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बर्बादी को निमंत्रण

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StoryPublisher

Guest
प्रस्तुत कहानी के सभी पात्र एवं घटनाक्रम काल्पनिक है। यदि किसी पात्र और घटना का किसी भी प्रकार से किसी वास्तविकता से संबंध पाया जाता है तो इसे मात्र एक संयोग कहा जायेगा। इस कहानी के माध्यम से मेरा एक लेखक के तौर पर किसी जाति , धर्म या सम्प्रदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई उद्देश्य नहीं है अपितु इस कहानी के माध्यम से मैं एक लेखक के तौर पर आप सभी पाठकों का अपनी कहानी के माध्यम से मनोरंजन करने की मंशा रखता हूँ। आशा करता हूँ आपको कहानी पसन्द आएगी।

अपडेट - 1

बड़ी सुख शांति से कट रहे जीवन में एक ऐसा तूफान आया कि घर परिवार और सारी सुख शांति गर्मी से भाप बन कर उड़ गई। कुछ समझ ही नही आ रहा था कि इस तूफान को रोक जा सकता था या ये तूफान खुद हमारा ही चुनाव था।

सरिता: 25 साल की नव विवाहिता खूबसूरत योवन से परिपूर्ण । मॉडर्न होने के साथ साथ संस्कारी बहु।

राज:25 साल का एक लड़का मॉडर्न लेकिन संस्कारी। पढ़ने में होशियार था इस लिए लंदन से एम बी ए करके अपने पिता का बिज़नेस संभाल रहा था।

राज और सरिता दोनों बनारस के है लेकिन बिज़नेस के सिलसिले में दोनों पिछले 2 साल से दिल्ली रह रहे है।

सरिता के परिवार में चार सदस्य है। सरिता की माँ सरला सरिता के पिता जगमोहन सरिता की छोटी बहन रीता।

वहीं राज के परिवार में सदस्य संख्या थोड़ी ज्यादा है। राज के परिवार में राज की माँ चाँदनी ,

राज के बड़े भैया सुरेश और उनकी पत्नी श्रीमति चंचल और राज की छोटी बहन पूजा और आरती।

सब कुछ सही चल रहा था। हंसी मजाक चारों तरफ खुशियां ही खुशियां । बस राज के पिता नहीं होने से घर मे थोड़ी सी मायुशी थी लेकिन वो सब भी राज की पत्नी सरिता के आने के बाद कहीं गुम हो गयी थी।

राज के बड़े भाई सुरेश का विवाह राज से कुछ तीन साल पहले हुआ था। इसलिए राज की माँ थोड़ा सा परेशान रहने लगी । क्योंकि अब सुरेश के विवाह को करीब पांच साल होने को आये है और चाँदनी अभी तक अपने बड़े बेटे से पोते पोती की खुशियों की गुहार लगा रही है। चाँदनी ने कई बार चंचल से भी कहा कि अब तो मुझे पोते पोती के दर्शन कर लेने दो बड़ी बहू।

दरअसल जब चंचल विवाह करके घर आई थी तो उसने सुरेश से कहा था कि वो शादी के पांच सालों तक कोई बच्चा नही चाहती। अपनी सास की अब पांच साल के बाद कि गयी मांग चंचल के लिए भी नाजायज नहीं थी। लेकिन चंचल करे भी तो क्या करे । पिछले पांच सालों से चंचल गर्भ निरोधक गोलियाँ खा रही थी। लेकिन पिछले तीन चार महीनों से उसने वो भी बंद कर दी थी। सुरेश के सारे प्रयाश असफल हो रहे थे। चंचल को बच्चा नही हो पा रहा था। उसका एक सबसे बड़ा कारण ये था कि सुरेश एक तो काम मे बहुत व्यस्त रहता था दूसरा गर्भनिरोधक के चलते चंचल के गर्भ मैं भी शिथिलता आ गयी थी जो कि दवाओं से चंचल ने दूर कर लिया लेकिन अब सुरेश उस मात्रा में वीर्य नहीं दे पा रहा था जिस से बच्चा ठहर सके।

धीरे धीरे परिवार में मायूसी छाने लगी थी। संस्कारी घर होने के कारण चाँदनी चंचल और सुरेश को दूसरे विवाह के लिए मजबूर भी नही कर सकती थी। इसलिए उसने सब कुछ ऊपरवाले के भरोसे छोड़ दिया।

