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बदनाम रिश्ते



"हाये बहिन , चुसु मैं तेरी बुर को ? चाटु इसको ?"

"हां भाई चाट ना, चुस ले अपनी बहिन की चुत के सारे रस को। दोनो फांको को खोल के उसमे अपनी जीभ डाल दे, और चुस। और ध्यान से देख, तु तो बुर की केवल फांको को देख रहा है। देख मैं तुझे दिखाती हुं।"

और राखी ने अपनी चुत को पुरा चिरोड दिया और अंगुली रख कर बताने लगी,

"देख, ये जो छोटा वाला छेद है ना, वो मेरे पेशाब करने वाला छेद है। बुर में दो-दो छेद होते है। उपर वाला पेशाब करने के काम आता है और नीचेवाला जो ये बडा छेद है, वो चुदवाने के काम आता है। इसी छेद में से रस निकलता है, ताकि मोटे से मोटा लंड आसानी से चुत को चोद सके। और भाई ये जो पेशाब वाले छेद के ठीक उपर जो ये नुकिला सा निकला हुआ है, वो क्लीट कहलाता है। ये औरत को गर्म करने का अंतिम हथियार है। इसको छुते ही औरत एकदम गरम हो जाती है, समझ में आया ?"

"आ गया समझ में। हाय, कितनी सुंदर है, ये तुम्हारी चूत। मैं चाटु इसे बहिन ?"

"हां भाई, अब तु चाटना शुरु कर दे। पहले पुरी बुर के उपर अपनी जीभ को फिरा के चाट, फिर मैं आगे बताती जाती हुं, कैसे करना है ?"

मैने अपनी जीभ निकाल ली, और राखी की बुर पर अपनी जुबान को फिराना शुरु कर दिया। पुरी चुत के उपर मेरी जीभ चल रही थी। मैं फुली हुई गद्देदार बुर को अपनी खुरदरी जुबान से, उपर से नीचे तक चाट रहा था। अपनी जीभ को दोनो फांको के उपर फेरते हुए, मैने ठीक बुर की दरार पर अपनी जीभ रखी और मैं धीरे-धीरे उपर से नीचे तक चुत की पुरी दरार पर जीभ को फिराने लगा। बुर से रिस-रिस कर निकलता हुआ रस, जो बाहर आ रहा था उसका नमकीन स्वाद मुझे मिल रहा था। जीभ जब चुत के उपरी भाग में पहुंच कर क्लीट से टकराती थी, तो राखी की सिसकीयां और भी तेज हो जाती थी। राखी ने अपने दोनो हाथों को शुरु में तो कुछ देर तक अपनी चुचियों पर रख था, और अपनी चुचियों को अपने हाथ से ही दबाती रही। मगर बाद में उसने अपने हाथों को मेरे सिर के पिछे लगा दिया और मेरे बालों को सहलाते हुए मेरे सिर को अपनी चुत पर दबाने लगी।मेरी चुत चुसाई बादस्तुर जारी थी और अब मुझे इस बात का अंदाज हो गया था कि,राखी को सबसे ज्यादा मजा अपनी क्लीट की चुसाई में आ रहा है। इसलिये मैने इस बार अपनी जीभ को नुकिला कर के, क्लीट से भिडा दिया और केवल क्लीट पर अपनी जीभ को तेजी से चलाने लगा। मैं बहुत तेजी के साथ क्लीट के उपर जीभ चला रहा था और फिर पुरी क्लीट को अपने होंठो के बीच दबा कर, जोर-जोर से चुसने लगा। राखी ने उत्तेजना में अपने चुतडों को उपर उछाल दिया और जोर से सिसकीयां लेते हुए बोली,

"हाये दैया, उईई मां,,,,,,, शी शी,,,,, चुस ले, ओह,,,,,, चुस ले,,,, मेरे भगनशे को। ओह, शीश,,,, क्या खुब चुस रहा है रे तु ???? ओह म,,मैने तो सोचा भी नही थाआआआ,,,, कि तेरी जीभ ऐसा कमाल करेगी। हाये रे,,,,, भाईआ,,,,, तु तो कमाल का निकला,,,,,,,, आह, ओओओह,,,,, ऐसे ही चुस,,, अपने होंठो के बीच में भगनशे को भर के,,,, इसी तरह से चुस ले, ओह भाई चुसो, चुसो भाई,,,,,,,"

राखी के उत्साह बढाने पर मेरी उत्तेजना अब दुगुनी हो चुकी थी। मैं दुगुने जोश के साथ, एक कुत्ते की तरह से लप-लप करते हुए, पुरी बुर को चाटे जा रहा था। अब मैं चुत के भगनशे के साथ-साथ पुरी चुत के मंस (गुद्दे) को अपने मुंह में भर कर चुस रहा था, और राखी की मोटी फुली हुई चुत अपने झांठो समेत मेरे मुंह में थी। पुरी राखी को एक बार रसगुल्ले की तरह से मुंह में भर कर चुसने के बाद, मैने अपने होंठो को खोल कर चुत के चोदनेवाले छेद के सामने टिका दिया, और बुर के होंठो से अपने होंठो को मिला कर मैने खूब जोर-जोर से चुसना सुरु कर दिया। बुर का नशिला रस रिस-रिस कर निकल रहा था, और सीधा मेरे मुंह में जा रहा था। मैने कभी सोचा भी नही था कि, मैं चुत को ऐसे चुसुन्गा, या फिर चुत की चुसाई ऐसे कि जाती है। पर शायद चुत सामने देख कर चुसने की कला अपने आप आ जाती है। फुद्दी और जीभ की लडाई अपने आप में ही इतनी मजेदार होती है कि, इसे सिखने और सिखाने की जुरुरत नही पडती। बस जीभ को फुद्दी दिखा दो, बाकी का काम जीभ अपने आप कर लेती है। राखी की सिसकीयां और शाबाशी और तेज हो चुकी थी। मैने अपने सिर को हल्का-सा उठा के राखी को देखते हुए, अपने बुर के रस से भीगे होंठो से राखी से पुछा,

"कैसा लग रहा है राखी , तुझे अच्छा लग रहा है ना ?"

राखी ने सिसकाते हुए कहा,

"हाये,भाई मत पुछ, बहुत अच्छा लग रहा है, मेरे भाई । इसी मजे के लिये तो तेरी बहिन तरस रही थी। चुस ले मेरी बुर कोओओओओओओ,,,,, और जोर से चुस्स्स्स्स्स्स्,,,,, सारा रस पी लेएएएएए मेरे सैंया, तु तो जादुगर है रेएएएएएएएए, तुझे तो कुछ बताने की भी जुरुरत नही। हाये मेरी बुर की फांको के बीच में अपनी जीभ डाल के चुस भाई , और उसमे अपनी जीभ को लबलबाते हुए अपनी जीभ को मेरी चुत के अंदर तक घुमा दे। हाये घुमा दे, राजा भाई घुमा दे,,,,,,,"
 


बहिन के बताये हुए रास्ते पर चलना तो भाई का फर्ज बनता है, और उस फर्ज को निभाते हुए, मैने बुर की दोनो फांको को फैला दिया और अपनी जीभ को उसकी चुत में पेल दिया। बुर के अंदर जीभ घुसा कर, पहले तो मैने अपनी जीभ और उपरी होंठ के सहारे बुर की एक फांक को पकड के खूब चुसा। फिर दुसरी फांक के साथ भी ऐसा ही किया। फिर चुत को जितना चिरोड सकता था उतना चिरोड कर, अपनी जीभ को बुर के बीच में डाल कर उसके रस को चटकारे ले कर चाटने लगा। चुत का रस बहुत नशीला था और राखी की चुत कामोत्तेजना के कारण खूब रस छोड रही थी। रंगहीन, हल्का चिप-चिपा रस चाट कर खाने में मुझे बहुत आनंद आ रहा था। राखी घुटी-घुटी आवाज में चीखते हुए बोल पडी,

"ओह, चाट ऐसे हि चाट मेरे राजा, चाट चाट के मेरे सारे रस को खा जाओ। हाये रे मेरा भाई, देखो कैसे कुत्ते की तरह से अपनी बहिन की बुर को चाट रह है। ओह चाट ना, ऐसे ही चाट मेरे कुत्ते भाई, अपनी कुतिया बहिन की बुर को चाट, और उसकी बुर के अंदर अपनी जीभ को हिलाते हुए मुझे अपनी जीभ से चोद डाल।"

मुझे बडा आश्चर्य हुआ कि एक तो बहिन मुझे कुत्ता कह रही है, फिर खुद को भी कुतिया कह रही है। पर मेरे दिलो-दिमाग में तो अभी केवल बहिन की रसीली बुर की चटाई घुसी हुई थी। इसलिये मैने इस तरफ ध्यान नही दिया। बहिन की आज्ञा का पालन किया, और जैसे उसने बताया था उसी तरह से, अपनी जीभ से ही उसकी चुत को चोदना शुरु कर दिया। मैं अपनी जीभ को तेजी के साथ बुर में से अंदर-बाहर कर रहा था, और साथ ही साथ चुत में जीभ को घुमाते हुए चुत के गुलाबी छेद से अपने होंठो को मिला के अपने मुंह को चुत पर रगड भी रहा था। मेरी नाक बार-बार चुत के भगनशे से टकरा रही थी और शायद वो भी बहिन के आनंद का एक कारण बन रही थी। मेरे दोनो हाथ बहिन की मोटी, गुदाज जांघो से खेल रहे थे। तभी बहिन ने तेजी के साथ अपने चुतडों को हिलाना शुरु कर और जोर-जोर से हांफते हुए बोलने लगी,

"ओह निकल जायेगा, ऐसे ही बुर में जीभ चलाते रहना भाई ,,,,, ओह, सी,,,,सीइ शीइशिशि, साली बहुत खुजली करती थी। आज निकाल दे, इसका सारा पानी।"

और अब राखी दांत पीस कर लगभग चीखते हुए बोलने लगी,

"ओह होओओओओ,,,, शीईईई साले कुत्ते, मेरे प्यारे भाई, मेरे लाल,,,, हाये रे,,,, चुस और जोर-से चुस अपनी बहिन की चूत को,,,,, जीभ से चोद देएएएएए अभी,,,,,,, सीईईइ ईई चोदनाआआ कुत्ते,,,, हरामजादे और जोर-से चोद सालेएएएएएएएए, ,,,,,,,, चोद डाल अपनी बहिन को,,,, हाय निकला रे,,, मेरा तो निकल गया। ओह,,,, मेरे चुदक्कड भाई ,,, निकाल दिया रे तुने तो,,,,, अपनी बहिन को अपनी जीभ से चोद डाला।"

कहते हुए बहिन ने अपने चुतडों को पहले तो खूब जोर-जोर से उपर् की तरफ उछाला, फिर अपनी आंखो को बंध कर के चुतडों को धीरे-धीरे फुदकाते हुए झडने लगी,

"ओह,,, गईईईई मैं,,,, मेरे राजाआआ,,,, मेरा निकल गया, मेरे सैंयाआआ। हाये तुने मुझे जन्नत की सैर करवा दी रे। हाय मेरे भाई ,,, ओह,,,, ओह,,, मैं गई,,,, बहिन ,," की बुर मेरे मुंह पर खुल-बंद हो रही थी। बुर की दोनो फांको से रस, अब भी रिस रहा था। पर बहिन अब थोडी ठंडी पड चुकी थी, और उसकी आंखे बंध थी। उसने दोनो पैर फैला दिये थे, और सुस्त-सी होकर लंबी-लंबी सांसे छोडती हुई लेट गई। मैने अपनी जीभ से चोद-चोद कर, अपनी बहिन को झाड दिया था। मैने बुर पर से अपने मुंह को हटा दिया, और अपने सिर को बहिन की जांघो पर रख कर लेट गया। कुछ देर तक ऐसे हि लेटे रहने के बाद, मैने जब सिर उठा के देख तो पाया की बहिन अब भी अपने आंखो को बंध किये बेशुध होकर लेटी हुई है।

मैं चुप-चाप उसके पैरो के बीच से उठा और उसकी बगल में जा कर लेट गया । मेरा लंड फिर से खडा हो चुका था, पर मैने चुप-चाप लेटना ही बेहतर समझा और बहिन की ओर करवट ले कर, मैने अपने सिर को उसकी चुचियों से सटा दिया और एक हाथ पेट पर रख कर लेट गया । मैं भी थोडी बहुत थकावट महसुस कर रहा था, हालांकि लंड पुरा खडा था और चोदने की ईच्छा बाकी थी। मैं अपने हाथों से बहिन के पेट, नाभी और जांघो को सहला रहा था। मैं धिरे-धिरे ये सारा काम कर रहा था, और कोशिश कर रहा था कि, राखी ना जागे। मुझे लग रहा था कि, अब तो राखी सो गई है और मुझे शायद मुठ मार कर ही संतोष करना पडेगा। इसलिये मैं चाह रहा था कि, सोते हुए थोडा सा राखी के बदन से खेल लुं, और फिर मुठ मार लुन्गा। मुझे राखी की जांघ बडी अच्छी लगी और मेरा दिल कर रहा था कि, मैं उन्हे चुमु और चाटु। इसलिये मैं चुप-चाप धीरे से उठा, और फिर राखी के पैरो के पास बैठ गया । राखी ने अपना एक पैर फैला रखा था, और दुसरे पैर को घुटनो के पास से मोड कर रख हुआ था। इस अवस्था में वो बडी खूबसुरत लग रही थी। उसके बाल थोडे बिखरे हुए थे। एक हाथ आंखो पर और दुसरा बगल में था। पैरों के इस तरह से फैले होने से उसकी बुर और गांड, दोनो का छेद स्पष्ट रुप से दिख रहा था। धीरे-धीरे मैं अपने होंठो को उसकी जांघो पर फेरने लगा, और हल्की-हल्की चुम्मियां उसकी रानो से शुरु कर के उसके घुटनो तक देने लगा। एकदम मख्खन जैसी गोरी, चीकनी जांघो को अपने हाथों से पकड कर हल्के-हल्के मसल भी रहा था। मेरा ये काम थोडी देर तक चलता रहा, तभी राखी ने अपनी आंखे खोली और मुझे अपनी जांघो के पास देख कर वो एकदम से चौंक कर उठ गई, और प्यार से मुझे अपनी जांघो के पास से उठाते हुए बोली,

"क्या कर रहा है भाई ????,,,, जरा आंख लग गई थी। देख ना इतने दिनो के बाद, इतने अच्छे-से पहली बार मैने वासना का आनंद उठाया है। इस तरह पिछली बार कब झडी थी, मुझे तो ये भी याद नही। इसलिये शायद संत्रुष्टी और थकान के कारण आंख लग गई।"

 


"कोई बात नही बहिन , तुम सो जाओ।"

तभी बहिन की नजर मेरे ८.५ ईंच के लौडे की तरफ गई और वो चौंक के बोली,

"अरे, ऐसे कैसे सो जाउं ?"

