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पहचान

चुँधियार्इ आँखों और मैले दाँतों वाले बन्ने उस्ताद के मुँह से बदबू फूटा करती थी।

जल्द ही बन्ने उस्ताद की 'शागिर्दी' से उसने स्वयं को आजाद कर लिया। उसने जान लिया था कि टेलर मास्टर कभी लखपति बनकर ऐश की जिंदगी नहीं गुजार पाता। वह तो ताउम्र 'टेलरर्इ' ही करता रह जाता है।

इससे कहीं अच्छा है कि यूनुस मन्नू भार्इ से स्कूटर, मोटर-साइकिल की मिस्त्रीगिरी सीखे।

पंद्रह

यूनुस की विद्यालयीन पढ़ार्इ ही खटार्इ में पड़ी थी, किसी विश्वविद्यालय का मुँह देखना उसके नसीब में कहाँ था?

वैसे भी हर किसी के मुकद्दर में विश्वविद्यालयीन पढ़ार्इ का 'जोग' नहीं होता।

फुटपथिया लोगों का अपना एक अलग विश्वविद्यालय होता है, जहाँ व्यावहारिक शास्त्र की तमाम विद्याएँ सिखार्इ जाती हैं।

हाँ, फर्क बस इतना है कि इन विश्वविद्यालयों में 'माल्थस' की थ्योरी पढ़ार्इ जाती है न डार्विन का विकासवाद।

छात्र स्वयमेव दुनिया की तमाम घोषित, अघोषित विज्ञान एवं कलाओं में महारत हासिल कर लेते हैं।

प्राध्यापकीय योग्यता के लिए शिक्षा और उम्र का बंधन नहीं होता। वे अनपढ़ हो सकते हैं, बुजुर्ग या बच्चे भी हो सकते हैं। कभी-कभी तो पशुओं के क्रिया-व्यापार से भी ये फुटपथिया विद्यार्थी ज्ञान अर्जित कर लेते हैं।

ये अनौपचारिक प्राध्यापक अपने विद्यार्थियों को जीने की कला सिखाते हैं।

जो विद्यार्थी जितना तेज हुआ, वह उतनी जल्दी व्यावहारिक ज्ञान ग्रहण कर लेता है। संगत के कारण विद्यार्थी निगाह बचा कर गलत काम करने, बहाना बनाने और बच निकलने का हुनर सीख जाता है। यहाँ सिखाया भी तो जाता है कि जो पकड़ा गया वही चोर। जो पकड़ से बचा वह बनता है गलियों का बेताज बादशाह।

इन विश्वविद्यालयों की कक्षाएँ उजाड़-खंडहरात में, गैरेजों में, सिनेमा-हाल और चाय-पान की गुमटियों में लगती हैं।

'प्रेक्टिकल-ट्रेनिंग' के लिए नगर के आवारा-लोफर, गँजेड़ी-भँगेड़ी, दुराचारी-बलात्कारी, युवकों की संगत जरूरी होती है।

बस-ट्रक चालकों और खलासियों से भूगोल, नागरिक शास्त्र और भारतीय दंड विधान का सार सरलता से उनकी समझ में आ जाता है।

मोटर गैरेज में काम सीख कर मेकेनिकल-इंजीनियरिंग और आटो-मोबाइल इंजीनियरिंग का कोर्स पूरा किया जाता है।

दर्जियों की दुकान में बैठकर 'ड्रेस-डिजाइनर' और 'फैशन-टेक्नोलॉजी' की डिग्री मिल जाती है।

नार्इ की दुकान से 'ब्यूटी पार्लर' का डिप्लोमा मिल जाता है।

सिविल ठेकेदार के पास मुंशीगीरी कर लेने के बाद आदमी आसानी से सिविल इंजीनियर जितनी योग्यता प्राप्त कर लेता है।

विद्युत ठेकेदार के पास काम सीखने पर इलेक्ट्रीशियन का डिप्लोमा मिला समझो।

काम-शास्त्र के सैद्धांतिक पक्ष से वे कमसिनी में ही वाकिफ हो जाते हैं और प्रेक्टिकल का अवसर निम्न-मध्यमवर्गीय समाजों में उन्हें सहज ही मिल जाता है। चचेरे-ममेरे भार्इ-बहिन, चाचा-मामा, बुआ-चाची-मामी, नौकर-नौकरानी, पिता या अध्यापक, इनमें से कोर्इ एक या अधिक लोग उन्हें वयस्क अनुभवों से मासूम बचपन ही में पारंगत बना देते हैं।

राजनीति-शास्त्र सीखने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं। आजकल हर चीज में 'पोलिटिक्स' की बू आती है।

यूनुस और उसके जैसे तमाम सुविधाहीन बच्चे ऐसे ही विश्वविद्यालयों के छात्र थे।

बड़े भार्इ सलीम की असमय मृत्यु से गमजदा यूनुस को एक दिन उसके आटोमोबाइल इंजीनियरिंग के प्राध्यापक यानी मोटर साइकिल मिस्त्री मन्नू भार्इ ने गुरु-गंभीर वाणी में समझाया था - 'बेटा, मैं पढ़ा-लिखा तो नहीं लेकिन 'लढ़ा' जरूर हूँ। अब तुम पूछोगे कि ये लढ़ार्इ क्या होती है तो सुनो, एम्मे, बीए जैसी एक डिग्री और होती है जिसे हम अनपढ़ लोग 'एलेलपीपी' कहते हैं। जिसका फुल फार्म होता है, लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर, समझे। इस डिग्री की पढ़ार्इ फर्ज-अदायगी के मदरसे में होती है जहाँ मेहनत की कापी और लगन की कलम से 'लढ़ार्इ' की जाती है।'

यूनुस मन्नू भार्इ की ज्ञान भरी बातें ध्यान से सुना करता।

असुविधाओं से भरपूर अव्यवस्थित घरेलू माहौल में स्कूली शिक्षा की किसे फिक्र!

वह अच्छी तरह जानता था कि अकादमिक तालीम उसके बूते की बात नहीं।

उसे भी अब इस 'लढ़ार्इ' जैसी कोर्इ डिग्री बटोरनी होगी।

इसीलिए वह मन्नू उस्ताद की बात गिरह में बाँध कर रक्खे हुए था।

मन्नू भार्इ की छोटी सी मोटर-साइकिल रिपेयर की गैरेज थी।

नगर के बाहर पहाड़ी नाले के पुल को पार करते ही दुचकिया, तिनचकिया, चरचकिया, छचकिया जैसी तमाम गाड़ियों की मरम्मत के लिए गैरेज हैं। टायरों में हवा भरने वाले बिहारी मुसलमानों की दुकानें भी इधर ही हैं।

मन्नू भार्इ की गैरेज पुल पार करते ही पहले मोड़ पर है।

बन्ने उस्ताद के दर्जीगीरी वाले अनुभव से मायूस यूनुस को गैरेज का माहौल ठीक लगा।

गैरेज के अंदर एक लकड़ी का बोर्ड था, जिस पर क्रम से पाना-पेंचिस आदि सजा कर टाँग दिए जाते। यूनुस का काम होता, सुबह मन्नू भार्इ के घर जाकर उनसे गैरेज की चाभी ले आता। एक बित्ते का एक झाड़ू था, जिससे वह पहले गैरेज के बाहर सफार्इ करता। फिर गैरेज का शटर उठाता। अंदर रिपेयर के लिए आर्इ स्कूटर-मोटर साइकिलें बेतरतीबी से रखी रहतीं। एक-एक कर तमाम गाड़ियों को वह गैरेज से बाहर निकालता। फिर गैरेज के अंदर झाड़ू लगाता। इस बीच कोर्इ नट-बोल्ट, वाशर या कोर्इ अन्य पार्ट गिरा मिलता तो उसे उठाकर यथास्थान रख देता। मन्नू भार्इ के आने से पूर्व यदि कोर्इ कस्टमर आता तो वह उनकी समस्या सुनता और उसके लायक रिपेयर का काम होता तो कर देता।

इस छोटी-मोटी रिपेयरिंग से अपना जेब-खर्च बनाता।

रात गैरेज बंद होने से पहले वह तमाम पाना-पेंचिस को जले मोबिल से धोता, पोंछता और फिर उन्हें दीवार पर टँगे बोर्ड पर क्रमानुसार सजा देता।

मन्नू भार्इ और यूनुस मिलकर मरम्मत के लिए तमाम गाड़ियों को गैरेज के अंदर ठूँसते।

यूनुस जब घर जाने के लिए सलाम करता तो मन्नू भार्इ उसे रोकते और फिर कभी दस, कभी बीस रुपए का नोट पकड़ा देते।

अपनी इस छोटी-मोटी कमार्इ से यूनुस बहुत खुश रहता।

नन्हा यूनुस बड़ा जहीन था...

कहा भी जाता है कि ये सिक्खड़े-सरदार और म्लेच्छ-मुसल्ले बड़े हुनरमंद होते हैं। तकनीकी दक्षता में इनका कोर्इ सानी नहीं।

मेहनत और मरम्मत के काम ये कितनी सफार्इ से करते हैं। नार्इ, दर्जी और सब्जियों की दुकानें अधिकांशतः मुसलमानों की हैं। अंडा, मुर्गा, मछली और गोश्त की दुकानों पर भी मुसलमानों का कब्जा है।

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद नगर में हिंदू कसाइयों ने 'झटका' वाली दुकानें लगार्इं। हमीद चिकवा बताता है कि उन लोगों ने अपनी मीटिंग में फैसला लिया है कि 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' का नारा लगाने वाले राष्ट्रीय हिंदू यदि मांसाहारी हैं तो वे मुसलमान चिकवों से गोश्त न खरीदें, बल्कि 'झटका' वाली दुकानों से गोश्त खरीदें।

इससे मुसलमानों के इस एकछत्र व्यवसाय पर कुछ तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

सिक्खड़ों को तो सन चौरासी में औकात बता दी गर्इ थी। मुसल्लों को गोधरा के बहाने गुजरात में तगड़ा सबक सिखा दिया गया।

सिख तो समझ गए और मुख्यधारा में आ गए, लेकिन इन म्लेच्छ-मुसलमानों को ये कांग्रेसी और कम्युनिस्ट चने के झाड़ पर चढ़ाए रखते हैं। और वो जो एक ठो ललुआ है, वो चारा डकार कर मुसलमानों का मसीहा बना बैठा है।

यूनूस ने कम उम्र में ही जान लिया था कि उसके अस्तित्व के साथ जरूर कुछ गड़बड़ है।

चौक के तिलकधारी मुनीम जी कहा करते - 'अगर ये हमारे छद्म धर्मनिरपेक्षवादी नपुंसक हिंदू शांत रहें तो 'आर-पार' की बात हो ही जाए। सेकुलर कहते हैं ये शिखंडी साले खुद को।'

उनके हमखयाल चौबेजी हाँ में हाँ मिलाते - 'हिंदू हित की बात करने वाले को ये चूतिए सांप्रदायिक कहते हैं। हमें अछूत समझते हैं।'

शिशु मंदिर के प्रधानपाठक विश्वकर्मा सर कहाँ चुप रहते, वैसे भी उन्हें गुरूर था कि वह इस कस्बे के सर्वमान्य बुद्धिजीवी हैं, किंतु राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित मुनीम जी और चौबे जी उन्हें ज्यादा अहमियत नहीं देते - 'अब समय आ गया है कि हम अपना 'होमलैंड' बना लें। इन मुसल्लों को द्वितीय नागरिकता मिले और इन्हें मताधिकार से वंचित किया जाए। तुष्टिकरण की सारी राजनीति स्वमेव खत्म हो जाएगी।'

अपने समय की चुनौतियों से बाखबर और बेखबर यूनुस, मन्नू भार्इ को काम करते बड़े ध्यान से देखा करता।

उनकी हरेक स्टाइल की नकल किया करता।

मन्नू भार्इ चाय बहुत पीते थे।

कोर्इ ग्राहक आया नहीं कि आर्डर कर देते - 'यूनुस, तनि भाग कर चारठो चाय ले आ।'

वहीं यूनुस को चाय की आदत पड़ी।

मन्नू भार्इ को अल्सर हो गया था।

सुनते हैं कि अब वह इस दुनिया में नहीं हैं।

सोलह

मोटर साइकिल मिस्त्री मन्नू भार्इ के बाद उसे एक और उस्ताद मिला - 'डाक्टर'। यह कोर्इ एमबीबीएस या झोला छाप डाक्टर का जिक्र नहीं, बल्कि सरदार शमशेर सिंह डोजर ऑपरेटर का किस्सा है।

सरदार शमशेर सिंह कहा करता - 'सर दर्द, कमर दर्द, बुखार की दवा लिखने वाला जब डाक्टर कहलाता है तो तमाम रोगों को दूर भगाने वाली दारू की सलाह देने वाले को डाक्टर क्यों नहीं कहा जाता?'

दूसरे डाक्टर वह होते हैं जो किसी खास विषय पर शोध करते हैं और विश्वविद्यालय से उन्हें 'डाक्टरेट' की डिग्री मिलती है। अधिकांश लोगों को यह डिग्री गहन अध्ययन के पश्चात मिलती हैं और कुछ लोगों को उनकी विलक्षण प्रतिभा के कारण विश्वविद्यालय स्वयं 'डीलिट' की मानद उपाधि से सम्मानित करता है।

सरदार शमशेर सिंह को दारू के क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त थी, इसलिए फुटपथिया विश्वविद्यालय के कुलपतियों ने उसे मानद 'डाक्टरेट' की उपाधि से सम्मानित किया था। डाक्टर की शागिर्दी में यूनुस 'बुलडोजर' और 'पेलोडर' चलाना सीख गया। 'पोकलैन' भी वह बहुत बढ़िया चलाता।

'पोकलैन' हाथी की सूँड़ की तरह का एक खनन-यंत्र है, जिसके 'बूम' और 'बकेट' का 'मूवमेंट' ठीक हाथी के सूँड़ के जैसा है। जिस तरह से कोर्इ हाथी अपनी सूँड़ की मदद से ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से हरी-भरी डालियाँ तोड़कर उसी सूँड़ की सहायता से ग्रास अपने मुँह में डालता है, उसी तरह से 'पेलोडर' मशीन काम करती है।

शायद दुनिया के तकनीशियनों, अभियंताओं, सर्जकों और वास्तुकारों ने प्राकृतिक तत्वों और जीव-जंतुओं की उपस्थिति से प्रेरणा प्राप्त कर अपनी कुशलता और दक्षता में वृद्धि की है।

कोयला की खुली खदानों और धरती की काया-कल्प कर देने वाली परियोजनाओं की जान हैं ये भीमकाय उपकरण। चाहे विशालकाय पहाड़ कटवा कर चटियल मैदान बना दें या बड़ी-बड़ी नहरें खोद डालें।

यूनुस के हुनर की सभी तारीफ करते। वह 'डाक्टर' का चेला जो ठहरा!

