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नसीब मेरा दुश्मन vps

तीस मिनट बाद।

विमल के लौटते ही नसीम बानो ने पूछा—"सब कुछ ठीक हो गया?"

"हां।"

"गाड़ी का क्या किया?"

"टाउन हॉल के पार्किंग में खड़ी कर आया हूं, विनीता की लाश को ठिकाने लगाने में शायद काम आए।"

"यह तुमने समझदारी का काम किया, विनीता की लाश को गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठकर हम किसी सूनी सड़क पर, खाई में लुढ़का देंगे ताकि गाड़ी और लाश मिलने पर पुलिस को लगे कि किसी के द्वारा जहरीली सुई चुभोने के बाद विनीता ने ड्राइविंग की और जहर का असर होते-होते गाड़ी उसके काबू से बाहर होकर खाई में गिर पड़ी।"

"शायद यही उचित होगा।" कहने के बाद थका-सा विमल बेड पर बैठ गया, कुछ देर चुप रहने के बाद बोला— "समझ में नहीं आता कि पलक झपकते ही आखिर ये क्या हो गया—विनीता की हत्या मिक्की या रहटू ने नहीं की तो फिर कितने की है?"

"इस बारे में बाद में सोचेंगे, फिलहाल अपने और मिक्की के बीच चल रही जंग के बारे में सोचना ज्यादा महत्वपूर्ण है, सारे पासे उलट गए हैं—जहां हम यह सोच रहे थे कि सुरेश हमारी उंगलियों पर नाच रहा है, वहीं पता लगा कि सुरेश दरअसल सुरेश है नहीं, मिक्की है और अगर विनीता उसकी बातें न सुनती तो हम मिक्की और रहटू के जाल में बुरी तरह फंस चुके थे।"

"अब उसकी हैरतअंगेज स्वीकारोक्ति की वजह भी समझ में आ रही है।" विमल ने कहा— "दरअसल जब तुमने फोन पर ढंग से बात की जैसे जानकीनाथ के मर्डर में वह तुम्हारे साथ रहा था, तो सुरेश बने मिक्की ने सोचा होगा कि निश्चय ही सुरेश ने तुम्हारे साथ मिलकर मर्डर किया होगा—उसने सोचा होगा कि यदि अनजान बना या कोई सवाल किया तो मिक्की होने का भेद खुल जाएगा, अतः सब कुछ स्वीकार करते चले जाओ।"

"मजे की बात यह है कि वह अभी तक सुरेश को सचमुच जानकीनाथ का हत्यारा समझ रहा है, रहटू से भी उसने यही कहा—तभी तो उन दोनों ने मिलकर अपनी नजर में उस मर्डर के एकमात्र गवाह यानी मेरे मर्डर की स्कीम तैयार की?"

"पुलिस इंस्पेक्टर को धड़ल्ले से फिंगर प्रिन्ट्स देने वाली बात भी अब समझ में आ रही है, उसे मालूम था कि वह मिक्की है, सो उसके फिंगर प्रिन्ट्स भला सुरेश की उंगलियों के निशान से कैसे मेल खा सकते थे?"

"यह राज पता लगने के साथ ही सारी गुत्थियां स्वतः सुलझ चुकी हैं कि वह सुरेश नहीं, मिक्की है।"

"करेक्ट।"

"एक घण्टा पहले और अब के हालतों में जमीन-आसमान का अन्तर आ गया है, अतः पिछली सारी रणनीति को भूलकर नए सिरे से, नई स्थिति पर गौर करके हमें भविष्य के लिए नई रणनीति तैयार करनी होगी।"

"इस बात की जरूरत मैं भी महसूस कर रहा हूं।"

"जानकीनाथ की हत्या के जुर्म में 'सुरेश' को सजा के बाद कानून सारी दौलत विनीता को मिलनी थी, इसी वजह से उसके एक हिस्सेदार तुम भी थे और मुझे तो उसमें से सारी जिन्दगी कुछ-न-कुछ मिलता रहने वाला था ही—किन्तु विनीता की मौत के बाद यह सारी स्कीम स्वतः धराशायी हो चुकी है—अब भले ही कथित सुरेश फांसी के फंदे पर झूल जाए, उसकी दौलत में से हमें फूटी कौड़ी मिलने वाली नहीं है।''

"इसका मतलब ये हुआ कि अब सुरेश बने मिक्की को जानकीनाथ की हत्या के जुर्म में फंसाने से हमें कोई लाभ ही नहीं है।"

"लाभ नहीं है, मगर ऐसा करना मजबूरी जरूर बन चुकी है।"

"क्यों भला?"

"अगर देखा जाए तो सारी दौलत पर मिक्की और रहटू का कब्जा हो चुका है, मैं उनकी नजर में रास्ते का कांटा हूं ही, अतः यदि कल की उनकी आइसक्रीम वाली साजिश से बची तो वे फिर किसी दूसरे तरीके से मेरे मर्डर की कोशिश करेंगे—शायद हमेशा उनके प्रयास से बची न रह सकूं—यही स्थिति तुम्हारी भी है, देर-सवेर वे विनीता और तुम्हारे सम्बन्धों का पता लगा लेंगे और फिर उन पेशेवर गुण्डों को तुम्हारा मर्डर करने में देर नहीं लगेगी।"

विमल का चेहरा फक्क।

अपने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए नसीम ने कहा— "अब हमें अपनी आगे की रणनीति दौलत के लिए नहीं, बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा कीमती अपने प्राणों की हिफाजत के लिए तैयार करनी है, अगर उसका इलाज न किया गया और वे इसी तरह आजाद घूमते रहे तो हमारी जिन्दगी के लिए हमेशा खतरा बना रहेगा।"

"फिर क्या करें?"

"विनीता की लाश को मैं काफी देर पहले सेफ में बन्द कर चुकी थी—तब से यहां बैठी इसी बारे में सोच रही हूं—उन दोनों के खतरे से खुद को मुक्त करने की तरकीब मैंने सोची भी है, अब सिर्फ उस पर तुम्हारी स्वीकृति की मोहर लगना बाकी है।"

"क्या सोचा है तुमने?" विमल ने उत्सुकतापूर्वक पूछा।

पहले नसीम ने रहटू नाम की मुसीबत से छुटकारा पाने की तरकीब बताई—विमल ध्यानपूर्वक सुनता रहा और अन्त में बोला— "वैरी गुड, रहटू का इससे बेहतरीन इलाज कोई अन्य नहीं हो सकता, मगर.....।"

"मगर—?"

"पकड़े जाने पर कहीं वह हकीकत न खोल दे?"

"ऐसा वह नहीं कर सकेगा, दरअसल, हकीकत खोलने का मतलब होगा पुलिस को यह बता देना कि सुरेश, सुरेश नहीं मिक्की है और यह राज उनमें से कोई भी मरते दम तक पुलिस पर नहीं खोल सकता।"

"ओ.के.।"

"अब रहा मिक्की.....उसके बारे में मुझे अपनी पूर्व योजना ही उचित लग रही है, ऐसी कोई खास बात नहीं हुई है जिसकी वजह से उस योजना में चेंज करना पड़े।"

"यानी?"

"मैं वादामाफ गवाह बनकर उसे जानकीनाथ की हत्या के जुर्म में फंसा देती हूं।"

"क्या हत्या के जुर्म में फंसने के बाद भी पुलिस को नहीं बताएगा कि वह सुरेश नहीं मिक्की है?"

“नहीं बताएगा।”

"यहां मैं तुम्हारी राय से इत्तफाक नहीं करता।"

"क्या मतलब?"

"पहले वह अपना राज छुपाए रखने की कोशिश करेगा, मगर जब देखेगा कि किसी भी रास्ते से बच नहीं पा रहा है तो स्पष्ट कर देगा कि मैं मिक्की हूं और जब वह सुरेश है ही नहीं तो जानकीनाथ का हत्यारा वह स्वतः नहीं है।"

"इससे क्या होगा?"

"हमारी योजना फेल, वह जानकीनाथ के हत्यारे के रूप में न पकड़ा जा सकेगा।"

"मगर सुरेश की हत्या के जुर्म में तो पकड़ा जाएगा।"

"पकड़ा जाता रहे, हमारी योजना तो फेल हो ही गई न और उसके फेल होने का सीधा मतलब होगा तुमसे वादामाफ गवाही वाली फैसेलिटी छिन जाना, क्योंकि उस स्थिति में जानकीनाथ की हत्या की एकमात्र मुजरिम तुम ही बचीं।"

"तुम्हारी बात दुरुस्त है, मगर ऐसा होगा नहीं।"

"क्यों नहीं होगा?"

"सुरेश बने रहकर जानकीनाथ की हत्या के जुर्म में पकड़े जाना, फिर भी मिक्की बनकर सुरेश की हत्या के जुर्म में पकड़े जाने के मुकाबले मिक्की के लिए फायदे का सौदा होगा—और इसलिए वह मिक्की बनकर पकड़े जाने से बेहतर सुरेश के रूप में पकड़ा जाना पसन्द करेगा।"

"मैं समझा नहीं।"

"जरा ध्यान दो, मिक्की यह सोचेगा कि यदि मैं सुरेश के रूप में पकड़ा जाता हूं तो मुमकिन है कि जानकीनाथ के मर्डर की सजा, जो अच्छे वकीलों के कारण फांसी नहीं होगी, भोगने के बाद सुरेश की दौलत पर ऐश कर सकता हूं, मगर यदि मैंने अपने मिक्की होने का राज खोल दिया तो समझ लो सारी उम्मीदें ही खत्म कर लीं—पहले तो अच्छे वकील के अभाव में फांसी हो सकती है, दूसरे, यदि फांसी से कम सजा हुई भी तो उसे भोगकर जेल से बाहर आने पर सामने पुनः वही फक्कड़ जिन्दगी होगी।"

"ओह।"

"हर हालत में उसे सुरेश बने रहने में ही फायदा है—सो, हरगिज अपना राज नहीं खोलेगा और उसकी यह मानसिकता हमारे हक में होगी।"

"बात तो तुम्हारी तर्कसंगत है, लेकिन.....।"

"लेकिन—?"

"हम उसे एक दूसरे तरीके से भी फंसा सकते हैं।"

"किस तरीके से?"

"पुलिस को उसके बारे में हकीकत बताकर, यानी अगर हम पुलिस पर यह राज खोल दें कि सुरेश की हत्या करने के बाद मिक्की अब उसकी दौलत पर कब्जा करने वाला है तो वह फंस जाएगा और दुनिया की कोई ताकत उसे बचा नहीं सकती।"

"तुम ठीक कह रहे हो—मगर ऐसा करने से पुनः वही संकट उठ खड़ा होगा, मेरे हाथ से वादामाफ गवाह बनने की फैसेलिटी चले जाने का संकट—अगर हम उसे इस रूप में फंसाते हैं तो म्हात्रे की इन्वेस्टिगेशन चलती रहेगी और उस अपराध की एकमात्र जीवित मुजरिम होने के कारण सारी सजा मुझे मिलेगी।"

"ओह।"

"वैसे भी अपने मुंह से उसे मिक्की कहने की जरूरत नहीं है।" नसीम बानो ने दूरदर्शिता से काम लेते हुए कहा— "जब हम कहेंगे कि वह जानकीनाथ का हत्यारा सुरेश है तो हंड्रेड परसेंट उम्मीद है कि अपना राज छुपाए रखने के लिए वह इस जुर्म में फंस जाना कबूल करेगा, फिर भी मान लेते हैं, कि नहीं करता, तब मजबूरी में उसे अपने मिक्की होने का राज खोलना पड़ेगा—अगर वह ऐसा करता है तो वह बात आ ही गई जो तुम कह रहे हो?"

