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‘‘अगर मैं ग़लत हूँ, तो इतना जान लो, इस कॉलेज में फ़ॉर्मेलिटी नहीं, अपनापन मिलेगा। तुम अपनी माँ को अगर ‘आप‘ कहकर संबोधित करती हो तो उनसे निकटता महसूस नहीं करतीं।‘‘ रोहित ने अपना फ़ैसला सुना दिया।
निरूत्तर देवयानी का हाथ पकड़ रोहित ने कहा-
‘‘तुम्हारी चुप्पी तुम्हारी स्वीकृति है। हमारी दोस्ती हमेशा बनी रहे। चलो, अब प्रोग्राम शुरू होने जा रहा है।‘‘
लड़को ने लड़कियों को कुछ चिटें बाँटी। उन पर नम्बर लिखे थे। जिस नम्बर को पुकारा जाएगा, उस लड़की को स्टेज पर जाकर उससे जो फ़र्माइश की जाए, उसे पूरा करना होगा। देवयानी के हाथ में नं. 5 की चिट थी। अचानक नम्बर 5 की पुकार पर देवयानी को स्टेज पर जाना पड़ा। लड़कों ने आवाज़ लगाई-
‘‘एक प्यार से सराबोर ग़ज़ल गाइए, मोहतरमा‘‘ देवयानी की हिचक पर रोहित आगे बढ़ आया-
‘‘दोस्ती के नाम पर एक ग़ज़ल सुना दो, देवयानी।‘‘
देवयानी ने जैसे ही माइक थामा, हॉल तालियों से गूँज उठा। देवयानी ने अपनी फ़ेवरिट ग़ज़ल शुरू की –
‘‘दिल चीज़ क्या है, आप मेरी जान लीजिए, बस एक बार मेरा कहा, मान लीजिए…….‘‘ सुरीले गले से निकली ग़ज़ल में मानो उमराव जान साकार थी। ग़ज़ल समाप्त होने पर कुछ पलों के लिए आत्म- विस्मृत सन्नाटा छाया रहा। अचानक ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट ने जैसे सबकी तंद्रा भंग कर दी।
‘‘एक और, वन्स मोर‘‘ के शोर के बीच देवयानी मंच से नीचे उतर आई। सब देवयानी की ओर मुग्ध दृष्टि से ताक रहे थे। रोहित ने देवयानी को बधाई देते कहा-
‘‘तुम में और कितने गुण छिपे हैं, देवयानी ? जितना ही तुम्हें जान रहा हूँ, उतना ही विस्मित हो रहा हूँ।‘
उसी वक्त देवयानी को सर्वसम्मति से कालेज की ‘लंता मंगेशकर‘ का खि़ताब मिल गया।
कुछ ही देर में नृत्य के लिए संगीत शुरू हो गया। लड़कों ने लड़कियों को आमंत्रित कर डांस शुरू कर दिया। देवयानी हॉल के कोने में बैठी नृत्य करते जोड़ों को कौतुक से देख रही थी। एक-एक करके कई साथियों ने देवयानी को नृत्य के लिए आमंत्रित किया, पर देवयानी प्रस्ताव शालीनता से अस्वीकार करती गई-
‘‘क्षमा करें, मुझे नृत्य नहीं आता।‘‘
‘‘आइए न, हम सिखा देंगे, बशर्ते आप हमे संगीत सिखा दें।‘‘ मुस्कराते मोहनीश ने कहा।
‘‘अरे पाश्चात्य नृतय में होता ही क्या है, बस इधर-उधर पाँव रखते रहिए।‘‘ अनुराग ने समझाया।
‘‘मुझे दूसरों को नृत्य करते देखना अच्छा लगता है। प्लीज़ हमे एन्ज्वॉय करने दें।‘‘
‘‘ओ. के. ऐज़ यू विश।‘‘
अचानक पीछे से आए रोहित ने देवयानी को कंधे से पकड़ जबरन खड़ा कर लिया। रोहित के साथ करीब-करीब घिसटती-सी देवयानी डांस- फ़्लोर पर पहुँच गई।
