• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

दीदी तुम जीती मैं हारा complete

मैं स्नेहा दीदी की चूत में ही अपना सारा वीर्य निकाल कर उनके ऊपर बेसुध होकर गिर पड़ा और मेरा लंड अभी भी दीदी की चूत में ही अटका हुआ था ।

हम दोनों की साँसे बहुत तेज़ तेज़ चल रही थी । हम बिना कुछ बोले कुछ देर तक ऐसे ही पड़े रहे ।

फिर मैंने दीदी के कान में कहा , " तुमने कर दिखाया दीदी , तुम जीत गयीं !!! "

स्नेहा दीदी मुस्कुरायी और मेरे गाल पर किस करते हुए बोली , " welcome back bro !!! "

स्नेहा दीदी के साथ हुई घमासान चुदाई के बाद हम दोनों थक कर सो गए थे । करीब 2 घंटे बाद दीदी ने मुझे आकर जगाया ।

दीदी : समू उठ !! देख 10 बज गए हैं । चल उठ जा और तैयार हो जा , हमें मार्केट जाना है ।

मैं अंगड़ाई लेते हुए उठा और अचानक मुझे होश आया कि मैं तो एकदम नंगा ही सो रहा था । मैंने झट से चादर खींच कर अपने ऊपर डाल ली ।

दीदी ये सब देख कर हँसते हुए बोली , ” हाँ हाँ ..छुपा ले …छुपा ले ……..कहीं मैं खा ना जाऊं । ”

मैं दीदी की और देख कर मुस्कुरा दिया । अब गुस्से का पागलपन सर से उतर चुका था और मैं बिलकुल हल्का महसूस कर रहा था ।

दीदी : " चल अब उठ जा । मैं नाश्ता बना रही हूँ । जल्दी से तैयार होकर आजा । "

और ये कहकर दीदी रूम से बाहर चली गयी ।

मैं थोड़ी देर ऐसे ही बैठा रहा और जो कुछ मेरे और दीदी के बीच घटा था उसे रिवाइंड कर के सोचने लगा । मेरे द्वारा की गयी दीदी की चुदाई का एक एक दृश्य किसी फिल्म की तरह मेरे दिमाग में चलने लगा और मेरे लंड में फिर से तनाव आने लगा था । मैं दीदी के रूप और यौवन को ख्यालों में ही भोगने लगा और मेरे लंड ने अपना विकराल रूप धारण कर लिया । मेरे लंड में हल्का हल्का दर्द हो रहा था । मैंने गौर किया तो पाया की मेरी foreskin दो जगह से छिली हुई थी जो दीदी की टाइट गांड और चूत से अत्यधिक घर्षण के कारण हुई थी ।

मैं ये देखकर हैरान था कि लड़की के ख्याल से अब मेरा लंड पूरे जोश में आ जा रहा है और मन ही मन दीदी का शुक्रगुज़ार भी था कि उन्होंने मुझे बदल दिया था । फिर मुझे याद आया कि मैंने स्नेहा दीदी के साथ कैसे बुरा बर्ताव किया था और उन्हें गन्दी गन्दी गालियां दी थी , मुझे अफ़सोस हुआ ।

फिर स्नेहा दीदी की आवाज़ आयी , ” समू !! तू उठा कि नहीं । ”

मैं ख्यालों की दुनिया से निकल कर बाहर आया और बोला , “ उठ गया दी ! ..…आ रहा हूँ । ”

और तेज़ी से बाथरूम की तरफ भागा ।

दीदी ने मुझे नाश्ता करने को कहा और मेरे सामने बैठ कर खुद भी नाश्ता करने लगी ।

स्नेहा दीदी के चेहरे पर मुस्कान थी और चेहरा खिला खिला सा लग रहा था । उनके बॉयकट बाल जाने क्यों मुझे अब अच्छे नहीं लग रहे थे । उन्होंने नाक और कान में रिंग्स पहन लिये थे और हलके गुलाबी रंग का सलवार सूट पहना था पर दुपट्टा नहीं लिया था । कुल मिलाकर बालों को छोड़कर दीदी अब अपने पुराने लड़कियों वाले रूप में आ गयी थी । उनकी बड़ी बड़ी चूचियां बिना दुपट्टे के कुर्ते से बाहर को निकल रही थी ।

ज़िन्दगी में पहली बार मुझे किसी लड़की की चूचियों में इतना इंटरेस्ट आ रहा था । मैं स्नेहा दीदी को इतने गौर से देख रहा था , जितना पहले कभी नहीं देखा । मुझे वो सुंदरता की देवी लग रही थी ।

तभी स्नेहा दीदी ने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा और मुझे एकटक अपने को देखते पाकर बोली , ” ऐसे क्या देख रहा है मुझे ? ”

मैं सकपका गया और बोला , ” वो ..वो …कुछ नहीं दीदी ।”

मेरी ऐसी हालत देख कर दीदी की हंसी छूट गयी ।

फिर मैं थोड़ा रिलैक्स होकर बोला , “ दीदी ! आप बहुत सुन्दर हो ।”

स्नेहा दीदी ने मेरी आँखों में देखा और बोली , “ अच्छा !! …मुझे तो पता ही नहीं था ।”

मैं फिर बोला , “ सच दीदी ! मज़ाक नहीं …… आप बहुत सुन्दर हो ।”

दीदी बोली , ” चल ….. ज़्यादा मक्खन मत लगा और चुपचाप नाश्ता कर ।”

फिर मैंने नाश्ता खत्म किया और स्नेहा दीदी प्लेट्स उठा कर किचन में चली गयी ।

मैंने अपने हाथ धोये और दीदी के पीछे पीछे किचन में चला गया ।

दीदी प्लेट्स धो रही थी । मैं दीदी के पास जाकर खड़ा हो गया और बोला , ” दीदी …आय ऍम सॉरी ! ”

दीदी ने प्लेट्स धोते धोते मेरी तरफ नज़र उठा कर देखा और बोली , “ सॉरी …फॉर व्हाट ? ”

मैंने कहा , ” वो सुबह …मैंने आपके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया ।”

स्नेहा दीदी ने एक प्यारी सी स्माइल दी और बोली , “ it’s ok …....गलती मेरी भी तो थी । ”

फिर उन्होंने प्लेट्स को एक तरफ रखा और अपने हाथ पोंछने के बाद मुझसे बोली , “ चल मार्केट चलते हैं । मुझे कुछ घर का सामान लाना है ।”

और मुड़ के किचन से बाहर जाने लगी । मैंने आगे बढ़कर दीदी का हाथ पकड़ा और अपनी तरफ खींचा । दीदी मेरे सीने से आ लगी और मैंने उन्हें कमर से आलिंगन कर लिया ।

दीदी अचानक मेरे ऐसे करने से पहले तो घबराई , फिर बोली , “ समू !! क्या कर रहा है ? छोड़ मुझे ! ”

मैंने दीदी की आँखों में आँखें डाल कर कहा , “ छोड़ दूंगा दी ! ……पहले कहो कि तुमने मुझे माफ़ किया । ”

दीदी ने प्यारी सी स्माइल दी और बोली , “ हाँ …..मेरे प्यारे भाई ! मैंने तुझे माफ़ किया ! चल अब छोड़ मुझे । "

मैंने अपनी पकड़ को और टाइट किया तो स्नेहा दीदी की चूचियां मेरे सीने में गड़ने लगी ।

मुझ पर वासना हावी होने लगी और मेरे मुंह से निकला , “ छोड़ दूंगा दी ! …पहले इन होंठों का रस तो पीने दो । ”