वहीं राज अपनी पत्नी सरिता के साथ दिल्ली रह रहा था। इन दोनों भाइयों ने अपने पिता के बिज़नेस के दो भाग बना लिए थे । एक बनारस में संभाल रहा था तो दूसरा दिल्ली में उसकी नींव डाल रहा था ।

जब राज ने सरिता से बच्चे के बारे में पूछा तो सरिता ने शर्मा कर कहा कि दीदी (जेठानी चंचल) ने भी तो पांच साल का परहेज किया है तो मुझे भी पांच साल दो न। राज सरिता की बात पर मुस्कुरा उठा लेकिन कुछ कहा नहीं।
 
अपडेट - 2

जब राज ने सरिता से बच्चे के बारे में पूछा तो सरिता ने शर्मा कर कहा कि दीदी (जेठानी चंचल) ने भी तो पांच साल का परहेज किया है तो मुझे भी पांच साल दो न। राज सरिता की बात पर मुस्कुरा उठा।

अब आगे...

राज भली भांति जानता था कि सरिता को बच्चे से कोई परहेज नही है लेकिन फिलहाल ये मेरे साथ जीवन और जवानी दोनो का आनन्द लेना चाहती है। और फिर राज खुद भी नहीं चाहता था कि इतनी जल्दी घर गृहस्थी से बच्चों में उलझ जाए।

वहीं दूसरी और चाँदनी कई बाबाओं के आश्रम के चक्कर लगा रही थी। कभी कोई बाबा तो कभी कोई बाबा ,कभी किसी आश्रम से प्रसाद और कभी किसी आश्रम से कोई उपाय। चंचल इन सब से परेशान हो चुकी थी।

चंचल: (मन ही मन) अब सासु माँ को कौन समझाए की बच्चा प्रसाद और उपायों से नही ताबड़ तोड़ चुदाई और वीर्य से होता है। जितने उपाय में कर रही हूं यदि डॉक्टर को दिखाने का उपाय सुरेश कर ले तो सासु माँ की हर इच्छा पूरी हो जाये।

चाँदनी: चंचल किन सोचों में गुम हों। जैसा बाबा ने कहा है वैसा ही करना देखना जल्द ही तुम्हारी गौद में इस घर का वारिश किलकारियां मारने लगेगा।

चंचल ने मुस्कान के साथ मुह बनाते हुए चाँदनी के कहे अनुसार उपाय पूरा किया। लेकिन पिछले छ: सात महीनों के उपायों के बावजूद भी चंचल को उल्टी नही हुई तो चाँदनी उदास होने लगी।

एक दिन ऐसे ही चाँदनी बाहर हॉल में बैठे-बैठे भगवान से अपने घर के चिराग के लिए प्रार्थना कर रही थी कि कोई साधु चाँदनी के घर के दरवाजे के पास आकर जोर से चिल्लाता है।

साधु: अलख निरंजन। बम भोले शिव शम्भू... अरे कोई है घर में साधु को भिक्षा दे दो। भगवान तुम्हारे हर मनोरथ पूरे करे। अलख निरंजन।

चाँदनी साधु की आवाज सुनकर जल्दी से दरवाजे तक भागी- भागी जाती है और साधु को अंदर आने का निमंत्रण देती है लेकिन साधु चाँदनी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है।

चाँदनी: क्या हुआ बाबा? घर मे पधारिये।

साधु: देवी हम आपका सत्कार स्वीकार नहीं कर सकते। हम ब्राह्मण है। केवल पांच घर मे भिक्षा मांग कर खाते है। किंतु किसी का सत्कार नहीं लेते।

चाँदनी: ठीक है बाबा आपके तप और संकल्प को भन्ग करने का तो मैं विचार भी नहीं कर सकती। अच्छा तो आप यहीं रुकिए मैं खाने के लिए लाती हूँ।

चाँदनी रसोई घर में जाकर घी से चुपड़ी रोटियां सब्जी और कुछ मिठाईयां लाकर साधु को देती हूं।

साधु: देवी ये तो बहुत ज्यादा है मेरे घर मे केवल हम चार प्राणी है जिनके लिए ये बहुत है।

चाँदनी: बाबा मेरे घर में भी ये खाना ज्यादा है। आप अपने बच्चों को ये खाना देंगे तो मैंरे यहां अन्न का अनादर भी नही होगा और फिर मेरे कोई पोता नही है तो उसी के लिए में ये धर्म कर्म भी करना चाहती हूँ।