"तुम्हारी योजना ही ठीक है।" अच्छी तरह सोचने के बाद विमल ने कहा—"मगर उसका क्या करेंगे, जिसने विनीता की हत्या की है?"

"इस बारे में अभी तो हमें यही पता नहीं है कि वह कौन है और विनीता की हत्या उसने क्यों की है?" नसीम ने कहा— "इन दोनों सवालों का जवाब पाने के बाद ही हम उसका कुछ बिगाड़ सकते हैं—मगर ऐसा भी हम तभी कर सकेंगे जब मिक्की और रहटू के खतरे से मुक्त हों।"

"उनसे तो कल मुक्त हो जाएंगे।"

"एक सवाल यह बाकी रह जाता है कि सुरेश बने मिक्की पर सफेद एम्बेसेडर से कातिलाना हमला किसने किया था?"

"मेरा ख्याल तो यह है कि किसी ने हमला-वमला नहीं किया, वह सुरेश और रहटू की संयुक्त साजिश थी।" विमल ने कहा— "उन्होंने सोचा होगा कि जब रहटू नसीम बानो को यह कहकर फंसाएगा कि वह सुरेश का दुश्मन है और उसका मर्डर करना चाहता है तो अपनी कोशिश का एकाध उदाहरण भी देना होगा, सो उदाहरण के लिए ही उन्होंने ब्रेक फेल करने और सफेद एम्बेसेडर का ड्रामा किया।"

"तुम ठीक कहते हो।" कुछ सोचती हुई नसीम बानो चुटकी बजा उठी—"रहटू ने कहा भी था कि सुरेश पर एम्बेसेडर वाला हमला उसी ने किया—करेक्ट, वह मुझ पर यह विश्वास जमाना चाहता था कि वह वास्तव में सुरेश का दुश्मन है।"

"फिलहाल मैं चलता हूं।" कहता हुआ विमल उठकर खड़ा हो गया—"रात ठीक ढाई बजे गाड़ी के साथ यहां आऊंगा, क्योंकि यदि विनीता की लाश रात में ही ठिकाने नहीं लगाई गई तो यह हमारे लिए एक ऐसी मुसीबत बन जाएगी जिससे छुटकारा पाना मुश्किल हो जाएगा।"

"ओ.के.। वैसे भी साजिन्दे के आने से पहले तुम्हारा यहां से निकल जाना जरूरी है, अकेली विनीता को गायब पाकर वह सन्देह में पड़ सकता है।"

¶¶
 
रात के वक्त।

मेहनत तो जरूर करनी पड़ी मगर अपने प्रयास में वे सफल हो गए—सारा काम इच्छित ढंग से निपट गया और इसे उनका नसीब ही कहा जाएगा कि कहीं कोई ऐसी गड़बड़ नहीं हुई, जिसे सही मायने में व्यवधान कहा जा सके।

दस्ताने पहनकर गाड़ी विमल ने चलाई थी।

पिछली सीट पर बैठी नसीम के हाथों में भी दस्ताने थे।

सड़क पर लगे मील के पत्थर को तोड़ते हुए गाड़ी उन्होंने एक इतनी गहरी और छुपी हुई खाई में डाली थी कि पुलिस वहां दुर्गन्ध फैलने से पहले न पहुंच सके—इससे यह फायदा होने जा रहा था कि लाश की बरामदगी पर और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के बाद पुलिस यही समझती कि कार दिन ही में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी।

ऑपरेशन सफलतापूर्वक निपटाकर वे वहां से लौटे।

¶¶

"हैलो।" सम्बन्ध स्थापित होते ही विमल ने पूछा—"पुलिस स्टेशन?"

"यस।" दूसरी तरफ से कड़कड़ाती आवाज में कहा गया।

पौने छः बजा रही रिस्टवॉच पर एक नजर डालने के बाद विमल ने कहा— "बुद्धा गार्डन में चांदनी चौक का कुख्यात गुण्डा आइसक्रीम बेच रहा है।"

"फिर?" गुर्राकर कहा— "ये तो अच्छी बात है, अगर कोई गुण्डा बदमाशी छोड़कर आइसक्रीम बेचने लगा है तो आपके पेट में दर्द क्यों हो रहा है?"

"म.....मर्डर के लिए?”

“क्या बक रहे हो!”

"उसका नाम रहटू है, शायद आप परिचित हों—इतना नाटा है कि आइसक्रीम बेचने वालों में आप उसे पहचान लेंगे।"

"किसका मर्डर करना चाहता है वह?"

"ये तो नहीं बता सकता, मगर इतना जान लीजिए कि उसके पास आइसक्रीम के जो कप हैं, उनमें से कम-से-कम एक में जहर मिक्स है, लेबोरेटरी जांच के बाद यह साबित हो जाएगा, दरअसल वह ये कप उसे देने वाला है, जिसका मर्डर करना चाहता है।"

"अ.....आप कौन हैं?"

"एक ऐसा शहरी जिसे अपने कर्त्तव्य का बोध है।" कहने के बाद विमल ने आहिस्ता से रिसीवर हैंगर पर लटका दिया, उसी वक्त दूसरी तरफ से बोलने वाला कदाचित 'हैलो-हैलो' ही चिल्लाए जा रहा था, जब विमल ने माउथपीस से अपना रुमाल हटाकर जेब में ठूंसा और पब्लिक बूथ बाहर आ गया।

बूथ के समीप खड़ा एक पल वह कुछ सोचता रहा, फिर बड़बड़ाया—"नसीम बानो बेवकूफ थी जो विनीता की मौत के साथ यह समझ बैठी कि एक पाई भी हमारे हाथ नहीं लगनी है, इतने नोट तो मैं अब भी हथिया सकता हूं, जिससे इंग्लैण्ड जाकर अपनी अपनी जिन्दगी के बाकी साल शाही अंदाज में जीऊं।"

¶¶

सुरेश अथवा मिक्की की मारुति डीलक्स सवा छः बजे एक झटके से बुद्धा गार्डन के मुख्य गेट पर रुकी—पन्द्रह मिनट में बुरी तरह बेचैन हो चुकी नसीम उसकी तरफ लपकी, दरवाजा खोलकर मिक्की उस वक्त बाहर आ रहा था, जब उसके नजदीक पहुंचकर नसीम ने अपने बुर्के का नकाब उलटते हुए नागवारीयुक्त स्वर में कहा— "इतना लेट कैसे हो गए?"

"एक अजीब हादसा हो गया है।" सुरेश ने कहा।

नसीम ने धड़कते दिल से पूछा—"क्या?"

"विनीता कल दोपहर से गायब है।"

"ग.....गायब है?" नसीम ने खूबसूरत एक्टिंग की।

"हां, कल जब मैंने तुमसे फोन पर कहा था कि वह जल्दी में अपनी गाड़ी लेकर कहीं गई है, तभी से गायब है—कल रात तक तो मैंने या घर के किसी नौकर ने उसे आते नहीं देखा। जब रात तक तो लौट आना उसकी दिनचर्या थी—मैं ग्यारह बजे सो गया था, सुबह जब उठा तो काशीराम ने बताया कि वह रात-भर आई ही नहीं, तब मैं कुछ चौंका क्योंकि पूरी रात वह पहले कभी गायब नहीं रही, फिर भी यह सोचकर संतोष कर लिया कि रात ज्यादा पी गई होगी, नशा उतरेगा तो कुछ देर बाद लौट आएगी—मगर सारे दिन इन्तजार करने के बावजूद न वह स्वयं आई और न ही फोन पर कोई सूचना दी तो मेरा माथा ठनका और अब जाकर थाने में उसकी गुमशुदगी की कम्पलेंट लिखाकर आया हूं, उसी चक्कर में पन्द्रह मिनट लेट हो गया।"

"विनीता आखिर गई कहां होगी?"

"कुछ समझ में नहीं आ रहा, खैर.....मनू और इला कहां मिलेंगे?" मिक्की ने पूछा—"सोच रहा हूं कि आज उनसे भी फाइनल बात कर ही लूं।"

"वे अंदर ही कहीं, साढ़े छः बजे मिलेंगे—कह रहे थे कि तुम लोग घूमते रहना, जहां हम उचित समझेंगे, मिल जाएंगे।"

"ठीक है।" कहने के बाद मिक्की ने मारुति ठीक से पार्क की और चाबी जेब में डालकर उसके साथ गार्डन में दाखिल हो गया।

नसीम बानो ने नकाब गिरा लिया था।

आइसक्रीम बेच रहे रहटू के सामने से गुजरते वक्त अलग-अलग दोनों के दिलों ने बड़ी तेजी से धड़कना शुरू कर दिया—मिक्की यह सोचता रहा कि नसीम आइसक्रीम खाने के लिए कहने वाली है—और नसीम यह सोचती रह गई कि यह पेशकश मिक्की करेगा।

वे उसके ठेले के सामने से गुजर गए।

एकाएक मिक्की ने कहा— "आइसक्रीम खाओगी नसीम?"

"आं.....हां।" इंकार करने का मतलब था मिक्की को शक करना।

"आओ।" कहकर वह वापस रहटू की तरफ चल दिया।

नसीम बानो का दिल बुरी तरह पसलियों पर चोट कर रहा था। अब वह सोच-सोचकर मरी जा रही थी कि विमल ने अपना काम सही समय पर किया भी है या नहीं? पुलिस वहां पहुंचेगी भी या नहीं?

वे रहटू के नजदीक पहुंचे।

"क्या खिलाऊं साहब?" रहटू ने पूछा।

"दो पिस्ते वाले कप।"

रहटू ने पिस्ते वाले दो कप निकाले ही थे कि विद्युत गति से आने वाली पुलिस जीप एक झटके से, ब्रेकों की तीव्र चरमराहट के साथ मिक्की और नसीम के नजदीक रुकी।

पलक झपकते ही जीप से कूदने वाले सिपाहियों ने ठेले सहित रहटू को चारों तरफ से घेर लिया।

रहटू और मिक्की अवाक् थे।

जबकि मन-ही-मन एक निश्चिन्तता की सांस लेने के बावजूद नसीम बानो खुद को उन्हीं की तरह अवाक् दर्शा रही थी। पुलिस इंस्पेक्टर ने सुरेश से कहा— "हम रिक्वेस्ट करेंगे सर कि इस बदमाश की आइसक्रीम आप बिल्कुल न खाएं।"

"क.....क्यों, ऐसा क्या हुआ?"

"आइसक्रीम के किसी एक कप में इसने जहर मिला रखा है।"

"ज.....जहर?"

