• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

नज़रिया

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
S

StoryPublisher

Guest
ये कहानी मेने नही लिखी हे ....ये बस आप लोगो के लिए हिन्दी फ़ॉन्ट मे पेश कर रहा हु..प्लीज़ कहानी को एंजाय करे
 
अपडेट 1

"आटिट्यूड".इस शब्द का अक्सर लोग ग़लत मतलब निकलते हैं, घमंड!!!!तो फिर ईगो क्या है???

आटिट्यूड का मतलब नज़रिया होता है.धृष्टिकोण होता है.ईगो तो लगबघ हर किसी मे पाया जाता है.पर आटिट्यूड,ये रखना

हर किसी की औकात नही.

तो चलिए शुरू करते हैं ये सफ़र,जिसमे इस का मुख्या किरदार व.ज आपको इस आटिट्यूड से रूबरू करवाएगा....

ढेंकानाल..ओररिसा का एक छोटा सा टाउन.पर जबकि ये बात है तब ये बस छोटा था कोई टाउन नही.सन 1998,मे 24 रात के 11 बजे,एक सरकारी हॉस्पिटल मे एक लड़की ऑपरेशन टेबल के बेड पर पड़ी थी.उसकी डेलिवरी का वक़्त हो गया था.लड़की इसीलये क्यूंकी वो महज़ 19 साल की थी.उसके आस पास उसका अपना कोई ना था.ऐसा नही की वो इस दुनिया मे अकेली थी,उसका पति था,माता पिता थे भाई थे बहें थी.पर उसके मैके वालों ने उससे नाता तोड़ दिया था.और पति एक सिविल इंजिनियर थे और इस वक़्त साइट पे गया थे.उस लड़की को असहनिया दर्द हो रहा था.उससी वक़्त उसके पति हॉस्पिटल पहुँचे.अपनी बीवी की दर्दभरी आवाज़ उनके कान के पर्दों को झंझोर रही थी.डॉक्टर

ने उन्हे अंदर बुलाया और कहा की केस क्रिटिकल है.वो मा और बचे मे किसी एक को ही बचा सकते हैं.लड़की के हज़्बेंड को जैसे सदमा सा हो गया.पर कुछ वक़्त बाद खुदको मजबूत कर उन्होने कहा की उन्हे उनकी पत्नी सही सलामत चाहिए.बचा तो फिर हो जाएगा.तो डॉक्टर ने कहा की अगर बाकछे को गिराया गया तो उनकी पत्नी फिर कभी मा नही बन पाएगी इतने दर्द मे भी उस लड़की ने जब ये बात सुनी तो उसका कलेजा काँप गया.उसने डॉक्टर से कहा,सिर आप बचे को ही बचाईए,बस कोशिश कीजिएगा की मई काँसेकम अपने बचे को एक बार देख सकूँ इतनी साँसें मुझे दिलवदीजीएगा.उसका पति इसके लिए बिल्कुल राज़ी नही था पर उस लड़की ने उससे अपनी कसम देकर अपनी बात मनवा ली.भरे दिल से अपने अऔंस्ुओं को समेटे वो बाहर चला गया.

दोनो ये बात नही जानते थे की उन्हे बादलों के उपर से मुस्कुराते हुए भगवान देख रहे थे.

उनकी पत्नी ने जब उनसे इसका कारण पूछा तो उनकी मुस्कुराहट और गहरी हो गयी.उन्होने कहा,ये बालिका नही जानती की इसके कोख मे जो अंश है वो दिव्या है.इससे धरती पर लाने के लिए इसने अपने जीवन का त्याग करने तक का कठिन फ़ैसला कर लिया है.गॉड्स वाइफ-तो क्या वो मार जाएगी!!!उसकी उमर ही क्या है.मा बनाना हर औरत के लिया एक गर्व की बात है.आप कह रहे हैं की उसके गर्व मे दिव्यांश है.तो क्या वो ये गौरव महसूस नही कर पाएगी.गोद-मैने ऐसा तो नही कहा.मई तो बस देखना चाहता था की क्या ये इस अंश इस दिव्या शक्ति को जन्म देने लायक है.मुझे इसका जवाब मिल गया.गॉड्स वाइफ-ऐसा क्यूँ?गोद-क्यूंकी इसके बालक मे मेरे शक्तियों का अंश होगा.पर मेरे शक्तियों का कुछ अंश शैतान मे भी है.पर उसने उसका सही उपयोग नही किया.उपर से अभी कलयुग है.

हर तरफ पाप ही पाप है.ऐसे मे इसकी ताक़त का सही मार्गदर्शन ज़रूरी है.और मा से बड़ा गुरु कोई नही.इस लड़की का मान कोमल और सक्चा है और इरादे ढृढ.मेरे अंश का पालन पोषण उसका उचित मार्गदर्शन ये ज़रूर पूरी निष्ठा से करेगी.कुछ समझ आया.गॉड्स वाइफ-कुछ कुछ.आपकी लीला आप ही जाने.भगवान की मुस्कुरात और गहरी हो गयी.

इधर नीचे

डॉक्टर्स पूरी कोशिश कर रहे थे की ऑपरेशन सक्सेस्फुल हो और बाचा और मा दोनो बच जाएँ?पर वो जानते थे की ये मुमकिन नही...

बाहर लड़की का पति गणपति बप्पा के मूर्ति के आयेज आनसून बहाए अपने पत्नी और बाकछे की ज़िंदगी की भीक माँग रहा था.अब सरकारी हॉस्पिटल वो भी एक छोटी से जगह मे, ऐसे मे कोई प्राइवेट वॉर्ड साउंड प्रूफ ग्लासस तो होंगे नही.उस लड़की की दर्द से भारी चीखें हर तरफ गूँज रही थी.फिर वो समय भी आया जब उस बचे का इस संसार मे आना का वक़्त हो गया.अचानक मौसम बदलने लगा.मे का महीना वैसे तो गर्मी का होता है और वो दिन भी कुछ अलग ना था ना ही रात अलग थी.पर अचानक बिजलिए कडकने लगी.हवा ने रफ़्तार पकड़ ली मानो दुनिया को ही उड़ा देना चाहती हो.महॉल काफ़ी रहस्यमयी लगने लगा.लोगों को समझ नही आरहा था की ये हो क्या रहा है.अंदर डॉक्टर्स अपने काम मे लगे थे.लड़की के सर के पास एक नर्स थी जो उससे पुश पुश(धक्का) देने को कह रही थी.अचानक एक ज़ोरदार चीख के साथ वो लड़की बेहोश हो गयी.और उससी वक़्त लाइट भी चली गयी.पर उससे पहले ही डॉक्टर्स ने बच्चे को खिच लिया.बचे का जन्म ठीक 12.01 मिनिट मे हुआ.जो की आती शुभ था क्यूंकी ये एक ब्रम्हन मुहूर्त था.पर ये क्या बचे के बाहर आते ही हर तरफ एक रोशनी फैले गयी.और बाहर बारिश शुरू हो गयी.जैसे आसमान भी खुशी माना रहा हो.इधर अंदर कुछ भी देखा नही जेया सकता था.कुछ पल के बाद रोशनी अपने आप कम होने लगी और फिर ख़त्म हो गयी और तभी लाइट भी आ गयी.किसी को कुछ समझ नही आ रहा था की ये हुआ क्या आख़िर!!!डॉक्टर्स की नज़र जब बचे पे गयी तो उन्होने देखा की बचा उन्हे ही देख रहा है.सारी मेडिकल टीम जो उस रूम मे थी वो भी बचे को देखने डॉक्टर के पास आ गये पर सभी चोवनक् गये. क्यूंकी बचे की आँखें काफ़ी बड़ी और गहरी थी और वो डॉक्टर को अपनी गहरी काली नज़रों से टुक टुक देख रहा था.वो रो नही रहा था.उसके चेहरे पे एक अजीब सी शांति थी.सब उस बचे मे खो से गये.पर बचे ने पकले जपकाइं और जैसे सब अचानक होश मे आ गये.किसी को कुछ भी जो भी हुआ था याद ना रहा.रोशनी का होना बचे का ना रोना कुछ नही.पर फिर एक नर्स की नज़र उस लड़की पर गयी.उसकी हालत बोहोट खराब लग रही थी.डॉक्टर ने भी गौर किया और उसके नब्ज़ को अपने हाथ मे लेकर चेक किया.डॉक्टर समझ गया की ये अब बच नही पाएगी.उसकी नब्ज़ बोहोट धीरे चल रही थी या ये कहें की ना के बराबर चल रही थी.डॉक्टर्स ने लड़की के पति को बुलवाया.उससे जब पता चला की उसकी पत्नी बस चाँद लम्हो की मेहमान है तो वो खुद को संभाल नही पाया और फूट फूट के रोने लगा.उससे समझ नही आ रहा था की वो किसको दोष दे.अपनी बीवी को जिसकी ज़िद के आयेज वो हार गया या उस बचे को जिसकी वजह से उसकी पत्नी अब नही बचेगी.वो सोच ही रहा था की नर्स उसके बचे को लेकर उसके पास आई.कंग्रॅजुलेशन्स बोलके बचा पकड़ा कर चली गयी.बचे पे नज़र जाते ही उसके सारे सवाल सारे दोष गायब हो गये.वो भी बचे की सुंदरता उसके आँखों की गहराई मे खो सा गया.डॉक्टर की आवाज़ से उससे होश आया.डॉक्टर ने कहा की उनकी पत्नी की साँसें कभी भी रुक सकती हैं.वो चाहती थी की मरने से पहले एक बार अपने बचे को देख ले.तो आप बचे को उनके पास छ्चोड़ दें.भारी कदमो से वो आदमी अपने बचे को अपनी पत्नी के सिरहाने लेता दिया और बाहर आ बेंच पर बैठ गया.उससे बर्दाश्त नही हो रहा था.

चलिए अंदर का हाल भी जान लेते हैं

बचे की मा बेसूध आवष्ता मे लेती हुई थी.बचा बाजू मे लेट हाथ पौन चला रहा था.

पर अचानक एक चमत्कार हुआ.हुआ ये की हाथ चलते चलते बचे का हाथ उसकी मा के हाथ या ये कहें नब्ज़ से टकरा गया.और हाथ के लगते ही लड़की के शरीर को एक झटका लगा.उसकी नब्ज़ से होते हुए वो झटका उसके सिने तक गया और उसकी धड़कन तेज़ हो गयी और फिर नॉर्मल हो गयी.लड़की के चेहरे का थकान डोर हो गया और ऐसा लगने लगा जैसे वो बस सो रही है.कुछ देर बाद नर्स आई तो उसने भी ये नोटीस किया.वो तुरंत डॉक्टर को बुला लाई.डॉक्टर आए और जब लकी का नब्ज़ चेक किया तो शॉक हो गये.फिर भी संसुस्ती के लिए उन्होने उसकी आँखें चेक की तो और चोवनक् गये क्यूंकी वो लड़की सिर्फ़ सो रही थी.उन्हे कुछ समझ नही आया.वो बाहर आए और उस लड़की के हज़्बेंड को ढूँडने लगे.वो कुछ दूर हॉस्पिटल के स्टार्ट के एक बेंच पे बैठा था.डॉक्टर उसके पास गये और सब बता दिया.उससे भी यकीन नही हुआ.पर भागते हुए जब अंदर गया और अपनी पत्नी को देखा तो पहले तो शॉक हो गये.फिर खुशी से चिल्ला उठे.मिनूउऊउ...जी हन यही है उस लड़की का नाम.शॉक इसीलिए हुए क्यूंकी मीनू को होश आ चुका था और वो अपने बचे को गोध मे खेला रही थी.वो दौड़के अपनी पत्नी के पास गये और एक साइड से मीनू को गले लगा लिया.मीनू के भी खुशी से आँसू निकल गये.वो जानती थी की उसके फ़ैसले ने उसके पति को कितना दर्द दिया होगा.कुछ देर ऐसे ही रहने के बाद दोनो अलग हुए.अब दोनो ही बेहद खुश दे.आख़िर मा बाप जो बने थे.उनका घर भी अब रोशन हो चुका था.

