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फोरेस्ट आफिसर
जंगल के कच्चे किन्तु समतल रास्ते पर दौड़ती हुई जीप
आखिर उस इमारत के आगे रुकी जिसे फारेस्ट अधिकारी का बगला कहा जाता था।
सबसे पहले नये फारेस्ट आफिसर ही नीचे उतरा और चारों ओर छाई प्राकृतिक सुन्दरता को मुग्ध भाव से देखने लगा।
'भैया तितली तितली।'
जीप से कूद कर उतरी एक बारह-चौदह साल की लड़की एक ओर की सफेद फलों वाली झाड़ी के ऊपर पर फड़फड़ाती हुई चमकदार रंगों वाली तितलियों को देखती हुई बोली। तितलियां उसे अपनी ओर आते देखकर दूसरी झाड़ी पर जा मंडराने लगी। लड़की को अच्छा खेल मिल गया और वह ताली बजाती हुई तितलियों के पीछे दौड़ने लगी।
'मुन्नी ज्यादा दूर मत जाना।'
जीप से तीसेक रााल की भरे पूरे और आकर्षक शरीर को एक महिला नीचे उतरती हुई बोली। उसके साथ ही एक सोलह सत्रह वर्ष का किशोर भी नीचे उतरता हुआ वाला-'दीदी सामान उतार लूं में।'
'हां किब्बू सामान उतार लो।'
महिला ने कहा और फिर अपनी बड़ी-बड़ी हिरनी सरीखी बांखों से चारों ओर देखती हुई सुख सन्तोष की एक दीर्घ निःश्वास के साथ बोली-'कितनो शान्ति है यहां।'
'हां दीदी।' फारेस्ट आफिसर ने तृप्त से स्वर में कहा, 'देखो ना प्रकृति कितनी सभ्यता से मुस्कराती हुई हम लोगों का स्वागत कह रही है।'
किव्वू ड्राइवर के साथ मिलकर जीप के पीछे लगे ट्रेलर से सामान उतरवाने लगा। गृहस्थी का सभी आवश्यक सामान ले आए थे वे लोग अपने साथ। लोहे के फोल्डिंग पलंग इत्यादि भी।
साधना-यही था उस महिला का नाम-नीचे उतरा सामान उठाने लगी तो युवक एकदम उसकी ओर बढ़ता हुआ बोला-'तुम रहने दो दीदी। मैं उठाता हूं।'
'अरे हां मैं यह देखना तो भूल ही गई कि कमरे साफ भी हैं या नहीं।' साधना बगले के भीतर घुसती हुई बोली।
'सब चकाचक साफ है बीबी जी।' ड्राइवर ट्रंक नीचे उतारता हुआ बोला-'आपको लेने जाने से पहले हमने हर कमरे की
अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर सफाई कर दी थी।'
'अच्छी सफाई की है। मुझे तो बरामदे में ही कूड़ा नजर आ रहा है। ला बता झाडू कहां है?"
महिला ने अपने आंचल का पल्लू कमर में खोंसा और झाडू उठा कर कूड़ा हटाने लगी। वैसे कमरे साफ थे इसलिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। उन लोगों द्वारा लाए गए सामान की वह कमरे में व्यवस्थित ढंग से लगाने लगी थी।
इस बीच स्टोव जला कर चाय का पानी भी चढ़ा दिया था उसने।
'ड्राइवर से लेकर चराती तक सब कुछ हम ही हैं। यहां पर पिछले अफसर साहब तो हम से बड़ा ही प्रम करते थे।
महाराज-महाराज कहते मुंह नहीं थकता था उनका। अकेले ही रहते थे यहां इसलिए उनको रसोई भी हमी बनाते थे। बड़े सख्त अफसर थे पर हमारे से इतना प्रेम करते थे कि घर भी नहीं जाने देते थे। हम कहते थे कि हुजूर हुमारे बीवी बच्चे हैं। उनकी भी देख भाल करनी है तो बड़ा मन मार कर छुट्टी देते थे। सख्त तो थे पर बड़े दयालु आदमी थे वेचारे।'
महाराज सिंह नामक वह व्यक्ति अपनी वाचाल प्रकति का प्रदर्शन करता हुआ कहे जा रहा था।
'उन्हें तो किसी ने मार दिया था न?" केसरी ने पूछा।
'हां हुजूर, एक दिन उनकी लाश जंगल में पड़ी पई गई।'
'कुछ पता चला कि किसने मारा था।'
'अब हुजूर कोई आदमी होता तो पता चलता कि किसने मारा है। पर वो तो लगता है कि किसी जानवर के इत्ये चढ़ गए थे। बाघ था शायद कोई। सारा शरीर खूनम खून था।
