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दोस्त की माँ नशीली बहन छबीली

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मैं अभी इसी उलझन में था कि माया ने मुझे छेड़ते हुए बोला- बड़ी देर लगा दी अन्दर.. सब कुछ ठीक है न?

तभी रूचि भी चुहल लेते हुए कहा- कहीं ऐसा तो नहीं मेरी पेट वाली समस्या आपके पास ट्रांसफर हो गई?

तो मैं झेंपते हुए बोला- नहीं कुछ भी गड़बड़ नहीं है.. जैसा आप लोग समझ रहे हैं।

रूचि हँसते हुए बोली- फिर कैसा है?

तो मैंने बोला- अरे मैं टॉयलेट गया था.. तभी मेरी आँख में शायद कोई कीड़ा चला गया था.. तो मैं अपनी आँख धोकर देखने लग गया था कि वो आँख के अन्दर है कि नहीं..

तभी रूचि मेरे पास आई उसने कातिलाना मुस्कान देते हुए कहा- लाओ मैं अभी तुम्हारा कीड़ा चैक किए देती हूँ..

तो मैं बोला- अरे नहीं.. अब हो गया..

वो मेरे लौड़े को देखते हुए बोली- हाँ दिख तो रहा है.. कि साफ़ हो गया।

फिर से चुहलबाज़ी में हँसने लगी।

तभी माया ने मेरा पक्ष लेते हुए कहा- तू उसे तंग मत कर.. बड़ा है तेरे से..

तब कहीं जाकर रूचि शांत हुई.. फिर हम टीवी देखने लगे कि तभी माया बोली- टीवी में आज कुछ अच्छा आ ही नहीं रहा है..

रूचि भी बोली- हाँ.. माँ आप सच कह रही हो.. मैं भी बोर हो रही हूँ।

तो मैंने भी उनकी ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाते हुए अपने प्लान को सफल बनाने के लिए अपनी इच्छा प्रकट की- हाँ यार.. कुछ मज़ा नहीं आ रहा है..

तो विनोद बोला- फिर क्या किया जाए?

रूचि बोली- कुछ भी सोचो.. जिससे आसानी से टाइम पास हो सके।

वो बोला- अब सोचो तुम ही लोग.. मेरा क्या है.. मैं तो बस शामिल हो जाऊँगा।

अब मुझे अपना प्लान सफल होता हुआ नज़र आने लगा जो कि मैंने घर से आते ही वक़्त बनाया था.. जिसकी सम्पूर्ण जानकारी सिर्फ रूचि को ही थी.. लेकिन प्लान क्या था.. इसके लिए अभी थोड़ा और इंतज़ार कीजिएगा.. जल्द ही मैं इस कहानी के अगले भाग को लिखूंगा और प्लान भी बताऊँगा और तब तक आप भी सोचते रहिए कि आखिर प्लान क्या हो सकता है।

आप लोगों को बताना चाहूंगा कि मेरी एक फ्रेंड है जिसका नाम तो नहीं बता सकता.. पर आप लोग पूजा कह सकते हैं और उसे मेरी कहानी के बारे में मेरे ही कंप्यूटर से जानकारी मिल गई थी.. जो कि उसने मुझे बाद में बताया।

उसे उन कहानियों को पढ़कर इतना मज़ा आया कि वह भी मेरे साथ कुछ हसीन पल बिताना चाहती है। पर मुझसे उसने 31 मई तक का समय माँगा है कि मैं यह कर पाऊँगी कि नहीं.. तो मैंने बोला है कि जैसा समझो.. पर अगर तुम्हें लगे कि तुम आनन्दित महसूस करोगी तो बता देना..

 
लेकिन प्लान क्या था.. तो अब मैं अपना प्लान बताता हूँ.. विनोद का ध्यान हटते ही मैंने माया को देखते हुए कहा- आंटी आप ही कुछ बताओ न..

तो वो बोलीं- मैं क्या बताऊँ?

मैंने उनसे पूछा- जब आप लोग छोटे थे.. तो क्या खेलते थे?

बोलीं- बहुत कुछ.. पर उस जमाने में आज की तरह इतने साधन नहीं थे.. तो हम लोग कैरम, लूडो, लुका-छिपी, खो-खो, रस्सी-कूद, चोर-पुलिस और अंताक्षरी वगैरह खेलते थे।

‘वाह आंटी.. बहुत मज़ा आता होगा न..?’

वो बोलीं- हम्म.. हम लोगों के समय बस यही खेल खेले जाते थे.. जिसमें से अंताक्षरी में.. मैं हमेशा हार जाती थी।

माया की बात से मुझे याद आया कि मेरा दोस्त विनोद भी अपनी माँ की ही तरह था.. उसे गाने-वाने में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं था… तो आंटी की इस बात से मुझे पक्का यकीन हो चला कि अब मेरा प्लान सफल हो जाएगा और प्लान इतना मज़ेदार था कि किसी भी हाल में आज या तो मेरे साथ माया रहेगी या रूचि.. जिसके सपने मेरी आँखों के सामने घूमने लगे थे।

बस फिर क्या था.. मैंने बोला- चलो फिर आज अंताक्षरी खेली जाए.. पर एक शर्त रहेगी..

तो सब बोले- वो क्या?

मैं बोला- वो बाद में.. पहले ये बोलो कि दूसरी टीम का कप्तान कौन बनेगा..?

तो रूचि ही ने तपाक से बोला- अगर तुम कप्तान हो.. तो मुझसे मुकाबला करो..

सभी हंस दिए.. वो ऐसे बोली थी कि जैसे झाँसी की रानी हो..

मैंने बोला- चलो ठीक है.. पर आंटी और विनोद.. किसकी टीम में रहेंगे.. इसके लिए टॉस होगा।

तो सभी ने सहमति जताई और मेरे पक्ष की बात हुई.. तो मैंने सिक्का निकाला और रूचि से बोला- देख.. अगर हेड आया तो विनोद मेरी ओर.. और अगर टेल आया.. तो तेरी ओर..

वो मुस्कुरा कर बोली- अरे कोई भी आए.. जीतूंगी तो मैं ही..

तो मैंने टॉस उछाला और वही हुआ.. जो मैंने सोचा था।

मैंने सोचा यह था कि विनोद मेरी ओर ही रहे और नसीब से हेड ही आया।

फिर सबसे पहले आंटी बोलीं- अच्छा अब शर्त भी तो बता.. जो तू बोल रहा था।

मैं बोला- बहुत ही आसान है.. अगर बिना शर्त के खेल खेला गया तो शायद मज़ा न आए.. बस इसलिए गेम में ट्विस्ट लाने के लिए किया जा रहा है।

तो विनोद बोला- अबे यार इतना घुमा क्यों रहा है.. सीधे बोल न.. करना क्या है?

मैं बोला- जो जीतेगा.. उस टीम का 1 मेंबर हारी हुई टीम के 1 मेंबर के साथ रहेगा.. उतने सभी दिन.. जितने दिन मैं यहाँ हूँ.. और हर रोज पार्टनर आल्टरनेट बदलते रहेंगे और उसे जीतने वाली टीम के मेंबर की हर बात माननी होगी।

आंटी बोलीं- पर कैसे?

मैंने समझाया- जैसे मैं जीतता हूँ.. तो आपको या रूचि में से कोई आज मेरे साथ ही रहेगा.. और जैसा मैं बोलूंगा.. वो उसको करना पड़ेगा और कल आप में से कोई दूसरा मेरे साथ.. इसी तरह जब तक मैं हूँ.. यही चलता रहेगा।

वो बोलीं- वैसे करना क्या-क्या पड़ सकता है?