दीदी ने कोई विरोध नहीं किया । बस अपने आपको ढीला छोड़ दिया और मैंने अपने होंठ उनके होंठो से मिला दिये और बारी बारी से उनके होंठों को अपने होंठों में भर कर चूसने लगा । दीदी के हाथ मेरे बालों से खेलने लगे और मेरे हाथ दीदी की गरदन से नितम्बों तक की दूरियां तय करने लगे । दीदी भी मेरी कमर और गरदन को अपने हाथों से सहलाने लगी । फिर अचानक से मैंने अपना एक हाथ दीदी की चूची पर रख दिया और चूची को ज़ोर से मसलने लगा ।

स्नेहा दीदी एक दम से अलग हो गयी और बोली , ” पागल ! अभी मेरे साथ बाहर चल । ये सब बाद में करना ।”

फिर दीदी की नज़र मेरी पैंट में बने तम्बू पर पड़ी तो उन्होंने अपने मुंह पर हाथ रख लिया , “ हे भगवान !! ये तो पूरे मूड में आ गया है ? ”

मैंने दीदी का हाथ पकड़ कर फिर अपने पास खींचा और उनका हाथ अपने लंड पर रख कर बोला , ” दीदी , प्लीज !! इसकी कुछ मदद करो ना ।"

दीदी बोली , “ कैसी मदद ? ”

मैं : " ओहो दी ! इसको शांत करो ना !! …… कैसे भी । नहीं तो मैं आपके साथ नहीं जा पाऊँगा । "

दीदी : " उफ़ ! तू भी ना … थोड़ा सब्र नहीं होता तुझसे । "

मैं : " नहीं हो रहा दी !! आप को देख के तो बिलकुल भी सब्र नहीं हो रहा । "

स्नेहा दीदी मुस्कुरायी और बोली , " चल , इसे बाहर निकाल । "

और मैंने तुरंत किसी आज्ञाकारी स्टूडेंट की तरह अपने लंड को पैंट की ज़िप खोल के बाहर निकाला ।

 
दीदी ने अपने हाथ से थोड़ी देर तक लंड को सहलाया । फिर बोली , ” तू खुद ही इसे शांत कर ले ना !! प्लीज !! ”

मैं : " दी प्लीज !!…ऐसे बीच में मत छोड़ो …कुछ करो ना । "

दीदी : " ठीक है , मैं हाथ से करती हूँ । "

स्नेहा दीदी ने मुझे किचन की स्लैब पर बैठने को कहा और मेरे लंड की चमड़ी को आगे पीछे करने लगी । मुझे बहुत अच्छा लग रहा था । पर कभी कभी दीदी चमड़ी को ज़्यादा पीछे कर देती तो दर्द भी होने लगता था छिलने की वजह से ।

करीब 5 मिनट तक दीदी ऐसे ही मेरे लंड को सहलाती रही । फिर अपना हाथ खींचते हुए बोली , ” मेरा हाथ दुःख रहा है , मुझसे नहीं होता …तू खुद कर ले ।”

मैं बोला , ” दी …प्लीज यार …..हाथ दुःख रहा है तो …...। ”

दीदी : " तो …तो क्या ? "

मैं : " तो .....मुंह से कर दो ना …प्लीज !! "

दीदी : " मुंह से करना मुझे अच्छा नहीं लगता ।…...और वैसे भी मैं नहा चुकी हूँ । "

मैं : " प्लीज दी …प्लीज …अपने भाई के लिये इतना भी नहीं करोगी । आपने कितना बड़ा favour किया है …एक favour और कर दो ना प्लीज दी …प्लीज !! "

दीदी थोड़ा convince होते हुए , " ठीक है …ठीक है ..पर ज़्यादा अंदर नहीं डालूंगी और तू ज़बरदस्ती नहीं करेगा । "

मैं : " ठीक है दी । "

फिर स्नेहा दीदी ने अपने हाथ से मेरे लंड को पकड़ा और लंड के सुपाड़े को अपने होठों के बीच डाल लिया । मेरे सारे शरीर में एक मस्ती का करंट सा दौड़ गया । फिर दीदी सुपाड़े को अपने होंठों के बीच फंसा कर उस पर अपनी जीभ फिराने लगी । और मेरे मुंह से मस्ती भरी सिसकारियां फूटने लगी , "…आह हहहहह ……ओह दी ..... ओह ….यू आर सो गुड ….लव यू दी । "

दीदी थोड़ा थोड़ा लंड को अपने मुंह से अंदर बाहर भी करने लगी और सुपाड़े पर अपनी जीभ भी फिराती रही ।

मैंने दीदी के बॉय कट बालों को मुट्ठी में भींच लिया और फिर कुछ देर बाद मैंने दीदी को कहा , " ओह हहहहह ,,,,,,दी ..i am coming !! "

स्नेहा दीदी ने तुरंत ही लंड को मुंह से निकाल लिया । मैं स्लैब से उतरकर खड़ा हो गया और मेरे लंड ने वीर्य की एक ज़ोरदार पिचकारी मारी । जो ठीक दीदी के पैरों के पास जाकर गिरी । दीदी तुरंत और पीछे हो गयी । 2-3 पिचकारी और मारने के बाद मेरा लंड शांत हो गया । मेरे चेहरे पर परम संतुष्टि के भाव थे और मैं स्लैब से टेक लगाये लम्बी लम्बी साँसे ले रहा था ।

तभी स्नेहा दीदी ने मुझे टिश्यू पेपर पकड़ाये और कहा , ” ले , साफ़ कर ले ।”

फिर दीदी कुछ टिश्यू पेपर खुद ले कर फर्श साफ़ करने लगी ।

मैं दीदी को लेके मार्केट गया , वहां दीदी ने घर का कुछ ज़रूरी सामान खरीदा । वापस घर आते आते शाम हो गयी थी । घर वापस आते ही थकान के मारे मैं ड्राइंग रूम में सोफे पर ही ढेर हो गया और दीदी भी सामान रखने के बाद मेरी बगल में ही सोफे पर पसर गयी ।

हम काफी देर तक आँखें बंद किये ऐसे ही सोफे पर बैठे रहे । फिर थोड़ा रिलैक्स होते हुए स्नेहा दीदी ने सवाल किया , “ समू ! एक बात पूछूं ? ”

मैंने आँखें खोल कर दीदी की ओर देखा और कहा , “ पूछो दी । क्या पूछना है ? ”

दीदी : " तेरा अब भी लड़कों में इंटरेस्ट है या कुछ बदलाव महसूस कर रहा है । "

मैं : " पता नहीं दी । ये तो कोई चिकना लड़का सामने आये तभी पता चलेगा । फिलहाल तो मुझे सिर्फ तुम्हारे में इंटरेस्ट है ।"

और मैंने ये कहते ही स्नेहा दीदी का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया ।

दीदी धम से मेरी गोद में आ गिरी । दीदी अचानक हुए हमले से घबरा गयी और बोली , “ क्या कर रहा है ? पागल है क्या ? ”

मैंने जवाब दिया , “ हाँ दीदी ! पागल ही तो कर दिया है आपने ।”

स्नेहा दीदी मेरी गोद से उठते हुए बोली , “ चल हट ! मुझे जाने दे और भी बहुत से काम हैं । ”

मैं दीदी का सर वापस अपनी गोद में रखते हुए बोला, “ छोडो ना दी ! थोड़ी देर बैठो ना मेरे पास । ”

दीदी बोली , “ नहीं तेरा कुछ भरोसा नहीं । तेरा शेर फिर जग गया तो ? ना जाने फिर तू क्या क्या करेगा । " और फिर मुस्कुराने लगी ।

मैं बोला , “ नहीं दी ! कुछ नहीं करूँगा । बस कुछ देर ऐसे ही लेटी रहो प्लीज ! ”

दीदी : “ ओके ! पर कुछ गलत नहीं करना ।”

मैं : " नहीं दी ! पक्का ! कुछ गलत नहीं करूँगा । "

स्नेहा दीदी ऐसे ही मेरी गोद में लेटी रही और मैं उनके बालों को सहलाने लगा । फिर धीरे धीरे उनके गालों , होठों और गरदन पर अपनी उंगलियां फिराने लगा । दीदी को शायद अच्छा लग रहा था इसीलिए उन्होंने अपनी आँखें मूँद रखी थी । काफी देर तक मैं ऐसे ही दीदी को सहलाता रहा और दीदी की आँख लग गयी ।

मैं भी वैसे ही सोफे पर बैठे बैठे सो गया । करीब आधे घंटे बाद अचानक से स्नेहा दीदी हड़बड़ा कर उठी और बोली , “ ओहो कितना टाइम हो गया ! चल मैं कुछ ज़रूरी काम निपटाती हूँ । तू फ्रेश हो जा , मैं तेरे लिए चाय लाती हूँ । ”

और दीदी उठ कर किचन की तरफ चली गयी । मैं उनके मटकते थिरकते नितम्बों पर नज़र गड़ाये देखता रहा । इससे पहले कि मेरा लंड फिर हुंकार भरे , मैं उठा

और फ्रेश होने बाथरूम चला गया ।

स्नेहा दीदी मुझे चाय देते हुए बोली , “ और कुछ चाहिये तुझे ? ”

मैं : " हाँ ! चाहिये । "

दीदी : " क्या ?"

