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फोरेस्ट आफिसर

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'मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा कि आखिर तुम कौनसा

खेल खेलने जा रहे हो जयतार?'

अगली सुबह नौ बज कर पांच मिनट पर जगतार का फोन आया तो जगन सेठ ने कहा। हालांकि नौ बजे मे पहले ही वह टेलीफोन के पास जम कर बैठ मया था और जैसे ही घड़ी की सुईयों ने नौ बजाए तो उसकी नजरें एकदम फोन की ओर इस तरह धम गई जैसे वह बज उठा हो।

लेकिन अगले ही क्षय उसे आभास हो गया कि मात्र उसका वहम था। फोन की घंटी नहीं बजी थी। वह पहले की तरह ही

खामोश था। फिर एक-एक मिनट बीतना भी उसे भारी सा लगने लगा। तरह-तरह की आशंका मन में उठकर त्रस्त करने लगीं।

जगतार सेफ खोलकर कागजात लाने में असफल रहा था।

मेयर को पता लग गया होगा कि यह काम जगन सेठ का है।

बह कहों उन कागजात का उपयोग करके उसे तबाह करने

का ही निश्चय न कर ले।

रात की घटना से वह कुछ क्रुद्ध हो उठा हो तो कोई ताज्जुब नहीं। उसका सारा शरीर पसीने मे भीगना शुरू हो गया था। अनिष्ट की आशंका उसे धबड़ाए दे रही थीं। वह जानता था कि जब तक कागजात मेयर के कब्जे में हैं वह चैन की नींद नहीं सो सकता। रात कागजात हामिल करने का जगतार का प्रयत्न असफल रहा। और अब उन्हें फिर से हासिल करने की कोई उम्मीद उसे दिखाई नहीं दे रही थी।

मेयर वैसे ही बड़ा काईया है और रात की घटना से तो बहु

और भी अधिक सावधान और सतर्क हो गया हो। सम्भव है अब तक काजगात उसने ऐमी जगह पहुंचा दिए हों जहां लाख सिर पटकने के बावजूद भी जगन सेठ के फरिश्ते तक न पहुंच सकें।

उसके मानस क्षितिज पर अनेकानेक बुरे विचार काले-काले भयानक बादलों की तरह घुमड़ रहे थे।

जगतार ने नौ बजे कल करने को कहा था। लेकिन नौ तो वज चुके। फिर वह फोन क्यों नहीं कर रहा?

कहीं जगतार भी उसे धता बता कर तो...

तभी कोन की घंटी बज उठी और उसने झपट कर फोन उठा लिया। उसकी आवाज सुनकर जहां आश्वस्त सा हुआ वह,

वहीं उसने बड़े ही अनमने ढंग से उपरोक्त बात कही।

'मैं वह खेल खेलने जा रहा हूं जगन सेठ कि जिससे उस

सत्यानाश को रोका जा सके जो तुम और मेयर करने जा रहे हो।' फोन पर जगतार की आवाज आई।

'क्या मतलब?'

'तुम और मेयर आपसी दुश्मनी में सब कुछ नष्ट कर देने पर तुले हो। जबकि मैं चाहता हूं कि आपसी दुश्मनी को भुला कर अगर तुम दोनों मिल जाओ तो हम सब मिलकर इस शहर और इसके जंगलों से इतनी अकूत दौलत कमा सकते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियां आराम से खा सकें।'

'तो क्या मेयर वह कागजात देने के लिए तैयार है?'

'बिल्कुल तैयार है। बस तुम्हें उन्हें हासिल करने के लिए यहां तक आना होगा।'

'लेकिन मैं मेयर की कोठी पर नहीं आऊंगा।' जगन सेट बोला-'अगर वह साफ दिल से अपनी भलमनसाहत का सबूत देना चाहता है तो उसे कागजात लेकर मेरे पास आना होगा।'

'तुम लोगों को यह बेमतलब की हठ भी तुम लोगों की दुश्मनी बनी हुई है। तुम मेयर के यहां नहीं आना चाहते और मयर तुम्हारे यहां नहीं आना चाहता तो फिर बात बने तो बने कैसे?'

'देखो।'

'मुझे तुम लोगों की इस हठधर्मी का पहले ही आभास था इसलिए मैंने ऐसा इन्तजाम कर लिया है कि हम लोग किसी ऐसी जगह पर मिलें जो न तुम्हारी हो न मेयर की हो।'

'ऐसी जगह का इन्तजाम कर लियो है तुमने?'

'जी हां।' जगतार की आवाज आई-कृष्णा होटल का रूम नम्बर सोलह। वहां पहुंचने में तो तुम्हें कोई एतराज नही है?'

'वहां पहुंचने में भला क्या एतराज हो सकता है। लेकिन मेयर

तो पदुंब रहा है वहा?'

'समझिए कि बस पहुंचने वाला है और तुम भी वक्त खराब करने की बजाए फौरन वहां पहुंच जाओ। बाकी बातें वही आने पर हो जाएंगी। और हां उस पुलिस कमिश्नर जयकर को साथ लेते आईएगा।'

उसे तो में ले आऊंगा लेकिन मेरे साथ भैरों भी होगा।' 'यानि इस वक्त भी किसी बाडीगार्ड की जरुरत है?' जगतार बोला-'खैर ले आईएगा उसे भी। लेकिन बिना किसी हथियार के। क्योंकि मेयर यहां मेरे भरोसे पर बिल्कुल अकेला आ रहा है। बातचीत के दौरान अगर उसके साथ कोई गड़बड़ी हुई तो मुझे फिर अपना दुश्मन ही समझिएगा।'

जिस समय जगन सेठ कृष्णा होटल के रूम नम्बर सोलह में पुलिस कमिश्नर जयकर और भैरों के साथ पहुंचा तो वहां मेयर पहले से ही मौजद था। उन तीनों को देखकर उसने अजीब ढंग से मुंह बिसूरा और दूसरी ओर देखने लगा। जगतार ने उठ कर उनका स्वागत किया। उन लोगों ने बैठने के लिए पहले से ही इन्तजाम इत्गदि किया हुआ था। जा सब लोग बैठ गए तो जगतार बोला-'मेरा ख्याल है कि हम लोगों को इधर-उधर की बातचीत न करके सीधे ही अपने मकसद पर आ जाना चाहिए। जैसा कि आप मब लोग जानते होंगे कि हम लोग यहां इस लिए एकत्रित हुए हैं कि जो भी पिछली गलतफहमियां हैं उन्हें टूर करके हम नये सिरे से एक ग्रुप बनाएं और मिलकर फायदे का काम करें।' 'जद तक मेरे हाथ म वे कागजात नहीं पहुंच जाते तव तक मैं कोई बात करने को तैयार नही हूं।' जगन सठन अपनी स्थिति को थोड़ा मजबूत समझते हुए कहा।

हालांकि उसकी समझ में कोई बात पूरी तरह मे नहीं आ रही थी अभी, लेकिन मेयर का वहां आ जाना ही उसके लिए इस बात का सबमे बड़ा सबूत था कि वह समझौता करने के लिए बेताब है। ऐसे में खुद कुछ अकड़ जाने में उसे कोई बुराई नजर नहीं आई।

मेयर ने जगमार की ओर देखा। उसे मालूम था कि कागजात उसके पास नहीं हैं। अगर जगन सेठ कागजात मांग रहा है तो जाहिर है कि जगतार ने कागजात उसे नहीं दिए हैं। इसका मतलब है कि जगतार वाकई पूरी ईमानदारी के साथ समझौता करा देना चाहता है।

जगतार ने मेयर को आलों ही आंखों से आश्वस्त करते हुए

जगन सेठ ने हा-'कागजात तुम्हें मिल जाएगे जगन सेठ। वो ही देने के लिए तो मेयर साहब यहा आए हैं। लेकिन इनकी क्या गारन्टी है कि कागजात आपको मिलने के बाद समझौता हो ही जाएगा?'