"जी हां।"

"क्या बक रहे हो, इंस्पेक्टर?" रहटू गुर्राया।

"शटअप।" इंस्पेक्टर ने दहाड़कर कहा— "इसे पकड़ लो।"

सिपाहियों ने आदेश मिलते ही उसे दबोच लिया। रहटू के विरोध का उन पर कोई असर नहीं हुआ था—मिक्की और नसीम बानो ठगे से खड़े सबकुछ देखते रहे—वह खेल, नसीम का किया हुआ तो खैर था ही, परन्तु रहटू और मिक्की की खोपड़ियां हवा में चकरा रही थीं।

वे समझ नहीं पा रहे थे कि इतनी बड़ी गड़बड़ हो कैसे गई?

रहटू को जीप में बैठाने के बाद इंस्पेक्टर ने तीन सिपाहियों को उसका ठेला थाने लाने के लिए कहा—जीप जिस तेजी के साथ आई थी, टर्न होकर उसी तेजी के साथ वापस चली गई।

मिक्की सोच तक न सका कि वह रहटू के लिए क्या कर सकता है?

¶¶
 
"अजीब जमाना आ गया है।" वह बड़बड़ाया—"अब तो बाजार में कोई चीज खाने का धर्म नहीं रहा, जब गुण्डे-बदमाश वस्तुओं में जहर मिलाकर बेचने लगे हैं तो बाकी बचा क्या?"

"मेरा दम तो अभी तक यही सोच-सोचकर सूखा जा रहा है कि जो कप वह हमें दे रहा था, यदि उन्हीं में से किसी में जहर होता तो क्या होता?" नसीम बानो ने उसी के सुर में सुर मिलाया।

अपने मन का चोर छुपाने के लिए मिक्की ने कहा— "जाने वह किसे मारना चाहता था?"

"ये गुण्डे-बदमाश मारने के तरीके भी अजीब-अजीब निकाल लेते हैं।"

इस तरह।

एक-दूसरे को बेवकूफ बनाते हुए वे टहलते रहे, एक स्थान पर ठिठककर मिक्की ने ट्रिपल फाइव सुलगाई और सुलगाने के बाद अभी चेहरा ऊपर उठाया ही था कि चौंक पड़ा।

ठीक सामने से चले जा रहे इंस्पेक्टर गोविन्द म्हात्रे पर नजर पड़ते ही उसका समूचा जिस्म इस तरह सुन्न पड़ता चला गया जैसे अचानक लकवे ने आक्रमण कर दिया हो।

म्हात्रे इस वक्त सादे लिबास में था।

बगैर पुलिसवर्दी के हालांकि मिक्की उसे पहली बार देख रहा था, परन्तु उस अत्यन्त पतले व्यक्ति को पहचानने में वह कतई भूल नहीं कर सकता था।

सोने का लाइटर हाथ में रह गया।

सिगरेट होंठों पर झूल रही थी। कश तक लगाने का होश नहीं था उसे और इस कदर होश गुम होने की वजह थी, म्हात्रे की यहां मौजूदगी।

म्हात्रे को सीधा अपनी ओर आता देखकर मिक्की के होश उड़ गए और उस वक्त तक गुमसुम ही था, जब उसके अत्यन्त नजदीक पहुंचकर म्हात्रे ने अपनी पतली उंगली वाला हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा— "हैलो मिस्टर सुरेश!"

"हैलो!" मजबूर मिक्की को हाथ बढ़ाना पड़ा।

कुटिल मुस्कराहट के साथ उसने कहा— "तो बाग में सैर हो रही है? ये मोहतरमा कौन हैं?"

मिक्की ने संभलकर कहा— "हैं कोई, आपको मेरी व्यक्तिगत जिन्दगी में दखल देने का कोई हक नहीं है।"

"मैं सिर्फ इन मोहतरमा के हसीन चेहरे को देखने का ख्वाहिशमन्द हूं, इसमें भला आपकी निजी जिन्दगी में दखल देने वाली क्या बात है?"

"ये मेरी गर्लफैड है और नहीं चाहती कि कोई इसे मेरे साथ देखे, आप हमारी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती इसका नकाब नहीं हटा सकते।"

"आज मैं यहां सिर्फ इनके चेहरे से ही नहीं, आपके चेहरे से भी नकाब हटाने के लिए हाजिर हुआ हूं बन्दानवाज।" एक-एक शब्द को चबाते हुए म्हात्रे कहता चला गया—"आज सारे पर्दे हट जाएंगे।"

मिक्की के पसीने छूट गए, मुंह से बोल न फूटा।

जबकि आंखों में चमक लिए, मिक्की को लगातार घूरता हुआ म्हात्रे बोला— "ये वही मोहतरमा हैं न जो स्वयं भी आपसे अपनी किस्म के व्यक्तिगत सम्बन्धों को नकारती रहीं और आप भी बार-बार यह कहते रहे कि नसीम बानो से आपके कोई व्यक्तिगत सम्बन्ध नहीं हैं।"

"य......ये नसीम नहीं है।" मिक्की गला फाड़कर चीख पड़ा।

म्हात्रे ने उतने ही आहिस्ता से कहा— "ये नसीम बानो ही हैं।"

"मैं कहता हूं होश में रहो इंस्पेक्टर वर्ना.....।"

"होश तो तुम्हारे ठिकाने लगाने हैं, मिस्टर सुरेश।" मिक्की की दहाड़ को बीच ही में काटकर म्हात्रे ने इस बार पुलिसिए स्वर में कहा— "तुम्हारी हिम्मत की दाद देनी होगी कि एक तरफ मुझसे लगातार कहते रहे कि नसीम से तुम्हारा कोई व्यक्तिगत सम्बन्ध नहीं है, दूसरी तरफ इसके साथ बागवानी भी कर रहे हो।"

"मैं फिर कहता हूं, इंस्पेक्टर......।"

"खामोश!" दहाड़ने के साथ ही इस बार म्हात्रे ने अपना रिवॉल्वर निकालकर उस पर तान दिया—"जितनी बकवास कर रहे हो, कुछ देर बाद वह सारी तुम्हें उल्टी पड़ने जा रही है।"

"क.....क्या मतलब?" मिक्की हकला गया।

इस बार म्हात्रे ने सीधा नसीम से कहा— "नकाब हटाओ नसीम बानो।"

नसीम ने उसकी बांदी के समान हुक्म का पालन किया।

ऐसा देखकर मिक्की के रहे-सहे होश भी उड़ गए। यह बात उसी कल्पनाओं से एकदम बाहर थी कि नसीम तनिक भी विरोध किए बिना ऐसा करेगी।

"इसकी तरफ देखो मिस्टर सुरेश और फिर कहो कि यह नसीम नहीं है।"

मिक्की गुम-सुम हो गया।

काटो तो खून नहीं।

इंस्पेक्टर म्हात्रे ने दूसरा हाथ हवा में उठाकर दो बार चुटकी बजाई और ऐसा होते ही दाईं-बाईं झाड़ियों से दो वर्दीधारी पुलिसमैन निकलकर उनकी तरफ लपके—उनमें से एक के पास हथकड़ी देखकर मिक्की का मस्तिष्क सुन्न पड़ गया।

"तुम्हें याद है न मिस्टर सुरेश कि मैंने क्या कहा था?" एक-एक शब्द पर जोर देता म्हात्रे बोला—“ किसी को गिरफ्तार कर लेता हूं तो, सजा तो उसे होती ही है—खासियत ये है कि पूरे केस के दरम्यान मैं उसकी जमानत भी नहीं होने देता और आज, इस क्षण मैं आपको गिरफ्तार कर रहा हूं—याद रखना, इस क्षण के बाद आप अपनी कोठी की सूरत नहीं देख पाएंगे।"

मिक्की बड़ी मुश्किल से कह पाया—"इतने सबूत हैं तुम्हारे पास?"

"सबसे बड़ा सबूत तो तुम अपने साथ ही लिए घूम रहे हो बेवकूफ—नसीम बानो, जानकीनाथ के मर्डर में तुम्हारी पार्टनर—फिलहाल तुम्हारे बचे-खुचे इरादों को धराशायी करने के लिए शायद इतना काफी है कि नसीम बानो ने सबकुछ स्वीकार कर लिया है—और अब, यह इस केस में सरकारी गवाह बन गई है।"

मिक्की का दिलो-दिमाग सचमुच धराशायी हो गया।

"करीब एक घण्टे पहले थाने में तुम्हारी मर्डर-पार्टनर सबकुछ स्वीकार कर चुकी है, इसी की योजनानुसार मैं यहां तुम्हारा इन्तजार कर रहा था।"

मिक्की का जी चाहा कि घूमे और नसीम की गर्दन पर अपने पंजे जमा दे।

¶¶

सुरेश के सेक्रेटरी के रूप में विमल मेहता का कोठी में आना-जाना था ही, अतः न उसे दरबान में रोकने की ताकत थी, न ही काशीराम कुछ कह सकता था। सो सबसे पहले उसने विनीता के कमरे में जाकर उसकी पर्सनल सेफ का लॉकर खाली किया।

कम-से-कम पच्चीस लाख की डायमंड ज्वैलरी थी वहां।

लॉकर को खाली करने के बाद अपना एयर बैग संभाले बीच का दरवाजा खोलकर सुरेश के कमरे में आया—वह घर का भेदी था। यह बात इसी से जाहिर है कि बिना किसी उलझन के उसने सुरेश की नम्बरों वाली सेफ खोल ली।

सौ-सौ के नोटों की अनेक गड्डियां उसमें ठुंसी थीं।

सभी को एयर बैग में डालने के बाद वापस विनीता के कमरे से होता हुआ गैलरी में पहुंचा.....इस रोमांच से कांपते हुए उसने जानकीनाथ के कमरे में कदम रखा कि अब तक वह कितने का मालिक बन चुका है?

जानकीनाथ की तिजोरी खाली करते-करते उसका बैग ठसाठस भर गया, चेन बन्द करके अभी खड़ा हुआ ही था कि—जानकीनाथ की रिवॉल्विंग चेयर की चूं-चां उसके कानों में पड़ी।

मुंह से आतंक में डूबा स्वर निकला—"क.....कौन है?"

रिवॉल्विंग चेयर विद्युत गति से घूम गई।

और।

विमल के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई हो, चेहरे पर दुनिया भर की हैरत लिए, आँखें फाड़े वह चेयर पर बैठी शख्सियत को देखता रह गया।

वे जानकीनाथ थे।

हां, जानकीनाथ।

बड़ी-बड़ी सफेद मूंछों, चौड़े और रुआबदार चेहरे वाले जानकीनाथ—उनके दोनों कानों से स्पर्श होते सफेद बाल परम्परागत अन्दाज में चांदी के मानिन्द चमक रहे थे—बाएं हाथ की मोटी उंगलियों के बीच सुलग रहा था एक सिगार।

दांए हाथ में रिवॉल्वर था।

वह रिवॉल्वर, जिसकी नाल का मुंह विमल को साक्षात् मौत के जबड़े के रूप में नजर आया—टांगें ही नहीं बल्कि समूचे अस्तित्व के साथ उसके दिलो-दिमाग भी किसी सूखे पेड़ के पत्तों के मानिन्द कांप रहे थे।

मुंह से आवाज न निकल सकी, जुबान तालू में जा चिपकी थी।

"क्यों?" फिजा में जानकीनाथ की रौबीली आवाज गूंजी—"हमें जिन्दा देखकर हैरान हो, सोच रहे हो कि ये अनहोनी हो कैसे सकती है?"

