था, उन्होंने पहले तो मेरी योनि के बालों को सहलाया फिर हाथ से योनि को छूकर कुछ देर तक सहलाया।

अब मुझे सीधा लिटा कर वे मेरी टाँगों की तरफ चले गए और मेरी जाँघों से लेकर पाँव तक चूमा और फिर जाँघों के बीच झुक कर मेरी योनि को करीब 15-20 बार चूमा और फिर चूसने लगे।

अमर ने बड़े प्यार से मेरी योनि को चूसा फिर दो ऊँगलियाँ डाल कर अन्दर-बाहर करने लगे।

थोड़ी देर बाद उन्होंने मेरी योनि को फैला दिया और दोनों तरफ की पंखुड़ियों को सहलाते हुए कहा- ये किसी फूल की पत्ती की तरह फ़ैल गई हैं, काश इसकी झिल्ली तोड़ने का सुख मुझे मिला होता।

मैंने उससे पूछा- क्या आप सब मर्द बस इसी के लिए मरते हो कि औरत की झिल्ली तोड़ो.. आपको पता है, इसमें एक औरत को कितनी तकलीफ होती है, पर आप लोग तो बस मजे लेना जानते हो।

उसने तब मुझसे कहा- अरे यार, एक औरत को पहला प्यार देना किसी भी मर्द के लिए स्वर्ग के सुख जैसा होता है और दर्द होता भी है तो क्या मजा नहीं आता और ये दर्द तो प्यार का पहला एहसास होता है।

मैंने भी सोचा कि अमर गलत तो नहीं कह रहा है क्योंकि यह एक मीठा दर्द ही तो है जो उसे एहसास दिलाता है कि कोई उसे कितना प्यार करता है और मैं उसके सर पर हाथ फेरते हुए मुस्कुराने लगी।

उसने भी मुझे मुस्कुराते हुए देखा और मेरी योनि को फिर से चूमा और मुझे उल्टा लिटा दिया, फिर मेरे कूल्हों को प्यार करने लगे।

उसने जी भर कर मेरे कूल्हों, कमर, पीठ और जाँघों को प्यार किया और फिर मुझे सीधा करके मेरे सामने अपना लिंग रख दिया।

मैं भी बड़े प्यार से उनके लिंग को चूमा, सुपाड़े को खोल कर बार-बार चूमा फिर जुबान फिरा कर उसे चाटा और अंत में मुँह में भर कर काफी देर चूसा।

मेरे चूसने से अमर अब बेकाबू से हो गए थे और मैं तो पहले से काफी गर्म थी, सो मुझे सीधा लिटा दिया और मेरे ऊपर चढ़ गए।

मैंने भी अपनी टाँगें फैला कर उनको बीच में ले लिया और अपनी तरफ खींच कर उनको कसके पकड़ लिया।

अमर ने झुक कर फिर से मेरे चूचुकों को बारी-बारी से चूसा और मेरे होंठों को चूम कर मुस्कुराते हुए कहा- अब मैं तुम्हारी नथ उतारूँगा।

मैं समझ रही थी कि वो बस स्त्री और पुरुष के पहले सम्भोग की कल्पना कर रहे हैं और मुझे भी ये अंदाज बहुत अच्छा लग रहा था।

सो मैं भी उनके साथ हो गई और कहा- दर्द होगा न, धीरे-धीरे करना वरना खून आ जाएगा और हँसने लगी।

अमर भी मुस्कुराते हुए बोले- डरो मत जान… आराम से करूँगा, तुम्हें जरा भी तकलीफ़ नहीं होगी, बस आवाज मत निकालना।

हम दोनों को इस तरह से खेलने में बहुत मजा आ रहा था। अमर ने अपनी कमर हिला-हिला कर अपना लिंग मेरी योनि के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया।

तब मैंने फिर कहा- कुछ चिकनाई के लिए लगा लीजिए.. दर्द कम होगा।

उन्होंने कहा- अरे रुको.. मैं कुछ और भी लाया हूँ और वो उठ कर अलमारी खोल कर एक चीज़ लेकर आए।

वो कोई जैली थी, अमर ने उसे मेरी योनि के अन्दर तक भर दिया और फिर से मेरे ऊपर चढ़ गए।

मुझसे अब बर्दास्त नहीं हो रहा था, मैंने उनके लिंग को पकड़ कर अपनी योनि में घुसा लिया, पर सिर्फ सुपाड़ा ही अभी अन्दर गया था सो मैंने टाँगों से उन्हें जकड़ लिया और अपनी ओर खींचा।

तभी अमर को और मस्ती सूझी और उसने कहा- इतनी भी जल्दी क्या है, आराम से लो.. वरना तुम्हारी बुर फट जाएगी।

मैंने उससे कहा- ये कैसी भाषा बोल रहे हो आप?

अमर ने कहा- हम पति-पत्नी हैं और शर्म कैसी?

अमर ने मुझे भी वैसे ही बात करने को कहा और मुझसे जबरदस्ती कहलवाया- अपने लण्ड से मेरी बुर चोदो।

अमर से ऐसा कहने के बाद तुरंत ही अपना लिंग एक धक्के में घुसा दिया, जो मेरे बच्चेदानी में लगा और मैं चिहुंक उठी।

मैं कराह उठी और मेरे मुँह से निकल गया- ओ माँ मर गई… आराम से… मार डालोगे क्या?

तब अमर ने कहा- सील टूट गई क्या?