मैं बोला- जैसे खाना बनाने में मदद.. सोते में साथ ही रहना.. और अगर रात को पानी मांगे.. तो उठ कर देना.. ये समझ लो.. बिना कुछ सोचे उसका आदेश मानना है।

विनोद बोला- यार मेरे से नहीं हो पाएगा.. साले कहीं तू हार गया तो सब मुझे भी करना होगा.. जो कि मुझसे नहीं होगा।

तो मैं बोला- अबे प्रयास करेगा या पहले ही हार मान लेगा।

वो फिर बोला- साले.. मेरे हिस्से का भी तू ही करेगा.. ये सोच ले.. मुझसे जितना बन पड़ेगा.. मैं बस उतना ही करूँगा।

जिस पर रूचि ने विनोद की बहुत चिकाई ली.. तो वो भी मुझे अपने मन में गरियाता हुआ ‘हाँ’ बोल दिया।

तभी रूचि बोली- भाई अगर मैं जीती.. तो तुम्हें आज ही अपनी सेवा का मौका दूंगी.. बहुत काम कराते हो मुझसे!

तो वो खिसियाते हुए बोला- पहले जीत तो सही.. फिर देखेंगे..

आंटी मेरे बताए हुए प्लान के मुताबिक मौन धारण किए हुई थीं.. क्योंकि उनका न बोलना ही प्लान को हवा दे रहा था।

फिर हमने गेम शुरू किया.. क्योंकि टॉस मैं जीता था.. तो मुझसे ही शुरूवात हुई।

अब गाने वगैरह लिखने की शायद जरूरत नहीं है.. आप लोग बुद्धिजीवी हैं.. सब समझ ही लेंगे और अगर लिखता भी हूँ तो कुछ को यही लगेगा कि फालतू की समय बर्बादी हो रही है.. इसलिए अब कहानी आगे बढ़ाता हूँ।

 
गेम खेलते-खेलते करीब आधा घंटा हो चुका था.. पर हम दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था।

तभी मैंने रूचि को याद दिलाई- यार.. इतनी देर हो गई.. अब कोल्ड ड्रिंक ले आओ.. जल्दी से फिर पीते-पीते हुए ही खेलेंगे।

रूचि उठने लगी.. तो मैंने उसे इशारा किया कि मुझे बात करनी है.. और वो गाना था ‘मुझे कुछ कहना है… मुझे कुछ कहना है..’

जिसे रूचि समझते हुई मुस्कुराई और उसने ‘हाँ’ में सर हिला दिया और बोली- पहले कोल्ड्ड्रिंक हो जाए.. फिर कहते हैं।

तो मैं बोला- ओके..

वो रसोई में गई और उसे गए करीब पांच मिनट से भी ज्यादा हो गए थे.. पर वो नहीं आई।

विनोद ने आवाज लगाई- देर क्यों लगा रही हो?

वो बोली- ड्रिंक्स वाले गिलास नहीं दिख रहे हैं..

विनोद अपनी माँ से बोला- माँ तुम ही जाओ.. वरना ये सारी रात गिलास ढूढ़ने में ही लगा देगी।

मुझे बस इसी पल का इंतज़ार था.. जब तक आंटी उठतीं.. तब तक मैं ही विनोद से बोला- तू ही चला जा न..

वो बोला- यार मुझे कोई आईडिया नहीं है.. कि कौन सा सामान कहाँ रखा है।

तो मैंने बनावटी हंसी के साथ बोला- ले तेरा घर.. तुझे ही नहीं मालूम.. तुझसे अच्छा तो मैं ही हूँ.. कि घर तेरा और कौन चीज़ कहाँ है.. बस दो ही दिन में जान गया था। आंटी लगता है.. आप इससे कोई काम नहीं लेती हो.. तभी इसे कुछ नहीं मालूम..

फिर तो विनोद खिसियाते हुए बोला- अबे लेक्चर बंद कर.. और लेकर आ.. तब जानूँ..

तो मैं उठा और रसोई में गया.. जहां पहले से ही सब रेडी हो चुका था.. बस बाहर आने की ही देरी थी।

मैं जैसे ही गया तो रूचि बोली- क्या है.. क्या बात कहनी थी?

तो मैं बोला- कैसे भी करो.. हारो.. नहीं तो प्लान चौपट हो सकता है.. विनोद की वजह से.. कहीं वो शर्त से मुकर गया.. तो सब किए-कराए पर पानी फिर जाएगा।

तो वो मेरे और करीब आई और मुस्कुराते हुए मुझे बाँहों में भरकर मेरे होंठों पर चुम्बन देते हुए बोली- जान तेरे लिए तो अब मैं अपना सब कुछ हारने को तैयार हूँ.. फिर ये गेम क्या चीज़ है।

मैंने भी उसके बोबों को भींचते हुए बोला- तो फिर अब चलें..

मेरे अचानक से हुए इस वार से या शायद ज्यादा ही दबाव के कारण.. उसके मुँह से दर्द भरी चीख निकल गई..

तो मैं भी उतनी ही तेज स्वर में बोला- क्या यार.. बच्चों की तरह एक चूहे से डर गई..

यह कहते हुए हम वापस कमरे में पहुंच गए.. जहाँ हम खेल रहे थे।

आंटी रूचि से बोलीं- क्या हुआ.. चीखी क्यों थी?

तो रूचि मुस्कुरा उठी.. इसके पहले कि कोई अपना दिमाग लगाता.. मैंने बोल दिया- क्या आंटी.. रूचि तो बहुत ही डरती है.. जरा सा चूहा पैर से छू कर क्या निकल गया.. ये तो चीख ही पड़ी.. बहुत कमजोर है।

यह कहते हुए मैंने रूचि को देखते हुए आँख मार दी.. जिससे रूचि से रहा न गया और वो शर्मा उठी।

फिर मैंने बोला- ये तो कहो.. चूहे का दिल मजबूत था.. नहीं तो इसकी चीख सुनकर बेचारा वहीं मर जाता।

इतना सुनते ही सब ठहाके लगाकर हँसने लगे।

तभी विनोद रूचि से बोला- अब सबको ड्रिंक्स देगी भी.. या ऐसे ही खड़ी रहेगी..

तो रूचि बोली- थोड़ा तो रुको.. मैं बहुत घबड़ा गई थी। ये तो कहो.. मैं अकेली नहीं थी.. वरना सब गिलास टूट जाते और कांच भी साफ़ करना पड़ता..

फिर वो गिलासों में कोल्डड्रिंक्स डालने लगी और चारों गिलास में भरने के बाद ट्रे हमारी ओर बढ़ाई तो हम लोगों ने ली.. फिर एक उसने माया को दिया और एक खुद ले कर माया आंटी के पास बैठ गई।

तो दोस्तो, आप लोगों ने शायद ध्यान नहीं दिया कि जब से मैंने रूचि को जवानी का पाठ पढ़ाना शुरू किया था.. तब से वो न ही तो मेरा नाम ले रही थी और न ही मुझे अभी तक एक बार भी भैया बोला था।

खैर.. आपको कहानी पर ले चलते हैं.. फिर मैंने उससे बोला- चलो अब ‘ह’ से गो या ‘ह’ से हारी पाओ..

तो वो बोली- अच्छा..

और कुछ सोचने के बाद बोली- माँ मेरी डिक्शनरी लगभग खाली हो रही है.. कुछ आप भी गाओ न..?

तो माया बोली- मुझे जो आते हैं.. मैं गा तो रही हूँ..

और इसी तरह सोचने के कुछ देर बाद बोली- लो फिर… ‘हम तुमसे मोहब्बत करके दिन रात सनम रोते हैं।’

वो ऐसे चेहरे के भाव बना कर गा रही थी.. जैसे कि गाने के जरिये ही मुझे हाल-ए-दिल बयान कर रही हो।

मैं अभी इसी सोच में था कि अचानक विनोद की आवाज़ मेरे कान में पड़ी- देखा साले.. हरा दिया न..