(और मेरा लौडा अपने हाथ में पकड लिया।)

"मेरे भाई का लंड खडा हो के, बार-बार मुझे पुकार रहा है, और मैं सो जाउं।"

", इसको तो मैं हाथ से ढीला कर लुन्गा, तुम सो जाओ।"

"नही मेरे भाई, आजा जरा-सा बहिन के पास लेट जा। थोडा दम ले लुं, फिर तुझे असली चीज का मजा दुन्गी।"

मैं उठ कर बहिन के बगल में लेट गया । अब हम दोनो बहिन-भाई एक-दुसरे की ओर करवट लेते हुए, एक-दुसरे से बाते करने लगे। बहिन ने अपना एक पैर उठाया ,और अपनी मोटी जांघो को मेरी कमर पर डाल दिया। फिर एक हाथ से मेरे खडे लौडे को पकड के उसके सुपाडे के साथ धीरे-धीरे खेलने लगी। मैं भी राखी की एक चुंची को अपने हाथों में पकड कर धीरे-धीरे सहलाने लगा, और अपने होंठो को राखी के होंठो के पास ले जा कर एक चुंबन लिया। राखी ने अपने होंठो को खोल दिया। चुम्मा-चाटी खतम होने के बाद राखी ने पुछा,

"और भाई, कैसा लगा बहिन की चूत का स्वाद ? अच्छा लगा, या नही ?" "हाये राखी, बहुत स्वादिष्ट था, सच में मजा आ गया।"

"अच्छा, चलो मेरे भाई को अच्छा लगा, इससे बढ कर मेरे लिये कोई बात नही।"

" राखी , तुम सच में बहुत सुंदर हो। तुम्हारी चुचियां कितनी खूबसुरत है। मैं,,,,, मैं क्या बोलुं ? राखी , तुम्हारा तो पुरा बदन खूबसुरत है।"

"कितनी बार बोलेगा ये बात तु, मेरे से ? मैं तेरी आंखे नही पढ सकती क्या ? जिनमे मेरे लिये इतना प्यार छलकता है।"

मैं राखी से फीर पुरा चिपक गया । उसकी चुचियां मेरी छाती में चुभ रही थी, और मेरा लौडा अब सीधा उसकी चुत पर ठोकर मार रहा था। हम दोनो एक-दुसरे की आगोश में कुछ देर तक ऐसे ही खोये रहे। फिर मैने अपने आप को अलग किया और बोला,

" राखी , एक सवाल करुं ?"

"हां पुछ, क्या पुछना है ?"

" राखी , जब मैं तुम्हारी चुत चाट रह था, तब तुमने गालियां क्यों निकाली ?"

"गालियां और मैं, मैं भला क्यों गालियां निकालने लगी ?"

"नही राखी , तुम गालियां निकाल रही थी। तुमने मुझे कुत्ता कहा, और,,, और खुद को कुतिया कहा, फिर तुमने मुझे हरामी भी कहा।"

"मुझे तो याद नही भाई कि, ऐसा कुछ मैने तुम्हे कहा था। मैं तो केवल थोडा-सा जोश में आ गई थी, और तुम्हे बता रही थी कि कैसे क्या करना है। मुझे तो एकदम याद नही कि मैने ये शब्द कहे "नही राखी , तुम ठीक से याद करने की कोशिश करो। तुमने मुझे हरामी या हरामजादा कहा था, और खूब जोर से झड गई थी।"

"मुझे तो ऐसा कुछ भी याद नही है, फिर भी अगर मैने कुछ कहा भी था तो मैं अपनी ओर से माफी मांगती हुं। आगे से इन बातों का ख्याल रखुन्गी।"

" इसमे माफी मांगने जैसी कोई बात नही है। मैने तो जो तुम्हारे मुंह से सुना, उसे ही तुम्हे बता दिया। खैर, जाने दो तुम्हारा भाई हुं, अगर तुम मुझे दस-बीस गालियां दे भी दोगी तो क्या हो जायेगा ?"

" ऐसी बात नही है। अगर मैं तुझे गालियां दुन्गी तो, हो सकता है तु भी कल को मेरे लिये गालियां निकाले, और मेरे प्रति तेरा नजरीया बदल जाये। तु मुझे वो सम्मान ना दे, जो आजतक मुझे दे रहा है।"

"नही ऐसा कभी नही होगा। मैं तुम्हे हमेशा प्यार करता रहुन्गा और वही सम्मान दुन्गा, जो आजतक दिया है। मेरी नजरों में तुम्हारा स्थान हमेशा उंचा रहेगा।"

"ठीक है , अब तो हमारे बीच एक, दुसरे तरह का संबंध स्थापित हो गया है। इसके बाद जो कुछ होता है, वो हम दोनो की आपसी समझदारी पर निर्भर करता है।"

"हां तुमने ठीक कहा, पर अब इन बातों को छोड कर, क्यों ना असली काम किया जाये ? मेरी बहुत इच्छा हो रही है कि, मैं तुम्हे चोदुं। देखोना , मेरा डण्डा कैसा खडा हो गया है ?"

"हां भाई, वो तो मैं देख ही रही हुं कि, मेरे भाई का हथियार कैसा तडप रहा है, बहिन का मालपुआ खाने को ? पर उसके लिये तो पहले बहिन को एक बार फिर से थोडा गरम करना पडेगा भाई।" "हाये बहिन, तो क्या अभी तुम्हारा मन चुदवाने का नही है ?"

"ऐसी बात नही है, चुदवाने का मन तो है, पर किसी भी औरत को चोदने से पहले थोडा गरम करना पडता है। इसलिये बुर चाटना, चुंची चुसना, चुम्मा चाटी करना और दुसरे तरह के काम किये जाते है।"

"इसका मतलब है कि, तुम अभी गरम नही हो और तुम्हे गरम करना पडेगा। ये सब कर के,,,,,"

"हां, इसका यही मतलब है।"

"पर तुम तो कहती थी, तुम बहुत गरम हो और अभी कह रही हो कि गरम करना पडेगा ?"
 


"अबे उल्लु, गरम तो मैं बहुत हुं। पर इतने दिनो के बाद, इतनी जबरदस्त चुत चटाई के बाद, तुने मेरा पानी निकाल दिया है, तो मेरी गरमी थोडी देर के लिये शांत हो गई है। अब तुरन्त चुदवाने के लिये तो गरम तो करना ही पडेगा ना। नही तो अभी छोड दे, कल तक मेरी गरमी फिर चढ जायेगी और तब तु मुझे चोद लेना।"

"ओह नही , मुझे तो अभी करना है, इसी वक्त।"

"तो अपनी बहिन को जरा गरम कर दे, और फिर मजे ले चुदाई का।मैने फिर से बहिन की दोनो चुचियां पकड ली और उन्हे दबाते हुए, उसके होंठो से अपने होंठ भीडा दिये। बहिन ने भी अपने गुलाबी होंठो को खोल कर मेरा स्वागत किया, और अपनी जीभ को मेरे मुंह में पेल दिया। बहिन के मुंह के रस में गजब का स्वाद था। हम दोनो एक-दुसरे के होंठो को मुंह में भर कर चुसते हुं, आपस में जीभ से जीभ लडा रहे थे। बहिन की चुचियों को अब मैं जोर-जोर से दबाने लगा था और अपने हाथों से उसके मांसल पेट को भी सहला रह था। उसने भी अपने हाथों के बीच में मेरे लंड को दबोच लिया था और कस-कस के मरोडते हुए, उसे दबा रही थी। बहिन ने अपना एक पैर मेरी कमर के उपर रख दिया था और, अपनी जांघो के बीच मुझे बार-बार दबोच रही थी।

अब हम दोनो की सांसे तेज चलने लगी थी। मेरा हाथ अब बहिन की पीठ पर चल रहा था, और वहां से फिसलते हुए सीधा उसके चुतडों पर चल गया । अभी तक तो मैने बहिन के मक्खन जैसे गुदाज चुतडों पर उतना ध्यान नही दिया था, परन्तु अब मेरे हाथ वहीं पर जा के चिपक गये थे। ओह चुतडों को हाथों से मसलने का आनंद ही कुछ और है। मोटे-मोटे चुतडों के मांस को अपने हाथों में पकड कर कभी धीरे, कभी जोर से मसलने का अलग ही मजा है। चुतडों को दबाते हुए मैने अपनी उन्गलियों को चुतडों के बीच की दरार में डाल दिया, और अपनी उन्गलियों से उसके चुतडों के बीच की खाई को धीरे-धीरे सहलाने लगा। मेरी उन्गलियां राखी की गांड के छेद पर धीरे-धीरे तैर रही थी। राखी की गांड का छेद एकदम गरम लग रहा था। राखी, जो कि मेरे गालो को चुस रही थी, अपना मुंह हटा के बोल उठी,

"ये क्या कर रह है रे, गांड को क्यों सहला रहा है ? "

तुम्हारी ये देखने में बहुत सुंदर लगती है, सहलाने दो ना,,,,,,,"

"चुत का मजा लिया नही, और चला है गांड का मजा लुटने।",

कह कर राखी हसने लगी।

मेरी समझ में तो कुछ आया नही, पर जब राखी ने मेरे हाथों को नही हटाया तो मैने राखी की गांड के पकपकाते छेद में अपनी उन्गलिआं चलाने की अपने दिल की हसरत पुरी कर ली। और बडे आराम से धीरे-धीरे कर के अपनी एक उन्गली को हल्के हल्के उसकी गांड के गोल सिकुडे हुए छेद पर धीरे-धीरे चल रह था। मेरी उन्गली का थोडा सा हिस्स भी शायद गांड में चला गया था, पर राखी ने इस पर कोई ध्यान नही दिया था। कुछ देर तक ऐसे ही गांड के छेद को सहलाता और चुतडों को मसलता रहा। मेरा मन ही नही भर रहा था। तभी राखी ने मुझे अपनी जांघो के बीच और कस के दबोच कर मेरे गालो पर एक प्यार भरी थपकी लगाई और मुंह बिचकाते हुए बोली,

"चुतीये, कितनी देर तक चुतड और गांड से ही खेलता रहेगा, कुछ आगे भी करेगा या नही ? चल आ जा, और जरा फिर से चुंची को चुस तो।"

मैं राखी की इस प्यार भरी झिडकी को सुन कर, अपने हाथों को राखी के चुतडों पर से हटा लिया और मुस्कुराते हुए राखी के चेहरे को देख और प्यार से उसके गालो पर चुम्बन डाल कर बोला,

"जैसी मेरी राखी की इच्छा।" और उसकी एक चुंची को अपने हाथों से पकड कर, दुसरी चुंची से अपना मुंह सटा दिया और निप्पलों को मुंह में भर के चुसने का काम शुरु कर दिया।राखी की मस्तानी चुचियों के निप्पल फिर से खडे हो गये और उसके मुंह से सिसकारीयां निकलने लगी। मैं अपने हाथों को उसकी एक चुंची पर से हटा के नीचे उसकी जांघो के बीच ले गया और उसकी बुर को अपने मुठ्ठी में भर के जोर से दबाने लगा। बुर से पानी निकलना शुरु हो गया था। मेरी उन्गलियों में बुर का चिपचिपा रस लग गया । मैने अपनी बीच वाली उन्गली को हल्के से चुत के छेद पर धकेला। मेरी उन्गली सरसराती हुई बुर के अंदर घुस गई। आधी उन्गली को चुत में पेल कर मैने अंदर-बाहर करना शुरु कर दिया। राखी की आंखे एकदम से नशिली होती जा रही थी और उसकी सिसकारियां भी तेज हो गई थी। मैं उसकी एक चुंची को चुसते हुए चुत के अंदर अपनी आधी उन्गली को गचा-गच पेले जा रह था। राखी ने मेरे सिर को दोनो हाथों से पकड कर अपनी चुचियों पर दबा दिया और खूब जोर-जोर से सिसकाते हुए बोलने लगी,

"ओह, सीई,,,,,स्स्स्स्स्स्स्स्, एए,,,, चुस, जोर से निप्पल को काट ले, हरामी। जोर से काट ले मेरी इन चुचियों को हाये,,,,,"

और मेरी उन्गली को अपनी बुर में लेने के लिये अपने चुतडों को उछालने लगी थी। राखी के मुंह से फिर से हरामी शब्द सुन कर मुझे थोडा बुरा लगा। मैने अपने मुंह को उसकी चुचियों पर से हटा दिया, और उसके पेट को चुमते हुए उसकी बुर की तरफ बढ गया। चुत से उन्गलीयां निकाल कर मैने चुत की दोनो फांको को पकड के फैलाया और जहां कुछ सेकंड पहले तक मेरी उन्गलीयां थी, उसी जगह पर अपनी जीभ को नुकिला कर के डाल दिया। जीभ को बुर के अंदर लिबलिबाते हुए, मैं भगनशे को अपनी नाक से रगडने लगा। राखी की उत्तेजना बढती जा रही थी। अब उसने अपने पैरो को पुरा खोल दिया था और मेरे सिर को अपनी बुर पर दबाती हुई चिल्लाई,

"चाट साले, मेरी बुर को चाट। ऐसे ही चाट कर खा जा। एक बार फिर से मेरा पानी निकाल दे, हरामी। बुर चाटने में तो तु पुरा उस्ताद निकला रे। चाट ना अपनी बहिन की बुर को, मैं तुझे चुदाई का बादशाह बना दुन्गी, मेरे चुत-चाटु राजाआआ साले।"

थोड़ी ही देर उसकी बुर ने पानी छोड़ दिया अब मैं अपनी बहन की टाँगो के बीच आ गया और अपना लंड उसकी चूत पर सैट करके एक ज़ोर दार धक्का दिया और पुर एक घंटे तक उसकी मस्त चदाई की मेरी बहन ने मुझे वास्तव मे चुदाई बादशाह बना दिया था और इस तरह दोस्तो हमारी सेक्स की जिंदगी दीदी की शादी तक आराम से चलती रही

समाप्त

 
मा बेटे के सेक्स की कहानी--1

सावधान........... ये कहानी समाज के नियमो के खिलाफ है क्योंकि हमारा समाज मा बेटे और भाई बहन के रिश्ते को सबसे पवित्र रिश्ता मानता है अतः जिन भाइयो को इन रिश्तो की कहानियाँ पढ़ने से अरुचि होती हो वह ये कहानी ना पढ़े क्योंकि ये कहानी एक मा बेटे के सेक्स की कहानी है

चांग सिंह मेघालय राज्य के एक छोटे से गांव का रहने वाला है. वो अपने माँ - बाप का एकलौता बेटा है. गांव में घोर गरीबी के चलते उसे 15 साल की ही उम्र अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर दिल्ली आना पड़ा. दिल्ली आते ही उसे एक कारखाने में नौकरी मिल गयी. उसने तुरंत ही अपनी लगन एवं इमानदारी का इनाम पाया और उसकी तरक्की सिर्फ एक साल में ही सुपरवाइजर में हो गयी. अब उसे ज्यादा वेतन मिलने लगा था. अब वो अपने गाँव अपने माँ - बाप से मुलाक़ात करने एवं उन्हें यहाँ लाने की सोच रहा था. तभी एक दिन उसके पास उसकी माँ का फोन आया कि उसके पिता की तबियत काफी ख़राब है. चांग जल्दी से अपने गाँव के लिए छुट्टी ले कर निकला. दिल्ली से मेघालय जाने में उसे तीन दिन लग गए. मगर दुर्भाग्यवश वो ज्यों ही अपने घर पहुंचा उसके अगले दिन ही उसके पिता की मृत्यु हो गयी.

होनी को कौन टाल सकता था. पिता के गुजरने के बाद चांग अपनी माँ को दिल्ली ले जाने की सोचने लगा क्यों कि यहाँ वो बिलकुल ही अकेली रहती और गाँव में कोई खेती- बाड़ी भी नही थी जिसके लिए उसकी माँ गाँव में रहती. पहले तो उसकी माँ अपने गाँव को छोड़ना नही चाहती थी मगर बेटे के समझाने पर वो मान गयी और बेटे के साथ दिल्ली चली आयी. उसकी माँ का नाम बसंती है. उसकी उम्र 31 - 32 साल की है. वो 15 साल की ही उम्र में चांग की माँ बन चुकी थी. आगे चल कर उसे एक और संतान हुई मगर कुछ ही दिनों में उसकी मृत्यु हो गयी थी. आगे चल कर बसंती को कोई अन्य संतान नही हुई. इस प्रकार से बसंती को सिर्फ एक पुत्र चांग से ही संतुष्टी प्राप्त करना पड़ा. खैर ! चांग उसका लायक पुत्र निकला और वो अब नौकरी कर के अपना और अपनी माँ का ख़याल रख सकता था.