इंट्रो इन थे नेक्स्ट अपडेट.
 
Update 2

इंट्रो.....

हीरो'स फादर'स नामे-जैराज सिंग.यंग,जस्ट 23 यियर्ज़ ओल्ड(हीरो के बर्त टाइम के हिसाब से)हाइट 5'11,स्मार्ट,फिट बॉडी बुत नो 6 पॅक्स(उस वक़्त सिक्स पॅक्स का क्रेज़ नही था)आक्युपेशन-सिविल इंजिनियर बुत सपना है खुद का बिज़्नेस स्टार्ट करने का.ये बचपन से ही अनाथ हैं.अनाथ आश्रम मे रह कर ही पढ़ाई की.इन्होने बोहोट स्ट्रगल किया है लाइफ मे.ये आज जहाँ भी हैं अपने दूं पे हैं.इनका एक और सपना है की जो ज़िंदगी ये ना जी पाए वो उनका बेटा जिए.

हीरो'स मदर'स नामे-मीनाक्षी जैराज सिंग.जस्ट स्वीट 19.ब.कॉम प्रीवियस प्राइवेट मे कर रहीं हैं.आ प्राउड वाइफ आंड नाउ आ लकी मदर टू.कोलूर कंपेक्स्षन पिंक वाइट.ब्यूटिफुल फेस

ब्राउन आइज़.दिल की सॉफ्ट पर उतनी ही कॉन्फिडेंट.इनकी लोवे मॅरेज हुई है.इनके परिवार वालो को मंज़ूर नही था.और जैसा की अक्सर होता है मोहोब्बत ने रिश्तों को मॅट डेडी.इन्होने अपने मोहोब्बत के साथ भाग कर शादी करली.जब वापस घर गये तो गहर वालों ने चेहरा देखने तक से इनकार कर दिया.अब ये घर से डोर अपने नये आशियाने मे खुश हैं.पर घर की याद तो आती ही है ना..एक आस एक दुआ है इनकी खुदा से की इनके घर वाले इन्हे वापस अपना लें....

हीरो ऑफ थे स्टोरी-विक्रम जैराज सिंग...

यानी की मई.उर्फ व.ज.

ये नाम मेरे दोस्तों ने रखा है मेरा और अब मेरी पहचान बन गयी है.

मई कैसा हूँ क्या हूँ क्यूँ हूँ ये आपको आयेज चलकर पता चल जाएगा.

अर्रे भाई अभी तो पैदा ही हुआ हूँ ना....

(नोट.दोस्तों अभी एक ही जगह का नाम लिया है ढेंकानाल.वो सच मे एक जगह है.पर आयेज जो भी सिटी टाउन या गाओं का नाम आएगा काल्पनिक होगा.मेरे दिमाग़ की उपज होगी.ताकि जो भी इससे पढ़े अपने अपने सोच के हिसाब से रंग भरे.

इसका भी एक अलग ही मज़ा है.तो चलिए चलते हैं वापस कहानी मे)

क्यूंकी डेलिवरी नॉर्मल हुई थी 48 घंटों मे ही डिसचार्ज मिल गया.मगर इन 48 घंटों मे कुछ कुछ अजीब भी हुआ था.मीनू कमज़ोर थी इसीलिए उससे बार बार नींद आजाती थी.पर जब जब मीनू सोती थी उसके सपने मे एंजल्ज़ आते थे.और उसके न्यू बोर्न बेबी के पालने के पास बैठ कर गाने गाते थे.उससे देख मुस्कुराते थे.इससे मीनू की नींद टूट जाती थी.पहली बार तो उससे ये महज़ सपना ही लगा पर जब यही सपना बार बार आया तो वो कुछ परेशन हो गयी.आख़िर मा जो थी.उसने ये बात अपने पति जैराज को बताई पर उन्होने इससे इत्तफ़ाक़,डेलिवरी के बाद थकान से दिमाग़ का कमज़ोर होना बोल कर ताल दिया.पर एक बात उन्हे भी अजीब लग रही थी.बात ये थी की उनका बेटा इन दो दीनो मे एक बार भी रोया नही था.बस शांत रहता था जैसे कुछ सोच रहा हो.बस जब उसकी मा या वो खुद उससे गोध मे लेते थे तब हल्का सा मुस्कुरा देता था.दो दीनो के बाद वो अपनी पत्नी और बचे के साथ सर्क्यूट हाउस वापस आ गये.

चलिए इनके घर के बारे मे बताता हूँ.ये एक सर्क्यूट हाउस मे रहते थे.ये एक कंपनी का दिया बड़ा सा घर था जहाँ सिर्फ़ उस कंपनी के सिविल इंजिनियर रहते थे.ये एक किसाम का खूबसूरत सा बांग्ला था.ये एक ड्यूप्लेक्स था.जिसमे कुल टीन बेडरूम्स थे जिनमे बातरूम्स अटॅच्ड थे.दो नीचे और एक उपर.इसके अलावा एक स्टोर रूम किचन और एक बड़ा सा हॉल था.घर के बाहर छोटा सा लॉन,गार्डेन और लेफ्ट साइड मे सेरवेंट्स क़ुअतेर था.रिघ्त साइड मे एक गॅरेज था.

तीनो सुबह ही घर पोुंच गये थे.जैराज काम के मामले मे बोहोट ईमानदार और स्ट्रिक्ट थे पर बाकी के वक़्त वो एक बेहद मिलनसार व्यति थे.गहर के नौकरों को भी अपना ही मानते थे.

सारे नौकर अपने छोटे मालिक को देखने के लिए बोहोट उत्सुक थे.और जब बचा उनके सामने आया तो सब बेहद खुश हो गये.अभी तक एक बात किसी ने गौर नही की थी यहाँ तक की मीनू और जैराज ने भी नही.

कमला नाम की उनकी एक नौकरानी थी.35 की थी.बेचारी उस उमर मे ही विधवा हो गयी थी.कोई बचा भी नही था. कमला बोहोट ज़्यादा धार्मिक थी और टोना कला जादू चमत्कार इन सबमे विश्वास रखती थी.कभी कभी मीनू भी जब अकेली होती थी तो उससे बात कर किया करती थी.उसकी बातें काफ़ी रोचक हुआ करती थी.कमला मीनू को अपने अपने अलग अलग अनुभवों के बारे मे बताती थी जो मीनू बड़े मज़े से सुनती थी.मीनू को ईश्वर मे आस्था तो थी पर जादू और चमत्कारों मे उससे विश्वास ना था.वो बस टीमेपस्स के लिए कमला की बातें सुन लिया करती थी. जब कमला ने बचे को देखा तो उससे लगा जैसे कोई शक्ति है जो उससे अपने तरफ खिच रही है.कमला बचे के तोड़ा पास आ गयी और ध्यान से देखने लगी.उससे बचे के मुख पे बोहोट तेज नज़र आया.देखते देखते अचानक उसकी नज़र बचे के बाएँ पैर के अंगूठे पे पड़ी तो वो चोवोक गयी.ध्यान से देखने पर उसका शक यकीन मे बदल गया.बचे के बाएँ पैर मे पाँच की जगह 6 उंगलिया थी.उसमे भी आख़िर की टीन उंगलियाँ एक साथ जुड़ी थी.उससे ये अजीब लगा.उसने जब ये बात मीनू और जैराज को बताई तो उन्होने भी देखा तो वो भी शॉक होगआय की अबतक उन्होने खुद ये कैसे नही देखा था.

कमला-मलिक,मालकिन ये एक बोहोट ही शुब संकेत है

मीनू-तू फिर शुरू होगआई कमला.

कमला-अर्रे मालकिन विश्वास करे.अछा एक बात बताएँ.छोटे मलिक का जन्म कब और कितने बजे हुआ था.

मीनू-25 मे यानी परसो,रात के 12 बजके एक मिनिट मे.क्यूँ?(जैराज ने मीनू को बचे के पैदा होने का वक़्त बता दिया था.)

कमला फिर चोवोक गयी.मालकिन मुझे पहले सिर्फ़ शक था पर अब यकीन हो गया है की छोटे मलिक बोहोट तेजस्वी हैं.क्यूंकी परसो रात बारह बाज के एक का वक़्त ब्रम्हा मुहूर्त था.और उससी वक़्त छोटे मालिक भी पैदा हुए.हो ना हो ये कोई बोहोट बड़ा चमत्कार है.पर मीनू और जैराज इससे मात्रा एक संजोग मान रहे थे.

कमला-ठीक है मालकिन.मई एक काम करती हूँ.मेरे पहचान मे एक बोहोट ही ज्ञानी बाबा हैं विषाक्त ऋणी बाबा मई कल उन्हे बुला लाती हूँ.आपको बचे का नाम कारण तो करना ही है ना.उनसे बेहतर इस काम के लिए कोई ना होगा.और लगे हाट मेरी बात की भी पुष्टि हो जाएगी.

मीनू-क्यूँ जी आप क्या कहते हैं???

जैराज-यार मुझे इंसब बातों मे विश्वास तो नही है पर हन नाम कारण तो करना ही है.और जिनका ये नाम ले रही है उनका नाम भी सुना है मैने.मेरा सूपरवाइज़र भी उनका गुण गान करता रहता है.चलो इसी बहाने उनसे भी मिल लेंगे.पता चल जाएगा की बाबा सच मे ज्ञानी हैं या कोई ढोंगी...

कमला-ठीक है मलिक,तो मई कल सुबह ही उन्हे बुला लेती हूँ...

"क्या होगा कल?क्या बाबाजी सच मे ज्ञानी हैं या कोई ढोंगी!!!क्या ये बचा सच मे अनोखा है!6 उंगलियों का क्या रहस्या है.जानेने के लिए साथ बने रहिए..."
 
अपडेट 3

रात गुज़री और सूर्या उदय के साथ एक नये सुबह का आगमन हुआ.वैसे तो फिलहाल गर्मी के दिन थे पर आज का मौसम ही कुछ अलग था.हवा मे बिल्कुल भी गर्माहट नही थी.शीतल हवा मान और टन दोनो को बोहट रहट पहुँचा रही थी.लग ही नही रहा था की गर्मी का मौसम चल रहा है.

अब चलते है अपने हीरो के घर की तरफ...