खुश किस्मती से वो साधु एक महान आत्मा थे। उन्होंने चाँदनी के चेहरे पर उसका भविष्य जान लिया था जिससे वो थोड़े चिंतित थे लेकिन फिर भी उन्होंने चाँदनी से इशारे में पूछा।

साधु: देवी आपको पोता चाहिए या घर का वारिश।

चाँदनी साधु की बात समझ नहीं सकी। और चाँदनी ने कहा बाबा पोता होगा तो वो ही वारिश होगा ना।

साधु ने तीन बार पूछा और ये भी बोला कि देवी विचार करके बताओ तुम्हे जो चाहिए वो अवश्य मिलेगा मेरे इस भोजन के मूल्य के रूप में लेकिन....

(चाँदनी महात्मा की बात काटते हुए)

चाँदनी: नहीं महाराज मुझे तो बस पोता चाहिए जो मेरे पति के नाम को आगे बढ़ाए। हमारे वंश के नाम को आगे बढ़ाए।

साधु: तथास्तु देवी किन्तु आपको अपने पोते की प्राप्ति उस समय होगी जब आप अपने घर मे नहीं होंगी।

चाँदनी: अर्थात महाराज । आप कहना क्या चाहते है। मेरे घर मे नहीं होने पोते का क्या संबंध?

साधु: देवी आपने हमे भोजन उस वक़्त प्रदान किया है जब आपके घर मे कोई नहीं था केवल आप ही थी। हमने आपके घर मे किसी और के होने का आभास तक नहीं किया। और अगर कोई है भी तो आपका पोता ऐसी अवस्था मे होगा जिसके भान घर के किसी सदस्य को नही होगा।

साधु: देवी आपको अब तीर्थ यात्रा पर जाना चाहिए । चारों धामों की यात्रा। एक माह तक एक धाम पर रुकना। और उनसे पौत्र मांगना। और याद रहे इन चार महीनों में केवल अपनी छोटी वधू से ही बात करना अन्य किसी भी पारिवारिक सदस्य से मत करना वरना परिणाम की तुम स्वयं जिम्मेदार रहोगी। ईस्वर ने चाहा तो चार संतान होंगी।

चाँदनी बाबा की बातों को सोच रही थी और समझ रही थी लेकिन जब कुछ समझ नही आया तो बाबा को पूछने के लिए गर्दन उठा कर देखा तो बाबा जा चुके थे। चाँदनी घर के बाहर आकर भी ढूंढा लेकिन बाबा कहीं भी नज़र नही आए।
 
आपका बहुत बहुत शुक्रिया @koshlendra , @mastram जी...

आप सभी पाठकों से निवेदन है कि इसी प्रकार से मुझसे और मेरी इस कहानी से जुड़े रहें और मुझे लिखने को प्रेरित करते रहें।।

आप सभी को अपने कमैंट्स और शुभकामनाओं के लिए मेरा आभार
 
अपडेट - 3

चाँदनी बाबा की बातों को सोच रही थी और समझ रही थी लेकिन जब कुछ समझ नही आया तो बाबा को पूछने के लिए गर्दन उठा कर देखा तो बाबा जा चुके थे। चाँदनी घर के बाहर आकर भी ढूंढा लेकिन बाबा कहीं भी नज़र नही आए।

अब आगे.....

चाँदनी : (मन ही मन) है ईस्वर ये बाबा का आशीर्वाद था या शाप। कहीं बाबा किसी बात का बुरा तो नहीं मान गए। नहीं- नहीं बाबा ने तो तो आशीर्वाद ही दिया है। लेकिन मेरे यहाँ नही होने से ही पोता होगा। नहीं चार संतान होंगी। मतलब मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा। खेर जो भी हो कम से कम हमारा वंश तो आगे बढ़ सकेगा ना।

तभी घर के अंदर से चंचल आती है।

चंचल: माँ जी बधाई हो। आपको बहुत बहुत बधाई हो।

चाँदनी: अरे अरे पगली पैर तो जमीन पर रख। ऐसा क्या मिल गया जिसकी बधाई देते हुए और पगलाए जा रही हो।