जंगल के कच्चे किन्तु समतल रास्ते पर दौड़ती हुई जीप
आखिर उस इमारत के आगे रुकी जिसे फारेस्ट अधिकारी का बगला कहा जाता था।
सबसे पहले नये फारेस्ट आफिसर ही नीचे उतरा और चारों ओर छाई प्राकृतिक सुन्दरता को मुग्ध भाव से देखने लगा।
'भैया तितली तितली।'
जीप से कूद कर उतरी एक बारह-चौदह साल की लड़की एक ओर की सफेद फलों वाली झाड़ी के ऊपर पर फड़फड़ाती हुई चमकदार रंगों वाली तितलियों को देखती हुई बोली। तितलियां उसे अपनी ओर आते देखकर दूसरी झाड़ी पर जा मंडराने लगी। लड़की को अच्छा खेल मिल गया और वह ताली बजाती हुई तितलियों के पीछे दौड़ने लगी।
'मुन्नी ज्यादा दूर मत जाना।'
जीप से तीसेक रााल की भरे पूरे और आकर्षक शरीर को एक महिला नीचे उतरती हुई बोली। उसके साथ ही एक सोलह सत्रह वर्ष का किशोर भी नीचे उतरता हुआ वाला-'दीदी सामान उतार लूं में।'
'हां किब्बू सामान उतार लो।'
महिला ने कहा और फिर अपनी बड़ी-बड़ी हिरनी सरीखी बांखों से चारों ओर देखती हुई सुख सन्तोष की एक दीर्घ निःश्वास के साथ बोली-'कितनो शान्ति है यहां।'
'हां दीदी।' फारेस्ट आफिसर ने तृप्त से स्वर में कहा, 'देखो ना प्रकृति कितनी सभ्यता से मुस्कराती हुई हम लोगों का स्वागत कह रही है।'
किव्वू ड्राइवर के साथ मिलकर जीप के पीछे लगे ट्रेलर से सामान उतरवाने लगा। गृहस्थी का सभी आवश्यक सामान ले आए थे वे लोग अपने साथ। लोहे के फोल्डिंग पलंग इत्यादि भी।
साधना-यही था उस महिला का नाम-नीचे उतरा सामान उठाने लगी तो युवक एकदम उसकी ओर बढ़ता हुआ बोला-'तुम रहने दो दीदी। मैं उठाता हूं।'
'अरे हां मैं यह देखना तो भूल ही गई कि कमरे साफ भी हैं या नहीं।' साधना बगले के भीतर घुसती हुई बोली।
'सब चकाचक साफ है बीबी जी।' ड्राइवर ट्रंक नीचे उतारता हुआ बोला-'आपको लेने जाने से पहले हमने हर कमरे की
अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर सफाई कर दी थी।'
'अच्छी सफाई की है। मुझे तो बरामदे में ही कूड़ा नजर आ रहा है। ला बता झाडू कहां है?"
महिला ने अपने आंचल का पल्लू कमर में खोंसा और झाडू उठा कर कूड़ा हटाने लगी। वैसे कमरे साफ थे इसलिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। उन लोगों द्वारा लाए गए सामान की वह कमरे में व्यवस्थित ढंग से लगाने लगी थी।
इस बीच स्टोव जला कर चाय का पानी भी चढ़ा दिया था उसने।
'ड्राइवर से लेकर चराती तक सब कुछ हम ही हैं। यहां पर पिछले अफसर साहब तो हम से बड़ा ही प्रम करते थे।
महाराज-महाराज कहते मुंह नहीं थकता था उनका। अकेले ही रहते थे यहां इसलिए उनको रसोई भी हमी बनाते थे। बड़े सख्त अफसर थे पर हमारे से इतना प्रेम करते थे कि घर भी नहीं जाने देते थे। हम कहते थे कि हुजूर हुमारे बीवी बच्चे हैं। उनकी भी देख भाल करनी है तो बड़ा मन मार कर छुट्टी देते थे। सख्त तो थे पर बड़े दयालु आदमी थे वेचारे।'
महाराज सिंह नामक वह व्यक्ति अपनी वाचाल प्रकति का प्रदर्शन करता हुआ कहे जा रहा था।
'उन्हें तो किसी ने मार दिया था न?" केसरी ने पूछा।
'हां हुजूर, एक दिन उनकी लाश जंगल में पड़ी पई गई।'
'कुछ पता चला कि किसने मारा था।'
'अब हुजूर कोई आदमी होता तो पता चलता कि किसने मारा है। पर वो तो लगता है कि किसी जानवर के इत्ये चढ़ गए थे। बाघ था शायद कोई। सारा शरीर खूनम खून था।