अर्रे वाह यहाँ तो त्योहार सा आलम था.पूरे घर को फूलों से सजाया गया था.घर के बाहर अलग अलग रंगोली बनी हुई थी मानो दीपावली का त्योहार हो.पर आज का दिन तो मीनू और जैराज के लिए किसी भी त्योहार से उपर था.आज उनके घर के चिराग का नाम जो रखा जाने वाला था.सुबह के 10.30 बाज रहे थे.मीनू अपने कमरे मे आईने के सामने खड़ी हो सारी पहें रही थी.ये एक हरी कांजिवाराम की सारी थी जो मीनू की खूबसूरती मे चार चाँद लगा रही थी.जैराज बाहर हॉल मे थे.डेकोरेशन्स मे नज़र रख रहे थे.काम सारे लगभग हो ही गये थे.जैराज को भी हल्की थकावट हो रही थी.वो सुबह से ही घर सजाने मे लगे हुए थे.वैसे तो एक सिविल इंजिनियर के घर मे नौकरों की भीड़ रहती है पर जैराज एक सेल्फ़ मेड मान थे.जो स्ट्रगल उन्होने अपनी लाइफ मे करी थी उसने उन्हे इतने बड़े ओहदे मे पहुँचने के बाद भी काफ़ी डाउन तो अर्त रखा था.उन्हे ज़्यादार काम खुद ही करना पसंद था और आज तो उनके नज़र-ए-नूवर उनके बचे का नाम कारण था.वो तो दोगुने जोश से सारे सजावट मे हाथ बता रहे थे.एक और कारण ये भी था की उनकी वाइफ अभी अभी डेलिवरी के बाद हॉस्पिटल से वापस आई थी.उनका जिस्म फिलहाल कमज़ोर था.जैराज उन्हे बिल्कुल भी महनेट नही करने देना चाहते थे.प्यार जो बेशुमार करते थे अपनी पत्नी से.खैर,काम सारे लगभग पूरे हो गये थे तो जैराज भी तैयार होने अपने रूम पहुँच गये.

पर रूम मे घुसते ही जो नज़ारा उनके आँखों के सामने आया उससे वो वहीं ठिठक कर रुक गये.उनकी आँखें भी पलके झपकना भूल गयी.मीनू अपना श्रीनगर लगभग पूरा कर ही चुकी थी.बचा पैदा करने के बाद, थकान के बावजूद मीनू का जो रंग सामने निखार कर आया था वो जैराज को घायल करने के लिए काफ़ी था.और अभी तक तो जैराज ने आईने मे ही सिर्फ़ मीनू के अक्स को ही देखा था और ये हाल हो गया अभी तो असली हमला बाकी था.और वो भी हो ही गया.फाइनल तौचुप के बाद मीनू जब पलटी तो सामने जैराज को खड़े पाया.मीनू के पलटेते ही उसकी खूबसूरती जैराज के सामने थी..जैराज को ऐसा लगा जैसे कोई अप्सरा आसमान से उतार उसके सामने खड़ी है.खुदको ऐसा घूरते देख मीनू को कुछ समझ नही आया.उसने आंकों से इशारा किया की क्या हुआ?पर जवाब कुछ अलग ही अंदाज़ मे मिला मीनू को.जैराज ने यूँही बेखुदी मे कहा की

"तेरी उम्र तो वही रुक गयी,हम बड़े हो गये,

ये यो नाइंसाफी है.

ह्यूम मारने के लिए किसी हैतीयार की ज़रूरत नही,

तेरा ये रूप ही काफ़ी है...."

अपने लिए तारीफ़ सुन मीनू के गोरे गाल लाल हो गये.शादी को उनके 1 साल होचुका था पर जानते वो एक दूसरे को 4 सालों से थे.जैराज का प्यार उसकी दीवानगी इतने सालों मे ज़रा भी कम नही हुई थी.थे तो वो हज़्बेंड वाइफ बुत रहते लवर्स की तरह ही थे.

मीनू-धात.आप कहीं भी शुरू हो जाते हो.आबटो शर्म करो,एक बचे के बाप बन गये हो.मीनू की बात पर जैराज ज़ोर से हास पड़े.फिर बोले

जैराज-डार्लिंग,अगर शर्म करते तो बाप कैसे बनते.भाई हम तो आपके आशिक़ हैं,आपकी तारीफ़ करना हमरा हक़ है.

मीनू-बड़े आए तारीफ़ करने वाले,चलिए जाइए,बाबाजी के आने का वक़्त हो गया है.उन्हे इंतज़ार करना ठीक नही.

जैराज ने भी ये ठीक समझा,और तुरंत बातरूम मे घुस गये.मीनू अपने बचे के पास जाकर बैठ गयी.अब तक.उसने भी गौर किया की ना तो उसका बचा एक बार भी रोया है ना उससे भूक लगी है.पर जब भी दूध खुद से पिलाओ पिता ही चला जाता है.तोड़ा अजीब तो था ये सब पर मातृ प्रेम ने इस सोचको गहराने ना दिया.मीनू ने कुछ देर तक बचे को दूध पिलाया फिर उससे पालने मे रख उससे निहारती रही.बचा भी शांत मुद्रा मे बिन पलके झपकाएँ अपनी मा को देखता रहा.इधर कमला विषाक्त ऋणी बाबाजी को लेकर घर की तरफ निकल चुकी थी.उनका घर पास ही था.वैसे भी ये टाउन छोटा सा था.सारी जगह आस पास ही थी.कुछ डूस मिनिट के अंदर ही बाबाजी और कमला घर के द्वार तक पहुँच गये.बाबाजी का मुख एक दूं शांत था जैसे उन्होने ज़िंदगी नमक पहेली की गूती सुलझा ली हो.बाबा ने जैसे ही बाहर के गाते के अंदर पाँव रखा वैसे ही उनके दिल की धड़कन बढ़ गयी.एक अजीब सी व्याकुलता से उनका मान भर गया.उन्हे लगा जैसे उनकी बरसो की प्रतीक्षा ख़त्म होने वाली है.वो वहीं रुक गये और आँखें बंद कर ली.बाबा विषाक्त के आने की खबर आस पास के घरों मे भी फैले चुकी थी.सब उनके दर्शन हेतु जैराज के घर के पास पहुँच गये थे.कुछ जो जान पहचान के थे वो गाते के अंदर ही डेरा डाले खड़े थे.बाबाजी को यूँ अचानक रुक आँख बंद कर ध्यान करने जैसा देख कर सबको अजीब लगा.कमला जो बाबा के आयेज आयेज चल रही थी उसने अचानक पीछे मुदके देखा तो बाबा को आँख बंद कर खड़े पाया.वो भी उनकी और वापस चल दी.इधर बाबाजी आँख बंद कर किसी और ही दुनिया मे पहुँच गये थे.वो खुद वहाँ नही पहुँचे थे बल्कि किसी अग्यात शक्ति ने उन्हे वहाँ अपने पास बुलाया था.हर तरफ़ कोहरा था.बाबाजी को कुछ नज़र नही आ रहा था.फिर धीरे धीरे वो ढूँढ हटा और जो सामने आए उससे देख बाबाजी को अपनी आँखों पे विश्वास नही हुआ.वो अपने घुटनो पे गिर गये.क्यूंकी उनके सामने स्वयं परम पिता परमेश्वर थे,जो बाबाजी को देख मुस्कुरा रहे थे.

बाबाजी-हे परम कृपालु, परम पूज्या पिता परमेश्वर,हे भगवान आपने मुझे पुनः दर्शन दिए.(जी हन पुनः,पहले भी ये भगवान से मिल चुके हैं,कैसे?बस अभी पता चल जाएगा.)हे प्रभु,क्या मेरे गुनाह माफ़ हो गये.क्या अब मुझे मोक्ष मिल जाएगा!!!

(दोस्तों चलिए कहानी तोड़ा पीछे ले चलते हैं...)

बात अबसे कुछ हज़ारों साल पुरानी है,कलयुग ने दुनिया मे पावं पसरा नही था.उस वक़्त बाबा विषाक्त ऋणी तपस्या मे लीं थे.सादिया बीट चुकी थी,नज़ाने कितने ही मौसों बदले पर विषाक्त बाबा पर इसका कोई असर नही हुआ.समय बीतता गया,तपस्या और कठिन होती गयी पर बाबाजी तस से मास नही हुए.फिर वो दिन भी आया जिसके लिए बाबा इतने कठिन ताप कर रहे थे.परम पिता परमेश्वर को उनकी ये ढृधता अची लगी और वो बाबा के आयेज प्रगट हुए.

भगवान-पुत्रा विशख्त.उठो पुत्रा.आँखें खोलो.मई तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हुआ.आँखें खोलो और माँगो क्या चाहते हो.

विशख्त बाबा ने आँखें खोली और जब भगवान को सामने देखा तो खुशी से झूम उठे.अपनेआप को भगवान के चरणों मे झुका पहले सास्तांग प्रणाम किया.फिर उठ कर बोले.प्रभु,मई धान्या होगआया.क्या मई आपसे कुछ भी माँग सकता हूँ.

भगवान-निसंकोच होकर माँगो पुत्रा.पर ध्यान रहे जो भी तुम माँगो उसमे जगत कल्याण हो ना हो किसिका नुकसान नही होना चाहिए.

विशख्त-आवश्या प्रभु.पर क्या मई दो वरदान माँग सकता हूँ!!!

भगवान-ठीक है पुत्रा,माँगो.

विशख्त-प्रभु मई इस संसार का सबसे ज़्यादा ज्ञानी मनुष्या बनाना चाहता हूँ.ऐसा कुछ ना हो जो मुझे ना पता हो.ना कोई मंतरा ना कोई रोग और उसका उपचार.और दूसरा वरदान ये की मई जब भी चाहूं आपसे ध्यान मे जाकर बात कर सकूँ.

भगवान-तथास्तु...

ये कह भगवान अदृश्या हो गये.

विशख्त बाबा भी इसके बाद वहाँ से अंतर्ध्यान हो अपने नगर सोर्मपुर (काल्पनिक)

चले गये.जाने कितनो युगों से बाबा विषाक्त अपनी ताप मे लीं थे.वो तो अपने तब के बाल पर अब भी जवान ही थे.पर उनके घर वेल अपना जीवन चक्र पूरा कर नज़ाने कब का ये संसार छ्चोड़ चुके थे.बाबा विशख्त जब घर पहुँचे तब उन्हे इस कड़वे सच का बोध हुआ.उन्हे इस बात का बोहोट दुख हुआ और वो वहाँ से अंतर्ध्यान हो गये.और वो पहुँचे भारत के उत्तरी भाग मे पहाड़ों के बीच बसे एक गाओं मे जिसका नाम था सिलारपूर.ये एक बोहोट ही सुंदर गाओं था.सभी सुख सुविधाओं से भरपूर.यहाँ एक तरफ झरने थे,दूसरी तरफ लहलहते खेत.यहाँ की ज़मीन बोहोट उपजौ थी जिसके चलते खेती बोहोट आक्ची होती थी.और यहाँ का कमाई का महत्वपूर्ण श्रोत भी यही था.बाबा विशख्त अंतर्ध्यान हो सीधा यहीं पहुँचे.उनके हृदाया मे जो परिवार वियोग के कारण दर्द था यहाँ आकर कुछ कम हुआ.यहाँ उनके मान को एक अलग ही शांति मिली.उन्होने वहीं आयेज का जीवन बिताने का निर्णय लिया.इसका एक कारण और भी था.सिलारपूर मे जड़ीबूटी प्रचुर मात्रा मे थी.औसे पौधे और पेड़ थे जिनसे नज़ाने कितने रोगो का उपचार हो सकता था.पर इसकी जानकारी किसिको ना थी.

पर बाबा विशख्त की बात कुछ और थी.भगवान से वरदान पाकर अब वो सर्वज्ञानी हो चुके थे.जगह देखते ही उनकी दिव्यदृष्टि से कुछ ना चुप सका.उन्होने वहीं गाओं से कुछ ही दूर एक कुटिया बना रहने लगे.

जहाँ वो रहते थे वहीं एक नदी बहती थी.एक दिन जब बाबा विशख्त वहाँ स्नान कर रहे थे तो उन्हे नदी के पास पठार के पीछे कुछ कपड़ा सा दिखा.जब बाबा पास गये तो उन्होने देखा की वहाँ एक लड़की थी जो मूर्छित हो गयी थी.पर फिर भी काँप रही थी.बाबा उससे उठा अपनी कुटिया मे ले आए और पास ही के कुछ पत्तों को तोड़ औषधि बना उसका लेप लड़की के मष्टिशक मे लगा मंतरा उचरणन करने लगे

"ड्रिणना उपचार्या नमः"....

