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Guest
मैं जो की अभी तक इस सुंदर नजारे में खोया हुआ था, थोडा-सा चौंक गया।फिर हकलाते हुए बोला,
"हां, हां, अभी करता हुं,,,,,, मैने सोचा पहले तुम कर लो इसलिये रुका था।" फिर मैने अपने पजामे के नाडे को खोला, और सीधे खडे-खडे ही मुतने की कोशिश करने लगा। मेरा लंड तो फिर से खडा हो चुका था, और खडे लंड से पेशाब ही नही निकल रहा था। मैने अपनी गांड तक का जोर लगा दिया, पेशाब करने के चक्कर में।बहिन वहीं बगल में खडी हो कर मुझे देखे जा रही थी। मेरे खडे लंड को देख कर, वो हसते हुए बोली,
"चल जल्दी से कर ले पेशाब, देर हो रही है। घर भी जाना है।"
मैं क्या बोलता। पेशाब तो निकल नही रहा था। तभी बहिन ने आगे बढ कर मेरे लंड को अपने हाथों में पकड लिया और बोली,
"फिर से खडा कर लिया, अब पेशाब कैसे उतरेगा ?",
कह कर लंड को हल्के-हल्के सहलाने लगी।
अब तो लंड और टाईट हो गया, पर मेरे जोर लगाने पर पेशाब की एक-आध बुंद नीचे गीर गई। मैने बहिन से कहा,
"अरे, तुम छोडोना इसको, तुम्हारे पकडने से तो ये और खडा हो जायेगा। हाये छोडो,,,,!"
और बहिन का हाथ अपने लंड पर से झटकने की कोशिश करने लगा। इस पर राखी ने हसते हुए कहा,
"मैं तो छोड देती हुं, पर पहले ये तो बता कि खडा क्यों किया था ? अभी दो मिनट पहले ही तो तेरा पानी निकाला था मैने, और तुने फिर से खडा कर लिया। कमाल का लडका है, तु तो।"
मैं खुछ नही बोला अब लंड थोडा ढीला पड गया था, और मैने पेशाब कर लिया। मुतने के बाद जल्दी से पजामे के नाडे को बांध कर, मैं राखी के साथ झाडियों के पिछे से निकल आया। राखी के चेहरे पर अब भी मंद-मंद मुस्कान आ रही थी। मैं जल्दी-जल्दी चलते हुए आगे बढा और कपडे के गठर को उठा कर, अपने माथे पर रख लिया। राखी ने भी एक गठर को उठा लिया और अब हम दोनो भाई- बहिन जल्दी-जल्दी गांव के पगदंडी वाले रास्ते पर चलने लगे। गरमी के दिन थे, अभी भी सुरज चमक रहा था। थोडी दूर चलने के बाद ही मेरे माथे से पसिना छलकने लगा। मैं जान-बुझ कर राखी के पिछे-पिछे चल रह था, ताकि राखी के मटकते हुए चुतडों का आनंद लुट सकुं, और मटकते हुए चुतडों के पिछे चलने का एक अपना ही आनंद है। आप सोचते रहते हो कि, ये, कैसे दिखते होंगे, ये चुतड बिना कपडों के, या फिर आपका दिल करता है कि, आप चुपके से पिछे से जाओ और उन चुतडों को अपनी हथेलियों में दबा लो और हल्के मसलो और सहलाओ। फिर हल्के-से उन चुतडों के बीच की खाई, यानीकि गांड के गढ्ढे पर अपना लंड सीधा खडा कर के सटा दो, और हल्के-से रगडते हुए प्यारी-सी गरदन पर चुम्मियां लो। ये सोच आपको इतना उत्तेजित कर देती है, जितना शायद अगर आपको सही में चुतड मिले भी अगर मसलने और सहलाने को तो शायद उतना उत्तेजित ना कर पये। चलो बहुत बकवास हो गई। आगे की कहानी लिखते है। तो मैं अपना लंड पजामे में खडा किये हुए, अपनी लालची नजरों को राखी के चुतडों पर टिकाये हुए चल रह था। राखी ने मुठ मार कर मेरा पानी तो निकाल ही दिया था, इस कारण अब उतनी बेचैनी नही थी, बल्कि एक मिठी-मिठी-सी कसक उठ रही थी, और दिमाग बस एक ही जगह पर अटका पडा था। तभी राखी पिछे मुड कर देखते हुए बोली,
"क्यों रे, पिछे-पिछे क्यों चल रहा है ? हर रोज तो तु घोडे की तरह आगे-आगे भगता फिरता रहता था ?"