'मैं जबान देता हूं।' 'तुम्हारी जवान पर और मैं भरोमा करूंगा?' मेयर एकदम आवेश में आकर बोला-'यह बेवकूफी अब मै दोबारा करने वाला नहीं हूं जगन सेठ। तुम्हारी जबान पर भरोसा करके मैं देख चुका हूं। तुम जैसा थूक कर चाटने वाला आदमी मैंने दूसरा नहीं देखा।' 'तू आस्तीन का सांप मुझे थूक के चाटने वाला आदमी कह रहा है।' जगन सेठ भी अपनी बांहें फैलाता हुआ बोला-'मैंने तुझे चुनाव लड़वाया। पानी की तरह पैसा बहाया तुझे मेयर बनाने के लिए। लेकिन बदले में तूने मुझे दिया क्या। अहसान फरामोश, कृतघ्न आदमी। कुर्सी पर बैठते ही आंखें बदल गई।'

'झूठ मत बोलो जगन सेठ।' मेयर ने भी तुर्की बतुर्की जवाब दिया-'जो कुछ भी तुमने मेरे साथ किया था उसका भरपूर बदला चुकाया था मैंने। लेकिन तुमने मुझे बराबर का दरजा देने के लिए तैयार नहीं थे। तुम मुझे अपने हाथ की कठपुतली बना लेना चाहते थे। तुम चाहते थे कि मैं तुम्हारे इशारे पर नाचूं। तुम बैठने को कहो तो बैठ जाऊं, तुम उठने को कहो तो

उठ खड़ा होऊं। तुम जब चाहे मेरा कान पकड़ कर जिस तरफ मुंह मोड़ दो और मैं कुछ न बोलूं। तुमने मुझे कभी अपना साथी नहीं समझा। तुम मुझे अपना ऐसा कुत्ता बना लेना चाहते थे जो तुम्हारे द्वारा चसकर फेंकी गई हड्डी को चुपचाप खाता रहे और बदले में तुम्हारे तलवे चाटता हुआ अपनी दुम हिलाता रहे।' क्रोधावेश में मेयर कहता गया-'लेकिन मैं भी आदमी हूं। मेरा

भी कुछ आत्म सम्मान है। जब मैंने तुम्हारा कुत्ता बनने से इन्कार कर दिया तो तुमने मुझे दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंका। कालिया के साथ मिलकर तुम जंगल

की दौलत लूटते रहे और तस्करी करवा कर अपना घर भरते रहे। इस जयकर की मदद से शहर में सट्टे और जुए का कारोबार करते रहे। अवैध शराब के अड्डे और वेश्यालय चलाते रहे और दोनों हाथों है सोना-चांदी बटोरते रहे। लेकिन पुराने दिनों की दोस्ती का लिहाज करके मैं सब कुछ देखता रहा और चुप रहा। लेकिन तुमने मेरी शराफत को हमेशा मेरी कमजोरी ही समझने की भूल की। अब चुनाव सिर पर आए तो उस साले सम्पतराय मुनीम को सामने ले आए ताकि मुझे उखाड़कर नया मेयर बना दिया जाए जो तुम्हारे तलवे चाटे

और अपनी दुम हिलाए।'

'किसी क्ने भी मेयर बनाने की और मेयर की कुर्सी से हटाने की ताकत है मेरे हाथ में।' जगन सेठ ने जोर से अपनी मुट्ठी बन्द करते हुए कहा-'और तुम मेरी इस ताकत को समझने के बावजूद भी उस नये फारेस्ट आफिसर की खातिर मुझसे उलझने को तैयार हो गए।

'तुमने जब उस सम्पतराय मुनीम को अपना नया उम्मीदवार घोषित कर दिया तो मुझे भी तो अपने बचाव में कुछ करना ही था। सारी कमाई तुम हड़प रहे ये और मैं ।'

'सारी कमाई मैं हड़प रहा था और तुम बड़े साधु धर्मात्मा बने बैठे थे।' जगन सेठ ने जोरदार शब्दो में उसकी बात काटते हुए कहा-'न जाने कितने जाली परमिट और कोटे दे-देकर पैसे बटोरते रहे तुम। अस्पतालों और स्कूलों के नाम पर लाखों का चन्दा हजम करके डकार भी नहीं ली तुमने। समाज सेविकाओं की आड़ में कालगर्ल्स का धन्धा करवाते रहे तुम। किस काम की जानकारी नहीं है मुझे तुम्हारे। लेकिन मैंने कभी तुम्हारे किसी काम में टांग अड़ाने की कोशिश नहीं की। सिर्फ इसलिए क्योंकि कभी अच्छे दोस्त रह चुके थे हम दोनों। इसी जयकर ने मुझसे वाई बार कहा कि तुम्हारा पुलिंदा खीच कर रख दे। लेकिन मैंने यह कहकर मना किया कि कीचड़ में पत्यर फेंकने से कोई लाभ नही, अपने ही कपड़े गन्दे होंगे।'

'मेरा पूलिंदा खींच दे?' मेयर उत्तेजित स्वर में बोला-'जरा कोई हाथ तो लगा के दिखाता फिर पता चलता कि कैसे मैं तुम लोगों का शीशे का महल मिट्टी में मिला देता।'

'देखिए मुझे तो मेहरबानी करके बीच में मत घसीटिए।'

जयकर ने कहा-'मैंने तो हर चन्द कोशिश की कि दोनों पक्ष आपस में मिल-जुलकर प्यार से रहें। लेकिन आप दोनों ही अपनी अपनी जिद पर इस बुरी तरह से अड़े रहे कि किसी की भी कुछ सुनने को तैयार नही।' 'लेकिन फायदा तुम्हें जगन सेठ के खेमें में नजर आया इसलिए उसके साथ मिलकर मेरी काट करते रहे।' मेयर ने व्यंग्यपूर्ण स्वर में कहा।

जयकर ने प्रतिवाद करना चाहा।

लेकिन हाथ के संकेत से उसे चुप रहने के लिए कहकर जगतार बोला-'मेरा खयाल है कि एक-दूसरे के बारे में काफी कुछ कहा जा चुका है। अब अगर यह बहस ज्यादा देर तक चालू रही तो मुझे खतरा है कि हम अपने बसनी उद्देश्य में भटक जाएंगे।'

मेयर और जगन सेठ बोले तो नहीं लेकिन आग्नेय दष्टि ले एक-दूसरे को घूरते अवश्य रहे। भैरों ने अपनी बोरियत का प्रदर्शन करते हुए कुर्सी में पहलू बदला। साफ लग रहा था कि उसकी इस सारी बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं है।

'अब तक जो हो चुका सो सो चुका।' जगतार बोला-'मेरा खयाल है कि यह आप लोगों को यह समझाने के लिए मुझे ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है कि आपस की इस लड़ाई में किसी का भी कोई फायदा नहीं होने वाला है। बेहतर यही है कि दोनों पक्ष पिछली सारी बातों को भूलकर एक हो जाएं। आपकी क्या राय है पुलिम कमिश्नर साहब।'

'इस राय में तो किसी भी आदमी को कोई विरोध नहीं हो सकता।' जयकर ने कहा-'मिस्टर मेयर की इस शहर में अपनी एक हस्ती है जिप्ते कोई भी चुनौती देने का साहस नहीं कर सकता। रही जगन सेठ की बात सो इनके बारे में कुछ भी कहना सूरज को दीपक दिखाने जैसा है। अगर यह दोनों फिर से मिल जाएं तो फिर क्या कहने है। इस शहर से

और इन जंगलों से सोना ही सोना उगाया जा सकता है। लेकिन मिस्टर जगतार आपसे एक बात पूछ सकता हूं।'

'जरूर पूछिए।'

'इन लोगों के बीच मेल कराने में आपका अपना क्या फायदा

है?'

'पुलिस कमिश्नर साहब अंग्रेजों का असूल रहा था कि फूट

डालो और राज करो। एकदम गलत असूल था वह। इसलिए

अंग्रेजों को यहां से अपना बोरिया बिस्तरा बांध कर भाग जाना पड़ा। जगतार का असूल है, मेल कराओ और माल कमाओ।'

'मैं कुछ समझा नहीं।' 'मैं समझाता हूं। अभी-अभी आपने कहा कि अगर यह दोनों

महान हस्तियां आपस में मिल जाएं तो इस शहर से और इसके जंगलों से सोना ही सोना उगाया जा सकता है। आपके बताने के पहले यहां के हालात देखने के बाद ऐसा ही कुछ अनुमान मेंने लगा लिया था। इसीलिए इन लोगों के बीच समझौता कराने की कोशिश में हूं। ताकि इन लोगों के मिलने के बाद जो सोने की फसल उगेगी उसमें एक हिस्सा मेरा भी होगा। कहिए इस बात पर आपमें से किसी को कोई एतराज

तो नहीं है।'

'यह सब प्रोग्राम तो बाद में बन जाएगा।' जगन सेठ बोला -'लेकिन जब तक वह कागजात मुझे वापिस नही मिल जाते तब तक समझौते की कोई बात करना बेकार है।'

'तो फिर इस बात को यही खत्म कर दिया जाए।' जगतार ने एकदम निर्णायक स्वर में कहा-'आगे बातचीत करने का कोई फायदा नहीं।'

'क्या मतलब?' उसकी बदली हुई टोन सुनकर जगन सेठ एकदम चौंका।

'मतलब साफ है जगन सेठ।' जगतार तनिक कड़े स्वर में बोला-'अगर वो कागजात तुम्हारे हाथों में पहुंच ही गए तो फिर तुम मेयर साहब को किस खेत की मूली समझोगे?'

