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पछतावा

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पछतावा

भयानक काली रात थी। बारह बज रहे थे। मूसलाधार बारिश हो रक रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजलियों की कौंध से जी घबरा जाता था। काश ! बिजली न टूट पड़े। गाज न गिर जाये। मेंढकों की टर्राहट और झींगुरों की झनकार डरावनी लग रही थी। जुगनुओं की लप-लप चमक दूर-दूर तक दिखाई पड़ती थी। लगातार सात दिनों से झड़ी लगी हुई थी बरसात की। जिधर देखो नदी, तालाब, नहर, गड्ढों, सड़कों, गलियों और खेत-खलिहानों में पानी ही पानी नजर आता था।

उधर बादल गरज रहे थे और इधर शांति बाई मारे प्रसव पीड़ा के बिस्तर पर लोट-पोट हो रही थी। उसके पति झालर महन्त सोच में डूबे सिर पर हाथ धरे असहाय से बैठे थे। सोच रहे थे कैसे रात कटे और वह तड़के ही जाकर बिसाहिन दाई को जचकी कराने ले आये। शांति बार-बार कराह रही थी। कभी-कभी रोती और चिल्लाती भी थी। सुबह पाँच बजे मुर्गें की बांग सुनाई दी। चिड़ियों की चहचहाहट होने लगी थी। पास के मकानों में बात करने की आवाज सुनाई देने लगी थी। झालर ने शांति के सिर में बालों को सहलाया और कहा- देखो सुबह हो गई है। प्रसव की उम्मीद से शांति एवं झालर रात भर जागते रहे थे। झालर ने कहा “मैं भौजी के नाई को बुलाकर लाता हूँ”। झालर ने दरवाजा खोलकर देखा पानी बरस रहा था। छत्ता तानकर वह बाहर निकला। दरवाजे से चिल्लाया भौजी…भौजी दरवाजा खोल। केजा कौन है किसकी आवाज है, कहकर दरवाजा खोलकर बाहर निकली। दरवाजा के सामने कांपते हुए स्वर में झालर ने कहा – भौजी जल्दी चल, शांति की पीड़ा बढ़ गई है। रात भर सो नही पाया हूँ। शायद बच्चा होने का समय आ गया है। सुन शांति जोर-जोर से चिल्ला रही है। केजा बोली तुमने पहले क्यों नही बताया। मैं रात वहीं सो जाती। जल्दी-जल्दी केजा को लेकर झालर छत्ता उसे ओढ़ाकर ले चला। घबरागट में बोला शांति की पीड़ा और बढ़ गई थी। देखो तो कितनी जोर-जोर से चिल्ला रही है। केजा सिर पर हाथ रखकर प्यार से बोली- घबरा मत अब मै आ गई हूँ। सब कुछ ठीक हो जायेगा। फिर झालर से कहा तुम बाहर जाओ। कपड़ा, रेजरपत्ती, गरम पानी की व्यवस्था करो।

झालर महंत परछी में रखे गोरसी में तवेले रख पानी गरम करने रख दिया। झालर की उत्सुकता बढ़ने लगी लड़का होगा या लड़की। शांति की पीड़ा और बढ़ गई। आई माँ केजा ने कहा- जरा जोर से धक्का दे बच्चे का मुंह बाहर आ गया है। शांति को भी कहा गया जरा जोर से दम लगा। लम्बी सांस लेते हुए शांति जोर से चिल्लाती है। आई आँ...... बच्चा धम्म से बाहर आ गया। केजा ने बच्चे को सम्हाला। शांति पसीने से लथपथ थी। बच्चे के बाहर आने से शांति को हल्का महसूस होने लगा। केजा ने बच्चे को उठाकर देखा बच्चा स्वस्थ, सुंदर था। केजा ने बच्चे को हाथ से साफ किया। कैसे नहीं रो रहा है, कहकर सीने को दबाया। हाथ, पैर हिलाया, डुलाया। बच्चे के रोने की आवाज आई। एहेंव, अहेंव बाहर झालर बच्चे की रोने की आवाज सुनकर कहा – “भौजी का होये हे ?” भौजी ने कहा – “लड़का हुआ है।” गरम पानी हुआ कि नही। नया रेजर, ब्लेड ले आओ। झालर ने गरम पानी, रेजर ब्लेड दे दिया। उसने झांककर देखा कि शांति चुपचाप शांत पड़ी है। बच्चा रो रहा है। केजा शांति के कपड़े बदलती है। आवश्यक साफ-सफाई करती है। बच्चे के नये ब्लेड से नाल काटती है। खून नार फांस को अलग कर साफ करती है। शांति को नये कपड़े पहनाती है। आवश्यक हिदायत देती है- उठने-बैठने खाने-पीने की। बच्चे को गुनगुने पानी से साफ करती है, नहला-धुलाकर साफ कर बच्चे को सौंपती है। शांति सिने से लगाकर माथे से चुम लेती है। शांति के चेहरे पर चमक आ जाती है। शांति मुस्कराकर कहती है- मेरे लाल आ जा। माथे से चुमकर सिने से लगा लेती है। प्रसव पीड़ा से थकी रहती है। गहरी नींद में सो जाती है। केजा बच्चे को लेकर झालर की गोद में पकड़ा जाती है। झालर बच्चे को सीने से लगाकर घूमने लगता है। झालर का पहला पुत्र हुआ है। वह बच्चे को पाकर बरामदे में नाचने लगता है। पास के मकान वाले सभी मुहिलाओं को पता चल जाता है कि शांति को लड़का हुआ है। एक-एक करके बच्चा दखने आने लगते हैं। बड़े भाई महंत जगतारण दास अपने लड़के मनमोहन दास पुत्री सत्यवती,सुभद्राबाई को लेकर आ गए। गाँव में शोर हो जाता है कि झालर महंत का लड़का हुआ है। गाँव में खुशी-आनंद का माहौल हो जाता है। सभी बच्चे को प्यार-दुलार कर गोदी में लेते हैं।

झालर लड़के होने से खुश हो जाता है। गाँव भर में शक्कर बंटवाता है। हंस-हंसकर गाँव वालों को बताता है कि उसका लड़का हुआ है। शांति भी खुश रहती है। छह दिन बाद छट्ठी होती। शांति को स्नान कराया जाता है। शांति को नये वस्त्र पहनाये जाते हैं। शांति अब दुबली छरहरी दिखने लगती है। छट्ठी में शांति के माँ-बाप, भाई-बहन, बुआ सभी आते हैं। शांति को विशेष पेय “काके पानी” पिलाया जाता है। इसके बाद दालभात, मुनगा, बड़ी की सब्जि खिलाया जाता है। माँ द्वारा सोंठ, तिल, गुड़ से लड्डू पौष्टिक औषधि खिलाया जाता है। झालर महंत अपने रिश्तेदारों को छट्ठी का निमंत्रण देता है। गाँव भर को निमंत्रण दिया रहता है। गाँव के गोतियार और सभी गाँव वालों को खाने, काके पानी पिने के लिए बुलाता है। झालर महंत पास के गाँव मस्तूरी से लाउड स्पीकर लाकर बजाता है। गाँव में लाउड स्पीकर में फिल्मी तथा छत्तीसगढ़ी गाने बजते हैं। पास के गाँव से बाजे बुलाए जाते हैं। गाँव भर में उत्सव का माहौल हो जाता है। सभी प्रसन्न चित्त आनंद से भोजन ग्रहण करके तृप्त होते हैं। झालर महंत के बड़प्पन को सभी स्वीकारते हैं। पुत्र-प्राप्त पर सभी बधाई देते हैं। झालर महंत सभी अपने संबंधियों को नयी साड़ी, धोती, गमछा, लुंगी भेंट में देते हैं। शांति बाई सभी रिश्तेदारों से नए जन्म होने व पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु आशीर्वाद ग्रहण करने हेतु पैर छुकर प्रणाम करती है। माँ, बाप, सास-ससुर सभी आशीर्वाद देते हैं दूधों नहाओ, पूतों फलों, जुग-जुग जियो। छट्ठी के बाद सभी अपने-अपने घर चले जाते हैं। मात्र शांति की माँ श्यामाबाई बच जाती है। शांति की सेवा सुश्रुषा एक माह तक करती है। प्रसव के बाद आई कमजोरी को शक्तिवर्धक आहार देकर पूर्ति कर दी जाती है। प्रसव के बाद महिलाओं को उचित आहार से भोजन खाना चाहिए तभा बच्चों के लिए पर्याप्त मात्रा में दूध उपलब्ध हो पायेगा। शांति का आहार दुगना हो गया था। झालर शहर से फल लाकर देता है।

झालर महंत के पिता श्री मणिकदास बाहर गाँव से आते है। माँ देववती भी बहुत खुश होती है। वे बालक का नामकरण रामदास रखते हैं। दादा-दादी दिन भर बच्चे को कभी गोदी तो कभी सीने से चिपकोए रहते हैं। घर में पहला पुत्र जो हुआ था। वंश परम्परा के लिए पुत्र रत्न जो हुआ था। वह सबका प्यारा, दुलारा लाडला था। रामदास का बचपन बड़े लाड़-प्यार से गुजर रहा था। झालरदास एक सम्पन्न कृषक के पुत्र थे। मणिदास का नाम आस-पड़ोस में भले मानस के रूप में था। वे समाज के मुखिया भी थे। बीस गाँव में पंचायत करने जाते थे मणिदास ईमानदार, न्यायप्रिय, सच्चरित्र व्यक्ति थे। इसलिए सभी उनका सम्मान करते थे। कोई व्यक्ति उनका बात नही काट पाता था जो बात कह दिए वह मान्य था। फिर सम्पन्न किसान थे। आसपास के लोग धान, तिवरा, रूपया, पैसा उधार में ले जाते थे। मणिदास के द्वार से कोई भिखारी खाली हाथ नही लौटता था। जो भूखे थे उसे वे भरपेट भोजन खिलाते थे। घर में भंडारा चलता था। झालर पर पिताजी के व्यक्तित्व का प्रभाव जो पड़ा था। झालर पिता जी की खेती किसानी में हाथ बंटाता था। रामदास के होने से दादा दादी को एक जीवित खिलौना मिल गया था। शांतिबाई दूध पिला देती थी और देववती मुन्ना को संभालती थी। शांति अपने घर के काम में व्यस्त रहती। दिन भर भोजन बनाने में लगी रहती थी। कभी-कभी शांति उदास हो जाती वह सोचती कब इस चूल्हा चौकी से मुक्ति मिलेगी।

इस बरस पानी ठीक से गिरने के कारण पचास एकड़ धान की फसल अच्छी हुई। कोई किड़े माहो का नही था। दस एकड़ में दुबराज धान मतार खार में बोये थे। दूबराज धान की खूशबू से पूरा खार महक रहा था। दूबराज धान हवाओ में झूम-झूम रहा था। खेतों से मेड़ पर चलने वाले लोग कहते-“क्या खूशबू ह”। महक पूरे वातावरण को सुगंधित कर रही थी। खेतों के मेड़ों में अरहर की फसल खूब लगी थी। अरहर फल रहे थे। चारों तरफ हरियाली छाई थी। ऐसा लगता था मानो, धरा हरी मखमली साड़ी पहन कर आई है। इसे देखने देवगण धरता पर उतर आए है। चांद-सितारे देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। धरा में हरियाली बिखरी पड़ी है। किसान फसल को देखकर झूम नाच रहें हैं। झालर दास अपने पुत्र के जन्म से खुश थे। परन्तु फसल अच्छी होने का श्रेय अपने पुश्र रामदास को दे रहे थे। शांति बच्चे को सीने से चिपकारती पुचकारती थी। इधर रामदास दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता के प्यार दूलार से बड़ा हो रहा था। मणिदास के घर में कोई कमी नही थी। खेत खलिहान में एक कुंआ था, जिसका पानी बहुत मीठा था। गाँव भर के लोग पानी भरते थे। पात की बाड़ी में केले के पेड़ लगाये थे। आठ-दस केले में घेर आ गया था। मूसावरी केला था। बाड़ी में किनारे-किनारे मुनगा के पेड़ के साथ में सीताफल लगे थे। करेला, भिन्डी, मिर्ची, सेमी, लौकी, कुम्हड़ा लगे थे। घर खाने के लिए सारी चीजें थी। मात्र दीप जलाने के लिए मिट्टी के तेल लेते थे। घर में गाय- भैसों के कई जोड़े थे। एक साथ कई गाएं एवं भैसें जनती थी। दूध की कोई कमी नही थी। दही, मही गाँव के महिलाओं को शांति बांटती रहती थी। गाँव के सम्पन्न कृषक थे। झालर महंत इस बरस दिवाली त्यौहार को अच्छे ढ़ंग से मनाने की सोच रहे थे। झालर ने पिताजी से कहा कि रामदास और शांति के लिए नये कपड़े,बनवाने हैं। पाँच सौ रूपये दे दो। मणिदास ने कहा बेटा तुम्हारी माँ या शांति बहू से ले लेना। जब गाँव से बिलासपुर जा रहे हो तो घर के लिए मिठाई,फल फटाका, नारियल शक्कर लेते आना। झालर ने मस्तुरी बस स्टैंड से बस में बैठकर बिलासपुर तोरवा नाका स उतरकर बुधवारी बाजार चला गया। बुधवारी बाजार से रामदास के लिए कमीज, पैंट, शांति एवं माँ के लिए साड़ी पेटीकोट, ब्लाउज, टिकुली,फुंदरी आँवला के सुगंधित तेल पावडर, क्रीम पिताजी व अपने लिए कमीज, कुर्ता धोती खरीदी। घर के राशन के लिए सांगेरा होटल से मिठाईयाँ, फटाखे लेकर बस स्टैंड बिलासपुर से बस में बैठकर गाँव मस्तूरी आ गए। घर सड़क के किनारे ही था। नौकर लोग बस स्टैंड में झालर का इंतजार कर रहे थे।सारा सामान उठाकर घर ले गए। झालर से रामादिन नौकर ने कहा-मालिक हमारे लिए कुछ लाए हो। झालर बोला कि हाँ-हाँ दीवाली के दिन देंगे।

दीवाली त्यौहार के लिए घर की लिपाई-पुताई होने लगी।खलिहान की साफ-सफाई नौकर करने लगे थे। शांति ने रसोईघर की साफ-सफाई करा ली थी। सभी लोग दीवाली की तैयारी में लगे थे। गाँव के गरीब किसानों मजदूरों में उमंग था। अपने-अपने औकात के अनुसार तैयारी कर रहे थे। गाँव में जिनके घर में खाने के लिए धान बाढ़ी (उधार) दिए, साथ रूपए भी बांट दिए। कोई आदमी न छूट जाए। मणिदास से देववती ने कहा- “अब तीन दिन पहले से कोई धान उधार नहीं दिए जाएंगे। आज धनतेरस है।वेदवती शांति से बोली बहू कोठी के नीचे गोड़ा को साफ-सफाई कर देना। शांति बोली माँ जी, पहले से साफ-सफाई लिपाई भी करा ली है। सूरज डूबते ही दीप जलाने के लिए तैयारी होने लगी। घर की कोठी (धान) के ऊपर एक दीप जलाया, आँगन के तुलसी चौरा में एक दीप रखा। घर बरामदे द्वार पर भी दीपक रखे। दो दीपक दो धान की कोठी में जो धान से भरी थी घी के दीप जलाये। धन तेरस के दिन सात दीप जल रहे थे।

लक्ष्मी पूजा के लिए कोठी के नीचे गोड़ा को बनाया था। कृषकों के लिए गोड़ा सुरक्षित स्थान है। वेदवती, शांति, रामदास, झालर, मणिदास ने मिलकर धन तेरस की पूजा की। इस वर्ष धन तेरस में रामदास के लिए चांदी की करधनी खरीदी पुराने हौला, गुंडी को बदलकर नए हौला बर्तन लिए। झालर रामदास को गोदी में उठाकर गाँव घुमाने गली में ले गया। गली के पास बरामदे में आठ दस लड़के गप्पें मार रहे थे। झालर रामदास को लेकर चला गया। सभी लड़कों ने रामदास को बारी-बारी से गोदी में उठाया। लड़कों ने खूब प्यार जताया। रामदास बहुत सुन्दर और गोरा शिशु था। कुछ देर के बाद झालर घर चला आया। उधर सभी लड़के अपने-अपने घर चले गए।

धनतेरस के बाद तीसरे दिन दिवाली होती है। तीनों दिन घरों को दीपों से सजाया जाता है। गाँव के सभी घर में दीप जलाए जाते हैं। सभी उमंग से नए कपड़े पहनकर फटाके फोड़ रहे थे। झालर भी अपने घर के सामने फटाके फोड़ रहे थे। गाँव के बहुत सारे बच्चे एकत्र हो गए थे। मणिदास ने झालर से कहा – “बेटा, सभी बच्चों को मिठाई और एक-एक फटाका दे दो। सभी हमारे बच्चे हैं।” झालर ने कहा – “सभी बच्चे लाइन में लग जाओ।” परन्तु बंदरों की भीड़ थी एक नहीं माने। एक के ऊपर एक चढ़ रहे थे। झालर ने लड़कों को डांटा और एक-एक फटाके सभी को दिए। गाँव दीपावली के दिन आनन्द उमंग के दिन थे। मणिदास के कारण गाँव में कोई भूखा नहीं सोता था। शांति ने भी फटाके जलाए वेदवती रामदास को गोदी में लेकर एक एक सुरसुरी चकरी जलाई। मणिदास झालर ने बम फटाके फोड़े। सारा गाँव आवाज से गूँज उठा। रात मनोहर यादव गड़वा बाजे के साथ गायों में सुहाई बांधने आया था। मनोहर यादव ने हर एक गाय के गले में खुशी-खुशी सोहाई बांध रहा था।

 


अपने किसान का दोहा कहकर आशीशें भी दे रहा था। घर के नौकरों को एक-एक धोती, मिठाई और मीठी रोटी बांटी गई। मनोहर यादव को एक धोती एवं इक्कीस रुपए भेंट में दिए। मनोहर यादव अपने किसान को आशीशें दे चलता बना। सुहाई बांधना पशु एवं प्रकृति के प्रति प्रेम दर्शाता है। गाय, भैंस दूध देती हैं, उसके बछड़े खेती किसानी में हल जोतने के काम आता है। इसलिए दीपावली त्यौहार में आदमियों के साथ पशुओं से भी प्रेम किया जाता है।

वेदवती शांति मिलकर पशुओं को खिलाने के लिए दार, भात, बस, सोहांरी कढ़ी, खोड़हा भाजी पकाई। कुछ क्षणों बाद मनोहर यादव राउत सभी पशुओं को चराकर ले आया। पशुओं को जोंकिया तालाब में नहलाया गया। करीब अस्सी गाय भैंस बैल और बछड़े भी थे। सभी को अपने हाथों से वेदवती भोजन कराती थी। वर्ष में एक दिन गायों को माल पुआ खिलाया जाता है। शांति आरती उतारती है, प्रणाम करती है फिर खाना खिलाने के बाद सबको पानी पिलाती है। सींगों में तेल चपड़ा जाता है। रामदीन नौकर ने सहयोग दिया। घर के सभी नौकरों को बिठाकर बरामदे में भोजन कराया। बाद में झालर महंत मणिदास, झालर के बड़े भाई जगतारण दास सभी मिल कर भोजन किए। परिवार के सभी सदस्य मिल बैठकर भोजन खाने में बहुत आनन्द आता है। जो चार रोटियां खाने वाले हैं सात रोटियाँ खा जाते हैं। मणिदास ने बचे हुए भोजन को गाँव वालों में बंटवा दिया। दीपावली का त्यौहार बड़े आनन्द उमंग के साथ मनाया गया। दीपावली के बाद झालर ने खलिहान तैयार करा कर धान कटाई कराना शुरू किया। बिना पानी वाले जल्दी पकने वाले पाँच एकड़ के धान को कटाई कराकर खलिहान में ले आया। एक-एक कर सभी के धान धान कटाई बोवाई कराकर ले आए। खेती किसानी में बहुत परिश्रम करना पड़ता है। धान काटने के लिए श्रमिक नहीं मिलते। क्योंकि सभी किसानों को अपनी धान कटाई कराना पड़ता है। फसल बहुत अच्छी हुई थी। घर में रखने के लिए जगह नहीं थी। दूबराज धान को बड़ी कोठी में भरवा दिया था। बाहर पड़े धानों को सोसायटी में बेच दिया। एक लाख रूपए मिले। झालर और शांति रामदास के भाग्य को सराह रहे थे कि रामदास के आने से घर भर गया है। घर में खुशियाँ ही खूशियाँ छा गई थी। वेदवती बहुत ही खुश थी।

शांति झालर से कहती है कि “बिलासपुर में शनिचरी बाजार में मड़ई भर रहा है। इच्छा हो तो मड़ई दिखा दिखा दो। “झालर ने कहा बस तो बंद है”। बैलगाड़ी से बिलासपुर जाना पडे़गा। “शांति बोली यदि जाना है तो पैदल भी जा सकते हैं”। ज्यादा दूर नहीं है चार कोस की दूरी है। झालर शुक्रवार रात को बैलगाड़ी में घवरा न पिपरा बैल-जोड़ी को फांद कर चल देते हैं। बैलगाड़ी छांकड़ा रहता दौड़-दौड़कर जल्दी बिलासपुर पहुँच जाता है। साथ में वेदवती, बड़े पिताजी के लड़के और बहु कुल सात आदमी रहते हैं। अरपा नदी के तट में अमराई के छांव में बैलगाड़ी को खड़ी करते हैं। सभी अरपा नदी के स्वच्छ पानी में स्नान करते हैं। शांतिबाई एवं झालर खाना बनाने के जुगाड़ में लग जाते हैं।पत्थर ईंट से चूल्हा बनाकर माल पकाते हैं। शनिचरी बाजार से लाल भाजी, आलू, सेमी की सब्जी पकाते हैं। घर से हल्दी, मिर्च, मसाले, तेल लाए रहते हैं। शांति बहुत बढ़िया खाना बनाती थी। रामदास को वेदवती गोदी में खिला रही थी। मड़ई बाजार देखने गाँव-गाँव से बैलगाड़ी में आदमी आने लगे थे। सबकी रावटी नदी के किनारे लगने लगी थी। सभी खाने-पीने की तैयारी कर रहे थे। सब कोई बारी-बारी से नदी से सनान करके आए थे। अमराई की छांव में बैठकर सभी ने छककर भोजन किया। दूसरे टाईम के लिए भात सब्जी, बना लिए थे। क्योंकि शाम को शनिचरी बाजार में मड़ई दखने जाना था। जैसे-जैसे दिन चढ़ने लगा वैसे-वैसे आदमियों कि भीड़ बढ़ने लगी थी। आदमियों का रेला लगा था। बाजार-सड़क में आदमी ही आदमी दिखते थे। दोपहर दो बजे से राऊत नाचा के दलों का प्रवेश शुरू हुआ।

जूना बिलासपुर के राऊत नाचा पार्टी द्वारा मढ़ई निकाला गया था। मड़ई लगभग 21 फीट ऊंचे बांस में सजाइ गई थी। राऊत लोग झूम-झूम कर कूद-कूद के नाच रहे थे। भगवान श्री कृष्ण जय बोल रहे थे। साथ में बीच-बीच में दोहे भी बोल रहे थे। मंगल राऊत बढ़िया मखमल के कुर्ता, पांव में घुंघरू, सिर में पागा, हाथ में लाठी अमफरी, मखमल के बड़ी में कौड़ियों के बख्तर बंद पहने हुए थे। जब उछाल मारके वे दोहा पारते थे, तो देखने वाले झूम जाते थे।

गंडवा बाजों के साथ नचकार के संग डफली, मोहरी, धन दूमदूमी के संग मंगल राउत झूम-झूम के नाच रहे थे। लोक धुनों में थिरक रहे थे। आसपास शहर और पास मुंगेली, दुर्ग, रायपुर, शक्ति ,पामगढ़, बिल्झ, सेंदरी, रतनपूर, तिफरा, घुरू, अमेरी, मंगलम, रेलवे कालोनी, दर्री, घोत, लखटकोनी लगभग एक सौ एक राउत नाच दल आये थे। इतनी भीड़ कभी नही थी।

एक दल दूसरे दल को लाठी से वार करके अपने कौशल का प्रदर्शन करते थे। कई राऊत नाच द्वारा दारू का सेवन करके आने से आपस में मारपीट भी हो जाती थी। झालर,शांति, रामदास सात जने सड़क किनारे खड़े होकर देख रहे थे। रामदास के लिए फुग्गा खरीदा गया। फुग्गा पाकर वह खुश था। रामदास कभी मड़ई को देखकर कभी गंड़वा बाजे से बजने को सिर हिलाकर, हाथ हिलाकर नाचने को प्रयास कर रहा था।लोक धुन, लोक गीत, इतनी शक्तिशाली होती है कि मन प्रसन्नता से नाचने लगता है। शांति पहली बार शनिचरी, राऊत बाजार देखती है। बड़े अचम्भे से देखती है। कहती है बहुत मजा आया। जैसे-जैसे रात बढ़ने लगी वैसे-वैसे भीड़ कम होती गई। झालर ने शांति और सबके लिए होटल से जलबी खरीदी। गाड़ी के पास आकर सबने भजिया और जलेबी खाई दोपहर के 12 बजे भोजन किया। रामदास दादी के गोद में ही सो गया था। रात एक बजे के बाद बैलगाड़ी से झालर अपने गाँव टेकारी मलार आ गए। फिर झालर अपने खेती किसानी के काम में लग गए।

रामदास का पालन- पोषण दादा-दादी के आँचल के छांव में होने लगा। स्वस्थ बालक दिनों-दिन बढ़ता गया। साल भर बाद ही रोटी, दाल भात खाने लगा था। घर की काली गाय बच्चा जनी थी। काली गाय का दूध रामदास पीता था।

घर में दूध घी की कमी नही थी। मणिदास महंत गाँव-गाँव घूमकर शिष्य चेला बनाने के कार्य करते थे। मणिदास पोथी, पुराण, भागवत, देवी भागवत पढ़ लेता था। बढ़िया प्रवचन भी दे लेता था। एक भागवत् कथा बाचने से पाँच हजार रूपए मिल जाते थे। वैसे घर से सम्पन्न किसान थे ही सत्यनारायण की पूजा-पाठ भी करते थे। गाँव-गाँव में बहुत प्रसिध्द पंडित थे। झालरदास उनका इकलौता पुत्र था। मणिदास के कोई संतान नही होने से वेदवती हमेशा उदास रहती थी। मणिदास हमेशा समझाता था कि एक दिन तुम्हारी सूनी गोद भी भर जायेगी।

परन्तु वेदवती कहती थी जब मैं अस्सी साल की डोकरी हो जाऊंगी तो बच्चा हो भी तो किस काम का। मणिदास हमेशा धीरज बंधाता था। वेदवती ने बहुत देवी-देवताओं को नारियल चढ़ाये थे। परन्तु गोद सूनी की सूनी रही। कई बैगा गुनिया से जड़ी-बूटी खाई कोई काम नही आया। हमेशा उदास रहने लगी थी।

मणिदास को संतान की चिंता सता रही थी। गाँव के पास गाँव कुरेला में संत गुरू घासीदास जी के पुत्र गुरू बालकदास जी ने रावती डाला था। मणिदास सुनकर गुरूजी के पास गया और गुरूजी के चरणों में प्रणाम किया। बोले- गुरूजी मेरे कोई संतान नही है। गुरूजी ने आशीर्वाद दिये। बच्चा निराश न हो मैं आपको उपाय बताता हूँ।

आज अपने घर में झेंझरी चौका कराओ। मैं सभी सामग्री लिख देता हूँ। गुरू के आशीर्वाद लेकर झालर अपने गाँव आ गया। वेदवती को बात बताई। वेदवती खुश हो गई। चलो गुरूजी के दर्शन तो हो जाएंगे। गुरू बालक दास जी अपने रावटी कुटेल से उठाकर गाँव टिकारी से आए। मणिदास गुरू के पैर पखार कर, घर ले जाते है। चौका पार्टी गुरूजी के साथ थे। रात आठ बजे घर के आँगन में चौका पुराने का काम होता है। चांवल के आटा से चौक बनाते हैं। चारों दिशाओं में चारों गुरूओं को मंत्र आमंत्रित कर गद्दी में बैठाया जाता है। चौक के चारो ओर गाने बजाने वाले बैठते हैं। तबला, झांझ, हारमोनियम, मंजीरा, खंजरी से चौक गीत प्रारंभ करते हैं। सभी गुरूओं को आमंत्रित करते हैं। मंत्र पढ़कर गीत, संगीत द्वारा स्थान जाग्रत करते हैं। चौका गीत सुनकर महिलाएं मंत्रमूग्ध होकर झूमने लगती है। लोकधुन में गीत गाया जाता है। पान सुपारी नारियल चौक के बीच में कलश की स्थापना की जाती है। पान सुपारी से अभिमंत्रित किया जाता है।

झेंझरी फैंका पुत्र मुराद के लिए कराते हैं। वेदवती को पास में बुलाकर गुरूजी एक सफेद कपड़ा का परदा रखते हैं। एक तरफ गुरूजी दूसरी तरफ वेदवती। गुरूजी मंच पर जाते हैं। वेदवती गुरूजा पर ध्यान लगाती है। बीस मिनट तक चौक गीत होता रहता है। गुरूजा मंत्र पढ़ते जाते हैं। वेदवती सुनती जाती है।

गुरूजी कुछ समय बाद परदे को हटा देते हैं। मणिदात वेदवती को पान प्रसाद के रूप में खाने के लिए देता है। दोनो पान को चबाकर निगल जाते हैं। चौका रात भर चलते रहता है। चौका समाप्त कर गुरूजी दो चार दिन गाँव में रहते हैं। धर्म का प्रचार करके फिर दूसरे गाँव के लिए रावटी लगा जाते हैं। इस प्रकार से वेदवती गर्भ धारण करती है। दस माह बाद झालर का जन्म होता है।

गाँव के चौपाल में मणिदास सभी बच्चों को बढ़िया-बढ़िया किस्से सुनाया करते थे। खाली समय में सभी युवक, बड़े-बूढ़े बच्चे इकट्ठे हो जाते थे। सुबह-शाम और दोपहप को किस्से कहानियाँ देश-विदेश के समाचार की जानकारियां देते थे। कभी-कभी शिक्षाप्रद कहानियां करते थे। मणिदास के बिना चौपाल सूना लगता था। निठल्ले युवक कहानी, सुनने के बाद जा हल्के कर घरों को आते थे। मजेदार किस्से सुनाते रहते थे मणिदास।

झालर और शांति का सुखमय जीवन बीतने लगता है। रामदास दो वर्ष का हो जाता है। शांति फिर गर्भवती हो जाती है। शांति के गर्भ धारण तीन महिने होने पर शांति की माँ बेटी को सघोरी सीत प्रकार के मिष्ठान, रोटी, बरा, सोहारी, पपची, ठेठरी, खुर्मी, मालपुआ, दही बड़ा इत्यादि प्रकार के फसल गेहूँ की रोटियां लेकर आती है। घर में मंगल गीत गाए जाते हैं। शांति की माँ श्यामबाई सभी लोगों के लिए धोती, साड़ी रामदास के कमीज, पेंट भेंट देती है। झालर गाँव से लाए रोटियों को अपने बड़े भाई जगतारणदास एवं पड़ोसियों, रिश्तेदारों के बंटवा देता है। शांति रूचि के अनुसार रोटियां खाती है। शांती को स्नेह मिष्ट चीजें पसंद आ रही थी। शांति की माँ घर से इमली एवं आम के आचार को खिलाती है। कुछ दिन रहकर श्यामबाई अपने घर चली जाती है। शांति को खाना पिना अच्छा नही लगता एक दो माह अनमने ढ़ंग से रहती है। पाँच महिने बाद शांति के पेट बढ़ने लगता है नवे महिने में स्वस्थ सुन्दर पुत्री के जन्म देती है। केजा बाई के हाथों से दूसरे बच्चे जनती है। झालर वेदवती मणिदास बहुत खुश होते हैं। घर में लड़के की कमी थी पूरी हो गई। झालर अपने ससुराल नगराडीह जाकर निमंत्रण देता है एवं श्यामबाई को साथ ले आता है। वेदवती और श्यामबाई शांति की ठीक ढ़ंग से देखरेख करते हैं।
 
छह दिन में छट्ठी होता है। सभी गाँव वाले से काके पानी दारभात खिलाता है। मणिदासके नाम से सभी गाँव वाले भोजन करके आते हैं। गाँव में त्यौहार उत्सव का माहौल हो जाता है। झालर अपने रिशतेदारों को नए वस्त्र देता है। शांतिबाई सभी बड़ों का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेती है। सभी जन आशीर्वाद देते हैं। छट्ठी माल खाकर सभी अपने घर चले जाते हैं। शांति बेटी को पाकर बहुत खुश हो जाती है। घर में लक्ष्मी आ गई थी। माँ के साहसा सहेली, गुड़िया आ गई थी। मणिदात वेदवती दोनो बच्चों को खुब प्यार-दुलार करते थे। सुखी परिवार था। दिन, माह, वर्ष बीतते चले गए पता नही चला। रामदास छह वर्ष के हो गए। मणिदास ने कहा झालर रामदाल को प्रायमरी स्कूल में भर्ती करा देना एक जुलाई से स्कूल खूल रहा है। झालर महंत ने रामदास को लेकर हैडमास्टर वीरेन्द्र सिंह के पास गया। रामदास तंदुरूस्त स्वस्थ बालक था। गुरूजी ने नाम पूछा- क्या नाम है जी रामदास इधर पास आओ, उसे मत, रामदास पास आ गया। गुरूजी ने स्नेह से कहा- दाहिने हाथ से बाए कान को पकड़ो, रामदास ने पकड़ लिया। गुरूजी ने पहली कक्षा में भर्ती कर रजिस्टर में नाम लिख दिया। झालर ने रामदास के लिए स्कूल ड्रेस के लिए खाकी पेंट, सफेद शर्ट, सिलवा दिए। रामदास पेंट शर्ट, बस्ता लिए प्रतिदिन स्कूल जाने लगा। कभी-कभी मणिदास कभी-कभी वेदवती स्कूल जाते थे। रामदास पढ़ने में होशियार थे। गुरूजी प्रतिदिन होमवर्क देते थे। उसे पूरा कर लाता था। मणिदास, झालर उसे खूब पढ़ाते थे। शांति भी रामदास को दुलार प्यार करती थी। सुबह दस बजे रामदास के स्नान कराकर खाना खिलाकर तैयार करा देती थी। घंटी बजने पर रामदास बस्ता लेकर दौड़ते-दौड़ते चले जाते थे।कभी-कभी श्यामवती बस्ता पकड़कर स्कूल तक चली जाती थी। बच्चों के बीच बैठकर पढ़ने लग जाती थी।

इसी प्रकार रामदास दादा-दादी की छत्र-छाया में कक्षा पांचवी में प्रथम श्रेणी में पास हो जाता है। रामदास होनहार बालक थे। बड़े गुरूजी विशेष ध्यान रखते थे। रामदास को अधिक पढ़ाते थे। रामदास को बीस तक पहाड़ा मौखिक याद था।

भूगोल, इतिहास की प्रसिध्दता भी याद कर लिए थे। रामदास पढ़ने में होशयार के साथ खेल-कूद में भाग लेते थे। लम्बी कूद, दौड़ में खो-खो ऊंची कूद में प्रथम आया था। मणिदास रामदास के गुण से अति प्रसन्न थे। कक्षा में प्रथम आने पर दादाजी नए-नए वस्त्र देते थे। नए-नए खिलौने भी शहर से लाकर देते थे। रामदास गाँव के चहेते लड़के थे। रामदास को अच्छी-अच्छी किस्से कहानियाँ वेदवती, मणिदास सुनाए करते थे। जन तक दादा-दादी से रामदास श्यामवती नही सुन लेते तब तक नही सोते थे। झालर शांति बुलाते रहते नही आते थे। प्रतिदिन रात में नित नए किस्से रामदास सुनते थे। रामदास गर्मी के छुट्टी में अपने मामा के घर नगाराडीह चले जाते थे। वहां मामा के संग बाग-बगिचे में घूमते थे। रोज सुबह उठकर पास के अमराई में मीठे-मीठे आम तोड़ लेते थे। अरपा नदी में मामा राजेश के साथ स्नान कर आते थे। नानी श्यामबाई नाना सहदेव नए-नए गीत संगीत सुनाते थे। रामदास बड़े गौर से सुनते थे। नानी से कई प्रकार के सवाल पूछते थे। कि नानी ये क्या है वो क्या है, नानी कहती बेटा तुम्हारे मैं पढ़ी होती बता देती। मैं तो अनपढ़ हूँ। मैं भोजन बनाना जानती हूँ। रामदास कहता ठीक है नानी मैं मामा से पूछ लूंगा। रामदास के गर्मी के छुट्टी कब बीत गया पता नही चला। रामदास को छोड़ने नाना-नानी, मामा सभी गाँव छोड़कर चले गए।

