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पछतावा
भयानक काली रात थी। बारह बज रहे थे। मूसलाधार बारिश हो रक रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजलियों की कौंध से जी घबरा जाता था। काश ! बिजली न टूट पड़े। गाज न गिर जाये। मेंढकों की टर्राहट और झींगुरों की झनकार डरावनी लग रही थी। जुगनुओं की लप-लप चमक दूर-दूर तक दिखाई पड़ती थी। लगातार सात दिनों से झड़ी लगी हुई थी बरसात की। जिधर देखो नदी, तालाब, नहर, गड्ढों, सड़कों, गलियों और खेत-खलिहानों में पानी ही पानी नजर आता था।
उधर बादल गरज रहे थे और इधर शांति बाई मारे प्रसव पीड़ा के बिस्तर पर लोट-पोट हो रही थी। उसके पति झालर महन्त सोच में डूबे सिर पर हाथ धरे असहाय से बैठे थे। सोच रहे थे कैसे रात कटे और वह तड़के ही जाकर बिसाहिन दाई को जचकी कराने ले आये। शांति बार-बार कराह रही थी। कभी-कभी रोती और चिल्लाती भी थी। सुबह पाँच बजे मुर्गें की बांग सुनाई दी। चिड़ियों की चहचहाहट होने लगी थी। पास के मकानों में बात करने की आवाज सुनाई देने लगी थी। झालर ने शांति के सिर में बालों को सहलाया और कहा- देखो सुबह हो गई है। प्रसव की उम्मीद से शांति एवं झालर रात भर जागते रहे थे। झालर ने कहा “मैं भौजी के नाई को बुलाकर लाता हूँ”। झालर ने दरवाजा खोलकर देखा पानी बरस रहा था। छत्ता तानकर वह बाहर निकला। दरवाजे से चिल्लाया भौजी…भौजी दरवाजा खोल। केजा कौन है किसकी आवाज है, कहकर दरवाजा खोलकर बाहर निकली। दरवाजा के सामने कांपते हुए स्वर में झालर ने कहा – भौजी जल्दी चल, शांति की पीड़ा बढ़ गई है। रात भर सो नही पाया हूँ। शायद बच्चा होने का समय आ गया है। सुन शांति जोर-जोर से चिल्ला रही है। केजा बोली तुमने पहले क्यों नही बताया। मैं रात वहीं सो जाती। जल्दी-जल्दी केजा को लेकर झालर छत्ता उसे ओढ़ाकर ले चला। घबरागट में बोला शांति की पीड़ा और बढ़ गई थी। देखो तो कितनी जोर-जोर से चिल्ला रही है। केजा सिर पर हाथ रखकर प्यार से बोली- घबरा मत अब मै आ गई हूँ। सब कुछ ठीक हो जायेगा। फिर झालर से कहा तुम बाहर जाओ। कपड़ा, रेजरपत्ती, गरम पानी की व्यवस्था करो।
झालर महंत परछी में रखे गोरसी में तवेले रख पानी गरम करने रख दिया। झालर की उत्सुकता बढ़ने लगी लड़का होगा या लड़की। शांति की पीड़ा और बढ़ गई। आई माँ केजा ने कहा- जरा जोर से धक्का दे बच्चे का मुंह बाहर आ गया है। शांति को भी कहा गया जरा जोर से दम लगा। लम्बी सांस लेते हुए शांति जोर से चिल्लाती है। आई आँ...... बच्चा धम्म से बाहर आ गया। केजा ने बच्चे को सम्हाला। शांति पसीने से लथपथ थी। बच्चे के बाहर आने से शांति को हल्का महसूस होने लगा। केजा ने बच्चे को उठाकर देखा बच्चा स्वस्थ, सुंदर था। केजा ने बच्चे को हाथ से साफ किया। कैसे नहीं रो रहा है, कहकर सीने को दबाया। हाथ, पैर हिलाया, डुलाया। बच्चे के रोने की आवाज आई। एहेंव, अहेंव बाहर झालर बच्चे की रोने की आवाज सुनकर कहा – “भौजी का होये हे ?” भौजी ने कहा – “लड़का हुआ है।” गरम पानी हुआ कि नही। नया रेजर, ब्लेड ले आओ। झालर ने गरम पानी, रेजर ब्लेड दे दिया। उसने झांककर देखा कि शांति चुपचाप शांत पड़ी है। बच्चा रो रहा है। केजा शांति के कपड़े बदलती है। आवश्यक साफ-सफाई करती है। बच्चे के नये ब्लेड से नाल काटती है। खून