मैं : " तुम ! "

दीदी मुस्कुराते हुए बोली , " पागल ! मैं कुछ खाने के लिए पूछ रही हूँ । "

मैं : " हाँ हाँ दी ! मैं भी खाने के लिए ही मांग रहा हूँ । "

दीदी : " वो तो तुझे नहीं मिल सकता । और कुछ चाहिये तो बता ।" कहकर दीदी हंसने लगी ।

मैं : " और कुछ नहीं चाहिये मुझे ।"

दीदी हंसती हुई किचन में चली गयी । मैंने चाय खत्म की और अपने रूम में चला आया । और सो गया ।

स्नेहा दीदी ने आके खाना खाने के लिए जगाया । देर तक नींद लेने के बाद मैं काफी फ्रेश सा फील कर रहा था ।

खाने की टेबल पर खाना खाते वक्त दीदी बोली , “ कल माँ आ रही हैं ।”

मैंने चौंक कर पूछा , “ अच्छा ! माँ का फ़ोन आया था क्या ? ”

दीदी बोली , " नहीं , मैंने माँ को फ़ोन किया था कि वापस आ जाओ । अब तुम्हारा लड़का सुधर गया है ।.....हा हा हा ...... "

और दीदी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी ।

मेरी कुछ समझ नहीं आया तो मैंने दूसरा सवाल पूछा , “ मतलब ? मैं कुछ समझा नहीं ।”

दीदी बोली , “ अरे बुद्धू !! मैंने ही माँ को रिश्तेदारों के यहाँ भेजा था । तेरा इलाज जो करना था ।”

मैं : " ओह ! तो इसका मतलब सब planned था और माँ को भी सब मालूम है ? "

दीदी : " हाँ ! सब planned तो था पर माँ को वो सब नहीं मालूम जो तूने मेरे साथ किया । "

मैं : " तो माँ ने पूछा नहीं कि लड़का कैसे सुधरा ? "

दीदी : " पूछा था , पर मैंने सब सच नहीं बताया । मतलब सेक्स वाली बात नहीं बतायी । "

मैं : " ओह ! तो ये बात है इसका मतलब मेरे पास सिर्फ आज की रात है । "

स्नेहा दीदी चौंकी और मेरी तरफ देखते हुए बोली , " मतलब क्या है तेरा ? "

मैं : " मतलब कि जितना प्यार करना है आज रात ही करना पड़ेगा । फिर माँ के आ जाने के बाद पता नहीं कब मौका मिले । "

दीदी : " ऐसा कुछ नहीं होगा समझे । मत भूल हमारे बीच क्या रिश्ता है । "

मैं : " ओहो छोडो न दी ! अब रिश्ता क्यों याद आ रहा है ? पहले रिश्ता कहाँ था ? "

दीदी : " देख मैंने जो कुछ किया वो तेरे transformation के लिए किया । कोई लड़की ही ये काम कर सकती थी , पर हम ये लड़की कहाँ से लाते ? इसलिए मैंने ही ये ज़िम्मेदारी ली ।

और अब तू ठीक हो गया है तो तू अपने लिए कोई अच्छी सी लड़की ढूंढ और मैं अपने लिए कोई अच्छा सा लड़का देखती हूँ । "

स्नेहा दीदी की बातें सुनने के बाद मुझे बहुत बुरा फील हो रहा था और गुस्सा भी आ रहा था । मैं गुस्से में खाना छोड़ कर उठा और अपने रूम में आ गया दीदी पीछे से आवाज़ देती रह गयी ।

थोड़ी देर बाद जैसा की मैंने सोचा था स्नेहा दीदी मेरे रूम में आयी और मुझे बेड पर उदास लेटा हुआ देख कर बोली , “ खाना क्यों छोड़ आया बीच में ? चल उठ खाना खत्म कर । ”

मैं गुस्से में बोला , " तुम जाओ दी । मुझे अब भूख नहीं है ।"

दीदी : " देख समू ! बचपना छोड़ और चल खाना खा ले ।"

मैं : " मैंने कहा न दीदी मुझे नहीं खाना है । आप जाओ यहाँ से । "

पर दीदी वहीँ मेरे बेड पर ही बैठ गयी ।

दीदी बोली , " देख समू प्लीज मेरी बात समझ । जैसा तू चाहता है वैसा possible नहीं है । हम दोनों एक दूसरे के लिए नहीं बने हैं । "

मैं : " हो सकता है दी हम एक दूसरे के लिए न बने हो । पर मेरी भी एक बात आप कान खोल कर सुन लो । मैं प्यार करने लगा हूँ आपसे । मेरे mind में जो पिक्चर है वो आपकी है ।

 
मुझे आपको ही देखकर excitement होता है । मैं आपकी जगह किसी और को imagine नहीं कर सकता । मुझे आपके साथ रहने से ख़ुशी मिलती है और सुबह से तो मेरा मन कर रहा है कि मैं बस आपको ही देखता रहूं । आगे मेरा क्या होगा मैं भी नहीं जानता । इसीलिए प्लीज आप ज़िद न करो और मुझे अकेला छोड़ दो । "

स्नेहा दीदी कुछ देर तक वैसे ही मेरे पास बैठी रही और एकटक मेरी ही तरफ देखती रही । शायद उन्हें भी कुछ समझ नहीं आ रहा था । फिर दीदी उठ कर अपने रूम में चली गयी और मैं दीदी के बारे में ही सोचता सोचता सो गया ।

सुबह स्नेहा दीदी ने मुझे आकर जगाया और कहा कि माँ आ रही है तो मैं स्टेशन जाकर उन्हें ले आऊं ।

मैंने स्टेशन से माँ को रिसीव किया और उन्हें घर पर छोड़कर बिना कुछ खाये ही ऑफिस चला गया ।

माँ ने दीदी से मेरी बेरुखी का कारण पूछा तो दीदी ने कुछ बहाना बना दिया ।

मैंने दीदी से बात करना लगभग बन्द ही कर दिया था , बस कुछ ज़रूरी काम की ही बात होती थी । पर दीदी का रूप और यौवन तो मेरे अंदर तक बस चुका था । उसे निकालना मेरे लिए बहुत मुश्किल था ।

मुझे जब भी मौका मिलता मैं दीदी से नज़र बचा कर उनके हुस्न का दीदार कर लिया करता था ।

माँ से भी पहले की तुलना में अब मैं कम ही बात कर पाता था । मेरी सेक्स लाइफ की तो जैसे बैंड ही बज चुकी थी ।

सुन्दर से सुन्दर लड़की मुझे नहीं भाती थी और लड़कों में अब कोई इंटरेस्ट नहीं आता था ।

