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Guest
हम सीधा शंकर के पास आये, वे सभी बड़ी बेसब्री से हमारा इंतज़ार कर रहे थे, चेहरे पर हवाइयां उडी हुईं थीं उनके!
"सब खैरियत तो है गुरु जी?" क़य्यूम भाई ने पूछा,
"हाँ सब खैरियत से है" मैंने कहा,
अब उन्हें चैन पड़ा!
"शंकर?" शर्मा जी ने कहा,
"जी?" वो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया,
"तुमने जो दो औरतें देखीं थीं, वो रक्त-रंजित थीं क्या?" शर्मा जी ने पूछा,
"नहीं जी, बिलकुल नहीं" उसने कहा,
अब मुझे जैसे झटके से लगने लगे!
"एक दम साफ़ थीं वो?" मैंने पूछा,
"हाँ जी, हाँ उन्होंने पेट पर शायद कोई भस्म या चन्दन सा मला हुआ था, पक्का नहीं कह सकता" शंकर ने कहा,
"कोई हथियार था उनके हाथ में?" शर्मा जी ने पूछा,
"जी नहीं, कोई हथियार नहीं, केवल खाली हाथ थीं वो" उसने कहा,
यहाँ हरि साहब और क़य्यूम भी की साँसें रुक रुक कर आगे बढ़ रही थीं! आँखें ऐसे फटी थीं जैसे दम निकलने वाला ही हो! एक एक सवाल पर आँखें और चौड़ी हो जाती थीं उनकी!
"क्या हुआ गुरु जी?" हरि साहब ने पूछा,
"कुछ नहीं" मैंने उलझे हुए भी सुलझा सा उत्तर दिया!
"आपको दिखाई दीं वो?" अब क़य्यूम ने पूछा,
"हाँ!" मैंने कहा,
अब तो जैसे दोनों को भय का भाला घुस गया छाती के आरपार!
"क्क्क्क्क.......क्या?" हरि साहब के मुंह से निकला!
"हाँ, उनका बसेरा यहीं है!" मैंने कहा,
"मैंने कहा था न गुरु जी? यहाँ बहुत बड़ी गड़बड़ है, आप बचाइये हमे" अब ये कहते ही घबराए वो, हाथ कांपने लगे उनके!
"आप न घबराइये हरि साहब, मै इसीलिए तो आया हूँ यहाँ" मैंने कहा,
"हम तो मर गए गुरु जी" वे गर्दन हिला के बोले,
"आप चिंता न कीजिये हरि साहब" मैंने कहा,
"गुरु जी, वहाँ उस पेड़ को देखें?" शर्मा जी ने याद दिलाया मुझे,
"हाँ! हाँ! अवश्य!" मैंने कहा,
हम भागे वहाँ से, उस अमलतास पेड़ की तरफ! वहाँ पहुंचे, टोर्च की रौशनी डाली वहाँ, कोई नहीं था वहाँ! हम आगे गए! मैंने रुका, शर्मा जी को रोका, कुछ पल ठहरा और फिर मै अकेला ही आगे बढ़ा, पेड़ के नीचे कुछ भी नहीं था, कुछ भी नहीं! मैंने आसपास गौर से देखा, और देखने पर अचानक ही मुझे पेड़ से दूर, चारदीवारी के पास एक आदमी खड़ा दिखा, साफ़ा बांधे! मै वहीँ चल पड़ा! वो अचानक से नीचे बैठ गया, जैसे कोई कुत्ता छलांग मारने के लिए बैठता है, मै रुक गया तभी कि तभी, जस का तस! वो नीचे ही बैठा रहा, मै अब धीरे धीरे आगे बढ़ा! और फिर रुक गया!
"कौन है वहाँ?" मैंने पूछा,
कोई उत्तर नहीं आया!
"कौन हो तुम?" मैंने पूछा,
कोई उत्तर नहीं!
अब मै आगे बढ़ा तो वो उठकर खड़ा हो गया! लम्बा! कद्दावर और बेहद मजबूत! पहलवानी जिस्म! उसने बाजूओं पर गंडे-ताबीज़ बाँध रखे थे! गले में माल धारण कर राखी थी, कौन सी? ये नहीं पता चल रहा था! कद उसका सात या सवा सात फीट रहा होगा! उम्र कोई चालीस के आसपास!