और हँसने लगे।

मैं शांत होती, इससे पहले फिर से अमर ने जोर से एक धक्का दिया और मैं फिर से कराह उठी तो अमर ने कहा- अब बोलो.. कैसा लगा मुझे बूढ़ा कह रही थी।

मैंने उनसे फिर भी कहा- हाँ… बूढ़े तो हो ही आप।

मेरी बात सुनते ही वो जोर-जोर से धक्के देने लगे और मैं ‘नहीं-नहीं’ करने लगी, मुझसे जब बर्दास्त नहीं हुआ तो मैंने उसने माफ़ी माँगना शुरू कर दिया और वो धीरे-धीरे सम्भोग करने लगे। योनि में जो जैल डाला था, उसके वजह से बहुत आनन्द आ रहा था और लिंग बड़े प्यार से मेरी योनि को रगड़ दे रहा था।

अब हम दोनों अपने होंठों को आपस में चिपका कर चूमने और चूसने लगे और नीचे हमारी कमर हिल रही थीं। मैं अपनी योनि उनको दे रही थी और वो अपना लिंग मेरी योनि को दे रहे थे।

मेरा बदन अब तपने लगा था और पसीना निकलना शुरू हो गया था, उधर अमर भी हाँफने लगे थे और माथे से पसीना चूने लगा था।

करीब आधे घंटे तक अमर मेरे ऊपर थे और हम दोनों अभी भी सम्भोग में लीन थे, पर दोनों की हरकतों से साफ़ था कि हम दोनों अभी झड़ने वाले नहीं हैं।

अमर ने मुझे अपने ऊपर चढ़ा लिया क्योंकि वो थक चुके थे, मैंने अब धक्कों की जिम्मेदारी ले ली थी। अमर मेरे कूल्हों से खेलने में मग्न हो गए और मैं कभी उनके मुँह में अपने स्तनों को देती तो कभी चूमती हुई धक्के लगाने लगती।

करीब 5-7 मिनट के बाद मेरा बदन अकड़ने लगा और मैं अमर को कसके पकड़ कर जोरों से धक्के देने लगी। ऐसा जैसे मैं उनके लिंग को पूरा अपने अन्दर लेना चाहती होऊँ।

मेरी योनि की मांसपेशियाँ सिकुड़ने लगीं और मैं जोर के झटकों के साथ झड़ गई, मैं धीरे-धीरे शांत हो गई और मेरा बदन भी ढीला हो गया।

अमर ने अब मुझे फिर से सीधा लिटा दिया और टाँगें खोल कर अपने लिंग को अन्दर घुसाने लगा।

मैंने उससे कहा- दो मिनट रुको।

पर वो कहाँ मानने वाला था।

उसने फिर से सम्भोग करना शुरू कर दिया और तब मैं फिर से गर्म हो गई। इस बार भी मैं तुरंत झड़ गई और मेरे कुछ देर बाद अमर भी झड़ गए।

एक बात तो इस रात से साफ हुई कि मर्द को जितना देर झड़ने में लगता है, वो झड़ने के समय उतनी ही ताकत लगा कर धक्के देता है।

अमर भी झड़ने के समय मुझे पूरी ताकत लगा कर पकड़ रखा थे और धक्के इतनी जोर देता कि मुझे लगता कि कहीं मेरी योनि सच में न फट जाए।

अमर जब थोड़े नरम हुए तो कहा- तो सुहागरात कैसी लगी?

मैंने उनसे कहा- बहुत अच्छा लगा, ये सुहागरात मैं कभी नहीं भूलूँगी, आपने मेरी सील दुबारा तोड़ दी।

यह कह कर मैं हँसने लगी।

अमर ने कहा- हाँ.. वो मेरा हक था, तोड़ना जरुरी था, क्योंकि अब तुम मेरे बच्चों को जन्म दोगी।

हम इसी तरह की बातें करते और हँसते हुए आराम करने लगे।

मैं थोड़ी देर आराम करने के बाद उठ कर पेशाब करने चली गई, पर बाथरूम में मैंने आईने में खुद को देखा तो सोचने लगी कि यदि कोई मर्द मुझे इस तरह से देख ले तो वो पागल हो जाएगा।

मैं ऊपर से नीचे तक गहनों में थी एक भी कपड़ा नहीं था और ऐसी लग रही थी जैसे काम की देवी हूँ।

मैं अन्दर से बहुत खुश थी कि मुझे अमर जैसा साथी मिला जो मेरी सुन्दरता को और भी निखारने में मेरी मदद कर रहा था।

वापस आकर हमने फिर से खेलना शुरू कर दिया। उस रात तो सम्भोग कम और खेल ज्यादा ही लग रहा था, पूरी रात बस हम खेलते रहे पर सम्भोग ने भी हमें बहुत थका दिया था।

मैं बहुत खुश थी क्योंकि जो मेरी अधूरी सी इच्छा थी वो पूरी हो गई और रात भर हम सोये नहीं। मैंने बहुत दिनों के बाद लगातार 5 बार सम्भोग किया और सुबह पति के आने से पहले चली गई।

हालांकि पूरे दिन मेरे बदन में दर्द और थकान रही और न सोने की वजह से सर में भी दर्द था, पर मैं संतुष्ट थी और खुश भी थी।

अमर सही कहते थे कि मर्द औरतों को दर्द भले देते हैं पर ये दर्द एक मीठा दर्द होता है, चाहे झिल्ली फटने का हो या फिर माँ बनाने का दर्द हो।

 
तड़फती जवानी-7

मैं आज जो कहानी सुनाने जा रही हूँ वो मेरे जीवन की एक कड़वी दवाई की तरह सच है क्योंकि पता नहीं आप लोग इस कहानी को पढ़ कर मेरे बारे में क्या सोचेंगे।

फिर भी बड़ी हिम्मत करके मैंने तय किया कि आप लोग मेरे बारे में जो भी सोचें, मैं आपके मनोरंजन के लिए इसे भी लिख देती हूँ।

दरअसल मुझे इसलिए कहानी लिखने में थोड़ी हिचकिचाहट हो रही थी क्योंकि मेरे जिनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बने वो मेरे रिश्तेदार ही लगते हैं।

मेरा उनसे क्या रिश्ता है मैं यह नहीं बताना चाहूँगी, पर जो कुछ भी और कैसे हुआ वो जरुर विस्तार से बताऊँगी।

बाद दो साल पहले की है वैसे भी मेरे पति और मेरे बीच के रिश्तों के बारे में आप सबको पहले से ही पता है।

मेरे पति के एक रिश्तेदार हैं जो पहले फ़ौज में थे और अब अपने गाँव में बस खेती-बाड़ी देखते हैं।

उनका एक ही बेटा है जो कि दुबई में काम करता है और दोनों पति-पत्नी घर पर अकेले ही रहते हैं।

गाँव में अच्छी खासी खेती-बाड़ी है और गाँव के लोग उनकी बहुत इज्ज़त करते हैं क्योंकि बहुत से लोगों को वो अपने यहाँ काम पर रखे हुए हैं।