चांग ने दिल्ली में एक छोटा सा कमरा किराया पर ले रखा था. इसमें एक किचन और बाथरूम अटैच था. उसके जिस मकान में यह कमरा ले रखा था उसमे चारों तरफ इसी तरह के छोटे छोटे कमरे थे. वहां पर लगभग सभी बाहरी लोग ही किराए पर रहते थे. इसलिए किसी को किसी से मतलब नही था. चांग का कमरे में सिर्फ एक खिडकी और एक मुख्य दरवाजा था. बसंती पहली बार अपने राज्य से बाहर निकली थी. वो तो कभी मेघालय के शहर भी नहीं घूमी थी. दिल्ली की भव्यता ने उसकी उसकी आँखे चुंधिया दी. जब चांग अपनी माँ बसंती को अपने कमरे में ले कर गया तो बसंती को वह छोटा सा कमरा भी आलिशान लग रहा था. क्यों कि वो आज तक किसी पक्के के मकान में नही रही थी. वो मेघालय में एक छोटे से झोपड़े में अपना जीवन यापन गुजार रही थी. उसे उसके बेटे ने अपने कमरे के बारे में बताया . किचन और बाथरूम के बारे में बताया. यह भी बताया कि यहाँ गाँव कि तरह कोई नदी नहीं है कि जब मन करे जा कर पानी ले आये और काम करे. यहाँ पानी आने का टाइम रहता है. इसी में अपना काम कर लेना है. पहले दिन उसने अपनी माँ को बाहर ले जा कर खाना खिलाया. बसंती के लिए ये सचमुच अनोखा अनुभव था. वो हिंदी भाषा ना तो समझ पाती थी ना ही बोल पाती थी. वो परेशान थी . लेकिन ने उसे समझाया कि वो धीरे धीरे सब समझने लगेगी.

रात में जब सोने का समय आया तो दोनों एक ही बिस्तर पर सो गए. चांग का बिस्तर डबल था. इसलिए दोनों को सोने में परेशानी तो नही हुई. परन्तु चांग तो आदतानुसार किसी तरह सो गया लेकिन पहाड़ों पर रहने वाली बसंती को दिल्ली की उमस भरी रात पसंद नही आ रही थी.वो रात भर करवट लेती रही. खैर! सुबह हुई. चांग अपने कारखाने जाने के लिए निकलने लगा. बसंती ने उसके लिए नाश्ता बना दिया. चांग ने बसंती को सभी जरुरी बातें समझा कर अपने कारखाने चला गया. बसंती ने दिन भर अपने कमरे की साफ़ सफाई की एवं कमरे को व्यवस्थित किया. शाम को जब चांग वापस आया तो अपना कमरा सजा हुआ पाया तो बहुत खुश हुआ. उसने बसंती को बाजार घुमाने ले गया और रात का खाना भी बाहर ही खाया.

बसंती अब धीरे धीरे अपने गाँव को भूलने लगी थी. अगले 3 -4 दिनों में बसंती अपने पति की यादों से बाहर निकलने लगी थी और अपने आप को दिल्ली के वातावरण अनुसार ढालने की कोशिश करने लगी. चांग बसंती पर धीरे धीरे हावी होने लगा था. चांग जो कहता बसंती उसे चुप चाप स्वीकार करती थी. क्यों कि वो समझती थी कि अब उसका भरण - पोषण करने वाला सिर्फ उसका बेटा ही है. चांग भी अब बसंती का अभिभावक के तरह व्यवहार करने लगा था.

चांग रात में सिर्फ अंडरवियर पहन कर सोता था. एक रात में उसकी नींद खुली तो वो देखता है कि उसकी माँ बैठी हुई.

चांग - क्या हुआ? सोती क्यों नहीं?

बसंती - इतनी गरमी है यहाँ.

चांग - तो इतने भारी भरकम कपडे क्यों पहन रखे हैं?

बसंती - मेरे पास तो यही कपडे हैं.

चांग - गाउन नहीं है क्या?

बसंती - नहीं.

चांग - तुमने पहले मुझे बताया क्यों नहीं? कल मै लेते आऊँगा.

अगले दिन चांग अपनी माँ के लिए एक बिलकूल पतली सी नाइटी खरीद कर लेते आया. ताकि रात में माँ को आराम मिल सके. जब उसने अपनी माँ को वो नाइटी दिखाया तो वो बड़े ही असमंजस में पड़ गयी. उसने आज तक कभी नाइटी नही पहनी थी. लेकिन जब चांग ने बताया कि दिल्ली में सभी औरतें नाइटी पहन कर ही सोती हैं तो उसने पूछा कि इसे पहनूं कैसे? चांग ने कहा - अन्दर के सभी कपडे खोल दो. और सिर्फ नाइटी पहन लो. बेचारी बसंती ने ऐसा ही किया. उसने किचन में जा कर अपनी पहले के सभी कपडे खोले और सिर्फ नाइटी पहन ली. नाइटी काफी पतली थी. बसंती का जवान जिस्म अभी 32 साल का ही था. उस पर पहाड़ी औरत का जिस्म काफी गदराया हुआ था. गोरी और जवान बसंती की चूची बड़े बड़े थे. गाउन का गला इतना नीचे था कि बसंती की चूची का निपल सिर्फ बाहर आने से बच रहा था.

बसंती ने गाउन को पहन कर कमरे में आयी और चांग से कहा - देख तो ,ठीक है? चांग ने अपनी माँ को इतने पतले से नाइटी में देखा तो उसके होश उड़ गए. बसंती का सारा जिस्म का अंदाजा इस पतले से नाइटी से साफ़ साफ़ दिख रहा था. बसंती की आधी चूची तो बाहर दिख रही थी. चांग ने तो कभी ये सोचा भी नही था कि उसकी माँ की चूची इतनी गोरी और बड़ी होगी. वो बोला - अच्छी है. अब तू यही पहन कर सोना. देखना गरमी नहीं लगेगी. उस रात बसंती सचमुछ आराम से सोई. लेकिन चांग का दिमाग माँ के बदन पर टिक गया था. वो आधी रात तक अपनी माँ के बदन के बारे में सोचता रहा. वो अपनी माँ के बदन को और भी अधिक देखना चाहने लगा. उसने उठ कर कमरे का लाईट जला दिया. उसकी माँ का गाउन बसंती के जांघ तक चढ़ चुका था. जिस से बसंती की गोरी चिकनी जांघ चांग को दिख रही थी. चांग ने गौर से बसंती की चूची की तरफ देखा. उसने देखा कि माँ की चूची का निपल भी साफ़ साफ़ पता चल रहा है. वो और भी अधिक पागल हो गया. उसका लंड अपनी माँ के बदन को देख कर खड़ा हो गया. वो बाथरूम जा कर वहां से अपनी सोई हुई माँ के बदन को देख देख कर मुठ मारने लगा. मुठ मारने पर उसे कुछ शान्ति मिली. और वापस कमरे में आ कर लाईट बंद कर के सो गया. सुबह उठा तो देखा माँ फिर से अपने पुराने कपडे पहन कर घर का काम कर रही है. लेकिन उसके दिमाग में बसंती का बदन अभी भी घूम रहा था.

उसने कहा - माँ, रात कैसी नींद आयी?

बसंती - बेटा, कल बहुत ही अच्छी नींद आयी. गाउन पहनने से काफी आराम मिला.

चांग - लेकिन, मैंने तो सिर्फ एक ही गाउन लाया. आगे रात को तू क्या पहनेगी?

बसंती - वही पहन लुंगी.

चांग - नहीं, एक और लेता आऊँगा. कम से कम दो तो होने ही चाहिए.

बसंती - ठीक है, जैसी तेरी मर्जी.

चांग शाम कारखाने से घर लौटते समय बाज़ार गया और जान बुझ कर झीनी कपड़ों वाली गाउन वो भी बिना बांह वाली खरीद कर लेता आया.

उसने शाम में अपनी माँ को वो गाउन दिया और कहा आज रात में सोते समय यही पहन लेना.

रात में सोते समय जब बसंती ने वो गाउन पहना तो उसके अन्दर सिवाय पेंटी के कुछ भी नही पहना. उसका सारा बदन उस पारदर्शी गाउन से दिख रहा था. यहाँ तक कि उसकी पेंटी भी स्पष्ट रूप से दिख रहे थे. उसकी गोरी चूची और निपल तो पूरा ही दिख रहा था. उस गाउन को पहन कर वो चांग के सामने आयी. चांग अपनी माँ के बदन को एकटक देखता रहा.

बसंती- देख तो बेटा, कैसा है, मुझे लगता है कि कुछ पतला कपडा है.

चांग - अरे माँ, आजकल यही फैशन है. तू आराम से पहन.

अचानक उसकी नजारा अपनी माँ के कांख के बालों पर चली गयी. कटी हुई बांह वाली गाउन से बसंती के बगल वाले बाल बाहर निकल गए थे.

चांग ने आश्चर्य से कहा - माँ , तू अपने कांख के बाल नही बनाती?

बसंती - नहीं बेटे, आज तक नहीं बनाया.

चांग - अरे माँ, आजकल ऐसे कोई नहीं रखता.

बसंती - मुझे तो बाल बनाना भी नही आता.

चांग - ला , मै बना देता हूँ.

बसंती आजकल चांग के किसी बात का विरोध नहीं करती थी. चांग ने अपना शेविग बॉक्स निकाला और रेजर निकाल कर ब्लेड लगा कर तैयार किया. उसने माँ को कहा- अपने हाथ ऊपर कर. उसकी माँ ने अपनी हाथ को ऊपर किया और चांग ने अपनी माँ के कांख के बाल को साफ़ करने लगा. साफ़ करते समय वो जान बुझ कर काफी समय लगा रहा था. और हाथ से अपनी माँ के कांख को बार बार छूता था. इस बीच इसका लंड पानी पानी हो रहा था. वो तो अच्छा था कि उसने अन्दर अंडरवियर पहन रखा था. किसी तरह से चांग ने कांपते हाथों से अपनी माँ के कांख के बाल साफ़ किये. बाल साफ़ करने के बाद बसंती तो सो गयी. मगर चांग को नींद ही नहीं आ रही थी. वो अपनी माँ के बगले में लेटे हुए अँधेरे में अपने अंडरवियर को खोल कर अपने लंड से खेल रहा था. अचानक उसे कब नींद आ गयी. उसे ख़याल भी नहीं रहा और उसका अंडरवियर खुला हुआ ही रह गया. सुबह होने पर रोज़ कि तरह बसंती पहले उठी तो वो अपने बेटे को नंगा सोया हुआ देख कर चौक गयी. वो चांग के लंड को देख कर आश्चर्यचकित हो गयी. उसे पता नहीं था कि उसके बेटे का लंड अब जवान हो गया है और उस पर बाल भी हो गए है. वो समझ गयी कि उसका बेटा अब जवान हो गया है. उसके लंड का साइज़ देख कर भी वो आश्चर्यचकित थी क्यों कि उसने आज तक अपने पति के लंड के सिवा कोई और जवान लंड नहीं देखा था. उसके पति का लंड इस से छोटा ही था. हालांकि उसके मन में कोई बुरा ख़याल नही आया और सोचा कि शायद रात में गरमी के मारे इसने अंडरवियर खोल दिया होगा. वो अभी सोच ही रही थी कि अचानक चांग की आँख खुल गयी और उसने अपने आप को अपनी माँ के सामने नंगा पाया. वो थोडा शर्मिंदा हुआ लेकिन आराम से तौलिया को लपेटा और कहा - माँ, चाय बना दे न.

बसंती थोडा सा मुस्कुरा कर कहा - अभी बना देती हूँ.

चांग ने सोचा - चलो माँ कम से कम नाराज तो नहीं हुई.

क्रमशः.....................

 
मा बेटे के सेक्स की कहानी--2

गतान्क से आगे................

सावधान........... ये कहानी समाज के नियमो के खिलाफ है क्योंकि हमारा समाज मा बेटे और भाई बहन के रिश्ते को सबसे पवित्र रिश्ता मानता है अतः जिन भाइयो को इन रिश्तो की कहानियाँ पढ़ने से अरुचि होती हो वह ये कहानी ना पढ़े क्योंकि ये कहानी एक मा बेटे के सेक्स की कहानी है

लेकिन उसकी हिम्मत थोड़ी बढ़ गयी. अगली ही रात को चांग ने सोने के समय जान बुझ कर अपना अंडरवियर पूरी तरह खोल दिया और एक हाथ लंड पर रख सो गया. सुबह बसंती उठी तो देखती है कि उसका बेटा लंड पर हाथ रख कर सोया हुआ है. उसने चांग को कुछ नही कहा और वो कमरे को साफ़ सुथरा करने लगी. उसने चांग के लिए चाय बनाई और चांग को जगाया. चांग उठा तो अपने आप को नंगा पाया ,.

चांग थोडा झिझकते हुए कहा - पता नहीं रात में अंडरवियर कैसे खुल गया था.

बसंती - तो क्या हुआ? यहाँ कौन दुसरा है? मै क्या तुझे नंगा नहीं देखी हूँ? माँ के सामने इतनी शर्म कैसी?

चांग - वो तो मेरे बचपन में ना देखी हो. अब बात दूसरी है.

बसंती - पहले और अब में क्या फर्क है ? यही ना अब थोडा बड़ा हो गया है और थोडा बाल हो गया है , और क्या? अब मेरा बेटा जवान हो गया है. लेकिन माँ के सामने शर्माने की जरुरत नहीं.

चांग समझ गया कि माँ को उसके नंगे सोने पर कोई आपत्ति नहीं है. अगले दिन रविवार है. शाम को चांग ने आधा किलो मांस लाया और माँ ने उसे बनाया . दोनों ने ही बड़े ही प्रेम से मांस और भात खाया. बसंती अब पूरी तरह से चांग की अधीन हो चुकी थी. बसंती अपने झीनी गाउन को पहन कर बिस्तर पर आ गयी. चांग वहां तौलिया लपेटे लेटा हुआ था. चांग ने अपनी जेब से सिगरेट निकाला और माँ से माचिस लाने को कहा. बसंती ने चुप- चाप माचिस ला कर दे दिया. चांग ने माँ के सामने ही सिगरेट सुलगाई और पीने लगा. बसंती ने कुछ नही कहा क्यों कि उसके विचार से सिगरेट पीने वाले लोग आमिर लोग होते हैं.

चांग - माँ, तू सिगरेट पीयेगी?

बसंती - नहीं रे .

चांग - अरे पी ले, मांस भात खाने के बाद सिगरेट पीने से खाना जल्दी पचता है. कहते हुए अपनी सिगरेट माँ को दे दिया. और खुद दुसरा सिगरेट जला दिया. बसंती ने सिगरेट से ज्यों ही कश लगाया वो खांसने लगी.

चांग ने कहा - आराम से माँ. धीरे धीर पी. पहले सिर्फ मुह में ले. धुंआ अन्दर मत ले. बसंती ने वैसा ही किया. 3 -4 कश के बाद वो सिगरेट पीने जान गयी. आज वो बहुत खुश थी. उसका गोरा बदन उसके काले झीने गाउन से साफ़ झलक रहा था.

चांग - कैसा लग रहा है माँ?

बसंती - कुछ पता नहीं चल रहा है. लेकिन धुआं छोड़ने में अच्छा लगता है.

