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बेकाबू

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बेकाबू

अप्रैल का वो दिन था जब गर्मी की छुट्टियों में मेरे शुभ चिंतक मेरे मास्टर जी, मेरे घर , मेरे हाल समाचार लेने आए थे।

"नमस्कार मास्टर जी अाइए।" मेरी मां ने उनका अभिवादन कर उन्हें अंदर बुलाया। मै अपने कमरे में बंद होकर खिड़की में से चुपके से देख रहा था।

" अभी ठीक है राहुल?" मास्टर जी ने पूछा।

"हां इलाज़ लग गया है , काफ़ी सुधार है।" मां ने मेरे लिए कहा।

"क्या हुआ अचानक?"

"पता नहीं मास्टर जी ये लड़का अपने सीने में क्या दफ़न करके बैठा है, अब आप ही कुछ पता कीजिए।"

" डॉक्टर ने क्या बताया?"

"बस यही की , उसकी जिंदगी का वो राज़ हम भी नहीं जान सके , अगर वो पता चले तो आगे कुछ स्थाई इलाज संभव हो सके।"

मां ने इशारे से मास्टर जी को मेरे कमरे में जाने को कहा।

मास्टर जी ने मेरे कमरे का दरवाज़ा खटखटाया,

"राहुल दरवाज़ा खोलो देखो मै आया हूं , तुम्हारा शर्मा सर।"

शर्मा सर मेरे लिए भगवान तुल्य थे ,

उन्होंने कभी टीचर स्टूडेंट वाला रिश्ता महसूस ही नहीं होने दिया था, और हर संभव मेरी मदद की थी,

हालाकि उसकी वज़ह ये भी थी कि उन्हें असफल लोग बिल्कुल पसंद नहीं थे , और सफल लोग हद से ज्यादा पसंद थे । तो बात कुछ ऐसी थी कि एवरेज बच्चों के लिए वो जीतने के खतरनाक थे उतने ही पढ़ने लिखने वाले बच्चों के प्रिय हुआ करते थे।

मैंने बड़ी मुश्किल से दरवाज़ा खोला ,

वो मेरे कमरे में अंदर आए , मेरे सर पर हाथ फेरा मैंने भी उनके पैर छुए ,मास्टर जी मेरे पलंग के पास रखे स्टूल पर बैठ गए,

"आओ मेरे शेर बैठो मेरे पास।"

मै जा कर चुप चाप उनके पास बैठ गया मेरी आंखे ज़मीन पर गड़ी हुई दांए बांए नाच रही थी,

"कैसे हो ?"

" अच्छा हूं, और आप?"

" मै भी ठीक हूं।"

"इतने समय से शहर वापस आ गए , मुझे बताया नहीं तुमने?"

मेरी धड़कने बढ़ने लगी , क्यों फिर वही सवाल किए जा रहे कोई क्यों मुझे अकेला नहीं छोड़ देता।

" मै बस सोच ही रहा था मिलने आने की।" मैंने ठिठकती हुई आवाज़ में झूठ बोला ताकि अपनी कमज़ोरी छुपा सकूं।

" वो ऑफिस से फ़ोन आ गया कि छुट्टी से वापस आ जाओ।"

" अच्छा ठीक है चले जाना थोड़े दिन और रुकलो , तुम्हे अपना ये शहर अच्छा नहीं लगता क्या?"

मेरी मां ने मास्टर जी को सब बता रखा था , शायद वो जानते थे कि मै झूठ बोल रहा हूं लेकिन मेरी हालत को देखते हुए उन्होंने ऐसा उत्तर दिया था ,

" मै आज ये जानने आया हूं कि ऐसी कौन सी आंधी थी जिसे मेरा सबसे काबिल स्टूडेंट झेल ना सका और टूट गया?"

" सर आपका काबिल स्टूडेंट टूटा नहीं आंधी के साथ अपना वजूद खो कर चल दिया।"

" तुमने कभी महसूस किया कि तुम मेरा गुरूर थे, तुम्हारी मिसालें दि है मैंने , तुम्हारे जूनियर्स को।"

मास्टर जी मेरी हालत पर तरस भी खा रहे थे , और अन्दर मेरे , सफल ना होने का मलाल और नाराज़गी भी दिल के संदूक में से बाहर आने को कर रही थी ,पर उसका आज कोई इलाज़ ना था, क्योंकि इलाज़ कैसे किया जाए वो सिखाते तो थे , पर जिंदगी की मुश्किलों का डॉक्टर बनना स्टूडेंट के अपने हाथ में होता है।

फ़िर से सवाल दोहराया "बेटा !आज मै तुमसे बस इतना जानने आया हूं कि ये हाल हुआ कैसे तुम्हारा , मै तुमसे वादा करता हूं कि तुम्हारे बारे में कोई धारणा नहीं बनाऊंगा ?"

मुझे थोड़ा सहज महसूस नहीं हो रहा था क्योंकि जो कुछ भी मेरे साथ घटा था, उसे अपने टीचर के सामने रखा नहीं जा सकता था।

मास्टर जी ने कहा "मत घबराओ मै किसी से कुछ नहीं कहूंगा, चाहो तो अपनी आंखे बंद कर लो , और यूं मान लो कि अपने किसी अजीज मित्र के सामने बैठे हो।"

मैंने अपनी आंखे बंद की और कुछ बोलता उसके पहले अचानक मुझे फिर से घबारहट शुरू हो गई,

मैंने घबराकर अपनी आंखे खोल ली ,

"राहुल तुम एक बहादुर बच्चे हो , कोशिश करो साहस करो बताने कि ये बात इस कमरे से बाहर कभी नहीं जाएगी , मै वादा करता हूं।"

मैंने फ़िर आंखे बंद की और हिम्मत जुटाई और बोलना शुरू किया। इतने समय से दफ़न राज़ पहली बार किसी के सामने आने वाला था,

"अक्सर हमारी जिंदगी कल्पनाओं और वास्तविकताओं के बीच संघर्ष की कहानी होती है.."

मेरे शब्द लड़खड़ाने लगे और मै चुप होगया ।

" बेटे चुप क्यूं हो गए , बताओ आगे , हो सकता है तुम्हारी आप बीती किसी का भला कर जाए, किसी का कैरियर बचा ले।"

मास्टर जी की ये बात मेरे जेहन में उतर गई , यदि मेरी आप बीती मेरी तरह के युवाओं को सही राह दिखा सकती थी, तो हर हाल में सब कुछ बताऊंगा मै। ,
 
2. कम उम्र के बड़े ख़्वाब(अब तक....)

मेरा सूखा गला किसी की मदद के भाव से तर हो चुका था।

"क्या आपने सब कुछ बना हुआ जान बुझकर अपने हाथों से बिगड़ा है?"

" नहीं ! कौन मूर्ख ऐसा करता है।"

" मैं वही मूर्ख हूं।"

मैंने अपनी आंखे बंद की और कहना शुरू किया

" कक्षा आठ तक मै एक लास्ट बैंचर स्टूडेंट था ,

दूसरे बच्चो को मरना , चमकाना और अपनी दादागिरी झाड़ना मेरा शगल और इज्ज़त हुआ करती थी , कक्षा में एक , लड़की थी मिताली मुझे वो बहुत पसंद थी जी करता था कि बस उसे ही देखता रहूं ।

हालाकि उम्र भले छोटी थी पर ये हमारे दादाजी वाला दौर नहीं था , नया ज़माना था, प्रेम रस के घूंट टेलीविज़न वाले हमे बड़े होने से पहले ही पिला देते थे।

मेरे दोस्त मिताली को गेट से देख कर, मुझे आवाज़ लगा देते थे , राहुल , मिताली आ गई, मै दौड़ कर उसके फ्रेश - फ्रेश चेहरे को और उसके गोरे गालों पर आती हुई लट को उंगलियों से सरका कर कान के पीछे ले जाना देखने हाज़िर होजाता था, ये पल ऐसा लगता था मानो ज़माना थम कर मेरे अाघोश में आ चुका हो ।

आज का दिन कुछ अलग है क्यूंकि मैंने मयंक को प्रे से पहले ही एक कोने में ले जा कर धमका आया हूं ,आज से वो मिताली के पास वाली डेस्क पर नहीं बैठेगा जो कि सबसे आगे की डेस्क है , आज से ये फ़ैसला लिया है कि भले मुझे कुछ आए ना आए , भले ही टीचर्स की और मार क्यूं ना खा ली जाए, लेकिन आज से बैठना तो आगे मिताली के ठीक बाजू वाली डेस्क पर ही है।

प्रे के बाद सभी अपनी अपनी कक्षाओं की तरफ़ बढ़े, मै और सन्नी जो कि मेरा जिगरी दोस्त था, हमेशा मेरे साथ रहता था , हमने बढ़े रौब से अपना बैग मिताली की बाजू वाली डेस्क पर रख दिया जैसे कोई बहुत बड़े सेलेब्रिटी आए हो कहीं से, उसके बाद एक पिंक कलर का बैग आकर मेरे बैग के ठीक बाजू में रखा गया जो मेरी मिताली का था, उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैं कोई अतिक्रमणकारी था , फ़िर उसने मयंक को देखने के लिए अपनी गर्दन घुमाई मयंक अपना चश्मा ठीक करते हुए ओके का इशारा कर रहा था ।

ऐसा लग रहा था कि मेरा वहां बैठना मिताली को खल रहा था, दरअसल बात यह थी कि मयंक हमारी क्लास का हीरो था हमेशा फर्स्ट जो आता था , टीचर्स और क्लास के अन्य विद्यार्थियों के सामने उसकी इज्ज़त किसी कलेक्टर से कम ना थी , हर कोई उसके साथ बैठना चाहता था क्योंकि वो दौर ही ऐसा होता है जब मां बाप अपने बच्चों को अच्छे पढ़ने लिखने वाले बच्चों के साथ रहने की हिदायत दे कर स्कूल भेजते है और फिर एक कारण यह भी है, ऐसे टॉपर अपनी कॉपी हमेशा कंप्लीट रखते है, स्कूल रोज़ आते है और तो और कभी कभी टीचर्स से मार खाने से भी बचा , लिया करते है क्योंकि अमूमन क्लास के मॉनिटर भी वही होते है तो उनके साथ बैठना एक अच्छा सौदा साबित होता है,

इधर हम जैसे शैतान बच्चे होते है जो सिर्फ अपने मन में हीरो होते है , असल में स्कूल मैनेजमेंट की नज़र में और छात्रों की नज़र में किसी विलेन से कम नहीं होते है।

हिन्दी का पीरियड था आज सर , जो अभी तक पढ़ाया उसका मौखिक टेस्ट लेने वाले थे , सर कक्षा में अा चुके थे

उन्होंने किताब मांगी मिताली ने झट से निकाल कर दे दी,

मैंने राहत की सांस ली ,

कहीं मुझसे मांग लेते तो मुसीबत खड़ी हो जाती,

आप सोच रहे होंगे किस बात की तो मै आपको बता दूं कि मैं एक सम्पूर्ण हल कि गाईड खरीदता था बस कोई पुस्तक पुस्तिका नहीं ओनली गाइड , जिसके कई फायदे थे , एक तो कॉपी कंप्लीट करने की चिंता खत्म , पास होने जितने आई एम पी मिल जाते थे, और इसके पन्ने एग्जाम टाइम में फाड़ कर खर्रे बनाए जा सकते थे , तो यदि किताब मुझसे मांग ली जाती तो सज़ा मिलना तो तय था ना।

" हां तो प्रश्न है, 'उसने कहा था' शीर्षक से आप क्या समझते है?"