वो बहुत ही साधारण किस्म के इंसान हैं, उनका रहन-सहन बिलकुल साधारण है। उनकी उम्र करीब 70 की होगी, पर दिखने में 50-55 के लगते हैं।

वो आज भी खेतों में खुद काम करते हैं। जब मैंने पहली बार उनको देखा था तब करीब 50 किलो वजन की बोरी उठा कर घर से गोदाम में रख रहे थे।

मैं उनको देख कर हैरान थी कि वे इस उम्र में भी इतना काम कर लेते हैं। उनका भोजन भी सादा ही होता था, सुबह उठ कर टहलने जाते थे और फिर आकर थोड़ा योग करते थे, काफी तंदुरुस्त, थोड़े से सांवले, कद करीब 6 फीट लम्बे, पेट थोड़ा निकल गया था, पर फिर भी दिखने में अच्छे लगते थे।

उनके कंधे चौड़े, मजबूत बाजू देख कर कोई भी पहचान लेता कि वे फौजी हैं।

बात यूँ हुई कि दो साल पहले उनकी बीवी की बच्चेदानी में घाव हो गया था और तबियत बहुत ख़राब थी।

उनका बेटा और बहू तो दुबई में थे, हालांकि देखभाल के लिए नौकर थे पर अपना कोई नहीं था इसलिए मेरे पति ने मुझे उनके पास छोड़ दिया, क्योंकि मेरे घर पर बच्चे अब इतने बड़े हो चुके थे कि उनका ध्यान मेरी देवरानी और जेठानी रख सकते थे।

मेरे पति मुझे वहाँ अकेले छोड़ कर वापस आ गए।

मैं करीब 15 दिन वहाँ रही थी और इसी बीच ये घटना हो गई।

मुझे करीब एक हफ्ता हो गया था इस बीच मैं खाना बनाने के अलावा सबको खाना देती और उनकी पत्नी को दवा देती, उनकी साफ़-सफाई में मदद करती थी।

एक शाम उनकी पत्नी की तबियत बहुत ख़राब हो गई, वो दर्द से तड़पने लगीं, पास के डॉक्टर को बुलाया गया तो उसने उन्हें बड़े अस्पताल ले जाने को कहा।

तुरंत गाड़ी मंगवाई गई और फ़ौरन उन्हें बड़े अस्पताल ले जाया गया। मैं भी उनके साथ थी।

अस्पताल पहुँचते ही उन्हें भरती कर लिया गया।

रात के करीब 10 बज चुके थे और वो अब सो चुकी थीं।

मुझे भी थकान हो रही थी, इसलिए मुझसे उन्होंने कहा- अस्पताल के लोगों के लिए पास में एक गेस्ट-हाउस है, वहाँ एक कमरा ले लेते हैं ताकि हम भी कुछ आराम कर लें।

मैंने तब उनसे कहा- आप चले जाइये, मैं यहीं रूकती हूँ।

वो जाते समय डॉक्टर से मिलने चले गए, फिर थोड़ी देर बाद वापस आए और कहा कि उनकी बीवी का ऑपरेशन करना होगा, सो अब एक कमरा लेना ही पड़ेगा, पर अभी उन्हें सोने की दवा दी गई है। सो सुबह तक मुझे रुकने की जरूरत नहीं है, मैं भी साथ में चलूँ और आराम कर लूँ क्योंकि सुबह फिर आना है।

मैंने भी सोचा कि ठीक ही कह रहे हैं और मैं साथ चल दी।

गेस्ट-हाउस पहुँचे तो हमने दो कमरे की बात कही, पर उनके पास बस एक ही कमरा था और वो भी एक बिस्तर वाला था।

उन्होंने मुझसे कहा- चलो आज रात किसी तरह काम चला लेते हैं, कल कोई खाली होगा तो दूसरा ले लेंगे।

मैंने भी सोचा कि ये तो मेरे पिता समान हैं कोई हर्ज़ नहीं है, सो मैंने ‘हाँ’ कर दी।

उस गेस्ट-हाउस की हालत देख कर लग रहा था कि इधर कितनी भीड़ रहती होगी, कुछ लोग काउंटर पर ही सो रहे थे।

क्योंकि शायद उनके पास पैसे कम होंगे और कुछ लोगों ने तो कमरे को जाने वाले रास्ते में ही फर्श पर ही अपना बिस्तर लगा रखा था।

ज्यादातर लोग अभी भी जगे हुए थे और कुछ लोग खाना खा रहे थे।

सभी आस-पास के गाँव से आए हुए लग रहे थे। हम दोनों अपने कमरे में आ गए, बत्ती जलाई तो देखा कि कमरा बहुत छोटा था।

बस सोने लायक ही था।

हमने बस यही सोच कर कमरा पहले नहीं देखा था, क्योंकि गेस्ट-हाउस के मैनेजर ने कहा था कि उनके पास बस एक ही कमरा खाली है।

मेरे साथ आए रिश्तेदार ने कहा- कुछ खाने को ले आता हूँ।

मैंने मना कर दिया क्योंकि इस भाग-दौड़ में मेरी भूख मर गई थी।

पर मैंने उनसे कहा- आप खाना खा लें।

पर वो तो बाहर का खाना नहीं खाते थे और इतनी रात को कोई फल की दुकान भी नहीं खुली थी, सो उन्होंने भी मना कर दिया।

बस वेटर को पानी लाने को कह दिया।

कमरे में बिस्तर बस एक इंसान के सोने भर का था, बगल में एक छोटी सी अलमारी थी और उसी में एक बड़ा सा आइना लगा था, बगल में एक कुर्सी थी।

हमने अपने साथ लाए हुए बैग में सोने के लिए सामान निकाला और फिर उसे अलमारी में रख दिया।

उन्होंने कहा- बिस्तर बहुत छोटा है, तुम बिस्तर पर सो जाओ, मैं कुर्सी पर सो जाऊँगा। एक रात किसी तरह तकलीफ झेल लेते हैं।

मैंने उनसे कहा- बाकी लोगों को फोन कर के बता दें कि यहाँ क्या हुआ है।

पर उन्होंने कहा- सुबह बता देंगे.. रात बहुत हो चुकी है, बेकार में सब परेशान होंगे।

