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Guest
आकांक्षा की डायरी पढ़ कर तो ऐसा लग रहा था कि एक लड़की होना कितना मुश्किल हैं. अपने तो क्या खाली लंड ही संभालना पड़ता है. खून तो नही निकलता ना?
मैं जैसे जैसे आगे पढ़ते गया मुझे ऐसा एहसास होने लगा कि मैं किसी बिल्कुल अंजानी लड़की के बारे मे पढ़ रहा हूँ नाकी अपनी सग़ी,छोटी बेहन के बारे मे. वो क्या सोचती हैं? क्यू सोचती हैं? क्या चाहती हैं? हां! सिर्फ़ मेरे और उसके रिश्ते के बारे मे मैं सही था कि वो मुझे हेट करती हैं. उतना ही जितना मैं उसे हेट करता हूँ. या करता था?? मैं अपने आपसे ही पूछने लगा. उसके सपने, उसके दिल मे किसके लिए क्या चलता हैं, वो किसके बारे मे क्या सोचती हैं ये पढ़ कर मुझे एक अजीब सी फीलिंग आने लगी. जैसा की आप जानते हैं कि मैं और वो कभी भी आपस मे बात नही करते थे. क्या इसलिए मैं वो, असली मे कुछ बिल्कुल भी नही जानता? मुझे थोड़ा बुरा लग रहा था मगर एक दिलासा था कि सिर्फ़ मैं नही, आकांक्षा भी मुझसे बात नही करती. दोनो सगे भाई बेहन होकर भी एक दूसरे से इतना अंजान थे हम.
मे: आगे पढ़ा जाए..
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आज मेरा पीरियड स्टार्ट हुआ. मम्मी ने जो ट्रैनिंग दी थी अब समझ आई कि क्यू दी थी? पॅड खून के लिए लगाया जाता हैं. सुबह बाथरूम मे टाँगो के बीच खून देख कर मैं डर गयी. मगर मैं ये एक्सपेक्ट ही कर रही थी. मुझे फिर भी थोड़ा सा रोना आ गया. मगर अब मैं बड़ी हो गयी हूँ. बात बात पे रो नही सकती. आटीस्ट सबके सामने तो नही. इन कुछ दिनो मे मुझे कयि सारी बाते पता चली. मुझमे कैसे कैसे चेंजस आएगे और अब क्या क्या झेलना होगा. तक़लीफ़ से कम नही लग रहा मुझे ये कुछ. कल ही निशा से बात की इस बारे मे. निशा मुझसे कुछ मंत्स बड़ी हैं तो वो जानती हैं काफ़ी चीज़े. सर्प्राइज़िंग्ली! निशा को कोई तक़लीफ़ महसूस नही होती इस बारे मे. उल्टा वो तो काफ़ी खुश लगती हैं. हम कल रिसेस मे बैठे थे कॅंटीन के बाहर.
निशा: अर्रे यार, अककु..! तू भी ना! फालतू मे टेन्षन ले रही. बेस्ट टाइम हैं ये अपनी लाइफ का बेबी.. एंजाय कर.
आकांक्षा : क्या खाक एंजाय करू निशा?? परेशान हो गयी हूँ मैं इस सब से. मुझे नही होना बड़ा. तुझे पता भी हैं कि कितना दर्द होता हैं उस टाइम?
निशा: किस टाइम?
आकांक्षा : अर्रे वोही.. जो मुझे हुआ था कुछ दिनो पहले.
निशा: अया...पीरियड? ऐसा बोल ना बुद्धू..
आकांक्षा : हां वोही..
मैने याद करते हुए कहा कि मम्मी ने भी कही थी इन्हे पीरियड्स कहते हैं. मैं ज़मीन पर बैठ कर अपने घुटने पे सिर रख कर बैठ गयी. निशा मेरे साइड मे मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोली;
निशा: अर्रे मेरी रानी.. ऐसा कुछ नही.. अच्छा चल! एक सीक्रेट बताऊ?
आकांक्षा : ह्म्म्म्म ??
निशा मेरे एक दम करीब आकर बोली;
निशा: मेरा अभी पीरियड चल रहा हैं.
मैं उसकी बात सुनके चौंक सी गयी.
आकांक्षा : म..एम्म..मगर कैसे? और.. ब्लड?? पेन?? तू ठीक तो हैं ना?
निशा मुझे शांत करते हुए बोली;
निशा: अर्रे शांत होज़ा!! शांत होज़ा.. चल मेरे साथ.. दिखाती हूँ तुझे कुछ.