मैने शरमिन्दगी में अपने सिर को नीचे झुका लिया, हालांकि अब शर्म आने जैसी कोई बात तो थी नही। सब-कुछ खुल्लम-खुल्ला हो चुका था, मगर फिर भी मेरे दिल में अब भी थोडी बहुत हिचक तो बाकी थी ही। राखी ने फिर कुरेदते हुए पुछा,
"क्यों, क्या बात है, थक गया है क्या ?"
मैने कहा,
"नही राखी, ऐसी कोई बात तो है नही। बस ऐसे ही पिछे चल रह हुं।"
तभी राखी ने अपनी चाल धीमी कर दी, और अब वो मेरे साथ-साथ चल रही थी। मेरी ओर अपनी तिरछी नजरों से देखते हुए बोली,
"मैं भी अब तेरे को थोडा बहुत समझ्ने लगी हुं। तु कहां अपनी नजरें गडाये हुए है, ये मेरी समझ में आ रह है। पर अब साथ-साथ चल, मेरे पिछे-पिछे मत चल। क्योंकि गांव नजदीक आ गया है। कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा ?",
कह कर मुस्कुरने लगी।
मैने भी समझदार बच्चे की तरह अपना सिर हिला दिया और साथ-साथ चलने लगा। राखी धीरे-से फुसफुसाते हुए बोलने लगी,
"घर चल, तेरा जीजा तो आज घर पर है नही। फिर आराम से जो भी देखना है, देखते रहना।"
मैने हल्के-से विरोध किया,
"क्या राखी, मैं कहां कुछ देख रहा था ? तुम तो ऐसे ही बस, तभी से मेरे पिछे पडी हो।"
इस पर राखी बोली,
"लल्लु, मैं पिछे पडी हुं, या तु पिछे पडा है ? इसका फैसला तो घर चल के कर लेना।"
फिर सिर पर रखे कपडों के गठर को एक हाथ उठा कर सीधा किया तो उसकी कांख दिखने लगी। ब्लाउस उसने आधी-बांह का पहन रखा था। गरमी के कारण उसकी कांख में पसिना आ गया था, और पसिने से भीगी उसकी कांखे देखने में बडी मदमस्त लग रही थी। मेरा मन उन कांखो को चुम लेने का करने लगा था। एक हाथ को उपर रखने से उसकी साडी भी उसकी चुचियों पर से थोडी-सी हट गई थी और थोडा बहुत उसका गोरा-गोरा पेट भी दिख रहा था। इसलिये चलने की ये स्थिति भी मेरे लिये बहुत अच्छी थी और मैं आराम से वासना में डुबा हुआ अपनी बहिन के साथ चलने लगा। शाम होते-होते हम अपने घर पहुंच चुके थे। कपडों के गठर को ईस्त्री करने वाले कमरे में रखने के बाद, हमने हाथ-मुंह धोये और फिर बहिन ने कहा कि भाई चल कुछ खा-पी ले। भूख तो वैसे मुझे कुछ खास लगी नही थी (दिमाग में जब सेक्ष का भूत सवार हो तो, भूख तो वैसे भी मर जाती है), पर फिर भी मैने अपना सिर सहमती में हिला दिया। राखी ने अब तक अपने कपडों को बदल लिया था, मैने भी अपने पजामे को खोल कर उसकी जगह पर लुंगी पहन ली। क्योंकि गरमी के दिनो में लुंगी ज्यादा आरामदायक होती है। राखी रसोई घर में चली गई, और मैं कोयले कि अंगिठी को जलाने के लिये, ईस्त्री करने वाले कमरे में चला, गया ताकि ईस्त्री का काम भी कर सकु। अंगिठी जला कर मैं रसोई में घुसा तो देख राखी वहीं, एक मोढे पर बैठ कर ताजी रोटियां सेक रही थी। मुझे देखते ही बोली,
"जल्दी से आ, दो रोटी खा ले। फिर रात का खाना भी बना दुन्गी।"