कुछ ही देर मे एक रोशनी का गोला बाबा के हाथ से निकल लड़की के मस्तिष्क से होते हुए उसके अंदर चला गया.कुछ ही वक़्त मे उससे होश आ गया.ठीक तो वो औषधि से ही हो गयी थी पर मंत्रों से उसकी शारीरिक शक्ति तुरंत लौट आई.वो बाबा को धन्यवाद कर घर चली गयी.घर पहुँची तो उससे उसके परिवारवाले बैठे मिले जो काफ़ी उदास दिख रहे थे.लड़की को देख वो खुश होगआय.मेल मिलाप के बाद लड़की की माता ने उससे पूछा वो सुबह से कहाँ थी.लड़की ने बताया की वो नदी की तरफ यूँही घूमने निकल गयी थी.पानी मे खेलते खेलते उसका पैर फिसला और उसका सर एक पठार से टकराया.वो मूर्छित हो गयी.फिर बाबा के बारे मे भी बता दिया.वो उस गाओं के एक धनी घर की बेटी थी.फिर क्या था ये बात हर जगह फैल गयी.उसके घर वाले बाबा का शुक्रिया करने उनके कुटिया मे गये.उस धनी व्यक्ति के घर मे लड़की के दादा को कोढ़ हो गया था.बोहोट जगह कोशिश की पर कोई उन्हे ठीक ना कर सका.उस धनी व्यक्ति ने बाबा से पूछा की क्या वो अपने पिता को एक बार देखेंगे तो बाबा ने हन कहा और उससे भी चाँद पलों मे ही ठीक कर दिया.फिर क्या था बाबा की ख्याति चारों दिशाओं मे गूंजने लगी.दूर दूर से लोग अपने रोग मुक्त करने बाबा के पास आने लगे यहाँ तक की राजघरानो से भी और हर कोई ठीक होकर ही जाता.बाबा विशख्त की लोग भगवान से तुलना करने लगे.और यहीं से शुरू हुई बाबा की दुर्दशा की शुरुवत.बाबा विशख्त को खुद के उपर गुमान होने लगा.विनम्रता आदर सब कुछ धीरे धीरे बाबा विशख्त के व्यवहार से विलुप्त होने लगा.अब बाबा हर किसिका इलाज नही करते थे .केवल राजघरों से आए लोगों का या धनी व्यक्तियों का ही वो उपचार करने लगे.कुटिया की जगह एक भव्या आश्रम ने ले ली.बाबा के सेवा मे इतने सेवक रहने लगे जितना किसी राजा के पास भी ना थे.
 
अपडेट 4...

ऐसे ही दिन बीतने लगे.एक दिन बैकुंत रीति राजाइया से ऋषि विशिष्ट अपनी पुत्री आरती के साथ बाबा विशख्त के आश्रम पधारे.पर उन्हे काफ़ी इंतज़ार करना पड़ा क्यूंकी बाबा विशिष्ट के ये आराम करने का वक़्त था.ऋषि विशिष्ट को क्रोध तो आया पर अपने पुत्री की वजह से वो चुप रहे.आरती को जड़ी बूटी औषध्या मे बोहोट रूचि थी.उन्होने बाबा विशख्त का बोहोट नाम सुना था.तो अपने पिता से ज़िद कर उन्हे ले बाबा विशख्त से मिलने चली आई.काफ़ी देर बाद बाबा विशख्त आए.उनकी नज़र आरती पर जाम गयी.ये बाबा अब पहले वाले बाबा तो थे नही.जहाँ पहले कोमल हृदाया था अब उसमे मक्कारी आ गयी थी.जिन आँखों मे श्रद्धा थी अब उसमे आरती के लिए हवस दिख रही थी.पर उन्होने अपनी मोनदशा चेहरे पे दिखने नही दी.

उन्होने बड़े आदर से ऋषि विशिस्ता को बैठाया.ऋषि विशिस्ता का क्रोर्ध बाबा विशख्त के व्यवहार से शांत हो गया. ऋषि विशिस्ता ने अपने आने का कारण बाबा को बताया की उनकी पुत्री यहाँ उनकी शिष्या बन कर रहना चाहती है.बाबा विशख्त खुश हो गये.वो भी तो यही चाहते थे.एक गहरी नज़र आरती के बदन को देखकर ऋषि विशिष्ट को बाबा ने अपनी सहमति दे दी.ऋषि विशिष्ट अपनी पुत्री सौंप वापस चले गये.बाबा ने आरती को उसका कमरा दिखा दिया.

आरती एक 18 वर्षीया चर्चारे बदन वाली सुंदर लड़की थी.उसका यौवन अपने ज़ोर पे था.पर जीतनी वो खूबसूरत थी उतनी ही शांत ओर कोमल भी.उसके पिता ने उससे बोहोट ही आचे संस्कार दिए थे.कुछ दीनो मे ही इस बात को बाबा विशख्त भाँप भी गये.उन्होने बोहोट कोशिश की आरती को इंप्रेस करने की.अलग अलग मंतरा पढ़ते चमत्कार दिखाते.औषधियों के बारे मे नयी नयी बातें सिर्फ़ आरती को बताते ताकि उसके करीब जेया सकें पर आरती बस काम से काम रखती.और चमत्कारों का भी उसपे कुछ ख़ास असर नही होता.बाबा विशख्त ये नही जानते थे की ऋषि विशिष्ट एक सिद्ध पुरुष है और ऐसे चमत्कार आरती बचपन से ही देखते आ रही है.

एक बात और भी थी की आरती बोहोट तेज़ थी.रिझाने के चक्कर मे बाबा विशख्त ये नही देख पाए की उनकी सारी विधया आरती एक बार मे ही सिख लेती थी.मंत्रों का उपयोग उससे नही आया था पर औषधियों का पूरा ज्ञान उसने प्राप्त कर लिया था.1 वर्ष बीट गया.बाबा अपनी कोशिशें आरती के उपर करते रहते थे पर आरती बस अपने काम से काम रखती थी.

एक दिन बाबा विशख्त अपने कमरे मे विश्राम कर रहे थे तभी एक सेवक आया

सेवक-बाबा विषाक्त,आपसे मिलने तालिंदा देश के महाराज आए है.

बाबा विशख्त-उनसे कहो इंतज़ार करें हम आ रहे है.

सेवक चला गया और बाहर महाराज को ये खबर दे दी

(दोस्तों जिन कॅरेक्टर्स को रोल नही मई उनका नाम नही लिख रहा हूँ)

कुछ समय पासचात बाबा विशख्त बाहर आए और महाराज से मिले और आने का कारण पूछा.

महाराज-गुरुवार,कृपया कर मेरी सहायता कीजिए.मेरे कुल के सभी बचो को रिक्ष रोग हो गया है(इस रोग मे जो भी खाओ उल्टी हो जाती ह और बदन भी सुख जाता है)

मई बड़ी आस लेके आपके पास आया हूँ.

बाबा विषाक्त-राजन चिंता की कोई आवश्यकता नही है.हमारे पास सभी रोगों का उपचार है पर आप बताइए इससे ह्यूम क्या लाभ होगा!

राजा-प्रभु आप बताइए आपको क्या चाहिए.

मई अपने वंश के लिए कोई भी कीमत दे सकता हूँ.

बाबा विशख्त-आपको हमे अपने राजाइया का हिस्सा देना होगा.

कहिए क्या आपको मंज़ूर है.

राजा तोड़ा चोवनक् गये क्यूंकी उन्होने ये नही सोचा था पर कर भी क्या सकते थे.उन्होने हन कह दिया.

बाबा विशख्त-महाराज इस रोग की औषधि हिमालय की एक घाटी मे है.वहाँ पोोचना आसान नही.हम अंतर्ध्यान होके भी बस उस जगह की सीमा तक ही जेया सकते हैं उसके आयेज पिता परमेश्वर के आशीर्वाद से बने रुवदू पेड़ों का जंगल है.वहाँ से ह्यूम चल कर आयेज जाना होगा.इसमे कुछ वक़्त लगेगा.(रुवदू एक पेड़ है जिसमे जीवन देने की शक्ति है और भी अलौकिक शक्तियाँ है जिसके बारे मे विस्तार मे आयेज पता चलेगा)

आप निशिंत होकर अपने राजाइया प्रस्थान करें हम औषधि लेकर आपके पास पोहॉंछते हैं.

राजा-ठीक ह गुरुदेव.जैसे आपकी आंगया.और महाराज चले गये.

इसके बाद बाबा विशख्त ने आरती को रिझाने का एक और प्रयत्न किया.उसने सिलारपूर की पूरी ज़िम्मेदारी आरती को डेडी और खुद चले गये औषधि लेने.और यहीं से उनकी पतन की शुरुवत हुई.

(दोस्तों ये उपचार वाला पार्ट शॉर्ट मे निपटा दूँगा.इसका आयेज कुछ काम नही है)

बाबा विशख्त के जाने के बाद आरती ने सारा काम आचे से संभाल लिया.जिन लोगों को बाबा विशख्त अब नही देखते थे उनका भी उपचार आरती ने निस्वार्थ भावना से किया.जो गुणगान कभी बाबा विशख्त का होता था वही अब आरती के लिए होने लगा.पर इसका आरती पर ज़रा भी दुष्प्रभाव नही पड़ा.वो उससी निर्मल और सॉफ मान से लोगों की सेवा करती रही.

उधर बाबा विशख्त को उन जुंगलों को पार कर औषधिओं को प्राप्त करने मे काफ़ी महनेट लगी.पर उसने वो हासिल कर ही ली.वहाँ से वो तालिंदा देश चले गये.सभी बचो का उपचार कर उन्होने उन्हे ठीक कर दिया.

महाराज ने बाबा विशख्त को कुछ दिन रुकने का निमंत्रण दिया ताकि आधा राज्या उनके नाम पर कर सके लिखित मे.

बाबा को भी कोई आपत्ति नही थी क्यूंकी एक तो राज विलास को कौन ठुकराए और अब उन्हे किसी के दर्द से, रोग से कोई हुंदर्दी भी नही थी.जब से लोगों ने उन्हे भगवान का दर्जा दिया था तबसे उन्होने ध्यान लगा भगवान से बात करना भी छ्चोड़ दिया था.उन्हे लगने लगा की जब वो स्वयं भगवान से कम नही तो फिर क्यूँ बात करें.

कुछ 3 महीने पासचाट बाबा विशख्त वापस अपने आश्रम पहुँचे.पर वापस आकर उंहोने जो देखा उससे वो बोहोट क्रोध मे आ गये.जहाँ पहले उनकी जयजायकर होती थी अब वहीं सभी आरती के गून गा रहे थे.उन्हे ये बर्दाश्त नही हो रहा था पर वो कर भी क्या सकते थे.वो चुप रहे पर अंदर ही अंदर उन्होने आरती से बदला लेने का मान बना लिया.

