• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

दुक्खम्‌-सुक्खम्‌

22

अभी सारी गृहस्थी उठाने की बात इन्दु के मन में नहीं थी। उसने रात में एक ट्रंक में अपने और बच्चों के कुछ कपड़े अचक से जमा लिये थे कि अगर पति अचानक कहें चलो तो हाथ-पैर न फूल जाएँ। कवि की सफेद पैंट और दो कमीज़ें मैली लग रही थीं। कमरे के बाहर पानी की बाल्टी रखकर वह उन्हें धो रही थी। यहाँ बैठकर नीचे की आवाज़ें उसके कानों में पड़ रही थीं और वह मन-ही-मन यही मना रही थी कि चिल्ल-पौं इत्ती न बढ़ जाए कि पड़ोस की तोते अपनी छत पर आकर पूछने लगे, ‘‘भाभी सबेरे-सबेरे मिरचें कूटकर खिला दीं क्या?’’

थोड़ी देर को कवि मूढ़े पर अवसन्न-सा बैठा रहा, दोनों हाथों में अपना सिर थामे।

कपड़े धोना बीच में छोडक़र इन्दु कमरे में आ गयी।

कवि ने थकी आवाज़ में कहा, ‘‘इनी सुनो, कल सुबह की गाड़ी से मैं अकेला जाऊँगा। जॉयन करने के बाद पहला काम मकान ढूँढऩे का करूँगा। तुम हिम्मत और समझदारी से यहाँ रहना। तुमसे दादाजी का कोई बैर नहीं है। शिकायतें तो सारी मुझसे हैं।’’

इन्दु का मुँह उतर गया। नये शहर और जीवन के उसने अनगिनत स्वप्न देख डाले थे। उसे लगा दिल्ली जैसे बड़े शहर में मकान ढूँढऩा असम्भव काम होगा।

कविमोहन ने कहा, ‘‘तुम दिल क्यों छोटा करती हो। मैं अपने साथ काम करनेवालों से कहूँगा, कोई-न-कोई रास्ता निकल ही आएगा।’’

अकेली जान की थोड़ी-सी तैयारी थी। रात में निपटा ली गयी। बक्सा तो वही छोटावाला था, तकिये के साथ दो चादरें लपेट लीं। हाँ, किताबों भरी एक पेटी ज़रूर भारी थी।

अगले रोज़ मुँहअँधेरे उठकर कवि ने अपना सामान नीचे उतारा और दायें कमरे में प्रवेश कर माँ के पैर छुए। माँ ने रुलाई अन्दर भींचकर कहा, ‘‘जा बेटा, राजी-खुशी रहना, बच्चन की फिकर न करना।’’

पिता काफी रात करवटें बदलने के बाद सो पाये थे। लेकिन उनकी आँख खुल गयी।

‘‘कबी तू जा रहा है! चिट्ठी डालियो। और सुन वहाँ पे जो जरा भी फजीहत हो तो वापस आ जइयो। या घर में अच्छा-बुरा सब तेरा ही है भैया।’’

बच्चे अभी सो रहे थे। भगवती की नींद खुल गयी। वह दरवाज़े से लगकर सुबकने लगी।

माँ ने घुडक़ा, ‘‘इसमें रोबे की कौन बात है। छोरा बड़ी नौकरी पर जा रहा है।’’

पिता बोले, ‘‘बेटे आते-जाते रहना।’’

इन्दु से तो रात भर कवि ने विदा-राग सुना था। उसका धीरज रह-रहकर टूटता और आँखों की कोर से झरने लगता। कवि ने कहा भी था, ‘‘मैं तो पहले भी आगरे में था, अब इतनी बेचैन क्यों हो रही हो!’’

इन्दु ने कहा था, ‘‘तब तो तुम्हारी मजबूरी थी।’’

कवि ने ढाँढस बँधाया था। इन्दु ने उससे मनुहार की थी, ‘‘इस बार सलूनो पर हम आगरे जरूर जाएँगे, हमें कोई रोके ना, हाँ नहीं तो।’’

जब ताँगा आ गया और अब्दुल ताँगेवाला सामान उठाकर ताँगे में रखने लगा, कवि ने धीरे से कहा, ‘‘राखी पर ये बच्चों के साथ मायके जाए तो जा लेने देना, जीजी।’’

मन-ही-मन विद्यावती खिंच गयीं। इन्दु के अन्दर ये परिवर्तन उन्हें ग्राह्य नहीं थे। पहले वह पति या श्वसुर से कुछ कहना चाहती तो सास के माध्यम से अपनी बात पहुँचाती। इधर जब से कवि घर में रहने लगा था वह सीधे कवि से या दादाजी से बात कर लेती। उसका सिर पर पल्ला भी अब ऊँचा रहने लगा था। ऊपर से गज़ब यह कि सास से मनवानेवाली बातें वह पति के ज़रिये उनके सामने रखने लगी थी।

आज तो यह दुखी है, कल से इसे ठीक करूँगी, विद्यावती ने तय किया।

इन्दु अपने कमरे की तरफ़ चली तो लाला नत्थीमल ने कहा, ‘‘बहू रात का दूध बचा हो तो मोय चाय पिला दे, नेक सी कुटकन भी देना।’’

भगवती बोली, ‘‘दादाजी मैं बनाऊँ।’’

‘‘चाय तो बस इन्दु जाने है बनानी या फिर कवि।’’

‘‘भैयाजी लाटसाहबों वाली चाय बनाते हैं, मोपै नायँ बने वैसी चाय।’’

इन्दु ने स्टोव जलाकर जल्दी से चाय बनायी और कटोरी में दो मठरी सहित ससुर को दी।

विद्यावती ने करवट पलटकर पूछा, ‘‘मेरे लिए बनायी?’’

‘‘नैक-सा दूध रहा जीजी। अभी दूधवाला आता होगा। ताजे दूध की बना दूँगी।’’ इन्दु ने कहा।

विद्यावती को बुरा लगा। उन्होंने धोती का पल्लू फैलाकर मुँह ढँक लिया और मुँह ढँके-ढँके बोली, ‘‘हाँ अब जीजी की फिकर च्यौं करेगी? जे तो दिल्लीवारी हो गयी ना।’’

‘‘अच्छा अब सब चुप हो जाओ मोय पाँच पन्नों का रट्टा लगाना है। सर ने कहा आज परीक्षा लेंगे।’’ भग्गो ने कहा और लालटेन लेकर बरामदे में पहुँच गयी।

लाला नत्थीमल ने पत्नी से कहा, ‘‘मेरे गिलास से ले-ले चाय।’’ विद्यावती ने कोई जवाब नहीं दिया। उसका चित्त घर से उचाट अपने कताई-संघ की तरफ़ चला गया। इधर कई महीनों से वह गृहस्थी के खटराग में न चरखा चला सकी, न संघ की किसी बैठक में जा पायी। उसे लगा घर-गृहस्थी उसके लिए जाल भी है और जंजाल भी। इसमें कोई काम कभी सीधे से न होता है, न हुआ। कवि तो सारी जिम्मेदारी उनके मूड़ पर डाल दिल्ली चल दिया। वह बेटियाँ सँभाले या बहू। ऊपर से उसके खुरपेचू लाला। उसने तय किया कि अब से लालाजी के दुकान चले जाने के बाद वह बैठकर चरखा काता करेगी और जब-तब दुपहर में चरखा-समिति का भी चक्कर लगा लिया करेगी। बल्कि वह लीला से कहेगी कि वह भी चरखा-समिति में संग चला करे। उसका मन बहल जाएगा।

मूर्ख नहीं थी विद्यावती। सीमित शिक्षा के बावजूद उसमें सहज व्यावहारिक ज्ञान था कि स्त्री के लिए घर-परिवार एक क़िस्म का आजीवन कारावास होता है। उसने चरखा-समिति की सभाओं में सुना था कि आज़ादी के मतवालों को अँग्रेज़ पुलिस जेल में ठूँसकर उनसे कैसा बर्ताव करती है। सी-क्लास कैदियों को तो भरपेट खाना-लत्ता भी नसीब नहीं होता। ऊपर से उनसे हाड़-तोड़ मशक्‍कत ली जाती है। कोल्हू में बैल की तरह जोत दिया जाता है, रातों में सोने नहीं दिया जाता और अगर वे ज़रा भी प्रतिवाद करें तो उन्हें लात-घूँसों से पीटकर अधमरा कर दिया जाता है। विद्यावती को लगा क्या घर-परिवार में फँसी स्त्री की दशा भी सी-क्लास क़ैदी जैसी नहीं है! आज़ादी के मतवालों का तो नाम-गाम जेल के इतिहास में लिखा मिल जाएगा। औरतों का तो नाम-निशान न मिले। ज्याैदा-से-ज्यावदा कुछ दिन यही चर्चा रहेगी कि फलाने की औरत चूल्हे की आग से भुरसकर मर गयी, ढिकाने की माँ का पैर जमुनाजी में रपट गयौ, तुमुक को कंठमाला हो गयी रही और अमुक को बीच बाज़ार साँड़ ने सींग मार दिया।

सोचते-सोचते मन भरभरा गया। इसी गृहस्थी में बामशक्कत क़ैद, डंडा बेड़ी, तनहाई जाने कौन-कौन सजा काट ली। अब हिम्मत बाकी नहीं। बस भगवती का ब्याह हो जाए तो नैया पार लगे।

ज़रूर विद्यावती की आँख लग गयी होगी। अचानक बादलों की गडग़ड़ाहट और मोरों की आवाज़ से वह जाग गयी। इन्दु आवाज़ लगाती रह गयी, ‘‘जीजी चाय उबल रही है, पीकर जाओ।’’

विद्यावती दानों की पोटली बगल में दबा, छड़ी के सहारे छत की सीढिय़ाँ चढ़ गयीं। सौंताल से उडक़र आये मोर मुँडेर पर बैठे सावन को न्यौत रहे थे : ‘मेह आओ, मेह आओ।’ इनमें बड़ेवाला मोर विद्यावती से इतना हिला हुआ था कि उनके हाथ से चुग्गा लेकर चुगता।

थोड़ी देर में बारिश की बूँदें पडऩे लगीं। विद्यावती का हृदय आह्लालाद से भर गया। हालाँकि मोर नाच नहीं रहा था, विद्यावती का मन-मोर नाच उठा। मन में मंसूबे बनाने लगी। सावन लगते ही घर-घर में झूला डल जाएगा। इस बार सबको बुलाऊँगी लीला, कुन्ती। भग्गो तो घर में है ही। कुन्ती को सावन के गीत बहुत आते हैं। ‘शिवशंकर चले कैलाश, बुँदियाँ पडऩे लगीं’ गीत तो वह इतना अच्छा गाती है और वह वाला भी ‘झूला झूले रे कदम तले, राधे भीगे संग नन्दलाल।’ उसके सहारे सारी जनी गा उठती हैं। इस बार मेंहदी भी लगायी जाए। बेबी-मुन्नी तो निचावली बैठती नहीं, उनके मेंहदी लगाकर मुट्ठी पर कपड़ा बाँध देंगे। जब हाथ रच जाएँगे तब कैसी खुश होंगी। शाम को ताँगा कर मन्दिरों की झाँकी देखी जाए। आजकल रोज़ नयी घटा सजाते होंगे, कभी नीली, कभी हरी, कभी गुलाबी। कहीं फूलडोल सजे होंगे। फूलडोल से वृन्दावन के बाँकेबिहारीजी का मन्दिर याद आ गया। विद्यावती ने कुल जमा तीन-चार बार देखा होगा पर बाँकेबिहारी मन्दिर की छवि उनके मन में बसी थी। मन्दिर की भक्तिनें सवेरे चार बजे जाग, बेले की कलियाँ तोडक़र, उनके गहने बनातीं। राधाकृष्ण का कुल सिंगार बेले की कलियों से होता, मोर मुकुट, झालर, शीषफूल, बेणी, कँगना, बाजूबन्द, पहुँची, तगड़ी, बैजन्तीमाल, यहाँ तक कि ठाकुरजी की मुरली पर भी बेले के हार लपेटे होते। कैसी भीनी महक आती मन्दिर भर में।

यादें ही तो हैं। आगे-पीछे होती रहती हैं। बड़े आवेग से वह धुँधली छवि विद्यावती की स्मृति में कौंध गयी जब वह छह साल की थी और उसका दूल्हा मुरारी पाँच साल का। दोनों को वृन्दावन राधा-मोहन का सिंगार बनाकर लाया गया था। तब उसका पैर एकदम ठीक था। मुरारी था तो पाँच का लेकिन विद्या से लम्बा था। देखने में भी बड़ा लगता था। पीताम्बर में साक्षात् कन्हैया जँच रहा था। मन्दिर में दोनों को जब राधा-गोविन्द की तरह खड़ा कर दिया गया, कितने ही भक्तों ने उन्हें चढ़ावा चढ़ाया। मुरारी ने कहा, ‘‘अम्मा मेरे तो पैर पिरा गये खड़े-खड़े।’’ तब उन दोनों को गोद में लेकर अम्मा और बाबा बाहर आ गये।

अपने पहले पति की बस इतनी-सी स्मृति बनी रही विद्यावती को। बाद का तो इतना याद है कि एक दिन बाबू दुकान से घर लौटे तो उनका मुँह उतरा हुआ था। उन्होंने अम्मा को बताया कि मुरारी तो हैजा से चल बसे। अम्मा सिर पर हाथ मार रोने लगी, ‘‘अरे मेरी छोरी का अभी गौना भी नहीं हुआ, कैसे उसे विधवा मानूँ।’’

पास-पड़ोस में ख़बर फैलते देर न लगी। रिश्ते की चाचियों ने उसे जबरन सफेद फ्रॉक पहना दी और समझा दिया, ‘‘देख लाली, अब तुझे घर में रहना है, छोरों से बात नईं करनी और निर्जला एकासी पर पानी नहीं छूना।’’

बाबू ने विरोध किया था, ‘‘भाभी, यह अयानी छोरी क्या समझे अमावस और एकासी।’’

चाचियों ने तर्जनी दिखाकर बरज दिया, ‘‘हम समझाएँगी नेमधरम।’’ सिर्फ विद्यावती के कल्याण के लिए उसके पिता गौरीशंकर सनातन धर्म से आर्यसमाज में आये जहाँ उन्हें लाला नत्थीमल में सुपात्र नज़र आया। जिस समय विद्यावती का पुनर्विवाह हुआ, उसकी उम्र केवल 14 साल थी।

जिस साल ब्याह हुआ उसी साल की दिवाली की बात है। विद्यावती के पैर में लोहे की ज़ंग लगी कील चुभ गयी। बहुतेरी मल्हम, पुल्टिस लगायी, कील मिली ही नहीं। गयी तो कहाँ गयी। पैर में दर्द इतना कि धरती पर धरा न जाए। तीसरे दिन पैर सूज गया। डॉक्टर ने बदल-बदलकर दवा दी। कोई असर नहीं हुआ। लीला उन दिनों पेट में थी। नत्थीमल इतने घबरा गये कि विद्यावती को मायके छोड़ आये। वहाँ भी जर्राह वैद्य सबने देखा, रोग किसी को समझ न आया। अलीगढ़ के अस्पताल में बाबू ने एक्सरे करवाया, कील पंजे में एड़ी की तरफ फँसी थी। ऑपरेशन से कील निकल गयी पर पैर में हमेशा के लिए कज आ गया। बायाँ पैर कुछ छोटा और कमज़ोर हो गया।

विद्यावती प्रसव के बाद सवा माह की बच्ची को लेकर पति-गृह आयी उसे नये सिरे से अपनी बदली हुई काया को स्वीकार करना पड़ा। नत्थीमल तीर की तरह लम्बे, पतले और वेगवान थे। पैदल चलते तो पीछे मुडक़र न देखते कि संग चलनेवला साथ है या पिछड़ रहा है। गेहुँआ रंग, तीखे नैन-नक्श, सुन्दर नाक और आँखें ऐसी तेज़ कि जिस पर नज़र पड़े उसे बेधकर रख दें। नत्थीमल ने पत्नी की देह-विषमता को गहरी चिढ़ और अस्वीकार से जीवन में प्रवेश दिया। उन्होंने आर्यसमाजी सुधारवाद की झोंक में पुनर्विवाह के लिए बाल-विधवा विद्यावती को चुना था तो सिर्फ इसलिए कि उनसे दस साल छोटी लडक़ी भाग-दौडक़र घर-गृहस्थी के काम सँवारकर अपने को धन्य समझेगी। सभी वणिक-पुत्रों की भाँति उनका गणित भी यही था, पैसा कमाने और खर्च करने का अधिकार उनका है, मेहनत, बचत और किफ़ायत का कर्तव्य उनकी पत्नी का है। विद्यावती ने एक बार दबी ज़ुबान में पति से कहा, ‘‘कहो तो बर्तन माँजने के लिए महरी रख लूँ, तीन रुपये महीने पर राजी हो जाएगी।’’

नत्थीमल ने त्यौरी चढ़ाकर कहा, ‘‘फिर तुम क्या करोगी सारा दिन?’’

‘‘लीला छोटी है और मुझे फिर दिन चढ़े हैं, ऐसौ लगे है। नल के पास घुटने मोडक़र बैठनौ भारी पड़ जाय है।’’

‘‘चाहे जैसे बैठकर माँज, माँजने तो तुझे ही हैं, मायके की लाटसाहबी यहाँ नहीं चलेगी।’’

बेटे के चक्कर में बेटियाँ पैदा होती गयीं इसे भी नत्थीमल विद्यावती का दोष मानते रहे।

नत्थीमल का गणित माना होता तो कविमोहन पैदा ही न होता। लीला, कुन्ती के बाद जब विद्यावती को दिन चढ़े किसी ने लाला नत्थीमल को सुझाया कि जब लड़कियाँ पैदा होती हैं तो तला-ऊपर तीन तो ज़रूर ही होती हैं। उस दिन नत्थीमल ने दुकान से लौटकर एक पुडिय़ा विद्यावती को दी।

‘‘जे का है?’’ विद्यावती ने पूछा।

‘‘कुनैन है। दिन में तीन बार फंकी लगाकर पानी पी ले। पेट की सफाई हो जाएगी।’’

विद्यावती को बहुत बुरा लगा। ये बाप है या कंस। फिर इस बार उसे सारे लक्षण बदले हुए लग रहे थे। उसने पुडिय़ा लेकर धोती की खूँट में बाँध ली और कहा, ‘‘अभी मोय प्यास नायँ। पानी पिऊँगी तब फंकी ले लूँगी।’’

इधर नत्थीमल की आँख बची उधर उसने खूँट से खोलकर आँगन की मोरी पर कुनैन झाडक़र बहा दी। हफ्ते भर यह सिलसिला चला। विद्यावती का पेट तो नहीं, आँगन की मोरी ज़रूर सफाचट हो गयी। जाने कब कब की इल्ली-गिल्ली सब मरमरा गयीं और मोरी से फल-फल पानी निकलने लगा। नत्थीमल ने अगले महीने पत्नी के फूलते पेट को देख हताशा से हाथ मले, ‘‘शर्तिया खंखा आनेवाली है। इत्ती कुनैन पी गयी और जीती रह गयी।’’

समस्त भय, आशंका और तनाव को निर्मूल कर जब कविमोहन प्रकट हुआ नत्थीमल खुशी से नाच उठे। सलोनी सूरतवाला शिशु साक्षात् मृत्युंजय था। नत्थीमल को कोई अपराध-बोध नहीं हुआ कि इस गर्भ को मिटाने के लिए उन्होंने कैसे-कैसे जतन किये। सभी मथुरावालों की तरह उन्होंने इसे श्यामसुन्दर की इच्छा कह अपने को क्षोभ-मुक्त कर लिया। चौथी सन्तान भगवती, कवि के आठ साल बाद बस ऐसे ही लड़ते-झगड़ते दाम्पत्य के बीच क्षणिक युद्धबन्दी के दौरान जीवन पा गयी।

छोटे बच्चों को सँभालना विद्यावती के लिए अकेले हाथ आसान काम नहीं था, ख़ासकर बायें पैर की कमज़ोरी के कारण। इसीलिए उसे आदत पड़ गयी थी हर समय टोका-टाकी और क्षेपक जड़ देने की। वह एक बार चौके में बैठ जाती, फिर उठ-उठकर कोई चीज़ उठाना, सँभालना उसके बस की बात नहीं थी। वह लड़कियों को बार-बार कोंचती, ‘‘लीली नेक लोटे में पानी दे दे। कुन्ती, हींग की डिबिया कहाँ हेराय गयी, ढूँढ़। अरे लीली, लल्ला को सँभार गिर जाएगौ।’’

पढऩे की कौन कहे, दोनों बहनों का खेलना तक दूभर रहता। जैसे ही वे गली में अक्कड़-बक्कड़ खेलने जाने को पैर बाहर धरतीं, विद्यावती पीछे से कहती, ‘‘अपने भइया को भी नैक घुमाय लाओ दोनों जनी।’’

गोलमटोल और भारी था कवि। उसे लेकर ज्याेदा दूर चलना उनके लिए मुश्किल था। वे वहीं किसी मन्दिर के चौंतरे पर उसे बिठा देतीं और गिट्टे खेलने लगतीं।

लीला और कुन्ती की किताबों से विद्यावती ने अपना बिसरा हुआ अक्षर-ज्ञान ताज़ा कर लिया। फिर तो उसे स्कूल की पढ़ाई में इतना रस मिलने लगा कि लड़कियों से भी पहले पाठ उसे याद हो जाता। लीला कहती, ‘‘रट्टा तो कोई भी लगा ले। इमला लिखकर दिखाओ तो जानें।’’

विद्यावती चौके में, चूल्हे से कोयला निकाल, पानी में छन्न से ठंडा करती और वहीं धरती के पत्थर पर या दीवार पर लिखना शुरू कर देती। वह सुन्दर अक्षर बनाती और उन्हें थोड़ा-सा मोड़ देती। लीला-कुन्ती हाथ जोड़ देतीं, ‘‘बस-बस उस्तानीजी, अब हमें तो पढ़ाओ ना।’’

इस दीवाल-लेखन पर पूर्णविराम लग गया जब एक दिन नत्थीमल ने कोयले से चिथी हुई दीवालें देखकर पूछा, ‘‘च्यों री लीली, तेरे पास पट्टी नहीं है या स्लेट टूट गयी जो मार दीवालें रंग डारी हैं।’’

लीला फिक् से हँस पड़ी, ‘‘जीजी से पूछो, कोऊ का काम है जे।’’

कुन्ती ने बताया, जीजी हमसे बढिय़ा लिखना जानती हैं।

नत्थीमल ने त्योरी डालकर कहा, ‘‘मार दीवालें पोत मारीं, जे नहीं सोचा कि दीवाली के पहले सफेदी कैसे होगी?’’

विद्यावती ने कहा, ‘‘चूना हो तो मैं ही ठीक कर दूँगी। एक पट्टी मुझे भी ला दो।’’

बदामी रंग की लकड़ी की पट्टी आ गयी। उसे पोतकर तैयार करने के लिए लीला-कुन्ती के पास मुलतानी मिट्टी थी ही। वे दो की जगह तीनों पट्टी पोतकर सूखने रख देतीं। कभी जल्दी होती तो मुड्ढ पर से पकड़ तख्ती झुलातीं और गातीं—

‘‘सूख सूख पट्टी चन्दन बट्टी, कट्टी तो कट्टी

ला तू मेरा पैसा

जा तू अपने घर को।’’

बच्चे बड़े हो गये लाला नत्थीमल का स्वभाव न बदला। लेकिन अब उनके बर्ताव से उतनी चोट नहीं लगती। विद्यावती ने अपनी दुनिया में मगन रहना सीख लिया था। बच्चों के हँसने-खेलने, पढऩे और मचलने के साथ, एक अलग संसार था। फिर मथुरा के मोहल्लों का रागरंग भी ऐसा था कि कोई भी ज्या-दा देर लसौढ़े-सा मुँह बनाकर रह नहीं सकता। अचानक लहर उठती, चलो आज सब लोग चलें रामलीला देखें, चलो आज परकम्मा लगा आयँ। आज तो सारी लुगाइयाँ हरी चूडिय़ाँ पहनने जाएँगी। आज अन्नकूट है आज सारी तरकारियाँ मिलाकर अन्नकूट का परसाद बनेगा। आज बसौढ़ा मनाया जाएगा। कोई आज चूल्हा न बाले। हर दिन किसी-न-किसी वजह से ख़ास दिन होता और पर्व की तरह मनाया जाता। बच्चे भी पोथी-बस्ते से छुटकारा पाते ही स्वाँग और मेले की रौनक में रम जाते।

मथुरा के निवासियों में उत्सवधर्मिता कूट-कूटकर भरी थी। वे अपने जीवन की समस्त तकलीफ़ें, तनाव और तडफ़ड़ाहट को इसी तरह जीतते। इस तरह यह आमोद-प्रमोद उनके जीवन का रास भी था और संन्यास भी। मनोरंजन था तो पलायन भी। कृष्ण कथाएँ उन्हें जीने का साहस देतीं। निरक्षर जनता भी कथावाचन का श्रवण कर अपने आपको शिक्षित अनुभव करती।

बाकी कमी महात्मा गाँधी की सर्वहारा छवि ने पूरी कर दी थी। उनकी रूखी-सूखी कृश काया से मथुरावासी उन्हें अपने जैसा एक व्यक्ति मानते जिसने अपनी खरी बात से सबको क़ायल किया और भय-मुक्त जीवन जीने का मार्ग दिखाया। साधारण-जन इस वक्त आज़ादी के लिए सन्नद्ध था और कटिबद्ध। गाँधीजी में उसे तमसो मा ज्योतिर्गमय साकार दिखा था।
 
23

दिल्ली के घर भी क्या घर। कोठरियाँ बनाम कमरे और कमरे बनाम बरामदे। एक तरफ़ दीवार में जड़ी हुई आलमारियाँ, दूसरी तरफ़ सडक़ की ओर खुलनेवाली कतारबद्ध खिड़कियाँ। खिड़कियों की नीचाई और सडक़ पर चलते आदमियों की ऊँचाई में अद्भुत तालमेल, कुछ ऐसा कि बेसाख्ता अन्दरवालों की आँख बाहर और बाहरवालों की आँख अन्दर टिकी रहे। न न पर्दे कैसे लगाए जा सकते हैं, घर में हवा का एकमात्र रास्ता हैं ये खिड़कियाँ, हवा और मनोरंजन का। जिन्होंने पर्दे लगा रखे हैं, वे भी सरके ही रहते हैं। भला हो विद्युत-व्यवस्था का, खिडक़ी-दरवाज़े, दिन-रात खुले रखने पड़ते हैं, चोरी और गर्मी, इन दोनों आशंकाओं की भिड़न्त में गर्मी हर बार जीतती है।

दिल्ली—एक नगर। नगर में कितने नगर—रूपनगर, कमलानगर, प्रेमनगर, शक्तिनगर, मौरिसनगर, किदवईनगर, विनयनगर, सन्तनगर, देवनगर, लक्ष्मीबाई नगर। मज़ा यह कि कोई चाहे कितनी भी दूर रहता हो, बसों में धक्के-मुक्के खाता अपने दफ्तर पहुँचता हो, उसे मुग़ालता यही रहता है कि वह दिल्ली में रहता है। जब गाँव-कस्बे से उसके रिश्तेदार मेहमान बनकर आते हैं वह उन्हें प्रदर्शनी दिखाता है, लाल किला और बुद्धजयन्ती पार्क घुमाता है, और एक के बाद एक टूटते दस-दस के नोट देखते हुए दिन गिनता है कि मेहमान कब जाएँ और वह वापस अपनी पटरी पर फिर बैठ जाए—दफ्तर से घर, घर से दफ्तर। सच पूछो तो दिल्ली का मतलब है दस-पाँच नेताओं की दिल्ली। दिल्ली की असली मलाई बस वही चाट रहे हैं, बाकी सारे घास काट रहे हैं।

कवि ने अपने इकलौते कमरे का इकलौता दरवाज़ा बन्द किया और ताला डालने की रस्म पूरी की। यह ताला किसी भी चाभी से खोला जा सकता है। है तो किसी उम्दा कम्पनी का पर जब से कवि ने होश सँभाला इसे घर में इस्तेमाल होते देखा। घिस-घिसकर चिकना लोहे का बट्टा जैसा हो गया है। जीजी ने यह ताला और इस जैसी कई कंडम चीज़ें उसे भेंट कर दीं जब वह मथुरा से चला। ताला बदलने का इरादा रोज़ करता है कवि, पर ताला ख़रीदने की बात उसे हास्यास्पद लगती है। पहले उसे कुछ ऐसा सामान ख़रीदना होगा जो ताले का औचित्य साबित कर सके।

कवि रोज़ रात दस बजे के बाद घर लौटता है। तब वह इतना थका होता है कि कई बार बिना कपड़े बदले, बिना चादर झाड़े, बिना बत्ती बुझाए तुरन्त सो जाता है। कमरे की बदरंग दीवारें, घिसी चादर, तिडक़े प्लेट-प्याले और टूटा स्टोव उसे सिर्फ तब नज़र आते हैं जब कोई दोस्त अचानक छुट्टी के रोज़ चला आता है। काम के बाद वह कॉफ़ी-हाउस चला जाता है। वहाँ शोर का एक अंश बनना उसे अच्छा लगता है, सिगरेट पीना भी और कभी-कभार कॉफ़ी। इन तीनों चीज़ों की तासीर ऐसी है कि इनके रहते भूख महसूस नहीं होती, न अकेलापन, न उदासी।

वह इन तीनों में से दो से हमेशा घबराता आया है। वह न अकेलापन बर्दाश्त कर सकता है न उदासी। कई बार सुबह चार-पाँच बजे के बीच मकान-मालकिन की नवजात लडक़ी के रोने से उसकी नींद टूटी है और फिर देर तक उसे नींद नहीं आयी है। अपनी बेबी-मुन्नी याद आने लगी हैं। कवि अपने आसपास के घरों की प्रारम्भिक आवाज़ें सुनता है—दूधवालों की साइकिलों की खडख़ड़ाहट, महरियों की खटखट, किसी-न-किसी घर या मन्दिर से अखंडपाठ की रटंत, बूढ़ों के गलों की खर्राहट। हर आवाज़ के साथ आराम एक असम्भव प्रक्रिया बन जाता। कहीं पड़ोस की युवा गृहणी का बिन्दी पुँछा चेहरा दिख जाता तो गज़ब अकेलापन, उदासी और सन्त्रास उसे दबोच लेते। ऐसे मौकों पर इन्दु की याद इतने ज़ोर से आती कि उसे लगता वह भागता हुआ मथुरा लौट जाए। इसीलिए कवि को ऐसे दिन पसन्द हैं जब वह सुबह आठ बजे उठे और उठते ही कॉलेज जाने की हड़बड़ी हो जाए।

कॉलेज के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि एक बार इसके परिसर में दाखिल हो जाओ, शेष जगत और जीवन की परेशानियाँ भुला दी जाती हैं। एक ओढ़ा हुआ व्यक्तित्व यहाँ इतना कामयाब होता है कि उतनी देर अपना असली व्यक्तित्व सामने ही नहीं आता। कवि अभी नया है इसलिए कोई उसके साथ ज्या दा आत्मीय नहीं हो पाया है। कक्षाओं के विद्यार्थी ज़रूर उसके पढ़ाने के ढंग से उसकी ओर खिंचे हैं। कॉमर्स, इकनॉमिक्स और एकाउंट्स की नीरस पढ़ाई से उकताकर वे जब इंग्लिश का पाठ्यक्रम देखते हैं वह उन्हें प्रिय लगता है। पढ़ाते हुए बीच-बीच में कविताओं के अंश उद्धृत करना कवि का शौक है। इससे व्याख्यान में ताज़गी बनी रहती है और विद्यार्थी एकाग्र रहते हैं।

दरियागंज में आवास की समस्त सम्भावनाएँ टटोलने के बाद ही कविमोहन ने कूचापातीराम में यह आधा कमरा लेने की मजबूरी स्वीकार की। दरियागंज प्रकाशकों, मुद्रकों और कागज़ के थोक विक्रेताओं का इलाक़ा है। किसी ज़माने में यहाँ पिछवाड़े की गलियों में जनता रहती थी। अब तो इसके चप्पे-चप्पे में व्यवसाय का जाल फैला हुआ है। यथार्थवादी लोगों ने यहाँ तलघर भी बना लिये हैं जो बिजली के भरोसे जगमगाते रहते हैं।

अपने विभाग के अब्दुल राशिद के साथ वह दरियागंज के सामने की गली का चक्कर भी लगा आया। चितली कबर यों तो देखने में ऐसी लगती थी जैसी शहर की कोई भी गली। इस लम्बी और सँकरी गली में रहना और कमाना साथ-साथ चलता था। छोटे दरवाज़ों वाले ऐसे मकान थे जो बड़े सहन में खुलते और कई मंजिला साफ़-सुथरा ढाँचा नज़र आता। अब्दुल राशिद हर जगह कहते, ‘‘बड़ी बी, इन्हें सिर छुपाने की जगह दरकार है। माशाअल्ला शादीशुदा हैं, बाल-बच्चे वाले हैं, जो किराया आप वाजिब ठहराएँगी, दे देंगे। मेरे साथ ही कॉमर्स कॉलेज में तालीम देते हैं।’’ बड़ी बी कहलाई जानेवाली महिला कोई जर्जर, उम्रदराज़ ऐसी औरत होती जो हालात से हिली होती। वह कानों को हाथ लगाकर कहती, ‘‘लाहौल बिला कूवत, बेटा देखते नहीं, क्या तो माहौल है दिल्ली का। कल को अगर किसी दंगाई ने आकर इन्हें कतल कर दिया तो मैं क़यामत के रोज़ किसे मुँह दिखाऊँगी।’’ एक और बड़ी बी ने कहा, ‘‘इनसे कहो, पुरानी दिल्ली के मोहल्लों में मकान तलाश करें। यहाँ तो आदमजात का भरोसा नहीं।’’

कविमोहन मन-ही-मन डर गया। उसने मकान के बाहर दुकानों में जरी और रेशम की ताराक़शी होते देखी और सोचा, ‘यहाँ न रहना ही अच्छा है। मुल्क़ के हालात की सबसे ज्या दा तपिश यहीं पहुँची लगती है।’

इसी तरह भटकते-भटकते वह चाँदनी चौक पहुँच गया। यहाँ बाज़ार एकदम रौशन था। ऐसा लगता था कुल दिल्ली यहीं उमड़ आयी है। एक ख़ास बात उसने यह देखी कि कपड़ों की दुकानों के शोकेस में साड़ी के साथ फ्रॉक या स्कर्ट-ब्लाउज़ का मॉडल ज़रूर सजा था। एक तरफ़ अँग्रेज़ों को मुल्क़ से बाहर कर देने का संकल्प था तो दूसरी तरफ़ उनसे व्यापार की उम्मीद। दरीबा कलाँ की चकाचौंध बस देखते बनती थी। कविमोहन के मन में चाह हुई कि कुछ महीनों बाद वह यहाँ इन्दु को साथ लाकर सोने की अँगूठी दिलाये। उसने आज तक इन्दु को कोई उपहार नहीं दिया था। चाँदनी चौक मुख्य बाज़ार था जिसके दायें-बायें मशहूर गलियाँ फूटती थीं। हर गली के नुक्कड़ पर खाने-पीने की कोई-न-कोई दुकान। चाट की दुकानों की भरमार थी। पानी के बताशे कई किस्म के मिलते, आटे के, सूजी के, हर्र के और सोंठ के गोलगप्पे। इसी तरह यहाँ आलू टिकिया सेंकने के अलग अन्दाज़ थे। कविमोहन को यहाँ आकर बुआ की याद ने सताया। उसे ग्लानि हुई कि इतने महीनों में उसने सिर्फ एक बार बुआ को याद किया। घंटेवाले हलवाई से उसने एक सेर सोहनहलवा पैक करवाया और फतहपुरी की तरफ़ बढ़ गया।

24

फतहपुरी के घर 13/39 में गज़ब गहमागहमी थी। मकान की पुताई हो रही थी। कई मज़दूर लगे हुए थे।

फूफाजी ने उसे देखते ही कहा, ‘‘अच्छा हुआ तुम आ गये। हम यही सोच रहे थे कवि को किसके हाथ कहाँ खबर भेजें। पता तो तुमने छोड़ा नहीं!’’