एक जुलाई को स्कूल खुलने वाला था। शांति ने झालर को कहा बाबूजी को कहो मस्तूरी में कक्षा छटवीं में रामदास को भर्ती करा दे। मणिदास ने कहा झालर साइकिल बिठाया रामदास के मस्तूरी ले जा। वहां कक्षा 7वीं में भर्ती करा दें। झालर ने रामदास के संग पढ़ने वाले रामसहाय, पूरन, उत्तम को कहा- चलो मैं तुम लोगों को कक्षा में भर्ती करा दूंगा। रामदास स्कूल ड्रेस पहनकर तैयार हो गया। झालर रामदास को साइकिल में बिठाकर मस्तूरी ले गया। साथ में सब लड़के अपने पिताजी के साथ मस्तुरी पहुँच गए। झालर हेड मास्टर से मिले रामदास ने सभी बच्चों को मार्कशीट दिखाई। मार्कशीट देखकर रामरतन यादव ने सभी बच्चों को कक्षा छटवीं में भर्ती कर दिया। रामदास, पूरन, महेत्तर, रामसहाय उत्तम तभी सायकलों से स्कूल जाने लगे। सभी लड़के बड़े ध्यान से पढ़ते थे। सभी ने कक्षा छटवीं परीक्षा पास कर ली रामदास कक्षा में प्रथम आया। रामदास की बहन श्यामबाई की बिमारी से मृत्यु हो जाता है। रामदास बहुत दुखी होता है। बहुत रोता है।

रामदास कक्षा सातवीं में पढ़ने लगा। रोजाना सुबह गाँव से पढ़ने आता शाम को घर चला जाता था। गाँव में लोगों के लिए दवाई, तेल, साबुन, कपड़े मस्तुरी से लेकर आते थे। गाँव के चहेते लड़के थे बड़े मानदार हंसमुख, शिष्ट आज्ञाकारी था। कोई बात हुई तो हाँ के सिवाय कुछ और नही कहता था। रामदास दादा-दादी के प्रिय थे। मणिदास वेदवती रामदास की बढ़ाई करते थकते नही थे मणिदास कहता- ‘मेरा पोता देश का सिपाही बनेगा’। कहता, अभी रामदास छोटा है कक्षा आठवीं पास होने तो दो। रामदास कक्षा आठवीं में प्रथम श्रेणी में पास हो जाता है। सभी लड़के कक्षा आठवीं द्वतीय श्रेणी में पास हो जाते हैं। मणिदास वेदवती बहुत खुश होते हैं। गाँव में आठवीं पास सभी लड़के हैं मगर प्रथम श्रेणी का एक लड़का है रामदास। सभी बहुत खुश होते हैं।

मणिदास और वेदवती एक रात में विचार करते हैं कि रामदास आठवीं पास हो गया। अब विवाह कर देना चाहिए। झालर से ये बांते बताते हैं। झालर पहले तो न-नुकुर करते हैं। बाद में शांति से सलाहकर हाँ कर देते हैं। रामदास किशोरेपन में प्रवेश कर रहा था। मस्त तंदुरूस्त गबरू जवान हो रहा था। मणिदास ने लड़की तलाशना शुरू कर दिया। रतनपुर के पास सेंदरी गाँव के आसकरणदास के यहाँ लड़की का पता चला। मणिदास अपने रिश्तेदारों को लेकर लड़की देखने सेंदरी पहुँच गए। आसकरण दास ने पंडित मणिदास के बारे में सुन रखा था। बहुत बड़े सम्पन्न किसान है। पहुना लोगों के हाथ-पैर पानी से धुलवाए। बरामदे में खाट बिछा दिए सभी लोगों के चरण-स्पर्श करके प्रणाम किए। सभी लोगों को पानी पिलवाया। मणिदास, जगतारण दास, महंत झालर दास मनमोहन दास, सहदेव दास बरामदे में बैठे थे। महंत आसकरण ने कहा- तुम्हारे घर में लड़की है सुना है। यदि हो तो हम लोगों के दिखाओ। मेरा नाती कक्षा आठवीं पास किया है। हम लोग विवाह करना चाहते हैं। आसकरण ने कहा- बच्ची तो है परन्तु बहुत छोटी है इस साल कक्षा पाँचवीं पास की है। मणिदास ने कहा- क्या नाम है दिखाओ तो। आसकरण ने पत्नी मंगलीबाई को कहा तुम खाना बनाने की तैयारी करो। रामवती कहां है तुम यहां ले आओ। रामवती आँगन में बच्चों के साथ सातूल-फूगड़ी खेल रही थी। रामवती दोनों चोटी में लाल फीता बांधी थी। मंहली ने रामवती कहकर पुकारा, रामवती सुनकर आई कहा-आई माँ दौड़ते-दौड़ते बरामदे से घर भीतर चली गई। मणिदास झालर ने उसे देख लिया। चुलबुली रामवती दोनों बेनी को हिलाते हुए चली गई थी। एक ही नजर में सब लोगों ने पसंद कर लिया। मंगली ने रामवती को धीमी आवाज में बताई कि लड़के वाले तुझे देखने आए हैं। चलो मुह हाथ धो ले। रामवती हाथ-पैर धोकर आ गई। मंगली ने दोनो चोटियों को ठीक किया। कपड़ों को झाड़ दिया। कहा- जाओ बाबूजी के पास बैठ जाना। छोटी बच्ची रामवती गोदी में जाकर बैठ गई। बाबूजी ने कहा रामवती बिटिया ये दादाजी आये हैं। चरण छूकर प्रणाम कर लो। रामवती बहुत होशियार और चुलबुली लड़की थी। बाबूजी के कहने पर सभी लोगों के चरण छूकर प्रणाम किया। मणिदास ने गोदी में बिठाकर माथे को चूम लिया। आशीर्वीद दिए जुग-जुग जीओ। मणिदास ने एक सौ निकालकर हाथ पर रख दिया। रामवती नही-नही कहती रही। बाबूजी ने कहा रामवती ले लो। रामवती दौड़ते-दौड़ते अपनी माँ के पीस घर के भीतर चली गई।

मणिदास ने आसकरण जी से कहा भाई तुम्हारी बिटिया हम लोगों को पसंद आ गई है। मैं अपने नाती रामदास के लिए नाती-पत्तों नाती बहू बनाकर इसे अपने घर ले जाना चाहता हूँ। आसकरण ने कहा मेरा सौभाग्य है मेरी बेटी आपके घर ब्याह के जाए। परन्तु मैं अपने परिवार वालों से पूछ लेता हूँ। शाम को मैं अपने परिवार वालों को बुला लूंगा। आसकरण सभी लोगों को स्नान कराने बाड़ी के कुएं पर ले गया। कुएं के ठंडे पानी से स्नान किया। पास ही अरपा नदिया बह रही है। आसकरण ने उन्हें घुमाफिराकर घर ले आया। मंगली बाई ने बढ़िया दूबराज चाँवल का भात पकाया। राहर दाल, लाल भाजी बनाई। सबको बरामदे मे बिठाकर आसकरण ने भोजन परोसा। मसालादार दाल में घी, अचार चटनी, सब्जी भाजी एक नहीं सात बार पूछ-पूछ कर सभी को भोजन कराया। मणिदास भोजन पाके खुश हो गए। रामवती माँ की मदद कर रही थी। पानी सब्जी, दाल घी बार-बार दे रही थी। सभी जन भोजन ग्रहण कर प्रसन्नचित्त हो बड़ाई कर रहे थे।

शाम को पांच बजे आसकरण ने अपने परिवार वाले महंत रामसनेही, दीवानंद, राधेश्याम नंदू एवं अन्य सदस्यों से बरामदे में बुला लिया। आसकरण ने सभी सदस्यों से परिचय कराया। आसकरण ने मणिदास के प्रस्ताव को बताया। सभी परिवार के सदस्यों ने विचार-विमर्श किया। सभी जानकारियां प्राप्त की।

रामसनेही महंत ने कहा मैं मणिदास महंत को जानता हूँ। नाम सुन रखा है। बड़े ज्ञानी पंडित हैं धन-धान्य से भी बड़े सम्पन्न लोग हैं। हमारे बिरादरी के कुछ टिकारी गाँव में हैं। मैं जानता हूँ मंगली बाई आसकरण विचार करके लड़की देने के लिए हां कह देते हैं। जगतारण दास ने कहा बड़े पिताजी लगे हाथ नारियल फोड़वा लेते हैं। अक्ती, बैशाखी आने वाली है शादी भी तय कर लेते हैं। झालर ने कहा बड़े भैया ठीक कह रहें हैं। मणिदास ने नारियल फोड़वाने की बात कही। रामसनेही महंत ने कहा- चलो एक साथ सगाई भी हो जाए। आसकरण ने राधेश्याम से कहा- दुकान से पांच नारियल, तिल, गुड़ खरीद कर ले आओ। पास की दुकाने से नारियल, गुड़ ले आया। मणिदास महंत ने रामसनेही से कहा- आप ही नारियल फोड़ो। नारियलों को छीलकर दोनो समधी परिवार के सदस्यों में वितरण कराया गया। भेंट के बाद मंत्र पढ़कर नारियलों को फोड़ा गया। नारियल दो-दो टुकड़ों में पांचो नारियल टूट गए। महंत के नारियल फोड़ने का तरीका अलग था। नारियल तोड़ने के मंत्र से दो टुकड़े हो जाते थे। नारियल, गुड़, तिल का प्रसाद बनाया जाता है। पहले दोनो समधियों को प्रसाद दिए जाते हैं। दोनो भेंटकर अपने-अपने हाथ के तिल गुड़ नारियल को खाते हैं। वहां उपस्थित महिला पुरषों को प्रसाद दिया जाता है। सगाई की नेंग पूरी हो जाती है। विवाह की तारीख अकती (अक्षय तृतीय) के दिन तय होता है। सात दिनों तक आसकरण के परिवार गाँव वाले मेहमानों को नवेदा नेवता खिलाते हैं। प्रतिदिन एक घर में नेवता भोजन खिलाते हैं और मणिदास व परिवार बहुत खुश हो जाते हैं। नेवता खा करके मणिदास अपने परिवार सहित घर जाने को कहते हैं। आसकरण दास बिलासपुर से सात धोतियां लाकर भेंट करते हैं। मणिदास आसकरण को घर देखने को बुलाते हैं। आसकरण कहते हैं अब शादी तय हो गई है। घर देखकर क्या करेंगे। मेहमानों को छोड़ने आसकरण दास बिलासपुर बस स्टैंड तक जाता है। बस में बिठाकर अपने घर लौट आते हैं।

मणिदास और झालरदास घर पहुँचते हैं। रामवती के पसंद करने की बात बताते हैं। एवं विवाह अक्ती के दिन निश्चित होना बताते हैं। वेदवती और शांति बहूत खुश होती है। शादी की तैयारियों में लग जाते हैं। मणिदास अपने नाती का विवाह बड़े धूम-धाम से मनाना चाहते हैं। सभी दूर-दूर के रिश्तेदारों को भी निमंत्रण भेज देते हैं। रामदास को शादी की जानकारी मिलती है। वह मणिदास से कहता है- दादाजी मैं तो अभी छोटा हूँ। मेरी शादी क्यों कर रहे हो। मैं अभी पढ़ूंगा। पढ़-लिखकर अधिकारी बनूंगा। मैं अभी शादी नही करता। माँ शांति शादी के लिए बहुत समझाती है। दादा जी कहते हैं बेटा तेरी शादी करके हम बहू का मुँह देखना चाहते हैं। जाने कब हम लोग मर जायें भरोसा क्या है। अभी रामवती भी छोटी है। अभी शादी होगी गवन बाद में होगा। जब रामवती जवान हो जायेगी। तुम्हारी पढ़ाई हम लोग बंद तो नही कर रहे हैं। जितना पढ़ना हो पढ़ो। रामदास सबकी बातें सुनकर तैयार हो जाता है। अक्ती के दिन पहले से ही मेहमानों का आना शुरू हो जाता है। सबसे पहले नाना-नानी, मामा-मामी सभी नगाराडीह से आते हैं। झालर मणिदास बहू के लिए गहने सुनार से लेते हैं। गजरा, टोड़ा, नागमोरी, नथ, कान के कुण्डल करधनी, बिछिया, नथनी, अंगूठी, माथे की बिंदिया, आठों अंग के लिए जेवर खरीदे थे। मणिदास अपनी शान को बढ़ाना दिखाना चाहते थे। मणिदास अपने नाती की शादी शाही अंदाज में बड़ी शान-शौकत से करना चाह रहे थे। पंचपेड़ी बाजार से गड़वा-बाजा पार्टी से हजार रूपये में मंगाये थे। मणिदास मस्तूरी से बीस लोग दूधराज का धान, कुरता लाये थे। एक बोरा राहर दाल, सुलोरा, उड़द दाल, एक बोरा तिवरा दाल दलवाये थे। बिलासपुर शहर से तेल, हरीमिर्च, मसाले, शक्कर, चाय-पत्ती, चावल गुड़, कपड़ा, धोती, साड़ी, लुंगी खरीद कर ले आये थे। बड़े जोर-शोर से शादी की तैयारियां कर रहे थे। मस्तूरी से लाउडस्पीकर, नाई, धोबी शहर से आये थे। शहर से ही खाना बनाने वाले रसोईयां भी ले आए थे। घर में नौकर-चाकर भी सभी आ गये। गांव भर में मंगल उछाह हो रहा था।

मणिदास ने अपने सभी रिश्तेदारों को निमंत्रण दिया। गाँव के आसपास के, सभी गाँवों के मुखिया, अधिकारियों, गुरूजी सभी लोगों को निमंत्रण दिया। मेहमानो का आना शुरू हो गया। घर-खलिहान में कुएं के पास मक्का विशेष व्यवस्था बनायी गयी थी। जिसमें एक साथ नौ गुंडी चांवल दाल एक साथ पक जाते थे, पानी रखने के लिए कई ड्रम गांव से आये थे। मणिदास ने प्रत्येक कार्य के लिये विशेष प्रभारी बना रखे थे। सबके उपर वह स्वयं थे। सभी मेहमानो के लिए अलग-अलग कमरों, बरामदों की व्यवस्था थी। गर्मी के दिन होने से खलिहान में भी सो जाते थे।

इधर आसकरण दास को पता चला कि मणिदास महंत शादी की तैयारियां जोर-शोर से कर रहा है। किसी ने बताया कि बरातियों की संख्या एक हजार से अधिक होगी तो उसके हाथ-पैर सूख गये। इतनी बड़ी संख्या के लिए पानी भी नही जुटा पाएंगे। अपनी जाति के सदस्य, राम सनेही, दीवान चन्द्र, नन्दू, मनहरण को बुलाकर विचार विमर्श किया। बताया, बरातियों के लिए व्यवस्था कैसे हो सकती है। रामसनेही महंत ने कहा- इज्जत की सवाल है। चाहे जैसे हो हम सब मिलकर व्यवस्था करते हैं। आसकरण दास भी इधर बड़े जोर शोर से बेटी की विवाह की तैयारी करने लगे। रामसनेही ने कहा सभी अपने-अपने घर, बरामदे, खलिहान को सफाई करके रखो। चार जगह चूल्हा बनाओ। सभी के खातिर अलग-अलग रसोई बनाये। बेटी की शादी बड़े धूमधाम से करने के लिए तैयारियां शुरू हो गई। तीन दिन पहले से शादी की मड़वा गाड़ने लगे थे। आसकरण के सभी रिश्तेदार मंगली बाई के भाई, बहन, माँ, चाचा, चाची मुंगेरी के पास फुलवारी गांव से आये थे। अक्ती के तीन दिन पहले से तेल, चुलमाटी के मड़वा गाड़ने के नेंग हो जावे।

मणिदास पत्नि वेदमती सहित शादी की खुशी में झूम-नाच रहे थे। रामदास को भीड़भाड़ में अच्छा लग रहा था। पहली बार इतनी भीड़ देखी थी। अक्ती के तीन दिन पहले आंगन में मड़वा गड़ाते हैं। शाम सात बजे सभी महिलाएं मंगल गीत गाती, चूलमाटी खनने के लिए धरती माँ की पूजा के लिए जाती है। रामदास की कोई बहिन बड़े पिताजी जगतराम दास की पुत्री मनोरमा सुवासिन बनकर पर्रा बोती है। पर्रा में रोजजलकर सिर में रखकर चलती है। सभी महिलाये विवाह गीच गाती हुई चलती है।

गीत-

कहां के दियना जुगर-जुगर करत हे।

कहां के दिखना जग जोत।

बहु घर के दियना जुगर जागर करच हे।

हमर घर दियना बरत हे।

तालाब के पार में पहुंचकर टीले को एक पानी से साफ करते हैं। हल्दी, कुमकुम, अगरबत्ती से पूजा करते हैं। सुवासिन साथ में ले गये गैती या कुदारी से मिट्टी सात जनें मिलकर खोदते हैं। ढ़ेड़वा सुवासा जो मनोरमा का पति मुक्तावन दास है खुदाई करता है। मुक्तावन को साली सरहज और अन्य महिलायें ताना दे देकर गीत गाती है।

गीत-

तोला माटी कोड़े ता नई आवाजग धीरे-धीरे।

अपने तोनमीगी खोंचं धीरे-धीरे।

तोला माटी कोड़े ता नई आवाजग धीरे-धीरे।

अपन बहनी लला धीरे-धीरे।

सुवासा को शादी की गीतों के तानों को सुनना पड़ता है। हंसी मजाक भी चलता है। सुवासा-सुवासिन मिट्टी खुदाई करते हैं। शांति, माँ, चाची, बड़ी माँ सभी नई साड़ियां पहनकर अचरा में मिट्टी को झोकते हैं। सभी महिलायें मातृ-पूजा करके मिट्टी को आंगन मड़वा में ले आते हैं। महिलायें गीत गाते हुए मड़वा बाजे के साथ घर आ जाती हैं। मड़वा बाजे के साथ सुवासिन बढ़ई के घर पीढ़ा एवं शुभ सूचक लकड़ी का मंगरोहन पूजा करके रखती है। घर की महिलायें कुंडा, करसी,कच्चा हल्दी पीलकर हल्दी तेल चढ़ाने की तैयारी करते हैं। आंगन में आई महिलाओं को सुवासिन द्वारा मड़वा के फोराकर रोटियां, लड्डू दी जाती है। मड़वा में कलश स्थापना करके उसके सामने रामदास को नई धोती पहनाकर, पीढ़ा में बैढाया जाता है। सबसे पहले सुवासिन तेल, हल्दी चढ़ाती है। माँ, बड़ी माँ, चाची, रामदास के सिर पर आंचल रखते हैं। बहिन, भाभी, चाची, नानी, दादी सभी महिलायें तेल हल्दी रामदास को लगाते हैं। रामदास का सारा शरीर हल्दी- हल्दी हो जाता है। दादी वेदवती, नानी श्यामबाई सभी महिलायें गीत गाती हैं। झालर मणिदास आंगन में मेहमानों के साथ आनंद से देखते रहते हैं। तेल चढ़ाकर घर अंदर कलश के समक्ष उठाकर मनोरमा, मुक्तावन ले जाते हैं। सभी मेहमानों को खाना खिलाते हैं।

उधर सेंदरी गाँव में रामवती को भी तेल चढ़ता है। मणिदास के घर से कूड़ा-कलसी, परदा, बिजना, हल्दी, नारियल, साड़ी, सुनारा पहले से पहुँचा दिया गया है। आंगन में मड़वा गाड़ दिये जाते हैं। बीच में कलश की स्थापना की जाती है। माँ, बाई, नाना-नानी, मामी सभी तीन दिन तक तेल चढ़ाते हैं। शादी के मंगल गीत गाते हैं। गाँव में मंगल आनंद छा जाता है। तीन दिन तक रामदास को तेल चढ़ाने का नेंग होता है। वेदवती, श्यामबाई, शांति, केजा, मनोरमा सभी महिलायें पर्दा सिर में डालकर फिल्मी धूनों पर खूब नाचती हैं। गड़वा-बाजे में मोहरी के साथ महिलायें थिरकती रहती हैं। घर में आनंद मंगल खुशी का माहौल रहता है।

गीत-

एक तेल चढ़गे से लाला अहिवरन के हो लाला अहवरन के।

दुई तेल जढ़गे हो लाला अहिवरन के ।

तीन,चार, पांच, छह, सात तेल चढ़गे लाला अहिवरन के हो।

तीसरे दिन रामदास को स्नान कराते हैं। महिलायें खास गीत गाती है।

गीत-

कोने कोड़ाये सरवर सगरी कौन बंधाये पार।

कौन लगाये धन अमरैया कौन है रखवार।

राम कोड़ाये सरवर सगरी, लक्ष्मन बंधावे पार।

सिया लगाये धन अमरैया, हनुमंत हावे रखवार।

रामदास को नई धोती-नया कुरता तफेद रंग वाला पहनाया जाता है। पैर में नये जूते भी। साथ में मुकुट, मौर को पगड़ी बांधते हैं। झालर अपने रिश्तेदारों को बारात जाने से पहले भोजन कराते हैं। लगभग हजार लोग भोजन करते हैं। अपने निजी एवं मुखिया लोगों को मणिदास नये धोतियां भेंट करते हैं। बारात विदाई होती है।सभी मां, दादी, नानी, चाची, भाभी, कलश घुमाकर रामदास का चुम्मा लेते हैं। महिलाएं गीत गाती हैं कि बेटा हमारे लिए बढ़िया सुंदर बहु लाये। जो हमें खाना बनाकर खिलाये, हमारी सेवा करे।

गीत-

झांपी के लूगरा पहिरे धार्मिन दाई।

सौंपो दाई माथा के मुकुट।

दे दाई मोला अस्सी रुपइया।

सुन्दरी बिहाय चले जाहब।

तोरर लाल दाई भाते रंधैया।

मोर बा जनम जोड़ी।

इधर महिलाएं बारात बिदा कर घर आ जाती हैं। मणिदास सभी बारातियों को बैलगाड़ी, भैंसागाड़ी, ट्रेक्टर, ट्राली, बस, मोटरसाइकिल आदि से बारात सेंदरी गांव के लिए रवाना हो गई। रात में सभी महिलायें अपने संवाग धारण में मनोरंजन के लिए नाटक, नाचा, डांस गीत, गाती है। और पुरूषों के न रहने का आनंद उठाती हैं। सभी महिलाएं गीत, संगीत, नृत्य प्रतिभा का प्रदर्शन करती है। मौज-मस्ती मनाती है, बेटा का विवाहे माँ के लिए खुशियों का खजाना होता है।

गीत-

गाँव भर के टूरी सकेल राखा रे।

डीडवा नाचे बर।

ईंहा होही रंग-रंग के खेल तमाशा।

सब मुटियारी सकेल राखा रे।

कई महिलायें आनंद विभोर हो नाचने गाने लगती है। पुत्र के विवाह में माँ, दादी, नानी, भाभी,दीदी, चाची, ताई सभी मड़वा में नाचती हैं। विवाह का आनंद पुरूष न रहने का खूब उठाती हैं। मौज-मस्ती कर महिलायें रोटियां, खीर, भात, दाल, सब्जियां, कढ़ी, विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर खाती हैं। वेदवती इनकी मुखिया रहती हैं। वेदवती श्यामबाई दोनों समधिन मड़वा में खूब नाचती और मनोरंजन करती है। पुरूष वेश धारण कर कलेक्टर, दरोगा, सिपाही व थानेदार बनकर नाटक, तमाशे करती है। गाँव के मनचले जो बारात जाने से छूट गये होते हैं तांक-झाक कर दूर से मजा लेते है। कभी-कभी पकड़ा जाते हैं। पिटाई, गाली भी खाते हैं। बारात आने की प्रतीक्षा करते हैं। मणिदास बारात लेकर सेंदरी गाँव पहुँचते हैं। इतनी संख्या में बारात ले जाना बहुत बड़ा सिरदर्द था कई घरों को जनवासा बना कर बारात ठहरा दी जाती है। बारातियों को सुबह ठंडा पानी, गु़ड़ पानी और चाय पिलाते हैं। सभी बाराती अरपा नदी में जाकर शौच एवं स्नान करते हैं। नये कपड़े पहनकर बाराती तैयार हो जाते हैं। रामदास भी सुवासा मुक्तावन के साथ तैयार बैठे रहता है। बारातियों की भीड़ रहती है। कौन कहं पर खड़ा है पता नही चलता। रामदास को लेकर सुवासा एक जगह खड़ा हो जाता है। पास में झालरदास, मणिदास, जगतारण, मनमोहन दास, सहदेव, रामदयाल पटेल, दलगंजसिंह, बहादुर सिंग, मुंशीलाल, भागवत गाँव से सभी प्रमुख जन बारात पर आने के लिए तैयार खड़े होते हैं। गड़वा बाजा बजने लगता है।

आसकरण दास अपने संबंधियों को लेकर बारात पर घर आ जाते हैं। साथ में बैंड बाजा के साथ आते हैं। रामसनेही महंत कहता है ऍसी ही बारात थोड़ी जायेगी। जरा कला, शौर्य, शक्ति का प्रदर्शन ता दिखाओ कि टिकारी वाले लोग पहलवान साबित होते हैं या सेंदरी वाले। फूलवारी से आये भागचंद दोनो हाथों में लाठी लेकर आये। उसके कुशल प्रदर्शन से लाठी चलाकर सबका मन मोह लिया। बाराती की ओर से वीरसिंह ने लाठी चलाकर दिखाया। उससे और अच्छा था। सेंदरी वालों की हार हो गई। सेंदरी वालों ने भाला गोला, चक्का, पानी भरे हौला को दांत से उठाना एक दूसरे नीचे दिखाने का प्रदर्शन होता रहा। महंत बाजे के साथ वीरता का प्रदर्शन होता रहा। अंत में दलगंज सिंह ने तलवार चलाने का अनूठा प्रदर्शन किया। पहले ही बढ़कर प्रदर्शन किया।

लगभग एक घंटे तक शौर्य प्रदर्शन चलता रहा। सूरज चढ़ता जा रहा था और भांवर का समय टल न जाए कहकर रामसनेही ने आसकरण से चादर बिछाने को कहा। समधी भेंट का समय हो गया है। आसकरण न झालर को माला, टीका लगाकर स्वागत, समधी भेंट किए। लगभग एक हजार बराती एक हजार घराती दो हजार से अधिक की भीड़ हो गई थी।

महिलाएं मंगल गीत गा रही थी। समधी भेंट के बाद द्वार पूजा पर्दा मारने का नेंग होता है गड़वा बाजे के साथ मुक्तावन, रामदास घर के द्वार पर ले जाता है। वर विजना से परी को मारता है। महिलाएं गीत गाती हैं। मजाक भी करती हैं।

गीत- ताला पर्रा मारेल नई आवय ग धीरे-धीरे।

अपन बहिनी ला लान धीरे-धीरे।

सभी बारातियों को रामसनेही के बरामदे घर में जनवासा दिए जाते हैं। सभी बाराती इधर-उधर जिसको जहां जगह मिली, बैठ गये। सभी बारातियों को नाश्ता, चाय, नुक्ती, सेव, पुड़ी खिलाए गये। दो हजार आदमियों के लेए प्रबंध किया गया था। जनवासे में कांदा भाजी खिलाने का रिवाज है। गरम-गरम खीर बारातियों को खाने को दिया गया। बड़े-बड़े बबूल को उबाल के दातून करने के दिया गया है। जब तक बाराती खीर व दातून नही तोड़ लिए तब तक महिलाएं गीत गा-गाकर गालियां लेती रही। हंसी मजाक के दौर में गालियां भी दी जाती है। बराती हंस-हंसकर महिलाओं को चिढ़ाते हैं। वाद-विवाद नही करते बल्कि इस प्रकार जनवासे की पूजा पूर्ण होती है।

इसके बाद सुनयना द्वारा वधू के लिए नए साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज, जेवर गहने, जूते-चप्पल आदि सामान पहंचाये जाते हैं। वधू को स्नान कराकर तैयार कराते हैं। वर-वधू को तैयार कर मड़वा युक्त आंगन में लाते हैं। लगन पूजा नारियल, गुड़, तिल के प्रसाद बनाकर वीडापन वर वधू को खिलाते हैं।

साथ-साथ आशीर्वाद दिया जाता है। आसकरण दास एवं महंत को प्रसाद दिए जातें हैं। प्रसाद खाकर समधी भेंट करते हैं। फिर सभी रिश्तेदार परस्पर भेंट करते हैं। करी लड्डू, तिल, गुड़ सभी लोगों में बांटते हैं। वर-वधू को घर में ले जाते हैं।

सभी बारातियों को दार भात, सब्जी, पूड़ी, आचार, मिर्ची चटनी परोसी जाती है। आंगन में पचास बाराती भोजन करते हैं। बाकी बाराती बरामदे व खलिहान में बैठकर भोजन करते हैं। दो हजार व्यक्ति को बढ़िया छककर भोजन कराते हैं। जिससे सभी बाराती खुश हो जाते हैं।

भोजन के बाद मणिदास रामसनेही कहते हैं कि जल्दी से भांवर में बैठा देते हैं। आंगन को साफ कर धान के चौक कलश को चारों ओर बनाते हैं। चारों ओर घराती-बाराती बैठ जाते हैं। रामवती को अंगुली पकड़कर सुवासिन आंगन में ले आती हैं। रामदास पीछे एक भांवर के बाद सुवासिन छोड़कर बाहर हो जाती है। रामवती, रामदास सात भांवर के बाद स्थान ग्रहण करते हैं। वर-वधू के पैर गाय के दूध से रामवती की माँ, चाची, मामी, दादी, नानी, पिताजी, दादाजी सभी रिश्ते पखारते हैं और चूमा लेते हैं। रामवती की माँ मंगली बाई नई साड़ी पहनकर चाची ताई, सब मिलकर पंच हर दाईज लाती हैं।

सबको आंगन मड़वा में नीचे रख दिया। माँ ने पहले रामवती रामदास के चूमा लिए एवं दहेज में रूपये दिए। आसकरण दास ने रामदास को सोने की चैल पहनाए। रामवती के बड़े भाई ने रामदास को कपड़े भेंट किए। महिलाएं मंगल गीत गाती रहती है। गड़वा बाजा भी आंगन में बजता है। आसकरण दास के सभी रिश्तेदार एक-एक करके चूमा लेते एवं दहेज में रूपये, धान, चावल, कपड़े गाय बछड़े देते हैं। लगभग एक लाख रूपये का दहेज देते हैं। दहेज के बाद सभी बारातियों को खाना खिलाया जाता है बराची घराती भोजन करने के बाद बरात विदाई का समय आ जाता है।

रामवती, रामदास घर से सड़क के किनारे सुनयना, सुनालिया सभी महिलाओं के साथ बारात विदाई के लिए जाते हैं। मंगली बाई, नानी, दादी, चाची, पिताजी चूमा लेकर रूंधे गले से बेटी को विदाई करते हैं।

गीत-

सुन ओ पड़ोसिन सुन ओ पड़ोसिन,

दाईल रोवे झन देवे, तोर घर रहें व दाई भात,

रंधैया ओ, भात रंधयो भात ल झन देख-देख रोवें।

मणिदास, झालर, रामदास, रामवती को बस में बिठाकर सभी बारातियों के गाँव टिकारी आ जाते हैं। रामदास की बारात देखते ही बनता था। आसपास गाँव में ऍसी कभी कोई बारात नही निकली थी। मणिदास गुलाबी रंग की पगड़ी में मस्त हारो बराबर दिख रहे थे। गाँव के स्कूल के बरामदे में वर-वधू बराती समा गए। वेदवती, शांतिबाई और अन्य महिलायें बरात आने पर मंगल गीत गाती आती है। रामवती के खुबसुरत चेहरे को देखकर सभी प्रशंसा करती है। अच्छी जोड़ी है। घर के द्वार में रामवती रामदास बरातियों की आरती उतारकर पूजा की जाती है। इसके बाद आंगव मड़वा को सुवासा-सुवासिन मनोरमा ले जाती है। वधू देखकर सभी प्रसन्न हो जाते हैं। घर अंदर ले जाकर दोनो के नए वस्त्र निकाल दिए जाते हैं। सभी बरातियों को दोपहर बाद भोजन कराते हैं। शाम पांच बजे तालाब स्नान कराने वर-वधू को ले जाते हैं। एक चादर के चारों कोनो में लाठी-लकड़ी बांध देते हैं। चार लोग पकड़ लेते हैं। वर-वधू बीच में सभी महिलाएं मंगल गीत गाती हुई तालाब के घाट में ले जाती हैं। गड़वा बाजा के साथ बजते रहता है। वर-वधू को स्नान कराने वाले कपड़े पहनाते हैं। पर्दा बिछाकर घाट में माँ, शांतिबाई बैठ जाती है। गोदी में रामदास एवं रामवती को बिठाते हैं। रामदास को कहा जाता है कि बहू के पाठ पर पाँच मुक्के मारो। रामवती के पीठ पर पाँच बार रामदास मारता है। रामवती हँसती-हँसती सह जाती है। सभी महिलाएं हँसती हैं। मनोरमा ऊपर से कलसी डालते हैं। ऍसे सात बार कलसी के पानी से उन्हें नहलाते हैं। बाद में महिलाएं एक दूसरे पर पानी छिड़कती हैं। वर-वधू को स्नान कराकर फिर घर आ जाते हैं।

शाम 6 बजे वर-वधू को नए वस्त्र पहनाकर मड़वा में ले जाते हैं। आंगन में धाने के चौक पूरे जाते हैं। बीच कलश में दीप जलते रहता है। मनोरमा चौक को एक भांवर घुमाकर छोड़ देते हैं। रामवती, रामदास पाँच भांवर घूमकर एक जगह चादर में बैठ जाते हैं। माँ शांतिबाई, दादी, वेदवती ताई, चाची सभी बारी-बारी से गाय के दूध से पैर पखारते हैं। चूमा लेते हैं। अपने समर्थ के अनुसार वधू को रूपये देते हैं। दहेज से लाए सभी सामग्रियों को आंगन में दिखाते हैं। घर आंगन भरा रहता है। बाद मणिदास झालर को चूमा लेकर आशीर्वाद देते हैं। बेटा-बहू हम लोगों को पांच मुट्ठी भर दे देना हम लोगों को कुछ आर नही चाहिए। सभी बराती रिश्तेदार रात में खाना खाते हैं। सुबह सभी अपने-अपने घर लौट जाते हैं। मनोरमा नानी श्यामबाई बच जाती है। दो चार दिन बाद तो सभी मेहमान अपने घर चले जाते हैं। मणिदास महंत को खिलाने-पिलाने की चर्चाएं बहुत दूर-दूर फैल जाती है। क्रमशः.....
 