तो मैं बोला- अभी कहाँ..

बोला- तू सोचता ही रहेगा या ‘ह’ से गाएगा भी?

तो मैं बोला- बाबू.. थोड़ा समय तो दे.. बस अभी गाता हूँ।

तभी रूचि बोली- इतनी देर का नहीं चलेगा..

तो मैं बोला- फिर आगे के लिए एक मिनट का समय तय कर लो.. मुझे ऐसा लग ही रहा था कि अब खेल ख़त्म होने की तरफ है.. क्योंकि मुझे गाना ही ऐसा याद आया था.. जिससे शायद उसे उसके गाने का जवाब भी मिल जाता।

तो मैंने गाना शुरू करने के पहले विनोद से बोला- तुम साले.. बस टापने के लिए ही बैठे हो.. या कुछ करोगे भी..?

वो बोला- मैं तुम्हारे ही सहारे खेल रहा हूँ.. तुम्हें तो पता ही है कि ये मेरे बस के बाहर है।

फिर मैंने बोला- चलो.. अब खेल ख़त्म..

रूचि ने सोचा कि मैं हार गया.. वो ख़ुशी से उछल पड़ी… तो मैं बोला- अरे इतनी खुश न हो..

तो वो बोली- आपको हराकर में खुश न हुई.. तो क्या हुआ.. वैसे आज विनोद भैया को गुलाम बनाना है.. ये मुझसे अक्सर बहुत काम लेते हैं।

मैं बोला- परेशान न हो.. मैं ये कह रहा था कि मेरे गाने के बाद खेल ख़त्म हो जाएगा..

मैंने एक आँख मार कर इशारा भी कर दिया ताकि आंटी को भी शक न हो कि मैं और रूचि भी उन्हीं क़े जैसे मिले हुए हैं।

तो रूचि बोली- कैसे?

मैं बोला- खुद ही देख लेना..

मैंने गाना चालू किया- हाल क्या है दिलों का.. न पूछो सनम.. आप का मुस्कुराना गजब ढा गया। एक तो महफ़िल तुम्हारी हंसी कम न थी.. उस पे मेरा तराना गजब ढा गया। हाल क्या है..?

अब चलो.. गाओ ‘है’ से..

थोड़ी देर बाद विनोद बोला- रूचि अभी कुछ देर पहले एक मिनट वाला शायद कुछ कह रही थी न..

ये कहते हुए वो हँसने लगा और मन ही मन हम तीनों भी ये सोच कर हंस रहे थे कि विनोद भी बेवकूफ बनकर खुद ही मदद करने लगा और वो गिनती गिनते हुए रूचि से बोले जा रहा था- अगर तू फंस गई.. तो समझ ले बहुत सारे कपड़े तुझसे धुलाऊँगा.. बहुत दिनों से गंदे पड़े हैं और तू खुद ही जिम्मेदार भी है.. अभी खुद पर बड़ा टशन था न.. अभी हारते ही सबसे पहले तुझे मैं मुर्गा बनाता हूँ।

विनोद की इस बात से आंटी इतना खुश हो रही थीं.. कि कुछ पूछो ही नहीं.. क्योंकि अब कुछ ऐसा बचा ही नहीं था कि विनोद किसी तरह का कोई विरोध करे या बनाए गए प्लान में आपत्ति जताता। उन्होंने मेरी और मुस्कुराते हुए देखकर फेसबुक की लाइक बटन की तरह अपने हाथों से इशारा किया.. जिससे मुझे लगा कि जैसे आज मेरी इच्छा नहीं बल्कि आंटी की इच्छा पूरी होने वाली है।

वैसे दोस्तो, आप सभी को मेरा प्लान कैसा लगा?

हो सके तो जरूर बताइएगा।

 
फिर विनोद गिनतियाँ गिनने के साथ साथ रूचि को भी चिढ़ाए जा रहा था और इसी तरह रूचि की टीम हार गई.. जिसकी ख़ुशी शायद मुझसे ज्यादा विनोद को हो रही थी.. क्योंकि यह आप लोग समझते ही होंगे कि भाई-बहन के बीच होने वाली नोंकझोंक का अपना एक अलग ही मज़ा है।

अब उनकी नोंकझोंक से हमें क्या लेना-देना। जैसे-तैसे हार के बाद बारी आई कि आज कौन किसके साथ रहेगा।

तो विनोद बोला- इसमें कौन सी पूछने वाली बात है.. आज रूचि मेरी गुलाम है।

तो रूचि बोली- आप चुप रहो.. यह फैसला कप्तान का होगा।

मैंने भी बोल दिया- अरे अब विनोद की आज की इच्छा यही है.. तुम उसकी गुलाम बनो.. तो मैं कैसे मना कर सकता हूँ।

जिस पर रूचि ने मेरी ओर देखते-देखते आँखों से ही नाराजगी जाहिर की.. जैसे मानो कहना चाह रही हो कि इससे अच्छा मैं ही जीतती। क्योंकि उसकी भी यही इच्छा थी कि उसे आज ही वो सब मिले.. जिसे उसने सपनों में महसूस किया था।

खैर.. जो होना था.. सो हो चुका था।

तभी विनोद बोला- लाल मेरी.. तैयार हो जा.. सुबह तक तू मेरी गुलाम बनेगी.. और जैसा मैं चाहूंगा.. वैसा ही करेगी.. क्यों राहुल ऐसी ही शर्त थी न..

तो मैं विनोद की ओर मुस्कुराता हुआ बोला- हाँ.. ठीक समझे.. अब आंटी मेरी गुलाम.. और रूचि तेरी..

इस पर रूचि नाक मुँह सिकोड़ते हुए अचकचे मन से विनोद से बोली- चल देखती हूँ.. आज कितने दिनों का बदला लेते हो..

यह कहते हुए वो अपने कमरे की ओर चल दी और आंटी अपने कमरे की ओर..

तभी विनोद बोला- देख आज जम के काम कराऊँगा रूचि से.. कल देखना अलमारी और कमरा कैसा दिखता है..

कहते हुए विनोद भी अपने कमरे की ओर चल दिया और शर्त के मुताबिक मैं आंटी के रूम की ओर चला गया।

फिर जैसे ही मैंने कमरा खोला.. तो आंटी बिस्तर पर ऐसे बैठी हुई थीं.. कि जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रही हों।

मैंने भी फ़ौरन दरवाज़ा अन्दर से बन्द किया और जैसे ही मैं मुड़ा.. तो मैंने पाया कि आंटी अपने दोनों हाथ फैलाए मेरी ओर देखते हुए ऐसे खिलखिला रही थीं.. जैसे सावन में मोर..

मैं भी अपनी बाँहें खोल कर उनके पास गया और उन्हें उठा कर हम दोनों आलिंगनबद्ध हो गए।

ऐसा लग रहा था.. मानो समय ठहर सा गया हो.. कब मेरे होंठ उनके होंठों पर आकर ठहर गए और मेरा बायां हाथ उनकी कमर में से होकर उनके चूतड़ों को मसकने के साथ-साथ दायां हाथ उनके मम्मों की सेवा करने लगा।

आंटी और मैं इतना बहक गए थे कि दोनों में से किसी को भी इतना होश न रहा कि घर में उनके जवान बेटे और बेटी भी हैं।

मैं और वो.. हम दोनों बड़ी तल्लीनता के साथ एक-दूसरे के होंठों को चूस रहे थे और एक पल के लिए भी होंठ हट जाते तो ‘पुच्च’ की आवाज़ के साथ दोबारा चिपक जाते।

अब आप लोग समझ ही सकते हैं कि हमारी चुम्बन क्रिया कितनी गर्मजोशी के साथ चल रही थी।

 
माया आंटी तो इतना बहक गई थीं कि मात्र मेरे चुम्बन और साथ-साथ गांड और चूची के रगड़ने मात्र से ही झड़ गईं..