ऐसे ही चलते चलते करीब 3 महीने गुज़र चुके थे और इन 3 महीनों में ना तो दीदी ने ही कभी मुझसे बात करने की पहल की और ना मैंने ही कोई पहल की ।

एक दिन माँ मेरे कमरे में आयी और मुझसे बोली , “ तेरी स्नेहा दीदी ने एक लड़का पसंद किया है । उसके बैंक में ही काम करता है ।

तू एक बार उसे मिल ले और उसके घर बार की जानकारी पता कर । सब कुछ ठीकठाक रहा तो अगले महीने स्नेहा की शादी कर देंगे । आया समझ में ? ”

मैंने कहा , " हाँ माँ ठीक है । मुझे उसका नाम पता बता देना । मैं देख लूंगा ।”

माँ बोली , “ हाँ वो मैं तुझे सुबह दे दूंगी । तू भी अपने लिए कोई लड़की ढूंढ जल्दी । स्नेहा चली जायेगी तो इस बुढ़ापे में मुझसे तेरी सेवा नहीं होगी , समझ रहा है ना । ”

मैं बोला , " हाँ ठीक है , देखता हूँ । ”

मैंने माँ को टालने के लिए ऐसा बोला था । जबकि हकीकत तो ये थी स्नेहा दीदी के अलावा मेरे दिल में और किसी के लिये जगह थी ही नहीं ।

माँ के मुंह से स्नेहा दीदी की शादी की बात सुन कर मुझे ज़रा भी शॉक नहीं लगा था क्यूंकि खुद दीदी ने पहले ही कह दिया था कि हम दोनों को अपने लिये साथी ढूँढ लेने चाहिये ।

मैं दीदी को दिल से खुश देखना चाहता था । इसीलिए सोचा कि चलो देखते हैं , कौन लड़का है , जो दीदी को पसंद है ।

अगले दिन मैंने अपने ऑफिस से 3 दिन की छुट्टी ली और माँ द्वारा बताये लड़के की छान बीन शुरू कर दी ।

दीदी के ऑफिस में एक चपरासी पहले मेरे ही बैंक में था । मैंने उसे बुलाया और जानकारी हासिल की । जो कुछ उसने मुझे बताया वो चौंकाने वाला था ।

असल में दीदी का लगभग 1 साल से उस लड़के के साथ अफेयर था और सारे बैंक में दबी जुबान में इसकी चर्चा थी ।

मुझे समझते देर न लगी कि दीदी क्यों मेरा जल्द से जल्द ट्रीटमेंट करना चाहती थी और उसके लिये कोई भी कीमत चुकाने को क्यों तैयार थी ।

असल में गलती दीदी की नहीं थी उनकी उम्र ही शादी की हो रही थी । घर में एक गे भाई और बूढ़ी माँ को किस के सहारे छोड़ के जाती ।

इसीलिए दीदी द्वारा उठाये गए कदम के बारे में सोचकर ही मेरी आँखें भर आयी । शादी करके घर छोड़ कर जाने से पहले ,

उन्होंने मुझे ठीक करने के लिये extreme step उठा लिया और अपना कौमार्य पति के बजाये मुझे यानी अपने छोटे भाई को सौंप दिया ।

कितना बड़ा त्याग किया था उन्होंने और एक मैं था जो सिर्फ अपने बारे में ही सोच रहा था ।

अगले दिन मैं सुबह सुबह तैयार होकर उस लड़के के गांव के लिए निकल गया जो कि हमारे शहर से कोई 150 km की दूरी पर था ।

गांव पहुंच कर जो जानकारी मुझे मिली उसने मुझे ऊपर से नीचे तक हिला के रख दिया । वो लड़का तो पहले से ही शादी शुदा था

और 2 साल की एक बेटी का बाप भी था । वापसी में मैं ये तय कर चुका था कि चाहे जो हो जाये पर मैं दीदी को ये शादी तो हरगिज़

नहीं करने दूंगा । घर आते आते मुझे रात हो गयी थी लेकिन मैंने किसी को कुछ नहीं बताया कि मैं कहाँ से आ रहा हूँ ।

माँ ने पूछा पर मैंने बहाना बना दिया कि बैंक के ही काम से कहीं गया था ।

दूसरे दिन सुबह मैं स्नेहा दीदी के कमरे में गया और उनसे कहा , “ दीदी आज मैं उस लड़के से मिलना चाहता हूँ । कितने बजे आऊं ? ”

दीदी के चेहरे पर एक मुस्कान तैर गयी । वो बोली , “ लंच टाइम में आ जाना ।”

मैंने कहा , “ नहीं , मैं ऑफिस खत्म होने के बाद ही आ पाऊँगा ।”

दीदी बोली ," ठीक है । कहाँ मिलना है ? "

मैंने कहा , " वो जो आपके ऑफिस के पास पार्क है । वहीँ मिलते हैं शाम को 5 बजे । "

दीदी : " ठीक है । "

मैंने जानबूझकर दीदी को शाम का टाइम इसीलिए दिया था कि सारी हकीकत जानने के बाद दीदी वापस ऑफिस नहीं जा पायेगी ।

और हो सकता है दीदी या वो लड़का कुछ हंगामा खड़ा कर दे तो उस पार्क में ना के बराबर लोगों के होने के कारण ज़्यादा तमाशा नहीं बनेगा ।

शाम को ठीक 5 बजे मैं पार्क के गेट पर पहुँच गया और दीदी का इंतज़ार करने लगा । करीब 10 मिनट बाद दीदी उस लड़के के साथ वहां आयी

वो लड़का देखने में साधारण सा ही था । मुझे तो उसमें कुछ भी ऐसा नहीं लगा कि दीदी को ये ही क्यों पसंद आया । दीदी ने आते ही मेरा उससे

परिचय कराया, “ राजन से मिलो और राजन, ये मेरा भाई समीर है “ ।

हालाँकि मुझे उसके परिचय की कोई ज़रुरत नहीं थी । क्यूंकि मैं तो उसकी

पूरी कुंडली ही पढ़ चुका था और उसके चेहरे से नकाब हटाने ही वहां आया था ।

हम तीनो पार्क के अंदर चले गए और एक कोने में खड़े हो गये ।

मैंने ही उससे पहला सवाल किया ," तो कब तक शादी का इरादा है आपका ? "

राजन बोला ," बस मेरा प्रमोशन due है , जैसे ही लेटर मिल जायेगा । उसके कुछ दिन बाद ही हम शादी कर लेंगे । "

मैं : " आप कहाँ के रहने वाले हो ? "

राजन : " यहाँ से 150 km दूर एक गांव है मीरपुर , वहीँ से हूँ । "

मैं : " आपके घर में कौन कौन है ? "

राजन : " मम्मी , पापा और एक छोटा भाई है ।"

दीदी चुपचाप खड़ी हमारी बातें सुन रही थी । कभी नज़रें झुकाये जमीन की तरफ देख रही थी , कभी हम दोनों की तरफ देख रही थी ।

उसके चेहरे पर हलकी मुस्कान भी थी । शायद शादी की तैयारियों और शादी के बाद की लाइफ के सपने उसके मन में तैर रहे होंगे ।

मैंने फिर सवाल किया , " और आपके बीवी बच्चों का क्या ? "

राजन चौंका , दीदी ने भी चौंक कर मेरी तरफ देखा ।

राजन हकबकाया , " क्या ? क्या कहा तुमने ? "

मैंने अपना सवाल फिर दोहराया , " आपने अपने बीवी बच्चों के बारे में नहीं बताया ? "

राजन गुस्से में बोला , " मेरे कोई बीवी बच्चे नहीं हैं । "

मैं : " अच्छा ! तो फिर ये लोग कौन हैं ? "

