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प्यार हो तो ऐसा compleet

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प्यार हो तो ऐसा पार्ट--4

गतान्क से आगे..............

“चल अंदर” वीर ने सरिता को हवेली के एक कमरे में धकेलते हुवे कहा

सरिता ने रोते हुवे मूड कर उसकी और देखा.

“देख क्या रही है, सूकर मना तू अभी तक ज़िंदा है” --- वीर प्रताप ने कहा

रेणुका दूर खड़ी हुई सब कुछ देख रही है. उसने ऐसा आज तक अपनी जींदगी में नही देखा, इश्लीए बहुत हैरान और परेशान है. वो दौड़ कर रुद्र प्रताप के कमरे में जाती है

“पिता जी-पिता जी….. देखिए ये किशे यहा उठा लाए हैं…आप इन्हे रोकते क्यों नही ?”

“चुप रहो बहू, एक साल हो गया तुम्हे इस घर में आए… पर तुमने अब तक ये नही सीखा कि इस घर की औरते ज़ुबान नही चलाती”

“माफ़ करना….पिता जी… पर जो कुछ ये कर रहे हैं… ग़लत कर रहे हैं. एक औरत को यहा ऐसी हालत में घसीट कर लाए हैं कि मैं कह नही सकती”

“वीर !!!” --- रुद्र प्रताप ने चील्ला कर आवाज़ लगाई

वीर भाग कर वाहा आता है

“जी पिता जी क्या हुवा ?”

“बहू से कहो यहा से चली जाए वरना हम अपना आपा खो बैठेंगे….. अब ये हमे बताएगी कि हम क्या करें क्या नही”

वीर ने तुरंत रेणुका की ओर बढ़ कर उसके बाल पकड़ लिए और चील्ला कर बोला, “क्या तकलीफ़ है तुम्हारी”

“आहह क..क..कुछ नही मैं तो बस पिता जी से ये कह रही थी कि ये जो हो रहा है ग़लत हो रहा है” --- रेणुका ने कराहते हुवे कहा

“और जो हमारी वर्षा के साथ हुवा वो क्या सही था ?” वीर ने पूछा

वीर रेणुका के बाल खींचते हुवे उशे अपने कमरे तक ले आया और उशे बिस्तर पर पटक दिया और बोला, “खबरदार जो आज के बाद यहा किशी से कुछ बोला तो, मुझ से बुरा कोई नही होगा”

“आप से बुरा… कोई है भी नही दुनिया में”

“बिल्कुल सही, बहुत जल्दी समझ में आ गया तुझे”

तभी वीर को बाहर से आवाज़ आती है

“छोटे मालिक”

वीर बाहर आ कर पूछता है

“क्या बात है बलवंत ?”

“मालिक मैं कुछ आदमियों को लेकर पीछे के खेतो में जा रहा हूँ, मुझे यकीन है कि मदन की छोटी बहन वहीं छुपी होगी”

“रूको मैं भी साथ चलूँगा ?”

“ठीक है मालिक चलिए”

“भीमा !!” वीर भीमा को आवाज़ लगाता है

भीमा भाग कर आता है और सिर झुका कर कहता है , “जी मालिक ?”

“वो बाहर के कमरे का ताला लगा दो, हम अभी आते हैं”

“जो हूकम मालिक”

वीर बलवंत और उसके साथियों के साथ हवेली के पीछे के खेतो की तरफ चल पड़ता है

खेत में साधना बड़ी असमंजस की हालत में है. वो मन ही मन सोच रही है कि वो घर जाए या फिर यहीं खेत में बैठी रहे. एक पल वो मदन के लिए परेशान होती है…. और दूसरे ही पल सरिता के लिए. वो इस बात से अभी अंजान है कि उसकी मा मर चुकी है, उसके पिता जी सड़क पर बेहोश पड़े हैं और उसकी बहन सरिता ठाकुर की हवेली में क़ैद है. वो इस बात से भी बेख़बर है कि वीर प्रताप कुछ लोगो के साथ उसकी तरफ बढ़ रहा है

अचानक साधना को किसी के आने की हुलचल सुनाई देती है. साधना भाग कर मक्की की फसलों में छुप जाती है.

“पूरा खेत छान मारो वो यही कही होगी ?” वीर ने कहा

“छोटे ठाकुर आप चिंता मत करो वो यहा से बच कर नही जा पाएगी” – बलवंत ने कहा

ठाकुर के आदमी पूरे खेत में फैल जाते हैं.

साधना, वीर और बलवंत की बाते सुन लेती है और समझ जाती है कि वो लोग उशे ढूंड रहे हैं.

“मालिक मैं यहा सामने की फसलों में देखता हूँ” --- बलवंत ने कहा

“हां-हां देखो, जल्दी ढूंड कर लाओ उशे”

साधना के दिल की धड़कन बढ़ जाती है क्योंकि बलवंत उशी की तरफ बढ़ रहा है.

पर तभी वीर के पास कल्लू चीखता हुवा आता है

“मालिक-मालिक लगता है वो लड़की जंगल में घुस्स गयी”

ये सुन कर बलवंत वापिस मूड जाता है और कल्लू से पूछता है

“क्या बकवास कर रहे हो… उस जुंगल में लोग दिन में जाने से डरते हैं, अब रात होने को है, वो लड़की भला वाहा कैसे जाएगी” --- बलवंत ने कहा
 


“मैं सच कह रहा हूँ बलवंत, मैने खुद किसी को अभी अभी खेत के उस पार जो जुंगल है उसमे जाते हुवे देखा है, मुझे पूरा यकीन है कि वो मदन की बहन ही होगी, दूर से वो कोई लड़की जैसी ही लग रही थी”

“बलवंत जल्दी से सभी को बुलाओ हूमें उसे हर हाल में पकड़ना है” --- वीर ने कहा

“मालिक इस वक्त उस जंगल में जाना ख़तरे से खाली नही है, मेरी बात मानिए हम उशे सुबह ढूंड लेंगे, वो अकेली लड़की भाग कर जाएगी भी कहा”

“पर मुझे डर है कि सुबह तक उसकी लाश ही मिलेगी” --- वीर ने कहा

“वो तो है मालिक पर इसके अलावा हम कर भी क्या सकते हैं, आप तो जानते ही हैं सतपुरा के इन जुंगलों को”

वीर किसी सोच में डूब जाता है और कहता है, “ठीक है चलो… कल सुबह देखेंगे”

वीर सभी को लेकर वाहा से चल देता है.

साधना साँस रोके चुपचाप बैठी है. वो सूकर मना रही है की वो लोग जा रहे हैं. पर एक बात मन ही मन उशे परेशान कर रही है कि ठाकुर के आदमियों ने जंगल में जाते हुवे किसको देखा है ?

इधर हवेली में रेणुका अपने कमरे से निकल कर उस कमरे की तरफ देखती है जिसमे सरिता बंद है. वो मन ही मन सोचती है कि जा कर कमरे का दरवाजा खोल कर उशे वाहा से भगा दे.

रेणुका ये सब सोच ही रही है कि अचानक उसे उस कमरे से चीन्ख सुनाई देती है. वो वाहा जाना चाहती है पर चाह कर भी जा नही पाती.

थोड़ी देर बाद उशे उस कमरे से रुद्रा प्रताप निकलता हुवा दीखाई देता है

वो मन ही मन कहती है छी !!…जब बाप ही ऐसा हो तो बेटा क्यों नही बुरे काम करेगा.

तभी अचानक रेणुका को घर के पीछे कुछ हुलचल सुनाई देती है.

वो भाग कर वाहा जाती है तो पाती है कि भीमा वाहा अपने हाथ को एक चाकू से चीर रहा है

“अरे ये क्या कर रहे हो तुम भीमा ?”

“म ..म ..में-सब कुछ नही”

“कुछ नही मतलब !! ये खून क्यों बहा रहे हो तुम”

“मेम-साब किसी से कहना मत”

“हाँ-हाँ बोलो क्या बात है ?”

“ये जो लड़की बाहर के कमरे में बंद है, उसका नाम सरिता है, मैं कभी उशे चाहता था. उसकी आँखो में भी मेरे लिए प्यार था, पर हम कभी कह नही पाए. और अचानक उसकी शादी हो गयी. आज सालो बाद उसे इस हालत में देख रहा हूँ. पर मैं चाह कर भी कुछ नही कर सकता… इश्लीए खुद को सज़ा दे रहा हूँ”

“तो जाकर चुलु भर पानी में डूब मरो” ---- रेणुका ने गुस्से में कहा और कह कर वाहा से मूड कर अपने कमरे की तरफ चल दी.