नार फांस को अलग कर साफ करती है। शांति को नये कपड़े पहनाती है। आवश्यक हिदायत देती है- उठने-बैठने खाने-पीने की। बच्चे को गुनगुने पानी से साफ करती है, नहला-धुलाकर साफ कर बच्चे को सौंपती है। शांति सिने से लगाकर माथे से चुम लेती है। शांति के चेहरे पर चमक आ जाती है। शांति मुस्कराकर कहती है- मेरे लाल आ जा। माथे से चुमकर सिने से लगा लेती है। प्रसव पीड़ा से थकी रहती है। गहरी नींद में सो जाती है। केजा बच्चे को लेकर झालर की गोद में पकड़ा जाती है। झालर बच्चे को सीने से लगाकर घूमने लगता है। झालर का पहला पुत्र हुआ है। वह बच्चे को पाकर बरामदे में नाचने लगता है। पास के मकान वाले सभी मुहिलाओं को पता चल जाता है कि शांति को लड़का हुआ है। एक-एक करके बच्चा दखने आने लगते हैं। बड़े भाई महंत जगतारण दास अपने लड़के मनमोहन दास पुत्री सत्यवती,सुभद्राबाई को लेकर आ गए। गाँव में शोर हो जाता है कि झालर महंत का लड़का हुआ है। गाँव में खुशी-आनंद का माहौल हो जाता है। सभी बच्चे को प्यार-दुलार कर गोदी में लेते हैं।
झालर लड़के होने से खुश हो जाता है। गाँव भर में शक्कर बंटवाता है। हंस-हंसकर गाँव वालों को बताता है कि उसका लड़का हुआ है। शांति भी खुश रहती है। छह दिन बाद छट्ठी होती। शांति को स्नान कराया जाता है। शांति को नये वस्त्र पहनाये जाते हैं। शांति अब दुबली छरहरी दिखने लगती है। छट्ठी में शांति के माँ-बाप, भाई-बहन, बुआ सभी आते हैं। शांति को विशेष पेय “काके पानी” पिलाया जाता है। इसके बाद दालभात, मुनगा, बड़ी की सब्जि खिलाया जाता है। माँ द्वारा सोंठ, तिल, गुड़ से लड्डू पौष्टिक औषधि खिलाया जाता है। झालर महंत अपने रिश्तेदारों को छट्ठी का निमंत्रण देता है। गाँव भर को निमंत्रण दिया रहता है। गाँव के गोतियार और सभी गाँव वालों को खाने, काके पानी पिने के लिए बुलाता है। झालर महंत पास के गाँव मस्तूरी से लाउड स्पीकर लाकर बजाता है। गाँव में लाउड स्पीकर में फिल्मी तथा छत्तीसगढ़ी गाने बजते हैं। पास के गाँव से बाजे बुलाए जाते हैं। गाँव भर में उत्सव का माहौल हो जाता है। सभी प्रसन्न चित्त आनंद से भोजन ग्रहण करके तृप्त होते हैं। झालर महंत के बड़प्पन को सभी स्वीकारते हैं। पुत्र-प्राप्त पर सभी बधाई देते हैं। झालर महंत सभी अपने संबंधियों को नयी साड़ी, धोती, गमछा, लुंगी भेंट में देते हैं। शांति बाई सभी रिश्तेदारों से नए जन्म होने व पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु आशीर्वाद ग्रहण करने हेतु पैर छुकर प्रणाम करती है। माँ, बाप, सास-ससुर सभी आशीर्वाद देते हैं दूधों नहाओ, पूतों फलों, जुग-जुग जियो। छट्ठी के बाद सभी अपने-अपने घर चले जाते हैं। मात्र शांति की माँ श्यामाबाई बच जाती है। शांति की सेवा सुश्रुषा एक माह तक करती है। प्रसव के बाद आई कमजोरी को शक्तिवर्धक आहार देकर पूर्ति कर दी जाती है। प्रसव के बाद महिलाओं को उचित आहार से भोजन खाना चाहिए तभा बच्चों के लिए पर्याप्त मात्रा में दूध उपलब्ध हो पायेगा। शांति का आहार दुगना हो गया था। झालर शहर से फल लाकर देता है।