चंचल: माँ जी सुरेश को बिज़नेस में बहुत फायदा हुआ है। उनका बनारस में प्रॉफिट सैंतीस करोड़ पैंसठ लाख तक हुआ है। जिस से दिल्ली में राज हमारे बिज़नेस को और भी मजबूती से चला सकता है। और दूसरी बात सुरेश ने बनारस के बिज़नेस का नया मालिक मुझे बना दिया है क्योंकि हमारे बिज़नेस पार्टनर हमारे बिज़नेस को आपसी सम्मति से एक नया रूप दे रहे है। जिसके मालिक सुरेश होंगे। ये बिज़नेस का हमारा दूसरा हेड आफिस होगा जो दुबई में होगा। अब माँ जी ना तो मुझे कहीं पर जॉब ढूंढने की ज़रूरत होगी ना ही कोई प्रॉब्लम। मैं अब खुद सुरेश की जगह आफिस में जाउंगी।

चाँदनी ने जब ये खुश खबरी सुनी तो खुशी से झूम उठी। चाँदनी ने तुरंत चंचल को गले से लगा लिया।

चाँदनी : ( मन ही मन) बाबा के आ जाने से कितनी सारी खुशियाँ एक साथ हमारे घर मे आयी है। ज़रूर बाबा का कहा हर वचन सच साबित होगा। मुझे अगर पोता चाहिए तो जल्द से जल्द तीर्थ यात्रा पर निकलना होगा। इस से पहले की सुरेश विदेश यात्रा पर निकल पड़े। सुरेश अगर विदेश चला गया तो पोता कैसे होगा। फिर पता नही वो कब आये। और फिर मैं भी तो और ज्यादा इंतजार नही कर सकती । मैं आज ही सुरेश से बात करूँगी।

चंचल चाँदनी को गले लगा कर दूर करती है और बोलती है।

चंचल: माँ जी मैं अभी ये खुश खबरी सरिता और राज को भी देती हूं।

चाँदनी: चंचल के गाल पर प्यार से हाथ फेरते हुए) हाँ बेटा ये तो सच मे खुशखबरी है। जाओ उन्हें जल्दी से फ़ोन करके खुशखबरी सुना दो। और हां अगर हो सके तो सरिता को कुछ दिनों के लिए यहां बुला लो।

चंचल तुरंत अपने कमरे में जाति है और सरिता को फ़ोन मिला देती है। सरिता और चंचल में बात होने लगती है। दोनों खुशी से झूम रही थी।

चंचल: अच्छा सुनो सरिता! वो माँ जी ने तुम्हे यहां बनारस बुलाया है।

सरिता: मुझे? पर क्यों?

चंचल: पर क्यों? लगता है राज के घर मे जल्दी घर बना लिया बन्नो। तो क्या अपनी दीदी के पास भी नहीं आओगी।

सरिता: नहीं नही दीदी ऐसी बात नही है। आप तो जिठानी है मेरी। लेकिन राज कैसे आएंगे मेरे साथ? वो तो बिज़नेस.....

चंचल: पगली इसीलिए तो सिर्फ तुझे बुलाया है। अब जल्दी से ट्रेन में बैठ और आज।

सरिता: लेकिन दीदी...

चंचल: लेकिन वेकीन कुछ नहीं तू जल्दी आज बस।

सरिता : हा हा हा जी दीदी। बिल्कुल मैं करती हूँ राज से बात और फिर आपको बताती हूँ।

चंचल: अच्छा ठीक है। और सुन कुछ दिनों की कसर निकाल कर आना। यहां राज के बिना रहना पड़ेगा।

सरिता: (लजाते , शर्माते) धत्त दीदी...

चंचल: (हंसते हुए) चल रखती हूँ फ़ोन जल्दी आना और हाँ ध्यान से आना। अपना ख्याल रखना।

सरिता : जी दीदी बाय..

दोनों अपने अपने हाथ मे फ़ोन लिए कुछ सोचती है और फिर मुस्कुराकर अपने अपने काम मे लग जाती है। वहीं दूसरी और चाँदनी अपनी तीर्थ यात्रा के लिए सामान जमाने लगती है। चाँदनी की तीर्थ यात्रा की तैयारी जोर शोर में थी।

पूरा परिवार खुशियों से झूम रहा था लेकिन ये खुशियां उस हवा की तरह थी। जो तूफान का संकेत देती है। पहले हल्की हल्की चलती है फिर अचानक से इतनी तेज आती है कि सब कुछ बर्बाद कर देती है। इस बात का एहसास अभी तक पूरे घर में किसी को भी नहीं था। चलता भी कैसे सब कुछ बहोत आराम से खुशी खुशी हो रहा था।
 
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