मैं बिस्तर पर लेट गई और वो कुर्सी पर बैठ गए, काफी देर हो चुकी थी।

मैं देख रही थी कि वो ठीक से सो नहीं पा रहे थे सो मैंने कहा- आप बिस्तर पर सो जाएँ और मैं नीचे कुछ बिछा कर सो जाती हूँ।

तब उन्होंने कहा- नहीं, नीचे फर्श ठंडा होगा, तबियत ख़राब हो सकती है। मैं यहीं कुर्सी पर सोने की कोशिश करता हूँ।

बहुत देर उन्हें ऐसे ही उलट-पुलट होते देख कर मैंने कहा- आप भी बिस्तर पर आ जाएँ, किसी तरह रात काट लेते हैं।

कुछ देर सोचने के बाद वो भी मेरे बगल में आ गए।

मैं तो यही सोच रही थी कि बुजुर्ग इंसान हैं और मैं दीवार की तरफ सरक के सो गई और वो मेरे बगल में लेट गए।

मैं लगभग नींद में थी कि मुझे कुछ एहसास हुआ मेरी टांगों में और मेरी नींद खुल गई।

मैं कुछ देर यूँ ही पड़ी रही और सोचने लगी कि क्या है, तो मुझे एहसास हुआ कि वो अपना पैर मेरे जाँघों में रगड़ रहे हैं।

मैं एकदम से चौंक गई और उठ कर बैठ गई।

मैंने कहा- आप यह क्या कर रहे हैं?

 
तड़फती जवानी-8

फिर उन्होंने जैसे ही कहा- कुछ नहीं।

मैंने बत्ती जला दी।

मेरे बत्ती जलाते ही उन्होंने मुझे पकड़ लिया और अपनी और खींचते हुए बिस्तर पर लिटा दिया और मेरे ऊपर आ गए।

मैं बस चीखने वाली थी कि उन्होंने मेरा मुँह दबा दिया और कहा- क्या कर रही हो… बाहर लोग हैं सुन लेंगे, क्या सोचेंगे।

मेरे दिमाग में घंटी सी बजी और एक झटके में ख्याल आया कि बाहर सबने मुझे इनके साथ अन्दर आते देखा है और अगर मैं चीखी तो पहले लोग मुझ पर ही शक करेंगे।

सो मैंने अपनी आवाज दबा दी, तब उन्होंने अपना हाथ हटाया और कहा- बस एक बार… किसी को कुछ पता नहीं चलेगा, मैं बहुत भूखा हूँ।

मैं अपनी पूरी ताकत से उनको अपने ऊपर से हटाने की कोशिश कर रही थी, पर उनके सामने मेरी एक नहीं चली।

मैं उनसे अब हाथ जोड़ कर विनती करने लगी- मुझे छोड़ दें.. हमारे बीच बाप-बेटी जैसा रिश्ता है।

मैं उन्हें अपने ऊपर से धकेलने की कोशिश करने लगी। पर वो मेरे ऊपर से हटने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

मेरी दोनों टाँगें आपस में चिपक सी गई थीं और वे अपने एक पैर से मेरे पैरों के बीच में जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे।

उन्होंने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए और उन्हें मेरे सर के ऊपर दोनों हाथों से दबा दिया, मैं किसी मछली की तरह छटपटा रही थी और वो अपने टांगों से मेरी टांगों को अलग करने का पूरा प्रयास कर रहे थे।

मुझे उनका लिंग अपनी जाँघों पर महसूस होने लगा था कि वो कितना सख्त हो चुका है।

हालांकि मुझे चुदवाए हुए काफ़ी दिन हो चले थे, मेरे अन्दर भी चुदने की इच्छा थी पर मैं तब भी अपनी पूरी ताकत से उनका विरोध कर रही थी, ऐसे कैसे किसी गैर मर्द से एकदम बिना किसी विरोध के चुदवा लेती?

तब उन्होंने मेरे दोनों हाथों को साथ में रखा और एक हाथ से दोनों कलाइयों को पकड़ लिया।

उनमें पता नहीं कहाँ से इतनी ताकत आ गई थी कि मैं अपने दोनों हाथों से उनके एक हाथ को भी नहीं छुड़ा पा रही थी।

तभी उन्होंने अपने कमर का हिस्सा मुझसे थोड़ा अलग किया और दूसरे हाथ से मेरी साड़ी को पेट तक ऊपर उठा दिया।

मेरी पैंटी अब साफ़ दिख रही थी, मैं अब पतली डोरी वाली पैंटी पहनती थी जिसमें सिर्फ योनि ही ढक पाती थी।

अब उन्होंने मेरी पैंटी की डोरी पकड़ ली। उनका हाथ पड़ते ही मैं और जोर से छटपटाई, पर उनके भारी-भरकम शरीर के आगे मेरी एक न चली।

मैं अब रोने लगी थी और रोते हुए विनती कर रही थी, पर मुँह से विनती तो वो भी कर रहे थे और शरीर से जबरदस्ती में लगे थे।

उन्होंने मेरी पैंटी उतारने की कोशिश की, पर मैंने अपनी टाँगें आपस में चिपका ली थीं सो केवल जाँघों तक ही उतरी, पर वो हार मानने को तैयार नहीं थे।

मेरे मन में तो अजीब-अजीब से ख्याल आने लगे थे कि आज ये मेरे साथ क्या हो रहा है। मैं सोच भी रही थी कि चिल्ला कर सबको बुला लूँ पर डर भी था कि लोग पहले एक औरत को ही कसूरवार समझेंगे, सो मैं चिल्ला भी नहीं पा रही थी।

तभी उन्होंने मेरी पैंटी की डोरी जोर से खींची और डोरी एक तरफ से टूट गई। अब उन्होंने मेरी टांगों को हाथ से फैलाने की कोशिश करनी शुरू कर दी, पर मैं भी हार नहीं मान रही थी। तब उन्होंने अपने कमीज को ऊपर किया और पजामे का नाड़ा ढीला कर अपने पजामे और कच्छे को एक साथ सरका कर अपनी जाँघों तक कर दिया।