आषाढ़ माह में किसान फसल को देखते हैं। किसी-किसी दिन बादल थोड़ा बहुत पानी बरस जाता था। परन्तु एकदम झकझोर कर पानी नही गिर रहा था। आषाढ़ महिना ऍसे सुखा बित गया, जो किसाने खेतों में बीज बो दिए थे बीज अंकुरित होकर चल गए। मणिदास झालर द्वारा बड़े चिंतित हैं कि इस वर्ष कैसे खेती किसानी करें। खेती किसानी पिछड़ती जा रही थी। सावन मास में कुछ पानी बरसा जिससे कुछ किसानों ने धान बो दिया। झालर ने भी खेतों में धान बो दिए। बीज उगने के बाद सिर्फ एक-दो दिन ही पानी बरसा। खेत नही भर पाये। सिंचाई विभाग ने चाहा कि नहर में पानी छोड़ें। ताकि खेतों में पानी भर जाए। धान की वियाई-विदाई हो जाए।

मणिदास ने रामदास को बिलासपुर के मिशन स्कूल में कक्षा 9वीं में भर्ती करा दिया। रामदास को मिशन होस्टल में रहने के लिए जगह भी मिल गई। रामदास मन लगाकर पढ़ने लगा। रामदास ने कक्षा 9वीं पास कर लिया। इस वर्ष पानी कम गिरने से धाने की फसल ज्यादा बर्बाद हुई उपज कम हुई। बड़ी मुश्किल से झालर को बाज के लिए धान मिला। छत्तीसगढ़ में किसानों के लिए महाअकाल पड़ गया। इस अकाल से किसानों के चुल हिल गये। छत्तीसगढ़ के सारे किसाने बड़े-बड़े शहरों में खाने-कमाने दिल्ली, कलकत्ता, इलाहाबाद, लखनऊ, आसाम, ढ़ाका चले गए। गाँव में मात्र झालर दास का परिवार रह गया। घर देखने के लिए बड़े-बूढ़े लोग बचे। उन्हें दिन में एक जून की रोटी भी नही मिल पाती थी। गाँव वाले मणिदास के पास जा पुराना धान था उसी से गुजर-बसर कर रहे थे।

रामदास कक्षा 9वीं पास कर कक्षा 10वीं में पढ़ने लगता है। रामदास किशोर से जवानी में प्रवेश कर रहा था। वह कक्षा 10वीं में द्वितीय श्रेणी मे उत्तीर्ण हो जाता है। रामदास पढ़ने-लिखने में बचपन से होशियार था। उसके संग पढ़ने वाले उत्तमदास, मनहरण, रामसहाय, पूरन लाल, मनोहर, तृतीय श्रेणी में पास हुए। गर्मी की छुट्टी में सभी साथी गाँव आ गए। वेदवती मणिदास से कहती हैं कि – रामवती जवान हो गई है गौना कराकर ले आओ। मणिदास झालर से कहता है कि –बेटा रामदास भी जवान हो गया है। बहू का गौना कराकर ले आओ। तुम कल सेंदरी गाँव जाकर आसकरण दास से कहो ...। झालर सेंदरी जाकर मंगलीबाई आसकरण दास से कहता है- कि बहू का गौना कराकर ले जाना चाहते हैं। तब तक रामवती आठवीं पास हो गई थी। रामवती मस्त गोल-गोल मांसल तन वाली जवान हो रही थी। देखने में बहुत खूबसूरत, छरहरी बदन की किशोरी लगती थी। मंगली आसकरण दास से बोली समधी जी आए हैं। रामवती के गौना कराने के कह रहें हैं। मंगली कहती है- आजकल के बच्चों का क्या भरोसा । कुछ ऊंच-नीच हो जाए तो बदनामी होगी। इसलिए तुम कह दो। अक्ती के दिने गौना कराकर ले जांए। अपनी बहू को।

झालर ने अपने घर आकर मणिदास को बतलाता है कि अक्ती का दिने तय हुआ है। चलो एक माह अभी समय है सभी तैयारियां कर लो। मणिदास अपने नाते रिश्तेदारों को एवं आसपास गाँव के मुखिया, पटेलों को गौना के बरात में चलने के लिए निमंत्रण देते हैं। बस में बैठकर मणिदास गौना की बारात सेंदरी गांव जाता है। अक्ती (अक्षय तृतीया) के सुबह बारात सेंदरी पहुँच जाती है। साथ में गड़वा बाजा भी ले जाते हैं। बाजा वाला बढ़िया फिल्मी धुनों में परी नाचती हैं। गाँव में हजारों आदमियों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है। आसकरण दास बरातियों को चाय, नास्ता कराते हैं। सुबह दस बजे आंगन में धान का चौक पूरकर कलश जला कर रामदास रामवती को नए वस्त्र पहनाकर घर से विदा करते हैं। आंगन में सभी महिला पुरूष, दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, मामा-मामी पिताजी सभी चूमा लेते हैं। विदाई के समय सभी लोगों की आंखों में आंसू छलक जाते हैं। माँ, भाभी, पिताजी सभी रामदास व परिवार के सदस्यों को अपनी माँ, बाप समझने एवं सेवा करने के लिए समझाते हैं। माँ मंगलीबाई से रामवती गले मिलकर खूब रोती है। मंगलीबाई कहती है बेटी आज तुम पराई बन गई हो। ससुराल ही तुम्हारा असली घर है। माँ-बाप पाल-पोसकर बड़ा कर देते हैं, परन्तु जीवन भर के लिए सास-ससुर ही माँ-बाप होते हैं। रामवती, नानी, दादी, मामी सखियों से मिलकर खूब रोती हैं। पास में खड़े रामदास के आंसू टपक जाते हैं। मन में ग्लानि होने लगती है कि लड़की ससुराल जाते ही पराई हो जाती है। यह कैसा रिवाज है। माँ-बाप, भाई-बहन, सभी पराये हो जाते हैं। घर से कुछ दूर सड़क कर जाकर वर-वधू की विदाई करते हैं। आसकरण दोनों हाथ जोड़कर मणिदास, झालरदास, जगतारणदास से विनती करता है कि मेरी बच्ची से कोई गलती हो तो माफ कर देना। अभी बहुत छोटी है। गौना में मिले चांवल, रूपए, पैसे को बस के ऊपर लादकर गाँव ले आते हैं।

वेदवती, शांतिबाई, केजा, मनोरमा सभी घर की महिलाएं द्वार पर आरती उतारकर वधू को घर में लाते हैं। आंगने में सभी बड़ों को प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। सभी बरातियों को शाम का भोजन कराते हैं। सभी मेहमान अपने-अपने घर चले जाते हैं। मनोरमा उस रात एक कमरे की साफ-सफाई पलंग बिछा देती है। खाना खाने के बाद मनोरमा रामवती को (सुहागरात) घर देने की बात बताती है और वहां ले जाती है। उधर दोनो गप मारते रहते हैं। वह रामदास को लेकर आती हैं। सुहागरात सफल हो.... कहकर मनोरमा वापस अपने कमरे में आ जाती है। रामवती पलंग से उठकर रामदास के पहले चरण स्पर्श करती है। रामदास रामवती के मना करने के बाद भी पोटार के कस के दबा लेता है। रामवती ए..माँ.. कहकर बोलती है, तुम तो ऍसा दबाए कि मेरी हड्डी टूट जाए। दोनों एक दूसरे को चुमते हैं। कुछ समय तक गप बाजी होती है। फिर लालटेन बुझाकर एक दूसरे में खो जाते हैं। रामदास रामवती दो शरीर-एक प्राण बन जाते हैं। सुहागरात की यादें दोनो के स्मृति में अंकित हो जाती है। सभी मेहमान घर चले जाते हैं। मणिदास और वेदवती बहू के हाथों से भोजन करके तृप्त हो जाते हैं। वेदवती कहती है कि अब यदि हम मर जाएंगे तो भी कुछ नही होगा। ऋण से छुटकारा हो गया है। झालर और शांतिबाई रामवती को पुत्री के समान रखती हैं। रामदास रामवती की जोड़ी खूब फबती है। रामदास झालर के संग खेती किसानी में साथ देता है। सावन के महिने में रामवती गर्भवती हो जाती है। जब दादा मणिदास और दादी वेदवती को यह पता चलता है तो वें खुशी से झूम जाते हैं। मणिदास कहता है कि, अब तो नाती के बेटा-बेटी को देख कर ही मरूंगा। चौथी पीढ़ी का सदस्य आने वाला है।

रामवती को खाने-पाने की चीजें पसंद नही आती है रामदास शहर से फल ला-लाकर खिलाता है। परन्तु रामवती नही खा पाती। रामदास आसकरण दास को बताता है कि रामवती गर्भवती है। खाना अच्छा नही लग रहा है। मंगलीबाई सात प्रकार (संधोरी) रोटियां बनाकर ले जाती हैं। साथ में इमली, नींबू का अचार, आम का अचार, खट्टे-मिठे सूखे बेर भी ले जाती है। रामवती मां को देखकर खुश हो जाती है। रामवती पहले से कमजोर हो गई थी। मंगली ने समझाया कि बेटी इस समय कुछ अच्छा नही लगता। पेट में जो आ रहा है, उसके कारण अच्छा नही लग रहा। रामवती को इमली, आम-नींबू का अचार अच्छा लगता है। रामवती शांतिबाई कुछ काम नही करने देते । मंगली घर के कामों में हाथ बंटाती थी। दोनो समधिन मिलकर घर के कामों को कर लेते थे। कुछ दिन बाद रामवती खाना-खाने लगती हैं। शरीर भरता जाता है, पेट बाहर निकलता जाता है। मंगली कुछ दिन रहकर अपने घर लौट जाती है। रामवती नौ माह बाद एक स्वस्थ बच्ची को जन्म देती हैं। रामदास, मणिदास, झालरदास सभी खुश हो जाते हैं। घर में एक खिलौना आ गया था। मणिदास ने पूरे गांव भर को कंकेपानी एवं भोजन कराया। मस्तूरी से लाउडस्पीकर लाए। फिल्मी गाने , छत्तीसगढ़ी गीत बजवाए। मणिदास और वेदवती की खुशियों का ठिकाना न था। इस वर्ष फसल भी अच्छी हुई। बच्ची के जन्म होने से घर धन-धान्य से भर गया। रामदास बच्ची का नाम माधूरी रखता है। वह अति सुंदर रहती है।

मणिदास का भरा-पूरा परिवार सुखी और सम्पन्न कृषक था। मणिदास की ख्याति भले और ईमानदार व्यक्तियों में गिनी जाती थी। झालरदास ने रामदास से कहा- बेटा, अब आगे पढ़ाई मत करो। घर की खेती किसानी को देखो। गाँव में कहावत है कि- लड़का बी. ए. पास होना मानो परदेशी बाबू बन जाना कहते हैं। देश-दुनियां, खेती-किसानी, गांव से संबंध उसका टूट जाता है। न वह शहर का हो पाता है, न गांव का किसान बन पाता । इसलिए बेटा, बढ़िया खेती-किसानी करो। तु्म्हारे लिए पूर्वजों ने बहुत धन संपत्ति रखा है। उधर रामवती भी रामदास को समझाता है, बाबूजी ठीक कह रहे हैं। फिर बच्ची भी अभी छोटी है। माधूरी बहुत रोती है। तुम्हारी गोद के लिए रोती है। पिता का प्यार-दुलार बच्ची पहचान गई है। मां शांति बाई, वेदवती सभी समझाते हैं। रामदास के साथ पढ़ने वाले सभी साथी कालेज नही पढ़ पाते। रामदास परिवर्तन को भांपते हुए कालेज नही जा पाता।

मणिदास सावन मास के बीतते भादो मास के शुरूवात में खेत देखने गया। खेत में मेड़ पर चल रहा था कि.. पैर में एक केकड़े आकार के बिच्छु ने आकर काट लिया। मणिदास बिच्छु के काटने से बुरी तरह से कराह उठा। बहुत पुरानी बिच्छु रहा। एक बार के काटने से ही आदमी मर जाए। मणिदास ने तब गमछे से नाड़ी को पकड़के कस कर बांध दिए। जल्दी-जल्दी घर आया। जैसे ही बरामदे में पहुंचा, मणिदास चिल्लाये... वेदवती, शांति, रामदास यहां आओ। लोटे में पानी लाओ। रामवती दौड़े-दौड़े एक लोटे पानी लाई। अपने हाथो से पानी पिलाई। मणिदास पसिने से लथपथ हो गया। शरीर में विष फैलने लगा। मुंह से झाग निकलने लगा। वह धीरे-धीरे बेहोश होने लगा मणिदास जमीन पर लेट गया। घर में रोना शुरू हो गया। मणिदास विष से तड़पने लगा। रामदास आसपास के बैगा, गुनिया से झाड़, फूंक कराया। परन्तु बिच्छु का जहर नही उतर पाया। झालर ने कहा रामदास नौकर से कहकर बैलगाड़ी फंदवाओ। इसे धर्म अस्पताल मस्तुरी ले जाते हैं। मणिदास का शरीर विष से नीला पड़ गया। मुंह से झाग बराबर निकल रहा था। मणिदास को बेहोश हुए दो घंटे हो गए। वेदवती शांतिबाई के आंसू नही थम रहे थे। बैलगाड़ी से शासकीय अस्पताल मस्तुरी ले गए। डा. गुप्ता ने देखकर कहा कि जल्दी क्यों नही लाए। शरीर में पूरा विष फैल गया है। मैं प्रयास करता हूँ। डा. गुप्ता ने सिस्टर मार्टिन को बुलाया। तत्काल ग्लूकोज से स्लाइन लगाओ। मणिदास को स्लाइन चढ़ाया गया। दो बोतल चढ़ाये। परन्तु मणिदास की बेहोशी नही कटी। सात घंटे तक लगातार बोतल विषमारक इंजेक्सन लगाते रहे परन्तु विष खत्म नही हुआ मणिदास के मस्तिस्क में जहर पहुंच चुका था। डा. गुप्ता ने जहर उतारने के लिए अथक प्रयास किए परन्तु, जहर नही उतरा। रात आठ बजे मणिदास प्राण पखेरू उड़ने से पहले जोर से चिल्लाए। हाथ पैर को पीटने लगे। सिस्टर मार्टिन, झालर, रामदास जोर से दबाकर हाथ पैर को पकड़े । मणिदास ने अंतिम बार आंखें खोली। रामदास को पास बुलाया। सिर पर हाथ रखा। वेदवती, झालर, को सबको एक नजर घुमाकर देखा। सब परिवार के सदस्यों को देखने के बाद अंतिम सांसे ली। सिर एक तरफ लु़ड़क गया। रामदास के सिर से उनका हाथ गिर गया। रामदास, वेदवती, झालर ने रोना शुरू कर दिया। सभी की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। मणिदास एक नेक इंसाने थे। संसार में एक महामानव बनकर आए थे। मणिदास की आत्मा ब्रम्ह में समा गई। डा. गुप्ता ने पोस्ट मार्टम रिपोर्ट बनाकर लास रामदास को सौंप दिए। डा. गुप्ता ने पुलिस थाना मस्तुरी में सर्प बिच्छु काटने का मामला दर्ज करा दिया। मर्ग कायम करके प्रकरण पंजीबध्द कर दिया।

प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र मस्तुरी से लाश को बैलगाड़ी, में भरकर गांव टिकारी ले गए। जैसे ही गांव वालों को पता चला। महंत जी नही रहें, देखने वालों का तांता लग गया। रामदास वेदवती चुप कराते थे, परन्तु वेदवती रोती जाती थी। कहती- बेटा अब इस शरीर में क्या रखा है। मेरे प्राण तो चले गए। मैं जी के क्या करूंगी। शांति, झालर, रामवती सभी समझाते परन्तु वेदवती रात भर विलाप करती रही। लाश से लिपट-लिपटकर रोती रही। रामदास ने सभी रिश्तेदारों को आजमी भेजकर जानकारी दी। आस-पास के सभी रिश्तेदार दस बजे के आसपास जमा हो गए। सेंदरी में रामसनेही महंत, आसकरण, मंगलीबाई बारह बजे दिन को पहूँच पाए। मणिदास के लाश को बढ़िया नहलाए, तेल हरदी, नए वस्त्र पहनाए। उसी समय वेदवती मूर्छित होकर गिर पड़ती है। वेदवती को रामदास पानी छिड़कता है। मुंह में पानी डालता है, पानी मुंह में नही जाता। बाहर निकल जाता है। रामदास के गोदी में ही सती वेदवती प्राण त्याग देती है। घर में हा-हाकार मच जाता है। एक साथ दो लोगों की मृत्यु। झालर दादा शांति खूब रोते हैं। रामवती बहुत रोती है। जगतारण दास केजा बाई मनमोहन सभी परिवार के दुखी सदस्यों को चुप कराते हैं। कहते हैं दोनों जीवन साथी साथ जीने, साथ मरने की कसमें खाए थे। भगवान दोनों को शांति प्रदान करे।

वेदवती के लाश को शांति, केजा, रामवती, स्नान कराकर नए साड़ी तेल हल्दी लगाकर माथे में सिंदूर, पैर में महावर, टिकली, फुंद्दी, एक सुहागन नारी के सुहाग पनाकर पत्नी-पति को एक साथ मुक्तिधाम ले जाने के लिए शव यात्रा निकलती है। गाँव-गाँव में शोर मच जाता है, कि पति-पत्नी एक साथ मर गए। साथ में दाह संस्कार किया। गाँव-गाँव से आदमी माटी देने के लिए आने लगे थे। शवयात्रा में रामदास झालर दोनों सामने जगतारण मनमोहन पीछे मयाने के पकड़े हुए थे। मयाना को एक-एक करके सब कंधा दे रहे थे। हजारों आदमियों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी। रामदास ने गाँव के तिहार, समक्ष, नौकर वेदराम को गड्ढा घोतने के लिए भेज दिए थे। बोधराम ने दोनों के लिए बड़े गड्ढे तैयार करा लिए थे। लाशों को पीपल पेड़ के नीचे उतारा गया। लाश के पास में जगतारण, झालरदास, रामदास बैठे थे। अगरब7त्ती जलाई। फूल मालाओं से लाशें ढंकी थी। अंतिम दर्शन के लिए मणिदास, वेदवती के मुँह को खोले। रामदास ने गंगा जल मुँह में डाल दिया। परिवार के सदस्यों ने अंतिम दर्शन कर गंगा जल पिलाया। दोनों की लाशें एक साथ गड्ढे में दफनाई गई। सभी लोगों ने पाँच-पाँच मुट्ठी मिट्टी डाली। बोधराम ने पत्थर से ऊपर उठी मिट्टी को पीटकर बराबर किया। सभी स्नान के लिए तालाब की ओर प्रस्थान किए। लाश के लिए नए वस्त्रों के ढेर लग गए थे। लगभग 100 साड़ियां और धोतियाँ चढ़ी थीं। सभी कपड़ों को सड़क के किनारे बबूल के पेड़ में लटका दिए। जिसे दीन-हीन लोग उपयोग में ला सकें।

तालाब के घाट में सभी स्नान किए। बोधराम ने उरई के पौधे को किनारे लगा दिए। जिसे झालर, जगतारण ने पाँच बार पानी दिया। बाद में सभी लोगों ने वैसा ही किया। स्नान के बाद सभी रामदास के घर आए। द्वार पर खड़े होकर सभी लोगों को प्रणाम किए एवं धन्यवाद दिया। महिलाएं सभी स्नान करके पहले आ गई थी। गाँव में अजीब सा सन्नाटा था। घर में तो और अधिक। क्योंकि दोनों सदस्यों की गमी हो गई थी। जगतारण की बहू लताबाई ने सब लोगों के लिए भोजन बनाया था। रामदास रामवती फूट-फूट के रो रहे थे। आँखों से आसूं थम नहीं रहे थे। झालर, शांति, मंगलीबाई बहुत समझा रहे थे। रामदास के सिर से दादा-दादी की छांव हट गई थी। जिसने पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया था। बड़े प्यार-दुलार से बड़ा किया था। उसी के सहारे जीते थे। रामवती रामदास को समझाता है कि अभी बाबूजी और माँ जीवित हैं, क्यों घबराते हो। सभी लोगों ने रामदास को ढाढस बंधाए। सभी मनुष्यों को एक दिन तो मरना है। किसी तरह रामदास को भोजन कराते हैं। सभी मेहमान शाम को अपने-अपने घर चले जाते हैं। बच जाते हैं मनोरमा और मंगलीबाई।

झालरदास दशकर्म के लिए रिश्तेदारों को काँव वालों को निमंत्रण देता है। दशकर्म शनिवार के दिन होगा। रामदास झालरदास दशकर्म के लिए चावल, दाल, तेल हल्दी, मिर्च मसाले बाजार से ले आता है। दूबराज धान के दस बोरा चावल मस्तूरी से कुटा कर ले आते हैं। दाल के लिए दो बोरे अरहर, उड़द, तीवरा, दराकर ले आते हैं। मालपुआ बनाने के लिए पाँच टिन घी, पाँच चक्की गुड़, नारियल, लौंग, इलायची बिलासपुर से खरीदकर बैलगाड़ी से भरकर ले आते हैं। तीन दिन में तीज नहावन करते हैं एवं दस दिन में दशकर्म। सभी मेहमान एक दिन जहलने के लिए आ जाते हैं। घर मेहमानों से भरा रहता है। पूरे घर की साफ-सफाई कराते हैं। घर के कपड़े बिस्तर धुलवाते हैं। दशकर्म के दिन रामदस शहर से लाए नाई से बाल उतरवाता है। झालरदास, जगतारा, मनमोहन मुक्तावन दास परिवार, गाँव के अन्य सदस्य सिर के बाल उतरवाते हैं। दोपहर दो बजे तक नाई दाढ़ी बाल काटते रहते हैं।

घर की एवं गाँव की सभी महिलाएं नहावन में तालाब जाती हैं। सभी महिलाएं पाँच बार पानी देते हैं। स्नान करके लाईन से घर आ जाती हैं। द्वार में रखेपानी से पैर धोती हैं। आंगन में खड़े होकर गाँव के सारे लोग अपने घर चले जाते हैं। शेष मेहमान रह जाते हैं। महिलाएं कपड़े पहनकर तैयार हो जाती हैं। पुरुष लोग महिलाओं के आने के बाद स्नान करने जाते हैं। लगभग हजार आदमियों से अधिक लोग स्नान करते हैं और पाँच-पाँच बार पानी अंतिम रूप से देते हैं। लाईन से सभी घर आ जाते हैं। द्वरा में पानी रखे रहते हैं। पैर-हाथ धोकर आंगन में जाते हैं। रामदास, झालरदास, हावन द्वार में खड़े होकर सभी लोगों को प्रणाम करते हैं। एवं भोजन ग्रहण करने के लिए निवेदन करते हैं। सभी पुरुष कपड़े पहनकर तैयार होते हैं।

खलिहान में दस गुण्डे के चूल (चूल्हा) जलते रहते हैं, जिसमें चावल दाल सब्जी पकाते हैं। सभी मेहमानों को भोजन पंक्ति में कराते हैं। रामदास झालरदास दोना पत्तल में भोजन लेकर द्वार में रख आते हैं। पानी पत्तल में रख देता है। ऐसा कहा जाता है कि मरे हुए व्यक्ति आकर भोजन पाते हैं। इसके बाद ही सभी लोग भोजन करते हैं।

शाम के पाँच बजे कगे बाद ही घर के आंगन के साफ-सफाई करके चौके पूरते हैं। चावल के आटे से फेंक फुरते हैं। फेंक चारों ओर चादर बिछाकर फैलाकर लोग बैठते हैं। आंगन में दरी बिछा देते हैं। अजीत महंत मंत्र पढ़कर कलश की स्थापना करते हैं। सभी गुरू गद्दी की स्थापना के बाद बैठ जाते हैं। फेकर आरती का कार्यक्रम शुरू होता है। तबला, हारमोनियम, झांझर, मंजीरा से मंगल गीत प्रारंभ करते हैं। सबसे पहले गुरूजी को प्रणाम करते हैं।

दोहा –

गुरुजी को पहुंचे कोट कोट प्रणाम

कष्ट भींग जीव तारिहो, गुरुकरि हो संत समाज।

शब्द नाम – हरिहर गोबर निरमल पानी।

चौका पोतो सत सुकूत ज्ञानी।।

सतनाम को करे जोहारा।

एक लाख के पास करे भाई।

नरतन छोड़ स्वर्ग में स्थान पाई।।

मंगलगीत –

अहो बाबा अंगना ल झार बहार डरा हो।

तन उरमीत देहो हो निकाल

कर्र लेहा पुरन कमाई संत घर ला पाईहा हो।

महंत अजीतदास एवं साथियों द्वारा दो घण्टे तक चौका आरती के कार्यक्रम करते हैं। मंगलगी. शब्द सारवी, दोहा आदि सुनकर कई महिलाओं को संत गुरू घासीदास चढ़ जाते हैं। झूमने नाचने लगते हैं। मंगलगीत के धुन से मन प्रसन्न हो जाता है। मन के क्लेश, काम, क्रोध, मद लोभ समाप्त हो जाता है। गुरूजी के ध्यान में ही मन लगा रहता है। हजारों आदमी इसे देखते हैं। अजीत महंत द्वारा आरती उतारकर पानी छिड़ककर संत गुरू घासीदास का नाम लेकर शांत कर देते हैं।

शब्द –

सार नाम सत गुरू, वानी,

सार नाम बिरले कोई जानी

सार नाम अधि अंश समाना।

सत है गरजीन गंयी तास।

सतनाम के मेहीन माला

सतनाम के जपे जू पाए

कोटिन काल मए जर धारा,

हीरा हंस लिए उबारा।

साहेब गुरु सतनाम।।

अजीत दास महंत द्वारा पान प्रसाद सुपारी कलश के चारों ओर चारों गुरू को चढ़ाते हैं। घर से आरती लेकर महिलाएं आती हैं। पान, प्रसाद, रोटी, लड्डू, नारियल, मालपुआ, शक्कर, फल मेवा, मिष्ठान, बूंदी रखती है। अजीत दास मंगल आरती गाता है।

आरती मंगल

पहली आरती जगमग ज्योती

हीरा पदारथ बारे ला मोती

होत आरती सतनाम साहेब की

कंचन धार कपूर लगे बाती

भव भव आरती उतारे बहु माती

आरती हो सतनाम साहेब के।

तीजे आरती त्रिभुवन जग मोहे

रतन सिंहासन गुरूजी सा सोहे।

चौथे आरती निर्मल शरीरा,

आरती गावै गुहू घासीदासा हो।

जप आरती जो नर गावे,

चढ़ के निमग सुरलोक सिंघावे

छठे आरती दया दर्शन होए

लख चौरासी के बद छुड़ाए

हो आरती सतना साहेब के।

सतई आरती सतनामी घर होवे

हंसा ला उवार के सत लोक पठाए

होत आरती सतनाम साहेब के।

रामवती, मनोरमा, शांति ले जा आरती को महंत को देते हैं। आरती को प्रणाम कर बीच में रख देते हैं। सभी महिलाएं कलश को प्रणाम करके चली जाती हैं। अशोक नाम पढ़ता है।

नाम

बिना बीज के वृक्ष है,

बिना शब्द के नाम

बिना शब्द के रहन सहन

है उन्हीं तोल समान

राई जैसे पत्र अघराई ऐसे फूल,

शारदा पत्र उनके नहीं

अ,ठ कंवल निज मूल।

सुनो पुत्र गिरधारी सुनो पुत्र बिहारी

जब रहित साहेब आपी आपा

तज साहेब घर छूटे पसेऊ

भर भादो जस बरसाय भेई

बईठत धरती उठत आकाश

सतनाम के सुमखन मोरी

अष्ट कलश हो आशा

गगन मंदिर पर जोत पुरुष हैं

जहां तुम्हारो वासा

सात दीप नव खण्ड धरती

सोलह खण्ड आकाशा, चौदह भुवन

दस सौ दिग पाला

जहाँ ठाढ़े रहिन, अथरे रहवासा,

कंचन काया पुरुष रहवासा,

अहो नाम तुम कहां से आए,

कौन नाम से जीव निरमाए,

अनह ऊपर अनहत बसाए,

सिक्का नाम से जीव जीव निरमाए,

चारों गुरू पांचों नाम साहेब गुरू सतनाम

पदमन द्वारा साखी कहा जाता है।

“साखी – गुरू हमारे बानिया नाम लाद करिन व्यापार, नहीं ताजी न ही तासूरी, गुरू तोल तिन्ह संसार।’ अंतिम मंगल अजीत साथी द्वारा गाते हैं।

मंगलगीत

गुरू कहवा मैं पावो आरुग फुलवा

गुरू तोला में चढावे कवन फुलवा हो।

सभी तो फूल ता साहेब मोरा जूठारे है

तेला कइसे तोला मैं चढ़ावों।।

हाँ चाल चलन के चम्पा मन कर मोंगरा

प्रेम के हरवा बनबो हो

नदिया के पानी, मीन जूठारे हे,

कौ जल मा नहवात हो

गंगा जमुना दोनों नैना केहे नदिया

आंसुअन के धार में नहावावो हो

गईया के दूध ला बछरा जुठारे हे,

कामा तोरे चरण पखारों हो।

शुद्ध मन सत्यवप्रत गोरस

एईमा तोर चरण पखार न हो।

भाव भगती कर भोग लगाऊं

सत गुरू के सेवा ल बजाऊ हो

अजीत महंत द्वारा नारियल भेंट, झालर, रामदास, जगतारण को करातेहैं। सभी चौक मंत्र पढ़कर नारियल भेंट करतेहैं। नारियल सेपानी, गुड़, मिठाई, रोटी मांग कराकर अजीत दास नारियल तोड़ते हैं। सभी नारियल बीच से टुकड़े हो जाते हैं। सभी महंत मिलकर नारियल, कुड़, शक्कर, रोटियां, लड्डू, फल दूध के प्रसाद बनाते हैं। रामदास को दो दोने के मणिदास वेदवती के लिए प्रथम भोग देते हैं। बाद में सभी महिलाएं एवं पुरुषों को प्रसाद वितरण करते हैं। आंगन में बैठ जाते हैं. खलिहान, बरामदे, गली, किली, घर, आंगन लगभ तीन हजार पुरुष महिलाओं को बूंदी, सेवब, खीर, शक्कर, घी, पूड़ी मालपुआ परोसी जाती है। लगभग पचास लोग परोसने वाले। दालभात, सब्जी, घी, अचार, सभी को किलाते हैं। सभी भर पेट खाकर मणिदास वेदवती के आत्मा को शांति पहुंचाते हैं। भोजन एक पूरी रात्रि तक चलता है। गाँव वाले अपने घर चले जाते हैं। मेहमान लोग रात में आंगन खलिहान बरामदे में सोकर बिताते हैं। ऐसा भोजन आसपास के गाँव में किसी ने नहीं खिलाया था। झालरदास की वाहवाही हो जाती है।

दूसरे दिन गुरू एवं भांजे भांजी की दक्षिणा लेकर पूजा अर्चना कर नए वस्त्र कमीज धोती, साड़ी, छाता, धान, चावल, रुपए पैसे देकर विदाई करते हैं, जिस घर में मृतक सोते थे उस घर में कटोरी में आटा रख दिया जाता है। दो कटोरियों में आटा रखा गया था। घर के सभी मेहमान, महिला पुरुष घर को खाली छोड़कर बिदाई करने चले जाते हैं। एक बुजुर्ग महिला द्वार से घर की रखवाली करते हैं। कटोरी के आटे मं अंगुलियों के निशान स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। शांति, झालर, रामदास, रामवती, मनोरमा, मंगली बाई, श्यामबाई बिदा करके रोते हुए आतेहैं। अंतिम बिदाई के समय घर से अंतिम बिदाई होती है। सभी मेहमान एक-क करके घर चले जाते हैं। रामदास, झालर, शांति, रामवती और माधुरी घर में बच जाते हैं। एक सुखी परिवार में दुख के बादल छा जाते हैं।

झालर, रामदास मिलकर खेती किसानी करने लगते हैं। इस वर्ष वहां फसल अच्छी नहीं होती। अकाल पड़ जाता है। धान की फसलों को डंकी, माहो, कटुवा, फाफूत, टिड्डी नुकसान पहुंचाते हैं। यहां तक बीज के लिए भी धान नहीं मिलता। सभी नौकर खाने कमाने इलाहाबाद चले जाते हैं। पूरा छत्तीसगढ़ अकाल की चपेट में आ जाता है। गाँव के गाँव किसान रोजी-रोटी के लिए पलायन कर जाते है। जिस किसान के पचास एकड़ जमीन होती है, वह भी एक बीजा धान नहीं पाता है। रामदास, झालरदास पुराने बचे कोठी को खोलते हैं और अपने सीमित परिवार का पेट भरते हैं। गाय भैंस के लिए चारे की कमी हो जाती है। सभी तालाब, नदी सूखने लगे थे। पशुओं में महामारी फैल जाती है। वैसे हीखारे पानी से कभी बीमारी से घर की गायें, बैल, भैंस एक-एक कर एक ही माह के भीतर सभी जानवर मर जाते हैं। घरम एक भी पशु नहीं बचता। बच्चों के लिए दूध की कमी होने लगती है। चरवाहे राउत से बच्ची के लिए दूध लेने लगे। मणिदास की मृत्यु धन सम्पत्ति कम होने लगी थी। झालर महंत चिंतित होने लगे कि अगले वर्ष खेती किसानी कैसे होगी। इधर घर में खाने के लिए अन्न नहीं बचता। उधर बीज बोने के लिए धान नहीं है। जोतने के लिए बैल नहीं है। क्या करें किसान। अकाल से किसानों की कमर टूट गई थी। किसी प्रकार रामदास अपने परिवार के पालन पोषण करता है।

झालरदास रामदास से कहता है कि – बेटा इतनी जमीन का क्या करोगे। फिर खेती-किसानी के लिए कम से कम तीन जोड़ी बैल या भैंस लेना पड़ेगा। बीच के लिए धान। खेती निंदाई गुड़ाई के लिए धान सजिया पैसा लगभग पच्चीस हजार रुपए से अधिक चाहे। यदि तुम्हारा मन आ जाए, तो पाँच एकड़ जमीन को परसदा खार की बेच देते हैं। वहाँ अघरिया किसान नए आए हैं। दो पाँच हजार रुपए एकड़ में सौदा तय कर आया। चौथे दिन बिलासपुर जाकर जमीन की रजिस्ट्री अघरिया किसान नन्दू पटेल के नाम से कर दी। नन्दू पटेल गाँव जाकर पच्चीस हजार रुपए पहले दे आया था। झालरदास रामदास बैल खरीदने के लिए काम कनेरी बाजार पशु हाट जाते हैं। दो जोड़ी बैल पाँच हजार रुपए एवं एक जोड़ी भैंसा तीन हजार में खरीद लाते हैं। रामदास झालरदास से कहता है – बाबूजी कोठा अभ सूना है। देहाती गाय ही खरीद लेते हैं। झालरदास बाजार में घूम-घूम कर देखते हैं। एक काली गाय को बछिया समेत एक सौ पचास रुपए में खरीद लेते हैं। कनेरी बाजार से सभीपशुओं को घर लाते हैं। द्वार के सामने रामवती शांतिबाई लोटे में पानी लेकर गाय की पूजा और आरती करती हैं। भगवान पहले जैसे कोठा को भर देना। खलिहान के कोठा में बैल, भैंसा और गाय को पानी चारा खिलाकर बांध देतेहैं। शांति माधुरी को गाय की बछिया दिखाती है। माधुरी हंस-हंस कर खेलने लगती है। सुबह खेलावत राउत को पता चलता है कि किसान के यहां गाय, बैल खरीद लाए हैं। गाय के आधा किलो दूध रखकर दे देते हैं। शांतिबाई दूध को गोरसी के आग में गरम करने लगती है। गाय बैल भैंसा को चराने के लिए राउत जंगल खार ले जाता है। दोपहर में ले आता है।

रामदास झालरदास दोनों सहकारी समिती से खाद बीच लेते हैं। लगभग दस हजार रुपए के ऋण लेते हैं। सनेही किसानी के लिए एक नौकर सहेत्तर से रख लेते हैं। तीन नागर जोतना रहता है। एक नागर रामदास, दूसरे को झालरदास, तीसरे को नौकर सहेत्तर जोतता है। लगभग एक महीने में सभी खेतों में धान बो देते हैं। पानी समय पर बरस रहा था। बादल रुक-रुक के झड़ी कर हरहरा कर गिर रहा था। सभी खेत खार नदी नाले तालाब भर गए थे। इस वर्ष कुछ अच्छी फसल होने की उम्मीद थी। भादो मास में तीजा त्यौहार मनाने के लिए आसकरणदास रामवती को लेने आए। शांति ने कहा बहू पिताजी आए हैं, कुछ दिन के लिए मायके चली जा। मन बहल जाएगा। जब से आई हो मायके नहीं गई हो। झालरदास रामदास को कहता है कि बहू को कुछ दिन के लिए मायके भेज दो। रामवती अपने माँ भाई से मिलकर आ जाएगी। रामदास बैलगाड़ी से मस्तूरी तक रामवती, माधुरी, आसकरणदास को छोड़ देता है। मस्तूरी से बस में बैठकर बिलासपुर, बिलासपुर से सेंथरी गांव टांगे में बैठकर चले जाते हैं। घर पहुंचते ही मंगलीबाई माधुरी को पाकर खुश होजाती है। माधुरी अब आदमी पहचानने लगी थी।