सर ने सन्नी की तरफ़ उंगली घुमाई और उत्तर के लिए खड़ा किया, सन्नी नीचे मुंडी करके खड़ा हो गया उसे नहीं पता था,

उसको कान पकड़ के खड़े रहने की सज़ा दे दी गई ,

अब मेरी बारी थी,

मैंने सोचा आता तो है नहीं बाकी ऐसा जवाब दूं की सब क्लास हंसे और मै फोकस में बना रहूं , और खास कर मिताली के, ध्यानाकर्षण की यह युक्ति मुझ पर भारी पड़ गई,

" उसने कहा था शीर्षक में हमे उस व्यक्ति के बारे में जानकारी मिल गई है जिसने कहा था, अब जाके उसको ठोकना भर रहा गया है।"

सब हंसने लगे , " चुप ,चुप हो जाओ मूर्खों कोई नहीं हंसेगा मै बाहर कर दूंगा।" सब धीरे धीरे चुप हो गए।

सर जी ने स्केल निकाल कर मेरी पिटाई लगाई और डेस्क के ऊपर हाथ ऊंचे करवा कर खड़ा कर दिया।

, लो सोचा था हीरो बनेंगे ये तो बड़ी बेज्ज़ती हुई,

मिताली अगले पीरियड से मुझे देख कर मुंह बनाने लगी जैसे मै कोई घिनौना आदमी हूं,

अगला पीरियड विज्ञान का था ,

उसमे होम वर्क न करने के कारण सजा मिली,

अब तो हद है दो पीरियड से लगातार खड़े होकर हाथ दुखने लगे थे बार बार नीचे की तरफ़ अा रहे थे , इधर पैरों के घुटने भी बार बार मुड़ने लगे थे,

अब सबसे डरावना पीरियड था गणित का जितना विषय भयंकर उससे ज्यादा उसके मास्टर जी थे।

ऐसे ऐसे सवाल हल करने को देते थे जो किताब में भी नहीं होते थे, उनका विचार था कि यदि आपको कॉन्सेप्ट समझ अा गया है तो फिर सवाल कहीं से भी आए आपको बन जाना चाहिए , पर उनका ये दर्शन हमारे दर्शन से अलग था, सवाल रट कर आने वाले लोगो का एक अलग समूह होता है बस एक समानता यहां मिताली और मेरे बीच थी कि हम दोनों इसी समूह से आते थे,

गणित वाले सर आए और कॉपी में होम वर्क खोल कर डेस्क पर रखने के लिए कहा ,

उनके रेट फिक्स थे कोई मोल भाव नहीं,

होम वर्क ना करना दस स्केल ,

अधूरा करना पांच स्केल,

कॉपी घर छोड़ आना दस स्केल,

कल नहीं आया था कि स्थिति में सज़ा छुट्टी के लिए आवेदन देने ना देने पर निर्भर करती थी।

मेरा रिकॉर्ड था एक बार मैंने पांच स्केल खाए थे बाकी रोज़ दस ही खा रहा था,

मैंने मुड़ कर मिताली कि तरफ़ देखा उसकी आंखो में आंसू थे,

मैंने उससे धीरे से पूछा "रो क्यों रही है?"

उसने आंसू पोछे और कहा " आगे देख।"

वाह क्या बेज्ज़ाती हुई थी मेरी मैंने इधर उधर देखा कि किसी ने , सुना तो नहीं।

सर आए और सन्नी और मुझे दस स्केल मारे, आज का दिन मिताली के लिए रोज से अलग था क्यूंकि आज एक भी स्केल ना खाने वाली को पांच स्केल पड़ चुके थे।

रिसेस की घंटी बज गई।

सब टिफिन लेकर बाहर लंच हॉल में चले गए , पर वो नहीं आई, वो रो रही थी , उसको देख कर मैंने सन्नी को जाने का इशारा किया और मै उसके साथ अकेला क्लास में रहा गया,

मैंने उससे कहा " होता है ये , इसके पीछे खाना नहीं खाएगी क्या, देख मुझे तो दस स्केल पड़े मै रो रहा हूं क्या? रो मत टिफिन निकाल और चल ।"
 
उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा और जितनी मन की भड़ास थी निकाल दी, तब जाकर पता चला रोने कि असली वजह मै ही था, उसके बारे में एक चीज़ पता चली कि वो पढ़ने में ठीक थी बस उसका गणित कमज़ोर था, हर रोज जो गणित के जो सवाल रह जाया करते थे वो मयंक से पूछ कर क्लास में होम वर्क कंप्लीट कर लिया करती थी, लेकिन मेरे जैसा लुच्चा उसकी इसमें क्या मदद कर सकता था।

उसने मुझसे इतनी लाचार आवाज़ में रिक्वेस्ट कि

" प्लीज़ राहुल तुम अपनी जगह पर वापस चले जाओ और मयंक को आगे भेज दो।"

उसके सुंदर आंखो से निकल रहे आंसू मुझसे नफ़रत और मयंक की चाहत बयां कर रहे थे, मै तो सोचता था दादागिरी दिखाने वाला सबको हंसाने वाला हीरो होता है, बाकी क्लास की आगे बैठने वाली दुनिया क्लास की पीछे बैठने वाली दुनिया से बहुत अलग होती है, ये आज पता चला था

ये अगड़े लोगो की दुनिया थी , पिछड़े लोगों से अलग ;

मै यदि आज आगे नहीं बैठता तो कितना बेखबर होता मिताली की पसंदगी - नापसंदगी से , उसे पढ़ने- लिखने वाले इज्ज़तदार और स्मार्ट वर्कर्स पसन्द थे , जिनको टीचर्स भी इज्ज़त की नज़र से , देखते थे , मै तो पूरा उल्टा था ।

आज मेरी आंखे खुल गई थी , पूरा नज़रिया बदल चुका था आप कह सकते हो की मुन्ना भाई फिल्म उस समय अाई होती तो मै अपने सर्किट जैसे दोस्त सन्नी को यही कह रहा होता की "ऐ सर्किट! अपुन को साला इस क्लास का नहीं , अख्खी स्कूल का टॉपर बनने का है ,क्या।" ,
 
3. अंधा प्यार त्याग नहीं देखता(आगे....)

मैंने अपना बैग उठाया और पीछे वापस अपनी जगह पर जा कर बैठ गया , आज की इस वापसी को लौट के बुद्धू घर को आए नहीं कह सकते थे, ये "गए थे बुद्धू समझ के आए" जैसा कुछ हुआ था।

मिताली ने मुझे पलटकर देखा तो मै उसके मयंक का बैग वापस उसकी अपनी पुरानी जगह पर ला रहा था, जो जगह ना सिर्फ मिताली की डेस्क के क़रीब थी बल्कि उसके दिल के भी करीब थी।

उसने खाना नहीं खाया था, खाया तो शायद मैंने भी नहीं था पर मुझे उसके ना खाने की बात दिलों दिमाग में छप गई थी इसलिए उसके केस में ' शायद ' शब्द की कोई जगह नहीं थी।

रिसेस खत्म होने की बेल बज चुकी थी सारे बच्चे खा पी कर, खेल कूद कर अपनी अपनी कक्षाओं में लौट रहे थे,

मयंक ने मुझे अपनी जगह पर वापस देखा तो पूछा

" क्या हुआ भाई?"

"कुछ नहीं, तू अपनी जगह पर वापस चले जा।"

"क्यों?" बड़े ही व्यंगात्मक लहज़े में उसने पूछा।

उसके क्यों में असल में मेरी नाकामयाबी का मंज़र छुपा था ,वो आगे बढ़ा अपनी जगह पर बैठते हुए उसने मिताली को हाय किया मिताली का मूड मुझे उसकी जगह पर बैठा देख कर जितना आफ़ हुआ था उससे कई तेज़ी से मयंक को वापस अपनी जगह पर देख कर ऑन हो गया,

"ओ हाय।"

इस बार मुस्कुरा कर उसने जवाब दिया था।

हम लड़के अक्सर अपनी साइड देखते है की हमने कितना त्याग किया बंदी के लिए पर कभी ये नहीं देखते कि बंदी सामने वाले के प्यार में कितनी अंधी है , तुम बेचारों का त्याग उसे दिखेगा भी? कुछ ऐसा ही मेटर मेरे साथ होगया था , छोटी सी मयंक की जगह मयंक को वापस क्या कर दी थी, ऐसा मान बैठा था मन ही मन जैसे बहुत बड़ा त्यागी पुरुष हूं मिताली मेरे बारे में जरूर कुछ ना कुछ अच्छा सोचेगी, बाकी देखो उस लड़की को जरा भी कदर नहीं मेरे त्याग की।

आज की स्कूल खत्म होने में और रोज की स्कूल खत्म होने में अंतर था,

स्कूल छूटी और मै भी अपने दोस्त के साथ बाहर आया ,आज मेरा ध्यान उन शरीफों की चाल ढाल देखने में था जिनके बापों की कॉलर खड़ी और मां की बातों में घमंड होता है पूरे रिश्तेदारों के बच्चे , इन्हीं बच्चों का नाम और परफॉर्मेंस सुन कर बड़े होते है।

"अरे सन्नी ये तो वो चेहरे है रे जो कभी ग्राउंड पे नहीं दिखते।"

" अबे अपने जैसे थोड़े ही है , घर जाकर थोड़ा बहुत घूमते फिरते होंगे और पढ़ाई में लग जाते होंगे।" सन्नी ने कहा।

"सुनना "

"बोल"

" देख, ना अपने पास कॉपी कंप्लीट है ,ना अपने पास बुक्स है, कैसे अच्छे मार्क्स लाएंगे?" मैं बड़ी दुविधा में था।

" अब छोड़ ना तू भी अगर पढ़ने कि बातें करेगा तो क्लास में मेरा दोस्त कौन रह जाएगा।" सन्नी ने रोने कि एक्टिंग करते हुए कहा।

"नहीं रे सन्नी अब तो बहुत होगई , देख सामने देख रहा है, वो मिताली ?"