"क्या नाम है तुम्हारा?" मैंने पूछा,
कोई उत्तर नहीं!
मै आगे बढ़ा!
"जहां है, वहीँ ठहर जा!" वो गर्रा के बोला!
भयानक स्वर उसका और लहजा कड़वा! रुक्ष! धमकाने वाला!
मै ठहर गया!
"कौन हो तुम?" मैंने पूछा,
"क्या करेगा जानकार?" उसने जैसे ऐसा कह कर चुटकी सी ली!
"मै जानना चाहता हूँ" मैंने कहा,
"किसलिए?" उसने पूछा,
अब इसका उत्तर मेरे पास नहीं था!
"यहाँ प्रेतों का वास है" मैंने कहा,
वो हंसा! बहुत तेज! सच में बहुत तेज!
"मै चाहता हूँ कि तुम सब यहाँ से चले जाओ, अज ही!" मैंने कहा,
"अब वो गुस्सा हो गया! कूद के मेरे सामने आ खड़ा हुआ! मरे सर पर अपना भारी भरकम हाथ रखा! और मुझे हैरत! मेरे तंत्राभूषण भी नहीं रोक पाए उसे मुझे छूने से! ये कैसा भ्रम??
"ये भूमि हमारी है! पार्वती नदी तक, सारी भूमि हमारी है!" उसने मुझे दूर इशारा करके बताया!
"कैसी भूमि?" मैंने उसका हाथ अपने सर से नीचे किया और पूछा,
"ये भूमि" उसने अपने पैर से भूमि पर थाप मारते हुए कहा!
"कौन हो तुम?" मैंने पूछा,
"मेरा नाम खेचर है! ये मेरा ही स्थान है!" उसने कहा,
स्थान? यही सुना न मैंने??
''स्थान? कैसा स्थान?" मैंने पूछा,
"ये स्थान!" उसने फिर से इशारा करके मुझे वही भूमि दिखा दी!
मै हतप्रभ था!
"सब खैरियत तो है गुरु जी?" क़य्यूम भाई ने पूछा,
"हाँ सब खैरियत से है" मैंने कहा,
अब उन्हें चैन पड़ा!
"शंकर?" शर्मा जी ने कहा,
"जी?" वो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया,
"तुमने जो दो औरतें देखीं थीं, वो रक्त-रंजित थीं क्या?" शर्मा जी ने पूछा,
"नहीं जी, बिलकुल नहीं" उसने कहा,
अब मुझे जैसे झटके से लगने लगे!
"एक दम साफ़ थीं वो?" मैंने पूछा,
"हाँ जी, हाँ उन्होंने पेट पर शायद कोई भस्म या चन्दन सा मला हुआ था, पक्का नहीं कह सकता" शंकर ने कहा,
"कोई हथियार था उनके हाथ में?" शर्मा जी ने पूछा,
"जी नहीं, कोई हथियार नहीं, केवल खाली हाथ थीं वो" उसने कहा,
यहाँ हरि साहब और क़य्यूम भी की साँसें रुक रुक कर आगे बढ़ रही थीं! आँखें ऐसे फटी थीं जैसे दम निकलने वाला ही हो! एक एक सवाल पर आँखें और चौड़ी हो जाती थीं उनकी!
"क्या हुआ गुरु जी?" हरि साहब ने पूछा,
"कुछ नहीं" मैंने उलझे हुए भी सुलझा सा उत्तर दिया!
"आपको दिखाई दीं वो?" अब क़य्यूम ने पूछा,
"हाँ!" मैंने कहा,
अब तो जैसे दोनों को भय का भाला घुस गया छाती के आरपार!
"क्क्क्क्क.......क्या?" हरि साहब के मुंह से निकला!
"हाँ, उनका बसेरा यहीं है!" मैंने कहा,
"मैंने कहा था न गुरु जी? यहाँ बहुत बड़ी गड़बड़ है, आप बचाइये हमे" अब ये कहते ही घबराए वो, हाथ कांपने लगे उनके!
