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पिशाच की वापसी

पिशाच की वापसी – 14

एक मजदूर अपनी पूरी मेहनत से काम कर रहा था, खच्चच ….. खच्चच, एक जगह हल्की सी खुदाई का काम करना था उसे, वह अपने काम में मग्न था वहां के हालत को भूल के, की तभी उसने ज़मीन पे कुछ देखा, ज़मीन पे हल्का सा पानी भरा हुआ था जिसे उसने उसके अंदर कुछ देखा वह सोचने लगा की क्या है, फिर उसने अपने हाथ आगे बढाया धीरे धीरे उस पानी की तरफ, धीरे धीरे वह हाथ आगे बढा रहा था और जैसे ही उसने उस पानी को चूहा..

"आआआआआआआअ….!!

एक आवाज़ जो चीखने की थी वह अचानक घुट के रही गयी, जिसे कोई और सुन नहीं पाया.

रोज़ की तरह काम हो रहा था, आज का मौसम कुछ अजीब था बाकी दीनों से, कुछ अलग ही माहौल, मानो एक अजीब सी शांति जो ना तो इंसान को भा रही थी और ना ही उस जगह से दूर भेज रही थी, ऐसा लग रहा था मानो उस जगह ने वहां पे सबको जकड़ा हुआ था, बेमन से ही सही पर सब अपने काम में लगे हुए थे.

दोपहर का वक्त था, कुछ लोग आगे के हिस्से में काम कर रहे थे तो कुछ वहां बनी उस उजड़े हुए कब्रिस्तान के उपर, पर एक अकेला ऐसा मजदूर था जो जंगल की गहराई में काम कर रहा था, जगह जगह गढ्ढे खुदे हुए थे, बारिश की वजह से पानी भरा हुआ था.

"खच्चच ….. खच्चच, आवाज़ के साथ वह मिट्टी उठा के साइड में डाल रहा था, उसका काम लगभग खत्म पर ही था, की उसने गढ्डे में भरे पानी के अंदर कुछ देखा, उसकी आँखें बड़ी हो गयी और उसके हाथ उसके खुद के चेहरे पे घूमने लगे, मानो चेहरे से कुछ हटाना चाह रहा हो, तभी उसने अपने चेहरे से हाथ हटाया और फिर दुबारा पानी में देखा, इस बार उसे राहत की सांस आई क्यों की उसका चेहरा अब नॉर्मल दिखाई दे रहा था लेकिन तभी …

देखते ही देखते उसका चेहरा उसके चीन से काला होने लगा, मानो धीरे धीरे जल रहा हो, उसेमें छाले पड़ने लगे, वह जलता गया और धीरे धीरे उपर बढ़ गया और कुछ ही पलों में वह आधा चेहरा अपना जला हुआ देख रहा था, एक बार फिर उसको झटका लगा..

"आआहह..."

वह हलके से चिल्लाते हुआ थोड़ा पीछे हुआ और अपने चेहरे पे हाथ लगाने लगा, लेकिन उसे फिर महसूस हुआ की उसका चेहरा बिलकुल ठीक है, उसके दिल की धड़कने बढ़ रही थी, साँसें इतनी जबरदस्त चढी हुई थी मानो वह मिलो दूर से भाग कर आया हो, चेहरे पे एक डर उभर के उसके चेहरे पे निखर रहा था, उसके हाथ पाव एक पल के लिए फूल गये, हिम्मत तो नहीं हो रही थी की वह आगे बड़े पर फिर भी वह आगे बड़ा, इंसान की लालसा उससे हर वह काम करने की तरफ खिंचती है जिसे नहीं करना चाहिए, वह काँपते हुए पैर को उठा के थोड़ा सा आगे गया और वहाँ जाकर अपनी शकल एक बार फिर पानी में देखी.

"मुझे ही धोका हो रहा है, हरिया सही कहता था, ये जगह ही अजीब है, मुझे यहाँ से निकल जाना चाहिए, नहीं तो में पागल हो जाऊंगा"

कहते हुई वह आदमी वहां से जाने लगता है की तभी उसके कानों में उसे कोई जानी पहचानी आवाज़ सुनाई देती है.