" हां , उसकी सहेली के साथ जारही है , पास में मयंक और उसका दोस्त जा रहा है , मिताली मयंक बातें करते जारहे है ,और कुछ भी कमेंट्री करूं?" सन्नी ने कहा।

, " सन्नी वो जा नहीं रहे , बहुत आगे जा चुके है।"

" अरे तू यार बहुत सीरियस हो गया है मै बोर होजाऊंगा फिर, कट्टी कट्टी जा तू ..।"

" अबे तेरी ये मजाक बंद करेगा तू? "

सन्नी ने मेरी तरफ देखा ,

"तुझे पता है , खाली एक ही वजह है ,मयंक अच्छा पढ़ता है, उसी वजह से वो उसे पसंद करती है, उसकी हेल्प कर देता है यार।"

"हां यार बात तो तूने सही कही , और यहां साला हम अपनी खुद की हेल्प नहीं कर पाते।"

"बहुत हो गया सन्नी इस बार कुछ करके दिखाएंगे भाई मेरे।"

" एक मिनिट तू मुझे क्यूं घसीट रहा है।"

" चल ठीक है मै ख़ुद ही करूंगा अकेला।"

" पढ़ाई ई ई.... मै आरहा हूं।"

" एक मिनिट आज वीडियो गेम नहीं खेलेगा क्या?"

"नहीं"

" तो मां पूछेगी कि एक दम से क्या हो गया इतना पढ़ रहा है , क्या जवाब देगा अंटी को, बोल?"

मै सोच में पड़ गया बात तो अक्ल के पैदल ने सही कही थी आज, एग्जाम के टाइम तक तो मां को बोलना पड़ता है कि बेटा पढ़ ले, बेटा पढ़ ले, अब अचानक से पढ़ने बैठ गया तो मां को शक तो हो जाएगा कि बात तो कुछ है और अगर कहीं ये अंदाज़ा लगा लिया कि मै मास्टर जी से डर गया हूं, इसलिए पढ़ रहा हूं तो अपने लिए तो बड़ी शर्म की बात होगी, अरे इज्ज़त की धज्जियां उड़ जाएगी भाई।

पर जो कुछ भी हो मुझे एग्जैक्टली वैसा ही बनना है , जिसमें मिताली मुझे पसंद करे।

अगर उसका हीरो मेरे जैसा दबंग नहीं कॉमेडी नहीं तो कोई बात नहीं ।

" हर बात होगी मुझमें जो तुझे अच्छी लगे,

होगी तू मेरी ही इस जनम में ,

, चाहे कितना भी मुझे दम लगे।"

अब देखना आगे मै क्या करता हूं....,

4. वो यहां कैसे?

अब सबसे बड़ी समस्या तो ये है कि गाइड से ,पास होने जितना तो काम चल जाएगा पर टॉप करने जितना नहीं, कहीं से बुक्स और नोट्स जुगाड़ने पड़ेंगे।

"नवंबर ख़त्म होने को है , कौन मदद करेगा ?"

अब तो हाफ ईयरली एग्जाम सामने अा चुकी थी कोर्स लगभग पचहत्तर प्रतिशत ख़त्म हो चुका था , सारे पढ़ने लिखने वाले बच्चे जोर शोर से पढ़ाई में लगे हुए थे, अब क्या किया जाता ?

जब सारे रास्ते बंद हो और मन कुछ पाने की ज़िद पर अड़ जाए , तो कभी - कभी ऐसी मजबूरियों की नाव आदमी को बेईमानी के घाट उतार देती है ।मैं भी कुछ ऐसा ही रास्ता अख्तियार करने की तैयारी में था ।

पुस्तकें खरीदने का रास्ता निकल आया था, मैंने घर में कहा "नए टीचर के पास ट्यूशन लगवा रहा हूं , उनके यहां जाने से बहुत सारे फ्रेंड्स अच्छे नंबर ला रहे है?"

मां ने कहा" हां तो वो फ्रेंड्स घर पर पढ़ते भी तो होंगे तेरी तरह तो होंगे नहीं।"

"लेकिन मां इस बार मै पढूंगा।"

"क्यूं स्कूल में टीचर्स ने पिटाई लगाई क्या?"

मां ने तो ओवर की पहली गेंद पे मेरे स्टंप उखाड़ दिए ,

"अरे नहीं , मै तो अपनी मर्जी से पढ़ रहा हूं, वो सन्नी ने कहा है कि इस बार यदि वो अच्छे नंबर लाएगा तो उसके पापा साइकिल दिलाएंगे उसे, अब वो पढ़ने में लग गया है तो सोचा मैं भी पढ़ ही लूं।"

पीछे से आवाज़ आई " यदि तुम्हारे भी अच्छे नंबर आए तो तुम्हारे पापा भी नई साइकिल दिला देंगे।" मुड़ कर देखा तो पापा खड़े थे बस घर आए ही थे । पिता जी एक सरकारी नौकरी में थे ,इस वजह से बाहर रहते थे मुझे और मां को यहां शहर में रख रखा था।

मै दौड़ कर पापा के पास गया और उनसे चिपक गया ," थैंक्यू पापा "

हर मां बाप अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए अपनी औकात से ज्यादा खर्च कर सकते है।

"लेकिन मुझे ट्यूशन जाना पड़ेगी ।"

" ठीक है ,तो जाना ,रोका किसने है मेरे शेर को?"

" वो मास्टर जी दो महीने की फीस एडवांस में लेते हैं।"

"ठीक है मुझे बता देना कितनी फीस है ?"

"ओके पापा"

मेरा काम बन गया था । मै एक सीढ़ी चढ़ चुका था ।

मैंने अगले दिन सुबह पापा से पैसे ले लिए , और स्टेशनरी पर जैसे ही बुक खरीदने गया ,

" भैय्या ,ये बुक्स देना।"और दुकानदार के हाथ में पुस्तकों कि लिस्ट पकड़ाई , वो जैसे ही निकाल कर लाया, कि मेरे बाजू में एक ग्राहक ने आवाज़ दी " भैया , एक रफ़ कॉपी दे दो।"

आवाज़ तो बहुत जानी पहचानी है , ऑफकोर्स सही सोच रहे है आप ,ये मिताली ही थी।

मै उधर मुंह करके खड़ा हो गया ताकि वो देख ना सके , मैंने उसके तरफ़ देखा नहीं था , सिर्फ आवाज़ से ही पता लगा लिया था कि ये मिताली है,

उसने काउंटर पर रखी कक्षा आठ की बुक का सेट देखा तो अपनी सहेली से कहा " देख इस समय भी लोग किताबें खरीदते है।"

मेरा मुंह उधर और कान इधर थे उनकी बातें सुनाई दे रही थी।

, "अरे ! ऐसा भी तो हो सकता है कि पुरानी बुक्स फंट गई हो या चोरी हो गई हो।" उसकी सहेली ने कहा।

दुकान के नौकर ने रफ कॉपी निकाल कर दी, गल्ले पर बैठे सेठ ने दोनों सामानों का इकठ्ठा मूल्य बता दिया, पर मैंने मुंह ना घुमाया,

"अरे भैया मेरी सिर्फ रफ कॉपी है।" मिताली।

" ऐ लड़के ये लो तुम्हारी पुस्तकें और उसका बिल।"

"हां अंकल जी।"

मुझे लगा वो निकल गई होंगी , पर कहां की निकली; कॉपी को बैग में रख रही थी , हमारी नजरें मिल गई ,

मेरे साथ अचानक में भयानक घट गया,

वो दोनो मुझे देख कर एक दूसरे को ताली देकर हंस पड़ी; मिताली ने कहा

" तू बुक खरीद रहा है ?"

"हां ।"

"क्यूं तुझे क्या जरूरत पड़ गई, तेरे पास तो गाइड होती है ना?"

" बस ऐसे ही वो सन्नी को पढ़ना है, बुक से।"

" अरे वाह! दोस्ती हो तो ऐसी।"

वो बहाने समझ तो गए थे कि खिसियानी बिल्ली खंबा निपोर रही है, लेकिन ना समझ पाई होगी तो वो ये बात कि ये सब उसके लिए ही तो पागलपन कर रहा था।

अब किताबें मिल चुकी थी , नोट्स जुगाड़ने बाकी थे।

"यार सन्नी नोट्स कहां से मिलेंगे , अपनी क्रेडिट तो इतनी खराब है कि कोई अपनी कॉपी भी नहीं देगा हमे।"

" भाई तू चिंता मत कर ये जिम्मेदारी मेरी।"

"यार सच्ची; दोस्त हो तो तेरे जैसा।" मैंने कहा।

" अरे भाई तू ये छोड़ , नई वाली साइकिल पे ध्यान लगा, मुझे भी चलाने देगा ना तू?"

इधर उधर मुंडी घुमा के सन्नी बोला ,

" भाई वो गेयर वाली लेना यार क्या मस्त लगती है।"

" अरे ओ गंगाधर पहले नोट्स तो ला कर दे।"

, दो दिन गुजर गए ,

शाम को जब सन्नी घर आया तो बाहर से ही आवाज़ लगाता हुआ आया ,

"राहुल .... जल्दी बाहर अा .."

मै घबराकर बाहर आया"क्या हुआ ?"