जाते-जाते उसने मूड कर देखा तो पाया कि जीवन चाचा उस कमरे में घुस रहा था जिसमे सरिता बंद थी

रेणुका ने मन ही मन में कहा, ‘इस घर में सभी आदमी एक जैसे हैं…बस नाम, शकल और उमर अलग-अलग हैं’

रेणुका से ये सब देखा नही गया और वो वापिस मूड कर भीमा के पास आ गयी और बोली, “तुम उशे कैसा प्यार करते थे !! तुम्हे शरम नही आती, यहा खड़े-खड़े तमासा देख रहे हो, तुम्हे कुछ करना चाहिए”

“मैं इस घर का नौकर हूँ मेम-साब, आप ही बताओ मैं क्या कर सकता हूँ”

“नौकर होने का ये मतलब तो नही की तुम इंसानियत भूल जाओ ?”

“मेम-साब में कुछ नही कर सकता, मैं मजबूर हूँ”

“ठीक है फिर मुझे ही कुछ करना पड़ेगा”

ये कह कर रेणुका भाग कर हवेली की रसोई में जाती है और एक लंबा सा चाकू लेकर उस कमरे की तरफ भागती है जिसमे सरिता बंद है. भीमा एक तक उशे देखता रह जाता है.

रेणुका उस कमरे के बाहर आकर देखती है कि दरवाजा अंदर से बंद है और अंदर से सरिता के सिसकने की आवाज़ आ रही है. वो हिम्मत करके दरवाजा खड़काती है.

“कौन है ?”

पर रेणुका जीवन के सवाल का कोई जवाब नही देती और एक बार फिर से दरवाजा खड़काती है. वो चाकू एक हाथ से पीठ के पीछे छुपा लेती है

जीवन दरवाजा खोलता है.

“अरे रेणुका बेटी तुम यहा क्या कर रही हो ?”

“ये सवाल मुझे आपसे करना चाहिए चाचा जी”

“चुप कर, अपना काम कर जा कर ?”

“अपना काम ही कर रही हूँ चाचा जी चुपचाप पीछे हट जाओ वरना ये खंजर शीने में उतार दूँगी” --- रेणुका चाकू जीवन को दीखाते हुवे कहती है.
 


पर जीवन एक झटके में उसके हाथ से चाकू छीन लेता है.

रेणुका एक नज़र सरिता पर डालती है. सरिता की हालत देख कर उसकी आँखे नम हो जाती हैं. सरिता भी ना-उम्मिदि लिए उसकी ओर देखती है और अपनी आँखे बंद कर लेती है.

जीवन रेणुका के मूह पर एक थप्पड़ जड़ देता है जिसके कारण रेणुका लड़खड़ा कर वहीं गिर जाती है

भीमा भाग कर वाहा आता है पर जीवन को देख कर ठिठक जाता है.

“भीमा तुम जाओ अपना काम करो यहा सब ठीक है” --- जीवन ने कहा

“मालिक पर”

“पर क्या…. मेरा दीमाग खराब मत करो और जाओ यहा से”

भीमा चुपचाप वापिस मूड कर चल देता है.

रेणुका कमरे के बाहर पड़ी रह जाती है और जीवन दरवाजा वापिस बंद कर लेता है.

अचानक भीमा कुछ अजीब करता है. वो रुद्र प्रताप के कमरे की तरफ जाता है और उसके कमरे को बंद करके बाहर से कुण्डी लगा देता है.

फिर वो भाग कर रेणुका के पास आता है और कहता है, “मेम-साब उठो”

“उस लड़की को बचा लो भीमा… वरना मैं भगवान को क्या मूह देखाउन्गि”

“मैं कुछ करता हूँ मेम-साब आप उठो यहा से”

रेणुका वाहा से खड़ी होती है.

भीमा दरवाजे को ज़ोर से धकैल कर खोल देता है.

“भीमा ये क्या कर रहे हो”

“वही जो बहुत पहले करना चाहिए था”

भीमा ने जीवन की टाँग पकड़ कर उसे सरिता के उपर से खींच लिया और उसे एक तरफ पटक दिया

“लगता है तुझे अपनी जान प्यारी नही”

भीमा जीवन को कुछ नही कहता और कमरे के बाहर आ कर रेणुका से कहता है “मेम-साब….कपड़े”

“रूको मैं अभी अपने कुछ कपड़े लाती हूँ”

इतने में भीमा जीवन को रस्सी से बाँध कर एक तरफ बैठा देता है

रेणुका भाग कर अपने कमरे से सरिता के लिए कपड़े लाती है और कमरे में आकर सरिता को कपड़े देते हुवे कहती है, “लो जल्दी से कपड़े पहन लो और यहा से निकल जाओ”

सरिता मुस्किल से उठती है और धीरे-धीरे कपड़े पहनती है

मेम-साब मुझे भी इसके साथ ही जाना होगा, आपने मेरी आँखे खोल दी वरना मैं जींदगी भर खुद से नज़रे नही मिला पाता

“इन बातो का वक्त नही है अभी जल्दी यहा से निकलो…सरिता को इसके ससुराल पहुँचा देना”

“जी मेम-साब मैं सरिता को लेकर अभी इसके ससुराल चल पड़ूँगा आप अपना ख्याल रखना”

“अब जल्दी जाओ यहा से”

“जी मेम-साब”

सरिता हाथ जोड़ कर रेणुका का धन्यवाद करती है

रेणुका भावुक हो कर उसे गले लगा लेती है और कहती है , “जो भी तुम्हारे साथ हुवा उसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ. जाओ अपना ख्याल रखना”

भीमा सरिता को लेकर हवेली से निकल पड़ता है.

रेणुका उन्हे जाते हुवे देखती रहती है. वो मन ही मन सोचती है की उशे भी यहा से कहीं चले जाना चाहिए. ऐसे नरक में रहने से क्या फ़ायडा. फिर वो मूड कर अपने कमरे की तरफ चल देती है.

अचानक उसे अपने पीछे हलचल सुनाई देती है. वो मूड कर देखती है कि वीर, अपने आदमियों के साथ चला आ रहा है

वीर जैसे ही उस कमरे के सामने पहुँचता है तो समझ जाता है कि रेणुका ने मदन की बहन को भगा दिया है.

वो भाग कर रेणुका के बाल पकड़ लेता है और कहता है, “तो तूने अपनी औकात दीखा ही दी. अब मैं तेरा वो हाल करूँगा कि तू सोच भी नही सकती”

बलवंत कमरे में जाकर देखता है कि जीवन वाहा बँधा पड़ा है, वो झट से उसकी रस्सिया खोलता है और मूह में से कपड़ा निकालता है.

जीवन भाग कर वीर के पास आता है और कहता है, “वीर उस लड़की को भीमा ले गया है, और बहू ने उसकी मदद की है”

“क्या भीमा ? भीमा ने ऐसा क्यों किया ?”

“पता नही वीर… उसी ने मुझे रस्सी से बाँधा था और मेरे मूह में कपड़ा ठूंस दिया था”

“आप चिंता मत करो चाचा जी वो लोग बच कर कही नही जा सकते. भीमा को मैं जींदा नही छोड़ूँगा”

वीर, रुद्रा प्रताप के कमरे की तरफ बढ़ता है तो देखता है कि बाहर से कुण्डी लगी है. वो खोल कर देखता है तो पता है कि उसके पिता जी सो रहे हैं.

वीर, बलवंत को बुला कर पूछता है, “ये भीमा किस रास्ते से गया होगा ?”

मालिक वो ज़रूर हवेली के पीछले रास्ते से गया होगा, हम सामने से आ रहे थे, वो हमे तो दीखा नही. हवेली के पीछे खेत हैं और खेतो के पार जंगल, वो ज़रूर पीछले रास्ते से गया होगा

“हां-हां वो पीछले रास्ते से ही गया है मैने कमरे से उन्हे जाते देखा था” – जीवन ने वीर से कहा

इधर खेत में साधना अभी भी चुपचाप मक्की की फसलों में बैठी है. अंधेरा घिर आया है और चाँद की चाँदनी चारो और फैलने लगी है.

साधना चुपचाप बाहर निकलती है. लेकिन बाहर निकलते ही वो काँप उठती है. उसे दूर से अपनी और आता एक साया दीखाई देता है. वो डर कर वापिस मक्की की फसलों में घुस्स जाती है.

वो साया भी उसके पीछे पीछे मक्क्की की फसलों में घुस्स जाता है.