उसे आवाज़ को सुन के वह वहीं रुक गया, लेकिन फिर वह आवाज़ भी आनी बंद हो गयी,

"इस जगह में जरूर कोई गड़बड़ है"

बोलते हुए वह आगे बड़ा की उसे एक बार फिर जानी पहचानी आवाज़ सुनाई पडी, आवाज़ सुन के वह वहीं रुक गया पर इस बार वह आवाज़ नहीं रुकी, वह उस आवाज़ को ध्यान से सुनने लगा तभी उसे महसूस हुआ की वह कोन चिल्ला रहा है.

"ये आवाज़ तो हरिया की है"

बोलते हुए वह पीछे मुडा, लेकिन उसके पीछे कोई नहीं था, थी तो सिर्फ़ वह आवाज़ जिसमें उसका नाम था, मंगलू, मंगलू, बस यही आवाज़ आ रही थी.

"हरिया, हरिया, कहाँ है तू"

मंगलू आगे की तरफ बढ़ता हुआ चिल्लाया.

"में यहीं हूँ, तेरे सामने, मुझे बचा ले भाई, में यहाँ फँस गया हूँ बचा ले मुझे"

हरिया की घबराई हुई आवाज़ सुन के मंगलू के माथे पे शिकन आ गयी और उसके शरीर में डर की एक लहर दौड़ गयी.

"पर मुझे तू क्यों दिखाई नहीं दे रहा, कहाँ है तू"

आगे बढ़ते हुए वह उसेी जगह पे पहुंच गया था जहाँ से वह चला था, वह जंगलो की गहराइयो में देखने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, कोहरा इतना घना था की ज्यादा दूर से आँखों की रोशनी से देखना नामुमकिन था.

"मेरे भाई देख में तेरे पीछे ही हूँ जल्दी कर"

तभी मंगलू के कानो में आवाज़ पडी तो वह फौरन पीछे मुडा और सामने का नज़ारा देख वह पूरी तरह से चौंक गया, उसका शरीर कांप उठा.

"हरियाआआ…..”

मंगलू ज़ोर से चिल्लाया, उसके सामने हरिया उसेी गढ्ढे में पानी के अंदर था और बार बार पानी पे हाथ मार के बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था, पर निकल नहीं पा रहा था.

"हरिया, तू, तू अंदर कैसे, हे भगवान ये क्या देख रहा हूँ में"?

मंगलू इस पल को देख के बिलकुल कांप चुका था, उसे यकीन नहीं हो रहा था की ये उसकी आँखें क्या देख रही है, उसका शरीर डर से कांप रहा था वहीं अपने दोस्त को उसे जगह पे ऐसे देख की पूरी तरह से चिंता में था.

"वह सब मत पूछ, मुझे जल्दी बाहर निकाल, मुझे सांस लेने में दिक्कत हो रही है बहुत"

हरिया फिर से चिल्लाता है.

"तू चिंता मत कर भाई, में हूँ ना, में बचाता हूँ तुझे"

इतना कहा और वह पानी में उतर गया, पानी उसकी कमर तक आ गया, पर घुसते ही उसे अजीब सी चीज़ महसूस हुई

"पानी गरम, इस जगह पे हे भगवान ये तू आज क्या खेल दिखा रहा है"

इतना सोचते हुई वह कुछ कदम आगे बढा.

पर वह क्या जाने की ये खेल कोई भगवान नहीं, बल्कि कुदरत में जन्मा एक पिशाच खेल रहा है.

मंगलू आगे बड़ा, दूसरी तरफ से हरिया का हाथ उपर उठा मानो पकड़ने के लिए हाथ दे रहा हो, मंगलू का दिमाग इस वक्त उसके साथ नहीं था, उसने भी अपना हाथ उस तरफ बढ़ाया, उंगलीयो ने पानी को छुआ, थोड़ा सा हाथ अंदर गया की तभी…….

