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मेरा नाम लीना है और मैं दिल्ली से जुड़े हुए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक छोटे से शहर में अपने पति रवि वर्मा के साथ रहती हूँ।
हमारा एक छोटा सा किरयाना स्टोर है और उसमें किरयाना वस्तुओं के साथ साथ दैनिक जरूरतों का अन्य सामान भी मिलता है।
पिछले दस वर्ष से यह स्टोर मेरे पति रवि और मेरे जेठ राजू मिल कर चलाते थे लेकिन चार वर्ष पहले आपस में कुछ अनबन हो जाने के कारण वह उससे अलग हो कर अपना नया काम शुरू कर दिया।
तब से इस स्टोर को रवि और मैं मिल कर सम्भाल रहे हैं जिसमे रवि सुबह सात बजे से दस बजे तक दुकान खोल कर ग्राहक को सम्भालते हैं।
घर का सुबह का काम निपटा कर दस बजे से मैं दुकान पर जा कर बैठती हूँ और रवि थोक बाज़ार में जा कर सामान लाते हैं तथा दूकान में यथा स्थान पर लगाते एवं सजाते हैं।
दोपहर एक बजे मैं घर जाकर खाना बनाती हूँ और दो बजे तक वापिस दूकान में आकर हम दोनों साथ साथ खाना खाते हैं।
उसके बाद मैं फिर घर चली जाती हूँ और शाम के छह बजे तक रवि अकेले ही दुकान का काम संभालते हैं।
शाम को छह बजे से मैं फिर से पति का हाथ बंटाने के लिए दुकान पर आ कर बैठती हूँ और रात नौ बजे घर वापिस जाती हूँ लेकिन रवि रात दस बजे के बाद ही दूकान बंद करके घर पहुँचते हैं।
अलग व्यवसाय के पहले वर्ष में उसे स्थापित करने के लिए तथा जेठ जी के स्टोर से प्रतिस्पर्धा के कारण हम दोंनो पूरा दिन दुकान के काम में ही व्यस्त रहते थे इसलिए हमारी यही नीरस दिनचर्या हो गई थी।
दिन भर दुकान की और थोक बाज़ार की भाग दौड़ से थके होने के कारण रवि घर पहुँचते ही खाना खाते और मेरी आवश्यकताओं की अनदेखी करके लम्बी तान कर सो जाते।
शुरू के चार-पांच माह तक तो मैंने रवि से कुछ नहीं कहा और अपनी ज़रूरतों को दबा कर उनकी तथा दुकान की देखभाल में अपने को व्यस्त रखती रही।
रात को जब भी मैं सहवास के लिए उनके पास जाती और उनको हाथ भी लगाती तो वह हमेशा मना कर देते या फिर अगले दिन करने का झांसा दे देते।
वह अगला दिन तो कभी नहीं आया और इस तरह मैं रोजाना ही अपनी अतृप्त वासना को दबा कर तथा अपना मन मसोस कर सोने की कोशिश करती थी।
कभी तो नींद आ जाती थी और कभी बिल्कुल ही नहीं सो पाती, अधिकतर मैं सारी सारी रात जागती और करवटें बदलती रहती थी।
छ्टे माह के शुरू में ही मेरी वासना की पूर्ति नहीं होने से मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा तथा मेरे स्वभाव में थोड़ा चिड़चिड़ापन आ गया और अक्सर छोटी छोटी बात पर मेरा और रवि का झगड़ा भी होने लगता था।
अक्सर रात को जब भी मुझे वासना की अनुभूति होती तब मैं सोते हुए रवि को जगाने के लिए उनके लिंग को मसल कर खड़ा करने की कोशिश करती थी लेकिन वे थके होने का कारण बता कर मुझे अपने से दूर कर देते और करवट बदल कर सो जाते।
एक रात जब हम सोने लगे तब मैंने रवि से मेरी वासना की अग्नि को शांत करने के लिए कहा तो वह मान गए और हमने बड़े उत्साह से संसर्ग शुरू किया लेकिन रवि का शीघ्र ही वीर्य-पतन हो जाने के कारण मुझे आनन्द और संतुष्टि नहीं मिली।
उस प्रकरण में ना तो मैं चरम सीमा तक ही पहुंची और ना ही मेरी योनि से रस का स्राव ही हुआ।
मुझे संतुष्टि नहीं मिलने के कारण उस रात मैंने खीज और गुस्से में आ कर रवि को बहुत बुरा भला कहा तथा उन्हें नपुंसक तक भी कह दिया।
शायद मेरी यह बात रवि के मन को चुभ गई थी इसलिए उसने सुबह दुकान जाने से पहले मुझे कहा– तुम कुछ दिन प्रतीक्षा कर लो, तब तक मैं तुम्हारी वासना की शान्ति के लिए कोई ना कोई उपाय या प्रबंध ज़रूर कर दूंगा।
तीन दिनों के बाद रात के समय रवि ने मुझसे पूछा- क्या तुम अपनी वासना की संतुष्टि के लिए किसी परपुरुष से संसर्ग करने के लिए तैयार हो?