'डाक्टर' अब रिटायर हो चुका है।

अपने खालू का यूनुस इसीलिए अहसान माना करता कि उन्होंने 'डाक्टर' से उसके लिए सिफारिश की। 'डाक्टर' के कारण ठेकेदारों में आज उसकी अपनी 'मार्केट-वैल्यू' है।

खाला ने उसे काफी समझाया था कि वह अपनी जिंदगी को खुद एक नए साँचे में ढाले। अपने बड़े भार्इ सलीम की तरह हड़बड़ी न करे।

जो भी काम सीखे पूरी लगन और र्इमानदारी के साथ सीखे। खाला कहा करती थी - 'सुनो सबकी, लेकिन करो मन की। दूसरों के इशारे पर नाचना बेवकूफी है।'

इसीलिए काम सीखने के लिए यूनुस ने खाला की सलाह मानी।

उसने 'डाक्टर' की दारू या अन्य ऐब नहीं बल्कि उसके हुनर को आत्मसात किया। यही यूनुस की पूँजी थी।

यूनुस ने कोर्इ कसर न छोड़ी काम सीखने में।

 
'डाक्टर' को स्वीकार करना पड़ा कि उसने आज तक इतने चेले बनाए किंतु इस 'कटुए' जैसा एक भी नहीं। बहुत से शागिर्द बने, जिनने उससे शराब पीनी सीखी। नशे में धुत रहना सीखा। रंडीबाजी सीखी किंतु काम न सीखा।

इसीलिए यूनुस को वह कहा करता - 'ये बड़ा लायक चेला निकला।' यूनुस को अब भी सिहरन होती है, जाड़े की उन कड़कड़ाती अँधेरी रातों को यादकर। जब कोयले की ओपन-कास्ट खदान के 'डंपिंग-एरिया' में वह डाक्टर के साथ काम सीखने जाया करता था।

सिंगरौली क्षेत्र मे कोयले की बड़ी-बड़ी खुली खदानें हैं।

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर कोयले का अकूत भडार है सिंगरौली क्षेत्र में। रिहंद नदी पर बांधा गया विशालकाय बाँध। कोयले और पानी के योग से बिजली बनाने के बड़े-बड़े विद्युत-गृह। लाखों टन कोयले से बनने वाली हजारों मेगावाट बिजली। इस बिजली की राष्ट्रीय पूर्ति में सिंगरौली क्षेत्र की पर्याप्त हिस्सेदारी है।

सिंगरौली क्षेत्र देश का एक प्रमुख ऊर्जा-तीर्थ है।

एक बार में एक सौ बीस टन कोयला ढोकर चलने वाले भीमकाय डंपर। सैकड़ों टन बारूद की ब्लास्टिंग से चूर-चूर चट्टानों का पहाड़ अपनी पीठ पर उठाए, अलमस्त हाथी की तरह झूम-झूम कर चलते डंपर। उन डंपरों के चलने से ऐसा शोर होता ज्यों सैंकड़ों सिंह दहाड़ रहे हो। एक-एक डंपर एक बड़ी फैक्टरी के बराबर हैं।

डंपर के चलने के लिए चौड़ी सड़कें बनार्इ जाती हैं। इन्हें हाल-रोड कहा जाता है। हाल-रोड पर डंपर चलने के पूर्व पानी के टैंकर से जल-सिंचन किया जाता है ताकि धूल के बादल न उठें। बालुर्इ पत्थर की धूल फेफड़े के लिए नुकसानदेह होती है। फेफड़े के छिद्रों में कोयला और पत्थर की धूल के असुरक्षित सेवन से खदान-कर्मियों को न्यूमोकोनियोसिस, सिलकोसिस जैसी बीमारियाँ हो जाती हैं।

सिंगरौली क्षेत्र की कोयला खदानों में बड़ी-बड़ी ड्रेगलाइनें हैं। जमीन की सतह से डेढ़ सौ फीट तक गहरे से मिट्टी खोदकर तीन सौ फीट की दूरी पर ले जाकर 'डंप' करने वाला यंत्र 'ड्रेगलाइन'। यूनुस बड़े शौक से उस भीमकाय यंत्र को चलते हुए देखा करता, एकदम मंत्रमुग्ध होकर। रस्सों के सहारे 'बकेट' का संचालन। लंबे-लंबे 'बूम' पर घिर्रियों के सहारे रस्सों का अद्भुत खेल। 'डाक्टर' उर्फ शमशेर सिंह एक दिन यूनुस को ड्रेगलाइन दिखाने ले गए। पास जाकर उसे डर लगा था। रात का समय। सैकड़ों बल्बों के प्रकाश से ड्रेगलाइन का चप्पा-चप्पा प्रकाशमान था। इतनी रोशनी कि आँखें चुंधिया जाएँ। इतने बल्ब कि गिना न जा सके। मार्चिंग पैड से लेकर बूम के टॉप तक तेज रोशनी के सर्चलारइटें। 'डाक्टर' उसे एक जीप में बिठाकर ड्रेगलाइन तक ले गया था। जीप पाँच सौ मीटर की दूरी पर रोक दी गर्इ। वहाँ से अब पैदल जाना था। उतनी बड़ी ड्रेगलाइन के समक्ष इंसान कितना बौना नजर आता है। हाथी के समीप चींटी की सी हैसियत। ड्रेगलाइन एक घंटे में एक हजार मजदूरों के एक माह काम के बराबर मिट्टी हटाती है। इसे मात्र एक आदमी चलाता है। ड्रेगलाइन-आपरेटर। जिसका वेतन खदान के सभी श्रमिकों से ज्यादा होता है।

ड्रेगलाइन के पीछे दो डोजर लगातार चल रहे थे। वे ड्रेगलाइन की अगली 'सिटिंग' के लिए समतल जगह बना रहे थे।

डाक्टर ने यूनुस से कहा कि घूमती हुर्इ ड्रेगलाइन में चढ़ना होगा। ड्रेगलाइन का मार्चिंग-पैड ही जमीन से बीस फुट ऊँचा था। उस पर सीढ़ी लगी थी। डाक्टर उचक कर उस सीढ़ी पर चढ़ गया और जल्दी-जल्दी ऊपर चढ़ने लगा। यूनुस ने भी उसका पीछा किया। अब वे मार्चिंग-पैड पर थे। ड्रेगलाइन अपनी जगह पर बैठे-बैठे घूम-घूम कर मिट्टी उठाकर फेंक रहा था। फिर डाक्टर पचास फुट ऊँचे मशीन-रूम की तरफ जाने वाली सीढ़ी पर चढ़ने लगा। यूनुस भी पीछे-पीछे चढ़ गया। मशीन-रूम से गरम हवा निकल रही थी, जिससे अब ठंड लगनी कम हो गर्इ थी। मशीन-रूम का दरवाजा बंद था। डाक्टर ने धक्का मारकर दरवाजा खोला तो यंत्रों के चलने से उत्पन्न भयानक शोर से लगा कि कान के पर्दे फट जाएँगे। यूनुस ने कान हाथों से बंद कर लिए। मशीन-रूम में बड़े-बड़े मोटर, जेनेरेटर और जाने कितने उपकरण लगे थे। जिनके चलने से वहाँ शोर था।

डाक्टर युनुस को ड्रेगलाइन की क्रियाविधि के बारे में बताने लगा। डंप-रोप को घुमाने के लिए ड्रम लगा हुआ है। ड्रेग-रोप घुमाने के लिए ड्रम किधर है। यूनुस ने जाना कि आठ-दस फैक्टरियों के बराबर ड्रेगलाइन में मोटर-जेनेरेटर लगे हैं।

फिर वे लोग आपरेटर केबिन की तरफ गए। दो दरवाजा खोलने पर एक कारीडार मिला। जिस पर कालीन बिछा हुआ था। यहाँ तकनीशियन आराम कर रहे थे। डाक्टर ने यहाँ अपना जूता उतारा। यूनुस ने भी जूते उतारे। फिर एक काँच का दरवाजा खोल कर वे आपरेटर केबिन में जा पहुँचे। एकदम वातानुकूलित कमरा। काँच का घर। पीछे तरफ वायरलैस-सेट। बीच में आपरेटर की सीट। जिस पर एक सरदार जी आराम से बैठकर हाथ और पैर के संचालन से ड्रेगलाइन चला रहे थे। यूनुस को लेकर डाक्टर सामने की तरफ आ गया। यहाँ से नीचे कोयले की परत दिखलार्इ दे रही थी। जिसके ऊपर के ओवर-बर्डन को ड्रेगलाइन की बकेट से उठाकर सरदार जी तीन सौ फुट दूर किनारे डाल रहे थे। इस फेंकी हुर्इ मिट्टी का एक नया पहाड़ बनता जा रहा था। बड़ी लय-ताल बद्ध क्रिया थी ड्रेगलाइन की।

ड्रेगलाइन-आपरेटर के सामने और दोनों तरफ जाने कितने लीवर, बटन और सिग्नलिंग-लाइट्स लगे हुए थे। बीच-बीच में सरदारजी कंट्रोल-रूम से वायरलेस के जरिए बात करता जाता था। फिर सरदारजी ने डाक्टर की फरमाइश पर असिस्टेंट से कहा कि डाक्टर को 'पाँगड़ा' सुनवा दे यारा!

यूनुस ने उस दिन वहाँ चाय भी पी। आपरेटर की सुख-सुविधा की वहाँ पूरी व्यवस्था थी। यदि वह थक जाए या उसे हाजत लगी हो तो असिस्टेंट मौजूद रहता, जो ड्रेगलाइन आपरेशन जारी रखता।

ऐसी ही एक और हैरत-अंगेज मशीन है ड्रिलिंग-मशीन। ये जमीन में एक सौ पचास फुट गहरे और एक फुट व्यास के छेद करती है, जिनमें डेढ़ से दो टन बारूद डालकर ब्लास्टिंग की जाती है। एक बार में चार-पाँच सौ टन बारूद की ब्लास्टिंग होती है। आस-पास का इलाका दहल जाता है। धूल और रंग-बिरंगी गैसों के बादल काफी देर तक छाए रहते हैं। कहते हैं कि सिंगरौली क्षेत्र में खदान खुलने से पहले हर तरह के जंगली जानवर रहा करते थे। यह एक अभयारण्य की तरह था। खदान खुलने से जंगलात कम हुए। नगर बसे। जानवर जाने कहाँ गायब हो गए। आज भी सियार, मोर, लोमड़ी और बनमुर्गियाँ यहाँ नजर आते हैं। कर्इ लोग बाघ आदि देखने का दावा भी करते हैं।

धरती के गर्भ में सदियों से छिपी हैं कोयले की मोटी परतें।

कोयले की परत के ऊपर सख्त बालुर्इ परतदार तलछट चट्टानें हैं।

यूनुस ने ओवरमैन मुखर्जी दा से एक बार पूछा था कि दादा, ये कोयला बना कैसे?

बांग्लादेश से राँची आकर बसे मुखर्जी दा के सामने के दो दाँत टूटे हुए हैं। वह कुछ भी कहें, 'हत् श्शाला' कहे बिना अपनी बात पूरी न करते।

उन्होंने बताया कि करोड़ों बरस पूर्व यहाँ घने जंगल हुआ करते थे। फिर महाजलप्लावन हुआ होगा और वे सारे जंगलात पानी में डूब गए होंगे। पेड़-पौधे, वन्य जंतु, वनस्पतियाँ आदि सड़-गलकर कार्बनिक पदार्थों में तब्दील हो गए। कालांतर में उन पर बालू-मिट्टी की परतें जमती चली गर्इं। धीरे-धीरे उच्च ताप और दाब सहते-सहते जंगलात कोयले में बदल गए होंगे। इसीलिए अभी भी इन कोयले की परतों में वृक्षों के फासिल्स यानी जीवाश्म पाए जाते हैं।

कोयला कहीं-कहीं धरती की सतह के काफी नीचे मिलता है। उसकी क्वालिटी अच्छी होती है। उस कोयले को निकालने के लिए सुरंगें बनार्इ जाती हैं या चानक खोदे जाते हैं। ऐसी खदानों को अंडर-ग्राउंड खदानें कहा जाता है।

जिन स्थानों में कोयले की परत धरती की सतह से थोड़ा-बहुत नीचे मिलती है, उन कोयले की परतों का खनन 'ओपन-कास्ट' विधि से किया जाता है। ऐसी खदानें ओपन-कास्ट माइन या खुली खदानें कहलाती हैं।

ब्लास्टिंग के बाद चूर्ण हुर्इ चट्टानों को शावेल जैसे उत्खनन यंत्र खोदकर डंपरों पर लाद देते हैं। इन चट्टानों के चूर्ण को खनन-शब्दावली में 'ओवर-बर्डन' कहा जाता है। ओवर-बर्डन को डंपरों के जरिए डंपिंग एरिया में भेजा जाता है। 'डंपिंग एरिया' में ओवर-बर्डन डंप होते-होते एक पहाड़ सा बन जाता है।

सदियों पुराने पहाड़ कटकर ओवर-बर्डन के नए पहाड़ों में बदल जाते हैं। ओवर-बर्डन के पहाड़ इंसान के हाथ की रचना हैं। इन नए पहाड़ों की चोटियों को समतल कर उन पर वृक्षारोपण किया जाता है।

कोयला निकल जाने के बाद बाकी बचे गड्ढे को कृत्रिम झील में बदल दिया जाता है। इसी डंपिंग-एरिया में बुलडोजर चला करते हैं, जो डंपर द्वारा लार्इ गर्इ चट्टानों को 'डोज' कर समतल बनाता है, ताकि उन पर दुबारा डंपर आकर ओवर-बर्डन की डंपिंग कर सकें।

यूनुस उसी बुलडोजर की आपरेटरी सीखने खदान आया करता।

डंपिंग-एरिया में शेर की तरह दहाड़ते डंपर आते तो उन्हें देख कलेजा दहल जाता। डंपर आपरेटर जब रिवर्स-गियर लगाता तो उसका आडियो-विजुअल अलार्म बजने लगता -पीं पाँ पीं पांकृ...