साधना एक जगह रुक जाती है ताकि उसके कदमो की आहट ना हो.

लेकिन तभी उसे कदमो की तेज आहट सुनाई देती है.

वो पीछे मूड कर देखती है तो पाती है की वो साया बिल्कुल उसके पीछे 4 कदम की दूरी पर है.

वो तेज़ी से मूड कर भागती है लेकिन वो साया उसे दबोच लेता है.

“ क..क..कौन हो तुम..छ्चोड़ो मुझे” साधना चील्ला कर कहती है

वो साया साधना के मूह पर हाथ रख देता है.

“चुप रहो साधना….ये मैं हूँ”

वो साया उसके मूह से हाथ हटा देता है

साधना अंधेरे में उस साए की शकल तो ठीक से नही देख पाती लेकिन फिर भी उसकी आवाज़ सुन कर रोने लगती है

“प्रेम……..क्या ये तुम हो ?”

“तुम्हे क्या लगता है ?”

साधना उस साए के गले लग जाती है और कहती है, “तुम कहा चले गये थे प्रेम !!….. मैं आज इतनी परेशान हूँ कि अपने प्रेम के कदमो की आहट भी पहचान नही पाई..मुझे माफ़ कर दो”

“चुप रहो ये वक्त बाते करने का नही है ठाकुर के आदमी इसी तरफ आ रहे हैं”

“तुम्हे ये सब कैसे पता…..वो तो अभी यहा से गये हैं”

“बतावँगा सब कुछ बतावँगा अभी तुम थोड़ी देर चुप रहो”

क्रमशः......................

gataank se aage..............

“Chal ander” veer ne sarita ko haweli ke ek kamre mein dhakelte huve kaha

sarita ne rote huve mud kar uski aur dekha.

“Dekh kya rahi hai, sukar mana tu abhi tak zinda hai” --- veer pratap ne kaha

renuka dur khadi huyi sab kuch dekh rahi hai. usne aisa aaj tak apni jeendagi mein nahi dekha, ishliye bahut hairaan aur pareshaan hai. vo daud kar rudra pratap ke kamre mein jaati hai

“pita ji-pita ji….. dekhiye ye kishe yaha utha laaye hain…aap inhe rokte kyon nahi ?”

“chup raho bahu, ek saal ho gaya tumhe is ghar mein aaye… par tumne ab tak ye nahi seekha ki is ghar ki aurte jubaan nahi chalaati”

“maaf karna….pita ji… par jo kuch ye kar rahe hain… galat kar rahe hain. ek aurat ko yaha aisi haalat mein ghasit kar laaye hain ki main kah nahi sakti”

“veer !!!” --- rudra pratap ne cheella kar awaaj lagaayi

veer bhaag kar vaha aata hai

“ji pita ji kya huva ?”

“bahu se kaho yaha se chali jaaye varna hum apna aapa kho baithenge….. ab ye hame bataayegi ki hum kya karein kya nahi”

veer ne turant renuka ki aur badh kar uske baal pakad liye aur cheella kar bola, “kya takleef hai tumhaari”

“aahhh k..k..kuch nahi main to bas pita ji se ye kah rahi thi ki ye jo ho raha hai galat ho raha hai” --- renuka ne karaahte huve kaha

“aur jo hamaari varsha ke saath huva vo kya sahi tha ?” veer ne pucha

veer renuka ke baal kheenchte huve ushe apne kamre tak ley aaya aur ushe bistar par patak diya aur bola, “khabaradaar jo aaj ke baad yaha kishi se kuch bola to, mujh se bura koyi nahi hoga”

“aap se bura… koyi hai bhi nahi duniya mein”

“bilkul sahi, bahut jaldi samajh mein aa gaya tujhe”

tabhi veer ko baahar se awaaj aati hai

“chote maalik”

veer baahar aa kar puchta hai

“kya baat hai balwant ?”

“maalik main kuch aadmiyon ko lekar peeche ke kheto mein ja raha hun, mujhe yakin hai ki madan ki choti bahan vahin chupi hogi”

“ruko main bhi saath chalunga ?”

“theek hai maalik chaliye”

“bhima !!” veer bhima ko awaaj lagaata hai

bhima bhaag kar aata hai aur sir jhuka kar kahta hai , “ji maalik ?”

“vo baahar ke kamre ka taala laga do, hum abhi aate hain”

“jo hukam maalik”

veer balwant aur uske saathiyon ke saath haweli ke peeche ke kheto ki taraf chal padta hai

khet mein sadhna badi asmanjas ki haalat mein hai. vo man hi man soch rahi hai ki vo ghar jaaye ya phir yahin khet mein baithi rahe. Ek pal vo madan ke liye pareshaan hoti hai…. aur dusre hi pal sarita ke liye. vo is baat se abhi anjaan hai ki uski maa mar chuki hai, uske pita ji sadak par behosh pade hain aur uski bahan sarita thakur ki haweli mein kaid hai. vo is baat se bhi bekhabar hai ki veer pratap kuch logo ke saath uski taraf badh raha hai

achaanak sadhna ko kisi ke aane ki hulchal sunaayi deti hai. sadhna bhaag kar makki ki faslon mein chup jaati hai.

“pura khet chaan maaro vo yahi kahi hogi ?” veer ne kaha

“chote thakur aap chinta mat karo vo yaha se bach kar nahi ja paayegi” – balwant ne kaha

thakur ke aadmi pure khet mein fail jaate hain.

Sadhna, veer aur balwant ki baate sun leti hai aur samajh jaati hai ki vo log ushe dhund rahe hain.

“Maalik main yaha saamne ki faslon mein dekhta hun” --- balwant ne kaha

“haan-haan dekho, jaldi dhund kar lao ushe”

sadhna ke dil ki dhadkan badh jaati hai kyonki balwant ushi ki taraf badh raha hai.

par tabhi veer ke paas kallu cheekhta huva aata hai

“maalik-maalik lagta hai vo ladki jungle mein ghuss gayi”

ye sun kar balwant vaapis mud jaata hai aur kallu se puchta hai

“kya bakwaas kar rahe ho… ush jungal mein log din mein jaane se darte hain, ab raat hone ko hai, vo ladki bhala vaha kaise jaayegi” --- balwant ne kaha

“main sach kah raha hun balwant, maine khud kisi ko abhi abhi khet ke us paar jo jungal hai usme jaate huve dekha hai, mujhe pura yakin hai ki vo madan ki bahan hi hogi, dur se vo koyi ladki jaisi hi lag rahi thi”

“balwant jaldi se sabhi ko bulaao humein ushe har haal mein pakadna hai” --- veer ne kaha

“maalik is vakt us jungle mein jaana khatre se khali nahi hai, meri baat maaniye hum ushe subah dhund lenge, vo akeli ladki bhaag kar jaayegi bhi kaha”

“par mujhe dar hai ki subah tak uski laash hi milegi” --- veer ne kaha

“vo to hai maalik par iske alaawa hum kar bhi kya sakte hain, aap to jaante hi hain satpura ke in junglon ko”

veer kisi soch mein dub jaata hai aur kahta hai, “theek hai chalo… kal subah dekhenge”

veer sabhi ko lekar vaha se chal deta hai.

sadhna saans roke chupchaap baithi hai. vo sukar mana rahi hai ki vo log ja rahe hain. Par ek baat man hi man ushe pareshaan kar rahi hai ki thakur ke aadmiyon ne jungle mein jaate huve kisko dekha hai ?

Idhar haweli mein renuka apne kamre se nikal kar us kamre ki taraf dekhti hai jisme sarita band hai. vo man hi man sochti hai ki ja kar kamre ka darvaaja khol kar ushe vaha se bhaga de.

Renuka ye sab soch hi rahi hai ki achaanak ushe us kamre se cheenkh sunaayi deti hai. vo vaha jaana chaahti hai par chaah kar bhi ja nahi paati.

Thodi der baad ushe us kamre se rudra pratap nikalta huva deekhaayi deta hai

Vo man hi man kahti hai chi !!…jab baap hi aisa ho to beta kyon nahi bure kaam karega.

Tabhi achaanak renuka ko ghar ke peeche kuch hulchal sunaayi deti hai.

vo bhaag kar vaha jaati hai to paati hai ki bhima vaha apne haath ko ek chaaku se cheer raha hai

“arey ye kya kar rahe ho tum bhima ?”

“m ..m ..mem-sab kuch nahi”

“kuch nahi matlab !! ye khun kyon baha rahe ho tum”

“mem-saab kisi se kahna mat”

“haan-haan bolo kya baat hai ?”