उसने बैग खोला और नोट्स निकाल कर बताए " ढेन टेडेन .. देख, सारे सब्जेक्ट्स के है।"

मैंने ध्यान से देखा सबके आगे पीछे के पन्ने फटे हुए थे।

"तूने ये कैसे फटेले नोट्स लाया रे।"

"देख सबसे मांगा किसी ने कॉपी दी नहीं , तेरे भाई ने ताड़ ली। अब चोरी का माल है आगे के पन्ने फाड़ दिए जिस पर नाम लिखा था।"

चलो पढ़ना तो था , किताबें नोट्स और गाइड अब ज्ञान अर्जन से किसी का बाप नहीं रोक सकता था।

" पर इस बीच एक गड़बड़ बहुत बड़ी हो गई , होशियारी सारी धरी रह गई।",
 
5. सब गड़बड़ सडबड़ हो गया

दूसरे दिन जब हम स्कूल गए तो पिंकी रो रही थी,

वो हमारी क्लासमेट थी , मेरे दो डेस्क आगे ही बैठती थी,

"सन्नी ये क्यों रो रही होगी?"

"अरे! ऐसे लोगों से खुद का समान नहीं संभलता मार दिया होगा किसी ने।"

मैंने सन्नी की तरफ़ देखा तो उसने मुझे आंख मारी।

मैं भांप चूका था कि ये कारनामा इसी का है।

" तूने इसी के नोट्स उड़ाए है ना?"

सन्नी ने मेरी तरफ देखा और हां में अपना सर हिलाया।

मैं भी हंस दिया।

इस समय , मै इतना ख़ुदग़र्ज़ हो गया था कि , अच्छा बुरा कुछ समझ नहीं आरहा था , बस एक ही जुनून सवार था फर्स्ट आने का।

जिस तरह आज के ज़माने में हर किसी को किसी भी शर्त पर बस अपना फ़ायदा चाहिए।

हमारी आज कि स्कूल ख़त्म हुई मै पहली बार पूरा होम वर्क करके आया था , मुझे आज स्केल नहीं पड़े बल्कि शाबासी मिली ।

सच पूछो तो आज ज़िन्दगी में पहली बार इज्ज़त क्या चीज़ है उसका स्वाद चखा था ।

शाम को मैंने ट्यूशन जाना छोड़ दिया था ,

घर से बाहर पार्क में बैठ कर सेल्फ स्टडी करना शुरू कर दिया था, ताकि पुराना कोर्स खत्म हो जाए और स्कूल के टीचर्स के साथ साथ अा जाऊं।

जब अगले दिन स्कूल आए तो , आज का मंज़र ही अलग था,

मेरी मिताली रो रही थी , उसका सुबकना मुझसे देखा नहीं जा रहा था,

" सन्नी आज ये क्यों रो रही है?"

" राहुल मुझ पर शक मत कर प्लीज़, सबकी कॉपी ले सकता हूं पर इसकी नहीं, मेरे भाई की ख़ुशी है वो ,उसके साथ गलत नहीं करूंगा।"

" फिर क्यों रो रही है?"

मयंक उसको चुप करा रहा था,

उतने में सर क्लास में आ गए।

"क्यों मिताली बेटा , क्यों रो रही हो?"

मिताली ने सारी बात रोते हुए सर को बता दी ।

सर " पिंकी यहां आओ।"

पिंकी सर के पास अाई,

"तुम इसकी कॉपियां क्यों नहीं लौटा रही हो?"

पिंकी की गर्दन झुक गई ,

" सर, असल में मिताली कि सारी कॉपियां खो गई है मुझसे।"

"क्या ???"

" नेक्स्ट वीक से एग्जाम है , और तुमने उसकी कॉपी खो दी , तुम्हारे जैसी लड़की से ऐसी उम्मीद नहीं कर सकता था मै।"

सर बहुत नाराज़ हुए , इस के बाद पिंकी के आंखों में फिर से गल गले अा गए, और मेरी आंखो में भी।

पूरा माजरा समझ अा गया था, सन्नी ने जो नोट्स पिंकी के बैग से ट्यूशन में चोर लिए थे असल में वो मिताली के थे,

"सन्नी तूने मिताली के नोट्स चोर लिए?"

"नहीं भाई मैंने तो पिंकी के नोट्स ताड़े थे यार।"

उसने हर बार की तरह सोचने के लिए इधर उधर गर्दन झटकी और फिर उसे याद आया;

, "अरे एक गड़बड़ हो गई , आगे का पन्ना फाड़ते वक़्त ये नहीं पढ़ा था कि उस पर नाम किसका लिखा था।"

मैंने कन्फर्म करने के लिए अपने बैग से चुपके से एक कॉपी निकाली और उसमे देखा किसी का नाम नहीं दिख रहा था।

पर जब मैंने कॉपी के पन्ने पलटकर देखा तो एक जगह बहुत छोटे अक्षरों में " M //cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/2764.svgM " बना हुआ था।

अब दोनों बातें क्लियर हो गई थी, एक तो ये कि कॉपी मिताली की थी, दूसरी ये की मिताली ने मयंक को 'लाइन क्लियर' (रेलगाड़ी को आगे जाने देने का संकेत) दे दिया था।

आज मुझे जिंदगी ने एक सबक सीखा दिया था ,

बुराई का रास्ता हथियार की तरह होता है, जो सामने कौन है देख नहीं पाता ,बस चीरता चला जाता है, जैसे आज हुआ था, पिंकी के साथ बुरा होने पर हंसने वाला दरअसल खुद की जान की जान निकाल चुका था, बुरा किया था पिंकी के साथ, सोचा भी नहीं था हो कुछ ऐसा जाएगा।

मिताली के आंसू की वजह फ़िर एक बार मै ही था,

उसके आंसुओं ने मेरे अंदर के सत्यवादी हरीशचन्द्र को जगा दिया था,

मै खड़ा हुआ और कॉपी को हवा में लहराते हुए कहा

"कहीं ये तो तुम्हारी कॉपी नहीं है?"

उसने मेरी तरफ देखा , फिर पूरी क्लास मेरी तरफ देखने लगी,

मिताली मेरे पास आई और मेरे हाथ से कॉपी ली,

पलट कर देखा आगे का पन्ना गायब , आगे पीछे से फटी उसकी ही कॉपी थी , उसने कॉपी उठाई और एक जोर का तमाचा मेरे गाल पर रख दिया, इस वक़्त गुस्से में वो कराल काली का अवतार नज़र अा रही थी।

सर भी अा गए ,और मुझे मारते हुए प्रिंसिपल के पास ले जाया गया।

प्रिंसिपल ने मेरे घर मां पापा को सूचना भिजवाई,

" अपने लड़के पर ध्यान दें , चोरी करना सीख रहा है पढ़ने में भी , ध्यान नहीं है , स्कूल के दूसरे बच्चे भी आए दिन इसकी शिकायतें करते है , यदि इसका ऐसा ही रवैया रहा तो हमे मजबूरन स्कूल से निकालना पड़ेगा, उसका जिम्मेदार आप और आपका बेटा होगा।"

मार तो हमेशा से खाई थी, पर आज की नैतिक पतन की मार दिल पर असर कर गई।

घर पर भी मां ने खूब पिटाई लगाई कोई सुनने को तैयार नहीं था, होता भी क्यों और सच्चाई भी यही थी कि मैंने बहुत ग़लत काम किया था , भले सन्नी ने किया था पर मेरे कहने पर ही किया था, इसलिए चोर का साथी भी एक चोर ही था।

आज से कसम ली कि ऐसा अब से नहीं करूंगा, लक्ष्य तो पाना है पर सही की राह पर चलकर,

खैर, अब क्या मतलब था इन सब बातों का ,

मिताली के दिल में मेरा नाम अब नफ़रत वाले कॉलम में जुड़ चुका था ।

लेकिन आप सुन लीजिए ! सही का अंजाम भी सही ही होता है ज़रूरी नहीं, यकीन नहीं तो आगे देख लो....,
 
6 . सही का अंजाम ग़लत

मैंने अब तय किया कि सही रास्ते से मंजिल पाऊंगा ।

एक पल को लगने लगा था कि मेरी अब सारी मेहनत बेकार है,

क्यूंकि इस घटना के बाद मिताली के दिल में अपनी जगह तलाशना, अतल तल में मोती तलाशने जैसा हो गया था।

पर मैंने सोचा कि यदि मै हार मान गया ,तो मिताली को पक्का खो दूंगा, लेकिन कुछ करता रहूंगा तो हो सकता है ऐसा कुछ हो जाए कि मै फ़िर से मैच में वापसी कर पाऊं।

मैंने फिर भी पढ़ाकू बनने का इरादा नहीं छोड़ा , मै पढ़ता चला गया ।

हॉफ ईयरली ने भी निराश किया , इतना पढ़ने के बाद भी

मात्र फर्स्ट डिवीजन बना, घर के लोग मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं युद्ध जीत कर लौटा हूं।

पापा ने मुझे साइकिल ला कर दी , मां ने आस पड़ोस में मिठाईयां बांटी, मुझे एक तरफ लग रहा था कि मेरे मां पापा बस इतनी सी उम्मीद रखते थे कि मै अच्छे से पढ़ लिख लूं , बस इतनी सी, देखो उनके चेहरे कैसे खिल खिला उठे है, दूसरी तरफ़ मन में ये टीस थी की मैंने अपना लक्ष्य हासिल नहीं किया था।

आज पहली बार ख़ुद से उम्मीदें इतनी बढ़ गई थी कि मेरे मां पापा की उम्मीदों के भी पार हो गई थी।

शायद यही वो दौर था जिसमें लोग अपने सपने फॉलो करना सीखते है।

अंततः यदि मेरे पास वो कॉपी मिताली की नहीं होती तो मेरी मार्कशीट कुछ और बयां करती,

जो शायद मेरा एग्जाम रिजल्ट तो सुधार देती, पर मेरी शक्स‌ियत हमेशा के लिए बिगड़ जाती ।

फर्स्ट रैंक तो क्या इतनी मेहनत पर सिर्फ फर्स्ट डिवीजन भी बड़ी मुश्किल से बाउंड्री पर बन पाया,

कहीं औकात से ज्यादा तो टारगेट सेट नहीं कर लिया था मैंने ?

पर कुछ भी कहो ,सही अंज़ाम पाने की दिशा में सही रास्ता ज़रूर मिल गया था,

पर अभी सही का अंजाम सही नहीं था।

अब नेक्स क्लास में देखना क्या तांडव होता है।
 
7. पास वो आने लगी ज़रा ज़रा...