डंपर पीछे चलकर बुलडोजर से बनार्इ गर्इ मेड़ पर आकर रुकता। फिर डंपर आपरेटर 'डंप लीवर' उठाता और ओवर-बर्डन का ढेर भरभराकर सैकड़ों फुट नीचे गहरार्इ में गिर जाता। कुछ माल मेड़ पर बच जाता जिसे डोजर-आपरेटर, डोजर की सहायता से साफ करता, ताकि अगला डंपर उस जगह पर आकर सुरक्षित 'अनलोड' कर सके।

डंपिंग क्षेत्र में किनारे की मेड़ बनाना ही असली हुनर का काम है। उस मेड़ को 'बर्म' कहा जाता है। अगर ये बर्म कमजोर बने तो डंपर के अनियंत्रित होकर नीचे लुढ़कने का खतरा बना रहता है। असुरक्षित डंपिंग-क्षेत्र में कर्इ दुर्घटनाएँ घट चुकी हैं।

 
इससे करोड़ों रुपए की लागत से आयातित डंपर दुर्घटनाग्रस्त होते हैं और कर्इ बार आपरेटर की जान भी जाती है। बुलडोजर से डोजिंग करना एक तरह की कला है। जिस तरह मूर्तिकार छेनी-हथोड़ी से बेजान पत्थरों पर जान फूँकता है, उसी तरह कुशल डोजर-आपरेटर, डोजर की ब्लेड के कलात्मक इस्तेमाल से ऊबड़-खाबड़ धरा का रूप बदल देता है।

यूनुस अपनी बेजोड़ मेहनत और लगन से जल्द ही इस हुनर में माहिर हो गया।

इससे उसके पियक्कड़ उस्ताद 'डाक्टर' का भी लाभ हुआ।

सेकेंड शिफ्ट की ड्यूटी में शाम घिरते ही यूनुस को बुलडोजर पकड़ा कर 'डाक्टर' दारू-भट्टी चला जाता।

कोयला खदान के श्रमिकों और कुछ अधिकारियों के मन में ये धारणा है कि दारू-शराब फेफड़े में जमी कोयले की धूल को काट फेंकती है। साथ ही एक नारा और गूँजता कि दारू के बिना खदान का मजदूर जिंदा नहीं रह सकता।

इसीलिए कोयला-खदान क्षेत्र में दारू के अड्डे बहुतायत में मिलते हैं।

लोक कहते कि मरने के बाद कोयला खदान के मजदूरों को जलाने में लकड़ी कम लगेगी, क्योंकि उनके फेफड़े में वैसे भी कोयले की धूल जमी होगी, जो स्वतः जलेगी।

मुखर्जी दा कहते - 'ये आदमी भी श्शाला गुड क्वालिटी का कोयला होता है।'

यूनुस ने कभी दारू नहीं पी।

हो सकता है इसके पीछे खाला-खालू का डर हो, या मन में बैठी बात कि मुसलमानों के लिए शराब हराम है। ठीक इसी तरह यूनुस बिना तस्दीक के बाहर गोश्त नहीं खाता। उसे पक्का भरोसा होना चाहिए कि गोश्त हलाल है, झटका नहीं। दोस्तों के साथ पार्टी-वार्टी में वह मछली का प्रोग्राम बनवाता या फिर शाकाहारी खाना खाता।

ओपन कास्ट कोयला खदान की हैवी मशीनों को चलाना सीखने के बाद उसमें आत्मविश्वास जागा।

सरकारी नौकरी तो मिलने से रही, हाँ अब वह बड़ी आसानी से किसी प्राइवेट नौकरी में तीन-चार हजार रुपए महीना का आदमी बन गया था।

खालू ने यूनुस के लिए कोयला-परिवहन करने वाली कंपनी 'मेहता कोल एजेंसी' यानी 'एमसीए' के मैनेजर से बात की।

मैनेजर ने जवाब दिया कि जगह खाली होने पर विचार किया जाएगा।

खालू जान गए कि प्राइवेट में भी हुनर की बदौलत नौकरी का जुगाड़ कर पाना उनके बस की बात नहीं, इसलिए वह हार मान गए।

लेकिन खाला कहाँ हार मानने वाली थीं।

मजदूर यूनियन के नेता चौबेजी से खाला की अच्छी बोलचाल थी। चौबेजी उनके मैके गाँव के थे। कॉलरी में इस तरह के संबंध काफी महत्व रखते हैं।

खाला के निमंत्रण पर चौबेजी एक दिन क्वाटर आए तो यूनुस दौड़कर उनके लिए दो बीड़ा पान ले आया। पान चबाते हुए चौबेजी ने कहा था - 'सबेरे दस बजे मेहतवा के आफिस पर लइकवा को भेज दें। आगे जौन होर्इ तौन ठीकै होर्इ।'

और वाकर्इ, चौबेजी की बात पर उसे अस्थायी तौर पर काम मिल गया।

'परमानेंट' के बारे में चौबेजी को विश्वास दिलाया गया कि काम देखकर जल्द ही बालक को परमानेंट कर दिया जाएगा।

एक बात जरूर यूनुस को सुना दी गर्इ कि कंपनी अपनी आवश्यकतानुसार, काम पड़ने पर अपने कर्मचारियों को देश के किसी भी हिस्से में काम करने भेज सकती है। एमसीए का कारोबार बिहार, बंगाल, झारखंड, एमपी और छत्तीसगढ़ में फैला है। इनमें से किसी भी प्रांत में उन्हें भेजा जा सकता है।

मरता क्या न करता, यूनुस ने तमाम शर्तें मान लीं।

इसके अलावा कोर्इ चारा भी तो न था।

भीमकाय सरकारी डंपरों में लदकर कोयला कोल-यार्ड तक पहुँचता।

वहाँ उनमें से शेल-पत्थर आदि को छाँटा जाता है। कोल-यार्ड को पहली निगाह में कोर्इ बाहरी आदमी कोयला-खदान ही समझेगा। सैकड़ों एकड़ में फैले विस्तृत-क्षेत्र में कोयले के टीले। इन्हें अब प्राइवेट दस-टनिया डंपरों में भरकर रेलवे साइडिंग तक पहुँचाने का काम एमसीए का था। इन दस-टनिया डंपरों से सीधे ग्राहकों तक भी कोयला पहुँचाया जाता।

कोयला-यार्ड में पेलोडर मशीन से दस-टनिया डंपरों में कोयला भरा करता था यूनुस। उसकी कार्यकुशलता, लगनशीलता, कर्मठता और मृदु व्यवहार के कारण मुंशी-मैनेजर उसे बहुत मानते थे। कोर्इ उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।

न जाने क्यों ऐसे हालात बने कि उसे खाला का घर छोड़ने को निर्णय लेना पड़ गया।

वैसे भी उसे लग रहा था कि उसका दाना-पानी अब उठा ही समझो। वो तो अच्छा हुआ कि बड़े भार्इ सलीम की तरह अकुशल श्रमिकों की श्रेणी में उसकी गिनती नहीं थी। उसकी एक 'मार्केट वैल्यू' बन चुकी है। उसे मालूम था कि इस बहुत कुछ पाने के लिए वह ढेर सारा खो भी रहा है। यानी तपती-चिलचिलाती धूप में घनी आम की छाँह जैसी अपनी सनूबर को...

वह सनूबर को दिल की गहराइयों से प्यार करता था।

फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' का एक मशहूर गाना वह अक्सर गुनगुनाया करता -'ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना।' बिग बी अमिताभ की तर्ज पर इसे यूँ भी कहा जा सकता है - 'सनूबर के बिना जीना भी कोर्इ जीना है लल्लू, अंय...'

क्या अब वह सनूबर से कभी मिल पाएगा?

यूनुस जानता है कि वह सनूबर के लायक नहीं।

मखमल में टाट का पैबंद, यही तो खाला ने उसके बारे में कहा था।

खाला जानती थी कि वह सनूबर को चाहता है। सनूबर भी उसे पसंद करती है, लेकिन सिर्फ एक-दूसरे को चाह लेने से कोर्इ किसी की जीवन-संगिनी तो बन नहीं सकती।

यूनुस के पास सनूबर को खुश रखने के लिए आवश्यक संसाधन कहाँ?

'माना कि दिल्ली मे रहोगे, खाओगे क्या गालिब?'

अब सनूबर उसकी कभी न हो पाएगी!

दुनिया में कुछ इंसान भाग्यवश स्वर्ग के सुख भोगते हैं और कुछ इंसानों के छोटे-छोटे स्वप्न, तुच्छ सी इच्छाएँ भी पूरी नहीं हो पाती हैं... क्यों?

ऐसे ही कितने सवालों से जूझता रहा यूनुस...

सत्रह

प्लेटफार्म के मुख्य-द्वार पर एक लड़की दिखी।

यूनुस चौंक उठा।

कहीं ये सनूबर तो नहीं।

वैसी ही पतली-दुबली काया।

उस लड़की के पीछे एक मोटा आदमी और ठिगनी औरत थी, जो शायद उसके माँ-बाप हों।

वे प्रथम श्रेणी के प्रतीक्षालय की तरफ जा रहे थे।

यूनुस सनूबर को बड़ी शिद्दत से याद करने लगा।

उसे याद आने लगीं वो सब बातें, जिनसे शांत जीवन में हलचल मची।

जमाल साहब का खाला के घर में प्रभाव बढ़ता गया। हरेक मामलात में उनकी दखलंदाजी होने लगी।

रमजान के महीने में वह रात को खाला के घर में ही रुकने लगे। रमजान में सुबह सूरज उगने से पूर्व कुछ खाना पड़ता है, जिसे सेहरी करना कहते हैं। गेस्ट हाउस में कहाँ ताजा रोटी रात के दो-तीन बजे बनती। इसलिए खाला की कृपा से ये जमाल साहब शाम को जो घर आते तो फिर सुबह फजिर की नमाज के बाद ही वापस गेस्ट-हाउस जाते।

र्इद में वह नागपुर जाते, लेकिन खाला और खालू की जिद के कारण वह अपने माता-पिता और भार्इ-बहनों के पास नहीं जा पाए।

जाने कैसा जादू कर रखा था खाला ने उन पर...

असली कारण तो यूनुस को बाद में पता चला।

हुआ ये कि इस बीच एक ऐसी बात हुर्इ कि यूनुस को खाला के घर अपनी औकात का अंदाजा हुआ।

उस दिन उसने जाना कि यदि यहाँ रहना है तो अपमानित होकर रहना होगा।

उसने जाना कि पराधीनता क्या होती है?

उसने जाना कि गरीबी इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है।

उसने जाना कि पराश्रित होकर जीने से अच्छा मर जाना है।

और उसी समय उसके मन में अपने परों के भरोसे अपने आकाश में उड़ने की इच्छा जागी।

हुआ ये कि सनूबर ने यूनुस के कपड़े बिना धोए यूँ ही फींच-फाँच कर सुखा दिए थे। कपड़ों में साबुन लगाया ही नहीं था।

ग्रीस-तेल और पसीने की बदबू कपड़े में समार्इ हुर्इ थी।

यूनुस का पारा सातवें आसमान में चढ़ गया।

उसने आव देखा न ताव, सनूबर की पिटार्इ कर दी।

सनूबर चीख-चीख कर रोती रही।

खाला ने यूनुस को जाहिल, गँवार, खबीस, राच्छस, भुक्खड़, एहसान-फरामोश और भगोड़ा आदि जाने कितनी उपाधियों से नवाजा।

यूनुस उस दिन ड्यूटी गया तो फिर घर लौटकर न आया। उसने कल्लू के घर रहने की ठान ली थी। जैसे अन्य लड़के जीवन गु़जार रहे हैं, वैसे वह भी रह लेगा। खाला के घर में हुर्इ बेइज्जती से उसका मन टूट चुका था।

दूसरे दिन जब वह घर न लौटा तो खालू स्वयं एमसीए की वर्कशाप में आए। उन्होंने यूनुस को घूरकर देखा।

फिर पूछा - 'घर काहे नहीं आता बे!'

यूनुस खालू से बहुत डरता था।

उसकी रूह काँप गर्इ।

उसने कहा - 'ओवर-टाइम कर रहा था। आज आऊँगा।'

खालू मुतास्सिर हुए।

उसकी जान बची।

शाम ड्यूटी से छूटने पर उसने मनोहरा के होटल से गर्मागर्म समोसे खरीदे। साथ में इमली की खटमीठी चटनी रखवार्इ। सनूबर को समोसे बहुत पसंद हैं।

वाकर्इ, उसे किसी ने कुछ न कहा।

सभी ने दिल लगाकर समोसे खाए।

खाला के कहने पर सनूबर ने दो समोसे अपने जमाल अंकल के लिए रख दिए।

उस रात सभी ने लूडो खेली।

जमाल अंकल, खाला, सनूबर और यूनुस।

यूनुस के बगल में सनूबर थी और उसके बगल में जमाल अंकल। टी-टेबल के चारों तरफ बैठे थे वे।

यूनुस ने खेल के दरमियान महसूस किया कि टेबल के नीचे एक दूसरा खेल जारी है। जमाल अंकल के पैर सनूबर के पैर से बार-बार टकराते हैं। ऐसे संपर्क के दौरान दोनों बात-बेबात खूब हँसते हैं।

उसके पल्टे हुए गुलाबी होंठ जब हँसने की मुद्रा में होते तो यूनुस को दीवाना बना जाते थे, लेकिन आज उसे वे होंठ किसी चुड़ैल के रक्त-रंजित होठों की तरह दिखे।

उसे सनूबर की बेवफार्इ पर बड़ा गुस्सा आया।

उस रात खालू की नाइट-शिफ्ट थी।

खालू खाना खाकर ड्यूटी चले गए।

जमाल साहब भी जाना चाहते थे कि टीवी पर गुलाम अली की गजलों का कार्यक्रम आने लगा।

'चुपके-चुपके रात-दिन आँसू बहाना याद है

हमको अब तक आशिकी का वो जमाना याद है'

मुरकियों वाली खनकदार आवाज में गु़लाम अली अपनी सुरों का जादू बिखेर रहे थे। यूनुस भी गुलाम अली को पसंद करता था, लेकिन जमाल साहब की रुचि जानकर उसे जाने क्यों गुलाम अली की आवाज नकियाती सी लगी। आवाज ऐसे लगी जैसे पान की सुपारी गले में फँसी हुर्इ हो।

जैसे जुकाम से नाक जाम हो।

वह टीवी के सामने से हट गया।

अंदर किचन में उसका बिस्तर बिछता था।

चटार्इ के साथ गुदड़ी लिपटी रहती। सुबह चटार्इ लपेट दी जाती और रात में वह सोने से पूर्व चटार्इ बिछा लेता। ओढ़ने के लिए एक चादर थी। तकिया वह लगाता न था।

किचन की लाइट बंद हो तब भी बाहर आँगन की रोशनी खिड़की से छनकर किचन में आती। उसे उस धुँधली रोशनी में सोने की आदत थी।

टीवी वाले कमरे से ठहाके गूँज रहे थे।

यूनुस के कान में कुछ अफवाहें पड़ चुकी थीं कि जमाल साहब बड़ा शातिर आदमी है। नागपुर में 'डोनेशन' वाले इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ कर निकला है जमाल साहब। सुनते हैं कि वहाँ वह गुंडा था गुंडा।

उसकी खूब चलती थी वहाँ।

बाहरी लड़कों से महीना वसूली करता था जमाल साहब।

खालू ने उसे घर घुसा कर अच्छा नहीं किया है।

एक के मुँह से यूनुस ने सुना कि जमाल साहब की नजर खुली बोरी और बंद बोरी की शक्कर, दोनों में है।

खुली बोरी और बंद बोरी की बात यूनुस समझ सकता था, क्योंकि फुटपाथी विश्वविद्यालय के कोर्स के मुहावरों में ये भी था।

खुली बोरी यानी खाला और बंद बोरी माने सनूबर!

यूनुस को नींद नहीं आ रही थी।

गुलाम अली की आवाज किसी तेज छुरी की तरह उसकी गर्दन रेत रही थी -

'तुम्हारे खत में नया इक सलाम किसका था

न था रकीब तो आखिर वो नाम किसका था'

'वफा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे

तुम्हें भी याद है कि ये कलाम किसका था'

सनूबर की खिलखिलाहट सुनकर यूनुस का दिल रो रहा था।

उसने करवट लेकर अपने कान को कुहनी से दबा लिया।

आवाज मद्धम हो गर्इ।

नींद लाने के लिए कलमे का विर्द करने लगा -

'ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह।'

पता नहीं उसे नींद आर्इ या नहीं, लेकिन रात अचानक उसे अपना पैजामा गीला लगा।

हाथ से टटोला तो गीली-चिपचिपी हो गर्इं उँगलियाँ, यानी...