चांग हंसने लगा. कुछ दिन यूँ ही और गुजर गए. बसंती अपने बेटे से धीरे धीरे खुलने लगी थी. चांग भी अब रोज़ सुबह नंगा ही पाया जाता था. चांग ने अब शर्माना सचमुच छोड़ दिया था. चांग ने अपनी माँ को ब्यूटी पार्लर ले जा कर मेक अप और हेयर डाई भी करवा दिया था. उसने अपनी का के मेक-अप के लिए लिपस्टिक, पाउडर क्रीम आदि भी लेता आया था. बसंती दिन ब दिन और भी खुबसूरत होती जा रही थी.

एक रात चांग ने सिगरेट पीते हुए अपनी माँ को सिगरेट दिया. बसंती भी सिगरेट के काश ले रही थी. बसंती काला वाला झीने कपडे वाला पारदर्शी गाउन पहन रखा था. उसका गोरा बदन उसके काले झीने गाउन से साफ़ झलक रहा था.

चांग - माँ एक बात कहूँ.

बसंती - हाँ बोल.

चांग - तू रोज़ गाउन पहन के क्यों सोती है? क्या तेरे पास ब्रा और पेंटी नहीं हैं?

बसंती - हाँ हैं, लेकिन तेरे सामने पहनने में शर्म आती है.

चांग - जब मै तेरे सामने नही शर्माता तो तू मेरे सामने क्यों शर्माती हो? इसमें शर्माने की क्या बात है? कभी कभी वो पहन कर भी सोना चाहिए. ताकि पुरे शरीर को हवा लग सके. दिल्ली में शरीर में हवा लगाना बहुत जरुरी है नहीं तो यहाँ के वातावरण में इतना अधिक प्रदुषण है कि बदन पर खुजली हो जायेंगे. देखती हो मै तो यूँ ही बिना कपडे के सो जाता हूँ.

बसंती - तो अभी पहन लूँ?

चांग - हाँ बिलकूल.

बसंती अन्दर गयी और अपना गाउन उतार कर एक पुरानी ब्रा पहन कर बाहर आ गयी. पुरानी पेंटी तो उसने पहले ही पहन रखी थी. बसंती को ब्रा और पेंटी में देख चांग का माथा खराब हो गया. वो कभी सोच भी नहीं सकता था कि उसकी माँ इतनी जवान है. उसका लंड खड़ा हो गया. उसके तौलिया में उसका लंड खड़ा हो रहा था लेकिन उसने अपने लंड को छुपाने की जरुरत नहीं समझी.

वो बोला - हाँ , अब थोड़ी हवा लगेगी. तेरे पास नयी ब्रा और पेंटी नहीं है?

बसंती - नहीं. यही है जो गाँव के हाट में मिलता था.

चांग - अच्छा कोई बात नहीं, मै कल ला दूंगा.

बसंती ने लाईट ऑफ कर दिया, लेकिन चांग की आँखों में नींद कहाँ? थोड़ी देर में जब उसे यकीं हो गया कि माँ सो गयी है तो उसने अपना तौलिया निकाला और अपने खड़े लंड को मसलने लगा. माँ के चूत और चूची को याद कर कर के उसने बिस्तर पर ही मुठ मार दिया. सारा माल उसके बदन पर एवं बिस्तर पर जा गिरा. एक बार मुठ मारने से भी चांग का जी शांत नहीं हुआ. 10 मिनट के बाद उसने फिर से मुठ मारा. इस बार मुठ मारने के बाद उसे गहरी नींद आ गयी. और वो बेसुध हो कर सो गया. सुबह होने पर बसंती ने देखा कि चांग रोज़ की तरह नंगा सोया है और आज उसके बदन एवं बिस्तर पर माल भी गिरा है. उसे ये पहचानने में देर नहीं हुई कि ये चांग का वीर्य है. वो समझ गयी कि रात में उसने मुठ मारा होगा. लेकिन वो जरा भी बुरा नहीं मानी. वो समझती है कि लड़का जवान है, एवं समझदार है इसलिए वो जो करता है वो सही है. वो कपडे पहन कर चांग के लिए चाय बनाने चली गयी. तभी चांग भी उठ गया. वो उठ कर बैठा ही था कि उसकी माँ चाय लेकर आ गयी. चांग अभी तक नंगा ही था.

बसंती ने कहा - देख तो, तुने तुने क्या किया? जा कर बाथरूम में अपना बदन साफ़ कर ले. मै बिछावन साफ़ कर लुंगी.

चांग बिना कपडे पहने ही बाथरूम गया. और अपने बदन पर से अपना वीर्य धो पोछ कर वापस आया तब उसने तौलिया लपेटा. तब तक बसंती ने वीर्य लगे बिछवान को हटा कर नए बिछावन को बिछा दिया.

उस दिन रविवार था. चांग बाज़ार गया और अपनी माँ के लिए बिलकुल छोटी सी ब्रा और पेंटी खरीद कर लाया. ब्रा और पेंटी भी ऐसी कि सिर्फ नाम के कपडे थे उसपर. पूरी तरह जालीदार ब्रा और पेंटी लाया. शाम में उसने अपनी माँ को वो ब्रा और पेंटी दिए और रात में उसे पहनने को बोला. रात को खाना खाने के बाद चांग ने सिगरेट सुलगाई और उधर उसकी माँ ने नयी ब्रा और पेंटी पहनी. उसे पहनना और ना पहनना दोनों बराबर था. क्यों कि उसके चूत और चूची का पूरा दर्शन हो रहा था. लेकिन बसंती ने सोचा जब उसके बेटे ने ये पहनने को कहा है तो उसे तो पहनना ही पड़ेगा. उसे भी अब चांग से कोई शर्म नही रह गयी थी. पेंटी तो इंतनी छोटी थी कि चूत के बाल बिलकुल बाहर थे. सिर्फ चूत एक जालीदार कपडे से किसी तरह ढकी हुई थी. ब्रा का भी वही हाल था. सिर्फ निपल को जालीदार कपडे ने कवर किया हुआ था लेकिन जालीदार कपड़ा से सब कुछ दिख रहा था. उसे पहन कर वो चांग के सामने आयी. चांग को तो सिगरेट का धुंआ निगलना मुश्किल हो रहा था. सिर्फ बोला - अच्छी है.

बसंती ने कहा - कुछ छोटी है. फिर उसने अपनी चूत के बाल की तरफ इशारा किया और कहा - देख न बाल भी नहीं ढका रहें हैं.

चांग - ओह, तो क्या हो गया. यहाँ मेरे सिवा और कौन है? इसमें शर्म की क्या बात है. खैर ! मेरे शेविंग बॉक्स से रेजर ले कर नीचे वाले बाल बना लो.

बसंती - मुझे नही आते हैं शेविंग करना. मुझे डर लगता है.

चांग - इसमें डरने की क्या बात है?

बसंती - कहीं कट जाए तो?

चांग - देख माँ, इसमें कुछ भी नहीं है. अच्छा , ला मै ही बना देता हूँ.

बसंती - हाँ, ठीक है.

.

बसंती ने उसका शेविग बॉक्स में से रेजर निकाला और चांग को थमा दिया. चांग ने उसके चूत के बाल पर हाथ घसा और उसे धीरे धीरे रेज़र से साफ़ किया.

उसका लंड तौलिया के अन्दर तम्बू के तरह खड़ा था. किसी तरह उसने अपने हाथ से चूत के बाल साफ़ किया. फिर उसने उसने अपनी माँ को सिगरेट दिया और खुद भी पीने लगा. वो लगातार अपनी माँ के चूची और चूत को ही देख रहा था और अपने तौलिये के ऊपर लंड को सहला रहा था.

चांग ने कहा - अब ठीक है. चूत के बाल साफ़ करने के बाद तू एकदम सेक्सी लगती है रे.

बसंती ने हँसते हुए कहा - चल हट बदमाश, सोने दे मुझे. खुद भी सो जा. कल तुझे कारखाना भी जाना है ना.

चांग ने अपना तौलिया खोला और खड़े लंड को सहलाते हुए कहा - देख ना माँ, तुझे देख कर मेरा लंड भी खडा हो गया है.

बसंती ने कहा - वो तो तेरा रोज ही खड़ा होता है. रोज की तरह आज भी मुठ मार ले.

चांग ने हँसते हुए कहा - ठीक है. लेकिन आज तेरे सामने मुठ मारने का मन कर रहा है.

बसंती ने कहा - ठीक है. आजा बिस्तर पर लेट जा और मेरे सामने मुठ मार ले. मै भी तो जरा देखूं कि मेरा जवान बेटा कैसे मुठ मारता है?

बसंती और चांग बिस्तर पर लेट गए. चांग ने बिस्तर पर अपनी माँ के बगल में लेटे लेटे ही मुठ मारना शुरू कर दिया. बसंती अपने बेटे को मुठ मारते हुए देख रही थी. पांच मिनट मुठ मारने के बाद चांग के लंड ने माल निकालने का सिग्नल दे दिया. वो जोर से आवाज़ करने लगा.उसने झट से अपनी माँ को एक हाथ से लपेटा और अपने लंड को उसके पेट पर दाब कर सारा माल बसंती के पेट पर निकाल दिया. ये सब इतना जल्दी में हुआ कि बसंती को संभलने का मौक़ा भी नही मिला. जब तक वो संभलती और समझती तन तक चांग का माल उसके पेट पर निकलना शुरू हो गया था. बसंती भी अपने बेटे को मना नही करना चाहती थी. उसने आराम से अपने शरीर पर अपने बेटे को अपना माल निकालने दिया. थोड़ी देर में चांग का माल की खुशबु रूम में फ़ैल गयी. बसंती का पेंटी भी चांग के माल से गीला हो गया. थोड़ी देर में चांग शांत हो गया. और अपनी माँ के बदन पर से हट गया. लेकिन थोड़ी ही देर में उसने अपनी माँ के शरीर को अच्छी तरह दबा कर देख चुका था. बसंती भी गर्म हो चुकी थी. उसने भी अपने पुरे कपडे उतारे और बिस्तर पर ही मुठ मारने लगी. उसने भी अपना माल निकाल कर शांत होने पर नींद मारी. सुबह होने पर बसंती ने आराम से बिछावन को हटाया और नया बिछावन बिछा दिया.

अगली रात को लाईट ऑफ कर दोनों बिस्तर पर लेट गए. बसंती ने चांग के पसंदीदा ब्रा और पेंटी पहन रखी थी. आज चांग अपनी माँ का इम्तहान लेना चाहता था. उसने अपनी टांग को पीछे से अपनी माँ की जांघ पर रखा. उसकी माँ उसकी तरफ पीठ कर के लेती थी. बसंती ने अपने नंगी जांघ पर चांग के टांग का कोई प्रतिरोध नहीं किया. चांग की हिम्मत और बढी. वो अपनी टांगो से अपनी माँ के चिकने जाँघों को घसने लगा. उसका लंड खडा हो रहा था. उसने एक हाथ को माँ के पेट पर रखा. बसंती ने कुछ नही कहा. चांग धीरे धीरे बसंती में पीछे से सट गया. उसने धीरे धीरे अपना हाथ अपनी माँ के पेंटी में डाला और उसके गांड को घसने लगा . धीरे धीरे उसने अपनी माँ के पेंटी को नीचे की तरफ सरकाने लगा.

पहले तो बसंती आसानी से अपनी पेंटी खोलना नही चाहती थी मगर चांग ने कहा - माँ ये पेंटी खोल ना. आज तू भी पूरी तरह से पूरी तरह से नंगी सोएगी. बसंती भी यही चाहती थी. उसने अपनी कमर को थोड़ा ऊपर किया जिस से कि चांग ने उसके पेंटी को उसके कमर से नीचे सरका दिया और पूरी तरह से खोल दिया. अब बसंती सिर्फ ब्रा पहने हुए थी. चांग ने उसके ब्रा के हुक को पीछे से खोल दिया और बसंती ने ब्रा को अपने शरीर से अलग कर दिया. अब वो दोनों बिलकूल ही नंगे थे. चांग ने अपनी माँ को पीछे से पकड़ कर अपने लंड को अपनी माँ के गांड में सटाने लगा. उसका तना हुआ लंड बसंती की गांड में चुभने लगा. बसंती को मज़ा आ रहा था. उसकी भी साँसे गरम होने लगी थी. जब बसंती ने कोई प्रतिरोध नही किया तो चांग ने अपनी माँ के बदन पर हाथ फेरना चालु कर दिया. उसने अपना एक हाथ बसंती की चूची पर रख उसे दबाने लगा.

क्रमशः.....................

 
मा बेटे के सेक्स की कहानी--3

गतान्क से आगे................

सावधान........... ये कहानी समाज के नियमो के खिलाफ है क्योंकि हमारा समाज मा बेटे और भाई बहन के रिश्ते को सबसे पवित्र रिश्ता मानता है अतः जिन भाइयो को इन रिश्तो की कहानियाँ पढ़ने से अरुचि होती हो वह ये कहानी ना पढ़े क्योंकि ये कहानी एक मा बेटे के सेक्स की कहानी है

उसने माँ से कहा - माँ, मेरा मुठ मारने का मन कर रहा है.

बसंती - मार ना. मैंने मना किया है क्या?

चांग - आज तू मेरा मुठ मार दे ना माँ.

बसंती - ठीक है . कह कर वो चांग की तरफ पलटी और उसके लंड को पकड़ ली. खुद बसंती को अहसास नही था की चांग का लंड इतना जबरदस्त है. वो बड़े ही प्यार से चांग का लंड सहलाने लगी. चांग तो मानो अपने सुध बुध ही खो बैठा. वो अपने आप को जन्नत में पा रहा था. बसंती अँधेरे में ही चांग का मुठ मारने लगी. बसंती भी मस्त हो गयी.

वो बोली - रुक बेटा , आज मै तेरा अच्छी तरह से मुठ मारती हूँ. कह कर वो नीचे झूकी और अपने बेटे चांग का लंड को मुह में ले ली. चाग को जब ये अहसास हुआ कि उसकी माँ ने उसके लंड को मुह में ले लिया है तो वो उत्तेजना के मारे पागल होने लगा. उधर बसंती चांग के लंड को अपने कंठ तक भर कर चूस रही थी. थोड़ी ही देर में चांग का लंड माल मिन्कालने वाला था.

वो बोला - माँ - छोड़ दे लंड को माल निकलने वाला है.

बसन्ती ने उसके लंड को चुसना चालु रखा. अचानक चांग के लंड ने माल का फव्वारा छोड़ दिया. बसंती ने सारा माल अपने मुह में ही भर लिया और सब पी गयी. अपने बेटे का वीर्य पीना का आनंद ही कुछ और था. थोड़ी देर में बसन्ती ने चांग के लंड को मुह से निकाल दिया. और वो बाथरूम जा कर कुल्ला कर के आई.

तब चांग ने कहा - माँ , तुने तो कमाल कर दिया.

बसन्ती ने बेड पर लेटते हुए कहा - तेरा लंड का माल काफी अच्छा है रे.

