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मधु की शादी
लेखक : अवनि श्रीवास्तव
“तुम मुझसे क्या चाहते हो प्रेम,”- मधु ने प्रेम से पूछा. “तुम्हारा साथ और क्या ?”. प्रेम के अह्लाद ने आसमान को हिला दिया. मधु ने व्यंग्य भरी निगाहों से प्रेम को देखा. “तुम्हारी माँ मुझे स्वीकार लेंगीं ?”. मधु की इस बात पर प्रेम का आश्चर्य सातवें आसमान को लांघ गया. “तुम मेरी माँ को नहीं जानती, मेरी खुशी में ही मेरी माँ की खुशी है”. प्रेम और मधु देर तक बादलों को निहारते रहे. कभी कोई झोंका, किसी बादल को किसी ओर ले जाता तो,कोई झोंका किसी बादल को किसी और दिशा में, बिलकुल उन दोनों के अपने – अपने मन की तरह.
“मेरा साथ दोगी ना !”. प्रेम ने मधु को शंका भरी निगाहों से देखा. “मरते दम तक”. मधु के सटीक उत्तर ने प्रेम के ह्रदय से असमंजस के कोहरे को हटा दिया. दूर से गुजरती इंटर सिटी एक्सप्रेस की आवाज ने, दोनों की तन्द्रा को भंग कर दिया था. ठंडी सांसों के स्वर ने वातावारण को काफी भारी कर दिया.
वो एक छोटा क़स्बा था – आमगांव. उन दोनों के घर भी आपस में ज्यादा दूर नहीं थे, बिलकुल रेलवे स्टेशन के पास. परन्तु दोनों के परिवारों में ज्यादा बोलचाल नहीं थी.दोनों परिवारों की रहन सहन और परिवेश में अंतर था. एक मराठी परिवार तो दूसरा उत्तर भारतीय. मधु का घर ज्यादा संपन्न था. मधु अपने चाचा के पास रहती थी.चाचा – चाची ने अपनी बेटी की तरह पाला पोसा था – मधु को.
प्रेम के भी पिता नहीं थे. बूढ़ी माँ थी. पुरखों का बनाया हुआ एक घर था, और साथ में लगा हुआ एक छोटा सा खेत. पढाई पूरा करते ही, प्रेम में कस्बे के अन्य लडकों की तरह, समीप के शहर में “जौब” करने का चस्का लग गया था. माँ ने लाख कहा की, बेटा अपने खेत में हाथ बंटाओ, घर में सोना बरसेगा.पर प्रेम को तो शहर की हवा फांकनी थी.
प्रेम, सुबह की शटल से शहर निकल जाता और शाम की इंटरसिटी एक्सप्रेस से घर आता. साफ़ – सुथरे कपड़ों में बेटे को, शहर जाने को तैयार होता देख माँ संतोष कर जाती की, चलो लड़का अपने पैर पर खड़ा हो गया है.फिर अपने सूने खेत को देखकर माँ की आँखें भर आतीं.
एक सुबह पड़ोस की मधु को ट्रेन की टिकिट की लाईन में खड़ा देखकर ,प्रेम को सुखद आश्चर्य हुआ.उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी की, मधु से कुछ पूछे.परन्तु शहर के रेल्वे स्टेशन के बाहर मधु को प्रतीक्षा में खड़ा देख कर प्रेम से रहा नहीं गया और उसने पूछ ही लिया, –“जाना कहाँ है आपको ?”. मधु का ठहरा हुआ उत्तर सुनकर प्रेम ने कहा, -“फिर तो आप गलत साइड खडीं हैं, आपको ऑटो रोड के दूसरी तरफ से मिलेगा”.बस इतना ही था वह प्रथम संवाद.
टारगेट का दवाब और बॉस की रोज – रोज की किचकिच सुनकर प्रेम को कभी – कभी लगता की, माँ का कहना ही ठीक है. अपने खेत में काम करना ही अच्छा है. ना किसी की डांट,ना कोई टेंशन. फिर प्रेम अपने सिर को बेरहमी से झटक देता, उसके सारे ख्याल हवा हो जाते.
उस रोज प्रेम कुछ ज्यादा ही लेट हो गया था. इंटरसिटी एक्सप्रेस का अनाउंसमेंट काफी दूर से ही सुनाई दे रहा था. था. प्रेम हडबडाहट में बस से उतरा और टिकिट काउंटर की ओर दौड़ा. वहां मधु को देखते ही उसके पैर रुक गए. मधु ने बताया की उसने दोनों के टिकिट ले लिए हैं. ट्रेन ने हलकी स्पीड पकड़ी ही थी की दोनों हिम्मत करके ट्रेन में चढ़ गए. गेट के पास खड़े दोनों के लिए यह एक नया अनुभव था. मधु ने बताया की वह शहर के कॉलेज में पढ़ाई कर रही है.