‘‘क्या ख़ुशख़बरी है?’’ कवि ने पूछा।

जवाब बुआ ने दिया, ‘‘तुम्हारे छोटे भाई लड्डू का ब्याह तय हो गया है। लडक़ीवालों ने माँगकर रिश्ता लिया है। साड़ी के ब्यौपारी हैं। कहते हैं लड्डू को कपड़े का ब्यौपार खुलवाएँगे। चलो रोज की खिचखिच से जान छूटेगी उसकी।’’

‘‘लडक़ी कैसी है?’’

‘‘वह तो हमने देखी नायँ। नाऊ ने बताया साच्छात फूलकुमारी है। पान खाय तो गले में पीक का निशान देख लो। उमर बस इक्कीस। लड्डू तो छब्बीस उलाँककर सत्ताईस में पड़ गयौ।’’

‘‘बुआ एक नज़र खुद डाल लेतीं लडक़ी पर तो अच्छा था।’’

‘‘लो बोलो, नाऊ हर हफ्ते पचासों बयाह करावै। वह क्या झूठ बोलेगा। तू अपनी नीयत बता। बरात में चलेगौ कि नायँ।’’

‘‘जरूर चलूँगौ, मेरे भाई का ब्याह है।’’

फूफाजी खुश हो गये। अचानक उनके चेहरे पर उदासी के बादल घिर आये, ‘‘मथुरा से बस यही भर रिश्ता बचा है कवि। दादाजी से हमें कोई उम्मीद नायँ कि वो आवेंगे या जीजी को भेज देंगे।’’

‘‘उन्हें ख़बर की?’’

‘‘हाँ, सबसे पहले! वहाँ से इक्कीस रुपये का मनीऑर्डर आया। फॉर्म के नीचे लिखा था ‘‘दुकान छोडक़र आना मुश्किल है। बेटे की शादी की बधाई लो।’’

कवि को अन्दर-ही-अन्दर एक अव्यक्त सुख मिला। कम-से-कम पिता ने पारिवारिक औपचारिकता तो निभायी।

‘‘मेरा काम क्या रहेगा, फूफाजी आप अभी बता दें।’’

‘‘बेटा तुम्हारे जिम्मे हमारे पढ़े-लिखे बराती रहेंगे। किसको क्या चाहिए, कैसे आएगा, सब तुम्हारे जिम्मे। मैं विमला से कह दूँगा, तुम्हें फिज़ूल के कामों में न फँसाये।’’

कुछ दिन के लिए फूफाजी के मकान की दशा बिल्कुल बदल गयी। जमादार सुबह-शाम मकान के आगे और पिछवाड़े झाड़ू लगाता रहा। बचनी धोबन रोज़ सुबह आकर कपड़े पछाड़ जाती। फिर भी बुआ के सामने कामों का अम्बार लगा था।

सबसे बड़ा काम था नीचे ड्योढ़ी में फाटक लगने का। फाटक वर्षों पहले गलकर टूट गया था। तब से ड्योढ़ी छाबड़ीवालों, खोमचेवालों और ठेलेवालों की आम रिहाइश बन गयी थी। खुली, खाली जगह देखकर छोटे-छोटे फेरीवाले यहीं टिककर सुस्ताते। बहती सडक़ और बाज़ार होने के कारण, यहीं उनकी फुटकर बिक्री भी होती रहती। फूफाजी को ये सब लोग आते-जाते सलाम कर देते, इसके अलावा और कोई लेन-देन नहीं था। शुरू में जब एक-दो दुकानदारों ने वहाँ बैठना शुरू किया था, फूफाजी ने सोचा चलो अच्छा है, मकान की चौकीदारी रहेगी। देखते-देखते यहाँ खोमचे और छाबड़ीवालों का ठिकाना ही बन गया। अपने घर का ज़ीना चढऩे के लिए भी परेशानी होने लगी। फाटक लगाने का इरादा तो कई बार किया। ड्योढ़ी की दोनों तरफ़ की दीवार में ज़ंग खाये मज़बूत कुन्दे अभी भी लटके दिख जाते थे। लेकिन बुआ का पूरा परिवार कमाई की जद्दोजहद में इस काम के लिए फुर्सत नहीं निकाल पाया।

‘‘इस काम में तो काफी खर्च आएगा?’’ कवि ने कहा।

‘‘लडक़ीवालों ने वरिच्छा में इक्कीस सौ रुपये चढ़ाये हैं, कुछ मेरे पास धरे हैं, फाटक लगने से समझो, मकान की शान बन जाएगी।’’ बुआ ने कहा।

परिवार का हौसला अन्त तक बना रहा। फाटक लग गया, वार्निश हो गयी, नया निवाड़ का पलंग आ गया, मकान की पुताई, दरवाज़ों का रंग-रोगन सब पूरा हो गया। वही घर अब कुछ बड़ा और कायदे का लगने लगा।

ऐसा तभी तक था जब तक कम्मो का सामान नहीं आया था। लड्डू की बहू कामिनी के साथ विदाई की बेला में सिर्फ एक बक्सा और एक आलमारी आयी। दोनों सामान लड्डू के कमरे में स्थापित कर दिये गये। फिर शुरू हुआ दहेज का सामान भेजने का सिलसिला तो कमरे छोड़ दालान और बरामदा भी भर गये, सामान ख़त्म न हुआ। गहने-कपड़े तो पहले ही, बक्से में आ चुके थे। अब गृहस्थी का बाकी सरंजाम आया। सर्दी-गर्मी के अलग बिस्तर, खाने, पकाने के अलग-अलग नाप के बर्तन, पंखा, रेडियो, साइकिल, यहाँ तक कि स्टोव और अँगीठी भी भेजी गयी। नरोत्तम अग्रवाल ने बार-बार मना किया कि गृहस्थी का कुल सामान उनके यहाँ इफ़रात में है पर कम्मो के पिता और चाचा नहीं माने।

आखिरकार रहस्य का उद्घाटन इस प्रकार हुआ जिसके लिए विमला बुआ और नरोत्तम फूफा तैयार नहीं थे। विजेन्द्र गिरधारी चक्रधारी साड़ी भंडार में बैठकर काम समझने लग गया था। उसके आने से कम्मो के पिता गिरधारी और चाचा चक्रधारी को आराम हो गया था। घर का आदमी पाँच ओपरे आदमियों पर भारी पड़ता है। फिर विजेन्द्र की नज़र और बुद्धि तेज़ थी। वह इशारे से बात समझता। ग्राहकों से बात करना, गल्ले का मिलान और दुकान बढ़ाना ऐसे काम थे जिनमें गिरधारी और चक्रधारी कई बार चकरा जाते। दोनों के ही परिवार में बेटा नहीं था, हाँ बेटियों की भरमार थी।

एक दिन विजेन्द्र ने कहा, ‘‘माँ मुझे दुकान बढ़ाते-बढ़ाते दस बज जाते हैं। मन तो करता है वहीं लुढक़कर सो रहूँ। तुम्हारी फिकर में गिरते-पड़ते घर आ जाता हूँ। यहाँ कम्मो के आने से घिचपिच भी बहुत हो गयी है।’’

माँ ने कहा, ‘‘नहीं, बहू से क्या घिचपिच।’’

‘‘तुम्हारी राजी हो तो मैं वहीं रह लिया करूँ। दुकान के ऊपर, छत पर बहुत बढिय़ा दो कमरों का सैट खाली पड़ा है, चौका, गुसलखाना सब है वहाँ।’’

माँ को पहले बात की गम्भीरता समझ नहीं आयी। उसने कहा, ‘‘मुँह खोलकर उन लोगों से माँगना पड़ेगा। वे पहले ही इत्ता देकर घर भर चुके हैं।’’

लड्डू के मुँह से औचक निकल गया, ‘‘वे तो शुरू से कह रहे हैं, यहीं आकर रहो, इसे अपना ही समझो।’’ माँ सन्न रह गयी। बेटा जाएगा तो बहू भी यहाँ क्यों रहेगी!

अब उसे समझ आया कि उसके बेटे को घर-जमाई बनाया जा रहा है।

नरोत्तम और विमला ने बेटे को समझाने के सभी जतन किये। विजेन्द्र ने कहा, ‘‘मैं कहीं दूर थोड़ेई जा रहा हूँ। जब तुम्हारा जी चाहे आ जाना।’’

कामिनी तो जैसे तैयार ही बैठी थी। जिस रफ्तार से उसका सारा सामान फतहपुरी आया उससे दस गुनी रफ्तार से सब वापस चाँदनी चौक चला गया। कमरे खाली लगने लगे। कम्मो ने सास-ससुर के पाँव छूते हुए कहा, ‘‘जीजी हम आते रहेंगे, आप कोई फिकर न करें।’’
 
25

आगरे की तरह दिल्ली में भी कविमोहन का कविता-प्रेम बरक़रार था। उसके अन्दर ऊर्जा और ऊष्मा का विस्फोट शब्दों में होता। तब जो भी कागज़ उसके सामने आता उस पर वह अपनी कविता टाँक देता। उसे शेक्सपियर का नायक ऑर्लेंडो याद आ जाता जो अपनी कविताएँ लिखकर पेड़ों पर लटका देता था। कविमोहन डायरी के पृष्ठों पर, अख़बार के कागज़ों पर, चीनी के लिफ़ाफों पर, कहीं भी अपने काव्योच्छ्वास लिख डालता। कॉलेज लायब्रेरी में उसे पत्रिकाओं की जानकारी मिल जाती। उसने दो पत्रिकाओं में अपनी एक-एक कविता भेजी। एक तो तत्काल वापस आ गयी। दूसरी तीन माह बाद छप गयी। कविमोहन को आश्चर्य और आह्लालाद की अनुभूति हुई। छपने पर कवि उसे कई बार पढ़ गया। यह रचना कागज़ से पहले उसके मन के पृष्ठों पर कई बार लिखी जा चुकी थी। कविता इस प्रकार थी—

होने सवार ज्यों बढ़े चरण

चमका एड़ी का गौर वर्ण

कर नमस्कार, कुछ नमित वदन

जब मुड़ीं हो गये रक्त कर्ण।

चल दी गाड़ी घर घर घर घर

खिंचता ही गया सनेह-तार

धानी साड़ी फर फर फर फर

उड़-उडक़र दीखी बार-बार

पल भी न लगा सब क्लान्त शान्त

मैं खड़ा देखता निर्निमेष,

लो फिर सुलगा यह प्राण प्रान्त,

बस प्लेटफॉर्म की टिकट शेष।’’

कॉलेज के हिन्दी-विभाग की गोष्ठी में कविमोहन ने अपनी इस सद्य:-प्रकाशित कविता का सस्वर पाठ किया तो वहाँ ज़लज़ला आ गया। लड़कियों ने घोषणा की कि प्रेम की स्थिति की यह सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। वे कवि की प्रेरणा का स्रोत जानना चाहती थीं। कवि अपनी छात्राओं से उतना खुला हुआ नहीं था। होता तो वह कहता जो तुम समझ रही हो यह वैसी अनुभूति नहीं है। कविमोहन ने जीवन की पाठशाला में पहला प्रेम का पाठ इन्दु के ज़रिये ही पढ़ा था। दूर रहते हुए उसके लिए पत्नी ही प्रेयसी थी जिसे सम्बोधित कर वह कभी उत्तप्त तो कभी सन्तप्त कविता लिखा करता। यह अजीब लेकिन सत्य था कि जब कवि घर से दूर रहता तो घर उसके बहुत क़रीब रहता। घर उसकी धमनियों में ख़ून की तरह सनसनाता। घर से दूर उसे न पिता गलत लगते न माँ। भग्गो और बेबी-मुन्नी में भी उसे ब्रह्मंड नज़र आता। लेकिन घर के पास फटकते ही समस्त अपवाद, ऐतराज़, अवरोध और असहमतियाँ एक-एक कर सिर उठातीं और वह भन्ना जाता कि अब छुट्टियों में भी वह घर नहीं आया करेगा। इन्दु का भुनभुनाना, बड़बड़ाना उसे दाम्पत्य से विमुख करने लगता। तब उसे कूचापातीराम का वह अँधेरा, अधूरा कमरा ज्याधदा आत्मीय और अपना लगता जहाँ बैठ वह हफ्ते में छह-सात कविताएँ रच लेता।

कुहेली भट्टाचार्य यों तो अँग्रेज़ी विभाग में कविमोहन की सहकर्मी थी लेकिन कवि को सुनने वह हिन्दी-विभाग में आ जाती। हिन्दी-विभाग के प्राध्यापक उसे हिन्दी-प्रेमी के रूप में पहचानते थे। कैम्पस पर सब उसे कुहू कहते थे। कुहू का छोटा भाई देवाशीष इंग्लिश में कमज़ोर था। पढ़ाई के लिए वह कुहू के हाथ के नीचे आता नहीं था। भट्टाचार्य परिवार चाहता था कि देवाशीष अँग्रेज़ी में पारंगत हो जाए तो ख़ानदान की इज्ज़त बची रहे। पिता डॉ. आनन्दशंकर भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘देख लेना देवू अगर तुम अँग्रेज़ी नहीं पढ़े तो दर-दर की ठोकरें खाओगे। बांग्ला किस्से-कहानियाँ पढऩे से नौकरी नहीं मिलेगी।’’

देवाशीष मार्लो के उबाऊ नाटक ‘डॉ. फॉस्टस’ के ऊपर शरत्बाबू का ‘श्रीकान्त’ रखकर पढ़ता रहता।

कुहू ने कविमोहन से आग्रह किया, ‘‘आप बस देवू के अन्दर पढ़ाई के लिए लगन पैदा कर दीजिए, आगे का काम मैं सँभाल लूँगी।’’

‘‘मैं तो अब ट्यूशन करता नहीं।’’

‘‘आप गलत समझे। आपसे ट्यूशन करने को कौन कह रहा है। हफ्ते में एक बार आकर उसकी दिलचस्पी देख-सुन जाइए।’’

‘‘आप उसी के स्कूल का कोई टीचर क्यों नहीं ढूँढ़तीं।’’

‘‘टीचर यह काम नहीं कर सकता। आप उसे सही प्रेरणा देंगे, मुझे भरोसा है।’’

‘‘देखूँगा। कह नहीं सकता कब आऊँ।’’

कविमोहन ने प्रसंग टाल तो दिया पर मन से निकाल नहीं पाया। अपने पर थोड़ा घमंड भी हुआ। इतने कम समय में वह छात्रों का प्रिय शिक्षक बन गया था। कॉलेज में वह छात्रों से घिरा रहता। कॉलेज में पिकनिक रखी जाती तो हर क्लास का आग्रह होता कवि उनके साथ चले। शहर में कोई नयी किताब चर्चित होती तो छात्र उस पर कविमोहन की राय जानना चाहते।

स्टाफ़-रूम में युवा प्रवक्ताओं के बीच बहस छिड़ी हुई थी। राशिद, किसलय और कुहू इस बात पर अड़े हुए थे कि पंडित नेहरू हमारे देश के लिए गाँधी से ज्याहदा ज़रूरी हैं। कविमोहन और सुनील सेठी का कहना था महात्मा गाँधी न होते तो नेहरू भी न होते। पंडित नेहरू के लिए स्वाधीन भारत का स्वप्न गाँधीजी ने ही साकार कर दिखाया।

राशिद बोला, ‘‘कुछ भी कहो, गाँधीजी घनघोर इम्प्रेक्टिकल तो रहे हैं। उन्होंने पार्टिशन के लिए हाँ न भरी होती तो इतनी मारकाट और हिंसा जो हुई वह न होती।’’

उसके यह कहते ही कविमोहन उत्तेजित हो गया, ‘‘किसने कहा पार्टिशन महात्माजी का विचार था! तुम अख़बार नहीं पढ़ते, रेडियो नहीं सुनते या तुम एकदम ठस्स हो।’’

राशिद बुरा मान गया, ‘‘माइंड यौर लेंग्वेज। मैं अख़बार भी पढ़ता हूँ और रेडियो भी सुनता हूँ। कौन नहीं जानता कि गाँधी और जिन्ना के बीच डैडलॉक (गतिरोध) की वजह से ही पार्टिशन हुआ। आज जो पंजाब और सिन्ध से लुटे-पिटे लोगों के काफिले दिल्ली पहुँच रहे हैं उसने इस आज़ादी को भी धूल चटा दी है।’’

कुहू ने उसे टोका, ‘‘आपकी बात राजनीतिक हो सकती है, इतिहास-सिद्ध नहीं है। हमारे देश के टुकड़े गाँधी-जिन्ना डैडलॉक से नहीं बल्कि अँग्रेज़ों की फूट डालो, राज करो नीति के कारण हुए। आप जो आज इतनी आसानी से बापू के खिलाफ़ बोल रहे हैं, यह हक़ भी आपको बापू की उदारता ने ही दिया है। यह उन्हीं का फ़ैसला था कि आप यहाँ नज़र आ रहे हैं।’’

किसलय ने कहा, ‘‘यह सारी बातचीत ऑफ द मार्क हो रही है। बहस का मुद्दा गाँधी-नेहरू था न कि गाँधी-जिन्ना। विभाजन हम सबके लिए एक सेंसिटिव इश्यू है। हम जानते हैं गाँधीजी ने जिन्ना से इतनी मुलाक़ातें सिर्फ इसलिए कीं ताकि विभाजन रोका जा सके। कौन चाहता है कि उसके देश का नक्शा रातोंरात छोटा हो जाए। फिर अपने मुल्क में रह रहे ज्या दातर मुसलिमों के पूर्वज हिन्दू थे। उन्होंने हिन्दू धर्म त्याग कर मुसलिम बनना मंजूर किया। हम सब राशिद को दोस्त मानते हैं कि नहीं?’’

‘‘बिल्कुल, बिल्कुल’’ कई आवाज़ें उठीं।

वास्तव में 1947 में हो यह रहा था कि पिछले छह महीनों की उथल-पुथल में हर मुसलिम घर में एक विभाजन घटित हुआ था। घर के कुछ सदस्य यहीं अपने वतन, अपने शहर में रहना चाहते थे जैसे वर्षों से रहते आये थे। कुछ सदस्यों का मन उखड़ गया था, वे नये मुल्क से नयी उम्मीद पाले हुए थे। उन्होंने अपना सामान तक़सीम कर पाकिस्तान जाना कबूल कर लिया। एक ही घर में एक भाई हिन्दुस्तानी बन गया तो दूसरा पाकिस्तानी। कहीं माँ-बाप हिन्दुस्तान में रह गये, सन्तानें पाकिस्तान चली गयीं। दिल को समझाने को वे कहते, ‘अरे मेरे बच्चे कहीं दूर नहीं गये हैं, यहाँ से बस थोड़े घंटों की दूरी है, जब मर्जी आकर मिल जाएँगे’ पर जानेवाले जानते थे कि कोई भी जाना बस जाना ही होता है, एक बार जड़ें उखड़ गयीं फिर न गाँव अपना मिलता है न गली। फिर भी लोग लगातार जा रहे थे कि वे अपनी जिन्दगी में तब्दीली लाना चाहते थे।

‘‘यह मसला इक्की-दुक्की का नहीं, मामला पूरी क़ौम का है।’’

‘‘क़ौम भी तो इनसानों से बनती है।’’

कवि ने कहा, ‘‘राशिद तुम्हारी बातों से तकलीफ़ पहुँच रही है। अगर तुम हमारे बीच एक घायल रूह की तरह रहोगे, हमें कैसे चैन आएगा!’’

कवि देख रहा था कि राशिद के सोच-विचार में पिछले छह महीनों में बुनियादी बदलाव आया था। उसके अन्दर से सहज विश्वासी बेफिक्र नागरिक विदा हो गया। उसकी जगह एक जटिल, शक्की और शिक़ायतों का पुलिन्दा आ बैठा। अभी कल तक वह कवि को चितली कबर के मुहल्ले में कमरा दिलाने के लिए उसके साथ घूम-भटक रहा था।

सभी ने राशिद के स्वभाव में आये इस परिवर्तन पर ग़ौर किया। वे सोचने लगे कि स्टाफ़ में मौजूद बाकी ग्यारह-बारह लोग भी क्या ऐसी उथल-पुथल से गुज़र रहे होंगे। कहने को ये सभी पढ़े-लिखे लोग थे।

आज़ादी हासिल होते ही गाँधीजी का व्यक्तित्व एक लाचार ट्रेजिक हीरो की शक्ल में सामने आया था। कहाँ तो उन्होंने कहा था, ‘अगर कांग्रेस बँटवारे को स्वीकार करना चाहती है तो उसे मेरी लाश पर से गुज़रना होगा। जब तक मैं जिन्दा हूँ, कभी हिन्दुस्तान का बँटवारा स्वीकार नहीं करूँगा।’ कहाँ उनके साथी और समर्थक कब अलग राह चल पड़े उन्हें पता ही नहीं चला। एक घनघोर उदासी उन पर छा गयी और वे अँग्रेज़ों की साठ-गाँठ पहचानते हुए भी इसे रोक नहीं पाये। शातिर लोग उन्हें काशी या हिमालय चले जाने की सलाह देने लगे। गाँधीजी ने कहा—‘‘मैं तो शायद यह सब देखने को जीवित न रहूँ लेकिन जिस अशुभ का मुझे डर है, वह यदि कभी देश पर आ जाए, आज़ादी ख़तरे में पड़ जाए तो आनेवाली पीढिय़ों को मालूम होना चाहिए कि यह सब सोचना इस बूढ़े के लिए कितना यातनाकारी था।’’

26

इतवार की शाम पाँच बजे जब ढूँढ़ता-ढाँढता कविमोहन कुहू के घर बंगाली मार्केट के पिछवाड़े पहुँचा तो बाहर फाटक तक उनके रेडियो से क्रिकेट कमेंट्री सुनाई दे रही थी। फाटक पर नेमप्लेट के पास ही कॉलबेल लगी थी। कॉलबेल दबाने पर पाजामा और टीशर्ट पहने एक किशोर लडक़ा बाहर आया। उसने हँसते हुए दोनों हाथ जोड़े और कहा, ‘‘गुड ईवनिंग सर।’’

‘‘तुम देवू हो, देवाशीष?’’

‘‘बेशक! आइए आप बाबा के पास बैठिए।’’

अन्दर बैठक में बेंत के सोफे पर देवू के पिता आनन्द शंकर भट्टाचार्य रेडियो के पास बैठे थे। उनके घुटनों के पास क्रिकेट का बल्ला रखा था और हाथों में गेंद थी। कविमोहन के अभिवादन पर उन्होंने ज़रा-सा सिर हिला दिया लेकिन ध्यान उनका कमेंट्री पर ही रहा।

तभी कुहू अन्दर के दरवाज़े से आयी और कवि को ‘आइए’ कहकर साथ ले गयी।

बाहर बड़ा-सा आँगन था जिसके चारों ओर तरह-तरह के पौधे लगे हुए थे।

सलवार-कुरते और दुपट्टे में कुहू एकदम स्कूली लडक़ी नज़र आ रही थी। कॉलेज में उसके बाल जो जूड़े में बँधे रहते थे, इस वक्त कमर के नीचे तक लहरा रहे थे। उसका साँवला रंग यौवन की आभा में दमक रहा था। सबसे सुन्दर उसकी आँखें लग रही थीं जिनमें काजल की लकीर के सिवा, चेहरे पर प्रसाधन का और कोई चिह्न नहीं था।

अन्दर के कमरे में कुहू की माँ किताब पढ़ रही थीं। उन्होंने कवि का परिचय मिलने पर उसका मुस्कराकर स्वागत किया। किताब उन्होंने पलटकर रख दी। वे कुहू से बोलीं, ‘‘मैं चाय भिजवाती हूँ।’’

अब तक कुहू ने अपनी उत्तेजना पर क़ाबू पा लिया था। मूढ़े पर कवि को बैठाकर बोली, ‘‘क्रिकेट मैच वाले दिन ड्राइंगरूम में बैठना मुश्किल हो जाता है।’’

‘‘पिताजी को क्रिकेट का शौक रहा है?’’

‘‘देख रहे हैं न। हाथ में गेंद ओर पास में बल्ला रखकर कमेंट्री सुनते हैं। कभी छक्का पड़ता है तो इतने जोश में आ जाते हैं कि गेंद उछाल देते हैं।’’

‘‘ख़ुद भी खिलाड़ी रहे होंगे।’’

‘‘वह तो थे। कॉलेज में इतने इनाम जीते बाबा ने। अब घुटनों में दर्द रहता है, खेलना बन्द हो गया।’’

देवाशीष ट्रे में चाय और बिस्किट लेकर आया।

कुहू ने कहा, ‘‘देव, ये कविमोहनजी तुम्हारे लिए आये हैं।’’

‘‘पता है दीदी, मैं फाटक पर ही आपसे मिल लिया।’’

कवि को कुहू-घर दिलचस्प लगा। पिता खेल-प्रेमी, माँ पुस्तक-प्रेमी और बेटा, दोनों।

‘‘इन दिनों क्या पढ़ रहे हो?’’

‘‘श्रीकान्त।’’

‘‘बस कहानी-उपन्यास पढक़र टाइम वेस्ट करता है ये। कॉलेज का कोर्स कौन पूरा करेगा?’’

‘‘अभी परीक्षा में बहुत समय है। हो जाएगा।’’

‘‘आप इसकी कॉपियाँ देखें। हर पेज पर लिखता है वन्स अपॉन अ टाइम (एक बार की बात है) और कोरा छोड़ देता है। पूछो तो कहता है, अभी सोच रहा हूँ।’’

‘‘तुम तो कहानी-लेखक बन जाओगे।’’ कवि ने हँसकर देवू से कहा।

‘‘लेकिन यह तो कोई कैरियर नहीं है। बाबा चाहते हैं यह भी पढ़-लिखकर प्रोफेसर बने।’’

‘‘रास्ता तो सही है। उसे पढऩे का भी शौक है और लिखने का इरादा। किस इयर में हो देवू?’’

‘‘फस्र्ट इयर।’’

‘‘इसकी पढ़ाई थोड़ी पिछड़ गयी है। मैंने तो उन्नीस साल में बी.ए. पूरा कर लिया था।’’

कुहू की माँ एक प्लेट में सन्देश लेकर आयीं। उन्होंने कवि और कुहू के आगे प्लेट कर देवू से कहा, ‘‘खोकन मिष्टी खाबे?’’

‘‘नहीं माँ, भूख नहीं है।’’ देवाशीष बोला।

‘‘आमार हाथी खेएनौ।’’ कहते हुए माँ ने अपना हाथ बेटे के मुँह की तरफ़ बढ़ाया। उनके लिए उन्नीस साल का लडक़ा भी शिशु था जिसे वे अपने हाथ से खिलाना चाहतीं। घर भर के लाड़ले से पढ़ाई की सख्ती कौन करे, यह भी एक समस्या थी।

‘‘जिसे पढऩे का शौक हो उसके लिए कोर्स की किताबें पढऩा मुश्किल नहीं होता। और एक बात बताएँ देवाशीष। एक बार बी.ए. पार हो जाए तो एम.ए. आसान होता है क्योंकि तब एक ही विषय रह जाता है।’’

‘‘यही तो मैं दीदी से कहता हूँ। इंग्लिश तो मैं पढ़ लूँ पर फिलॉसफी और पोलिटिकल साइंस का क्या करूँ।’’

‘‘ये दोनों भी दिलचस्प विषय हैं। किस कॉलेज में हो?’’

‘‘हिन्दू कॉलेज।’’

‘‘गुड। वह तो अच्छा कॉलेज है।’’

बातों-बातों में सात बज गये। कवि जब जाने को उद्यत हुआ, कुहू की माँ ने आग्रह किया, ‘‘खाना खाकर जाओ।’’

‘‘आज इजाज़त दीजिए, फिर कभी।’’

देवाशीष उसे बस स्टॉप तक छोडऩे आया। कवि ने उसे सुझाव दिया कि वह कभी-कभी वापसी में उसके कॉलेज की तरफ़ आ जाया करे।

देवाशीष ने कहा, ‘‘दादा, मैंने भी दो-चार कविताएँ लिखी हैं। आपको दिखाऊँगा।’’
 
27

रक्षाबन्धन पर बस एक ही छुट्टी थी। लेकिन कवि का मथुरा पहुँचना ज़रूरी था। इसलिए वह तडक़े की गाड़ी में सवार हो गया। उस समय भी गाड़ी ठसाठस भरी हुई थी। खड़े और बैठे हुए लोगों के चेहरों पर आज के त्योहार का कोई चिह्न नहीं था। पता नहीं सवेरे-सवेरे सब कहाँ जा रहे थे।

मथुरा स्टेशन पर उतर कविमोहन आह्लालादित हो उठा। स्टेशन के प्लेटफॉर्म से ही सौंताल के मोरों का समवेत स्वर ‘मियाओ, मियाओ’ सुनाई दे रहा था। गर्मी ने भी मानो कुछ देर की छुट्टी ले रखी थी। यह कहना मुश्किल था कि धूप, आज के साथ कैसा सलूक करेगी लेकिन इस कुनमुनाती सुबह का मिज़ाज अच्छा था।

घर स्टेशन से दूर नहीं था फिर भी कवि ने रिक्शा कर लिया। उसे इन्दु और बच्चों को देखने की भीषण उत्कंठा हो रही थी।

उसके आने से माता-पिता और दो बहनों के चेहरे खिल उठे। तीसरी बहन कुन्ती ने डाक से राखी भेज दी थी कि माँजी की तबियत ख़राब होने के कारण वह आ नहीं सकेगी। कवि का ध्यान बार-बार सीढिय़ों की तरफ़ जा रहा था।

जीजी बोलीं, ‘‘बहू तो हफ्ता भर पहले ही आगरा चली गयी। कौन जाने कब लौटेगी।’’

कवि के मन में यकायक कोई बल्ब बुझ गया।

लीला ने कहा, ‘‘हम तो जब आयँ बहू हमें दिखती ही नायँ। कभी वह चौके में होय कभी नहानघर में। उसे पता ही नहीं बड़ी ननद की इज्ज़त कैसे की जाए।’’

भग्गो ने प्रतिवाद किया, ‘‘नहीं दीदी, भाभी तो तुम्हारी बहुत इज्ज़त करती है। बिल्लू-गिल्लू के कमीज़-पजामे उन्होंने ही सींकर भेजे थे।’’

जीजी ने कहा, ‘‘अरे कवि कब-कब आता है। उसे आज यहाँ होना चाहिए था।’’

कवि को अचानक ख़याल आया, ‘‘जीजी, उसे भी तो अपने भाइयों को सलूनो की राखी बाँधनी है।’’

‘‘वह ठीक है पर शादी के बाद ससुराल का भी ख़याल रखना चाहिए। कुन्ती को देखो, सास की ज़रा तबियत ख़राब भई तो चिट्ठी पठा दी।’’

‘‘तुमसे पूछकर ही गयी होगी।’’ कवि ने कहा।

‘‘जे तूने भली कही। जब तू जाने लगा तभी याने कह दी थी कि सलूनो पर वह जरूर जाएगी। सो रानी साहेबा अपनी कुमारियों को लेकर चल दीं।’’

‘‘अकेली?’’

‘‘नायँ, छोटा भाई सुरेश आया था लिवाने।’’

‘‘कब आने की कह गयी है।’’

‘‘हमसे तो कुछ कही नायँ। सुरेश ने कही वह अगले महीने छोड़ जायगा।’’

‘‘इत्ते दिनों को चली गयी।’’

‘‘देख लो, बाय ज़रा फिकर नहीं जीजी कैसे घर सँभारेंगी।’’

अपनी निराशा दबाकर कवि ने कहा, ‘‘चलो बहुत दिनों बाद आगरे गयी है इन्दु।’’

भग्गो एक तश्तरी में पेठा और दालमोठ लेकर आयी, ‘‘सुरेश भैया लाये थे, खाओ।’’

विद्यावती ने टोका, ‘‘पहले नहा-धोकर राखी बाँधो, तभी मुँह जूठा करना।’’

कवि बोला, ‘‘भग्गो, पहले चाय तो पिला।’’

‘‘अभी लायी’’ कहकर वह चौके में गयी।

चाय मिली पर कवि को रुची नहीं। चाय में दूध और चीनी भरपूर थी पर पत्ती की ख़ुशबू और रंगत नदारद थी। इन्दु के सिवा कोई भी ढंग से चाय बनाना नहीं जानता था।

यों घर भरा हुआ था पर कवि को खाली लग रहा था। बार-बार उसे पत्नी और बच्चों का ध्यान आता। उसका मन हो रहा था वह आगरे चला जाए लेकिन यह मुमकिन नहीं था। कॉलेज में रक्षाबन्धन की सिर्फ एक छुट्टी थी। शाम की गाड़ी से ही उसे लौटना होगा।

बहनों ने राखी की बड़ी तैयारी कर रखी थी। लीला ने ख़ुद अपने हाथ से कलाबत्तू की राखी बनायी थी। भगवती बाज़ार से सलमे सितारे जड़ी राखी लेकर आयी थी। आरती का थाल भी दोनों ने अलग ढंग से सजाया। लीला उसके लिए पैंट और कमीज़ का कपड़ा भी लायी। कवि ने कहा, ‘‘आज के दिन बहनें लेती हैं, देती नहीं।’’

लीला बोली, ‘‘तू छोटा होकर बड़ी बातें करनी सीख गयौ है। बड़ी बहनों को हक़ होता है छोटे भाई को कुछ भी दें।’’

कवि ने बहनों को नेग दिया और बिल्लू-गिल्लू और दीपक को भी रुपये दिये।

फिर उसने दस-दस के दो नोट विद्यावती की गोदी में डालकर कहा, ‘‘जीजी, अभी मुझे अच्छा मकान मिला नायँ, मिल जाय तो तुम्हें ले जाकर दिल्ली घुमा दूँ।’’

लाला नत्थीमल बच्चों को देखकर प्रसन्न हो रहे थे। बिल्लू-गिल्लू और दीपक के आने से घर-आँगन चहक उठा था। कवि का माँ को दिल्ली ले चलने का चाव देखकर उनके कलेजे में एक हूक उठी कि बेटे ने बाप से एक बार नहीं कहा कि आपको भी दिल्ली घुमाऊँगा। उन्होंने तसल्ली लेने की कोशिश की—चलो यह कहता भी तो मैं दुकान-मकान छोडक़र कैसे चल देता। इसकी महतारी का तो पाँव चरखे के चक्कर में बाहर निकल गया है। अब बहू के न होने से थोड़ी अक्ल ठिकाने आयी है वरना तो मेरी कभी सुनी ही नहीं इसने।

बेटे के प्यार से विद्यावती निहाल हो गयी। कुछ-कुछ मचलकर कह उठी, ‘‘अब तू आयौ है तो मोय डागदर के भी दिखाय दे। बायीं आँख से कछू टिपै ही नायँ। बस पनियाई रहै।’’

कवि को चिन्ता हुई ‘‘आँखें कब ख़राब हुई, तुमने बताया ही नहीं।’’

‘‘तू यहाँ हो तो बताऊँ।’’

‘‘मैंने तुम्हें बोरिक पाउडर लाकर दिया था कि नायँ। कित्ती बार धोयी तुमने आँख। छोरे के आगे चोचले करने का क्या मतबल है।’’ लाला नत्थीमल बिगड़ गये। दरअसल उनकी भी आँखों में यही समस्या हो गयी थी। उन्हें एक कम्पाउंडर ग्राहक ने यह इलाज बताया था तो वे दो पुडिय़ा बोरिक पाउडर लाये थे। एक उन्होंने पत्नी को दी थी।

सचाई यह थी कि विद्यावती ने एक भी बार आँख धोयी नहीं थी। कवि को देखकर नसें ऐसी शिथिल हुईं कि सभी शिक़ायतें याद आने लगीं।

शाम की गाड़ी से कवि का वापस आना ज़रूरी था। उसने कहा, ‘‘भग्गो, तू जीजी को आँख के डॉक्टर के पास ले जाना। रुपये जीजी के पास हैं।’’

विद्यावती का चेहरा पीला पड़ गया। वे डर गयीं। पता नहीं पति क्या सोचे कि कवि ने उन्हें कारूँ का खजाना दे दिया है।

‘‘भैयाजी, बड़े डागदर की फीस सोलह रुपये है।’’

‘‘तो क्या हुआ। जीजी देंगी, हैं न जीजी?’’