"आप न घबराइये हरि साहब, मै इसीलिए तो आया हूँ यहाँ" मैंने कहा,
"हम तो मर गए गुरु जी" वे गर्दन हिला के बोले,
"आप चिंता न कीजिये हरि साहब" मैंने कहा,
"गुरु जी, वहाँ उस पेड़ को देखें?" शर्मा जी ने याद दिलाया मुझे,
"हाँ! हाँ! अवश्य!" मैंने कहा,
हम भागे वहाँ से, उस अमलतास पेड़ की तरफ! वहाँ पहुंचे, टोर्च की रौशनी डाली वहाँ, कोई नहीं था वहाँ! हम आगे गए! मैंने रुका, शर्मा जी को रोका, कुछ पल ठहरा और फिर मै अकेला ही आगे बढ़ा, पेड़ के नीचे कुछ भी नहीं था, कुछ भी नहीं! मैंने आसपास गौर से देखा, और देखने पर अचानक ही मुझे पेड़ से दूर, चारदीवारी के पास एक आदमी खड़ा दिखा, साफ़ा बांधे! मै वहीँ चल पड़ा! वो अचानक से नीचे बैठ गया, जैसे कोई कुत्ता छलांग मारने के लिए बैठता है, मै रुक गया तभी कि तभी, जस का तस! वो नीचे ही बैठा रहा, मै अब धीरे धीरे आगे बढ़ा! और फिर रुक गया!
"कौन है वहाँ?" मैंने पूछा,
कोई उत्तर नहीं आया!
"कौन हो तुम?" मैंने पूछा,
कोई उत्तर नहीं!
अब मै आगे बढ़ा तो वो उठकर खड़ा हो गया! लम्बा! कद्दावर और बेहद मजबूत! पहलवानी जिस्म! उसने बाजूओं पर गंडे-ताबीज़ बाँध रखे थे! गले में माल धारण कर राखी थी, कौन सी? ये नहीं पता चल रहा था! कद उसका सात या सवा सात फीट रहा होगा! उम्र कोई चालीस के आसपास!
"क्या नाम है तुम्हारा?" मैंने पूछा,
कोई उत्तर नहीं!
मै आगे बढ़ा!
"जहां है, वहीँ ठहर जा!" वो गर्रा के बोला!
भयानक स्वर उसका और लहजा कड़वा! रुक्ष! धमकाने वाला!
मै ठहर गया!
"कौन हो तुम?" मैंने पूछा,
"क्या करेगा जानकार?" उसने जैसे ऐसा कह कर चुटकी सी ली!
"मै जानना चाहता हूँ" मैंने कहा,
"किसलिए?" उसने पूछा,
अब इसका उत्तर मेरे पास नहीं था!
"यहाँ प्रेतों का वास है" मैंने कहा,
वो हंसा! बहुत तेज! सच में बहुत तेज!
"मै चाहता हूँ कि तुम सब यहाँ से चले जाओ, अज ही!" मैंने कहा,
"अब वो गुस्सा हो गया! कूद के मेरे सामने आ खड़ा हुआ! मरे सर पर अपना भारी भरकम हाथ रखा! और मुझे हैरत! मेरे तंत्राभूषण भी नहीं रोक पाए उसे मुझे छूने से! ये कैसा भ्रम??
"ये भूमि हमारी है! पार्वती नदी तक, सारी भूमि हमारी है!" उसने मुझे दूर इशारा करके बताया!
"कैसी भूमि?" मैंने उसका हाथ अपने सर से नीचे किया और पूछा,
"ये भूमि" उसने अपने पैर से भूमि पर थाप मारते हुए कहा!
"कौन हो तुम?" मैंने पूछा,
"मेरा नाम खेचर है! ये मेरा ही स्थान है!" उसने कहा,
स्थान? यही सुना न मैंने??
''स्थान? कैसा स्थान?" मैंने पूछा,
"ये स्थान!" उसने फिर से इशारा करके मुझे वही भूमि दिखा दी!
मै हतप्रभ था!