मुझे उनकी यह बात सुन कर थोड़ा असमंजस, खीज और क्रोध आया, लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहूँ मेरी वासना मुझ पर हावी हो गई और मैं झट से बोली- हाँ, अगर तुम मुझे संतुष्ट नहीं कर सकते हो तो मुझे किसी और का सहारा तो लेना ही पड़ेगा। अगर यह प्रबंध तुम खुद ही कर दोगे तो अधिक बेहतर होगा क्योंकि इसमें तुम्हारी सहमति भी शामिल होगी।
कुछ देर के बाद जब मैंने रवि से पूछा की वह किस परपुरुष की बात कर रहा था तब उसने बताया- ऊपर वाले फ्लैट में जो अंकल रहते हैं, मैंने उनसे आज शाम को दुकान पर हमारी समस्या के बारे में बात करी थी। मैंने उनसे आग्रह भी किया है कि वह कम से कम सप्ताह में एक बार तुम्हारी तृष्णा की तृप्ति कर दिया करें तो हमारी गृहस्थी टूटने से बच जायेगी।
मैंने रवि से पूछ लिया- तो अंकल ने क्या उत्तर दिया है?
रवि ने कहा- उन्होंने कहा है कि वह सोच कर उत्तर देंगे। लेकिन मुझे पूरी आशा है कि वह ज़रूर अपनी सहमति दे देंगे।
हमारा एक छोटा सा किरयाना स्टोर है और उसमें किरयाना वस्तुओं के साथ साथ दैनिक जरूरतों का अन्य सामान भी मिलता है।
पिछले दस वर्ष से यह स्टोर मेरे पति रवि और मेरे जेठ राजू मिल कर चलाते थे लेकिन चार वर्ष पहले आपस में कुछ अनबन हो जाने के कारण वह उससे अलग हो कर अपना नया काम शुरू कर दिया।
तब से इस स्टोर को रवि और मैं मिल कर सम्भाल रहे हैं जिसमे रवि सुबह सात बजे से दस बजे तक दुकान खोल कर ग्राहक को सम्भालते हैं।
घर का सुबह का काम निपटा कर दस बजे से मैं दुकान पर जा कर बैठती हूँ और रवि थोक बाज़ार में जा कर सामान लाते हैं तथा दूकान में यथा स्थान पर लगाते एवं सजाते हैं।
दोपहर एक बजे मैं घर जाकर खाना बनाती हूँ और दो बजे तक वापिस दूकान में आकर हम दोनों साथ साथ खाना खाते हैं।
उसके बाद मैं फिर घर चली जाती हूँ और शाम के छह बजे तक रवि अकेले ही दुकान का काम संभालते हैं।
शाम को छह बजे से मैं फिर से पति का हाथ बंटाने के लिए दुकान पर आ कर बैठती हूँ और रात नौ बजे घर वापिस जाती हूँ लेकिन रवि रात दस बजे के बाद ही दूकान बंद करके घर पहुँचते हैं।
अलग व्यवसाय के पहले वर्ष में उसे स्थापित करने के लिए तथा जेठ जी के स्टोर से प्रतिस्पर्धा के कारण हम दोंनो पूरा दिन दुकान के काम में ही व्यस्त रहते थे इसलिए हमारी यही नीरस दिनचर्या हो गई थी।
दिन भर दुकान की और थोक बाज़ार की भाग दौड़ से थके होने के कारण रवि घर पहुँचते ही खाना खाते और मेरी आवश्यकताओं की अनदेखी करके लम्बी तान कर सो जाते।
शुरू के चार-पांच माह तक तो मैंने रवि से कुछ नहीं कहा और अपनी ज़रूरतों को दबा कर उनकी तथा दुकान की देखभाल में अपने को व्यस्त रखती रही।
रात को जब भी मैं सहवास के लिए उनके पास जाती और उनको हाथ भी लगाती तो वह हमेशा मना कर देते या फिर अगले दिन करने का झांसा दे देते।
