S
StoryPublisher
Guest
'यह कौन है?'
मजदूरों को बीच एक नए चेहरे को देखकर उसने सुपर-वाईजर से प्रश्न किया।
वह एक भरे-पूरे बदन का आदमी था। आयु लगभग पैतीस-छत्तीस के आस-पास। सिर के बाल उलझे हुए। कई दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी। विवर्णा-सी नीली जीन की पतलून और उस पर चैक की एक पुरानी सी कमीज जिसके आगे के बटन खुले हुए थे।
'नया मजदूर है सर।' अधेड़ सुपरवाईजर ने उसे पद की मर्यादा से सम्बोधित करते हुए कहा-'काम मांग रहा था। मैंने दिहाड़ी पर रख लिया। वैसे भी आज तीन-चार मजदूर नहीं आए सो आदमियों की जरूरत तो थी ही।'
'यह आदमी आपको मजदूर जैसा लगता है क्या?' उसने उस व्यक्ति को घूरते हुए देखा जो कुल्हाड़ी के द्वारा एक पेड़ का तना काटने में लगा हुआ था।
'लगता तो नही है। लेकिन वक्त ग्रादमी को जो कुछ न बना दे सो थोड़ा।'
लेकिन वह सुपरवाईजर की बात नहीं सुन रहा था वह उस व्यक्ति को देख रहा था। साफ गुण्डों जैसा दिखाई दे रहा था। उसे इस बात में कोई शक नही था कि कालिया ने ही इस व्यक्ति को मजदूर के रूप में वहां भेजा होगा। उसे परेशान करने के लिए।
वह उसके निकट पहुंचा।
उस व्यक्नि ने भी उसकी उपस्थिति का आभास पाकर हाथ रोक लिया। हाथ माथे से छुआकर सलाम किया-'सलाम साहब।'
'तुम्हें मजदूरी के लिए इस जंगल के अलावा और कोई जगह नहीं मिली?' वह तीक्ष्ण दृष्टि से उसका निरीक्षण करते हुए बोला।
विचित्र ढंग से मुस्कराया वह व्यक्ति।
फिर गरदन को अजीब ढंग से झटका देता हुआ बोला-'कौन कह सकता है कि इतनी बड़ी टुनिया में किसकी रोजी-रोटी कहां छुपी हुई है। किस्मत मुझे आपके इलाके में खींच लाई और मैं यहां काम करने लगा।'
'किस्मत तुम्हें यहां खींच लाई या तम खुद-ब-खुद यहां आ गए, मुझे इससे कोई मतलब नही है।' उपेक्षित से स्वर में कहा उसने-'लेकिन तुम्हारे लिए यहां कोई काम नहीं है।'
'इतने नाराज क्यों हो रहे हैं आप मुझ पर। कोई चोरी-डकैती तो मैंने की नहीं है। मेहनत मजदूरी करके कुछ कमाने की कोशिश कर रहा हूं।'
जितना भी वह उस व्यक्ति को देख रहा था उतना ही उसे उसकी मुजरिमों जैसी सूरत से घृणा-सी होती जा रही थी। यह विचार भी हृदय में बल पकड़ता जा रहा था कि इस आदमी को निश्चित रूप से कालिया ने ही भेजा है। कोई और घिनौनी चाल चलने के लिए। अपने इन भावों को छुपाने की कोई कोशिश भी नहीं की उसने।
'मैं तुमसे बेकार की बहस तो करना नहीं चाहता।' वह तीव्र स्वर में बोला-'एक बार कह दिया कि यहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है तो समझ लो कि यहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है।'
'बेभाव का ताव खाने की जरूरत नहीं है मिस्टर? तुम लोग अगर आदमियों को मजदूरी नहीं करने दोगे तो क्या वे चोरी-चकारी के लिए मजबूर नहीं हो जाएंगे।'
'चोरी-चकारी करेंगे तो जेल में जाकर चक्की भी पीसेंगे।'
उसे खद महसस हो रहा था कि वह जरूरत से ज्यादा ही उत्तेजित हो रहा है और वेमतलब की बात भी कर रहा है। लेकिन वह अपने आप पर काबू पाने में अपने-आपको असमर्थ पा रहा था।