कक्षा नौ की कहानी में एक छोटा सा मोड़ अा गया, जिसे हराना था वो खुद ही रास्ते से हट गया, मतलब ये कि मयंक अब हमारी स्कूल छोड़ चुका था , उसके मामा बड़े शहर में रहते थे, वो आगे की पढ़ाई के लिए उनके घर चला गया।

यहां समझ यह नहीं अा रहा था की ख़ुशी मनाऊ या गम,

गम इस बात का कि मै उसे हराता उसके पहले वो स्कूल से चला गया, ख़ुशी इस बात की , कि चलो ये दूरियां मिताली और मयंक के बीच की नजदीकियां तो कम कर ही देगी कम से कम ,

इस बार मै क्लास शुरू होते ही पढ़ाई को लेकर सीरियस था,

एकाग्रता से अपने लक्ष्य को साधने में लगा था, हां वो बात अलग है कि बात बात पर मिताली की बातें याद अा जाया करती थी , बातें , सुनकर चौंक गए ना ? हां बातें ,वो आज कल मुझसे हल्की फुल्की बातें कर लिया करती थी जो दिन भर मेरे कानों में गूंजती रहती थी, पर मेरा लक्ष्य मुझे भटकने नहीं देता था।

इससे ज़िन्दगी की एक गहरी सच्चाई के साथ सामना हुआ , वो यह थी कि हमे सही जगह फ़ोकस करना चाहिए, जब फ़ोकस मिताली पर हुआ करता था तो वो मुझसे दुर दुर हुआ करती थी , अब फोकस उस चीज़ पर लगा दिया जो मिताली को आकर्षित करती थी ,तो बिना मेहनत वो अपने आप मेरे करीब आने लगी,

मेरे दिल के बैकग्राउंड में एक गाना बजने लगा था,

'पास वो आने लगी ज़रा ज़रा....."

और हां एक और बात ,अब जब भी मै स्कूल आता था , तो दूसरे बच्चे मुझे बड़े उत्सुकता से देखते थे ,

बताईए क्यों?

क्योंकि, मै गियर वाली साइकिल से आता था, जो

हमारे छोटे से शहर में सिर्फ दो थीं , जिसमें एक मेरी थी,

जी हां पापा ने अपना वादा पूरा किया , मेरे फर्स्ट डिवीजन आने का उपहार था मेरी साइकिल।

पूरे साल अच्छी मेहनत करने के बाद ,

एनुअल एग्जाम के महज़ दो महीने पहले कुछ परिवर्तन देखने को मिले,

जैसे - टीचर्स आज कल मेरी इज्ज़त करने लगे थे ,

मेरे पिताजी की कॉलर मेरे लिए खड़ी होने लगी थी , मेरी मां की बातों में मेरे लिए घमंड के मसालों का छोंक साफ साफ महसूस किया जा सकता था,

और गणित के जो सवाल पूरी क्लास से हल नहीं होते थे वो मै कर दिया करता था , ये सबसे बड़ी जीत थी क्यूंकि इसी वजह से मिताली अब आगे की डेस्क पर नहीं , मुझसे अच्छी दोस्ती हो जाने के कारण और गणित का होम वर्क पूरा करने का मयंक के बाद मेरा साथ एक मात्र विकल्प होने की वज़ह से वो अब पीछे ठीक मेरे बाजू वाली डेस्क पर बैठने लगी थी, और एक बड़ा परिवर्तन ये था कि सन्नी अब मेरा दोस्त नहीं रहा हमारे रास्ते अलग हो चुके है अब,

परीक्षा अा चुकी थी सब अपनी अपनी पढ़ाई में लग गए

एग्जाम तो मैंने दे दी पर इस बार का मामला कुछ अलग ही होगया।,
 
8. रिजल्ट का दिन

आज का दिन मेरे लिए बहुत ही खास है, क्यूंकि मैंने टॉप आने के लिए साल भर मेहनत की थी, इसलिए मुझे आज के दिन से बहुत उम्मीदें थीं , अब तक की क्वॉटरली एग्जाम और हॉफ ईयरली एग्जाम में मैंने उतने अच्छे अंक हासिल नहीं किए थे , जितना क्लास में , मै टीचर्स के सामने परफॉर्म कर रहा था,

मेरे टीचर्स को भी आश्चर्य तो हुआ था कि इसके नॉलेज के हिसाब से अंक कम है पर किसी टीचर को क्या पड़ी है किसी की ? इतने सारे स्टूडेंट्स है अब किस किस को व्यक्तिगत रूप से प्रशिक्षण दें।

अंततः मै मां के साथ रिजल्ट लेने पहुंचा , मां ने स्कूल के अंदर आते आते कहा कि " मुझे तो लग रहा है इस बार तेरा नाम बाहर , बोर्ड पर पहले नंबर पर ही दिख जाएगा ।"

जैसे ही अंदर पहुंचे की पूरा बोर्ड दो बार चेक कर लिया ,

वहां सिर्फ तीन नाम लिखे पहला , दूसरा और तीसरा उसमे मैं नहीं था , मेरी आंखों से आंसू टपकने लगे,

इतनी मेहनत के बाद भी फल ना मिले तो दुःख तो होता ही है,

मां ने समझाया " अरे ये क्या लड़कियों कि तरह रो रहा है, अगली कक्षा में और अच्छे से पढ़ना , चल अंदर रिजल्ट लेकर आते है।"

हम अंदर गए ,

सोचा था कि इस बार जब टीचर मेरा रिजल्ट देंगे तो हमे बड़े सम्मान के साथ देंगे, पर मेरे जैसे बहुत सारे ठीक ठाक पढ़ने वाले स्टूडेंट्स थे जिनके परसेंट मेरे आस पास बने थे,

बात असल में इसलिए ज्यादा खल रही थी, क्यूंकि

फर्स्ट आकर , ना मुझे पापा से गिफ्ट चाहिए थे, ना मां को खुश करना था , मां तो अपने बच्चों से वैसे भी हर हाल में खुश रहती है बस दिखाती नहीं,

बात मिताली की थी , जो अब अच्छी दोस्त तो बन गई थी , पर मेरी भी एक ज़िद थी कि जब तक मै फर्स्ट नहीं अा जाता , और मयंक की जगह नहीं ले लेता , मैं मिताली को प्रपोज नहीं करने वाला हूं,

लेकिन आज के रिजल्ट ने मुझे अन्दर तक हिला दिया था, वही नॉर्मल परफॉर्मेंस सत्तर की लाइन में, मुझे तो ख़ुद से किया वादा एक बार को असंभव लगने लगा था,

मेरी पढ़ाई की प्रेरणा सिर्फ और सिर्फ मिताली थी,

उसको पाने कि सनक ने मुझे लड़ाकू से पढ़ाकू बना दिया था ।

हम रिजल्ट ले रहे थे तभी मिताली भी उसके पापा के साथ रिजल्ट लेने आई,

उसका दीदार अक्सर यूनिफॉर्म में होता था या फिर नॉर्मल ड्रेस में , आज लाल और काले का मैचिंग वाला खास टॉप एंड जीन्स उसको और भी खास और सेक्सी बना रहा था,

कक्षा नौ में जवानी लड़िकयों की काया पर दस्तक दे देती है , जैसे कलियां खूबसूरत फूल बनने को तैयार बैठी हो ,

तेज़ धूप की रोशनी में चेहरा और रोशन दिख रहा था , कमसिन ऐज में अच्छी हाइट, लड़कियों की खूबसूरती में चार चांद लगा देती है , क्रॉस ब्लैक पर्स में से उसने पेन निकालकर अपने पापा को दिया जो आज पेन लाना भूल गए थे,

मैंने उसे हाई किया ,

उसने गाल पर आती हुई लट को हर बार की तरह उंगलियों से सरकाकर कहा"ओ हाई"

दोस्तों ये ' ओ हाई ' वही हाई था जो मयंक को मिला करता था और जिसे पाने के लिए मै बेकरार था,

उसने पापा की तरफ इशारा करके मुझसे कहा " पापा है।"

, इशारे से पूछा तुम्हारे साथ कौन आया है ,

मैंने लिप्सिंग की " मम्मी"

जब तक मां ने मुझे मिताली से इशारों में और फुसफुसा कर बातें करना देख लिया , एकाएक उसकी और मां की नज़रे मिल गई, उसने मां को नमस्ते किया,

मां बोली "ये कौन है?"

मैंने कहा " मेरी क्लामेट है , अच्छी दोस्त है मेरी।"

मन कर रहा था कि मां से सब पूछ लूं " मां कैसी लगी?, संस्कारी है कि नहीं , सुंदर है कि नहीं ?" सारी समीक्षा मै आज ही चाहता था , पर उसके लिए मै बहुत छोटा था कि मां को उसकी भावी बहु का दीदार आज ही करा पाता।

मां तब तो कुछ नहीं बोली , पर जब हम घर वापस अा रहे थे , तो रास्ते भर मुझे समझाते गई, "अरे बेटा तू इतना अच्छा पढ़ रहा है, देख आगे बोर्ड एग्जाम अा रही है , ऐसी उमर में थोड़े कदम बहकते है , ध्यान पढ़ाई से हट जाता है।"

मैंने कहा " मां कहना क्या चाहती हो?"

"अरे बेटा तू ना लड़कियों से ज्यादा दोस्ती मत रख सब ना तेरा ध्यान पढ़ाई से हटा देगी वो।"

मतलब मां एक झटके में समझ गई थी , मां आखिर मां होती है,

बाकी अब उनको बताए कौन , की मै तो उसके लिए ही पढ़ लिख रहा हूं।

उसका प्यार हासिल करना ही मेरी एक मात्र प्रेरणा है।

अच्छा इसके साथ एक बात और है , जब मै बिगड़ा बच्चा हुआ करता था तो मुझसे कोई उम्मीद नहीं थी , अब मै पढ़ने लगा तो सब को दिन पर दिन उम्मीदें भी बढ़ती ही चली जा रही है ,

काम करने वालों को टोंकना और निठल्लों को नजरंदाज करना दुनिया की कड़वी सच्चाई है।

ये क्लास भी गई , अफ़सोस फर्स्ट न अा सका उसे प्रपोज करना रह गया, अब नेक्स्ट आखिरी कोशिश है नहीं हुआ तो मै छोड़ दूंगा,

किसे मिताली को?