'यानि यानि ।'

जगतार की बात पर कोशिश के बावजूद भी मेयर अपनी प्रसन्नता न रोक सका और हकला सा गया। मगर फिर एकदम अपने आपको संयत करता हुआ बोला-'अगर कागजात एक बार दे दिए तो फिर जगन सेठ ने किसे पूछना है। फिर तो तू कौन और में कौन।'

जगन सेठ ने कड़ी नजरों से जगतार को धूरा।

क्रोध से नथने फड़कने लगे थे और गाल लाल हो गए थे।

कड़े स्वर में जगतार से बोला वह-'आखिर तुम ओ इस मेयर से जा मिले?'
 
जगन सेठ ने कड़ी नजरों से जगतार को धूरा।

क्रोध से नथने फड़कने लगे थे और गाल लाल हो गए थे।

कड़े स्वर में जगतार से बोला वह-'आखिर तुम ओ इस मेयर से जा मिले?'

'मैं किसी से मिला हुआ नहीं हूं।' जगतार बोला-'न तुम से न मेयर से। मत भूलो कि मैं इस समय पंच बना हुआ हूं और पंच में परमेश्वर बोलता है जो किसी का पक्ष नहीं लेता। सिर्फ वही करता है जो न्याय की बात होती है।' 'मेरी गरदन हमेका इस मेयर की गरदन में फंसी रहे इसे तुम न्याय कहते हो।' जगन सेठ ने रोष पूर्ण स्वर में कहा-'यानि तुम हमेशा-हमेशा के लिए इस मेयर का कुत्ता बना देना चाहते हो?'

'नहीं लगन सेठ, मैं किसी को किसी का कुत्ता नहीं बनाना चाहता। सिर्फ समझौता चाहता हूं बराबर की शर्तों पर। आपको मेरी इस कोशिश में कोई गलत बात नजर आ रही है?'

अन्तिम बात जमतार ने जयकर को सम्बोधित करके कही थी और जयकर ने बड़ी गम्भीरता से सिर हिलाते हुआ कहा-'नहीं इसमें तो कोई गलत बात नहीं है। यह तो बिल्कुल न्याय की बात है कि समझौता हो लेकिन बराबरी के आधार पर हो।'

'आपको मंजूर हैं?' उसने जगन सठ से पूछा।

'हां बराबरी के आधार पर समझौता हो तो किसे मंजूर नही होगा।' जगन सेठ ने अपने को संयत करके जवाब दिया।

'आपको कोई एतराज है?' उसने मेयर से पूछा।

'नहीं।'

मेयर का जवाब मिलने के बाद जगतार बोला-'तब मेरा फैसला है कि वे कागजात मेयर के पास ही सुरक्षित रहेंगे। बतौर गारन्टी ताकि जगन सेठ कभी सपने में भी मयर साहब के खिलाफ जाने की बात न सोच सके।'

'यह क्या बात हुई।' जगन सेठ एकदम बिफर कर बोला-'यह तो तुमने मेरी गरदन पर छुरी फेर दी और इसे तुम समझौता कह रहे हो।'

'बिलकुल सही किया है।' मेयर उत्साहित स्वर में बोला-'क्योंकि इन्हें मालूम है कि मैं कमी कोई गलत काम कर ही नहीं सकता। और तुम्हें भी यकीन दिलाता हूं कि वे कागजात चाहें रहें मेरे पास ही लेकिन जब तक तुम मेरे खिलाफ कोई गलत हरकत नहीं करोगे मैं उनका तुम्हारे खिलाफ उपयोग नहीं करूगा।'

'जब बात बराबर के समझौते की है तो खाली यकीन दिलाने से कुछ नहीं होने का।' जगतार ने मेयर से कहा। 'यकीन को क्या मैं रखकर चाहूंगा।' जगन सेठ बोला-'मेरी गरदन तो तुम्हारे हाथों में रहेगी। मेरे पास तुम्हारे खिलाफ क्या रहेगा झुनझुना?'

'तुम्हें मेरी बात का यकीन करना होगा ।'

'यकीन से कोई बात हल नहीं होने वाली एफ मेयर साहब।' जगतार बोला-'समझौता बराबर के ही ढंग से होगा। अगर आप उन कागजातों को अपने कब्जे में रखना चाहते हैं तो आपको अपने अपराधों का पूरा विवरण एक कागज पर लिखकर और दस्तखत करके जगन सेठ को देना होगा।'

जगतार की यह रात सुरकर मेयर चौकड़ी सी भूल गया।

'मम्म मैं-।' बौखलाए से स्वर में यह बोला-'मैं भला क्यों कुछ लिखकर दूंगा।'

'मत लखकर दीजिए।' ‘

'क्या मतलब?'

'अगर आप लिखकर नहीं देंगे तो वो वाले कागजात जगन सेठ को वापिस दे देने होंगे। फिर जगन सेठ जाने और आप।' जगतार की बात सुनकर मेयर के चेहरे पर हवाईयाँ सी उड़ने लगी। सांप छछूदर जैसी हालत होगई थी, उसकी न निगलते बन रहा न उगलते।

'मैंने पहले ही कह दिया था कि समझौता होगा तो बराबर की शर्तों पर होगा।' जगतार बोला-'तराजू के दोनों पलड़े बराबर होंगे। कोई किमी की तरफ ज्यादा नहीं झुकने दिया जाएगा।'

'यह बात हुई ना कायदे की जगतार गुरु।' जगन सेठ ने उत्साहित स्वर मे उसका समर्थन करते हुए कहा-'अगर मेरी गरदन इसके हाथ में हो तो इसकी गरदन मेरे हाथ में होनी चाहिए। ताकि अगर कोई किसी की गरदन दबाए तो उसे इस वात का अहसास तो रहेगा कि दूसरा भी उसकी गरदन दबा सकता है।'

'यह बात मानने वाली है।' पुलिस कमिश्नर जयफर भी बोला-'जगतार गुरु ने जो फैसला दिया है इससे ज्यादा सही और सच्चा फैसला और कोई नहीं हो सकता। समझौता बराबर की शर्तों पर डोगा तमी मजेदारी भी है और आगे हम मिल-जुल कर सही ढंग से बेहतर काम कर सकेंगे।'

फोरेस्ट आफिसर 'मुझे कुछ सोचने का टाईम दो।' मेयर ने विवश से स्वर में कहा।

'जो कुछ भी सोचने का टाईम है वह यहीं पर है।' जगतार बोला-'इस कमरे से बाहर जाने का मतलब है कि फिर कभी कोई समझौता नहीं होगा। अगर आप समझौते की शतं मानने के लिए तैयार नहीं हैं तो मजबूरन हमें ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी कि हम नोग आपके विना भी काम चला सकें।'

मेयर को लगा कि उसके पास और कोई चारा नहीं है।

बोला-'मै तो तहे दिल से समझौते के पक्ष में हूं। अगर आप लोग यही चाहते हैं तो ऐसा दरी सही।लाईए कागज कलम मैं लिख देता हूं।'
 
जगतार ने उसे एक ओर रखा कागज उठाकर दे दिया। जयकर ने अपनी जब से पैन निकालकर दिया।

मेयर लिखने लगा।

'भैरों सिंह।' जगतार ने कहा-'तुम जरा फोन उठाकर रूम सर्विस से कहो कि एक बोतल ओर पांच गिलास भिजवा दे। इस ऐतिहासिक समझौते की खुशी में यहा बैठे पंच परमेश्वर सुबह सुबह भगवान शकर का प्रसाद तो चख ले।'