‘‘मैं कहूँ अपनी मैया के इलाज को तू रुपयों की गाँठ बाँधकर दे जाय रहा है, बाप से तोय छँटाँक भर भी प्यार नहीं है कि उसका हाल भी पूछे।’’ नत्थीमल बोल पड़े।

‘‘दादाजी आप स्वयं समर्थ हो, आपको हम क्या आसरा देंगे, आप तो घर भर का आसरा हो।’’

लाला नत्थीमल तारीफ़ से खुश तो हुए पर उन्होंने टेक नहीं छोड़ी।

‘‘कुछ भी कह, सच्ची बात तो यह है कि बच्चे घर से दूर जाकर निठुर हो जाते हैं। माँ-बाप से ज्यादा उन्हें अपनी आज़ादी की फिकर होवै। अब देख ले कुन्ती समसाबाद ब्याही तो वहीं की हो गयीं। तू दिल्लीवाला बन गया। सबको आजादी का चस्का लग गया।’’

‘‘इसमें क्या बुराई है। दादाजी यह समझ लो पूरी दुनिया में सारी मारकाट आजादी की खातिर है। आजादी के बिना तरक्की भी नहीं होती।’’

‘‘चलो अब तो आज़ादी मिल गयी, अब देखें तू कितनी तरक्की करेगौ।’’

‘‘हैं, आजादी मिल गयी का?’’ विद्यावती चौंकी।

‘‘समझ लो सब तैयारी हो गयी है। गाँधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद सबने अँग्रेज़ों के सामने अपनी शर्तें रख दी हैं। वाइसराय राजी हो गये हैं। बस एक बात बुरी है कि हिन्दुस्तान का बड़ा-सा हिस्सा कटकर अलग हो जाएगा।’’

‘‘कहाँ चला जाएगा।’’

‘‘पराया देश बन जाएगा। पाकिस्तान कहलाएगा। तभी देख रही हो न सिन्ध, पंजाब, कश्मीर से लोग भागे चले आ रहे हैं। इसी तरह यहाँ के लोग वहाँ जा रहे हैं।’’

‘‘भैयाजी इससे क्या फायदा। बात तो वही रही।’’

लाला नत्थीमल बोले, ‘‘वही कैसे रही। हिन्दुओं को हिन्दुस्तान में अच्छा लगता है, मुसलमानों को पाकिस्तान में। इन दोनों जातियों में भाईचारा तो रहा पर रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं बना।’’

‘‘रही-सही कसर लीग ने पूरी कर दी। जिन्ना जैसे लिबरल आदमी को कठमुल्ला बना लिया। हमारे कॉलेज में कई साथी एकदम कट्टर बन गये हैं।’’

‘‘तू उनके साथ मत रहा कर।’’

‘‘साथ काम करते हैं, उठना-बैठना तो पड़ता है।’’

‘‘ऐसे काम का क्या फायदा। यहाँ घर की घर में काम का ढेर लगा पड़ा है। लीला अच्छी-भली चक्की बन्द करबे की सोच रही है। मेरा हाल भी डाँवाडोल है।’’

‘‘दादाजी, मेरी पढ़ाई की कुछ तो कद्र कीजिए। मैं तो कहूँ लीली दीदी चक्की या तो बेच दें या एक मुनीम रख लें। बिल्लू-गिल्लू को पढ़ाई में लगाओ न कि चक्की में।’’

लीला को बुरा लगा। कवि खुद तो कोई फ़र्ज के नीचे आता नहीं, बच्चों को भी बाग़ी बना रहा है।

बिगडक़र बोली, ‘‘रहने दे बड़ा आया लाटसाब। हमारे मूड़ पे पड़ी, हम काट लेंगे।’’

भगवती ने बात बदलने को कहा, ‘‘तिमाही इम्तहान में मेरे सबसे ऊँचे नम्बर आये हैं, भैयाजी, कॉपी दिखाऊँ।’’

वाकई हर विषय में उसके प्रथम श्रेणी के प्राप्तांक थे।

कवि बहुत खुश हुआ। उसकी पीठ ठोककर शाबासी दी और पूछा, ‘‘तब तो तू क्लास में अव्वल आयी होगी।’’

‘‘कहाँ,’’ भगवती ने मुँह लटका लिया, ‘‘दो लडक़ों के नम्बर मुझसे भी ज्याीदा हैं। मनमोहन और गोविन्द को मैं पछाड़ ही नहीं सकती।’’

‘‘अगली बार और मेहनत कर तो अव्वल आ जाएगी। अगर उन लडक़ों को पछाड़ देगी न, तो मैं दिल्ली से तेरे लिए बड़ा-सा इनाम लाऊँगा।’’

‘‘सब पढ़ैया-लिखैया लेकर बैठ गये किसी को फिकर नहीं मेरी नैया कैसे पार लगेगी।’’ लीला सिर पर हाथ मारकर रोने लगी। विद्यावती उसे घपची में भरकर चुप करावें पर लीला का तो जैसे बाँध ही टूट गया।

‘‘देख लिया न भैया जी येई मारे मेरी पढ़ाई चूल्हे में झुँक जाय है।’’ भगवती ने दबी ज़ुबान से भाई को बताया।

‘‘दीदी, तुम्हारे रोने से तो जीजाजी आ नहीं जाएँगे। ये तो लडऩे से पहले सोचना था न!’’ कवि ने कहा।

‘‘बताओ जीजी, मैं लड़ी थी या कुबोल बोली। मोय तो दादाजी ने जिस ठौर बैठा दिया वहाँ चुपचाप बैठ गयी। मोय सूधी जान के ही यह सब हुआ। कोई तेज बैयर होती तो आदमी को टस्स से मस्स न होवे देती।’’

कवि का जी घबराने लगा। उसे लगा वह फिर एक चक्रव्यूह में समाता जा रहा है। अन्दर से आवाज़ें आने लगीं, ‘यहाँ से भाग निकलो, यही वक्त है।’

कवि ने घड़ी देखी, माता-पिता के पैर छुए, बहनों के सिर पर हाथ फेरा, भतीजों को प्यार किया और अपना झोला उठा स्टेशन के लिए चल पड़ा।

बिल्लू-गिल्लू कहते रहे, ‘‘मामा लाओ हम झोला ले चलें। स्टेशन पहुँचाकर लौट आएँगे।’’

कवि ने कहा, ‘‘नहीं भैया, अपनी मैया का ध्यान रखना, वह रोवे न।’’

स्टेशन पहुँचकर पता चला कि गाड़ी आधा घंटा देर से आएगी। कवि बेंच पर बैठ गया। उसे घर से निकलकर राहत महसूस हो रही थी। उसे बड़ी ज़ोर से कुहू का घर याद आया। एक वह घर था जहाँ हर आदमी स्वाधीन, मुखर और सुखी था। एक यह घर है जहाँ शुभ से शुभ अवसर की मिट्टी पलीद हो जाती है। बिना लड़ाई-झगड़े, आँसू और अंगारे के बात सिलटती ही नहीं। इन्दु की ग़ैरहाजिरी में यह घर असहनीय हो जाता है। उसे अपने ऊपर खीझ आयी कि उसे यह याद क्यों नहीं रहा कि सलूनों पर इन्दु आगरे गयी होगी। न आता वह मथुरा, बहनों को मनीऑर्डर से रुपये भेज देता।

गाड़ी खचाखच भरी हुई आयी। हर डिब्बे से उतरे इक्का-दुक्का यात्री किन्तु चढ़े कहीं ज्या दा। कवि किसी तरह एक जनरल डिब्बे में सवार हो गया लेकिन वहाँ बैठने की तिल भर गुंजाइश नहीं थी। चार सवारियों की बर्थ पर छह-सात ठस-ठसकर बैठी थीं। बीच-बीच में कई सवारियाँ अपना टीन का ट्रंक रास्ते में खिसकाकर उस पर टिकी हुई थीं। इससे खड़े होनेवाले मुसाफिरों की ज्याकदा मुसीबत थी। हर कोई उनसे कहता, ‘कहाँ सिर पर चढ़े चले आ रहे हो, अलग हटकर खड़े हो।’ पैर टिकाने की जगह मुहाल थी।

यह रेल का डिब्बा क्या था भारतदेश का जिन्दा नक्शा था। कहीं कुल्लेदार साफे में सजे सिर आपस में पंजाबी में बोल रहे थे कहीं दाढ़ीवाले चेहरे उर्दू में आज के हालात पर तबसिरा कर रहे थे। कवि की तरफ़वाले हिस्से में दो औरतें काले बुर्के में एक-दूसरी से सटकर बैठी थीं। उसी बर्थ पर चार स्त्रियाँ और चार बच्चे भी आसीन थे। इन स्त्रियों ने दुपट्टे से सिर ढँक रखा था। उनके चेहरे निर्विकार थे लेकिन बच्चों को डाँटते और टोकते वक्त उनमें गुस्से का पुट आ जाता।

अलीगढ़ पर दोनों बुर्केवाली सवारियाँ और उनके साथी दो मर्द डिब्बे से उतर गये। खाली जगह पर बैठने की हड़बड़ी में खड़े यात्रियों में काफ़ी खलबली मची। तभी एक मोटी-सी स्त्री उस खाली जगह में लेटकर अपने पेट पर हाथ फेरने और हाय-हाय करने लगी। उसकी तबियत ख़राब लग रही थी। साथवाली स्त्री उसे अख़बार से हवा करने लगी। खड़े हुए लोगों में से एक को भी बैठने की जगह नहीं मिली क्योंकि अब तक ठस-ठसकर बैठे लोग कुछ पसरकर बैठ गये। गाड़ी सरकने को थी कि डिब्बे में चार सवारियाँ और घुस आयीं। बुर्कानशीन स्त्री, दो लडक़े और एक आदमी। आदमी ने अन्दर बर्थ पर पहुँचते ही सवारियों को घुडक़ा, ‘‘यहाँ खड़े होने की जगह नहीं और आपको लेटने की सूझी है। ठीक से बैठो, लेडीज़ को बैठना है।’’ उसकी घुडक़ी में कडक़ थी। लेटी हुई औरत कराहते हुए बैठ गयी। बुर्केवाली स्त्री बैठी और दोनों बच्चों को भी बैठाने लगी। एक तो किसी तरह फँसकर बैठा दूसरा नहीं बैठ पाया। आदमी ने बिगडक़र कहा, ‘‘छोटे बच्चों का टिकट नहीं लगता, उन्हें सीट पर क्यों बिठाया है, गोदी लो।’’ औरतें बोल पड़ीं, ‘‘तुम कहाँ के कानूनदाँ हो जी, हमारे बच्चे ऐसे ही बैठेंगे।’’ आदमी ने जेब से टिकट निकालकर दिखाये, ‘‘देखो इन बच्चों का हमने टिकट कटाया है।’’

‘‘तो हम क्या करें? हम तो झाँसी से बैठकर आ रहे हैं।’’

एक छोटे बच्चे को उठाकर वह आदमी ज़बरदस्ती महिला की गोद में डालने लगा। बच्चा चिल्ला उठा। तभी सामने की बर्थ से एक आदमी उठा और बिगड़ैल आदमी की बाँह झिंझोडक़र बोला, ‘‘ख़बरदार जो बच्चे को हाथ लगाया।’’

‘‘तुम्हारे बच्चे बैठेंगे, हमारे खड़े रहेंगे क्या? ग़ाजियाबाद तक जाना है।’’

‘‘ऐसा ही नखरा है तो फस्र्ट क्लास में जाते, थर्ड क्लास में क्यों आये हो।’’

बिगड़ैल आदमी और भी उग्र हो गया, ‘‘जगह तुम्हारे बाप की नहीं है, रेल तो सबकी है, चुप करके बैठो।’’

एक स्त्री अपने आदमी से चुप होने का इशारा कर रही थी। बच्चे भी बेचैन हो रहे थे।

आदमी ने जोश में आकर बिगड़ैल आदमी को हल्का-सा धक्का दे दिया।

बिगड़ैल ने कमीज़ की जेब में हाथ डालकर फौरन रामपुरी चाकू निकाल लिया, ‘‘साले अभी चीरकर रख दूँगा, सारा मोबिलऑइल निकल जाएगा तेरा।’’

सभी बच्चे और औरतें डर के मारे चिल्लाने लगे। कई लोग उठकर खड़े हो गये, ‘‘जाने दो भई, क्यों गरम होते हो, बैठना है तो बैठ जाओ।’’

बिगड़ैल आदमी ने ख़ूनी नज़रों से प्रतिद्वन्द्वी को देखते हुए चाकू मोडक़र जेब के हवाले किया। यात्रियों ने उसके लिए जगह बना दी। बच्चे सहमकर पहले ही माँओं से जा चिपके थे। बिगड़ैल आदमी का परिवार ठीक से बैठ गया। डिब्बे का माहौल तनावपूर्ण हो गया। पहले की बतकही और शोर थम गया। शिकोहाबाद पर जब गाड़ी में थोड़ी जगह हुई तो सवारियाँ उठकर इस तरह बैठ गयीं कि हिन्दू एक तरफ़ हो गये और बाकी तबके दूसरी तरफ़।

भारत का विभाजन अभी घोषित नहीं हुआ था लेकिन जनता रोज़ विभाजित हो रही थी। विभाजन से ज्या दा विभाजन की ख़बरें लोगों को उद्वेलित कर रही थीं। अख़बारों में कभी कैबिनेट मिशन के उद्देश्य छपते जो पढऩे में मासूम लगते लेकिन लोगों में उनकी मीमांसा का अलग ही रूप निकलता। इन उद्देश्यों में भारत-विभाजन का कोई संकेत नहीं था लेकिन जनता के मन में अँग्रेज़ सरकार के लिए घोर अविश्वास था। उन्हें लगता ऐसा हो ही नहीं सकता कि टोडी बच्चा हमेशा के लिए वापस ब्रिटेन चला जाए।

कुछ लोग महात्मा गाँधी की अहिंसावादी नीतियों को ही विभाजन का जिम्मेदार ठहराते। उन्हें लगता आम सहमति निर्मित करने के चक्कर में गाँधीजी हर निर्णय में ढुलमुलपन दिखा रहे हैं। दूसरी ओर मुहम्मद अली जिन्ना दो टूक शब्दों में कह रहे थे हिन्दुस्तान कभी भी एक राष्ट्र नहीं था। एक हिन्दुस्तान में न जाने कितने हिन्दुस्तान छुपे बैठे थे। एक तरफ़ सभी रियासतों के राजा अपना अलग वर्चस्व बनाये हुए थे, दूसरी ओर मुसलमान यहाँ के समाज में अलग-थलग पड़े थे। जिन्ना ने साफ़ शब्दों में कहा कि हिन्दुस्तान की हर समस्या का हल पाकिस्तान है।

एक समय ऐसा था जब गाँधीजी और जिन्ना दोनों हिन्दुस्तान को अँग्रेज़ शिकंजे से आज़ाद कराना चाहते थे। यह अँग्रेज़ सरकार की सफलता थी कि उन्होंने उदार जिन्ना को अनुदार और संकीर्ण विचारधारा की तरफ़ मोड़ दिया। उन्होंने गाँधीजी को सम्पूर्ण भारत का नेता मानने की बजाय सिर्फ हिन्दुओं का नेता माना क्योंकि इससे उनकी सम्प्रदायवादी नीति को बल मिलता था। जिन्ना ने तो अपने को मुसलमानों का प्रतिनिधि नेता घोषित कर साफ़ कह दिया, ‘‘हम दस करोड़ लोग हैं, हम अपने अधिकारों के लिए आखिरी दम तक लड़ेंगे।’’ उनके ऐसे बयानों से मुसलिम मानसिकता में एक हेकड़ी और आत्मविश्वास पैदा हुआ। पाकिस्तान की स्थापना लोगों के लिए युटोपिया जैसा स्वप्न बनती गयी। वहाँ जाने के इच्छुक लोगों को हिन्दुस्तान कबाड़घर की तरह लगने लगा जहाँ वे अपना रद्दी सामान और परिवार के अवांछित सदस्य पटककर नये-नकोर देश में जा सकते थे।

विभाजन की वार्ता ऊँचे राजनीतिक स्तर पर चलने से आम जन के मनोविज्ञान पर लगातार प्रतिगामी प्रभाव पड़ रहे थे। लोगों के दिमाग में जैसे चॉक से लकीर खिंच गयी थी, हम यहाँ के, वे वहाँ के; जबकि अभी यह भी स्पष्ट नहीं था कि देश के कौन से हिस्से पाकिस्तान में जाएँगे। अचानक अफ़वाह फैलती कि अलीगढ़ पाकिस्तान में चला जाएगा। लोग अचम्भा करते कैसे अलीगढ़ दूसरे देश में जाएगा, क्या उसके पहिये लग जाएँगे या पाकिस्तान में एक नया शहर बसाकर उसका नाम अलीगढ़ रखा जाएगा। लोग सोचते अगर सारे ताले बनानेवाले कारीगर पाकिस्तान चले गये तो हम हिन्दुस्तानी अपने घरों में ताले कहाँ से लाकर लगाएँगे। तभी ख़बर उड़ती कि अजमेर तो पाकिस्तान ज़रूर चला जाएगा। अजमेर शरीफ़ के बिना उनका गुज़र ही नहीं। यहाँ के लोग कहते, ‘‘अजमेर शरीफ़ पर तो हम भी चादर चढ़ाते हैं, ऐसे कैसे वे उठाकर ले जाएँगे।’’ 1947 के ये दिन बड़ी उलझन, ऊहापोह और असमंजस के दिन थे। स्कूल के बच्चे अपनी तरह के तुक्के लगाते, ‘‘अब लाल क़िला और ताजमहल यहाँ नहीं रहेगा। इसकी एक-एक ईंट उखाडक़र ये लोग पाकिस्तान ले जाएँगे।’’

सुननेवाले बच्चे कहते, ‘‘वहाँ जाकर कैसे जोड़ेंगे?’’

पहलेवाले बच्चे कहते, ‘‘अरे अपने साथ तस्वीर ले जाएँगे। तस्वीर देख-देखकर जोड़ेंगे।’’

औरतें कहतीं, ‘‘हमने तो सुनी है फिरोज़ाबाद भी पाकिस्तान में चला जाएगा। सारे मनिहार अपना साँचा-भट्टी वहीं लगाएँगे।’’

‘‘हाय राम फिर हमें चूड़ी कौन पहराएगा। हम क्या नंगी-बुच्ची कलाइयाँ रखेंगी?’’ कुछ और औरतें पूछतीं।

जानकार औरतें अपनी साथिनों की घबराहट बढ़ाने के लिए बतातीं कि बनारसी साड़ी बुननेवाले जुलाहे, बुनकर सब पाकिस्तान जानेवाले हैं।

अबोध औरतें हिन्दुस्तान के भविष्य को लेकर भयभीत हो जातीं। उन्हें लगता उनकी बेटियों के ब्याह में न जामदानी साड़ी आएगी, न मेंहदी लगेगी न शहनाई बजेगी, न चूडिय़ाँ पहनी जाएँगी।

औरतें कहतीं, ‘‘किसने कहा बँटवारा होना चाहिए। जैसे सब मिलजुलकर इत्ते बरस रहते रहे वैसे ही रहते रहें।’’

दिल्ली, बम्बई और लन्दन में बैठे नेताओं को जनता की राय दरकार नहीं थी। एक बार बँटवारे की बात उठी तो उसमें क्षेपक जुड़ते गये। हर उदारवादी नेता के विचार को अतिवादियों ने तोड़ा, मरोड़ा और उसका भुरकस निकाल दिया। मौलाना अबुलकलाम आज़ाद को सिर्फ इसलिए गालियाँ मिलीं क्योंकि वे मुसलमान होते हुए भी एक देश, एक राष्ट्र व एक संघीय सरकार की ज़रूरत पर ज़ोर दे रहे थे। केबिनेट मिशन के सर क्रिप्स ने उनसे कहा कि मुसलिम बहुल प्रान्तों के लिए अलग अधिकार-तालिका बना दी जाए तो आज़ाद ने कहा कि यह विकल्प एक संघीय सरकार की अवधारणा के विरुद्ध होगा। गाँधीजी ने अन्त तक कहा कि वे दो राष्ट्र के सिद्धान्त से एकदम असहमत हैं। इससे किसी का भला नहीं होगा।

सन् 1947 में आज़ादी आते तक गाँधीजी अपनी मान्यताओं में बिल्कुल अकेले पड़ गये। महत्त्वाकांक्षी नेताओं को लगने लगा कि आज़ादी की लड़ाई अनिश्चित काल तक चलती रहेगी, अँग्रेज़ कभी भारत नहीं छोड़ेंगे, गाँधीजी अहिंसा की जिद ठाने, सबको घिसटाएँगे और लीग लोगों में बगावत के बीज डालती रहेगी।

बँटवारे की चर्चा इतने लम्बे समय तक चली कि जनता में बदहवासी फैलती गयी। सडक़ों पर, घरों में, दुकानों में लूटपाट, छुरेबाज़ी और हाथापाई की घटनाएँ आम हो गयीं। कश्मीर, पंजाब और सिन्ध से भागकर लोगों ने दिल्ली और अन्य शहरों का रुख किया। दिल्ली में यकबयक इतनी भीड़ बढ़ गयी कि मकान तलाश करना दुश्वार हो गया। शक़-शुबहे का वातावरण ऐसा कि जो शरणार्थी नहीं था उसे भी शरणार्थी मानकर लोग झट अपना दरवाज़ा बन्द कर लेते।

कवि के सामने समस्या थी कि सीमित आमदनी में से वह आधी तनखा घर भेजे तो आधी से गुज़र कैसे हो। कभी-कभी पैसे बचाने के विचार से वह स्टोव पर ख़ुद खिचड़ी बनाने का उपक्रम करता लेकिन हर बार कुछ-न-कुछ गड़बड़ हो जाती। कभी खिचड़ी कच्ची रह जाती तो कभी जलकर ढिम्मा बन जाती। कभी उसमें नमक ज्याादा पड़ जाता तो कभी बिल्कुल फीकी रह जाती। खाना बनाने के बाद बर्तन-साफ़ करना भी एक समस्या थी। ज्याददा समय उसे सडक़ छाप रेस्तराँ और ढाबों पर मयस्सर रहना पड़ता। उसकी इच्छा होती कहीं एक कमरा और रसोई का भी मकान मिल जाए तो वह इन्दु और बच्चों को यहाँ बुला ले। लेकिन मकान महँगे होते जा रहे थे।

कवि को यह देखकर हैरानी होती कि सिन्ध, पंजाब से आये लोगों में किस हद तक संघर्षधर्मिता और जिजीविषा थी। सीताराम बाज़ार के इधरवाले मोड़ पर एक अधेड़ आदमी चटाई बिछाकर बडिय़ाँ पापड़ बेचने लगा था। उसने एक गत्ते पर लिखकर टाँग रखा था ‘अमृतसर की बडिय़ाँ-पापड़’। अमृतसर में स्वर्णमन्दिर के सामनेवाली गली में उसकी बड़ी-सी दुकान थी जिस पर बड़ी-पापड़ के अलावा मसाले और दालें बिकती थीं। दंगों में उसकी दुकान आग के हवाले हो गयी। घर पर थोड़ा माल रखा था, वही लेकर वह अपनी पत्नी के साथ दिल्ली चला आया। उसने गुरुद्वारे में शरण ली लेकिन लंगर में खाना नहीं खाया। अपने शहर में वह दस को खिलाकर खाता था। मुफ्त की रोटी उसे स्वीकार नहीं थी। वह सारा दिन सीताराम बाज़ार में बड़ी-पापड़ बेचता। उसकी पत्नी दुपट्टे से अपना सिर लपेटे पास में बैठी रहती। रात को वे चाँदनी चौक या लाजपतराय मार्केट में ढाबे से ख़रीदकर दाल-रोटी खाते। पटरी पर लगनेवाली दुकानों की संख्या बहुत बढ़ गयी थी। जो लोग अपना थोड़ा-बहुत सामान लाने में कामयाब हो गये थे उन्होंने उसी से अपना धन्धा शुरू कर दिया। ऊँची दुकानों के मुकाबले वे सस्ते में सामान देते। ग्राहक से मीठी बोली बोलते। दिल्ली के लिए यह बिल्कुल नये किस्म का व्यापार-विनिमय था। गोरे रंग और कंजी आँखोंवाले ख़ूबसूरत पंजाबी और सिन्धी विक्रेता ग्राहकों को ‘आओजी बादशाहो’, ‘मालिक’ और ‘साहब’ कहकर सम्बोधित करते। दिल्ली अभी तक ख़ानदानी किस्म के मोटे थुलथुल सेठों से परिचित रही जो गद्दी पर ठस्स बैठे रहते। उनका व्यापार मुनीम और सेल्समैन के जरिए चलता। उनकी सूरत देखकर लगता ग्राहक और मौत बस एक दिन आते हैं। ग्राहक के प्रति कोई स्वागत भाव उनमें न होता। ऊपर से ये व्यापारी दुकान में जगह-जगह लिखकर तख्तियाँ लटका देते ‘एक दाम’, ‘उधार मुहब्बत की कैंची है’। कम आमदनीवाला ग्राहक ऐसी जगहों में घुसने की हिम्मत ही न करता। इनके बरक्स, अपने ठीये-ठिकाने से उखड़े हुए लोग अपने दोस्ताना व्यवहार से ग्राहक का दिल जीत लेते। उन्होंने दिल्ली में कपड़ों को कुछ और रंगीन बना दिया, खाने को कुछ और चटख़ारेदार और व्यापार की रफ्तार में फुर्ती भर दी।
 
28

आगरे के गोकुलपुरा में रहते हुए, कुछ दिन तो इन्दु और बेबी-मुन्नी का बहुत मन लगा। अगल-बगल होते हुए भी आगरे और मथुरा की सभ्यता, संस्कृति बिल्कुल अलग थी। घर की दिनचर्या भी भिन्न थी। फिर यहाँ इन्दु के ऊपर काम की अनिवार्यता और जिम्मेदारी नहीं थी। मन हुआ तो भाभी के साथ कपड़े धुलवा लिये, तरकारी कटवा दी, नहीं हुआ तो बच्चों को लेकर छत पर चली गयी।

इन्दु के चार भाई थे जिनमें से दो अभी पढ़ रहे थे। बड़े दो भाइयों ने यहाँ बीच बाज़ार में दवाओं की दुकान खोली थी ‘फ्रंटियर गुप्ता स्टोर’। बड़े भाई इंटर पास थे और छोटे भाई ने फ़ार्मेसी में डिप्लोमा किया था। पश्चिम पंजाब में अपना समृद्ध सराफ़ा व्यापार छोडक़र दवाओं की शीशी और गोलियों में मन लगाना आसान तो नहीं था पर उन्होंने अपनी सूझबूझ से बहुत जल्द व्यापार जमा लिया। कालीचरण और लालचरण को दवाओं की अच्छी जानकारी हो गयी। वे दवाओं के साथ आया साहित्य और निर्देश पुस्तिका ख़ूब ध्यान से पढ़ते। रोगी को दवा देते समय वे सलाह भी देते, ‘‘यह ख़ाली पेट खाना, यह दवा नाश्ते के बाद की है। इस दवा से ख़ुश्की हो जाती है, दूध ज़रूर पीना।’’

रोगी अभिभूत हो जाता। उसे लगता बिना फीस दिये यहाँ सेंत में डॉक्टर मिल जाता है। उन दोनों बड़े भाइयों को लोग डॉक्टर साहेब कहते। सुबह दुकान खुलने से पहले लालचरण पिछले कमरे में अक्सर खरल में अनेसिन और एस्प्रो की गोलियाँ पीसते और उनकी छोटी पुडिय़ा बना लेते। यह सिरदर्द, बदनदर्द की पुडिय़ा थी। इसका कागज़ सफेद रहता और हर पुडिय़ा पर नम्बर एक लिखा रहता। इसी तरह बैरालगन और बैलेडिनॉल की गोलियाँ पीसकर वे पीले कागज़ में पुडिय़ा बनाते जिन पर नम्बर दो लिखा रहता। यह पेटदर्द की पुडिय़ा थी। इन दो पुडिय़ों के चलते लालचरण ने बहुत यश और धन अर्जित किया। सीधे-सादे अनपढ़ ग्राहक उन्हें दो पुडिय़ा का जादूगर मानते। कालीचरण ने मिक्सचर बनाना सीख लिया था। उनके मिक्सचरों से खाँसी, जुकाम, बुख़ार और बदहज़मी ठीक हो जाती।

‘फ्रंटियर गुप्ता स्टोर’ की कमाई अच्छी थी। रात नौ बजे दोनों भाई जब दुकान बढ़ाकर लौटते उनकी जेबें नोटों और फुटकर पैसों से फूली रहतीं। सारा पैसा वे एक रूमाल पर उँड़ेलकर गिनते और कुछ रेजगारी रोककर बाकी पैसे रुपये तिजोरी में रखते जाते। यह रेजगारी वे बीवी-बच्चों में बाँट देते। उनके घर लौटने की बच्चे-बच्चे को प्रतीक्षा रहती। अक्सर माँ-बच्चों में बहस हो जाती। माएँ चाहतीं कि बच्चे अपनी रेज़गारी उनके पास जमा करें। बच्चे कहते, ‘पापा ने हमें दिये हैं, हम अपनी गुल्लक में डालेंगे।’

इन्दु के आने पर रेज़गारी में तीन हिस्से और बनने लगे। बड़े भाई कालीचरण इन्दु, बेबी, मुन्नी को भी पैसे देते। इन्दु निहाल हो जाती। भाई का प्यार और अपनापन वह अपनी आत्मा तक महसूस करती। लेकिन भाभियों के चेहरे कठिन हो जाते। प्रकट में कुछ न कहतीं लेकिन चौके में बैठ खुसर-पुसर करतीं कि बीबीजी जाने कब विदा होंगी!

कालीचरण, लालचरण की एक और आदत थी। रोज़ रात को वे मौसम की कोई-न-कोई खाने की चीज़ घर ज़रूर लाते। कभी लीची तो कभी खुबानी, कभी चैरी। इस तरह वे एबटाबाद के उन दिनों को वापस लौटाने की चेष्टा करते जब उन्होंने ये सब फल इफ़रात में देखे और खाये थे। दालमोठ और तले हुए काजू तथा सेम के बीज भी उन्हें पसन्द थे। फुर्सत के किसी छोटे-से हिस्से में लालचरण, पंछी या अग्रवाल हलवाई के यहाँ से ये नमकीन ख़रीदकर रख लेते। उन सबकी थाली जब परोसी जाती उसमें भोजन के साथ थोड़े-से काजू, सेमबिज्जी और दालमोठ ज़रूर रखी जाती। इन्दु के आने पर भाइयों को न जाने कब के भूले-बिसरे स्वाद याद आने लगे। कालीचरण कहते, ‘‘इन्दो तुझे पता है अम्माजी काँजी के बड़े कैसे बनाती थीं?’’

इन्दु इन दिनों बच्ची की तरह चहक रही थी, ‘‘हाँ भैया, मैं ही तो दाल पीसती थी। इमामदस्ते में राई कूटना, मर्तबान में तले हुए बड़े और पानी डालना सब मेरे काम थे। अम्माजी से उठा-बैठा कहाँ जाता था।’’

‘‘ये भाभी और रुक्मिणी बनाती हैं पर वह स्वाद नहीं आता।’’ लालचरण कहते।

भाभियाँ तन जातीं। रुक्मिणी अपनी बैठी आवाज़ में प्रतिवाद करती, ‘‘चाहे कित्ता भी अच्छा बना दो, ये तो यही कहेंगे कि अम्माजी जैसा नहीं बना।’’

‘‘कोई तो कसर रह जावे है।’’ लालचरण कहते।

‘‘भाभी आप मर्तबान में हींग का धुआँ देती हैं कि नहीं।’’ इन्दु पूछती।

‘‘हम तो हींग, पिट्ठी में डालते हैं।’’

‘‘वह तो सभी डालते हैं। मर्तबान में हींग की ख़ुशबू ज़रूर होनी चाहिए। उसी से बड़ों में स्वाद आता है।’’

‘‘हमें तो पता ही नायँ मर्तबान में हींग कैसे मली जाय!’’

‘‘वह लो। सीधी-सी बात है। बलता हुआ अंगारा चिमटे से उठाकर साफ जमीन पर रखो। उसके ऊपर हींग की छोटी डली डालो। इसके ऊपर मर्तबान मूँदा मार दो। पाँच मिनट वैसे ही पड़ा रहने दो। अब मर्तबान उठाकर जल्दी से उसके मुँह पर ढक्कन बन्द करो। पाँच मिनट बाद ढक्कन खोलकर मनमर्जी अचार डाल लो।’’

‘‘बीबीजी आपैई डाल के जाना काँजी के बड़े। हमपे तो होवे ना इत्ती पंचायत।’’

कालीचरण ने अनुज पत्नी को डाँट दिया, ‘‘इन्दु के मत्थे मढ़ दिया काम, तुम कुछ सीखोगी कि गँवार ही बनी रहोगी।’’

‘‘देखेंगे कै रोज बहन खिलाएगी!’’ कहकर दोनों भाभियाँ सामने से हट गयीं।

इन्दु को एहसास हुआ कि भाभियाँ बुरा मान गयीं। उसने अस्फुट स्वर में कहा, ‘‘भैया आप भी क्या ले बैठते हो। अम्माजी गयीं, उनके साथ ही कितनी सारी चीज़ें चली गयीं, किस-किसको याद करोगे!’’

देखा जाए तो वे सब लडक़पन के स्वाद थे जिनमें उत्तर-पश्चिम पंजाब सीमान्त का हवा-पानी और माँ का हाथ शामिल था। गहनों के क़ारोबार की समृद्धि जीवन के हर पहलू में झलकती। एबटाबाद में माँ के हाथ की बनी गुच्छी की रसेदार तरकारी इतनी लज़ीज़ होती कि चाहे कितनी भी बने थोड़ी पड़ जाती। तीनों भाई-बहन उसे बोटी की सब्ज़ी कहते। रसे में डूबकर गुच्छियाँ फूल जातीं। उन्हें चूस-चूसकर स्वाद लेने में सामिष भोजन का आनन्द आता।

इसी तरह से मेथी-दाने की खटमिट्ठी चटनी, खरबूज़े के बीज और काली मिर्च की तिनगिनी केवल यादें बनकर रह गयी थीं।

इन्दु ने देखा आजकल दोनों भाभियाँ उससे कम बोलतीं। आपस में उनकी बातचीत पूर्ववत् चलती। उसके आने पर वे चुपचाप चौके के काम में लग जातीं।

बच्चों में कोई दूरी नहीं थी। बड़े भाई के तीनों बेटे श्याम, रवि और विनय और छोटे भाई का बेटा सुशील, बेबी-मुन्नी के साथ मिलकर धमा-चौकड़ी मचाते। चोर-सिपाही खेलते हुए श्याम, बेबी के बालों का रिबन खींचकर खोल देता। उसके बाल बिखर जाते। तब वह उसे चिढ़ाता ‘भूतनी आ गयी, भूतनी देखो।’ बेबी पैर पटकने लगती। मुन्नी उसके पास जाकर उसे पुच-पुच करती। विनय बेबी की उमर का था। बेबी उसकी किताब फाड़ देती। वह मारने लपकता। दोनों गुत्थमगुत्था हो जाते। बड़ी मुश्किल से उन्हें छुड़ाया जाता। कभी-कभी विनय और बेबी के बीच ज्ञान-प्रतियोगिता होती। श्याम टीचर बन जाता। हाथ में फुटरूलर लेकर वह पूछता—

‘‘वॉट इज़ यौर नेम?

‘‘वॉट इज़ यौर फादर्स नेम?’’

‘‘वॉट इज़ यौर मदर्ज नेम?’’

‘‘वेयर डू यू लिव?’’

‘‘वेयर इज़ यौर नोज़?’’

‘‘वेयर आर यौर आईज़?’’

‘‘वेयर आर यौर टीथ?’’

‘‘वेयर आर यौर इयर्ज?’’

इस प्रतियोगिता में बेबी थोड़ा चकरा जाती। उसे अँग्रेज़ी का ज्या दा ज्ञान नहीं था। वह विनय को देखकर अपनी नाक, कान, आँख को हाथ लगाती जाती।

श्याम पास-फेल घोषित करता, ‘‘विनय फस्र्ट, बेबी फेल।’’

‘‘ऊँ ऊँ ऊँ’’ बेबी रोती और पैर पटकती। सब बच्चे उसे चिढ़ाते, ‘‘तेरा नाम प्रतिभा नहीं पपीता है। ए पपीता इधर आ?’’