फिर तो जैसे रोज का क्रम बन गया. कभी सुबह की शटल का टिकिट मधु लेती तो किसी दिन शाम की इंटरसिटी का टिकिट प्रेम लेता. समय गुजरता गया. मधु और प्रेम में प्रगाढ़ता बढ़ती गयी. जब कभी दोनों जल्दी फ्री हो जाते, तो शहर में खूब घुमते. एक शाम मधु ने प्रेम को बताया की उसे लड़के वाले देखने आने वाले हैं. वातावरण में निस्तब्धता छा गई. मधु ने देखा की प्रेम, की आँखों में आंसू आ गए हैं. मधु ने प्रेम का हाथ थाम लिया. मधु ने प्रेम से कहा -,”प्रेम मेरे चाचा से बात करों ना !“.
प्रेम ने सोचा की, माँ को बता दूँ. फिर जाने क्या सोचकर वह रह गया. अगले रविवार की शाम प्रेम, जैसे अपने ह्रदय को अपने हाथों में लेकर मधु के घर पहुंचा. श्वेत वस्त्रों में मधु के चाचा, एक सज्जन पुरुष कम, किसी गाँव के जमींदार ज्यादा लग रहे थे. प्रेम के अभिवादन का उत्तर, उन्होंने प्रेम को बैठने का इशारा कर किया. प्रेम समीप की ही एक कुर्सी पर बैठ गया. प्रेम अपने शब्दों को जुटाने का प्रयत्न करने लगा. चाय का एक घूंठ लेते हुए मधु के चाचा ने कहा,- “काफी समय से हम लोगों का सोने – चांदी का व्यवसाय है. दूर – दूर तक हमारे यहाँ के जेवर प्रसिद्द हैं.” मधु के पिता ने एक काफी पुराना एल्बम दिखाया जिसमें कोई महारानी जेसी महिला आभूषणों से लदी हुयी तस्वीर थी. मधु के चाचा ने बताया की वो किसी राजघराने की महिला थी और उसके सारे जेवरातों का निर्माण उनके वंशजों ने किया था. प्रेम जैसे जमीन में गढ़ गया था. उसकी आँखें व्यथित हो रहीं थीं. मधु के चाचा ने अपने हाथ में पहनीं हुईं अन्गूठीयों के बारे में बताना शुरू किया. प्रेम की निगाहें जमीन खंगालतीं रहीं.
लेखक : अवनि श्रीवास्तव
“तुम मुझसे क्या चाहते हो प्रेम,”- मधु ने प्रेम से पूछा. “तुम्हारा साथ और क्या ?”. प्रेम के अह्लाद ने आसमान को हिला दिया. मधु ने व्यंग्य भरी निगाहों से प्रेम को देखा. “तुम्हारी माँ मुझे स्वीकार लेंगीं ?”. मधु की इस बात पर प्रेम का आश्चर्य सातवें आसमान को लांघ गया. “तुम मेरी माँ को नहीं जानती, मेरी खुशी में ही मेरी माँ की खुशी है”. प्रेम और मधु देर तक बादलों को निहारते रहे. कभी कोई झोंका, किसी बादल को किसी ओर ले जाता तो,कोई झोंका किसी बादल को किसी और दिशा में, बिलकुल उन दोनों के अपने – अपने मन की तरह.
“मेरा साथ दोगी ना !”. प्रेम ने मधु को शंका भरी निगाहों से देखा. “मरते दम तक”. मधु के सटीक उत्तर ने प्रेम के ह्रदय से असमंजस के कोहरे को हटा दिया. दूर से गुजरती इंटर सिटी एक्सप्रेस की आवाज ने, दोनों की तन्द्रा को भंग कर दिया था. ठंडी सांसों के स्वर ने वातावारण को काफी भारी कर दिया.
वो एक छोटा क़स्बा था – आमगांव. उन दोनों के घर भी आपस में ज्यादा दूर नहीं थे, बिलकुल रेलवे स्टेशन के पास. परन्तु दोनों के परिवारों में ज्यादा बोलचाल नहीं थी.दोनों परिवारों की रहन सहन और परिवेश में अंतर था. एक मराठी परिवार तो दूसरा उत्तर भारतीय. मधु का घर ज्यादा संपन्न था. मधु अपने चाचा के पास रहती थी.चाचा – चाची ने अपनी बेटी की तरह पाला पोसा था – मधु को.
प्रेम के भी पिता नहीं थे. बूढ़ी माँ थी. पुरखों का बनाया हुआ एक घर था, और साथ में लगा हुआ एक छोटा सा खेत. पढाई पूरा करते ही, प्रेम में कस्बे के अन्य लडकों की तरह, समीप के शहर में “जौब” करने का चस्का लग गया था. माँ ने लाख कहा की, बेटा अपने खेत में हाथ बंटाओ, घर में सोना बरसेगा.पर प्रेम को तो शहर की हवा फांकनी थी.