,

नहीं जी , मै ये दुनियां छोड़ दूंगा अब यदि मै सफल नहीं हुआ तो.... देख लेना।,

कै९ कक्षा दस के पहले की गर्मी की छुट्टियां आज तक की सबसे लंबी छुट्टियां साबित हुई , मिताली से मिलना जो नहीं हो पा रहा था।

लेकिन उसकी याद को भूलने का एक ही उपाय था उसको पाने की दिशा में कुछ कदम बढ़ाए जाए ताकि मन में ये तसल्ली तो रहे की मै उसके लिए कुछ कर रहा हूं,

आज पापा की छुट्टी थी और बड़े दिनों बाद वो मेरे साथ छत पर टहल रहे थे , उन्होंने मुझसे आगे मेरे कैरियर के बारे में पूछा, "तुम क्या बनना चाहते हो अपनी लाइफ में?"

डायरेक्ट आंसर तो मिताली का पति था, और पापा के सवाल का सही जवाब मेरे पास नहीं मिताली के पास था, उसे पाने के लिए मुझे क्या बनना चाहिए?

इतनी बातें हुई पर मैंने ये तो पूछा ही नहीं कभी।

मैंने जवाब दिया " अभी तो कुछ सोचा नहीं।"

"तुम्हे कक्षा ग्यारहवीं से सब्जेक्ट लेना पड़ेगा , और वहां से तय हो जाता है हमे कौनसी फील्ड में जाना है?"

"कर लूंगा पापा, अभी बोर्ड एग्जाम पर फ़ोकस है।"

मै इन बातों से अनजान था कि हमारे माता पिता हमे इसलिए स्कूल में पढ़ाते लिखाते है कि आगे चलकर हम पैसा कमा सके, इज्ज़त कमा सके, दुनिया में अपना वजूद कायम रख सके, मुझे तो सिर्फ फर्स्ट आने की धुन संवार थी,

तभी मां ने हमे खाना खाने के लिए नीचे बुलाया।

सभी खाना खाने बैठे और बात चीत शुरू हो गई।

मां ने पापा को बताया " वो मेरी शाहपुर वाली काजिन है ना, उसका बेटा आई आई टी से इंजीनियरिंग किया है, अमेरिका में जॉब करता है, बहुत अच्छी सैलरी है , कंपनी ने घर गाड़ी सब दे रखी है ।"

पापा ने कहा " आई आई टी हर किसी के बस की बात नहीं है वो एक्स्ट्रा टैलेंटेड होगा।"

मां "हां ! शुरू से अच्छा था पढ़ने में।"

मैं कान गड़ा कर उनकी बातें सुनता जा रहा था,

" असल में बात ये है कि उसकी शादी है।"

"अच्छा.."

अब मेरे कान और खड़े हो गए थे , आखिर इस उम्र में इसका क्रेज सर चढ़ कर बोलता है।

मां " सरिता दीदी ने अपनी प्रीती के लिए रिश्ते का बोला था, मैंने नंदिनी(शाहपुरा वाली बहन) को ख़बर भी दी थी पर उनकी तरफ से कोई रिप्लाई नहीं आया।"

सरिता मेरी बुआ जी है और प्रीती उनकी लड़की जो मेरी कॉज़िन सिस्टर हुई,

पापा " अपनी प्रीती भी तो अच्छी है डेंटिस्ट है अच्छा जम सकता था।"

मां " अरे क्या जमता वो लव मैरिज कर रहा है , लड़की अपनी जात समाज की थोड़े ही है, उसकी स्कूल से साथ पढ़ी हुई है।"

वाह! इससे अच्छा उदाहण जो बिना कहीं जाए, घर के घर में मिल गया था कहीं और मिल ही नहीं सकता था।

पापा " खेर लड़की के भाग्य खुल गए आई आई टी वाला लड़का जो मिल गया, उसे क्या कमी है अब।"

मां " हां वो तो है , यहां हम आस पास घूमने जाने के लिए भी सोचते है वो तो हनी मून के लिए स्विट्जरलैंड जा रहे है।"

मेरे दिमाग ने इस बात को अच्छी तरह बैठा लिया था ,और यही नहीं मै कहीं खो गया था , फिल्मों वाली स्विट्जरलैंड की वादियों में जहां , मिताली और मै एक दूसरे को बर्फ मार रहे थे मै उसे पकड़ने दौड़ रहा था , मैंने उसे गले लगा लिया बस, उस समय की इमेजिनेशन आज की तरह नहीं हुआ करती थी कि सुनसान जगह पर अलाव जलाकर स्लो मोशन में ब्लैंकेट ओड कर लड़की को बेड तक ले जाए और हमारे समय में पोर्न फ़िल्म इतनी आसानी से उपलब्ध नहीं थी जितनी फ्री इन्टरनेट और सस्ते स्मार्टफोन की वजह से आज हुआ करती है गले लगना हद से हद लिप किस इमेजिनेशन की आखिरी स्टेज थी , बल्कि पवित्र प्रेम बंधन में गले भर लगा लेना प्रेम जाहिर करने की पराकाष्ठा थी उन दिनों।

अब आने वाली क्लास में तो ये ही निश्चित नहीं था कि मै टॉप आता हूं कि नहीं , मिताली को प्रपोज कर पाता हूं कि नहीं?

अगर नहीं तो मै अगली क्लास नहीं पढ़ पाऊंगा,

क्यूंकि मै जिंदगी को टाटा बाय बाय कह दूंगा,

मेरे अंतर्मन में एक बात हमेशा रही वो ये कि

राहुल कभी हार नहीं सकता, जो सोचता है वही करता है।

अब मेरा डायलॉग ही मुझ पर भारी होता जा रहा था, जो मुझे डिप्रेशन में ले जाने लगा था...

आज कल हो भी यही रहा है , खाने पीने जीने के संसाधन पुराने जमाने से ज्यादा अच्छे और सरलता से उपलब्ध है , पर लोग अब खाने की भूख से नहीं अपनी इच्छाओं की भूख से पीड़ित हो गए है।,
 
10. सोलहवें साल की चाल

बड़े दिनों बाद स्कूल खुले ,और जिसके इंतजार में पूरी छुट्टियां बीताई वो मेरे सामने थी , अक्सर सुना था कि लड़कियां जल्दी बड़ी हो जाती है, पर आज मिताली को देखा तो यकीन हो गया; क्या लंबे सिल्की बाल एकदम से बदल गई वो, इसे कहते है स्वीट सिक्सटीन, जैसे कोई कलि अभी ही खिल कर फूल बनी हो , उसका गोरादीप चेहरा एकदम ग्लो कर रहा था, ऊपर से तीखे नाक नक्श, ऐसा लग रहा था किसी कास्मेटिक के विज्ञापन वाली मॉडल को देख रहे है , जी हां सिर्फ चेहरा ही नहीं , सभी परिवर्तन हो चुका था जिसमें खास तौर पर गर्दन के नीचे वाले भाग के उभार भी शामिल थे, जो किसी पुरुष का ध्यान आकर्षित करने के लिए पर्याप्त थे, स्कूल के सीनियर लड़के भी उसे देख कर दंग रह गए ,

व्हाइट शर्ट और घुटनों तक की रेड येलो चेक्स स्कर्ट व्हाइट लॉन्ग साक्स में वो ऐसी लग रही थी मानो कोई परी अाई हो चिकनी मोम की तरह त्वचा , होंठ स्ट्राबेरी की तरह लाल सुर्ख बल्कि उससे भी ज्यादा रसीले, मेरा मुंह इस तरह खुला रह गया कि,

मैं हूं ना फिल्म याद अा गई ' मुंह तो बंद कर लो अंकल',

वो सेक्सी चाल में चलती हुई मेरे करीब आ रही थी ,

जैसे ही पास अाई मुझसे कहा,

" हाई"

मैंने कहा "ओ हाई"

"कहां खो गए?"

आज पहली बार मैंने मुंह से कुछ ऐसा शब्द निकाला जो शायद लव डिक्शनरी से संबंध रखता था।

" तुम्हारी खूबसूरती में।"

उसने मेरे कंधे पर मुक्का मारते हुए कहा,

" धत्त !पागल।"

"ओह ! पागल, पागल का मतलब जानती हो।"

"नहीं, तुम बताओ ?"

"पास अा गले लग जा।"

"आर यू मेड?"

" यस "

" अब मै आगे नहीं पूछूंगी ,तुम मुझे फ्लर्ट करने के मूड में हो।"

और ऐसा कह कर वो बैग रखने क्लास में जाने लगी,

आस पास खड़े सभी सहपाठीगण ऐसे देख रहे थे जैसे कोई शूटिंग चल रही हो,

मिताली दो कदम चल कर रुकी और पीछे मुड़ी और कहा, " वैसे तुम भी बड़े डैशिंग लगने लगे हो।"

अरे बाप रे ये क्या सुन लिया सपना तो नहीं है , वाओ ! पूरा साल बना दिया इसने तो,

कभी कभी खुशी हद से ज्यादा मिल जाती है तो उसका इज़हार करना उससे ज्यादा मुश्किल हो जाता है, मेरा अभी यही हाल था,

प्रे हुई और सारे स्टूडेंटस क्लास की ओर चल दिए।

तभी टीचर के आने के पहले मिताली मेरे पास आई,

मै बैठा हुआ था, वो झुकी और मेरे कानो में होले से कहा

" हम साथ बैठें, आजू बाजू?"

सच बताऊं ये वो पल था जब मुझे उसका रोते हुए चले जाने के लिए कहने वाला सीन एक पल को आंखो में घूम गया, आदमी ठान ले तो कुछ भी कर सकता है,

आज मेरी बड़ी जीत थी , वो मुझे ख़ुद बोल रही थी साथ बैठने का,

मेरा सारा त्याग दोस्तों के साथ घूमने फिरने , पार्टी मनाने, होली , खेलने से लेकर डेली क्रिकेट खेलने तक का जैसे अब कहीं जा कर रिजल्ट देने लगा था,

मैंने उसकी आंखों में देखा , मुझे प्यार की वो चमक दिखाई दी जो जवानी की भूल के किस्सों की अक्सर बुनियाद साबित हो जाती है,

उसकी आंखे नेचुरली अपीलिंग थीं;

"कहां बैठेंगे ?" मैंने मुस्कुरा कर पूछा।

उसने अपने बाल संवारते हुए कहा,

"इतनी पीछे नहीं बैठेंगे , मुझे प्रॉपर ब्लैक बोर्ड नहीं दिखता, वो बीच वाली डेस्क पर?"इशारा करते हुए बोली।

मै अभी भी पीछे बैठा हुआ था।

"ओके चलो अपना बैग लाओ , मै वहीं अा रहा हूं।"

तभी क्लास के एक लड़के ने कहा,

"क्यों सेट हो गई क्या?"