‘‘हमे छोड़ दो, रोहित। प्लीज़, हमे डांस नहीं आता।‘‘ देवयानी रूँआसी-सी थी।
‘‘ऐ बेबी, ज़िंदगी का एक-एक पल एन्ज्वॉय करना सीखो। न जाने कब हमें ये खूबसूरत दुनिया छोड़कर चले जाना पड़े। नाउ लेट्स स्टार्ट लाइक दिस………।‘‘
रोहित की बातों मे न जाने क्या जादू-सा था, देवयानी के पाँव उसके साथ उठते गए।
साथियों ने तालियाँ बजाकर, आवाजें कसीं-
‘‘हियर-हियर। रोहित यार, मान गए।‘‘
‘‘अब तू मेडिसिन की पढ़ाई छोड़, डांस-टीचर बन जा।‘‘ रोहित के साथी जयंत ने सलाह दी। हँसी-खुशी को वो शाम बड़ी जल्दी बीत गई। अचानक कलाई-घड़ी पर नज़र पड़ते ही देवयानी चौंक गई। ग्यारह बजे रात तक वो पहली बार बाहर रही थी। माँ का चिंतित चेहरा याद हो आया।
‘‘अब हमें जाना है, माँ परेशान होंगी।‘‘ साथ बैठी रितु हंस पड़ी
‘‘अरे, घर में तो रोज़ ही रहती हो, एक दिन यहाँ भी एन्ज्वॉय कर लो।‘‘
‘‘नहीं, रितु, हमारी परिस्थिति सबसे अलग है। माँ परेशान होंगी। हम जा रहे हैं।‘‘
देवयानी को खड़ा होते देख, रोहित पास आ गया।
‘‘क्या बात है, देवयानी ?‘‘
‘‘हमे घर जाना है, रोहित।‘‘
‘‘इतनी जल्दी ?‘‘
‘‘इतनी जल्दी ?‘‘
‘‘हमारे लिए ग्यारह बजे रात का मतलब बहुत देर हो जाना है, रोहित।‘‘
‘‘ओह, समझा। चलो तुम्हें घर तक छोड़ आऊँ।‘‘
हॉल के बाहर आकर रोहित अपनी मोटरबाइक के पास देवयानी को ले गया।
‘‘मोटरबाइक में पहलेकभी बैठी हो ? डर तो नहीं लगेगा ?‘‘ रोहित के चेहरे पर कंसर्न था।
‘‘नहीं, पर तुमने तो कहा था लड़कियों को घर तक छोड़ने का इंतजाम है।‘‘
‘‘अरे, इससे अच्छा इंतज़ाम क्या होगा, देवयानी। मिनटों में घर पहुँच जाओगी।‘‘
‘‘हमे मोटरबाइक पर बैठते डर लगता है। हम कभी नहीं बैठे हैं। अगर कोई रिक्शा मिल जाए तो हम चले जाएँगे।‘‘
‘‘व्हाट रबिश। इतनी रात गए अकेले रिक्शे में जाना क्या सेफ़ होगा। वेल। डोंट बिहेव लाइक ए चाइल्ड। कम ऑन। मैं बाइक स्टार्ट करता हूँ। तुम मेरे पीछे बैठ जाना। डर लगे तो मुझे कसकर पकड़ लेना। यकीन रखो गिराऊँगा नहीं।
देवयानी की झिझक देख फिर कहा-
‘‘क्या करूँ, अभी मेरे पास कार तो है नहीं। चलो, जल्दी करो वर्ना और देर हो जाएगी।‘‘
विवश देवयानी को रोहित के पीछे बैठना पड़ा। मोटरबाइक के झटकों से डरकर उसका हाथ रोहित के कंधे को जकड़े हुए था। घर के सामने पहुँच, रोहित ने मोटरबाइक रोक कर, देवयानी को उतार कर कहा-
‘‘डरीं तो नहीं ? हाँ, माँ को बता देना तुम मेरे साथ आई हो। अगर डाँट पड़े तो कोई बात नहीं, पर झूठ बोलना ग़लत होगा।‘‘
‘‘थैंक्स रोहित। मुझे आज तक माँ से कभी झूठ बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ी न पड़ेगी। हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं एक-दूसरे की बात खूब समझते हैं।‘‘