विमल अवाक्।

"अपनी तरफ से हमारा मर्डर करने में तुमने कोई कमी नहीं छोड़ी, हम तैरना नहीं जानते, इस जानकारी का तुमने खूब फायदा उठाया, मगर जिसकी मौत नहीं आई उसे कोई नहीं मार सकता विमल मेहता.....हमें महुआ ने बचा लिया था, बेहोश अवस्था में वह हमें अपने घर ले गया—होश में आने पर उसने बताया कि वह दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारे मर्डर की कोशिश थी—इसकी जानकारी उसे नाव से पानी उलीचते वक्त तली में बनाए गए छेद देखकर हुई—हम उलझन में पड़ गए कि हमारे मर्डर की कोशिश कौन कर सकता है—सोचा कि पता लगाने का इससे बेहतर रास्ता नहीं कि अपने मर्डर को हुआ 'शो' कर दें—तब एक लावारिस लाश खरीदकर हमने उसे जानकीनाथ बनाया—हां, विमल मेहता, वह एक भिखारी की लाश थी, जिसे बुरी तरह फूली और वीभत्स होने के कारण तुम्हीं ने नहीं बल्कि पुलिस ने भी हमारी लाश समझ लिया था।''

हक्का-बक्का विमल सुन रहा था।

जानकीनाथ ने पूरी सतर्कता के साथ सिगार में कश लगाया और बोले—"गायब होने के बावजूद यह पता नहीं लगा पा रहे थे कि हमारे मर्डर का षड्यन्त्र किसने रचा और एक दिन महुआ ने बताया कि उसके पास नसीम बानो आई थी, नसीम ने उससे जो बातें कीं उन्हें सुनकर हम इस नतीजे पर पहुंचे कि जल्दी-से-जल्दी हमारी सम्पत्ति का मालिक बनने के लिए सुरेश ने यह कोशिश की—हमारे तन-बदन में यह सोचकर आग लग गई कि जिसे गोद लेकर हमने अपना वारिस बनाया, वह इतना खतरनाक सपोला निकला—उसी वक्त हमने सुरेश को मजा चखाने का फैसला किया, महुआ को निर्देश दिया कि यदि इस बारे में पुलिस कुछ पूछे तो सचमुच उसे हर घटना से अनजान बने रहना है—हां, शुरू में हम यह समझे थे कि नसीम बानो के साथ सुरेश मिला है, इसीलिए एक बार उसके कत्ल की कोशिश की—भगवान का शुक्र है कि वह नाकाम हो गई, वर्ना तुम्हारे फैलाए षड्यंत्र में फंसकर हम सचमुच अनर्थ कर चुके थे—बस अड्डे पर सुरेश और नसीम के बीच होने वाली बातों से तो हमारे दिमाग में पूरा खाका ही स्पष्ट हो गया था कि हमारे मर्डर का प्लान क्या था—यदि उस वक्त हम नसीम बानो की जगह सुरेश का पीछा करते तो शायद हकीकत से वंचित रह जाते, परन्तु नसीब अच्छा था कि बस अड्डे से हमने नसीम का पीछा किया—नसीम को उसकी करनी का मजा चखाने का निश्चय हम उसी दिन कर चुके थे—सो, गुप्त तरीके से कोठे में घुसे और तब हमने नसीम, विनीता और तुम्हारी वे बातें सुनीं जिन्हें करते वक्त तुम लोग सुरेश की स्वीकारोक्ति पर हैरान थे—वहां हमें अपने असली हत्यारों के चेहरे देखने को मिले और साथ ही यह भी पता लगा कि हमारे मर्डर के जुर्म में हमारे ही बेटे को फंसाने की लगभग सारी तैयारी पूरी हो गई है—यह सोचकर हम भी हैरान हो उठे कि सुरेश नसीम के साथ हमारी हत्या में शामिल नहीं था तो बस अड्डे पर वह ऐसी बातें क्यों कर रहा था, जैसे वही हत्यारा हो—फिर हमें लगा कि वास्तव में वह अपने अन्दाज में तुम्हें चकमा देने की कोशिश कर रहा है—हमें उसकी नादानी पर प्यार आया, सोचा कि तुम लोगों को धोखा देने की वह कितनी बेवकूफाना हरकत कर रहा है—लगा कि यदि जल्दी ही हमने कुछ न किया तो वह मासूम तुम्हारे जाल में फंस जाएगा।"

विमल की तंद्रा अभी तक नहीं टूटी थी।

"अरे.....तुम तो जरूरत से ज्यादा हैरान हो, हमारे ख्याल से तुम्हें हैरान होना तो चाहिए था, मगर इतना ज्यादा नहीं—कम-से-कम विनीता की मौत के बाद तो यह अहसास हो ही जाना चाहिए था कि हम दुनिया में कहीं हो सकते हैं।"

विमल को लगा कि जानकीनाथ अभी तक इस रहस्य से वाकिफ नहीं है सुरेश, सुरेश नहीं बल्कि मिक्की है।

जानकीनाथ अपनी ही धुन में कहते चले गए—"आज तुम लोगों का खेल खत्म हो जाएगा विमल मेहता, कुछ देर बाद मेरे कमरे में तुम नहीं बल्कि तुम्हारी लाश पड़ी होगी और नसीम.....गन्दी नाली की उस दुमई को अपने हाथों से मारना भी हम पाप समझते हैं, उससे पुलिस ही निपटेगी।"

"प.....पुलिस?" विमल के मुंह से पहला शब्द निकला।

"हां पुलिस......जो कुछ तुम्हें अभी-अभी बताया, वह सब एक लिफाफे में बंद करके हम हम थाने में, इंस्पेक्टर गोविन्द म्हात्रे के एक सिपाही को यह कहकर दे आए हैं कि म्हात्रे के आते ही लिफाफा उसे दे—तुम्हारी हकीकत बताने के साथ वह लिफाफा—हमने वहां इसलिए भी दिया है ताकि म्हात्रे को पता लग जाए कि हमारा बेटा निर्दोष है, वह धाकड़ इन्वेस्टिगेटर भी आज तक यही समझ रहा है कि हमारी हत्या हमारे बेटे सुरेश ने की है।"

विमल का जी चाहा कि वह चीखे।

चीख-चीखकर जानकीनाथ को बताए कि वह तेरा बेटा सुरेश नहीं, बल्कि मिक्की है। तेरे बेटे का हत्यारा। मगर यह बात जानकीनाथ को बताने में उसे दूर-दूर तक अपना कोई फायदा नजर नहीं आया।

जानकीनाथ की मौजूदगी ने सारे समीकरण ही बदल दिए थे।

यह बात भी विमल की समझ में आ रही थी कि जो लिफाफा जानकीनाथ थाने में म्हात्रे के लिए छोड़कर आया है, वह उनकी समूची साजिश और थाने में चल रहे ड्रामें को एक ही झटके में धराशायी कर देगा।

अब की तरकीब उसे या नसीम को नहीं बचा सकती।

नसीम पूरी तरह फंस चुकी है।

मगर मैं.....।

मेरे पास अभी मौका है।

इस विचार ने बड़ी तेजी से उसके दिमाग में सरगोशी की—'फिलहाल मेरे रास्ते में एकमात्र अड़चन वह रिवॉल्वर है, अगर किसी तरह मैं उसे धोखा दे दूं तो साफ बचकर निकल सकता हूं—भाड़ में जाए नसीम बानो और मिक्की—साथ ही बूढ़ा भी, जो यह समझे कि सुरेश, उसका बेटा सुरेश ही है।'

इस वक्त विमल को सिर्फ खुद को बचाने की पड़ी थी।

बोला— "अगर आप मुझे बख्श दें सेठजी तो मैं एक ऐसा राज बता सकता हूं, जो आपको तबाह होने से बचा लेगा।"

"अच्छा!" कुटिल मुस्कराहट के साथ जानकीनाथ ने व्यंग्य-भरे स्वर में कहा— "अब भी कोई ऐसा राज है जो हमें तबाह कर सके?"

"हां सेठजी।" विमल ने बाएं जूते के पंजे से दांए पैर की ऐड़ी जूते से बाहर निकलते हुए कहा— "मुझे इस बात पर हैरत है कि वह राज अभी तक आपको पता क्यों नहीं लगा—क्या आपने कल वे बातें नहीं सुनीं जो आपकी सुईं का शिकार होने के बाद नसीम के कोठे पर आकर विनीता ने हमें बताई थीं?"

"हमें बार-बार छुपकर बातें सुनने की आदत नहीं।"

बिना फीते के दाएं जूते को अपने पैर के पंजे में झुलाते हुए विमल ने पूछा—"इसका मतलब आपने कभी सुरेश और रहटू की बातें भी नहीं सुनीं?"

"र.....रहटू?" जानकीनाथ चौंके।

"हां रहटू।" ये शब्द कहने के साथ ही अच्छी तरह निशाना तानकर विमल ने दाएं पैर से अपना जूता जानकीनाथ के हाथ में दबे रिवॉल्वर पर मारा।

जानकीनाथ हड़बड़ा गए।

जूता चूंकि सही निशाने पर लगा था, अतः रिवॉल्वर उनके हाथ से निकल गया, जानकीनाथ को कोई मौका नहीं देने की गर्ज से जूते के पीछे ही पीछे विमल ने स्वयं भी जम्प लगा दी।

परन्तु—

तब तक रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे जानकीनाथ घूम चुके थे।

झोंक में विमल कुर्सी की पुश्तगाह से टकराकर एक चीख के साथ पीछे उलट गया, जबकि जानकीनाथ सीधे फर्श पर पड़े रिवॉल्वर पर झपटे।

रिवॉल्वर हाथ में आया ही था कि विमल ने उन्हें दबोच लिया—विमल का एक हाथ जानकीनाथ की उस कलाई को जकड़े हुए था जिसमें रिवॉल्वर था।

उनमें संघर्ष होने लगा।

पांच मिनट की जद्दो-जहद के बाद जानकीनाथ अपने हाथ में दबे रिवॉल्वर की नाल का रुख कमरे की छत की ओर करने में कामयाब हो गए—उन्होंने यह महसूस किया कि विमल उन पर भारी पड़ रहा है—इस उम्मीद के साथ ट्रिगर दबा दिया कि फायर की आवाज से कोई उनकी मदद के लिए आ सकता है।

परन्तु।

गोली चलने के साथ ही कमरे में विमल के हलक से निकलने वाली चीख गूंज गई। गाढ़े खून के छींटों ने उछलकर उनके चेहरे को रंग दिया।

उनके ऊपर पड़े विमल का जिस्म निर्जीव हो चुका था।

जानकीनाथ बौखलाकर फर्श से उठे। उनके साथ ही विमल का जिस्म भी एक कलाबाजी-सी खाता वापस 'पट्ट' से फर्श पर गिरा।

वह लाश में तब्दील हो चुका था।
 
हैरान जानकीनाथ आंखें फाड़े उसके सिर पर बने गोली के छेद और उससे बहते गाढ़े, गर्म लहू को देखते रह गए—उनके द्वारा चलाई गई गोली विमल के सिर में धंस गई थी।

विमल के पास ही फर्श पर विमान का एक टिकट पड़ा था।

कदाचित वह कलाबाजी के वक्त उसकी जेब से गिरा था। जानकीनाथ ने झुककर टिकट उठाया, खोलकर पढ़ा और फिर नफरत-भरे स्वर में गुर्रा उठा—"सारा कैश समेटकर लंदन भागने के ख्वाब देख रहा था कमीना।"

तभी—

कमरे का बन्द दरवाजा पीटा गया और काशीराम की आवाज सुनाई दी—"कौन है अंदर, दरवाजा खोलो.....वर्ना हम इसे तोड़ देंगे।"

¶¶

नाव में छेद करते सुरेश का फोटो मिक्की के सामने मेज पर रखा था और मेज पर रखा वह छोटा-सा टेप भी चल रहा था, जिसमें से उसकी अपनी और नसीम बानो की वे आवाजें निकल रही थीं जो उनके मुंह से बस अड्डे पर निकली थीं।

मिक्की का मस्तिष्क अंतरिक्ष में घूम रहा था।

बचाव का कोई रास्ता अब उसे दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिया—लग रहा था कि जब सुरेश की मर्डर-पार्टनर ही न सिर्फ टूट चुकी है, बल्कि सरकारी गवाह बन चुकी है तो आगे किया ही क्या जा सकता है?