उसका हाथ फँस गया, अचानक ही उसके शरीर को झटका लगा, उसे महसूस हुआ मानो उसे कोई खींच रहा हो, इस सब से मंगलू का ध्यान पानी से हट गया और वह अपने हाथ को बाहर खींचने लगा, लेकिन वह हाथ टस से मस ना हुआ, मानो किसी पानी में नहीं बल्कि एक गाढ़े कीचड़ में फँस गया हो, वह कोशिश करने लगा लेकिन उसका हाथ नहीं निकला

"हरिया मेरा हाथ आ, निकल नहीं.."

बस इतना ही कहता है और पानी की तरफ देखता है तो उसे एक और बडा झटका लगता है, पानी में हरिया की छाया या उसका कोई भी अस्तित्व उसे नहीं दिखा, उसकी रूह अंदर तक कांप गयी, उसके बदन में डर की अकड़न पैदा हो गयी, वह चिल्लाया

"बचाओ"

बस इतना ही चिल्ला पाया की उसकी आवाज़ घुट गयी और तभी उसका शरीर पानी के अंदर ऐसे घुस गया मानो किसी ने तेजी से अंदर खिच लिया हो.

कहानी जारी रहेगी...
 
पिशाच की वापसी – 15

कुछ देर पानी में कोई हलचल नहीं हुई, पर तभी अचानक से, कुछ अजीब सी आवाजें आने लगी पानी के अंदर से, मानो हज़ारों किडे कुछ कुतर रहे हो तेजी से, ना जाने क्या पर बहुत ज़ोर ज़ोर से कुतरने की आवाज़ आने लगी मानो कोई चीज़ किसी में से खींची जा रही हो, पर तभी पानी में बुलबुले से बनने लगे और फिर तेज आवाज़ करते हुए, एक फुव्वारा उपर की बढ़ उड़ा, खून का फुव्वारा, मानो किसी ने पानी के नीचे खून का फुव्वारा बना रखा हो, वह खून पूरे पानी में फैल गया और कुछ ही पलों में पानी लाल हो गया, कुछ मिनट तक ऐसे ही खून का फुव्वारा निकलता रहा और फिर वह शांत हो गया.

पर शायद इस बार कुदरत, या फिर यूँ कहूँ की पिशाच के इरादे कुछ और ही थे, तभी एक बार पानी में हलचल शुरू हुई, पानी में ज़ोर ज़ोर से बुलबुले उठने लगे और अचानक ही…

पानी में से एक कंकाल हवा में उड़ता हुआ बाहर निकला और सीधा पीछे वाले पेड़ के आगे जा गिरा, और इधर गड्ढे में एक अजीब सी आवाज़ हुई और सारा पानी कुछ ही पल में ज़मीन के अंदर चला गया और वह गढ़ा सुख गया.

पेड़ के सहारे वह कंकाल ऐसे ही पड़ा रहा उसका चेहरा बता रहा था की कितनी दर्दनाक तरीके से उस नोचा गया है, हड्डियों पे भी बारे बारे निशान थे, कुछ जगह बारे बारे गड्ढे हो गये थे. मंगलू के बदन का एक भी कतरा मास उस कंकाल में नहीं बचा था.

तभी वहां किसी के पैरों की चलने की आवाज़ आने लगी,

"ये मंगलू कहाँ गया, इसको में बोला था की अकेले इस जंगल में काम मत करना, अगर करना तो किसी को साथ लेकर करना था, अब पता नहीं"

वह इतना ही कह पाया की उसकी नज़र सामने पड़े कंकाल पे गया, वह वहीं रुक गया, मानो किसी ने उस खामोशी की दवा दे दी हो, पर अचानक ही वह चिल्ला पडा..

"आआआआआआहह, भूत, भूत"

चील्लाते हुई वह वहां से भाग गया.

"हमें बारे साहब से मिलना है अभी, अभी उन्हें बाहर बुलाओ, अभी के अभी"

बहुत सारेे मजदूर एक ही जगह पी खड़े चिल्ला रहे थे.

"देखिए आप सब शांत हो जाये बारे साहब काम में है"

पुलिस वाले ने सबको शांति से समझते हुए कहा.