“ye jo ladki baahar ke kamre mein band hai, uska naam sarita hai, main kabhi ushe chaahta tha. uski aankho mein bhi mere liye pyar tha, par hum kabhi kah nahi paaye. Aur achaanak uski shaadi ho gayi. aaj saalo baad ushe ish haalat mein dekh raha hun. par main chaah kar bhi kuch nahi kar sakta… ishliye khud ko saja de raha hun”

“to jaakar chulu bhar paani mein dub maro” ---- renuka ne gusse mein kaha aur kah kar vaha se mud kar apne kamre ki taraf chal di.

jaate-jaate ushne mud kar dekha to paaya ki jeevan chacha us kamre mein ghuss raha tha jisme sarita band thi

renuka ne man hi man mein kaha, ‘is ghar mein sabhi aadmi ek jaise hain…bas naam, shakal aur umar alag-alag hain’

Renuka se ye sab dekha nahi gaya aur vo vaapis mud kar bhima ke paas aa gayi aur boli, “tum ushe kaisa pyar karte the !! tumhe sharam nahi aati, yaha khade-khade tamaasa dekh rahe ho, tumhe kuch karna chaahiye”

“Main is ghar ka naukar hun mem-saab, aap hi bataao main kya kar sakta hun”

“naukar hone ka ye matlab to nahi ki tum insaaniyat bhool jao ?”

“mem-saab mein kuch nahi kar sakta, main majboor hun”

“theek hai phir mujhe hi kuch karna padega”

ye kah kar renuka bhaag kar haweli ki rasoyi mein jaati hai aur ek lamba sa chaaku lekar us kamre ki taraf bhaagti hai jisme sarita band hai. bhima ek tak ushe dekhta rah jaata hai.

renuka us kamre ke baahar aakar dekhti hai ki darvaaja ander se band hai aur ander se sarita ke sisakne ki awaaj aa rahi hai. vo himmat karke darvaaja khadkaati hai.

“kaun hai ?”

par renuka jeevan ke sawaal ka koyi jawaab nahi deti aur ek baar phir se darvaaja khadkaati hai. vo chaaku ek haath se peeth ke peeche chupa leti hai

jeevan darvaaja kholta hai.

“arey renuka beti tum yaha kya kar rahi ho ?”

“ye sawaal mujhe aapse karna chaahiye chacha ji”

“chup kar, apna kaam kar jaa kar ?”

“apna kaam hi kar rahi hun chacha ji chupchaap peeche hat jao varna ye khanjar sheene mein utaar dungi” --- renuka chaaku jeevan ko deekhaate huve kahti hai.

par jeevan ek jhatke mein uske haath se chaaku cheen leta hai.

renuka ek najar sarita par daalti hai. sarita ki haalat dekh kar uski aankhe nam ho jaati hain. sarita bhi na-ummidi liye uski aur dekhti hai aur apni aankhe band kar leti hai.

jeevan renuka ke muh par ek thappad jad deta hai jiske kaaran renuka ladkhada kar vahin gir jaati hai

bhima bhaag kar vaha aata hai par jeevan ko dekh kar theetak jaata hai.

“bhima tum jao apna kaam karo yaha sab theek hai” --- jeevan ne kaha

“maalik par”

“par kya…. Mera deemaag kharaab mat karo aur jao yaha se”

bhima chupchaap vaapis mud kar chal deta hai.

renuka kamre ke baahar padi rah jaati hai aur jeevan darvaaja vaapis band kar leta hai.

achaanak bhima kuch ajeeb karta hai. vo rudra pratap ke kamre ki taraf jaata hai aur uske kamre ko band karke baahar se kundi laga deta hai.

phir vo bhaag kar renuka ke paas aata hai aur kahta hai, “mem-saab utho”

“us ladki ko bacha lo bhima… varna main bhagwan ko kya muh dekhaaungi”

“main kuch karta hun mem-saab aap utho yaha se”

renuka vaha se khadi hoti hai.

bhima darwaje ko jor se dhakail kar khol deta hai.

“bhima ye kya kar rahe ho”

“vahi jo bahut pehle karna chaahiye tha”

bhima ne jeevan ki taang pakad kar ushe sarita ke upar se kheench liya aur ushe ek taraf patak diya

“lagta hai tujhe apni jaan pyari nahi”

bhima jeevan ko kuch nahi kahta aur kamre ke baahar aa kar renuka se kahta hai “mem-saab….kapde”

“ruko main abhi apne kuch kapde laati hun”

itne mein bhima jeevan ko rassi se baandh kar ek taraf baitha deta hai

renuka bhaag kar apne kamre se sarita ke liye kapde laati hai aur kamre mein aakar sarita ko kapde dete huve kahti hai, “lo jaldi se kapde pahan lo aur yaha se nikal jao”

sarita muskil se uthti hai aur dheere-dheere kapde pahanti hai

mem-saab mujhe bhi iske saath hi jaana hoga, aapne meri aankhe khol di varna main jeendagi bhar khud se nazre nahi mila paata

“in baato ka vakt nahi hai abhi jaldi yaha se niklo…sarita ko iske sasural pahuncha dena”

“ji mem-saab main sarita ko lekar abhi iske sasural chal padunga aap apna khyaal rakhna”

“ab jaldi jao yaha se”

“ji mem-saab”

sarita haath jod kar renuka ka dhanyavaad karti hai

renuka bhaavuk ho kar ushe gale laga leti hai aur kahti hai , “jo bhi tumhaare saath huva uske liye main bahut sharminda hun. jao apna khyaal rakhna”

bhima sarita ko lekar haweli se nikal padta hai.

renuka unhe jaate huve dekhti rahti hai. vo man hi man sochti hai ki ushe bhi yaha se kahin chale jaana chaahiye. aise narak mein rahne se kya faayda. Phir vo mud kar apne kamre ki taraf chal deti hai.

achaanak ushe apne peeche halchal sunaayi deti hai. vo mud kar dekhti hai ki veer, apne aadmiyon ke saath chala aa raha hai

veer jaise hi us kamre ke saamne pahunchta hai to samajh jaata hai ki renuka ne madan ki bahan ko bhaga diya hai.

vo bhaag kar renuka ke baal pakad leta hai aur kahta hai, “to tune apni aukat deekha hi di. ab main tera vo haal karunga ki tu soch bhi nahi sakti”

balwant kamre mein jaakar dekhta hai ki jeevan vaha bandha pada hai, vo jhat se uski rassiya kholta hai aur muh mein se kapda nikaalta hai.

Jeevan bhaag kar veer ke paas aata hai aur kahta hai, “veer us ladki ko bhima ley gaya hai, aur bahu ne uski madad ki hai”

“Kya bhima ? bhima ne aisa kyon kiya ?”

“Pata nahi veer… ushi ne mujhe rassi se baandha tha aur mere muh mein kapda thoons diya tha”

“Aap chinta mat karo chacha ji vo log bach kar kahi nahi ja sakte. Bhima ko main jeenda nahi chodunga”

Veer, rudra pratap ke kamre ki taraf badhta hai to dekhta hai ki baahar se kundi lagi hai. Vo khol kar dekhta hai to pata hai ki uske pita ji sho rahe hain.

Veer, balwant ko bula kar puchta hai, “ye bhima kish raste se gaya hoga ?”

Maalik vo jaroor haweli ke peechle raste se gaya hoga, hum saamne se aa rahe the, vo hame to deekha nahi. Haweli ke peeche khet hain aur kheto ke paar jungle, vo jaroor peechle raste se gaya hoga

“Haan-haan vo peechle raste se hi gaya hai maine kamre se unhe jaate dekha tha” – jeevan ne veer se kaha

Idhar khet mein sadhna abhi bhi chupchaap makki ki faslon mein baithi hai. Andhera ghir aaya hai aur chaand ki chaandni charo aur failne lagi hai.

Sadhna chupchaap baahar nikalti hai. Lekin baahar nikalte hi vo kaanp uthti hai. Ushe dur se apni aur aata ek saaya deekhaayi deta hai. Vo dar kar vaapis makki ki faslon mein ghuss jaati hai.

Vo saaya bhi uske peeche peeche makkki ki faslon mein ghuss jata hai.

Sadhna ek jagah ruk jaati hai taaki uske kadmo ki aahat na ho.

Lekin tabhi ushe kadmo ki tej aahat sunaayi deti hai.

Vo peeche mud kar dekhti hai to paati hai ko vo saaya bilkul uske peeche 4 kadam ki duri par hai.