जब उनका चूतरस स्खलित हुआ तो उनके होंठ स्वतः ही मेरे होंठों से जुदा हुए और एक गहरी.. ‘श्ह्ह्हीईईई ईईईई..’ सीत्कार के साथ बंद आँखों से चेहरा ऊपर को उठाए झड़ने लगीं।

उस पल उनके सौंदर्य को मैं जब कभी याद कर लेता हूँ.. तो अपने लौड़े को हिलाए बिना नहीं रह पाता।

क्या गजब का नज़ारा था.. चेहरे पर ख़ुशी के भाव.. होंठ चूसने से होंठों पर लालिमा.. और अच्छे स्खलन की वजह से उनके माथे पर पसीने बूँदें.. उनके सौंदर्य पर चार चाँद रही थीं..

मैं तो उनके इस सौंदर्य को देखकर स्तब्ध सा रह गया था।

तभी उन्होंने चैन की सांस लेते हुए आँखें खोलीं और मुझे अपने में खोया हुआ पाया।

तो उन्होंने मेरे लौड़े को मसलते हुए बोला- राहुल मेरी जान.. किधर खो गया?

उनकी इस हरकत से मैं भी ख्वाबों की दुनिया से बाहर आता हुआ बोला- आई लव यू माया डार्लिंग.. तुम कितनी प्यारी हो.. पर ये क्या.. तुम तो पहले ही बह गईं।

तो उन्होंने नीचे झुककर मेरे लोअर को नीचे सरकाया और मेरी वी-शेप्ड चड्डी के कोने में अपनी दो उंगलियां घुसेड़ कर मेरे पप्पू महान को.. जो की रॉड की तरह तन्नाया हुआ था.. उसे अपने दूसरे हाथ की उँगलियों से पकड़कर बाहर निकाला।

उन्होंने मेरे लौड़े के ऊपर की चमड़ी को खिसकाया ही था.. तभी मैंने देखा कि जैसे मेरे लौड़े के टोपे में मस्ती और चमक दिख रही थी.. ठीक वैसे ही उनके चेहरे पर चमक और होंठों पर मस्ती झलक रही थी।

फिर उन्होंने मेरे सुपाड़े को लॉलीपॉप की तरह एक ही बार में ‘गप्प’ से अपने मुँह में घुसेड़ लिया और अगले ही पल निकाल भी दिया। शायद उन्होंने मेरे लौड़े के सुपाड़े को मुँह में लेने के पहले से ही थूक का ढेर जमा लिया था.. जिसके परिणाम स्वरूप मेरी तोप एकदम ‘ग्लॉसी पिंक’ नज़र आने लगा था।

जिसे देख कर माया ने हल्का सा चुम्बन लिया और मेरे लौड़े को मुठियाते हुए बोली- राहुल.. तेरे इस लौड़े का कमाल है.. जो मुझे खड़े-खड़े ही झाड़ दिया.. पता नहीं.. इसके बिना अब मैं कैसे रह पाऊँगी।

मैं बोला- आप परेशान न हों.. मैं हूँ न.. मैं कभी भी आपको इसकी कमी न खलने दूंगा..ु

कहते हुए मैंने अपने दोनों हाथों को उनके सर के पीछे कुछ इस तरह जमाया.. जिससे मेरे दोनों अंगूठे उनके दोनों कानों के पिछले हिस्से को सहला सकें और इसी के साथ ही साथ मैंने अपने लौड़े को उनके होंठों पर ठोकर देते हुए सटा दिया..

जिसका माया ने भी बखूबी स्वागत करते हुए अपने होंठों को चौड़ा करते हुए मेरे चमचमाते सुपाड़े को अपने मुख रूपी गुफा में दबा सा लिया।

अब अपने एक हाथ से वो मेरे लौड़े को मुठिया रही थी और दूसरे हाथ से मेरे आण्डों को सहलाए जा रही थी।

मुझे इस तरह की चुसाई में बहुत आनन्द आ रहा था। वो काफी अनुभवी तरीके से मेरे लौड़े को हाथों से मसलते हुए अपने मुँह में भर-भर कर चूसे जा रही थी जिससे कमरे में उसकी मादक ‘गूँगूँ.. गूँगूँ..’ की आवाज़ गूंज रही थी।

वो बीच-बीच में कभी मेरे लौड़े को जड़ तक अपने मुँह में भर लेती.. जिससे मेरा रोम-रोम झनझना उठता।

हाय.. क्या क़यामत की घड़ी थी वो.. जिसे शब्दों में लिख पाना सरल नहीं है।

 
उनकी इस मस्त तरीके की चुसाई से मैं अपने जोश पर जैसे-तैसे काबू पा ही पाया था कि उसने भी अनुभवी की तरह अपना पैंतरा बदल दिया।

अब उसने मेरे लौड़े पूरा बाहर निकाला और उस पर ढेर सारा थूक लगा कर अपनी जुबान से कुल्फी की तरह मेरे सुपाड़े पर अपनी क्रीम रूपी थूक से पौलिश करने लगी।

इसके साथ ही वो.. जहाँ से लौड़े का टांका टूटता है.. वहाँ अपनी उँगलियों से धीरे-धीरे कुरेदने लगी।

मैं लगातार ‘अह्ह्ह्ह ह्ह्ह.. श्ह्ह्ह्ह्ह्ही.. स्सीईईईई.. आआआअह’ रूपी ‘आहें’ भरे जा रहा था।

माया का अंदाज़ ही निराला था.. उसको देखकर लग रहा था कि यदि मैं अभी नहीं झड़ा तो कहीं ये मेरे बर्फ सामान कठोर लौड़े को चूस-चूस कर खा ही डालेगी.. तो मैंने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा- जान.. क्या बात है.. आज तो बहुत मज़ा दे रही हो.. क्या इरादा है..?

तो वो नशीले और कामुक अन्दाज में लौड़े को मुँह से बाहर निकाल कर बोली- जानी.. इरादे तो नेक हैं.. पर तेरा औजार उससे भी ज्यादा महान है.. मैं इसके बिना आज सुबह से तड़प रही थी.. दो दिनों में ही तूने मुझे इसकी लत सी लगा दी है.. मैं क्या करूँ..

यह कहते ही उसने फिर से मेरे लौड़े को ‘गप्प’ से मुँह में ले लिया।

मुझे ऐसा लग रहा था.. जैसे मेरा लौड़ा सागर में डुबकी लगा रहा हो। यार.. इतना अच्छा आज के पहले मुझे कभी नहीं लगा था। वो अलग बात है रूचि ने अनाड़ीपन के चलते जो किया.. वो भी अच्छा था.. पर इसका कोई जवाब ही नहीं था।

ऐसा मुख-चोदन मैंने सिर्फ ब्लू-फिल्म में ही देखा था।

अब उसका हाथ रफ़्तार पकड़ने लगा था अब वह तेज़ी मुठियाते हुए मेरे लौड़े को गपागप मुँह में लिए जा रही थी। जिससे मेरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई और उसके इस हमले के प्रतिउत्तर में मैंने भी जोश में आकर उसे जवाब देना चालू किया।

मैंने भी उसके बालों सहित उसके सर को कसते हुए अपने लौड़े को तेज़ी के साथ मुँह में अन्दर-बाहर करते हुए ‘शीईईई आअहह्ह्ह.. शीईईईइं.. अह्हह्ह’ करने लगा।

मेरे तेज़ प्रहारों के कारण माया ने भी एक अनुभवी चुद्दकड़ की तरह मेरे लौड़े को मुँह फैला कर अपने होठों के कसावट की कैद से आज़ाद कर दिया। मानो कि अब मेरी बारी हो और उनके बालों के कसने से और लौड़े के तेज़ प्रहार से अब आवाज़ें बदल गई थीं।