कुछ दिन यूँही बीट गये.अब भी कुछ ऐसे रोग थे और उनकी औषधियाँ थी जो सिर्फ़ बाबा विशख्त जानते थे.इन्ही रोगों मे एक रोग था मृदानुकति रोग.इसके लक्षण शुरू मे पीलिया जैसे लगता थे.पर असल मे इस रोग मे शरीर के सारे चिद्रा से पूस निकालने लगता था.जैसे जैसे चिद्रा बड़े होने लगते थे दर्द असहनिया होता जाता था और फिर शरीर के फटने से मौत हो जाती थी.पर दर्द के लक्षण बाद मे पता चलता था.इसका उपचार सिर्फ़ बाबा विशख्त के पास ही था.एक बार एक महिला अपना इलाज करवाने आश्रम मे आई.आरती ने उसका इलाज कर दिया पर उसके जाते वक़्त बाबा ने अपने मंत्रों के शक्ति से जानबूझ कर ये रोग उस महिला मे डाल दिया.कुछ दिन बाद वो महिला वापस आई.आरती ने उससे देखा.उससे ये पीलिया ही लगा.उसने उसके उपचार हेतु कुछ दवाई दी.पर डॉवा खाते ही उस महिला के शरीर के चिद्रा खुलने लगे.असहनिया पीड़ा उठी और देखते ही देखते उस औरत का शरीर फट गया.

उसका पति साथ मे ही था.अपनी पत्नी की ऐसी मौत देखकर वो पागल सा होगआया.इधर आरती को कुछ समझ नही आ रहा था की ये क्या हो गया.कुछ देर रोने के बाद वो आदमी क्रोध से जल उठा.आश्रम मे बोहोट से लोग थे.सभी का यही हाल था.सब आरती को ही दोषी कह रहे थे.आरती भी क्या कहती वो तो खुद सदमे मे थी.उससे होश दर्द से आया.हुआ ये की उस मारी हुई औरत के पति ने कहीं से एक पठार उठाकर आरती के सर पर मारा.आरती का सर फॅट गया.उसके बाद सभी यही करने लग गये.कोई पठार मार रहा था कोई लकड़ी से मार रहा था.बाबा विशख्त चुप छाप खड़े मुस्कुरा रहे थे.उन्हे उनका बदला पूरा होता नज़र आ रहा था.कुछ देर युहीन चलता रहा फिर जब लोग हटे तो वहाँ एक और शव था.आरती का शव.

वही डोर कहीं ऋषि विशिष्ट ध्यान मे बैठे थे.

अचानक उन्हे अपनी पुत्री के साथ कुछ अनर्थ घटने की आशंका हुई.वो तुरंत अंतर्ध्यान हो आश्रम पोुंच गये.

इस तरह ऋषि विशिस्ता को अपने सामे देख एक बार तो बाबा विशख्त भी घबरा गये.उन्हे नही पता था की ऋषि

विशिस्ता इतने पहुँचे हुए है पर अपने ताक़त के घमंड मे चूर उन्होने ज़्यादा ध्यान नही दिया.ऋषि विशिष्ट अपनी पुत्री की मृत शरीर देख स्तब्ध रह गये.एक सीध पुरुष के आँखों से भी आँसू निकल आए.कुछ देर यूँही खड़े रहे फिर उन्होने पूछा की ये सब कैसे हुआ.भीड़ मे से किसीने नमक मुरछ लगाकर सब बता दिया.पर आख़िर मे एक भूल कर दी उसने.उसने आरती को बढ़चालन कह दिया.उससी वॉट उसकी राख ज़मीन पर पड़ी थी.हुआ ये की अपनी पुत्री के बारे मे ग़लत सुन ऋषि विशिष्ट की आँखों मे आग उतार आया .उन्होने घूर कर उस आदमी की तरफ देखा.ऋषि विशिष्ट की आँखों से आग निकल कर उस आदमी को लगा और वो वहीं राख हो गया.सब ये देखकर भाग खड़े हुए पर ऋषि विशिष्ट ने अपना हाथ उपर किया,एक मंतरा पढ़ा और सबके पैर वहीं जाम गये.कोई हिल नही पा रहा था.बाबा विशख्त भी ये देख दर गये पर अब कर भी क्या सकते थे.ऋषि विशिष्ट भारी कदमो से अपनी पुत्री के शव के पास गये और उसके सर पर हाथ रख कुछ मंतरा पढ़ा.अचानक ऋषि विशिष्ट के माथे मे एक जयोते दिखने लगी.ये उनकी दिव्या दृष्टि थी जिससे वो जो चाहे देख सकते थे.ऋषि विशिष्ट को सब कुछ दिखने लगा.बाबा विशख्त की धोकेबाज़ी भी.अचानक उनकी आँखें खुल गई.खरोड से उनका मुख लाल हो गया.वो आयेज बढ़े और बाबा विशख्त के आयेज खड़े हो गये.ऋषि विशिष्ट का ये रूप देख बाबा विशख्त के पैर तर तर काँप रहे थे.

ऋषि विशिष्ट-गुरु विशख्त.अपने वरदान के गोरूर मे तुम सब कुछ भूल गये.तुमने ये भी याद ना रहा की भगवान ने तुम्हे क्या कहा था.की कभी किसी को तुम्हारे ज्ञान से हानि नही होनी चाहिए थी पर तुम अपने घमंड मे ये महा अपराध कर गये.लालच ने सत्ता ने तुम्हे अँधा कर दिया.पर अब नही.

मई तुम्हे श्राप देता हूँ.मई तुमसे तुम्हारी शकीटियाँ छींटा हूँ.चाहूं तो तुम्हे अभी मार सकता हूँ पर नही तुम्हे एक ऐसी ज़िंदगी दूँगा जो मौत से भी बत्तर होगी.तुम्हे ज्ञान चाहिए था ना.वो तुम्हारे पास ही रहेगा.तुमने जिस तरीके से इस औरत के औषधि मे बीमारी मिलाई जो दर्द इस औरत ने सहा वही दर्द अब तुम्हे सहना होगा.हमेशा सहना होगा.और इस दर्द का उपचार है तुम्हारा ज्ञान और उसका उपयोग.जब भी तुम किसी रोगी को निस्वार्थ भाव से ठीक करोगे तुम्हारा दर्द चला जाएगा पर सिर्फ़ एक पहेर के लिए.दर्द से बचने के लिए तुम्हे लगातार लोगों की सेवा करनी होगी.पर ये दंड भी काफ़ी नही.तुम्हे मई दीर्घायु का अवीशाप देता हूँ.हन ठीक सुना, ये तुम्हारे लिए अवीशाप ही है क्यूंकी अब से तुम्हे भूक तो लगेगी पर तुम कुछ ग्रहण नही कर पाओगे.जो भी खाओगे खून के साथ बाहर आ जाएगा.पर तुम मरोगे भी नही.सिर्फ़ तड़पोगे.

बाबा विषाक्त स्तब्ध रह गये.श्राप का असर शुरू भी हो चुका था.उन्हे दर्द महसूस होना शुरू हो गया था.

ऋषि विशिष्ट-और तुम सब लोग कितने स्वार्थी हो.इतने दिन मेरी बेटी ने तुम लोगों की सेवा की सब भूल गये.सच ही तो कहा है किसीने,जितना भी अछा कार्लो,कोई एक ग़लती भी हो गयी तो सारी अक्चाईयाँ दिखनी बंद हो जाती है.तुम सब को जीने का कोई अधिकार नही.ऋषि विशिष्ट ने अपनी आँखें बंद की,कुछ मंतरा बुदबुड़ाए और हाथ उपर किया.अचकान बिजलियाँ कदकी और जीतने भी लोग खड़े थे सब जलकर रख बन गये.बाबा विशख्त ने ऋषि विशिष्ट से बोहोट विनिटी की पर वो नही माने अपनी पुत्री के शव को उठा अंतर ध्यान जो गये.

कुछ महीने बीट गये.बाबा विशख्त की हालत बाद से बदतर हो गयी.जब भी किसिका उपचार करते एक पहर्तक की शांति मिलती पर फिर वही दर्द.और उपर से भूक.कुछ खा भी नही सकते थे.अब तक उन्हे भी अपनी भूल का एहसास हो गया था.एक रात वो दर्द से तड़प्ते पेड़ के नीचे बैठे हुए थे.अपनी ग़लतियों के बारे मे सोच रहे की उन्हे कुछ कराहने की आवाज़ सुनाई दी.दर्द मे भी वो उस और बढ़े.देखा एक वृढ आदमी चट्टान के नीचे बैठ काँप रहा था.बाबा विशख्त उसके पास गये.उससे च्छुआ तो पता चला की उससे तेज़ बुखार है. बाबा विशख्त की हालत कुछ ठीक नही थी.फिर भी वो उठे और कुछ पौधों को ढूँडने लगे.ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा.पौधा पास ही था.पत्ते तोड़ रस निकल उस वृढ के पास जाकर उन्हे वो रस पिलाने लगे.धीरे धीरे उस आदमी का कापना बंद हो गया.पर ये क्या बाबा विशख्त का भी दर्द चला गया.अचानक उस वृढ का रूप बदल गया और जो सामे आया उससे देख बाबा विशख्त घुटनो पर आ गये.सामने और कोई नही स्वयमPआऱाM पिता परमेश्वर थे और मुस्कुरा रहे थे.बाबा विशख्त घुटनो के बाल बैठ फुट फुट कर रोने लगे.

भगवान ने उन्हे उठाया

भगवान-तुम इतने कष्ट मे थे तो तुमने मेरा ध्यान क्यूँ नही किया.

बाबा विशख्त-किस मूह से याद करता भगवान.मई इस काबिल नही.

भगवान-तुम्हे पासचताप है ये अची बात है.मई खुश हुआ.मई ऋषि विशिष्ट के श्राप को तोड़ूँगा नही पर इसका एक हाल है मेरे पास.सुनोगे!

बाबा विशख्त-कृपा करे प्रभु.

भगवान-तो सुनो.तुम्हारा दर्द तो रहेगा.पर अब जब भी तुम किसीकि मदद करोगे तो उस पूरे दिन तुम्हे कुछ नही होगा.रोज़ मदद करोगे तो हमेशा ठीक रहोगे.और हन जब जब मदद करोगे उस दिन भोजन भी खा सकोगे.

बाबा विशख्त-प्रभु क्या इसका कोई संपूर्ण हाल नही.कृपा मुझे दीर्घ आयु से भी मुक्त करें.ये शापित जीवन मई नही जीना चाहता.मई आपकी शरण मे रहना चाहता हूँ.

भगवान-इसका वक़्त अभी नही आया.पर आने वाला है.बोहोट शीघ्र कल युग आने वाला है.उस युग मे पाप अपने चरम पर होगा.शैतान आती शक्तिशाली होगा.तब मेरा अंश इस संसार मे आएगा.जब भी उसका जन्म होगा,उसका नाम तुम ही रखोगे.उसके पैर को अपने माथे पे लगते ही तुम अवीशाप मुक्त हो जाओगे.

बाबा विशख्त-तो क्या तब मुझे मोख़सा मिल जाएगा.मई आपके शरण मे आ जौंगा.

भगवान-इसका जवाब भी मई तुम्हे तब ही दूँगा.तब तक लोगों की दिल से सेवा करो.

बाबा विशख्त-जो आगया प्रभु

भगवान-मंगल हो.

(दोस्तों ये रहा 3र्ड और 4त अपडेट.बाबा विशख्त का पस्त लिखना ज़रूरी था.उनका भी आहें किरदार है आयेज इसीलिए.पढ़िए और बताइए कैसा लगा.लाते इसीलिए हुआ क्यूंकी मई बाबा का पूरा पस्त एक साथ दिखना चाहता था.रेड & एंजाय.)
 