मैंने अपना फ़ोन निकला और उसमें एक फोटो निकालकर राजन के चेहरे के सामने कर दिया ।

राजन ने फोटो पर सिर्फ निगाह डाली और अपना मुंह फेर लिया और बोला मुझे नहीं मालूम ।

दीदी ने मेरे हाथ से फ़ोन छीन लिया और एक एक फोटो को उत्सुकता से देखने लगी ।

वो फोटो राजन की शादी के थे । जब मैं उसके गांव गया था तो मैंने उसके घरवालों से कहा कि राशन कार्ड अपडेट करने के लिए उसकी बीवी के साथ फोटो चाहिये ।

जब उन्होंने उसकी शादी का एल्बम दिखाया तो मैंने अपने फ़ोन से कुछ फोटो खींच ली थी ।

 
अब स्नेहा दीदी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी । उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या चल रहा है ।

दीदी : " समीर , ये सब क्या है ? तुम्हें कहाँ से मिली ये फोटोज ? "

मैंने दीदी की तरफ देखा और बोला, " दीदी , आय ऍम सॉरी ! लेकिन ये आदमी फ्रॉड है । इसकी पहले से ही शादी हो चुकी है और एक 2 साल की बेटी भी है ।

मैं कल इसके गांव गया था वहीँ से ये सब जानकारी लेकर आया हूँ । आगे आप खुद इससे पूछ लो । "

और मैं थोड़ी दूर जाकर एक बेंच पर बैठ गया ।

मैं जहाँ बैठा था वहां से उन्हें सिर्फ देख सकता था , बातें साफ़ साफ़ नहीं सुनाई नहीं दे रही थी ।

दीदी ने राजन से कई सवाल किये , उनकी आँखों में आंसू थे और चेहरे पर गुस्सा ।

राजन ने कुछ जवाब दिया तो दीदी ने उसका कॉलर पकड़ के झंझोड़ दिया । राजन ने गुस्से में दीदी के हाथों को अपने कॉलर से झटक दिया ।

पर दीदी ने फिर से उसके कॉलर को पकड़ लिया और शायद उसे कुछ गालियां देने लगी ।

राजन ने दोबारा से दीदी का हाथ पकड़ कर ज़ोर से झटका और पीछे को धकेल दिया तो दीदी नीचे गिर पड़ी ।

अब मुझसे रहा नहीं गया । मैं उठा और राजन को पीछे से हाथ पकड़ कर खींचा और एक ज़ोरदार थप्पड़ उसके गाल पर दे मारा ।

वो लड़खड़ा के दो चार कदम पीछे हो गया , फिर मुझे गालियां बकने लगा।

मैंने दीदी को कंधो से पकड़ कर उठाया तो दीदी ज़ोर ज़ोर से मेरे सीने में अपना मुंह छुपा कर रोने लगी ।

मैंने राजन को चेतावनी दी , " साले , अब अगर तू मेरी दीदी के आस पास भी दिखा ना , तो मैं तेरी हड्डी पसली एक कर दूंगा ।"

राजन मुझे देख लेने की धमकी देता हुआ पार्क से बाहर चला गया ।

मैं दीदी को लेकर बेंच पर बैठ गया और काफी देर तक उन्हें दिलासा देता रहा । उनके बालों को सहलाता रहा जोकि अब लम्बे होकर उनके कंधे तक हो गये थे ।

काफी देर तक मैं दीदी को समझाता रहा और दीदी रोती रही । बड़ी मुश्किल से दीदी के आंसू बंद हुए और मेरी तरफ देखते हुए बोली , “ थैंक्स समू ! ”

मैंने कहा , “ इट्स ओके दी ! मैं हमेशा आपके साथ हूँ, हमेशा ! ”

फिर दीदी बोली ," इस आदमी पर मैंने कितना विश्वास किया था और इसने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा किया । "

कहते कहते दीदी फिर रो पड़ी ।

मैंने उनके आंसू पोंछते हुए कहा , “ अब छोडो ना दीदी ! ऐसे बेकार लोगों के लिए क्यों अपनी आँखों के मोती गंवाती हो ।”

दीदी मेरी बात सुन कर कुछ नार्मल हुई ।

पार्क में बैठे बैठे हमें अँधेरा हो चुका था ।

मैंने कहा , “ अब घर चलें या यहीं पार्क में मच्छरों से कटवाओगी ? ”

दीदी के चेहरे पर हलकी से एक मुस्कान आयी और बेंच से उठते हुए बोली , “ चलो , चलते हैं ।”

दीदी को मुस्कुराता देख मैंने कहा , “ ये हुई ना बात , देखो तो हँसते हुए कितनी प्यारी लगती हो ।”

दीदी ने प्यार से मेरे कंधे पर एक हाथ मारा और मेरा हाथ पकड़ के अपना सर मेरे कंधे से टिका कर चलने लगी ।

मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे मुझे मेरी प्यारी दी वापस मिल गयी हो । मैं अंदर ही अंदर बहुत खुश था पर दीदी का दिल यूँ टूटने का अफ़सोस भी था ।

घर आकर दीदी ने माँ को सब कुछ बता दिया पहले तो माँ बहुत उदास हुई । फिर इस बात की उसे ख़ुशी हुई कि जल्द ही सच्चाई सामने आ गयी ।

मैंने खाना खाया और अपने कमरे में आ गया । और अपने लैपटॉप पर नेट सर्फिंग करने लगा । दीदी किचन का काम निबटा रही थी और माँ अपने कमरे में सोने चली गयी थी ।

मैं भी 1 घंटे तक नेट सर्फिंग के बाद सोने ही जा रहा था तभी दीदी मेरे कमरे में आयी।

दीदी : " समू , सो गया क्या ? "

मैं : " नहीं दी , बस सोने ही जा रहा था । अब आप ठीक तो हो ना । "

दीदी :" हम्म …बस ठीक हूँ । "

मैं : " मैं समझ सकता हूँ दी , आपके ऊपर क्या बीत रही होगी । दिल टूटने के दर्द का अहसास है मुझे । "

दीदी मुस्कुरायी : " अच्छा किस लड़की ने तोड़ा दिल तेरा , बता मुझे ? "

मैं : " है एक लड़की । तुम उसे अच्छे से जानती हो । "

और दीदी को जब अहसास हुआ कि मैं उनकी ही बात कर रहा हूँ तो उनके चेहरे के भाव बदल गए और वो एकदम से सीरियस हो गयी ।

मैंने उनका हाथ पकड़ कर अपने पास बैठाते हुए कहा , ” खैर छोडो दी उस लड़की को । आप अपनी बताओ ।”

दीदी धीमे स्वर में बोली ," तू अब भी उस लड़की से प्यार करता है ? "

मैंने उनकी आँखों में आँखें डाल कर कहा , “ हाँ दी !! और मरते दम तक करता रहूँगा ।”

स्नेहा दीदी थोड़ी देर खामोश रही और कमरे के एक कोने को घूरती रही । फिर दीदी की आँखों से झर झर आंसू बहने लगे ।

मैंने अपने हाथ से उनके आंसू पोछते हुए कहा , “अरे ये क्या ! लगता है मैंने अपनी प्यारी दीदी को फिर रुला दिया ।”

स्नेहा दीदी एक गहरी सांस लेते हुए बोली , ” नहीं रे पगले इसमें तेरा कोई कसूर नहीं । ये तो सब किस्मत का कसूर है । ”

वो आगे बोली , ” अजीब ही दस्तूर हैं ज़माने के । जिसे चाहो वो मिलता नहीं और जो तुम्हें चाहे उसे अपना नहीं सकते । ये कैसे रस्म - ओ - रिवाज़ हैं ।”

मैंने जवाब दिया , ” दी ! अगर ख़ुशी चाहिए तो ये रस्म - ओ - रिवाज़ों को तोड़ डालो ।”

दीदी ने चौंक कर मेरी तरफ देखा ।

मैंने आगे कहा , ” यहाँ किसे तुम्हारी परवाह है जो तुम ज़माने की परवाह करती हो ।अपनी खुशियों की बलि चढाती हो , किस के लिए ।