अब ‘गूँगूँ..गूँगूँ..’ की जगह ‘मऊआआआ.. मुआआआअ..’ की आवाजें आने लगी थीं। उनके मुँह से उनका थूक झाग बन कर उनकी चूचियों और जमीन पर गिरने लगा।

अब मानो कमान मेरे हाथों में थी.. तो मैंने भी बिना रुके कस-कस कर धक्के लगाने आरम्भ किए और उन्हें अपना पुरुषत्व दिखाने लगा।

वो भी हार नहीं मान रही थी.. मैं जितनी जोर से अन्दर डालता.. उसके चेहरे पर ख़ुशी के साथ-साथ अजीब सी चमक दिखने लगी थी।

मैं भी अब अपने लौड़े को कभी-कभी पूरा निकालता और पूरा का पूरा उसके मुँह में घुसेड़ देता.. जिससे उसकी आँखें बाहर निकल जातीं और मुझे ऐसा लगता जैसे मेरा लौड़ा उसकी बच्चे-दानी से टकरा गया हो।

उसकी हालत ख़राब देख कर मैंने थोड़ी देर के लिए लौड़े को बाहर निकाला।

अब मैंने लौड़े को उसके होंठों पर घिसने लगा.. और बीच-बीच में मुँह में ऐसे डालकर निकालता.. जैसे कांच वाली बोतल में अंगूठा घुसेड़ कर निकालो.. तो ‘पक्क’ की आवाज़ होती है.. ठीक उसी तरह..

अब मैं भी उसके मुँह से खेलते हुए आनन्द के सागर में गोते लगाने लगा था और अचानक ही मैंने देखा कि ये क्या मेरे लण्ड में खून की इतनी मात्रा आ चुकी थी कि वो पूरा लाल हो गया था.. तो मैंने सोचा क्यों न आंटी का भी मुँह लाल किया जाए।

तो मैंने भी पूरे जोश के साथ उसके मुँह की एक बार गहराई और नापी.. जिससे उसका मुँह ‘अह्ह्ह्ह’ के साथ खुल गया और उसने मेरी जांघ पर चिकोटी काट ली.. चूंकि दर्द से उसका गला भी भर आया था।

फिर मैंने अपने पूरा लौड़ा बाहर निकाला और उसे पकड़कर उनके गालों पर लण्ड-चपत लगाने लगा। कभी बाएं तो कभी दाएं गाल पर लौड़े की थापें पड़ रही थीं।

इससे आंटी और मेरा दोनों का ही जोश बढ़ रहा था। अब इस तरह चपत लगाने से माया के थूक की चिकनाई जा चुकी थी.. जिससे मेरे लिंग मुंड पर कसावट से दर्द सा होने लगा था..

मैंने उन्हें बोला- अब मुँह खोलो..

तो उसने वैसा ही किया.. मैं बोला- बस ऐसे ही करे रहना.. और हो सके तो थोड़ा थूक भर लो।

तो उन्होंने ‘हाँ’ में सर हिला दिया और मैंने भी स्ट्रोक लगाना चालू किया.. पर अब मैं ऐसे धक्के दे रहा था.. जो मेरे साथ साथ माया को भी मज़ा दे रहे थे और मुझे ऐसा लग रहा था.. जैसे मैं मुँह नहीं.. बल्कि उसकी चूत चोद रहा होऊँ.. देखते ही देखते मेरे स्खलन का पड़ाव अब नज़दीक आ गया था।

 


आंटी के जो हाथ मेरी जांघों में थे.. वो अब मेरे लौड़े पर आ गए थे.. क्योंकि वो मेरे शरीर की अकड़न से पहचान चुकी थी कि अब मेरी मलाई फेंकने की मंजिल दूर नहीं है.. शायद इसीलिए अब मेरे लण्ड की कमान उन्होंने मजबूती से सम्हाल ली थी। वो बहुत आराम व प्यार के साथ-साथ अपने मुँह में लौड़ा लेते हुए मेरी आँखों में आँखें डालकर बिल्कुल Sophi Dee की तरह रगड़े जा रही थीं।

इसी तरह देखते ही देखते मैं कब झड़ गया.. मुझे होश ही न रहा और झड़ने के साथ-साथ ‘अहह… आआअह्ह्ह ह्ह्ह..’ निकल गई।

मेरे लण्ड-रस को माया ने मुझे देखते हुए बड़े चाव के साथ बहुत ही सेक्सी अंदाज़ में गटक लिया।

मैंने भी अपनी स्पीड के साथ-साथ अपने हाथों की कसावट को भी छोड़ दिया.. जो कि उसके सर के पीछे बालों में घुसे थे।

मैं अपने इस स्वस्थ्य स्खलन का मज़ा बंद आँखों से चेहरे पर पसीने की बूंदों के साथ ले रहा था।

मुझे होश तो तब आया.. जब माया आंटी ने मेरे लौड़े को चाट कर साफ़ किया और फिर अपने पल्लू से पोंछकर उसकी पुच्ची ली.. पर इस सबसे मुझे बेखबर पाकर उसने मेरे मुरझाए लौड़े पर हौले-हौले से काटना चालू कर दिया.. तब जाकर मेरी तन्द्रा टूटी।

फिर मैंने उन्हें उठाया और कहा- क्या यार.. इतना मज़ा दे दिया कि मेरी तो ऑंखें ही नहीं खुल रही हैं.. मन कर रहा है.. बस तुम्हें बाँहों में लेकर लेट जाऊँ।

तो माया मुस्कुराते हुए बोली- खबरदार.. जो सोने की बात की.. आज मैं तुम्हें सोने नहीं दे सकती.. पर हाँ.. तुम कल दिन और रात में सो सकते हो.. क्योंकि वैसे भी कल मेरे साथ नहीं रहोगे.. तो आज क्यों न हम जी भर के इस मौके का फायदा उठाते हुए मज़ा ले लें..।

तभी बाहर से तेज़ी का शोर-शराबा सुनाई देने लगा.. जो रूचि और विनोद के बीच में हो रही नोंक-झोंक का था।

सब कुछ ठीक से साफ़ सुनाई तो नहीं दे रहा था.. पर आवाजें आ रही थीं.. तो माया बोली- तू बाहर जा कर देख.. क्या चल रहा है.. मैं अभी कपड़े बदल कर आई।

तो मैंने उनके गालों पर चुम्बन लेते हुए बोला- कुछ अच्छा सा ड्रेस-अप करना.. जो कि सेक्सी फीलिंग दे।

वो मुस्कराते हुए बोली- चल मेरे आशिक़.. बाहर देख वरना पड़ोसी इकट्ठे हो जायेंगे।

मैंने अपनी हालत को सुधार कर अपने कपड़े ठीक किए और चल दिया उनके कमरे की ओर.. जिसका रास्ता हॉल से हो कर जाता है।

जब मैं कमरे के पास पहुँचा.. तो मैंने सुना कि काम को लेकर झगड़ा हो रहा है।

दोस्तों ये काम.. वासना वाला काम नहीं बल्कि नौकरों वाले काम को लेकर दोनों झगड़ रहे थे।

मैंने दरवाज़ा खटखटाया.. वो लोग अभी भी लड़ने में पड़े थे.. शायद उन्होंने अपनी लड़ाई के चलते ध्यान न दिया हो.. क्योंकि मैंने भी आहिस्ते से ही खटखटाया था..

मैंने पुनः तेज़ी से विनोद को बुलाते हुए खटखटाया.. तभी विनोद बोला- क्या है?