"उनको बोलो काम छोड के आए, हमारी फरियाद सुनने, अभी बुलाओ नहीं तो यहाँ से हम सब नहीं जाएँगे"

वहां सभी मजदूर हल्ला मचाने लगे, अंदर घुसने लगे, पर तभी.

"शांत हो जाइये सब“

अंदर से एक पुलिस वाला बाहर आया,

"शांत हो जाईये, ऐसे चिल्लाने से क्या आप अपनी समस्या का हाल पा लेंगे, देखिए आराम से बताइये क्या हुआ है"?

"साहब वह जगह, वह जगह जहाँ हम काम कर रहे हैं, वह शापित है साहब, वह जगह शापित है, लेकिन बारे लोग उस बात को नहीं मान रहे साहब, वहां हर दूसरे दिन इंसान गायब हो रहा है साहब, वह जगह शापित है"

एक मजदूर ने कहा और वहां एक पल के लिए अजीब सा सन्नाटा फेल गया.

"क्या तुम उसी जगह की बात कर रहे हो, जहाँ मेयर साहब वाला काम चल रहा है"

पुलिस वाले ने अजीब सी टोन में पूछा.

"जी साहब, आप हमारे साथ चलिए, हमारे पास सबूत है, वहां हमारे आदमी का कंकाल मिला है है साहब"

"हम्म, देखो तुम सब चिंता मत करो हम अभी चलते हैं, चलो"

बोल की पुलिस वाले जीप लेकर निकल जाते हैं, कुछ ही देर बाद पुलिस और सारे मजदूर जंगल के पास खड़े होते हैं.

"कहाँ देखा था तुमने वह कंकाल"?

"वह, वह जंगल के अंदर साहब उस जगह"

हरिया ने उंगली से इशारा करते हुए कहा.

"हम्म चलो"

बोलते हुए पुलिस वाले और कुछ मजदूर अंदर चले गये, कुछ देर चलने के बाद उस जगह पे पहुंचे पर.

"यहाँ तो कुछ भी नहीं है"

पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा, हरिया के साथ साथ सभी मजदूर हैरान थे.

"पर, पर थोड़ी देर पहले यहीं था साहब, उस पेड़ के नीचे पड़ा हुआ था"

हरिया ने अपनी बात ज़ोर देते हुए कही..

"पर यहाँ कुछ नहीं है, तुम्हें जरूर कोई धोका हुआ होगा, लेकिन फिर भी हम यहाँ पे अपनी टीम को ढूंडले के लिए भेजते हैं, पर अगर कुछ नहीं मिला तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा"

"पर साहब, भूषण भी तो गायब है, उसका क्या"

हरिया फिर से बोला और सभी मजदूरों ने उसका साथ दिया.

"हम, उस भी हम ढूंढ. लेंगे, फिलहाल तुम सब यहाँ से जाऊं और हमें काम करने दो"

इंस्पेक्टर ने इतना कहा और सभी मजदूर चले गये, की तभी उसने फोन किया.

"एस सर, हम वही है, नहीं यहाँ वह नहीं मिला, नहीं वह भी नहीं, जी सर ऑलराइट, में अभी आता हूँ"

इतना बोले के उसने फोन कट कर दिया और फिर सबको ढूंढ़ने का बोल के जंगल के बाहर निकल आया."

अच्छी तरह ढूंढो, हर जगह, कोई भी जगह छूटनी नहीं चाहिए, चलो फटाफट ढूंढो"

इंस्पेक्टर ने सभी हवलदारों को कहा और खुद फोन पे बात करने लगा.

"हाँ सर, जी आप बेफ़िक्र रहिए, नहीं नहीं यहाँ सब कंट्रोल में है, हाँ में आपके पास ही आऊंगा सीधे जी जी, ओके सर, ओके"

फोन पे बात करने के बाद वह खुद भी जंगल के अंदर चला गया.

करीब 1 घंटे तक सब वहाँ ढूंढ़ते रहे, इधर उधर लेकिन कहीं भी कुछ नहीं मिला उन्हें, आख़िर थक हार के सब जंगल से बाहर आ गये.