उसका दिमाग खराब हो गया।

नींद उचट गर्इ।

पेशाब का दबाव मसाने पर था।

वह उठा।

खिड़की के पल्लों से छनकर पीली रोशनी के धब्बे कमरे में फैले हुए थे। ठीक उसके पैजामे में उतर आए धब्बों की तरह।

उसे कमजोरी सी महसूस हो रही थी। जाने क्यों स्वप्न में हुए स्खलन के बाद उसकी हालत पस्त हो जाती है।

उठने की हिम्मत न हुर्इ।

वह कुछ पल बैठा रहा।

तभी उसके कान खड़े हुए।

 
पहले कमरे से फुसफुसाने की आवाज आ रही थी। तख्त भी हौले-हौले चरमरा रहा था।

यूनुस ने किचन से लगे बच्चों के कमरे में झाँका। वहाँ सनूबर अपने अन्य भार्इ-बहनों के साथ सोर्इ हुर्इ थी।

इसका मतलब पहले कमरे में खाला हैं। फिर उनके साथ कौन है? खालू की तो नाइट शिफ्ट है।

यूनुस के मन में जिज्ञासा के साथ भय भी उत्पन्न हुआ।

वह दबे पाँव पहले कमरे के दरवाजे की झिर्रियों से अंदर झाँकने लगा।

पहले कमरे में भी अँधेरा ही था।

हाँ, रोशनदान के जरिए सड़क के खंभे से रोशनी का एक बड़ा टुकड़ा सीधे दीवाल पर आ चिपका था।

अँधेरे की अभ्यस्त उसने तख्त पर निगाहें टिकार्इं।

देखा खाला के साथ जमाल साहब आपत्तिजनक अवस्था में हैं।

उसकी टाँगें थरथराने लगीं।

उसका कंठ सूख गया।

हाथ में जुंबिश होने लगी।

दिल की धड़कनें तेज क्या हुर्इं कि उसका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया।

इसी ऊहा-पोह में वहाँ से भागना चाहा कि उसके पैरों की आहट सुनकर खाला की दबी सी चीख निकली।

यूनुस तत्काल अपने बिस्तर पर आकर लेट गया।

पहले कमरे की गतिविधि में विघ्न पैदा हो चुका था। वहाँ से आने वाली आहटें बढ़ीं। फिर बाहर का दरवाजा खुलने की आवाज आर्इ। फिर स्कूटर के स्टार्ट होने की आवाज आर्इ और लगा कि फुर्र से उड़ गर्इ हो स्कूटर।

यूनुस को काटो तो खून नहीं।

आँखें बंद किए, करवट बदले वह अब खाला की हरकतों का अंदाजा लगाने लगा।

लगता है खाला ने पहले बच्चों के कमरे की लाइट जलाकर वहाँ का जायजा लिया है।

अब वह किचन की तरफ आ रही हैं।

लाइट जलाकर यहाँ भी वह यूनुस के पास कुछ देर खड़ी रहीं।

उनका शातिर दिमाग माजरा समझना चाह रहा था।

फिर वह पुनः पहले कमरे में चली गर्इं।

यूनुस की जान में जान आर्इ।

वह उसी तरह पड़ा रहा जबकि पेशाब के जोर से मसाने फटने को थे।

जमाल साहब और खाला की हकीकत, सनूबर का जमाल साहब की तरफ झुकाव और सनूबर के साथ जमाल साहब के रिश्ते को लेकर खाला-खालू के ख्वाब...

पूरी पहेली यूनुस के सामने थी।

उस पहेली का हल भी उसके सामने था।

लेकिन उसमें यूनुस का कोर्इ रोल न था...

इस स्थिति से निपटने के लिए यूनुस के दिमाग में एक बात आर्इ।

क्यों न सनूबर को वस्तुस्थिति से अवगत कराया जाए! उसके बाद जो होगा, सो होगा।

अठारह

जब यूनुस ड्यूटी से घर लौटा, उस समय दिन के बारह बजे थे।

खाला घर में नहीं थीं। हस्बेमामूल खाला पड़ोसियों के घर बैठने गर्इ हुर्इ थीं।

सनूबर लगता है स्कूल नहीं गर्इ थी और किचन में चावल पका रही थी।

यूनुस आजकल सनूबर से ज्यादा बातें नहीं करता। बस, काम भर की बातें। वह सीधे आँगन में पानी की टंकी की तरफ हाथ-मुँह धोने चला गया।

गमछे से मुँह पोंछते हुए वह पहले कमरे में चला गया। पर्दा उठा हुआ था। बाहर से रोशनी अंदर आ रही थी। शायद बिजली नहीं थी, वरना इस घर में टीवी कम ही बंद रहता है।

यूनुस तख्त पर लेट गया।

उसने आँखें बंद कर लीं।

उसके माथे पर गहरी लकीरें थीं।

सनूबर कब आकर दरवाजे के पास खड़ी हुर्इ उसे पता न चला। जब सनूबर ने दरवाजा खोला तो चूँ... की आवाज से उसकी तंद्रा भंग हुर्इ।

उसने सनूबर के चेहरे को ध्यान से देखा।

उसे लगा कि सनूबर उससे कुछ कहना चाह रही है।

यूनुस उठ बैठा।

उसने सनूबर के पलटे हुए होंठ और भारी पलकों में कैद उदास आँखों को बड़ी हसरत से देखा। कितना प्यार था सनूबर से उसको।

सनूबर तख्त के पास कुर्सी पर बैठ गर्इ।

यूनुस को लगा कि उसके दिल की गहराइयों से आवाज गूँजी हो - 'सनूबर...!'

सनूबर कुछ न बोली।

'सनूबर, तुम्हें मालूम है, तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है।'

यूनुस की बहकी-बहकी बातें सुनकर सनूबर डरी हुर्इ लग रही थी।

'डरो नहीं, ये सच है... तुम्हारे साथ तुम्हारी मम्मी एक खेल खेल रही हैं।'

सनूबर ने अपने कान पर हाथ रख लिए - 'क्या बक रहे हो, यूनुस...?'

'सच सनूबर, तुम्हें जमाल साहब से हुशियार रहना चाहिए। वह बड़ा धोखेबाज है। मैं कैसे कहूँ कि जमाल अंकलवा कितना कमीना है।'

तभी दीवाल घड़ी टनटनार्इ - 'टन्न!'

सनूबर ने घड़ी देखी - 'एक बज गए, मम्मी आती होंगी।'

यूनुस की समझ में न आ रहा था कि बीती रात की दास्तान को वह किन लफ्जों में बयान करे।

फिर भी हिम्मत करके वह बोला - 'सनूबर! वो जमाल सहबवा तुमसे हमदर्दी का दिखावा करता है और जानती हो वो कितना कमीना है कि सुनोगी तो... अच्छा किसी से बताओगी तो नहीं न!'

सनूबर इतने में झुँझला गर्इ।

'नहीं बाबा, किसी से नहीं कहूँगी, तुम बताओ तो सही।'

'तो सुनो, कल रात मैंने अपनी आँखों से देखा। अल्ला-कसम, कलाम-पाक की कसम जो झूठ बोलूँ मुझे मौत आ जाए। मैंने जमाल साहब और खाला को कल रात एक साथ एक बिस्तर पर देखा है सनूबर... तुम्हें विश्वास हो या न हो ये सच है सनूबर...'

सनूबर ने अपने कान बंद कर लिए।

वह रोने लगी।

'कल रात वो हालात देखने के बाद कहाँ सो पाया हूँ, सनूबर!'

यूनुस का मन तो हल्का हुआ लेकिन सनूबर तो जैसे बेजान हो गर्इ।

खाला आर्इं तो यूनुस आँखें बंद किए सोने का नाटक करता रहा।

सनूबर अपने कमरे में लेटी रही।

खाला यूनुस के पास कुर्सी पर बैठ कर चीखीं - 'कहाँ मर गर्इ कुतिया...'

सनूबर ने जवाब न दिया तो उठ कर अंदर गर्इं और सनूबर को झिंझोड़कर उठाते हुए बोलीं - 'कैसे पसरी है महारानी, खाना-वाना बनेगा या आज हड़ताल है? इसीलिए उनसे कहती हूँ कि लड़कियन को पढ़वाइए मत, लेकिन सुनें तब न! आजकल अपने जमाल अंकल की शह पाकर हरामजादी जबान लड़ाना सीख गर्इ है।'

सनूबर कुछ न बोली और उठ बैठी।

यूनुस ने भी आवाज सुनकर नींद खुलने का अभिनय किया।

तब तक चिट्टे-पोट्टे स्कूल से घर आ गए और संयोग से लाइट भी आ गर्इ। छुटकी जमीला ने बस्ता यूनुस की गोद पर पटककर टीवी ऑन किया।

टीवी से चिपककर घंटों वह कार्टून प्रोग्राम देखा करती है।

यूनुस ने देखा कि सनूबर गाली खाकर भी न उठी तो खाला स्वयं किचन में घुसीं।

खाना तो वैसे तैयार ही था।

बस दाल छौंकना बाकी था।

दुपहर में सब्जी बनती न थी। दाल-भात अचार वगैरा के साथ खाया जाता। खालू 'हरियर मिर्च' के साथ खाना खा लेते थे।

दाल छौंक कर खाला ने यूनुस को आवाज दी।

यूनुस उठा और किचन के पास दालान में अपनी सोने की जगह नंगे फर्श पर बैठ गया।

सनूबर वैसे ही गुमसुम लेटी रही और खाला के संग यूनुस ने खाना खा लिया।

यूनुस जानता था कि सनूबर इतनी आसानी से उसकी बात पर विश्वास करेगी नहीं। वह अपने तर्इं छानबीन जरूर करेगी।

पता नहीं उसने क्या छानबीन की और उससे उसे क्या हासिल हुआ लेकिन अगली सुबह यूनुस ने अपने बिस्तर पर अपनी बगल में गर्माहट पार्इ तो जाना कि सनूबर उसकी बगल में लेटी है।

वह घबरा कर उठ बैठा।

सनूबर ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा।

यूनुस ने पहले कमरे और अंदर वाले कमरे की तरफ देखा। आहट लेने की कोशिश की। दीवाल घड़ी पाँच बार टनटनार्इ।

इसका मतलब सभी सो रहे हैं।

खालू तो ड्यूटी गए हुए हैं।

वह सनूबर के बगल में लेट गया।

सनूबर ने उसे बाँहों में भर लिया।

पतली-दुबली सनूबर का नर्म-गुनगुना आलिंगन...

सनूबर उसके कानों में फुसफुसार्इ - 'मुझे भगा कर ले चलो इस जहन्नुम से यूनुस...!'

उस दिन उसे एहसास हुआ कि वह कितना कमजोर आदमी है।

उस दिन उसने फैसला किया कि अब वह अपने लिए एक नर्इ जमीन तलाशेगा...

एक नया आसमान बनाएगा...

एक नए सपने को साकार करेगा...

 
एक नर्इ पहचान

एक

घंटी की टनटनाहट के साथ प्लेटफार्म में हलचल मच गर्इ।

रात के ठिठुरते अंधियारे को चीरती पैसेंजर की सीटी नजदीक आती गर्इ और चोपन-कटनी पैसेंजर ठीक साढ़े बारह बजे प्लेटफार्म पर आकर रुकी।

इक्का-दुक्का मुसाफिर गाड़ी से उतरे। पूरी गाड़ी अमूमन खाली थी।

यूनुस जल्दी से इंजन की तरफ भागा। वह इंजिन के पीछे वाली पहली बोगी में बैठना चाहता था। यदि खालू आते भी हैं तो इतनी दूर पहुँचने में उन्हें समय तो लगेगा ही।

पहली बोगी में वह चढ़ गया।

दरवाजे से लगी पहली सीट पर एक साधू महाराज लेटे थे।

अगली लाइन में कोर्इ न था। हाँ, वहाँ अँधेरा जरूर था। वैसे भी यूनुस अँधेरी जगह खोज भी रहा था। उसने अपना बैग ऊपर वाली बर्थ पर फेंक दिया और ट्रेन से नीचे उतर आया।

वह चौकन्ना सा चारों तरफ देख रहा था।

अचानक उसके होश उड़ गए।

स्टेशन के प्रवेश-द्वार पर खालू नीले ओवर-कोट में नजर आए। उनके साथ एक आदमी और था। वे लोग बड़ी फुर्ती से पहले गाड़ी के पिछले हिस्से की तरफ गए।

यूनुस तत्काल बोगी पर चढ़ गया और टॉयलेट में जा छिपा।

उसकी साँसें तेज चल रही थीं।

ट्रेन वहाँ ज्यादा देर रुकती नहीं थी।

तभी उसे लगा कि कोर्इ उसका नाम लेकर आवाज दे रहा है - यू...नू...स! यू...नू...स!