तो मैं बोला- दरवाज़ा खोलेगा या बस अन्दर से ही बोलेगा.. ये मैं बोल ही रहा था कि अचानक से रूचि ने दरवाज़ा खोल दिया और जैसे मेरी नज़र रूचि पर पड़ी.. तो मैं देखता ही रह गया।

इस समय उसने भी रात के कपड़े पहन लिए थे।

आज के कपड़े कुछ ज्यादा ही सेक्सी और बोल्ड थे.. जिसमें वो एकदम पटाखा टाइप का माल लग रही थी। उसको देख कर मेरे लौड़े में फिर से उभार आने लगा।

खैर.. आप लोग माया की ममता तो देख ही चुके हैं.. अब रूचि के स्वरुप का वर्णन के लिए अपने लौड़े को थाम कर कहानी के अगले भाग का इंतज़ार कीजिएगा..।
 
फिर मैं अपने आपको सम्हालते हुए अपनी जेब में हाथ डालकर लौड़े को सही करने लगा.. क्योंकि उस समय मैंने सिर्फ लोअर ही पहन रखा था।

मैं जल्दबाज़ी में चड्डी पहनना ही भूल गया था.. तभी मैंने अपने लण्ड को एडजस्ट करते हुए ज्यों ही रूचि की ओर देखा.. तो उसके भी चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान छा चुकी थी.. शायद उसने भी मेरे उभार को महसूस कर लिया था।

मैंने भी उसी समय उससे पूछा- क्या हुआ.. तुम लोग क्यों झगड़ रहे हो?

तो वो बोली- आपको क्या.. आप तो आराम से सोने चले गए.. पर मुझे भाई ने अभी तक काम पर लगाए रखा है.. हद होती है किसी चीज़ की.. पहले अलमारी सही कराई.. मैंने कर दी.. अब इतनी रात को बोल रहा है कि चलो ये कपड़े भी धोओ.. तो मैं बिना कुछ कहे कपड़े मशीन में डालने लगी.. तो बोला मशीन से नहीं.. हाथ से धोओ.. ये भी कोई बात हुई क्या.?

तो मैंने भी बोला- हाँ.. कह तो सही रही हो.. मैं विनोद को समझाता हूँ।

तब तक माया भी वहाँ नाईटी में आ गई.. और मामले को रूचि से समझने लगी।

मैं विनोद के पास बैठकर उसे समझाने में लगा हुआ था कि यार ऐसा न कर.. माना कि हम जीते हैं.. पर है तो वो तेरी बहन ही न.. आराम से काम ले.. जितना आज हो सके उससे.. आज करा.. बाकी कल छोड़कर परसों फिर से करा लियो.. अभी बहुत समय है.. क्यों इतना जल्दिया रहा है.. और वो तो कर भी रही है.. तो उसे अपने हिसाब से करने दे।

विनोद बोला- हाँ यार.. गलती मेरी ही है.. कुछ ज्यादा ही हो गया था शायद.. चल अब नहीं होगा।

तब तक माया भी आई और विनोद से कुछ कहती.. इसके पहले ही मैंने बोला- आंटी.. अब जाने दो.. जो हुआ सो हुआ.. अब कुछ नहीं होगा.. मैंने समझा दिया है।

तो रूचि बोली- अबकी ऐसा हुआ न.. तो मुझे विनोद भाई के साथ नहीं रहना..

मैंने भी बात को सम्हालने के लिए हँसते हुए रूचि से बोला- ओह्हओ.. झाँसी की रानी.. अब ज्यादा न भाव खा.. मैंने उसे समझा दिया है.. अब तंग नहीं करेगा.. जा और जाकर सो जा..

तो वो बोली- अब आप कह रहे हो.. तो कोई नहीं.. पर इससे बोल दियो कि आगे से मैं अपने हिसाब से ही काम करूँगी।

मैंने बोला- ठीक है.. जाओ अब.. तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी.. तुम सो जाओ।

तो वो बोली- ठीक है..

मैं और माया भी कमरे से निकलने लगे।

मैं तो सीधा कमरे में जा कर लेट गया.. पर माया शायद फिर से दरवाज़े के बाहर खड़े हो कर दोनों को समझाने में लगी हुई थी।

अब उसे समझाने दो.. तब तक मैं आपको बताता हूँ कि रूचि में ऐसा मैंने क्या देख लिया था.. जो मेरा लौड़ा फिर से चौड़ा होने लगा था। तो आपको बता दूँ जैसे दरवाज़ा खुला.. तो मेरी पहली नज़र रूचि की जाँघों पर पड़ी.. जो कि चुस्त लैगीज से ढकी थी.. उसकी दूधिया जाँघें उसमें से साफ़ झलक रही थीं और जब मेरी नज़र उसके योनि की तरफ पहुंची तो मैं देखता ही रह गया.. उसने आज नीचे चड्डी नहीं पहने हुई थी। जिससे उसकी चूत भी फूली हुई एकदम गुजिया जैसी साफ़ झलक रही थी।

मैं तो देखते ही खुद पर से कंट्रोल खो बैठा था.. अगर शायद उस वक़्त विनोद वहाँ न होता तो मैं उसकी गुजिया का सारा मीठापन चूस जाता। फिर जब मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी तो वो किसी परी की तरह नज़र आ रही थी। उसके बाल पोनी टेल की तरह बंधे हुए थे और बालों की लेज़र कट उसे खूबसूरत बना रही थी। उसके होंठ भी गजब के लग रहे थे.. मेरा तो जी कर रहा था कि मैं इनका रस अभी चूस लूँ.. मसल के रख दूँ उसकी अल्हड जवानी को।

पर मैं दोस्त के रहते ऐसा कर न सका। हाँ.. इतना जरूर हुआ कि वो भी मेरी चक्षु-चुदाई से बच न सकी.. आँखों ही आँखों में मैंने उसे अपने अन्दर चल रहे उफान को जाहिर कर दिया था.. जिसे रूचि ने मेरे अकड़ते लंड को देखकर जान लिया था। उसकी मुस्कराहट उस पर मोहर का काम कर गई थी।

उस समय उसके चूचे तो क़यामत लग रहे थे। वो टी-शर्ट तो नहीं.. पर हाँ उसके जैसा ही ट्यूनिक जैसा कुछ पहना हुआ था.. जिसमें उसकी चूचियों का उभार आसमान छूने को मचल रहा था। उसकी इस भरी जवानी का मैं कायल सा हो गया था और इन्हीं बातों को सोचते-सोचते मेरी आँखें बंद हो चली थीं।

मेरा हाथ मेरे सामान को सहला रहा था कि तभी माया आंटी अन्दर आईं और ‘धम्म’ से दरवाज़ा बंद किया।

इसी के साथ में स्वप्न की दुनिया से बाहर आया।

अब आगे क्या हुआ यह जानने के लिए उसके वर्णन के लिए अपने लौड़े को थाम कर कहानी के अगले भाग का इंतज़ार कीजिएगा।

तब तक के लिए आप सभी को राहुल की ओर से गीला अभिनन्दन।

 
जैसे ही मेरी आँखें खुलीं.. तो मैंने आंटी का मुस्कुराता हुआ चेहरा सामने पाया..

मैंने उनसे पूछा- क्या हुआ.. आप इतना मुस्कुरा क्यों रही हो?

तो वो बोलीं- बस ऐसे ही..

मैं बोला- अच्छा.. ऐसा भी भला होता है क्या?

तो वो बोलीं- तुम सो गए थे क्या?

मैंने भी बोला- नहीं.. बस आँखें बंद किए हुए लेटा था..

तो वो बोलीं- क्यों?

मैंने भी बोल दिया- बस ऐसे ही..

बोलीं- तुम भी न.. चूकते नहीं हो.. तुरंत ही कुछ न कुछ कर ही देते हो..