Vo teji se mud kar bhaagti hai lekin vo saaya ushe daboch leta hai.

“ k..k..kaun ho tum..chhodo mujhe” sadhna cheella kar kahti hai

Vo saaya sadhna ke muh par haath rakh deta hai.

“Chup raho sadhna….ye main hun”

Vo saaya uske muh se haath hata deta hai

Sadhna andhere mein us saaye ki shakal to theek se nahi dekh pati lekin phir bhi uski awaaj sun kar rone lagti hai

“prem……..kya ye tum ho ?”

“Tumhe kya lagta hai ?”

Sadhna us saaye ke gale lag jaati hai aur kahti hai, “tum kaha chale gaye the prem !!….. main aaj itni pareshaan hun ki apne prem ke kadmo ki aahat bhi pehchaan nahi paayi..mujhe maaf kar do”

“Chup raho ye vakt baate karne ka nahi hai thakur ke aadmi ishi taraf aa rahe hain”

“Tumhe ye sab kaise pata…..vo to abhi yaha se gaye hain”

“Bataaunga sab kuch bataaunga abhi tum thodi der chup raho”

kramshah......................

 
गतान्क से आगे..............

प्रेम का उस वक्त अचानक आना साधना के लिए किसी सपने से कम नही था. साधना मन ही मन सोच रही थी कि आख़िर आज प्रेम अचानक यहा कैसे आ गया. 3 साल से वो गाँव से गायब था, वो कहा था ? क्या कर रहा था ?.. ये कुछ ऐसे सवाल थे.. जो साधना के मन में घूम रहे थे. साधना प्रेम से बहुत कुछ पूछना चाहती है पर हालात ऐसे नही हैं. प्रेम भी साधना को बहुत कुछ बताना चाहता है पर उस वक्त वो चुप्पी साधे हुवे है.

लेकिन फिर भी साधना धीरे से कहती है, “प्रेम…. ठाकुर के आदमी दीदी को उठा कर ले गये हैं”

“घबराओ मत… सरिता अब वाहा नही है, मैं हवेली से ही आ रहा हूँ. सरिता को वाहा से भीमा अपने साथ ले गया है” – प्रेम ने धीरे से कहा

“तुम्हे ये कैसे पता”

“मैं कोई 2 घंटे पहले गाँव पहुँचा था, रास्ते में तुम्हारे पिता जी सड़क पर बेहोश मिले”

“क्या!! हे भगवान ” --- साधना ने भावुक हो कर पूछा

“धीरे बोलो” –प्रेम ने धीरे से कहा

“पर पिता जी को क्या हुवा था ?”

“साधना, छोटे ठाकुर ने उन्हे बहुत बुरी तरह मारा था… जिसके कारण वो बेहोश हो कर सड़क पर गिर गये. पर तुम चिंता मत करो वो अब ठीक हैं और सुरक्षित हैं. उन्होने ही मुझे सब कुछ बताया. मैं उनकी बात सुन कर सरिता के लिए तुरंत हवेली गया. पर मेरे वाहा पहुँचने से पहले ही भीमा, सरिता को वाहा से ले गया. भीमा को तो तुम भी जानती हो ना ? ….वो एक अछा इंसान है. फिर मैने हवेली की दीवार से अंदर की बाते सुनी..यही पता चला कि ठाकुर के आदमी भीमा और सरिता को ढूँडने इधर ही आ रहे हैं. तभी मैं भाग कर यहा आया ….क्योंकि तुम्हारे पिता जी ने बताया था कि तुम खेत में ही हो”

“मेरी मा तो ठीक है ना प्रेम ?”

पेम ये सुन कर चुप हो जाता है

साधना फिर से पूछती है, “मा तो ठीक है ना प्रेम ?”

“वो…… अब इस दुनिया में नही हैं साधना, मुझे दुख है… काश !! में थोडा और पहले पहुँच जाता तो ये सब नही होने देता”

साधना आँसुओ में डूब जाती है और अपने चेहरे को घुटनो में छिपा कर चुपचाप आँसू बहाने लगती है

प्रेम उसके कंधे पर हाथ रख कर उशे दिलासा देता है. पर वो लगातार आँसू बहाती चली जाती है

“ये क्या हो रहा है हमारे साथ आज, प्रेम. सुबह से भैया गायब हैं…. दीदी को ठाकुर के आदमी उठा कर ले गये… और अब मेरी मा चल बसी… एक दिन में इतना कुछ हो गया… और आज ही तुम वापिस आ गये…मुझे सब कुछ बहुत अजीब लग रहा है”

“अजीब तो मुझे भी लग रहा है”

प्रेम और साधना चुपचाप बाते कर ही रहे थे कि उन्हे किसी के कदमो की तेज आहट सुनाई देती है.

“बलवंत अगर भीमा उस छोकरी को ले कर जंगल में घुस्स गया होगा तो ?”

“तो हम वापिस चले जाएँगे कल्लू”

“पर छोटे ठाकुर हमें खूब दांटेंगे बलवंत”

“तू चिंता मत कर उनकी डाँट के डर से हम रात को उस भयानक जंगल में नही जाएँगे…वैसे मुझे यकीन है कि भीमा उस छोकरी के साथ यही कही छुपा होगा”

प्रेम और साधना, बलवंत और कल्लू की बाते सुन रहे थे.
 


तभी अचानक एक खौफनाक चीन्ख पूरे खेत में गूँज उठती है. जो कि हवेली तक सुनाई देती है

“य..य..ये क्या.. था.. बा.ल.वन्त ?”

“पता नही कल्लू…बाकी के आदमी कहा गये ?”

“तुम्ही ने तो सबको 2-2 की टोली में बाँटा था”

“हाँ पर कोई दीख नही रहा” – बलवंत ने चारो ओर देखते हुवे कहा

इधर मक्की के खेत के बीचो बीच साधना, वो चीन्ख सुन कर काँप उठती है और प्रेम के गले लग जाती है. इस से पहले कि वो कुछ बोल पाए प्रेम उसके मूह पर हाथ रख देता है और कान में धीरे से कहता है…”डरो मत मैं हूँ ना तुम्हारे साथ..बिल्कुल चुप रहो”

“बलवंत वो देखो सामने कोई खड़ा है”

“कहा ?”

“उधर सामने..पर ये अपना आदमी तो नही लगता…ये तो कोई और ही लगता है”

“अबे ये तो मुझे आदमी ही नही लग रहा.. चल भाग… यहा से”

ये कह कर बलवंत वाहा से हवेली की तरफ भाग लेता है

कल्लू भी उसके पीछे-पीछे भागने लगता है

रास्ते में उन्हे 2 और साथी मिल जाते हैं जो कि दूसरी तरफ से भाग कर आ रहे थे.

“क्या हुवा बलवंत तुम क्यों भाग रहे हो”

“हम..ने वाहा कुछ अजीब देखा बीर्बल” – बलवंत ने हांपते हुवे कहा

“हमने भी….. पता नही क्या बला है भाई… जल्दी चलो यहा से” बीर्बल ने कहा

ठाकुर के सभी आदमी भाग कर हवेली में पहुँच जाते हैं और वीर को सारी बात बताते हैं.

“तुम सब के सब निकम्मे हो… कभी तुम्हे जंगल से डर लगता है.. कभी किसी साए से. किसी काम के नही हो तुम लोग. ऐसा क्या था खेत में जो तुम डर कर भाग आए. हो सकता है ये भीमा की कोई चाल हो… और क्या पता वो खुद भीमा ही हो” – वीर ने गुस्से में कहा

नही मालिक वो भीमा हरगिज़ नही था. भीमा को मैं आछे से जानता हूँ. उसे मैं किसी भी हालत में पहचान सकता हूँ. खेत में जो कोई भी था ..इंसान नही था..”

इधर खेत में साधना प्रेम से बुरी तरह लीपटि हुई है.

“प्रेम ये लोग किस से डर कर भाग गये ?”

प्रेम तुरंत उसके मूह पर हाथ रख देता है और कहता है, “चुप रहो और यही रूको… मैं देख कर आता हूँ कि चक्कर क्या है”

पर तभी फिर से एक भयानक चीन्ख खेत में गूँज उठती है जो इस बार हवेली को भी हिला देती है

“नही प्रेम रूको… कहीं मत जाओ… मुझे डर लग रहा है, आज खेत में ज़रूर कुछ गड़बड़ है”

“वही तो देखने जा रहा हूँ की क्या गड़बड़ है साधना, डरो मत”

“नही प्रेम रुक जाओ… यहा अकेले मुझे डर लगेगा”
 


इधर उसी वक्त हवेली में :--

“सुनी ये आवाज़ मालिक… ये ज़रूर उसी भयानक साए की है…इतनी ज़ोर से कोई इंसान नही चीन्ख सकता” --- बलवंत ने कहा

वीर भाग कर अपने कमरे में जाता है और रेणुका से पूछता है, “क्या कल रात तुमने ऐसी ही चीन्ख सुनी थी ?”