भैरों उठा और उसने कोने में रखे फोन द्वारा आदेश दुहरा दिया। फिर कमरे में चहलकदमी सी करने लदा। मेयर ने कागज लिखकर दस्तखत किए और फिर उसे जगतार की और बढ़ा दिया।

जगतार ने जगन सेठ को संकेत किया--देख लो जगन सेठ जो कुछ लिखा गया है उसे पढ़कर तुम्हारी तसल्लो है ना?" जगन सेठ ने पढ़ा।

फिर सन्तोष से सिर हिलाते हुए कहा-'हां ठीक है।'

'तो इसका मतलब है कि अब समझौता तसल्लीबक्श हो गया है।' जगतार बोला-'अब दोनों जने बड़े प्रेम से आपस मैं दोस्ताने का हाथ मिलाओ।'

'हाय तो मिला लूं।' मेयर बोला-'पर वे कागजात तो पहले मझे मिलने चाहिए।'

पर आपमें से किसी को कोई एतराज तो नहीं है।'

'यह सब प्रोग्राम तो बाद में बन जाएगा।' जगन सेठ बोला -'लेकिन जब तक वह कागजात मुझे वापिस नही मिल जाते तब तक समझौते की कोई बात करना बेकार है।'

'तो फिर इस बात को यही खत्म कर दिया जाए।' जगतार ने एकदम निर्णायक स्वर में कहा-'आगे बातचीत करने का कोई फायदा नहीं।'

'क्या मतलब?' उसकी बदली हुई टोन सुनकर जगन सेठ एकदम चौंका।

'मतलब साफ है जगन सेठ।' जगतार तनिक कड़े स्वर में बोला-'अगर वो कागजात तुम्हारे हाथों में पहुंच ही गए तो फिर तुम मेयर साहब को किस खेत की मूली समझोगे?'

'यानि यानि ।'

जगतार की बात पर कोशिश के बावजूद भी मेयर अपनी प्रसन्नता न रोक सका और हकला सा गया। मगर फिर एकदम अपने आपको संयत करता हुआ बोला-'अगर कागजात एक बार दे दिए तो फिर जगन सेठ ने किसे पूछना है। फिर तो तू कौन और में कौन।'

जगन सेठ ने कड़ी नजरों से जगतार को धूरा।

क्रोध से नथने फड़कने लगे थे और गाल लाल हो गए थे।

कड़े स्वर में जगतार से बोला वह-'आखिर तुम ओ इस मेयर से जा मिले?'

'मैं किसी से मिला हुआ नहीं हूं।' जगतार बोला-'न तुम से न मेयर से। मत भूलो कि मैं इस समय पंच बना हुआ हूं और पंच में परमेश्वर बोलता है जो किसी का पक्ष नहीं लेता। सिर्फ वही करता है जो न्याय की बात होती है।'

'मेरी गरदन हमेका इस मेयर की गरदन में फंसी रहे इसे तुम न्याय कहते हो।' जगन सेठ ने रोष पूर्ण स्वर में कहा-'यानि तुम हमेशा-हमेशा के लिए इस मेयर का कुत्ता बना देना चाहते हो?'

'नहीं लगन सेठ, मैं किसी को किसी का कुत्ता नहीं बनाना चाहता। सिर्फ समझौता चाहता हूं बराबर की शर्तों पर। आपको मेरी इस कोशिश में कोई गलत बात नजर आ रही है?'

अन्तिम बात जमतार ने जयकर को सम्बोधित करके कही थी

और जयकर ने बड़ी गम्भीरता से सिर हिलाते हुआ । कहा-'नहीं इसमें तो कोई गलत बात नहीं है। यह तो बिल्कुल न्याय की बात है कि समझौता हो लेकिन बराबरी के आधार पर हो।'

'आपको मंजूर हैं?' उसने जगन सठ से पूछा।

'हां बराबरी के आधार पर समझौता हो तो किसे मंजूर नही होगा।' जगन सेठ ने अपने को संयत करके जवाब दिया।

'आपको कोई एतराज है?' उसने मेयर से पूछा।

'नहीं।'

मेयर का जवाब मिलने के बाद जगतार बोला-'तब मेरा फैसला है कि वे कागजात मेयर के पास ही सुरक्षित रहेंगे। बतौर गारन्टी ताकि जगन सेठ कभी सपने में भी मयर साहब के खिलाफ जाने की बात न सोच सके।'

'यह क्या बात हुई।' जगन सेठ एकदम बिफर कर बोला-'यह तो तुमने मेरी गरदन पर छुरी फेर दी और इसे तुम समझौता कह रहे हो।'

'बिलकुल सही किया है।' मेयर उत्साहित स्वर में बोला-'क्योंकि इन्हें मालूम है कि मैं कमी कोई गलत काम कर ही नहीं सकता। और तुम्हें भी यकीन दिलाता हूं कि वे कागजात चाहें रहें मेरे पास ही लेकिन जब तक तुम मेरे खिलाफ कोई गलत हरकत नहीं करोगे मैं उनका तुम्हारे खिलाफ उपयोग नहीं करूंगा।'

'जब बात बराबर के समझौते की है तो खाली यकीन दिलाने से कुछ नहीं होने का।' जगतार ने मेयर से कहा।
 
'जब बात बराबर के समझौते की है तो खाली यकीन दिलाने से कुछ नहीं होने का।' जगतार ने मेयर से कहा।

'यकीन को क्या मैं रखकर चाहूंगा।' जगन सेठ बोला-'मेरी गरदन तो तुम्हारे हाथों में रहेगी। मेरे पास तुम्हारे खिलाफ क्या रहेगा झुनझुना?'

'तुम्हें मेरी बात का यकीन करना होगा ..।'

'यकीन से कोई बात हल नहीं होने वाली एफ मेयर साहब।' जगतार बोला-'समझौता बराबर के ही ढंग से होगा। अगर आप उन कागजातों को अपने कब्जे में रखना चाहते हैं तो आपको अपने अपराधों का पूरा विवरण एक कागज पर लिखकर और दस्तखत करके जगन सेठ को देना होगा।'

जगतार की यह बात सुरकर मेयर चौकड़ी सी भूल गया।

'मम्म मैं-।' बौखलाए से स्वर में यह बोला-'मैं भला क्यों कुछ लिखकर दूंगा।'

'मत लिखकर दीजिए।'

'क्या मतलब?'

'अगर आप लिखकर नहीं देंगे तो वो वाले कागजात जगन सेठ को वापिस दे देने होंगे। फिर जगन सेठ जाने और आप।'

जगतार की बात सुनकर मेयर के चेहरे पर हवाईयाँ सी उड़ने लगी। सांप छडूंदर जैसी हालत हो गई थी, उसकी न निगलते बन रहा न उगलते।

'मैंने पहले ही कह दिया था कि समझौता होगा तो बराबर की शर्तों पर होगा।' जगतार बोला-'तराजू के दोनों पलड़े बराबर होंगे। कोई किमी की तरफ ज्यादा नहीं झुकने दिया जाएगा।'

'यह बात हुई ना कायदे की जगतार गुरु।' जगन सेठ ने उत्साहित स्वर मे उसका समर्थन करते हुए कहा-'अगर मेरी गरदन इसके हाथ में हो तो इसकी गरदन मेरे हाथ में होनी चाहिए। ताकि अगर कोई किसी की गरदन दबाए तो उसे इस वात का अहसास तो रहेगा कि दूसरा भी उसकी गरदन दबा सकता है।'

'यह बात मानने वाली है। पुलिस कमिश्नर जयफर भी बोला-'जगतार गुरु ने जो फैसला दिया है इससे ज्यादा सही और सच्चा फैसला और कोई नहीं हो सकता। समझौता बराबर की शर्तों पर डोगा तमी मजेदारी भी है और आगे हम मिल-जुल कर सही ढंग से बेहतर काम कर सकेंगे।'

'मुझे कुछ सोचने का टाईम दो।' मेयर ने विवश से स्बर में कहा।

'जो कुछ भी सोचने का टाईम है वह यहीं पर है।' जगतार बोला-'इस कमरे से बाहर जाने का मतलब है कि फिर कभी कोई समझौता नहीं होगा। अगर आप समझौते की शतं मानने के लिए तैयार नहीं हैं तो मजबूरन हमें ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी कि हम नोग आपके विना भी काम चला सकें।'