कह कर वो चांग कि तरफ पीठ कर के सोने लगी. मगर चांग का जवान लंड अभी हार नहीं मानने वाला था. उसने अपनी माँ को फिर से पीछे से पकड़ कर लपेटा और उसके बदन पर हाथ फेरने लगा. उसका लंड फिर खड़ा हो गया. इस बार उसका लंड बसंती की चिकनी गांड के दरार में घुसा हुआ था. ये सब उसके लिए पहला अनुभव था. वो अपनी माँ के गांड के दरार में लंड घुसा कर लंड को उसी दरार में घसने लगा. वो इतना गर्म हो गया की दो मिनट में ही उसके लंड ने माल निकालना चालु कर दिया और सारा माल बसंती के गांड के दरारों में ही गिरा दिया. उत्तेजना के मारे फिर से उसका बहुत माल निकल गया था.बसंती का गांड पीछे से पूरी तरह भींग गया. धीरे धीरे जब चांग का लंड शांत हुआ तो तो बसंती के बदन को छोड़ कर बगल लेट गया और थक के सो गया. इधर बसंती उठ कर बाथरूम गयी और अपने गांड को धोया और वो वापस बिना पेंटी के ही सो गयी. वो जानती थी कि चांग उससे पहले नहीं उठेगा और सुबह होने पर वो नए कपडे पहन लेगी. लेकिन वो भी गर्म हो गयी थी. काफी अरसे बाद उसके शरीर से किसी लंड का मिलन हुआ था. वो सोचने लगी कि उसके बेटे का लंड उसके पति से थोड़ा ज्यादा ही बड़ा और मोटा है. उसे भी अपने पति के साथ मस्ती की बातें याद आने लगी. ये सब सोचते हुए वो सो गयी. सुबह वो पहले ही उठी और कपडे पहन लिए. चांग ज्यों ही उठा उसकी माँ बसंती उसके लिए गरमा गरम कॉफी लायी और मुस्कुरा कर उसे दिया. चांग समझ गया कि आज की रात कहानी और आगे बढ़ेगी.

अगले दो दिन तक कारखाना बंद है. इसलिए उसने अपनी माँ को दिल्ली के पार्कों की सैर कराई. और नए कपडे भी खरीदवाया. शाम को उसने ब्लू फिल्म की सीडी लाया. आज उसकी माँ ने बड़े ही चाव से मुर्ग मस्सल्लम बनाया. दोनों ने नौ बजे तक खाना पीना खा पी कर बिस्तर पर चले आये. आज जिस तरह से चांग खुश को कर अपने माँ से छेड़-छाड़ कर रहा था उसे देख कर बसंती को अहसास हो रहा था कि आज फाइनल हो के ही रहेगा. अब वो भी अपने चूत में लंड का प्रवेश चाहती थी.

रात को बिस्तर पर आते ही चांग ने अपने सभी कपडे खोले और कहा - आज मै तुम्हे फिल्म दिखाऊंगा.

बसंती ने ब्रा और पेंटी पहनते हुए कहा - हिंदी तो मुझे समझ में आती नहीं. मै क्या समझूँगी फिल्म.

चांग - अरे, ये नंगी फिल्म है. इसमें समझने वाली कोई बात नही है.

चांग ने ब्लू फिल्म की सीडी चला दी. बसंती ब्रा और पेंटी पहन कर अपने बेटे के बगल में ही लेट गयी और फिल्म देखने लगी. फिल्म ज्यों ही अपने रंग में आने लगी चांग का लंड खडा होने लगा. बसंती भी फिल्म देख कर अकड़ने लगी. जब चांग ने देखा कि उसकी माँ भी मज़े ले कर ब्लू फिल्म देख रही है तो उसने कहा - ये क्या माँ, नंगी फिल्म कपडे पहन कर देखने की चीज थोड़े ही है? अपने ब्रा और पेंटी उतार दो और तब फिल्म देखो तब ज्यादा मज़ा आएगा.

बसंती ने बिना किसी हिचक के अपने बेटे के आदेश पर अपनी ब्रा को खोल दिया. यूँ तो चांग ने कई बार अपनी माँ की चुचियों झीनी ब्रा के पीछी से देखा था लेकिन इस प्रकार से खुले में कभी नही देखा था. इतने गोरे और बड़े मस्त चूची थी कि चांग का मन किया कि लपक कर चूची को चूसने लगूं . बसंती थोड़ा रुक गयी.

चांग ने कहा- पेंटी भी खोल दे ना.

बसंती ने कहा - तू जो है यहाँ.

चांग ने अब थोडा साहस एवं मर्दानगी दिखाते हुए अपने माँ की पेंटी को पकड़ा और नीचे की तरफ खींचते हुए कहा- अरे माँ, अब मुझसे कैसी शर्म?

बसंती ने भी कमर उठा कर पेंटी को खुल जाने दिया. बसंती की चूत गीली हो गयी थी. जिस चूत को चांग ने पारदर्शी पेंटी से देखा था आज वो उसके सामने बिलकूल खुली हुई थी. नंगी चूत को देख कर चांग की आवाज़ निकालनी ही बंद हो गयी. अब वो दोनों एक दूजे से सट कर बैठ गए और ब्लू फिल्म का आनंद उठाने लगे. चांग तो पहले भी कई बार ब्लू फिल्म देख चुका था. लेकिन बसंती पहली बार ब्लू फिल्म देख रही थी. चुदाई के सीन आते ही उसकी चूत इतनी गीली हो गयी कि उस से पानी टपकने लगा. इधर चांग भी अपने लंड को सहला रहा था. अपने माँ के नंगे बदन को देख कर उसका लंड भी काफी गीला हो रहा था.

उसने बसंती के हाथ को पकड़ा और अपने लंड पर रखा और कहा - इसे पकड़ कर फिल्म देख, कितना मज़ा आएगा.

उसकी माँ ने बड़े ही प्यार से चांग का लंड सहलाने लगी. अचानक चांग की नजर अपनी माँ की गीली चूत पर पड़ी. उसने बड़े ही आराम से अपनी माँ की चूत पर हाथ रखा और सहलाते हुए कहा - ये इतनी गीली क्यों है माँ?

बसंती ने कहा - चुदाई वाली फिल्म देख कर गीली हो रही है.

चांग ने अपनी माँ के बुर को सहलाना जारी रखा. उसके छूने से बसंती की हालत और भी खराब हो गयी. अपने दुसरे हाथ से उसने अपनी माँ की चूची को मसलना चालु किया. उधर टीवी पर लड़का एक लडकी की चूत को चूसने लगा. ये देख कर बसंती बोली - हाय देख तो , कैसे चूत चूस रहा है वो.

चांग - लड़की को चूत चुस्वाने में बहुत मज़ा आता है. बापू भी तो तेरी चूत चूसता होगा.

बसंती - नहीं रे, उसने कभी मेरी चूत नही चुसी.

चांग - आज मै तेरी चूत चूस कर बताता हूँ कि लड़की को कितना मज़ा आता है.

उसने अपनी माँ की दोनों चुचियों को चुसना चालु किया. बसंती को काफी मज़ा आ रहा था. चांग ने अपनी माँ के चुचियों को जबरदस्त तरीके से चूसा. फिर वो धीरे धीरे नीचे की तरफ गया. कुछ ही सेकेंड में उसने अपनी माँ के बुर के सामने अपनी नजर गड़ाई. क्या मस्त चूत थी उसकी माँ की. मादक सी खुशबू आ रही थी. उसने धीरे से अपने ओठ को माँ की चूत पर लगाया. उसकी माँ की तो सिसकारी निकलने लगी. पहले चांग ने बसंती के चूत को जम के चूसा. फिर उसने अपनी जीभ को बसंती की चूत में अन्दर डालने लगा. ऐसा देख कर बसंती की आँख मादकता के मारे बंद हो गयी. चांग ने अपनी पूरी जीभ बसंती के चूत में घुसा दी. बसंती की चूत से पानी निकल रहा था. अब वो दोनों ब्लू फिल्म क्या देखेंगे जब खुद ही वैसा मज़ा ले रहे हों. थोड़ी देर तक चांग बसंती की चूत को जीभ से चोदता रहा. बसंती को लग रहा था कि अब उसका माल निकल जाएगा. वो कराहते हुए बोली - बेटा , अब मेरा माल निकलने वाला है.

चांग - निकलने दे ना. आज इसे पियूँगा. जैसे कल तुने मेरा पिया था.

इसके पहले कि बसंती कुछ और बोल पाती उसके चूत के उसके माल का फव्वारा निकल पड़ा. चांग ने अपना मुह बसंती के चूत पर इस तरह से सटा दिया ताकि माल का एक भी बूंद बाहर नहीं गिर पाए. वो अपनी माँ के चूत का सारा माल पीने लगा. कम से कम 200 ग्राम माल निकला होगा बसंती के चूत से. चांग ने सारा माल पी कर चूत को अच्छी तरह से चाट कर साफ़ किया. उसकी माँ तो सातवें आसमान में उड़ रही थी. उसकी आँखे बंद थी. चांग उसके छुट पर से अपना मुह हटाया और उसके चूची को अपने मुह में भर कर चूसने लगा. बसंती मस्ती के मारे मस्त हुए जा रही थी.

थोड़ी देर चूची चूसने के बाद चांग ने बसंती को कहा - बसंती , तू कितनी मस्त है है रे.

बसंती - तू भी कम मस्त नहीं है रे. आज तक इतनी मस्ती कभी नहीं आई.

चांग ने कहा - बसंती, अभी असली मस्ती तो बांकी है.

बसंती ने कहा - हाँ बेटा, आजा और अब डाल दे अपने प्यारे लंड को मेरी प्यासी चूत में.

अब समय आ गया था कि शर्मो हया को पीछे छोड़ पुरुष और औरत के बीच वास्तविक रिश्ते को कायम करने की. चांग ने अपनी माँ के टांगो को फैलाया. अपने लंड को एक हाथ से पकड़ा और अपनी माँ की चूत में डाल दिया. उसकी माँ बिना किसी प्रतिरोध के अपने बेटे को सीने से लगाया और आँखों आखों में ही अपनी चूत चोदने का स्वीकृती प्रदान कर दी. चांग के लंड ने बसंती की चूत की जम के चुदाई की. कई साल पहले इसी चूत से चांग निकला था. आज उसी चूत में चांग का लंड समाया हुआ था. लेकिन बसंती की हालत चांग के लंड ने खराब कर दी. बसंती को यकीन नहीं हो रहा था कि जिस चूत में से उसने चांग को कभी निकाला था आज उसी चूत में उसी चांग ला लंड वो नही झेल पा रही थी. वो इस तरह से तड़प रही थी मानो आज उसकी पहली चुदाई थी. दस मिनट में उसने तीन बार पानी छोड़ा. दस मिनट तक दमदार शॉट मारने के बाद चांग का लंड माल निकाल दिया. उसने सारा माल अपनी माँ के चूत में ही डाल दिया. वो अपने माँ के बदन पर ही गहरी सांस ले कर सुस्ताने लगा. उसने अपना लंड माँ के चूत में ही पड़े रहने दिया. लगभग 10 मिनट के बाद चांग ला लंड फिर से अपनी माँ के ही चूत में खड़ा हो गया. इस बार बसंती का चूत भी कुछ फैल गया था. वो दोनों दुबारा चालु हो गए. इस बार लगभग 20 मिनट तक बसंती कि चूत की चुदाई चली. इस बार उसके चूत से 6 -7 बार पानी निकला मगर अब उसके चूत में पहले इतना दर्द नही हो रहा था. अब वो अपने बेटे से अपनी चूत की चुदाई का आनंद उठा रही थी. उसे अपने बेटे की मर्दानगी पर गर्व हो रहा था. बीस मिनट के बाद चांग का लंड जवाब दे दिया और पहले से भी अधिक माल अपनी माँ के चूत में छोड़ दिया.

रात भर में ही चांग ने अपनी माँ के साथ 5 बार चुदाई की जिसमे दो बार उसकी गांड की चुदाई भी शामिल थी.

उसी रात से चांग ने अपनी माँ को माँ नहीं कह कर बसंती कह कर बुलाना चालु कर दिया. बसंती ने अभी तक परिवार नियोजन का आपरेशन नहीं करवाया था. 20 -22 दिन के लगातार जम के चुदाई के बाद बसंती को अहसास हुआ कि वो पेट से हो गयी है. उसने चांग को ये बात बतायी. चांग उसे ले कर डाक्टर के पास गया. वहां उसने अपना परिचय बसंती के पति के रूप में दिया.

डाक्टर ने कहा - बसंती माँ बनने वाली है.

घर वापस आते ही बसंती ने फैसला किया कि वो इस बच्चे को जन्म नहीं देगी. लेकिन चांग ने मना किया.

बसंती बोली - कौन होगा इस बच्चे का बाप?

चांग ने कहा - यूँ तो ये मेरा खून है, लेकिन इस बच्चे का बाप मेरा बाप बनेगा.

बसंती - मै कुछ समझी नहीं.

चांग - देख बसंती, हम लोग किसी और जगह किराया पर मकान ले लेंगे. और लोगों को कहेंगे कि मेरा बाप आज से 20 -22 दिन पहले ही मरा है. बस मै यही कहूँगा कि उसने मरने से पहले तुझे पेट से कर दिया था. फिर इस दिल्ली में किसे किसकी परवाह है ? और हम दोनों अगले कई साल तक पति - पत्नी के रूप में रहेंगे. और ये बच्चा मेरे भाई या बहन के रूप में रहेगा. इस बच्चे के जन्म के बाद तू परिवार नियोजन करवा लेना ताकि हमारे बीच कोई और ना आ सके.

इतना सुनने के बाद बसंती ने चांग को अपनी चूची से सटा लिया. उस दिन 7 घंटे तक चांग अपनी माँ , मेरा मतलब है अपनी नयी पत्नी को चोदता रहा.

दो दिन बाद ही चांग ने अपने लिए दुसरे मोहल्ले में किराया पर मकान खोज लिया और बसंती को ले कर वहां चला गया. थोड़े ही दिन में उसे बगल के ही फैक्ट्री में पहले से भी अच्छी जॉब लग गयी. आस पास के लोगों को उसने बताया कि ज्यों ही उसके बापू का निधन हुआ त्यों ही पता चला कि उसकी माँ पेट से है. थोड़े ही दिन में लोग यही समझने लगे कि चांग की माँ को उसके पति ने पेट से कर के दुनिया से चल बसा. और सारी जिम्मेदारी चांग पर छोड़ दी. ठीक समय पर बसंती ने अपने बेटे चांग की बेटी को अपनी कोख से जन्म दिया. इस प्रकार वो बच्ची हकीकत में चांग की बेटी थी लेकिन दुनिया की नजर में वो चांग कि बहन थी. अगले 5 - 6 सालों तक चांग और बसंती जमाने से छुप छुप कर पति पत्नी के समबन्धों को कायम रखते हुए जिस्मानी सम्बन्ध बनाए रखा. उसके बाद चांग ने लोक- लाज की भय तथा बड़ी होती बेटी के सवालों से बचने के लिए अपनी माँ को ले कर मुंबई चला गया और वहां अपनी माँ को अपनी पत्नी बता कर सामान्य तरीके से जीवन यापन गुजारने लगा. बसंती भी अपने बेटे को अपना पति मान कर आराम सी जीवन गुजारने लगी. अब बसंती का पति खुद उसका बेटा चांग ही था जो उस से 15 साल का छोटा था.

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end...........................

