हम चारों खेत पहुंचे! बहुत ही खूबसूरत नज़ारा था वहाँ का! जंगली पीले रंग के फूलों ने ज़मीन पर कब्ज़ा जमा लिया था, उनमे से कहीं कहीं नीले रंग के फूल भी झाँक रहे थे, जैसे प्रकृति ने मीनाकारी का काम किया हो! कुछ सफ़ेद फूल भी निकले थे वहाँ, वो अलग ही खूबसूरती ज़ाहिर कर रहे थे! पेड-पौधों ने माहौल को और खुशगवार बना दिया था! अमरुद, बेर और आंवले के पेड़ों के समरूप रूप ने जैसे प्रकृति का सलोनापन ओढ़ लिया था! बेलों ने क्या खूब यौवन धारण किया था, काबिल-ए-तारीफ़! उनके चटख हरे रंग ने मन मोह लिया था, पीले रंग के फूल जैसे स्वर्ग का सा रूप देने में लगे थे! सच में प्राकृतिक सौंदर्य वहाँ उमड़ के पड़ा था! शुष्क नाम की कोई जगह वहाँ नहीं दिखाई दे रही थी! हर तरफ हरियाली और हरियाली!
"आइये, इस तरफ" हरि साहब ने कहा और जैसे मै किसी सम्मोहन से जागा!
जी, चलिए" मैंने कहा,
ये एक संकरा सा रास्ता था! दोनों तरफ नागफनी ने विकराल रूप धारण कर रखा था, लेकिन उसके खिलते हुए लाल और पीले फूलों ने उसकी कर्कशता को भी हर लिया था! बहुत सुन्दर फूल थे, बड़े बड़े! अमरबेल आदि ने पेड़ों पर अपनी सत्ता कायम कर रखी थी! मकड़ियों ने भी अपने स्वर्ग को क्या खूब सजाया था अपने जालों से! ऊंचाई पर लगे बड़े बड़े जाले!
"यहाँ से आइये" हरि साहब ने कहा, और हम उनके पीछे पीछे हो लिए, हम अब एक बाग़ जैसी ज़मीन में प्रवेश कर गए, खेतों में लगे बैंगन और गोभी आदि बड़े लुभावने लग रहे थे!
तभी सामने तीन पक्के कमरे बने दिखाई दिए, उसके पीछे भी शायद कमरे बने थे, वहाँ मजदूरों की भैंस और बकरियां बंधी थीं, चारपाई भी पड़ी थीं, उनके बालक वहीँ खेल रहे थे, हमे देख ठिठक गए!
कय्यूम भाई ने एक चारपाई बिछायी और एक पेड़ के नीचे बिछा दी, हम बैठ गए उस पर, अपने लिए उन्होंने एक और चारपाई बिछा ली, वे भी बैठ गए, तभी हरि साहब ने आवाज़ दी और अपने मजदूर शंकर को बुलाया, पहले उसकी पत्नी बाहर आई और फिर वो समझ कर चली गयी शंकर को बुलाने, शंकर कहीं खेत में काम कर रहा था उस समय,
"ये है जी ज़मीन" हरि साहब बोले,
"देख ली है, अभी जांच करूँगा यहाँ की" मैंने कहा,
कय्यूम भाई उठे और अन्दर से घड़े में से पानी ले आये, मैंने पानी के दो गिलास पिए और शर्मा जी ने एक, पानी भी बढ़िया और ठंडा था! उसी पनिया-ओझा के बताये हुए स्थान पर खोदे हुए कुँए का ही था!
तभी शंकर आ पहुंचा वहाँ, उसने नमस्ते की और अपने अंगोछे से अपना मुंह पोंछते हुए अपने हाथ धोये और फिर वहीँ एक खटोला बिछा कर बैठ गया!
हरि साहब ने दो चार बातें कीं उस से और फिर सीधे ही बिना वक़्त गँवाए काम की बात पर आ गए! अब शंकर मेरे सवालों का उत्तर देने को तैयार था!