उसके ठीक सामने गोविन्द म्हात्रे बैठा था।

दाईं तरफ नसीम।

सशस्त्र पुलिस वाले मेज के चारों तरफ से घेरे खड़े थे।

सारे पासे पलटने की मिक्की को सिर्फ एक ही वजह नजर आ रही थी—उसे लग रहा था कि नसीम को किसी तरह उसके और रहटू के संयुक्त प्लान से अपने होने वाले मर्डर की भनक लग गई होगी—तभी तो वह सरकारी गवाह बन गई।

रहटू की गिरफ्तारी के पीछे भी उसे यही वजह नजर आ रही थी।

अब याद आ रहा था कि गार्डन में नसीम ने उससे आइसक्रीम खाने के लिए क्यों नहीं कहा था। वजह साफ थी—उसे भनक लग गई होगी कि आइसक्रीम में जहर मुझे नहीं बल्कि उसे दिया जाने वाला है।

मगर।

यह भनक लगी कैसे होगी?

क्या विनीता की गुमशुदगी का इससे कोई सम्बन्ध है?

मिक्की यही सब सोचता रहा और उधर टेप समाप्त होने पर म्हात्रे ने टेपरिकार्डर ऑफ कर दिया। यही समय था जब उसके दाईं तरफ खड़े पुलिसमैन ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकालकर उसे देते हुए कहा— "करीब एक घण्टा पहले एक आदमी ये लिफाफा दे गया था, सर।"

लिफाफा हाथ में लेते हुए म्हात्रे ने पूछा—"क्या है इसमें?"

"मैंने खोलकर नहीं देखा सर, वह खातौर पर कह गया था कि उसे आप ही खोलें—कहता था कि उसे खोलते ही इंस्पेक्टर म्हात्रे एक ऐसा केस हल कर लेंगे जो उनके लिए आजकल दर्देसिर बना हुआ है।"

"कौन था वह आदमी?"

"नाम तो उसने अपना नहीं बताया, सर।"

"स्टुपिड।" अचानक गुर्राते हुए म्हात्रे ने लिफाफा एक तरफ फेंक दिया और पुलिसमैन पर बरसा—"किसने तुम्हें पुलिस में भर्ती कर लिया, पहले एक ऐसे आदमी से लिफाफा लेते हो जो अपना नाम तक नहीं बताता, फिर उसे थाने से चले जाने देते हो और ऊपर से यह कारस्तानी मुझे ही बताते हो—वह भी तब जबकि मैं इन्तहाई जरूरी केस को सॉल्व कर रहा हूं?"

"स.....सॉरी सर।" पुलिसमैन गिड़गिड़ाया—"इतनी देर ये यह मैंने आपकी व्यस्तता की वजह से ही नहीं दिया था।"

"तो क्या इस वक्त मैं तुम्हें खाली नजर आया था?"

"टेप खत्म होने पर मैंने सोचा सर.....।"

"शटअप!" म्हात्रे गुर्राया—"एण्ड गेट आऊट, जब तक यहां चल रहीं बातें खत्म न हो जाएं, तब तक मैं तुम्हारी शक्ल बर्दाश्त नहीं कर सकता, लिफाफा उठाकर एकदम बाहर हो जाओ।"

बुरी तरह पुलिसमैन ने ऐसा ही किया।

खुद को व्यवस्थित करने के बाद गोविन्द म्हात्रे ने अपनी नजरें पुनः मिक्की पर जमा दीं और होंठों पर विशिष्ट मुस्कान उत्पन्न करके बोला—"इस फोटो, अपनी मर्डर-पार्टनर की स्वीकारोक्ति और टेप में भरी खुद अपनी स्वीकारोक्ति के बावजूद भी क्या आपको कुछ कहना है मिस्टर सुरेश?"

"न.....नहीं।" उसने जबड़े भींचकर कहा।

"हुंह.....यानी आपके ख्याल से भी ये सबूत आपको फांसी के फंदे तक पहुंचाने के लिए मुकम्मल है?"

मिक्की कुछ बोला नहीं।

जबड़े भींचे रखे उसने—सबसे ज्यादा अफसोस उसे इस बात का था कि वह अपने द्वारा किए गए किसी जुर्म में नहीं बल्कि सुरेश द्वारा किए गए मर्डर में फंस रहा था—वह तय नहीं कर पा रहा था कि अपना मिक्की होने का राज खोले या नहीं?

उस रास्ते पर भी उसे सीधा फांसी का फंदा नजर आ रहा था।

फायदा क्या होगा?

"जितने सबूतों के आप मुझसे तलबगार थे, वे पूरे हो गए हैं या अभी कोई कमी बाकी है, मुझे तुमसे सिर्फ इस सवाल का जवाब चाहिए।"

जाने क्यों मिक्की को उसके पूछने के अंदाज पर गुस्सा आ गया, गुर्राया—"मेरा मुंह मत खुलवाओ इंस्पेक्टर, जो तुमने जुटा लिया, सब ठीक है।"

"ओह, तो तुम अब भी इस खुशफहमी का शिकार हो कि यदि तुमने मुंह खोल दिया तो इन सारे सबूतों को सिरे से बेकार कर दोगे?"

म्हात्रे का लहजा ऐसा था कि मिक्की का तन-बदन सुलग उठा, गुर्राया- "फिलहाल मैं सिर्फ इतना कह रहा हूं इंस्पेक्टर कि 'मैं' जानकीनाथ का हत्यारा नहीं हूं।''

"ओह!" म्हात्रे के मस्तक पर बल पड़ गए, अत्यन्त जहरीले स्वर में उसने कहा— "यानी अपनी आवाज के टेप और इस फोटो के बावजूद तुममें यह कहने की हिम्मत है, वाह.....मान गए मिस्टर सुरेश.....मान गए कि तुम और कुछ हो, न हो मगर ढीठ अव्वल दर्जे के हो।"

"अपनी गन्दी जुबान बन्द रखो, इंस्पेक्टर।"

"खामोश!" म्हात्रे उससे कहीं ज्यादा बुलन्द स्वर में गुर्राया—"तुम्हारी अमीरी का रुआब खाने वाले पुलिसिए कोई और होंगे मिस्टर सुरेश, कल तक तुम मुझसे सबूत मांग रहे थे, मैंने पेश कर दिए, अब स्वयं को बेगुनाह कहने की कोशिश की तो मैं जुबान खींच लूंगा।"

मारे गुस्से के मिक्की पागल-सा हो गया, दिमाग में केवल एक ही बात कौंधी कि वह कुछ और कर सके या न कर सके, इस बदमिजाज इंस्पेक्टर के गरूर को तो चूर-चूर कर ही सकता है।

क्यों न वह ऐसा ही करे?

सजा तो जानकीनाथ के मर्डर की भी वही मिलनी है और सुरेश के मर्डर की भी, म्हात्रे अभी तक जिस अंदाज में उसकी तरफ देख रहा था उसने मिक्की की आत्मा तक को सुलगाकर रख दिया और वह हलक फाड़कर चिल्ला उठा—"कान खोलकर सुन लो इंस्पेक्टर, मैं जानकीनाथ का हत्यारा नहीं हूं।"

"मैं सबूत मांग रहा हूं।"

"सबूत ये है।" मिक्की ने अपने दोनों हाथ उसके सामने फैला दिए—"मेरे हाथ, मेरी उंगलियों के निशान—।"

"हुंह.....तुमने प्लास्टिक सर्जरी वाली.....।"

"वह तुम्हारे दिमाग की कल्पना है बेवकूफ, सुरेश ने किसी किस्म की प्लास्टिक सर्जरी का इस्तेमाल नहीं किया था, मगर फिर भी इन उंगलियों के निशान सुरेश की उंगलियों से नहीं मिल सकते।"

"मतलब?"

"तुम्हारे सामने फैलीं ये उंगलियां सुरेश की नहीं हैं, बेशक जानकीनाथ की हत्या सुरेश ने की होगी, मगर तुम्हारे सामने बैठी ये शख्सियत सुरेश नहीं है मूर्ख इंस्पेक्टर।"

"क.....क्या?" म्हात्रे के नीचे से जैसे कुर्सी सरक गई हो, चेहरे पर बवण्डर लिए उसने हैरत-भरे स्वर में पूछा—"स......सुरेश नहीं हो?"

उसकी हालत का आनन्द लेते हुए मिक्की ने कहा, "हां।"

"फ.....फिर कौन हो तुम?"

एक नजर मिक्की ने नसीम बानो के निस्तेज हो चले चेहरे पर डाली, जेहन में उसे भी मजा चखाने का विचार आया और फिर म्हात्रे की आंखों में आंखें डालकर उसने बड़े ठोस शब्दों में कहा— "मेरा नाम मिक्की है, सुरेश का जुड़वां भाई हूं मैं।"

"म.....मिक्की?" म्हात्रे उछल पड़ा।

उसे इस मुद्रा में देखकर मिक्की को अजीब-सी खुशी हुई, बोली— "जी हां, हिन्दुस्तानी शरलॉक होम्ज साहब, मेरा नाम मिक्की है और अब यदि तुम अपने इन बोगस सबूतों और सरकारी गवाह यानी इस रण्डी के आधार पर मुझे एक मिनट की भी सजा दिलवा सको तो जानूं।"

"त.....तुम सुरेश के जुड़वां भाई हो?" म्हात्रे की हैरत कम नहीं हो पा रही थी।

मिक्की ने बड़े दिलचस्प स्वर में कहा— "आप बहरे हो गए हैं क्या?"

"कोई सबूत?"