रेणुका उसकी और देखती है पर कोई जवाब नही देती

“मैं तुमसे कुछ पूछ रहा हूँ… क्या तुम बाहरी हो गयी हो”

“हां ऐसी ही छींख सुनी थी…कल रात तो मेरी बात सुनी नही.. अब क्यों पूछ रहे हो”

वीर भाग कर रुद्र प्रताप के कमरे में जाता है

ऱुद्र प्रताप भी वो भयानक चीन्ख सुन कर उठ जाता है

“पिता जी मुझे लगता है वर्षा किसी मुसीबत में है”

“क्या कह रहे हो तुम… पहले ये तो पता चले कि वर्षा है कहा”

पिता जी बलवंत के चाचा के अनुसार वर्षा कल रात मदन से खेत में मिलने वाली थी.. पर कल रात भी रेणुका ने खेतो से ऐसी ही भयानक चीन्ख सुनी थी”

क्रमशः......................

gataank se aage..............

Prem ka us vakt achaanak aana sadhna ke liye kisi sapne se kam nahi tha. Sadhna man hi man soch rahi thi ki aakhir aaj prem achaanak yaha kaise aa gaya. 3 saal se vo gaanv se gaayab tha, vo kaha tha ? kya kar raha tha ?.. ye kuch aise sawaal the.. jo sadhna ke man mein ghum rahe the. Sadhna prem se bahut kuch puchna chaahti hai par haalaat aise nahi hain. Prem bhi sadhna ko bahut kuch bataana chaahta hai par us vakt vo chuppi saadhe huve hai.

Lekin phir bhi Sadhna dheere se kahti hai, “prem…. thakur ke aadmi didi ko utha kar ley gaye hain”

“Ghabrao mat… sarita ab vaha nahi hai, main haweli se hi aa raha hun. Sarita ko vaha se bhima apne saath ley gaya hai” – prem ne dheere se kaha

“Tumhe ye kaise pata”

“main koyi 2 ghante pehle gaanv pahuncha tha, raaste mein tumhaare pita ji sadak par behosh mile”

“Kya!! Hey bhagvaan ” --- sadhna ne bhaavuk ho kar pucha

“Dheere bolo” –prem ne dheere se kaha

“Par pita ji ko kya huva tha ?”

“Sadhna, chote thakur ne unhe bahut buri tarah maara tha… jiske kaaran vo behosh ho kar sadak par gir gaye. Par tum chinta mat karo vo ab theek hain aur suraksit hain. Unhone hi mujhe sab kuch bataaya. Main unki baat sun kar sarita ke liye turant haweli gaya. Par mere vaha pahunchne se pehle hi bhima, sarita ko vaha se ley gaya. Bhima ko to tum bhi jaanti ho na ? ….vo ek acha insaan hai. Phir maine haweli ki deewar se ander ki baate suni..yahi pata chala ki thakur ke aadmi bhima aur sarita ko dhundne idhar hi aa rahe hain. Tabhi main bhaag kar yaha aaya ….kyonki tumhaare pita ji ne bataaya tha ki tum khet mein hi ho”

“Meri ma to theek hai na prem ?”

Pem ye sun kar chup ho jaata hai

Sadhna phir se puchti hai, “ma to theek hai na prem ?”

“Vo…… ab is duniya mein nahi hain sadhna, mujhe dukh hai… kaash !! mein thoda aur pehle pahunch jaata to ye sab nahi hone deta”

Sadhna aansuvo mein dub jaati hai aur apne chehre ko ghutno mein chipa kar chupchaap aansu bahaane lagti hai

Prem uske kandhe par haath rakh kar ushe dilaasa deta hai. Par vo lagaatar aansu bahaati chali jaati hai

“Ye kya ho raha hai hamaare saath aaj, prem. subah se bhaiya gaayab hain…. didi ko thakur ke aadmi utha kar ley gaye… aur ab meri ma chal basi… ek din mein itna kuch ho gaya… aur aaj hi tum vaapis aa gaye…mujhe sab kuch bahut ajeeb lag raha hai”

“Ajeeb to mujhe bhi lag raha hai”

Prem aur sadhna chupchaap baate kar hi rahe the ki unhe kisi ke kadmo ki tej aahat sunaayi deti hai.

“Balwant agar bhima us chokri ko ley kar jungle mein ghuss gaya hoga to ?”

“To hum vaapis chale jaayenge kallu”

“Par chote thakur hamein khub daantenge balwant”

“Tu chinta mat kar unki daant ke dar se hum raat ko us bhayaanak jungle mein nahi jaayenge…vaise mujhe yakin hai ki bhima us chokri ke saath yahi kahi chupa hoga”

Prem aur sadhna, balwant aur kallu ki baate sun rahe the.

Tabhi achaanak ek khaufnaak cheenkh pure khet mein gunj uthti hai. jo ki haweli tak sunaayi deti hai

“Y..Y..Ye kya.. tha.. ba.l.want ?”

“Pata nahi kallu…baaki ke aadmi kaha gaye ?”

“Tumhi ne to sabko 2-2 ki toli mein baanta tha”

“Haan par koyi deekh nahi raha” – balwant ne chaaro aur dekhte huve kaha

Idhar makki ke khet ke beecho beech sadhna, vo cheenkh sun kar kaanp uthti hai aur prem ke gale lag jaati hai. Is se pehle ki vo kuch bol paaye prem uske muh par haath rakh deta hai aur kaan mein dheere se kahta hai…”daro mat main hun na tumhaare saath..bilkul chup raho”

“Balwant vo dekho saamne koyi khada hai”

“Kaha ?”

“Udhar saamne..par ye apna aadmi to nahi lagta…ye to koyi aur hi lagta hai”

“Abe ye to mujhe aadmi hi nahi lag raha.. chal bhaag… yaha se”

Ye kah kar balwant vaha se haweli ki taraf bhaag leta hai

Kallu bhi uske peeche-peeche bhaagne lagta hai

Raste mein unhe 2 aur saathi mil jaate hain jo ki dusri taraf se bhaag kar aa rahe the.

“Kya huva balwant tum kyon bhaag rahe ho”

“Ham..ne vaha kuch ajeeb dekha birbal” – balwant ne haanpte huve kaha

“Hamne bhi….. pata nahi kya bala hai bhai… jaldi chalo yaha se” birbal ne kaha

Thakur ke sabhi aadmi bhaag kar haweli mein pahunch jaate hain aur veer ko saari baat bataate hain.

“Tum sab ke sab nikamme ho… kabhi tumhe jungle se dar lagta hai.. kabhi kisi saaye se. kisi kaam ke nahi ho tum log. Aisa kya tha khet mein jo tum dar kar bhaag aaye. Ho sakta hai ye bhima ki koyi chaal ho… aur kya pata vo khud bhima hi ho” – veer ne gusse mein kaha

Nahi maalik vo bhima hargiz nahi tha. Bhima ko main ache se jaanta hun. Ushe main kisi bhi haalat mein pehchaan sakta hun. Khet mein jo koyi bhi tha ..insaan nahi tha..”

Idhar khet mein sadhna prem se buri tarah leepti huyi hai.

“Prem ye log kis se dar kar bhaag gaye ?”

Prem turant uske muh par haath rakh deta hai aur kahta hai, “chup raho aur yahi ruko… main dekh kar aata hun ki chakkar kya hai”

Par tabhi phir se ek bhayaanak cheenkh khet mein gunj uthti hai jo is baar haweli ko bhi hila deti hai

“Nahi prem ruko… kahin mat jao… mujhe dar lag raha hai, aaj khet mein jaroor kuch gadbad hai”

“Vahi to dekhne jaa raha hun ki kya gadbad hai sadhna, daro mat”

“Nahi prem ruk jao… yaha akele mujhe dar lagega”

Idhar ushi vakt haweli mein :--

“Suni ye awaaj maalik… ye jaroor ushi bhayaanak saaye ki hai…itni jor se koyi insaan nahi cheenkh sakta” --- balwant ne kaha

Veer bhaag kar apne kamre mein jaata hai aur renuka se puchta hai, “kya kal raat tumne aisi hi cheenkh suni thi ?”