Update 5

अपडेट 5:-

(जैसा की आपने पढ़ा की कैसे बाबा विशख्त को श्राप मिला,और कैसे भगवान ने उन्हे मुक्ति का रास्ता बताया.उस दिन के बाद से बाबा विशख्त हर रोज़ निस्वार्थ भाव से लोगों की मदद करने लगे.जब किसी दिन किसी कारणवश मदद नही कर पाते उस दिन ना वो कुछ खा पाते और दर्द से उनका शरीर तड़पने लगता.पर इस दर्द को भी उन्होने सहर्ष अपनाया.उन्हे ये दर्द अपने पापों का एक छोटा सा पश्टाछाप लगता.देखते देलहते जाने कितने युग बीट गये और कल युग आ गया.बाबा अब भी वैसे ही छोटे छोटे गाओं घूम सभी रोगियों की मदद करते.ऐसे ही सालों बीटेटे गये और वो यहीं ढेंकानाल(अपने हीरो का बर्त प्लेस) से कुछ डोर कुटिया बनाकर रहने लगे.रोगियों की मदद करते आऊँ ज्योतिष् विद्या की मदद से लोगों को मुसीबतों से आगाह भी करते.ऐसे ही उनके नाम की ख्याति फैलने लगी.उनके मार्गदर्शन से लाभ मिलने वालों मे एक नाम कमला का भी था.इसीलिए उसने अपने छोटेमालिक के नामकरण के लिए बाबा विशख्त को बुलाने का आग्रह किया था.अब वापस प्रेज़ेंट मे चलते हैं...)

बाबा विशख्त आँख बंद कर ध्यान मुद्रा मे खड़े थे.देखने वालों को समझ नही आ रहा था की ये क्या हो रहा है.पर किसीमे हिम्मत नही थी की कुछ भी बाबा से पूछे.इधर बाबा भी ध्यान अवस्था मेरे भगवान के सामने हाट जोड़ कर खड़े थे.उस दिन के बाद भगवान ने कभी बाबा विशख्त को दर्शन नही दिया था.और आज अचानक ही प्रभु को सामने देख बाबा विशख्त अपने भावनाओं को संभाल नही पा रहे थे.उनके आँखों से अश्रुओं की धार सी निकल रही थी.भगवान भी चुपचाप खड़े मुस्कुरा रहे थे.कुछ शान की खामोशी के बाद भगवान बोले....

भगवान-पुत्रा रोना बंद करो.हन,ये सच है की तुम्हारे दुखों मे अब पूर्ण विराम लगने वाला है.

बाबा विशख्त ये सुन कर खुश हो गये

बाबा विशख्त-इसका मतलब प्रभु,अब मुझे मोक्ष मिल जाएगा.मई आपके पास आ सकूँगा!!!

भगवान-नही पुत्रा,इसमे अभी समय है.अभी तुम्हारा जीवन चकरा ख़त्म नही हुआ है.बोहोट से काम करने है तुम्हे.जो पाप तुमसे हुआ है उससे सुधारने का वक़्त आने वाला है.

बाबा विशख्त-प्रभु,मई समझा नही.

भगवान-पुत्रा,उससे पहले मई तुम्हे कुछ दिखना चाहता हूँ.

फिर अचानक बाबा विशख्त के आँखों के सामने एक रोशनी हुई और जब हटी तो एक चलचित्रा(दृश्या) सामने आया.उससे देखते ही बाबा विशख्त चोवनक् गये क्यूंकी उस दृश्या मे और कोई नही ऋषि विशिष्ट थे और समय भी तब का था जब ऋषि विशिष्ट ने बाबा विशख्त को श्राप दिया हा.ऋषि विशिष्ट थके से एक जंगल मे भटक रहे थे.वापस अपने नगर जाने का उन्हे बिल्कुल मान ना था.भटकते भटकते वो एक पेड़ के नीचे बैठ गये.उन्हे वक़्त का कुछ भी होश ना था.दिन महीनो मे बदल गये,पर वो ऐसे ही बैठे शून्य को घूरते रहे.उनके आस पास गंदगी जाम गयी.पैरों के पास मिटी के उपोले(परत) जाम गयी थी पर उन्हे किसी की सुध नही थी.इतनी सीधी प्राप्त करने के बावजूद उन्हे सब ख़त्म होता दिख रहा था.ये दृश्या और लंबा चलता की अचानक ऋषि विशिष्ट के सामने एक रोशनी प्रकट हुई.रोशनी इतनी तेज़ थी की ऋषि विशिष्ट को आँख बंद करनी पड़ी.और जब रोशनी कम हुई तो उनके सामने स्वयं परम पिता परमेश्वर खड़े थे.ऋषि विशिष्ट तुरंत उनके पैरों मे गिर गये और रोने लगे.

ऋषि विशिष्ट-प्रभु मुझसे क्या ग़लती हुई जो मुझे ये सज़ा मिली.मेरी पुत्री को इस संसार ने मुझसे चीन लिया और आप ने कुछ ना किया.क्या मुझसे कुछ पाप हुआ था भगवान.बताइए प्रभु बताइए.

भगवान-उठिए ऋषि विशिष्ट.आप तो इतने कमज़ोर ना थे.आपको पता है की नियती से कोई नही बच सकता.आपकी पुत्री का जीवन चकरा यहीं तक था.

ऋषि विशिष्ट-प्रभु मुझे भी अब नही जीना. मई भी अपनी पुत्री के पास जाना चहतू हूँ.

भगवान-पुत्रा शांत हो जाओ.अभी तुम्हारा कारया पूर्ण नही हुआ.और अपनी पुत्री का शोक ना मनाओ.मई तुम्हे यही बताने आया हूँ की तुम्हारी पुत्री का कलयुग मे पुनार जन्म होगा.उससे वो सारी खुशियाँ मिलेगी जो तुम उससे इस जानम मे देना चाहते थे.और एक बात,तुम्हारी पुत्री का विवाह मेरे ही अंश से होगा.वो उसकी शक्ति बनेगी.

ऋषि विशिस्ता अपनी पुत्री के पुनार जन्म की बात सुन शांत हो गये और जब उन्होने सुना जी उनकी पुत्री का विवाह स्वयं भगवान के अंश से होगा तो वो आती प्रससन्न् हो गये.

ऋषि विशिष्ट-धन्यवाद प्रभु आपका कोटि कोटि धन्यवाद.आपने मेरी पुत्री को इस लायक समझा.

अब मेरे लिए क्या आंगया है प्रभु?

भगवान-पुत्रा,अबटूम इसी जंगल के दखशीण भाग के मॅढिया मे जो गुफा है वहाँ जाओ और ध्यान मे बैठो.कलयुग मे मेरा अंश आएगा और तुम्हे ध्यान से मुक्त करेगा.तुम्हे तब पता चल जाएगा की तुम्हे क्या करना है.

ऋषि विशिष्ट-प्रभु क्या मई अपनी पुत्री को तब तक नही मिल पौँगा?

भागवग-मिल पाओगे पर सिर्फ़ स्वप्नो मे. जो ज्ञान उससे इस जन्म मे प्राप्त हुआ था वही ज्ञान उस जानम मे भी मिलेगा.तुम उसकी मदद करोगे.

ऋषि विशिष्ट-जो आज्ञा प्रभु...

इसी के साथ भगवान अंतर्ध्यान हो गये और ऋषि विशिष्ट उस गुफा मे जेया ध्यान मे बैठ गये.गुफा के बाहर अचानक एक बड़ा सा पठार प्रकट हुआ और गुफा बंद हो गयी.

इसी के साथ दृश्या बंद हो गया.ऋषि विशिष्ट की ऐसी हालत देख बाबा विशख्त को पुनः दुख हुआ.

भगवान-पुत्रा,जो हुआ उससे बदला तो नही जेया सकता,पर हन,सुधरा आवश्या जेया सकता है.

बाबा विशख्त-कृपया आप मेरा मार्गदर्शन करें प्रभु.

भगवान-इसीलिए हुँने तुम्हे यहाँ बुलाया है.

तुम अभी जिस बचे का नाम कारण करने आए हो वो ही मेरा अंश है.इस धरती पर एक बोहोट ही बड़ा संकट आने वाला है.मेरा अंश इस धरती का उधहरकर्ता होगा.आयेज चलकर तुम्हे इसका उचित मार्गदर्शन करना है.जो ग़लतियाँ तुमसे हुई,ताक़त के घमंड मे जो कदम तुमने उठाए,उससे तुम्हे इससे दूर रखना है.इस बालक मे असीम शक्तियाँ होंगी पर सही समय आने तक उनका बाहर आना ठीक नही होगा.शैतान को इस शक्ति का आभास हो चुका है.उसने इससे ढूँडने का आदेश "गेटो सोफर"(ये शैतान का ख़ास्स देविल है.इसमे किसिको छू के ही उसकी शक्ति चूसने की पवर है.इसके अलावा ये फिरे को आराम से कंट्रोल भी कर सकता है.गर्मी का इस्पे कोई असर नही होता.ये किसिको भी महसूस कर ढूंड लेता है.आयेज जाके कहानी मे इसकी लड़ाई है हमारे हीरो के साथ)को दिया है.मई तुम्हे एक मंतरा देता हूँ

"अग्रसम गुप्टाम शक्ति नीरोतापम "...

इस मंतरा से उस बालक की शक्ति का श्रोत उससे बाहर निकल तुम्हारे पास आ जाएगा.और कोई भी इस बालक को ढूंड नही पाएगा.पर जो शक्ति बाहर आएगी उससे तुम बर्दाश्त नही कर सकते इसीलिए ये मानी रखो.मानी को बाहर निकलते ही समय चकरा रुक जाएगा.मंतरा पढ़ने से पहले इस मानी को उसके मस्तिष्क के उपर रख देना.उसकी शक्ति निकल कर इस मानी मे समा जाएगी.मानी पे हाथ रख तुम फिर ये मंतरा कहना

"शक्ति कुंजम स्वयं प्रजोतनाम"

मानी अपने आप एक सुरक्षित स्थान पहुँच जाएगी.

बाबा विशख्त-जो आज्ञान प्रभु.

भगवान-तुम्हारे जाने का वक़्त हो गया.

इसी के साथ फिर एक रोशनी हुई और बाबा विशख्त का ध्यान टूट गया.उन्होने तुरंत आँखें खोली.उन्होने देखा सभी उन्हे अजीब तरीके से देख रहे हैं.कमला भी चकित सी उन्हे देख रही थी.बाबा कुछ ना बोले और आयेज बढ़ गये.

कमला आयेज आयेज चल रही थी.गाते पर ही जैराज और मीनू खड़े थे.भले ही दोनो चमत्कार वग़ैराह मे नही मानते थे पर अतिथि सत्कार उनके व्यवहार मे था.बाबा का उन्होने उचित स्वागत किया.दोनो ने बाबा के पैर छुए.बाबा ने मीनू को सदा सौभाग्यवती भाव का आशीर्वाद दिया और जैराज को अऔशमान भावा का.दोनो ने बाबा को अंदर आने का आग्रह किया.बाबा फिर मुस्कुराते भगवान का नाप जप्ते अंदर आ गये.वो आती अधीर थे उस नवजात शिशु को देखने के लिए पर मुख उनका सामानया ही रहा.सब अंदर आ गये.बचा हॉल मे ही एक बड़े से पालने मे लेता हाथ पैर चला रहा था.बाबा सीधे उससी पालने के पास गये.बचे को देखते ही बाबा खो से गये.एक तेज, एक आकर्षण था बाकछे क मुख पे,शक्तियों का समंदर बचे के अंदर से निकलता हुआ आभास हुआ बाबा को.ये आभास आम इंसान महसूस नही कर सकता था.पर बाबा पहचान गये.वो समझ गये शैतान को भी यही आभास हुआ होगा इसीलिए वो सतर्क हो गया है.

बाबा विशख्त-क्या मई इससे गोध मे उठा सकता हूँ.

जैराज-जी बाबा.बिल्कुल उठा सकते हैं.