माधुरी नाना, नानी की गोद में खेलने लगती है। रामवती हाथ पैर धोकर हालचाल पूछती है। कन कौन सहेली तीजा मनाने आई हैं। मंगली कहती है कि बेटी इस साल के दुकाल (अकाल) से सभी अनाथ हो गए हैं। किसी के पास खाने के लिए दाने नहीं है। रामसनेही महंत तुम्हारे बड़े पिताजी चम्पाबाई को लेने मुंगेली गए हैं।

शायद शाम तक आ जाएंगे घर की हालत भी कोई अच्छी नहीं थी। अरपा नदी में साग सब्जी कोचई लगाए थे। कुछ फायदा हो गया है। इसी से गुजर-बसर कर रहे हैं। नहीं तो हम लोग भी भूखे मर गए होते। खेतों में धान नहीं उगाई। रामवती मंगली माँ को बताती है कि हमारे घर का तो कुछ हाल है। पाँच एकड़ खेत बेचकर, बैल जोड़ी, एक भैंस जोड़ी, एक गाय खरीदे हैं। सहकारी सोसायटी से बीज,खाद उधार में लिए हैं। किसी प्रकार इस वर्ष खेत-किसानी हुआ है।

तीजा के दिन नदी किनारे पीपल के पेड़ में झालर रामवती के छोटे भाई दिलहरण बांध देते हैं। सभी सहेली रामवती के पास आते हैं। माधुरी को गोदी में लेकर खिलाने लगतेहैं। बहुत सुन्दर बेबी थी। जिसने देख लिए उसी के गोद में चली जाती थी। रामवती की छोटी बहन कलावती माधुरी को पकड़कर ले जाती है। आठ दस सहेलियां झूला झूलने बाग में चली जाती हैं। सभी सहेलियां हंसी मजाक गीत गाते मजे करते हुए कुछ सहेलियां माधुरी को झूलाती हैं। जोर जोर से झूला झूलने लगता है। रामवती अधिक झूलाने को मना कर देती है।

गीत –

सावन महीना रे मन भावन रे,

तीजा बड़े तिहार।

आओ सखी मेहंदी लगाएं,

रंग में रंग जाए तन मन हमार।

रामवती शाम चार बजे बेबी को लेकर अपने घर पहुंचती है। मंगलीबाई इंतजार करती रहती है। साथ में बैठकर भोजन करती हैं। माधुरी को दूध-पिलाकर सुला देती है। आसकरणदास शहर से रामवती के लिए साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज खरीदकर लाया रहता है। रामवती की पहली तीजा था। रामवती बाबूजी को कहती है बाबूजी अकाल पड़ा है। काहे के लिए खर्च कर रहे हो। बाबूजी कहते हैं बेटी पहली बार मायके आई हो। माता-पिता का फर्ज है बेटी की खुशी के लिए कुछ तो दें। भले ही तुम्हारे घर में कोई कमी नहीं है। परन्तु नेग है, इसे करना पड़ेगा। रामवती के आंसू बह जाते हैं। मा-बापू के प्यार में रामवती निहाल हो जात है। माधुरी नाना, नानी, मौसी से हिल-मिल जाती है। दो-तीन दिन रहकर रामवती रामदस के संग गाँव चली जाती है।
 
रामदास बड़े मनोयोग से खेती-किसानी करने लगता है। झालरदास शांतिबाई माधुरी को दिन बर गोदी में उठाए घूमते फिरते हैं। घर के बरामदे में दिन भर आदमियों की भीड़ लगी रहती है। बोरी-बारी से सभी लड़के उसे गोदी में लेते हैं। गाँ की वह दुलारी प्यारी बेबी थी। रामवती रात में सोते वक्त रामदास को कहती है कि कोई सरकारी छोटी-मोटी नौकरी क्यों नहीं कर लेते। छोटे परिवार का गुजर-बसर चल जाएगा। रामदास कहता है कि – गाँव में एम.ए. पास लड़के घूम रहे हैं। नौकरी कहां मिल रही है। चलो तुम कह रही हो तो कल से नौकरी की तलाश शूरू कर देता हूँ। रात को किसी प्रकार सोकर बिताते हैं। रामदास को नींद नहीं आती है। रामवती कहती है कि – ज्यादा सोचो मत। आओ मैं तुम्हें सुला देती हूँ। रामवती रामदास के सिर के बालों पर हाथ फेरती है और धीरे-धीरे सिर को दबाती है। रामवती के प्रेम से रामदास को नींद आ जाती है। बड़े सवेरे चार बजे केवट पारा का मुर्गा बांग देता है। रामदास की नींद खुल जाती है। रामवती कहती है अभी सोए रहो, मत उठो पर रामदास नहीं मानता पेशाब करने खलिहान की ओर जाता है। गाय, बैल, भैंसा, बछिया को देखता है, सब कुछ ठीक तो है।

रामदास सुबह हाथ मुँह धोकर नहर के किनारे शौच के लिए जाता है। नहर के पुल के पास पूरनलाल मिल जाता है। रामदास शौच के लिए चला जाता है। पूरनलाल पुलिया पर बैठकर इंतजार करने लगता है। पूरनलाल रामदास के आपर कहता है – संगवारी कल मैं बिलासपुर नौकरी की तलाश में गया था। रोजगार दफ्तर में पता चला कि पुलिस लाइन में सिपाही की भर्ती परसों होने वाली है। रामदास कहता है कि – चलो हम लोग किस्मत आजमाते हैं। गाँव के अन्य साथी मेहत्तर, रामसहाय, उत्तमदास, भागवत को लेकर चलते हैं। सबका ऊँचाई छह फीट से अधिक है। रामदास सभी साथियों को बुलवा भेजता है। धीरे-धीरे सभी साथी आ जाते हैं। पूरन सभी को बताता है कि परसों पुलिस लाइन, बिलासपुर में सिपाही की भर्ती होने वाली है। मार्कशीट, निवास प्रमाणपत्र आदि लेकर जाना है। सभी साधी सिपाही में भर्ती होने के लिए तैयारी करते हैं।

तीसरे दिन पुलिस लाइन बिलासपुर रामदास व साथी पहुंच जाते हैं। वहां हजारों किसान-पुत्र पहले से लाइन में खड़े रहते हैं। मार्कशीट आदि कागजात देखेने एवं ऊँचाई की नाप, सीने की चौड़ाई, फुलाने पर सीने की चौड़ाई नाप ले रहे थे। रामदास की बारी आई ऊँचाई 6 फीट, सीने की चौड़ाई 75 इंच, फुलाने पर 89 इंच। रामदास पहले टेस्ट में पास हो जाता है। पूरन फेल हो जाता है। उत्तमदास, रामदास, महेत्तर, बाबूलाल सभी टेस्टों में पास हो जाते हैं। रामदास के नाम सभी टेस्टों में खेलकूद, दौड़ में पहला स्थान पाताहै। सिपाही के चयन सूची में पहला रामदास जोगी का नाम रहता है। पचहत्तर लोगों की सूची में रामसहाय, उत्तमदास, महेत्तर के नाम आ जाते हैं। सभी साथी खुशी से झूम उठते हैं। सिपाही भर्ती के नियुक्ति पत्र उसी दिन शाम पाँच बजे दे दिए जाते हैं। जिसमें मेडिकल प्रमाण पत्र एवं सात दिन में ड्यूटी पुलिस लाइन बिलासपुर ज्वाइन करने के निर्देश भी थे।

रामदास व साथी रात में अपने-अपने घर पहुंचते हैं। रामदास झालर व माँ के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। सिपाही में भर्ती होने का नियुक्ति पत्र दिखाते हैं। रामवती किचन से भागकर आती है। क्या हुआ। रामदास कहता है मैं सिपाही बन गया हूँ। देश सेवा करूँगा। रामदास बिलासपुर से मिठाई लाया रहता है। रामवती के मुँह में अपने हाथ से खिलाता है। रामवती बहुत खुश होजाती है। माँ शांतिबाई भी बहुत खुश होती है। रात में खाना खाकर रामदास सोने लगता है। बर्तन भांडे व घर की साफ-सफाई कर रामवती बिस्तर पर आती है। माधुरी सो गई थी। रामवती रामदास के ऊपर लेटकर उसे कसकर दबा देती है। मुँह से चूमने लगती है। कहती है – मेरे वीर सिपाही ने तो कमाल कर दिया। रामदास भी रामवती को प्यार करने लगता है। रामदास कहता है यदि तुम मुझे नौकरी करने के लिए नहीं कहती तो मैं शायद नहीं जाता। तुम्हारे ही कारण मैं सिपाही बन पाया हूँ। बहुत रात तक दोनों सुहाने सपने बुनते हैं। कब नींद पड़ जाती है पता नहीं चलता। सुबह गाँ में हल्ला हो जाता है कि रामदास, उत्तमदास, रामसहाय, महेत्तर सिपाही में भर्ती हो गए हैं। नियुक्ति पत्र मिल गया है। बरामदे में बड़े-बूढ़े बेरोजगार जवान पचास साठ लोग आ जाते हैं। रामदास सभी लोगों को शहर से लाई हुई मिठाई खिलाता है। रामदास नौकरी मिलने की खुशी में फूला नहीं समाता है। झालरदास शांतिबाई भी बेहद खुश होते हैं। चलो बेटे को पुलिस की नौकरी तो मिली। रामदास अपने साथियों के साथ तालाब में स्नान करने जाता है। तालाब में कमल खिले रहते हैं। तालाब का पानी कंचन जैसा चमकता है। घाट के पत्थर से चेहरा देखकर कंघी करते हैं। तालाब के चारों ओर सघन अमराई है। नए पुराने आम, पीपल, नीम के अमराई के बहुत मीठे आम थे। रामदास गाँव के गाँव के अमराई, भोजवा तालाब से कमल फूल, साफ पानी देखकर प्रणाम करता है। जन्म से अभी तक के साथी थे। अब नौकरी में कहां-कहां जाना पड़ेगा। पूरन, उत्तम महेत्तर कहते हैं कि क्या सोच रहे हो रामदास। रामदास की स्मृति वापस आ जाती है। हड़बड़ा कर कहता है – नहीं यार कुच नहीं। मैं सोच रहा था कि इस तरह तालाब में स्नान करने व घनी अमराई की छांव और कहां मिलेगी। पूरन कहता है चल स्नान कर। रामदास घाट से धड़ाम से कूदता है। पानी में डुबकी लगाकर 20 फीट दूर निकल जाता है। सभी साथी पानी में तैरते हुए तालाब के बीच पहुंच जाते हैं। पास के कमल फूल को तोड़कर लाते हैं। तालाब में खूब तैरते हैं। बहुत बड़ा तालाब है। लगभग बीस एकड़ का क्षेत्रफल है। अपार पानी का भण्डार है। विगत साल सौ सालों में नहीं सूखा है। रामदास को एक बड़ी मछली तैरती हुई मिल जाती है। एकदम किनारे सभी साथियों के बीच से पूँछ हिलाती नकल जाती है। लगभग पचास किलो वजन की रही होगी। पानी में सफेद चमक के साथ चमक रही थी। बीच तालाब से घाट में आ जाते हैं। रामदास लोटे में जल लेकर भगवान शिव के जलहरी में चढ़ाता है। कमल के पुष्प को अर्पित करता है। जय भोलेनाथ सदा सहाय करना। सभी साथियों ने पीपल के पेड़ में पानी डाले एवं प्रणाम किए। स्नान करके घर आ गए। सुबह बासी रोटी खाकर बिलासपुर मेडिकल चेकप कराने चले जाते हैं। पुलिस लाइन के डॉक्टर सक्सेना रामदास को बुलाता है। सभी जगह छूकर अंदर भाग को देखकर कोई बीमारी गुप्त तो नहीं है। आंख की जांच करना है। सभी फिट रहता है। रामदास को ओके का प्रमाण पत्र मिल जाता है। उत्तम की आंख थोड़ी कमजोर रहती है। डॉक्टर को रुपए देकर पास करा लेते हैं। महेत्तर, रामसाय को कम सुनाई देने के कारण प्रमाणपत्र देने में आनाकानी करता है। रामदास अनुनय विनय करके सभी साथियों को प्रमाण पत्र दिला देता है। फिर वे बिलासपुर से गाँव लौट आते हैं।

दूसरे दिन सभी अपने कपड़े, सामान, पेटी लेकर पुलिस लाइन बिलासपुर में ज्वाइन करने आ जाते हैं। रक्षित निरीक्षक रामदास दीक्षित योग्यता प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, मेडिकल फिटनेस, ज्वाइनिंग रिपोर्ट को लेता है। सभी लोगों को दो जोड़ी कुरता, हाफपैंट, बैल्ट, जूता, टोपी, बैच, एक पेटी मोजा देते हैं। पहचान के लिए सिपाही क्रमांक देते हैं। रादास को पाँच सौ एक, उत्तमदास को पाँच सौ नब्बे, रामसाय को पाँच सौ पन्द्रह, महेत्तर को पाँच सौ बीस मिलता है। पुलिस लाइन में हाजिरी में सिपाही क्रमांक पुकारा जाता है. बंदूक चलाना सिखाते हैं। सभी रंगरूट पुलिस विभाग की कानून की धाराएं पूछते हैं। लगभग साठ लड़कों को सिपाही प्रशिक्षण के लिए बीस-बीस के समूह में पुलिस प्रशिक्षण स्कूल राजनांदगांव, ग्वालियर, उमरिया भेजते हैं। रामदास को राजनांदगांव, महेत्तर को उमरिया प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता है।

एक पुलिस गाड़ी में रामदास एवं अन्य उन्नीस सिपाहियों को राजनांदगांव प्रशिक्षण स्कूल में पहुंचाया जाता है। हवलदार पुर पाटिल पुलिस अधीक्षक का पत्र प्रचार्य को देता है। सभी सिपाहियों को हॉस्टल में बैरक में रुकने के लिए स्तान दे दिया जाताहै। रामदास का प्रशिक्षण शुरू होता है। सुबह पाँच बजे से बहुत कठिन परिश्रम कराते हैं। जमीन खोदना, घास काटना, ईंट गारे ढोना, मिस्त्री के काम, खाना बनाने, कपड़ा धोने, साहब के बच्चों को घुमाना, स्कूल छोड़ना। रामदास कठिन परिश्रम से परेशान हो जाता है। सोचता है इससे तो खेती किसानी ही ठीक थी। परन्तु भविष्य सोचकर वह कड़े मन से प्रशिक्षण लेता है। छुट्टी के दिन रामदास साथियों सहित राजनांदगांव शहर घूमने जाता है। कामठी लाइन, गुड़ाखू लाइन, महामाया पारा, ब्राह्मण पारा होते हुए महामाया मंदिर पहुंच जाते हैं। प्रसिद्ध महामाया मंदिर में नारियल, फूल अगरबत्ती जलाकर पूजा करते हैं। पास के तालाब से राणा के महल, बगीचा, बहुत मनोरम दृश्य देखकर रामदास खुश हो जाता है। रानी तालाब होकर पैदल प्रशक्षण स्कूल पहुंच जाते हैं। रामदास समय पर खाना, सोना, पढ़ना सभी काम समय पर करते थे। रामदास से सभी प्रशिक्षक प्रसन्न रहते हैं। श्री वर्मा प्राचार्य रामदास को बुलाकर पूछते हैं कहाँ के रहने वाले हो। रामदास कहता है – सर, मैं मल्हार के पास गाँव टिकारी का रहने वाला हूँ। वर्मा जी कहते हैं कि – मैं बहुत पहले मस्तूरी थाने में थानेदार था। मस्तूरी थाने के सभी गाँवों को जानता हूं। टिकारी गाँव के भी बहादुर सिंह थानेदार थे। कहाँ हैं। रामदस कहते हैं – सर अभी रायगढ़ थाने के सरिया थाने में पदस्थ हैं। बहुत बढ़िया आदमी हैं। चलो अच्छा हुआ। पहचान के निकल गए। रामदास तुम घर में आते रहना। जी सर कहकर सेलूट मारकर हॉस्टल में चला गया। रामदास भोजन करके कमरे में चला आता है। और रातम में कुछ सीआरपीसी के अध्याय को पढ़ता है।

रविवार गे तिन वर्मा साहब टीआई साहब को निर्देश देते हैं कि नए सिपाहियों को डोंगरगढ़ ले जाकर माँ बम्लेश्वरी के दर्शन एवं भिलाई इस्पात संयंत्र दिखाकर ले आओ। श्री बनाफर सभी रंगरुटों को लारी में भरकर देवी दर्शन कराने ले जाते हैं। रामदास दल के नायक रहते हैं। पहाड़ी के नीचे पार्किंग स्थल पर खड़ी कर देते हैं। सभी लोग नीचे उतर जाते हैं। मंदिर जाने के ले सीढ़ी चढ़ने लगते हैं। सबी रंगरूट जवान थे। दौड़ते-दौड़ते चढ़ जाते हैं। रामदास एवं बनाफर साहब धीरे-धीरे सीढ़ी चढ़ते हैं। जगह-जगह पानी की व्यवस्था थी। पानी पीकर जूतों को एक जगह रखकर नंगे पांव दर्शन के लिए जाते हैं। रामदास दुकान से नारियल, अगरबत्ती, इलायची के प्रसाद, फूलमाला, लाल चुनरी, पट्टी खरीद कर ले जाता है। जय माता दी कहते सभी भक्तजन सीढ़ी चढ़ रहे थे। लाइन से सभी महिला पुरुष पूजा करने जाते हैं। रामदास अगरबताती जलाकर माँ बम्लेश्वरी को दोनों हाथ जोड़कर माथा टेकता है। प्रार्थना करता है कि माँ, मेरे परिवार को सुखी रखना। प्रसाद नारियल पुजारी को देता है। नारियल प्रसाद को चढ़ाकर वह वापस कर देता है। जय माता दी की पट्टी, टिकुली, बंदन, फीता रामदास को प्रसाद के रूप में दे देता है। रामदास मंदिर में बैठकर थकान मिटाता है। सभी जवान मंदिर के चारों ओर खड़े होकर डोंगरगढ़ नगर के दृश्य को देखते हैं। मंदिर से रेलगाड़ी की पांतें साफ-साफ दीखती हैं। पहाड़ी के चारों ओर हरे-भरे वृक्षों की कतारें हैं। मंदिर के चारों ओर बहुत ही मनोहारी दृश्य है। सभी जवान मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरकर कार्यालय के पास बैठ जाते हैं और प्रसाद खाते हैं। रामदास नीचे नारियल को तोड़ता है। प्रसाद सभी लोगों में बांट देता है। जो नहीं आए थे उनके लिए प्रसाद रख लेता है। रामदास जोर से जय बम्लेश्वरी माता बोलता है। पूरी पहाड़ी माता की जयकार से गूँज उठती है। जय माता दी कहते हुए सभी रंगरूट सीढ़ी से पहाड़ी से नीचे उतर जाते हैं। पानी पीकर सभी जवानों को लेकर बनाफर साहब राजनांदगांव प्रशिक्षण स्कूल वापस लौट जाते हैं।

रामदास देवी माँ का प्रसाद लेकर श्री वर्मा साहब के यहाँ जाते हैं। घंटी का बटन दबाते ही वर्मा साहब दरवाजा खोलते हैं। रामदास सेलूट मारता है। सर प्रसाद लाया हूँ। वर्मा ने कहा – लाओ, रामदास कैसा रहा टूर। रामदास – बहुत बढ़िया सर। देवी माँ के दर्शन कर मन प्रसन्न हो गया सर। वर्मा जी प्रसाद ले लेते हैं। प्रसाद के लिए धन्यवाद। रामदास – धन्यवाद की कोई बात नहीं सर। यह तो मेरा फर्ज है। आप ही की कृपा से देवी दर्शन हुआ सर। नहीं रामदास मैंने देवी माँ की कृपा से ही आदेश दिया था। रामदास जाने के लिए सेलूट मारता है। जय हिंद सर। मुड़कर हॉस्टल चला जाता है। रामदास को कानूनी की अच्छी और पूरी शिक्षा मिलती है। नेक, ईमानदार, सद्चरित्र, अनुशासनप्रिय, न्यायप्रिय, समानता का व्यवहार, दीनहीन की सेवा, सहायता करने का प्रशिक्षण मिलता है। कठिन प्रशिक्षण से रामदास परिपक्व बनता जाता है। राजनांदगांव में गणेश पूजा के लिए गणेश चतुर्थी बहुत धूमदाम से मनाते हैं। जिस गली चौराहे को निकल जाओ, गणेश मूर्ति की भव्य स्थापना रहती है। सिंधी कॉलोनी, कामठी लाइन, रेलवे कॉलोनी, चिखली, नदी चौक, मण्डी समिति, गुजराती समाज मूर्ति स्थापना के साथ भव्य झांकी बनाए रहते हैं। आसपास के गाँवों से झांकियां देखने के लिए बहुत आदमी आते हैं। रामदास एवं साथियों की प्रतिदिन भीड़ नियंत्रण के लिए ड्युटी लगाई जाती हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश मूर्ति के विसर्जन के दिन रात्रि में झांकियों की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। एक से पढ़कर एक भव्य झांकियां निकाली जाती हैं। रात आठ बजे से प्रारंभ होकर सुबह पाँच बजे तक सड़कों पर झांकी देखने ग्रमीण महिला पुरुषों की भीड़ लगी रहती है। सभी सड़कों पर भीड़ ही भीड़। रामदास की ड्यूटी पुराना थाना क्षेत्र में लगी रहती है। जहाँ नियंत्रण कक्ष रहता है। पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर, सिटी मजिस्ट्रेट, एसडीएम, नगर निगम अध्यक्ष, कार्यपालन यंत्री सभी वहां बैठते हैं। शोभायात्रा में चलने के लिए कई समितियों में कभी-कभी विवाद हो जाता है। कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक मामले को सलटा लेतेहैं। सुबह पाँच बजे सभी गणेश मूर्तियों का विसर्जन रानीसागर के घाट में कर दिया जाता है। झांकियां अपने-अपने समितियों के साथ बढ़ती हैं। राजनांदगांव के झांकियों को सजा संवार कर रायपुर वाले लाते हैं। रात्रि मे ही शोभायात्राएं निकालते हैं। ऐसी झांकियां आसपास नहीं निकलती हैं। मध्यप्रदेश का इंदौर पहले स्थान पर है। रामदास रात भर झांकियां देखता रहता है। रामदास बहुत आनंद लेता है। सुबह आठ बजे ड्यूटी समाप्त कर हॉस्टल चला जाता है। राजनांदगांव का गणेश समारोह आसपास बहुत प्रसिद्ध है। राजनांदगांव के लोग गणेश पूजा की साल भर प्रतीक्षा करते हैं। जगह-जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाचा, गम्मत, पण्डवानी, कवि सम्मेलन, करमा, छत्तीसगढ़ संगीत आरकेस्ट्रा इत्यादि होते रहते हैं।

रामदास बराबर रामवती को चिट्ठी पत्री भेजता रहता था। रामदास अपने साथियों के साथ सभी प्रशिक्षणार्थियों को पाँच दिनों की छुट्टी मिल जाता है। रामदास अपने साथियों के साथ छत्तीसगढ़ में बैठकर बिलासपुर आ जाता है। बिलासपुर में रामदास बेबी के लिए फ्रॉक, रामवती के लिए साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज, माँ के लिए साड़ी, पिताजी के लिए धोती कमीज खरीदता है। मिठाई दुकान से एक किलो बूंदी के लड्डू, एक किलो पेड़ा खरीदता है। शाम को बस मैं बैठकर मस्तूरी चला जाता है। मस्तूरी से साइकिल से टिकारी गाँव पहुंच जाता है। रामवती इंतजार में द्वार पर बैठी बाट जोहती रहती है। एकाएक अपने वीर सिपाही को देखकर चहक उठती है। बरामदे में पिताजी और माँ को चरण छूकर प्रणाम करता है। बेबी को गोदी में लेकर चूमने लगता है। रामवती हँसते हुए चरण छूकर प्रणाम करती है। रामदास घर के भीतर आंगन में जाता है। रामदास आशीर्वाद देता है – दूधो नहाओ पूतो फलो। सौभाग्यवती भवः। आधा दर्जन बच्चे की माँ बनो। रामवती खूब हंसती है। सिपाही ट्रेनिंग में सब सीख रहो कि खूब बच्चे पैदा करो सभी जवानों। देश की सेवा बाद में। क्यों । रामदस घर जाकर रामवती को कसकर पोटार लेता है। रामवती कसमसा जाती है। रामवती कहती है कि माँ आ जाएगी। एक बहुत दिनों के बाद आ रहे हो। कभी हम लोगों की याद आई। रामदास कहता है – पगली कैसे भूल सकता हूँ। तुम तो मेरी जीवनसाथी हो। सुख-दुख के साथी। रामवती कहती है – कौन जाने भइया। कहीँ और तो नहीं ढूंढ लिए हो। रामदास कहता है पानी पिलाओगी या ऐसे ही धमकाती रहोगी। माधुरी बिटिया तंग तो नहीं करती। रामवती कहती है – माधुरी को पिता का दुलार चाहिए। मैं कहां से लाऊँ। बहुत खोजती है। माँ, बाबूजी खेती किसानी में व्यस्त रहते हैं। रामदास मजाक में कहता है माधुरी के लिए बाजार से बाप तो नहीं खरीद लिए। रावती कहती है कि – बाजार में यदि मिले तो खरीद लेती। परन्तु यहां तो कोई नहीं है। शायद शनिचरी बाजार में बिलासपुर में मिल जाते होंगे।

रामदास खूब जोर-जोर से हंसता है। चलो हाथ पैर धो लो – रामदास कहता है। पहले तालाब जाऊँगा। शौच से निपटकर आ रहा हूँ। कपड़े बदलकर लूंगी बनियान में निकल जाता है। भोजवा तालाब में स्नान करके रामदास घर आ जाता है। भोजन करने के के बाद सोने लगते हैं। रामवती रात भर राजनांदगांव के बारे में पूछती है। रामदास सब कुछ बताता है। डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी माँ के बारे बात आते ही रामवती कहती है मुझे भी कभी माँ के दर्शन करा देना। माधुरी दूध पीकर सो जाती है। रामवती रामदास दोनों गप्पें मारकर एक हो जाते हैं। कब नींद आ जाती है पता नहीं चलता। रामवती पति के प्यार दुलार पाकर फूल के कुप्पा हो जाती है। गदगद हो जाती है। फिर नौकरी के प्रथम साड़ी, सभी के लिए नए कपड़े और मिठाई लाया था। रामवती सोचती है इस वर्ष दिवाली अच्छी मनेगी।

रामदास गाँव में पाँच दिन रुक जाता है। दीपावली के दिन रामवती और शांति मिलकर चावल की भिन्न प्रकार की रोटियां बनाती हैं। रामदास की पसंद की खीर-पूरी पकाई जाती है। रामदास पेट भर खाता है। रामवती कहती है – जी भर के खाओ। ये तो पाँच महीने के प्रशिक्षण में नहीं मिल पाया होगा। रामदास बताता है – चार माह हो गए एक टाइप का खाना खाते-खाते। रामवती पंखा झलती रहती है और परोसते भी जाती है। रामदास खाना खाता जाता है। रामदास पेट भरने के बाद ए चम्मच खीर रामवती को भी खिलाता है। शाम को लक्ष्मीपूजा भी नए वस्त्र पहन कर ही करते हैं। माँ पिताजी, माधुरी और रामवती नई साड़ी पहनकर पूजा करती हैं। माँ दीप जलाती जाती है। रामवती दौड़-दौड़ कर सभी जगह आंगन, द्वार, कोठा, कोठी, तुलसी चौका में दीप रखती है। रामदास बेबी को पकड़कर गुमा रहा था। झालर बरामदे में बैठकर गप्पें मार रहे थे। रामदास, सामवती सुरसुरी चकरी जलाकर लक्ष्मी पूजा करते हैं। घर में लक्ष्मी की कमी हो गई थी। जिस कोठी में धान भरा रहता था। अकाल के कारण खाली है। रामदास को दादा-दादी की याद आ जाती है। दाद-दादी के रहते घर धनधान्य से भरा था। आज नहीं है, तो मजा नहीं आ रहा है। रामदास के आंसू टपकने लगते हैं। रामवती भी रोने लगती है। सामवती कोबेटी बराबर मानते थे। रामदास एक बम फटाका गली में फोड़ता है। पूरा गाँव गूँज उठता है। रामवती भी बम फटाका फोड़ती है। शांतिबाई झालरदास गुड़िया को गोदी में लिए दिखा रहे थे। रात के दस बजे तक रामदास अपने साथियों के साथ राजनांदगाव जाने के लिए पूछता है। दीपावली के दूसरे दिन छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से जाना तय होता है। रात में रामवती कहती है कि पाँच माह की खुराक ले लो। बाद में नहीं तो पछताओगे। रामदास जी भर के प्यार करता है। रामवती प्यार पा के गदगद हो जाती है। दूसरे दिन साइकिल से मस्तूरी, मस्तूरी से बस में बैठकर बिलासपुर। बिलासपुर से ट्रेन से राजनांदगांव शाम के पांच बजे पहुंच जाता है।

दूसरे दिन सुबह पाँच बजे से पीटी परेड, दौड़, खेलकूद शुरू हो जाता है। दस बजे से पाँच बजेतक क्लास में पढ़ाई, शाम सात बजे रामदास दीपावली की बधाई देने श्री वर्मा साहब के घर पहुँचता है। वर्मा साहब बाहर चहलकदमी कर रहे थे। रामदास सेलूट मारता है। दीपावली की शुभकामानाएं सर। आपको भी। आओ रामदास। घर में सब ठीक तो हैं। दीपावली ठीक मनी। रामदास कहता है – आपकी कृपा से सब ठीक-ठाक हैं सर। रामदास मिठाई खाओगे। नहीं सर। वर्मा प्लेट में मिठाई ले आते हैं। लो रामदास। एक पीस मिठाई खाता है। अब नहीं सर। गिलास से पानी पीता है, प्लेट गिलास को अंदर रख आता है। रामदास जाने के लिए सेलूट मारता है। पीछे मुड़कर हॉस्टल की ओर चल देता है। भोजन करके चला जाता है। रात में रामवती, माधुरी की याद आती है। माधुरी की मुस्कान को याद कर रामदास मुसकरा देता है। कुछ माह प्रशिक्षण और चलता है। प्रशिक्षण का वार्षिक उत्सव खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। रामदास लम्बी कूद, चार सौ मीटर दौड़, फुटबाल, गोला फेंक में प्रथम आता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी बढ़चढ़ कर भाग लेता है। शाम सात बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम था। रामदास दस साथियों के साथ नृत्य का रिहर्सल दो दिनों से कर रहा था। अच्ची तैयारी कर ली थी। सास्कृतिक कार्यक्रम के उदघाटन पुलिस महानिरीक्षक भिलाई द्वारा सरस्वती के फोटो में फूलमाला चढ़ाया जाता है। दीप जलाकर, अगरबत्ती जलाकर उद्घाटन करता है। दो शब्द कार्यक्रम के बारे में वर्मा जी भी जानकारी देते हैं। महानिरीक्षक महोदय शुभकामनाएं देते हैं। कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से होती है।

दूसरा कार्यक्रम करमा गीत नृत्य से शुरू होता है। करमा ददरिया अच्छे ढंग से मंदिर के थाप के साथ प्रस्तुत करते हैं। तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँज जाता है। तीसरा कार्यक्रम रामदास पंथी नृत्य प्रस्तुत करता है। रामदास सफेद धोती, सफेद बनियान पैर में घुँघरू, सभी साथियों के साथ चीता जैसी स्फूर्ति से तेज गति से नाचते हुए एक-एक करके दस लोग आते हैं। मांदर, झांझ, मंजीराके साथ पंधी गीत नृत्य प्रस्तुत करते हुए आतेहैं। दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत करते हैं।

गीत

तन्ना रे नन्ना, नन्ना हो ललना,

खेले बर आए हे खैलाय बर आए हे

गुरू जग मोहना गुरू मन मोहना,

खेलत खेलत जग हो होलना

तन्ना रे नन्ना, नन्ना हो ललना।।

रामदास के सभी साथी झूम-झूमकर नाचते हैं। संसार में तेज गति के नृत्य पंथी नृत्य कहलाते हैं। रामदास ने झूम-झूमके कला का प्रदर्शन किया। वर्मा जी महानिरीक्षम महोदय को बताते हैं कि रामदास सबसे होशियार, ईमानदार, आज्ञाकारी और सभी खेलों, सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रथम रहता है। पंथी नृत्य के बाद छत्तीसगढ़ी नृत्य का कार्यक्रम होता है। कई कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं। प्रथम पुरस्कार रामदास और उसके साथियों को मिलता है। रामदास खुश हो जाता है। दीक्षांत समारोह में देश भक्ति और जन सेवा की शपथ लेते हैं।

दीक्षांत परेड में रामदास प्रथम आता है। मंत्री महोदय द्वारा रामदास को पुरस्कृत किया जाता है। प्रथम आने सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षणार्थी के लिए पुरस्कारस्वरूप एक फीता वाला हवलदार बना दिया जाता है। रामदास प्रशिक्षण प्राप्त कर बिलासपुर पुलिस लाइन ज्वाइन कर लेता है। पुलिस अधीक्षक द्वारा सभी लोगों को पुलिस थाने पदस्थापना का आदेश देता है। रामदास की प्रथम नियुक्ति मुंगेली थाने में की जाती है। उत्तमदास को पण्डरिया, रामसहाय रायपुर के, महेत्तर की पाली थाने में की जाती है।
 
रामदास नियुक्ति पत्र लेकर सीधे बस द्वारा मस्तूरी, मस्तूरी से साइकिल से मल्हार माँ डिडनेश्वरी देवी के दर्शन के लिए पहुंच जाता है। साइकिल आम पेड़ के नीचे खड़ी कर देता है। तालाब में हाथ-पैर धोता है। नारियल, अगरबत्ती, इलायचीदाना का प्रसाद माँ को प्रणाम करते हुए चढ़ाता है। कमल फूल भी माँ के चरणों में अर्पित करता है। नारियल बाहर में तोड़कर प्रसाद आधा पुजारी को देता है। आधा बच्चों के लिए रख लेता है। माँ डिडनेश्वरी देवी की मुख्य प्रतिमा देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। माँ से आशीर्वाद मांगता है – मेरे परिवार को सुखी रखना माँ। मेरी नौकरी सही सलामत रहे। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करके साइकिल से मल्हार से गाँव टिकारी आ जाता है। मल्हार से टिकारी आते समय मुक्तिधाम पड़ता है। पीपल पेड़ के नीचे दादा-दादी का मठ बना हुआ है। रामदास वहां चाकर अगरबत्ती जलाकर प्रणाम करता है। रामदास की आँखों से आंसू बहने लगते हैं। रामदास आशीर्वाद मांगता है दादा-दादी मेरे सिर पर आपकी छांव हमेशा बनी रहे। गाँव के अमरई घने छांव पीपल, नीम, आम के बाग देखकर रामदास खुश हो जाता है। ये ही आम के पेड़ हैं जिसके मीठे फल पत्थर फेंक कर गिराए और चखे हैं। वह भी क्या समय था। मजे ही मजे थे।