सच तो ये है दी कि ज़माने की दुहाई देकर हम अपनी खुशियों का गला खुद ही घोंट रहे हैं ।”

दीदी मेरी बात से थोड़ी संतुष्ट सी नज़र आने लगी थी ।

 


दीदी बोली , “ शायद तू ठीक कह रहा है ।…anyway.... चल बहुत रात हो गयी है , अब तू सो जा । गुड़ नाईट ।”

और दीदी बेड से उठ कर जाने लगी ।

मैंने उनका हाथ पकड़ा और वापस बेड पर बैठाते हुए बोला , ” दीदी एक बात बोलूं ? प्लीज बुरा तो नहीं मानोगी ।”

दीदी बोली , ” बोल ना , क्या बात है ? ”

मैं : " प्लीज ! आज मेरे साथ यहीं पर सो जाओ ना । "

दीदी ने चौंक कर मेरी तरफ देखा और मेरी आँखों में मिन्नत का भाव देख कर बोली , ” ठीक है ! पर कुछ गड़बड़ नहीं करना ।”

मैं खुश होते हुए बोला , ” प्रॉमिस दी ! कुछ गड़बड़ नहीं होगी ।”

और दीदी वहीँ मेरी बगल में लेट गयी ।

मैंने उनका सर उठा कर अपने सीने पर रख लिया और उनके बालों में उंगलियां फिराने लगा ।

मैं : " दीदी प्लीज ! उदासी छोड़ो । उस कमीने के लिये और आंसू बहाने की ज़रूरत नहीं है । मैं आपके लिए बहुत अच्छा लड़का ढूंढूंगा ।

जो आपको बहुत बहुत प्यार करेगा और आपका बहुत ख्याल रखेगा । "

दीदी मेरी बातें सुन कर मुस्कुरा दी और मेरे माथे पर चुम्बन लेकर फिर से मेरे सीने पर सर रख के लेट गयी ।

मैंने भी दीदी के सर पर किस किया और बोला, ” दी प्रॉमिस करो । अब आप कभी नहीं रोयेंगी ।”

दीदी ने अपने हाथ से मेरा सीना सहलाते हुए कहा , “ अगर तू मेरा ऐसे ही ख्याल रखेगा तो कभी नहीं रोऊँगी । आई प्रॉमिस !! ”

हम ऐसे ही काफी रात तक बातें करते रहे और मैं दीदी की पीठ , गरदन , बालों और गालों को धीरे धीरे सहलाता रहा और कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला ।

अगले दिन मैंने देखा दीदी ऑफिस जाने के लिये तैयार ही नहीं हुई है । तो मैं दीदी के पास गया और पूछा , ” दी क्या बात है ? आज ऑफिस नहीं जाना क्या ? ”

दीदी ने थोड़ा उदास होते हुए कहा , “ मेरा मन नहीं हो रहा था तो मैंने 4 दिन की छुट्टी ले ली है। वैसे भी वहां उस कमीने राजन की शकल देखने से तो अच्छा है , मैं कुछ दिन घर पर आराम करूँ ।”

मैं : ” idea तो अच्छा है दी । पर उसे भी कब तक avoid करोगी। एक ना एक दिन तो सामना करना ही पड़ेगा ।”

दीदी : “ तब का तब देखा जाएगा । फिलहाल तो मेरा ऑफिस जाने का मूड नहीं है ।”

मैं : “ ok as u wish…चलो मैं तो ऑफिस निकलता हूँ , देर हो रही है । bye ”

दीदी : bye

आज ऑफिस में काम करने में मेरा बिलकुल मन नहीं लग रहा था । बस मन कर रहा था कि जल्दी से छुट्टी हो और दीदी के सामने पहुँच जाऊं ।

मुझे बार बार दीदी का ही ख्याल आ रहा था । मैं तरह तरह के दीदी के साथ वक्त गुजारने के बहाने खोज रहा था ।

अचानक मेरे दिमाग में एक आईडिया आया , क्यों न मैं दीदी को कहीं घुमाने ले जाऊं । दीदी का मन भी बहल जायेगा और मुझे भी दीदी का भरपूर साथ मिलेगा ।

मैंने ऑफिस से 3 दिन की छुट्टी ले ली ।

रात को खाना खाते वक्त मैंने माँ से कहा , " माँ , चलो मैं तुम लोगों को कहीं घुमा के लाता हूँ । ”

माँ चौंकते हुए बोली , “ ये तुझे क्या हुआ । पहले तो कभी तूने हमें घुमाने का नहीं सोचा ।”

मैं : " ओहो माँ ! पहले नहीं सोचा तो अब तो बोल रहा हूँ । अब चलो । "

माँ : " देख बेटा , मुझे तो कहीं नहीं घूमना इस बुढ़ापे में । तुम दोनों चाहो तो चले जाओ ।"

मैंने दीदी की तरफ देखा और पूछा , " तो बताओ दीदी कहाँ चलना है ? "

दीदी : " मेरा मन नहीं है , तू अकेला ही चला जा । "

माँ : " ओहो ! अब तू भी मत जा , बेचारा कितना खुश होकर बोल रहा था ।"

मैं : " ठीक है न माँ । किसी को नहीं जाना तो ज़बरदस्ती थोड़े ही है ।"

और मैं गुस्से में उठ कर अपने रूम में आ गया ।

दीदी दौड़ी दौड़ी मेरे पीछे आयी और मुझे पीछे से आलिंगन में भरते हुए बोली ," ओके बाबा , आय एम सॉरी !

मैं तो यूँ ही तुझे चिढ़ाने के लिये बोल रही थी । बता ना कहाँ चलना है । ”

मैं खुश होते हुए बोला , ” मनाली चलते हैं । यहाँ से ज़्यादा दूर भी नहीं और जगह भी अच्छी है ।”

दीदी : " ठीक है । कब चलना है ? "

मैं : " सुबह सुबह निकलते हैं । आप अपना सामान पैक कर लो । कुछ गरम कपडे ज़रूर रख लेना । "

दीदी ने मेरे गाल पर एक चुम्बन लिया और “ ठीक है " कह कर चली गयी ।

हम अगली सुबह मनाली के लिए निकल पड़े और 3 दिन तक वहां रहे । हमने मनाली में बहुत मस्ती की , खूब शॉपिंग की । स्नेहा दीदी मनाली आकर बहुत खुश हुई और मुझे उन्हें खुश देख कर बहुत अच्छा लग रहा था । हम दोनों एक ही रूम में रुके और रात को एक दूसरे के आलिंगन में ही सोते थे । पर सेक्स जैसी कोई बात हमारे बीच नहीं हुई । मैं ये निश्चय कर चुका था कि स्नेहा दीदी मेरे प्यार को खुद कबूल करेगी तो ठीक , नहीं तो अब अपनी तरफ से कोई पहल नहीं करूँगा ।

मनाली से वापस आने के बाद स्नेहा दीदी बहुत खिली खिली सी रहने लगी थी और मैं भी दीदी की छोटी छोटी ज़रूरतों का ख्याल रखने लगा था । जैसे जैसे समय गुज़र रहा था दीदी के प्रति मेरा प्यार और गहरा होता जा रहा था पर वक्त को शायद ये मंज़ूर नहीं था ।

 


एक दिन माँ ने मुझे बुला कर कहा , “ देख समू ! बहुत हुई मस्ती , अब कुछ आगे का सोचो । या तो अपने लिए कोई लड़की ढूँढ या फिर दीदी के लिए कोई लड़का । किसी एक की शादी तो देख के जाऊँ मैं , अब मेरी उम्र का क्या भरोसा । "

मैंने माँ को आश्वासन दिया कि दीदी के लिये जल्दी ही मैं कोई लड़का ढूंढ़ता हूँ ।

कुछ दिन बाद , डिनर करते हुए मैंने मज़ाक में यूँ ही दीदी को चिढ़ाने के लिये कहा, “ माँ ! एक लड़का देखा है ।”