बेबी दौडक़र इन्दु की गोद में लिपट जाती, ‘‘मम्मी अपने घर चलो, भइया गन्दा।’’

इस बार सुरेश घर आया तो इन्दु ने कहा, ‘‘सुरेश मुझे यहाँ छोडक़र तू तो भूल ही गया कि बहन को वापस भी ले जाना है।’’

सुरेश हँसा, ‘‘नहीं, भूला नहीं। मैंने तो सोचा वहाँ काम में खटती हो, ज़रा आराम कर लो।’’

‘‘नहीं भैया, वहाँ जीजी को परेशानी हो रही होगी।’’

‘‘इन्दु जीजी मेरी मुसीबत यह है कि अगले हफ्ते मेरे इम्तहान शुरू हो रहे हैं। मैं एक भी दिन बरबाद नहीं कर सकता। कहो तो तुम्हें रेल में बैठा दूँ, वहाँ दादाजी उतार लेंगे।’’

‘‘क्या बताऊँ भैया, ससुराल में ऊँट कौन करवट बैठे किसे क्या पता, इसी बात में किल्ल-पौं न शुरू कर दें। ये भी दिल्ली में हैं, सो और मुश्किल।’’

एक-दो दिन दिमाग दौड़ाने में लग गये कि इन्दु वापस कैसे जाए। भाभियाँ ननद के जाने के प्रस्ताव से इतनी उत्साहित हो गयीं कि उन्होंने सेरों पकवान बना डाले। बच्चियों के लिए रेडीमेड फ्रॉकें आ गयीं ओर इन्दु के लिए ऑरगैंडी की साड़ी। इन्दु ने दबी जुबान से कहा, ‘‘दादाजी, जीजी और भग्गो के लिए कछू हो तो मैं सिर ऊँचा करके जाऊँ।’’ भाभियों ने दरियादिली दिखायी। सबके लिए धोती जोड़ा और कमीज़-जम्पर का इन्तज़ाम किया गया।

भाइयों के लिए दुकान छोडक़र जाना मुमकिन नहीं था। उन्होंने इन्दु को इंटर क्लास की टिकटें थमाकर कहा, ‘‘हमारी पहचान के श्यामसुन्दर मोदी इसी गाड़ी से मथुरा जा रहे हैं, वह तुम्हारी देखभाल कर लेंगे।’’

इन्दु ने एक नज़र उन्हें देखकर हाथ जोड़ दिये। वे ठिगने और अधेड़, सेठ किस्म के आदमी थे जो गाड़ी चलने के पहले ही अपनी बर्थ पर लेटकर ‘फिल्मी दुनिया’ पढ़ रहे थे।

इन्दु किसी भी तरह मथुरा पहुँचना चाहती थी। उसने भाइयों को चिन्तामुक्त किया, ‘‘आप फिकर न करें, खाना-पानी सब मेरे पास है। आप चलें, नमस्ते।’’

इंटर के डिब्बे में बहुत-थोड़े यात्री थे। एक पूरी बर्थ पर बेबी-मुन्नी और इन्दु बैठ गये। शाम चार बजे गाड़ी चली। इसका मथुरा पहुँचने का निर्धारित समय साढ़े छ: था। अक्सर यह लेट हो जाती थी। आखिर कितना लेट होगी, यही सोचकर इस गाड़ी को चुना गया था। फिर स्टेशन के इतनी पास घर होने से इसका भी डर नहीं था कि इन्दु घर कैसे पहुँचेगी? कोई-न-कोई घर से आ ही जाएगा। कितनी भी लद्धड़ हो, गाड़ी आखिर बढ़ तो मंजिल की ओर रही थी।

खिडक़ी से रह-रहकर कोयला आ रहा था।

मोदीजी लद्द से ऊपर से उतरे और उन्होंने एक झटके में खिडक़ी बन्द कर दी।

बेबी-मुन्नी चिल्लाने लगीं, ‘‘खिडक़ी खोलो, मम्मी खिडक़ी।’’

बौखलाकर मोदीजी ने खिडक़ी आधी खोल दी। बच्चों को सरकाकर वे इन्दु के पास बैठ गये।

इन्दु को यह बड़ी अभद्रता लगी। उसने अपना आप कुछ अधिक समेट लिया और आत्मस्थ होकर बैठ गयी। मोदीजी ने बातचीत की पहल की, ‘‘आपके घर में कौन-कौन हैं?’’

‘‘पूरा परिवार है।’’ इन्दु ने कहा।

‘‘लालचरण बता रहा था इन बच्चियों के बाप तो दिल्ली में रहते हैं।’’

‘‘इससे क्या, घर तो उन्हीं का है।’’

‘‘आपको तो बड़ी परेशानी होती होगी। यहाँ सास का चंगुल, वहाँ उनके ऊपर अनजान औरतों का।’’

‘‘सास तो मेरी माँ जैसी है।’’ इन्दु ने कहा और अपनी जगह से उठकर बच्चों के पास खिडक़ी से लगकर बैठ गयी। बेबी रोने लगी, ‘‘हम खिडक़ी पर बैठेंगे।’’

इन्दु ने बेबी को गोद ले लिया।

मोदीजी ने मुन्नी को पुचकारा, ‘‘आजा बेटा चाचा की गोदी।’’

मुन्नी घबराकर माँ से चिपक गयी।

ऊपर से इन्दु शान्त मुद्रा में, खिडक़ी से बाहर नज़र टिकाये थी। अन्दर उसका दिल धड़धड़ा रहा था। डिब्बे में चढ़ते हुए उसने देखा था उसमें मुश्किल से सात-आठ मुसाफिर थे। उसे लग रहा था कहीं ये सब बीच के स्टेशन भरतपुर पर उतर गये तो वह क्या करेगी। उसने सोचा अगर अब यह आदमी कोई हरकत करेगा तो वह चलती गाड़ी से कूद पड़ेगी। उसका रुख देखकर मोदीजी सामने की बर्थ पर चले गये। लेकिन इन्दु को लग रहा था कि वे ‘फिल्मी कलियाँ’ पढऩे के बहाने उसी के चेहरे पर नज़र गड़ाये हुए हैं।

इन्दु को सुरेश पर गुस्सा आया। साथ आ जाता तो कोई फेल नहीं हो जाता। कुछ ही घंटों की बात थी। उसी दिन लौट जाता।

बेबी इन्दु को हिला-हिलाकर पूछ रही थी, ‘‘मम्मी, मम्मी, भैया मुझे भूतनी क्यों कहता है?’’

इन्दु ने बेबी को चूम लिया, ‘‘हम भैया को मारेंगे। हमारी बेबी तो रानी बेटी है, भूतनी नहीं है।’’

कालीचरण ने विदा के समय इन्दु को काफी रुपये शगुन के तौर पर दिये थे। इन्दु ने बहुत मना किया, ‘‘रहने दो भैया, पहले ही तुम्हारा बहुत ख़र्च हो गया।’’

कालीचरण की आँखें पनिया गयीं। उन्हें लगा अपनी इस छोटी बहन को उन्होंने कुछ भी तो नहीं दिया। माँ की मौत पर इन्दु आयी नहीं थी सो दोनों बहुओं ने सास का सारा गहना कपड़ा आपस में बन्दरबाँट कर लिया। क़ायदे से उसमें इन्दु का हक़ बनता था। लालचरण ने बहुत-सी दवाओं की पुडिय़ाँ दीं। कहने लगा, ‘‘रख लो, बच्चोंवाला घर है, हारी-बीमारी में काम आएँगी। हरेक पुडिय़ा पर बीमारी का नाम लिखा है।’’

अब इन्दु ने रूमाल खोलकर देखा, दवाओं के अलावा सौ के तीन नोट और दस-दस के दो-तीन नोट थे। तीन सिक्के एक रुपये के थे। इनके अलावा सलूनो के दिन भी चारों भाइयों ने सौ-सौ का पत्ता उसे दिया था। बेबी-मुन्नी को अलग मिले थे।

दवाइयाँ थैले में डालकर इन्दु ने रुपयों को रूमाल में लपेटकर ब्लाउज़ के अदर रख लिया।

मुन्नी निंदासी हो रही थी। इन्दु ने बेबी को गोद से उतारकर मुन्नी को थाम लिया।

बच्चे इस समय इन्दु के लिए झंझट भी बने थे और कवच भी। उसने सोचा बच्चे साथ न होते, तब यह आदमी लम्पटपना दिखाता तो वह खींचकर एक रैपटा लगाती। ज्याउदा कुछ करता तो वह चलती गाड़ी से कूद जाती पर इन अबोध बच्चों का वह क्या करे जो उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकते। पति की अनुपस्थिति में इन्हीं में उसका दिल लगा रहता। उसे लगता ये उसके सजीव खिलौने हैं।

गाड़ी बिना अटके मथुरा पहुँच गयी। इन्दु को इतनी उतावली थी कि वह पहले से ही मुन्नी को गोद में सँभाले खड़ी हो गयी।

बेबी ने उसकी साड़ी पकड़ते हुए कहा, ‘‘मम्मी सामान!’’

धीमी होती गाड़ी से इन्दु ने प्लेटफॉर्म पर नज़र दौड़ाई। लाला नत्थीमल, बिल्लू-गिल्लू का हाथ थामे खड़े हुए थे। उसने हाथ हिलाया। उसे इतनी सुरक्षा की भावना कभी नहीं मिली थी जितनी इस समय मिली। उसके उतरते ही, पास खड़ा छिद्दू लपककर डिब्बे से उसका सामान उतार लाया। बेबी-मुन्नी को बिल्लू-गिल्लू ने कसकर पकड़ लिया। वे भी भैया-भैया कहने लगीं। लाला नत्थीमल बहू-बच्चों को देखकर खिल गये। छिद्दू से बोले, ‘‘सामान भारी हो तो कुली कर लो।’’

छिद्दू ने बक्सा ख़ुद पकड़ा, डोलची बिल्लू को पकड़ाई और थैला कन्धे पर टाँगने की कोशिश करने लगा।

इन्दु पलटकर देखने लगी कि उसका रक्षक-भक्षक कहाँ पर है। मोदीजी का कहीं नामनिशान भी नहीं था। गाड़ी रुकते ही वे उलटी दिशा में चल पड़े थे।

लाला नत्थीमल ने ख़ुशी में एक कुली रोका और सारा सामान उसके सिर पर लदवा दिया। छिद्दू ने बेबी को गोदी उठा लिया। मुन्नी माँ के पास जाने को मचल रही थी। उसे दादाजी ने घपची में भरकर उठा लिया, ‘‘इधर आ मेरा लटूरबाबा, मैं तोय गोदी लूँ।’’

बिल्लू ने कहा, ‘‘मामी हमारे लिए का लाई हो?’’

इन्दु बड़ी असमंजस में पड़ी। उसे ख़बर ही नहीं थी कि लीला बीबी जी यहीं पर हैं।

इन्दु ने उसका हाथ थामकर कहा, ‘‘तूने तो बताया ही नहीं, क्या लाती। मैं तो तेरे लिए खूब-सी दालमोठ, पेठा और मठरी लायी हूँ।’’

बिल्लू मामी का हाथ डुलाता हुआ बोला, ‘‘जे तो मोय बहुत भाये है।’’ सबके पहुँचने पर सारा परिवार बैठक में आ गया। विद्यावती की आँखें चमक उठीं, ‘‘आ गयी इन्दु, सँभारौ अपनी गिरस्ती। इत्ते दिना को चली गयी। जे नईं सोची कि जीजी का का होगा।’’

इन्दु ने उनके पाँव पड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे तो जीजी, आपका ध्यान रोज आता रहा।’’

इन्दु ने डोलची खोलकर सब पकवान निकालकर रख दिये।

फैनी, घेवर, पेठा, दालमोठ, मठरी के साथ-साथ शक्करपारे, पुए और बेसन के सेव भी थे।

अब उसने बक्सा खोलकर सास-ससुर और भगवती के कपड़े निकाले।

लीला ने कहा, ‘‘मेरे लिए कछू नायँ आयौ।’’

इन्दु बोली, ‘‘बीबीजी उन्हें खबर होती आप यहाँ पर हैं तो जरूर भेजते।’’

‘‘हम कहीं रहैं, हैं तो हम याई घर के।’’

‘‘बीबीजी, आप मेरी धोती ले लो।’’ इन्दु ने अपनी साड़ी निकालकर लीला को दी।

‘‘देखा कैसी सुलच्छनी है मेरी बहू, अपनी तीयल नन्द को थमा रही है।’’

लीला ने साड़ी वापस करते हुए कहा, ‘‘रख ले इन्दु, मैं तो हँसी कर रही थी। मैं अब पहर-ओढक़र कहाँ जाऊँगी?’’

लीला के चेहरे पर दुख की छाया आकर चली गयी।

इन्दु ने कहा, ‘‘बीबीजी ऐसे क्यों सोचती हैं, अभी आपकी उमर ही क्या है! कल को ननदेऊजी आ जाएँगे, सब ठीक हो जाएगा।’’

थोड़ी देर सब पर चुप्पी छा गयी।

तभी बेबी और गिल्लू एक-दूसरे के पीछे दौड़ते आये। बेबी के हाथ में सेलखड़ी का छोटा-सा ताजमहल था। गिल्लू ताजमहल हाथ में लेकर देखना चाहता था। ‘मेरा है, मेरा है’ कहकर बेबी उसे छीन रही थी। पता चला श्याम भैया ने बेबी को यह खिलौना दिया था।

बिल्लू बोला, ‘‘मुझे दिखाओ का है।’’

बेबी ने हाथ पीछे हटाया। गिल्लू ने पीछे हाथ बढ़ाया। बेबी के हाथ से ताजमहल छूट गया। ज़मीन पर गिरकर सेलखड़ी का ताजमहल चकनाचूर हो गया।

लाला नत्थीमल को गुस्सा आ गया। उन्होंने लपककर गिल्लू का कान पकड़ लिया, ‘‘तोड़ डारा न खिलौना, चैन पड़ गया तोय।’’

लीला का मुँह बन गया, ‘‘बासे नईं न टूटो, बेबी ने गिरायौ।’’

‘‘तू चुप रह लीली। बालक इसी तरह बिगड़ते हैं। बड़ी देर से ये पीछे पिलच रहा था।’’

‘‘बिना बाप का बालक है, जो मर्जी कर लो। याकी जान निकार लो।’’ लीला बोली।

विद्यावती ने पति को झिडक़ा, ‘‘बच्चों की बात में ना बोला करो।’’

‘‘क्यों न बोलें, छोरी अभी आयी अभी बाको खिलौना टूट गयौ।’’

लीला को यकायक चंडी चढ़ गयी। उसने गिल्लू को बाँह से पकड़ा और अपने कमरे की तरफ़ धमाधम मारते हुए कहती गयी, ‘‘मरते भी नहीं ससुरे, मेरी जान को छोड़ गये हैं मुसीबतें। कौन कुआँ में कूद जाऊँ मैं!’’

बिल्लू दीपक को लेकर कमरे में चला गया। घर में सन्नाटा खिंच गया।

इन्दु का जी अकुला गया। कितने चाव में वह घर लौटी थी।

ऐसा नहीं कि घर भर को लीला की व्यथा का अन्दाज़ा नहीं था। महीनों से मन्नालाल का कोई अता-पता नहीं था। अपनी तीन बच्चों से भरी गृहस्थी को वे कच्ची डोर से लटकता छोड़ जाने कहाँ धूनी रमा रहे थे। गुस्सा होता तो उतरता भी। यह तो सीधे-सीधे वैराग्य दिखाई दे रहा था, परिवार-विमुखता जिसमें दायित्वबोध का नकार था। उनके न होने से चक्की का काम भी ठप्प पड़ा था। जियालाल मनमर्जी करने लगा था। सुबह के घंटों में जब बिल्लू-गिल्लू स्कूल में होते, चक्की पर कोई काम ही न होता। लीला पूछताछ करती तो कहता, ‘‘सुबह-सुबह कनक के कनस्तर लेकर कौन निकरता है। चक्की का काम दुपहर-शाम की चीज है।’’

सरो के पेड़ जैसी अपनी लम्बी, सुन्दर बेटी लीला को देखकर विद्यावती के कलेजे से आह निकल जाती। वह सोचती लीला का कितना गलत विवाह हुआ है। बनिया जाति अपने बेमेल विवाहों के लिए ख़ासी मशहूर थी। यह बेमेल केवल आयु का नहीं गुणों का भी था। स्वजातीय विवाह करने के फेर में माँ-बाप अपनी भोली लडक़ी का रिश्ता किसी काइयाँ लडक़े से कर देते तो कोमल हृदया का कठोर वर से। कहीं लडक़ी दरियादिल होती तो लडक़ा कंजूस मक्खीचूस। कई बार ऐसा सम्बन्ध हो जाता कि लडक़ी अनपढ़ और लडक़ा उच्च शिक्षित। ऐसे दम्पति मन मारकर लोकलाज निभाने की खातिर एक छत के नीचे रहते पर उनके दाम्पत्य में दरार-ही-दरार होती। माता-पिता लड़कियों से सलाह लेना, उनकी मर्जी पूछना और मन टटोलना एकदम ग़ैरज़रूरी समझते। वे अपनी सुविधानुसार सम्बन्ध तय करते भले उसके बाद ब्याही हुई बेटी की उन्हें सारी जिन्दगी जिम्मेदारी उठानी पड़ती।

बहू-बेटियों के बारे में सोच-सोचकर विद्यावती का मन आँधी का पात बन जाता। कवि इतने महीनों से बाहर था। इन्दु कब तक सास-ससुर और बाल-बच्चों में मन लगाएगी, कहना मुश्किल था। उम्र का तकाज़ा था कि दोनों इकट्ठे रहते। कवि कॉलेज में पढ़ाता है। कहीं किसी से मन न मिला बैठे। तुकबन्दी करनेवाले आधे बावले होते हैं। कुन्ती ज़रूर अपने गिरस्त में रमी हुई लगती। कभी-कभार वह पोस्टकार्ड पर अपना समाचार भेज देती कि वह राज़ी-ख़ुशी है और भगवान से उनकी राज़ी-ख़ुशी मनाती है। भगवती पर पढऩे का शौक ऐसा चर्राया था कि कोई काम कहो, वह मुँह के आगे पोथी पसारकर बैठ जाती।

लीला के दस गुणों के बीच एक भारी दोष उसकी बेलगाम ज़ुबान थी। गुस्सा आ जाने पर वह न छोटा-बड़ा देखती न रिश्ता-नाता। बस, मुँह से लाल मिर्च उगलने लगती। उसकी इसी आदत के मारे उसकी ससुराल के लोगों ने उससे किनारा कर रखा था। कई पड़ोसिनें कहतीं, लाला नत्थीमल का स्वभाव इस लीला में ही उतर आया है, राजी रहे तो मक्खन मुलायम, नाराजी हो तो दुर्वासा दुबक जाएँ। बच्चों को कभी-कभी बेहद मार पड़ जाती पर वे भी न जाने कौन-सी मिट्टी के गढ़े थे कि चुपचाप पिट लेते, गालों पर आँसुओं के छापे लेकर सो जाते लेकिन जागने पर अपनी मैया की गोद में ही दुबकते।

इस वक्त भी बच्चे पिटने के बाद भूखे सो गये थे। दीपक को मार नहीं पड़ी पर वह सहमकर सो गया। लीला ने लालटेन की बत्ती बढ़ा दी और बच्चों के पास दुहरी होकर पड़ गयी। गुस्सा शान्त हो गया था लेकिन मन अशान्त था। अँधेरे मे उसे अपना पिछला-अगला समय जैसे साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था। उसे पछतावा हो रहा था कि माँ-बाप और भाभी के सामने उसने इतनी तीती बानी बोली। यही एक घर था जहाँ वह कभी भी बच्चों को लेकर आ जाती। इस वक्त उसका मन हो रहा था बच्चों को छूकर वह क़सम ले-ले कि कभी बिना सोचे-समझे मुँह नहीं खोलेगी। लेकिन उन बातों का क्या हो जो पहले ही उसकी ज़ुबान से निकल चुकी हैं। उसे बड़े तीखेपन से याद आया एक बार पहले भी पति से उसकी कहा-सुनी हुई थी। हुआ यह था कि लीला ने मन्नालाल और बच्चों के स्वेटर लक्स साबुन के चिप्स से धोकर सूखने के लिए आँगन की बड़ी चटाई पर फैलाये। सामने के घर का कुत्ता मोती पता नहीं कब स्वेटरों के ऊपर अपने गन्दे पैरों से गुज़र गया। जब लीला सूखते कपड़ों का मुआयना करने निकली उसने कुत्ते के पंजों के निशान देखे। वह समझ गयी यह काम मोती के सिवा और किसी का नहीं है। वह सोटी लेकर गली में निकली। मोती अपने घर के आसपास मँडरा रहा था। उसने इतनी कसकर सोटी मारी कि कुत्ता वहीं ढेर हो गया। गुस्से से फनफनाती लीला ने अपने घर आकर किवाड़ भड़ से बन्द कर लिये।

थोड़ी देर में गली में शोर मच गया—मोती को किसी जालिम ने मार डाला। बताओ सीधा-साधा जीव। जिसने मारा वह नरक जाएगा। और क्या!

मन्नालाल अन्दर बैठे सब सुन-देख रहे थे। उन्होंने लीला से कहा, ‘‘जीव-हत्या करके आयी हो। सिर से नहाओ तब कुछ छूना।’’

‘‘हम क्या जानबूझकर मारे हैं। उसने सारे स्वेटर बरबाद कर दिये वाई मारे हमें गुस्सा आ गयौ।’’

‘‘तुझे तो मेरे पे भी गुस्सा आतौ है। किसी दिन मोय भी मार डालेगी।’’

‘‘तुम्हारी जुबान भी क्या चीज है! तुम और मोती एक हो का?’’

‘‘दोनों जीव हैं। जो कोई ने तुझे देखा होगा तो अभाल पुलिस तुझे आय के पकड़ लेगी।’’

‘‘तुम तो हमेशा मेरा बुरा ही चाहो, मोय फाँसी चढ़ा दो, जाओ ढिंढोरा पीट दो।’’ कहते हुए लीला ने अपना सिर कूट डाला।

मन्नालाल बौखला गये, ‘‘हें हें लीली का कर रही हो, मैं तो यों ही कह रहा था।’’

पर लीला को होश कहाँ था। वह तो अपने आपको कूटे गयी जब तक घबराकर मन्नालाल घर से बाहर नहीं निकल गये।

मोती की मौत की बात तो किसी तरह दब गयी। थाना-कचहरी की नौबत नहीं आयी। पर मन्नालाल के निकल जाने की बात सुबह तक आग पकड़ गयी।

किसी ने कहा—उसने मन्नालाल को गली में भागते हुए देखा।

किसी ने कहा—जब मन्नालाल घर से निकले उनके पूरे बदन पर राख पुती हुई थी।

जितने मुँह उतनी बातें।

सबसे ज्यातदा परेशानी बच्चों को हुई। वे जब बाहर निकलते लोग उनसे च्-च् हमदर्दी जताते, ‘‘क्यों बेटा, तुम्हारे बाबू का कोई समाचार मिला। कब आय रहे हैं।’’

बच्चों के चुप रहने पर लोग कहते, ‘‘ये बच्चे अनाथ हो गये। बेचारे बाप का दिल टूट गया, अब क्या लौटेगा।’’

तब तो मन्नालाल तीसरे दिन पूर्णानन्द गिरिजी महाराज की पार्टी के संग नाचते-गाते, मजीरा बजाते लौट आये थे।

लौटते ही उन्होंने लीला से इक्कीस लोगों की रासमंडली का खाना बनवाया, पूड़ी, कचौड़ी, आलू की तरकारी, मुरायता और काशीफल का साग। रात तक लीला को इतनी साँस नहीं मिली कि पति से पूछ सके ‘तुम कहाँ चले गये थे? ऐसे भी कोई घरबार छोडक़र जाता है?’

अगले दिन मंडली को विदा देकर मन्नालाल ने अकेले पड़ते ही अपनी तर्जनी दिखाकर लीला को बरजा, ‘‘ख़बरदार जो कचर-कचर जबान चलायी। इस बार तो मैं बच्चन का खयाल करके आ गया, अबकी गया तो कभी इधर पलटूँगा भी नहीं।’’

लीला ख़ून और खलबलाहट का घूँट पीकर रह गयी।
 
एक और बार की बात है। लीला पेट से थी। अहोई अष्टमी का त्योहार आया। लीला ने कच्ची रसोई तो खुद राँध ली, मिठाई बाज़ार से मँगायी। जब वह आँगन की दीवार पर अहोई माता की तस्वीर बनाकर परिवार के सदस्यों के नाम लिख रही थी, मन्नालाल बोले, ‘‘ये देवी-देवता प्रेत बने बैठे हैं। इनके नाम पर बायना निकालती हो, कंजकें जिमाती हो, का फायदा। जाने कितने साधु-सन्त भूखे, निराहार घूमते हैं। अरे देना है तो उन्हें दो। तुम्हें पुन्न भी लगे।’’

ये बातें लीला कुछ-कुछ पहचानती थी पर मन्नालाल से सुनने में उसे अपनी आलोचना लगी।

उसने तुनककर कहा, ‘‘सभी मनाते हैं, बाल-बच्चोंवाले घरों में तो अहोई जरूर पूजी जाय है।’’

मन्नालाल बोले, ‘‘ये देवियाँ मरे हुए को जिलाती हैं, ऐसी कभी होय नहीं सकतौ। बच्चों को ठीक से पालो तो वो मरें ही क्यों?’’

लीला ने कहा, ‘‘दिन-त्यौहार क्या बहस लेकर बैठ गये, हटो पूजा करके मुँह जूठा करूँ। आज सवेरे से बरती हूँ।’’

मन्नालाल हँसने लगे। बिल्लू से बोले, ‘‘तेरी माँ को तर माल खाबे की बान पड़ गयी है, तभी न रोज ब्रत करै है।’’

लीला को गुस्सा आ गया। यह आदमी जितनी बार मुँह खोले, कुबोल ही बोले है। अच्छी बात इसे आवै ही नायँ।

‘‘क्या भकोस लिया मैंने जो सुना रहे हो, अब कभी कहना मोसे, कछू न बना के दूँ।’’ कहते हुए लीला ने भर कढ़ाही खीर मोरी पे पटक दी।

‘‘अरे भागमान ये का कर रई है, बच्चों को तो खाने दे।’’ मन्नालाल जब तक रोकें, लीला ने कढ़ाही में एक लोटा पानी डाल दिया। मन्नालाल दुखी हो गये, ‘‘तेरे लच्छन ऐसे हैं कि तू बड़ा दुख पाएगी, जरा-सी भी समवाई नहीं है तोमें।’’

त्यौहार का दिन उपवास का दिन बन गया। पति-पत्नी में अनबोला हो गया। कई दिनों तक बच्चों के ज़रिए वार्तालाप चला फिर यकायक एक दिन मन्नालाल चक्की से ही कहीं चले गये। बिल्लू-गिल्लू से कहा, ‘‘रोना मत, मैं ढेर दिना में आऊँगा।’’

उस वक्त वे दो महीनों में लौटे थे। कोई कुछ पूछे कहाँ रमे रहे तो बस इतना कहें, ‘गुपालजी के चरणों में लोटता रहा।’

लीला ने कई दिन गुमान रखा। बोली नहीं। उसकी मुखमुद्रा से ज़ाहिर था कि जहाँ रहे थे वहीं रहो, हमारे ढिंग क्यों आये हो।

एक दिन घर में रात के वक्त काला नाग निकल आया, विषकोबरा। इसके माथे पर तिलक और मुँह लम्बोतरा—बिल्कुल विषकोबरा की पहचान। आकर सर्र-सर्र बच्चों के तख़त के नीचे सर्राया। लीला की घिग्घी बँध गयी। जाकर पति के सीने से चिपट गयी, ‘‘मेरे बच्चन को बचा लो, तुम्हारे पाँव धो-धोकर पिऊँगी।’’

मन्नालाल थे पराक्रमी। उन्होंने तीनों बच्चों को एक-एक कर उठाया और अपने कमरे के पलंग पर डाल दिया। फिर उन्होंने बीच का दरवाज़ा बन्द कर उसकी चौखट पर चादर और तौलिये की बाड़ लगा दी।

काँपती हुई लीला से बोले, ‘‘तू सो जा बच्चों के पास मैं मन्दिर में गुपालजी के चरणों में पड़ौ रहूँगौ।’’

लीला ने उनके पाँव पकड़ लिये, ‘‘तुम्हें मेरी सौंह जो कहीं गये। हम सब इसी पलंग पर सो जाएँगे।’’

सुबह उठकर नागदेवता की बड़ी ढुँढ़ाई की गयी। सँपेरा भी बुलाया। पर विषकोबरा ऐसे अन्तर्धान हो गया जैसे आया ही नहीं था।

इस बार मन्नालाल को गये दो महीने से ऊपर का वक्त हो चला था, कहीं कोई सूत्र नहीं मिल रहा था कि वे कहाँ गये। पड़ोसियों ने लीला को सुझाया कि उनकी फोटो के साथ गुमशुदगी की सूचना पेपर में छपवा दो, भागे-भागे आएँगे।

‘‘जहाँ वे हैं, वहाँ, पता नहीं अखबार जाते हैं या नहीं।’’

बच्चों को स्कूल भेजकर लीला खिडक़ी पर खड़ी हो जाती। उसे लगता गली में आनेवाला अगला चेहरा उसके पति का होगा, या अगला या अगला।

अपने घर में समय बड़ी मुश्किल से सरक रहा था इसलिए लीला मायके आ गयी थी।

29

लाला नत्थीमल का कुनबा जब से इस नये मकान में आया था, उसका दिनमान कुछ बदल गया था। अब घर के लोग बार-बार बैठक की दीवाल-घड़ी देखने नहीं दौड़ते। यह मकान नानकनगर में स्टेशन के करीब बना था। यहाँ गाडिय़ों के आने-जाने से समय की सूचना मिलती रहती। विद्यावती गर्मी भर छत पर छिडक़ाव कर सबके बिस्तर लगवाती। वहीं एक तरफ़ खाना बना हुआ रखा रहता। शाम सात बजे की डाकगाड़ी धड़धड़ निकल जाती तब वे सब ब्यालू कर लेते। रात ठीक नौ बजे फ्रंटियरमेल का काला इंजन अपनी भट्टा जैसी आँख लपलपाते और चिंघाड़ते हुए गुज़रता। तब विद्यावती कहती, ‘‘कवि लगता है आज भी नायँ आयौ, चलो छोरियो सो जाओ।’’

बेबी-मुन्नी सबको अपने पास समेटकर वे लेट जातीं।

बेबी कहती, ‘‘दादी चतुर कौवे की कहानी सुनाओ।’’

दादी कहती, ‘‘मोय तो नींद आ रही है।’’

मुन्नी दादी की टाँग पर अपनी नन्ही टाँग चढ़ाकर कहती, ‘‘नईं दादी कहानी।’’

विद्यावती निहाल हो जाती। कहती, ‘‘हुँकारा भरती रहना नहीं तो मैं सुनाऊँगी नहीं।’’

लाला नत्थीमल छत पर सोना पसन्द नहीं करते। उनका ख़याल था कि छत पर सुबह मक्खियाँ परेशान करती हैं। फिर जो हवा छत पर मिले वही आँगन में मिल जाती है। वे खाना खाकर नीचे चले जाते। उनकी चिन्ता यह भी रहती कि घर का कुल सामान नीचे खुला पड़ा है, ऐसे में छत पर चढक़र सोना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है।

लेकिन आँगन में लेटे हुए भी, जब तक उन्हें नींद न आ जाती, वे एक कान से छत की बातचीत सुनते रहते। कभी नीचे से ही बमक पड़ते, ‘‘विद्यावती तूने वा बात तो बताई ही नायँ।’’

इसलिए विद्यावती अपनी आवाज़ दबाकर कहानी सुनाती। कभी वह बच्चों की फ़रमाइश के अनुसार कहानी बनाकर सुनाती, कभी बच्चे सुनी हुई कहानी फिर से सुनना चाहते, कभी वह नयी-नकोर कहानी सुनाने की कोशिश करती।

बेबी-मुन्नी आधी कहानी सुनते तक नींद में गुम हो जातीं। तब इन्दु मुन्नी को अपनी खाट पर ले आती।

जब लीला आ जाती तब बिल्लू, गिल्लू, दीपक और बेबी मिलकर खेलते। कभी एक-दूसरे की फ्रॉक और कमीज़ पीछे से पकडक़र वे रेलगाड़ी बन जाते, ‘‘छक्कम, छकपक्कम, छक्कम, पकछक्कम’’ कहते हुए वे दौड़ते। उनके सुर में सुर मिलाकर विद्यावती गा उठती, ‘‘कटी जिन्दगानी कभी दुक्खम, कभी सुक्खम, कभी दुक्खम कभी सुक्खम।’’ लीला और इन्दु भी साथ देने लगतीं, ‘‘कटी जिन्दगानी कभी दुक्खम कभी सुक्खम।’’ बच्चों की कतार एक-दूसरे के कपड़ों का सिरा पकड़े छत पर गोल घूमती, ‘‘छकपक्कम, पकछक्कम, छकपक्कम, पकछक्कम।’’ बिल्लू सबसे आगे इंजन बना अपनी हथेली मुँह के आगे रखकर आवाज़ निकालता, ‘‘कू ऽ ऽ ऽ।’’

इन्दु को याद आता आगरे में जब उन्हें सुशील मुनि के प्रवचनों में ले जाया जाता था तब वहाँ यही सुनने को मिलता था, ‘‘कालचक्र के छह कालखंड होते हैं— 1. सुखमा- सुखमा, 2. सुखमा, 3. सुखमा-दुखमा, 4. दुखमा-सुखमा, 5. दुखमा और 6. दुखमा-दुखमा। इन्हीं को पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ और छठा काल भी कहा जाता है। इन कालखंडों के प्रवर्तनों से मनुष्य के शरीर की अवगाहना, आयु, बल, वैभव, सुख, शान्ति की क्रमश: गति-अवगति पता चलती है। आकुलताएँ, क्लेश, बैर, विरोध, मान और दु:ख बढ़ते जाते हैं। छठे काल के व्यतीत होने पर महाप्रलय में इस सृष्टि का लगभग नाश हो जाता है। कभी जल तो कभी पवन, कभी अग्नि तो कभी धूल से महानाश का वातावरण हो जाता है। इसके काफ़ी दिन बाद शान्ति और समृद्धि स्थापित होती है। नव-सृजन का प्रारम्भ छठे आनेवाले काल का उद्घोष है। फिर धीरे-धीरे उत्कर्ष-काल आता है। प्रथम से छठे तक अवनति वाले समय को अवसर्पिणी काल कहते हैं। छठे से पहले तक के उत्कर्षगामी काल को उत्सर्पिणी काल कहा जाता है।

कभी भग्गो अपनी पढ़ाई जल्दी समाप्त कर छत पर आ जाती। वह आग्रह करती, ‘‘जीजी वह वाली कहानी सुनाओ, सौंताल वाली।’’

‘‘कौन-सी?’’ विद्यावती याद करतीं।

‘‘अरे वोही रानी फूलमती की।’’

‘‘अच्छा वो, बड़े दिना हो गये, जने भूल गयी कि याद है।’’

लीला कहती, ‘‘जीजी शुरू तो करो, याद आती जाएगी।’’

विद्यावती सुनाने लगतीं—

‘‘एक थी फूलमती। बाकी ये बड़ी-बड़ी आँखें, कोई कहे मिरगनैनी, कोई कहै डाबरनैनी। एक बाकी ननद लब्बावती। जेई सौंताल से लगी हवेली राजा सूरसेन की। जब हवेली बन रही ही, राजाजी के सन्तरी-मन्तरी ने भतेरा समझायौ ‘या बावड़ी ठीक नईं, नेक परे नींव धरो’ पर राजाजी अड़े सो अड़े रहे ‘मैं तो यईं बनवाऊँगौ महल। एम्मे का बुरौ है।’

‘राजाजी पीपल के पेड़ पर भूत-पिसाच और परेत तीनों का बसेरौ है। जैसे भी भीत उठवाओगे, पीपल की छैयाँ जरूर छू जाएगी, जनै उगती, जनै डूबती।’ सन्तरी बोले।

बस इत्ती-सी बात।

ये लो। राजाजी ने पीपल समूल उखड़वा दियौ।

राजा सूरसेन का अपनी रानी से बड़ा परेम हौ। रानी फूलमती बोली, ‘राजाजी ऐसौ बाग बनाओ कि मैं पूरब करवट लूँ तो मौलसिरी महके, पच्छिम घूम जाऊँ तो बेला चमेली।’ राजा ने ऐसा ही कर्यौ। हैरानी देखो पेड़ों की जड़ सौंताल की मिट्टी में और फूल खिलें राजाजी के चौबारे।

राजा-रानी मगन मन अपने बाग में घूमें। सौंताल के किनारे शाम को ऐसे कुमकुमे जलें जिनकी परछाईं पानी में काँपती नजर आय। महल ऐसा कि उसमें सात दरवाजे और उनचास पवन के आने के लिए उनचास खिड़कियाँ।

राजकुमारी लब्बावती का विवाह हाथरस के कुँअर वृषभानलला के पोते से हो गया। अभी गौना नहीं हुआ था। नन्द-भाभी घर में जोड़े से बोलें, जोड़े से डोलें, सास बलैयाँ लेती, ‘मेरी बहू-बेटी दोनों सुमतिया।’

पर तुम जानो जहाँ सौ सुख हों, वहाँ एक दुख आके कोने में दुबककर बैठ जाय तो सारे सुख नास हो जायँ। सोई हुआ राजा की हवेली में।’’

‘‘कैसे?’’ भग्गो ने पूछा।

‘‘अरे बियाह को एक साल बीता, दो साल बीते, साल पे साल बीते, फूलमती की कोख हरी न भई।’’

‘‘सास लाख झाड़-फूँक करावै, राजाजी ओझा-बैद बुलावें, नन्द किशन कन्हाई की बाललीला सुनावै पर कोई उपाय नायँ फलै।’

एक दिन लब्बावती को सुपनौ आयौ कि तेरे भैया ने पीपर समूल उपारौ, येई मारे महल अटारी निचाट परै हैं। एकास्सी के दिन सौंताल के किनारे फिर से तेरी भाभी पीपर लगायँ, रोज ताल में नहायँ, पीपर पूजै तब अनजल लें तब जाके जे कलंक मिटै। फिर तू नौ महीनन में जौले-जौले दो भतीजे खिलइयौ।’

लब्बावती ने सुबह सबको सपना बखानौ। अगले ही दिन एकास्सी ही। सो सात सुहागनें पूजा की थाली सजाए, सोलहों सिंगार किये, सोने का कूजा फूलमती के सिर पर धरा कर पीपल रोपने चलीं। महल की मालिन का इकलौता बेटा कन्हाई सबके आगे-आगे रास्ता सुझाये। बाके हाथ में फड़वा खुरपी।

राजा महलन में से देखते रहे। रानी फूलमती ने लोट-लोटकर पूजा की। आपै आप बावड़ी में उतर सोने का कूजा भर्यौ और पीपर-मूर पे जल चढ़ायौ। फिर सातों सुहागनों ने असीसें उचारीं। सब-की-सब राजी-खुशी घर लौटीं।

रोज सबेरे पंछी-पखेरू के जगते-मुसकते फूलमती, लब्बावती, दोनों जाग जातीं और सौंताल नहाने, पीपर पूजने निकल पड़तीं। कभी राजाजी जाग जाते, कभी करवट बदलकर सो जाते।

फूलमती भायली ननद से कहती, ‘तेरे भइया तो पलिका से लगते ही सोय जायँ। इनकी ऐसी नींद तो न कभी देखी न सुनीं।’

लब्बावती कहती, ‘मेरे भइया की नींद को नजर न लगा भाभी! जे भी तो सोचो जित्ती देर जागेंगे तुम्हें भी जगाएँगे कि नायँ।’

फूलमती उलटी साँस भरती, ‘हम तो सारी रात जगें, भला हमें जगाये बारो कौन?’