मैं कुछ कहती उससे पहले ही निशा मुझे खीचते हुए टाय्लेट मे लेकर आई.
आकांक्षा: क्या??
निशा: शूऊ!!! कीप क्वाइट.
हम कुछ देर ऐसी ही टाय्लेट मे खड़े रहे. निशा अपने बाल ठीक कर रही थी, हाथ धो रही थी. इन शॉर्ट टीपी कर रहे थे. लोल! कुछ देर बाद टाय्लेट मे की सारी लड़किया एक एक करके जाने लगी. हम ऐसे दिखा रहे थे कि कुछ बात कर रहे हैं..... जब टाय्लेट मे से सब गर्ल्स चली गयी, निशा ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे एक टाय्लेट स्टॉल मे ले गयी और डोर लॉक कर दिया..
मे: अर्रे क्या कर रही हैं तू? पागल हो गयी क्या? जाने दे मुझे.. सरक!
निशा ने जैसी मेरी बात सुनी ही नही और मेरे कंधो पे हाथ रख कर मुझे ज़बरदस्ती कॉमोड पर बैठा दी. मुझे कुछ समझ नही आ रहा था मगर निशा को देख कर सॉफ पता चल रहा था कि उसके दिमाग़ मे कुछ चल रहा हैं. मैने सोचा कि चलो देख ही लेते हैं क्या हैं तो और तभी निशा ने झट्से अपनी स्कर्ट उपर उठा दी..
आकांक्षा : सस्शीई!! पागल.. नीचे कर..
निशा: शट अप! देख चुप चाप.
मैने अपनी गर्दन मोड़ ली तो निशा ने एक हाथ से मेरी नज़र फिर से उसकी स्कर्ट की तरफ ज़बरदस्ती घुमा दी. मैं देखने लगी. ऑफ-वाइट कलर की पैंटी पहनी थी उसने जिसपे फ्लवर्स का डिज़ाइन था. मुझे कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या हो रहा हैं ये सब? मैं बस निशा की पैंटी को देखे जा रही थी. उसकी गोरी गोरी थाइस पर बोहोत जच रही थी पैंटी. उतने मे ही;
निशा: अबे पैंटी देखने नही बोली मैने तुझे.. पहली बार देख रही क्या? अंदर देख..
आकांक्षा : हुहह?
निशा: ओफफफूओ!!
इतना कह कर निशा ने मेरा हाथ पकड़ कर उसकी पैंटी के ठीक बीच मे ले गयी. मेरा हाथ काँप रहा था. पता नही क्यूँ? पसीना आएगा ऐसा लग रहा था मगर आ नही रहा था, दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. चेस्ट मे कुछ अजीब ही खिचावट महसूस हो रही थी. मैं बोहोत डर रही थी. ये सब क्या हो रहा हैं मुझे?? मैं अपने ही ख़यालो मे थी तो निशा बोली;
निशा: देखी??
मैने अपने हाथ से निशा की पैंटी चेक की..बहुत ही सॉफ्ट लग रही थी. इतनी सॉफ्ट तो नही होती पैंटी. मेरी तो नही थी. मैं कुछ समझी नही ये बात देख कर निशा ने मेरा हाथ छोड़ दिया. मैं तुरंत हाथ निकाल ली. निशा ने अपनी स्कर्ट भी नीचे करली और बाहर चली गयी. मैं पुतले जैसी वही बैठी रही और कुछ वक़्त मे निकल कर;
आकांक्षा: क्या दिखा रही थी तू? मुझे कुछ समझ नही आ रहा.
निशा: उल्लू!! पॅड पहनी हूँ मैं..
आकांक्षा : स्कूल मे??
निशा: हाँ तो यही तो फ़ायदा हैं. कही भी पहन सकते हो.. पता भी नही चलता कि पहना हैं कुछ. सिंपल.. देख बेबी, पहली बार मैं भी डर गयी थी ब्लड देख कर.मगर तू मत डर. मुझे दीदी ने समझाया और मैं तुझे समझा रही हूँ. पेन के लिए पिल्स भी मिलती है. तेरी मम्मी से बोल, ला देगी वो.कुछ नही होता. ओके?
आकांक्षा : ह्म्म्मा...ओके..
निशा: अरे अब क्या चल रहा दिमाग़ मे तेरे? कुछ पूछना हैं और?
आकांक्षा : हां.. वो... वो...
निशा: हां पूछ ना!