माँ ने उत्सुकता से पूछा , ” अच्छा कौन है , क्या करता है ? ”

मैंने स्नेहा दीदी की ओर देखा तो दीदी के चेहरे को अजीब सी उदासी ने घेर लिया था ।

मैंने माँ के सवाल का जवाब दिया , “ है एक लड़का । मेरे बैंक में एक साथी का रिश्तेदार है ।”

माँ ने खुश होते हुए पूछा , “ अच्छा करता क्या है ? तू बात आगे बढ़ा ।”

मैं : " अभी ज़्यादा कुछ मालूम नहीं है । पर मैं पता करता हूँ , फिर आपको बताऊंगा । "

माँ बोली , " हाँ ठीक है । जल्दी पता कर के बताना ।"

मैंने हामी में गरदन हिलायी और स्नेहा दीदी की तरफ देखा । दीदी अपना खाना खत्म कर चुकी थी ओर थोड़ी नाराज़ सी लग रही थी । उन्होंने मुझे घूर के देखा ओर उठ कर किचन में चली गयी ।

मेरी कुछ समझ नहीं आया , मैं भी उठ के अपने रूम में आ गया ओर माँ भी अपने कमरे की ओर चली गयी ।

करीब डेढ़ घंटे बाद दीदी मेरे कमरे में आयी , तब तक मैं सो चुका था ।

उन्होंने मुझे जगाया , “ समू ! समू ! ”

मैं हड़बड़ा के उठा और स्नेहा दीदी को देख कर चौंकते हुए बोला , “ दी ! क्या हुआ ? ”

दीदी मेरे बेड पर बैठते हुए बोली , “ तुझसे बात करनी है ।”

मैं : " क्या बात है बोलो ? "

दीदी : " कौन लड़का है ?"

मैं : " कौन ?"

दीदी : "वही जिसकी बात तू , माँ से कर रहा था ।"

मैं : “ अरे वो ! मेरे एक साथी का रिश्तेदार है । ”

दीदी : " देख समू ! मैं अभी शादी नहीं करना चाहती ।"

मुझे अचानक जैसे झटका लगा , “ क्या ? शादी नहीं करना चाहती ? पर क्यों ? "

दीदी : " वो …वो … बात ये है की मेरा अभी मन नहीं है शादी का ।"

मैं : " पर दीदी , मैं भी तो वही पूछ रहा हूँ । मन क्यों नहीं है ? कोई तो वजह होगी ? ”

दीदी : " मुझे नहीं पता । बस अब मेरा मन नहीं है और मेरे लिये लड़का देखने की कोई ज़रूरत नहीं है ।"

मैं : " पर पहले तो आप ....................दीदी मुझे नहीं समझ आ रहा , आखिर आप ऐसा क्यों बोल रही हो ? "

दीदी : " मैंने बताया ना , बस मेरा मन नहीं है ।"

मैं : " या फिर कोई और बात है जो आप मुझसे छुपा रही हो ? "

स्नेहा दीदी थोड़ी देर चुप रही फिर बोली , " नहीं और कोई बात नहीं है ।"

मैं : " कहीं ऐसा तो नहीं कि राजन को अभी आप भूल नहीं पा रही हो ।"

दीदी अचानक गुस्सा होते हुए बोली , “ उस कमीने की बात मत करो । मेरे दिल में उसके लिए सिर्फ नफ़रत है ।”

मैं : " ओके ! ओके ! दीदी शांत हो जाओ ।"

दीदी कुछ नार्मल हुई तो मैंने फिर पूछा , “ दी पक्का कोई और बात नहीं है ? ”

दीदी फिर कुछ देर के लिए खामोश हो गयी और फिर धीमे से स्वर में बोली , “ नहीं कोई और बात नहीं है । बस तुम लोगों को छोड़ कर जाने का मेरा मन नहीं हो रहा ।”

मैंने प्यार से स्नेहा दीदी के सर के बालों को सहलाया और बोला , “ दीदी मन तो हमारा भी नहीं है तुम्हें खुद से अलग करने का । पर याद है ना मैंने पहले कहा था कि ज़माने का यही दस्तूर है । ”

दीदी फिर थोड़ा सा नाराज़ होते हुए बोली , “ भाड़ में जाये ज़माना । ”

मैं : " वो सब तो ठीक है दी , पर माँ को क्या कहोगी ? "

दीदी : " मैं माँ को भी समझा लूँगी । "

मैं : " ठीक है फिर , जैसे आपकी मर्ज़ी । मैं आगे से कोई लड़का नहीं देखूंगा , सब कैंसिल । ”

स्नेहा दीदी के चेहरे पर थोड़ी सी चमक आयी और वो बेड से उठते हुए बोली , “ ओके ! तुम सो जाओ , अब मैं चलती हूँ ।” और दीदी मुड़ कर जाने लगी ।

मैंने पीछे से दीदी को टोका “ दीदी !! ”

दीदी के कदम रुक गए वो पलटी और मुझसे पूछा , “ हैं ? ”

मैंने अपने बेड पर लेटे लेटे कहा , “ अगर प्यार है तो छुपाती क्यों हो ? खुल कर बोलती क्यों नहीं ? ”

स्नेहा दीदी का चेहरा शर्म से झुक गया और वो मुझे “गुड़ नाईट ” बोलकर पलट कर कमरे से बाहर चली गयी ।

कुछ दिन बाद , एक सुबह माँ मेरे कमरे में आयी । मैं ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था ।

माँ : " समू , तेरी मौसी के देवर की बेटी की शादी है , उनका फ़ोन आया था । उन्होंने हम सब को वहां बुलाया है । "

मैं : " माँ आपको जाना है तो आप दीदी को साथ ले जाओ । मैं छुट्टी नहीं ले सकता , पहले ही बहुत छुट्टियां हो चुकी हैं । "

माँ : " मुझे पता था मेरे साथ कोई नहीं जाएगा । चल कम से कम मुझे ट्रेन में तो बैठा सकता है या उतना भी टाइम नहीं है तेरे पास । "

मैं : " ओहो माँ कैसी बात कर रही हो । कब जाना है आपको ? "

माँ : " अभी 10 बजे की ट्रेन है और तू बस मुझे ट्रेन में बैठा दे । वहां तो कोई ना कोई मुझे लेने आ ही जायेगा ।"

मैं : " ठीक है माँ । चलो आपका सामान कहाँ है ? मैं आज ऑफिस थोड़ा लेट चला जाऊंगा । "

माँ : " तू चल पहले नाश्ता कर ले । मैं अपना सामान लेकर आती हूँ । "

नाश्ता करने के बाद मैंने स्नेहा दीदी की तारीफ की , “ वाह दीदी क्या परांठे बनाये हैं । कसम से मज़ा आ गया ।”

दीदी मुस्कुराते हुए बोली , " चल झूठे ! ऐसे तो मैं हमेशा ही बनाती हूँ ।"

मैं : " हाँ पर आज आपकी मुस्कान ने इसे और भी टेस्टी बना दिया ।"

दीदी हँसते हुए किचन में चली गयी और माँ अपना सामान लेकर कमरे से बाहर आ गयी । मैं माँ को स्टेशन छोड़ने चल दिया ।

 
ट्रेन आने में अभी वक्त था तो मैंने सोचा क्यों न स्नेहा दीदी को थोड़ा परेशान किया जाये । मैंने दीदी को मैसेज किया , “ दी ! आखिर कब तक अपने दिल के हाल को यूँ ही छुपाओगी ।”

थोड़ी देर बाद दीदी का रिप्लाई मिला , “ मेरे दिल का हाल ठीक है , तुम अपनी चिंता करो ।”

मैंने फिर टाइप किया , “ मेरे दिल का हाल तो तुम्हें पता है पर अपने दिल का हाल तुमने अभी तक नहीं बताया । शायद ज़माने से अभी भी डरती हो तुम ।”