यूनुस टॉयलेट में दुबक कर बैठ गया।

गाड़ी की सीटी की आवाज आर्इ और फिर गाड़ी चल पड़ी।

वह दम साधे दुबका रहा।

जब गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली, तब उसकी साँस में साँस आर्इ।

बैग कंधे पर टाँगे हुए ही वह खड़े-खड़े मूतने लगा।

वाश-बेसिन के पानी से उँगलियों को धोते वक्त उसकी निगाहें आर्इने पर गर्इं।

आर्इने के दाहिनी तरफ स्केच पेन से स्त्री-पुरुष के गोपन-संबंधों को बयान करता एक बचकाना रेखांकन बना हुआ था।

यूनुस ने दिल बहलाने के लिए उस टॉयलेट की अन्य दीवारों पर निगाह दौड़ार्इ।

दीवार में चारों तरफ उसी तरह के चित्र बने थे और साथ में अश्लील फिकरे भी दर्ज थे।

यूनुस टॉयलेट से बाहर निकला, लेकिन वह चौकन्ना था।

ट्रेन की खिड़की से उसने बाहर झाँका।

दो पहाड़ियों के बीच से गुजर रही थी गाड़ी। आगे जाकर महदइया की रोशनी दिखार्इ देगी क्योंकि अगला स्टेशन महदइया है।

सिंगरौली कोयला क्षेत्र का आखिरी कोना महदइया यानी गोरबी ओपन-कास्ट खदान।

हो सकता है कि खालू ने खबर की हो तो महदइया स्टेशन में उनके मित्र उसे खोजने आए हुए हों।

पहाड़ियाँ समाप्त हुर्इं और रोशनी के कुमकुम जगमगाते नजर आने लगे।

इसका मतलब स्टेशन करीब है।

महदइया स्टेशन के प्लेटफार्म में प्रवेश करते समय ट्रेन की गति धीमी हुर्इ तो यूनुस पुनः एक टॉयलेट में जा घुसा। वह किसी तरह के खतरे का सामना नहीं करना चाहता था।

उसका अंदाज सही था।

इस प्लेटफार्म पर भी उसे अपने नाम की गूँज सुनार्इ पड़ी। इसका मतलब ये सच था कि खालू ने यहाँ भी अपने दोस्तों को फोन कर दिया था।

वह टॉयलेट में दुबक कर बैठा रहा और पाँच मिनट बाद ट्रेन सीटी बजा कर आगे बढ़ ली।

यूनुस ने राहत की साँस ली।

टॉयलेट से वह बाहर निकला।

उसने देखा कि साधू महाराज के पैर के पास एक स्त्री बैठी है। वह एक देहाती औरत थी। साधू महाराज के वह पाँव दबा रही थी।

यूनुस ने उस सीट के सामने ऊपर वाली बर्थ पर अपना बैग रखा। फिर खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ कर शीशे के पार अँधेरे की दीवार को भेदने की बेकार सी कोशिश करने के बाद अपनी बर्थ पर उचक कर चढ़ गया।

उसे नींद आने लगी थी।

एअर-बैग से उसने गर्म चादर निकाली और उसे ओढ़ लिया। एयर-बैग अपने सिरहाने रख लिया ताकि चोरी का खतरा न रहे।

ट्रेन की लकड़ी की बेंच ठंडा रही थी। वैसे तो उसने गर्म कपड़े पर्याप्त मात्रा में पहन रखे थे, लेकिन ठंड तो ठंड ही थी। रात के एक-डेढ़ बजे की ठंड। उसका सामना के करने लिए औजार तो होने ही चाहिए।

वह उठ बैठा और अपनी जेब से सिगरेट निकाल ली। सिगरेट सुलगाते हुए साधू महाराज की तरफ उसकी निगाह गर्इ।

देहाती स्त्री बड़ी श्रद्धा से साधू महाराज के पैर दबा रही थी।

साधू महाराज यूनुस को सिगरेट सुलगाते देख रहे थे। दोनों की निगाहें मिलीं।

यूनुस ने महसूस किया कि वह भी धूम्रपान करना चाहता है।

यूनुस बर्थ से नीचे उतरा।

उसने महाराज की तरफ सिगरेट बढ़ार्इ।

साधू महाराज खुश हुआ।

उसने सिगरेट सुलगार्इ और गाँजा की तरह उस सिगरेट के सुट्टे मार कर बाकी बची सिगरेट स्त्री को दे दी।

स्त्री प्रसन्न हुर्इ।

उसने सिगरेट को पहले माथे से लगाया फिर भोले बाबा का प्रसाद समझ उस सिगरेट को पीने लगी।

स्त्री के बाल लटियाए हुए थे। हो सकता है कि वह सधुआइन बनने की प्रक्रिया में हो। उसके माथे पर भभूत का एक बड़ा सा टीका लगा हुआ था।

उसकी आँखों में शर्मो-हया एकदम न थी। वह एक यंत्रचालित इकार्इ सी लग रही थी। तमाम आडंबर से निरपेक्ष, साधू महाराज की सेवा में पूर्णतया समर्पित...

साधू महाराज ने पूछा - 'कौन बिरादरी का है तू?'

यूनुस को मालूम है कि बाहर पूछे गए ऐसे प्रश्नों का क्या जवाब दिया जाए। जिससे माहौल न बिगड़े और काम भी चल जाए।

एक बार उसने सच बोलने की गलती की थी, जिसके कारण उसे बेवजह तकलीफ उठानी पड़ी थी।

उसे कटनी में स्थित उस धर्मशाला का स्मरण हो आया, जहाँ वह एक रात रुकना चाहता था।

तब सिंगरौली के लिए चौबीस घंटे में एक ट्रेन चला करती थी। कोतमा से वह कटनी जब पहुँचा तब तक सुबह दस बजे चोपन जाने वाल पैसेंजर गाड़ी छूट चुकी थी। अब दो रास्ते बचे थे। वापस कोतमा लौआ जाए या फिर कटनी में ही रहकर चौबीस घंटे बिताए जाएँ। वैसे कटनी घूमने-फिरने लायक नगर तो है ही। कुछ सिनेमाघरों में 'केवल वयस्कों के लिए' वाली पिक्चर चल रही थीं। ट्रेन में ही एक मित्र बना युवक उससे बोला कि चलो, स्टेशन के बाहर एक धर्मशाला है। मात्र दस रुपए में चौबीस घंटे ठहरने की व्यवस्था। खाना इंसान कहीं भी खा लेगा। हाँ, एक ताला पास में होना चाहिए। धर्मशाला में ताला नहीं मिलता। जो भी कमरा मिले उसमे ग्राहक अपना ताला स्वयं लगाता है। यूनुस ने कहा था कि ताला खरीद लिया जाएगा।

वे लोग स्टेशन के बाहर निकले और सड़क के किनारे बैठे एक ताला-विक्रेता से यूनुस ने दस रुपए वाला एक सस्ता सा ताला खरीद लिया।

वे दोनों धर्मशाला पहुँचे।

पीली और गेरुआ मिट्टी से पुती हुर्इ एक पुरानी इमारत का बड़ा सा प्रवेश-द्वार। जिसके माथे पर अंकित था - 'जैन धर्मशाला'।

वे अंदर घुसे।

अंदर द्वार से लगा हुआ प्रबंधक का कमरा था।

उस समय वहाँ कोर्इ भी न था।

सहयात्री ने कहा कि चलो, धर्मशाला देख तो लो।

वे दोनों अंदर की तरफ पहुँचे। दुतल्ला में चारों तरफ कमरे ही कमरे बने थे। बीच में एक उद्यान था। उद्यान के अंदर एक मंदिर। पानी का कुआँ, हैंड-पंप, और नल के कनेक्शन भी थे।

वे वापस आए।

प्रबंधक महोदय आ चुके थे।

वह एक कृशकाय वृद्ध थे।

चश्मे के पीछे से झाँकती आँखें।

उन्होंने रजिस्टर खोल कर लिखना शुरू किया - 'नाम?'

सहयात्री ने बताया - 'कमल गुप्ता।'

- 'पिता का नाम?'

- 'श्री विमल प्रसाद गुप्ता'

- 'कहाँ से आना हुआ और कटनी आने का उद्देश्य?'

- 'चिरमिरी से कटनी आया, रेडियो का सामान खरीदने।'

- 'ताला है न?'

कमल गुप्ता ने बताया - 'हाँ!'

प्रबंधक महोदय ने रजिस्टर में कमल से हस्ताक्षर करवाकर उसे कमरा नंबर पाँच आवंटित किया।

फिर उन्होंने यूनुस को संबोधित किया।

- 'नाम?'

- 'जी, मुहम्मद यूनुस।'

स्वाभाविक तौर पर यूनुस ने जवाब दिया।

प्रबंधक महोदय ने उसे घूर कर देखा। उनकी भृकुटि तन गर्इ थी। चेहरे पर तनाव के लक्षण साफ दिखलार्इ देने लगे।

लंबा-चौड़ा रजिस्टर बंद करते हुए बोले - 'ये धर्मशाला सिर्फ हिंदुओं के लिए है। तुम कहीं और जाकर ठहरो।'
 
सहयात्री कमल गुप्ता नहीं जानता था कि यूनुस मुसलमान है। सफर में बातचीत के दौरान नाम जानने की जरूरत उन दोनों को महसूस नहीं हुर्इ थी, शायद इसलिए वह भी उसे घूरने लगा।

यूनुस के हाथ में एक नया ताला था।

वह कभी प्रबंधक महोदय के दिमाग में लगे ताले को देखता और कभी अपने हाथ के उस ताले को, जिसे उसने कुछ देर पहले बाहर खरीदा था।

उसने अपनी जिंदगी के व्यावहारिक शास्त्र का एक और सबक हासिल किया था।

वह सबक था, देश-काल-वातावरण देखकर अपनी असलियत जाहिर करना।

उसने जाने कितनी गलतियाँ करके, जाने कितने सबक याद किए थे।

सलीम भार्इ के पास ऐसी सहज-बुद्धि न थी, वरना वह ऐसी गलतियाँ कभी न करता और गुजरात के कत्ले-आम में यूँ न मारा जाता।

इसीलिए जब साधू महाराज ने उसकी बिरादरी पूछी तो वह सचेत हुआ और तत्काल बताया - 'महाराज, मैं जात का कुम्हार हूँ।'

साधू महाराज के चेहरे पर सुकून छा गया।

चेहरा-मोहरा, चाल-ढाल, कपड़ा-लत्ता और रंग-रूप से उसे कोर्इ नहीं कह सकता कि वह एक मुसलमान युवक है, जब तक कि वह स्वयं जाहिर न करे। उसे क्या गरज कि वह बैठे-बिठाए मुसीबत मोल ले।

वह इतना चालाक हो गया है कि लोगों के सामने 'अल्ला-कसम' नहीं बोलता, बल्कि 'भगवान-कसम' या 'माँ-कसम' बोलता है। 'अल्ला जाने क्या होगा' की जगह 'भगवान जाने' या फिर 'राम जाने' कह कर काम चला लेता है।

अगर कोर्इ साधू या पुजारी प्रसाद देता है तो बाकायदा झुक कर बार्इं हथेली पर दाहिनी हथेली रखकर उस पर प्रसाद लेता है और उसे खाकर दोनों हाथ सिर पर फेरता है। जबकि वही सलीम भार्इ हिंदुओं से पूजा-पाठ आदि का प्रसाद लेता ही नहीं था। यदि गलती से प्रसाद ले भी लिया तो फिर उसे खाता नहीं था, बल्कि चुपके से फेंक देता था।

यूनुस को यदि कोर्इ माथे पर टीका लगाए तो वह बड़ी श्रद्धा-भाव प्रकट करते हुए बड़े प्रेम से टीका लगवाता और फिर उसे घंटों न पोंछता।

ऐसी दशा में उस पर कोर्इ संदेह कैसे कर सकता है कि वह हिंदू नहीं है।

वैसे भी अनावश्यक अपनी धर्म-जाति प्रकट कर परदेश में इंसान क्यों खतरा मोल ले।

बड़ा भार्इ सलीम अगर यूनुस की तरह सजग-सचेत रहता। खामखा, मियाँ-कट दाढ़ी, गोल टोपी, लंबा कुर्ता और उठंगा पैजामा न धारण करता तो गुजरात में इस तरह नाहक न मारा जाता...

साधू महाराज ने यूनुस को आशीर्वाद दिया - 'तू बड़ा भाग्यशाली है बच्चा! तेरे उन्नत ललाट बताते हैं कि पूर्वजन्म में तू एक पुण्यात्मा था। इस जीवन में तुझे थोड़ा कष्ट अवश्य होगा लेकिन अंत में विजय तेरी होगी। तेरी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।'

यूनुस साधू महाराज के चेहरे को देख रहा था।

उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे। दाढ़ी बेतरतीब बढ़ी हुर्इ थी। उसकी आयु होगी यही कोर्इ पचासेक साल। चेहरे पर काइयाँपन की लकीरें।

साधू महाराज के आशीर्वाद से यूनुस को कुछ राहत मिली।

वह पुनः अपनी जगह पर चला गया और बैग से लुंगी निकालकर उसे बर्थ पर बिछा दिया ताकि लकड़ी की बेंच की ठंडक से रीढ़ की हड्डी बची रहे।

बर्थ पर चढ़ कर उसने जूते उतारकर पंखे पर अटका दिए।

अब वह सोना चाहता था।

एक ऐसी नींद कि उसमें ख्वाब न हों।

एकदम चिंतामुक्त संपूर्ण निद्रा...

जबकि यूनुस जानता है कि उसे नींद आसानी से नहीं आया करती। नींद बड़ी मान-मनौवल के बाद आया करती है।

उसने उल्टी तरफ करवट ले ली और सोने की कोशिश करने लगा।

खटर खट खट... खटर खट खट

ट्रेन पटरियों पर दौड़ रही थी।

सुबह छह बजे तक ट्रेन कटनी पहुँच जाएगी। फिर सात-साढ़े सात बजे बिलासपुर वाली पैसेंजर मिलती है। उससे बिलासपुर तक पहुँचने के बाद आगे कोरबा के लिए मन पड़ेगा तो ट्रेन या बस पकड़ी जाएगी।

बिलासपुर में स्टेशन के बाहर मलकीते से मुलाकात हो जाएगी।

मलकीते के पापा का एक ढाबा कोतमा में हुआ करता था। सन चौरासी के सिख-विरोधी दंगों में वह होटल उजड़ गया। सिख समाज में ऐसा डर बैठा कि आम हिंदुस्तानी शहरी दिखने के लिए सिख लोगों ने अपने केश कटवा लिए थे। मलकीते तब बच्चा था। अपने सिर पर रूमाल के जरिए वह केश बाँधा करता था। वह गोरा-नाटा खूबसूरत लड़का था। यूनुस को याद है कि लड़के उसे चिढ़ाया करते थे कि मलकीते अपने सिर में अमरूद छुपा कर आया करता है।

उसके पापा एक रिश्तेदार से मिलने राँची गए थे और इंदिरा गांधी की हत्या हो गर्इ। वे उस समय सफर कर रहे थे। सुनते हैं कि सफर के दौरान ट्रेन में उन्हें मार दिया गया था।

उस कठिन समय में मलकीते ने अपने केश कटवा लिए थे।

मलकीते के बारे में पता चला था कि सन चौरासी के बाद मलकीते की माली हालत खराब हो गर्इ थी।

तब मलकीते की मम्मी अपने भार्इ यानी मलकीते के मामा के पास बिलासपुर चली गर्इ थीं। वहीं मामा के होटल में मलकीते मदद करने लगा था।

स्टेशन के बाहर एक शाकाहारी और मांसाहारी होटल है - 'शेरे पंजाब होटल'।

यही तो पता है उसका।

इतने दिनों बाद मिलने पर जाने वह पहचाने या न पहचाने, लेकिन मलकीते एक नंबर का यार था उसका!

यूनुस ने फुटपाथी विश्वविद्यालय की पढ़ार्इ के बाद इतना अनुमान लगाना जान लिया था कि इस दुनिया में जीना है तो फिर खाली हाथ न बैठे कोर्इ। कुछ न कुछ काम करता रहे। तन्हा बैठ आँसू बहाने वालों के लिए इस नश्वर संसार में कोर्इ जगह नहीं।

अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इंसान को परिवर्तन-कामी होना चाहिए।

लकीर का फकीर आदमी का जीना मुश्किल है।

जैसा देस वैसा भेस...

कठिन से कठिन परिस्थिति में भी इंसान को घबराना नहीं चाहिए। कोर्इ न कोर्इ राह अवश्य निकल आएगी।

इसीलिए तो वह अम्मी-अब्बू, घर-द्वार, भार्इ-बहिन, रिश्ते-नाते आदि के मोह में फँसा नहीं रहा।

अपना रास्ता स्वयं चुनने की ललक ही तो है कि आज वह लगातार जलावतनी का दर्द झेल रहा है।

इसी उम्मीद में कि इस बार की छलाँग से शायद अल्लाह की बनार्इ इत्ती बड़ी कायनात में उसे भी कोर्इ स्वतंत्र पहचान मिल ही जाए...