झालर महंत के पिता श्री मणिकदास बाहर गाँव से आते है। माँ देववती भी बहुत खुश होती है। वे बालक का नामकरण रामदास रखते हैं। दादा-दादी दिन भर बच्चे को कभी गोदी तो कभी सीने से चिपकोए रहते हैं। घर में पहला पुत्र जो हुआ था। वंश परम्परा के लिए पुत्र रत्न जो हुआ था। वह सबका प्यारा, दुलारा लाडला था। रामदास का बचपन बड़े लाड़-प्यार से गुजर रहा था। झालरदास एक सम्पन्न कृषक के पुत्र थे। मणिदास का नाम आस-पड़ोस में भले मानस के रूप में था। वे समाज के मुखिया भी थे। बीस गाँव में पंचायत करने जाते थे मणिदास ईमानदार, न्यायप्रिय, सच्चरित्र व्यक्ति थे। इसलिए सभी उनका सम्मान करते थे। कोई व्यक्ति उनका बात नही काट पाता था जो बात कह दिए वह मान्य था। फिर सम्पन्न किसान थे। आसपास के लोग धान, तिवरा, रूपया, पैसा उधार में ले जाते थे। मणिदास के द्वार से कोई भिखारी खाली हाथ नही लौटता था। जो भूखे थे उसे वे भरपेट भोजन खिलाते थे। घर में भंडारा चलता था। झालर पर पिताजी के व्यक्तित्व का प्रभाव जो पड़ा था। झालर पिता जी की खेती किसानी में हाथ बंटाता था। रामदास के होने से दादा दादी को एक जीवित खिलौना मिल गया था। शांतिबाई दूध पिला देती थी और देववती मुन्ना को संभालती थी। शांति अपने घर के काम में व्यस्त रहती। दिन भर भोजन बनाने में लगी रहती थी। कभी-कभी शांति उदास हो जाती वह सोचती कब इस चूल्हा चौकी से मुक्ति मिलेगी।
इस बरस पानी ठीक से गिरने के कारण पचास एकड़ धान की फसल अच्छी हुई। कोई किड़े माहो का नही था। दस एकड़ में दुबराज धान मतार खार में बोये थे। दूबराज धान की खूशबू से पूरा खार महक रहा था। दूबराज धान हवाओ में झूम-झूम रहा था। खेतों से मेड़ पर चलने वाले लोग कहते-“क्या खूशबू ह”। महक पूरे वातावरण को सुगंधित कर रही थी। खेतों के मेड़ों में अरहर की फसल खूब लगी थी। अरहर फल रहे थे। चारों तरफ हरियाली छाई थी। ऐसा लगता था मानो, धरा हरी मखमली साड़ी पहन कर आई है। इसे देखने देवगण धरता पर उतर आए है। चांद-सितारे देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। धरा में हरियाली बिखरी पड़ी है। किसान फसल को देखकर झूम नाच रहें हैं। झालर दास अपने पुत्र के जन्म से खुश थे। परन्तु फसल अच्छी होने का श्रेय अपने पुश्र रामदास को दे रहे थे। शांति बच्चे को सीने से चिपकारती पुचकारती थी। इधर रामदास दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता के प्यार दूलार से बड़ा हो रहा था। मणिदास के घर में कोई कमी नही थी। खेत खलिहान में एक कुंआ था, जिसका पानी बहुत मीठा था। गाँव भर के लोग पानी भरते थे। पात की बाड़ी में केले के पेड़ लगाये थे। आठ-दस केले में घेर आ गया था। मूसावरी केला था। बाड़ी में किनारे-किनारे मुनगा के पेड़ के साथ में सीताफल लगे थे। करेला, भिन्डी, मिर्ची, सेमी, लौकी, कुम्हड़ा लगे थे। घर खाने के लिए सारी चीजें थी। मात्र दीप जलाने के लिए मिट्टी के तेल लेते थे। घर में गाय- भैसों के कई जोड़े थे। एक साथ कई गाएं एवं भैसें जनती थी। दूध की कोई कमी नही थी। दही, मही गाँव के महिलाओं को शांति बांटती रहती थी। गाँव के सम्पन्न कृषक थे। झालर महंत इस बरस दिवाली त्यौहार को अच्छे ढ़ंग से मनाने की सोच रहे थे। झालर ने पिताजी से कहा कि रामदास और शांति के लिए नये कपड़े,बनवाने हैं। पाँच सौ रूपये दे दो। मणिदास ने कहा बेटा तुम्हारी माँ या शांति बहू से ले लेना। जब गाँव से बिलासपुर जा रहे हो तो घर के लिए मिठाई,फल फटाका, नारियल शक्कर लेते आना। झालर ने मस्तुरी बस स्टैंड से बस में