बाबा ने हाथ आयेज कर बचा गोध मे लिया और उसके बाएँ पैर जिसमे 6 उंगलियाँ थी उससे अपने माथे से लगा दिया.सब ये देख चोवनक् गये.पैर के माथे से च्छुटे ही श्राप टूट गया.बाबा को उनका ज्ञान उनकी शक्ति वापस मिल गयी.ये सब 1 सेकेंड मे ही हो गया.बाबा ने फिर पैर हटाया और जैराज से मुखातिब हुए.आपने मुझे इसके नाम कारण के लिए बुलाया है.बाबा के आवाज़ की दैविक्ता पुनः लौट आई थी.जैराज तो बाबा के आवाज़ मे ही खो गये.यही हॉल मीनू और कमला का भी था.फिर बाबा के दोबारा पूछने पर सब होश मे आए.

जैराज-जी बाबाजी.इसीलिए ही बुलाया है.

बाबा विशख्त-पर आपको तो ज्योतिष् विधया मे विश्वास नही ना ही आपकी पत्नी को.फिर क्यूँ?

जैराज ये सुन चोवनक् गये और कमला की तरफ देखने लगे.उन्हे लगा शायद कमला ने ही बाबा को बताया है.

बाबा विशख्त-कमला ने मुझे कुछ नही बताया है.

जैराज-फिर बाबा आपको कैसे पता?

बाबा विशख्त-शायद ही ऐसा कुछ हो जैराज जिससे मई अंजन हूँ.मुझे ये भी पता है की तुम अनाथ हो.तुम्हारी बीवी का मायका धवालगार्ह(इमॅजिनरी) से है और उसके घरवाले अब तुम दोनो से कोई रिश्ता नही रखते.मीनू और जैराज दोनो बाबा के बातों से चोवनक् गये.

बाबा विशख्त-ये मत पूछना की मुझे ये सब कैसे पता.समय आने पर बतादूँगा पर पहले जिस कारया से आया हूँ वो करलूँ!क्या कोई बैठने की जगह है.

मीनू-अर्रे हन,मई भी ना, अभी तक आप खड़े ही हैं.आइए हुँने हॉल के दूसरे तरफ बैठने का सब इंतज़ाम किया है.

फिर सब उस ओर ही चल दिए.बैठने के बाद बाबा ने एक बार सबकी और देखा.बाबा की शक्तियाँ अब लौट आईं थी.उन्हे सब नज़र आ रहा था.उन्हे पता चल गया की मीनू और जैराज दोनो ही इस अनोखे बालक के पालणपोषण और उचित संस्कार देने क लिए एकद्ूम सही हैं.बाबा ने बचे को एक बार फिर गोध मे लिया और फिर बोलना शुरू किया.

बाबा विशख्त-इस बचे की ललाट की रेखाएँ बता रही ह की ये बचा आती पराक्रमी,मेहनती,आऊँ बोहोट बुद्धिमान होगा.अपने उमर के बचो से ये ज़्यादा परिपक्व होगा.ऐसा नही है की ये हारेगा नही या हमेशा अवल्ल ही आएगा.पर हर हार से ये और सशक्त होगा.इसीलये इसका नाम होगा विक्रम.

अपने बचे का नाम और गून सुन कर मीनू और जैराज खुश हो गये.

बाबा विशख्त-इस बालक की वजह से आपकी तक़दीर मे भी बदलाव आएगा.आपका हर सपना साकार होगा.इससे आपको कभी हौसला देने की आवश्यकता नही होगी.ये खुद से ही खुद को ठीक कर लेगा.ये बस आप दोनो के सामने ही चंचल होगा बाकी दुनिए के लिए बोहोट शांत होगा.वैसे तो इससे क्रोध आसानी से नही आएगा पर जब आएगा तो कोई इससे रोक नही पाएगा.पर चिंता मत करना ये आचे के साथ बुरा कभी नही करेगा.इसके क्रोध का फल भी अछा ही होगा.इसके बाएँ पावं मे 6 उंगलियाँ हैं.इससे कभी अलग मत कराएएगा.इसके आत्मविश्वास का श्रोत होंगें ये.एक दिन इसका नाम सारा जाग मे जाना जाएगा.इतना बोल बाबा विशख्त शांत हो गये

जैराज-बाबा और कुछ बताइए ना मेरे बचे के बारे मे.अब किस बाप को अपने बचे की तारीफ़ नही सुननी.जैराज भी कोई अलग तो थे नही.बाबा विशख्त भी जैराज के इस भावना से अनभीग्या ना थे.वो बस मुस्कुरा दिए.कहते भी तो क्या,की उनका पुत्रा स्वयं परम पिता परमेश्वर का अंश है.उसके अंदर दिव्या शक्ति है.उसका जन्म किसी ख़ास मकसद से हुआ है....!!!!!!

बाबा विशख्त-अभी मई केवल इतना ही बता सकता हूँ.पर मेरी मुलाकात आपसे फिर होगी.जब भी कभी आपके उपर कोई तकलीफ़ आएगी मई ज़रूर अवँगा.

मीनू-तकलीफ़?[ईम्ग]?बाबा कैसी तकलीफ़???

बाबा विशख्त-घबराव मत पुत्री.सब मंगल ही हो होगा.

ये कह बाबा ने अपना हाथ अपने झोले मे डाला.और हाथ जब बाहर आया तो समय रुक गया.बाबा के हाथ मे मानी थी.बाबा ने वो मानी विक्रम के मष्टिशक के उपर रख दी और आँख बंद मंत्र उचरण करने लगे.

"अग्रसम गुप्टाम शक्ति नीरोतापम"

धीरे धीरे विक्रम की बॉडी रोशनी से भरने लगी.रोशनी इतनी बढ़ गयी की बाबा विशख्त की आँखें बंद होने पर भी आँखों मे चुभने लगी.फिर धीरे धीरे रोशनी कम हुई फिर भी प्रकाश काफ़ी ज़्यादा था.बाबा ने धीरे से आँख खोला तो देखा मानी लाल रंग से चमक रही थी.बाबा ने मानी उठाने की कॉसिश की पर उठा ना सके.मानी के उपर हाथ रख वो फिर मंतरा दोहराने लगे.

"शक्ति कुंजम स्वयं प्रजोतनाम"....मानी गायब हो गयी और कहाँ पहुँची!!!! ये बाद मे पता चलेगा.

मानी के गायब होते ही समय चक्र फिर से शुरू हो गया.

बाबा विशख्त-चलिए अब मुझे आंगया दीजिए.मई चलता हूँ

जैराज-बाबा आपकी दखशीणा!!!

बाबा विशख्त-मई इसके लिए यहाँ नही आया.मुझे कुछ नही चाहिए.वैसे भी हमारी फिर मुलाकात आवश्या होगी.

मीनू-बाबा कुछ तो लीजिए.ऐसे खाली हाथ ना जाइए.

बाबा विशख्त-मुझे जो चाहिए था मिल चुका है.पर एक बात कहना चाहूँगा.हर बाबा ढोंगी नही होता.

बाबा की बात सुन जैराज और मीनू चोवनक् गये.चोवनक् तो वो पहले ही गये थे जब बाबा ने कहा की मुझे जो चाहिए था वो मिल चुका है!!!उनका सिर शर्म से नीचे हो गया.

बाबा मुस्कुरकर बोले

बाबा विशख्त-अर्रे अर्रे इसमे शर्म आने की कोई बात नही.ये कलयुग है.यहाँ सही से ज़्यादा ढोंगी बाबा ही घूमते हैं.ऐसा सोचना कुछ ग़लत नही है.बस इतना ध्यान दीजिए की अपनी बात किसी पे कहने से पहले एक बार पुश्ती कर लीजिए.अछा अब चलता हू.फिर मिलेंगे.

ये कह बाबा जैसे आए थे वैसे चले गये.

मीनू और जैराज आंकों मे थबॉदी शर्मिंदगी थोड़ी खुशी थोड़े सवाल लिए खड़े रह गये....

दूसरी और.......अर्त से करोड़ों माइल्स डोर एक अंधेरे ग्रह "मोंसलिककेल".(यहाँ सूर्या की रोशनी नही आती थी).मे एक 100 फीट लंबा शैतान बैठा हुआ था.सर से पावं तक काले कपड़े पर बदन गोरा.आँख भट्टी सी तपती लाल.चेहरे पर एक अजीब सी खामोशी.उसका नाम ........

असमडेयस

देविल'स किंग

क्रियेचर ऑफ जड्ज्मेंट......
 
Update 6

(अब तक आपने पढ़ा की कैसे बाबा विशख्त श्राप मुक्त हो गये.दूसरी और ऋषि विशिष्ट भगवान के निर्देश अनुसार गुफा मे जेया ध्यान मे बैठ गये.बचे का नामकरण हो गया.उसका नाम विक्रम रखा गया.और शैतान का नाम और उसका रूप भी भी पता चला................"असमडेयस"...................

अब आयेज...

अपडेट 6-

मोंसलिककेल......असमडेयस का ग्रह....

एक ख़तरनाक जगह,जो खुद असमडेयस ने बनाई है.इस पूरे ग्रह मे सिर्फ़ एक महल बस है.पर ये महल कोई आम महल नही है.चार से पाँच शहेर जाम जाए इतना बड़ा महल है ये.इसीके अंदर सारे डेविल्स रहते हैं.इस ग्रह मे कोई पेड़ पौधे पानी वागेहरा कुछ भी नही है.सिर्फ़ चट्टान हैं और बड़े बड़े सूखे मैदान.यहाँ कभी दिन नही होता.क्यूंकी यहाँ पे कोई सूर्या नही है.यहाँ पर उजाला सिर्फ़ आग की वजह से होता है.ये पूरा ग्रह लावा के उपर बना है.फिर भी एक अजीब बात है.वो ये की यहाँ का मौसम बेहद ठंडा है.पूरे साल यहाँ बर्फ गिरती है.और इसका कारण है असमडेयस....चलिए ज़रा हमारे कहानी के विलेन के बारे मे जानते है.आक्च्युयली ये विलेन तो है,शक्तिशाली भी है पर ज्ञानी भी बोहोट है.शैतान सुनकर लगता है जैसे ख़तरनाक दिखता होगा पर ऐसा है नही.उल्टा ये इतना हॅंडसम है की हॉलीवुड आक्टर्स भी शर्मा जाएँ.गोरा आकर्षक चेहरा,रिप्ड बॉडी,चेहरे मे सूर्या सा तेज,बस आंकों की पूतियाँ पूरी सफेद.कब क्या सोच ले कोई नही जानता.और सबसे अजीब बात,शैतान के सोच के बिल्कुल उलट,ये बिल्कुल शांत दिमाग़ का है.जैसा की मैने कहा की मोंसलिककेल का मौसम हमेशा ठंडा ही रहता है.ये असमडेयस की आँखों का कमाल है.जब तक इसकी आंकों की पुतलियान सफेद हैं तब तक मौसम ठंडा ही रहते है.इसकी आँखों का एक और कलर है,लाल.और इसीलिए पूरा मोंसलिककेल लावा के उपर बसा है.वो लावा इसकी आँखों का ही प्रतीक है.जब भी असमडेयस को गुस्सा आता है तब उसकी आँखों की पुतलियों का रंग बदल कर लाल हो जाता है.पर नज़ाने कितनी साड़ियाँ बीट गयी असमडेयस को गुस्सा हुए,और इसीलिए मौसम मे भी हमेशा ठंडक बनी रहती ह.असमडेयस की सोच भगवान से उल्टी ज़रूर है पर तेज़ भी बोहोट है.ये बात स्वयं भगवान भी जानते हैं.वो चाह कर भी असमडेयस को नही मार सकते हैं,क्यूंकी असमडेयस भगवान का शक्ति पुंज है.देविल बनाने से पहले वो लॉर्ड थे गोद का सबसे ताकतवर एंजल था.दुनिया की हर चीज़ पे जड्ज्मेंट देने का हक़ ईश्वर ने उससे दिया था,पर कुछ ग़लत फ़ैसलों की वजह से उससे हेवेन से निकल दिया गया.(रीज़न आयेज स्टोरी मे पता चलेगा).