लब्बावती को काटो तो खून नहीं। बोली, ‘क्या बात है?’

फूलमती बोली, ‘अभी तुम गौनियाई नायँ, तुम्हें का बतायँ का सुनायँ। तोरे भैया तो जाने कौन-सी पाटी पढ़े हैं कि मन लेहु पे देहु छटाँक नहीं।’ फिर फूलमती ने बात पलटी, ‘तुम्हारी ससुराल से सन्देसो आयौ है अबकी पूरनमासी को लिवाने आएँगे।’

लब्बावती ने भाभी को गटई से झूलकर लाड़ लड़ाया, ‘कह दो बिन से, पहले हम अपने भतीजे की काजल लगाई का नेग तो ले लें तब गौने जायँ।’

माँ ने सुना तो बरज दिया, ‘समधी जमाई राजी रहें। इस बार गौना कर दें, फिर तू सौ बार अइयौ, सौ बार जइयो, घर दुआर तेरौ।’ बड़े सरंजाम से लब्बावती की बिदाई भई। गौने में माँ और भैया ने इत्तौ दियौ कि समधी की दस गाड़ी और राजाजी की दस गाड़ी ठसाठस भर गयीं। डोली में बैठते लब्बावती ने भाभी को घपची में भर लीनो—‘भाभी मेरी, मेरे भैया की पत रखना। पीपल पूजा, बावड़ी नहान का नेम निभाना। मोय जल्दी बुलौआ भेजना।’

फूलमती ननद के जाने से उदास भई। राजाजी ने कठपुतली का तमाशा करायौ, नन्दगाँव का मेला दिखायौ पर रानी का जी भारी सो भारी।

सुबह-सबेरे अभी भी वह रोज सौंताल नहाये, पीपल पूजे तब जाकर अनजल छुए। अब इस काम में संगी-साथी कोई न रह्यै। एक दिना रानी भोर होते उठी। एक हाथ पे धोती-जम्पर धर्यो, दूसरे पे पूजा की थाली और चल दी नहाने।

उस दिन गर्मी कछू ज्यानदा रही कि फूलमती की अगिन। गले-गले पानी में फूलमती खूब नहाई। अबेरी होते देख फूलमती पानी से निकरी। अभी वह कपड़े बदल ही रही थी कि बाकी नजर झरबेरी पे परी। गर्मी में झरबेरी लाल-लाल बेरों से बौरानी रही।

हाँ तो फिर क्या था। फूलमती ने आगा सोचा न पीछा, बस बेर तोडऩे ठाड़ी हौं गयी। उचक-उचककर बेर तोड़े और पल्ले में डारै। वहीं थोड़ी दूर पर मालिन का लडक़ा पूजा के लिए फूल तोड़ रहौ थौ। तभी रानी की उँगरी मा बेरी का काँटा चुभ गयौ। फूलमती तो फूलमती ही, बाने काँटा कब देखौ। उँगरी में ऐसी पीर भई कि आहें भरती वह दोहरी हो गयी। मालिन के छोरे कन्हाई ने रानीजी की आह सुनी तो दौड़ा आयौ।

काँटा झाड़ी से टूटकर उँगरी की पोर में धँस गयौ। मालिन का छोरा काँटे से काँटा निकारना जानतौ रहौ। सो बाने झरबेरी से एक और काँटा तोड़ रानी की उँगरी कुरेद काँटा काढ़ दियौ। काँटे के कढ़ते ही लौहू की एक बूँद पोर पे छलछलाई। कन्हाई ने झट से झुककर रानी की उँगरी अपने मुँह में दाब ली और चूस-चूसकर उनकी सारी पीर पी गयौ। छोरे की जीभ का भभकारा ऐसौ कि रानी पसीने-पसीने हो गयी।

उधर राजा सूरसेन की आँख वा दिना जल्दी खुल गयी। सेज पे हाथ बढ़ाया तो सेज खाली। थोड़ी देर राजाजी अलसाते, अँगड़ाई लेते लेटे रहे। उन्हें लगा आज रानी को नहाने-पूजने में बड़ी अबेर हौं रही है। राजाजी ने वातायन खोला। सौंताल में न रानी न बाकी छाया। पीपल पे पूजा-अर्चन का कोई निशान नहीं। रानी गयीं तो कहाँ गयीं। सूरसेन अल्ली पार देखें, पल्ली पार देखें। तभी उन्हें सौंताल के पल्ली पार झरबेरी के नीचे रानी फूलमती और मालिन का छोरा कन्हाई दिखे- फूलमती की उँगरी कन्हाई के मुँह में परी ही और रानी फूलों की डाली-सी लचकती वाके ऊपर झुकी खड़ी।

राजा सूरसेन को काटो तो खून नहीं। थोड़ी देर में सुध-बुध लौटी तो मार गुस्से के अपनी तलवार उठायी। पर जे का! तलवार मियान में परे-परे इत्ती जंग खा गयी कि बामें ते निकरेई नायँ। राजा ने भतेरा जोर लगायौ, तलवार ज्यों की त्यों। उधर डाबरनैनी फूलमती की उँगरी की पोर मालिन के छोरे के मुँह में परी सो परी।

राजा, परजा की तरह अपनी रानी को घसीटकर महलन में लावै तो कैसे लावै, बस खड़ा-खड़ा किल्लावै। उसने अपने सारे ताबेदारों को फरमान सुनायौ कि महल के सारे दुआर मूँद लो, रानी घुसने न पाय। कोई उदूली करै तो सिर कटाय।

रानी फूलमती नित्त की भाँत खम्म-खम्म जीना चढ़ के रनिवास तक आयी। जे का। बारह हाथ ऊँचा किवार अन्दर से बन्द। अर्गला चढ़ी भई। रानी दूसरे किवार पे गयी। वह भी बन्द। इस तरह डाबरनैनी ने एक-एक कर सातों किवार खडक़ाये पर वहाँ कोई हो तो बोले।

सूरसेन की माता ने पूछा, ‘क्यों लला आज बहू पे रिसाने च्यों हो?’

सुरसेन मुँह फेरकर बोले, ‘माँ तुम्हारी बहू कुलच्छनी निकरी। अब या अटा पे मैं रहूँगो या वो।’

माँ ने माली से पूछा, मालिन से पूछा, महाराज से पूछा, महाराजिन से पूछा, चौकीदार से पूछा, चोबदार से पूछा। सबका बस एकैई जवाब राजाजी का हुकुम मिला है जो दरवाजा खोले सो सिर कटाय।

सात दिना रानी फूलमती अपना सिर सातों दरवाजों पे पटकती रही। माथा फूटकर खून-खच्चर हो गयौ। सूरसेन नायँ पसीजौ...’

लीला कहती, ‘‘आगे की कहानी मैं सुनाऊँ जीजी!’’

विद्यावती कहती, ‘‘सीधे-सीधे सुनाना, घुमाना-फिराना ना।’’

‘‘तो सुनो,’’ लीला कहती। बच्चे उसके पास खिसक आते।

फिर यह हुआ कि जैसे ही फूलमती को घर-दुआर पे दुतकार पड़ी, वह खम्म-खम्म जीना उतर गयी। सौंताल पर कन्हाई उसकी राह देख रहा था। उसने रानी का हाथ पकड़ा और अपनी कुटिया में ले गया। सात दिन में रानी अच्छी-बिच्छी हो गयी। मालिन ने दोनों की पिरितिया देखी तो बोली, ‘रे कन्हाई, राधा भी किशन से बड़ी ही, जे तेरी राधारानी ही दीखै।’ डाबरनैनी वहीं रहने लगी। रोज़ सुबह मालिन और कन्हाई फूल तोडक़र लाते, फूलमती उनकी मालाएँ बनाती।

इधर राजा सूरसेन उदास रहने लगे। माँ ने लब्बावती को बुला भेजा। लब्बावती ने भाई से पूछा, ‘प्यारे भैया, मेरी राजरानी भाभी में कौन खोट देखा जो उसे वनवास भेज दिया।’

सूरसेन ने कहा, ‘तेरी भौजाई हरजाई निकली। वह मालिन के बेटे के साथ खड़ी थी। दोनों हँस रहे थे।’

बहन बोली, ‘ये तो अनर्थ हुआ। अरे हँसना तो उसका स्वभाव था। भैया सूरज का उगना, नदिया का बहना और चिडिय़ा का चूँ-चूँ करना कभी किसी ने रोका है?’

राजा सूरसेन को लगा उन्होंने अपनी पत्नी को ज्यादा ही सजा दे दी।

सात दिन राजा ने उधेड़बुन में बिता दिये। आठवें दिन लब्बावती की विदा थी। लब्बावती जाते-जाते बोली, ‘भैया, अगली बार मैं हँसते-बोलते घर में आऊँ, भाभी को लेकर आओ।’

कई साल बीत गये। राजा रोज़ सोचते आज जाऊँ, कल जाऊँ। इसी सोच में कई बरस खिसक गये। आखिर एक दिन वे घोड़े पे सवार होकर निकले। साथ में कारिन्दे, मन्तरी और सन्तरी। जंगम जंगल में चलते-चलते राजाजी का गला चटक गया। घोड़ा अलग पियासा। एक जगह पेड़ों की छैयाँ और बावड़ी दिखी। राजा ने वहीं विश्राम की सोची। बावड़ी से ओक में लेके ज्योंही राजा पानी पीने झुके, किसी ने ऐसा तीर चलाया कि राजा के कान के पास से सन्नाता हुआ निकल गया। मन्तरी-सन्तरी चौकन्ने हो गये। तभी सबने देखा, थोड़ी दूर पर एक छोटा-सा लडक़ा, साच्छात कन्हैया बना, पीताम्बर पहने खड़ा है और दनादन तीर चला रहा है। राजा कच्ची डोर में खिंचे उसके पास पहुँचे। छोरा क्या बूझे राजा-वजीर। वह चुपचाप अपने काम में लगा रहा।

राजा ने बेबस मोह से पूछा, ‘तुम्हारा गाम क्या है, तुम्हारा नाम क्या है?’ नन्हें बनवारी ने आधी नजर राजा के लाव-लश्कर पे डाली और कुटिया की तरफ जाते-जाते पुकारा, ‘मैया मोरी जे लोगन से बचइयो री।’ लरिका की मैया दौड़ी-दौड़ी आयी। बिना किनारे की रंगीन मोटी धोती, मोटा ढीला जम्पर, नंगे पाँव, पर लगती थी एकदम राजरानी। उसके मुख पर सात रंग झिलमिल-झिलमिल नाचें।

राजा ने ध्यान से देखा। अरे ये तो उसकी डाबरनैनी फूलमती थी।

सूरसेन को अपनी सारी मान-मरयादा बिसर गयी। सबके सामने बोला, ‘परानपियारी तुम यहाँ कैसे?’

फूलमती ने एक हाथ लम्बा घूँघट काढ़ा और पीठ फेरकर खड़ी हो गयी।

तब तक बनवारी का बाप कन्हाई आ गया। राजा ने कारिन्दों से कहा, ‘पकड़ लो इसे, जाने न पाये।’

कन्हाई बोले, ‘जाओ राजाजी तुम क्या प्रीत निभाओगे। महलन में बैठ के राज करो।’

मन्तरी बोले, ‘बावला है, राजा की रानी को कौन सुख देगा। क्या खिलाएगा, क्या पिलाएगा?’

कन्हाई ने छाती ठोंककर कहा, ‘पिरितिया खवाऊँगौ, पिरितिया पिलाऊँगौ। तुमने तो जाके पिरान निकारै, मैंने जामें वापस जान डारी। तो जे हुई मेरी परानपियारी।’

‘और जे चिरौंटा?’ मन्तरी ने पूछा।

‘जे हमारी डाली का फूल।’

राजा के कलेजे में आग लगी। मालिन के बेटे की यह मजाल कि उसी की रानी को अपनी पत्नी बनाया वह भी डंके की चोट पर। उसने घुड़सवार सिपहिये दौड़ा दिये।

दादी बोली, ‘हाँ तो कन्हाई और फूलमती बिसात भर लड़े। नन्हा बनवारी भी तान-तानकर तीर चलायौ। पर तलवारों के आगे तीर और डंडा का चीज। सौंताल के पल्ली पार की धरती लाल चक्क हो गयी। थोड़ी देर में राजा के सिपहिया तलवारों की नोक पे तीन मूड़ उठाये लौट आये।’

इन्दु ने कहा, ‘‘जीजी तीनों मर गये?’’

दादी ने उसाँस भरी, ‘‘हम्बै लाली। तीनोंई ने वीरगति पायी। येईमारे आज तक सौंताल की धरती लाल दीखै। वहाँ पे सेम उगाओ तो हरी नहीं लाल ऊगे। अनार उगाओ तो कन्धारी को मात देवै। और तो और वहाँ के पंछी पखेरू के गेटुए पे भी लाल धारी ज़रूर होवै। ना रानी घर-दुआर छोड़ती ना बाकी ऐसी गत्त होती।’’

भग्गो और लीला एक साथ बोलीं, ‘‘गलत, एकदम गलत। निर्मोही के साथ उमर काटने से अच्छा था घर छोडऩा। रानी ने बिल्कुल ठीक किया।’’

विद्यावती में भी साहस का संचार होता। वह पूछती, ‘‘जनै का वजह है, घर-दुआर और संसार से जितनी प्रीत औरतों को होय उतनी आदमी को नहीं होय।’’

लीला बोली, ‘‘आदमी जनम का निर्मोही होता है तभी न मरे पे शमशान में फूँक-पजार करने आदमी जावे हैं, औरत कब्भौ ना जाय।’’

‘‘चलो वह तो शास्त्रों में लिखा कर्तव्य समझो। पर घर में भी बच्चों से जालिमपना मर्द ज्या दा दिखावै है।’’

इन्दु की तलखी सामने आ जाती, ‘‘औरतें भी कोई कम जालिम नहीं होयँ हैं।’’

‘‘जे तूने कैसे कही?’’ विद्यावती तन जाती।

‘‘जिस लडक़ी के माँ-बाप खतम हो जायँ उसका पीहर भाभियाँ छुड़ायें हैं, भाई नहीं।’’ इन्दु कहती।

यह ऐसा समय होता जब भग्गो के सिवा सब अपना-अपना निर्मोही याद करतीं। पति के जीवन से बाहर खड़ीं ये तीन उपेक्षिताएँ अपनी सीमाओं पर भी सोच-विचार नहीं करतीं। उन्हें लगता उनके जीवन का समस्त दुख बेमेल जीवन-साथी के कारण है।

तभी किसी बच्चे को शू-शू आ जाती और समस्त महिला-मंडली झटके से वर्तमान में लौटती। वैसे खुले आकाश के नीचे लेटकर साँस लेने मात्र से इतनी ताज़गी फेफड़ों में भर जाती कि अगले बारह घंटों तक काम आती। लीला को छत पर सोना बहुत पसन्द था। वही शाम छ: बजे से दौड़-दौडक़र छत पर सामान चढ़ाती, बिल्लू को नहला-धुलाकर पूजा के पाट पर बैठाती और विश्वकर्मा पर ध्यान लगाने लगतीं। इतनी मुश्किलों के बीच उसे यह तसल्ली होती कि उसके तीन बेटे हैं, बेटी कोई नहीं। ये पल-पुस जाएँ तो अपने आप घर सँभाल लेंगे, वह सोचती।

मन्नालाल के बारबार घर से चले जाने का संकेतार्थ उसकी समझ आने लगा था। मन्नालाल घर से नहीं अपने से भागे फिरते थे। जब उन्हें लगता कि घर उनहें अपनी सर्वग्रासी गुंजलक से लील रहा है, वे भाग खड़े होते। अथवा यह एक तिहाजू पति का अपनी नई-नकोर पत्नी से परिताप-पलायन था।

इन्दु की समस्या लीला से बिल्कुल अलग थी। उसके पति के अनुराग, उत्ताप और उत्तेजना में कहीं कोई कमी नहीं थी, फिर भी वह यहाँ ससुराल में उपेक्षिता का जीवन जी रही थी। कभी-कभी उसका जी एकदम विरक्त हो जाता। सास-ससुर आवाज़ लगाते रहते, ननदें टहोके मारतीं, वह एकदम जड़, निस्पन्द, चौके के पटरे पर बैठी चूल्हे की लपट देखती रहती। वह न बोलती, न डोलती। केवल जब मुन्नी घुटनों के बल घिसटती आकर कहती, ‘‘मम्मी टुक्की।’’ वह एकदम से जाग जाती और लपककर बच्ची को गोद में ले लेती।

मुन्नी ने अभी तक पैदल चलना शुरू नहीं किया था। उसकी टाँगों में ताक़त नहीं थी। घर के सब बड़े बच्चे उसे मालगाड़ी कहते और उसके सामने एक-दूसरे की कमीज़ पकडक़र धीमे-धीमे कहते, छुकऽऽ छुकऽऽ छुकछुक। तब बेबी उसके पास जाकर अपनी नन्हीं बाँहों से छाँह बना लेती और कहती, ‘‘मेली मुन्नी को चिढ़ाओ मत, मैं मालूँगी।’’
 
30

नानकनगर वाले मकान की दाहिनी ओर के दो कमरों का हिस्सा, लाला नत्थीमल ने, एक वैद्यजी को किराये पर दे दिया था। वैद्यजी ने एक कमरे में ‘पुनर्नवा’ साइनबोर्ड से अपनी पुरानी प्रेक्टिस की नयी शुरुआत की। उनके आने से एक आराम यह हो गया कि परिवार में छोटी-मोटी तकलीफों के लिए तुरन्त दवाई वैद्यजी से मिल जाती। विद्यावती की पीठ का फोड़ा जब-तब पनप जाता। वैद्यजी ने नासूर देखकर एक भूरे रंग के पाउडर की ख़ुराक खाने को दी और मलहम की डिब्बी लगाने को। जब विद्यावती नियम से दवा खा और लगा लेतीं उन्हें फोड़े में कुछ आराम आ जाता लेकिन दवा लेने में वे बेहद अनियमित थीं। अगर भगवती याद न रखे तो वे दवा लेना भूल जातीं और फोड़े में फिर चीस उठ जाती। वैद्यजी के बच्चे अभी छोटे थे, उनमें से कोई भी स्कूल नहीं जाता था। उनकी पत्नी विशाखा अच्छे स्वभाव की थी लेकिन वह तीन बच्चों से इतनी अकबकाई रहती कि उसे कभी पड़ोस में बैठने बतियाने की फुर्सत न मिलती। विद्यावती को यह शिकायत रहती कि घर की घर में उन्हें मुँह बाँधकर बैठना पड़ता है, किरायेदारिन कभी बात नहीं करती। लाला नत्थीमल मगन थे कि वैद्यजी ठीक पहली को उनके हाथ में किराये के बीस रुपये रख देते हैं।

सबसे पहले बच्चों ने आपस की दूरियाँ ख़त्म की। वैद्यजी की बिटिया पूजा बेबी की उम्र की थी। उसकी गेंद लुढक़ती हुई आँगन की नाली में पहुँच गयी। बेबी ने नाली से गेंद निकालकर पूजा को दी। दोनों ने एक-दूसरे को नाम बताया। बेबी अपना नाम प्रतिभा बोल नहीं पाती थी। कोई उससे नाम पूछे तो वह कहती पपीता। सुननेवाला अगर हँस पड़ता तो वह रोने लगती। पूजा का उच्चारण साफ़ था लेकिन वह उसे बेबी कहने लगी। पूजा के दोनों भाई हेमन्त और वसन्त उससे छोटे थे।

मुन्नी दो साल की होकर भी अभी पैदल नहीं चल पाती थी। वह घिसट-घिसटकर बड़ी बहन के पीछे चल पड़ती। जब उसे आँगन में बैठाया जाता वह घुटनों के बल वैद्यजी के घर चली जाती।

एक शाम मुन्नी इसी तरह वैद्यजी के कमरे में पहुँच गयी जहाँ उनके तीनों बच्चे चेचक के प्रकोप से पीडि़त एक ही बिस्तर पर पड़े थे। विशाखा ने बच्ची को कमरे मे आने से रोकने की कोशिश की पर ज़मीन पर लगे बिस्तर पर मुन्नी झट से सरक आयी। वह बच्चों को छूकर जगाने लगी, ‘‘भइया उठो, भइया उठो।’’ विशाखा ने उसे गोद में भरकर इन्दु के पास पहुँचाया।

‘‘दीदी इसे सँभाल लो। हमारे बच्चे बुखार में तप रहे हैं।’’ उसने कहा।

इन्दु ने पूछा, ‘‘कैसा बुख़ार है?’’

‘‘क्या पता मियादी लगे जनै।’’ विशाखा चेचकवाली बात छुपा गयी।

तीसरे दिन मुन्नी के पेट पर लाल रंग की मरोरियाँ उभर आयीं। देखते-देखते बदन तपने लगा और शाम तक बच्ची निढाल हो गयी।

विद्यावती बोलीं, ‘‘इन्दु, लाली को तो शीतला माता आय वाली लगैं।’’

इन्दु का जी धक् से रह गया। उसे लगा हो न हो यह वैद्यजी के घर से ही छूत आयी है।

उसने अपना खटका सास को बताया। विद्यावती दनदनाती वैद्यजी के घर में घुस गयी। विशाखा बच्चों के खुरंडों पर चन्दन का तेल रुई के फाहे से लगा रही थी। विद्यावती ने कहा, ‘‘च्यों वैदजी, आपको येई घर मिला था बीमारी फैलाने को। बता नहीं सकते थे। हमारी लाली को माता निकर आयी, इसका हरजाना कौन भरैगो।’’

वैद्यजी बोले, ‘‘हम तो पहले सेई परेशान हैं। तीनों बच्चे बीमार पड़े हैं। आप अपने बच्चन सँभालकर रखें।’’

इन्दु के पास भाई की दी हुई दवाओं की पुडिय़ा थीं। उसकी समझ नहीं आया इतने छोटे बच्चे को कितनी खुराक दवा दी जाए।

उन लोगों ने घर में नीम का धुँआ किया, लाल दवाई से बच्ची के हाथ-पैर और पेट पौंछे पर बदन पर दाने फैलते चले गये। बच्ची के मुँह, कान, जीभ, आँख से लेकर पैरों के तलुवों तक में दाने फबद आये। लालाजी भी मुन्नी की बीमारी से घबरा गये। डॉ. टोपा को फीस देकर घर बुलाया गया। उसने कहा, ‘‘अब तो रोग ने पकड़ लिया है। बच्चे के आसपास सफाई रखें, बाकी बच्चों को दूर सुलायें। बड़े जोर की चेचक निकली है। इसमें यह बच्ची अन्धी, बहरी, गूँगी कुछ भी हो सकती है। बुखार कम करने की दवा मैं भिजवा देता हूँ, तब तक सिर पर गीली पट्टी रखें।’’

अब असली दिक्कत थी बेबी को अलग रखने की। वह बार-बार मुन्नी के पास जाने की जिद करती। तंग आकर यह तय किया गया कि बेबी को लीला बुआ के पास भेज दिया जाए। वह लीला से हिली हुई थी। फिर बिल्लू-गिल्लू और दीपक के साथ उसका मन भी लग जाएगा।

दादाजी ने एक पोस्टकार्ड कवि को डालकर जता दिया कि बच्ची बीमार है। इन्दु को जैसे कारावास हो गया। उसके कपड़े, बर्तन सब अलग कर दिये गये। लालाजी ने वैद्यजी से हाथ जोड़ दिये, ‘‘वैद्यजी आप मकान खाली कर दें, हमारा छोरा बहुत नाराज हो रहा है।’’

वैद्यजी ने कहा, ‘‘लालाजी अब तो बच्चे ठीक हो रहे हैं।’’

‘‘अब बच्चे हैं, हारी-बीमारी लगी ही रहेगी। वैसे भी हमें जगह छोटी पड़ रही है।’’ लालाजी बोले।

‘‘देखिए दवाखाने की जगह रोज नहीं बदली जाती। आप कहें तो मैं किराया बढ़ा दूँ।’’

लालाजी ने जी कड़ा कर कहा, ‘‘नहीं वैद्यजी, आप हमें माफ करें, जयरामजी की।’’

वैद्यजी के मकान खाली करने पर इन कमरों में नीला थोथा डालकर पुताई करायी गयी, वहाँ हवन हुआ, उसके बाद ही वहाँ घर का सामान रखा गया।

जब कविमोहन घर आया, मुन्नी का बुख़ार कम हो गया था लेकिन चेचक के दाने फुंसी-फोड़े में बदल गये थे। एक बार को कवि अपनी बच्ची को पहचान ही नहीं पाया। पहले से दुबली मुन्नी अब सूखकर कंकाल मात्र रह गयी थी। उसकी बोलने, सुनने की सामथ्र्य जैसे लुप्त हो गयी थी। उसके साथ-साथ इन्दु भी सूखकर काँटा बन गयी थी।

पहले कविमोहन खिन्न हुआ। फिर अवसन्न हुआ। उसके बाद वह यकायक फट पड़ा,‘‘जीजी मैं इन लोगों को कौन के भरोसे छोड़ गया था। आपके भरोसे। इनकी जे का गत बनायी तुमने! मैं आधी तनखा दादाजी को भेजता रहा। जाई मारे कि इन्हें रोटी मिलती रहे। वोहू ना दे पाईं तुम। इससे तो अच्छा होतौ इन्हें फूँक-पजारकर मोय बुलातीं।’’

अब पिता सामने आये, ‘‘तोय अपनी धी-लुगाई दीखीं, तूने मैया का जीव नायँ देखौ, छोरी के लिए बरत-उपास कर-करके, कै छटाँक की रह गयी है।’’

‘‘हमने तौ भैया छोरी-छोरा में कछू फरक नायँ कियौ। पूछ लो बाकी मैया से। माता आय गयी तो हम का करें। हमसे पूछकर तो आयी नायँ।’’

विद्यावती को थोड़ा ढाँढ़स बँधा। बोली, ‘‘डागदर हम बुलाये, बसौढ़ा हम पूजे, नजर हम उतरवाये, पूछ लो या बहू से, कौन जतन नहीं किये।’’

वाकई पिछले चार दिनों से दादी रोज़ सुबह मुन्नी के कान के पास ले जाकर थाली बजातीं और कहतीं, ‘‘मुन्नी उठ लाली, देख भगवान भास्कर कह गये हैं जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है सो खोवत है।’’

असहाय आक्रोश से खलबलाते कविमोहन ने अपना कुरता कन्धे पर से चीरकर तार-तार कर डाला, ‘‘तुम्हीं बताओ जीजी, दादाजी, मैं नौकरी करूँ या बच्चे पालूँ?’’

कई दिनों बाद रात में नहाकर इन्दु पति के कमरे में आयी। हथेलियों की कैंची बना, सिर के नीचे रखकर कवि छत की कडिय़ाँ ताक रहा था। चिन्तामग्न कवि की इस मुद्रा से पत्नी अच्छी तरह परिचित थी। गिले-शिकवों से गले-गले भरी इन्दु के पास धीरज की जमापूँजी नि:शेष हो चुकी थी। इस वक्त उसे यही लग रहा था पति ने उसे गुलामी के गहरे गड्ढे में धँसाकर अपनी आज़ादी कमाई है। छठे-छमासे आकर डाँट-डपट करने के सिवा और कौन-सी जिम्मेदारी निभाते हैं ये।

क्रोध के अतिरेक के बाद कवि का मन वैरागी होने लगा। यहाँ वह भाग-भागकर क्यों आता है जहाँ एक पल का चैन नहीं है। यह घर उसकी उड़ान को अवरुद्ध करता है। इस विशालकाय मकान से ज्यायदा गुँजाइश उस आधे कमरे में है जो उसने कूचापातीराम में ले रखा है। वहाँ वह जब चाहे अपनी डायरी उठाकर कविता लिख सकता है। जब चाहे बिजली का खटका दबाकर पुस्तक पढ़ सकता है। किताबों से भरी एक आलमारी उसके पास है। यह स्त्री जिसका नाम इन्दु है, अगर उसे नहीं समझेगी, ज़रूर पीछे छूट जाएगी। उसके सामने प्रगति का अनन्त आकाश है। यहाँ घर के लोग उसे पीछे धकेलते हैं, ये उसे कुएँ का मेंढक बनाना चाहते हैं।

इन्दु पति का मनोविज्ञान पहचानकर बोली, ‘‘मुन्नी रात में रोती है, मैं उसके पास जाती हूँ।’’

बगल में पड़ी चारपाई पर मुन्नी सो रही थी। वहीं इन्दु जाकर लेट गयी।

शरीर को अनिवार्यता रात के एक लमहे में उन्हें पास लायी लेकिन उसके बाद वे अपने-अपने बिस्तर पर कैद हो गये।

सुबह उठते ही कवि को दिल्ली के दस काम याद आ गये। माँ-बाप ने बार-बार कहा कि एक दिन रुक जा, कवि नहीं माना। उसकी दलील थी जो होना था हो गया, मेरे किये अब कुछ न होगा।

स्टेशन जाते समय, उसने ताँगा गली रावलिया की तरफ़ मोड़ लिया। बेबी घर के सामने इक्कड़-दुक्कड़ खेल रही थी। उसे प्यार से घपची में ले कवि ने उसके हाथ पर पाँच का नोट रखा और बिल्लू-गिल्लू व दीपक को प्यार कर चला गया। ताज्जुब कि परिवार से अलग होकर उसे तसल्ली का अहसास हुआ।
 
31

ये आज़ादी के बाद के दिनों की दिल्ली थी। इसका प्रधान रंग तिरंगा था। लालकिले पर आज़ाद भारत का परचम शान से लहरा रहा था। लेकिन ठीक उसके नीचे लालकिले की बाहरी दीवार से सटे न जाने कितने शरणार्थी अपने टीन-कनस्तर, गठरी-मोटरी लेकर खुले में बैठे हुए थे। सबके चेहरों पर परेशानी और उलझन थी। स्त्रियों ने अपने सिर दुपट्टों से ढँके हुए थे लेकिन तेज़ हवा चलने पर दुपट्टे फिसल जाते। कभी अगस्त का बादल बरस जाता तो खुले आसमान के नीचे पड़े सामान को समेटने की नाकाम कोशिश में कई जोड़ी बाँहें उघड़ जातीं। दरियागंज, तुर्कमान गेट, लालकिला, जैन मन्दिर और गुरुद्वारा सीसगंज की तरफ़ से ऐलानियाँ ताँगा कई बार मुनादी करता निकलता ‘‘भाइयो और बहनो, सरकार की तरफ़ से जगह-जगह कैम्प लगाये गये हैं, आपसे गुज़ारिश है वहाँ जाकर अपना नाम दर्ज करवाएँ और अपनी बारी का इन्तज़ार करें। खुले में रात न बितायें।’’

मुनादी सुननेवाले बेघर-बार लोग और सिकुडक़र बैठ जाते। कई कैम्पों की बुरी हालत देखने के बाद ही वे खुले आसमान के तले आकर बैठे थे। कैम्पों में इन्सान जानवरों से भी बदतर हाल में रह रहे थे। इनकी तरफ़ देखने पर आज़ादी की सारी उमंग झूठी लगती।

कविमोहन कॉलेज जाते और आते वक्त ये दृश्य देखकर उदास हो जाता। कॉलेज में उसे संस्थापक दिवस समारोह की कार्यक्रम-समिति में रखा गया। प्रिंसिपल चाहते थे कि वह कुछ फडक़ते हुए देशगान तैयार करवाये। लेकिन कवि का मन आज़ादी की विसंगतियों से डाँवाडोल रहता। वह विद्यार्थियों को ‘मेरे नगपति मेरे विशाल’ और ‘बढ़े चलो, बढ़े चलो’ जैसे गाने कंठस्थ नहीं करवा पाया। इनकी बजाय उसने दिनकर की पुस्तक ‘हुंकार’ से कविता ली—

‘श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं

माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं।

युवती के लज्जा वसन बेच जब ब्याज चुकाए जाते हैं

मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी-सा द्रव्य बहाते हैं

पापी महलों का अहंकार देता तब मुझको आमन्त्रण।’

एक और समूहगान उसने प्रतीक से लिया—

‘बोल अरी हो धरती बोल

राजसिंहासन डाँवाडोल।’

छात्र और छात्राओं को इन कविताओं की शब्द योजना और स्वर समझ आ गया और उन्होंने अभ्यास कर इन्हें कंठस्थ कर लिया। कुहू अलग अपनी नृत्यनाटिका का पूर्वाभ्यास करवा रही थी। समारोह से एक दिन पूर्व प्रिंसिपल ने बताया कि वे ड्रेस रिहर्सल देखना चाहते हैं।

विद्यार्थियों का उत्साह चरम पर था। उन्होंने फाइनल समारोह की तरह ही ड्रेस रिहर्सल का आयोजन किया।

बाकी सब आइटम तो ठीक रहे पर समूहगान पर प्रिंसिपल अटक गये। उन्होंने कहा, ‘‘जलसे में हमने रक्षामन्त्री को बतौर मुख्य अतिथि बुलवाया है। अगर वे पूछेंगे ‘राजसिंहासन डाँवाडोल’ से आपका क्या तात्पर्य है तो हम क्या जवाब देंगे’।’’

कवि ने कहा, ‘‘सर यह स्वाधीनता से पहले की कविता है, तभी के ज़ज्बात इसमें आये हैं।’’

‘‘यह बात कविता से कहाँ ज़ाहिर हुई है?’’ प्रिंसिपल ने एतराज़ किया।

इसी प्रकार दिनकर की कविता पर आक्षेप लगा। प्रिंसिपल को ख़तरा था कि इसे व्यंग्य-आरोप न समझ लिया जाए।