"हमें कुछ नहीं मिला, एक एक जगह ढूंढ़ने के बाद कहीं कुछ नहीं मिला"

इंस्पेक्टर ने बाहर आकर सभी मजदूरों से कहा.

"पर साहब ऐसा कैसे हो सकता है, हमें विश्वास नहीं है, आप एक बार फिर से"

बस वह इतना ही कह पाया.

"बस, वैसे भी तुम्हारी वजह से मैंने अपना काफी टाइम खराब कर दिया, तुम्हारी तसल्ली के लिए देख लिया ना मैंने, पर कुछ नहीं मिला, अब तुम सब अपने काम पे लग जाओ, यहाँ कुछ भी ऐसा नहीं है, अगर अगली बार गलत अफवा फैला के पुलिस स्टेशन आए तो तुम सब को अंदर डाल दूँगा"

इंस्पेक्टर ने गुस्से में कहा और वह वहां से चला गया.

मजदूर ताकते रह गये और कुछ नहीं कर पाये, यही सोच रहे थे की अब कौन है जो उनकी मदद करेगा काम छोड नहीं सकते या फिर यूँ कहा जाए की ये जगह काम छोडने नहीं देगी, इस वक्त ये सब उस जगह खड़े थे जहाँ दोनों तरफ ही खाई थी, मरते क्या ना करते, सब ने अपना काम जारी रखा.

दूसरी तरफ.

"थैंक यू सो मच मिस्टर. पाटिल, अगर आप ना होते तो आज"

मुख्तार ने इंस्पेक्टर पाटिल से हाथ मिलाते हुए कहा.
 
पिशाच की वापसी – 16

"अरे कैसी बात कर रहे हैं आप सर, ये तो मेरा काम था, आपको और मेयर साहब को तकलीफ हो तो फिर हम जैसों का फायदा क्या है"

पाटिल मुस्कुराते हुए अपनी बात रखता है.

"अरे ये तो आपका बड़प्पन है मिस्टर. पाटिल, वैसे अच्छा हुआ की अपने मुझे फोन कर दिया था उस टाइम, जब वह मजदूर आपके पास आए थे, उसी टाइम मैंने अपने आदमियो को इनफॉर्म कर दिया था, लेकिन ताज्जुब की बात ये है की उन्हें भी कुछ नहीं मिला, अगर वहां कुछ था ही नहीं तो वह सब मजदूर आपके पास आए क्यों, क्या आपको कुछ मिला."

सोचते सोचते मुख्तार ने अपनी बात रखी.

"नहीं मुख्तार साहब, हमें भी कुछ नहीं मिला, जब आपसे बात हुई, उसके बाद हमने काफी ढूंढा पर हमें कुछ नहीं मिला, जबकि सब कुछ ठीक था, एक दम नॉर्मल"

पाटिल ने बेहद आसानी से जवाब दिया.

इस जवाब को सुनकर मुख्तार सोच में पड गया,

"क्या सोच रहे हैं मुख्तार साहब"?

पाटिल ने मुख्तार को सोचते देख पूछा.

"बस यही सोच रहा हूँ की अगर कोई हादसा वहाँ हुआ तो क्यों कुछ नहीं मिला हमें"?

"इसका जवाब तो खुद मेरे पास नहीं है"

"आपको क्या लगता है मिस्टर. पाटिल क्या वहाँ सच मच कोई आत्मा, कोई रूह है"?

मुख्तार ने चिंतित टोन में कहा, उसके कहते ही वहाँ के माहौल में एक अजीब सी शांति छा गयी, दोनों एक दूसरे को देखने लगे.

"में कुछ समझा नहीं की आप क्या कहना चाहते है, क्या आपको लगता है वह सब सच कह रहे हैं"

पाटिल ने गंभीर चेहरा बनाते हुए कहा.