बैठकर बिलासपुर तोरवा नाका स उतरकर बुधवारी बाजार चला गया। बुधवारी बाजार से रामदास के लिए कमीज, पैंट, शांति एवं माँ के लिए साड़ी पेटीकोट, ब्लाउज, टिकुली,फुंदरी आँवला के सुगंधित तेल पावडर, क्रीम पिताजी व अपने लिए कमीज, कुर्ता धोती खरीदी। घर के राशन के लिए सांगेरा होटल से मिठाईयाँ, फटाखे लेकर बस स्टैंड बिलासपुर से बस में बैठकर गाँव मस्तूरी आ गए। घर सड़क के किनारे ही था। नौकर लोग बस स्टैंड में झालर का इंतजार कर रहे थे।सारा सामान उठाकर घर ले गए। झालर से रामादिन नौकर ने कहा-मालिक हमारे लिए कुछ लाए हो। झालर बोला कि हाँ-हाँ दीवाली के दिन देंगे।
दीवाली त्यौहार के लिए घर की लिपाई-पुताई होने लगी।खलिहान की साफ-सफाई नौकर करने लगे थे। शांति ने रसोईघर की साफ-सफाई करा ली थी। सभी लोग दीवाली की तैयारी में लगे थे। गाँव के गरीब किसानों मजदूरों में उमंग था। अपने-अपने औकात के अनुसार तैयारी कर रहे थे। गाँव में जिनके घर में खाने के लिए धान बाढ़ी (उधार) दिए, साथ रूपए भी बांट दिए। कोई आदमी न छूट जाए। मणिदास से देववती ने कहा- “अब तीन दिन पहले से कोई धान उधार नहीं दिए जाएंगे। आज धनतेरस है।वेदवती शांति से बोली बहू कोठी के नीचे गोड़ा को साफ-सफाई कर देना। शांति बोली माँ जी, पहले से साफ-सफाई लिपाई भी करा ली है। सूरज डूबते ही दीप जलाने के लिए तैयारी होने लगी। घर की कोठी (धान) के ऊपर एक दीप जलाया, आँगन के तुलसी चौरा में एक दीप रखा। घर बरामदे द्वार पर भी दीपक रखे। दो दीपक दो धान की कोठी में जो धान से भरी थी घी के दीप जलाये। धन तेरस के दिन सात दीप जल रहे थे।
लक्ष्मी पूजा के लिए कोठी के नीचे गोड़ा को बनाया था। कृषकों के लिए गोड़ा सुरक्षित स्थान है। वेदवती, शांति, रामदास, झालर, मणिदास ने मिलकर धन तेरस की पूजा की। इस वर्ष धन तेरस में रामदास के लिए चांदी की करधनी खरीदी पुराने हौला, गुंडी को बदलकर नए हौला बर्तन लिए। झालर रामदास को गोदी में उठाकर गाँव घुमाने गली में ले गया। गली के पास बरामदे में आठ दस लड़के गप्पें मार रहे थे। झालर रामदास को लेकर चला गया। सभी लड़कों ने रामदास को बारी-बारी से गोदी में उठाया। लड़कों ने खूब प्यार जताया। रामदास बहुत सुन्दर और गोरा शिशु था। कुछ देर के बाद झालर घर चला आया। उधर सभी लड़के अपने-अपने घर चले गए।
धनतेरस के बाद तीसरे दिन दिवाली होती है। तीनों दिन घरों को दीपों से सजाया जाता है। गाँव के सभी घर में दीप जलाए जाते हैं। सभी उमंग से नए कपड़े पहनकर फटाके फोड़ रहे थे। झालर भी अपने घर के सामने फटाके फोड़ रहे थे। गाँव के बहुत सारे बच्चे एकत्र हो गए थे। मणिदास ने झालर से कहा – “बेटा, सभी बच्चों को मिठाई और एक-एक फटाका दे दो। सभी हमारे बच्चे हैं।” झालर ने कहा – “सभी बच्चे लाइन में लग जाओ।” परन्तु बंदरों की भीड़ थी एक नहीं माने। एक के ऊपर एक चढ़ रहे थे। झालर ने लड़कों को डांटा और एक-एक फटाके सभी को दिए। गाँव दीपावली के दिन आनन्द उमंग के दिन थे। मणिदास के कारण गाँव में कोई भूखा नहीं सोता था। शांति ने भी फटाके जलाए वेदवती रामदास को गोदी में लेकर एक एक सुरसुरी चकरी जलाई। मणिदास झालर ने बम फटाके फोड़े। सारा गाँव आवाज से गूँज उठा। रात मनोहर यादव गड़वा बाजे के साथ गायों में सुहाई बांधने आया था। मनोहर यादव ने हर एक गाय के गले में खुशी-खुशी सोहाई बांध रहा था।