ड्रेस रिहर्सल के दिन ये दोनों समूहगान आयोजन में से निकाल दिये गये। कुहू से कहा गया कि वह अपनी नृत्य नाटिका में उर्वशी का एक और नृत्य जोडक़र आइटम को लम्बा बना दे।

समूहगान के छात्रों में मायूसी छा गयी। दो-तीन छात्र आक्रोश में आ गये। कवि के दोनों आइटम आयोजन से बाहर हो गये। यकायक वह संस्थापक-समारोह में आउटसाइडर बन गया।

अगले दिन उत्सव था। कविमोहन कॉलेज गया ही नहीं। वह अपने कमरे में लेटे-लेटे बाँसवेल की ‘लाइफ़ ऑफ़ जॉन्सन’ पढ़ता रहा। कवि की अनुपस्थिति को तीखेपन से कुहू ने महसूस किया। उसे लगा वह अकारण ही कारण बन गयी। वैसे भी उसे कवि का रवैया समझ नहीं आता। कभी वह पीछे हटे समुद्र-सा पराजित, परास्त और प्रत्यावर्तित दिखता। कुहू को लगता उनकी मित्रता का आधार अजनबीयत पर टिका है। वह उसके बारे में कुछ भी तो नहीं जानती।

कवि के जीवन में कुहू वहीं तक थी जहाँ इन्दु उसे अकेला छोड़ती। उसके मन में एक बुद्धिजीवी साथी की ललक बनी हुई थी। उसे लगता उसके पहलू में कोई हो जो उसके सपने और सरोकार समझे, जिसे वह अपने मन का साथी बना सके और जिसके लिए उसकी ख़ुशी अहम हो।

कॉलेज में फ्री पीरियड के दौरान उन दोनों में वार्तालाप तो अक्सर होता पर वह संवाद से ज्याकदा विवाद की शक्ल ले लेता। बल्कि अब तो बाकी अध्यापक बाकायदा इन्तज़ार करते कि इनकी बहस छिड़े तो उनका भी वक्त कटे।

सबसे पहला विवाद का विषय तो यही हो जाता आज चाय मँगाई जाए या कॉफी। कुहू को कॉफी पसन्द थी। कवि चाय-प्रेमी था। वह कहता, ‘‘कैंटीनवाले को कॉफी बनानी नहीं आती, इंडियन कॉफी हाउस जैसी कॉफी यहाँ कभी नहीं मिल सकती।’’

कुहू कहती, ‘‘यहाँ की चाय तो और भी रद्दी है, उसमें फ्लेवर है ही नहीं।’’

स्टाफ़-रूम में मौजूद मेहरोत्रा कहता, ‘‘फिज़ूल झगड़ रहे हो तुम लोग, जिसे चाय पीनी है चाय मँगाये, जिसे कॉफी पीनी है, कॉफी।’’

कोहली फुटनोट जड़ता, ‘‘कुहेलीजी की रुचियाँ हाइक्लास हैं, कविमोहन की, मिडिल क्लास। जोड़ी नहीं बैठती।’’

कुहू मन मारकर चाय पी लेती।

कभी साहित्य के प्रश्नों पर बहस छिड़ जाती जो कई दिन चलती। कुहू की आदत थी वह जिस भी कवि की कविता क्लास को पढ़ाती, उसी का राग अलापना शुरू कर देती। इन दिनों वह शैले पढ़ा रही थी। उसने लायब्रेरी से लेकर शैले की जीवनी ‘एरियल’ से लगाकर समस्त किताबें पढ़ डालीं। वह शैले की जीवन-शैली, क्रान्तिकारिता और काव्य-प्रतिभा के गुणगान से भरी हुई थी। कवि को शैले बुरा नहीं लगता था लेकिन वह उसका दीवाना भी नहीं था।

‘‘मैं यह मानता हूँ शैले ने अपना जीवन गलत ढंग से जिया। इसकी वजह से उसने तो दुख पाया ही, उससे जुड़े सभी लोगों ने बेवजह दुख उठाया।’’ कवि ने स्टाफ़-रूम में कुहू से कहा।

‘‘तुम पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो। वह इतना संवेदनशील था कि और किसी तरह जीना उसके बस में नहीं था। कच्ची उम्र में अपनी सौतेली बहन के प्रेम में पड़ गया, ज़रा बड़ा हुआ तो हैरियट की ख़ूबसूरती उसे ले डूबी।’’ बोलते-बोलते कुहू भावुक हो उठी।

‘‘उसने हैरियट को सिर्फ सताया, उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया, वह क्रिमिनल था।’’ कवि ने कहा।

‘‘तुम उसके प्रति ज़ालिम हो रहे हो। उसकी कविताओं के बरक्स उसका जीवन रखकर देखो। ऐसा कवि ही हताशा के हक़ में लिख सकता है।’’

‘‘क्या यह अच्छा है, अपनी पीड़ा में छपक-छपक नहाना? उससे कहीं सशक्त कवि वर्ड्ज़वर्थ और कोलरिज हैं।’’ कवि ने प्रतिवाद किया।

‘‘तुमने भी किन मीडियॉकर के नाम ले लिये,’’ कुहू ने कहा, ‘‘वर्ड्ज़वर्थ में कहीं उत्तेजना का चरमबिन्दु नहीं है, वह ताउम्र सत्तानवे डिग्री पर लिखता रहा।’’

‘‘तुम यह उम्मीद क्यों करती हो कि लेखक अपना कुल जीवन दाँव पर लगाकर लिखता रहे? लेखक को इसी जीवन में बहुत से काम करने रहते हैं, लिखना उनमें से एक काम है।’’

‘‘नहीं इस तरह कोई जीनियस नहीं लिख सकता।’’

तभी घंटी बजने से उनकी बहस स्थगित हो गयी लेकिन शेष दिन के लिए दोनों को विचारमग्न छोड़ गयी।

कवि सोचने लगा कि उसकी नज़र में शैले पलायनवादी, सुखवादी और अव्यावहारिक इन्सान था लेकिन एक लेखक के तौर पर वह स्वयं क्या है? एक तरफ़ वह अपने को जिम्मेदार नागरिक मानता है दूसरी तरफ़ वह अपने घर का बोझ माता-पिता के ऊपर डालकर अविवाहित जीवन जैसी स्वाधीनता कमाने की कोशिश करता है। उसके जीवन में क्या कम विसंगतियाँ हैं। जैसे शैले ने हैरियट को मौत की कगार पर पहुँचाया वह भी अपनी पत्नी को तिल-तिल मार रहा है। महज़ कुछ रुपये घर भेज देने को वह अपने कर्तव्य की पूर्ति समझता है।

उसे यह भी समझ आने लगा था कि कुहू शायद उसे अविवाहित मानकर ही चल रही है। वैसे कॉलेज में अब्दुल, अपूर्व और कई साथियों को पता था कि वह विवाहित है पर उन सबसे कुहू की कोई अनौपचारिक मित्रता नहीं थी। यह कुहू का भोलापन था अथवा कवि का काइयाँपन कि अब तक वह अपने विवाहित होने की जानकारी उसे नहीं दे सका। वह अपने को रोज़ यही भुलावा देता रहा कि बिना किसी सन्दर्भ और प्रसंग के वह कैसे कुहू से कह सकता था, सुनो मैं बाल-बच्चेदार आदमी हूँ, तुम मुझे अपना सम्भावित साथी मत समझो।

कवि ने तय किया कल वह किसी भी तरह कुहू को जता देगा कि उसके परिवार में कौन-कौन है। काश उसके पास इन्दु और बच्चों की कोई तस्वीर होती। तब उसका काम बड़ा आसान हो जाता। वह किताब में से तस्वीर गिरा देता और उठाते हुए कहता, ‘देखो कुहू, मेरा प्यारा परिवार। मेरी पत्नी इतनी सुन्दर है कि नरगिस, निम्मी उसके आगे पानी भरें। और ये हैं मेरी बच्चियाँ।’ लेकिन तस्वीर के बिना कवि उन्हें तस्वीर से भी कहीं ज्या दा सप्राण, सुन्दर और आत्मीय बना देगा, यह वह जानता था।

32

अगले दिन कॉलेज में कुहू का सामना करने के लिए कवि ने पिछली रात आँखों में काटी। दिमाग में तरह-तरह के जाले थे जो तर्क-वितर्क से हट नहीं रहे थे। कवि सोच रहा था उन दोनों के बीच घोषित सम्बन्ध तो महज़ इतना था कि वे एक ही कॉलेज के एक विभाग में सहकर्मी थे। दोनों को ही कविता पढ़ाने में विशेष रुचि थी हालाँकि उनके प्रिय कवि अलग थे। दोनेां को साहित्यिक बहस का शौक था। यह अलग बात है कि कई बार उनकी बहस एकाधिक दिन तक चला करती और स्टाफ़-रूम में मौजूद बाकी लोग दिलचस्पी से यह नज़ारा देखते। इसके साथ-साथ सतह के नीचे पनपने वाली वह मित्रता थी जिसकी पृष्ठभूमि दोनों की असावधानी से निर्मित हुई थी। कुहू के बार-बार ज़ोर देने पर कविमोहन के उसके घर जाने के छ:-सात प्रसंग, देवाशीष के कविता या अध्ययन-सुधार के चार-पाँच सत्र और कुल जमा एक बार कवि का उनके घर पर रात्रिकालीन भोजन। उस दिन की बात से कवि को आज भी हँसी आ जाती है। कैसे कुहू की माँ ने ताज्जुब से कहा था, ‘ओ माँ यह बोका माछेर झोल खाता नहीं, इसको हम क्या खिलाएँ?’ उस रात कवि ने उनके यहाँ सिर्फ चने की दाल से लूची खायी थी। कवि को उस परिवार का उत्फुल्ल भाव पसन्द था। वहाँ सब सदस्यों का आपस में सहज संवाद था। लडक़े-लडक़ी की मित्रता के प्रति न कोई सन्देह न संकोच। बल्कि उसके पिता स्वयं कहते, ‘‘कोबी इस पूजो पर तुम हमारे साथ कोलकाता चलो, बहुत अच्छा लगेगा।’’ घर की हदों में कुहू भी एकदम अलग किस्म की लडक़ी बन जाती, शैले और वर्ड्सवर्थ पर झगडऩेवाली युवती की जगह ताश के पत्ते बाँटती, फेंकती, एक अल्हड़ लडक़ी।

उस परिवार के ताने-बाने में कवि एक सदस्य की तरह स्वीकार कर लिया गया था, यहाँ तक कि कवि को बोलचाल की बांग्ला समझ आने लगी थी। वह रवीन्द्रनाथ ठाकुर और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा लिखित दोनों बांग्ला प्राइमर भी खरीद लाया था। रात जब वह आखिरी बस से दस बजे जाने को कहता, कुहू उसे छोडऩे घर के फाटक तक आती और व्यग्रता से पूछती, ‘‘फिर कब आओगे?’’ थोड़ी देर दोनों ठिठके खड़े रहते। पूरे चाँद की चाँदनी में न सिर्फ बेगमबेलिया के पत्ते वरन् कुहू के बाल भी चमकते, उसका दुपट्टा एक क्षण कवि के ऊपर लहरा जाता और वह कहती, ‘‘एदियू टिल वी मीट अगेन।’’ कवि बस की जगह बादलों पर सवार होकर वापस लौटता।

कवि को याद आया एक दिन कुहू की माँ ने कहा, ‘‘ये लडक़ी, कोबी, एकदम पागल है। इधर बंगाली मार्केट में नहीं उधर करोलबाग जाकर शॉपिंग करना बोलती। तुम इसको ले जाओ, हम तो कभी करोलबाग गया नहीं।’’

एक इतवार वे दोनों करोलबाग गये थे। कुहू चिडिय़ा की तरह चहक रही थी। उसने सलवार-सूट का कपड़ा, पाउडर, शमीज, छोटे टॉवेल और मेवे खरीदे। फिर बोली, ‘‘अरे मुझे बॉबपिन्ज़ और क्लिप खरीदने थे, वह तो मैं भूल ही गयी।’’ वह कवि की बाँह पकडक़र एक तरह से घसीटती हुई ही वापस चल पड़ी थी मार्केट की ओर जहाँ नुक्कड़ पर ही क्लिपवाला और चाट-पकौड़ी वाला बैठा था। जब कुहू ने बालों के लिए तरह-तरह के ढेर सारे क्लिप्स और पिन खरीदे, कवि ने भी तीन जोड़ी सुन्दर से क्लिप्स खरीद लिये थे।

कुहू ने शरारत से कहा था, ‘‘अपनी तीन गर्ल फ्रेंड्स के लिए?’’

कवि ने सकपकाकर कहा था, ‘‘मेरी तीन बहनें हैं।’’

उस क्षण कवि बता सकता था कि वह यह सौगात अपनी पत्नी के लिए खरीद रहा है लेकिन उसमें नैतिक साहस ही न हुआ। उसे बहनों का नाम लेना सर्वथा सुरक्षित लगा।

रात में इन बातों की निष्प्रयोजनता कवि के सामने खुलती जा रही थी। वह तय कर रहा था कि उसे यह ख़बर पहले कुहू-परिवार को देनी चाहिए अथवा कुहू को! कभी वह सोचता उसे पहले कुहू को बताना चाहिए क्योंकि परिवार को तो वह कुहू के माध्यम से जान पाया है। कभी उसे लगता एक बार परिवार उसके सत्य को स्वीकार कर ले फिर तो कुहू का व्यवहार समयानुसार सहज हो जाएगा।

इन्हीं द्वन्द्वों में फँसा जब कवि कॉलेज पहुँचा उसने पाया आज कुहू कॉलेज आयी ही नहीं है।

कवि कुछ प्रकृतिस्थ होकर स्टॉफ़-रूम में अपनी कुर्सी पर बैठ गया। कुछ देर बाद उसके हैड ने ही बताया, ‘‘कुहेली भट्टाचार्य के फादर को हार्ट अटैक हो गया है। उसका फोन आया था।’’

कवि को हैरानी हुई, ‘‘कब की बात है।’’

‘‘लास्ट नाइट बताया था उसने।’’

कविमोहन ने किसी तरह एक पीरियड लिया, फिर वह बंगाली मार्केट की तरफ़ चल पड़ा।

घर पर ताला लगा था। पड़ोसी ने बताया शायद जीवन हॉस्पिटल गये हैं सब लोग।

सघन चिकित्सा कक्ष के बाहर गलियारे में बेंच पर चिन्तामग्न बैठे तीन चेहरे माँ, देवाशीष और कुहू के थे। उन्हीं से कवि को पता चला कि रात खाने के बाद पिताजी को यकायक बेचैनी हुई, बाँह में तेज़ दर्द हुआ और वे बेहोश हो गये। डॉ. आहूजा को बुलाकर दिखाया तो उन्होंने इन्हें हॉस्पिटल लाने की सलाह दी। गम्भीर हार्ट अटैक था। इस वक्त दवाओं के असर से बेसुध हैं।

मौजूदा हालात में पिताजी की देखभाल के अलावा और किसी विषय पर बातचीत का सवाल ही नहीं था। कॉलेज के कुछ और लोग भी उन्हें देखने आये लेकिन कवि पर उनके पास बैठने की बाक़ायदा ड्यूटी लगी थी। कुहू के चाचा का परिवार कलकत्ते से दो दिनों के लिए आकर बीमार का हाल देख गया। सेवासुश्रूषा का असली वज़न घर के लोगों पर ही था और कवि भी घर का हिस्सा समझा जाने लगा।

एक शाम वह भट्टाचार्यजी के पास बैठा किताब पढ़ रहा था। तभी स्टॉफ नर्स ने आकर उनका रक्तचाप जाँचा। वह कवि से मुस्कराकर बोली, ‘‘आपके फ़ादर हैं ये?’’

‘‘नहीं, फ़ादर जैसे हैं।’’

‘‘फ़ादर इन लॉ?’’

‘‘नहीं, माय फ्रेंड्स फ़ादर।’’

नर्स के जाने के बहुत देर बाद जब कवि भट्टाचार्यजी को फलों का रस पिला रहा था, उन्होंने अचानक कहा, ‘‘कोबी, हमंऔ लगता हम अब लडक़ी का बिये कर दें।’’

कवि एकबारगी समझा नहीं कि वे क्या कह रहे हैं। उसे प्राइमर से यह तो पता था कि बोई का मतलब किताब होता है। बिये का मतलब वह नहीं जानता था।

भट्टाचार्यजी कहने लगे, ‘‘रिटायर होकर हम सोचता था, सब काम धीरे-धीरे करेगा। अब तबियत बोलता, तड़पड़ काम करने का जैसे हज़ारे रन बनाता। ताड़ाताड़ी।’’

‘‘सब हो जाएगा, पहले आप स्वस्थ होकर घर तो पहुँचें।’’

कवि ने उनको शान्त किया। उसे आभास हुआ कि उनका मतलब कुहू की शादी से है। यह वह मौका नहीं था जब कवि इस सत्य का उद्घाटन करता कि वह विवाहित है, दो बच्चों का पिता। एक इनसान की जान पर बनी थी और अगले चार घंटे, उनकी सुश्रूषा का भार कवि पर था।

जब कुहू रात के लिए थर्मस में दूध लेकर हॉस्पिटल आयी तब भी कवि यह न पूछ सका कि सुनो कुहू, बिये का मतलब क्या होता है?

अपने कमरे के एकान्त में, बिस्तर पर, थके-हारे, लेटे हुए कवि को बड़े तीखेपन से लग रहा था भारतीय समाज पुरुषों के प्रति कम क्रूर नहीं रहा है। क्यों नहीं समाज ने कुछ ऐसे प्रतीक चिह्न स्थापित किये जिनको धारण करने से पुरुषों का विवाहित होना ज़ाहिर हो सके। स्त्रियों को कम-से-कम यह छूट है कि वे मंगलसूत्र, सिन्दूर, आलता और बिन्दी के सहारे अपने विवाहित होने का सबूत पेश कर सकती है। पुरुष के सर्वांग पर कहीं नहीं लिखा होता कि वह विवाहित है अथवा अविवाहित। पुरुष शिथिल, थुलथुल, अधेड़ दिखने लगे तब तो लोग समझ लें कि हाँ यह बाल-बच्चेदार आदमी है, अन्यथा अगर वह कवि की तरह लम्बा, दुबला, लडक़े जैसे युवा और आकर्षक व्यक्तित्व का हो तो यह समस्या हर सम्पर्क में उपस्थित हो सकती है। पश्चिम में मर्द के बायें हाथ की अनामिका में अँगूठी का होना उसका शादीशुदा होना बताता है पर भारतीय समाज में मर्द की उँगली में अँगूठी कोई स्पष्ट घोषणा-पत्र नहीं है। शादी पर कविमोहन को ससुराल से अँगूठी दी गयी थी जिस पर ú खुदा हुआ था। कवि ने उसे एक भी बार पहनकर नहीं देखा। उसे हमेशा लगता था अँगूठी पहननेवाले हाथ व्यापारियों के हाथ होते हैं। कलम-पेन्सिल पकडऩेवाले हाथों में अँगूठी शोभा नहीं बाधा लगती है। उसकी अँगूठी घर की तिजोरी में कहीं पड़ी होगी। कवि को बच्चनजी की पंक्तियाँ याद आने लगीं—

‘हम कब अपनी बात छिपाते।

हम अपना जीवन अंकित कर

फेंक चुके हैं राज-मार्ग पर

जिसके जी में आये पढ़ ले, थमकर पल भर आते-जाते

हम कब अपनी बात छिपाते।’

यही ठीक रहेगा, कवि ने सोचा। वह कुहू को पत्र लिखकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर देगा।

कवि का मन कुछ हल्का हो आया। शब्द की दुनिया पर उसे सबसे ज्या्दा भरोसा था।

करवट-करवट सोकर देखा लेकिन उसको नींद न आयी। कवि कागज़-कलम लेकर बैठ गया।

उसने लिखना शुरू किया—मेरी दोस्त कुहू। फिर कुछ सोचकर उसने मेरी शब्द काट दिया। —मेरी दोस्त कुहू। उसे क्या हक है कुहू को मेरी कहने का। आगे उसने लिखा—‘तुम सोचोगी जब मैं रोज़ इतने घंटे तुम्हारे पास, तुम्हारे साथ होता हूँ, चिट्ठी लिखने की आखिर क्या ज़रूरत पड़ गयी। आज अस्पताल में पिताजी को यकायक तुम्हारी फिक्र होने लगी। उन्होंने कहा वे चाहते हैं तुम्हारी बिये कर दें। बांग्ला सहज ज्ञान पोथी में बिये शब्द का अर्थ तो नहीं दिया पर मैं समझ रहा हूँ कि उनका तात्पर्य तुम्हारे विवाह से है।

इसके लिए पहल तो तुम्हें करनी होगी। जैसी सहज, सजग और प्रखर तुम हो अपने अनुरूप साथी ढूँढऩे का काम सबसे सही तरीके से तुम ही कर सकती हो। अपने आसपास साथियों पर नज़र दौड़ाता हूँ तो मुझे कोई भी तुम्हारे योग्य नहीं लगता, मैं भी नहीं। काश तुम मुझे पाँच साल पहले मिली होतीं। तब मैं अपना नया उज्ज्वल प्रथमोल्लास तुम्हें अर्पित करता। अब तो मेरी दशा कुछ-कुछ एलियट की कविता की शुरुआत जैसी है—

‘लेट अस गो देन यू एंड आय

वैन द ईवनिंग इज़ स्प्रेड अगेंस्ट द स्काय

लाइक ए पेशेंट ईथराइज़्ड अपॉन द टेबिल।’

मेरी पत्नी इन्दु सुन्दर और अच्छी है लेकिन मेरे विचारलोक में प्रविष्ट नहीं है। उसे अधिक शिक्षित करने का मुझे समय और अवसर भी नहीं मिला। तुममें मैंने अपनी सोलमेट की झलक देखी जिसका स्विचबोर्ड हमेशा सक्रिय और संवेदनयुक्त रहता है।

इस पत्र को लिखते हुए मैं एक साथ चिन्तातुर और चिन्तामुक्त, दोनों हो रहा हूँ। तुम समझ सकती हो।

तुम्हारा

कविमोहन

पत्र पूरा कर कवि उसे एक बार पढ़ गया। अब उसने सम्बोधन में से दोस्त शब्द भी काट दिया—मेरी दोस्त कुहू—सिर्फ कुहू बच रहा। अन्त में भी एक शब्द काटना पड़ा—तुम्हारा। उसने दूसरी बार पत्र पढ़ा। कटे हुए शब्द लाशों की तरह पृष्ठ पर पड़े थे। कवि चाहता तो चिट्ठी दुबारा नये कागज़ पर लिख सकता था। पर उसकी आदत थी वह कोई भी चीज़ बस एक बार लिखता। कविता से लेकर लेख तक उसका यही अभ्यास था। हाँ, कागज़ पर उतरने से पहले पंक्तियाँ उसके मन-मस्तिष्क में उमड़ती रहतीं।

पत्र को मोडक़र उसने लिफ़ाफे में डाला। लिफ़ाफे के ऊपर कुहू का नाम लिखते हुए हाथ कुछ काँप गया। दूसरा लिफ़ाफ़ा लम्बा था, रचनाएँ भेजनेवाला। उसमें निजी ख़त डालना अच्छा नहीं लगता। कवि ने मेज़ पर चिट्ठी रख छोड़ी। उसके ऊपर पेन रख दिया। सोचा सुबह दूसरा लिफ़ाफ़ा लाकर नाम नये सिरे से लिख देगा।

आमतौर से कवि देर में सोकर उठता था और हड़बड़ी में तैयार होकर कॉलेज चल देता। आज सुबह-सुबह हल्की फडफ़ड़ाहट से उसकी नींद खुल गयी। उसने पाया खिडक़ी से आ रही हवा से कलम के नीचे दबा कागज़ रह-रहकर फडफ़ड़ा रहा है जैसे कह रहा हो, मुझे सँभाल लो, मैं किसी भी पल उड़ जाऊँगा।

कवि ने बाँह बढ़ाकर चिट्ठी उठा ली। चिट्ठी पर नज़र डाली। थोड़ा असन्तोष हुआ। उसे लगा चिट्ठी अधूरी है। उसने पुनश्च लिखकर उसमें जोड़ा, ‘आज मुझे तुम्हारे प्रिय कवि शैले की पंक्तियाँ याद आ रही हैं—

‘We look before and after

And pine for what is not.

Our sincerest laughter

is with some pain fraught

Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.’

जब तक चिट्ठी कमरे में रखी रही कविमोहन को चुनौती देती रही। उसे लग रहा था यह चिट्ठी उसे अँगूठा दिखा रही है, ‘तुम मुझे डाक में डालोगे ही नहीं। तुम्हें बंगाली मार्केट का पता भूल जाएगा। तुम्हारे पास न लिफ़ाफ़ा है, न डाकटिकट। तुम इस शहर में अपनी एकमात्र दोस्त को अपनी बेवकूफ़ी से खो दोगे। तुम्हारा नाम कविमोहन नहीं मूर्खमोहन है।’

कवि से न नाश्ता खाया गया न खाना। वह कॉलेज भी नहीं गया। उसने अख़बार भी नहीं पढ़ा। उसके दिमाग में आँधी चलती रही। किस मुँह से वह कॉलेज जाता रहेगा। कुहू उसे क्यों क्षमा करेगी! और उसका परिवार!

आखिरकार सत्य का बोझ और अधिक सहना कवि के लिए असह्य हो गया और शाम पाँच बजे वह चिट्ठी डाकपेटी में छोड़ आया।
 
33

मथुरा में इन दिनों बड़े परिवर्तन हो गये थे। आज़ादी के साथ ही वहाँ नये निर्माण का दौर आया और देखते-ही-देखते वहाँ के बाज़ार रौनक़दार हो गये। बहुत से शरणार्थियों ने छत्ता बाज़ार, चौक, होली दरवाज़े, नानकनगर और डैम्पियर पार्क में तरह-तरह के स्टोर खोले। इनमें पीले टिमटिमाते बल्बों की जगह उन्होंने लम्बी ट्यूबलाइटें लगवायीं जो दिन में भी दुकानों को जगमग रखतीं। दुकानदारी का शास्त्र और अर्थशास्त्र दोनों बदल गया। पुराने व्यापारी इन नये दबावों को महसूस कर थोड़ा तिलमिलाते, फिर पंखे की डंडी से पीठ खुजाते हुए बोलते, ‘‘दुकानें लाख नयी हो जाएँ ग्राहक तो वही पुराने हैं, वे तो हमारे ही पास आएँगे।’’ इस बात में केवल एक-तिहाई सच था। ग्राहक की जेब में पैसे हों न हों वह एक नज़र इन नये स्टोरों पर ज़रूर मारता।

उसके व्यवहार की जड़ में घर की स्त्रियों की ललकार रहती जो सुबह-सवेरे मुनादी कर देतीं, ‘‘तुम यह बट्टीवाला साबुन कहाँ से ले आये? बगलवाली के यहाँ तो ‘काके दी हट्टी’ का साबुन आया है। यासे आठ आना सस्ता और झाग दोगुना।

पति गाँठ बाँध लेते अब से ‘काके दी हट्टी’ से ही साबुन लाना है।

नव-स्वाधीन भारत देश का न केवल भूगोल वरन इतिहास भी बदला था। उसका बाज़ार और भाव भी बदल रहा था। जिसने यह सत्य जितनी जल्द पहचान लिया उतनी जल्द वह तरक्की की दौड़ में शामिल हो गया। पीछे छूटे लोग रोते रह गये अपनी पुरानी दुकान और दुकनदारी को।

लाला नत्थीमल समय की चाप पहचान रहे थे। उन्होंने इसकी शुरुआत पत्नी विद्यावती और बेटी भगवती के आचरण में देखी थी। उन्हें पता था कि अब बाज़ार विक्रेता का नहीं ख़रीदार का हो रहा है।

लाला नत्थीमल के अन्दर समय की नब्ज़ टटोलने की अद्भुत मशीन लगी हुई थी। वे यह भी मानते थे कि ग्राहक के अनुकूल बात कहते हुए भी अपने मन की करना, एक अच्छे व्यापारी की निशानी है। अत: वे भी अब आसामी से इसी तर्ज में बात करते।

भगवती ने दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर स्कूल का कीर्तिमान तोड़ा और उसी साल उसे कस्तूरबा विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी मिल गयी। लाला नत्थीमल ख़बर से हक्का-बक्का रह गये क्योंकि उन्होंने कभी कल्पना ही नहीं थी थी कि ऐसा ज़माना आएगा जब लडक़ी भी कमाई करने लगेगी। आदत के मुताबिक पहले उन्होंने विरोध किया, ‘‘भग्गो काम पर नहीं जाएगी। लोग क्या कहेंगे! बनिया बिरादरी में तो नाक कट जाएगी!’’

विद्यावती बोली, ‘‘छोरी ने पढ़ाई कर सिर ऊँचा किया है तुम्हारा। लडक़ी है तो क्या हुआ!’’

‘‘पहले घर का काम तो सीख ले। कल को ब्याह होगा तो किताब-कापी काम नायँ आयगी।’’

‘‘घर के काम वह पहले से जानै। अभी तो ब्याह तय नहीं हुऔ है तब तक तो पढ़ाने दो बाय।’’

‘‘छोरी की कमाई खाओगी?’’

‘‘अलग धरती जाऊँगी। डाकखाने में उसके नाम जमा करवा देना।’’

‘‘तुम इत्ती हिमायत च्यों कर रही हो?’’

‘‘मैंने देख लिया ना। पढ़ाई के बिना औरत की जिन्दगी नरक है। येई लीली को बीच में स्कूल से उठा लिया। कुन्ती भी छठी के आगे नायँ पढ़ी। कवि देखो पढ़ गया तो कित्ता आगे बढ़ गया।’’

‘‘हाँ वह तो दिल्लीवाला बन के बैठ गया। अपनी छोरियों की भी फिकर नायँ।’’

‘‘इनके नाम भी लिखवाओ। बेबी बड़ी हो रही है, कब स्कूल जायगी?’’

बड़े बेमन से पिता भगवती को काम पर भेजने को राजी हुए। उन्होंने उसे डपटकर समझाया, ‘‘टीचर बन गयी है इसका मतलब यह नहीं कि सडक़ों पर फक्का मारती घूम। घर से स्कूल, स्कूल से घर सूधे से आना-जाना है। सडक़ पर कभी किसी से बोलना नहीं। और कान खोलकर सुन ले, फैसन करबे की कोई जरूरत नहीं।’’

भगवती ने दबी ज़ुबान से कहा, ‘‘दादाजी स्कूल में टीचरों की भी ड्रेस है, नीली किनारी की सफेद धोती।’’

गाँधीजी के सिद्धान्तों पर कस्तूरबा विद्यालय स्थापित हुआ था। अभी वहाँ सिर्फ कक्षा एक से पाँच तक की पढ़ाई होती। महात्मा गाँधी का नारा ‘सादा जीवन उच्च विचार’ स्कूल के फाटक पर भी अंकित था।

बनिया बिरादरी को महात्मा गाँधी की ‘सादा जीवन’ वाली उक्ति बहुत पसन्द थी। खर्च से चिढऩेवाली कौम को लगता गाँधीजी के आदर्शों से और कुछ हो न हो घर में बचत तो हो ही सकती है। उच्च विचारवाली बात पर वे थोड़े हक्के-बक्के हो जाते। फिर मन में तसल्ली करते कि नौजवान पीढ़ी जब किफ़ायत से जीना सीखेगी तो विचार अपने आप उच्च हो जाएँगे। अपने विचारों को लेकर वे कभी चिन्ताग्रस्त नहीं रहे क्योंकि उन्हें लगा कि उनसे ज्याचदा आदर्शवादी जाति न कभी कोई थी न होगी। महात्मा गाँधी के राष्ट्रीय आन्दोलन को भी उन्होंने एक बिरादरी-नज़र से देखा। वे महात्मा गाँधी को राष्ट्रीय नेता से अधिक एक बनिया नेता में तब्दील करना चाहते थे। जब-तब आज़ादी मिलने के बाद भी वे अपनी सायंकालीन बैठकों में उनके दर्जन भर नुक्स निकालते। लाला शरमनलाल कहते, ‘‘गाँधीबाबा के साथ मुश्किल यह है कि वे न समाजवाद के बारे में स्पष्ट हैं न लोकतन्त्र के। पढ़ा तो उन्होंने खूब है पर बीच में जो ये दक्खिन अफ्रीका चले गये ना, बस हमारे यहाँ की राजनीति उनके हाथ से छूट गयी। अब वे लाख कहते रहें चरखा चलाओ, खादी पहनो, इससे तो देश का काम चलेगा नहीं।’’

छेदीलाल कहते, ‘‘गाँधीबाबा कहते हैं अपनी जरूरतें कम करो। खुद नंगे उघाड़े रहते हैं कि उनकी देखादेखी हम लोग भी नंगधड़ंग रहें।’’

अच्छत चौबे कहते, ‘‘अरे हम तो तऊ नंगे उघाड़े रह लें पर लुगाइयों का क्या होगा। वे तो कुछ पहिरेंगी।’’

लाला नत्थीमल बोलते नहीं पर उन्हें बड़े ज़ोर से कौंध जाता वह दिन जब उनकी पत्नी अपनी बेटी के साथ स्वदेशी आन्दोलन की सभा मे होली दरवाज़े गयी और भाईजी की वक्तृता सुनकर ऐसे जोश में आयी कि उसने अपने बदन पर लपेटी चीनी सिल्क की चादर उतारकर विदेशी वस्त्रों की होली में झोंक दी। उसी समय कांग्रेसी वालंटियरों ने उसके ऊपर खद्दर की चादर डाल दी। लालाजी को बेचैनी इस बात की थी कि कुछ पल को ही सही तमाम भीड़ ने उनकी स्त्री को नंगा उघाड़ा तो देख लिया।

वे नहीं चाहते थे कि एक अधनंगा, मझोले कद का दुबला-पतला आदमी आज़ादी के नाम पर उनकी स्त्री और बच्चों को अनुशासित करे।

प्रकट उन्होंने कहा, ‘‘चलो आजादी आ भी गयी और अँग्रेज चले भी गये तो अब क्या करोगे। का आजादी लेकर चूरन की तरह चाटोगे।’’

छेदीलाल बोले, ‘‘अरे आजादी भी यह क्या आयी है कि लफंगों, गुंडों, हरामखोरों को आजादी मिल गयी है, शरीफ लोग वैसे के वैसे। जरा भंगी का हौसला देखो, झाड़ू नहीं लगाएगा, धीमर पानी नहीं भरेगा, मोची पनही नहीं बनायेगा। हम लोगों का तो मरण हो गया। ये काम कौन करेगा?’’

भरतियाजी ने कहा, ‘‘चलो मान लो यह जागरण की आँधी है। अब जिसे तनखाह दोगे वही झाड़ू लगाएगा और वही पानी भरेगा। असली बात पर आओ। औरतें घर में हमारा कहा मानेंगी या उस गाँधीबाबा का जो बहत्तर मील दूर बैठा है।’’

लाला नत्थीमल को भी यही प्रश्न सबसे ज्यादा प्रासंगिक लगा। उन्होंने कहा, ‘‘दसियों साल से मैं देख रहा हूँ, औरतों को आजादी का चस्का जरा ज्यादा ही लगा है। पहले ससुरा चरखा चलाने के नाम पे घर से बाहर पैर निकला, फिर तो लुगाइयाँ कई-कई सभाओं में जाने लगीं। सत्याग्रह का शोर तो उन्होंने सुराजी भौलंटियरों से भी ज्यातदा मचाया। जरा-जरा बात में चूल्हे की लपट जैसी भभकें, ये कोई अच्छौ गुन-ढंग नायँ।’’

भरतियाजी अपने मित्र का दर्द समझ रहे थे। उनकी पत्नी और बहन भी चरखा चलाने का संकल्प लिये हुए थीं। उन्होंने कहा, ‘‘पर अब तो सुराज आ गया, अब चरखा चलाने की कौन ज़रूरत है। जहाँ कताई केन्द्र था वहाँ तो खद्दर भंडार खुल गया है। खुद इन लोगों के नेता भाईजी वहाँ बैठते हैं। कल तक नुक्कड़ पर नेतागिरी करते थे, आज हाथ में गज पकडक़र खादी नाप रहे हैं।

लालाजी बोले, ‘‘लो बोलो, इन्हें भला आजादी से क्या मिला?’’