दो

यूनुस ने सोचा कि सुबह कटनी पहुँच कर नाश्ता करने के बाद बिलासपुर वाली गाड़ी पकड़ी जाएगी।

कटनी का खयाल दिमाग में आया तो यूनुस को बड़की आपा याद हो आर्इ।

कहते हैं कि बड़की कटनी में कहीं रहती है।

खाला भी तो बता रही थीं कि अम्मा एक बार चोरी-छिपे उससे मिल आर्इ हैं। चूँकि उसने हिंदू धर्म अपना लिया है, इसलिए उसे अब बिरादरी में मिलाया तो नहीं जाएगा।

यूनुस सोच रहा था कि उनके घर में एक भी औलाद ठीक न निकली? इसका कारण क्या है?

उसने बचपन की तमाम घटनाओं को सूत्र-बद्ध करना चाहा। ज्ञात हुआ कि उसके अब्बा वंश-वृद्धि के पावन कर्तव्य को प्राथमिकता देते हैं। इस पावन यज्ञ से फुर्सत पाने के बाद उनकी चिंता का केंद्र नौकरी हुआ करती। अब्बा दिन भर में एक कट्टा बीड़ी और एक रुपए की खैनी हजम कर जाते। चाय अमूमन घर में ही पीते। इसके बाद भी यदि समय बच जाता तो स्थानीय कादरिया-मस्जिद कमेटी के लोगों के बीच उठते-बैठते। उनके एक और हमदर्द दोस्त थे नन्हू भार्इ, जिन्हें यूनुस नन्हू चच्चा कहा करता।

अब्बा ने अपनी बेशुमार आल-औलाद की तालीम-तरबीयत, कपड़ा-लत्ता और खान-पान के बारे में कभी ध्यान नहीं दिया। बच्चे चाहे जैसे अपना जीवन गुजारें, स्वतंत्र हैं।

 
अम्मा भी अब्बा के कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं। उन्होंने प्रति तीन बरस पर एक संतान के औसत को बरकरार रखा। बच्चा अपने प्रयास से स्तन खोज कर मुँह में ठूँस ले तो ठीक, वरना अम्मा के भरोसे रहा तो भूखा ही रह जाएगा।

अम्मा ज्यादातर अपनी खाट में पसरे रहा करती थीं। ठंड के दिनों मे अब्बा या कि बड़की खाट के नीचे बोरसी में आग डाल कर रख दिया करते। यूनुस उस खाट में कभी-कभी सोता था। बोरसी की आँच से गुदड़ी गरमा जाती और पीठ की अच्छी सिंकार्इ हो जाती थी।

अम्मा अपने सुख-दुख या फिर अपनी हारी-बीमारी की चिंता किया करती थीं।

हाँ, दिन भर चाहे जिस हालत में रहें, शाम होते ही अच्छे से चेहरा धो-पोंछकर स्नो-पाउडर लगा लेतीं। आँखों में काजल और माँग 'अफसन' से भरतीं। जिस्म फैल-छितरा गया है तो क्या, बनना-सँवरना तो इंसान की फितरत होती है। हाँ, लिपिस्टिक की जगह होंठ पान की लाली से रँगे हुआ करते।

अम्मा को भी अब्बा की तरह अपनी ढेर संतानों की कोर्इ चिंता कभी नहीं रही।

इस अव्यवस्था का परिणाम ये हुआ कि यूनुस की बड़ी बहिन बड़की अभी ठीक से जवान हो भी न पार्इ थी कि घर से भाग गर्इ।

यूनुस को याद है कि बड़की उसे कितना प्यार किया करती थी।

यूनुस तब चार-पाँच बरस का होगा।

बस जब देखो तब अपनी बड़की आपा के पास मँडराता रहता। अम्मा को तो बच्चों की सुध ही न रहती थी।

पड़ोस में एक सिंधी फलवाला रहता था।

सिंधी फलवाला सुबह नौ-दस बजे ठेले पर फल सजाया करता। वह नगर में घूम-घूम कर फल बेचा करता था। नौ बजे घर के सामने वाला सार्वजनिक नल खुला करता था। आधा-पौन घंटा भीड़ रहा करती, फिर जब लोग कम हो जाते तब बड़की बाल्टी लेकर पानी भरने निकलती। यूनुस भी अपनी बड़की आपा के पीछे एक डब्बा या डेगची लेकर पानी भरने चला आता।

बड़की आपा पानी भरने लगती और सिंधी फलवाले को देख मुस्कराया करती।

तब फलवाला यूनुस को इशारे से अपने पास बुलाता।

यूनुस फल की लालच में दौड़ा चला जाता।

सिंधी फलवाला उसे दो केले देता। कहता, एक अपनी आपा को दे देना।

यूनुस को बड़े शौक से अपने हिस्से का केला खाता और बड़की आपा के हिस्से का केला उसे दे देता। बड़की आपा केला हाथ में पकड़ती तो उसके गाल शर्म से लाल हो जाते। यूनुस को क्या पता था कि इस केले के माध्यम से उन दोनों के बीच किस तरह का 'कूट-संवाद' संपन्न होता था। वह तो चित्तीदार केले का मीठा स्वाद काफी देर तक अपनी जुबान में बसाए रखता था।

रात के नौ बजे बड़की आपा यूनुस का हाथ पकड़ कर टहलने निकलती।

तब सिंधी फलवाला फेरी लगाकर वापस लौट आता था।

बड़की आपा से जाने क्या इशारे-इशारे में वह बातें किया करता।

यूनुस को पुचकारकर पास बुलाता।

कोर्इ सड़ा सेब या केला उसके हाथ में पकड़ा देता।

यूनुस खुश हो जाता।

यूनुस रात में बड़की आपा के पास ही सोया करता था।

बड़की आपा उसे अच्छी तरह सीने से चिपका कर सुलाया करती और बहुत प्यार किया करती।

कभी-कभी सिंधी फलवाले का आपा के साथ किया गया व्यवहार नन्हे यूनुस को अच्छा नहीं लगता था। चूँकि बड़की आपा बुरा नहीं मानती थी और लजाकर हँस देती थी, इसलिए यूनुस सिंधी फलवाले की हरकतों को चुपचाप हजम कर जाया करता था।

एक दिन यूनुस के दोस्त छंगू ने उसे बताया कि यार, अगर तू बुरा न माने तो एक बात कहूँ। यूनुस ने उसे डपट दिया कि ज्यादा भूमिका न बाँधते हुए मुद्दे पर आ जाए।

छंगू बिचारा कहने में संकोच कर रहा था कि कहीं यूनुस उसे पीट न दे, इसलिए उसने एक बार फिर यूनुस से गछवा लिया कि भार्इ मेरे, तू बुरा तो नहीं मानेगा।

खीज कर यूनुस ने उसकी गर्दन पकड़ कर हिला दिया।

छंगू की आँखें बाहर निकलने को हो आर्इं, तब उसने कहा - 'छोड़ दे बे, बताता हूँ... कल रात घर के पिछवाड़े मैंने देखा था कि वो सिंधी फलवाला तेरी दीदी का चुम्मू ले रहा है।'

यूनुस का खून खौल उठा - 'तो?'

छंगू घबरा गया - 'इसीलिए मैं बोल रहा था कि बुरा न मानना।'

यूनुस ने उसे कुछ न कहा।

उसने स्वयं अपनी आँखों से ऐसा ही एक प्रतिबंधित दृश्य देखा था। वाकर्इ बड़की हद से आगे बढ़ रही है। अम्मा और अब्बा को तो बच्चे पैदा करने से फुर्सत मिलती नहीं कि वे बच्चों के बारे में सोचें।

एक दिन यूनुस पिछवाड़े आँगन में खड़े-खड़े मूत रहा था तब उसने अमरूद के पीछे देखा था कि सिंधी फलवाला और बड़की काफी देर तक एक दूसरे से चिपके खड़े थे।

यूनुस की समझ में न आया कि वह तत्काल क्या करे। उसने एक पत्थर उठाया और सिंधी फलवाले की पीठ पर दे मारा।

फलवाले ने बुरा नहीं माना, बल्कि मार खाकर वे दोनों बड़ी देर तक हँसते रहे थे।

सिंधी फलवाला यूनुस को साला कहा करता और एक मुहावरा उछाला करता - 'सारी खुदार्इ एक तरफ, जोरू का भार्इ एक तरफ!'

उस गुप-चुप चलती प्रेम कहानी की जानकारी सिर्फ यूनुस को थी।

सलीम भार्इ घर से ज्यादा मतलब न रखता लेकिन उसे बड़की की कारस्तानी का अंदाजा हो रहा था। उसने अम्मा से बताया भी था कि नालायक बड़की को डाँटिए कि उस सिंधी फलवाले से दूर रहे। लेकिन अम्मा को कहाँ फुरसत थी... उस समय छोटकी पेट में थी। वे तो अपनी सेहत को लेकर ही परेशान रहा करती थीं।

कहते हैं कि सलीम भार्इ ने एक बार अपने दोस्तों के साथ उस फलवाले को डराया-धमकाया भी था। उसके दोस्तों ने सिंधी फलवाले के ठेले पर बचे हुए फल लूट लिए थे और उसे चेतावनी दी थी कि अपनी आदतों से बाज आए।

जब सिंधी फलवाले और बड़की ने देखा कि उनके प्रेम-व्यापार के दुश्मन हजार हैं तो एक दिन बड़की आपा उस सिंधी फलवाले के साथ कहीं भाग गर्इ।

कहते हैं कि वे लोग कटनी चले गए हैं।

कटनी तो सिंधियों का गढ़ है गढ़...

इसीलिए यूनुस को कटनी से चिढ़ है।

बड़की के घर से भाग जाने के बाद जिसका मन सबसे ज्यादा हताहत हुआ वह सलीम भार्इ था। जाने क्यों अव्यवस्था का वह धुर विरोधी हुआ करता था। वह अपने दोस्तों में, अपने समाज में, अपनी और अपने परिवार की इज्जत बढ़ाने का प्रयास किया करता था। बड़की ने घर से भाग कर जैसे सरे-बाजार उसकी नाक कटा दी हो। सलीम भार्इ अपने दोस्तों के साथ कर्इ दिनों तक सिंधी फलवाले और उसके घरवालों की टोह लेता रहा था। यदि इस बीच वे मिल गए होते तो पक्का है कि फौजदारी हो जाती और बाकी जिंदगी सलीम भार्इ जेल में काटते।

बड़े जिद्दी स्वभाव का था सलीम भार्इ।

सुनता सबकी लेकिन करता अपने मन की।

होश सँभालते यूनुस के बड़े भार्इ सलीम ने देखा कि इस घर के रंग-मंच में अब ज्यादा दिन का रोल उसके लिए नहीं। अम्मा और अब्बा जिस तरह से घर चला रहे थे, उसमें सलीम को अपना भविष्य अंधकारमय लगा।

बड़की आपा के घर से भागने के बाद सलीम ने दोस्तों का साथ छोड़ दिया।

कुछ दिन वह घर में कैद रहा।

एकदम अज्ञातवास का जीवन...

अम्मा-अब्बा सभी उसकी हालत देख परेशान रहने लगे थे।

फिर एक दिन वह फजिर की अजान सुनकर जामा-मस्जिद की तरफ चला। वहाँ उसे नमाज पढ़ने के बाद तब्लीगी-जमात वालों के मुख से तकरीर सुनने को मिली। दिल्ली से जमात आर्इ हुर्इ थी। तब्लीगी-जमात वालों के रहन-सहन और जीवन-दर्शन से उसे प्रेरणा मिली।

उसके अशांत दिलो-दिमाग को सुकून मिला।

उन लोगों से वह इतना प्रभावित हुआ कि उस दिन घर न लौटा।

तब्लीग वालों के साथ ही मस्जिद में कयाम किया।

शाम को अस्र की नमाज के बाद जमात के लोग स्थानीय स्तर पर लोगों से सीधे संपर्क करने के लिए गश्त पर निकले।

वह भी उनके साथ गश्त पर निकला।

अमीरे-जमात किस तरह अपरिचित कलमा-गो लोगों को दीन-र्इमान की दावत दिया करते हैं, उसने देखा।

फिर मगरिब की नमाज के बाद जिक्र और र्इशा की नमाज के बाद अल्लाह की तस्बीह और याद और गहरी नींद का र्इनाम...

सलीम भार्इ तब नियमित रूप से जामा-मस्जिद में नमाज पढ़ने जाने लगा।

कभी-कभी चंद विदेशी मुसलमान भी धर्म-प्रचार और आत्मोत्थान के उद्देश्य से आया करते थे।

अब्बा तो कट्टर बरेलवी विचारों के थे। वे तब्लीगियों को 'मरदूद वहाबी' कहा करते और अक्सर एक तुकबंदी पढ़ा करते थे -

मरदूद वहाबी की यही निशानी

उठंगा पैजामा,

टकला सिर और काली पेशानी

 
बरेलवी लोगों की पोशाक देवबंदियों के ठीक विपरीत हुआ करती। देवबंदी जहाँ अपने सिर के बाल सफाचट करवाते हैं वहीं बरेलवी लोगों के बाल कान के ऊपर बढ़े होते हैं। देवबंदियों की मूँछें सफाचट रहेंगी जबकि बरेलवी लोग पतली-तराशी हुर्इ मूँछें रखते हैं। बरेलवियों का पैजामा या शलवार टखनों के नीचे तक रहती है। उनकी टोपियाँ काली रहती हैं। सफेद टोपियाँ हों तो कुछ आसमान की तरफ अतिरिक्त उठी हुर्इ रहेंगी। उनके कंधे पर शतरंजी डिजाइन का गमछा हुआ करता है।

यूनुस ने देवबंदी और बरेलवी दोनों तरह के मुसलमान करीब से देखे हैं। उसे आज तक समझ में नहीं आया कि बरेलवी लोगों के माथे पर बार-बार सिजदा करने से किसी तरह का दाग नहीं बनता है, जबकि इसी के उलट देवबंदी अभी महीने भर का पक्का नमाजी बना नहीं कि उसकी पेशानी पर गोल काला धब्बा उभर आता है।

ये ऐसी बुनियादी पहचान है जिसे दोनों अकीदे के लोग अपना अलग-अलग 'ड्रेस कोड' बनाए हुए हैं। इसी पहनावे और अन्य आउट-लुक से मुसलमान जान जाते हैं कि मियाँ किस अकीदे का है।

शिक्षित तबके का ओहदेदार मुसलमान जो इन सब लफड़ों में नहीं पड़ना चाहता उसके अकीदे के बारे में जानना मुश्किल होता है।

इसमें तो इतनी मुश्किल पेश आती है कि कोर्इ ये भी न जान सकें कि वह हिंदू है या मुसलमान...

यूनुस ने अपनी जीवन-यात्रा में इतना जान लिया था कि हिंदुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा...