मेयर को लगा कि उसके पास और कोई चारा नहीं है। बोला-'मै तो तहे दिल से समझौते के पक्ष में हूं। अगर आप लोग यही चाहते हैं तो ऐसा ही सही। लाईए कागज कलम मैं लिख देता हूं।'
 
जगतार ने उसे एक ओर रखा कागज उठाकर दे दिया। जयकर ने अपनी जब से पैन निकालकर दिया।

मेयर लिखने लगा।

'भैरों सिंह।' जगतार ने कहा-'तुम जरा फोन उठाकर रूम सर्विस से कहो कि एक बोतल ओर पांच गिलास भिजवा दे। इस ऐतिहासिक समझौते की खुशी में यहा बैठे पंच परमेश्वर

सुबह सुबह भगवान शकर का प्रसाद तो चख ले।' भैरों उठा और उसने कोने में रखे फोन द्वारा आदेश दुहरा दिया। फिर कमरे में चहलकदमी सी करने लगा।

मेयर ने कागज लिखकर दस्तखत किए और फिर उसे

जगतार की और बढ़ा दिया।

जगतार ने जगन सेठ को संकेत किया--देख लो जगन सेठ जो कुछ लिखा गया है उसे पढ़कर तुम्हारी तसल्ली है ना?" जगन सेठ ने पढ़ा।

फिर सन्तोष से सिर हिलाते हुए कहा-'हां ठीक है।'

'तो इसका मतलब है कि अब समझौता तसल्लीबक्श हो गया है।' जगतार बोला-'अब दोनों जने बड़े प्रेम से आपस मैं दोस्ताने का हाथ मिलाओ।'

'हाथ तो मिला लूं।' मेयर बोला-'पर वे कागजात तो पहले मुझे मिलने चाहिए।' 'वो भी देता हू। पहले हाथ तो मिलाओ।'

'क्या मतलब?' जगन सेठ ने एकदम चौंककर कहा--'तुम तो

कह रहे थे कि रात तुमसे सेफ खुली ही नही!'

'झूठ बोला था मैंने जगन सेठ।' जगतार बोला-'लेकिन यह तो तुम मानोगे कि अच्छे काम के लिए बोले गए झूठ को झूठ नहीं कहा जाता। पहले बाली स्थिति बेहतर रहती या अदकी स्थिति बेहतर है।'

.

जगन सेठ के जबाब देने से पहले दन्वाजे पर दस्तक हुई। भैरों ने दरवाजा खोला। तभी सामने पुलिस को देखकर चौंक मया। उसने पिस्तौल निकालने की कोतिल की किन्तु पुलिस अधिकारी की पिस्तौल से निकली गोली ने उसका हाथ धायल कर दिया। उसके साथ ही कई पुलिसवाले भीतर घुस आए।

यह वही पुलिस अधिकारी था जो हास्पिटल मे जगतार के कमरे के बाहर घेराबन्दी किए हुए था।

सबको पिस्तौल के निशान पर लेता हुआ बोला-'अब तुम्हारा खेल खतम हो गया जगतार। मेरा खेल शुरू है।'

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'यह कौन था?' रात जब भैरोंसिंह उसे उसके बंगले पर छोड़कर गया तो साधना ने उससे पूछा था। भैरोंसिंह।' उसने अनमने ढंग से जवाब दिया था।

'वही जो यहां सबसे पहले रिश्वत लेकर आया था?'

उसने साधना के इम सवाल का कोई जवाब नहीं दिया और अपने कमरे की ओर चल दिया। उसका दिमाग नशे से बोझिल था और सिर गे जगतार द्वारा की गई चोटों की धमक गूज रही थी। अन्दर ही अन्दर एक विवशतापूर्ण क्रोध का लावा सा उबल रहा था जो उसकी नस-नस को जलाए दे रहा था।

असफलता और असफलता।

आज उसने कम से कम उस हरामजादे मेयर को तो निश्चित रूप से ठिकाने लगा दिया होता अगर उस जगतार ने अचानक ही वहां पहुंच कर सारा काम खराब न कर दिया होता।

लेकिन वह जगतार वहां पहुंचा कैसे?

साफ जाहिर है कि वह साला मेयर सं भी मिला हुआ था। वह निश्चित रूप से मेयर का आदमी था तभी तो उसके दुश्मन जगन सेठ के आदभी कालिया से उलझ पड़ा वह ओर दीदी समझ रही है कि वह हम बचाने के लिए अपनी जान पर खेल गया।

'तुमने मेरी बात का जवाब नही दिया?' साधना ने उसका रास्ता रोकत हुए पूछा -'कहा रहे तुम इतनी रात तक और यह भैर तुम्हे यहां फैस छोड़ने के लिए आया?' 'मैं तुम्हारे सवाल के जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हूं।'

'बाध्य हो तुम।' साधना दृढ़ स्वर मे बोली-जब तक मैं यहां हूं तुम मेर हर सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य हो। शराब भी पी है ना तुमने।'

'हां पी है।' दम एकदम जोरदार आवाज में बोला-'शराब पी है मैंने। लेकिन लोगों का लहू नहीं पिया तुम्हारे उस जगतार की तरह थे।'
 
साधना का हाथ उसे मारने के लिए उठा तो उसने उसकी कलाई पकड़ ली और सख्त स्वर में बोला-'बस दीदी बस। अब तुम्हें कोई हक नहीं रहा मुझ पर हाय उठाने का। जाओ उस जगतार की माला जपो जिसे तुम अपना रक्षक समझ रही थी।'

'कहां मिला था तू उनसे?'

'नाम मुनते ही पिघल गई?' उसने घृणापूर्ण दृष्टि से साधना मँग ओर देखते हुए उसका हाथ झटक दिया-'मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि तुम भावनाओं के बहाब में कभी इतना नीचे भी गिर जाओगी। छि:।'

वह जाकर अपने पलंग पर घम्म से औंधे मुंह जा पड़ा।

साधना दरवाजे से सिर टिकाकर सोचने करें कि क्या उसने बाकई अपने सब हक खो दिए हैं।

क्या उसकी सारी तपस्या का कोई अर्थ नहीं। सब कुछ यूं ही निष्फल चला जाएगा। आखिर शराब से वहके हुए यह कदम

जसके भाई को कौन सी भटकी हुई मंजिल की ओर खींच रहे हैं। उसे भी क्या दोष दे? कहीं वह खुद भी तो नहीं भटक गई

आखिर क्या हो जाता है उसे जगतार का नाम सुनकर?

सब कुछ जानते-बूझते शी लग वह खुद गलत दिशा में नहीं बढ़ रही। सब कुछ सोचते समझते भी एक फरार मुजरिम के साथ अपनी प्रीत की डोर बांध बैठी। भावना से वहके हुए

खुद उसके कदम भो तो उसे न जाने किस भटकी हुई मंजिल की ओर खींच रहे हैं। जगतार का नाम सुनते ही वह सब कुछ क्यों भूल गई? क्यों उसकी इच्छा हो रही है कि जाकर केशो से पूछे कि वह कहां मिला था? कैसे हैं? उनके जख्मों का क्या हाल है?

आंसुओं से भीगे चेहरे के साथ उसने पलंग की ओर देखा जहां वह औंधा पड़ा हुआ था और फिर भारी कदमों से अपने कमरे की ओर लौट गई।

कुछ पूछने का साहस नहीं हुआ।

वह खुद पलंग पर गिरते ही शराब के नशे से भरपूर नींद के आगोश में पहुंच गया था। देर दिन चढ़े तक सोता रहा था वह।

वहीं पड़े-पड़े बाहर फैली हुई धूप को देखा। घड़ी में दस बय रहे थे। फिर भी उठने का मन नहीं कर रहा था। रात की शराब का नशा अब खुमार बन कर मन मस्तिष्क

को बोझिल सा किए हुए था।

रात की घटनाएं धीरे-धीरे याद आने लगी। लेकिन दे कोई ऐसी यादें नही थीं जिनसे मन-मस्तिष्क प्रफुल्लित होता। बल्कि उनके कारण निराशा का कोहरा उसे दबोचता सा चला गया।

नहीं वह कुछ नहीं कर सकता। इस सारी व्यवस्था से अथवा-अव्यवस्था से वह नहीं लड़ सकता।

जगन सेठ के खिलाफ सबूत लेकर गया तो मेयर ने दोगलापन दिखा दिया। मेयर को मारने के लिए गया तो जगतार उसे बचाने के लिए पहुंच गया। सब साले चोर हैं।

वह पुलिस कमिश्नर तक इन चोरों से मिला हुआ है।

वह यही सव सोचता रहा और पलंग पर करवटें बदलता रहा। ग्यारह बज गए। बारह बज गए?