दीदी : “ ज़माना जाये भाड़ में , मुझे किसी का कोई डर नहीं ।”

मैं : “ तो फिर कहती क्यों नहीं ।”

दीदी : “ क्या ? ”

मैं : “ वही जो तुम कहना चाहती हो पर कह नहीं पा रही हो ।”

दीदी : “ ऐसा कुछ भी नहीं है , सब तुम्हारा वहम है । ”

मैं : “ ओके ठीक है दी । फिर मैं भी माँ के साथ जा रहा हूँ , माँ के साथ ही वापस आऊंगा । बाई एंड टेक केयर ।”

दीदी : “ पागल हो क्या ! तुम कहीं नहीं जाओगे । चुपचाप ऑफिस जाओ और फिर घर आओ ।”

मैं : “ सॉरी दी ! पर माँ बहुत ज़िद कर रही है , इसलिए जाना ही पड़ेगा । टेक केयर ।”

दीदी : “ ठीक है जाओ , पर मुझसे बात नहीं करना ।”

मैंने मैसेज पढ़ा ही था कि दीदी की कॉल आ गयी , मैंने कॉल कट कर दी ।

तभी ट्रेन भी आ गयी और मैंने माँ को सीट पर बैठा दिया ।

मैं ऑफिस पहुंचा तो देखा मेरे मोबाइल में स्नेहा दीदी की 11 मिस कॉल्स थी ।

मैंने थोड़ा सा दीदी को और सताना शुरू किया और मैसेज किया , " दी क्या बात है । आप तो बोल रही थी की आप बात नहीं करोगी । फिर कॉल क्यों कर रही हो ? ”

दीदी का रिप्लाई आया , “ देख समू प्लीज ! माँ के साथ मत जाना । मैं घर में अकेली बोर हो जाऊँगी ।”

मैं : “ ठीक है नहीं जाऊँगा पर पहले आप खुल कर कहो जो आपके दिल में है ।”

दीदी : “ मुझे नहीं पता मेरे दिल में क्या है और जो है , तू सब समझता है ।”

मैं : “ दी जबतक आप कहोगी नहीं , मुझे कैसे पता चलेगा की आपके दिल में क्या है ।”

दीदी : “ क्या सुनना चाहता है तू । प्लीज साफ़ साफ़ बता ना ।”

मैं : “ कम ऑन दी । बहुत हुआ ये नाटक । अब खुल कर बोलो नहीं तो मैं जा रहा हूँ । ट्रेन आ गयी है और ये मेरा लास्ट मैसेज है । ”

स्नेहा दीदी का तुरंत रिप्लाई आया , “ ok…wait…I LOVE YOU…samu plz don’t go .”

वो तीन शब्द मेरी ज़िन्दगी के सबसे ख़ूबसूरत शब्द थे । मैं बार बार उन्हें पढ़ता रहा ।

तभी दीदी का एक और मैसेज आया , “ अब खुश ? अब तो नहीं जाओगे ना ? "

मैंने रिप्लाई किया , “ नहीं दी अब सारी ज़िन्दगी आपको छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा …..। LOVE U TOO…शाम को घर पर मिलते हैं ।”

ऑफिस में टाइम कैसे कटा ये तो बस भगवान ही जानता है । मैं जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता था । शाम को 5 बजे जब मैं घर पहुंचा तो स्नेहा दीदी ने एक बड़ी ही प्यारी स्माइल के साथ दरवाज़ा खोला । दीदी अपने बैंक से मुझसे पहले घर आ जाती थी ।

मैंने गेट बंद किया और दीदी को अपनी बांहों में भर कर गोद में उठा लिया ।

दीदी हँसते हुए बोली , “ क्या कर रहा है मुझे नीचे उतार मैं गिर जाऊँगी ।”

मैं : "दी ! अब बस बहुत हो गया । अब तुम हमेशा ही इन बांहों की कैद में रहोगी ।"

दीदी बोली ," अच्छा इतना प्यार करता है तू मुझसे ।"

मैं : " हाँ दी ! अपनी जान से भी ज़्यादा ! "

दीदी ने ये सुनते ही अपनी बांहें मेरी गर्दन में डाल दीं ।

मैं स्नेहा दीदी को ऐसे ही गोद में उठाये ड्राइंग रूम में ले गया और दीदी को सोफे पर बैठा दिया । और दीदी की गोद में सर रख कर फर्श पर बैठ गया । दीदी मेरे बालों में अपनी उंगलियां फिराने लगी । मुझे बहुत ही सुखद अहसास हो रहा था ।ऐसा लग रहा था जैसे मेरी ज़िन्दगी मुझे वापस मिल गयी हो।

मैंने दीदी से कहा , ” दी बहुत सताया है तुमने मुझे । बहुत परीक्षा ली है मेरी ।”

स्नेहा दीदी बोली , “ मैं जानती हूँ समू । पर बड़े फैसले करने में वक्त तो लगता ही है , चल अब उठ । मैं तेरे लिए चाय बनाती हूँ । तू फ्रेश हो जा फिर बैठ कर बातें करेंगे ।”

हमने चाय नाश्ता किया और सोफे पर बैठे TV देख रहे थे , स्नेहा दीदी मेरी गोद में अपना सर रखे लेटी थी और मैं उनके बालों से खेल रहा था ।

मैंने दीदी से पूछा , “ दी ! माँ का क्या सोचा है ? ”

स्नेहा दीदी मेरी तरफ देखे बिना ही एक गहरी सांस लेकर बोली , “ पता नहीं यार , देखते हैं अभी तो कुछ समझ नहीं आ रहा ।”

मैं : " दी क्यों न हम माँ को कुछ बताये ही ना ?"

दीदी :" पर कभी न कभी तो माँ को पता चल ही जाएगा फिर क्या करेंगे ?"

मैं : "दी तब का तब देखेंगे । पर अगर अभी बता दिया तो अभी मुसीबत उठानी पड़ेगी सोच लो ।"

दीदी : " हम्म्म …कह तो तू ठीक रहा है । मुझे भी नहीं लगता कि माँ हमें समझेगी । "

मैं : " दीदी तुम खुश तो हो ना ?"

दीदी ने लेटे लेटे ही मेरी आँखों में देखा और मेरा सर नीचे झुका कर मेरे होंठों पर एक चुम्बन लेते हुए बोली , “ बहुत ! ”

मैंने भी दीदी के होंठों को किस किया और बोला , “ दीदी वैसे तो तुम बहुत खूबसूरत हो पर एक कमी है ।”

दीदी ने चौंकते हुए मुझसे पूछा , “ क्या कमी है ? ”

मैंने दीदी को अपनी गोद से अलग किया और सोफे से उठते हुए बोला , “ अभी बताता हूँ क्या कमी है ।”

और अपने कमरे में चला आया । मेरे पीछे पीछे दीदी भी आ गयी । कमरे में अपने बैग से एक डिबिया निकाली । उसमें से सिंदूर निकालकर स्नेहा दीदी की मांग में भर दिया ।

फिर कहा, " हाँ दी ! बस यही कमी थी , जो मैंने सिन्दूर भरकर पूरी कर दी और हमारे प्यार पर पक्की मुहर लगा दी ।"

स्नेहा दीदी की आँखों से आंसू निकल पड़े और वो मेरे सीने से आ लगी ।

मैंने भी दीदी को कस कर अपने आलिंगन में बाँध लिया और उनकी ठोड़ी के नीचे हाथ लगा कर उनके चेहरे को ऊपर किया तो देखा कि उनकी गालों पर आंसुओं की मोटी मोटी बूंदें जगमगा रही थीं ।

मैंने अपने होंठों से उनके आंसुओं को पीते हुए कहा , “ बस दी ! आज से तुम्हारे सारे दुःख मेरे और मेरी सारी खुशियां तुम्हारी ।”

 
Back
Top