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मामी की मस्त चुदाई

प्रेषक : सेक्सी कुमार

यह मेरी पहली और सच्ची कहानी है। मैं दिल्ली का रहने वाला हूँ, उम्र 21 साल है पर मुझे देखने पर ऐसा नहीं लगता कि मैं 21 साल का हूँ। मेरे लंड का आकार 5"5 इंच है।

मेरा और मेरे मामा का परिवार एक साथ रहता था। मेरे मामा की शादी को 2 साल हो गए थे पर उनके अभी तक कोई भी बच्चा नहीं था। मेरे मामा एक कंपनी में काम करते थे जिससे वो कई बार 2-4 दिन तक घर नहीं आते थे। मेरी मामी साक्षी, दिखने में काफी सेक्सी लगती हैं उनके दूध (चूची) काफी सेक्सी और गोल हैं, उन्हें देखते ही मन करता था कि अभी दबा दूँ इन्हें और पी लूँ इनका दूध।

कई बार जब वो कोई घर का काम करने के लिए झुकती तो मुझे उनके दूध के दर्शन हो जाते थे और मैं उन्हें देखता ही रहता था। मेरी मामी को यह बात पता थी कि मैं उनके दूध देखता हूँ पर वो कभी कुछ नहीं बोलती। मैं उन्हें चोदने की सोचता रहता था पर डरता था कि कहीं घर पर सब को ना बता दें और उनके नाम की मुठ मार लेता और अपने लंड महाराज को शांत कर लेता। कभी मौका मिलता तो उनकी पैंटी को उठा कर सूंघता, उसमें से बहुत ही मादक खुशबू आती थी और मुठ मार लेता। वैसे अक्सर मुझे उनकी पैंटी मिल जाती थी क्योंकि वो सुबह नहाने के बाद पैंटी निकाल देती और सारे कपड़े शाम को धोती थी।

यह बात पिछली गर्मियों के उस दिन की है जब घर पर कोई नहीं था, सिर्फ मैं और मामी ही थे, सभी लोग गए हुए थे, 3 दिन में लौटने वाले थे। सभी सुबह ही चले गए थे तो मैंने और मामी ने मिल कर घर का सारा काम कर लिया और दोपहर में आराम करने लगे। मामी को लेटते ही नींद आ गई तो मैंने सोचा कि क्यों न कोई मूवी देखी जाये।

मैंने अपना कंप्यूटर चालू किया और धूम-2 देखने लगा। इतने में ही मुझे ध्यान आया कि कंप्यूटर में एक ब्लू फिल्म पड़ी है और मैं वो देखने लगा। मेरा कंप्यूटर मैंने अपने बिस्तर के पास ही रख रखा था। और उस दिन मैं और मामी एक ही बिस्तर पर थे।

मैं मूवी देख रहा था तो मुझे लगा कि मामी जगी हुई है। थोड़ी देर बाद मैंने अपना कंप्यूटर बंद कर दिया और लेट गया मामी के साथ ही।

उन्होंने दिन में भी मैक्सी पहन रखी थी जो काफी ढीली-ढाली थी। मैक्सी में से उनके दूध बाहर निकल रहे थे। तो मैंने सोने का नाटक करके अपना एक हाथ उन पर रख दिया। और धीरे-धीरे उन्हें दबाने लगा। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, मैं उन्हें दबाता रहा। मेरा लंड पैंट के अन्दर से ही सलामी दे रहा था और पैंट फाड़ कर बाहर आने को हो रहा था।

इतने में ही उनकी आँख खुल गई तो मैंने अपना हाथ वहीं रोक लिया और सोने का नाटक करने लगा। पर उन्हें पता लग गया था कि मैं सो नहीं रहा, सिर्फ नाटक कर रहा हूँ।

वो फिर सो गई पर अब मैं समझ गया था कि वो भी सो नहीं रही, सिर्फ नाटक कर रही थी, जिससे मेरी हिम्मत और भी बढ़ गई और थोड़ी ही देर बाद मैंने फिर अपना हाथ उनके दूध पर रख दिया और उन्हें दबाने लगा। इस बार मैं कुछ ज्यादा ही जोर से दबा रहा था।

एकदम से उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और आँख खोल ली और मेरा भी सोने का नाटक का राज खुल गया और उनका भी।

बस फिर क्या था मैंने सीधे ही उनके दूध दबाने शुरु कर दिए। उन्हें भी काफी मज़ा आ रहा था इसमें।

धीरे-धीरे मेरे हाथ उनकी चूत की तरफ जाने लगे। जैसे ही मेरा हाथ उनकी पैंटी पर लगा तो मुझे कुछ गीला-गीला सा लगा।मैंने पैंटी के ऊपर से ही उनकी चूत सहलानी शुरु कर दी। अब मैंने उनकी मैक्सी उतार दी, अब वो मेरे सामने सिर्फ पैंटी में थी।

वो क्या लग रही थी लाल पैंटी में ! मैं आप को बता नहीं सकता।

अब उन्होंने मेरे कपड़े उतारने शुरु कर दिए। उन्होंने मेरे लंड को अंडरवियर के ऊपर से ही पकड़ लिया और उसे दबाने लगी और फिर उन्होंने अपने हाथों से मेरे अंडरवियर को उतार दिया। अब मैं उनके सामने बिलकुल नंगा था। उन्होंने नीचे बैठ कर मेरा लंड अपने मुँह में ले लिया और उसे लॉलीपोप की तरह चूसने लगी।

मुझे काफी मज़ा आ रहा था, मेरे मुँह से .....ओह....ओह....अह....अह.... जैसी आवाज़ आ रही थी।

कुछ देर बाद मैंने उनकी पैंटी उतार दी ! क्या चूत थी उनकी ! एकदम गुलाबी, जैसे आज तक कभी न चुदी हो और काफी उभरी हुई, उस पर एक भी बाल नहीं था जैसे आज ही साफ़ किए हों।

मैं देखते ही उनकी चूत पर टूट पड़ा और हम 69 की मुद्रा में आ गए। काफी देर तक हम एक दूसरे को चूसते रहे। वो कभी मेरे लंड का सुपारा होठों से दबा कर तो कभी जीभ से सहला कर मजे ले रही थी। मुझे बड़ा मजा आ रहा था। मैं भी उसकी चूत के दाने को तो कभी चूत के दोनों होंठ चाट रहा था जिससे उसे भी मजा आ रहा था और उसके मुँह से सिसकारी निकल रही थी- ओह... ओह.... अह.... अह....

और ऐसा सुन कर मैं और भी उत्तेजित होता जा रहा था। हम लगभग 30 मिनट तक इसी मुद्रा में रहे। और हम दोंनो ही एक साथ झड़ गए और एक दूसरे के माल को पी गए।और जब अलग हुए तो देखा कि 5 बज गए थे तो मुझे दूध (भैंस का दूध) लेने के लिए जाना पड़ा। वो घर का काम करने लग गई।

उस दिन घर का सारा काम जल्दी-जल्दी कर लिया, 8 बजे डिनर कर लिया और उसके बाद एक दम फ्री हो गए और बडरूम में आ गए।

और फिर शुरु हुआ खेल लंड और चूत का। मामी मेरे लंड से लगभग दस मिनट खेलती रही। फिर मैंने उन्हें सीधा लिटा दिया और उनकी चूत चाटने लगा। क्या स्वाद था उनकी चूत में ! मैं उनकी चूत के दोंनो होठों को चाट रहा था और उनके मुँह से लगातार आवाजें आ रही थी- आह....ओह....अह....अह....ओह.....अह....अह.....ओह....अह....अह....

अब उन्होंने कहा- अब रहा नहीं जाता, डाल अपना लंड मेरी चूत में और बना इसका भरता। साली बहुत परेशान करती है यह तुम्हारी मामी को।

इतना सुनते ही मैं उठा, उनके पैरों को ऊपर करके फ़ैलाया और उनकी चूत पर अपना लंड रख कर रगड़ने लगा। उनकी चूत काफी संकरी थी दो साल शादी को होने के बाद भी।

मैंने उनकी चूत को थोड़ा और फ़ैला कर अपना लंड चूत पर रखा और एक जोर का झटका मारा तो मेरे लंड का सुपारा ही अन्दर जा पाया और उनके मुँह से सिसकी निकली। पर इतने में ही मैंने एक और झटका मारा और मेरा आधे से भी ज्यादा लंड उनकी चूत में समां गया। मैं अन्दर-बाहर करने लगा। 10-12 झटकों के बाद ही मैंने एक और जोरदार झटका मारा और मेरा पूरा लंड उनकी चूत की गहराई में समां गया।

थोड़ी ही देर बाद वो भी नीचे से मेरा साथ देने लगी और पूरे कमरे में फचा-फच की आवाज़ गूंज गई। हमारा यह कार्यक्रम 30 मिनट तक चला और उसके बाद उनकी चूत ने पानी छोड़ दिया। वो बिलकुल निढाल हो गई पर मेरा काम अभी नहीं हुआ था। मैंने अपनी गति बढ़ा दी और 15-20 झटकों के बाद मैंने भी अपना पानी छोड़ दिया और उनकी चूत को अपने पानी से भर दिया।

मैं उनके ऊपर ही गिर गया पर मैंने अपना लंड उनकी चूत से नहीं निकाला। हम 20 मिनट इसी मुद्रा में रहे होंगे।

मैंने उस पूरी रात में उन्हें चार बार और चोदा अलग अलग मुद्रा में और जब तक हमारे घर वाले नहीं आये तब तक हमारा यही कार्यक्रम चलता रहा।

हाँ ! उस रात मैंने उनकी गांड का भी मज़ा चखा।

तो कैसी लगी मेरी कहानी? जरूर बताना आप अपनी राय और सुझाव ताकि मैं और कहानियाँ लिख सकूँ।

 
मैं और मेरी प्यारी शिष्या

प्रेषक : टॉंम हूक

मेरा नाम अनुज है, मैं बंगलोर की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता हूँ। हिंदी सेक्सी कहानियां पर काफी समय हो गया कहानियाँ पढ़ते हुए तो सोचा कि क्यों न अपनी कहानी आपको सुनाऊँ !

यह बात तब की है जब मैं अपनी मास्टर डिग्री पूरी कर रहा था। पढाई में अच्छा था तो खाली समय में टयूशन पढ़ा लेता था। मुझे किसी के रेफेरेंस से एक टयूशन मिली। वो एक लड़की थी जिसका नाम तनवी था, वो स्नातिकी कर रही थी। जब पहली बार मैंने उसे देखा तो बस देखता ही रह गया। मन ही मन उस इंसान को शुक्रिया कहने लगा जिसने मुझे उससे मिलवाया था। जिसे आप सम्पूर्ण लड़की कह सको, बिल्कुल वैसी थी तनवी। जवानी पूरे जोर से छाई थी उस पर .. कातिलाना आँखें, भरे-भरे स्तन, करीब 28 इन्च की कमर और एकदम मक्खन जैसे होंठ.. और उसके कपड़े- उफ्फ्फ ! क्या कहूँ .. गहरी वक्ष-रेखा बहुत आराम से आपको निहारती थी..

खैर टयूशन शुरू हुई.. वो मेरे ही घर आती थी पढ़ने.. घर पर सब होते थे और सबको पता था कि वो पढ़ने आती है तो एक कमरा हम दोनों के लिए खाली रखा जाता था। फिर ऐसे ही चलता रहा, वो पढ़ने आती रही..

धीरे-धीरे हम दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई। हम इधर-उधर की बातें भी करने लगे पढाई के साथ साथ। कभी कभी मैं उसके गालों को खींच देता जब वो कोई गलती करती पढ़ाई में..

कभी कभी हम दोनों के हाथ भी टकरा जाते कुछ समझाते हुए। उसने कभी कुछ भी नहीं कहा.. जब भी मैं उससे छू जाता तो पूरे शरीर में सिहरन दौड़ जाती थी.. उसके बारे में सोच-सोच कर कई बार मैंने रात को मुठ भी मारा था.. मन करता किसी दिन वो हाँ कर दे तो उसके साथ एक भरपूर सेक्स का मज़ा लूँ ! उसकी आँखों को देख कर लगता था कि वो सब समझती है।

एक बार की बात है मेरे घर वालों को बाहर जाना था। मैं नहीं गया, मेरा मन नहीं था जाने का।

तनवी हमेशा फोन करके आती थी। उस दिन भी उसका फोन आया पर यह बात मैंने तनवी को नहीं बताई कि घर पर कोई नहीं है।

वो आई, बोली- अंकल-आंटी सब कहाँ गए?

मैंने बोल दिया- बाज़ार गए है..

फिर हम पढ़ने बैठ गए हमेशा की तरह। लेकिन मैंने उससे कहा- आज सोफे पर बैठ कर पढ़ेंगे..

वो बोली- क्यों?

मैंने कहा- आज मेज़-कुर्सी पर बैठने का मन नहीं है..

तो उसने कहा- ठीक है..

फिर हम दोनों एक ही सोफे पर बैठ गए.. एक तरफ़ वो, दूसरी तरफ़ मैं ..

उस दिन पढ़ते हुए उसने कुछ गलती की तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा- आज तुमको इस गलती की बड़ी सजा मिलेगी..

तो इस पर वो बोली- क्या?

यह सुनकर मैंने उससे एकदम से अपनी ओर खींच लिया..

वो एकदम से खुद को संभाल नहीं पाई और मेरे ऊपर आ कर गिरी, उसके स्तन मेरे सीने पर थे, लगा जैसे पूरे शरीर में बिजलियाँ दौड़ गई हों..

फिर हम दोनों एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे..

वो बोली- छोड़ो ना..

मैंने कहा- तनवी, कब से इस दिन का इंतज़ार किया है ! आज छोड़ने को मत कहो..

वो बोली- मतलब?

मैंने कहा- तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो.. मैं तुम्हें प्यार करना चाहता हूँ..

वो बोली- मुझे पता है ! बस तुम्हारे मुँह से सुनना चाह रही थी..

यह कह कर उसने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए.. यह पहली बार तो नहीं था कि मैं किसी लड़की को चूम रहा था पर फिर भी इतने नर्म होंठ मैंने कभी चूमे नहीं थे..

वो अपने मुलायम होंठों से मेरे होंठों को चूसने लगी..

मैंने उससे बाहों में भर रखा था..

हम करीब 15 मिनट तक एक दूसरे के होंठों को चूसते रहे, फिर वो बोली- छोड़ो ! कोई आ जाएगा ..

तब मैंने उसे बताया- कोई नहीं आएगा ! सब शहर से बाहर गए हैं..

तो वो समझ गई कि मैंने उससे झूठ कहा था, बोलो- नौटी बॉय !

और कह कर फिर से मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए..

इस बार पता नहीं मुझे क्या हुआ कि मैं उसे पागलों की तरह चूमने लगा .. उसकी टी-शर्ट के ऊपर से उसके स्तन दबाने लगा ..

उसके मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगी.. वो मुझसे कस कर चिपक गई.. मैं उसकी टी-शर्ट ऊपर करने लगा... और उसकी नंगी पीठ पर हाथ फिराने लगा.. उसकी सिसकारियाँ बढ़ने लगी.. मैंने उसकी टी-शर्ट निकल दी.. उसकी काले रंग की ब्रा पहनी थी.. उसमें से उसके गोरे-गोरे स्तन बाहर निकल कर मुझे छूने को आमंत्रित कर रहे थे..

मैंने भी उनको जल्दी से उस ब्रा से आज़ाद कर दिया..

इतने भरे-पूरे मम्मे मैंने कभी नहीं देखे थे.. मैं उनको दबा-दबा कर चूसने लगा..

उसकी सिसकारियाँ सुन-सुन कर मेरा जोश बढ़ जाता और मै उनको ज्यादा जोर से दबा-दबा कर चूसने लगता..

इसी बीच मैंने उसका हाथ अपने लंड पर महसूस किया, मैंने देर न करते हुए अपनी टी-शर्ट और पैंट उतार दी.. अब मै सिर्फ जॉकी की चड्डी में उसके सामने था..

वो अपनी कैपरी उतारने लगी तो मैंने कहा- मुझे उतारने दो..

फिर मैंने उसकी कैपरी उतार दी..

अब हम दोनों सिर्फ चड्डी में थे एक दूसरे के सामने..

हम दोनों एक दूसरे से चिपक गए और प्रगाढ़ चुम्बन करने लगे..