लेकिन अभी भी उठने को मन नहीं कर रहा था। बीच में एक बार साधना आई थी उससे चाय पूछने के लिए। हालांकि चाय पीने की इच्छा थी उसकी लेकिन फिर भी न जाने क्या सोच कर उसने मना कर दिया। साधना ने भी दोबारा नहीं पूछा।

घर में चारों ओर फैली मनहूसियत को देखते हुए उसने सोचा कि अब उसे उठ ही जाना चाहिए। तभी बाहर किमी जीप के रुकने की आवाज सुनाई दी। बह उठने की जा रहा था कि उससे पहले ही फड़फड़ाता हुआ एक पुलिस अधिकारी भीतर घुस आया। यह वही पुलिस

अधिकारी था जिसे उसने हास्पिटल में देखा था।

'मिस्टर केटरी आप अपने आपको हिरासत में समझो।' उसने

आते ही कहा।

'लकिन मैंने क्या किया है?'

'आप पर आरोप है कि आपने मेयर भी शर्मा के घर में घुस

कर उनकी हत्या का प्रयास किया था।'

तब तक साधना भी वहां पहुंच गई थी। उसे देखते ही पुलिस अधिकारी बोला-'मिस साधना आपको जेल से फरार खतरनाक मुजरिम जगतार को कानून की नजरों से बचाकर पनाह देने के अपराध में गिरफ्तार किया जाता है।'

'लेकिन बह हैं कहां?'

'मैंने उसे गिरफ्तार कद जिया है और वह बाहर जीप में बैठा

सुनते साधना बावल स बाहर की ओर दौड़ पड़ी।

बाहर जीप में जगतार बैठा था। हाथों में हथकड़ियां थी। दोनों की नजरें मिली। क्षण भर को ठिठक कर खड़ी रह गई। फिर आगे बढ़कर उसके निकट पहुंच गई।

काफी देर तक दोनों में से कोई नहीं बोला। बस एक-दूसरे की

ओर देखते भर रहे।

'कैसे हो?' आखिर साधना ने पूछा।

जवाब में अजीब ढंग से मुस्कराया जगतार। फिर हाथों की हथकड़ियों की ओर संकेत करता हुआ बोला-'जहां से आया था वही वापिस जा रहा हूं।' 'मैं इन्तजार करूंगी तुम्हारा।'

'बेवकूफ हो तुम जो एक अपराधी के लिए अपनी जिन्दगी

खराब करना चाहती हो।' जगतार बोला-'हम दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ उसे महज एक सपना समझ कर भूल जाना।'

'क्या तुम भूल सकोगे?'

एकाएक जवाब न दे सका साधना के इस सवाल का जगतार। फिर धीरे से बोला-'लेकिन भूलना तो होगा ही। सपने कभी सच नहीं होते।'
 
साधना ने विषय परिवर्तन करते हुए पूछा-'तुम्हारे घाव अब कैसे हैं।'

'वे तो ठीक हो ही जाएंगे।' जगतार एक लम्बी सांस के साथ बोला-'लेकिन नही जानता कि तुम्हें जो घाव देकर जा रहा हूं वो कैसे ठीक होगा।'

'मेरी चिन्ता मत करो।' साधना बोली-'मुझे कोई घाव नहीं दिया है तुमने। मैंने सिर्फ तुम्हें चाहा है और दिल से चाहा है।

तुम जो भी जैसे भी हो मेरे हो।'

'साधना।'

'मैंने कहा ना कि मैं तुम्हारा इन्तजार करूगीं।'

'और अगर मैं लौटकर न आया तो?'

'तो सारी जिन्दगी तुम्हारा नाम लेकर गुजार दूंनी। तुम जानते हो ना कि मेरा नाम साधना है। बिश्वास रखो अपनी साधना के बल पर मैं तुम्हें हासिल करके ही रहूंगी। अगर यहां नहीं तो वहां।' कहते-कहते साधना ने ऊपर आसमान की ओर संकेत किया।

न जाने क्या सोच कर जगतार की आंखें सजल हो बाई। वह एकटक साधना को देखता सा रह गया।

'तुम किस धोखेबाज के चक्कर में फस गई हो बेटी।'

अचानक उसी पुलिस अधिकारी की आवाज सुनाई दी। वह न जाने कब उनके निकट पहुंच गया था।

'आपको हम लोगों के बीच बोलने का कोई हक नहीं है।' साधना एकदम रोषपूर्ण स्वर में बोसी।

'यह मक्कार तुम्हें शुरू से धोखा देता रहा और फिर भी तुम इसकी तरफदारी कर रही हो।' वह पुलिस अधिकारी बोला-'लेकिन फिर भी तुम्हारा प्रेम देखकर मैं नतमस्तक हो गया हूं। अपनी पूरी जिन्दगो में तुम जैसी अनोखी लड़की नहीं देखी मैंने। यह लो चाबी और इसकी हथकड़ियां खोल दो।'

साधना ने चाबी नहीं ली। ऊपर से नीचे तक उस पुलिस

अधिकारी को देखा और फिर कड़े स्वर में बोली-'हमें किसी से भी दया की भीख नहीं चाहिए। यह कानून के मुजरिम हैं

और कानून जो भी।' 'नहीं बेटी।' पुलिस अधिकारी उसकी बात काटता हुआ बोला-'यह कानून का मुजरिम नहीं है। यह सिर्फ तुम्हारा मुजरिम है।'

साधना के बेहरे पर आश्चर्य के भाव उभरते देखकर वह पुलिस अधिकारी बोला-'हां बेटी, मैंने तुमसे कहा था ना कि यह धोखेबाज तुम्हें शुरू से ही धोखा देता रहा था। इसने कभी तुम्हें अपने बारे में सच्चाई नही बताई। इसने अपना नाम तक सही नही बताया तुम्हें। इसका नाम जगतार नहीं बल्कि मनबीर सिंह है। और न हो यह जेल से भागा हुआ कोई कैदी ही है बल्कि भारतीय खुफिया विभाग का एक बहुत ही दिलेर

और खतरनाक जासूस है।'

साधना को जैसे अपने कानों पर विश्वास न हो रहा था कि जो जो कुछ वह सुन रही है वह सच है। उसे ऐसा लगने लगा था जैसे कोई सपना सा देख रही हो।

पुलिस अधिकारी जगतार की हथकड़ियां खोलता हुआ बोला -'नाटक वहुत हो चुका। कार बेवकूफ बना लया तुमने इस लड़की को अब अपनी असलियत में आ जाओ वरना अब वह बेभाव की मारनी शुररू करूंगा कि खोपड़ी गंजी हो जाएंगी।'

'यस अंकल।' हथकड़ियां खुलते ही जगतार बाहर कूदता दुआ बोला। साधना को चक्कर से आने लगे थे। उसे लगा जैसे वह खशी के मारे बेहोश हो जाएगी। वह बेहोश होकर गिर भी पड़ती अगर मनवीर ने उसे अपनी मजबूत बांहों में, न थाम लिया होता।



 
'मेरा नाम अवध बिहारी सिंह है।' चाय की चुस्कियों के दौरान उस पुलिस अधिकारी ने बताना शुरू किया--'और मैं खुफिया विभाग में मनवीर का आफिसर हूं। दरअसल हम लोगों को इस इलाके से जबर्दस्त गड़बड़ियों की सूचनाएं मिल रही थी। उनके बारे में पता लगाने और असली अपराधियों को खोजने के लिए हमने अपने ही विभाग के एक अन्य जासूस सरन महतो को यहां का फारेस्ट आफिसर बनाकर भेजा। लेकिन उसने हमें कभी कोई महत्वपूर्ण रिपोर्ट नहीं भेजी। बस गहि वगाहे यही सूचना भेजता रहा कि वह पता लगाने की कोशिश में है। फिर एक दिन हमें मालूम हुआ कि जंगल में उसकी लाश पाई गई। किसी जंगली जानवर ने उसे मार डाला है।'