कल का दश्य यानि उसकी साधना दीदी का नंगा शरीर रह-रहकर उसके मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध रहा था।
न जाने क्यों उसे लग रहा था कि यही वह व्यक्ति है जिसने कल उसकी दीदी के साथ वह कुत्सित व्यवहार किया था। उसका शीलहरण करने की कोशिश की थी।
'कुछ लोगों को दुनिया की किसी भी जेल की दीवारें रोक कर नही रख सकतीं समझे।' उस व्यक्ति ने बड़ी ही सख्त और खतरनाक-सी आवाज में कहा।
फिर हाथ की कुल्हाड़ी झटके-से फेंककर वह वहां से चल दिया।
'यह आपने अच्छा नहीं किया सर।'
उसने चौंककर कहने वाले की ओर देखा। सुपरवाईजर था जो उस जाते हुए व्यक्ति को गम्भीर मुख मुद्रा के साथ देख रहा था।
'क्या अच्छा नहीं किया।' वह उसी तरह तीव्र स्वर में बोला-'आपको वह मजदूर जैसा दिखाई देता है। कालिया का आदमी है वह कालिया का आदमी।'
'मैंने इस आदमी को आज से पहले कभी नहीं देखा। लेकिन हो सकता है कि जो कुछ आप कह रहे है वह सब हो। उसे सच मानकर ही मैं एक बुजुर्ग और आपका हितैषी होने के नाते यह कह रहा हूं कि आपने अच्छा नहीं किया।'
'क्या मतलब?'
'पानी मे रहकर मगर से और जंगल में रहकर लकड़बग्घे से वैर पालना कोई अकलमन्दी नहीं है। आपको आश्चर्य होगा कि मैंने शेर की जगह लकड़बग्घा क्यों कहा?' क्योंकि कालिये को शेर कहना शेर का अपमान करना है। वह आदमी के रूप में लकड़- बग्घा ही है। उसी की तरह धूर्त और कुटिल। कभी शेर की तरह सामने नही आएगा। हमेशा छुपकर और पीछे से बार करेगा।'
मजदूरों को बीच एक नए चेहरे को देखकर उसने सुपर-वाईजर से प्रश्न किया।
वह एक भरे-पूरे बदन का आदमी था। आयु लगभग पैतीस-छत्तीस के आस-पास। सिर के बाल उलझे हुए। कई दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी। विवर्णा-सी नीली जीन की पतलून और उस पर चैक की एक पुरानी सी कमीज जिसके आगे के बटन खुले हुए थे।
'नया मजदूर है सर।' अधेड़ सुपरवाईजर ने उसे पद की मर्यादा से सम्बोधित करते हुए कहा-'काम मांग रहा था। मैंने दिहाड़ी पर रख लिया। वैसे भी आज तीन-चार मजदूर नहीं आए सो आदमियों की जरूरत तो थी ही।'
'यह आदमी आपको मजदूर जैसा लगता है क्या?' उसने उस व्यक्ति को घूरते हुए देखा जो कुल्हाड़ी के द्वारा एक पेड़ का तना काटने में लगा हुआ था।
'लगता तो नही है। लेकिन वक्त ग्रादमी को जो कुछ न बना दे सो थोड़ा।'
लेकिन वह सुपरवाईजर की बात नहीं सुन रहा था वह उस व्यक्ति को देख रहा था। साफ गुण्डों जैसा दिखाई दे रहा था। उसे इस बात में कोई शक नही था कि कालिया ने ही इस व्यक्ति को मजदूर के रूप में वहां भेजा होगा। उसे परेशान करने के लिए।
वह उसके निकट पहुंचा।
उस व्यक्नि ने भी उसकी उपस्थिति का आभास पाकर हाथ रोक लिया। हाथ माथे से छुआकर सलाम किया-'सलाम साहब।'
'तुम्हें मजदूरी के लिए इस जंगल के अलावा और कोई जगह नहीं मिली?' वह तीक्ष्ण दृष्टि से उसका निरीक्षण करते हुए बोला।
विचित्र ढंग से मुस्कराया वह व्यक्ति।