वह अगला दिन तो कभी नहीं आया और इस तरह मैं रोजाना ही अपनी अतृप्त वासना को दबा कर तथा अपना मन मसोस कर सोने की कोशिश करती थी।
कभी तो नींद आ जाती थी और कभी बिल्कुल ही नहीं सो पाती, अधिकतर मैं सारी सारी रात जागती और करवटें बदलती रहती थी।
छ्टे माह के शुरू में ही मेरी वासना की पूर्ति नहीं होने से मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा तथा मेरे स्वभाव में थोड़ा चिड़चिड़ापन आ गया और अक्सर छोटी छोटी बात पर मेरा और रवि का झगड़ा भी होने लगता था।
अक्सर रात को जब भी मुझे वासना की अनुभूति होती तब मैं सोते हुए रवि को जगाने के लिए उनके लिंग को मसल कर खड़ा करने की कोशिश करती थी लेकिन वे थके होने का कारण बता कर मुझे अपने से दूर कर देते और करवट बदल कर सो जाते।
एक रात जब हम सोने लगे तब मैंने रवि से मेरी वासना की अग्नि को शांत करने के लिए कहा तो वह मान गए और हमने बड़े उत्साह से संसर्ग शुरू किया लेकिन रवि का शीघ्र ही वीर्य-पतन हो जाने के कारण मुझे आनन्द और संतुष्टि नहीं मिली।
उस प्रकरण में ना तो मैं चरम सीमा तक ही पहुंची और ना ही मेरी योनि से रस का स्राव ही हुआ।
मुझे संतुष्टि नहीं मिलने के कारण उस रात मैंने खीज और गुस्से में आ कर रवि को बहुत बुरा भला कहा तथा उन्हें नपुंसक तक भी कह दिया।
शायद मेरी यह बात रवि के मन को चुभ गई थी इसलिए उसने सुबह दुकान जाने से पहले मुझे कहा– तुम कुछ दिन प्रतीक्षा कर लो, तब तक मैं तुम्हारी वासना की शान्ति के लिए कोई ना कोई उपाय या प्रबंध ज़रूर कर दूंगा।
तीन दिनों के बाद रात के समय रवि ने मुझसे पूछा- क्या तुम अपनी वासना की संतुष्टि के लिए किसी परपुरुष से संसर्ग करने के लिए तैयार हो?
मुझे उनकी यह बात सुन कर थोड़ा असमंजस, खीज और क्रोध आया, लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहूँ मेरी वासना मुझ पर हावी हो गई और मैं झट से बोली- हाँ, अगर तुम मुझे संतुष्ट नहीं कर सकते हो तो मुझे किसी और का सहारा तो लेना ही पड़ेगा। अगर यह प्रबंध तुम खुद ही कर दोगे तो अधिक बेहतर होगा क्योंकि इसमें तुम्हारी सहमति भी शामिल होगी।
कुछ देर के बाद जब मैंने रवि से पूछा की वह किस परपुरुष की बात कर रहा था तब उसने बताया- ऊपर वाले फ्लैट में जो अंकल रहते हैं, मैंने उनसे आज शाम को दुकान पर हमारी समस्या के बारे में बात करी थी। मैंने उनसे आग्रह भी किया है कि वह कम से कम सप्ताह में एक बार तुम्हारी तृष्णा की तृप्ति कर दिया करें तो हमारी गृहस्थी टूटने से बच जायेगी।
मैंने रवि से पूछ लिया- तो अंकल ने क्या उत्तर दिया है?
रवि ने कहा- उन्होंने कहा है कि वह सोच कर उत्तर देंगे। लेकिन मुझे पूरी आशा है कि वह ज़रूर अपनी सहमति दे देंगे।