'हम लोगों को इस बात पर यकीन नहीं आया। मैंने मनवीर से सलाह की और हम दोनों इसी नतीजे पर पहुचे कि जिन अपराधियों का पता लगाने के लिए उसे भेजा गया था उन्हें किसी तरह यह मालूम हो गया कि वह खुफिया विभाग का जासूस है और उन्होंने उसकी हत्या कर दी। असली अपराधियों का पता लगाने के लिए नये सिरे से योजना बनाई गई और मनवीर ने ही यह सुझाव रखा कि इस वार इस ढंग से काम किया जाए कि अपराधी लाख कोशिश के बावजूद भी असलियत पता लगाने में कामयाब न हो सकें।'

'इसके लिए एझ नाटक खेला गया। मनबीर को जगतार बनाकर एक अपराधी के रूप में जेल भेजा गया जहां से कुछ दिन बाद इसे भगा दिया गया। भागकर योजना के अनुसार यह सीधा वहां जंगल में आया।

'तब तक तुम नये फारेस्ट आफिसर बनकर यहां आ चुके थे।'

अवध बिहारी ने केसरी की ओर उन्मुख अकर कहा-'और कालिया से तुम्हारी तनातनी शुरू हो चुकी थी। पहले ही दिन तुम्हारी मनवीर से जगतार के रूप में मुलाकात हुई तो तू-तू मैं-मैं भी हो गई। जगतार के रूप में मनवीर जंगलों के मजदूरों से बातचीत करके कुछ जानकारियां हासिल करता रहा। तू-तू मैं-मैं के बावजूद तुम्हारी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से भी प्रभावित हुआ था यह। जब तुमने कालिया के मुंह पर थप्पड़ मारा तभी मनबीर को इस बात का यकीन हो गया था कि कालिया बदले की कार्यवाही के रूप में कुछ न कुछ करेगा। इस लिए यह रात को तुम्हारे बंगले की निगरानी करने का निश्चय कर चका था। जिससे गुंडों के हमले के समय ऐन वक्त पर यह तुम्हारो मदद के लिए पहुंच सका था।'

'खैर उस कांड में एक और कांड हो गया कि साधना का झुकाव न जाने कैसे इस अपराधी की ओर हो गया। औरत के बारे में मनबीर के अनुभव कुछ अच्छे नहीं थे और इसी वजह से यह अभी तक कुंआरा रहा। दरअसल यह खुफिया विभाग में जासूस तो अपने शौक की वजह से है और वैसे करोड़पति बाप का इकलौता बेटा है। जितनी भी लड़कियां इसे मिली उन अबके बारे में इसका यही खयाल था कि उनमें से कोई भी इसे नहीं चाहती बल्कि इसकी करोड़ों की दौलत के लालच में इससे प्यार का नाटक करती हैं। हालांकि भगवान ने कोई बुरी सूरत नहीं दी है इसे। लेकिन न जाने क्यों इसे यह बहम हो नया था कि इसकी सूरत इस लायक ही नहीं है कि कोई खूबसूरत लड़की इससे प्यार कर सके। इसलिए जब साधना इसकी ओर बढ़ी तो यह गच्चा सा खा गया था। उसे अपने से दूर रखने के लिए इसने अपने कैदी होने की बात भी बता ही। लेकिन साधना पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। क्योंकि मुझे लगता है कि इसने अपने मन की आंखों से असली जगतार को पहचान लिया था'

'बहरहाल उस रौत कालिया से हुई लड़ाई में यह हास्पिटल पहुंच गया। मुझे जैसे ही खबर लगी मैं वैसे ही कुछ सिपाही लेकर वहां से रवाना हो गया था क्योंकि मुझे खतरा था कि कही कालिया के गुंडे इसे हास्पिटल में ही मारने की कोशिश न करें। इससे पूरी बात जानने के लिए मैंने उस समय तुम लोगों को जबर्दस्ती बाहर निकाल दिया था।'

'अन्दर मनबीर ने सब कुछ बताया मुझे। अपनी अब तक की कारगुजारियों के बारे मे भी और साधना के बारे में भी। मगर साथ ही कहा कि मैं साधना को उसकी असलियत के बारे में जरा भी आभास न लगने दूं बल्कि यह जानने की कोशिश करू कि क्या वह वाकई अपराधी जगतार को दिल से चाहती है।'

'बाहर आकर मैंने साधना से वही सब कहा और जैसी कि उम्मीद थी इस जिद्दी लड़की ने मेरी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। यह जगतार की देखभाल के लिए उसके कमरे में रहना चाहती थी लेकिन ऐसा सम्भव नहीं था। क्योंकि हमें अपना कर्तव्य भी तो पूरा करना था।'
 
'मुझे और जगतार को पूरा भरोसा था कि कालिया का कोई न कोई आदमी उसे हास्पिटल में जान से मारने की कोशिश करेगा और हम तब उसे पकड़ लेंगे ताकि उससे और कुछ उमलवाया जा सके।'

'लोकिन ऐसा नहीं हुआ। उसकी जगह सफाई कर्मचारी के रूप में एक आदमी ने जगतार से पूछा था कि क्या वह भाग निकलना चाहता है। दुश्मनों के बीच घुसने के लिए इस मौके की तलाश थी ही। इसलिए हमने भी अपनी घेराबन्दी ढीली कर ली ताकि हुश्मनों को इसे भगाने में कोई खास दिक्कत पेश न आए।'

'आपने ऐसी घायलावस्था में इन्हे दुश्मनों के बीच जाने दिया?' साधना ने शिकायत पूर्ण स्वर में कहा।

'अरे बेटी विभाग में मैं इसका अफसर हूं और यह मेरा मातहत।' 'अवध बिहारी सिंह ने मनवीर की ओर देखते हुए कहा-'लेकिन जब फील्ड में काम करने का मौका आता है तो यह मेरा अफसर होता है और मैं इसका मातहत। उस वक्त जो यह चाहेगा वही होगा मेरी कुछ नहीं चलती तब।'

'यही सोचकर तो मैं भी हैरान था कि इतना जबर्दस्त पुलिस प्रबंध होने के बावजूद भी जगतार मेरा मतलब मनवीर भाग कैसे निकला।' केसरी बोला-'फिर मुझे ध्यान आया कि पुलिस भी तो दुश्मनों से ही मिली हुई है।'

'खैर हम दुश्मनों से मिले नहीं थे लेकिन फिर भी हमने इसे आग जाने दिया।' अवध बिहारी सिंह ने चाय का अन्तिम चूंट भरते हुपू कहा-'उस वक्त हमने यह नहीं सोचा था कि अपराधी जिस रात मनवीर को भगाएंगे उसी रात कालिया की भी हत्या कर देंगे।'

'तो कालिया की हत्या जगन सेठ ने ही की थी।'

'जगन सेठ ने करवाई थी। भैरोंसिंह के हाथों।' अवध बिहारी सिंह ने कहा-'लेकिन मनवीर के भागने का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि यह जगन सेठ के नजदीक पहुंच गया चोर सभी वह संयोग हुआ कि तुम कागजात लेकर मेयर के पास पहुंच गए। लेकिन वह कागजात तुम्हारे हाथ लगे कैसे?'

केसरी ने उसे कागजात मिलने का किस्सा बता दिया।

'हूं।' सुनने के बाद अवध बिहारी सिंह ने गम्भीरता से सिर हिलाते हुए कहा-'इससे यह तो साफ जाहिर हो जाता है कि सरन महतो यहां आकर जासूसी तो पूरी करने लगा था लेकिन विभाग के लिए नहीं बल्कि खुद माल चीरने के लिए। तुम कहते हो कि तुम्हारे कमरे की दीवार पर सांप की कोटर लिखा हुआ था। मुझे पक्का यकीन है कि वे शब्द सरन महतो ने ही लिखे होंगे। शायद उसे इस बात का शक हो गया था कि कहीं यह लोग उसकी हत्या न कर दें। उस हालत में वह जानता था कि विभाग का कोई न कोई आदमी उसकी हत्या की जांच पड़ताल करने के लिए जरूर आएगा और दीवार पर लिखे इस संकेत के मिलते ही वह इसके आधार पर खोज

शुरू करके अपराधियों के खिलाफ उस द्वारा एकत्रित किए गए सबूत हासिल कर लेगा।

विभाग की ओर से उसकी हत्या की जांच-पड़ताल और असली अपराधियों की तलाश में मनवीर आया तो सही। लेकिन यह कुछ ऐसे घटनाक्रम में उलझा कि उन सांकेतिक शब्दों पर इसकी नज़र ही न पड सकी। खैर वे कागजात तुमने मेयर को दिए और मेयर को जैसे मन मांगी मुराद मिल गई हो। उसने उन कागजातों के माध्यम से जगन सेठ और पुलिस कमिश्नर जयकर को अपने शिकंजे में कसना चाहा!