"नहीं हुई है , तुझे करनी है?"

उसे मेरा बदला स्वरूप शायद रास नहीं आ रहा होगा, पहले वाला राहुल होता तो इस वाक्य के अंत में पूर्ण विराम तौर पर मुक्का जड़ देता।

खैर वो मेरे इतना बोलने से ही डर गया था,

हम आजू बाजू वाली डेस्क पर बैठ गए।

ये क्लास पहले कि बाकी क्लास से अलग थी,

लक्ष्य बड़े थे, एग्जाम बोर्ड थी, और सबसे अहम बात,

नादान उम्र सारे सेंसेशंस कैच करने लगी थी,

बातों में अब नयापन छाने लगा जो नहीं हुआ वो होने लगा, इसी बीच अचानक हमारे नए क्लास टीचर की एंट्री हुई ये थे शर्मा सर जिनका पहला ही लेक्चर कमाल कर गया , क्या पढ़ाया उन्होंने पहली बार लगा की टीचर्स ऐसे भी होते है, अमूमन टीचर्स पहले नई क्लास का इन्ट्रो करते है और बाद में पढ़ना स्टार्ट करते है , यहां तो पहले पढ़ाया और अटेंडेंस रजिस्टर उठाया , फिर बड़े कड़क मिजाज़ में कहा,

" हू इस द टॉपर?"

, सोनल ने हाथ खड़ा किया ,

"यस कम ऑन , तुम मॉनिटर हो क्लास की।"

सोनल सर के पास गई, सर ने अटेंडेंस रजिस्टर उसके तरफ खिसका दिया ,

"सबकी अटेंडेंस लो।"

सोनल थोड़ी घबराई हुई सी लग रही थी इतनी बड़ी जिम्मेदारी उसे सौंप दी गई थी।

"अब से रोज़ तुम्हीं अटेंडेंस लोगी।"

मिताली ने धीरे से कहा,

"अजीब सर है, क्लास के किसी स्टूडेंट का नाम तक नहीं पूछा।"

तभी शर्मा सर ने इशारे से कुछ लड़के लड़कियों को उठा कर नाम पूछा , ये वो विद्यार्थी थे जिन्होंने पूरे पीरियड में या तो सही जवाब दिए थे या सही सवाल पूछे थे, या इनकी कैचिंग पॉवर सर को कमाल की लगी,

और बाकी स्टूडेंट्स के लिए वो 'ए लड़के' ' ए लड़की' शब्द का उपयोग करते रहे ।

मतलब साफ था , शर्मा सर की नज़र में एवरेज और ना पढ़ने लिखने वाले बच्चो की कोई औकात नहीं थी , जबकि एक्स्ट्रा टैलेंटेड स्टूडेंट्स के साथ बैठ कर वो लंच तक लिया करते थे ,और इस बीच किसी की हिम्मत नहीं थी कि जब सर और ग्रुप लंच कर रहे हो और जिसे इजाज़त नहीं हो वो स्टूडेंट अा कर बैठ जाए,

इसलिए शायद सर मिताली को ना जानते हो, क्योंकि वो एक एवरेज स्टूडेंट थी, ब्रिलियंट स्टूडेंट नहीं ,

वैसे तो मुझे भी नहीं जानते थे, मै उनके लंच वाले ग्रुप में शामिल नहीं था, पर एक घटना ऐसी घटी की मेरी जगह पक्की कर गई...,
 
11. पहली बारिश

शर्मा सर ने आज पहली बार कुछ खुल कर कहा,

"मुझे जुनूनी बच्चे पसंद है, मेरे लिए सक्सेस ही सब कुछ है, मेरी सक्सेस आप लोगों में छुपी है, अगर वाकई कोई मेरे साथ मेहनत करना चाहता है, तो मै स्कूल में ही आगे वाले हॉल में शाम सात बजे से एक्स्ट्रा क्लास लेता हूं, जिसे आना है अा सकता है।"

तभी क्लास में कानाफूसी शुरू हुई ,

आगे बैठे में से किसी ने अपने पास बैठे हुए से पूछ लिया,

"फ्री में है क्या?"

शर्मा सर ने सुन लिया, बात को आगे बढ़ाते हुए कहा,

"क्लास बिल्कुल फ्री है बस एक छोटी सी शर्त होती है।"

सभी उत्सुकता से उनकी तरफ देखने लग गए,

उन्होंने आगे कहा " क्लास आने का टाइम फिक्स होता है , जाने का नहीं।"

इस मुख्य घटना के साथ आज की स्कूल ख़त्म हुई,

मै शाम को शर्मा सर की एक्स्ट्रा क्लास गया,

मैंने वहां जाकर एक अलग ही दृश्य पाया,

वहां सिर्फ मै और सोनल आए थे, मुझे यकीन नहीं हो रहा था , मुझे उम्मीद थी कि लंच वाला ग्रुप तो आयेगा ही आयेगा और शायद यही आश्चर्य शर्मा सर को भी हो रहा होगा, खैर हम दोनों पढ़ने बैठ गए,

शर्मा सर ने कहा,"कोई भी सब्जेक्ट हो मुझसे पूछ लेना मै सारे सब्जेक्ट्स पढ़ा दूंगा",

पढ़ते पढ़ते हमे नौ बज गई,

सोनल और मै दोनों लगभग सुनसान सी सड़क पर चले जा रहे थे , सोनल ने मुझसे कहा,

"उम्मीद नहीं थी कि तुम आओगे।"

"वो क्यों?"

"नहीं ऐसे ही बहुत बदल गए हो तुम, इतना कैसे ग्रो किया , आई मीन इतना सीरियस क्यों?"

"कुछ नहीं ऐसे ही कुछ ठान रखी है वो करना है।"

" हम्म.."

उसने कहा "सर इतना लेट छोड़ेंगे तो मेरे घर से क्लास आने का मना हो जाएगा।"

"अरे! बाकी सर पढ़ा बहुत अच्छा रहे है हो सके तो अा जाओ।"

"ओके! मेरी एक हेल्प करोगे?"

" बोलो?"

"मेरे घर चलोगे अंदर ?"

"क्यों?"

"मम्मी से मिलवाना है"

"वो क्यों?"

"तुम सवाल बहुत करते हो।"

"तुम जवाब भी तो किश्तों में देती हो।"

उसका घर अा चुका था,

"चलो ठीक है मिल लेता हूं।"

हम घर में आए,

उसने उसकी मम्मी से मिलाया,

"मम्मी ये राहुल है ,मेरा क्लासमेट ।"

"नमस्ते आंटी!"

"नमस्ते बेटा।"

सोनल ने बीच में ही बात काटते हुए कहा,

"मम्मी ये मेरा मुंह बोला भाई है, क्लास में राखी भी बांधी है मैंने , , हम लेट हो गए तो छोड़ने आया है , बहुत फिक्र करता है मेरी।"

"ओह! ये तो बहुत अच्छा है, वरना मेरी बेटी बहुत इंट्रोवर्ड टाइप है ।"

उसकी मम्मी ने मुस्कुरा कर कहा ,

मैंने मन में सोचा ये क्या बात हुई , ऐसी ही किसी बात से कहावत बनी होगी ' जरूरत के समय गधे को भी बाप बना लेना' वैसे शायद उसने अभी जरूरत के हिसाब से गधे को भाई बनाया था ,

मैंने कहा "अच्छा चलता हूं।"

उसने जानबूझकर मम्मी को सुनाने के लिए कहा,

"हां यार लेट हो जाएं तो छोड़ने अा जाया करो।"

आज पहली बार तो सोनल से इतनी बात हुई थी जबकि वो पहली कक्षा से साथ में पढ़ रही थी।

बड़ा अजीब लग रहा था एक दम से ऐसा व्यवहार जैसे मेरे बिना एक पल ना रहती हो।

अगले दिन क्लास में शर्मा सर ने लेक्चर ख़त्म करके , कहा "राहुल तुम,आज से हमारे साथ लंच करोगे।"

आगे कहा " इस लड़के को सब ध्यान से देख लो " सब लोग मेरी तरफ देखने लगे।

" ये चेहरा तुम्हे फाइनल एग्जाम के रिजल्ट में अखबार में देखने को मिलेगा।"

एक पल को मै धक्क रह गया ये क्या ऐलान कर दिया,

मैंने मिताली कि तरफ़ देखा उसने मेरे लिए प्यार भरी मुस्कान बिखेरी;

सर मेरे पास आए और धीरे से कहा " कल एक्स्ट्रा क्लास में मैंने तुम्हारा कैलिबर चेक कर लिया, तुम हीरो हो।"

मैंने सर को थैंक्यू किया, सर ने कंधे पर हाथ रख कर कहा " तुम मेरे सबसे खास स्टूडेंट रहोगे बेहिचक जो पूछना है, जब पूछना है, जहां पूछना है, पूछ लेना , मुझे अपने बड़े भाई जैसा समझो।"

ये बात मेरे कानों में ऐसे लग रही थी जैसे कि सपने में हूं और आकाशीय संदेश अा रहे है, सभी स्टूडेंट्स देखते ही रह गए, वाकई , ऐसे टीचर उन्होंने अपनी लाइफ में पहली बार देखे थे, जो ऐसे वैसे स्टूडेंट का नाम तक नहीं जानते थे और होशियार स्टूडेंट के लिए जान तक हाज़िर कर देते थे,

अब से रोज़ मै और सोनल शाम को सर की एक्स्ट्रा क्लास में जाने लगे,

सोनल के साथ पढ़ने और सर के मार्ग दर्शन ने आखिरकार मेरी वो कमजोरियां दुर कर दी जिससे मै स्कोर नहीं कर पाता था, और वो कमज़ोरी थी लिखने का तरीका ,आता मुझे भी था , बल्कि उससे भी अच्छा आता था जो दूसरे टॉपर्स को आता था पर मैं लिखने में कमजोर था जितना बन पड़ता था मैथ्स में स्कोर करता रहा पर अब टेस्ट में मै बाकी सब्जेक्ट्स में भी टॉपर रहने लगा,

मेरी और सोनल की दोस्ती मजबूत होती जा रही थी,

हम दोनों के बीच अब एक कॉमन ग्राउंड था, वो था पढ़ाई

एक बार की बात है शाम को हम क्लास गए थे और बहुत तेज़ बारिश होने लगी ,हम दोनों सर का इंतजार कर रहे थे, पहली बार ऐसा हुआ कि सर लेट हुए थे,

मैंने अपनी नोट बुक, निकाल कर रिवीजन करना शुरू कर दिया, तभी सोनल ने मेरी नोटबुक बंद कर दी,

मैंने उसकी तरफ देखा उसकी आंखो में आज कुछ अलग रंग था,

बाहर गरजते बादलों की आवाज़ , बिजली की चमक, मिट्टी की भीनी खुशबू और बारिश की वजह से वातावरण में अाई ठंडक से मानो सोनल का मन बहक रहा था।

सोनल थी तो खूबसूरत पर मिताली जितनी फ़ैशन फॉलोअर नहीं थी , एक दम सिम्पल सोबर थी,

उसका ड्रेसिंग सेंस भी ठेठ भारतीय युवतियों कि तरह था, उसके रहन सहन से पता लगता था कि वो और लड़कियों की तरह अपनी खूबसूरती का प्रचार करना नहीं चाहती थी,

चेहरा गोल और रंग साफ , बाल ज्यादा स्टाइलिश ना हो कर सिम्पल कट थे, यदि आप भारतीय लड़के है तो अपनी दुल्हन के रुप में यकीनन उसे मिताली से ज्यादा नंबर दे सकते थे,

, आज मैंने गौर से देखा तो वो रोज़ से कुछ ज्यादा सज संवर कर अाई थी,

मैंने उससे पूछा,

"क्या हुआ , कॉपी क्यों बन्द की मेरी?"