तो मैं बोला- तो फिर बताओ न.. कि अभी क्यों हँस रही थीं?

वो बोलीं- अरे मैं तो इसलिए हँस रही थी.. क्योंकि तुम ऐसे लेटे हुए थे जैसे काफ़ी थक गए हो..

मैं तुरंत ही उठा और उनके चूचे मसलते हुए बोला- अब इनके बारे में क्या सोचोगी।

तो उन्होंने बिना बोले ही अपनी नाइटी उतार दी और मेरे गालों को चूमते हुए मेरे सीने तक आईं और फिर दोबारा ऊपर जाते हुए मेरी गरदन पर अपनी जुबान को फेरते हुए धीरे से बोलीं- अब सोचना नहीं बल्कि करना है.. आज ऐसा चोदो कि मेरा ख़ुद पर काबू न रहे..

तभी एकाएक झटके से मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया और उनके ऊपर आ कर उनके होंठों को चूसने लगा।

अब माया भी मेरा भरपूर साथ दे रही थी.. लगातार उसके हाथ मेरी पीठ सहला रहे थे.. उसकी चूत मेरा औज़ार से रगड़ खा रही थी और उसकी टाँगें मेरी कमर पर बँधी हुई थीं।

उसके गुलाबी होंठ मेरे होंठों को चूस और काट कर रहे थे.. माहौल अब इतना रंगीन हो चुका था कि दोनों को भी रुकने का मन नहीं था। अगर कुछ था तो वो था जज्बा.. एक-दूसरे को हासिल करने का।

तभी माया ने देर न लगाते हुए अपने हाथों को मेरे लोवर पर रख दिया और धीरे से उसे नीचे की ओर खींचने लगी।

मैं भी अपने आप को संभालते हुआ खड़ा हुआ और अपना लोवर उतार दिया।

मेरे लोवर उतारते ही आंटी ने मेरा हाथ खींचकर मुझे नीचे लिटा दिया और अपने हाथों से मेरे औज़ार को सहलाते हुए एक शरारती और कातिल मुस्कान दी।

तो मैंने भी उनके मम्मे भींच दिए जिसका उन्हें शायद कोई अंदाजा न था तो उनके मुँह से चीख निकल गई ‘आहह्ह्ह्ह..’

इसी के साथ ही मैंने उनके चूचे छोड़ दिए मेरे चूचे छोड़ते ही वो बोलीं- तूने तो आज जान ही निकाल दी।

वो अपने चूचे को मेरी ओर दिखाते हुए बोलीं- देख तूने इसे लाल कर दिया.. इतनी बेरहमी अच्छी नहीं होती.. आराम से किया कर न..

तो मैंने उनके उसी चूचे के निप्पल को अपनी जुबान से सहलाते हुए बोला- धोखा हो जाता है.. कभी-कभी तेज़ी में गाड़ी चलाते समय तुरंत ब्रेक नहीं लग पाती..

इसी तरह वो झुकी और उन्होंने मेरे होंठों को चूसते हुए पोजीशन में आने लगीं।

मतलब कि उन्होंने मेरे ऊपर लेटते हुए होंठों को चूसते हुए अपने घुटनों को मेरी कमर के बाज़ू पर रखा और चूसने लगीं।

इस चुसाई से मैं इतना बेखबर हो चुका था कि मुझे होश ही न रहा कि कब उन्होंने अपनी कमर उठाई और मेरे सामान को अपनी चूत रूपी सोख्ते से सोख लिया।

उनकी चूत इतनी रसभरी थी और मेरे से चुद-चुद कर उसने मेरे लण्ड की मोटाई भाँप कर मुँह फैलाने लगी थी।

तभी उन्होंने धीरे-धीरे मेरे औज़ार को अन्दर लेते हुए आधा घुसवाया और पुनः बाहर थोड़ा सा निकालकर तेज़ी से जड़ तक निगल लिया।

जिससे मेरे औज़ार ने भी उनकी बच्चेदानी में चोट पहुँचाते हुए उनके मुँह से ‘शीईईई ईएऐ..’ की चीख निकलवा दी।

इसी के साथ उनका दर्द के कारण चुदने का भूत कुछ कम हो गया।

अब मैंने होश में आते हुए अपने दोनों हाथों को उनकी कमर पर जमा दिए.. फिर तभी मैंने हल्का सा सर को ऊपर उठाया और उनकी गरदन को चूसते हुए फुसफुसाती आवाज़ के साथ कहा- अभी आप आगे का मोर्चा लोगी.. या मैं ही कुछ करूँ?

तो वे भी सिसियाते हुए मुझे चूमने लगीं.. और धीरे-धीरे ‘लव-बाइट’ करते हुए अपनी कमर को ऊपर-नीचे करने लगीं।

वे अपने दोनों हाथों को मेरे कन्धे पर टिका कर आराम से चुदाई का आनन्द लेते हुए सिसियाए जा रही थीं ‘आअह्ह्ह.. शीएऐसीईईई..’

मेरे हाथ उनकी पीठ को ऊपर से नीचे की ओर सहला रहे थे और जैसे ही मेरा हाथ उनके चूतड़ों के पास पहुँचता तो मैं उस पर हल्की सी चमेट जड़ देता.. जिससे उनका और मेरा दोनों का ही जोश बढ़ जाता और मुँह से ‘अह्ह्ह्ह..’ की आवाज़ निकल जाती।

इसी तरह मज़े से हमारी चुदाई कुछ देर चली कि अचानक से माया ने अपनी कमर को तेज़ी से मेरी जाँघों पर पटकते हुए मुँह से तरह-तरह की आवाजें निकालना आरम्भ कर दीं ‘अह्ह ह्ह्ह्ह… ऊओऔ.. अम्म म्म्मम.. श्हि.. ऊओह्ह्ह.. ऊऊऊ.. ह्ह्ह्ह्ह..’

जिसके परिणाम स्वरूप मुझे ये समझते हुए देर न लगी कि अब ये अपनी मंज़िल से कुछ पल ही दूर है।

मेरे देखते ही देखते उनके आंखों की चमक उनकी पलकों से ढकने लगी।

‘अह्ह्ह.. आह..’ करते हुए आनन्द के अन्तिम पलों को अपनी आँखों में समेटने लगीं।

उस दिन उनको उनकी जिंदगी में पहली बार इतना बड़ा चरमानन्द आया था.. जो कि उन्होंने बाद में मुझे बताया था।

अब इसके पीछे एक छोटा सा कारण था जो कि मैं आगे बताऊँगा.. अभी आप चुदाई का आनन्द लें।

उनके स्खलन के ठीक बाद मैंने अपनी जाँघों पर गीलापन महसूस किया और इसी के साथ वो अपनी आँखें बंद किए हुए ही मेरे सीने पर सर टिका कर निढाल हो गईं।

मैं उनके माथे को चूमते हुए उनकी चूचियों को दबाने लगा.. जिसे वो छुड़ाने के लिए वो अपनी कोहनी से मेरे हाथ को हटाने लगीं।

मैंने पूछा- क्या हुआ?

तो वो बोलीं- कुछ नहीं.. बस ऐसा लग रहा है.. आज मैं काफी हल्का महसूस कर रही हूँ.. अब बस तुम कहीं भी छू रहे हो तो गुदगुदी सी लग रही है।

मैंने बोला- अच्छा.. तुम्हारा तो हो गया.. पर मेरा अभी बाकी है.. तो क्या मुँह से करोगी?