रामदास साइकिल से घर पहुंचता है। बरामदे में गली में पचासों लोगों का जमघट। झालरदास वं कई वृद्धजनों को चरण छूकर प्रणाम करता है। साइकिल को लेकर आंगन में खड़ी कर देता है। शांति माधुरी से कहती है – देखो तो कौन आए हैं। तुम्हारे पापा जी आ गए। माधुरी पापा-पापा बोलने लगती है। रामदास माधुरी को गोद में ले लेता है। माँ को प्रणाम करता है। शांति पूछती है – बेटा कहां से आ रहे हो। रामदास कहता है – माँ मेरा प्रशिक्षण समाप्त हो गया है। मेरी पोस्टिंग थाना मुंगेली में हुई है। माधुरी को जोर से हवा में उछालता है। माधुरी हंसती हुई आती है। रामदास माथे को चूम लेता है। रामवती आवाज सुनकर रसोई घर से बाहर निकलती है। रामदास के पैर पड़ती है। रामदास हंसते हुए आशीर्वाद देता है – जुड़वा बच्चे की माँ बनो। रामवती लजा जाती है। कहती हैकि एक बच्ची का पालन-पोषण नहीं हो पा रहा है, इधर आधा दर्जन बच्चों का क्या होगा। रामवती कहती है कि – मैं क्या बच्चे पैदा करने की मशीन हूँ। जो सिर्फ यही कामरह गया है। घर-द्वार खेती किसानी, माँ-बाबूजी की सेवा कौन करेगा। मेरी सौत। रामदास हंसने लगता है – तुम्हारी ये बात सुनने के लिए तो तरस रहा था। माधुरी की एक गाल चुम्बन, माँ की एक गाल में रामदास लेता है। रामवती हंसते हुए साइकिल से सामान उतारती है। अब तो मैं भी साथ रहूँगी। यहां अकेले रहते-रहते थक गई हूँ। बहुत दिन हो गए शादी के बाद प्रताप टाकीज में फिल्म नहीं देखी। जब मैं पढ़ती थी तो गाँव से टांगा में बैटकर फिल्म देखने जाती थी। रामवती कहती है – हाथ पैर दोलो। रामदास मना कर देता है, कहता है – मैं शौच एवं स्नान करने तालाब जाऊँगा। रामवती कहती है – मेरे वीर सिपाही चलो मैं स्नान बाड़ी में करा देती हूँ। कभी-कभी हमको भी तो मौका दो। रामदास कहता है – अभी तो पूरी जिंदगी बची है। थक जाओगी सेवा करते-करते। सिपाही की बीवी बनी हो। कोई अफसर की नहीं। सभी काम अपने हाथों से करना पड़ेगा। गाँव के गोबर उठाने से तो बच जाऊँगी। रामवती कहती है।

रामदास कपड़ो उतार कर लुंगी-बनियान पहनकर भोजवा तालाब स्नान करने चला जाता है। घाट में पहले से बैठे पुराने साथी कहते हैं – नमस्कार भइया। रामदास – नमस्कार भाई। प्रशिक्षण समाप्त हुआ कि नहीं – पूरन पूछता है। रामदास कहता है – मुंगेली थाने में पदस्थापना हुई है। कल उपस्थित होना है। गाँव से मिल कर आ जाऊँ। पूरन व साथी कहते हैं – अब तो मुंगेली घूमने जाया करेंगे। रामदास कहता है – यार पूरन चल कल मुंगेली जाएंगे। पूरन कहता है – अभी तो ज्वाइन होकर आओ। जब भाभी को लेकर जाओगे तो सभी जाएंगे। रामदास लोटे में पानी लेकर घनी अमराई को पार कर खेत में शौच के लिए चला जाता है। अमराई के ऊँचे भाग में पकते हुए पीले-पीले आम चमक रहे थे। रामदास शौच से निपट कर आम को देखने लगता है। दिन डूब चुका था। अंधकार का विस्तार हो रहा था। रामदास ने सोचा चलो रात हो रही है। आम का मजा कभी जीवन रहा तो ले लेंगे। रामदास पचरी घाट में आ जाता है। पूरन से कहता है कि – यार हमारे गाँव का क्या कहना संगी। दूर-दूर गाँव में भोजवा तालाब जैसा पानी नहीं है। चारों तरफ आम के पेड़, हरियाली। तालाब में कमल फूल। बतखें ऐसी पनडुब्बी चिड़ियों की चहचहाट। मनोरम दृश्य हैं सभी। पूरन ने बताया – संगी दो-तीन दिन से हँस-हँसनी का जोड़ा यहाँ तालाब में तैर रहा है। देखने में बड़ा आनन्द आ रहा है। रामदास कहता है – संगी कोई विदेशी पक्षी होगा। पूरन ने बताया कि हँस-हँसिनी सफेद रंग, एक फीट चोंच, लगभग पचास-पचास किलो वजन के एकदम सफेद जोड़ी मछली घूम-घूमकर खाते हैं। सुबह आ जाते हैं, शाम को कहीं चले जाते हैं। रामदास कहता है – संगी उड़ने के लिए पंख हैं, खुला स्तब्ध आसमान है, जहां भूख लगे वहीं डेरा बना लेते हैं। स्वतंत्र घूम-फिर रहे हैं।

रामदास जल्दी से स्नान करने तालाब में कूद जाता है। दूर तैरते हुए निकल जाता है। तैरने का अभ्यास भी हो जाता है। सिर डुबोकर बार-बार डुबकियां लेता है। स्नान करके रामदास व साधी अपने-अपने घर आ जाते हैं। रामवती बाट जोहती रहती है। माँ-बाबूजी देखते हैं कि आज सब साथ में बैठकर खाना खाएंगे। रामवती रामदास से गुस्से में कहती है – हम लोगों के लिए समय नहीं है तुम्हारे पास। रामदास हंसकर कहता है – अब कुछ दिन की और बात है। मुझे मकान मिल जाने दो। फिर तुम्हारे साथ तुम्हारे आँचल में सिर छुपाए दिन भर बैठा रहूंगा। रामवती कहती है – अच्छा-अच्छा। चलो कपड़े बदल लो। बरामदे में माँ-बाबूजी बैठे इंतजार कर रहे हैं। रामदास जल्दी-जल्दी कपड़े बदलकर बरामदे में बैठ जाता है। झालरदास, माँ पूछती है – बेटा कब जा रहे हो। रामदास बताता है – माँ कल मुंगेली थाने में उपस्थिति दर्ज कराऊंगा। वहां पुलिस लाइन में कोई कमरा खाली होगा तो मिल जाएगा। नहीं तो किराए का मकान लेकर आऊंगा। कुल वेतन 85 रुपए महीने मिलेगा। झालर कहता है – इतनी कम रकम में गुजारा कैसे होगा। रामदास – बाबूजी गुजारा तो करना पड़ेगा। नई-नई नौकरी है, देखभाल के ऊँच-नीच देखकर काम चलाना पड़ेगा।

रामवती रसोई से थाली में खान लेकर आती है। थाली में दुबराज चांवल का भात, अरहर की दाल (भुनी हुई) भाजी के साग, लहसुन मिर्च की चटनी, आम का अचार, शुद्ध घी रामवती सबको परोस के रामदास के पास ही बैठ जाती है। शांति माधुरी को रामवती को सौंपती है। रामदास के पास बैठकर वह भी आँचल से हवा करती है। माधुरी पापा की थाली से दाल भात अपने हाथ से निकालकर खाती है। रामदास दाल चांवल की खुशबू से मांग-मांग कर खूब खाता है। रामवती भी आँचल से हवा करती है। बेबी को खिलाती है और रामदास को परोसती जाती है। रामदास भर पेट भोजन कर ओम की डकार करके उठ जाता है। मां-बाबूजी धी रे-धीरे चबाकर भोजन करते हैं। रामदास ने पाँच माह बाद घर का भोजन किया था। रामवती के हाथ के बनाए भोजन का अलग स्वाद मिठास रही है। रामवती हमेशा मन लगाकर ध्यान से भोजन पकाती रही है।

मणिदास, वेदवती भी रामवती की सदा तारीफ करते थे। भोजन करने में आनन्द मिलता है। माधुरी पापा को पाकर फिर किसी के पास जाना नहीं चाहती। माधुरी को मालूम हो जाता है कि पापा बहुत दिन बाद आए हैं और फिर कहीं भाग जाएंगे। रामदास गोदी में लेकर बरामदे गली से घुमाकर लाता है। तब तक रामवती खाना खाकर चौका बर्तन को साफ करने जाती है। तत्पश्चात अपने हाथ-पैर धोकर कमरे में आती है। जहां रामदास सोने के लिए खाट पर बैठा रहता है। रामदास माधुरी को सुलाने का प्रयास करता है। रामवती दरवाजा बंद कर आ जाती है। चुपके रामवती बगल में सो जाती है। बेबी माँ पिताजी को देखकर बहुत खुश होकर हंसती है। माधुरी एक बार माँ सीने पर चढ़कर खेलती है। दूसरे बार पिताजी के सीने में चढ़कर खेलती है। रामवती बेबी को दूध पिलाकर सुलाने का प्रयास करती है। सिर में थपकी देकर सुलाती है। थोड़ी देर में माधुरी सो जाती है। रामदास रामवती एक-दूसरे को प्यार करने लगते हैं। एक जान दो शरीर हो जाते हैं। रामदास पूछता है – घर में कोई तकलीफ तो नहीं है। रामवती कहती है – मुझे क्या तकलीफ होगी। बस, तुम्हारी कमी अखरती है। मुझे धन दौलत कुछ नहीं चाहिए। बस तुम्हारी बाहों का साया हो और क्या। रामदास कहता – कुछ महीने अकेली रह लो। फिर साथ में रहेंगे। रामवती कहती है कि जबसे तुम प्रशिक्षण में गए हो, तुम्हारी चिंता में नींद नहीं आती थी। रात बर करवट बदल-बदल कर आँखों में ही रात काटी है। इधर रात में बेबी पापा को खोजती थी। मैं कहाँ से पापा लाती। रो-रोकर सो जाती थी। अब पहचानने लगी है। माँ-बाबूजी दिनभर खेत में काम करने चले जाते हैं। मैं दिन भर भूतनी बनकर घर में अकेली रहती थी। रामदास और रामवती रात भर सो नहीं पाते। बातें करते चार बज जाते हैं। पाँच माह की दूरी को रात भर में ही पूरा करना चाहते थे। रामवती संतुष्ट हो जाती है। दोनों चार बजे तक जागते हैं। फिर न जाने कब नींद पड़ जाती है पता नहीं चलता। सुबह माधुरी जाग जाती है और सीने से लगकर रोने लगती है। सीने से चिपक जाती है। रामदास बच्ची को प्यार से बाल में हाथ फेरने लगता है। रामवती कपड़े ठीक कर उठ जाती है। रामदास बेबी को गोद में लिए उठता है। रामदास रामवती से कहता है – कुछ रोटी और भात पका ले, मैं शीघ्र स्नान करके तालाब से आता हूं। रामदास लोटा लेकर तालाब के मेड़ के अमराई में चला जाता है। शौच से निवृत्त होकर तालाब के घाट में स्नान करने लगता है। रामदास को देखकर दो-चार लड़के पूछते हैं – भइया... अभी कहां हो। रामदास बोलता है – मुंगेली थाने में ज्वाइन करूंगा। मैं जल्दी में हूँ, अभी जाना है। स्नान कर लोटे में जल लेकर जलहरी में पानी चढ़ाता है। जल्दी-जल्दी पैदल घर पहुंचता है। झालर, माँ दरवाजे के पास बरामदे में बैठकर बेबी को खिलाते रहते हैं। रामदास को देखकर पापा-पापा कहहकर रामदास की गोदी में आ जाती है। रामवती भोजन पकाकर बैठी रहती है। बरामदे में रामदास बैठकर भोजन करता है। रामवती कहती है – जल्दी-ल्दी में सब्जी नही बनी है। रात की दाल को सूखने डाल दिया है। भात-दूध के साथ टमाटर के चटनी, अचार के साथ खाना खा लो। रामदास कहता है – जो भी हो परोस दे। तुम्हारे हाथ के भोजन का अलग स्वाद होता है। रामवती गरम-गरम भात थाली में निकलाती है, गाय का दूध डालती है। थोड़ा-सा शक्कर डालती देती है। रामदास मजे से भोजन करके तैयार हो जाता है। रामदास साइकिल से मस्तूरी और मस्तूरी से बस में बैठकर बिलासपुर आ जाता है। पुलिस लाइन से पेटी-सामान लेकर मुंगेली के लिए फिर बस में बैठ जाता है। बस मुंगेली थाना के सामने रुकती है। रामदास सामान लेकर थाने में पहुंचता है। बड़े मुंशी संतोष मिश्र जी रामदास को थानेदार साहब के निवास में परवाना लेकर भेज देते हैं। थानेदार दलगंज सिंह साहब बरामदे में बैठकर कुछ-लिखा पढ़ी कर रहे थे। रामदास उन्हें देखकर सेल्यूट मारता है। ‘जयहिंद सर’ सिंह साहब पूछते हैं – कहां के रहने वाले हो। रामदास बोलता है कि सर, मैं गाँव टिकारी मस्तूरी के पास का रहने वाला हूँ। सिंह साहब कहते हैं – बैठो-बैठो। टिकारी में मेरा मामा का घर है। बहादुर सिंह नाम है मेरा। रामदास महंत कहता है सर हम लोगों का चेला है। बस क्या था। जान-पहचान होने से तुरंत मिश्रा को बुलाया। मिश्रा से कहा – रामदास को एक कमरा जो खाली है उसे सुपुर्द कर दो। रामदास सेल्यूट कर वापस थाने में आ गया। मुंशी जी ने कहा – रामदास ये लो चाबी। रामदास चाबी लेकर मकान देखने चला गया। मुंशी जी ने कहा – रामदास ये दो कोटवार बैठे हैं। ले जाओ। झाड़ू, साफ-सफाई करवा लो। दो कोटवार लेकर साफ सफाई कराकर अपना पेटी सामान इस बीच कमरे में रख देता है। कोटवार घड़े में पानी भर देता है। रामदास एक कोटवार को बाल्टी, रस्सी मग्गा और गिलास के लिए बाजार भेज देता है। एक काट भी बाजार से खरीद कर ले आता है। इस प्रकार से पहले दिन रात कमरे में काटता है। दूसरे दिन सुबह उठकर शौच, दातून करके तैयार होकर सुबह की हाजिरी में चला जाता है। सभी सिपाही हवलदार, मुंशी से परिचय होता है। सिंह साहब परिचय कराता है – रामदास मेरे मामा के गाँव के हैं। इसलिए सब लोग ठीक से व्यवहार करेंगे। मुंशी जी से कहा जाना है ड्यूटी बता देता है। थाने में ज्यादा स्टाफ नहीं था। एक थानेदार दो सहायक निरीक्षक एक मुंशी दो हवलदार बारह सिपाही थे। रामदास अपने पदोन्नति योग्यता के सोपानों के बारे में बताता है। पहले वह एक फीता वाला हवलदार रहता है। दरोगा साहब के साथ देहात गाँव जाते थे। बुलेट मोटर साइकिल में पीछे में डण्डा पकड़े बैठा रहता है। रामदास को सभी गुर मुंशी जी सिखाते रहते हैं। रामदास बहुत ईमानदार और व्यवहारकुशल सिपाही था। रामदास पुलिस विभाग में रहते प्रचलित व्यवहारों से बहुत दुखी रहता था। पुलिस के डण्डे के डर से करीब लोग कुछ नहीं कहते थे। रामदास को एक माह से अधिक समय हो गया था परन्तु पुलिसिया हरकत नहीं सीख पाया था। सज्जन लोग या अच्छे परिवार के लोग थाने की सीढ़ियां चढ़ना पसंद नहीं करते। शहर गाँ कई परिवारों के कई पीढ़ियों से थाने की सीढ़ी तक नहीं देखी है। पुलिस कर्मचारियों के लट्ठ व्यवहार से अच्छे-अच्छो निडर व्यक्ति की भी घिग्घी बंध जाती है।

थाने के आमने-सामने चेम्बर में दलगंजसिंह बैठे फाइल निपटा रहे थे। सिंह साहब रामदास को बुलाता है। रामदास सेल्यूट कर जयहिंद सर कहता है। सिंह साहब ने कहा – रामदास बैठो। आओ चायपिता हैं। कोटवार को बुलाकर कहा पाँच चाय ले आओ। रामदास ने कहा – सर मैं चाय नहीं पीता. सिंहा साहब ने पूछा तो क्या पीते हो। सर न पीता हूँ न खाता हूँ। मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ। यहां तक पान, सुपारी दारू,-शराब, मांस-मछली कुछ भी नहीं खाता। मैं स्व. मणिदास महंत के परिवार का हूँ। सह हमारे यहां कई पीढ़ियों से मांस नहीं खाते। सतनाम के असली पुजारी हैं सर।

वाह भाई रामदास तुम तो गजब के आदमी हो। तुम्हारे संग जाए तो हम भूखे मर जाएंगे।

नहीं सर, आपके लिए सब व्यवस्था कर देंगे सर।

रामदास मैं तो आधा बकरा खा जाऊँगा। कुछ नहीं होगा बल्कि सबको पचा जाऊँगा। हम तो भाई असुर प्रवृत्ति के हैं। हमें सब चलता है पर तुम पुलिस विभाग के लायक नहीं हो। यहां तो खूब खाओ, सबको खिलाओ। जमकर लूटो। अपना घर भरो।

रामदास कहता है – सर, मैं तो ये सब नहीं करूँगा। सिंह साहब बोले – नहीं तो तुम भूखे मरोगे। रामदास कहता है – सर हम लोगों ने देशभक्ति, जन सेवा का शपथ लिया है। सिंह साहब कते हैं – सभी नौकरी में आने से पहले शपथ लेते हैं। बाद में भूल जाते हैं। रामदास कहता है – सर आपकी कृपा मिल जाए, तो मैं जाकर अपना परिवार ले आता हूँ सर। सिंह साहब कहते हैं – तुम दो दिन की छुट्टी ले लो। पुलिस अधीक्षक कार्यालय की डाक ले जाओ। वहां देकर घर चले जाना। रामदास आवेदन देकर मुंशी जी के पास जाता है। उसी समय एक शराबी को पकड़कर सिपाही हेतराम लाता है। उसे इस कदर लात घूंसों से मारते हैं, जो सिपाही आए वहीं दो लात मारे। शराबी तो पेंट में पेशाब कर डालता है। रामदास दरोगा साहब के पास जाकर कहता है – सर, ज्यादा मारने से मर जाएगा। सर उसे छोड़ दीजिए। मैं इसे पानी पिला देता हूँ। सिंह साहब ने कहा – रामदास तुम इसे पानी पिलाकर सड़क के उस पार छोड़कर आना। साला मर जाएगा तो मेरे मत्थे मढ़ जाएगा। मारे सारे सिपाही, सजा पाए थानेदार। रामदास का दिल दहल जाता है। पुलिस विभाग में तो लगता है मानवीयता, इंसानियत मह गई है। बेचारा शराबी थोड़ी पी क्या गया दुर्गति हो गई।

रामदास दूसरे दिन डाक लेकर पुलिस अधीक्षक कार्यालय जाता है। वहां डाक देकर गोलबाजार चला जाता है। वहां बेबी के लिए फ्रॉक, माँ के लिए साड़ी, बाबू जी के लिए धोती खरीदता है। कोहिनूर होटल से एक किलो रसगुल्ला खरीदता है। बस स्टैण्ड जाकर बस से मस्तूरी पहुंच जाता है। रामदास किराए की साइकिल लेकर गाँव टिकारी पहुंच जाता है। बरामदे में दो-चार लोग गप्प मारते रहते हैं। पूरन बेबी को खिलाता रहता है। पूरन जोर से कहता है देखो कौन आ गया ? पापा-पापा माधुरी तुतली भाषा में बोलती है। पूरन उसे गोदी में दे देता है। रामदास बेबी को पकड़कर आंगन में जाता है। तभी पूरन साइकिल का आंगन में लाकर खड़ी कर देता है। रामदास रामवती को पुकारता है। रामवती बाड़ी में मुनगा पेड़ से मुनका पत्ता (भाजी) तोड़ रही थी। पेड़ के ऊपर चढ़ी हुई थी। रामवती दूर नहीं थी चढ़ी थी। ताकि कोई उसे पुकारे तो जल्दी से उतर सके। रामवती ऊपर से चिल्लाती है कि मैं यहां बाड़ी में हूँ। रामदास बेबी को गोदी में उठाए बाड़ी में पहुंच जाता है। पूरन भी साथ रहता है। भौजी ज्यादा ऊपर मत चढ़ना। मुनगा का पेड़ जल्दी टूटने वाला होता है। रामदास कहता है – आ। अब उतर बहुत भाजी तोड़ लिये। आज के बाद नहीं चड़ोगी। रामवती जल्दी-जल्दी पेड़ से उतरती है। रामदास के पैर छूती है। रामवती कहतीहै कि – आज जरूर आओगे ऐसा मेरे को महसूस हो गया था। आज ही सुबह दो कौआ काँव-काँव कर रहे था। मेरा बांया पैर भी खुजला रहा थआ। रामदासपूछता है कि माँ, बाबूजी कहां हैं ? रामवती कहती है कि खेत देखने गए हैं। आने ही वाले हैं। रामवती सजी संवरी रहती है। दो बेनियों में लाल फीता झबुआ, काली नैनों में काजल, लौंग फूल नाक, में फूल कान में, कान में बाली और गालों पर स्नो पाउडर लाली लगाई रहती है। रामदास को अच्छा लगता है। उसके इस रूप को देखकर उसमें काम-इच्छा जागृत हो जाती है। वह उसे आलिंगन में लेने को होता है कि तभी माधुरी जोर से चिल्लाती है पापा-पापा मेरा खिलौना ? रामवती छुड़ाती है। उसी समय दरवाजे पर खटका होता है। माँ-बाबू जी आ जाते हैं। रामदास चरण छूकर प्रणाम करता है। झालरदास पूछता है – कितने समय आए ? दरोगा साहब ने मुझे रहने क्वार्टर दे दिया है और परिवार ले जाने के लिए दो दिन की छुट्टी। शांतिबाई कहता है – बेटा अच्छा है बहू को अपने साथ ले जाओ। वह बेचारी यहां गाँव में उकता रही है। गाँव के कीचड़ से निजात पाएगी।

रामदास बरामदे में आकर बैठ जाता है। दो-चार साथी बैठे रहते हैं। रामदास तालाब नहर की ओर जाने के लिए कहता है। चार-पाँच लोग नहर की ओर चल पड़ते हैं। पूरन, बलदाऊ, रामूं, सोहन बारी-बारी से पूछते हैं सिपाहीका पद कैसा है ? क्या-क्या करना पड़ता है ? रामदास अपना दो माह का अनुभव बताता है। क्या पूछते हो संगी ? पुलिस विभाग डण्डे का विभाग है। डण्डे के जोर से अत्याचार होता है। किसी को मारना-पीटना, बेइज्जत करना, धौंस देना, फर्जी केसों में फंसा देना थोड़ी सी बात है। रुपए ऐंठना, कोई गलती करे तो दूसरे को तंग करना पुलिस विभाग के इन्हीं अत्याचारों से आम नागरिक जरा भी खुश नहीं हैं। दरोगासाहब ने एक दिन मवझे कह दिया कि रामदास तुम इस विभाग के लायक नहीं हो। यहां तो बदमाश लोग ही चाहिए। यहां गुण्डों, बदमाशों, अपराधियोंसे निपटना पड़ता है। नहीं तो पुलिस अधीक्षक थाने में थोड़ी टिकने देंगे। किसी लूप लाइन में डाल देंगे। पुरन व साथी सुनते जाते हैं। सभी पुलिया पर बैठकर गप मारते रहते हैं। पूरन पूछता है कि भर्ती कब हो रही है। जनवरी में भर्ती हो गई ऐसा रामदास कहता है। फिर शौच के लिए सभी साथी तालाब आ जाते हैं। भोजवा तालाब में स्नान करके अपने-अपने घर चले जातेहैं। रामवती दाल-भात, मुनगा भाजी, लाल मिर्च की चटनी काए रहती है। माँ-बाबूजी, रामदास सभी साथ बैठकर खाते हैं। माधुरी को रामदास अपने हाथों से खिलाता है। माधुरी अपने हाथ से भात को फेंककर आती है। रामदास मना करता है। माधुरी दादा के साथ खाने लगती है। उसके बाद दादी के साथ खाने लगती है। सभीके साथ घूम-घूम कर खा रही थी। रामदास की नजर रामवती से मिल जाती है, दोनों हंसते हैं। रामदास खाना खाने लगते हैं। रामदास कहता है – रामवती तुम्हारे हाथ के बनाए भोजन से ही मेरा पेट भरता है। रामवती आंचल से हवा करने लगती है। मुनगा भाजी और परोसती है। मुनगा भाजी और परोसती है। माँ-बाबूजी कहते हैं बेटी अपने लिए बचाया कि नहीं ? रामवती कहती है – अभी बहुत है। रामदास भरपेट भोजन करके ओम की डकार लेते हुए उठता है। उधर शांति माधुरी के हाथ-पांव को दोती है। माधुरी पापा-पापा करकर रामदास के पास आ जाती है।रामदास उसे गोदी में उठाकर आंगन बाड़ी की ओर घूमने जाता है।

रामदास थोड़ी देर बरामदे में बैठकर मां बाबूजी से बात करता है। बताता है कि दरोगासाहब के मामा घर बहादुर सिंह के यहां है। इसलिएदरोगा साहब का स्नेह मेरे ऊपर अधिक है। फिर मैं पुलिस विभाग के प्रपंच में नहीं पड़ा हूँ। झालरदास कहता है – किसी से घूस मत लेना। न किसी गरीब को सताना। माँ कहती है – किसी के हाथ का पान मत खाना। रामदास माँ-बाप की समझाइशों को गांठ बांधकर धर लेता है। झलरदास फिर कहते हैं – बेटा देरे दादा जी पंडित महंत मणिदास महंत का दूर-दूर तक शोर है कि कई अच्छे-अच्छे ईमानदार दानी आदमी थे। अपने दादा जी के सम्मान को ठेस मत पहुंचाना। रामदास कहता है कि पिताजी दादा जी का कुछ असर नाती में भी होता है। मैं दादाजी के पदचिन्हों पर चलने का प्रयास कर रहा हूँ। माधुरी दूध पीने के लिए रोने लगती है। रामदास माधुरी को परसों ले जाने के लिए कहता है। झालर कहता है कि घर से चावल, दाल, मिर्च, मसाला, अचार ले जाना। रामदास बेबी को लेकर रामवती के पास जाता है। रामवती बर्तन भांडे साफ कर रही थी। चौकर बर्तन कर हाथ पैर धोकर चेहरे में पानी डालकर जल्दी आई। गमछा में मुँह पोंछ कर माधुरी को गोद में ले लेती है और दूध पिलाने लगती है। कहती है – बड़ी पापा की बेटी बनती है और पापा के पास रहती भी नहीं। बेबी छककर दूध पीती है। पेट भर जाने के बाद पापा-पापा कहने लगती है। रामवती कहती है। बड़ी पापा की दुलारी, पापा एक दिन क्या आए तू पापा की हो गई। रामदास बेबी को गोदी में उठा लेता है। थपकी देकर सुलाने का प्रयास करता है। बेबी आँख बंदकर सोती है। पापा भाग न जाएं सोचकर जरा आँख खोलकर देखती भी है। इधर दोनों खूब हंसते हैं। रामवती थपकी देती है। लोरी सुनाती है। फिर बेबी सो जाती है। रामदास व रामवती भी सो जाते हैं।

सुबह उछकर रामदास शौच के लिए नहर किनारे दूर तक तीन-चार किलोमीटर तक चला जाता है। शौच से निपटकर भोजवा तालाब के घाट में बड़ पेड़ के नीचे बैठ जाता है। सभी पुराने साथी, गाँव नव युवक बच्चे मिल जाते हैं। रामदास एकटक समुद्र जैसे तालाब को देखता है। कमल की पत्ती के बीच में ऐरी चिड़िया ची... ची... चिल्लाती रहती है। बतख, बगुला पंख फड़फड़ाकर इधर-उधर भागते रहते हैं। कमल फूल खिले रहते हैं। घाट में छोटी-मोटी मछलियां झुंड के झुंड तैर रही थीं। रामदास को बचपन से अच्छ लगती थी। पास की अमराई से झुंड के झुंड चमगादड़ इधर-उधर उड़ रहे थे। बचपन की स्मृतियां याद आ जाती हैं। हंसकर वह उठ जाता है। तभी पूरन, सोहन, मोहन, नंदू जाते हैं। कहते हैं – भइया, आज तालाब के उस पार तैरकर चलते हैं। उस पार घाट में अशोक, महेत्तर, वीरेन्द्र दिख रहे हैं। रामदास कहता है – चलो उस पार तैरकर चलते हैं। लगभग एक किलोमीटर तैर कर जाते हैं और तुरंत तैर कर वापस आ जाते हैं। तालाब के बीच में कहीं नहीं सुस्ताते (आराम)। घाट में आकर ही दम लेते हैं। रामदास की सांसें फल जाती हैं। जमीन में खड़े होकर दम भरता है। सभी लड़के धीरे-धीरे आ जातेहैं। रामदास तैरने में होशियार था। कमल फूल के कांटे से रामदास के हाथ, पैर, पेट में चिन्ह पड़ गए थे। रामदास पानी में सभी को सहलाता है। बेबी के लिए दो कमल के फूल (कली) को तोड़ लेता है। पूरन ने कमल फूल का कांदा निकाल लिया। कांदा का धोकर पूरन रामदास को खाने के लिए देता है। पानी में रगड़कर धोए और खाए। बहुत आनन्द आया। बहुत दिनों के बाद मिला था यह सब। शहर में कहां मिलेगा ? ये तो प्रकृति के अनुपम उपहार हैं। ये सब चीजें गाँवों में मिलती हैं। रामदास स्नान कर घाट में साथियों को देखते हैं। सभी साथी मिलकर अपने-अपने घर आते हैं। रामदास बरामदे में बैठी माँ से माधुरी बेबी को लेता है। बेबी को उठाकर अंदर चला जाता है। रामवती घर को गोबर से लीप रही थी। चूल्हा-चौकी को लीप रही थी। रामदास बेबी को खाट में बिठाकर कपड़े पहनने लगा। रामवती सभी काम निपटाकर आती है। दूध को गरम गोरसी में रख देती है। रामदास को कहती है मैं कुएं से पानी भरकर लाती हूँ। गली के मोड़ पर रामवती को एकसहेली मिल जाती है। रामवती से पूछती है – कब मुंगेली जा रहे हो ? रामवती कहती है कल पूरा सामान साथ लेकर जाएंगे। अभी से सामान बांधने लगे हैं। रामवती तालाब नहाने के लिए जाती है। शौच से निपटकर घाट में आकर नहाने लगती है। उसकी सुंदरता को देख दूसरी महिलाएं कहती हैं – रामवती तुम्हारे जैसा सुन्दर पूरे गाँव में कोई नहीं है। रामवती साबुन लगाकर नहाती है, बालों को काली मिट्टी से धोती है। कपड़े आदि धोकर रामवती घर लौट आती है।

रामवती कपड़े पहनकर भोजन के लिए रसोई में घुस जाती है। रामदस परछी में बैठकर बेबी को खिलौने देकर खिलाता है। माँ-बाबूजी खेत देखने के लिए चले जाते हैं। शांति गाय के कोठा से गोबर लाकर घूरे में फेंकती है और खेत की तरफ चली जाती है। रामदास रसोई में पहुंच जाता है। रामवती केश सुखाकर चूल्हा जलाती है, लकड़ एवं कंडा रखकर आग लगा देती है। लकड़ी के धुएं से रसोई भर जाती है। रामदास बेबी को लेकर बाहर आ जाता है। दाल के लिए पतीली चढ़ाकर रामदास के पास आकर बैठ जाती है। रामदास कहता है – कुछ खिलाओ, पिलाओ। रामवती कहती है जल्दी से खाना बन जाएगा। मैं चाय बनाकर लाती हूँ। रामदास कहता है – मैं चाय नहीं पीता। दूध दे दो। रामवती एक गिलास। बेबी को दूध पिलाता हूँ। बचे गिलास के दूध को रामदास पीता है। रामवती कहती है – मुंगेली तो ठीक है। रामदास कहता है – सब ठीक है। दोनों, क्या-क्या ले जाना है कहकर गप मारने लगते हैं। बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आती है। रामदास दरवाजा खोलता है, पूरन अपने लड़के को लेकर आता है। दोनों बरामदे में बैठकर बच्चों को खिलाने लगते हैं। दो-चार पढ़ने वाले लड़के आ जाते हैं। रामदास से कहते हैं – भइया हम लोग बेरोजगाह हैं। यदि भर्ती हो तो हम खेत बेचकर रुपए दे देंगे। गाँव की जलालत, जुआ, दारू, चुगली से दूर रहेंगे। आप कम-से-कम गाँव के लफड़े से दूर हो जाएंगे। रामदास आश्वासान देताहै कि जब भी भर्ती होगी चिट्ठी पत्री भेजूंगा। भोजन का समय हो जाता है। रामवती और रामदास दोनों बैठकर भोजन करते हैं। माँ-बाबूजी खेत से आए नहीं रहते हैं। रामदास पचास किलो चावल, दस किलो दाल, मिर्च-मसाले, अचार, थाली, लोटे, गिलास, चार कटोरी, एक-एक हौला, भाद दाल पकाने के लिए गुण्डी, कड़ाही, चम्मच-चमचा, बेलन, चौकी आदि गृहस्थी का सामान तैयार कर लेता है। दूसरे दिन बैलगाड़ी में सामान व रामवती और बेबी को लेकर झालरदास मस्तूरी पहुंचता है। रामदास साइकिल से जल्दी से पहुंचकर किराया जमा करता है। बस खाली मिल जाती है। मस्तूरी से सीधे मुंगेली बस में बैठ जाते हैं। दो बजे मुंगेली घर पहुंच जाते हैं। बस थाने के पास रुकती है। रामवती बेबी को लेकर उतरती है। सामान को बस कंडक्टर निवास तक पहुंचा देता है। रामदास, रामवती सामान को सजाने लगते हैं। बेबी सो जाती है। रसोई के सामान को जमाते हैं। रात का भोजन दोनों मिलकर बनाते हैं और खाना खाकर सो जाते हैं। दूसरे दिन सुबह थाना के सामने हाजिरी में पहुंच जाता है। दरोगा साहेब सबको मुंशी को कहकर ड्यूटी बांट देता है। रामदास की ड्यूटी थाने में सशस्त्र गार्ड के रूप में लगाते हैं। रामदास आठ बजे से 2 बजे तक ड्यूटी करके घर चला जाता है। शाम को मुंगेली का बाजार रामवती को दिखाने, कुछ सामान खरीदने चले जातेहैं। कुछ घर के सामान खरीदकर बेबी के लिए फुग्गा (बेलून) लेकर आ जाते हैं। थानेदार साहब तीन बार आदमी भेजकर पूछ चुके थे कि रामदास को बुलाओ। सिंह साहब रामदास को लेकर चोरी के मामले में तफ्तीश में जाना था। रामदास बेबी को रामवती को पकड़ाकर जल्दी-जल्दी दलगंज सिंह साहब के पास पहुंच जाता है। पास के गांव रानीसागर में एक किराने की दूकान में सेंध मार सामान चुराकर ले गए। रामदास पीछे बंदूक लेकर बैठे थे। थोड़े समय में वहां पहुंच जाते हैं। रामदास मोटरसाइकिल खड़ी करता है। सिंह साहब कोटवार को बोलता है सभी नमस्ते करते हैं। दूकानदास सुधीर गुप्ता कहता है – सर, पीछे से दीवार फोड़कर ले गए हैं। रामदास साथ में पीछे देखता है। दाल की बोरी ले गए थे। रास्ते में गिरा मिला बहुत दूर खेतों तक जहां-जहां गया वहां तक दाल गिरी है। सिंह साबह को बताता है सर उस खेत की ओर भागे हैं। दूकान के अंदर रामदास, सिंह साहब मुआयना करतेहैं। चोर ने कोई सुराग नहीं छोड़ा था। दूकानदार का बयान रामदास लेता है। कोटवार और पड़ोसी का बयान भीलेता है। रामदास कहता है – सर, बयान ले लिए हैं। कोई शक शुभा हो तो बताओ। सुधीर गुप्ता बोलता है – सर हमें नहीं पता। कोटवार से चोर बदमाशों का नाम पूछते हैं। चार-पाँच बदमाशों का नाम बताते हैं। दरोगा साहब कहते हैं – रामदास दूकान से एक किलो काजू, आधा किलो बादाम, आधा किलो किशमिश, एक पाव पिस्ता, एक पाव लौंग इलायची ले लो। रामदास सुधीर से सामान लेता है। कुल दो हजार रुपयों का सामन नए झोले में भरकर दे देता है। रामदास दरोगा साहब से कहता है – सर, दो हजार रुपए देना है। सिंह साहब कहता है – बाद में देंगे। सिंह बुलेट मोटर साइकिल स्टार्ट करता है। रामदास पीछे बैठ जाता है। दरोगा साहब रामदास को फटकारता है – तुम पुलिस विभाग के लायक नहीं हो। जब मेरे साथ रहोगे तो चुपचाप रहना। मैं जैसे कहता हूं करते जाना। नहीं तो भूखे मरोगे। रामदास गलती के लिए माफी मांगताहै। रामदास थानेदार साहब के घर सामान पहुंचाकर आ जाता है। साहब चोरी के निगरानीशुदा बदमाशों को थाने में बुलाने के लिए मुंशी संतोष मिश्रा को हुक्म देते हैं। मिश्रा तत्काल चार सिपाही चारों ओर दौड़ा देता है।