सो उसे देखकर कोर्इ नहीं कह सकता था कि वह एक मुस्लिम युवक है।

अब्बा, सलीम भार्इ के तब्लीगी लोगों में उठने-बैठने का विरोध करते।

सलीम हर वह काम करता जिससे अब्बा को दुख पहुँचता। वह उन्हें तकलीफ पहुँचाकर सुकून हासिल किया करता था। जाने क्यों सलीम भार्इ इतना परपीड़क बन गया था।

तब्लीगी जमातें जब नगर में आतीं, अमीरे-जमात वजीर भार्इ सलीम को बुलवा भेजते। सलीम भार्इ उन जमात वालों का स्थानीय मददगार हुआ करता। वह आने वाली जमात का इस्तेकबाल करता। उन्हें मस्जिद के एक कमरे में ठहराता। उन्हें कहाँ खाना पकाना है, कहाँ नहाना है और कहाँ पैखाने जाना है, पीने के पानी की व्यस्था कहाँ से होगी, सभी जानकारी वह उपलब्ध कराता।

तब्लीगी जमात के लोग अत्यधिक अनुशासन में रहा करते। अमीरे-जमात के हुक्म का अक्षरशः पालन किया करते।

जमात वालों की बड़ी सख्त दिनचर्या हुआ करती थी।

घड़ी देख के तमाम काम...

यूनुस भी कभी-कभी सलीम भार्इ के साथ वहाँ जाया करता था।

जब नगर का सबसे भव्य मंदिर एक छोटे से चबूतरे पर था। जब यहाँ पुलिस थाना और रेलवे स्टेशन के अलावा कोर्इ पक्की इमारत न थी। तब नगर में मस्जिद के नाम पर बन्ने मियाँ की परछी हुआ करती थी। बन्ने मियाँ की आल-औलाद न थी। उन्होंने अपनी जमीन अंजुमन कमेटी को वसीयत कर दी थी।

बन्ने मियाँ ने एक पक्की मस्जिद के लिए स्वयं अपने हाथों से संगे-बुनियाद रखी थी। अल्लाह उनको करवट-करवट जन्नत बख्शे।

फिर स्थानीय स्तर पर चंदा करके वहाँ एक छोटा सा पक्का हाल बना।

मस्जिद के आँगन में एक कुआँ था। उस कुएँ का पानी बड़ा मीठा था। गर्मियों में भी पानी खत्म न होता। कमेटी वालों ने उस पर कवर लगा दिया। रस्सी-बाल्टी के लिए छोटा सा छेद था। कुएँ के एक तरफ दो कमरे थे, जिन्हें गुसलखाना कहा जाता था। दूसरी तरफ पिछवाड़े में इस्तिंजा (पेशाब) के लिए मूत्रालय था। फिर एक सीट वाला बैतुल-खुला यानी कि 'सेप्टिक टेंक' पैखाना था।

उस मस्जिद के पेश-इमाम बड़े काबिल बुजु़र्ग थे। संयमित जीवन वाले, नेक, परहेजगार और आध्यात्मिकता के हिमायती। लंबा कद, पतली-दुबली काया, लंबी सी सफेद दाढ़ी। बोलते तो मुँह पर हाथ रख लिया करते। कहते हैं कि उनके पास काफी रूहानी ताकत थी। वे गंडा-तावीज आदि नहीं दिया करते थे। हाँ, दुआएँ कसरत से दिया करते और उनकी दुआएँ 'अल्लाह रब्बुल इज्जत' की बारगाह में कु़बूल हुआ करती थी।

वे कु़रान-शरीफ का इतना मधुर पाठ किया करते कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध सुनता रहे। एकदम शुद्ध अरबी का उच्चारण। गले की बेहतरीन लयकारी। किरत ऐसी कि बस सुनते चले जाइए।

यूनुस कभी-कभी जुमा की नमाज पढ़ने उसी मस्जिद में जाता।

सलीम भार्इ वहाँ एक तरह से अवैतनिक मुअज्जिन बन चुका था। मुअज्जिन की अनुपस्थिति में वह मस्जिद का काम सँभाला करता था।

इसी कारण सलीम भार्इ किसी तरह का काम नहीं सीख पाया।

यूनुस धर्म पर आश्रित न था, बल्कि स्वाद-परिवर्तन के लिए धर्म के पास आया करता था। जैसे कि स्वाद-परिवर्तन करने के लिए पिक्चर देखना, कव्वाली सुनने जाना, फुटबाल मैच खेलना, बिजय भइया के साथ आरएसएस की शाखा में जाना या फिर गप्पें मारना...

सलीम भइया इसी तरह तब्लीग जमात वालों के साथ रहते-रहते जमात में चालीस-चालीस दिन के लिए बाहर निकल जाया करता था।

अब्बा पर उनके बरेलवी मौलानाओं से फतवा मिल चुका था कि ऐसा व्यक्ति जो देवबंदियों के अकीदे में विश्वास करे, उनके साथ उठे-बैठे, उसका बहिष्कार कर देना चाहिए, भले से वह अपना बेटा, बेटी, माँ या बाप या भार्इ-बहिन क्यों न हो!

अब्बा के पास आला हजरत इमाम अहमद रजा खाँ द्वारा बतार्इ निदेशिका थी, जिसे वह पहले कमरे की दीवार में लगाए हुए थे। उसकी कुछ बातें आज भी यूनुस को याद हैं।

वहाबियो, देवबंदियों से नफरत करो।

वहाबियो, देवबंदियों के मौलवियों के पीछे नमाज पढ़ना मना है। उसकी नमाज न होगी और नमाज पढ़ने वाला गुनहगार भी होगा।

अगर कोर्इ मुसलमान अपना निकाह या अपने बेटी-बेटे का निकाह, वहाबी या देवबंदी से करेगा तो निकाह हरगिज न होगा।

वहाबियों, देवबंदियों को दावत खिलाना, उनकी दावत खाना दोनों बातें नाजायज हैं।

सलीम भार्इ की गतिविधियाँ किसी से छिपी न थीं। वैसे भी वह जगह थी ही कितनी बड़ी कि बातें दबी रह सकें।

नगर के एक कोने में छींकिए तो दूसरे कोने तक आवाज चली जाए।

बरेलवी मौलानाओं, स्थानीय मदीना मस्जिद की कमेटी के मेंबरान की समझाइश से तंग आकर अब्बा ने ऐलान कर दिया था कि सलीम उनकी औलाद नहीं।

वे सलीम भार्इ को अपनी औलाद मानने से इनकार कर चुके थे।

इतने प्रतिबंधों से परेशान होकर सलीम भार्इ घर से भाग कर सिंगरौली खाला के पास चले गया।

वहाँ खालू ने सलीम भार्इ को बैढ़न में एक टीन के चादर से पेटियाँ बनाने वाले कारखाने में काम दिलवा दिया था।

वैसे खालू भी देवबंदियों से चिढ़ते थे।

वह एक कट्टर सुन्नी थे और बरेलवी अकीदे को मानते थे, लेकिन खाला के हस्तक्षेप के कारण वह सलीम भार्इ की उपस्थिति घर में बर्दाश्त किया करते थे।

शुरू में सलीम भार्इ बरेलवियों वाली मस्जिद में नमाज पढ़ता था, क्योंकि जिसके यहाँ वह काम सीखा करता था वह कट्टर स्वभाव का था। तब्लीगियों और देवबंदियों से बेतरह चिढ़ा करता था। जब सलीम भार्इ काम अच्छे से सीख गया तो वह एक दूसरे कारखाने में चला गया। ये भी एक मुसलमान का ही कारखाना था लेकिन ये जनाब देवबंदी खयालात के इंसान थे। वे जानते थे कि सलीम भार्इ के खालू बरेलवी हैं, फिर भी उन्होंने सलीम भार्इ को अपने यहाँ कारीगर रख लिया। अब सलीम भार्इ बैढ़न की देवबंदियों वाली मस्जिद में नमाज पढ़ने जाने लगा।

ये बात खालू को मालूम हुर्इ तो उन्होंने खाला से साफ-साफ कह दिया कि वे वहाबियों को अपने घर में सहन नहीं कर पाएँगे।

खाला ने सलीम भार्इ को समझाया-बुझाया। उसे दुनियादारी की बातें सिखाना चाहीं। सलीम भार्इ कहाँ मानने वाला था।

इस बीच खालू आ गए तो सलीम उन्हें ही तब्लीग करने लगा।

'कब्रों की पूजा ठीक नहीं। अस्ल चीज है नमाज, रोजा, हज और जकात। दीन में रार्इ-रत्ती का जोड़ने वाला बिदअती (देवबंदी लोग बरेलवियों को बिदअती कहते हैं और बरेलवी देवबंदियों को वहाबी!) कहलाता है। हुजूर सरकारे दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिए यदि सच्ची मुहब्बत है तो एक सच्चे मुसलमान को हक पर चलना चाहिए। बिदअतियों से बचना चाहिए।'

इतना नसीहत सुनकर फौजी खालू तो जैसे आपे से बाहर हो गए।

उन्होंने खाला का लिहाज छोड़ सलीम भार्इ को तत्काल घर-निकाला का फरमान दे दिया था।

फिर सलीम भार्इ बैढ़न में कारखाने में ही रहने लगा था।

वहीं उसका रंग-रूप बदल गया था।

अब वह कमीज-पैंट पहनना छोड़कर कुर्ता-शलवार पहनने लगा था। चूँकि उसका बदन गठा हुआ था और कद दरमियाना था, सो उस पर घुटनों के नीचे झूलता कुर्ता और टखनों से उठी शलवार खूब जमती थी। सिर पर वह सफेद गोल टोपी लगाने लगा था। वह एक परंपरागत मुसलमान दिखता था। जैसे कि देवबंद के दारूल-उलूम के छात्र दिखा करते हैं।

खाला जब कभी बैढ़न जातीं तो सलीम भार्इ से मिला करतीं।

उन्हें सलीम भार्इ से बड़ी मुहब्बत थी।

सलीम भार्इ ने अपनी कमार्इ से खाला के लिए कर्इ साड़ियाँ खरीदी थीं।

फिर सुनने में आया कि किसी तब्लीग जमात के साथ सलीम गुजरात की तरफ चला गया है। गुजरात के वड़ोदरा से एक-दो खत बैढ़न के कारखाने में आए थे, जिसमें खाला के लिए सलीम भार्इ अलग से खत लिखा करता था।

सलीम भार्इ के आखिरी खत से पता चला था कि वह एक तब्लीगी परिवार में घर-जमार्इ बन गया है।

अच्छे खाते-पीते लोग हैं वे।

फिर एक दिन गुजरात के दंगों में उसके मारे जाने की खबर आर्इ।

सलीम भार्इ का पहनावा और रहन-सहन गोधरा-कांड के बाद के गुजरात में उसकी जान का दुश्मन बन गया था...

तीन

खटर खट् खट्, खटर खट् खट्...

ठंड से ठिठुरती हुर्इ ट्रेन की एक लंबी चीख...

ट्रेन की पटरियों के बदलने की आवाज के साथ ब्रेक की चीं...चाँ...

और ट्रेन रुक गर्इ।

खिड़कियों के बाहर रोशनी की झलक नहीं। इस लाइन के अधिकांश स्टेशन तो बिना बिजली-बत्ती वाले हैं।

संभावना है कि आउटर पर ट्रेन रुकी होगी या फिर कोर्इ स्टेशन ही हो।

 
चोपन से सिंगरौली के बीच सिंगल-लाइन है। वैसे तो रात की ये पैसेंजर फास्ट-पैसेंजर के नाम से चलती है और छोटे-मोटे स्टेशन में रुकती नहीं लेकिन क्रासिंग के नाम पर इसे रोका ही जाता है।

चाय-पानी के लिए रात के सफर में ब्योहारी ही एक स्टेशन है, जहाँ कुछ आशा की जा सकती है। दिन में सरर्इ-ग्राम और खन्ना बंजारी स्टेशन में चाय-नाश्ता मिलता है।

गार्ड, ड्राइवर और मुसाफिर ऐसी जगहों पर टूट पड़ते हैं।

यूनुस को नींद नहीं आ रही थी।

उसने नीचे की सीट पर निगाह दौड़ार्इ।

देखा कि साधू महाराज कंबल ओढ़े पड़े हैं।

उनके पैर उस स्त्री की गोद में हैं।

स्त्री गहरी नींद में है।

उसके वक्ष पर आँचल हटा हुआ है।

भरी-भरी छातियाँ और चेहरे पर सुकून के लक्षण...

यूनुस ने सोचा कि कितना मस्त जीवन है ये भी!

आत्म-विस्मृति का जीवन!

कमाने-खाने की कोर्इ चिंता नहीं।

लोक-लाज की फिक्र नहीं।

व्यक्तिगत धन-संपत्ति का मोह नहीं।

बस, एक अंतहीन यात्रा में चलता जीवन...

बड़े भार्इ सलीम ने ऐसी ही राह अपनार्इ थी। उसने सोचा था कि इसी तरह तब्लीग (धर्म-प्रचार) करते-करते वह दुनिया के साथ-साथ आखिरत (परलोक) के इम्तिहानात में कामयाब रहेगा। उसने स्वयं को पूर्ण-रूपेण उस धार्मिक आंदोलन के लिए समर्पित कर रखा था।

और एक आस्थावान, धार्मिक प्रवृत्ति का साधारण युवक सलीम गुजरात के दंगों की भेंट चढ़ गया था।

यूनुस सलीम भार्इ की याद में खो गया था...

उसे आज भी याद है वो दिन जब आधी रात घर की साँकल बजी थी।

घर में यूनुस और बेबिया भर थे।

अब्बा आफिस के काम से शहडोल गए थे।

अम्मा पड़ोसी मेहताब भार्इ के साथ गढ़वा पलामू गर्इ हुर्इ थीं।

मेहताब भार्इ की मँगनी होने वाली है। उसने स्वयं अम्मा को अपने साथ ले चलने की जिद की। अंधे को क्या चाहिए दो आँख। अम्मा को तो घर छोड़ने का कोर्इ न कोर्इ बहाना चाहिए। बेबिया और यूनुस तो हैं ही घर के कुत्ते। भौंक-भौंक कर घर की रखवाली यही लोग तो करते हैं।

बाकी लोग तो मालिक ठहरे।

दुबारा साँकल बजी तो यूनुस ने आवाज लगार्इ - 'कौन?'

लगा नन्हू चच्चा की आवाज है - 'मैं हूँ भार्इ, नन्हू...!'

यूनुस को आश्चर्य हुआ कि नन्हू चच्चा और इस समय!

बेबिया अंदर वाले कमरे में घोड़ा-हाथी बेच कर सो रही थी।

यूनुस ने जल्दी से चड्डी पर गमछा लपेटा और दरवाजा खोला।

नन्हू चच्चा ही तो थे।

पतली-दुबली काया, लुंगी और कुर्ता पहने, सिर पर दुपल्ली टोपी।

बेतरतीब सी खिचड़ी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले - 'गुल्लू का फोन आवा है... तुहरे अब्बा कहाँ हैं?'

यूनुस ने उन्हें सलाम किया और अंदर आने को कहा।

नन्हू चच्चा बेहद घबराए हुए थे - 'अब्बा-अम्मा कौनो नहीं हैं का?'

यूनुस मन ही मन डर गया।

जाने क्या बात है कि नन्हू चच्चा ऐसे घबरा रहे हैं।

उसने जिगर कड़ा कर पूछा - 'का बात हो गर्इ चच्चा?'