पर वो गोद से नाराज़ नही हुआ.उसने ये तान ली की जिस दुनिया के लिए गोद ने उससे खुद से अलग किया है उससे वो बर्बाद कर देगा.उसकी ऐसी हालत कर देगा की खुद गोद दुनिया से क्रोधित हो उससे ख़त्म कर देंगे.बोहोट सोच समझ कर वो अपनी चाल चलता रहा.और देखते ही देखते उसने अपने डीमॉन्स गुलामो की मदात से इंसान के मान मे लालच,हवस मतलबपरस्ती इस कदर बढ़ा दी की अब दुनिया पाप के चरम पे थी.इसी बुराई से असमडेयस और शक्तिशाली हो गया,क्यूंकी अब वो एक शैतान था.उसकी शक्ति का श्रोत बुराई थी जो अब दिन दोगुनी रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ रही थी.इसीलये भगवान को अपना अंश धरती पर भेजना पड़ा.असमडेयस के पास अलग अलग डेविल्स की फौज थी जिनका वो बखुबी से इस्टामाल करता था.असमडेयस के महल मे दरबार नाम मात्रा की ही थी.वहाँ कोई सभा नही लगती थी.उस जगह पर असमडेयस बस ध्यान और स्वयं मंत्रणा करता था.

चलिए अब चलते है आयेज,अर्रे अर्रे एक मीं आयेज नही तोड़ा पीछे.उस रात की तरफ जिस रात हमारा हीरो पैदा हुआ था...

जब हमारा हीरो धरती पर पैदा होने वाला था,उस वक़्त असमडेयस मोंसलिककेल मे अपने महल के सिंघासन मे आँख बंद कर ध्यान मुद्रा मे बैठा हुआ था.उधर जैसे ही हमारा हीरो पैदा हुआ,इधर असमडेयस की आँखें खुल गयीं.जिस ग्रह मे सूर्या ना था उसका प्रकाश ना था,उस ग्रह मे अचानक रोशनी फैल गयी.जीतने डेविल्स बाहर घूम रहे थे सब रोशनी के पढ़ते ही बेहोश हो गये.और जो डेविल्स महल के अंदर थे,उनके पैर भी डगमगा गये और वो सब गिर गये.सब अचंभे मे थे की ये क्या हुआ???धीरे धीरे रोशनी कम हुई और फिर ख़त्म हो गयी.जहाँ एक और महल के अंदर सारे डेविल्स शॉक मे थे वहीं,असमडेयस अर्रे ये क्या इनकी आँखें नॉर्मल ही थी बस अब खुल चुकी थी.और होठों पे मुस्कान!!!!

असमडेयस-आख़िर खेल शुरू हो गया.

धीरे से असमडेयस अपने सिंघासन से खड़े हो गये आँख बंद की और एक मंतरा बोले

"मूर्छित विश्वँ पुनर्जते" और जीतने भी डेविल्स बेहोश थे सब वापस होश मे आ गये.

फिर उसने गेटो सोफर नाम के के देविल को याद किया गेटो सोफर तुरंत प्रकट हुआ

गेटो सोफर-हाई हेल देविल लॉर्ड(जाई हो) .और गेटो सोफर अपने कदमो मे झुक गया.

असमडेयस-उठो गेटो सोफर.जो रोशनी अभी हुई,तुमने भी महसूस की होगी

गेटो सोफर-जी महामाहिीम्.पर मुझे कुछ समझ नही आया.

असमडेयस-तुम्हे समझने की ज़रूरत भी नही है.

गेटो सोफर असमडेयस की कठोर आवाज़ सुनकर सहम गया.

असमडेयस-तुम्हे अभी धरतीलॉक मे जाना होगा.वहाँ पोुंच तुम ये मंतरा दोहराना.

"अग्यात शक्तीं रुपेह आगमन"

तुम उस जगह पोहॉंच जाओगे जहाँ तुम्हे जाना है.जिस जहाँ ये मंतरा तुम्हे पोहॉंछाएगा वहाँ तुम्हे एक नवजात शीसू मिलेगा.तुम्हे उससे मारना है.

ध्यान रहे,ये काम जितना आसान लग रहा है,उतना है नही.

गेटो सोफर-आपने जैसा कहा है वैसे ही होगा मी लॉर्ड.ये बोल गेटो सोफर पृथ्वी के लिए निकल गया.

असमडेयस-मैने आपनी चाल चल दी मी "लॉर्ड"....

अब...... आपकी बारी....

दूसरी तरफ परम पिता परमेश्वर ये सब देख रहे थे.जैसे ही गेटो सोफर पृथ्वी की तरफ निकला उन्होने अपने एक एंजल को बुलाया और उससे कुछ निर्देश देकर भेज दिया.

दूसरी तरफ गेटो सोफर लाइट स्पीड से धरती की और उड़ रहा था.अचानक उसके सामने एक डोर ओपन हो गया.गेटो सोफर की स्पीड बोहोट तेज़ थी.वो खुदको उस डोर के अंदर जाने से रोक नही पाया.गेटो सोफर के डोर के अंदर घुसते ही डोर बंद हो गया.और अब वो ब्राम्हादन्द के दूसरे छ्होर मे था.जितनी दूरी उसकी पृथ्वी से बच गयी थी अब वो उससे 10 गुना और दूर हो चुका था.गेटो सोफर रुक गया.उसके सामने इस वक़्त वही गोद का एंजल था.गेटो सोफर अपने रास्ते मे बाधा देख क्रोधित हो गया और उसने एंजल के उपर एक फिरे बॉल फेंकी.फिरे बॉल एंजल के पास आकर रुक गयी,और नष्ट हो गयी.गेटो सोफर और क्रोधित हो गया.

दूसरी तरफ ये सब ध्यान मे बैठा असमडेयस भी देख रहा था.पर फिर भी उसका मुख शांत था,जैसे वो कोई फिल्म देख रहा हो.इधर गेटो सोफर अपना वॉर खाली जाता देख अस्वेत बान का मंतरा पढ़ने लगा(इस बान से किसिको भी बँधा जेया सकता है)पर उससे पहले ही एंजल अपनी जगह छ्चोड़ देता है और गेटो सोफर के पीछे पहुँच जाता है.एंजल अपना हाथ आयेज कर गेटो सोफर के सिर पर रख देता है और बुदबुदाता है भ्रम दृश्यनाँ.

गेटो सोफर पुनः लाइट स्पीड से उड़ने लग जाता है.हुआ ये की मंतरा जैसे ही गेटो सोफर के मस्तिष्क के अंदर गया . . अब तक का . सब . गया..,उसकी . सब कुछ.उससे बस अपने . असमडेयस का . याद था.वो तुरंत . की तरफ . गया पर अब वो ग़लत . जेया रहा था.मंतरा के . मे अब उससे पृथ्वी . और . लगी.इस मंतरा मे भ्रम पैदा करने की . थी.

इधर असमडेयस ने जब देखा की एंजल ने गेटो . को जाने दिया तो वो सोच मे पढ़ गया.जैसे ही एंजल का काम ख़त्म हुआ उसने लौटना चाहा पर ये क्या वो ना . . रहा था ना गायब हो पा रहा था.उससे ऐसा लग रहा था जैसे . उससे . दिया हो.और फिर उसके सामने रोशनी हुई और जब रोशनी हटी और जो उसके सामने . था उससे देखकर एंजल . . गया.क्यूंकी उसके सामने और कोई नही "थे असमडेयस" . था...

असमडेयस-. मत ..तुम्हे ये शोभा नही देता.तुम गोद का वो . हो जो कभी मई था.मई तुम्हे मारूँगा नही.ना ही कुछ ... तो तुम्हारे सिर पर हाथ रख सब पता कर सकता हूँ की . मेरे . के साथ क्या किया.पर नही.ऐसे . नही आएगा.तुम इतने बड़े नही हुए की खुद असमडेयस तुम्हारे उपर शक्ति . ..जाओ तुम्हे मुक्त किया.और असमडेयस के ऐसा बोलते ही वो . मुक्त हो गया.वो एक पल भी ना . और अंतर्ध्यान हो . के पास चला गया.

असमडेयस-. आप मेरी बात . जाते गोद.. आपके . के . नही.चलिए देखते है आपके चाल का ..और असमडेयस . ध्यान हो अपने . लौट गया.

. . . . का रास्ता समझ . और ही . रहा था.महल मे बैठा असमडेयस ये देख रहा था और सोच रहा था की . ने . सोफर क सिर पर हाथ रख क्या कहा होगा,और जैसे अचानक उससे समझ आ गया की गोद ने क्या चाल चली है.उसने आँख बंद कर गेटो को . किया और कहा . .,और . . का भ्रम टूट गया.वो वहीं रुक गया.उससे सब स्मरण आ गया और वो . की तरफ मूड उड़ने लगा.

असमडेयस-. . थी गोद पर ये मुझे . के लिए काफ़ी नही......

पर ये . काफ़ी थी.क्यूंकी . . के . मे पैर रखते रखते 3 दिन निकल गये.और जब वो बालक के पास . . मंतरा पढ़ने वाला था उससी वक़्त बाबा विशख्त बचे की शक्ति मानी मे . मानी किसी सुरक्षित स्थान मे . . थे.

. असमडेयस को अचानक बचे की शक्ति महसूस होनी बंद हो गयी.उससे समझ नही आया की ऐसा क्यूँ हुआ.उसने आँख बंद कर मंतरा .."शक्ति कुंजम . आरंभाते....एक रोशनी का . . और धरती की और निकल गया.कुछ पल मे ही वो . . मे . कर गया और . . . डाला पर . उससे कुछ नही.वो रोशनी का . पुनः असमडेयस के पैरों मे आ . हो गया.

. गेटो सोफर ने मंतरा .

. . . ..पर ये क्या वो वापस असमडेयस के सामने था.हुआ . की जब असमडेयस उस शक्ति के श्रोत का पता नही लगा . तो उन्होने . . को वापस बुला लिया.उससी वक़्त गेटो . वो मंतरा बोल रहा था.अपने सामने असमडेयस को देख वो घबरा गया.उससे लगा उसने कुछ ग़लती कर दी.पर असमडेयस ने उससे कुछ नही बोला और जाने के लिए हाथ से . कर दिया.. . सिर नीचे कर धीरे धीरे निकल गया.

असमडेयस की आँखें एक पल के लिए लाल हो गयी.पूरा . . गया.. . कर उपर आने लगे.. . रुक गयी.मौसम मे गर्माहट आ गयी.पर फिर असमडेयस की . . हो गयी और सबकुछ पहले जैसा हो गया.

असमडेयस-. . . हो गोद.....

(देखते हैं . आयेज क्या . . दिखाती है.अभी तो सिर्फ़ पारट . है . मे . है.साथ . ......)

अब तक आपने पढ़ा शैतान असमडेयस और उसकी ताक़त के बारे मे.कैसे उसने एक महाशक्ति को महसूस किया और उसकी खोज मे अपने ख़ास देविल गेटो सोफर को भेजा पर गेटो सोफर उस शक्ति का पता लगाने मे नाकामियाब रहा.....

अब आगे........
 
Back
Top