‘‘मुझे तुमसे यही उम्मीद थी, देवयानी। ओ.के.बाय। गुड नाइट।
किक मार, रोहित उड़ गया।
कल्याणी खिड़की से देख रही थी। अंदर पहुँचते ही देवयानी ने कहा-
‘सॉरी, माँ। प्रोग्राम इतना अच्छा था वक्त का पता ही नहीं लगा।
‘‘किसके साथ आई थी, देवयानी ?‘‘
‘‘वो हमारे सीनियर रोहित थे…….‘‘
‘‘देख, देवयानी, आगे से किसी लड़के के साथ मोटरबाइक पर आने की ज़रूरत नहीं है।‘‘ गंभीरता से कल्याणी ने कहा।
‘‘ठीक है, माँ।‘‘
दूसरे दिन सुबह देवयानी ने अपने पिछली रात के प्रोग्राम के बारे में बताते हुए उत्साह से माँ से कहा-
‘‘जानती हो, माँ। कल हमें क्या खि़ताब मिला ?‘‘
‘‘मै तो वहाँ थी नहीं, कैसे जानूंगी, देवयानी ?‘‘
‘‘माँ, कल हमें कॉलेज की ‘लता मंगेशकर‘ का खि़ताब मिला है। हमने उमराव जान की ग़ज़ल सुनाई थी। हम तो नहीं गाना चाहते थे, पर सबने इतनी रिक्वेस्ट की कि गाना ही पड़ा।‘‘
‘‘कोई बात नहीं, अपनी कला को छिपाना नहीं चाहिए। मुझे खुशी है, तेरी ग़ज़ल सबको पसंद आई।‘‘ मुस्करा कर कल्याणी ने देवयानी का उत्साह बढ़ाया।
‘‘तुम बहुत अच्छी हो, माँ। हम तो डर रहे थे, कहीं तुम नाराज़ न हो। हाँ, तुम्हारी गाँव की औरतों वाली प्रोजेक्ट की क्या प्रगति है ?‘‘
‘‘देख, देवयानी, जो बात छिपाने की ज़रूरत पड़े, उसके लिए मैं नाराज़ हो सकती हूँ। तूने कुछ ग़लत नहीं किया। कल गाँव के मुखिया से बात की है, उम्मीद है अब औरतें हमारे कामों में सहयोग देंगी।‘‘
‘‘ये अच्छी बात है, माँ। तुम्हारे लिए मैं बहुत खुश हूँ। तुमने अब जीने के लिए एक मक़सद पा लिया है।‘‘
‘‘मेरी ज़िदगी का सबसे बड़ा मक़सद तो तुझे डॉक्टर बनाना था। वो पूरा हो रहा है। कल्याणी हल्के से मुस्करा दी।
‘‘नहीं माँ, कोई भी इंसान किसी दूसरे के नाम पर अपना मक़सद पूरा नहीं कर सकता। तुम्हारा मक़सद अब उन शोषित स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाना है, जिन्होंने खुशी का उजाला कभी जाना ही नहीं है।‘‘
‘‘आफ़िस से प्रोजेक्ट स्वीकृत हो जाए तब जल्दी ही काम शुरू हो जाएगा।‘‘
‘‘ऑफ़िस वालों का क्या रूख़ है ?‘
‘‘मेरे बॉस को योजना बहुत पसंद आई है। उन्होंने रिकमेंड करके फ़ाइल ऊपर भेज दी है।‘‘
‘‘वाह ! तब तो बात बन गई, समझो।‘‘
‘‘मेरी चिन्ता छोड़, तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, याद रख, तुझे अच्छे नम्बरों से पास होना है।‘‘
‘‘घबराओ नहीं, माँ तुम्हारी बेटी हूँ। तुम्हारा नाम रौशन करूँगी।‘‘
‘‘मुझे तुझ पर पूरा विश्वास है। काश् रोहन और रितु भी तेरी तरह मेहनत से पढ़ते तो आज वो भी किसी प्रोफ़ेशनल लाइन में होते। रोहन तो अभी तक बारहवीं भी पास नहीं कर पाया और रितु मेट्रिक पर ही अटकी है।‘‘