भयानक काली रात थी। बारह बज रहे थे। मूसलाधार बारिश हो रक रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजलियों की कौंध से जी घबरा जाता था। काश ! बिजली न टूट पड़े। गाज न गिर जाये। मेंढकों की टर्राहट और झींगुरों की झनकार डरावनी लग रही थी। जुगनुओं की लप-लप चमक दूर-दूर तक दिखाई पड़ती थी। लगातार सात दिनों से झड़ी लगी हुई थी बरसात की। जिधर देखो नदी, तालाब, नहर, गड्ढों, सड़कों, गलियों और खेत-खलिहानों में पानी ही पानी नजर आता था।
उधर बादल गरज रहे थे और इधर शांति बाई मारे प्रसव पीड़ा के बिस्तर पर लोट-पोट हो रही थी। उसके पति झालर महन्त सोच में डूबे सिर पर हाथ धरे असहाय से बैठे थे। सोच रहे थे कैसे रात कटे और वह तड़के ही जाकर बिसाहिन दाई को जचकी कराने ले आये। शांति बार-बार कराह रही थी। कभी-कभी रोती और चिल्लाती भी थी। सुबह पाँच बजे मुर्गें की बांग सुनाई दी। चिड़ियों की चहचहाहट होने लगी थी। पास के मकानों में बात करने की आवाज सुनाई देने लगी थी। झालर ने शांति के सिर में बालों को सहलाया और कहा- देखो सुबह हो गई है। प्रसव की उम्मीद से शांति एवं झालर रात भर जागते रहे थे। झालर ने कहा “मैं भौजी के नाई को बुलाकर लाता हूँ”। झालर ने दरवाजा खोलकर देखा पानी बरस रहा था। छत्ता तानकर वह बाहर निकला। दरवाजे से चिल्लाया भौजी…भौजी दरवाजा खोल। केजा कौन है किसकी आवाज है, कहकर दरवाजा खोलकर बाहर निकली। दरवाजा के सामने कांपते हुए स्वर में झालर ने कहा – भौजी जल्दी चल, शांति की पीड़ा बढ़ गई है। रात भर सो नही पाया हूँ। शायद बच्चा होने का समय आ गया है। सुन शांति जोर-जोर से चिल्ला रही है। केजा बोली तुमने पहले क्यों नही बताया। मैं रात वहीं सो जाती। जल्दी-जल्दी केजा को लेकर झालर छत्ता उसे ओढ़ाकर ले चला। घबरागट में बोला शांति की पीड़ा और बढ़ गई थी। देखो तो कितनी जोर-जोर से चिल्ला रही है। केजा सिर पर हाथ रखकर प्यार से बोली- घबरा मत अब मै आ गई हूँ। सब कुछ ठीक हो जायेगा। फिर झालर से कहा तुम बाहर जाओ। कपड़ा, रेजरपत्ती, गरम पानी की व्यवस्था करो।
झालर महंत परछी में रखे गोरसी में तवेले रख पानी गरम करने रख दिया। झालर की उत्सुकता बढ़ने लगी लड़का होगा या लड़की। शांति की पीड़ा और बढ़ गई। आई माँ केजा ने कहा- जरा जोर से धक्का दे बच्चे का मुंह बाहर आ गया है। शांति को भी कहा गया जरा जोर से दम लगा। लम्बी सांस लेते हुए शांति जोर से चिल्लाती है। आई आँ...... बच्चा धम्म से बाहर आ गया। केजा ने बच्चे को सम्हाला। शांति पसीने से लथपथ थी। बच्चे के बाहर आने से शांति को हल्का महसूस होने लगा। केजा ने बच्चे को उठाकर देखा बच्चा स्वस्थ, सुंदर था। केजा ने बच्चे को हाथ से साफ किया। कैसे नहीं रो रहा है, कहकर सीने को दबाया। हाथ, पैर हिलाया, डुलाया। बच्चे के रोने की आवाज आई। एहेंव, अहेंव बाहर झालर बच्चे की रोने की आवाज सुनकर कहा – “भौजी का होये हे ?” भौजी ने कहा – “लड़का हुआ है।” गरम पानी हुआ कि नही। नया रेजर, ब्लेड ले आओ। झालर ने गरम पानी, रेजर ब्लेड दे दिया। उसने झांककर देखा कि शांति चुपचाप शांत पड़ी है। बच्चा रो रहा है। केजा शांति के कपड़े बदलती है। आवश्यक साफ-सफाई करती है। बच्चे के नये ब्लेड से नाल काटती है। खून नार फांस को अलग कर साफ करती