नन्हू चच्चा की आँखें नम हो आर्इं।

'कुछ न पूछो, बस अपने अब्बा या अम्मा से बात करा दो बचवा!'

'दोनों नहीं हैं घर में, अब्बा तो शहडोल गए हैं, किसी भी समय आ सकते हैं लेकिन अम्मा बिहार गर्इ हुर्इ हैं। आप हम्में बताइए न का बात है?'

नन्हू चच्चा के बेटे गुल्लू यानी पीर गुलाम ने ही एक बार बताया था कि यूनुस का बड़ा भार्इ सलीम गुजरात के बड़ोदा शहर में रहता है।

वह तब्लीगी-जमात वालों के साथ गुजरात चला गया था।

वहीं एक तब्लीगी मियाँ भार्इ इस्माइल सिद्दीकी ने उसे अपना घर-जमार्इ बना लिया।

इस्माइल सिद्दीकी की छोटी-मोटी दुकानदारी है। इकलौती बेटी के लिए नेक दामाद सलीम। सलीम वहीं मजे में है।

पीर गुलाम जब भी बड़ोदा से कोतमा आता, सलीम भार्इ का संदेश लेकर आता। उसने एक बार बताया था कि अभागे सलीम ने ससुराल वालों के सामने अपने सगों को मरा हुआ मान लिया है। अब वह कभी लौटकर इधर नहीं आएगा। उसने अपने जीवन का मकसद जान लिया है। सलीम सरेआम ऐलान करता है कि उसने अल्लाह की बनार्इ इस कायनात में अपने नए माँ-बाप पाए हैं। उसकी मुमताज महल बीवी उसे अपना बादशाह, शहंशाह और सरताज मानती है।

उनके एक बेटा भी है शाहजादा सलीम की तरह...

अम्मा की ढेर सारी संतान हैं फिर भी वह पहलौठी औलाद सलीम को भूल न पातीं। उनका सलीम से लगाव कुछ ज्यादा ही था।

वह जितना सलीम भार्इ के बारे में उल्टी-सीधी सूचनाएँ पातीं, उनका दुख बढ़ता जाता। वह जार-जार आँसू बहातीं और अल्लाह-रसूल से उसके लिए दुआएँ माँगा करतीं।

पीर गुलाम से अम्मा ने सलीम की चोरी से बहू और बच्चे की फोटो भी मँगवार्इ थी। उस तस्वीर में सलीम भार्इ किसी मौलाना सा दिखलार्इ दे रहा था और उसकी बीवी बुर्के का घूँघट पलट कर चेहरा बाहर निकाले थी। उनका बच्चा ऐसा दिख रहा था जैसे रुई का गोला हो। अम्मा अपनी संदूकची में उस तस्वीर को सँभाल कर रखती है।

यूनुस ने नन्हू चच्चा से पूछा - 'क्या खबर आर्इ है?'

यूनुस के सामने केबिल टीवी के माध्यम से प्रसारित की जा रही गुजरात की दिल दहलाने वाली घटनाएँ कौंध गर्इं।

गोधरा-कांड के बाद गुजरात में मार-काट मची हुर्इ है। तमाम अखबार और टीवी के न्यूज चैनल गुजरात के दंगों को आम-जन के सामने लाने में भिड़े हुए हैं। एक से बढ़कर एक न्यूज रिपोर्टर कैमरा टीम के साथ जहाँ-तहाँ पिले पड़ रहे हैं ताकि दंगों का लाइव-कवरेज बना सकें।

ताकि उनके चैनल की टीआरपी अचानक बढ़ जाए।

ताकि उनके रिपोर्ट्स से मीडिया में तहलका मच जाए।

 
'ये देखिए, हाथ में पेट्रोल से भरी बोतलें लिए औरतें आगे बढ़ रही हैं। ये देखिए हरे रंग में पुता एक खास जाति के लोगों का मकान, पर्दे की ओट से झाँकती बुर्का ओढ़े औरतें, छत पर पत्थर र्इंट इकट्ठा करते बच्चे, नमाजें अदा करते बुजु़र्ग, और ये देखिए किस तरह तड़ातड़ बोतलें फेंकी जा रही हैं... यह एक्सक्लूसिव कवरेज सिर्फ इसी चैनल में आप देख रहे हैं... ये देखिए हमारे संवाददाता के साथ जनता कैसा बर्ताव कर रही है... लोग हमारा कैमरा तोड़ कर फेंक देना चाहते हैं... इस सड़क पर देखिए पुलिस के सिपाही मौन खड़े भीड़ को अवसर दे रहे हैं... वो देखिए एक गर्भवती महिला किस तरह भागना चाह रही है... किस तरह त्रिशूल और लाठियाँ लिए, माथे पर गेरुआ पट्टी बाँधे युवक उस महिला को चारों तरफ से घेर कर खड़े हो गए हैं... और... और... ये रहा उस महिला के पेट का त्रिशूल की नोक से चीरा जाना... देखिए किस तरह त्रिशूल की नोक पर अजन्मा बच्चा भीड़ के सिरों पर खुले आकाश में लहराया जा रहा है... याद रखिए ये लाइव-कवरेज हमारे चैनल पर ही दिखलाया जा रहा है... हमारे जाँबाज रिपोर्टरों ने अभी कुछ दिन पहले अफगानिस्तान में अमरीकी हमले के दौरान अमरीकी सैनिकों की बहादुरी और आतंकवादियों के सफाए का आँखों देखा हाल आप लोगों तक पहुँचा कर मीडिया की दुनिया में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था... और अब गुजरात में क्रिया के बाद की स्वाभाविक प्रतिक्रिया को पूरी र्इमानदारी के साथ आप लोगों तक पहुँचाया जा रहा है। रात नौ बजे पूरे घटना-क्रम पर फिर एक बार निगाह डालता हमारा दंगा-विशेष देखना न भूलें। इस कार्यक्रम के प्रायोजक हैं हीरे-जवाहरात के व्यापारी, चरस-हीरोइन के स्मगलर, जूता, साबुन, कंडोम और नेपकिन्स के निर्माता...

न्यूज के दूसरे-तीसरे चैनल भी यही सब दिखा रहे हैं। सभी दावा कर रहे हैं कि ये जो टीवी पर दिखाया जा रहा है, वह सब पहली बार उन्हीं के चैनल वालों ने दिखाया है। कि पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर रखी जा रही है। कि हमारे संवाददाता अपनी जान जोखिम पर डालकर दंगे की विश्वसनीय एवं आँखों देखी खबरें लगातार भेज रहे हैं। कि सिर्फ हमारा चैनल प्रस्तुत कर रहा है खसखसी दाढ़ी वाले मुख्य मंत्री और कवि-प्रधानमंत्री से सीधी बातचीत। मुख्य मंत्री, गृह मंत्री और प्रधान मंत्री कटघरे में। एकदम एक्सक्लूसिवली आपके लिए... जिसे प्रायोजित कर रहे हैं चड्ढी-बनियान, शीतल-पेय और बीयर के निर्माता...

विपक्ष में बैठे लोग, जिनके दामन में जाने कितने दंगों के दाग लगे थे, जिन्होंने अपने शासनकाल में बाबरी-मस्जिद शहीद होने दी थी, घड़ियाली आँसू बहा रहे थे।

गुजरात की सुलगती आग में उनके गैर-सांप्रदायिक कार्यकर्ता कहाँ थे, ऐसे कठिन समय में उनका रोल क्या था? क्या वे कभी इन सवालों का जवाब दे पाएँगे?

पक्ष-विपक्ष संसद में आपस में नोंक-झोंक कर रहे थे कि विपक्षियों के कार्यकाल में कितने दंगे हुए। सन चौरासी के सिख-विरोधी दंगे के आँकड़े के आगे तो गुजरात में कुछ ज्यादा नहीं हुआ है। सांप्रदायिक दंगों का इतिहास पलट लें, हर दंगों में स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए हैं। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में हुए इस 'सहज-प्रतिक्रियात्मक' कार्य में आँकड़ा उतना ज्यादा नहीं है। बहुसंख्यकों के आक्रोश का दमन स्थिति को और भयावह बना सकता था, इसलिए सरकार ने उन्हें थोड़ा सा मौका ही तो दिया था कि वे अपनी भावनाओं पर काबू पा लें। अभी तो कम ही हादसात हुए हैं।

मिलेटरी आदेश की प्रतीक्षा में कैंपों में दंड पेल रही थी।

पुलिस ऐसे समय में मूक दर्शक बनने की ऐतिहासिक भूमिका का तत्परता से पालन कर रही थी।

टीवी पर आती खबरों से फिर गुजरात धीरे-धीरे गायब होता गया कि नन्हू चच्चा ये कैसी खबर लेकर आ गए।

पीर गुलाम ने फोन पर क्या बात कही कि नन्हू चच्चा रात के बारह बजे समाचार पहुँचाने चले आए..

यूनुस का मन किसी अनहोनी की आशंका से विचलित हो रहा था।

नन्हू चच्चा चारपार्इ पर बैठे रहे।

फिर उन्होंने यूनुस से पानी माँगा।

लगता है कि बेबिया की नींद खुल गर्इ थी।

वह भकुआर्इ उठी थी।

यूनुस ने उससे चच्चा के लिए पानी लाने को कहा।

तभी दरवाजे की साँकल पुनः बजी।

लगता है कि अब्बा हैं, शायद ट्रेन से लौटे हों।

यूनुस ने लपक कर दरवाजा खोला, वाकर्इ अब्बा ही थे।

नन्हू चच्चा ने उन्हें सलाम किया और फिर अब्बा के लिए भी एक गिलास पानी मँगवाया।

अब्बा ने जब पानी पी लिया तो नन्हू चच्चा ने खँखारकर गला साफ किया और अब्बा के गले लगकर रो पड़े - 'अपना सलीम नहीं रहा... वो दंगे में मारा गया!'

यूनुस को काटो तो खून नहीं।

बेबिया तो दहाड़ मार कर रो पड़ी।

ये अचानक कैसी खबर सुन रहा था परिवार...

एकदम अप्रत्याशित खबर...

अब्बा की आँखें भी नम हो गर्इं - 'साफ-साफ बताएँ कि क्या बात है?'

नन्हू चच्चा के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे - 'इधर जब से गुजरात सुलगा हुआ था, मेरे बेटे पीर गुलाम की भी कोर्इ खबर नहीं मिल पार्इ थी। बाद में पीर गुलाम का फोन मिला कि वह ठीक है। मामला जब ठंडाया तो पीर गुलाम डरते-डरते आपके बेटे सलीम के मुहल्ले गया था। वहाँ उसे पता चला कि सलीम तब्लीग-जमात में चिल्ला काट कर लौटा था। जमात के लोग स्टेशन से अलग-अलग ऑटो बुक कराकर अपने-अपने घरों को लौट रहे थे। सलीम दंगाइयों के बीच फँस गया था। सलीम को आटो-सहित जला कर मार डाला गया। तब्लीगी-जमात वालों ने ही घटना की खबर उसकी ससुराल में पहुँचार्इ थी। ससुराल वाले इस उम्मीद में थे कि शायद सलीम जान बचा कर कहीं छुपा होगा और मामला ठंडाने पर लौट आएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वह खबर सही थी। उस आटो के साथ सलीम भी जल कर खाक हो गया था।'

यूनुस को पीर गुलाम की बात याद हो आर्इ जो सलीम भार्इ को 'लादेन' के नाम से याद किया करता। तब्लीगी-जमात से जुड़ा होने के कारण सलीम भार्इ का गेट-अप एकदम ओसामा बिन लादेन की तरह दिखता था।

यूनुस को उसका लिबास और उसकी पहचान ले डूबी।

एक बार यूनुस खालू के इलाज के लिए पीजीआर्इ लखनऊ गया था।

वहाँ एक मौलवी नुमा बुजुर्ग दिखे तो आदतन उसने उन्हें सलाम किया।

वे बहुत नाराज दिखलार्इ दे रहे थे।

कैसा जमाना आ गया। हद हो गर्इ भार्इ। ये डाक्टर जिन्हें फरिश्ता भी कहा जाता है, मुसलमान मरीजों से चिढ़ते हैं। जान जाते हैं कि मरीज मुसलमान है तो फिर इलाज में लापरवाही करते हैं। सारे काफिर डाक्टर आरएसएस के एजेंट हैं। वे चाहते हैं कि 'मीम' का सही इलाज न होने पाए।

थोड़ी सी हुज्जत की नहीं कि इलाज ऐसा कर देंगे कि रिएक्शन हो जाएगा, दवा कोर्इ फायदा न करेगी।

यूनुस ने उन मौलवी साहब की बात का खंडन किया - 'अरे नहीं मौलवी साहब, एकदम गल्त कह रहे हैं आप! भला बताइए, हम भी तो मुसलमान हैं, लेकिन हमने तो ऐसा कोर्इ भेदभाव यहाँ नहीं होते देखा। डाक्टर बिचारे भरसक मरीज को तंदुरुस्त करने में लगे रहते हैं।'

फिर उसने मौलवी साहब का मन बदलने के लिए पूछा - 'आप कहाँ के रहने वाले हैं?'

उन्होंने कहा - 'जौनपुर जिले का रहने वाला हूँ।'

'ठीक है, लेकिन आपकी ये शिकायत वाजिब नहीं कि डाक्टर मरीजों से भेदभाव करते हैं। बीमारी जितनी बड़ी होगी, डाक्टर उतने सीरियस रहते हैं।'

'दुनिया देखी है मैंने बेटे, तुम मुसलमान जरूर हो, लेकिन तुम्हारा रहन-सहन एक आम हिंदू शहरी की तरह है। इसलिए तुम हिंदुओं के बीच खप जाते हो। हमें देखकर कोर्इ भी जान लेता है कि हम मुसलमान हैं। वे हमसे नफरत करने लगते हैं। सोचता हूँ कि इस मुल्क के उलेमा ये फतवा जारी कर दें कि मुसलमानों को दाढ़ी रखने की सुन्नत से छूट मिल जाए।'

यूनुस उन बुजुर्ग की बात सुनकर काँप गया था।

चार

पंकज उधास की गजल का एक शे'र यूनुस को याद हो आया -

दुनिया भर की यादें हमसे मिलने आती हैं

शाम ढले, इस सूने घर में मेला लगता है

दीवारों से, मिलकर रोना, अच्छा लगता है

हम भी पागल हो जाएँगे, ऐसा लगता है

जिंदगी के इस पड़ाव पर दुनिया भर की यादें यूनुस का पीछा कर रही थीं।

अब्बा, अम्मा, खाला, खालू, सलीम भार्इ, बड़की, सिंधी फलवाला, सनूबर, मलकीते, छंगू, जमाल साहब, डाक्टर, बन्ने उस्ताद, मन्नू भार्इ मिस्त्री, यादव जी, बानो और भी न जाने कितने जाने-अन्जाने चेहरे, हर चेहरे की एक अलग दास्तान...

उसकी नींद उचट चुकी थी।

चोपन-कटनी पैसेंजर किसी स्टेशन पर रुकी।

 
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