मुख्तार अपनी जगह से उठते हुए,

"नहीं मेरा ये मतलब नहीं है, में बस ये पूछ रहा हूँ, क्या आपको इस जगह का इतिहास पता है, मतलब की कोई छुपा हुआ राज़ जिसे शायद अभी हम सब अंजान हो"

मुख्तार घूम के पाटिल की आँखों में देखते हुए पूछता है.

कमरे का तापमान बढ़ रहा था, दोनों की साँसें तेज चल रही थी, माहौल इस वक्त कुछ अलग मोड़ ले रहा था, पाटिल अपनी जगह से खड़ा होता हुआ.

"इस बारे में आपको मैं कुछ नहीं बता सकता, मुझे आए हुए कुछ ही टाइम हुआ है, यहाँ पे जो हादसा हुआ था उसके बाद ही मेरी पोस्टिंग यहाँ की गयी थी"

पाटिल भी अब असमंजस में दिख रहा था.

"मतलब आपसे पहले कोई और होगा जो आपकी जगह पर होगा"

"हाँ बिलकुल, यहाँ पे पुलिस स्टेशन था, काली चौकी पुलिस स्टेशन के नाम से"

"था मतलब, अब नहीं है"?

मुख्तार पाटिल के करीब आते हुए बोला.

"मतलब उस हादसे के बाद वह पुलिस स्टेशन नहीं बचा, अब वह सिर्फ़ एक खंडहर की तरह हो गया है"

"हम्म पर मिस्टर. पाटिल में चाहता हूँ की आप उसके बारे में इन्फार्मेशन निकले"

"पर क्या करेंगे आप"?

"शायद यहाँ का छुपा हुआ कोई इतिहास मिल जाए हमें, या फिर कुछ भी, आप समझ रहे हैं ना में क्या कहना चाहता हूँ"

मुख्तार ने पाटिल की आँखों में एक बार फिर देखते हुए कहा.

"जी, अब में चलता हूँ, जल्दी ही खबर लगाउंगा"

पाटिल की आवाज़ इस बार कुछ अलग थी, इतना कह कर वह निकल गया.

उसके जाते ही मुख्तार ने अपना फोन उठाया और नंबर डायल किया,

"हेलो सर, जी काम चल रहा है, आपको फिक्र करने की जरूरत नहीं है, क्या…., पर क्यों, हम्म, जी सर, अपने सही कहा, ये अच्छी मार्केटिंग स्ट्रॅटजी बन सकती है, हा बिलकुल सर में इस बात का बिलकुल ध्यान रखूँगा, जानता हूँ सर ये प्रोजेक्ट कितना इंपॉर्टेंट है आप बेफ़िक्र रहीये, यहाँ पे अब कोई भी उस बनने से रोक नहीं पाएगा, आप देखते जाइये सर, इस जगह का नाम एक बार फिर पहले की तरह कितना बड़ा हो जाएगा…., ओफ्फकोर्स सर, में जानता हूँ लेकिन कहते हैं ना सर कुछ पाने के लिए कुछ कुर्बनियाँ तो देनी ही पड़ती है, हाहहहाहा, बस आपकी मेहरबानी है सर"

इतनी बात करने के बाद थोड़ी देर मुख्तार शांत रहता है, दूसरी तरफ से कुछ देर सुनाने के बाद उसने कहना शुरू किया,

"नहीं सर फिलहाल उस जगह के बारे में कुछ नहीं जान पाया हूँ, आप तो जानते ही हैं सर मुझे आए हुए अभी सिर्फ़ 4 महीने ही हुए हैं, पर आप चिंता ना कर्रे में जल्दी ही पता लगा लूँगा, ओके सर, ये शुरू, जब आप कहे, पर में तो चाहता हूँ की आपसे उसी दिन मिलूं जब मेरा काम खत्म हो जाए, आप बेफ़िक्र रहिए, काम ऐसा होगा की दूर दूर से लोग आकर देखेंगे, जी सर ओके, ओके, हॅव आ नाइस डे सर"

इतना कहने के बाद मुख्तार ने फोन रख दिया.