है। शांति को नये कपड़े पहनाती है। आवश्यक हिदायत देती है- उठने-बैठने खाने-पीने की। बच्चे को गुनगुने पानी से साफ करती है, नहला-धुलाकर साफ कर बच्चे को सौंपती है। शांति सिने से लगाकर माथे से चुम लेती है। शांति के चेहरे पर चमक आ जाती है। शांति मुस्कराकर कहती है- मेरे लाल आ जा। माथे से चुमकर सिने से लगा लेती है। प्रसव पीड़ा से थकी रहती है। गहरी नींद में सो जाती है। केजा बच्चे को लेकर झालर की गोद में पकड़ा जाती है। झालर बच्चे को सीने से लगाकर घूमने लगता है। झालर का पहला पुत्र हुआ है। वह बच्चे को पाकर बरामदे में नाचने लगता है। पास के मकान वाले सभी मुहिलाओं को पता चल जाता है कि शांति को लड़का हुआ है। एक-एक करके बच्चा दखने आने लगते हैं। बड़े भाई महंत जगतारण दास अपने लड़के मनमोहन दास पुत्री सत्यवती,सुभद्राबाई को लेकर आ गए। गाँव में शोर हो जाता है कि झालर महंत का लड़का हुआ है। गाँव में खुशी-आनंद का माहौल हो जाता है। सभी बच्चे को प्यार-दुलार कर गोदी में लेते हैं।
झालर लड़के होने से खुश हो जाता है। गाँव भर में शक्कर बंटवाता है। हंस-हंसकर गाँव वालों को बताता है कि उसका लड़का हुआ है। शांति भी खुश रहती है। छह दिन बाद छट्ठी होती। शांति को स्नान कराया जाता है। शांति को नये वस्त्र पहनाये जाते हैं। शांति अब दुबली छरहरी दिखने लगती है। छट्ठी में शांति के माँ-बाप, भाई-बहन, बुआ सभी आते हैं। शांति को विशेष पेय “काके पानी” पिलाया जाता है। इसके बाद दालभात, मुनगा, बड़ी की सब्जि खिलाया जाता है। माँ द्वारा सोंठ, तिल, गुड़ से लड्डू पौष्टिक औषधि खिलाया जाता है। झालर महंत अपने रिश्तेदारों को छट्ठी का निमंत्रण देता है। गाँव भर को निमंत्रण दिया रहता है। गाँव के गोतियार और सभी गाँव वालों को खाने, काके पानी पिने के लिए बुलाता है। झालर महंत पास के गाँव मस्तूरी से लाउड स्पीकर लाकर बजाता है। गाँव में लाउड स्पीकर में फिल्मी तथा छत्तीसगढ़ी गाने बजते हैं। पास के गाँव से बाजे बुलाए जाते हैं। गाँव भर में उत्सव का माहौल हो जाता है। सभी प्रसन्न चित्त आनंद से भोजन ग्रहण करके तृप्त होते हैं। झालर महंत के बड़प्पन को सभी स्वीकारते हैं। पुत्र-प्राप्त पर सभी बधाई देते हैं। झालर महंत सभी अपने संबंधियों को नयी साड़ी, धोती, गमछा, लुंगी भेंट में देते हैं। शांति बाई सभी रिश्तेदारों से नए जन्म होने व पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु आशीर्वाद ग्रहण करने हेतु पैर छुकर प्रणाम करती है। माँ, बाप, सास-ससुर सभी आशीर्वाद देते हैं दूधों नहाओ, पूतों फलों, जुग-जुग जियो। छट्ठी के बाद सभी अपने-अपने घर चले जाते हैं। मात्र शांति की माँ श्यामाबाई बच जाती है। शांति की सेवा सुश्रुषा एक माह तक करती है। प्रसव के बाद आई कमजोरी को शक्तिवर्धक आहार देकर पूर्ति कर दी जाती है। प्रसव के बाद महिलाओं को उचित आहार से भोजन खाना चाहिए तभा बच्चों के लिए पर्याप्त मात्रा में दूध उपलब्ध हो पायेगा। शांति का आहार दुगना हो गया था। झालर शहर से फल लाकर देता है।