उनका कच्छा हटते ही उनका लिंग ऐसे बाहर आया जैसे कोई काला नाग पिटारे के ढक्कन खुलते ही बाहर आता है। मैंने एक झलक नीचे उनके लिंग की तरफ देखा तो मेरी आँखें देखते ही बंद हो गई, पर मेरे दिमाग में उसकी तस्वीर छप सी गई। काला लम्बा लगभग 7 इंच, मोटा करीब 3 इंच, सुपाड़ा आधा ढका हुआ, जिसमें से एक बूंद पानी जैसा द्रव्य रोशनी में चमक रहा था।

वो अब पूरी तरह से मेरे ऊपर आ गए और एक हाथ से मेरी जांघ को पकड़ कर उन्हें अलग करने की कोशिश करने लगे, पर मैं अब भी अपनी पूरी ताकत से उन्हें आपस में चिपकाए हुए थी।

हम दोनों एक-दूसरे से विनती कर रहे थे कि वो मुझे छोड़ दे और मैं उन्हें उनके मन की करने दूँ। हमारे जिस्म भी पूरी ताकत से लड़ रहे थे, मेरा जिस्म उनसे अलग होने के लिए लड़ रहा था और उनका जिस्म मेरे जिस्म से मिलने को जिद पर अड़ा था।

तभी उन्होंने अपना मुँह मेरे एक स्तन पर रखा और ब्लाउज के ऊपर से ही काट लिया। मुझे ऐसा लगा जैसे करेंट लगा और मेरी टांगों की ताकत खत्म हो गई हो। मेरी टांगों की ढील पाते ही वो मेरे दोनों टांगों के बीच में आ गए। मैंने अपनी योनि के ऊपर उनके गर्म लिंग को महसूस किया उनके नीचे के बालों को मेरे बालों से रगड़ते हुए महसूस किया। अब मेरी हिम्मत टूटने लगी थी, पर मैं फिर भी लड़ रही थी।

तभी उन्होंने मेरे दोनों हाथों को एक-एक हाथ से पकड़ लिया, फिर अपनी कमर को मेरे ऊपर दबाते हुए लिंग से मेरी योनि को टटोलने लगे। मेरी आँखों में आँसू थे और मैं सिसक-सिसक कर रोने लगी थी, पर उन पर कोई असर नहीं हो रहा था।

मैं अब पूरी तरह से उनके वश में थी मैं बस अपने हाथों को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, तभी उन्होंने एक हाथ छोड़ दिया और अपने लिंग को पकड़ मेरी योनि में घुसाने की कोशिश करने लगे। मैंने भी अपने एक हाथ को आजाद पाते ही उससे उन्हें रोकने की कोशिश करने लगी।

मैंने उनका हाथ पकड़ लिया था, पर तब तक उन्होंने अपने लिंग को मेरी योनि की छेद से भिड़ा दिया था। तब तक उन्होंने अपने कमर को मेरे ऊपर दबाया, मैंने महसूस किया कि उनका लिंग मेरी योनि में बस इतना ही अन्दर गया है कि उनके सुपारे का चमड़ा पीछे की तरफ खिसक गया।

अब उन्होंने अपना हाथ हटा लिया और मेरे हाथ को पकड़ने की कोशिश की, पर मैंने झटका देते हुए अपना हाथ नीचे ले गई और उनके लिंग को पकड़ कर घुसने से रोक लिया। मैंने उनके लिंग को पूरी ताकत से अपनी मुठ्ठी में दबा लिया और वो मेरे हाथ को छुड़ाने की कोशिश करने लगे।

हम दोनों की हालत रोने जैसी थी हालांकि मैं तो रो ही रही थी, पर उनके मुँह से ऐसी आवाज निकल रही थी कि जैसे अगर नहीं मिला तो वो मर ही जायेंगे।

किसी तरह उन्होंने मेरा हाथ अपने लिंग से हटा लिया और फिर मेरे दोनों हाथों को एक हाथ से पकड़ लिया। अब तो मैं और भी टूट चुकी थी क्योंकि अब मैं हार चुकी थी, पर मेरा विरोध अभी भी जारी था।

तभी उन्होंने अपने लिंग को पकड़ कर फिर से मेरी योनि टटोलने लगे, पर शायद मेरी आधी फटी पैंटी बीच में आ रही थी। सो उन्होंने उसे भी खींच कर पूरा फाड़ दिया और नीचे फेंक दिया।

उन्होंने फिर से अपने लिंग को पकड़ा और फिर मेरी योनि की दरार में ऊपर-नीचे रगड़ा और फिर छेद पर टिका कर हल्के से धकेला तो उनका मोटा सुपाड़ा अन्दर घुस गया।

मैंने और तड़प कर छटपटाने की कोशिश की, पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि मेरा हिलना भी न के बराबर था।

इसके बाद उन्होंने अपना हाथ हटा लिया और फिर एक-एक हाथ से मेरे हाथ पकड़ लिए और अपने लिंग को धीरे-धीरे अन्दर धकेलने लगे। करीब पूरा सुपाड़ा घुस चुका था और मुझे हल्का दर्द भी हो रहा था, शायद उनका मोटा था इसलिए या फिर मेरी योनि गीली नहीं थी।

कुछ देर ऐसे ही धकेलने के बाद उन्होंने एक झटका दिया और मेरे मुँह से निकल गया- हाय राम मर गईई…ईई… नहीं.. नहीं.. छोड़ दीजिए.. मैं मर जाऊँगी.. ओह्ह माँ..।

मेरी सांस दो पल के लिए रुक गई थी।

 
तड़फती जवानी-9

मैंने और तड़प कर छटपटाने की कोशिश की, पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि मेरा हिलना भी न के बराबर था।

इसके बाद उन्होंने अपना हाथ हटा लिया और फिर एक-एक हाथ से मेरे हाथ पकड़ लिए और अपने लिंग को धीरे-धीरे अन्दर धकेलने लगे। करीब पूरा सुपाड़ा घुस चुका था और मुझे हल्का दर्द भी हो रहा था, शायद उनका मोटा था इसलिए या फिर मेरी योनि गीली नहीं थी।

कुछ देर ऐसे ही धकेलने के बाद उन्होंने एक झटका दिया और मेरे मुँह से निकल गया- हाय राम मर गईई…ईई… नहीं.. नहीं.. छोड़ दीजिए.. मैं मर जाऊँगी.. ओह्ह माँ..।