वह अपना हाथ मेरी चड्डी में डाल कर मेरे लौंडे से खेलने लगी।

मेरे लौड़े का बुरा हाल हो रहा था .. इतना ज्यादा तन चुका था कि दर्द होने लगा लौड़े में..

अब मैंने उसको बोला- इसको प्यार करो ना..

तो उसने प्यार से मेरे लौड़े पर एक चुम्बन ले लिया..

मैंने बोला- ऐसे नहीं ! इसको मुँह में लेकर लॉलीपोप की तरह चूसो, तब इसको अच्छा लगेगा..

पहले तो उसने मना किया लेकिन मेरे कहने पर मुँह में ले लिया फिर धीरे धीरे उसको मज़ा आने लगा और वो बुरी तरह मेरे लौड़े को चूसने लगी..

मेरी सिसकारियाँ निकलने लगी तो वो और भी ज्यादा जोर से चूसने लगी लौड़े को.. बोली- आज इस लॉलीपोप को मैं खा जाउंगी..

मैं हंस पड़ा..

फिर मैं उसकी चड्डी के ऊपर से ही उसकी चूत को सहलाने लगा..वो गीली हो चुकी थी..

ऊपर से सहलाने के बाद मैंने उसकी चड्डी उतार दी तो देखा उसकी चूत पर बहुत ही हल्के हल्के बाल थे और गुलाबी सी चूत की दो फाकों को देख कर लग रहा था कि किसी ने अभी तक इन्हें छुआ भी नहीं होगा !

मैंने आव देखा ना ताव ! और उस पर मुँह रख दिया.. अपनी जीभ से उसकी चूत को चाटने लगा ..

तो वो पागल सी हो उठी.. बोली- चाटो आआआअ ह्ह्ह्हह्हह्ह्ह और ज़ोर से आआ अह्ह्ह्हह्ह्ह चाटो...

मैं चाटता रहा, फिर वो झड गई...

मेरी हालत ख़राब हो रही थी, अभी मेरा नहीं निकला था.. मैंने उसको कहा- मैं तुम्हारी चूत में अपना लौड़ा डाल रहा हूँ !

तो वो बोली- नहीं यह मत करो प्लीज !तो मैं बोला- मेरा क्या होगा ? मेरा तो निकला भी नहीं अभी तक..

तो वो बोली- मैं कुछ करती हूँ..

यह कह कर वो मेरे लौड़े को ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी और अपने हाथों से मेरा मुठ मारने लगी..

मैंने भी कई बार मुठ मारा था पर उसके कोमल कोमल होंठों और हाथों से मुठ मरवाने में अलग ही मज़ा आ रहा था..

मैं बोला- और जोर से चूसो ! और जोर से मुठ मारो..

तो उसने और जोर जोर से मेरा मुठ मारना शुरू कर दिया। करीब पाँच मिनट बाद मेरा माल निकल पड़ा.. वो सारा माल मैंने उसकी चूचियों पर गिरा दिया ..

और वो हंसने लगी और बोली- यह क्या किया..?

मैं भी हँसने लगा..

फिर मैंने उसे बाहों में ले लिया और हम दोनों ज़मीन पर लेट गए और ऐसे ही पड़े रहे बहुत देर तक !

उसके बाद उसने कहा- अब मुझे जाना है..

मैंने कहा- पहले मुझे तुम्हारी चूचियाँ साफ़ करने दो..

फिर मैंने एक गीले कपड़े से उसके वक्ष को मल-मल कर साफ़ किया..

फिर उसने कपड़े पहने और मुझे चूमा..

फिर वो चली गई अगले दिन आने का बोलकर..

घर वाले तीन दिन बाद वापस आने वाले थे.. अभी २ दिन और थे दोस्तो ..

तो यह थी कहानी मेरी और मेरी शिष्या तनवी की..

हमने अगले दो दिनों में क्या-क्या किया ! वो अगली बार..

अपनी राय मुझे लिखें !
 
ससुरजी ने की बहु की चुदाई

रात के 12 बज चुके थे। छोटे से गाँव राजापुर में बहूत ही सन्नाटा छ गया था। राजापुर गरीब की बस्ती है। इसी बस्ती के एक कोने में हरिया का घर है। हरिया एक गरीब किसान है। हरिया अपने घर के एक अँधेरी कोठरी में अक्सर की तरह अपनी बीबी की चुदाई में मशगुल था। हरिया की उमर 50 साल की है। और उसकी बीबी की उमर 45 साल की है। हरिया अपनी बीबी की चूत में लंड डाल कर काफ़ी देर तक उसकी चुदाई कर रहा था। उसकी बीबी मुन्नी बिना किसी ख़ास उत्तेजना के अपने दोनों पैर फैला कर यूँ ही पड़ी थी जैसे की उसे हरिया के बड़े लंड की कोई परवाह ही न हो या फिर कोई तकलीफ ही न हो रही है। केवल हर धक्के पर धीमे से आह आह की आवाज निकल रही थी। मुन्नी की बुर कब का पानी छोड़ चुका था। थोडी ही देर में हरिया का लंड से माल निकलने लगा तो वो भी आह आह कर के मुन्नी के चूची पे अपना मुह रख दिया और उसके बदन पर लेट गया । वो मुन्नी की बेजान चूची को उसने मुह में ले कर चूसने लगा। थोड़ी देर के बाद उसने अपना लंड मुन्नी के बुर से निकाला और बगल में लेट गया। उसने अपनी बीडी जलाई और पीने लगा। मुन्नी उसके लटक रहे लंड को अपने हाथों में ले लिया और उस को सहलाने लगी। लेकिन अब हरिया के लंड में कोई उत्साह नही था। वो एक बेजान लत की तरह मुन्नी के हाथो का खिलौना बना हुआ था।

मुन्नी के कहा - एक बार और चोदो न. कुछ पता भी नहीं चला कि कब मेरा माल निकल गया.

हरिया- नहीं अब नहीं, तेरी चूत अब एकदम सुखी हो गयी है. तेरे चूत से पानी निकल जाता है . एकदम बेजान चूत हो गयी है तेरी. तेरे चूत कि चुदाई में अब कुछ मज़ा नही आता. गीली चूत चोदने का मज़ा ही कुछ और था.

मुन्नी ने मन मसोस कर हरिया के लंड को अपने मुह में ले कर चूसने लगी कि कहीं शायद ये फिर से खड़ा हो जाए और एक बार और चुदाई कर दे. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. कुछ देर चूसने के बाद भी हरिया का लंड लटकता ही रहा. थक हार कर मुन्नी बगल में चुपचाप लेट गयी. हरिया उसकी एक चूची को यूँ ही बेमन से दबा रहाथा और किसी और विचार में खोया हुआ था.

अचानक मुन्नी ने कहा- जानते हो जी ! आज क्या हुआ?

हरिया ने कहा- क्या?

मुन्नी ने कहा- रोज़ की तरह आज में और मालती ( मुन्नी की बहु) सुबह शौच करने खेत गए । वहां हम दोनों एक दुसरे के सामने बैठ कर पैखाना कर थे.... तभी मैंने देखा की मालती अपने बुर में ऊँगली घुसा कर मुठ मारने लगी। मैंने पूछा ये क्या कर रही है तू? तो उसने मेरी पीछे की तरफ़ इशारा किया और कहा जरा उधर तो देखो अम्मा। मैंने पीछे देखा तो एक कुत्ता एक कुतिया पे चढा हुआ है। मैंने कहा- अच्छा, तो ये बात है। मालती ने कहा- देख कर बर्दाश्त नही हुआ इसलिए मुठ मार रही हूँ। मैंने कहा - जल्दी कर, घर भी चलना है। मालती ने कहा- हाँ अम्मा , बस अब निकलने ही वाला है। और एक मिनट हुए भी ना होंगे की उसके बुर से इतना माल निकलने लगा की एक मिनट तक निकलता ही रहा। मैंने पूछा- क्यों री , कितने दिन का माल जमा कर रखा था? उसने कहा- कल दोपहर को ही तो निकाला था। मैंने भी सोचा- कितना जल्दी इतना माल जमा हो जाता है।

हरिया ने कहा- वो अभी जवान है ना। अभी तो बेचारी 20 साल की भी ठीक से नहीं हुई है. और फिर उसकी गर्मी शांत करने के लिए अपना बेटा भी तो यहाँ नही है ना। कमाने के लिए परदेश चला गया। अरे में तो मना कर रहा था। ३ महीने भी नही हुए उसकी शादी को और अपनी जवान पत्नी को छोड़ कमाने बम्बई चला गया। बोला अच्छी नौकरी है। अभी बताओ चार महीने से आने का नाम ही नही है। बस फोन कर के हालचाल ले लेता है। अरे फोन से बीबी की गर्मी थोड़े ही शांत होने वाली है? अब उसे कौन कहे ये सब बातें खुल के?

थोडी देर शांत रहने के बाद मुन्नी फिर से हरिया के लंड को हाथ में ले कर खेलने लगी।

हरिया ने मुन्नी की चूची को दबाते हुए उस से पूछा- क्या तुम रोज़ ही उसके सामने बैठ के पैखाना करती हो?

मुन्नी ने कहा- हाँ।

हरिया- तब तो तुम दोनों एक दूसरे का बुर रोज़ देखती होगी।

मुन्नी- हाँ, बुर क्या पूरा गांड भी देखा है हम दोनों ने एक दूसरे का। बिलकूल ही पास बैठ कर पैखाना करते हैं।

हरिया- अच्छा , एक बात तो बता। उसका बुर तेरी तरह काला है या गोरा?

मुन्नी- पूरा गोरा तो नही है लेकिन मेरे से साफ़ है। मुझे उसके बुर पर के बाल बड़े ही प्यारे लगते हैं। बड़े बड़े और लहरदार रोएँ की तरह बाल। एक बार तो मैंने उसके बाल भी छुए हैं।

हरिया- क्यों?

मुन्नी- बस यूँ ही एक दिन मैंने कहा कि तेरी चूत की बाल इतनी लहरदार क्यों है? ज़रा छू कर देखूं तो. और उस दिन मैंने उसके चूत के बाल को छू कर देखा था.

हरिया- बुर कैसा है उसका?

मुन्नी- बुर क्या है लगता है मानो कटे हुए टमाटर हैं। एक दम फुले -फुले, लाल -लाल।

अचानक मुन्नी ने महसूस किया की हरिया का लंड खड़ा हो रहा है। वो समझ गई की हरिया को मज़ा आ रहा है।

वो बोली- अच्छा ,एक बात तो बताओ।

हरिया बोला- क्या?

मुन्नी- क्या तुम उसे चोदोगे?

हरिया- ये कैसे हो सकता है?

मुन्नी- क्यों नही हो सकता है? वो जवान है । अगर गर्मी के मारे किसी और के साथ भाग गई तो क्या मुह दिखायेंगे हमलोग गाँव वालों को? अगर तुम उसकी गर्मी घर में ही शांत कर दो तो वो भला किसी दूसरे का मुह क्यों देखेगी। जब वो किसी कुत्ते-कुतिया को देख कर मुठ मार सकती है तो वो किसी के साथ भी भाग सकती है। कितना नजर रख सकते हैं हम लोग? थोड़े दिन की तो बात है । फिर हमारा बेटा मोहन उसे अपने साथ बम्बई ले जाएगा तब तो हमें कोई चिंता करने की जरूरत तो नही है न।

हरिया- क्या मालती मान जायेगी?

मुन्नी ने कहा- कल रात को में उसे तुम्हारे पास भेजूंगी। उसी समय अपना काम कर लेना।

हरिया का लंड पूरा जोश में आ गया।

उसने मुन्नी की बुर में अपना लंड डालते हुए कहा- तुने तो मुझे गरम कर दिया रे।

मुन्नी ने मुस्कुरा कर अपनी दोनों टांगें फैला दी और जान बुझ कर जोर जोर से आह आह की आवाज़ निकने लगी। हालंकि उसे कोई ख़ास दर्द नही हो रहा था लेकिन वो अपनी बहु को सुनाने के लिए जोर जोर से बोलने लगी- आह -आह, धीरे धीरे चोदो ना। दर्द हो रहा है।

ये आवाज़ बगल के कमरे में सो रही उसकी बहु मालती को जगाने के लिए काफ़ी थी। चुदाई की मीठी दर्द भरी आवाज़ सुन कर मालती का बुर चिपचिपा गया। वो अपने पिया मोहन के लंड को याद कर के अपने बुर में ऊँगली डाली और दस मिनट तक ऊँगली से ही बुर की गत बना डाली।

सुबह हुई । दोनों सास बहु खेत गई । दोनों एक दूसरे के सामने बठी कर पैखाना कर रही थी। मालती ने अपनी सास मुन्नी की बुर देख कर बोली- अम्मा, तुम्हारा बुर कुछ सुजा हुआ लग रहा है।

मुन्नी ने मुस्कुरा कर कहा- ये जो तेरे ससुर जी हैं न बुढापे में भी नही मानते। देख न कल रात को इतना चोदा की अभी तक दुःख रहा है।

मालती ने कहा- एक बात पूछूं अम्मा?

मुन्नी- हाँ, पूछ न।

मालती- बाबूजी का लंड खड़ा होता है अभी भी?

मुन्नी- हाँ री। खड़ा क्या? लगता है बांस का कहता है। जब वो मुझे चोदते हैं तो लगता है की अब मेरी बुर तो फट ही जायेगी।

मुन्नी ने देखा की मालती अपनी ऊँगली अपने बुर में घुसा दी है।

मुन्नी ने पूछा- क्या हुआ तुझे? क्या फिर कोई कुत्ता है यहाँ ?

मालती बोली- नही अम्मा, मुझे तुम्हारी बातें सुन के गर्मी चढ़ गई है। इसे निकालना जरूरी है।

मुन्नी बोली- सुन, तू एक काम क्यों नही करती? आज रात तू अपने ससुर के साथ अपनी गर्मी क्यों नही निकल देती?

मालती चौंक कर बोली- ये कैसे हो सकता है? वो मेरे ससुर हैं।

मुन्नी बोली- अरे तेरी जरूरत को समझते हुए मैंने ऐसा कहा। तुझे इस समय किसी मर्द की जरूरत है। अब जब घर में ही मर्द मौजूद हो तो क्यों नही उसका लाभ उठा जाए।

मालती का मन अब डोल चुका था।

वो बोली- कहीं बाबूजी नाराज हों गए तो ?

मुन्नी बोली- अरे तू आज रात को उनके पास चले जाना। में बहाना बना के भेज दूँगी। धीरे धीरे रात के अंधेरे में जब तू उनको छुएगी ना , तो तू भूल जायेगी की तू उनकी बहु है और वो भूल जायेगे की वो तुम्हारे ससुर हैं।

ये सुन कर मालती के बुर में मानो तूफ़ान आ गया। उसके बुर से इतना पानी निकलने लगा की मुन्नी को लगा की ये पेशाब कर रही है। अब मुन्नी खुश थी। दोनों तरफ़ मामला सेट था।

रात हुई। खाना- वाना ख़तम कर मुन्नी हरिया के कमरे में गई और हरिया को बता दी कि मै मालती को भेज रही हूँ। वो चुदवाने के लिए तैयार है. तुम सिर्फ़ थोडी पहल करना।

कह के वो बाहर चली आई।

और बहु से बोली- बहु, ओ बहु, सुन आज मेरी तबियत कुछ ठीक नही है। तू जरा अपने ससुर जी को तेल तो लगा दे। फिर दरवाजे के बाहर से हरिया को बोली- सुनते हों जी , में जरा छत पर सोने जा रही हूँ। मालती बहु से तेल लगवा लेना।

इस प्रकार मालती को लगा कि ससुर जी को मेरे मन की बात पता नहीं है और उसे नहीं पता चला कि ससुरजी उसको चोदने के लिए किस तरह बेताब है. . जब कि हरिया को सब कुछ पहले से ही पता था.