झालर महंत के पिता श्री मणिकदास बाहर गाँव से आते है। माँ देववती भी बहुत खुश होती है। वे बालक का नामकरण रामदास रखते हैं। दादा-दादी दिन भर बच्चे को कभी गोदी तो कभी सीने से चिपकोए रहते हैं। घर में पहला पुत्र जो हुआ था। वंश परम्परा के लिए पुत्र रत्न जो हुआ था। वह सबका प्यारा, दुलारा लाडला था। रामदास का बचपन बड़े लाड़-प्यार से गुजर रहा था। झालरदास एक सम्पन्न कृषक के पुत्र थे। मणिदास का नाम आस-पड़ोस में भले मानस के रूप में था। वे समाज के मुखिया भी थे। बीस गाँव में पंचायत करने जाते थे मणिदास ईमानदार, न्यायप्रिय, सच्चरित्र व्यक्ति थे। इसलिए सभी उनका सम्मान करते थे। कोई व्यक्ति उनका बात नही काट पाता था जो बात कह दिए वह मान्य था। फिर सम्पन्न किसान थे। आसपास के लोग धान, तिवरा, रूपया, पैसा उधार में ले जाते थे। मणिदास के द्वार से कोई भिखारी खाली हाथ नही लौटता था। जो भूखे थे उसे वे भरपेट भोजन खिलाते थे। घर में भंडारा चलता था। झालर पर पिताजी के व्यक्तित्व का प्रभाव जो पड़ा था। झालर पिता जी की खेती किसानी में हाथ बंटाता था। रामदास के होने से दादा दादी को एक जीवित खिलौना मिल गया था। शांतिबाई दूध पिला देती थी और देववती मुन्ना को संभालती थी। शांति अपने घर के काम में व्यस्त रहती। दिन भर भोजन बनाने में लगी रहती थी। कभी-कभी शांति उदास हो जाती वह सोचती कब इस चूल्हा चौकी से मुक्ति मिलेगी।
इस बरस पानी ठीक से गिरने के कारण पचास एकड़ धान की फसल अच्छी हुई। कोई किड़े माहो का नही था। दस एकड़ में दुबराज धान मतार खार में बोये थे। दूबराज धान की खूशबू से पूरा खार महक रहा था। दूबराज धान हवाओ में झूम-झूम रहा था। खेतों से मेड़ पर चलने वाले लोग कहते-“क्या खूशबू ह”। महक पूरे वातावरण को सुगंधित कर रही थी। खेतों के मेड़ों में अरहर की फसल खूब लगी थी। अरहर फल रहे थे। चारों तरफ हरियाली छाई थी। ऐसा लगता था मानो, धरा हरी मखमली साड़ी पहन कर आई है। इसे देखने देवगण धरता पर उतर आए है। चांद-सितारे देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। धरा में हरियाली बिखरी पड़ी है। किसान फसल को देखकर झूम नाच रहें हैं। झालर दास अपने पुत्र के जन्म से खुश थे। परन्तु फसल अच्छी होने का श्रेय अपने पुश्र रामदास को दे रहे थे। शांति बच्चे को सीने से चिपकारती पुचकारती थी। इधर रामदास दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता के प्यार दूलार से बड़ा हो रहा था। मणिदास के घर में कोई कमी नही थी। खेत खलिहान में एक कुंआ था, जिसका पानी बहुत मीठा था। गाँव भर के लोग पानी भरते थे। पात की बाड़ी में केले के पेड़ लगाये थे। आठ-दस केले में घेर आ गया था। मूसावरी केला था। बाड़ी में किनारे-किनारे मुनगा के पेड़ के साथ में सीताफल लगे थे। करेला, भिन्डी, मिर्ची, सेमी, लौकी, कुम्हड़ा लगे थे। घर खाने के लिए सारी चीजें थी। मात्र दीप जलाने के लिए मिट्टी के तेल लेते थे। घर में गाय- भैसों के कई जोड़े थे। एक साथ कई गाएं एवं भैसें जनती थी। दूध की कोई कमी नही थी। दही, मही गाँव के महिलाओं को शांति बांटती रहती थी। गाँव के सम्पन्न कृषक थे। झालर महंत इस बरस दिवाली त्यौहार को अच्छे ढ़ंग से मनाने की सोच रहे थे। झालर ने पिताजी से कहा कि रामदास और शांति के लिए नये कपड़े,बनवाने हैं। पाँच सौ रूपये दे दो। मणिदास ने कहा बेटा तुम्हारी माँ या शांति बहू से ले लेना। जब गाँव से बिलासपुर जा रहे हो तो घर के लिए मिठाई,फल फटाका, नारियल शक्कर लेते आना। झालर ने मस्तुरी बस स्टैंड से बस में बैठकर बिलासपुर तोरवा नाका स उतरकर बुधवारी बाजार चला गया। बुधवारी बाजार से रामदास के लिए कमीज, पैंट, शांति एवं माँ के लिए साड़ी पेटीकोट, ब्लाउज, टिकुली,फुंदरी आँवला के सुगंधित तेल पावडर, क्रीम पिताजी व अपने लिए कमीज, कुर्ता धोती खरीदी। घर के राशन के लिए सांगेरा होटल से मिठाईयाँ, फटाखे लेकर बस स्टैंड बिलासपुर से बस में बैठकर गाँव मस्तूरी आ गए। घर सड़क के किनारे ही था। नौकर लोग बस स्टैंड में झालर का इंतजार कर रहे थे।