"सबूत आपको पहले ही दे चुका हूं, पुलिस के पास मेरा पूरा रिकॉर्ड है—उंगलियों के जो निशान मैंने आपको दिए थे, फिंगर प्रिन्ट्स सेक्शन में फोन करके उनका मिलान मिक्की की उंगलियों के निशान से कराइए।"

हतप्रभ गोविन्द म्हात्रे ने तुरन्त रिसीवर उठाकर पुलिस के फिंगर प्रिन्ट्स सेक्शन को आवश्यक निर्देश देने के बाद कहा— "मुझे पन्द्रह मिनट के अंदर-अंदर रिपोर्ट चाहिए, तुम्हारी रिपोर्ट पर एक बहुत उलझे हुए केस का दारोमदार टिका है।"

उधर।

नसीम बानो के सारे इरादे धूल में मिल चुके थे—उसकी समस्त आशाओं के विपरीत मिक्की ने अपना मिक्की होना स्वीकार कर लिया था—हालांकि उसकी समझ के मुताबिक मिक्की ने महाबेवकूफी की थी, मगर उसकी ये बेवकूफी नसीम के गले का फंदा बन चुकी थी।

इंस्पेक्टर म्हात्रे ने रिसीवर क्रेडिल पर रखा ही था कि वहां आवाज गूंजी—"तुमने इस लिफाफे में रखा कागज न पढ़कर बहुत बड़ी गलती की है इंस्पेक्टर, मेरे बेटे को हत्यारा करार देने से पहले इसे पढ़ लो।"

इन शब्दों के साथ जिस हस्ती ने वहां कदम रखा, उसे देखते ही नसीम, मिक्की और इंस्पेक्टर म्हात्रे के पैरों तले से जमीन खिसक गईं।

खोपड़ियां घूम गईं।

वे जानकीनाथ थे।

"अ......आप?" म्हात्रे के मुंह से निकला।

"हां, मैं—।" उसकी तरफ बढ़ते हुए जानकीनाथ ने कहा— "मैं मरा नहीं हूं, इंस्पेक्टर, मारने वाले से बचाने वाले के हाथ लम्बे होते हैं—मेरा बेटा, मेरा सुरेश बेगुनाह है—मेरे असली कातिल विमल, विनीता और नसीम बानो हैं—विनीता और विमल को अपने हाथों से सजा दे चुका हूं, नसीम बानो को कानून सजा देगा—मुझे अपने किए पर पश्चाताप नहीं है—खुद को कानून के हवाले करने आया हूं, कानून जो उचित समझे सजा दे मगर मेरे बेटे को छोड़ दो, यह पूरी तरह निर्दोष है—इस मासूम को तो इन तीनों शैतानों ने अपने जाल में फंसाकर यहां ला बैठाया है।" जानकीनाथ की आवाज के अलावा वहां सन्नाटा-ही-सन्नाटा था।

हरेक के दिलो-दिमाग पर सवार।

सबसे ज्यादा सन्नाटा सवार था मिक्की के दिमाग पर।

अपने हाथ में दबे लिफाफे को म्हात्रे के सामने डालते हुए जानकीनाथ ने कहा— "अभी तक इसे न पढ़कर तुमने बहुत बड़ी गलती की है इंस्पेक्टर, इसे पढ़ो.....इसमें लिखा है कि मैं कैसे बचा, जिस भ्रमजाल में तुम हो, उसी में फंसकर मैंने किस तरह एक बार अपने बेटे की हत्या का प्रयास किया और फिर किस तरह मैं अपनी हत्या का षड्यन्त्र रचने वालों तक पहुंचा, इसमें सबकुछ ब्यौरेवार लिखा है।"

और अब।

जब मिक्की के जेहन ने काम करना शुरू किया और उसकी समझ में आया कि क्या कुछ हो गया है तो उसकी इच्छा अपने सिर के सारे बाल नोंच डालने की हुई।

एक.....सिर्फ एक मिनट पहले ही तो उसने स्वीकार किया था कि वह मिक्की है।

उफ.....ये क्या हो गया भगवान?

क्या जानकीनाथ एक मिनट पहले नहीं आ सकता था, क्या लिफाफे में रखे कागजों को ये मूढ़मगज इंस्पेक्टर पहले नहीं पढ़ सकता था?

उफ!

एक मिनट के फेर में सारा खेल बिगड़ गया।

मिक्की का दिल चाहा कि पलक झपकते ही उसके नाखून राक्षसों की तरह लम्बे हो जाएं और फिर इन नाखूनों से वह अपना चेहरा नोच डाले।

खून पी जाए अपना।

फिंगर प्रिन्ट्स के रूप में वह एक ऐसा पुख्ता सबूत दे चुका था कि अब लाख कोशिशों के बावजूद खुद को सुरेश साबित नहीं कर सकता था—मिक्की का जी चाह रहा था कि यदि मेरा नसीब इंसान के रूप में सामने आ जाए तो उसके टुकड़े-टुकड़े कर दूं। शक्ल इतनी बिगाड़ दूं कि खुद को पहचान न सके।

"ब.....बेटे सुरेश।"

ममता का मारा जानकीनाथ मिक्की की तरफ बढ़ा ही था कि बहुत देर से खामोश बैठी नसीम बानो ने चीखकर कहा— "जिसके लिए तुम पागल हुए जा रहे हो जानकीनाथ, वह तुम्हारा बेटा नहीं, मिक्की है।"

"म.....मिक्की?" जानकीनाथ के हलक से चीख निकल गई।

"हां, मिक्की—सुरेश का हत्यारा, तुम्हारे बेटे का कातिल।"

"कौन कहता है कि मिक्की सुरेश का कातिल है?" दहाड़ता हुआ रहटू इंस्पेक्टर म्हात्रे के ऑफिस में दाखिल हुआ।

उसे देखते ही मिक्की सहित कई के मुंह से निकला—"त.....तुम?"

"हां, मैं.....मैं तेरी कोई चाल कामयाब नहीं होने दूंगा। अमीरों की दौलत चूसने वाली गन्दी तवायफ—तेरा यह इरादा खाक में मिला दूंगा मैं।"

"म.....मगर रहटू, तू यहां?" मिक्की चकित था—"तुझे तो पुलिस पकड़कर ले गई थी न?"

"छोड़ दिया, मुझसे माफी भी मांगनी पड़ी उन्हें।"

"क्या मतलब?"

"किसी अज्ञात आदमी के फोन कर दिया था कि मेरी आइसक्रीम के किसी कप में जहर है, बस—पुलिस इतनी बेवकूफ है कि उसने मुझे आकर गिरफ्तार कर लिया, मगर जांच के बाद किसी भी कप में जहर नहीं पाया गया—बस, पुलिस ने न सिर्फ छोड़ दिया बल्कि मुझे हुई असुविधा के लिए माफी भी मांगी।"
 
रहटू के चमत्कार से मिक्की चमत्कृत रह गया।

और वह, जो सबसे नाटा था—नसीम बानो के ठीक सामने आकर गुर्राया—"क्या बक रही थी तू.....मिक्की सुरेश का हत्यारा है?"

"हां।" खुद को फंसते देख नसीम बानो की हालत पागलों जैसी हो गई थी—"एक बार नहीं हजार बार कहूंगी कि ये सुरेश का हत्यारा है, उसकी दौलत पर कब्जा करने के लिए इसने सुरेश की हत्या की और हमशक्ल होने का लाभ उठाकर सुरेश बन बैठा।"

नाटे शैतान ने नसीम बानो के स्थान पर सीधे गोविन्द म्हात्रे से कहा— "ये चालाक और खतरनाक वेश्या एक बार फिर तुम्हें धोखा देने की कोशिश कर रही है इंस्पेक्टर, मिक्की ने सुरेश की लाश को अपनी लाश 'शो' करके सुरेश का रूप जरूर धरा है, मगर उसकी हत्या नहीं की—सुरेश की लाश को पेश करके मिक्की ने अपनी आत्महत्या का नाटक जरूर रचा है, परन्तु किसी नापाक इरादे के साथ नहीं—मुझसे ज्यादा इसे कोई नहीं जानता, इस सारे अभियान में मैं इसके साथ हूं—ये हकीकत है कि इसने हर कदम नेक इरादे के साथ उठाया।"

"तुम कहना क्या चाहता हो?"

"यह बक रहा है, इंस्पेक्टर।" नसीम बानो आपे से बाहर होकर चीख पड़ी—"हकीकत ये है कि मिक्की ने सुरेश की हत्या की और फिर हमशक्ल होने का लाभ.....।"

"शटअप!" म्हात्रे ने उससे ऊंची आवाज में नसीम को डांटा—"मेरी इजाजत बिना तुम एक लफ्ज नहीं बोलोगी।"

नसीम बानो सकपका गई।

"तुम बोलो मिस्टर रहटू, क्या कह रहे थे?"

"सुरेश की पत्नी विनीता ही नहीं, बल्कि उसके नौकर तक मिक्की की गरीबी के कारण इससे नफरत करते थे—इस बात के गवाह जानकीनाथ भी हैं कि सुरेश मिक्की से प्यार करता था—मिक्की के दिल में भी सुरेश के लिए उतना ही प्यार था, इस बात का गवाह मैं हूं—मिक्की सुरेश से मिलने अक्सर कोठी पर जाता था, सुरेश के अलावा इससे कोई भी बात नहीं करता था, अतः इसे सीधा सुरेश के कमरे में ही पहुंचा दिया जाता था—उस दिन जब यह सुरेश से मिलने गया तो नफरत से मुंह सिकोड़ते हुए विनीता ने इसे सुरेश के कमरे में जाने की इजाजत दे दी, मगर कमरे में कदम रखते ही मिक्की के होश उड़ गए—सुरेश की लाश अपने कमरे के पंखे में झूल रही थी—दृश्य ऐसा था जैसे उसने आत्महत्या कर ली हो, मारे डर के मिक्की चीख के साथ अभी कमरे से भागना ही चाहता था कि दिमाग में यह ख्याल आया कि सुरेश आत्महत्या क्यों करेगा?

मिक्की की समझ में ऐसी कोई चीज या बात नहीं आ रही थी जिसका सुरेश को अभाव हो और मिक्की यह सोचकर रुक गया कि सर्वसुख सम्पन्न सुरेश ने भला आत्महत्या क्यों की—कमरे में पैनी नजर घुमाने के बाद मिक्की को सुरेश की ऐश-ट्रे में ट्रिपल फाइव के टोटों के बीच 'चांसलर सिगरेट' का एक टोटा नजर आया—अलग रंग का होने के कारण वह दूर से साफ चमक रहा था, जबकि मिक्की अच्छी तरह जानता था कि सुरेश सिर्फ और सिर्फ ट्रिपल फाइव की सिगरेट पीता था—फिर चांसलर किसने पी—सारांश ये कि मिक्की समझ गया कि सुरेश ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उसका मर्डर किया गया है—उस वक्त मिक्की जिस तरह गया था, उसी तरह दरवाजा भिड़ाकर वहां से आ गया—सारा हाल मुझे बताने के बाद यह फूट-फूटकर रोने लगा, कहने लगा कि जाने किस कमीने ने मेरे भाई की हत्या कर दी—अगर वह मुझे कहीं मिल जाए तो मैं उसके टुकड़े-टुकड़े कर दूं—हमने सोचा कि सुरेश की लाश मिलने पर मुमकिन है कि पुलिस इसे आत्महत्या का केस मानकर फाइल बन्द कर दे, ऐसी हालत में सुरेश के हत्यारे का पता तक नहीं लगना था।''

''तुमने ऐसा कैसे सोच लिया?" म्हात्रे ने पूछा—"जब मिक्की ने ताड़ लिया कि वह हत्या है तो पुलिस को क्या तुम बेवकूफ समझते हो?"