भरतियाजी ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं है। ये खुद गाँधीजी के कहने से ही इस काम में लगे हैं। तुम्हें पता है बड़े-बड़े लोग आजकल संकल्प लेकर खद्दर भंडार में बैठते हैं और खादी बेचते हैं। देखा है न भंडार के बाहर लिखा रखा है—‘खादी वस्त्र नहीं विचार है।’ यह भी गाँधीजी का ही वाक्य है।’’

वास्तव में खादी, विचार से ज्याीदा एक अस्त्र था जिससे गाँधीजी भारतवर्ष की अर्थव्यवस्था ठीक करना चाहते थे। उनका नारा हो सकता था ‘खादी वस्त्र नहीं अस्त्र है’। लेकिन तब उनका अहिंसावाला आदर्श चोट खा जाता। इसलिए उन्होंने कहा ‘खादी वस्त्र नहीं विचार है’।

छेदीलाल ने कहा, ‘‘खादी महँगी होवै है। बड़े आदमी ही पहर सकें खादी।’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं। फिर हमने तो सुनी है कि खद्दर भंडार में हरेक ग्राहक को एक जोड़ी कपड़ा मुफ्त दे रहे हैं।’’

‘‘पहले शपथ लेनी पड़ती है कि सारी उम्र खद्दर ही पहनोगे तब मिलता है धोती-कुर्ता-गंजी और गाँधी टोपी।’’ भरतियाजी ने बताया।

मथुरा के जमुनाजल में जैसे सौ भँवर की हिलोर पड़ गयी। शाम का वक्त था। दुकानदार अपनी दुकानदारी में उलझे थे, गृहस्थ अपना सरंजाम सँभाल रहे थे कि दनादन, दनादन, दनादन, तीन गोलियों ने नवजात हिन्द स्वराज्य का नक्शा बदल दिया। ज़रा देर में छिद्दू रोता हुआ दुकान पर लौटा, ‘‘आज मैं खायबे को नईं खाऊँगौ, आप अन्दर बतला दें। आज गाँधीबाबा को दईमारों ने गोली मार दई।’’

‘‘तुझे कैसे पता?’’

‘‘मैं पानवाले के ढिंग रेडियो सुन रह्यै थौ। वहीं पे रोआराट मच गयी। आप भी लालाजी जल्दी से दुकान बढ़ालो, हल्लागाड़ी ऐलानिया बोल रई है।’’

लाला नत्थीमल के हाथ-पैर फूल गये। अगल-बगल झाँककर देखा। सभी अपने बोरे और कट्टे समेट रहे थे। जिनके पास रेडियो था वे बटन घुमाकर दिल्ली स्टेशन पकडऩे की कोशिश कर रहे थे। लडक़ों की एक टोली हाय-हाय करती मंडी के बीच से निकली। सबके चेहरों पर बदहवासी थी।

लालाजी को पत्नी का ध्यान आया। विद्यावती का जाने कौन हाल होगा खबर सुनकर। उस पगली ने कैसा तार जोड़ रखा था गाँधीबाबा से।

दुकान बढ़ाकर वे परेशान से घर में घुसे। अँगोछा अलगनी पर लटकाकर टोपी उतारी और बिना पैर धोये तखत पर बैठ गये।

तभी उन्हें भगवती दिखी। ‘‘भग्गो तेरी मैया कहाँ गयी?’’

‘‘दादाजी जीजी को खबर सुनकर दौरा पड़ गया। दाँती भिंच गयी है। अन्दर पड़ी हैं।’’

घर में रेडियो नहीं था पर ख़बर हवा में उडक़र आनन-फानन फैल गयी थी। इन्दु सास के तलवों में काँसे की कटोरी रगड़ रही थी। भग्गो ने दो बूँद पानी उनकी पलकों पर डाला और थोड़ा-सा होंठों पर। चौंककर उन्होंने आँखें खोल दीं। फटी-फटी और खाली आँखों से सबको देखकर बोलीं, ‘‘गाँधीबाबा से तो भेंट ही नायँ भयी, नईं मैं बिनसे पूछती लुगाइयों की आजादी के लिए च्यों नईं लड़े तुम। अभी तो आजादी ठीक से मिली भी नायँ।’’

‘‘सिर्री है का, 15 अगस्त 1947 को मिल तो गयी आजादी।’’ लालाजी ने कहा।

‘‘अब का मिलैगी। आजादी दिलाबै बारौ भी चलौ गयौ।’’ विद्यावती ने अपनी रौ में कहा।

बाज़ार तीन दिनों के लिए बन्द हो गया।

सभी स्कूल-कॉलेजों में शोक-सभाओं का आयोजन हुआ। महात्मा गाँधी के लिए जनता में भावनाओं का ज्वार इतना प्रबल था कि चौराहों पर आम-सभाएँ रखी गयीं। महात्मा गाँधी की तस्वीर के ऊपर इतनी फूल-मालाएँ चढ़ाई गयीं कि तस्वीर के साथ-साथ चौराहा भी पूरा भर गया। लोगों ने महात्मा गाँधी की तस्वीर देवी-देवताओं की मूर्ति और तस्वीरों के साथ अपने घरों में लगा ली।

विद्यावती का जैसे स्वप्न ही टूट गया। उसने सोचा था आज़ादी आएगी तो रामराज्य आ जायगा बल्कि सीताराज्य आ जायगा। औरत को आदमी की धौंस नहीं सहनी पड़ेगी। वह अपनी मर्जी की मालकिन होगी। कोई उसके हाथों किये खर्च पर नाक-भौं नहीं सिकोड़ेगा, कोई उसे बात-बात पर झिडक़ी नहीं लगायेगा, घर-बाहर हर जगह उसके साथ बराबरी का बर्ताव होगा। यह क्या कि आज़ादी के छह महीने बीत गये और औरत की जिन्दगी, वही ढाक के तीन पात। गाँधी बाबा को कम-से-कम औरतों का तो ध्यान रखना चाहिए था, मर्द तो पहले भी कौन कम आज़ाद थे। चलो समाज को तराजू मान लो और आदमी-औरत को बटखरा। ऐसा कैसे हो रहा है कि आदमी तो तीन छँटाक का भी सवा सेर और औरत सवाया होकर भी पौनी। बच्चों का पासंग बनाओ तब भी तराजू सतर नहीं होती। औरत की तमाम उम्र ऐसे ही कट जाती है—कभी दुक्खम, कभी सुक्खम। कहने की बात है कि मायके में सुख मिले, सासरे में दुख। माँ भी कम बैरी नहीं होती। बच्चों में दुभाँत करना बाप का नहीं, माँ का काम दिखता है। बेटों को प्यार, बेटियों को दुतकार। बेटे सारी जमा पूँजी, जमीन-जायदाद ले जाएँ तब भी प्यारे। बेटियाँ अचार की फाँक पर पलें, तब भी भारी।

विद्यावती के माँ-बाप ने उसका ब्याह कर जैसे जीते-जी उसका किरियाकरम कर दिया। वापस घूमकर कभी पूछा ही नहीं कि छोरी किस हाल में है। कुछ साल लग गये इस सचाई को हज़म करने में कि उसके जीवन में अब मायका ख़तम है। वही बावली कभी जमनाजी जाते-आते किसी से पूछ लेती लाल हवेली वाले लोग कैसे हैं, कभी अम्माजी को देखा, तबियत ठीक तो है न उनकी। बनिया-समाज शायद यह सोचता था कि बेटी से ज्यामदा मुहब्बत दिखाई तो कहीं वह ससुराल छोड़ पीहर में ही न आ बसे। उसका तो चलो दूसरा ब्याह था, जिनके पहले ब्याह थे उनकी भी कहानी यही थी। भाई-भाभी भी सुध नहीं लेते कि कहीं बहन आकर घर में डेरा न जमा ले।

इस हत्याकांड ने शहर को झकझोर दिया। बहुत-से लोग तो उसी दिन दिल्ली के लिए रवाना हो गये कि महात्माजी की अन्त्येष्टि में अपने दो बूँद आँसू की श्रद्धांजलि देंगे। बाकी लोग रेडियो से कान सटाकर दिल्ली का आँखों देखा हाल सुनने लगे। हर किसी के घर रेडियो था भी नहीं। जिनके घर में रडियो सैट था उन्होंने उसके आगे बड़ी-सी दरी बिछा दी। रईसों ने रेडियो वाले कमरे में कच्चे कोयलों की दहकी हुई अँगीठी रखवा दी कि खबर सुननेवालों को ठंड न लगे।

लाला नत्थीमल के यहाँ रेडियो नहीं था। उनके पड़ोसी लाला शरमनलाल के यहाँ था। इकतीस जनवरी को वहीं औरतों का जमघट जुटा। शरमनलाल बड़े आदमी थे। उन्होंने घर का बड़ा वाला रेडियो सैट जनानखाने में रखवा दिया और खुद अपने कमरे में जेबी रेडियो से राजघाट का आँखों देखा हाल सुनते रहे।

घरों के बच्चे भी जैसे सहम गये थे। न किसी ने भूख की शिकायत की, न नींद की। चूल्हा तो कहीं जला नहीं था। जिसको जो मिला वही खाकर बिस्तर में दुबक गया।

छेदीलाल की बेटी उषा के ब्याह की साइत तीस जनवरी की थी। सुबह से बारात के स्वागत की तैयारी हो रही थी। जनवासे की एक-एक सहूलियत जाँची जा रही थी। शाम साढ़े पाँच बजे जैसे ही रेडियो पर यह दुखद समाचार सुनाया गया, छेदीलाल हलवाइयों के चूल्हे के पास जाकर बोले, ‘‘भैया रोक दो सारे सरंजाम, उतार दो कढ़ैया, आज न बारात आएगी, न डोली जाएगी।’’ सब हैरान कि छेदीलाल को हो क्या गया है। जब उन्होंने भरतपुर खबर पहुँचाई, लडक़ेवालों ने कहा, ‘‘हम तो खुद पसोपेश में थे आपसे कैसे कहें, हम आज नायँ आएँगे। हमने सोची, आप बुरा न मान जायँ कि ये तो हीला-हवाला कर रहे हैं।’’

30 जनवरी को ही महापंडित राहुल सांकृत्यायन के सम्मान में मथुरा में एक विशेष सभा आयोजित की गयी थी। राहुलजी के आने पर, सब साहित्यकारों ने एकत्र होकर शोक-प्रस्ताव पारित किया और सभा स्थगित कर दी गयी।

टाउनहॉल के रेडियो सैट पर अपार जनसमूह इकट्ठा हो गया। लोगों ने घंटों खड़े होकर मिनट-मिनट का समाचार सुना। मथुरा की जनता की भूख-प्यास ग़ायब हो गयी।

व्यापारी वर्ग ने तीन दिनों तक अपनी दुकानें बन्द रखीं। किसी को इस हड़ताल के लिए कहना-समझाना नहीं पड़ा। गाँधीजी सभी के पूज्य थे। जो उनसे असहमत थे वे भी कहने लगे, ‘‘इस आदमी ने देश के लिए अपनी जान गँवा दी। हम क्या तीन दिन की दुकनदारी नहीं गँवा सकते।’’

9 फरवरी को महात्मा गाँधी की पवित्र भस्मी वृन्दावन धाम लायी गयी। लानेवाले थे वहाँ के अग्रगण्य शिक्षाविद् प्रोफेसर कृष्णचन्द्र। वहाँ से एक मौन जुलूस में, सुसज्जित गाड़ी में भस्मी का ताम्रपात्र डाकबँगले ले जाया गया। मथुरा नगर के कोटि-कोटि जन वृन्दावन पहुँच गये। 12 फरवरी को भस्मी का विसर्जन यमुनातट पर बीचधार किया गया।

विद्यावती जिद करके वृन्दावन चली गयी। पति ने लाख समझाया, ‘‘तू पैर से लाचार, का करेगी वहाँ जाय के, जाने वारा तो चलौ गयौ।’’

विद्यावती ने टेक पकड़ ली, ‘‘आज मुझे रोको मत, नहीं तो मैं बावली हो जाऊँगी।’’

हार झकमार कर, भगवती के संरक्षण में विद्यावती को वृन्दावन भेजा गया।

खुली हवा में खड़े-खड़े और निरन्न रहकर विद्यावती की तबियत बिगड़ गयी। उसे चक्कर आ गया। भगवती के हाथ-पैर फूल गये। बीमार माँ को लेकर कहाँ जाय। वह तो भला हुआ कि वहाँ वृषभान सर अचानक दिख गये। वे उन्हें अपनी धर्मशाला में ले आये। उन्होंने अपने झोले से निकाल अमृतधारा की दो बूँद विद्यावती को पिलाईं तब उन्हें कुछ सुध आयी। उन्होंने भगवती को डाँटा, ‘‘अपनी सूरत देखो, सूखकर छुआरा हो रही है। कुछ दाना-पानी मुँह में डारी हो या मैया समेत निन्नी घूम रही हो।’’

भगवती ने बताया जीजी ने तो 30 जनवरी की शाम से अब तक कभी ठीक से खाना खाया ही नहीं है।

वृषभान सर लपककर बाज़ार गये और जो भी मिल सका, ले आये। वे बोले, ‘‘खाया तो मैंने भी कल से नहीं है पर माँ को समझाओ, महात्माजी के आदर्शों को चलाने के लिए हम सभी को जिन्दा रहना होगा। हमसे ही गाँधीवाद जीवन पाएगा।’’

मथुरा लौटकर भी विद्यावती वृषभान के गुण गाती रहीं। उन्होंने कहा, ‘‘वह आदमी नहीं देवता है। दो बूँद दवा मेरे मुँह में क्या टपकाई, जनै संजीवनी पिला दी।’’

कभी-कभी वृषभान विद्यावती का हालचाल लेने घर आ जाते। वे समझाते, ‘‘माँजी आपको मीठा नुकसान करता है तो उसकी तरफ पीठ कर लो। गुड़, बूरा, चीनी, आँख से देखो ही मत। भगवती यह तुम्हारा जि़म्मा है कि माँजी के मुँह में मीठी कोई चीज़ न जाय।’’

विद्यावती को रंज होता, ‘हाय बिना चाय के मैं कैसे जिऊँगी!’

‘‘माँजी फीकी चाय पियो। हफ्ता भर मीठा छोडक़र अपनी जाँच करवाओ, देखो मधुमेह ठीक होता है कि नहीं।’’ वृषभान समझाते।

यह समस्त उपदेश एक-दो दिन अपना प्रभाव दिखाते। फिर जैसे ही कोई त्योहार आता, बच्चों के लिए पकवान बनाने के निमित्त विद्यावती घी-बूरे की कनस्तरी खोलती कि परहेज़ का बाँध टूट जाता। बच्चों से ज्यामदा मात्रा में वे ही हलुआ या पुए खा बैठतीं।

जैसे लाला नत्थीमल रात्रिकालीन बैठकों में नयी जानकारियों से लैस होते वैसे विद्यावती और इन्दु दोपहरकालीन बातचीत से सुविज्ञ बनतीं। बेबी का दाखिला डेज़ी कॉन्वेंट में करवा दिया गया था। उसे स्कूल भेजकर कुछ देर को इन्दु भी चैन से बैठ लेती। विद्यावती के पैर के कारण बैठक उन्हीं के घर में रखी जाती जहाँ नानकनगर से लेकर डैम्पियर पार्क तक की चरखा-बहनें इकट्ठी होतीं। इनमें कुछ तो बाक़ायदा एफ.ए., बी.ए. तक पढ़ी हुई थीं। बाकियों की पढ़ाई जिन्दगी के विद्यालय में हो चुकी थी। इन साथिनों के बीच बैठकर विद्यावती एक बदली हुई स्त्री होती, सलाह देती, सहमत और असहमत होती एक साथिन। निकल जाता उनके अन्दर का नीला-पीला ज़हर। वो इन्दु से मीठे स्वर में कहती, ‘‘बहू ज़रा चाय तो बना के ला। हमारी बहू चाय बहौत बढिय़ा बनावै है। और किसी को ना आवै ऐसी चाय। मठरी भी ले आना इन्दु।’’

बाकी औरतें कौतुक से देखतीं कि विद्यावती में पिछले दो साल में कितना परिवर्तन आया है। पहले वह बहू के जिक्र से ही अंगार उगलती। बहू के प्रति शिक़वा-शिक़ायत उनके संवाद का मुख्य अंग होते।

एक दिन ऐसी ही एक गप्प-गोष्ठी में निर्जला बहन ने कहा, ‘‘हमने तो सुनी है, जनै सच जनै झूठ, कि गाँधीबाबा ने अपने आश्रम की प्रार्थना सभा में सबसे कहा था, ‘औरत-मर्द दोनों बराबर हैं, कोई किसी से कम नहीं है।’ जो लोग कहवें कि औरत जात की अकल उसके पैर की एड़ी में होवै, वे झूठ बौलें।’’

नौमी ने कहा, ‘‘गाँधीबाबा अब सरग में बैठे-बैठे कछू कहैं, आदमियन तक तो बात पहुँचैई नईं, कर लो क्या कर लोगी! वे तो बस लाटसाब बने हुकुम चलायैं।’’

‘‘सच्ची कहती हो, हमारे ये भी आर्डर देने में गोरे साहबों से कम नहीं है। बात मुँह से निकली नहीं कि तुरन्त पूरी करो।’’ सगुना ने कहा।

विद्यावती बोली, ‘‘मर्द की आवाज भी कर्री होवै, जो भी वह कहै, हुकुम जैसौ ही लगै। कट गयी अपनी तो ऐसेई।’’

निर्जला ने कहा, ‘‘शायद नये जमाने में मरद औरत को दबाना छोड़ दैं।’’

मोहिनी की शादी को अभी सात-आठ साल हुए थे। वह तपाक से बोल पड़ी, ‘‘नये जमाने में दबाने के नये ढंग हो जाएँगे। अच्छा यही हो कि पढ़-लिखकर हम लोग भी काम पर निकलें।’’

नौमी ने कहा, ‘‘हाय राम, मर्दों की तरह पैंट-कमीज पहनकर दफ्तर में बैठोगी।’’

मोहिनी हँसी, ‘‘पैंट-कमीज की जरूरत नायँ, साड़ी पहनकर भी नौकरी हो सकती है।’’

‘‘हमारी छोरी कर ही रही है। टीचर बन गयी है भग्गो।’’ विद्यावती ने सगर्व कहा, ‘‘वह तो कहो, मैंने साथ दिया नहीं उसके दादाजी ने तो भतेरी चिल्लपौं मचायी।’’

नौमी ने स्वर दबाकर पूछा, ‘‘फैसन तो नहीं करने लगी?’’

‘‘नायँ, वह तो म्हौड़े पर कभी क्रीम भी ना लगाय। सिंगार पट्टार का घना सरंजाम धरा है बहू के पास पर हमारी भग्गो कभी शीशा भी नायँ देखे।’’

निर्जला ने कहा, ‘‘मैं जानूँ, कस्तूरबा स्कूल में बड़ी कड़ाई है।’’

‘‘उससे ज्यादा कड़ाई तो उसके दादाजी करैं। वो तो कहैं छोरी सयान हो गयी, उसे घर बैठाओ या ब्याह कर दो।’’

‘‘कित्ते साल की है?’’

विद्यावती ने झट दो साल उम्र छुपाकर कहा, ‘‘अभी सोलह की भी ना भई।’’

नौमी ने कहा, ‘‘छोटी तो नायँ। ब्याह लायक उमर तो है।’’

विद्यावती ने उसकी बात काटी, ‘‘हरेक का अपना उठान होवै है। देखने में भग्गो अभी बारी लगै। मैं सोलह साल की ब्याही आयी थी। कुछ भी पता नई था कैसे घर चलानौ है। येईमारे इनका कहना मानती गयी। हमेशा के लिए मैं दबैल बन गयी।’’

मोहिनी ने कहा, ‘‘आपकी लडक़ी नौकरी कर रही हे। ऐसे ही पकडक़र किसी के साथ मत बाँध देना। उसकी मर्जी पूछकर ही ब्याह करना।’’

‘‘चलो-चलो माथापच्ची बहौत हो गयी। आज भजन गाने की सुध नहीं आयी अभी तक। हाँ भई मोहिनी शुरू कर।’’

तुरन्त दरी पर से चाय के कुल्हड़, मठरी की तश्तरी सरकाकर जगह बनायी गयी। विद्यावती ने आवाज़ लगायी, ‘‘इन्दु तू भी आ जा।’’

मुन्नी की उँगली पकड़ इन्दु अन्दर आयी। सुन्दर इन्दु के साथ ग्रहण की तरह मुन्नी को लगे देख एक बार को सब सकपका गयीं।

बच्ची की चेचक ठीक हो गयी थी पर अपने निशान मुँह पर छोड़ गयी थी।

भजन-वजन तो सब गयीं भूल। इन्दु के ऊपर लानत और सलाह की बौछार शुरू हो गयी।

‘‘यह क्या दुर्गत बनायी है छोरी की, टीका नहीं लगवाया था? आजकल बेपढ़ी भी जानै बच्चों को चेचक का बीसीजी लगता है।’’

‘‘आप तो बड़ी चिकनी-चुपड़ी रहती हो, बच्चे की कोई फिकर नहीं, पैदा च्यौं किये जो ऐसे ही पटकने थे।’’

निर्जला ने कहा, ‘‘बहू जो हो गयी सो हो गयी, अब या छोरी का कच्चे दूध से म्हौड़ो धोया कर, छह महीनों में उजली हो जाएगी।’’

नौमी बोली, ‘‘इत्ता दूध कहाँ से आयगौ जी। मेरी बात सुनौ, गोले की कच्ची गिरी रगड़ो, दाग आपैई मिट जावैंगे।’’

इन्दु की शकल रुआँसी हो आयी। मुन्नी कमज़ोरी के बावजूद पैदल चलने लगी थी। जितनी देर जागती, इस कमरे से उस कमरे चक्कर लगाती। वह सोकर उठी तभी सास की पुकार पड़ी तो वह उसे लिये चली आयी। अब उसे पछतावा हो रहा था।

विद्यावती ने कमान सँभाली, ‘‘सुन लो सब जनीं। हमारी ये नतनी दुनिया से निराली है। रंगरूप कै दिना का। इसके सारे लच्छन झाँसी की रानी के हैं। हथेली से चींटे जे मार दे, पानी माँगो तो छोटी-सी लुटिया में डगमग-डगमग दादी के पास ले आय और बेबी को देखते ही रोवै हम भी स्कूल जाएँगे दादी। यह तो मेरी लटूरबाबा है।’’

दरअसल दादी का यह एक तरह से प्रायश्चित था क्योंकि चूक उनसे यह हुई कि जब कमिटी का नश्तर लगानेवाला कम्पाउंडर साइकिल पर आया और घर-घर उसने कुंडी खटखटाकर पूछा, ‘यहाँ कोई छोटा बच्चा बिना टीका लगे तो नहीं है?’ दादी ने उसे दरवाज़े से ही भगा दिया। बेबी को सारे टीके अस्पताल में ही लग गये थे। मुन्नी क्योंकि बहुत कमज़ोर थी, डॉक्टरनी ने उसके जन्म पर इन्दु को समझाया कि दो महीने बाद आना, बच्चा कुछ पनप जाय तो टीका लगा दें। एक बार घर आकर इन्दु गृहस्थी में ऐसी फँसी कि दुबारा अस्पताल की कौन कहे, डॉक्टर के भी नहीं जा पायी। कवि अव्वल तो घर में रहता ही नहीं था। फिर जितने भी दिन मथुरा में रहकर उसने नौकरी की, अपनी ही धुन में जीता रहा। बच्चों के प्रति कोई दायित्व-चेतना उसमें नहीं थी।

म्युनिसपैलटी की तरफ़ से मुहल्लों में नश्तरवाला भेजा जाता था कि जो भी नवजात शिशु हों उन्हें टीका लगाया जाए। उसके पास एक मोटी-सी सलाई होती जिसमें एक सिरे पर क्रॉस जैसा चिह्न बना होता। वह बच्चे की बाँह पर उस सलाई को कसकर घुमा देता। बच्चा मर्मान्तक दर्द से चीत्कार कर उठता। माँ जल्दी से बच्चे को अन्दर ले जाकर उसके मुँह में अपना दूध लगा देती।

मुन्नी शुरू से ठुनठुन शिशु थी। कुछ-न-कुछ उसे हुआ रहता। कभी फोड़े-फुन्सी निकलते, कभी कुकुर खाँसी हो जाती, कभी बुख़ार आ जाता तो कभी नाक चल निकलती। विद्यावती ने नश्तरवाले की आवाज़ सुन हर बार यही कहा, ‘‘रहने दे बहू, छोरी का दम तो पहलेई निकरा पड़ा है, तू और दो घाव मत करवाना।’’

इन्दु ने भी नादानी में यही सोचा कि टीके के बाद जो चार दिन बुखार चढ़ेगा, उसे कौन सँभालेगा।

उसकी चेचक को लेकर दादी और माँ दोनों को मलाल था।

तभी बेबी स्कूल से आ गयी।

जैसे कमरे में पूनो का चाँद निकल आया।

छोटी-सी बेबी का सौन्दर्य इन्दु से भी पाँच कदम आगे था। गोरा-उजला रंग, तीखे नाक-नक्श, अभी से लम्बे बाल, ठुमक भरी चाल और शोख़ बातें उसे हर किसी का लाड़ला बना देतीं।

काली मखमल की फ्रॉक में वह अद्भुत लग रही थी।

‘‘इधर आ तो मेरी बिबिया। आज का सीख के आयी है, सुनें तो।’’ दादी ने उसे अपने से चिपटाकर पूछा।

बेबी ने बस्ता उतार, फौरन सुनाना शुरू किया—

‘‘सडक़ बनी है लम्बी-चौड़ी

उस पर जाये मोटर दौड़ी

सब बच्चे पटरी से जाओ

बीच सडक़ पर कभी न आओ

आओगे तो दब जाओगे

चोट लगेगी पछताओगे।’’

कविता के साथ बेबी के नन्हें हाथों का अभिनय बहुत सजीव था। उसकी याददाश्त इतनी तेज़ थी कि एक बार में उसे पूरी कविता या कहानी याद हो जाती। स्कूल जाने पर उसका तुतलाना कम हो गया था, बस किसी-किसी शब्द पर ज़ुबान अभी भी फिसल जाती। वह सहेलियों के साथ नाचना भी सीख गयी थी। वह अपनी दोनों हथेलियाँ जोडक़र तकिया बनाकर उन पर अपना सिर तिरछा कर टिकाती और गाती—

‘‘मैं तो सो रही थी मुल्ली किसने बजायी।’’ सिखाने पर भी वह मुरली शब्द नहीं बोल पाती थी।

स्कूल से लौटकर वह देर तक दादी को बताती स्कूल में क्या हुआ।

समय के जैसे पंख लग गये थे। इधर बेबी ने कच्ची-पक्की पास की उधर मुन्नी का दाखिला हो गया। दाखिले के वक्त पूछा गया, लडक़ी का नाम क्या है? अब तक घर-परिवार में मुन्नी के सिवा और कोई नाम सोचा ही नहीं गया था। जब इन्दु के आगे दाखिले का फार्म आया उसने यों ही लिख दिया ‘मनीषा।’ इस प्रकार मुन्नी का नाम मनीषा दर्ज हो गया।

घर में दादी ने बहुतेरी फैल मचायी।

‘‘जे तोय का सूझी, मुन्नी का नामकरण कर डाला। न नौबत बजी, न पंडित आया और सीधे नाम रख दिया।’’

अब इन्दु भी तेज़ हो गयी थी। उसने कहा, ‘‘जब सिस्टर ने मुझसे पूछी मैं उठकर घर थोड़ी दौड़ी आती, जो मेरे मन में आया मैंने रख दिया।

‘‘मैं तो इसे मुन्नी ही बुलाऊँगी।’’ दादी ने मुनादी की।

मुन्नी के चेहरे के दाग काफ़ी हद तक हल्के पड़ गये थे लेकिन उसके स्वास्थ्य की निर्बलता ज़ाहिर होती रहती। वह बहुत धीरे-धीरे शिक्षित हो रही थी।

डेज़ी कॉन्वेंट का अनुशासन कठोर था। एक दिन मुन्नी ने घर से लाया सन्तरा चार बच्चों के बीच बाँट दिया।

सबने सन्तरा खाकर छिलके इधर-उधर फेंक दिये।

तभी सिस्टर ने देख लिया और डाँट लगायी, ‘‘छिलके कहाँ डालना माँगता, डस्टबिन में। कम ऑन, पिक दीज़ अप।’’

बच्चे इतनी अँग्रेज़ी समझते नहीं थे। उन्होंने अन्दाज़ लगाया और छिलके उठाकर कूड़े के डिब्बे में डाले।

मनीषा के बालमन पर शब्द ने अपनी अमिट छाप बना ली : डस्टबिन माने कूड़ेदान।

स्कूल में रोज़ कुछ-न-कुछ नया सीखने को मिलता इसीलिए मनीषा को स्कूल घर से ज्याडदा अच्छा लगने लगा। सुबह सोकर उठते ही वह स्कूल के लिए तैयार होकर बैठ जाती।

डेज़ी कॉन्वेंट में एक पंजाबी स्त्री बालो, बच्चों को घर-घर से ले जाती और छुट्टी होने पर पहुँचा जाती। वह पंजाबी मिश्रित हिन्दी बोलती। उसकी बोली बच्चों को बड़ी अनोखी लगती। वह बच्चों के नाम अपनी तरह से बोलती।

मनीषा को वह मिंशा कहतीं और प्रतिभा को तीभा। बच्चे कहते, ‘‘बालो आंटी मेरा नाम ऐसे नहीं, ऐसे बोलो।’’

बालो कहती, ‘‘बेबीजी तेरा नाम ओखा, मैनूँ होवे धोखा।’’

प्रतिभा और मनीषा हिन्दी, इंग्लिश, पंजाबी के तरह-तरह के शब्द सीख लेतीं।

दादाजी कहते, ‘‘मैंने लाख कही कि बच्चों को पास के वैदिक विद्यालय में भेजो पर तुम लोगों ने मेरी एक ना मानी। एक तो फीस दुगनी लगै दूसरे छोरियाँ जाने कौन-सी भाखा बोलैं हैं।’’

विद्यावती कहती, ‘‘कवि हर महीना भेजता तो है रुपया। येईमारे अपनी गिरस्ती ले नायँ गयौ कि मेरे माँ-बाप अकेले हो जाएँगे।’’

‘‘जे बात नई है, उसे आजादी का चस्का पड़ गयौ है, तुम्हारे गाँधीबाबा ने सबको अराजक बना डारौ।’’

‘‘मोय नाय मिलौ गाँधीबाबा नहीं मैं बासै पूछती च्यों जी तुमने सिर्फ आदमियों को आजादी दिला दी, लुगाइयों को कब आजाद करोगे, वो तो आज भी गुलाम हैं।’’ विद्यावती कहती।

‘‘क्या गुलामी कर रही हो ज़रा मैं भी सुनूँ। घर का काम बहू करै, दुकान मैं सँभारूँ, तोपे कौन-सी जिम्मेदारी है?’’

‘‘अभाल की नहीं, मैं तो पिछले सालों की बात करूँ। इत्ती जिन्दगानी दुक्खम-सुक्खम कट गयी, अपनी राजी से कछू नायँ कियौ।’’

‘‘क्या करना चाहती रही तू। कुनबे की चौधराहट तूने सँभारी, देसी घी के चुचैमा परामठे खाये, देखबे बारी न कोई सास न ननद, और का कसर रह गयी?’’

‘‘तुमने बस इत्ता ही जाना। अरे औरत रोटी और पाटी के ऊपर भी कछू चाहै कि नायँ। मर्द की गुलामी से अच्छी तो मौत होवै।’’

लाला नत्थीमल वहाँ से उठकर दुकान चले जाते। उन्हें पता था यह पराधीन कौम का स्वाधीन कौम के विरुद्ध आत्र्तनाद था। वे पत्नी का मन शान्त करने के लिए स्वामी दयानन्द की पुस्तक ‘सत्यार्थप्रकाश’ गाँधीजी की ‘आश्रम भजनावली’ और रामकृष्ण परमहंस की जीवनी घर में लाते लेकिन विद्यावती इन किताबों को हाथ न लगाती। वह बेबी-मुन्नी की किताबें पढक़र तृप्त हो जाती।

एक दिन जयपुर से लालाजी के कोई मित्र मिलने आये। चलते वक्त वे बेबी और मुन्नी को एक-एक रुपया और सेलखड़ी पत्थर की बनी एक चिडिय़ा और एक मछली दे गये। दोनों बहनें बड़ी खुश हुईं। वे देर तक इन चीज़ों से खेलती रहीं। दादी ने कहा, ‘‘ला रुपया खो जाएगा, मोय दे ये, गुल्लक में डार दूँ।’’

इन्दु बोली, ‘‘ये चिडिय़ा और मछली जरा हाथ से सरकने पर गिरकर टूट जाएँगी, लाओ इन्हें दीवार पर लगा दूँ।’’

इन्दु ने दीवार पर कील ठोककर दोनों खिलौने लटका दिये।

बेबी और मुन्नी ने तय किया कि अपने खिलौनों के नीचे उनका नाम लिखा जाए—चिडिय़ा और मछली।

तुरन्त कोयला ढूँढ़ा गया। लोहे की कुर्सी घसीटकर दीवार पर चिडिय़ा तक बेबी पहुँची और उसने लिखा, ‘चिडिय़ा।’

‘मछली भी लिख दूँ,’’ उसने मुन्नी से कहा।

‘‘नहीं हम लिखेंगे।’’

बेबी कुर्सी पर से कूदकर नीचे आ गयी। अब मुन्नी कुर्सी पर चढ़ी।

उसने टेढ़े-मेढ़े अक्षर बनाये मछल। बेबी ने सुधारा, ‘‘ल में ‘आ’ का डंडा लगा। अब ‘ई’ की मात्रा लगा।’’

मुन्नी थोड़ी गड़बड़ा गयी। उसने किसी तरह ल में डंडा लगाकर ला के ऊपर ली बनायी कि उसका हाथ हिल गया और मछली फटाक से नीचे गिर गयी।

बेबी बोली, ‘‘ओह मछली तो टूट गयी।’’

शोर सुनकर इन्दु आयी। उसने देखा मछली टूटी, ज़मीन पर पड़ी है। उसने एक-एक तमाचा दोनों को मारा, ‘‘जब देखो तब उत्पात मचाए रहती हैं। देखना दादाजी कितना पीटेंगे।’’

दोनों सहम गयीं।

शाम को दुकान से लौटकर दादाजी की नज़र दीवार पर गयी, ‘‘हैं मछली कहाँ गयी?’’ उन्होंने पूछा।

मुन्नी ने डरते-डरते कहा, ‘‘दादाजी हम मछली का नाम लिख रहे थे। जैसे ही हमने ‘ला’ पर टोपी पहनाई, मछली नीचे गिर गयी।’’

ताज्जुब दादाजी ने उसे डाँटा नहीं। सिर्फ कहा, ‘‘चलो स्लेट पर बीस बार ली लिखकर दिखाओ।

भगवती के स्कूल में पुस्तकालय शुरू करने के उद्देश्य से नयी किताबें मँगाई गयी थीं। उनमें वीर बालक, पन्ना धाय, सत्य हरिश्चन्द्र जैसी शिक्षाप्रद, मोटे टाइपवाली पतली पुस्तिकाएँ ज्यायदा थीं फिर भी अन्य पुस्तकों में प्रेमचन्द की कहानियाँ और उपन्यास थे, प्रसाद और माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य-संकलन थे। वक्त निकालकर भगवती स्कूल में ही किताबें पढ़ती। कभी किताब ख़त्म न होती और कहानी रोचक लगती तो वह किताब घर ले आती। कोई कहानी अच्छी लगती तो वह माँ और भाभी को सुनाती। वे आँखें फाड़े सुनतीं। उन्हें विस्मय होता कि प्रेमचन्द को लोगों के घरों का अन्दरूनी हाल कैसे पता चल गया है। ‘बड़े घर की बेटी’ कहानी विद्यावती को बहुत पसन्द आयी जबकि इन्दु को ‘नमक का दारोगा’ और ‘घासवाली’ अच्छी लगीं। अक्सर किताबों को लेकर घर में खींचातानी मचती कौन पहले पढ़े। भगवती कहती, ‘‘नयी किताब है, कल ही लौटानी है, प्रिंसिपल से माँगकर लायी हूँ।’’

विद्यावती उसाँस भरती, ‘‘किस्से-कहानी में भी औरतों की दुर्दशा ही बताई जावै। कोई जे नही बताता कि सुधरेगी कैसे।’’

दादाजी बेटी से कहते, ‘‘ये तूने अच्छा चस्का लगा दिया सबको। आधी रात तक बिजली फुँकै हैं।’’

नानकनगर में बिजली की लाइन आ जाने से घर में बिजली का उजाला हो गया था। सभी को आराम हो गया था हालाँकि लालाजी की मितव्ययिता के चलते सभी जगह पन्द्रह और पच्चीस पावर के बल्ब लगाये गये थे। सिर्फ बाहरी बैठक में चालीस पावर का बल्ब लगा था।

अब दादाजी को चिल्लाने का मौका तब मिलता जब घर के किसी कमरे में बिजली खुली दिख जाती, ‘‘दिन-रात लट्टू फुँक रहे हैं, मेरे रुपये का चूरन बना जा रहा है, बहू भागकर बत्ती बन्द कर।’’

अगर रात में वे चौके में बिजली जली देखते तो कहते, ‘‘इत्ती अबेर ब्यालू बनाने की क्या ज़रूरत है? पहले सई साँझ ब्यालू बना के रखती थी कि नहीं। रुपये का तो भुस्स उड़ गया।’’

विद्यावती समझाती, ‘‘घर में तीन-तीन कमानेवाले हैं, एक तुम्हारा ही तो खर्च नहीं हो रहा।’’

लाला नत्थीमल कहते, ‘‘बेटे-बेटी की कमाई मेरे जीते-जी तो खर्चियो मति। ये का कमायेंगे जो मैंने कमाये हैं। फिर भी रुपया देख के बरतो।’’

एक शाम लाला नत्थीमल घर में थे कि पुलिस विभाग का एक आदमी आया। उसने बैठते ही लालाजी से सवाल किया—

‘‘आपका नाम?’’