सारा सामान उठाकर घर ले गए। झालर से रामादिन नौकर ने कहा-मालिक हमारे लिए कुछ लाए हो। झालर बोला कि हाँ-हाँ दीवाली के दिन देंगे।
दीवाली त्यौहार के लिए घर की लिपाई-पुताई होने लगी।खलिहान की साफ-सफाई नौकर करने लगे थे। शांति ने रसोईघर की साफ-सफाई करा ली थी। सभी लोग दीवाली की तैयारी में लगे थे। गाँव के गरीब किसानों मजदूरों में उमंग था। अपने-अपने औकात के अनुसार तैयारी कर रहे थे। गाँव में जिनके घर में खाने के लिए धान बाढ़ी (उधार) दिए, साथ रूपए भी बांट दिए। कोई आदमी न छूट जाए। मणिदास से देववती ने कहा- “अब तीन दिन पहले से कोई धान उधार नहीं दिए जाएंगे। आज धनतेरस है।वेदवती शांति से बोली बहू कोठी के नीचे गोड़ा को साफ-सफाई कर देना। शांति बोली माँ जी, पहले से साफ-सफाई लिपाई भी करा ली है। सूरज डूबते ही दीप जलाने के लिए तैयारी होने लगी। घर की कोठी (धान) के ऊपर एक दीप जलाया, आँगन के तुलसी चौरा में एक दीप रखा। घर बरामदे द्वार पर भी दीपक रखे। दो दीपक दो धान की कोठी में जो धान से भरी थी घी के दीप जलाये। धन तेरस के दिन सात दीप जल रहे थे।
लक्ष्मी पूजा के लिए कोठी के नीचे गोड़ा को बनाया था। कृषकों के लिए गोड़ा सुरक्षित स्थान है। वेदवती, शांति, रामदास, झालर, मणिदास ने मिलकर धन तेरस की पूजा की। इस वर्ष धन तेरस में रामदास के लिए चांदी की करधनी खरीदी पुराने हौला, गुंडी को बदलकर नए हौला बर्तन लिए। झालर रामदास को गोदी में उठाकर गाँव घुमाने गली में ले गया। गली के पास बरामदे में आठ दस लड़के गप्पें मार रहे थे। झालर रामदास को लेकर चला गया। सभी लड़कों ने रामदास को बारी-बारी से गोदी में उठाया। लड़कों ने खूब प्यार जताया। रामदास बहुत सुन्दर और गोरा शिशु था। कुछ देर के बाद झालर घर चला आया। उधर सभी लड़के अपने-अपने घर चले गए।
धनतेरस के बाद तीसरे दिन दिवाली होती है। तीनों दिन घरों को दीपों से सजाया जाता है। गाँव के सभी घर में दीप जलाए जाते हैं। सभी उमंग से नए कपड़े पहनकर फटाके फोड़ रहे थे। झालर भी अपने घर के सामने फटाके फोड़ रहे थे। गाँव के बहुत सारे बच्चे एकत्र हो गए थे। मणिदास ने झालर से कहा – “बेटा, सभी बच्चों को मिठाई और एक-एक फटाका दे दो। सभी हमारे बच्चे हैं।” झालर ने कहा – “सभी बच्चे लाइन में लग जाओ।” परन्तु बंदरों की भीड़ थी एक नहीं माने। एक के ऊपर एक चढ़ रहे थे। झालर ने लड़कों को डांटा और एक-एक फटाके सभी को दिए। गाँव दीपावली के दिन आनन्द उमंग के दिन थे। मणिदास के कारण गाँव में कोई भूखा नहीं सोता था। शांति ने भी फटाके जलाए वेदवती रामदास को गोदी में लेकर एक एक सुरसुरी चकरी जलाई। मणिदास झालर ने बम फटाके फोड़े। सारा गाँव आवाज से गूँज उठा। रात मनोहर यादव गड़वा बाजे के साथ गायों में सुहाई बांधने आया था। मनोहर यादव ने हर एक गाय के गले में खुशी-खुशी सोहाई बांध रहा था।