प्रेम, सुबह की शटल से शहर निकल जाता और शाम की इंटरसिटी एक्सप्रेस से घर आता. साफ़ – सुथरे कपड़ों में बेटे को, शहर जाने को तैयार होता देख माँ संतोष कर जाती की, चलो लड़का अपने पैर पर खड़ा हो गया है.फिर अपने सूने खेत को देखकर माँ की आँखें भर आतीं.
एक सुबह पड़ोस की मधु को ट्रेन की टिकिट की लाईन में खड़ा देखकर ,प्रेम को सुखद आश्चर्य हुआ.उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी की, मधु से कुछ पूछे.परन्तु शहर के रेल्वे स्टेशन के बाहर मधु को प्रतीक्षा में खड़ा देख कर प्रेम से रहा नहीं गया और उसने पूछ ही लिया, –“जाना कहाँ है आपको ?”. मधु का ठहरा हुआ उत्तर सुनकर प्रेम ने कहा, -“फिर तो आप गलत साइड खडीं हैं, आपको ऑटो रोड के दूसरी तरफ से मिलेगा”.बस इतना ही था वह प्रथम संवाद.
टारगेट का दवाब और बॉस की रोज – रोज की किचकिच सुनकर प्रेम को कभी – कभी लगता की, माँ का कहना ही ठीक है. अपने खेत में काम करना ही अच्छा है. ना किसी की डांट,ना कोई टेंशन. फिर प्रेम अपने सिर को बेरहमी से झटक देता, उसके सारे ख्याल हवा हो जाते.
उस रोज प्रेम कुछ ज्यादा ही लेट हो गया था. इंटरसिटी एक्सप्रेस का अनाउंसमेंट काफी दूर से ही सुनाई दे रहा था. था. प्रेम हडबडाहट में बस से उतरा और टिकिट काउंटर की ओर दौड़ा. वहां मधु को देखते ही उसके पैर रुक गए. मधु ने बताया की उसने दोनों के टिकिट ले लिए हैं. ट्रेन ने हलकी स्पीड पकड़ी ही थी की दोनों हिम्मत करके ट्रेन में चढ़ गए. गेट के पास खड़े दोनों के लिए यह एक नया अनुभव था. मधु ने बताया की वह शहर के कॉलेज में पढ़ाई कर रही है.
फिर तो जैसे रोज का क्रम बन गया. कभी सुबह की शटल का टिकिट मधु लेती तो किसी दिन शाम की इंटरसिटी का टिकिट प्रेम लेता. समय गुजरता गया. मधु और प्रेम में प्रगाढ़ता बढ़ती गयी. जब कभी दोनों जल्दी फ्री हो जाते, तो शहर में खूब घुमते. एक शाम मधु ने प्रेम को बताया की उसे लड़के वाले देखने आने वाले हैं. वातावरण में निस्तब्धता छा गई. मधु ने देखा की प्रेम, की आँखों में आंसू आ गए हैं. मधु ने प्रेम का हाथ थाम लिया. मधु ने प्रेम से कहा -,”प्रेम मेरे चाचा से बात करों ना !“.
प्रेम ने सोचा की, माँ को बता दूँ. फिर जाने क्या सोचकर वह रह गया. अगले रविवार की शाम प्रेम, जैसे अपने ह्रदय को अपने हाथों में लेकर मधु के घर पहुंचा. श्वेत वस्त्रों में मधु के चाचा, एक सज्जन पुरुष कम, किसी गाँव के जमींदार ज्यादा लग रहे थे. प्रेम के अभिवादन का उत्तर, उन्होंने प्रेम को बैठने का इशारा कर किया. प्रेम समीप की ही एक कुर्सी पर बैठ गया. प्रेम अपने शब्दों को जुटाने का प्रयत्न करने लगा. चाय का एक घूंठ लेते हुए मधु के चाचा ने कहा,- “काफी समय से हम लोगों का सोने – चांदी का व्यवसाय है. दूर – दूर तक हमारे यहाँ के जेवर प्रसिद्द हैं.” मधु के पिता ने एक काफी पुराना एल्बम दिखाया जिसमें कोई महारानी जेसी महिला आभूषणों से लदी हुयी तस्वीर थी. मधु के चाचा ने बताया की वो किसी राजघराने की महिला थी और उसके सारे जेवरातों का निर्माण उनके वंशजों ने किया था. प्रेम जैसे जमीन में गढ़ गया था. उसकी आँखें व्यथित हो रहीं थीं. मधु के चाचा ने अपने हाथ में पहनीं हुईं अन्गूठीयों के बारे में बताना शुरू किया. प्रेम की निगाहें जमीन खंगालतीं रहीं.