Renuka uski aur dekhti hai par koyi jawab nahi deti

“Main tumse kuch puch raha hun… kya tum bahri ho gayi ho”

“Haan aisi hi cheenkh suni thi…kal raat to meri baat suni nahi.. ab kyon puch rahe ho”

Veer bhaag kar rudra pratap ke kamre mein jaata hai

Rudra pratap bhi vo bhayaanak cheenkh sun kar uth jaata hai

“Pita ji mujhe lagta hai varsha kisi musibat mein hai”

“Kya kah rahe ho tum… pehle ye to pata chale ki varsha hai kaha”

Pita ji balwant ke chacha ke anusaar varsha kal raat madan se khet mein milne wali thi.. par kal raat bhi renuka ne kheto se aisi hi bhayaanak cheenkh suni thi”

 


गतान्क से आगे..............

हवेली में सभी घबराए हुवे हैं. वर्षा का अभी तक कुछ पता नही चला और उपर से हवेली के पीछे के खेतो से ये भयानक चीन्खे …हर किशी के दिल को दहला रही हैं.

इधर खेत में प्रेम साधना को कहता है, “साधना चुपचाप मेरे पीछे आओ हमे यहा से निकलना है”

“पर प्रेम ये खेत में कौन है ?”

“श्ह… चुप रहो ज़्यादा बाते मत करो पहले यहा से निकलते हैं फिर बाते करेंगे”

“पर वो हमारे पीछे आया तो?”

“काफ़ी देर से कोई हलचल या आवाज़ नही हुई है, मुझे लगता है जो कोई भी वो था अब यहा नही है, और अगर हुवा भी तो देखा जाएगा..चलो अब”

प्रेम साधना का हाथ पकड़ कर उसे घनी फसलों से बाहर लाता है और गाँव की तरफ चल पड़ता है

“प्रेम तुम्हे डर नही लग रहा”

“मुझे बस तुम्हारी चिंता है, और मैं किसी चीज़ से नही डरता, बाते कम करो और तेज-तेज चलो”

लेकिन अभी वो चार कदम ही चलते हैं कि उन्हे किसी के अपने पीछे भागने की आहट सुनाई देती है. प्रेम मूड कर देखता है. दूर से उसे सॉफ सॉफ तो कुछ नही दीखता पर वो अंदाज़ा लगाता है, “अरे कहीं ये भीमा और सरिता तो नही ?”

“हो सकता है…….हमे रुकना चाहिए प्रेम”

“हां रुकने में कोई परेसानि नही है…देखते हैं वो कौन हैं”

जब वो 2 साए नज़दीक पहुँचते हैं तो प्रेम उन्हे पहचान जाता है और पूछता है, “तुम दोनो यहा क्या कर रहे हो ?”

“स्वामी जी आप ठीक तो हैं ?”

“हाँ-हाँ मैं ठीक हूँ…… पर तुम दोनो यहा क्यों आए ? ….मैने तुम्हे गाँव में रुकने को कहा था ना….. और गोविंद कहा है ?”

“जी वो गाँव में ही हैं, हम तो इसलिए आए थे कि यहा आपको हमारी कोई ज़रूरत हो तो हम काम आ सकें”

साधना ये सब सुन कर हैरान रह जाती है. वो धीरे से प्रेम से पूछती है, “ये तुम्हे स्वामी जी क्यों कह रहे हैं ?”

“चलो पहले यहा से चलते हैं…आराम से सब कुछ बताउन्गा” ---- प्रेम ने साधना से कहा

“स्वामी जी वो आवाज़े कैसी थी ?”

“क्या तुम दोनो ने भी वो सुनी”

“जी स्वामी जी तभी तो हम यहा भाग कर आए हैं. पूरे गाँव में वो चीन्खे गूँज रही थी”

“अभी कुछ नही कह सकते ….बाद में बात करेंगे”

“जी स्वामी जी” --- उन दोनो ने कहा

“साधना ये है धीरज और ये है नीरज दोनो मेरे ख़ास शिष्या हैं” ---- प्रेम ने उन दोनो का परिचय देते हुवे कहा

साधना की समझ से सब कुछ बाहर था. उसके मन में बहुत सारे सवाल उभर आए थे… जिनका जवाब वो जान-ना चाहती थी. पर उस वक्त उसने कुछ नही पूछा और चुपचाप प्रेम के साथ गाँव की तरफ चल दी.

अचानक फिर से वही चीन्ख ज़ोर से गूँजती है और वो सभी रुक जाते हैं.

“साधना तुम इन दोनो के साथ घर जाओ, तुम्हारे पिता जी वही हैं. मेरा एक मित्र गोविंद भी वही होगा. मैं यहा देखता हूँ कि क्या चक्कर है” --- प्रेम ने कहा

“नही प्रेम तुम यहा अकेले…….. ?”

ये सुन कर धीरज और नीरज हँसने लगते हैं

धीरज कहता है, “स्वामी जी किसी से नही डरते, बल्कि इनको देख कर तो आछे-आछे भूत-पिशाच भी भाग जाते हैं”

“चुप रहो धीरज” – प्रेम ने कहा

“जी स्वामी जी… माफ़ कीजिए” धीरज ने कहा

“साधना, मुझे जाकर देखना ही होगा कि आख़िर यहा खेत में हो क्या रहा है”--- प्रेम ने कहा

“फिर मैं भी यही रहूंगी तुम्हारे साथ प्रेम..तुम्हारे बिना मैं यहा से नही जा पाउन्गि” – साधना ने कहा

प्रेम किसी सोच में डूब जाता है

कुछ सोचने के बाद वो कहता है, “चलो पहले तुम्हारे घर चलते हैं….फिर देखेंगे की आगे क्या करना है ?”

साधना ये सुन कर मन ही मन थोडा खुस होती है…… पर अगले ही पल पूरे दिन को सोच कर गहरे गम में डूब जाती है.
 


धीरज और नीरज प्रेम को ऐसे रूप में देख कर बहुत हैरान हैं… पर वो प्रेम से कुछ पूछने की हिम्मत नही करते.

नीरज, धीरे से धीरज से पूछता है, “स्वामी जी लड़की के साथ…कुछ अजीब नही है ?”

“चुप कर स्वामी जी सुन लेंगे तो बहुत डाँट पड़ेगी” – धीरज ने नीरज को धीरे से कहा

“क्या बात है धीरज ?” --- प्रेम ने पूछा

“कुछ नही स्वामी जी…. बस यू ही” --- धीरज ने जवाब दिया

कोई 30 मिनूट में वो सभी खेतो से निकल कर गाँव में साधना के घर पहुँच जाते हैं

साधना दौड़ कर अपनी मा के मृत शरीर से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगती है. सभी बहुत भावुक अवस्था में चुपचाप देखते रहते हैं. गाँव के दूसरे लोग भी धीरे-धीरे उनके घर की तरफ आने लगते हैं.

गुलाब चंद भाग कर प्रेम के पास आता है और पूछता है, “बेटा… सरिता कहा है ?”

“जी अभी वो तो नही पता….. लेकिन हाँ वो ठाकुर की हवेली की क़ैद से आज़ाद हो चुकी है…आप फिकर ना करें सब कुछ ठीक हो जाएगा”

“क्या ठीक हो जाएगा बेटा… मदन सुबह से गायब है…बिम्ला चल बसी और सरिता का कुछ पता नही… अब और क्या ठीक होगा ?” – गुलाब चंद इतना कह कर अपना सर पकड़ कर बैठ जाता है

“जी मैं समझ सकता हूँ….भीमा सरिता को हवेली से छुड़ा कर अपने साथ ले गया है. और मुझे यकीन है कि वो सुरक्षित होगी” ---- प्रेम ने गुलाब चंद से कहा

साधना तभी अपनी मा के शरीर को छ्चोड़ कर प्रेम के पास आती है और अपने आँसू पोंछते हुवे कहती है, “भीमा दीदी को लेकर हमारे खेत की तरफ ही आ रहा था ना.. मुझे डर लग रहा है प्रेम.”

“चिंता मत करो साधना मैं वापिस खेतो में ही जा रहा हूँ…मैं बस तुम्हे यहा तक छ्चोड़ने आया था” --- प्रेम ने कहा

“प्रेम मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा” ---- गोविंद ने प्रेम से कहा

साधना गोविंद की तरफ देखती है.