"शंकर, जैसा मुझे हरि साहब ने बताया है वैसा कुछ देखा है आपने?" मैंने पूछा,
'हाँ जी, देखा है, मै क्या सभी ने देखा है यहाँ" वो बोला,
"अच्छा" मैंने कहा,
अब तक शंकर की पत्नी भी वहाँ आ बैठी, घूंघट किये हुए,
"क्या देखा है शंकर आपने?" मैंने पूछा,
"यहाँ अक्सर दो औरतें दिखाई देती हैं घूमते हुए" वो बोला,
"तुमने देखी हैं?" मैंने पूछा,
"हाँ जी, तीन बार" वो बोला,
"क्या उम्र होगी उनकी?" मैंने पूछा,
"जी पक्का पता नहीं, होगी ३०-३५ बरस" वो बोला,
"क्या पहन रखा है उन्होंने?" मैंने पूछा,
"कुछ नहीं" वो बोला,
"कुछ नहीं? मतलब नग्न?" मैंने पूछा,
"हाँ जी" वो बोला,
धमाका हुआ! मेरे दिमाग में हुआ धमाका! प्रेत यदि नग्न हो तो बलि कारण होता है उसका! और यहाँ बलि?
"पास में से देखी थीं?" मैंने पूछा,
"नहीं जी, कोई पचास फीट की दूरी से देखा था" वो बोला,
"किस जगह?" मैंने पूछा,
"जी पीछे है वो जगह, वहाँ केले, पपीते के पेड़ हैं" वो बोला,
"अक्सर वहीँ दिखाई देती हैं?'' मैंने पूछा,
"जी दो बार वहीँ दिखाई दी थीं, और एक बार कुँए के पास, चक्कर लगा रही थीं कुँए के" वो बोला,
"अच्छा, बाल कैसे हैं उनके?" मैंने पूछा,
"काले" उसने कहा,
"नहीं, खुले हैं या बंधे हुए?" मैंने पूछा,
"खुले हुए, छाती तक" वो बोला,
खुले हुए! फिर से बलि का द्योतक!
"किसी को पुकारती हैं? कुछ कहती हैं?" मैंने पूछा
"नहीं जी, चुप ही रहती हैं" वो बोला,
"अच्छा!" मैंने कहा,
"और गुरु जी, मेरी पत्नी ने भी कुछ देखा है यहाँ" वो बोला,
"क्या?" मैंने उत्सुकता से पूछा,
अब उसकी पत्नी की तरफ हमारी नज़रें गढ़ गयीं,
"क्या देखा आपने?" मैंने पूछा,
"जी मैंने यहाँ एक आदमी को देखा था, पेड़ के नीचे बैठे हुए" उसने बताया,
"आदमी? कैसा था वो?" मैंने कुरेदा!
"होगा कोई पचास-साठ बरस का, सर पर साफ़ सा बाँधा था उसने" वो बोली,
"और?" मैंने पूछा,
"वो बैठा हुआ था, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो, बीच बीच में उठकर सामने कमर झुक कर देखता था, फिर बैठ जाता था" उसने बताया,
"फिर?" मैंने पूछा,
"मैंने सोचा यहीं आसपास का होगा, मै वहाँ तक गयी और जैसे ही मेरी नज़र उस से मिली वो गायब हो गया, मै डर के मारे चाखते हुए वापिस आ गयी यहाँ और सभी को बताया!" वो बोली,
"अच्छा! ये कब की बात होगी?" मैंने पूछा,
"करीब छह महीने हो गए" वो बोली,
"फिर कभी नज़र आया वो?" मैंने पूछा,
"नहीं, कभी नहीं" उसने कहा,
"हम्म" मैंने मुंह बंद रखते हुए ही कहा,
तभी वो उठी और चली गयी वहाँ से!