"मैं, सिर्फ वह बता रहा हूं जो उस वक्त हमने सोचा, ये अलग बात है कि उसे आज आप गलत करार दें या नहीं।" रहटू कहता चला गया—"वैसे आप हर पुलिस वाले को अपनी तरह ईमानदार न समझें, इंस्पेक्टर म्हात्रे—मैंने अपने जीवन में ऐसे-ऐसे पुलिस अफसर देखे हैं जो थीड़ी-सी रकम के लिए न सिर्फ ऐसे सबूतों को अनदेखा कर देते हैं, जिन्हें अन्धा भी देख ले, बल्कि उन्हें गायब भी कर देते हैं। उसके फेवर में नए सबूत घटनास्थल से बरामद भी दिखा देते हैं, जिसे हरे नोट मिले हों।"

"खैर, तुम आगे बढ़ो।"

"हम इस नतीजे पर पहुंचे कि अगर सुरेश के हत्यारों का पता लगाना है तो मिक्की को सुरेश बन जाना चाहिए।"

"हत्यारों का पता लगाने के लिए सुरेश बनना ही क्या जरूरी था?"

"हमने सोचा था कि जब हत्यारा अपने से मार दिए गए सुरेश को जीवित देखेगा तो चकरा जाएगा, सुरेश बने मिक्की के इर्द-गिर्द पहुंचने की कोशिश करेगा और उसकी इसी गलती की वजह से हमें सफलता जल्दी मिल जाएगी।"

"ओह।"

"हम उसी समय रेन वाटर पाइप से चोरों की तरह सबसे छुपकर सुरेश के कमरे मे पहुंचे—लाश की यथास्थिति बता रही थी कि संयोग से उस वक्त तक घर के किसी सदस्य ने कमरे में कदम नहीं रखा था—हमने लाश उतारी, मिक्की सुरेश बना—और मिक्की के कपड़े सुरेश की लाश को पहना दिए गए—सुरेश बने मिक्की ने उसी वक्त कमरे से बाहर निकलकर न सिर्फ अपने कमरे को लॉक कर दिया बल्कि विनीता से यह भी कह कि वह बिजनेस के सिलसिले में दिल्ली से बाहर जा रहा है—प्रत्यक्ष में रवाना होकर यह कुछ देर बाद खिड़की के रास्ते पुनः कमरे में आ गया—मैं सुरेश की लाश के साथ वहां था ही—अब हमारे सामने समस्या सुरेश की लाश को ठिकाने लगाने की थी और उसे ठिकाने लगाने का इससे बेहतर हमें कोई रास्ता सुझाई नहीं दिया कि उसकी लाश को मिक्की की लाश दर्शा दिया जाए—योजनानुसार मिक्की ने लम्बे सुसाइड नोट वाली डायरी लिखी, लाश को अंधेरे का लाभ उठाकर हमने मिक्की के कमरे में पहुंचाया और वहां लाश किस हालत में मिली—पुलिस ने उसे मिक्की से आत्महत्या किस तरह माना, इस सबका ब्यौरा पुलिस फाइल में दर्ज है।"

"तुम्हारी इस कहानी का लब्बो-लुआब ये है कि मिक्की सुरेश की हत्या करके उसकी दौलत हड़पने के लिए सुरेश नहीं बना, बल्कि इसका मकसद सुरेश के हत्यारों तक पहुंचना और उनसे बदला लेना था?"

"आप सही समझ रहे हैं, इंस्पेक्टर म्हात्रे परन्तु 'कहानी' शब्द का इस्तेमाल आपने गलत किया है, मैंने आपको कहानी नहीं सुनाई, बल्कि 'हकीकत' बताई है।''

"क्या इस हकीकत का कोई सबूत भी है तुम्हारे पास?"

"सुरेश की वह ऐश-ट्रे जिसमें ट्रिपल फाइव के टोटे के बीच चांसलर का टोटा भी है, आज तक मेरे कमरे में उसी हालत में अनछुई रखी है।"

"यह कोई अकाट्य सबूत नहीं है।"

"विनीता मेरे बयान की पुष्टि कर सकती है।"

जानकीनाथ ने कहा— "विनीता अब इस दुनिया में नहीं है।"

"क.....क्यों.....कहां गई?"

जानकीनाथ के जवाब देने से पहले इंस्पेक्टर म्हात्रे ने कहा— "हालांकि फिलहाल तुम्हारे बयान को सच मान लेने की कोई ठोस वजह नहीं हैं, मगर यदि यह सच भी है तो तुमने कानून तोड़ा है, कानून तुम्हें किसी की लाश को कहीं से लाकर कहीं और टांग देने तथा उसका रूप धरकर षड्यंत्र रचने की इजाजत नहीं देता।"

"मानता हूं।" रहटू ने कहा— "मगर ये जुर्म कत्ल से बहुत नीचे का है, जिसमें मिक्की को फंसाने की कोशिश की जा रही है—वास्तव में हमने यह जुर्म किया है और हम इसकी सजा भुगतने के लिए भी तैयार हैं।"

मिक्की मन-ही-मन रहटू के लिए वाह-वाह कर उठा।

उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी, कि इतनी बुरी तरह फंस जाने के बावजूद रहटू उसे सफाई के साथ निकाल लेगा—उस वक्त मिक्की यह सोच रहा था कि रहटू के पास इतनी बुद्धि कहां से आ गई जब म्हात्रे ने उससे पूछा—"खैर, क्या तुम्हारा षड्यन्त्र कामयाब हुआ, मिस्टर मिक्की?"

"क.....कौन-सा षड्यन्त्र?" मिक्की बौखला गया।

"सुरेश के हत्यारे तक पहुंचने का षड्यन्त्र।" म्हात्रे ने पूछा—"क्या सुरेश के हत्यारे से तुम्हारी मुलाकात हो सकी?"

"न.....नहीं।" मिक्की ने संभलकर कहा— "उससे तो मुलाकात न हो सकी, मगर इस लोगों के षड्यन्त्र में जरूर उलझ गया मैं—इनकी बातों से मुझे लगने लगा कि सुरेश ने सचमुच जानकीनाथ की हत्या की होगी—इन्हें मेरे सुरेश होने पर शक न हो, इसलिए मैं इनकी 'हां' में 'हां' मिलाता चला गया—बीच में तो मैं ये भी सोचने लगा था कि कहीं ये लोग सच ही नहीं कह रहे हैं—कहीं सच यही तो नहीं है कि बाबूजी की हत्या के बाद ग्लानि महसूस करके सुरेश ने आत्महत्या की हो?"

कुछ देर चुप रहने के बाद इंस्पेक्टर म्हात्रे ने कहा— "हालांकि तुम दोनों दोस्त हर सवाल का जवाब बड़ा माकूल दे रहे हो, मगर अभी तक अपने बयान को सच साबित करने वाला कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सके।"

"इसी बात का किसके पास क्या सबूत है इंस्पेक्टर कि मिक्की सुरेश की हत्या करने के बाद उसकी दौलत हड़पने के लिए सुरेश बना है?" मिक्की ने कहा।

"खैर।" एक लम्बी सांस लेकर इंस्पेक्टर म्हात्रे ने कहा—“ गुत्थी सुलझ चुकी है, तुम खुद को गिरफ्तार के रूप में नहीं बल्कि जबरदस्त षड्यंत्रकारी के रूप में और आपको मैं विनीता और विमल की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार करता हूं, जानकीनाथ।"

"और हम?" रहटू ने पूछा।

"गिरफ्तार तो आप हैं ही, यह जांच करनी बाकी है कि किस जुर्म में गिरफ्तार है और इसके लिए मैं उस ऐश-ट्रे का निरीक्षण करने आपके कमरे में चलना चाहूंगा।"

"श.....श्योर।" रहटू ने नाटकीय ढंग से कहा।

¶¶

मिक्की, रहटू, म्हात्रे और तीन सिपाही थाने के प्रांगण में खड़ी जीप में सवार होने जा रहे थे कि आंधी-तूफान की तरह एक अन्य पुलिस जीप थाने में दाखिल होने के बाद, ब्रेकों की तीव्र चरमराहट के साथ पहली जीप के नजदीक रुकी।

उसमें से महेश विश्वास और इंस्पेक्टर शशिकांत एक साथ कूदे—वे बेहद उत्साहित और जल्दी में नजर आ रहे थे।

उन्हें देखते ही सब ठिठके।

"कहो शशिकांत!" म्हात्रे ने पूछा—"ये भागदौड़ किसलिए?"

"हम फिंगर प्रिन्ट्स सेक्शनों में बैठे एक फिंगर प्रिन्ट्स पर माथापच्ची कर रहे थे कि तुम्हारा फोन पहुंचा—संयोग से तुम्हारे भेजे गए फिंगर प्रिन्ट्स भी वे ही थे जो हमारा सिरदर्द बने हुए हैं।"

"किसके फिंगर प्रिन्ट्स थे वे?"

"मिक्की के।" शशिकांत ने बताया—"वह मिस्टर सुरेश का भाई था और रहटू का दोस्त।"

मिक्की की ओर दिलचस्प नजरों से देखते हुए म्हात्रे ने शशिकांत से सवाल किया—"वे फिंगर प्रिन्ट्स तुम्हारे लिए सिरदर्द क्यों बने हुए थे?"

"बात दरअसल ये है कि मिक्की की आत्महत्या के बाद उसकी लवर अलका की लाश अगली सुबह रेल की पटरियों पर पाई गई—प्राथमिक छानबीन के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे कि मिक्की के वियोग में शायद उसने आत्महत्या कर ली है, मगर.....।"

"मगर—?"

मिक्की का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था।

"बाद की जांच से इस नतीजे पर पहुंचे कि वास्तव में वह हत्या थी।"

"हत्या?"

"हां, किन्तु हत्यारा ऐसा शख्स साबित हो रहा है, जो अलका से पहले ही मर चुका है—बल्कि जिसके वियोग में अलका द्वारा आत्महत्या की मानी जा रही थी, यानी मिक्की।"

"म.....मिक्की?"

"हां, अलका के जिस्म और उसके पास बरामद चाबी पर ही नहीं, बल्कि उसके कमरे के बाहर लटके ताले पर भी मिक्की की ही उंगलियों के निशान पाए गए—उधर जिस ट्रेन ने अलका के दो टुकड़े किए, उसके चालक का बयान है कि बार-बार सीटी बजाने के बावजूद लड़की पटरियों पर लेटी रही—उसे शक है कि उस वक्त लड़की बेहोश थी।" एक ही सांस में शशिकांत कहता चला गया—"हालांकि सबूतों से स्पष्ट हो रहा है कि मिक्की अलका को उसके कमरे के अन्दर से ही बेहोश करके रेल की पटरी तक ले गया, मगर हैरानी की बात ये है कि मिक्की मर चुका है, फिर हर स्थान से उसकी उंगलियों के निशान मिलने का क्या मतलब है? फिर, तुमने भी वही निशान भेज दिए—हम यह मालूम करने आए हैं कि मिक्की की उंगलियों के निशान तुम्हें कहां से मिले?"