मेरी सांस दो पल के लिए रुक गई थी।

अब तब उन्होंने अपना पूरा वजन मेरे ऊपर डाल दिया और और धीरे-धीरे धक्के देने लगे।

शायद उन्हें भी थोड़ी तकलीफ हो रही थी क्योंकि मेरी योनि गीली नहीं थी।

मैंने अपनी आँखें खोलीं और एक बार उनकी तरफ रोते हुए देखा, उन्होंने अपने नीचे वाले होंठ को अपने दांतों से दबा रखा था, जैसे कोई बहुत ताकत लगाने के समय कर लेता है और मुझे धक्के दे रहे थे।

मैं अब भी रो रही थी और उनके धक्कों पर ‘आह-आह’ करके रोती रही।

करीब 5 मिनट तक हम ऐसे ही ताकत लगाते रहे, वो मुझसे सम्भोग करने के लिए और मैं उनसे अलग होने के लिए। मेरी योनि अब हल्की गीली हो चली थी और पहले जैसा कुछ भी दर्द नहीं हो रहा था, पता नहीं मुझे अब क्या होने लगा था।

शायद मैं हार गई थी इसलिए या अब मेरे पास कोई चारा नहीं था इसलिए मैंने धीरे-धीरे जोर लगाना बंद कर दिया था।

मेरी योनि अब इतनी गीली हो चुकी थी जितने में मैं सम्भोग के लिए तैयार हो जाती थी, मुझे अब उनका लिंग मेरी योनि में अच्छा लगने लगा था।

मैं उनके धक्कों पर अब भी सिसक रही थी, पर यह अब मजे की सिसकारी हो चुकी थी।

मैं अब मस्ती में आ चुकी थी और अचानक मेरे पैर उठ गए और मैं एक-एक पैर को उनकी जाँघों के ऊपर रख पैरों से ही उनकी जाँघों को सहलाने लगी।

उन्होंने अभी भी मेरे हाथों को पकड़ रखा था, तभी मेरी कमर में हरकत हुई जैसे कि मैं खुद को सहज करने के लिए हिला रही हूँ और मैंने अपनी टांगों को उनके कूल्हों पर रख उनको अपनी तरफ खींचा।

मेरी इस हरकत से उन्होंने मेरे हाथ छोड़ दिए और मेरे चूतड़ के नीचे रख मेरे चूतड़ को पकड़ कर अपनी ओर खींचा और अपने लिंग को मेरी योनि में और जोर से घुसेड़ा।

अपने हाथ को आजाद होते ही मैंने उनके गले में हाथ डाल उनको पकड़ लिया और अपने हाथों और पैरों से उन्हें अपनी ओर खींचने लगी।

मेरे दिमाग में अब कुछ भी नहीं था, मैं सब कुछ भूल चुकी थी। अब मुझे कुछ हो रहा था तो बस ये कि मेरी टांगों के बीच कोई मखमली चीज रगड़ रही है। मेरी योनि के अन्दर कोई सख्त और चिकनी चीज़ जो मुझे अजीब सा सुख दे रहा है।

पता नहीं मुझे क्या होने लगा था, मैंने उन्हें अपनी टाँगें खोल बुरी तरह से जकड़ती जा रही थी। उनके सर के बालों को दबोच रखा था, मैं अब मुँह से सांस लेने लगी थी।

मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे कोई चीज मेरी योनि से होता हुआ मेरी नाभि में फ़ैलता जा रहा है… कोई तेज़ ध्वनि की तरंग सा।

अब वो मुझे जोरों से धक्के देने लगे थे और मेरे चेहरे के तरफ गौर से देखे जा रहे थे। उनके मुँह से भी तेज़ सांस लेने की आवाजें आ रही थीं।

करीब 20 मिनट हो चुके थे और मैं अपनी चरम सीमा पर थी, मैं इतनी उत्तेजित हो चुकी थी कि अचानक मेरे बदन में एक करेंट सा दौड़ा और मैंने उनको अपनी ओर खींच कर अपने होंठों को उनके होंठों से लगा दिया।

मेरे बदन में सनसनाहट होने लगी और मैंने उनके होंठों और जुबान को चूसना शुरू कर दिया और उन्होंने भी मेरा साथ देना शुरू कर दिया।

करीब एक मिनट मैंने इसी तरह से उनको चूसती हुई झड़ गई, मेरी योनि ने पानी छोड़ दिया था।

वो मुझे अब भी धक्के देकर सम्भोग कर रहे थे मैंने अपनी पकड़ कुछ ढीली की तो वो रुक गए।

मैं समझ गई थी कि वो थक चुके हैं, पर मैं ये नहीं समझी कि उन्होंने मुझसे स्थान बदलने को क्यों नहीं कहा।

शायद उन्हें डर था कि कही मैं फिर से विरोध शुरू न कर दूँ क्योंकि वो भी समझ चुके थे कि मैंने पानी छोड़ दिया है।

वो मेरी तरफ देख रहे थे, पर मुझसे उनसे नजरें नहीं मिलाई जा रही थीं।

वो सिर्फ अपनी कमर को हौले-हौले हिला कर अपने लिंग को मेरी योनि की दीवारों से रगड़ रहे थे।

थोड़ी देर बाद जब उनकी थकान कुछ कम हुई तो उन्होंने अपने हाथों से मेरे कंधों को पकड़ लिया और फिर से धक्के देने लगे।

मुझे महसूस होने लगा था कि मेरी योनि के चारों तरफ झाग सा होने लगा है और लिंग बड़े प्यार से अन्दर-बाहर हो रहा था।

कुछ धक्कों के बाद मेरा जिस्म फिर से गर्म होने लगा और मेरे हाथों ने उनको फिर से पकड़ लिया, मेरी टाँगें खुद उठ गईं और फ़ैल गईं ताकि उनको और आसानी हो।

मेरे साथ यह क्या हो रहा था, खुद मेरी समझ से बाहर था। मैं भूल चुकी थी कि वो मेरे नजदीकी रिश्तेदार हैं।

मैं कुछ सोच पाती कि मैं फिर से झड़ गई और वो भी बस 5 से 7 मिनट के सम्भोग में..