जगन सेठ ने मनवीर को किस्सा बताया और मनबीर उन कागजातों को हासिल करने के लिए तैयार हो गया। तभी इसे खबर मिली कि तुम मेयर को मारने के लिए पिस्तौल ढूंढते फिर रहे हो। इसे इस बात का खतरा हुआ कि कहीं तुम उत्तेजना में कोई ऐसा-वैसा कार्य न कर बैठो। कि तुम्हारे लिए जिन्दगी-भर का पछताना हो जाए। इसलिए इसने अपनी योजना के अनुसार तुम्हें पिस्तौल भी दिलवा दी और उन लोगों के साथ मिलकर एसा इन्तजाम कर लिया कि तुम आधी रात के बाद मेयर के घर में प्रविष्ट हो। तुम्हें भीतर घुसने में किसी तरह की दिक्कत न हो इसके लिए यह तुम्हारे वास्ते रास्ते भी बनाता गया था।'

'इसका असली इरादा तो यह था कि वहां अकेले में तुमसे बात करके तुम्हारे सिर से हत्या का भूत उतार देगा।' अवध बिहारी सिंह कहता रहा-'लेकिन वहां इसे अपनी योजना बदल देनी पड़ी। क्योंकि सेफ से यह जगन सेठ और पुलिस कमिश्नर जयकर के खिलाफ वे कागजात हासिल करने में कामयाब हो गया था किन्तु मेयर के खिलाफ इसे कोई सबूत नही मिला था। जबकि कानून के फन्दे में मेयर को फांसना भी जरूरी था। आखिर वह भी कोई कम बड़ा अपराधी तो था नहीं। मेयर को फंसाने के लिए ही इसने चाल चली और तुम्हें मेयर के बैडरूम में घुस जाने दिया और ऐन वक्त पर तम्हारे सिर पर चोट करके तुम्हे बेहोश किया और मेयर को बचा लिया। मेयर को अपने चक्कर में फंसा कर समझौते के लिए मजबूर किया। लौटकर जगन सेठ को भी इस बात के लिए प्रेरित किया था कि वह मेयर से समझौता कर ले। इस सारे नाटक का उद्देश्य था मेयर के खिलाफ सबूत हासिल करना।'

'मौका देखकर यह रात को जगन सेठ के पास से भी चल दिया और मुझसे मिला। रात-रात में हमने उन अपराधियों को फसाने के लिए कृष्णा होटल के सोलह नम्बर कमरे में स्टेज तैयार की। कमरे मे माईक्रोफोन और विडियो कैमरे इस तरह से फिट कर दिए गए कि किसी को उनके होन का संदेह तक न हो सके। और तब समझौते के लिए मेयर अपने हाथों से अपने अपराधों का विवरण लिखने लगा तो मनबीर ने हमे भैरोसिंह के हाथों व्हिस्की लाने के लिए फोन करवा कर सतर्क कर दिया। हम लोग न केवल इन लोगों की बातचीत रिकार्ड कर रहे थे बल्कि उसे सुन भी रहे थे और जब मौका आया तो हमने एकदम कार्यवाही करके सबको गिरफ्तार कर लिया। भैरोंसिंह ने पिस्तौल निकालने की कोशिश की थी।

लेकिन उसे मौका ही नहीं मिला। बाकी कोई कुछ करने की स्थिति में ही नहीं था। अपराधी और उनके खिलाफ सबूत दोनों ही हमारे कब्जे में आ चुके थे।'

'लेकिन आप इन्हें हथकड़ी डालकर क्यों लाए यहां?' साधना ने पूछा।

'बताया ना यह सब इसी बदमाश की शरारत थी।' अबध बिहारी सिंह ने कहा-'यह जानना चाहता था कि तुम इससे कितना प्यार करती हो। वैसे इस नाटक में भी कोई बुराई नहीं थी। अब कम से कम इस बेवकूफ को यह तो यकीन आ गया कि कोई खूबसूरत लड़की इसे सचमुच प्यार कर सकती है।'

साधना ने चोर निगाहों से मनवीर की ओर देखा।
 
भैरोंसिंह ने पिस्तौल निकालने की कोशिश की थी।

लेकिन उसे मौका ही नहीं मिला। बाकी कोई कुछ करने की स्थिति में ही नहीं था। अपराधी और उनके खिलाफ सबूत दोनों ही हमारे कब्जे में आ चुके थे।'

'लेकिन आप इन्हें हथकड़ी डालकर क्यों लाए यहां?' साधना ने पूछा।

'बताया ना यह सब इसी बदमाश की शरारत थी।' अबध बिहारी सिंह ने कहा-'यह जानना चाहता था कि तुम इससे कितना प्यार करती हो। वैसे इस नाटक में भी कोई बुराई नहीं थी। अब कम से कम इस बेवकूफ को यह तो यकीन आ गया कि कोई खूबसूरत लड़की इसे सचमुच प्यार कर सकती है।'

साधना ने चोर निगाहों से मनवीर की ओर देखा।

मन्द-मन्द मुस्करा रहा था वह।

'यह आंख-मिचौली का खेल खेलने के लिए तो तुम लोगों के पास जिन्दगी पड़ी है।' अवध बिहारी सिंह ने कहा-'इस वक्त तो मुझे जोर की भूख लगी है। तुम जो इसे छुप-छुपकर खाना खिलाया करती थी, उसकी बड़ी तारीफ कर रहा था मनवीर। आज मैं भी यहां से तुम्हारे हाथ का खाना खाकर जाऊंगा।'

साधना उठी और केसरी को अपने पीछे आने का संकेत करते हुए रसोई में घुस गई।

'दीदी मुझे माफ कर दो।' रसोई में पहुंचते ही केसरी बोला।

'माफी किस बात की?'

'यह सब मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी आदमी के बारे में जो कुछ भी हम देख-सुन समझ रहं हैं वह एकदम इतना गलत हो जाएगा।'

'एक बात का हमेशा ध्यान रखना केशो कि अगर आदमी की भावना और निष्ठा सच्ची है तो उसका कल उसे बो चाहे मरजी मिले लेकिन वह कभी अकल्याणकारी वहीं होगा।'

'मैं अपने पिछले व्यवहार पर शर्मिन्दा हूं दीदी।'

'जो हो चुका उसे भूल जाओ। बिखरे हुए दूध पर आंसू बहाने से कोई लाभ नहीं। न उसे समेटने की कोशिश से ही कुछ हाथ लगेगा। नए उत्साह से नई स्थिति के बारे में सोची।'

केसरी ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला तो वह बोली-'अब हम भाई-बहन आपस की बातों में ही उलझे रहेंगे या उन लोगों के खाने का भी कुछ फ्रिक करेंगे। जा शहर से जाकर जल्दी से सामान ले आ। जल्दी करना।'

'बस समझो दीदी कि यूं गया और आया।'

उसने चुटकी बजाकर कहा और तेजी से बाहर निकल गया।

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सुहागरात।

साधना के मुखड़े से चूंघट हटाकर उसने उसके झुकी पलकों वाले चेहरे को निहारा और फिर बोला--'मुझे अब भी अपनी आंखों पर यकीन नहीं आ रहा कि तुम जैसी रूपवती सुन्दरी ने मुझसे शादी कर ली है। आज तो तुम्हें मुझे सच-सच बताना ही होगा कि क्या देखा था तुमने जेल से भागे हुए इस कैदी में जो जुमने अपने दिल की सारी दौलत इस पर लुटा डाली?'

साधना ने उसकी आंखों में झांका और फिर शरारत के साथ बोली-'यही कि ऐसे खतरनाक मुजरिम का फरार रहना ठीक नहीं है। इसे अपनी बांहों को कैद में लेना ही होगा।'

और उसके साथ ही उसने उसके गले में बाहें डालकर अपना चेहरा उसकी छाती में छुपा लिया।

★★ समाप्त ★★
 
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