तो बोलीं- नहीं.. अब मैं कुछ देर हिल भी नहीं सकती.. पर हाँ तुम्हारे लिए मैं एक काम करती हूँ.. थोड़ा कमर उठा लेती हूँ.. तुम नीचे से धक्के लगा लो।

तो मैंने ‘हाँ’ में सर हिला दिया.. तभी उन्होंने अपनी कमर को हल्का सा उचका लिया और अपने मुँह को मेरी गरदन और कंधों के बीच खाली जगह पर ले जाते हुए पलंग के गद्दे से सटा दिया ताकि उनके मुँह की आवाज़ तेज़ न निकले।

अब बारी मेरी थी.. तो मैंने भी उनकी पीठ पर अपने हाथों से फन्दा बनाते हुए अपनी छाती से चिपकाया और तेज़ी से पूरे जोश के साथ अपनी कमर उठा-उठा कर उनकी चूत की ठुकाई चालू कर दी।

इससे जब मेरा लौड़ा चूत में अन्दर जाता तो उनका मुँह थोड़ा ऊपर को उठता और ‘आह ह्ह्ह्ह..’ के साथ वापस अपनी जगह चला जाता। इस बीच उनके मुँह से जो गर्म साँसें निकलतीं.. वो मेरे कन्धे और गरदन से टकरातीं.. जिससे मेरा शरीर गनगना उठता।

‘अह्ह्ह ह्हह्ह.. श्ह्ह्ह्ह.. और तेज़.. फिर से होने वाला है..’ उनकी इस तरह की आवाजें सुनकर मेरा जोश बढ़ता ही चला जा रहा था।

अब शायद उनमें फिर से जोश चढ़ने लगा था.. क्योंकि अब वो भी अपनी कमर हिलाने लगी थीं.. पर मैंने चैक करने लिए उसके चूचे फिर से दबाने चालू किए और इस बार उन्होंने मना नहीं किया।

जबकि पहले वहाँ हाथ भी नहीं रखने दे रही थीं.. पर मैं अब फिर से भरपूर तरीके से उसके मम्मे मसल रहा था।

तभी अचानक वो फिर से झड़ गईं.. तो फिर मैंने उसे अपने नीचे लिटाया और फुल स्ट्रोक के साथ चोदने लगा। फिर कुछ ही धक्कों के बाद ही मेरी भी आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया और माया की बांहों में खोते हुए उसके सीने से अपने सर को टिका दिया।

अब माया मेरी पीठ सहलाते हुए मेरे माथे को चूमे जा रही थी और जहाँ कुछ देर पहले ‘अह्ह हह्ह्ह्ह.. श्ह्ह्ही.. ईईएऐ.. ऊऊओह.. फक्च.. फ्छ्झ.. पुच.. पुक..’ की आवाजें आ रही थीं.. वहीं अब इतनी शांति पसर चुकी थी.. कि सुई भी गिरे तो उसके खनकने आवाज़ सुनी जा सकती थी।

 
फिर जब कुछ देर बाद मेरी साँसें थमी तो मैं उनके ऊपर से हटा और अपना लौड़ा साफ़ करने के लिए उनकी पैन्टी खोजने लगा.. तभी मेरी नज़र उनकी चूत के नीचे की ओर चादर पर पड़ी तो मैंने पाया कि चादर इतना ज्यादा भीगी हुई थी कि लग ही नहीं रहा था कि यह चूत रस से भीगी है। मुझे लगा कि शायद इन्होंने मूत ही दिया है.. तो मैं बिना बोले उठा और अटैच्ड वाशरूम में जाकर अपने लौड़े को साफ़ करने लगा।

क्योंकि मेरे मन में बहुत अजीब सी फीलिंग आ रही थी कि क्या वाकयी में माया को होश न रहा था और उसने वहीं सुसू कर दी..

खैर.. मैंने अच्छे से अपने औजार नुमा लिंग को धोकर चमकाया और वापस बिस्तर की ओर चल दिया।

जैसे ही मैं बिस्तर के पास पहुँचा.. तो उन्होंने मेरे से पूछा- क्या हुआ.. कहाँ गए थे?

तो मैंने उन्हें बोला- लौड़ा साफ़ करने गया था।

वो बोली- यहीं कपड़े से पोंछ लेते न.. जाने की क्या जरुरत थी.. तू तो हमेशा मेरी पैन्टी से ही पोंछता है।

तो मैं बोला- हाँ पर आज आपने कुछ ऐसा कर दिया था कि मुझे न चाहते हुए भी जाना पड़ा।

उन्होंने पूछा- क्यों.. क्या हो गया था?

तो मुझसे रहा नहीं गया.. मुझे बताना पड़ा, जबकि मैं नहीं चाहता था कि उन्हें बताऊँ कि आज उन्होंने क्या किया है।

पर मुझे न चाहकर भी उनके बार-बार पूछने पर बताना पड़ा कि मैं जब उठा तो चूत के नीचे इतना गीला पाया कि जैसे अपने सुसू ही कर दी हो.. इसलिए साफ़ करने गया था।

तो उन्होंने बड़े ही प्यार से मेरे मुरझाए हुए लौड़े को सहलाते हुए बोला- ये सुसू नहीं.. बल्कि इस मथानी का कमाल है.. देखो कैसे इसने कैसे मथा है.. अभी तक बहे जा रही है।

जब मैंने ध्यान दिया तो वाकयी में चूत से बूँद-बूँद करके रस टपक रहा था।

मैंने हैरानी से देखते हुए उनसे पूछा- ऐसा क्या हो गया आज.. जो इतना बह रही है।

तो वो बोली- मैं नहीं बता सकती कि मुझे आज क्या हो गया है?

पर मेरे जोर देने पर उन्होंने बोला- यार आज न तूने मुझे जबरदस्त चुदाई का मज़ा तो दिया ही है और जिस तरह तुमने रूचि और विनोद को समझाया था न.. ऐसा लग रहा था जैसे तुम्हीं उन दोनों के बाप और मेरे पति हो। आज तो तूने मुझे पति वाला सुख भी दिया है.. जिससे मेरा रोम-रोम तुम्हारा हो गया और जिंदगी में पहली बार आज मुझे इतना अधिक स्खलन हुआ है। इससे पहले ऐसा कभी न हुआ था। मैं चाह कर भी खुद को रोक नहीं पा रही हूँ.. बस बहता ही जा रहा है। मैंने बहुत कोशिश की.. पर नहीं रोक पाई..

उनकी बात सुनकर मुझे भी उन पर प्यार आ गया और मैं उनके बगल में कुछ इस तरह से लेटा कि मेरा मुँह उनके गले के पास था।

मेरा दाहिना हाथ उनकी पैन्टी पकड़े हुए उनकी जांघ के पास था और बायां हाथ उनके सर के पास था, उनके दोनों हाथ मेरी पीठ पर थे और उनका मुँह मेरे गले के पास था। मेरा सोया हुआ लण्ड उनकी जांघों से सटा हुआ था।

अब इतना जीवंत चित्रांकन कर दिया है ताकि आप लोग ज्यादा से ज्यादा इसका मज़ा ले सकें।

खैर अब वो मेरे पीठ पर हाथ फेरते हुए मुझसे बोल रही थी- तुम्हारा ये गर्म एहसास मुझे बहुत पागल कर देता है.. मेरा खुद पर कोई कंट्रोल नहीं रहता और जब तुम मुझे इतना करीब से प्यार देते हो.. तो मेरा दिल करता है कि मैं तुम्हारे ही जिस्म में समा जाऊँ।

मैं उनके रस को उनकी जांघों से और चूत से पोंछ रहा था और बीच-बीच में उनके चूत के दाने को रगड़ भी देता था जिससे उनके बदन में ‘अह्ह्ह.. ह्ह्ह्ह..’ के साथ सिहरन सी दौड़ जाती.. जिससे उनकी अवस्था का साफ़ पता चल रहा था और वो मेरे गले को भी चूम भी लेती.. जिससे मेरे लौड़े में फिर से तनाव का बुलावा सा महसूस होने लगा था।

 
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