यह निशानी थी कि मैं कितनी गर्म थी और वासना की कैसी आग मेरे अन्दर थी।

करीब 45 मिनट हो चुके थे और मैं 4 बार झड़ चुकी थी मैं अपने कूल्हों के नीचे बिस्तर का गीलापन महसूस कर रही थी।

अब वो धक्के लगाते और रुकते फिर लगाते और रुकते… मैं समझ रही थी कि उनमें और धक्के लगाने की ताकत नहीं बची, पर मैं बस अपनी मस्ती में उनके धक्कों का मजा लेती रही।

फिर अचानक से उनके धक्के तेज़ हो गए उन्होंने एक हाथ मेरे चूतड़ों के नीचे रखा और दबोचते हुए खींचा, दूसरे हाथ से मेरे एक स्तन को पूरी ताकत से पकड़ लिया।

मुझे दर्द तो हुआ पर मैं उस मस्ती में दर्द सब भूल गई और उनके बालों को पकड़ अपनी और खींच होंठों से होंठ लगा चूमने लगी।

उनका हर धक्का मेरी योनि के अंतिम छोर तक जा रहा था, मुझे अपनी नाभि में महसूस होने लगा था। उन्होंने इसी बीच अपनी जुबान बाहर निकाल दी और मैं उसे चूसते हुए अपने चूतड़ों को उठाने लगी।

वो मुझे धक्के लगाते रहे मैं अपने चूतड़ उठाए रही और एक पल ऐसा आया कि दोनों ने मिल कर जोर लगाया और ऐसा मानो जैसे उनका लिंग मेरी योनि में फंस गया हो।

फिर दोनों के मुँह से मादक सिसकारी निकली- ह्म्मम्म्म..!!

मैंने पानी छोड़ दिया और उन्होंने भी अपना गर्म गाढ़ा वीर्य मेरी योनि की गहराई में उड़ेल दिया।

हम दोनों कुछ देर इसी अवस्था में एक-दूसरे को पकड़े हुए पड़े रहे, फिर धीरे-धीरे हम दोनों की पकड़ ढीली होने लगी।

जब पूरी तरह से सामान्य हुए तो उन्होंने मेरे ऊपर से अपना चेहरा ऊपर किया और मुझे गौर से देखने लगे, मेरे माथे से पसीना गले से होकर बहने लगा था।

मैंने उनको भी देखा उनके माथे पर भी पसीना था। तब उन्होंने मुस्कुरा दिया मैंने शर्म से अपनी नजरें झुका लीं।

वो मेरे ऊपर से हट गए और बगल में लेट गए।

मैंने भी दूसरी और मुँह घुमा कर अपनी आँखें बंद कर लीं।

मैंने न तो कपड़े ठीक करने की सोची और न अपनी योनि साफ़ करने की, बस पता नहीं किस ख्याल में डूब गई।
 
तड़फती जवानी-10

मैं बस यह सोच रही थी कि क्या इतने बुजुर्ग मर्द में भी इतनी ताकत होती है?

मेरे दिल में अब यह ख्याल नहीं आ रहा था कि वो मेरे रिश्तेदार हैं, बस एक संतुष्टि सी थी।

लगभग 15-20 मिनट बाद मुझे पता नहीं क्या हुआ मैं उनकी तरफ पलटी और उनको उठाया, वो भी नहीं सोये थे।

उन्होंने मुझसे पूछा- क्या हुआ?

मैंने कहा- और करना है क्या?

उन्होंने तुरंत कहा- हाँ..

फिर मैंने अपने कपड़े खुद ही उतार दिए सारे और नंगी हो गई।

मुझे ऐसा देख उन्होंने भी कपड़े उतार दिए और नंगे हो गए, वो मेरे सामने पूरे नंगे थे, मैंने गौर से देखा उनके शरीर पर झुर्रियाँ तो थीं पर लगता नहीं था कि वो बूढ़े हैं, सीना ऐसे मानो कोई पहलवान हो।

सीने पर काफी बाल थे और कुछ सफ़ेद बाल भी थे। उनका लिंग तो पूरा बालों से घिरा था, पर वहाँ के बाल अभी भी काले थे, उनके अंडकोष काफी बड़े थे।

मुझे पता नहीं क्या हुआ शायद एक बार में ही उनका चस्का सा लग गया। वो इससे पहले कि कुछ करते, मैंने खुद ही उनका लिंग पकड़ लिया और हिलाने लगी।

उनका लिंग ढीला था और मेरे हाथ लगाने और हिलाने से कोई असर नहीं पड़ रहा था, वो अब भी झूल रहा था।

उनके लिंग को अपने हाथ में पकड़ते ही मुझे फिर से कुछ होने लगा, मेरी योनि में गुदगुदी सी होने लगी।

वो अपने दोनों हाथ पीछे करके पैर सीधे किये बैठे थे और मैं उनके लिंग को हिला रही थी, पर करीब 5 मिनट हिलाने के बाद भी कोई असर नहीं हो रहा था।

मैंने एक हाथ से उनके सर को पकड़ा और अपने स्तनों पर झुका दिया, फिर दूसरे हाथ से अपने एक स्तन को उनके मुँह में लगा दिया और वो चूसने लगे।

मैंने फिर से उनके लिंग को पकड़ कर खड़ा करने के लिए हिलाने लगी।

तभी उन्होंने एक हाथ से मेरी टांग को फैला दिया और मेरी योनि को छूने लगे।

कुछ देर सहलाने के बाद उन्होंने मुझे रुकने को कहा और बिस्तर से उतर कर मेरी फटी हुई पैंटी उठा ली और मेरी योनि में लगा हुआ वीर्य पोंछ दिया और फिर उसे सहलाने लगे।

मैंने फिर से उनके लिंग को पकड़ सहलाना शुरू कर दिया और वो मेरी योनि को सहलाते हुए स्तनों को चूसने लगे।

उनका लिंग कुछ सख्त हो चुका था, पर इतना भी नहीं कि मेरी योनि को भेद सके।

तब मैंने उनके चेहरे को अपने स्तनों से अलग किया और उनके लिंग को मुँह में भर कर चूसने लगी।

मेरे कुछ देर चूसने के तुरंत बाद उनका लिंग खड़ा हो गया, पर मैं उसे अभी भी चूस रही थी, साथ ही उनके अन्डकोषों को सहला रही थी।

तभी उन्होंने कहा- ठीक है अब छोड़ो, चलो चुदाई करते हैं।

तब मैंने छोड़ दिया और बगल में लेट गई और अपनी कमर के नीचे तकिया लगा कर अपनी टाँगें फैला दीं।

वो मेरे ऊपर आ गए मेरी टांगों के बीच, वो मेरे ऊपर झुके तो मैंने उनके लिंग को पकड़ लिया और योनि की दरार में 4-5 बार रगड़ा और छेद में सुपारे तक घुसा दिया और कहा- चोदिये।

उन्होंने मेरी बात सुनते ही अपने कमर को मेरे ऊपर दबाया और लिंग को धकेल मेरी योनि में घुसा दिया।

मैं थोड़ा सा कसमसाई तो उन्होंने पूछा- क्या हुआ?