रामदास घर चल देता है। रामवती इंतजार करती रहती है। बेबी रो-धोकर सो जाती है। रामदास हाथ-पैर धोकर भोजन करने के लिए दोनों बैठ जाते हैं। रामदास कहता है कि पुलिस विभाग में डाकू भरे हुए हैं। आज क्या हुआ। बनिया के दूकान में चोरी हो गया था। तफ्तीश के लिए गए थे। दूकानदार के तो चोरी हो गई ऊपर से थानेदार साहब दो हजार रुपए के काजू, किशमिश ले आए। मैं रुपए के लिए बोला तो डांट दिए। और चेतावनी दिए कि मेरे साथ रहोगे तो चुपचाप रहना। रामवती समझाती है कि तुम ईमानदार हो सभी थोड़े ही होंगे। तुम अपना काम करते रहो। दुनिया का ठेका मत लो। पुलिस विभाग ऊपर से लेकर, संत्री से लेकर मंत्री, सिपाही ऊँचे अधिकारी तक है। रामदास तबभी कहता है कि इस विभाग में मानवता नाम की चीज नहीं है। अभी थाने में बदमाशों को बुलाया गयाहै। सभ लोगों की पिटाई हो रही है। कई तो बेकसूर हैं लोग हैं। असली चोर तो भाग गया होगा। परन्तु छोटे-मोटे चोर फंस गए होंगे। जिसने हफ्ता नहीं दिया होगा उसकी पिटाई उस क्षेत्र के सिपाही लात, घूंसों, जूतों से पीट रहे होंगे। रामवती बेकार इस विभाग में आ गया। देशभक्ति, जनसेवा के नाम से जनता को लूट रहे हैं। सिंह साहब जरूर रुपए लौटा देंगे। बहुत बढ़िया अफसर हैं। परन्तु समस्त स्टाफ मुफ्त के राशन, घी, दूध, कपड़े, सोने-चांदी से मालामाल हो रहे हैं। विभाग वेतन क्यों देता है ? वेतन ते मात्र दक्षिणा है सरकार उन्हें मुफ्त में दे रही है। रामवती कहती है – पहले भोजन कर लो। ज्यादा चिंता मत करो। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएगा तो देश का क्या होगा ? जब बाड़ ही खेत को चर जाएगा तो बकरे का क्या दोष। रामदास भोजन करके बेबी को घुमाने थाने की ओर ले जाता है। थाने में मुंशी संतोश मिश्रा, सिपाही रामप्रसाद साहू चोरों की पिटाई कर रहे थे। सबको लाइन में खड़े कर पूछ रहे थे। आखिरी वाले यासीन खां से कहा बता दो नहीं तो मार खाओगे। रामदास की बात मानकर अपनी चोरी कबूल कर लिया। रामदास ने बेबी को घर में पहुंचा दिया और रामप्रसाद के साथ चोरी का माल जप्त कर ले आया। रामदास ने कड़ाई से पूछा तो कैंग का नाम बता दिया। रामदास ने आसपास की चोरी का पता लगा लिया। दरोगा साहब बहुत खुश हुए। चोर एवं गैंग को जेल भेज दिया गया। रामदास की पहली सफलता थी। रामदास अपनी सफलता से बहुत खुश थे। रामवती उसे समय-समय पर समझाती रहती थी – पुलिस विभाग में सभी कर्मचारी, अधिकारी बेईमान, भ्रष्टाचारी नहीं होते परन्तु नब्बे प्रतिशत लोगों का व्यवहार ठीक नहीं है। आचरण भी ठीक नहीं है। इसलिए तो पुलिस विभाग बदनाम है।
 
रामदास मेहनत व लगन से कार्य कर रहा था। रामदास मुंशी से सभी लिखा-पढ़ी, रिपोर्ट दर्ज करना, केस खाता करने, जन्म-मृत्यु को दर्ज करना अपराधी की गणना करना सभी प्रकार के प्रतिवेदन भेजना, केस डायरी न्यायालय में भेजना। पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भेजना, हत्या के अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करना। सभी प्रकार के कार्य पद्धति रामदास बहुत जल्दी सीख गया था। दरोगा साहब रामदास को ही काम बताता था एवं साथ में रखते थे। ममुंगेली थाने में रामदास एक ईमानदार एवं व्यवहारकुशल आरक्षक के रूप में जाने जाने लगे थे। रामदास की पदस्थापना से थाने की इज्जत में बढ़ोतरी हो रही थी। सभी लोग रामदास को ही पूछते थे। थाने परिसर में कोई गरीब रिपोर्ट लिखाने आते थे, कोई किसान गांव वाले सभी लोगों को रामदास बैठाते थे। पानी पिलाने के बाद तकलीफ को पूछते थे। बड़े सम्मान के साथ पूछते थे। एफआईआर दर्ज कर लेते थे। किसी प्रकार का भय नहीं दिखाते थे। शहर के व्यापारी वर्ग भी खुश थे। आम नागरिकों में रामदास की लोकप्रियता बढ़ गई। रामदास किसी से रुपए नहीं मांते थे। जबरदस्ती ही कोई भेंट के रूप में कुछ दे जाते थे। उसे भी वे बहुत मुश्किल से लेते थे। सुरी घाट के पास गाँव के एक किसान की हत्या दिन-दहाड़े सुधा यादव व साथियों द्वारा कर दी जाती है। गाँव में आतंक व्याप्त था। गाँव के दरवाजे बंद हो गए थे। हत्यारे लोग घर-घर जाकर दरवाजा ठोककर गवाही देने वालों को जान से मारने की धमकी देकर फरसा, लाठी घुमाते हुए जंगल की ओर भाग गए थे। मुंशी संतोष मिश्रा तुरंत दरोगा साहब को सूचना देते हैं। दरोगा साहब आकर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के लिए कहते हैं। रामदास एफआईआर दर्ज करता है। सिंह साहब कोटवार को कहता है हम लोग आ रहे हैं, आप लोग चलिए। साथ में तीन सिपाही ले जाते हैं। गाँव में हत्या की दहशत से आतंक का वातावरण रहता है। दरोगा साहब, रामदास लाश को देखते हैं। फरसे से वार कर सर धड़ से अलग, पैर को भी काट दिए रहतेहैं। हत्या मनोहर सिंह बघेल नाम के किसान की कर दी जाती है। हत्यार जबरन रुपए ऐंठने के चक्कर मे हत्या कर देते हैं। पुराने खेत का झगड़ा रहता है। पुरानी रंजिश के कारण दिन-दहाड़े हत्या होती है। रामदास पोस्टमार्टम के लिए पत्र तैयार कर, दरोगा साहब से हस्ताक्षकर कराकर शासकीय अस्पताल मुंगेली भिजवा देता है। डॉ. एम.एल. डहरिया लाश का पोस्टमार्टम कर रिपोर्ट रात तक दे देता है। दरोगा साहब गवाहों के बयान लेता है। मानसिंह समाद, मंगल, दल्लू, मूरतराम के बयान लेते हैं। सभी लोगों ने हत्या करने देखने की बात लिखाते हैं। रामदास को एक लड़का जो पास के गाँव से आ रहा था, नाले के किनारे कुछ लोगों को सशस्त्र बैठे दारू पीने की बात बताता है। रामदास सिंह साहब को जानकारी देते हैं। सिंह साहब, तीन बंदूकधारी सिपाही, रामदास पैदल सर्च के लिए चल देते हैं। नाले के किनारे बेठे रहतेहैं। एक हत्यारा पुलिस वालों को देख लेता है। सुधा राउत को कहता है भागो पुलिस वाले आ रहे हैं। सुधा राउत व चार साथी खेतों में भागने लगते हैं। अरहर के खेतों मे जाकर छिप जाते हैं। रामदास व साथी बहुत ढूंढते हैं। लगभग एक घंटे के बाद रामदास को सुधा राउत दिख जाता है।

रामदास कहता है – सुधा, तुम पुलिस के हवाले कर दो नहीं तो तुम्हें गाँव वाले मार डालेंगे। सुधा तब भी भागता रहता है। रामदास भागने बहुत तेज था। रामदास अकेले दौड़कर खूंखार अपराधी सुधा राउत को पकड़ लेता है। सुधा राउत फरसों से रामदास पर वार करता है। परन्तु फरसा अरहर पेड़ में फंस जाता है। रामदास छलांग लगाकर फरसा से छुड़ा लेता है। रामदास फरसा की बैठ से दो लाठी उसकी पीठ में मारता है। सुधा गिर जाता है। रामदास सीने चढ़कर दनादन घूंसे से मार-मार कर उसे अधमरा कर देता है। तब तक तीन सिपाही आ जाते हैं। सभी लोग लात-बट से मार-मार कर हालत खराब कर देते हैं। रामदास हत्या कबूल करवा लेता है। सिंह साहब हथकड़ी लगाकर थाना के लॉकअप मे बंद कर देते हैं। सिंह साहब सुधा राउत का बयान लेते हैं। उसके चार अन्य साथियों को रात मे रामदास पकड़कर हवालात में बंद करा देता है। सिंह साहब रामदास की बहादुरी के लिए पाँच सौ रुपए का इनाम देते हं। दूसरे दिन सभी अखबारों में रामदास की फोटो सहित खूंखार अपराधी सुधा राउत पकडा गया। दस से अधिक हत्याओं के अपराधी को जो आज तक नहीं पकड़ गया था वीर जांबाज सिपाही रामदास का पाँच सौ रुपए इनाम दिया गया है। रामदास की शौर्यकीर्ति में अतिवृद्धि हो रही थी।

रामदास के साहस और शौर्य की चर्चा सारे अखबारों में होती है। कई संस्थानों द्वारा सम्मानित भी किया जाता है। रामदास की कर्तव्यपरायणता, सद्व्यवहार, सद्चरित्रता के लिए पुलिस अधीक्षक द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। रामदास का एक वर्ष का कार्यकाल बढ़िया कब बीत गया पता नहीं चला। दलगंज सिंहसाहब का प्रमोशन दुर्ग में उप पुलिस अधीक्षक के पद पर हो जाता है। रामदास दुर्ग तक सामान के साथ जाता है। रामदास सिंह साहब की बिदाई में शानदार पार्टी देता है। रामदास बिदाई के समय रो पड़ता है। उसके लिए सिंह साहब पिता के समान थे। सिंह साहब के कार्यकाल में अपराध घट गए थे। रामदास जैसे सहयोगी कहां मिलेगा ? रामदास के पिताजी झालरदास मुंगेली बच्चों को देखने के लिए आते हैं। झालरदास का सभी बहुत आदर सत्कार करते हैं। कहते हैं रामदास जैसे वीर सपूत के पिताजी हैं। झालरदास लड़के के साहस, ईमानदारी, बहादुरी, व्यवहराकुशलता, न्यायप्रिय सुनकर गद्गद हो गए। कोई भूखे भिखारी दरवाजे से बिना अन्न दिए खाली नहीं भेजते थे। भूखे को खाना भी खिलाते थे। रामवती बाबूजी की बहुत सेवा सत्कार कर रही थी। माधुरी दादा जी के पास खेल रही थी। माधुरी दो वर्ष की हो गई थी। दादाजी-दादाजी कहते आंगन घर थाने को एक कर रही थी। झालरदास आनन्द से कुछ दिन रहे। फिर रामदास ने माँ के लिए साड़ी, धोती कुर्ता-लुंगी, कुछ खेती किसानी के लिए रुपए देकर शिवरीनारायण वाले बस में मस्तूरी के लिए बिठा देता है। झालरदास मस्तूरी से गाँव पैदल चल कर आ जाते हैं।

मुंगेली थाने में नए थानेदार प्रेमसिंह डहरिया की पदस्थापना होती है। सिंह साहेब ने रामदास के बारे जानकारी दे दी थी। रामदास जोगी, दरोगा साहब के सेल्यूट कर जयहिंद सर कहता है। रामदास आदर से खड़े रहता है। नए अफसर से डरता है। रामदास बैठो। मैं तुम्हारे बारे में सब जानता हूँ। मैं मस्तूरी थाने प्रभारी था। तो नवभारत में तुम्हारे शौर्य की कथा छपी थी। मैं तुम्हारे घर भी गया हूँ। तुम्हारे पिताजी से भी मिला था। बहुत भले आदमी हैं। वैसे टिकारी गाँव बहुत बड़ा है। हमारे समाज वाले बहुत पढ़े लिखे अफसर और कर्मचारी हैं। आसपास के गाँव में इतने लोग शिक्षित नहीं है। रामदास बैठ जाता है। इतना नए अफसर जान गए । अच्छा हुआ नहीं तो मैं परेशान हो जाता। रामदास कुछ देर बैठकर संतोष मिश्रा के पास चला जाता है। मिश्रा कहता है – रामदास तुम्हारे तो पहचान वाले अधिकारी आ रहे हैं। रामदास कहता है – नहीं मिश्रा जी मैं तो पहली बार मिल रहा हूँ। साहब मस्तूरी थाने में थे। इसलिए मेरे गाँव को जानते हैं। रामदास घर खाना खाने चला जाता है। रामवती को नए अफसर केआने की जानकारी देता है। रामवती कहती है कि साहब को भी भोजन करने के लिए बुला लो। रामदास डहरिया साहब से भोजन के लिए आग्रह करता है। साहब सज्जन आदमी थे। साहब स्वीकार कर घर जाने को तैयार हो जाते हैं।

रामवती दूबराज चावल के भात, अरहर दाल, लाल भाजी की साग और टमाटर की चटनी पकाती है। जमीन में चटाई बिझाकर परछी में बैठकर भोजन करते हैं। बड़ा स्वादिष्ट भोजन घी डालकर खिलाती है। साहब भोजन से बहुत खुश हो जाता है। रामवती को धन्यवाद देता है। माधुरी नए साहब को देखती है। दोनों हाथ जोड़कर चरण छूकर प्रणाम करती है। माधुरी को गोदी में उठा लेता है। माधुरी हंसते हुए उतर जाती है। डहरिया साहब कहते हैं – बड़ी प्यारी बच्ची है। भोजन करने के बाद थाने में चले जाते हैं। रामदास थाने में सब समझाता है। मुंशी भी सभि रिकॉर्ड की जानकारी देते हैं। डहरिया साहब रेस्ट हाउस में रुक जाते हैं। जब तक दरोगा साहब का सामान दुर्ग न चले जावे।

प्रेमसिंह डहरिया साहब मस्तूरी थाने में थे। इसलिए परिवार अभी मस्तूरी में था। बच्चे सभी बिलासपुर में किराए के मकान में रहते थे। सभी बच्चों को पढ़ा-लिखा रहे थे। डहरिया साहब मुंगेली से सप्ताह में आ जाते थे। दलगंजसिंह साहब का सामान ट्रक से लदकर दुर्ग के लिए चला जाता है। रामदास सामान पहुंचाकर आता है। प्रेमसिंह यादव चार कोटवार बुलाकर घर की साफ-सफाई कराते हैं। चार दिन बाद मस्तूरी से सामान ट्रक से लदकर आ जाता है। रामदास सभी सामान उतरवाता है। रामवती सभी रसोई के सामान को जमाती है। मिसेज प्रेमसिंह हेमलता बहुत खुश हो जाती है। माधुरी भी दादी-दादी कहकर गोदी में बैठकर खेलने लगती है। सभी सामान जम जाते हैं। रामवती की बाई जी से अच्छी बोलचाल हो गई थी। नए अफसर के आते एक नवयुवती के अंधे कत्ल की सूचना मिलती है। बाजार का दिन था। शहर में चहल-पहल थी। सभी अपनी-अपनी जरूरत की सामग्री खरीद बेच रहे थे। बाजार में अंधे कत्ल की सनसनी फैल जाती है। इसकी सूचना एक राहगीर द्वारा थाने में जाकर दी जाती है। दरोगा साहब रामदास व साथी मिलकर घटनास्थल की ओर जल्दी जाते हैं।

आगर गहरी नदी में लाश पानी में तैरती रहती है। देखने वालों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है। रामदास एक स्वीपर को लाश निकालने के लिए कहता है। लाश खींचकर किनारे ले आता है। साश देखकर रामदास कहता है सर, हत्या बलात्कार का मामला जान पड़ता है। फोटोग्राफर सभी तरफ से फोटो लेता है। लाश का पंचनामा बनाकर शव परीक्षण के लिए शासकीय अस्पताल के चीरघर में भेज दिया जाता है। नवयुवती की पतासाजी की जाती है। पता नहीं चलता। दूसरे दिन समाचार पत्रों में अंधे कत्ल का समाचार फोटो सहित प्रकाशित होता है। सभी बड़े अधिकारी थाने में जमा हो जाते हैं। आरक्षकों को शहर के अपने-अपने मुखबिरों से पतासाजी का काम किया जाता है। परन्तु कोई पता नहीं चलता। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पहले बलात्कर कर बाद में हत्या करने के जख्म मिलते हैं। सभी अधिकारियों ने रामदास से कहा कि रामदास कुछ भी करो। हत्यारों को सजा मिलनी ही चाहिए।

रामदास – जी सर, कहकर प्रयास शुरू कर देता है। रामदास पास के गाँव में पतासाजी के लिए जाता है। गाँव का कोटवार जानकारी देता है – सर रमेश साहू की लड़की दो दिन से गायब है। नाम निर्मला साहू। रामदास कोटवार को डांटता है कि गुमशुदा की रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाई ? उसने कहा – रमेश आज ही बता रहा था कि मेरी लड़की दो दिन से घर नहीं आई है। मुंगेली के मिशन स्कूल में कक्षा आठवीं में पढ़ती थी। रामदास रमेश को लेकर थाना पहुंचता है। रमेश मृतक युवती का फोटो देखकर पहचान लेता है। मेरी बेटी निर्मला है। रमेश दहाड़ मार-मारकर थाने में रोने लगता है। सभी की आँखों में आंसू आ जाते हैं। होनहार लड़की की हत्या हो जाती है। रामदास पानी पिलाकर रोने से शांत कराता है। दरोगा साहब पूछता है – रमेश, कभी किसी ने छेड़छाड़ की शिकायत तो नहीं की थी ? रमेश – निर्मला ने कभी इसकी शिकायत नहीं की थी सर। दरोगा – कुछ दो बताओ। एक दो आवारा लड़कों के नाम तो बताओ, जो आसपास लड़कियां छेड़ने का काम करते थे। पर रमेश किसी का नाम नहीं बता पाता। रामदास मिशन स्कूल के कक्षा आठवीं की शिक्षिका मालिनी मसीह से निर्मला के बारे में पूछताछ करता है। हाजिरी पंजी में निर्मला का नाम दसवें क्रम में रहता है। निर्मला प्रतिदिन स्कूल आती थी। परन्तु दो दिन से नहीं आ रही है। रामदास उसकी हत्या हो जाने की खबर देता हा। हत्या की खबर मिलते ही स्कूल की छुट्टी कर शोकसभा आयोजित कर दी जाती है। सभी शिक्षक हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग करते हैं। रामदास दो-चार बदमाश लड़कों के नाम लिखकर ले आता है। दरोगा साहब को पूरी जानकारी बता देता है। तीसरे दिन गाँव के बीस लोग हत्यारों को पकड़ने के लिए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन देते हैं। मंडावी साहब शीघ्र पकड़ने का आश्वासन देते हैं। प्रेमसिंह साहब की गले की हड्डी बन जाता है। थाने प्रथम केस दर्ज रहता है। दरोगा साहब चिंतित हो जाता है। अच्छा भला था, आते ही ओले पड़ गए। रामदास को बुलाता है, कहता है – तुम अच्चे आदमी हो। तुम्हारा नाम अपराध पकड़ने में अच्छा है। रामदास कहता है – सर, सतनाम की कृपा बनी रहे। आप पर कोई बट्टा नहीं लगने दूँगा। दरोगा साहब ने बताया, पुलिस अधीक्षक, डीआईजी साहब, कलेक्टर साहब भी आज आने वाले हैं। शहर में अशांति फैलने का डर है। पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर साहब, डीआईजी साहब सभी थाने में बैठकर चर्चा करते हैं। उसी समय मिशन स्कूल के लड़के-लड़कियों का जुलूस ज्ञापन देने के लिए आ जाता है। लेक्टर साहब पाँच प्रमुख लोगों को बुलाकर चर्चा कर ज्ञापन ले लेते हैं और लड़कों से कुछ बदमाश लड़कों के नाम पूछता है। एक लड़की बताती है – सर, एक बदमाश लड़का राजेन्द्र मसीह प्रतिदिन स्कूल के पास मंडराते रहता था। परन्तु तीन दिन से गायब है। राजेन्द्र मसीह का पता मिशन अस्पताल के पास बताते हैं। सभी आरक्षकों को सब रामदास को शहर के सभी ठिकानों पर घर को खोजने के लिए पुलिस अधीक्षक ने निर्देश दिए। सभी लड़के-लड़कियां सभी स्कूल-कॉलेज बंद करवा दिए। मुंगेली बाजार भी पूर्णतः बंद रहा। कलेक्टर साहब ने धारा 144 लगा दिया। शांति व्यवस्था भंग न हो। बाजार बंद शांतिपूर्वक निपट जाताहै। सभी अधिकारी शाम को बिलासपुर आवश्यक निर्देश देकर लौट जाते हैं।

प्रेमसिंह साहब की वर्दी शान के खिलाफ अंगुली उछने लगी। सिंह साहब ने राजेन्द्र मसीह के घर में दबिश दी। माँ ने बताया कि तीन दिन से बिलासपुर गया हुआ है। माँ राजेन्द्र की फोटो ले लेता है। राजेन्द्र के रिश्तेदारों के नाम पते भी ले लेता है। रामदास और जानकारी लेकर थाने आ जाता है। रामदास को बिलासपुर भेज कर पतासाजी करने को कहता है। परन्तु राजेन्द्र मसीह बिलासपुर से पेंड्रारोड चला जाता है। बिलासपुर से पेंड्रारोड ट्रेन से रामदास पहुंच जाता है। वहां अपनी बहन के घर ज्योतिपुर में रहने लगता है। ज्योतिपुर जाकर राजेन्द्र मसीह का पता उसकी बहन से पूछता है। सिपाही देखकर पूछती है क्या हो गया है भाई साहब। रामदास को बैठाकर चाय पिलाती है। चाय पीते-पीते रामदास बताता है – बहनजी, मुंगेली में एक युवती की हत्या हो गई है। हत्यारा पकड़ा नहीं गया है। राजेन्द्र का नाम बदमाशों में से है। बहन बोलती है – राजेन्द्र ऐसी गलती नहीं कर सकता। रामदास कहता है कि – बहनजी मिशन स्कूल छात्राओं ने नाम बताया है कि राजेन्द्र को स्कूल के आसपास मंडराता देखा गया था। राधा मसीह कहती है – भइया राजेन्द्र तो सुबह से अमरकंटक घूमने गया है। रामदास को निराशा ही हाथ लगी। पेंड्रारोज थाने में हत्या के बारे में थानेदार साहब को बता देता है। वहीं से टेलीफोन से मुंगेली दरोगा साहब को जानकारी देता है कि राजेन्द्र अमरकंटक गया है। डहरिया साहब निर्देश देता है कि अमरकंटक जाकर पकड़कर लाओ। रामदास जी सर, कहकर टेलीफोन रख देता है।

रामदास थानेदार पेंड्रारोड को सेल्यूट कर जयहिंद कहकर चलने लगता है। दरोगा कहता है कि रामदास तुम्हारे साथ मोटरसाइकिल से हवलदार भेज देता हूं। जल्दी पहुंच जाओगे। रामदास मोटर साइकिल के पीछे बैठकर अमरकंटक की ओर चल पड़ते हैं। जंगली रास्ते से मोटर साइकिल पहाड़ों की चढ़ाई चढ़ने लगती है। अमरकंटक की घाटी बहुत प्रसिद्ध है। घुमावदार घाटी है। लगभग 1600 फुट की चढ़ाई चढ़ जाते हैं। एक अंधे मोड़ में कमांडर जीप पेड़ से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। हवलदार जगताप सिंह बताता है कि कल पाँच आदमियों की चालक सहित मृत्यु हो गई है। चालक को बड़ी मुश्किल से निकाला गया। वह सीट में फंस कर मर गया ।। अमरकंटक के बीहड़ घने वनों को द्खकर मन प्रसन्न हो जाता है। चारों ओर हरियाली ही हरियाली है। अमकंटक के वनों में अरबों-खरबों रुपए के इमारती लकड़ी का भण्डार भरा पड़ा है। रामदास अमरकंटक के दृश्यों को देखकर मोहित हो जाता है। क्योंकि पहली बार आए थे। रामदास जंगलराज के वासी नहीं थे। वे मैदानी इलाके के निवासी थे। जगताप सिंह मोटर साइकिल को मंदिर के सामने खड़ी कर देता है। रामदास को कहता है कि नर्मदा के उद्गम स्थान है। नर्मदा माँ के दर्शन कर चलते हैं। रामदास चारों ओर पैनी निगाह से देखता है, कहीं नजर नहीं आता। रामदास और जगताप नईमदा कुण्ड में स्नान करते हैं। कुण्ड का पानी अत्यधिक ठण्डा रहता है। रामदास डुबकी लगाकर नहाता है। कपड़े पहनकर माँ का दर्शन करता है। मंदिर के सामने एक हाथी की मूर्ति है। जगताप ने मूर्ति के के नीचे से जादू टोना, अस्वच्छ मन से कोई नहीं निकल सकता है। बहुत छोटी मूर्ति है। मूर्तिकार ने बहुत सोच-समझकर बनाया होगा। कई विदेशी महिलाएं उत्सुकतावश मूर्ति के नीचे से हंसते-हंसते निकलने का प्रयास करते हैं, परन्तु पेट के पास जाकर फंस जाते हैं। जगताप विदेशी युवतीके शरीर को तिरछा कर निकालने के लिए बताया। युवती परेशान हो जाती है। रामदास और जगताप दोनों आगे पीछे खींच कर निकालते हैं। सभी विदेशी रामदास जगताप के साथ फोटो खिंचाते हैं। एक फोटो तत्काल खींचकर रामदास को दे देते हैं। जगताप एवं रामदास माता के दर्शन कर प्रसाद नारियल चढ़ाकर मंदिर के बाहर आ जाते हैं। मंदिर के आसपास ढूंढते हैं। मंदिर से माई की बगिया, सोन नदी का उद्गम स्थान जाते हैं। कहीं नहीं मिलता। अमरकंटक के सभी धर्मशालाओं, कपिलधारा, जलप्रपात, सहस्रधारा, बालक नगर रोडवेज द्वारा बाक्साईट ले जा रहे हैं। वहाँ भी देखते हैं, परन्तु कहीं नहीं मिलता। रामदास अमरकंटक से पेंड्रारोड आने के लिए कहते हैं। जगताप सिंह मोटर साइकिल को सीधे कबीर चबूतरा के पास रोकते हैं। कबीर दासजी यहाँ भ्रमण करते हुए आए थे। यहां कुछ दिन संत कबीरदास जी एवं गुरू नानक देव जी की भेंट हुई थी। ऐसा जगताप ने रामदास को बताया। उसी समय बिलासपुर के लिए शहडोल वाली बस मिल जाती है। रामदास जगताप को धन्यवाद देता है। बस में बैठकर बिलासपुर आ जाता है। बिलासपुर से मुंगेली बस में आ जाता है। रामदास पहले थाना में जाकर दरोगा साहब को पूरा वाक्या की जानकारी देता है। सिंह साहब चिंतित हो जात है। रामदास को घर भेज देता है। रामवती तीन दिन से इंतजार करती है। रामदास दरवाजा खटखटाता है। माधुरी अंदर से दरवाजा खोलने का प्रयास करती है। पापा-पापा कहकर अंदर से चिल्लाती है। रामवती सिटकनी खोलती है। सामने रामदास का लटका चेहरा। फिर रामवती कहती है कि पकड़ नहीं सके तो क्या करोगे। आओ अंदर। रामवती बैग कोअंदर रखती है। रामदास माधुरी को गोदी में उठाकर प्यार करने लगता है। रामवती कहती है बच्चे को प्यार, माँ को नहीं। रामदास रामवती के गाल में एक चुम्मा लेता है। माधुरी भी पापा की नकल कर चुम्मा लेती है। माधुरी के दोनों गाल का चुम्मा माँ-बाप लेते हैं। माधुरी माँ, पिताजी के प्यार, स्नेह से खुश हो जाती है। रामदास बैग निकालकर एक खिलौना लड़की के लिए जिसे अमरकंटक में खरीदा था दे देता है।

रामदास को रामवती कहती है – क्या हुलिया बना कर रखा है। मजनूं से दिख रहे हो। रामदास रामवती को पूरी कहानी बताता है। अमरकंटक का वर्णन करता है। रामवती कहती है – अकेले-अकेले देखकर आ गए हमें कब दिखाओगे। रामदास को रामवती नहाने को कहती है। रामदास बाथरूम में जाकर स्नान करता है। रामदास पीठ में साबुन लगाने के लिए रामवती को बुलाता है। माधुरी आ जाती है पापा की पीठ में साबुन लगाती है। नन्हें-नन्हें हाथों के स्पर्श से गुदगुदी होने लगती है। रामदास हंसने लगता है। माधुरी अपने चेहरे हाथ पैर में भी साबुन लगाने लगती है। माधुरी पापा के ऊपर पानी डालने लगती है। रामदास माधुरी को भी नहलाता है। रामवती को पुकारता है। माधुरी को ले जाओ। पानी फैला रही है। रामवती रसोई से निकलकर माधुरी को टावेल से पोंछती है। माधुरी दूसरी बार नहाती है। रामवती माधुरी को कपड़े पहनाती है। रामदास भी कपड़े पहनकर खाना खाने के लिए बैठ जाता है। रामदास रामवती साथ बैठकर भोजन करते हैं। रामवती तीन दिनों से ठीक से भोजन नहीं कर पाई थी। दोनों बातें करते खाना खाते हैं, फिर सो जाते हैं।

रामदास सुबह उठकर राजेन्द्र मसीह की खोज में अस्पताल के पीछे क्वार्टर में जाकर पूछता है। राजेन्द्र मसीह घर में बेफिक्र सो रहा था। रामदास दरवाजा खटखटाकर पूछता है – राजेन्द्र कहां है ? माँ कहती है – सो रहा है। रामदास कहता है – ठीक है, अभी जगाओ। रामदास राजेन्द्र मसीह को साथ लेकर थाने पहुंच जाता है। रामदासडहरिया साहब को बताता है। शीघ्र कपड़े पहनकर थाने में आ जाते हैं। दरोगा साहब आते ही एक थप्पड़ राजेन्द्र मसीह को लगाता है। राजेन्द्र मूर्छित हो जाता है। रामदास उठाकर साहब के आगे खड़ा कर देता है। रामदास कहता है कि तुम सच-सच बता दोगे तो तुम्हें सरकारी गवाह बनाकर छोड़ देंगे। नहीं तो जिंदगी भर हत्या के जुर्म में जेल में सड़ते रहोगे। नहीं बताओगे तो इतनी मार पड़ेगी कि नानी याद जाएगी। रामप्रसाद साहू आरक्षक पीछे से एक लात मारता है। धम से नीचे गिर जाता है।

रामदास समझाता है कि बताओ। राजेन्द्र ना-नुकुर करता रहता है। मिश्रा मुंशी बेंत से पिटाई शुरू करता है। राजेन्द्र मार के मारे रोने लगता है। रामदास पानी लाकर पिलाता है। धीरे से रामदास पूछता है तुम भले आदमी हो। शक-सुबहे में क्यों मार खा रहे हो ? तुम्हारे साथियों ने सब कुछ बता दिया है। सभी तुम्हारा नाम ले रहे थे। तुम्हें फांसी की सजा निश्चित होगी। फांसी के डर से राजेन्द्र मसीह टूट जाता है। रामदास को बताता है कि हत्या मैंने नहीं की है । परन्तु हत्या करते देखा है। मुझे मारने के लिए ले गए थे। परन्तु मैं भाग गया था। घर में आकर मुझे धमकी दिए थे कि तुझे एवं तेरी माँ का कत्ल कर देंगे। तुम गवाही मत देना। मैं जान बचाकर भाग रहा था। रामदास कहता है – तुझे कुछ नहीं होगा। नाम तो बता।

रामदास दरोगा साहब को बुलाता है। दरोगा के समक्ष बोलता है कि मैंने हत्या नहीं की है। परन्तु मैंने हत्या करते देखा था। हमारे मुहल्ले के आनन्द मसीह, नूरखान, शेरसिंह ने बलात्कार करने के बाद हत्या की है। तीन अभियुक्तों को पकड़ने रामदास आरक्षक लेकर दरोगा साहब व रामदास जाते हैं। रामदास एक-एक करके तीनों अभियुक्तों को पकड़कर थाने में बंद कर देता है। रामदास सभी मुजरिमों से हत्या का अपराध कबूल करवा लेता है। बयान लेकर राजेन्द्र मसीह को गवाह बनाकर चालान कोर्ट में प्रस्तुत करते हैं। अभियुक्यों को बिलासपुर जेल भेज दिया जाता है। रामदास की कर्तव्यपरायणता में और वृद्धि हो गई।

मुंगेली थे में जितने भी हत्या के प्रकरण थे, सभी में आजीवन कारावास की सजा हो जाती है। रामदास की छवि दू-दूर तक सराही जा रही थी। रामवती रामदास के कार्यों से अति प्रसन्न होती है। अंधे कत्ल की गुत्थी सुलझ जाती है। डीआईजी साहब द्वारा रामदास को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित करते हैं। समाचार पत्रों में छपे खबर को सुनकर आसकरणदास एवं मंगलीबाई मुंगेली आ जाते हैं। रामवती थाने से रामदास को बुला भेजती है। माधुरी बुलाकर ले आती है। नाना-नानी को पाकर माधुरी खुश हो जाती है। रामदास माँ-बाबूजी के चरण छूकर प्रणाम करता है। रामदास के गौरव से पूरा परिवार गौरवान्वित हो रहा था। आसकरणदास, माँ ने आशीर्वाद दिया। जल्दी से तरक्की हो जाए। रामदास चुपचाप सुनता रहता है। गाँव के हालचाल पूछता है। सभी ठीक बताते हैं। रात में खाना खाकर सो जाते हैं।
 
मुंगेली क्षेत्र में 18 दिसम्बर गुरु घासीदास जयंती बड़े जोर-शोर से मनाते हैं। गाँव-गाँव, शहर-शहर में सफेद ध्वज जैतखाम में फहराते हैं है। सतनाम धर्म की धूम रहतीहै। पास के गाँव लालपुर में मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री कई मंत्रियों के आने की स्वीकृति स्थानीय कार्यकर्ता एवं सरकारी विभागों में आ जाते हैं। जयंती की जोरदार तैयारियां चलती हैं। आसकरण देखने के ले आए थे। रामदास जयंती समारोह के लिए चंदा एवं सहयोग तन-मन से करता है। डॉ. खेलनदास क्षेत्रीय विधायक थे। विधायक महोदय ने रामदास को मुख्य कार्यकर्ता बना दिया था। इधर पुलिस विभाग में ड्यूटी दोनों साथ-साथ कर रहा था। रामदास की मुलाकात विधायक के छोटे भाई खिलावन प्रसाद से हो जाती है। दोनों जी-जान लगाकर जयंती समारोह को सफल बनाने में लगे थे।