मिक्की पूरी तरह पस्त हो चुका था।

म्हात्रे की आंखें हीरों की मानिन्द चमकने लगीं, आहिस्ता-आहिस्ता चलता हुआ वह मिक्की के ठीक सामने खड़ा हो गया तथा उसकी आंखों मे आंखें डालकर बोला— "बता दूं?"

मिक्की को जैसे सांप सूंघ गया।

उद्विग्न हुए शशिकांत ने पूछा—"क्या वे निशान मिस्टर सुरेश की.....।"

"सुरेश नहीं शशिकांत.....ये मिक्की है।" उसकी तरफ घूमकर म्हात्रे ने एक झटके से कहा— "तुम्हार मुजरिम, मेरा मुजरिम और शायद पुलिस विभाग के हर थाने का मुजरिम—अजीब आदमी है ये, जितने कदम चलो, इसके बारे में उतने ही नए जुर्मों का पता लगता है—पकड़ा जानकीनाथ की हत्या के जुर्म में गया था—सुरेश के मर्डर की सफाई देने जा रहा था कि तुमने अलका का कातिल साबित कर दिया।"

"य.....ये मिक्की है?" शशिकांत भौंचक्का रह गया।

और।

यही पल था कि रहटू ने झपटकर अवाक् खड़े महेश विश्वास के होलस्टर से न सिर्फ रिवॉल्वर निकल लिया—बल्कि पलक झपकते ही उन सबको कवर करता हुआ गुर्राया—"अगर एक भी हिला तो गोलियों से भूनकर रख दूंगा, हाथ ऊपर उठा लो, हरी अप!"

मिक्की ऑफिस की तरफ भागा और किसी के समझ में कुछ आने से पहले ही उसने 'धाड़' से ऑफिस का दरवाजा बन्द करके बाहर से सांकल चढ़ा दी।

म्हात्रे, शशिकांत, महेश विश्वास और पुलिस वाले दंग रह गए।
 
रहटू ने फायर किया।

गोली 'सर' से म्हात्रे के कान को स्पर्श करती निकल गई।

म्हात्रे कांप उठा।

"हाथ ऊपर उठा लो!" रहटू खतरनाक स्वर में गुर्राया, "गोली जानबूझकर तुम्हारे कान के नजदीक से गुजारी गई है म्हात्रे, चाहता तो भेजे का तरबूज भी बना सकता था—उम्मीद है कि मेरे निशाने के बारे में शंकित नहीं रहोगे।"

सबके हाथ स्वतः ऊपर उठते चले गए।

"वो मारा रहटू, ये काम किया है तूने—मान गया तू यारों का यार है, दोस्त के लिए कुछ भी कर सकता है।" मिक्की हर्षित स्वर में चिल्लाया।

"फिलहाल ज्यादा खुश होने वाली बात नहीं है, मिक्की।" नजरें उन्हीं पर गड़ाए रहटू ने कहा— "अभी हम खतरे में हैं, इन सबके हथियार लेकर तुम एक जीप में डाल लो, जल्दी करो।"

ऑफिस के अन्दर मौजूद पुलिस वाले दरवाजा तोड़ने का प्रयास करने लगे थे—अतः मौके की नजाकत को भांपकर मिक्की उनकी तरफ बढ़ा।

उन्हें कवर किए रहटू ने पुनः चेतावनी दी—"अगर मिक्की द्वारा हथियार लेते वक्त किसी ने हरकत की तो वह अपनी मौत का जिम्मेदार खुद होगा।"

वे असमंजस में फंसे खड़े रहे।

हालांकि उनमें से हरेक उस मौके की तलाश में था, जिसका लाभ उठाकर हालातों पर हावी हुआ जा सके, परन्तु रहटू इतना सतर्क था कि किसी को हल्का-सा भी मौका नहीं दिया।

पलकें तक भी नहीं झपकी थीं जालिम ने।

मदद के लिए मिक्की था, सबके शस्त्र एक जीप में पहुंचाने में उसने काफी फुर्ती दिखाई—उधर, ऑफिस के अन्दर से दरवाजे को तोड़ने की कोशिश लगातार जारी थी, मगर उसकी परवाह किए बगैर रहटू ने हुक्म दिया—"सब लोग हवालात की तरफ चलें, आगे का तमाशा आप लोगों को हवालात में बन्द होकर देखना है।"

"ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो, रहटू।" म्हात्रे ने कहा— "दोस्ती के जज्बातों ने शायद तुम्हें पागल कर दिया है, मिक्की को बचाने की जो कोशिश तुमने ऑफिस में की थी, वह तो फिर भी जंचती थी, मगर यह कोशिश या ऐसा करके तुम दोस्ती का हक अदा नहीं कर रहे हो, बल्कि नादानी कर रहे हो—इस तरह मिक्की तो बचेगा नहीं, तुम भी संगीन जुर्म के मुजरिम बन जाओगे।"

"मुझे तुम्हारी स्पीच नहीं सुननी है म्हात्रे, हवालात की तरफ चलो।"

इस तरह मिक्की और रहटू ने मिलकर उन्हें हवालात में बन्द कर दिया।

ताला लगाकर चाबी जेब में रखते हुए मिक्की ने कहा— "ऑफिस का दरवाजा टूटने वाला है, यहां से भाग चलो।"

"कहां?" रहटू ने अजीब सवाल पूछा।

"कहां से मतलब?"

"यहां से भागकर कहां जाएगा, कुत्ते?" रहटू बड़े ही हिंसक स्वर में गुर्राया—"बहुत भाग लिया, अब मैं तुझे नहीं भागने दूंगा।"

"र.....रहटू.....पागल हो गया है क्या?"

"नहीं.....पागल हुआ नहीं हूं बल्कि पागल हो गया था—अब तो होश में आया हूं, हरामजादे—तेरी दोस्ती ने पागल कर दिया था मुझे—तेरे एक अहसान ने मुझे दीवाना बना दिया था—मगर नहीं—तू दोस्ती के लायक नहीं है—गन्दी नाली में पड़े मैले में रेंगता कीड़ा है तू—अरे, जिसने अलका के प्यार को नहीं समझा—जिसने उस दीवानी को मार डाला, वह कोई आदमी है—थू—मैं थूकता हूं तुझ पर—ये सोचकर अपने आपसे नफरत हो गई है मुझे कि मैंने कदम-कदम पर तेरी मदद की—अपनी जान खतरे में डाली, काश.....मुझे पहले ही पता लग गया होता कि तू अलका का भी हत्यारा है।"

"य.....ये झूठ है रहटू, मैंने अलका की हत्या.....।"

"खामोश!" रहटू के जोर से दहाड़ने में इस बार रोने की आवाज मिक्स थी—"अपनी गन्दी जुबान बन्द रख सूअर, मैं पुलिस वाला नहीं जो तेरे झांसे में आ जाऊं—तेरे लिए मैंने नसीम बानो को जहर देकर मारने के कोशिश की—वह तो अच्छा हुआ कि जब तुम लोग मेरे ठेले के सामने से गुजर गए और नसीम ने तुझे आइसक्रीम खाने के लिए नहीं कहा, उसी पल मुझे किसी गड़बड़ी की आशंका हो गई थी—मुझे लगा कि नसीम को इल्म हो गया है कि वास्तव में योजना उसके मर्डर की है—तुम लोगों के आगे निकलते ही मैंने जहर वाला कप अपनी पीछे की झाड़ियों में फेंक दिया था—अगर उस वक्त मैं चूक जाता तो शायद तुझ जैसे जलील दोस्त को अपने हाथों से खत्म करने का सुख भी न लूट पाता।"

मिक्की के होश फाख्ता थे।

म्हात्रे आदि हवालात में बन्द सींखचों के बीच से ऐसा चमत्कारी दृश्य देख रहे थे, जिसकी उन्होंने स्वप्न में भी कल्पना न की थी—रहटू की हालत, उसका एक-एक शब्द उनकी दिलचस्पी का बायस था।

मिक्की को सूझ नहीं रहा था कि क्या कहे?

क्या करे?

ऑफिस के अन्दर से दरवाजे को तोड़ डालने की कोशिश अब भी जारी थी और यह भांपने के बाद कि दरवाजा टूटने में कितनी देर है, रहटू ने कहा— "मजे की बात तो ये है कि अपने मरने के लिए तूने मैदान साफ करने में मेरी भरपूर मदद की, मैंने जो मदद की थी, उसका बदला तो चुका दिया, है न?"

"म.....मुझे माफ कर दो रहटू।" मिक्की गिड़गिड़ाया—"म.....मजबूरी हो गई थी यार, वह मेरा राज पुलिस पर खोलने के लिए कहने लगी थीं।"

"अच्छा?"

"हां।"

"फिर क्या हुआ?"

"फिर.....।"

"धांय!" रहटू के रिवाल्वर से निकली गोली ने मिक्की का घुटना तोड़ दिया—एक मर्मान्तक चीख के साथ वह जमीन पर गिरा।

"न.....नहीं।" हवालात के अन्दर से महेश विश्वास चीखा—"ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो, रहटू।"

"तुम चुप रहो, इंस्पेक्टर।" उसकी तरफ घूमकर रहटू अजीब वहशियाना अन्दाज में गुर्राया—"मुझे तुमसे नहीं जानना कि सही और गलत क्या है?"

महेश विश्वास सकपका गया।

शशिकांत ने कहा— "तुम अपने हाथ उसके खून से क्यों रंगते हो, कानून तो उसे सजा देगा ही।"

"नहीं इंस्पेक्टर, कानून इसे अलका के जिस्म को मिटाने की सजा दे सकता है—उसके प्यार, उसके विश्वास, उसकी मासूमियत का हत्यारा भी है ये जालिम, और कानून उसे इन हत्याओं की सजा नहीं दे सकता—इन हत्याओं की सजा तो इसे तब मिलेगी जब यह भी किसी अपने के हाथों मरे और इस दुनिया में इसका अपना मुझसे ज्यादा कोई नहीं है—क्यों मिक्की—मैं ठीक कह रहा हूं न—मैं तेरा अपना हूं न?"

"ह-हां।" उसने घिसटते हुए कहा— "हां रहटू.....तू मेरा अपना है, मेरा यार.....मुझे बख्श दे।"

"अगर आस-पास खड़ी अलका की रुह इस मंजर को देख रही होगी तो वह खुश होगी—सोच रही होगी कि उसके प्यार की कद्र करने वाला कोई तो है—ले, उसी के पास जा—मुझे पूरी उम्मीद है कि तुझे अपने सामने देखते ही वह बेवकूफ अपने गले से लगा लेगी, तेरे जख्मों को सहलाएगी।"

"र.....रहटू—।"

मगर रहटू ने वाक्य पूरा न होने दिया, उसके रिवॉल्वर से निकली गोली ने इस बार मिक्की के भेजे को तीसरी मंजिल से गिरे तरबूज की तरह फोड़ दिया।

'भड़ाक' की जोरदार आवाज के साथ ऑफिस का दरवाजा टूटा, हाथ में दबा रिवॉल्वर मिक्की की लाश की तरफ उछालने के बाद उसने पूरी आत्मिक शांति के साथ दोनों हाथ ऊपर उठा दिए।

...............—समाप्त—...............
 
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