मैंने कहा- कुछ नहीं।

तो उन्होंने कहा- दर्द हो रहा है क्या?

मैंने कहा- हाँ.. हल्का सा आपका लंड बहुत मोटा है।

इस पर वो मुझे मुस्कुराते हुए देखने लगे और धीरे-धीरे लिंग को अन्दर-बाहर कर सम्भोग करने लगे। मेरी योनि उनके धक्कों से पानी छोड़ने लगी और ‘चप-चप’ की आवाज निकलने लगी।

मैंने एक हाथ गले में डाला, दूसरा पीठ में डाल कर पकड़े हुई थी। वो मुझे मेरे कंधों को पकड़ कर धक्के मार रहे थे।

तभी उन्होंने एक हाथ नीचे ले जाकर मेरे चूतड़ों को पकड़ कर खींचा तो मैंने भी अपनी दोनों टाँगें उठा कर उनके चूतड़ों पर रख अपनी ओर खींचा।

वो मुझे ऐसे ही चोदे जा रहे थे और मैं कुहक रही थी, हम दोनों एक-दूसरे के चेहरे को देख रहे थे।

तभी उन्होंने मुझसे कहा- पहले तो मना कर रही थीं… रो रही थीं और अब मर्ज़ी से चुदवा रही हो, इतना नाटक क्यों किया?

मैंने सुनते ही नजरें दूसरी तरफ कर लीं और खामोश रही, पर उन्होंने बार-बार पूछना शुरू कर दिया।

तब मैंने कहा- हम दोनों का रिश्ता बाप-बेटी जैसा है और पहले ये मुझे ठीक नहीं लग रहा था।

मेरी बात सुनकर उन्होंने धक्के लगाना बंद कर दिया और कहा- ठीक है.. पर अब दुबारा करने के लिए खुद ही क्यों पूछा?

मैंने कहा- अब तो सब हो ही चुका था मेरे मना करने के बाद भी आप नहीं माने, मेरा मन कर रहा था और करने को सो कह दिया।

मेरी बात सुन कर वो मेरी तरफ गौर से देखने लगे, वो धक्के नहीं लगा रहे थे और मेरी अन्दर की वासना इतनी भड़क चुकी थी कि मुझे बैचैनी सी होने लगी थी।

तब मैंने 3-4 बार अपनी कमर उचका दी और अपनी टांगों से उन्हें अपनी ओर खींचा, फिर उनके होंठों से होंठ लगा कर उन्हें चूमने लगी।

उन्होंने अपना मुँह खोल जुबान बाहर कर दी और मैं उसे चूसने लगी।

वो अब पूरे जोश में आ गए थे। उन्होंने 2-3 जोर के धक्के लगाए जिससे मेरी ‘आह्ह्ह’ निकल गई और वे जोर-जोर के तेज़ धक्के मारते हुए मुझे चोदने लगे।

वो धक्के लगा रहे थे और मेरे मुँह से सिसकारियाँ और ‘आहें’ निकल रही थीं।

अभी सम्भोग करते हुए कुछ ही देर हुए ही थे कि मैंने फिर से अपने जिस्म को अकड़ते हुए महसूस करने लगी, मेरी साँसें दो पल के लिए रुक सी गईं।

मेरी योनि सिकुड़ गई और मैंने पानी छोड़ दिया।

मैंने उनको पूरी ताकत से पकड़ रखा था, मेरा पूरा बदन और योनि पत्थर के समान हो गई थी, पर वो मुझे लगातार चोद ही रहे थे।

उन्होंने कहा- बुर को ढीला करो..

जो कि फ़िलहाल मेरे बस में नहीं था।

कुछ पलों के बाद मेरा बदन ढीला पड़ने लगा और वो धक्के रुक-रुक कर लगाने लगे। मैं समझ गई कि वो थक चुके हैं।

मैंने उनको कुछ देर ऐसे ही धक्के लगाने दिया और फिर उनको कहा- आप नीचे आ जाइए।

मेरी बात सुनकर वो मेरे ऊपर से उठे और अपने लिंग को मेरी योनि से बाहर निकाल लिया और पीठ के बल लेट गए।

मैंने देखा तो मेरी योनि के चारों तरफ सफ़ेद झाग सा लग गया था, उधर वो भी अपने लिंग को हाथ से सहला रहे थे।

मैं दोनों टाँगें फैला कर उनके ऊपर चढ़ गई और उनके लिंग को पकड़ कर योनि को उसे ऊपर लगाया, तभी उन्होंने मेरी वही फटी पैंटी ली और मेरी योनि को पोंछ दिया।

मैंने लिंग को योनि के छेद पर सीधा रख दिया और बैठ गई, लिंग फिसलता हुआ मेरी योनि की गहराई में धंस गया।

लिंग अन्दर घुसते ही मुझे बड़ा आनन्द महसूस हुआ, उनके लिंग का चमड़ा पीछे की ओर खिसकता चला गया।

मुझे बड़ी ही गुदगुदी सी महसूस होने लगी। मैंने अपने घुटनों को मोड़ा, उनके सीने पर हाथ रख दिया, उन्होंने भी मेरी कमर को पकड़ लिया और तैयार हो गए।

मैंने पहले धीरे-धीरे शुरू किया फिर जब मुझे उनके ऊपर थोड़ा आराम मिलने लगा तो मैंने अपनी गति तेज़ कर दी।

मैं पूरे मस्ती में थी तभी मैं एक तरफ सर घुमाया तो मुझे सामने आइना दिखा।

 
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