मालती जैसे ही दरवाजे के पास आई मुन्नी ने उस से धीरे से कहा। देख मैंने बहाना बना कर तुम्हे उनके पास भेज रही हूँ। मालिश करते करते उनके लंड तक अपना हाथ ले जाना। शर्माना नही। अगर उनको बुरा लगे तो कह देना की अंधेरे में दिखा नही। अगर कुछ नही बोले तो फिर हाथ लगाना। जब देखना की कुछ नही बोल रहे हैं तो समझना की उन्हें भी अच्छा लग रहा है। ठीक है ना? अब मे चलती हूँ।

कह कर मुन्नी छत पर चली गई। इधर मालती हाथ में तेल की शीशी लिए हरिया के कमरे में आई।

हरिया ने कहा- आजा बहु । वैसे तो तेल मालिश की जरूरत नही थी, लेकिन आज मेरा पैर थोड़ा सा दर्द कर रहा है इसलिए मालिश जरूरी है।

मालती हरिया के बिस्तर पर बैठ गई। कमरे में एक छोटी सी डिबिया जल रही थी। जो कि पर्याप्त रौशनी के लिए भी अनुकूल नही थी।

मालती ने कहा- कोई बात नही। में आपकी अच्छे से मालिश कर देती हूँ। आप ये लूंगी उतार ले।

हरिया ने कहा- बहु, जरा ये डिबिया बुझा दे , क्यों की मैंने लूंगी के अन्दर छोटी सी लंगोट ही पहन रखी है।

मालती ने डिबिया बुझा दी। अब वहां घुप अँधेरा छा गया। सिर्फ़ बाहर की चांदनी रात की हलकी रोशनी ही अन्दर आ रही थी। हरिया ने लूंगी उतार दी।अब वो सिर्फ लंगोट में था. मालती की सांसे तेज़ हों गई। वो तेल को हरिया के पैरों में लगाने लगी। धीरे धीरे वो हरिया के जांघों में तेल लगाने लगी। धीरे से उसने जान बुझ कर हरिया के लंड तक अपना हाथ ले गई। हरिया ने कुछ नही कहा। मालती दुबारा हरिया के लंड पर हाथ लगाया। और तेल को वो जांघों और लंड के बीच लगाने लगी। जिससे वो बार बार हरिया के अंडकोष पर हाथ लगा सकती थी। हरिया ने जब देखा की बात लगभग बन चुकी है। उसने अपनी लंगोट की डोरी को कब खोल दिया मालती को पता भी ना चला। धीरे धीरे जब वो हरिया के अंडकोष पर हाथ फेर रही थी तो उसी के हाथ से उसकी लंगोट हट गई। लंगोट हटने पर मालती पूरी गरम हों गई। क्यों कि हरिया अब पूरी तरह से नंगा हो चुका था. खिडकी से आ रही चांदनी रात की हलकी हलकी रोशनी में वो हरिया के लंड को साफ़ साफ़ देख सकती थी. अब वो हरिया के लंड को छूने की कोशिश कर रही थी। धीरे धीरे उसने लंड पर हाथ लगाया और हटा लिया। हरिया का लंड सोया हुआ था। लेकिन ज्यों ही मालती ने हरिया का लंड छुआ मालती के जिस्म में एक सिरहन सी दौड़ गई। अब वो दुबारा अपना हाथ हरिया के दूसरे जांघ पर इस तरह ले गई जिस से उसकी कलाई हरिया के लुंड को छूती रहे। हरिया भी पका हुआ खिलाड़ी था। उसका लंड जल्दी खड़ा होने वाला नही था। उसे तो पता था कि मालती चुदवाने के लिए पूरी तरह से तैयार है .

हरिया ने कहा- बहु, अब जरा मेरे जांघ पर बैठ कर मेरे सीने की मालिश कर दे. इस से मेरे जांघ का दर्द भी कम हो गायेगा.

मालती बोली - बाबूजी आपके जांघ में तो काफी सारा तेल लगा हुआ है . आपकी जांघ पर मै बैठूंगी तो मेरी साड़ी में तेल लगने से ये खराब हो जायेगी.

हरिया- तुम अपनी साड़ी खोल दो ना। वैसे भी तेल लगने से सारी ख़राब हों सकती है।

मालती ने कहा- बाबूजी , साड़ी के नीचे मैंने पेटीकोट नही पहना है। इसलिए मै साड़ी नही खोल सकती।

हरिया ने कहा- अगर तू अन्दर कुछ नही पहनी है तो क्या हुआ? वैसे भी अंधेरे में में तुम्हे देख थोड़े ही पा रहा हूँ जो तुम यूँ शरमा रही हों?

मालती तो ये चाहती थी। उसने सोचा कि जब ससुरजी ही उसे नंगी होने के लिए कह रहे हैं तो उसे देर नहीं करनी चाहिए. उसने अपनी साड़ी खोल के एक किनारे रख दिया। अब वो सिर्फ ब्लाउज पहने हुई थी. और उसनेकमर के नीचे कुछ भी नहीं पहन रखा था.

वो हरिया के जांघ पर इस तरह से बठी की उसकी चूत हरिया के लंड में पूरी तरह से सटने लगी. उसकी नरम गांड हरिया के सख्त जांघ पर इस तरह थी मानो पत्थर पर कमल का फूल. हरिया को उसकी नरम नरम गांड का अहसास होने लगा. मालती भी अपने चूत से अपने ससुर के लंड को छूने के लिए अब बेताब होने लगी.

वो हरिया की जांघ पर बैठे बैठे उसके सीने की मालिश करने लगी. मालिश करते करते वो अपना हाथ हरिया के सीने से लेकर उसके लंड तक लेते आती. जब भी वो हरिया के सीने की तरफ अपना हाथ आगे बढ़ाती तो अपनी चूत से अपने ससुर के लंड को दबाने की कोशिश जरुर करती. और वापसी में अपने हाथ को उसके लंड तक लाती.

उसने अपने लंड को ढीला रखा हुआ था. मालती अपना हाथ कई बार हरिया के लंड के ऊपर से छूती हुई नीचे लाती. धीरे धीरे उसने हरिया के लंड पर हाथ फेरना चालु किया. वो अँधेरे में उसके लंड को इस तरह छू रही थी मानो वो अनजाने में ऐसा कर रही हो. अब हरिया में भीतर तूफ़ान उठना शुरू हो गया. वो समझ गया की लोहा गरम है और यही सही समय है चोट मारने का. उसने अपने हाथ से अपनी बहु की नंगी जांघ पर हाथ रखा और चिकनी जांघ पर हाथ फेरने लगा. उसकी बहु को मज़ा आने लगा. उसने अपने हाथ में हरिया का लंड पूरी तरह पकड़ लिया. और उसे दबाने लगी. अब थोडा थोडा हरिया का लंड खडा होने लगा. लेकिन वो पूरी तरह से इसे खड़ा नहीं किया और हरिया ने अपने हाथ को धीरे धीरे अपनी बहु की गांड पर फेरना चालु कर दिया. अब मालती को पूरा यकीन हो गया की ससुरजी भी चोदने के लिए तैयार हैं. हरिया का हाथ अपनी बहु की गांड की दरार में कुछ खोजने लगा. एक बार जैसे ही मालती आगे की और झुकी वैसे ही हरिया ने मालती की गांड की छेद में अपनी ऊँगली घुसा दिया. मालती तड़प गयी. लेकिन वो कुछ नहीं बोली. वो सिर्फ आगे की और झुकी रही. और नीचे से उसके ससुर उसकी गांड में उंगली करता रहा. अब मालती अपने रंग में आई और लपक कर अपने ससुर के लंड पर अपने चूत को पूरा सटा दी. अब मामला पूरी तरह से साफ़ हो चुका था.

हरिया ने अपने शारीर पर झुकी हुई अपनी बहु को एक हाथ से लपेटा और अपने बदन पर सटा दिया. अब मालती की चूची हरिया के सीने पर रगड़ खाने लगी. हरिया अपनी बहु की गदराई नरम देह को अपने सख्त शारीर मेंकस कर सटा रहा था.

उसने बहु को पकड़ कर अपने बगल में लिटा दिया और उसके चूची पर हाथ रख के बोला- ब्लाउज खोल दे.

मालती ने अपने ब्लाउज का हुक खोल दिया। हरिया ने ब्लाउज को मालती के चूची पर से अलग कर दिया और चूची को छूने लगा।

बोला- अरे तुमने अन्दर ब्रा नही पहन रखा है? खैर कोई बात नही. वो मालती के चूची को मसलने लगा। मालती की चूची गदराई जवानी का प्रतीक थी.

हरिया बोला- तेरी चूची तो एक दम सख्त है। में तेरी चूची छू रहा हूँ, तुझे बुरा तो नही लग रहा है न?

मालती बोली- नही, आप मेरे साथ कुछ भी करेंगे तो में बुरा नही मानूंगी।

हरिया ने कहा- शाबाश बहु, यही अच्छे बहु की निशानी है। बोल तुझे क्या चाहिए?

मालती- बाबूजी मुझे कुछ नही चाहिए, जो आपकी मर्ज़ी हो वो दे दें ।

हरिया- बहुत दिन से प्यासा हूँ. जरा मुझे अपनी चूत का पानी पिला दे ना .

मालती- अब देर किस बात की?

हरिया ने नीचे जा कर मालती के बुर को पहले तो छुआ फिर, मुंह में ले कर चूसने लगा।

मालती बोली- ऐसे मत चूसिये बाबूजी , मै मर जाऊंगी।

लेकिन हरिया नहीं माना. वो तो इस तरह इसे चूस रहा था मानो कोई आम की गुठली चूस रहा हो. मालती अपनी आँख बंद कर के अपने दोनों हाथ से अपने सर के पीछे रखे तकिये को जोर से पकड़ कर दबाये हुए मचल रही थी. उसका नंगा बदन सांप की तरह अंगडाई ले रहा था. थोड़ी देर में ही मालती के चूत ने पानी छोड़ दिया. हरिया ने मालती की चूत से बहती हुई पुरी पानी को चाट चाट कर पी लिया.

अब हरिया उठ खड़ा हुआ और, मालती के हाथ में अपना लंड थमा दिया। मालती के हाथ मानो कोई खजाना मिल गया हों। वो हरिया के लंड को कभी चूमती कभी खेलती. लेकिन वो कुछ निराश भी थी क्यों की ससुरजी का लंड आधा ही खडा हुआ था. जबकि सासुजी ने कहा था कि ससुरजी का लंड बांस की तरह टाईट हो जाता है. लेकिन मालती फिर भी इस आधे खिले हुए लंड को ही अपने प्यासे चूत में डालने के लिए बेताब थी.

वो बोली-बाबूजी, इसको मेरे बुर में एक बार डाल दीजिये न।

हरिया ने अपने लटके हुए लंड को हाथ से पकड़ कर मालती के बुर में घूसा दिया। मालती के बुर में हरिया का लंड जाते ही फुफकार मरने लगा। और मालती के बुर में ही वो खड़ा होने लगा।

मालती- बाबूजी ये क्या हों रहा है? जल्दी से निकल दीजिये।

हरिया- कुछ नही होगा बहु। अब हरिया का लंड पूरी तरह से टाइट हों गया। अब हरिया का लंड सचमुच बांस कि तरह टाईट और बड़ा हो गया था. मालती दर्द से छटपटाने लगी। उसे यह अंदाजा ही नही था की जिसे वो कमजोर और बुढा लंड समझ रही थी वो बुर में जाने के बाद इतना विशालकाय हों जाएगा। हरिया ने मालती को चोदना चालू किया। पहले दस मिनट तक तो मालती बाबूजी बाबूजी छोड़ दीजिये कहती रही। लेकिन हरिया नही सुना, वो धीरे धीरे उसे चोदता रहा। दस मिनट के बाद मालती का बुर थोड़ा ढीला हुआ। अब उसे भी अच्छा लग रहा था। दस मिनट और हरिया ने मालती की जम के चुदाई की। तब जा कर हरिया के अन्दर का पानी बाहर आने को हुआ तो उसने अपना लंड मालती के बुर से निकल के मालती के मुंह में लगा दिया बोला - पी जा।

मालती ने हरिया के लंड को मुंह में ले कर ज्यों ही दो- तीन बार चूसा की हरिया के लंड से तेज़ धार निकली जिस से मालती के पूरा मुह भर गया। मालती ने सारा का सारा माल गकत लिया। आज जा कर मालती की गर्मी शांत हुई।

उस के बाद फिर थोड़ी देर के बाद ससुर और बहु के बीच सम्भोग का खेल चालु हुआ. इस बार काफी इत्मीनान हो कर हरिया अपनी बहु मालती की चुदाई कर रहा था. मालती अब जोर जोर से आह आह की आवाज निकाल रही थी ताकि उसकी सास भी सुन ले और ये जान ले कि उनकी प्लानिंग कामयाब हो गयी है. इस बार जब हरिया का माल निकालने कू आया तो मालती ने कहा- इस बार चूत में ही निकाल लीजिये. हरिया ने वैसे ही किया. २ मिनट तक उसके लंड से माल निकलता रहा और मालती के चूत में गिरता रहा. हरिया मालती के चूत में लंड डाले हुए ही सो गया और मालती को भी कबनींद आ गयी उसे भी पता ना चला.

सुबह के चार बजे जब मुन्नी छत पर से नीची आई और अपने कमरे में गयी तो देखती है कि उसका पति हरिया अपनी बहु मालती के चूत में लंड डाले हुए उसके नंगे बदन पर सो रहा है. देख कर मुन्नी को थोड़ी ख़ुशी हुई कि चलो आखिर मेरी बहु मेरे घर के काम आई. उसने जा कर अपने बहु को हिला कर जगाया. थकी हुई बहु की आँखे खुली तो अपने चूत में अपने ससुर जी का लंड देख कर और सामने अपनी सास को देख कर थोड़ी शर्म आई. उसने प्यार से ससुरजी के लंड को अपने चूत से निकाला और ससुर जी को जगाया. हरिया की भी आँख खुल गयी. उसने जब अपने आप को नंगा और अपनी बहु को नंगा देखा तो उसे सारी बात याद आ गयी.

मुन्नी ने पूछा- अरे मालती, मैंने तो तुम्हे इनकी मालिश करने को कहा था. इन्होने ने तो तेरी ही मालिश कर दी. रात भर मालिश करवाती रही क्या?

मालती ने मुस्कुरा कर कहा- नहीं अम्मा, सिर्फ 3 बार !

मुन्नी ने हरिया से कहा- क्यों जी , कैसी लगी मेरी बहु के हाथो की मालिश? मज़ा आया? मेरी फुल जैसी बहु को तुमने ज्यादा मालिश तो नहीं कर दी ना?

हरिया ने कहा - हमारी बहु के हाथों में तो जादू है. अब रोज़ ही मै इसकी और ये मेरी मालिश लिया करेगी.

मुन्नी ने हँसते हुए कहा- हाँ , क्यों नहीं. वैसे भी अब मेरे हाथ में वो बात कहाँ जो मालती बहु के हाथ में है.

उसके बाद मालती रोज़ ही अपने ससुर के साथ ही सोने लगी. रात भर दोनों एक दुसरे की बदन की मालिश करते और मालती जी भर कर चुदवाती.

हाँ दो- तीन दिन में उसकी सास मुन्नी भी साथ सोने लगी। अब हरिया एक तरफ करवट ले कर बीबी को चोदता तो दूसरी तरफ़ करवट ले कर अपनी बहु मालती को।
 
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