उसने बड़े ही हसीन अंदाज़ में कहा

"रोज़ तो कॉपी ही खुली होती है, आज कुछ और खोलते है।"

मेरे लिए ये एक चौंकाने वाली बात थी, सोनल का ये रूप पहली बार देखा था, कहने वाले सही कहते है , दुर से देख कर किसी इंसान का पता नहीं लगाया जा सकता है,

"कुछ और खोलते है?"

"हां! मतलब तुम अपने बारे में बताओ मै अपने बारे में बताती हूं , पढ़ाई को साइड करो आज गप्पे शप्पे मारने का मूड है।"

बाहर मौसम बेईमान ऊपर से उम्र, इस पर खाली कमरा और अकेले टीन एजर लड़का - लड़की एक दूसरे के करीब थे, इस सिचुएशन का पूरा एडवांटेज लिया जा सकता था, किसी को पता तक नहीं चलता, और खेल हो जाता।

मैंने कहा "क्या सुनना चाहती हो?"

" कुछ खास जो तुम एक अच्छा दोस्त समझ कर शेयर करना चाहो।"

"पहले तुम स्टार्ट करो , फिर मै अपने बारे में बताऊंगा।"

"दिस इस रांग हां, मैंने पहले पूछा था, चलो ठीक है मै बताती हूं।"

उसने कहा "तुम बहुत हैंडसम हो।"

"हहाहा3 Full stop ये क्या बात हुई।"

उसने कहा "हां सच्ची।"

मैंने उसे याद दिलाया,

"तुम्हे याद है तुमने मुझे अपना भाई माना है।"

"तो कौनसा मैंने राखी बांधी है तुम्हे , क्या हुआ बोलने पड़ते कुछ झूठ भी ; लाइफ है यार।"

मै अचंभित रह गया , ये क्या हुआ ,

मै पानी पीने के लिए खड़ा हुआ , मटके के पास जाकर पानी पीया , जैसे ही पलटा सोनल ठीक मेरे पीछे खड़ी थी,

"क्या हुआ पानी पीना है?"

सोनल मुझसे लिपट गई,

"ये क्या कर रही हो?"

"तुम्हे फील करना चाहती थी , इतने दिनों से।"

मुझमें भी कामुकता बढ़ती जा रही थी एक अजीब एहसास मेरे जिस्म में फैलता जा रहा था, मेरे जुनून की दिशा जैसे बदल सी गई हो,

उसने कहा " राहुल मै मयंक को हार चुकी हूं तुम्हे नहीं हारना चाहती।"

"क्या मतबल?"

मैंने मन में सोचा , क्या लड़की है, एक नहीं तो दुसरा सही,

" मयंक मुझसे प्यार करता था, उसने मुझे प्रपोज भी किया था पर , उसके प्यार की मेरे दिल में कोई कीमत नहीं थी।"

"पर वो तो मिताली से प्यार करता था।"

"नहीं मुझे जलाने के लिए वो ऐसा करता था, मिताली सिर्फ दोस्त थी "

मुझे एक नई सच्चाई पता चली कि मयंक मिताली सिर्फ अच्छे दोस्त थे, और मयंक का प्यार जो था वो मेरी बांहों में था,

उसने कहा" मुझे कोई और पसंद था।"

मैंने पूछा "कौन?"

"तुम।"

मैंने बड़े आश्चर्य से कन्फर्म किया "मैं?"

उसने अपनी पलकें झुका कर हां का इशारा किया,

"बाकी तुमने तो ऐसा कोई इशारा ही नहीं किया था अब तक ?"

"सुनो मिस्टर हर एग्जाम में तुम्हारे पीछे मै ही बैठती हूं मेरा रोल नंबर तुम्हारे ठीक बाद आता है, हां जो तुम्हारी नकल की पर्चियां गिर कर पीछे आती थी सिर्फ हवा में उड़ कर नहीं आती थी , वो मेरे प्यार की हवा का कमाल था।"

"ओह तुम मेरे लिए इतना कुछ करती रही और मै अनजान रहा।"

, " राहुल , मुझे तुम्हारी कॉमेडी करना, तुम्हारा बन ठन के स्कूल आना सब पसंद था, मुझे अपने जैसे सीरियस नहीं अपने से थोड़े ऑपोजिट टाइप के लोग पसन्द है।"

मै सोच में पड़ा था , मुझे इस बात की हैरत थी कि उस रूप में भी मै किसी को पसंद अा सकता था।

" सोचा इससे पहले की तुम मिताली के लिए अपने आप को ढाल लो मै उस राहुल को अपने दिल कि बात बता दूं जिसे मै बेहद प्यार करती हूं , थोड़ी संकोची हूं इसलिए आज तक आगे रह कर बात नहीं की , बट इस से ज्यादा लेट नहीं कर सकती हूं अब।"

आज मै ऐसी जगह पर खड़ा था एक तरफ वो था जो मुझे बहुत प्यार करता था जिसे मै अपने असली रूप में पसंद था , एक तरफ वो शक्स था जिसे पाने के लिए मैंने अपनी शक्सियत बदल डाली थी , जिसे मै प्यार करता था , जिसका प्यार पाना मेरी ऐसी ज़िद थी जो चौबीसों घंटे मेरे दिमाग में घूमती ही रहती थी, क्यूंकि राहुल को हार पसंद नहीं ,

सोनल की छुअन में पता नहीं क्या एहसास था कि ऐसा लग रहा था मानो मै बहती नदी में खड़ा हूं और मेरे पैर काई की चिकनाहट पर धरे हो, बस अभी जमीन से अलविदा कह कर मै सोनल के प्यार, की धारा में बह चलूंगा,

पता नहीं क्या हुआ था मेरे पक्के इरादे को, पक्का किसी की नज़र लग गई।

उसका मुझे बाहों में भरना मेरे लिए उसकी आंखों में प्यार पाने को बेताब आंसू , मेरी हथेलियां बेकाबू कर गए,

उंगलियों ने मानो शराब पी ली हो वो भी बेकाबू सी सोनल के जिस्म पर लहराकर नाचने लगी थी , उसके जुल्फों में बड़े ही प्यार से कंघी की तरह बाल संवारने लगी मेरी उंगलियां उसमे और उतर जाने को कह रही थीं , टीन एज रोमांस कब बेकाबू हो जाए कोई नहीं जानता , सांसे तेज़ हो कर चेहरे को सोनल की गर्दन तक ले गई, बेकाबू बारिश बेकाबू होंश पता नहीं क्या क्या करवाते, हम एक दूसरे को चूमते हुए पास की दीवार पर टिक गए, दीवार से सोनल , की पीठ टिकी थी , हमारे होंठ अपने आप , एक दूसरे में गूंथ चुके थे, ऊपर वाले ने काम भी क्या चीज़ बनाई है कभी भी आदमी को बहका सकती है, प्यार मटके के पास चुन्नी सरकाने से शुरू हुआ था , जिसके बाद अब सोनल टेबल पर लेटी थी और कपड़े उसके डेस्क पर पड़े थे , उसका कौमार्य चंद सेकेंडों का और बाकी था कि अचानक , मुझे ऐसा लगा कोई अा गया,

मैं अपने होशों हवास में वापस लौटा इधर उधर देखने लगा, कोई नहीं था शायद मेरी आत्मा ने मुझे आवाज़ दी कि 'अब बस' ;

सोनल डेस्क से अपना कुर्ता उठा कर बदन ढंकते हुए बोली "आर यू ओके मेरी जान ?"

"इससे आगे नहीं होगा मुझसे सोनल , आई एम सॉरी ।"

मैंने टॉयलेट जाने का इशारा किया और टॉयलेट चला गया, जब वहां से बाहर निकला तो मुझे अपने आप में बहुत ग्लानि महसूस हो रही थी ,

सोनल खुद के कपड़े व्यवस्थित करते हुए बोली

" I love you Rahul"

इतना कहकर उसने अपनी गर्दन झुका ली , बाहर पानी की और अंदर आंसुओं कि बारिश शुरू थी,

मैंने मन में सोचा कि हवस की बारिश उसका तन भीगा देती , इससे तो बेहतर है आंसुओं कि बारिश से मन भीग जाए , मैं अपना बैग उठा कर अपने घर चल दिया, इस बार मैंने उसे हर बार की तरह नहीं कहा "चलें?"

वो वहीं खड़े ,मेरे जवाब का इंतज़ार करती रह गई ।

बस एक आखिरी शब्द जो मुझे उसके सुनाई दिए ,

" मैं मिताली की बेस्ट फ्रेंड हूं , जानती हूं उसे , इसलिए तुम्हारा इंतजार करूंगी ।"

मैं उसकी बात की परवाह किए बगैर वहां से चल निकला।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, मैं गलत था कि गलत कर चुका था कि गलत करने वाला था ये सिर्फ वक़्त की कोख में समाई प्रश्नावलियां मात्र थी जो एक उचित समय पर ही अपना उत्तर , ज़माने को बताती।,
 
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