‘‘आपकी पत्नी का नाम?’’

‘‘मकान का नम्बर?’’

‘‘कितने बच्चे हैं?’’

लालाजी ने अपनी तेज़ नज़र से उसे देखा, ‘‘क्यों जी ये सब पूछबे का कौन मतलब है? हम तुम्हें क्यों बताएँ हम कौन हैं?’’ उस आदमी ने अपना पहचान-पत्र दिखाया। उस पर पुलिस विभाग का ठप्पा लगा था और उस आदमी का नाम और फोटो था। उसने कविमोहन के बारे में पूछताछ करनी शुरू की। उसे सबूत की तलाश थी।

लालाजी आशंकित हो गये। कहीं किसी गलत काम में कवि पकड़ा तो नहीं गया।

उन्होंने अन्दर जाकर कागज़ टटोले। विद्यावती ने पूछा, ‘‘कौन आया है?’’

‘‘विपदा आयी है और का?’’ उन्होंने कहा और आलमारी की दराज़ में खखोरते रहे। आखिर उनके हाथ पुराना राशनकार्ड लगा जिसमें बच्चों के नाम लिखे थे।

हिम्मत कर उन्होंने सबइंस्पेक्टर से पूछा, ‘‘हमारे लडक़ा पे कोई मुसीबत तो नहीं आयी है?’’

‘‘नहीं जी, ये तो सरकारी नौकरी का मामला दीखे है।’’

अब जाकर लाला नत्थीमल सहज हुए। उन्होंने कहा, ‘‘बैठो, पानी-वानी पिओ।’’

‘‘लडक़े की पोस्टिंग हो जाने दीजिए, मिठाई खाने आऊँगा।’’ उसने कहा और चला गया।

उस दिन लालाजी रह-रहकर कवि को याद करते रहे, ‘‘ऐसा दिल्लीवारा बनौ है कि हमें तो कछू समझै ही नायँ। सरकारी नौकरी के लिए अर्जी लगायी है, हमें कछू खबर नईं। पुलिस पूछताछ करेगी हमें पता ही नहीं। न चिट्ठी न पतरी, बस मुँह उठाकर दिल्ली चल दिये।’’

ख़ुशी की एक क्षीण लहर इन्दु के मुँह पर आयी और ग़ायब हो गयी। उसने सोचा, ‘भले ही यह लाट कलट्टर हो जायँ हमें तो याही नरक में सडऩा है।’

पिछले काफी समय से इन्दु का जी उखड़ा-उखड़ा रहता था। उसे लगता जैसे वह जमुना की मझधार में फँसी है उसके लिए न कूल है न किनारा। पति-रूपी पतवार उसके हाथ से छूटी जा रही है। अल्लीपार ससुराल का जाल-जंजाल है तो पल्लीपार मायके का मृगजल। माँ-बाप के मर जाने के बाद मायके में भाइयों की जगह भाभियों का राज था। वहाँ उसकी रसाई मुश्किल थी। ससुराल में जान-खपाई के सिवा कुछ नहीं था। वह सोचती क्या स्त्री के लिए तीसरी कोई जगह नहीं होती जहाँ वह जाकर अपना मन हलका कर ले। उसकी सहेलियों की संख्या भी नगण्य थी। ले-देकर उमा थी। वह कभी आ जाती तो दोनों सखियाँ ऊपर कवि के कमरे में जा बैठतीं। दोनों की समस्या विलोम थी। उमा अपने पति दीपक बाबू के प्रेमातिरेक से घबराई रहती तो इन्दु विरहातिरेक से। जब बच्चे आसपास नहीं होते उमा बताती, ‘‘मैं तो रतजगों से तंग आ गयी हूँ। दिन में बच्चे नहीं सोने देते, रात को ये। ऐसा लगता है जब से मेरा ब्याह हुआ है मैं सोई ही नहीं हूँ।’’

इन्दु कहती, ‘‘सोने का मसाला तुम्हारे पास रहता है, सेवन करके सो जाया करो।’’

‘‘इनकी धींगामुश्ती बन्द हो तो सोऊँ। सारे चौरासी आसन करने होते हैं इन्हें। किसी दिन बिरजो या माधो मेरे से चिपट जाते हैं कि मम्मा आज तुम्हारे पास सोएँगे तो ये बच्चों को ऐसी डाँट लगाते हैं कि बेचारे रुआँसे हो जाते हैं।’’

इन्दु गहरी साँस भरती, ‘‘लगता है मेरा ब्याह तो बच्चों के साथ सोने को ही हुआ था।’’

कभी इन्दु चाय बनाने नीचे आती तो विद्यावती उसे घूरकर देखती, फिर घुडक़ी देती, ‘‘ऊपर बैठी क्या कर रही हो दोनों जनी। इन्दु उमा को अब घर जाय लेन दे, बाकी अम्माजी परेशान हो रही होंगी।’’

इन्दु का मुँह बन जाता। वह मन-ही-मन बड़बड़ाती, ‘‘उसकी अम्माजी तो नहीं पर आप जरूर परेशान हो रही हैं।’’

विद्यावती को शक़ रहता कि ज़रूर दोनों बहुएँ मिलकर अपनी-अपनी सास की निन्दा कर रही होंगी। एक बात और यह कि उमा की ससुराल बहुत मालदार थी। वह हमेशा कोई-न-कोई नया गहना पहनकर आती जबकि इन्दु के समस्त गहने पुराने और पारम्परिक थे, वे भी ससुर की तिजोरी में रखे हुए थे। वह केवल गले में पतली-सी लड़ और कानों में हल्के टॉप्स पहने रहती। उसके ब्याह में बड़े सुन्दर मीनाकारी छन आये थे जो सास ने पहले ही हफ्ते उतरवाकर रखवा लिये कि कहीं इनका पेच खुल गया तो कलाई से गिर जाएँगे। सास को लगता उमा उनकी बहू को बिगाड़ न दे।

उमा थोड़ी दबंग थी। वह किसी की ज्यायदा परवाह नहीं करती। जाते समय इन्दु से कहती, ‘‘मैं दो बार आ चुकी अब तुम्हारी बारी है चक्कर लगाने की।’’

इन्दु डरकर अपनी सास का मुँह ताकती।

उमा कहती, ‘‘जीजी दो घंटे बच्चे सँभाल लेंगी और क्या!’’

उसके जाने के बाद विद्यावती कहती, ‘‘ये लोहेवाली की बहू बड़ी जबर है। सयाने आदमी का कोई लिहाज नहीं याकी आँख में।’’

‘‘तभी तो जरा-सी आजादी मिली हुई है।’’ इन्दु मुँह-ही-मुँह में बड़बड़ाती। लिहाज करके उसने अपनी जिन्दगी सी क्लास क़ैदी की बना रखी थी।
 
34

कुहू ने दस दिन की छुट्टी ली थी, उसके बाद दीपावली अवकाश हो जाना था। कविमोहन को ये दिन पहाड़ से प्रतीत हुए। वह बार-बार कॉलेज की पत्रपेटी देखता और निराश होता। मन में सोचता, वह मुझे क्यों लिखेगी। मैंने क्या कसर छोड़ी उसका दिल तोडऩे में। कभी सोचता उसके घर जाकर पिताजी की तबियत पूछे। फिर अपनी मूर्खता पर ख़ुद हैरान होता।

अन्तत: एक दिन उसके नाम का एक लिफ़ाफ़ा पत्रपेटी में दिखा। कुहू ने लिफ़ाफे पर अपना नाम नहीं लिखा था लेकिन कवि उसकी लिखावट पहचानता था। उसने लपककर पत्र उठाकर जेब में रखा और लायब्रेरी की तरफ़ चल दिया। वह निपट एकान्त में इसे पढऩा चाहता था। यह पत्र उसके ख़त से भी छोटा था। कवि ने पढ़ा—

डियर कवि,

तुम इतनी सफाई क्यों देने लगे जबकि हमारे बीच कुछ भी नहीं था। तुम्हें देखकर तो मुझे यह लगता था कि तुम विवाहित ही नहीं विधुर भी हो। ब्लडप्रेशर की तरह लवप्रेशर का भी फौरन पता चल जाता है।

इन बातों पर मैं कोई तमाशा नहीं चाहती। मेरी शादी की चिन्ता करनेवाले कई लोग हैं। एलियट के ‘वेस्टलैंड’ की अन्तिम पंक्तियाँ मुझे उदास करनेवाली थीं पर मैंने तुरन्त बर्नर्ड शॉ पढऩा शुरू कर दिया, अच्छा लग रहा है।

—कुहू

कवि को ‘वेस्टलैंड’ की अन्तिम पंक्तियाँ याद आ गयीं—‘दिस इज़ द वे द वल्र्ड एंड्ज़, नॉट विद ए बैंग बट विद ए व्हिम्पर।’

इस ख़त से कुहेली की बहादुरी के सिवा अन्य किसी भाव का पता नहीं चल रहा था।

कवि को एक निसंग-सा सन्तोष मिला। लगभग ऐसा स्वभाव उसका भी था। जीवन की समस्याओं से बिदककर, वह भी उसी की तरह साहित्य में मुँह छुपाता।

दो बार और चिट्ठी पढऩे के बाद कवि ने उसे जेब के हवाले किया। लायब्रेरी आने का औचित्य सिद्ध करने के लिए वह अख़बार पलटने लगा। तभी ‘स्टेट्समैन’ में छपे एक विज्ञापन पर उसकी नज़र पड़ी। यह यूनियन पब्लिक सर्विस कमिशन का ऑल इंडिया रेडियो के लिए कार्यक्रम निष्पादक पद के लिए विज्ञापन था जिसमें दी गयी अर्हताएँ कवि के उपयुक्त थीं। पद स्थायी था, वेतनमान अच्छा था और नियुक्ति देश के किसी भी नगर में हो सकती थी। कवि को लगा जैसे उसके हाथ मुक्तिमार्ग आ गया। अब तक उसने नौकरी बदलने के बारे में सोचा नहीं था किन्तु बदले हालात में यह विकल्प उसे कई क़िस्म के सन्तापों से त्राण दिला सकता था। उसे लगा जैसे वह मथुरा से निकलने के लिए बेचैन था वैसे ही दिल्ली से निकलने के लिए भी। वहीं लायब्रेरी में बैठकर उसने अपने आवेदन-पत्र का प्रारूप तैयार किया और घर जाकर उसे अन्तिम रूप देने का निश्चय कर लिया।

आज उसने अतिरिक्त उत्साह से क्लास में पढ़ाया। कैंटीन का रोज़ का खाना आज कुछ बेहतर लगा। कॉलेज के बाद वह सीधा अपने कमरे पर गया। अपने प्रमाण-पत्र और अंक-पत्र सहेजते समय उसे ध्यान आया कि उसे आवेदन-पत्र में नगर के दो व्यक्तियों का सन्दर्भ देना है जो उसे जानते हों। शाम पाँच बजे उसे फिर भूख लग आयी। ऐसा बहुत दिनों बाद हुआ। कई दिनों से उसे भूख लगनी बन्द हो गयी थी। वह गली पराँठेवाली में चला गया। पराँठे के साथ काशीफल की सूखी और आलू की रसेदार सब्ज़ी खाते हुए उसे इनमें पड़ी मेथी और सौंफ की ख़ुशबू उठाकर मथुरा के पुराने मकान सतघड़े ले गयी जहाँ जीजी के हाथ की बनी ब्यालू में ये सब्जियाँ ज़रूर होती थीं। इस वक्त क्या कर रहे होंगे घर के लोग उसने सोचा।

फिलहाल उसे इंटरव्यू की तैयारी करनी थी। मासमीडिया और प्रसारण पर कुछ पुस्तकें पढऩी थीं और अपना हिन्दी साहित्य का ज्ञान अद्यतन करना था। साहित्य, संस्कृति और कला में रुचि इस पद के लिए अनिवार्य अर्हता थी। आवेदन-पत्र में जिन दो व्यक्तियों के नामों का सन्दर्भ देना था, उनसे इस बात की अनुमति भी लेनी थी। कवि चाहता तो कॉलेज के प्रिंसिपल का हवाला दे सकता था पर उसे यह ठीक नहीं लगा। एक तो वह कोई साहित्यप्रेमी व्यक्ति नहीं था दूसरे कवि कॉलेज में, अपने इस नवीन अभियान की गोपनीयता बनाए रखना चाहता था। कुछ देर सोच-विचारकर उसे प्रेमनाथ मिश्र का ध्यान आया। प्रेमनाथ मिश्र हिन्दी के चर्चित और प्रतिष्ठित रचनाकार थे। एक बार ‘अमर उजाला’ अख़बार के लिए कवि ने उनकी इंटरव्यू की थी। तभी का परिचय था। वैसे कवि उनकी कई पुस्तकें पढ़ चुका था। उनकी प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा का कारण उसकी समझ से बाहर था क्योंकि वे पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से कथा का ताना-बाना तैयार करते थे। कवि को लगता कि साहित्यकार को अपनी बात प्रत्यक्ष और प्रामाणिक रूप से लिखनी चाहिए , प्रतीकों से बात अकारण अस्पष्ट हो जाती है। अमर उजाला’ के लिए इंटरव्यू करते समय कवि ने यह सवाल मिश्र जी से किया था जिसका उन्होंने काफी पेचीदा जवाब दिया। लेकिन मिश्र जी में मित्र भाव का अभाव नहीं था। अगर उनकी बातें सुनने का धैर्य किसी में हो तो वह उनका क़रीबी बन जाता।

कवि आवेदन-पत्र में सन्दर्भ सूत्र के रूप में प्रेमनाथ मिश्र जी का नाम देना चाहता था। एक दिन वह उनके घर गया।

मिश्र जी तपाक से मिले। जोश में आवाज़ लगायी, ‘‘शारदा दो चाय लाना।’’

कवि को मिश्र जी के स्वभाव की बुलन्दी अच्छी लगती थी हालाँकि वे उसके प्रिय रचनाकार नहीं थे।

थोड़ी देर में उनकी पत्नी कमरे में आयीं। उनके चेहरे की चिड़चिड़ाहट से स्पष्ट था कि वे पति का फरमान सुन चुकी हैं, ‘‘अब इस वक्त चाय। जब देखो तब चाय! यह खाने का समय है या चाय का?’’

‘‘समय तो खाने का ही है पर चाय से कोई अनाचार नहीं हो जाएगा।’’

कवि को अपनी उपस्थिति अटपटी लग रही थी मानो उसी की वजह से चाय की चर्चा चली। उसने कहा, ‘‘कोई सदाचार भी नहीं हो जाएगा।’’

‘‘कवि बाबू हमारी पत्नी चाय बहुत अच्छी बनाती हैं, देखना दो मिनट में भिजवाएँगी।’’

शारदा का गुस्सा थोड़ा उतरा। वह मुडक़र सीढ़ी उतरने लगी तो मिश्रजी ने कहा, ‘‘शारदा जब चाय बनाओ, थोड़ी-सी मुहब्बत भी उसमें मिला देना।’’

शारदा फिर तन गयीं। सीढ़ी से ही चिचियाकर बोलीं, ‘‘और नहीं तो क्या मैं नफ़रत मिलाकर बनाती हूँ।’’

मिश्रजी ने कोई उत्तर नहीं दिया। वे कवि से पूछने लगे, इन दिनों उसने क्या कुछ लिखा है।

कवि ने इधर गम्भीर कविताएँ न लिखकर कुछ तुक्तक लिखे थे। मित्र-मंडली में, छोटी कवि गोष्ठियों में, जहाँ भी ये तुक्तक उसने सुनाए, काफी पसन्द किये गये थे। उसने बताया।

‘‘सुनाओ, सुनाओ, एकाध बानगी देखें।’’

कवि ने सबसे पहला तुक्तक सुनाया—

‘‘तीन गुण हैं विशेष कागज़ के फूल में

एक तो वे उगते नहीं हैं कभी धूल में

दूजे झड़ते नहीं, काँटे गड़ते नहीं

तीजे, आप चाहे उन्हें लगा लें बबूल में।’’

‘‘वाह अच्छा व्यंग्य है। मैंने भी आज एक चैप्टर ख़त्म किया है। खाने के बाद तुम्हें सुनाऊँगा।’’ मिश्रजी ने कहा।

उनकी यह पुरानी आदत थी कि नवोदित रचनाकार से उसकी स्फुट रचना सुनकर अपनी लम्बी-सी रचना उसे सुना डालते। कवि ने कहा वह अगली बार सुन लेगा।

मिश्रजी ने अपना नाम सन्दर्भ में देने की अनुमति सहर्ष दे डाली। बल्कि उन्होंने कहा वे सूचना प्रसारण मन्त्रालय में एक-दो लोगों को जानते हैं, उनसे कहलवा देंगे। उनकी आलमारी में एक अच्छी पुस्तक थी बी.बी.सी. का इतिहास। लेकिन वे उसे देने में अनिच्छुक थे। बोले, ‘‘तुम्हें जो भी पढऩा है चार बजे यहीं आकर पढ़ लो। दरअसल मेरी बुक शेल्फ़ में से एक भी किताब अगर निकल जाती है तो मेरे प्राण ऐसे विकल हो जाते हैं जैसे मेरा बच्चा बाहर चला गया हो।’’ कवि ने पुस्तक उलट-पुलटकर देखी। उसने तय किया दरियागंज की पुरानी दुकानों में इस पुस्तक की तलाश करेगा।

उसने चलने की इजाज़त माँगी। मिश्रजी साथ उठ खड़े हुए।

‘‘आप बैठें, मैं चला जाऊँगा।’’ कवि ने कहा।

‘‘सिगरेट ख़त्म हो गये हैं; फिर सारी शाम मैं लिखता रहा हूँ, बेहद थक गया हूँ। थोड़ा घूमना हो जाएगा।’’

हालाँकि सिगरेट पहले चौराहे पर ही मिल रही थी, मिश्र जी तीसरे चौराहे तक उसके साथ गये। वहाँ से कवि को बस मिल गयी।

दूसरे सन्दर्भ के लिए कवि को दूर नहीं जाना पड़ा। कॉफी हाउस में हर शाम उसने लेखकों, पत्रकारों की टोली देखी थी। उसे पता था वहाँ वरिष्ठ से लेकर कनिष्ठ साहित्यकार तक इकट्ठे होते हैं। एक व्यक्ति के व्यक्तित्व से वह कई बार आकृष्ट हुआ। उसके दोस्त अपूर्व ने बताया ये नाटककार विष्णु प्रभाकर हैं। इनके नाटक रेडियो से प्रसारित होते हैं। कवि को उनकी सौम्य सुन्दर मुखाकृति में सज्जनता का आश्वासन मिला। इन्हें उसने कई बार अपने मोहल्ले कूचापातीराम से गुज़रते देखा था। झकाझक सफेद खादी का कुरता-पाजामा पहने वे तेज़ क़दमों से पूरी गली पार कर जाते।

कवि ने खुद आगे बढक़र उनसे परिचय किया, अपने बारे में बताया और कहा, ‘‘मैं तो आपको रोज़ देखता हूँ आपने भी मुझे यहाँ कई बार देखा होगा।

‘‘मैंने आपकी रचनाएँ पढ़ी और सुनी हैं। मैंने रेडियो की नौकरी के लिए आवेदन किया है। आप इजाज़त दें तो मैं आपका नाम सन्दर्भ के तौर पर दे दूँ।’’

‘‘मैं तो आपको जानता नहीं।’’ उनकी आवाज़ शान्त और शालीन थी।

‘‘जानने की यह एक शुरुआत हो सकती है। लेखन की पायदान में मैं पहली सीढ़ी चढ़ रहा हूँ जबकि आप शीर्ष पर हैं।’’

‘‘लेखन में शीर्ष इतना शीघ्र नहीं मिला करता।’’

‘‘आप इजाज़त दें तो अपनी रचनाएँ आपको दिखा सकता हूँ।’’

सहज परिचय विकसित होने में ज्याीदा समय नहीं लगा। कवि ने उनका नाम सन्दर्भसूत्र में लिख दिया, कुंडेवालान वाले पते सहित।

विष्णु प्रभाकर कम बोलकर भी अपनी मुस्कान से सम्प्रेषण बनाए रखते। एक ख़ास बात यह थी कि मिश्रजी की तरह वे अपनी रचनाएँ सुनाने के लिए कभी तत्पर नहीं लगे। कॉफी हाउस में वे इत्मीनान से बैठते, उनकी मेज़ मित्र-मंडली से घिरी रहती।

अगले मसरूफियत के दिन थे। अध्यापन के साथ अध्ययन और चिन्तन के साथ मनन जुड़ गया। कविमोहन ने दरियागंज और कनॉटप्लेस के बुकस्टोर एक कर डाले, उसने इतना पढ़ा, जाना और गुना कि इंटरव्यू में पेनेल को लगा जैसे यह आदमी सूचना प्रसारण का चम्मच अपने मुँह में रखकर ही पैदा हुआ है। बाकी हिन्दी और इंग्लिश का ज्ञान तो अपनी जगह था ही। नतीजा यह हुआ कि यू.पी.एस.सी. की चयन-तालिका में कविमोहन का नाम सर्वोच्च स्थान पर रहा।

जब उसने कॉलेज में तीन महीने का नोटिस देते हुए प्रिंसिपल से कहा कि यदि वे उसे एक माह में ही कार्ययुक्त कर देंगे तो वह आभारी होगा, प्रिंसिपल उसका अनुरोध टाल न सके। कवि का अब तक का रिकार्ड ए-वन रहा था। उसका विदाई समारोह वहीं स्टाफ़-रूम में सम्पन्न हो गया जिसमें प्रिंसिपल भी शरीक़ हुए। इस दिन कुहू ने एक गीत गाया—

‘‘सखि वे मुझसे कहकर जाते

कह तो क्या वे मुझको अपनी पथबाधा ही पाते,

सखि वे मुझसे कहकर जाते।’’

गीत का स्वर इतना आत्र्तनाद भरा था कि स्टाफ़-रूम में सबकी आँखें भर आयीं। कवि को लगा उसकी कई पसलियाँ चट-चट टूट रही हैं। अब से वह आधी पसलियों के साथ ही जिन्दा रहेगा। यह अधूरी कामना मद्दे सुलगते अंगारे की तरह उसे जीवन भर सुलगाएगी।

कवि को यह प्रश्न विदग्ध करता रहा कि जो लडक़ी अपने पत्र में इतनी सूरमा बनी थी, विदाई समारोह में कैसे इतनी कच्ची और कमज़ोर बन गयी। उन दोनों की दोस्ती पूरे कॉलेज पर उजागर थी। उतना ही उजागर था पिछले एक माह का मौन। कवि कभी कोई सामान्य-सी बात भी कहता, कुहू ऐसे मुँह फेर लेती जैसे उसने सुना ही नहीं। साथी प्राध्यापक इस स्थिति का आनन्द लेते रहे।

कवि को अपमानित होना महसूस होता रहा। एक तरफ़ आर्टस एंड कॉमर्स कॉलेज का बनिया चरित्र उसे असन्तुष्ट करता दूसरी तरफ़ कुहू की उपेक्षा। इस कॉलेज की एक ख़ासियत यह थी कि शादी-ब्याह के दिनों में कभी भी उसके भवन और परिसर को लगन के लिए किराये पर उठा दिया जाता। यह भी नहीं देखा जाता कि कॉलेज में छुट्टी है अथवा नहीं। उन दिनों में कॉलेज में अघोषित अवकाश रखा जाता। कविमोहन को यह बात विचित्र लगती कि अकारण विद्यार्थियों की पढ़ाई का हर्ज किया जाए जबकि परीक्षा सिर पर हो। ऊपर से कुहू का व्यवहार! कुहू ने उससे तो कहा था कि वह कोई तमाशा नहीं चाहती पर वह आये दिन तमाशा ही खड़ा कर देती। मसलन एक बार छात्र उसके पीछे पड़ गये कि मैम आप हमें ब्राउनिंग का ‘पॉरफीरियाज़ लवर’ समझा दें। उसने कहा, यह कविता पुरुष के दृष्टिकोण से लिखी गयी है इसलिए तुम इसे किसी पुरुष प्राध्यापक से ही समझो जैसे कविमोहन अग्रवाल। छात्र उसे छोड़ कविमोहन के पीछे पड़ गये। कवि कविता पढ़ाते हुए भावुक हो गया। छात्रों के एक झुंड ने उसे टोककर पूछा, ‘‘सर क्या आप कभी प्रेम के अनुभव से गुज़रे हैं।’’

कवि प्रश्न पर अचकचा गया। छात्रों के सम्मुख न वह सच बोल सकता था न झूठ। सबसे बेढब बात यह थी कि ये विद्यार्थी भी उसे बैचलर समझकर छेड़ रहे थे। सबके बीच कुहू से उसकी निकटता प्रकट रही थी। आजकल वे इकट्ठे नहीं दिखते थे, इसे भी लोग रोमांटिक रूठा-रूठी मान रहे थे। रॉबर्ट ब्राउनिंग लवपोयट के रूप में विद्यार्थियों का चहेता कवि था। उसकी तीन यादगार कविताएँ बी.ए. के पाठ्यक्रम में थीं, ‘प्रॉस्पाइस’, ‘पॉरफीरियाज़ लवर’ और ‘द लास्ट राइड टुगैदर’। विद्यार्थी ‘प्रॉस्पाइस’ जैसी महत्त्वपूर्ण कविता को तो दरगुज़र करते किन्तु ‘पॉरफीरियाज़’ लवर और ‘द लास्ट राइड टुगेदर’ पर आकर ठिठक जाते। जैसा कविता के साथ होता है, हर विद्यार्थी इन्हें अपने तरीके से आत्मसात् करता। कोई इन्हें आवेग की अनुभूति मानता तो कोई संवेग की। किसी को ये रुग्ण मानसिकता की प्रतीक लगतीं तो किसी को उद्दाम प्रेम की अभिव्यक्ति। इन कविताओं की क़ामयाबी का यही राज़ था कि इनके बहुल पाठ सम्भव थे।

फेयरवेल पार्टी के बाद विदा लेने का कार्यक्रम देर तक चला। कविमोहन जो टी-शर्ट पहने हुए था, उसे उसके साथी शिक्षकों और विद्यार्थियों ने ग्रैफिटी लिख-लिखकर नीला-लाल कर दिया। वी लव यू, वी विल मिस यू, ओ रेवुआर, टिल वी मीट अगेन, यार दस्वेदानिया और ख़ुदा हाफिज़ बार-बार लिखा गया। जब टी-शर्ट में एक भी इंच जगह नहीं बची कुहू अपना बॉलपेन लेकर आगे बढ़ी और समस्त ग्रैफिटी के ऊपर सुपर इम्पोज़ कर उसने लिखा, ‘आय विल नेवर मिस यू—कुहू। कवि के सीने पर जैसे किसी ने कटार से गोद दिया। वह पसीने से नहा गया। उसने कुहू की डायरी उठाकर उसमें लिखा, ‘बट आय विल ऑलवेज़ मिस यू (लेकिन तुम मुझे हरदम याद आओगी)। विद्यार्थी कवि का पता जानना चाहते थे।

कवि ने कहा, ‘‘इस वक्त मैं त्रिशंकु हूँ। मेरा न कोई पता है, न ठिकाना। मुझे एक महीना दो तो मैं अपने पैर जमाकर बात करूँ।’’

तीन साल पुरानी जगह छोडऩा आसान नहीं था। आखिरी पचास कदम चलते हुए कवि को लगा कि वह इन काई लगी दीवारों, झाड़-झंखाड़ पेड़ों, रास्ते की बजरी और ज़ंग लगे फाटक से अभिन्न रूप से जुड़ गया था। इनका सगा सौन्दर्य वह आज पहली बार महसूस कर रहा था। दरियागंज की मुख्य सडक़ पर उसका बस अड्डा था। वहाँ रोज़ की तरह क़तार की जगह बेतरतीब भीड़ थी। इस एक अड्डे पर सात-आठ बसों का ठहराव था।

बारह नम्बर बस काफी देर तक नहीं आयी। कवि रेलिंग से टिककर अधबैठा-सा था कि सामने के बस अड्डे पर कुहू दिखी। दोनों ने दूर से एक-दूसरे को भर नज़र देखा। कुहू ने उसे पास आने का इशारा किया। एक बार कवि को यक़ीन ही नहीं हुआ कि यह इशारा उसके लिए है। उसके आसपास उचक-उचककर बसों के नम्बर पढ़ती निरपेक्ष भीड़ थी।

कुहू ने एक बार और हाथ हिलाया। कवि सडक़ पार कर सामनेवाले बस अड्डे पर गया।

‘‘एक बात कहनी थी।’’ कुहू ने कहा।

कवि ने एक नज़र अपने स्टैंड पर आ लगी नम्बर बारह को देखा। कुहू बस अड्डे से हटकर फुटपाथ पर खड़ी थी। कवि ने गुज़रता हुआ स्कूटर रोका और दोनों उसमें बैठ गये।

कवि ने जबरन मुस्कराकर कहा, ‘‘द लास्ट राइड टुगैदर।’’

कुहू के होंठ भिंचे हुए थे। वह नहीं मुस्करायी।

स्कूटरवाले ने खीझकर कहा, ‘‘बौजी जाना कित्थे है, दस्सो ना।’’

‘‘घर चलें?’’ कवि ने कुहू से पूछा।

उसने इनकार से सिर हिलाया।

‘‘मन्दिर मार्ग।’’ कवि ने स्कूटरवाले से कहा।

बिड़ला मन्दिर में इस वक्त उछीड़ थी। सुबह के भक्त जा चुके थे और शाम के, अभी आये नहीं थे। करीने से सँवरे लॉन में माली पौधों की देखभाल में लगे थे।

वे दोनों दक्षिणी कोने पर अशोक की क़तारों के पार बरगदवाले चबूतरे पर बैठ गये।

‘‘क्या तुम मेरी वजह से कॉलेज छोडक़र जा रहे हो?’’ कुहू ने बैठते ही पूछा।

‘‘नहीं तो।’’

‘‘तुम्हारे नहीं कहने से क्या होता है। सब कॉलेज में यही कह रहे हैं।’’

‘‘किसी के कहने से कोई बात सत्य नहीं हो जाती।’’

कुहू ने डायरी और पर्स पास में रखकर रूमाल से अपनी आँखें पोंछी।

कवि ने उसकी तरफ़ ध्यान दिया।

वह हँसने लगी। एक सायास, संक्षिप्त-सी हँसी, ‘‘रो नहीं रही हूँ, आँखें धुँधला रही हैं। लगता है रात में पढऩा बन्द करना पड़ेगा।’’

‘‘क्या पढ़ती रहती हो?’’

‘‘कुछ भी। कल तो मैं तोरुदत्त पढ़ती रही।’’

कवि चुप, उसे देखता रहा, ‘‘बस यही बात करनी थी?’’

यकायक कुहू विह्वल हो आयी, ‘‘नहीं तुम्हें बताना पड़ेगा, तुमने जॉब क्यों छोड़ा? जॉब क्या तुम तो प्रोफेशन ही बदल रहे हो! ऐसा कहीं होता है!’’

‘‘प्राइवेट कॉलेज का जॉब भी क्या है?’’

‘‘तुम्हारा मतलब है इसमें सुरक्षा नहीं है।’’

‘‘बहुत-सी चीज़ें इसमें नहीं हैं। इस नौकरी की कोई आचारसंहिता नहीं है। छात्रों के साथ रहकर सन्तोष मिलता है पर इसके अलावा अध्यापन में ज्याुदा कुछ नहीं है।’’

कुहू के मन में आया वह कहीं गिनती में ही नहीं है। कवि ने जैसे उसके मन की वह इबारत पढ़ ली।

‘‘एक तुम थीं तो मन लगा रहता था। मैंने तुम्हें भी खो दिया। अब मेरे लिए वहाँ कुछ नहीं है।’’

‘‘मैं तो वहीं हूँ।’’

‘‘मुझे तुमने अपनी जिन्दगी से खारिज बेदख़ल कर दिया।’’

‘‘वह ख़त मैंने गुस्से में लिखा था। तुमने अपने ख़त में जो तीन शब्द काटे थे, मुझे तकलीफ़ पहुँचाने के लिए काटे थे न।’’

कवि ने याद किया वे तीन शब्द थे मेरी, दोस्त, तुम्हारा।

उसे हल्की-सी ख़ुशी भी हुई। उसने कहा, ‘‘ये शब्द नहीं थे तीन क़दम थे जो मैं पीछे हटा रहा था।’’

‘‘क्यों? किससे पूछकर? मैं तो तुम्हारे सामने सिन्दूर की डिब्बी लेकर नहीं खड़ी थी कि मेरी मांग भर दो।’’

‘‘मेरी नैतिकता का तकाज़ा था कि तुम्हें बताता।’’

‘‘और तब कहाँ गयी थी तुम्हारी नैतिकता जब इतना वक्त हमने साथ गुज़ारा। दोस्ती की तुम्हारे लिए कोई क़ीमत नहीं!’’

कवि ने कुहू के कन्धे पर हल्का-सा हाथ रखा। कुहू ने झटक दिया।

‘‘सच मानो, तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त रही हो। तुम्हारे सहारे मैं इस बौड़म शहर में इतना रह लिया। दोस्ती की भी माँग थी कि मैं तुम्हें अपने बारे में बताता। अकेले मैं इतना बोझ कैसे उठाता?’’

मन्दिर में भीड़ आना शुरू हो रही थी। वे वहाँ से उठ लिये।

वापसी में कवि ने कुहू को बंगाली मार्केट पर उतारा।

‘‘घर चलो।’’ कुहू ने कहा।

‘‘कई काम हैं, फिर कभी।’’ कवि ने विदा ली।

अब घंटों के चिन्तन के पश्चात् कवि को लगा कि कुहू के साथ उसके सम्बन्ध का व्याकरण तो ठीक हो गया लेकिन अन्तर्कथा अभी भी हिली हुई है। उसने अपनी डायरी में लिखा—

‘‘इस सारे सुख को नाम नहीं देंगे हम

छोर से छोर तक माप कर

यह नहीं कहेंगे हम, इतना है हमसे

सिर्फ यह अहसास हमें मुक्त करता रहेगा

और हम अपनी बनायी जेलों से बाहर आ जाएँगे।’’

लेकिन कागज़ पर कलम रखते ही उसकी अभिव्यक्ति रोमांटिक होने लगी। उसे लगा स्त्रियों के स्वभाव में बहुत विसंगतियाँ होती हैं। कुहू ने ख़ुद उससे अनबोला किया और ख़ुद आकर मिट्ठी कर ली। वह क्या मिट्टी का माधो है जो हर हाल में ख़ुश है। अगर कुहू उसे याचक की भूमिका में देखना चाहती है तो निराश होगी। हो सकता है यह उनकी आज लास्ट राइड टुगैदर ही रही हो। एक बार वह नयी नौकरी में चला गया फिर कहाँ कुहू और कहाँ कवि। कुहू के अन्दर उमंग है उसे कभी भी किसी का संग मिल जाएगा। रहा वह तो इस दोस्ती में वही सबसे बड़ा उल्लू साबित हो रहा है।
 
Back
Top