फिर गरदन को अजीब ढंग से झटका देता हुआ बोला-'कौन कह सकता है कि इतनी बड़ी टुनिया में किसकी रोजी-रोटी कहां छुपी हुई है। किस्मत मुझे आपके इलाके में खींच लाई और मैं यहां काम करने लगा।'
'किस्मत तुम्हें यहां खींच लाई या तम खुद-ब-खुद यहां आ गए, मुझे इससे कोई मतलब नही है।' उपेक्षित से स्वर में कहा उसने-'लेकिन तुम्हारे लिए यहां कोई काम नहीं है।'
'इतने नाराज क्यों हो रहे हैं आप मुझ पर। कोई चोरी-डकैती तो मैंने की नहीं है। मेहनत मजदूरी करके कुछ कमाने की कोशिश कर रहा हूं।'
जितना भी वह उस व्यक्ति को देख रहा था उतना ही उसे उसकी मुजरिमों जैसी सूरत से घृणा-सी होती जा रही थी। यह विचार भी हृदय में बल पकड़ता जा रहा था कि इस आदमी को निश्चित रूप से कालिया ने ही भेजा है। कोई और घिनौनी चाल चलने के लिए। अपने इन भावों को छुपाने की कोई कोशिश भी नहीं की उसने।
'मैं तुमसे बेकार की बहस तो करना नहीं चाहता।' वह तीव्र स्वर में बोला-'एक बार कह दिया कि यहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है तो समझ लो कि यहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है।'
'बेभाव का ताव खाने की जरूरत नहीं है मिस्टर? तुम लोग अगर आदमियों को मजदूरी नहीं करने दोगे तो क्या वे चोरी-चकारी के लिए मजबूर नहीं हो जाएंगे।'
'चोरी-चकारी करेंगे तो जेल में जाकर चक्की भी पीसेंगे।'
उसे खद महसस हो रहा था कि वह जरूरत से ज्यादा ही उत्तेजित हो रहा है और वेमतलब की बात भी कर रहा है। लेकिन वह अपने आप पर काबू पाने में अपने-आपको असमर्थ पा रहा था।
कल का दश्य यानि उसकी साधना दीदी का नंगा शरीर रह-रहकर उसके मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध रहा था।
न जाने क्यों उसे लग रहा था कि यही वह व्यक्ति है जिसने कल उसकी दीदी के साथ वह कुत्सित व्यवहार किया था। उसका शीलहरण करने की कोशिश की थी।
'कुछ लोगों को दुनिया की किसी भी जेल की दीवारें रोक कर नही रख सकतीं समझे।' उस व्यक्ति ने बड़ी ही सख्त और खतरनाक-सी आवाज में कहा।
फिर हाथ की कुल्हाड़ी झटके-से फेंककर वह वहां से चल दिया।
'यह आपने अच्छा नहीं किया सर।'
उसने चौंककर कहने वाले की ओर देखा। सुपरवाईजर था जो उस जाते हुए व्यक्ति को गम्भीर मुख मुद्रा के साथ देख रहा था।
'क्या अच्छा नहीं किया।' वह उसी तरह तीव्र स्वर में बोला-'आपको वह मजदूर जैसा दिखाई देता है। कालिया का आदमी है वह कालिया का आदमी।'
'मैंने इस आदमी को आज से पहले कभी नहीं देखा। लेकिन हो सकता है कि जो कुछ आप कह रहे है वह सब हो। उसे सच मानकर ही मैं एक बुजुर्ग और आपका हितैषी होने के नाते यह कह रहा हूं कि आपने अच्छा नहीं किया।'
'क्या मतलब?'
'पानी मे रहकर मगर से और जंगल में रहकर लकड़बग्घे से वैर पालना कोई अकलमन्दी नहीं है। आपको आश्चर्य होगा कि मैंने शेर की जगह लकड़बग्घा क्यों कहा?' क्योंकि कालिये को शेर कहना शेर का अपमान करना है। वह आदमी के रूप में लकड़- बग्घा ही है। उसी की तरह धूर्त और कुटिल। कभी शेर की तरह सामने नही आएगा। हमेशा छुपकर और पीछे से बार करेगा।'