18 दिसम्बर के दिन माननीय मुख्यमंत्री जी, केंद्रीय मंत्री जी एवं मध्यप्रदेश शासन के कई मंत्री, सांसद, विधायक समारोह में उपस्थित रहते हैं। जैतखाम में सफेद ध्वज मुख्यमंत्री जी द्वारा पूजा अर्चना कर पंथी गीत, नृत्य के साथ जय सतनाम के नारे के साथ फरहाते हैं। जय सतनाम के नारे सा आकाश गूंज उठता है। लाखों नर-नारी जयंती समारोह में आते हैं। पचास पंथी पार्टियों द्वारा नृत्य गीत का प्रदर्शन किया जाता है। लालापुर को जयंती समारोह के गौरवपूर्ण आयोजन के लिए मुख्यमंत्री महोदय द्वारा विधायक महोदय को बधाई दी जाती है। मुख्यमंत्री एवं केंन्द्रीय मंत्री हेलीकॉप्टर से बिलासपुर जरहाभाठा के गुरू घासीदास जयंती समारोह के लिए उड़ जाते हैं। सभी लोग अपने-अपने घर चले जाते हैं। खिलावन एवं रामदास सभी टेण्ट, माइक सभी सामग्री पहुंचाने में मदद करते हैं। विधायक महोदय ने रामदास को बधाई एवं धन्यवाद दिया। विधायक महोदय गाँव-गाँव के समारोह में रामदास को साथ लेकर जाते थे। रामदास को गाँव-गाँव के लोग जानने लगे। रामदास की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ रही थी। आसकरणदास जयंती देखकर फूलवारी गाँव अपने ससुराल चला जाता है। खिलावन प्रसाद को जानकारी होती है कि रामदास जी के ससुर हैं। बहुत खातिरदारी करता है। आसकरण दास गाँव के दामाद होने के कारण जीजा का रिश्ता निकल आता है। रामदास को भांजा-दामाद मानता है। रामवती भी मामा पाकर बहुत खुश होती है। रामदास हमेशा परिवार सहित फूलवारी गाँव आते-जाते बहुत लोकप्रिय हो रहे थे। आसकरण दास कुछ दिनों के बाद अपने गाँव चला जाता है।

रामदास एवं खिलावन लगभग सौ गाँव के गुरू घासीदास जयंती में शामिल होते हैं। रामदास के हाथों से सभी जैतखामों में सफेद ध्वज फहराए जाते हैं। रामदास महंत के नाम से विख्यात हो गया। यदि किसी गाँव में कोई झगड़ा, सामाजिक विवाद, जमीनी विवाद या छोटे-मोटे झगड़े का निपटारा चुटकी बजाते न्याय कर देता है। सामाजिक बुराई दूर करने, अंधविश्वास को दूर करने जारी शिक्षा पर जोर देने को कहता था। सभी छोटे-बड़े लोग रामदास को दामाद मानते थे। व्यवहारकुशल सामदास सभी लोगों के सुख-दुख का साथी बनते जा रहा था। रामदास दीन-दुखियों केआसरा बन गया था। पुलिस थाने में भी आये दिन छोटे अपराधों का पंजीयन बंद हो गया था। सिंह साहब रामदास को सामाजिक कार्य करने के लिए सहयोग किया करते थे। खिलावन रामदास के घर में रहकर कक्षा दसवीं की परीक्षा देता है और पास हो जाता है। दोनों में बहुत अच्छी मित्रता हो जाती है।

रामदास को मुंगेली थाने में पूरे तीन साल हो जाते हैं। किसी प्रकार की शिकायत अधिकारियों को नहीं मिलती थी। संतोष मिश्रा रामदास के कार्यों की प्रशंसा करते थे। इधर रामदास के पिताजी बीमार पड़ जाते हैं। घर में माँ सेवा करती है। परन्तु दवा, दारू न होने से ठीक नहीं हो पाता। पूरन को मुंगेली भेजकर रामदास को बुला भेजता है। टीबी की बीमारी से झालरदास एकदम कमजोर हो जाता है। रामदास बिलासपुर ले जाकर धर्म अस्पताल में दिखाता है। डॉक्टर आवश्यक जांच कर कुछ दिन के लिए भर्ती कर लेता है। धीरे-धीरे कुछ आराम मिलता है। टीबी का इलाज लम्बा और सालों चलता है। डॉक्टरों ने रामदास को सलाह दी कि सही ढंग से इलाजके लिए सिनेटोरियम पेंड्रारोड में हो सकता है। डॉक्टर पेंड्रा के लिए रिफर कर देता है। झालरदास के साथ वहां माँ रहती है। कुछ दिनों के बाद माँ गाँव आ जाती है। गाँव में घर की देखरेख के लिए कोई नहीं रहता। झालरदास दो वर्ष सिनेटोरियम में रहकर स्वस्थ होने लगता है। रामदास गाँव के सभी खेतों को अपने बड़े पिताजी जगतारण को दे देताहै। घर के देख-रेख मनमोहन करता था। एक प्रकार से सभी जानवर मर गए थे। घर में कुछ बचा नहीं था। झालर अपने इलाज के लिए बची पाँच एकड़ जमीन भी बेच देता है। रामदास इलाज का खर्चा वहन नहीं कर पाता। घर की आर्थिक स्थिति एकदम खराब हो गई थी। रामदास कर्ज में डूब गया था। रामवती बहुत सोच समझ कर खर्च करती थी।

झालरदास को सिनेटोरियम की आबोहवा अच्छी लगती थी। बढ़िया शांत स्वच्छ वातावरण टीबी मरीजों के लिए स्वर्ग था। झालरदास दो साल में ठीक होकर गाँव चला जाता है। रामदास अपने साथ रहने के लिए कहता है। परन्तु झालरदास को गाँव पसंद था। गाँव में एक बकरी लेकर उसके दूध को सुबह शाम पीते थे। अच्छा फायदा हो रहा था। शांति बाई पति की सेवा में लगी रहती थी। घर का धान, चांवल बेच-बेच कर दवाई खरीद रहे थे। झालरदास साल भर बकरी के दूथ से स्वस्थ हो जाता है। घर से तालाब नहर घाट तक धीरे-धीरे जाता है। झालरदास खानपान में पाँच एकड़ खेत बेच देता है। कुल मिलाकर झालरदास के पास दस एकड़ बच पाता है। छत्तीसगढ़ में महा अकाल एवं बीमारी के कारण किसान झालरदास विपन्न किसान बन जाता है। रामदास अपने वेतन से गुजारा करता है।

रामवती रामदास से कहती है माधुरी को कक्षा पहली में शिशु मंदिर में भर्ती करा दो। रामदास माधुरी को भर्ती करा देता है। माधुरी रोजाना रिक्शा से स्कूल जाने लगती है। रामवती रामदास का जीवन अच्छे ढंग से चलने लगता है। सामवती माधुरी को पढ़ाने-लिखाने में व्यस्त रहती है। शाम सबेरे, रोटी, चावल, सब्जी की रसोई कभी-कभी मेहमान आने पर सोंहारी खीर बन जाती है। माधुरी के लिए सुबह नाश्ता दूध बनाती है। माधुरी बहुत वाचाल और चंचल लड़की है। इनके पैर के नुपूर के झनझन आवाज से घर गूंज जाता है। रामवती माधुरी की पायल की चंचलता से प्रसन्न रहती थी। रामवती रामदास से भोजन करने को कहती है कि दूसरे सिपाही के घर में रेडियो, साइकिल, मोटरसाइकिल, सोने-चांदी के जेवरात हर महीने आते हैं। एक तुम हो पाँच साल हो गए एक नाक और एक कान के लिए झुमका तक नहीं खरीद पाए। सभी महिलाएं मुझ पर हंसती हैं। रामदास स्त्री चरित्र कोजानता था। रामवती थोड़ा आंसू टपका देती है। रामदास कहता है कि इस माह वेतन मिलने दो। दूसरे दिन जाकर तुम्हारे लिए खरीद दूंगा। रामवती के आंसू का असर रामदास पर खूब पड़ता है। रामदास ईमानदार सिपाही था। रामदास ने रामवती कोसमझाया कि मैं दूसरे जैसा भ्रष्टाचारी नहीं हूँ। तुम्हीं तो बोली थी, मेरे वीर सिपाही ईमानदारी से काम करना। सो मैं दादा जी के नाम को नहीं डूबा रहा हूँ। दादा जी होते, तो कितना खुश होते। रामदास के आंसू छलक जाते हैं।

रामदास कहता है – रामवती चरित्र बना लो, इज्जत कमा लो, या रुपए कमा लो। दोनों काम एक साथ नहीं हो सकता। फिर घर से कोई सहयोग नहीं मिलता। गाँव के सभी खेती खत्म होगई है। बाबूजी की बीमारी ने कहीं का नहीं छोड़ा है। मैं कुछ रुपए बाबूजी के लिए गाँव भी भेजता हूँ। रामदास कहता है कि जब मुजा पचासी रुपए मिलते थे तो मैं पचास रुपए तुम्हारे लिए भेजता था परन्तु आज मुझे सात सौ रुपए मिल रहे हैं, परन्तु पचास रुपए घर नहीं भेज पा रहा हूँ। रामवती जिस दिन मुझे वेतन मिलता है उसे तुम्हारे हाथ में सौंप देता हूँ। तुम बड़े अर्थशास्त्री बैंकर हो। कैसे घर चलाती हो मैं जानता हूँ। तुम एक नया पैसा बेकार में खर्चा नहीं करती। अपने लिए तुम रंग, मेहंदी, स्नो-पावडर, साड़ी तक नहीं लाती। इस वेतन से ही गुजारा करती हो। फिर यहां दो-चार मेहमान को भोजन कराना पड़ता है। रामदास कहता है – मैं तुझे सुख नहीं दे सका। पर कोई दुख भी तो नहीं दिया। तुम घर की रानी हो। राज कर रही हो। रामवती सिर झुका कर कहती है सब ठीक है परन्तु पड़ोसिन महिलाओं को कौन समझाए ? क्या हम लोग सम्पन्न घर के नहीं थे। गाँव में एक दिन में पचासों आदमियों के लिए भोजन बनाती खिलाती थी। आज तो हम एक गरीब आदमी को भी भोजन नहीं करा पा रहे हैं।

रामदास कहता है – दादा जी की किस्मत से हम लो खा पी रहे हैं। पं. मणिदास महंत जब तक जिंदा ते, घर धनधान्य से भरा था। उसके जाने के बाद घर खाली हो गया है। शायद बड़े बुजुर्ग लोग ठीक ही कहते हैं कि आदमी के सत्कर्म का फल यहीं मिलता है। दादा जी महान आत्मा थे। जहां जाते थे, आदर सत्कार खूब होता था।

भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। रामवती कहती है कि मेरा बेटा बनकर वे मेरी कोख में आ जाते। मैं खुश रहूंगी। रामवती और रामदास की आँखों में आंसू झरने लगते हैं। बड़ा शोक मनाते हैं। माधुरी जग जाती है। मम्मी-पापा को रोते देख स्वयं रोने लगती है। रामवती चुप कराती है – नहीं माधुरी हम लोग तो गप मार रहे थे। तुम्हारे दादा जी के बारे में बातें कर रहे थे। माधुरी पूछती है – क्या नाम था ? रामदास कहता है – पंडित मणिदास महंत, दादी का नाम वेदवती था। माधुरी कहती है कि उनके पिता-माता ने कितना बढ़िया नाम रखा था। रामवती माधुरी को सुलाकर स्वयं सोने का प्रयास करती है। परन्तु नींद नहीं आ रही थी। माधुरी सो जाती है। रामवती धीरे से रामदासको पूछती है – कुछ लेना-देना तो नहीं। रामदास कहता है – दादा जी बहुत याद आ रहे हैं।

मुंगेली तहसील में बरसात के मौसम में बड़ी पीड़ादयक स्थिति रहती है। काली मिट्टी ऊपर से बबूल के कांटे। चिक्कट मिट्टी, हमेशा पैर फिसलने का डर रहता है। बरसात के मौसम भर वहां के लोग सजा काटते हैं। बरसात के बाद मौसम खुशगवार हो जाता है। सभी किसान अपने-अपने खेतों को जोतने-बोने में लग जाते हैं। चना, गेहूं, धनिया, सरसों, मूंग, अलसी, तिवरा, लाखड़ी की बोवाई करते हैं। बीच-बीच में गन्ने की खेती। किसान बड़े समृद्ध हैं। व्यापारिक फसल होने के कारण अधिक अनाज अधिक कीमत में बेचते हैं। धनिया चना सरसों गेहूं अधिक भाव पर बिकता है। हर एक किसान लाखों रुपए के चने, गेहूं, लाखड़ी बेचते हैं। बड़े किसानों के पास ट्रेक्टर भी है। ट्यूबवेल भी कई किसान खुदवा लिए हैं। जनवरी माह में सरसों, गेहूं, दाल, अरहर, धनिया की ळसल देखने लायक रहती है। सरसों फूल से पीली-पीली धरा नजर आती है। धनिया के फूलों की सुगंध सोंधी महक बिखेरती है।

रामदास को खिलावन अपने धनिया, चना के खेत दिखाता है। लगभग सौ एकड़ में रबी फसल बोए रहता है। गेहूं की बाली पकने को तैयार रहती है। फरवरी के अंतिम में सभी फसल पकने लगती है। सभी किसान गेहूं, धनिया, चना की फसल की देखरेख में लगे रहते हैं। खलिहान में फसल को इकट्ठा करते हैं। फागुन मास में पुरवाई चलती है। फागुन के जाते ही चैत माह के आते ठण्डी पुरवाई चलती है। कुछ किसान अपनी फसलों को मिंजकर घर की कोठी में डालते हैं। कुछ फसलों को मुंगेली मंडी में बेच आते हैं। सभी किसानो के हाथों में रुपयों की थैलियां रहती हैं। मुंगेली के लिए आगर एक गंगा सी नदिया जीवनदायिनी है।

खिलावन फसल को मिंजवाने फूलवारी गया था। कुछ फसल को मिंजवाकर घर के कोठी में रख जाते थे। डॉ. खेतान राम विधानसभा सत्र में भोपाल गए थे। गाँव में बड़े भाई परिवार सहित रहते थे। शॉर्ट सर्किट से फसल में आग लग जाती है। सभी फसलें जलकर नष्ट हो जाती है। खलिहान के पास घर में आग पकड़ लेती है। सभी लोग आग बुझाने घर से बाहर रहते हैं। घर में भी भयंकर आग पकड़ लेती है। देखते ही देखते पूरा घर खलिहान धू-धूकर जल जाताहै। एक घण्टे के भीतर सभी लोग उजड़कर आसमान के नीचे आ जाते हैं। सर छिपाने के लिए छत नहीं रहता। खिलावन बहुत रोता है। परिवार के सभी सदस्य जीवित बच जाते हैं। घर में एक बीज अनाज का नहीं बच पाता है। ईश्वर ऐसी विपदा किसी को न दे। रामदास सुनकर तुरंत फूलवारी आता है। साथ में कुछ कपड़े, खाना ले आता है। बच्चों को खाना खिलाता है। गाँव में भयावह स्थिति हो जाती है। टेलीफोन से विधायक महोदय को भोपाल सूचना भिजवाते हैं। विधायक महोदय सब छोड़कर छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से बिलासपुर आ जाते हैं। बिलासपुर से टैक्सी से मुंगेली होकर गाँव पहुंच जाते हैं। घर की स्थिति देखकर दिल दहल जाता है। कल तक गाँव के सम्पन्न किसान बड़े-बड़े घर के मालिक आज पेड़ की छांव में बैठे हैं। आसमान ही सहारा है। विधायक महोदय की आँखों से आंसू बहने लगते हैं। रामदास सांत्वना देता है – मामा जी, सब ठीक हो जाएगा।

रामदास मुंगेली से तालपत्री, पन्नी कुछ बारदाना भरकर टैक्सी से गाँव ले जाता है। घर के बचे ठूंठ लकड़ी से टेंट जैसे झोंपड़ी बनाते हैं। दो-तीन झोंपडियां बनाकर बच्चों को छाया देते हैं। खिलावन व डॉ. साहब सोचते हैं कैसे मकान पुनः बनाया जाए ? खिलावन ने सुझाव दिए कि बगल वाले गाँव की दस एकड़ जमीन को बेच देते हैं। एक लाख रुपए से गाँव में ईटों के मकान बनवाना शुरू करते हैं। जल्दी से तीन माह में चार कमरों का एक मकान बनकर तैयार हो जाता है। मुंगेली में भी विधायक महोदय मकान बनवा लेते हैं। बचे कुछ रुपयों से गेहूं, धान, तिवरा, अरहर खरीद लेते हैं। रामदास खिलावन को अपने घर रखकर पढ़ाता-लिखाता है। खेती किसानी के लिए भूमि विकास बैंक से एक लाख रुपए का ऋण, बीज, खाद, बैला-भैंसा के लिए लेते हैं। इस प्रकार इससे पुनः खेती प्रारंभ कर देते हैं। नए वर्ष में फसल अच्छी होने से घर धनधान्य से भर जाता है। भूमि विकास बैंक का कर्ज धनिया, चना, गेहूं बेचक रचुका देते हैं। परिवार फिर खुशहाल हो जाता है।

रामदास अधिकांशतः थाने में मुंशी का ही काम करने लगा। संतो, मिश्रा ने पूरा काम रामदास को सिखा दिया। सामदास लिख-पढ़ी में पहले से होशियार था ही। फिर रामदास हव्लदार की विभागीय परीक्षा में बैठता है। हजारों सिपाहियों में रामदास प्रथम आता है। वह दो फीते वाला हवलदार बन जाता है। पदोन्नति भी मुंगेली में मिल जाती है। रामदास थाने को घर जैसा चमका कर रखता था। मुंगेली थाने को आदर्श थाना बना दिया था। सभी क्षेत्रों में मुंगेली थाने का नाम ऊपर था। पुलिस अधीक्षक द्वारा सर्वोत्तम कार्य के लिए 15 अगस्त के परेड में उसे पुरस्कृत किया जाता है।

मुंशी रामदास की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ रही थी। इधर मामा ससुर विधायक डर काहे का ? दरोगा तक रामदास से डरते थे। रामदास अपने अफसरों का उचित सम्मान करते थे। इसलिए सभी लोग खुश रहते थे। वहां के गाँवों यदि कोई विवाद हुआ, रामदास को ही बुलावा आता था। गाँव की बैठक में रामदास दोनों पक्षों को सुनकर न्याय के पक्ष में निर्णय देता था। रामदास एक नारियल सतनाम के नाम से लेकर जैतखाम में फोड़ता था। फिर सबको प्रसाद बांटता था। इसलिए गाँवों के छोटे-छोटं अपराधों का एफआईआर दर्ज नहीं होता था। रामदास का नाम लेते ही अन्यायी डर जाया करते थे।

रामदास अक्सर रामवती को बाजार घुमाने ले जाता रहता है। रामवती के पुराने गहनों को बदलकर वह नए गहने भी बनवा देता है। रामवती गहनों में चमकने लगी थी। सभी महिलाएं उसके गहने देखकर तारीफ करती थीं। रामवती ने अपने कानों के कर्ण फूल, चांदी के पाय, सोने की चैन, नाक की लौंग, सोने की दो चूड़ियां, उधारी कर कुछ नगद कर गहने खरीद लिए थे। रामवती बहुत खुश है। जब भी गहने पहनकर निकलती थी, तो मॉडल या हीरोइन जैसी दिखती थी। एक बच्ची की माँ होने के बाद भी वह नवविवाहिता सी लगती थी। गहने से उसके चेहरे में निखार आ जाता है। रामदास चेहरा देखकर खुश हो जाता है। रामवती बिना खिले नहीं रह पाती।
 
खिलावन मेट्रिक पास होकर रायपुर में बीएससी करने चला जाता है। रामदास अब अकेला रह जाता है। एक अभिन्न मित्र चला जाता है। वह रामदास को पत्र लिखता है कि मैं गिरौदपुरी मेला देखने जा रहा हूँ। यदि आप चलो तो टैक्सी-जीप लेकर आ जाता हूँ। खिलावन रायपुर से जीप लेकर मुंगेली आ जाता है। रामवती, माधुरी व रामदास पहले से तैयार बैठे रहते हैं। रामदास तीन दिन की छुट्टी ले लेता है। खिलावन को भोजन खिलाकर मुंगेली से गिरौदपुरी धाम के लिए जीप चल पड़ती है। बिलासपुर में रुककर पानी पीते हैं। बिलासपुर से कुछ खाने पीने की चीजें रख लेता है। जीप नब्बे की रफ्तार से चलती है। शाम चार बजे गरौदपुरी शिवरीनारायण होकर पहुंचते हैं। जीप को सड़क के किनारे खड़ी कर दर्शन करने चल पड़ते हैं। चार किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। क्योंकि सड़क के किनारे दोनों ओर मेला में सामान बेचने वालों की दूकानें लगी रहतीहैं। आदमियों का रेला लगा रहता है। लाखों की भीड़ रहती है। रामदास पुलिस की वर्दी मे रहता है। इसलिए घंटे भर में दर्शन कर लेते हैं। रुक कर जैतखाम में अगरबत्ती जलाते हैं। नारियल को तोड़ते हैं। दोनो हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं। माधुरी का मत्था टिकाती है। रामवती पूजा करती है। लाइन में अपार आदमी। लगभग तीन से चार घंटे बाद संत गुरू घासीदास जी के ररण पादुका (खड़ाऊ) के दर्शन होते हैं। खिलावन जैतखाम के बालाजी का स्मरण करता है। खिलावन को बाबाजी चढ़ जाते हैं। खिलावन भूमि पर लोटने लगता है। झूमने-नाचने लगता है। आदि दर्शनार्थियों की भीड़ में रामदास उठाता है। खिलावन जोर-जोर से चिल्लाता है। बाबा जी की जय हो। सतनाम साहिब की जय हो। सभी सतनामी भाई मन, गुरूजी के संदेश को नहीं मान रहे हो। मांस मदिरा बंद नहीं कर रहे हो, बीड़ी तम्बाकू खा रहे हो। सबका ध्यान खिलावन पर केंद्रित हो जाता है। रामदास उसे पकड़कर अगरबत्ती से पूजा कराता है। अमृतजल छिड़ककर शांत किया जाता है। एकाएक खिलावन को होश आ जाता है। जोड़ा जैतखामा में नारियल फोड़कर पूजा करता है। मंदिर के पास पेड़ मे एक पेड़ में सफेद साँप दुधिया रंग के पेड़ की शाखा में इधर-उधर घूमने लगता है। सभी दर्शनार्थी बाबाजी के रूप में उसे प्रणाम करते हैं। सभी लोग एक दूसरे को बता रहे थे। लोगों में विश्वास है कि सर्प के रूप मे बाबा जी ही दर्शन देते हैं। सामवती माधुरी को सांप दिखाती है। माधुरी देख लेती है। खिलावन अपने कपड़ों से धूल झाड़कर ठीक करता है। दर्शनों के बाद रामदास भोजन बनाने के लिए महराजी गाँव की ओर चल पड़ते हैं। गाँव में एक परछी में भोजन पकाने के बर्तन रामवती उतारती है। पकाने के लिए सभी सामान मौजूद होता है। हेम्डपम्प से पानी लेकर भोजन बनाया जाता है। खिलावन भी तब तक हेण्डपम्प से स्नान करके आ जाता है। रामदास और माधुरी रामवती को सहयोग देते हैं। दाल, भात, सब्जी बनाती है। सब्जी पक रही थी तो खिलावन कहता है कि तुम लोग भी हाथ-पांव धोकर आ जाओ। रामवती, रामदास और माधुरी हाथ-पांव धोते हैं। रात लगभग आठ से अधिक हो जाता है। वहां पर कई दर्शनार्थी दुर्ग, भिलाई, रायपुर से आए रहते हैं। भोजन बनाकर खा पी रहे थे। महराजी मार्ग से छाता पहाड़ जाने का रास्ता है। रामवती चादर बिछाकर रामदास, खिलावन, माधुरी, सुरेश ड्राइवर को भोजन कराती है। आखिरी में भोजन के बाद मोटर सायकल से डी.एस.पात्रे रेंजर साहब पत्नी के साथ आ जाते हैं। रामवती दोनों को भोजन बनाकर खिलाती है। पिकनिक जैसा लगता है। रात उसी परछी में सो कर गुजारते हैं।

गिरौदपुरी मेला में रात्रि कई सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। संत गुरू घासीदास जी के पंथी गोला नृत्य, चौका आरती, नाटक, प्रवचन, पंडवानी, गुरूजी का चरित्र वर्णन विभिन्न शैलियों में कर रहे थे। संत महंत गुरूजी परिवारों द्वारा निःशुल्क भण्डारा खोला गया था। आदमियों का जत्था इतना आ गया था कि सभी पण्डालों में भोज्य सामग्री और पानी खत्म हो गया। पानी के लिए लोग प्यासे ही भटक रहे थे। शासन द्वारा पानी की व्यवस्था थी। परन्तु पर्याप्त नहीं थी। करुणा माता ने सरकारी मेला प्रभारी एसडीएम बलौदा बाजार के घर शिकायत की तब कहीं दूसरे दिन पानी की विशेष व्यवस्था हो सकी। रेस्ट हाउस में विशिष्टजन रुकते हैं। शासन द्वारा मेला समिति बनाई जाती है। उसी के द्वारा सारी व्यवस्था सम्पन्न कराई जाती है। मेला समिति में मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित प्रमुख,सांसद, विधायक और अन्य सामाजिक व्यक्तियों को सदस्य बनाया गया था। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, रायगढ़ के जन समिति के सदस्य थे। मेला में लाखों रुपए का चढ़ावा चढ़ता है। इसे मेला समिति अपने बैंक में जमा करा देती है।

गिरौदपूरी मेला में लाखों नर-नारी गुरू दर्शन के ले आते हैं। बस, जीप, ट्रक, ट्रैक्टर, बैलगाड़ी, पैदल, जिस व्यक्ति को जो भी सुविधा मिल जावे। उसी में बैठकर धर्मालु जन जय सतनाम कहते चले आते हैं। गिरौदपुरी एवं आसपास के गाँवं में जय सतनाम की गूंज से आकाश गुंजायमान हो जाता है। इस पवित्र भूमि की धूल को चंदन समझकर माथे में लगाते एवं शरीर में लगाते हैं। जहां-जहां गुरूजी के चरण पड़े थे, उस माटी की पूजा जन समुदाय करते हैं। ऐसा मेला पूरे छत्तीसगढ़ में कहीं नहीं भरता है। जहां देखो वहां नर-नारियों की भीड़ भक्ती के गीत भजन गाते झूमते रहते हैं। मंदिर के बाहर पहाड़ी पथरीली जगहों पर रुककर भोजन बनाते, खाते और सोते पड़े रहते हैं। वहां की ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब नहीं होता है। यदि किसी व्यक्ति को खाने का सामान नहीं मिलता है तो किसी भी दर्शनार्थी के पास जाकर निःशुल्क भोजन ग्रहण कर सकता है। गुरूजी की विशेष कृपा होती है कि वहां कोई व्यक्ति भूखा नहीं सोता। कहीं न कहीं भोजन मिलता अवश्य है।

रामदास व खिलाव जीप में बैठकर जोंक में स्नान करने जाते हैं। शौच कर के जोंक नदी के स्वच्छ निर्मल धारा में स्नान करते हैं। माधुरी दौड़-दौड़कर पानी में उछल-कूद रही थी। रेती से खेल रही थी। रामवती भी दूर जाकर शौच एवं स्नान करती है। नदी से बाल्टी में साफ पानी भोजन बनाने के लिए लाते हैं। वहां हजारों लोग भोजन बनाने के लिए तैयारी करते रहते हैं। खिलावन जंगल से लकड़ी ले आता है। तीन पत्थर रखकर चूल्हा बना लेते हैं। फिर एक आम पेड़ के नीचे चादर बिछाकर बैठ जाते हैं। पहले भोजन करते हैं, बाद में बर्तन साफ करके जीप में रख लेते हैं।

रामदास खिलावन परिवार सहित जोंक नदी से महराजी होते हुए छाता पहाड़ जाते हैं। जीप को नाले के किनारे बने पार्किंग स्थल में रख देते हैं। वहां से पैदल दो किलोमीटर घने साल के वनों से जाते हैं। वहां सूर्य प्रकाश भूमि पर नहीं पड़ता। सब पेड़ों की छाया में चलते हैं। नाले के पास एक पड़े विशाल चट्टान में गुरूजी ने बैठकर सत्य का ज्ञान प्रत्यक्ष प्राप्त किया था। बाबाजी उस विशाल पत्थर के ऊपर बाबाजी कैसे चढ़े होंगे ? फिर चारों ओर कई ट्रक लकड़ी इकट्ठी करके उसमें आग लगाई गई थी और आग के बीच ध्यान मुद्रा में बैठकर सतपुरुष सतनाम साहब का ध्यान साधा था। अग्नि की ज्वाला से बाबा जी का शरीर तपने लगा होगा। व्याकुल हो गए होंगे। आग की तीव्रता ने पूरे जंगल में हाहाकर मच गया होगा। सभी पशु, पक्षी, शेर, चीता, हिरण, सियार, गाय, बैल, भैंस जंगल छोड़कर भागने लगे होंगे। किसी कु कुछ समझ आया रहा हो या नहीं पर बाब जी तब तक ध्यान में बैठे रह गए थे जब तक उन्हें ज्ञान के दर्शन नहीं हुए। उन्होंने कहा – भले मर जाऊँ। आग से नहीं डरूंगा। अन्त में बाबाजी को सत्य ज्ञान की अनुभूति हुई। कहते हैं इसी समय आकाश में बादल छाए और घनघोर वर्षा हुई। बाबाजी के शरीर में पानी की तेज बूंदों के गिरने से कुछ ठंडा हुआ। चारों ओर की भीषण आग पानी से बुझ गई। बाबा जी ध्यान-मुद्रा छोड़कर नीचे उतर आए और सघन वनों से होकर गाँव गिरौदपुरी में प्रकट हुए। सभि संतों को वहां हजारों नर नारी गुरू दर्शन के लिए खड़े थे। गुरूजी ने सत्य का संदेश जय सतनाम साहब के पाँच नाम का उपदेश दिए। जय सतनाम के आवाज से आकाश गुंजायमान हो गया। गिरौदपुरी के एक-एक कंकड़, पत्थरर, पेड़, पौदे, मिट्टी में गुरूजी का ज्ञान समाया हुआ है।

छाता पहाड़ में जोड़ा जैतखाम संतों ने गड़ाए हैं। बाबा के आकार के विशाल शिलाखंड को भक्तगण पूजते हैं। भक्तगण चट्टान के किनारे-किनारे दरारों में बची हुई राख को ढूंढते हैं। राख को बाबाजी का प्रसाद समझकर दिलक लगाते हैं। रामदास भी माधुरी को गोद में लेकर चढ़ाई चढ़ता है। रामवती नारियल अगरबत्ती लिए धीरे-धीरे पत्थरों को पार करती चट्टान के पास पहुंचती है। हजारों की भीड़, नर-नारी नारियल अगरबत्ती जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं। जय गुरू घासीदास बाबा की जय। जय सतनाम साहेब की। पास में जोड़ा जैतखाम में ज्योति कलश जलाती है। रामदास, माधुरी सभी मत्था टेकते हैं। खिलावन जैसे ही जैतखाम के पास पहुंचता है। खिलावन कांपने लगता है और वहीं पर गिर जाता है। सिर और पैर कोपीटने लगता है। गायक दल पंथी-गीत मांदर की थाप पर गाते रहते हैं। जैसे-जैसे मांदर की धुन बजती जाती है उतना ही ज्यादा वह झूमने लगता है। खिलावन को रामदास पकड़ता है परन्तु पकड़ नहीं पाता। रामदास एक संत को बुलाता है। संत खिलावन पर पानी छिड़कता है। अगरबत्ती जलाकर हाथ में पकड़ाकर पूजा कराता है, पूजा करते ही वह शांत हो जाता है। खिलवान एक शिलाखंड पर बैठकर पसीने को पोंछता है। रामदास गमछा से हवा करता है। थोड़ा ठीक लगने पर विशाल शिलाखंड की परिक्रमा कर रामवती, माधुरी, रामदास और खिलावन नीचे उतर जाते हैं। छाता पहाड़ घने सघन वन में स्थित है। संत गुरु घासीदास जी को सत्यज्ञान की प्राप्ति 1820 में हुआ था। आज से दो सौ साल पहले उस घने जंगल में कोई व्यक्ति नहीं जा पाता रहा होगा। वहां अनेक हिंसक पशुओं का निवास था। ऐसे ही निर्जन स्थान को बाबा जी ने अपने तप स्थल बनाया था। यह आज भी पहुंचविहीन है। वन विभाग गो चाहिए कि वह इसको पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित कर दे। आश्चर्य है कि यहां के हिंसक पशु किसी भी दर्शनार्थी को तंग नहीं करते। रामदास, खिलावन जीप से मंदिर के पास आ जाते हैं। जीप को सड़क के किनारे खड़ी कर देते हैं। वहां से पैदल चलकर मंदिर पहुंचते हैं। मेला में गुरुदर्शन के लिए आसाम, बिहार, जमशेदपुर, कलकत्ता, नागपुर, भोपाल, दिल्ली, उड़ीसा, बंगाल, आंध्रप्रदेश, दुर्ग, राजनांदगांव, रायपुर, बस्तर, सरगुजा, रायगढ़ बिलासपुर जिले से लाखों लोग आए थे। भीड़ की भीड़ दर्शन के लिए आ रही थी। रामदास, रामवती, माधुरी, खिलावन मंदिर के पीछे से अमृतकुण्ड के दर्शन के लिए जाते हैं। एक किलोमीटर की दूरी पर एक कुआं बना हुआ है। उसे रायपुर के तत्कालीन कलेक्टर श्री अजीत जोकी ने पक्का बनवा दिया है। कुएं का पानी शीतल एवं मीठा है। इसे सभी दर्शनार्थी पीते हैं एवं शीशी में भरकर अमृत समझकर ले जाते हैं। रामवती भी बोतल में भरकर पानी रखती है। माधुरी को प्यास लगी रहती है। पानी पीती है। बहुत अच्छा लगता है। पानी पीने से थकान दूर हो जाती है। वहां से एक किलोमिटर की दूरी पर जंगल के भीतर झरने में एक छोटा आकार का कुआं बना हुआ है। वहां बाबा जी स्नान किया करते थे। दो सौ साल पहले पानी का अपार स्थल रहा होगा, परन्तु आज इतना पानी नहीं है। आज भी वहां पर साधु संत बैठकर जाप, ध्यान करते रहते हैं। माधुरी देखकर बहुत प्रभावित होती है। वापस मंदिर के पास बने पंडाल के मंच में श्री देवीदास बंजारे एवं साथियों का पंथी नृत्य हो रहा था। पंथी गीत गाते हुए देवदास धोती, जनेऊ पहने खुला बदन निकलते हैं। एक ताल एवं लय से चीता के चपत चाल झूम-झूम कर नाचन्न मांदर के धुन में नामन्न। रामदास, माधुरी, खिलावन का मन झूमने नाचने लगता है। वह बड़े मोहक ढंग से प्रस्तुति कराता है।