प्रेम उसका परिचय देता है, “साधना ये गोविंद है…. मेरा ख़ास मित्र”

वो ये बाते कर ही रहे थे कि साधना एक दम से बोलती है, “अरे !! दीदी तो वो आ रही है”

प्रेम मूड कर देखता है

सरिता लड़खड़ाती हुई भीमा के साथ घर की तरफ आ रही थी.

साधना भाग कर सरिता से लिपट जाती है और कहती है, “दीदी तुम ठीक तो हो”

“बस जींदा हूँ…ठीक तो क्या होना था” ---सरिता ने कहा

साधना, सरिता को अपनी मा के बारे में कुछ नही बता पाती. सरिता खुद अंदर आ कर अपनी मा के मृत श्रीर को देखती है और साधना से रोते हुवे पूछती है, “क्या हुवा मा को ?”

साधना फिर से रोने लगती है और अपनी दीदी को गले लगा लेती है. सरिता रोते, बीलखते हुवे अपनी मा के मृत शरीर पर गिर जाती है.

सभी लोग फिर से भावुक हो जाते हैं.

“तुम यही रूको मैं मंदिर हो कर आता हूँ” प्रेम ने गोविंद से कहा और वाहा से चल दिया

साधना प्रेम को जाते हुवे देखती है और दौड़ कर उसके पास आती है, “तुम अकेले कहा जा रहे हो प्रेम ?”
 


“मंदिर जा रहा हूँ साधना…. पिता जी से मिल आउ, वरना वो कहेंगे की इतने दीनो बाद वापिस आया और आ कर देखा भी नही” --- प्रेम ने कहा

“ठीक है… पर अब खेत में मत जाना”

“एक बात बताओ साधना ?”

“क्या खेत में पहले भी कभी ऐसा हुवा है ?”

“नही प्रेम.. पहले तो कभी ऐसा नही हुवा ?”

“क्या मदन पहले भी कभी यू बिना बताए कही गया है ?”

“नही प्रेम.. भैया कभी ऐसे बिना बताए कही नही गये… मुझे बहुत डर लग रहा है… कही भैया किसी मुसीबत में ना हो ?”

“तुम चिंता मत करो… में देखता हूँ कि क्या चक्कर है ?”

“हां पर तुम अब रात को खेत में मत जाना”

“नही अभी मैं मंदिर जा रहा हूँ.. फिर घर जाउन्गा… सभी से एक बार मिल लूँ. सुबह देखेंगे कि क्या चक्कर है इस खेत का”

“प्रेम वो ठाकुर के आदमी दुबारा आए तो ?”

“गोविंद यही है साधना और धीरज और नीरज भी यही हैं. वैसे गोविंद के होते किसी बात की चिंता नही है. मैं भी जल्दी ही आ जाउन्गा”

“ठीक है प्रेम अपना ख्याल रखना”

प्रेम मंदिर की तरफ चल पड़ता है.

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सतपुरा के जंगल में रात के वक्त किसी इंसान का होना अजीब सी बात है. पर जब महोबट से भरे दिल जंगल में फँस जायें तो क्या कर सकते हैं

“ये हम किस मुसीबत में फँस गये मदन ?”

“घबराओ मत वर्षा.. भगवान जो करते हैं आछे के लिए करते हैं”

“क्या अछा है इसमे… सुबह से हम भूके प्यासे भटक रहे हैं… पता नही हम कहा हैं और कहा जा रहे हैं”

“ऐसे दिल छोटा करने से कुछ हाँसिल नही होगा वर्षा.. वैसे भी हमे घर से तो भागना ही था”

“पर अचानक तो नही… और वो भी इस जंगल के रास्ते तो हरगिज़ नही, पता है ना तुम्हे ये जंगल कितना भयानक है”

“रूको” – मदन ने कहा

“क्या हुवा अब ?”

“ये पेड़ ठीक रहेगा.. चलो रात इस पेड़ पर बीताते हैं… सुबह देखेंगे क्या करना है ?”

“क्या ? रात हम इस पेड़ पर बीताएँगे” – वर्षा हैरानी में पूछती है.
 


हवेली में रहने वाली वर्षा के लिए सब कुछ बहुत अजीब है. वो बहुत परेशान और डरी हुई है. पर प्यार की खातिर सब कुछ किए जा रही है.

“हमे गाँव की तरफ भागना चाहिए था.. हम क्यों इस जंगल की तरफ आए कल ?” वर्षा ने कहा

“अब आ गये तो आ गये… ये बाते छ्चोड़ो और जल्दी इस पेड़ पर चढ़ो… कोई जुंगली जानवर आ गया तो हम दोनो की चटनी बना कर खा जाएगा”

“मुझे डराव मत मदन… मैं पहले से ही बहुत डरी हुई हूँ”

“अछा ठीक है.. अब जल्दी से चढ़ो”

वर्षा जैसे-तैसे पेड़ पर चढ़ जाती है. उसके चढ़ने के बाद मदन भी पेड़ पर चढ़ जाता है.

दोनो पेड़ के उपर एक मोटे से तने पर बैठ जाते हैं और चैन की साँस लेते हैं

“वो दोनो कहा होंगे मदन ?”

“पता नही…. थे तो वो हमारे आगे लेकिन जंगल में घुसते ही वो जाने किधर चले गये”

“ये तो मुझे भी पता है… मैं पूछ रही हूँ कि वो अब कहा हो सकते हैं”

“क्या पता शायद वो दोनो भी हमारी तरह जंगल में भटक रहे होंगे. इस जंगल से निकलना इतना आसान नही है”

“तो हम कैसे निकलेंगे यहा से ?”

“निकलेंगे, ज़रूर निकलेंगे… मैने कहा आसान नही है…. पर नामुमकिन भी तो नही है… मैं हूँ ना तुम्हारे साथ”

“मुझे भूक लगी है मदन?”

“अभी रात में कुछ मिलना मुस्किल है… मैं नीचे उतर कर देखता हूँ.. हो सकता है कोई फल का पेड़ मिल जाए”

“नही नही तुम अब नीचे मत जाओ… मुझे इतनी भी भूक नही लगी”

“झूट बोल रही हो हैं ना… सुबह से कुछ नही खाया और कहती हो इतनी भी भूक नही लगी. मैने रास्ते भर चारो तरफ देखा पर कोई फल का पेड़ नही मिला… एक बार यहा भी देख लेता हूँ ?”

“वर्षा मदन की और देख कर रोने लगती है… नही कही मत जाओ मुझे सच में भूक नही है”

मदन आगे बढ़ कर वर्षा के चेहरे को हाथो में लेकर उसके माथे को चूम लेता है और कहता है, “तुम चिंता मत करो… सब ठीक हो जाएगा… कल सुबह सबसे पहले तुम्हारे खाने का इंतज़ाम करूँगा”

“पर मदन वो खेत में क्या था ?”

“क्या पता… मैने खुद ऐसा पहली बार देखा है”

“वो दोनो ठीक तो होंगे ना ?”

“हाँ-हाँ ठीक होंगे… वो भी तो हमारे साथ जंगल में घुसे थे”

“इस जंगल के बारे में बहुत बुरी-बुरी अफवाह है मदन”

“ये सब छ्चोड़ो वर्षा और हमारी-तुम्हारी बात करो”

“तुम्हे ऐसे में भी प्यार सूझ रहा है ?”

“दिल में प्यार जींदा रखो वर्षा… हमारे पास यही तो सबसे अनमोल ताक़त है”

मदन जब वर्षा से कहता है ‘दिल में प्यार जींदा रखो वर्षा… हमारे पास यही तो सबसे अनमोल ताक़त है’ तो वर्षा मायूसी भरे शब्दो में मदन से कहती है, “क्या ये प्यार की ताक़त हमे इस भयानक जंगल से निकाल पाएगी ?”

वर्षा जीवन की वास्तविकता को देख कर थोड़ा घबरा रही है. अभी तक उसने बस हवेली की जींदगी देखती थी. उस जींदगी में आराम ही आराम था. एक आम आदमी की जींदगी का उशे पता ही नही था. अपने आप को जंगल के बीच ऐसे हालात में पा कर वो दुखी और मायूस है. शायद ये स्वाभाविक भी है

मदन शायद उसके दिल की बात समझ जाता है और कहता है, “तुम्हारे लिए तो ये सब बहुत अजीब है.. मैं समझ सकता हूँ. पर कल जंगल में घुसने के अलावा हमारे पास और कोई चारा नही था. मैं सिर्फ़ तुम्हारे लिए खेत से भागा, वरना मैं अपने खेत को छ्चोड़ कर हरगिज़ कहीं नही जाता”

 
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