"उफफ, ये मेयर साहब के सवाल का जवाब कहाँ से दु, मुझे जल्दी ही अब पता लगाना पड़ेगा की ऐसा क्या है उस जगह, जिसके बारे में जिसे पूछो वह कुछ बोल पाता नहीं पर मुझे उन सब के चेहरे पे एक अजीब सी खामोशी नज़र आती है"

इतना कह के मुख्तार अपना गिलास वाइन से भरने लगता है.

"साहब..!

मुख्तार के कानों में आवाज़ पड़ती है, अपनी गर्दन पीछे घुमा के देखता है तो उसका नौकर खड़ा होता है,

"हाँ बोल"

गिलास से एक घूँट भरते हुए वह उस बोलता है.

"साहब, क्या ये सब बातें उस जगह की है जहाँ वह कब्रिस्तान है"

छोटू ने थोड़े अटकते हुए कहा.

"हा, कब्रिस्तान है नहीं, था, अभी नहीं बचा, पर तुझे कैसे पता"?

अजीब सी निगाहों से पूछा.

"वह आपकी बातों से और उस दिन जो मजदूर आए थे उस दिन की बातों से मुझे लगा की वहीं की है..”

"तू बहुत बातें सुनने लगा है आज कल, चल जा के काम कर अपना, वैसे भी में इस वक्त कुछ सोच रहा हूँ"

मुख्तार थोड़ा चीखते हुए बोला और फिर वाइन की बॉटल उठा के अपना गिलास भरने लगा, गिलास में जा रही वाइन की आवाज़ उस कमरे में गूँज रही थी की तभी वह आवाज़ बंद हो गयी और मुख्तार के हाथ रुक गयी, वह फौरन घुमा और छोटू को देखने लगा.

"क्या कहाँ तूने अभी"?

मुख्तार ने बहुत तेजी से अपना सवाल किया.

"वही साहब जो मैंने सुना है, अपनी मां से, उसने बताया था मुझे एक बार, की वह जगह शापित है, साहब मां ने इतना भी बताया था की वहाँ कुछ साल पहले एक हवेली हुआ करती थी, बहुत बड़ी हवेली जिसे किसी शैतान ने जकड़ा हुआ था, बहुतो का खून पिया है साहब उस हवेली ने, मुझे तो लगता है साहब की ये वही हवेली है जो बदला ले रही है"

छोटू ने इतना कहा और वह चुप हो गया, एक पल के लिए कमरे को शांति ने घेर लिया, एक दम खोमोशी, मुख्तार एक गहरी सोच में डूबा हुआ था.

"हवेली हम्म, तुम जाकर खाने की तैयारी करो"

मुख्तार ने इतना कहा और फिर से सोच में डूब गया.

पुलिस स्टेशन.

"अरे राकेश मेरा एक काम तो कर देना"

पाटिल ने अंदर घुसते ही अपना आर्डर एक सब-इंस्पेक्टर को दिया.

"जी सर बोलिए"

"राकेश यार तू वह काली चौकी पुलिस स्टेशन के बारे में जानता है ना, जो उस पहाड़ी के ठीक आगे बना हुआ है"

"वह खंडहर सर"

"हाँ हाँ, यार वही"

"उस खंडहर में क्या काम आ गया है सर"

"अरे यार तू ये पता कर की मेरे आने से पहले वहाँ किसकी पोस्टिंग थी और किस वजह से उसका ट्रांसफर कर दिया, साथ ही साथ उसकी पूरी यूनिट का भी, क्यों की मेरे यहाँ पोस्टिंग करने की वजह मुझे नहीं बताई गयी थी, तो सोच रहा हूँ अब जब यहाँ आ गया हूँ तो सब कुछ पता कर लू"

"ये तो हम सबके साथ है सर, हम सबकी पोस्टिंग का रीज़न दिया ही नहीं गया है, आप चिंता मत कीजिए, ये काम जल्दी ही हो जाएगा"

राकेश ने इतना कहा और वह वहाँ से चला गया.

"लगता है अब गडे मुर्दे उखाड़ने का वक्त आ गया है"

पाटिल ने अजीब सा चेहरा बनाते हुए अपने आप से कहा और फिर फाइल खोल के अपने काम में लग गया…
 
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