गीत

मंदिरवा मा का करे जइवो।

अपन घर के देवला मनइबो।।

पथरा के देवता हालत न डोलत ऐ

काबर मुड़ पर कहतो।

मंदिरवा म का करे जइवो।।

देवदास द्वारा तीन गीत एक घण्टे में प्रस्तुत किया जाता है। लाखों लोग झूम रहे होते हैं। देवदास लगभग एक सौ साठ देशों में पंथी नृत्य का प्रदर्शन कर सतनाम के ध्वज को विश्व में फहरा चुका है। जय सतनाम के उद्घोष को आकाश में गुंजायमान कर चुका है। देवदास जन्मजात लोक कलाकार हैं। जब वह मंच से चला जाता है तब लाखों की भीड़ तालियों की ध्वनि से स्वागत करती है। श्री पुराणिक लाल चेलक साथियों द्वारा पंथी नृत्य प्रस्तुत करते हैं। लगभग पचास-साठ पंथी पार्टियों द्वारा अपनी-अपनी कलाओं का वृहत प्रदर्शन किया जाता है। दोपहर दो बजे जोड़ा जैतखाम में विजय गुरु द्वारा ध्वजारोहण किया दाता है। संत गुरु घासीदास की जयघोष से आकाश गूंज जाता है। सभी संत, महंत, अधिकारी, गुरु परिवार एकत्र रहते हैं। जय सतनाम का नारा लगाते हैं। गुरु दर्शन करने के बाद मेला की समाप्ति हो जाती है। सभी दर्शनार्थी जैसे आए थे वैसे जाने लगते है। रामदास, खिलावन, माधुरी, रामवती अपने पहचान के गाँव वाले रामसनेही महंत, राजमहंत डी.पी. धृतलहरे, श्री धनेश परला, डॉ. खेलनराम, देवचरण, मधुकर, श्री परसराम, सांसद नरसिंह मंडल, डॉ. विनय पाठक, पूर्व सांसद केयूर भूषण, के.पी. खण्डे, बहादुर सिंह, दलगंजनसिंह एवं अन्य गणमान्य लोगों से मिलते हैं। खिलावन सभी लोगों से परिचय करते हैं। रामदास सभी लोगों को जय सतनाम कहते हैं। रामवती को सबसे मिलकर अच्छा लगता है। रामवती के पिताजी आसकरणदास जी से भी मेले में भेंट हो जाती है। माधुरी नाना के पास हो लेती है और गोद से उतरती नहीं है। रामदास, खिलावन, रामवती सभी जीप में बैठकर शिवरीनारायण महानदी को पारकर आ जाते हैं। महानदी में हाथ पैर धोकर वहां के प्राचीन मंदिर में भगवान जगन्नाथ, समुद्र, बलराम के दर्शन करते हैं। शिवरीनारायण का प्राचीन रामायणकाल से प्रसिद्ध है। महानदी के पावन तट पर बसा शिवरीनारायम भगवान राम शबरी के नाम से पड़ा है। इसी स्थान में वनवास काल में भगवान राम को शबरी ने झूठे बेर खिलाए थे। राम-लक्ष्मण सीता शबरी आश्रम में कुछ दिन ठहरे थे। यहां से कुछ दूरी पर महानदी के ऊपरी क्षेत्र में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। तुरतुरिया नामक स्थान में वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की थी। सीता वनवास, लव एवं कुश की शिक्षा-दीक्षा वहीं हुई थी। इसलिए शिवरीनारायण रामायण, महाभारत काल से प्रसिद्ध है। रामदास खिलावन को बताता है कि यहां से आठ किलोमीटर की दूरी पर खरोद नाम के नगर में लखेश्वर महादेव मंदिर है। जहां शिवलिंग में एकलाख छिद्र हैं। वहां एक लाख चावलके दाने चढ़ते हैं। बहुत प्राचीन मंदिर है। रामदास जीप से मस्तूरी, मस्तूरी से गाँव टिकारी अपने घर आ जाता है। घर के परछी में बैठकर झालर गाँव वाले लड़कों को कथा कहानी सुना रहे थ। सबी लड़के चुपचाप कान लगाकर सुन रहे थे। रात के आठ बजे झालर ने कथा पूरने की बात कही, उसी समय रामदास पहुंच जाता है। जीप दरवाजे में रुकती है। जीप की आवाज सुनकर सभी लड़के पास आ जाते हैं। रामदास, माधुरी, रामवती, खिलावन, आसकरण दास उतरते हैं। लड़के लोग चिल्लाते हैं। मनमोहन भइया के पैर पड़ता है। रामवती माधुरी दरनाजे के पास झालर के चरण स्पर्श कर प्रणाम करती है। माधुरी को झालर चूम लेता है। माधुरी की पायल की आवाज रुनझुन-रुनझुन छमछमाछम करती है। रामवती, माधुरी घर के अंदर चली जाती हैं। शांति भोजन पकाने के लिए सेमी को साफ करती रहती है। माधुरी दादी-दादी चिल्लाकर गोदी में बैठ जाती है। रामवती माँ को चरण छूकर प्रणाम करती है। शांति आशीर्वाद देती है – दूधो नहाओ, पूतो फलो। रामवती हंस देती है। सामवती कहती है माता जी चार लोग और आए हैं। रामवती हाथ-पैर धोकर रसोई बनाने की तैयारी में लग जाती है। शांति लोटे में पानी लेकर दरवाजे के पास रख देती है। रामदास, खिलावन बाबूजी को प्रणाम करके बैठे रहते हैं। झालर आसकरण दास जी से समधी भेंट करते हैं। एक-दूसरे के गले मिलते हैं। रामदास माँ का प्रणाम पैर छूकर करता है। खिलावन दूर से नमस्कार करता है। आसकरण जी दूर से दोनों हाथ जोड़कर जमीन पर बैठ कर प्रणाम करता है। शांति समधीजी को उचित सम्मान देती है। रामदास लोटे के पानी को खिलावन, आसकरणदास जी को पांव धोने के लिए देता है। मेहमान का आदर सत्कार यहीं से शुरु होता है। रामदास ससुर एवं खिलावन को आंगन के परछी में खाट बिछाकर बैठाता है। रामवती लोटे गिलास में पानी पीने के लिए देती है। खिलावन पानी पीता है। एक कमरे में ले जाकर कपड़े उतार लुंगी पहनकर तालाब जाने के लिए तैयार होते हैं। माधुरी दादा जी के पास बैठकर मेला के बारे में बताती है। रामदास टॉर्च लेकर तालाब के घाट में पहुंच जाता है। लोटे में पानी लेकर शौच के लिए अमराई की ओर चले जाते हैं। शौच से निपटकर घाट में आ जाते हैं। खिलावन बड़े तालाब में कमल के फूलों को देखकर खुश हो जाता है। तालाब में मस्त हो, सिर डुबाकर स्नान करते हैं। तालाब से आने तक रामवती दाल, भात, सब्जी, चटनी पकाकर रखती है। रामदास जैसे ही आंगन में आते हैं, रामवती कहती है – भोजन तैयार है। झालर, आसरकरण, रामदास, खिलावन परछी मे बैठकर एक साथ भोजन करते हैं। माधुरी नाना और दादा के साथ भोजन करती है। शांति, रामवती एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। शांति पूछती है कि बहू माधुरी को पांच साल हो गए। अब कुछ नहीं दिखता। रामवती कहती है – माँ अभी नहीं है। रामदास और मुझे दादाजी सपने में आकर मुझसे पीने के लिए पानी मांग रहे थे। माँ जी शायद दादा जी की आत्मा भटक रही है। शांति कहती है बहू तेरा बेटा बनकर आने वाला है। इसलिए पानी पीने के लिए मांग रहा था। रात में खाना खाकर सो जाते हैं।

दूसरे दिन सुबह उठकर रामदास और दोनों मेहमान शौच के लिए नहर पार की ओर जाते हैं। नहर में पानी बहता रहता है। गेहूं के खेत में सिंचाई के लिए पानी छोड़ा गया रहता है। एक किलोमीटर सुबह टहलते-टहलते चले जाते हैं। दूर जाकर नहर के किनारे शौच करते हैं। पुलिया के पास नहर में हाथ मिट्टी से धोते हैं। नहर के किनारे आम के अमराई देखते-देखते तालाब के घाट में आ जाते हैं। भोजवा तालाब बहुत बड़ा तालाब है। तालाब कमल फूलों से पटा रहता है। बतख, ऐरी, बगुला, कई प्रकार की छोटी पनडुब्बी चिड़िया चहक रही थीं। चींची बगुले की कर्र-कर्र आवाज गूंज रही थी। भौरों के दल के दल कमल के फूलों पर मंडरा कर गुन-गुन गीत सुना रहे थे। बहुत ही मनोरम दृश्य था। खिलावन देखकर खुश हो जाता है। आम की अमराई से कोयल, पपीहे की मधुर आवाज सुनाई दे रही थी। शांत वातावरण अतिप्रिय लग रहा था। रामदास घाट पर आकर रुक जाता है। पीपल पेड़ के नीचे बैठ जाता है। पचरी घाट में दातून ब्रश करते हैं। रामदास के पुराने साथी दो-चार आ जाते हैं। रामदास धीरे-धीरे सीढ़ी उतरने के लिए बोलता है। सीढ़ी में काई जमी है। खिलावन के पैर फिसल जाते हैं। वह एकदम गहरे पानी में पहुंच जाता है। रामदास पचरी घाट से धड़ाम से पानी में कूदकर खिलावन को पकड़ लेता है। खिलावन तैरने लगता है। रामदास दोनों तालाब में दूर तक तैरते चले जाते हैं। कमल फूल के कांटे तैरने में लगते थे। पानी कटीले भी बहुत थे और कांटों सेतैरने में तकलीफ होती है। रामदास दूर से कमल फूल माधुरी के लिए लेकर आता है। स्नान करके घर को लौटते हैं। रामवती भी माधुरी के साथ नहाने घाट पर आती है। माधुरी अपने हाथों में पानी लेकर सीढ़ी पर ही नहाने लगती है। रामवती चार सीढ़ी उतरकर नहाती है। रामवती के रूपरंग में निखार आया रहता है। सभी महिलाएं रामवती से पूछती हैं कि और कितने बच्चे हैं ? रामवती कहती है – बस यही एक लड़की है। हमारे लिए लड़का भी है यही है। इसे खूब पढ़ाना है। अफसर, मजिस्ट्रेट, जज साहब बनाना है। आजकल बेटा-बेटी एक बराबर माने गए हैं। आजकल बेटा होने का भी क्या फायदा है। एक बूढ़ी महिला ने कहा – नहीं रामवती वंश चलाने के लिए एक पुत्र तो होना ही चाहिए। कम से कम एक पुत्र जो मरने पर एक मुट्ठी माटी दे। पाँच चुरु का उरई को पानी दे। रामवती ग्रामीण महिलाओं से बहस नहीं करना चाहती। रामवती कहती है – दाई सभीलोग अपनी-अपनी टुरी (पुत्री) टुरा को पढ़ाएं-लिखाएं इसी में भलाई है। मैं पढ़ी-लिखी हूँ। इसीलिए घर को ठीक ढंग से चलाती हूँ। सभी महिलाएं सुनती रहती हैं। रामवती के जेवर, गहनों के देखती रहती हैं। रामवती की पायल छम छम छमाछम कर रही थी। जैसे ही पैर रखती पायल बोल पड़ती थी। रामवती माधुरी को लेकर घर आ जाती है। कपड़े पहनकर रसोई में भोजन बनाने लग जाती है।

रामदास बाड़ी में खिलावन को पेड़-पौधे दिखाने ले जाते हैं। बाड़ी में किनारे-किनारे मुनका, सीताफल, नीम, आम के पेड़ लगे थे। कुएं के पास भुसावली केले के कई घेर (फूल) उतरे थे। माधुरी पापा से पूछती है – पपा क्या है ? रामदास बताता है – केला है बेटी। बाड़ी में भटा, मूली, गोभी, लाल भाजी, लौकी, करेला, सेमी इत्यादि लगाए थे। कुएं से पानी निकालकर सिंचाई की जाती थी। घर में माँ हीसब करती है। पिताजी तो बीमार हैं, टीबी की बीमारी ने उन्हें कमजोर बना दिया है। खेती है उसे अधिया पर दे दिया है।

रामवती दाल, चावल चढ़ाकर, साड़ी में लाल भाजी तोड़ने चली जाती है। धनिया पत्ती, लाल भाजी जल्दी-जल्दी तोड़ती है। बाड़ी से हरी मिर्च तोड़ लाती है। टमाटर भी खूब लगे रहते हैं। पके-पके टमाटरों को तोड़ती है। रामवती जल्दी से भोजन पका लेती है। आठ बजे रामदास, खिलावन, आसकरण और माधुरी भोजन करने बैठ जाते हैं। रामवती भोजन परोसती है। रामदास दाल में घी डलवाता है। दाल, चावल, लाल-भाजी का साग, टमाटर की चटनी खाने में खिलावन को मजा आ जाता है। रामदास कहता है – रामवती के हाथ का भोजन खाने में मजा आता है। मैं तो भर पेट छककर खाता हूँ। रामवती माधुरी को भोजन कराती है। कपड़े पहनकर खिलावन को मल्हार दिखाने ले जाता है। साथ में आसकरण, रामवती और माधुरी जीप में बैठकर धूल उड़ाते चले जाते हैं। टिकारी से बकरकूदा, सेचकरबेड़ा फिर मल्हार पड़ता है। पाँच किलोमीटर की दूरी आधे घण्टे में ही पहुंच जाते हैं। रामदास सबसे पहले डिड़ीनदाई डिडनेश्वरी देवी के दर्शन करने जाते हैं। जीप को मंदिर के किनारे खड़ी कर देते है। नारियल, अगरबत्ती, प्रसाद लेकर देवी में चढ़ाते हैं। रामदास, खिलावन, रामवती अगरबत्ती जलाकर पूजा करते हैं। पूजा-अर्चना के बाद मंदिर से निकलकर खईयां तालाब को देखते हैं। जीप रोककर मेला ग्राउंड में जवालेश्वर महादेव मंदिर में पूजा करते हैं। पुरातत्व विभाग द्वारा निकाली गई विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्ति को देखते हैं। 11वीं से लेकर 6वीं शताब्दी मूर्तियां रखी हुई हैं। खिलावन देखकर खुश हो जाता है। एक विशाल पत्थर पर अठारह हाथ लम्बा चौपहला भवन के लिए किसी समय लाया गया होगा। बीस टन से अधिक वजन से जड़ा हुआ है। बाद में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई की गई। मंदिर के भग्नावशेष दिखते हैं। खुदी के पहले एक नीम पेड़ के नीचे मंदिर के खंडहर दिखते हैं। टीले के रूप में था। पुरातत्ववेत्ता ने गिरे हुए पत्थरों को हटवाया। वहां विशाल मंदिर का गर्भगृह मिला। आज दर्शनीय स्थल है। मल्हार गाँव में जगह-जगह घर-घर में देवी देवताओं के मंदिर हैं। यह प्राचीन नगरी है। किसी समय में समृद्ध राजधानी थी।

खिलावन को मल्हार दर्शन कराकर घर आ जाते हैं। दोपहर का भोजन करने के बाद रामदास, रामवती, माधुरी, बाबूजी माँ से छुट्टी लेकर जीप से मुंगेली रात को आठ बजे पहुंच जाते हैं। खिलावन कहता है – रामदास मेरी परीक्षाएं नजदीक हैं। मैं रायपुर जा रहा हूं। रामदास, माधुरी, आसकरण, रामवती तीन दिन से थके रहते हैं, थोड़ा आराम करते हैं। रामवती भोजन पकाती है। भोजन करने के बाद सभी सो जाते हैं। रामदास रात में ही थाने जाकर मुंशी से कुशल मंगल पूछते हैं। मुंशी बताता है सब ठीक है। रामदास इत्मीनान से बेंच पर सो जाता है। सुबह सात बजे ही जगता है। सुबह की परेड में हाजिर हो जाता है। थानेदार सबको ड्यूटी पर भेज देता है। जब सभी अपने काम पर चले जाते हैं तब रामदास अपने मुंशी का काम करने लगता है।
 
रामदास दोपहर में भोजन करने आता है। माधुरी पढ़कर लौटती है और पाप के साथ बैठकर भोजन करती है। रामवती सबसे बाद में भोजन करती है। कहती है माधुरी को ठीक से पढ़ाना। अगले माह वार्षिक परीक्षा है। रामवती कहती है आप तो बहुत पढ़े-लिखे हैं, थोड़ा पढ़ा दिया करो। रामदास कहता है – मुझे कहां फुरसत है ? मैं दिनभर थाने में सिर फोड़ता हूं। रामवती कहती है – ठीक है मैं पढ़ा लूंगी। रामदास कहता है – तुम मेरी रानी महारानी हो, नाराज क्यों हो रही हो ? तुम नाराज होती होतो तुम्हारे गालों पर गड्ढे पड़ जाते हैं। शर्मिला टैगोर जैसी लगती हो। रामवती कहती है – और नहीं मिला उदाहरण – नर्गिस, मीनाकुमारी, हेमामालिनी, रेखा। रामदास कहता है – बस एक-एक दिन के बाद कहता जाऊंगा। इधर आ जाओ, तुम तो एक अच्छी पत्नी हो। एक हवलदार सिपाही की बीबी हीरोइन बन जाए। मैं इनको क्या नहीं मानता। रामवती कहती है – अब थाने में जाओगे या मगज मारते रहोगे। रामदास जवाब देता है – नहीं, श्रीमती जी। मैं जा रहा हूँ। रामदास थाने में जाकर अपना काम करने लगता है। एक कोटवार आकर बताता है कि गुरुवाइन डबरी में एक ही परिवार के सात लोगों की हत्या, सुदा एवं जैता यादवों ने कर दिय है। गाँव में दहशत है। रामदास इसे जातीय हिंसा मानता है। गुरुवाइन डबरी के सतनामी परिवार के लोगों की हत्या हो जाती है।

मुंगेली क्षेत्र में यादवों और ठाकुरों का आतंक है। रामदास तुरंत थानेदार एम.ए.खान साहब को सूचना देता है। रामदास हत्या का जुर्म दर्ज कर लेता है। अपराध पंजीबद्ध कर थानेदार साहब तुरंत अनुविभागीय अधिकारी पुलिस, पुलिस अधीक्षक, कलेक्ट, एसडीओ को सूचना देता है। तत्काल मोटरसाइकिल से गुरुवाइन डबरी, सोनपुर रामदास को पीछे बैठाकर बंदूक लेकर रवाना हो जाता है। चार सिपाहियों को साइकिल से आने के लिए बोल जाते हैं। मुंशी संतोष मिश्रा को ताने में छोड़ जाते हैं, कोई अधिकारी आए तो, चले गए बोल देंगे। आधे घंटे बाद गुरुवाइन डबरी पहुंच जाते हैं। घर के बाहर गाँव वालों की भीड़ लगी रहती है। थानेदार साहब मोटरसाइकिल दूर खड़ा कर देता है। लाश के पास चला जाता है। तीन लाशें दरवाजे के बाहर गली में पड़ी हुई थी। घर के आंगन में दो महिलाओं एवं दो बच्चों की लाशें पड़ी थी। सबकी सामूहिक हत्या, फरसा, लाठी, भाले से की गई थी। बड़ा वीभत्स दृश्य था। जो देखे उसी की आँखों में आंसू टप-टप झर रहे थे। रामदास स्वंय रो उठता है। दो मासूम बच्चों का सर धड़ से अलग कर दिए गए थे। अन्य बड़े लोगों के भी सर काट दिए गए थे। बड़े निर्मम ढंग से हत्या की गई थी। थानेदार साहब, साक्ष्यों का बयान लेता है। कई लोगों ने हत्यारों को भागते देखा था। हत्यारे भागते-भागते यह भी कह गए थे जो गवाही देगा उसे व उसके परिवार सहित हत्या कर दी जाएगी। आसपास के गाँवों में हत्या की प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई थी। गाँव-गाँव में सशस्त्र लोग इकट्ठा हो रहे थे, हथियारबंद हो रहे थे। सभी को जान की सुरक्षा का भय सताने लगा था। गाँव-गाँव से लोग देखने आने लगे। गाँव के एक मुखिया सम्पन्न किसान की हत्या की गई थी। जो चन्दा एवं खाद्य सामग्री नहीं देने देता था, बल्कि गाँव में हत्यारों का विरोध करता था। उससे वे सारे अभियुक्त भयभीत थे। रामदास सभी लोगों को समझाता है। हत्यारों को शीघ्र पकड़कर जेल में बंद करा देंगे। लाशों को पोस्टमार्टम के लिए मुंगेली अस्पताल लाया जाता है। फिर रामदास पोस्टमार्टम के लिए लाश भिजवा देता है। सामूहिक हत्या की सूचना पाकर कलेक्टर, डीआईजी, पुलिस अदीक्षक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक घटनास्थल का मुआयना करने दल बल के साथ पहुंचते हैं। रामदास व थाने मोटरसाइकिल से पहले पहुंच जाते हैं। गाँव के लोगों से पूछताछ और जानकारियां लेते हैं। कलेक्टर साहब का मनबेधी बघेल मुखबिर है। महाराज – इस क्षेत्र में यादवों एवं ठाकुरों का आतंक है, इसलिए सतनामी लोग जान बचाकर एक गाँव से दूसरे गाँव भाग रहे हैं। वे हमारी बहू-बेटियों की इज्जत लूट रहे हैं। धन सम्पत्ति भी लूट रहे हैं। एक लाख रुपए की मांग भेजी थी। नहीं तो हत्या कर देने की धमकी दी थी। आज दिन दो बजे समूह में दस बारह लोग सशस्त्र लाठी, तलवार, फरसा, भाला लेकर आए थे। पैसे की मांग रखी, नहीं देने पर परिवार के सारे सदस्यों सहित आक्रमण कर हत्या कर डाली एवं घर से सारे जेवर, रुपए-पैसे लूटकर ले गए। बड़ी निर्ममतापूर्वक हत्या की गई सर ! क्षेत्र के गाँव-गाँव में हत्या की खबर पहुंच गई है। यदि हत्यारों को गिरफ्तार नहीं किया गया तो शांति भंग हो सकती है। कलेक्टर साहब की आँखों में आंसू आ गए। उधर सारे अधिकारी भी अपने रुमाल से आंसू पोंछने लगे। बड़ी गमगीन स्थिति बन गई। कलेक्टर साहब ने मृतक परिवारों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। मृतक के भाई ने कहा – सर हमें सहायता नहीं चाहिए बल्कि हत्यारों को जल्दी पकड़वा दें। पुलिस अधीक्षक आश्वासन देते हैं। चार सशस्त्र गार्ड गाँव में सुरक्षा के लिए तैनात कर जाते हैं। रात को मुंगेली थाने में आकर बैठकर अधिकारी विचार-विमर्श करते हैं। आसपास के थानों से पुलिस फोर्स बुलवा लेते हैं। सभी थाने हत्या की सूचना भिजवा देते हैं। हत्यारों को पकड़ने के लिए आधएश प्रसारित कर देते हैं। हत्यारे पथरिया थाने की ओर भागे थे। दूसरे दिन अखबारों में गुरुवाइन डबरी हत्याकांड मुख्य पृष्ठ पर फोटो सहित प्रकाशित होता है। दूसरे ही दिन मुंगेली, पण्डरिया, कुण्डी, लोरमी, पथरिया आदि क्षेत्रों में सबको जानकारी मिल जाती है। सबी क्षेत्रों से हत्यारों को पकड़ने की मांग तेज होने लगती है। सांसद, विधायक, जन प्रतिनिधि, मंत्री सभी गाँव पहुंचते हैं। पीड़ित परिवार को सहायता देने का आश्वासन देते हैं। उधर विधानसभा में इस हत्याकांड पर गर्मागरम चर्चा होती है। गृहमंत्री ने आश्वासन दिया कि शीघ्र हत्यारों को पकड़ लिया जाएगा। परन्तु हत्यारे इधर-उधर भागते फिर रहे थे। पकड़ में नहीं आ रहे थे। वे रामदास के लिए चुनौती बन गए थे। थानेदार साहब ने रामदास से कहा जैसा भी बने उन्हें पकड़ो। नहीं तो हम लोगों की खैर नहीं। लोकसभा में मिनी माता सांसद बिलासपुर ने इस हत्याकांड को जोरदार ढंग से रखा कि मेरे पुत्रों की हत्या छत्तीसगढ़ में हो रही है। सामूहिक रूप से एक साथ सात लोगों की हत्या और हत्यारे शहर में खुले घूम रहे हैं। मैं ये सब बर्दाश्त नहीं करूंगी। मिनी माता की आँखों से आंसू झर-झर बहने लगते हैं। सभी सांसद एक महिला सांसद को रोते देखकर गमगीन हो उठते हैं। पूरा संसद शोक में डूब जाता है। श्रीमती इंदिरा गांधी गृहमंत्री से बोलती हैं हत्यारों को शीघ्र पकड़ने के लिए। मध्यप्रदेश शासन के निर्देश दें। गृहमंत्री संसद में आश्वासन देते हैं कि मैं मुख्यमंत्री को फोन से निर्देश दे रहा हूँ कि अपराधियों को शीघ्र पकड़ा जाए। मुख्यमंत्री तुरंत मुंगेली जाने के लिए कलेक्टर बिलासपुर को कहते हैं। कलेक्टर, कमिश्नर, आईजी, डीआईजी, पुलिस अधीक्षक मुंगेली के लिए रवाना हो जाते हैं।

रामदास लाश की पोस्टमार्टम शव परीक्षण गृह में कराकर जेल गाड़ी में भरकर परिजनों को सौंप देता है। शवों को गुरुवाइन डबरी में ले जाकर मुक्तिधाम में दफन कर दिया जाता है। वहां आसपास के हजारों लोग मिट्टी में सम्मिलित होते हैं। सभी लोग संकल्प एवं कसमें खाते हैं कि अब जो भी सतनामी भाइयों की हत्या करेगा उसकी भी हत्या कर दी जाएगी। हत्या का बदला हत्या से लिया जाए। उग्र भीड़ के रूप में सभी लोग वहां संगठित हो गए। पूरे क्षेत्र से आवाज उठने लगी थी। क्रिया कर्म कर सभी अपने गाँव चले गए थे। कमिश्नर, कलेक्टर सभी थाने में बैठकर आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। लालपुर में हेलीकॉप्टर उतरता है। साथ विधायक डॉ. खेलनराम अनुसूचित जाति मंत्री गणेशराम अनंत भी आते हैं। श्री गणेशराम अनंत भी मुंगेली के विधायक रह चुके थे। मुख्यमंत्री महोदय रेस्ट हाउस आते हैं। अधिकारियों से आवश्यक चर्चा करते हैं। अपराधियों को शीघ्र पकड़ने हेतु पुलिस अधीक्षक महोदय को डांट लगाते हैं। पुलिस अधीक्षक अपने नीचे वाले अधिकारियों को डांट लगाते हैं, क्राइम अधिकारियों को तीन दिन के भीतर अपराधियों को पकड़ने की हिदायतें देते हैं। मुख्यमंत्री महोदय, गणेशराम अनंत, डॉ. खेलनराम, कार में और गुरुवाइन डबरी के दो थानेदार, रामदास पहले मोटरसाइकिलों पर पायलेटिंग करते गए। गाँव से बाहर दूर कारें, जीपें खड़ी कर पैदल गाँव जाते हैं। एक काफिला के रुप मे जा रहे थे। कलेक्टर ने मुख्यमंत्री से कहा – सर, मैं कल आया था। सहायता करने का आश्वासन देकर गया हूं। मुख्यमंत्री ने कहा – ठीक है। और चलने लगते हैं। तेज तर्रार आईसीएस श्री गणेशराम अनंत जी ने पुलिस अधीक्षक को डांटते हुए कहा – मिस्टर अपराध बहुत बढ़ रहे हैं और एक ही जाति के लोगों पर अत्याचार हो रहा है। रोको, नहीं तो अपना सामान बांध लो। मुख्यमंत्री ने अनंत जी को रोका। यहां संतप्त परिवार के आंगन में गए। स्थल को देखा। बरामदे में खाटें बिछाई गई थी। मुख्यमंत्रीजी, मंत्री, विधायक सभी खाटों में बैठे। ग्रामीणों से मिले एवं मृतक व्यक्ति के छोटे भाई से भी मिले। मुख्यमंत्री जी ने सांत्वना दी, कहा – भगवान की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती। अभी तक साथ रहना था। मुख्यमंत्री कलेक्टर को संतप्त परिवार के एक वयस्क सदस्य को सरकारी नौकरी में रखने एवं राज्य शासन की ओर से एक लाख रुपए देने की घोषणा करते हैं। गाँव में छह माहतक पुलिस चौकी खोलने के लिए पुलिस अधीक्षक को निर्देश भी देते हैं। इस जघन्य हत्याकाण्ड से मुख्यमंत्री का दिल दहल जाता है। अन्य मंत्री और विधायक तो फूट-फूट कर रो पड़ते हैं। हत्यारों ने मासूम बच्चों को भी नहीं छोड़ा था। मुख्ममंत्री हेलीकॉप्टर से भोपाल चले जाते हैं। गृह विधायक को स्थिति सम्भालने के लिए छोड़ जाते हैं।

गुरुवाइन डबरी में दशकर्म के दिन पाँच हजार लोग बहुत दूर-दूर के, बिलासपुर, दुर्ग, रायपुर, राजनांदगांव के प्रबुद्ध सतनामी, नैतन, मण्डारी, महंत गुरू, गोसाई सभी लोग सम्मिलित होने आए हैं। एक बड़ी सभा होती है। सभी एक होने, संगठित होने के लिए संकल्प लेते हैं। डॉ. खेलनराम सबको संगठित रहने के लिए कहते हैं। इस हत्या के लिए सरकार की कटु आलोचना करते हैं। दशकर्म में सभी नहाते एवं सामूहिक भोज खाकर रात में अपने-अपने घर जाते हैं। रामदास भी भोज में सम्मिलित होता है। रामदास भी संकल्प लेता है कि जब तक मैं हत्यारों को पकड़ नहीं लूंगा, घर नहीं जाऊंगा। वहीं से चार सशर्त्र सिपाही लेकर पैदल गाँव-गाँव खोजने चल देता है। रामदास एवं उसके सहयोगी सिपाही दिन-रात चलते थे। गाँव-गाँव में रामदास का स्वागत एवं भोजन की व्यवस्था होती थी। आवश्यक पूर्ण सहयोग ग्रामीणों से मिल रहा था। नौजवान युवक भी साथ-साथ चलने लगे थे। रामदास को तीन दिन बाद ग्राम साकेत मुंडीपार के जंगल में उनके होने की खबर मिली। हत्यारे नदी के किनारे मिले। एक साथी भोजन पानी के लिए गया था। उसने ग्रामीणों को धमकाकर भोजन की मांग की। ग्रामीण युवकों ने उसे पकड़कर जमकर पिटाई की और मंगल सिंह को रस्सी से बांधकर बैठा लिया। रामदास भी उस गाँव पहुंच गया। उसके साथियों ने खूब पुलिस पिटाई कर पूछना शुरू किया। आखिर में हत्या कबूल कर उसने अपने साथियों के बारे में जानकारी दे दी। रामदास सशस्त्र सिपाहियों के साथ-साथ गाँव के दस जवान नवयुवकों को लेकर मंगलसिंह के साथ नदी किनारे आधे घंटे में पहुंच गए।

मंगल सिंह को पूरी रात मार पड़ती रही। मंगल संह जोर से चिल्लाया पुलिस, पुलिस। रामदास ने दो लात और मारा। आरक्षकों ने भी पिटाई की। जैता रावत एवं उसके साथियों ने आवाज पहचान ली औरनदी के पार पानी के रास्ते भागने लगे। रामदास व साथियों ने दैड़कर तीन आदमियों को पकड़ लिया. शेष आधे नदी के मंझधार में पहुंच गए थे। रामदास ने आवाज दी – रुक जाओ, नहीं तो गोली मार दी जाएगी। रामदास हवाई फायर करता है। सामने वाला शेर सिंह यादव वहीं खड़ा हो जाता है। बीच नदी में वे लोग डर के मारे कांपने लगते हैं। रामदास फिर दो फायर करवाता है। अगर जंगल के बीच नदी में गोली पड़ती है। मछलियां तड़प-तड़प कर मर जाती हैं। मछलियों के रक्त से पानी लाल हो जात है. सबके बीच लाल पानी बहने लगता है। गोली चलने की आवाज सुनकर नदी किनारे उस पार भीड़ बढ़ने लगती है। भीड़ से मारो-मारो सालों को की आवाज आने लगती है। उधर भीड़ में लाठी सब्बल वाले लोग नदी के किनारे पानी में आ जाते हैं। रामदास फिर चिल्लाता है यदि भागोगे तो मारे जाओगे। गिरफ्तार हो जाओगे तो शायद जान बच जाए, जैता यादव वृद्ध रहता है। सभी को समझाता है। चारों ओर से घिर गए हैं। उधर भी खतरा है। इसलिए गिरफ्तार होना ठीक है। रामदास हथियार को नदी के किनारे फेंकने को कहता है। सभी अपने अस्त्र-शस्त्र जमीन में फेंक देते हैं। सभी पानी से बाहर आ जाते हैं। रामदास व साथी चारों ओर से घेर लेते हैं। रस्सी हथकड़ी से दोनों हाथों को बांध देते हैं। रामदास व साती गांव वाले लड़के सभी पैदल चलकर रात भर में मुंगेली थाना पहुंच जाते हैं। रामदास सबको लॉकअप में बंद कर देता है। रामदास थानेदार साहब को जानकारी देता है। लॉकअप में बंद कर दिया हूँ। बहुत जोखिम एवं जान को खतरे में डालकर गिरफ्तार किया है। वहां के ग्रामीण नव युवकों के सहयोग की जानकारी देता है। थानेदार खान साहब की इज्जत बच जाती है। थानेदार साहब चायपीकर थाने पहुंचता है। सभी अखबारों को जानकारी पहुंचाता है। रामदास को धन्यवाद देता है। रामदास को नहाने-धोने के लिए छोड़ देता है। रामदास अपने निवास में सभी लोगों को ले जाता है। रामवती माधुरी को जगाता है। रामवती दरवाजा खोलती है, रामदास को देखकर खुश हो जाती है। भीड़ को देखकर घबरा जाती है। रामदास बताता है कि पकड़ने में इन लोगों ने सहयोग किया है। रामवती सबके लिए चाय बनाती है। रामदास सभी को सहयोग के लिए धन्यवाद देता है। युवक लोग बोलते हैं कि हत्यारों को पकड़वाना हमारा दायित्व था। सो हमने किया। सबी लड़के चाय पीकर अपने-अपने गाँव चले जाते हैं। थानेदार श्री खान साहब टेलीफोन से पुलिस अधीक्षक बिलासपुर को हत्यारे गिरफ्तार होने की सूचना देते हैं। पुलिस अधीक्षक द्वारा आईजी, डीआईजी, कलेक्टर, कमिश्नर को गिरफ्तारी की सूचना देते हैं। कलेक्टर महोदय द्वारा मुख्यमंत्री को जानकारी दी जाती है। मुख्यमंत्री फोन से नई दिल्ली सांसद मिनी माता को जानकारी देते हैं। मिनी माता प्रधानमंत्री, गृहमंत्री को धन्यवाद देती है। कलेक्टर, कमिश्नर, पुलिस अधीक्षक, डीआईजी, आईजी वरिष्ठ अधिकारियों का दल प्रेस फोटोग्राफर सहित प्रेस क्लब के अध्यक्ष सहित मुंगेली के लिए प्रस्थान करते हैं। मुंगेली थाने में हत्यारों को देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती है। सभी अधिकारी ताने में बैठकर अपने बयान दर्ज कराते हैं। श्री खान थानेदार त्वारा रामदास के सहयोग से सभी अभियुक्तों की हत्या कबूल करे के बयान देते हैं। सभी खूंखार अपराधियों को पकड़ने वाले रामदास हवलदार को आईजी साहब ने एक हजार रुपए ईनाम एवं प्रशंसा पत्र 15 अगस्त को बिलासपुर में गृहमंत्री के हाथ से देने की घोषणा करते हैं। रामदास को सभी अधिकारी गिरफ्तारी करने के लिए बधाई देते हैं। रामदास को कई पुरस्कार मिल गए थे इसलिए रामदास ने मैंने अपना कर्तव्य मानकर किया हूँ सर, कहकर ईनाम के लिए आभार व्यक्त करता है। भीड़ में रामदास जिंदाबाद के नारे लगते हैं। रामदास हाथ जोड़कर नमस्कार करता है।

शासन द्वारा मुंगेली थाने के सभी स्टाफ, अफसरों को विभिन्न थानों में स्थानांतरित कर ज्वाइन करने के निर्देश होते हैं। रामदास मुंशी का पाली थाने में स्थानांतरण होता है। सभी लोग अपना प्रभार देकर चले जाते हैं।
 
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