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मनोहर कहानियाँ

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Guest
'शिकार'



शाम के करीब 4 बजे थे। बाहर तेज बारिश हो रही थी। अमित अपने बेडरूम में अधलेटी अवस्थ में किसी उपन्यास के पृष्ठ पलट रहा था। मौसम सुबह से ही खराब था जिसकी वजह से वह आपिफस भी नहीं गया था। हाथ में थमा उपन्यास वह पहले भी एक दपफा पढ़ चुका था, लिहाजा दोबारा पढ़ने में उसे बोरियत महसूस हो रही थी। कुछ क्षण और पन्ने पलटते रहने के बाद उसने सुबह की डाक से आया मां का पत्रा उठा लिया और एक बार पिफर उसे पूरा पढ़ डाला।

मां ने लिखा था कि उसकीशादी किसी स्वेता नामक युवती से तय कर दी गई है। स्वेता बी.ए. पास थी और सिी काल सेंटर में जाॅब करती थी। पत्रा में मां ने जल्दी ही स्वेता की पफोटो भेजने की बात लिखी थी। पूरा पत्रा पढ़ चुकने के बाद उसने उसे तकिए के नीचे रख दिया और पुनः उपन्यास हाथ में उठा लिया। ठीक तभी दरवो पर दस्तक हुई।

अमित उठकर दरवाजे तक पहुंचा और किवाड़ खोलते ही चैक गया। खुले दरवाजे पर सिर से पांव तक भीगी हुई एक खूबसूरत युवती खड़ी थी। उसने जींस की पैंट और सपेफद रंग क शर्ट पहन रखा था। शर्ट का पहना और ना पहनना दोनों इस वक्त बराबर था क्योंकि भीगा हुआ शर्ट उसके शरीर से चिपक गया था और उसकी मांसल छातियां स्पष्ट नुमाया हो रही थी। अमित पहली ही नजर में भांप गया कि युवती शर्ट के नीचे कुछ भी नहीं पहने थी। उसके शरीर में सनसनी की लहर दौड़ गई।

कुछ क्षण युवती को घूरते रहने के बावजूद उसे युवती की सूरत जानी-पहचानी नहीं लगी। उसने अपने दिमाग पर जोर डालकर युवती को पहचानने की कोशिश की, किंतु कामयाब नहीं हुआ। कुछ ही क्षणों में उसे यकीन आ गया कि आज से पहले उसने युवती को कभी नहीं देखा था अतः उसने व्यर्थ सिर खपाने की बजाय उससे पूछ लेना ही उचित समझा, फ्कहिए किससे मिलना है?य्

फ्मुझे नहीं मालूम।य् युवती बोली, पिफर उसने महसूस किया कि उसकी बात स्पष्ट नहीं है अतः जल्दी से बोल पड़ी, फ्मेरा मतलब है बाहर बहुत तेज बारिश हो रही है, अगर आपकी इजाजत हो तो बारिश बंद होने तक मैं यहां रुक जाऊं।य्

फ्जी हां क्यों नहीं, प्लीज अंदर आ जाइए।य्

युवती कमरे में दाखिल हो गई। अमित ने उसे पीठ पीछे दरवाजा बंद कर दिया।

फ्मेरा नाम मोना है मैं...।य्

फ्परिचय बाद में दीजिएगा, पहले आप भीतर जाकर कपड़े बदल ले वरना बीमार पड़ जायेंगी। वार्डरोब में से जो भी आप पहनना चाहें पहन सकती हैं। आपचेंज करके आइए तब तक मैं आपक लिए चाय बनाता हूं।य्

कहकर अमित किचन की ओर बढ़ गया। युवती जिसने अपना नाम मोना बताया था, बेडरूम में पहुंचकर कपड़े बदलने लगी। जींस उतारकर उसने अमित का पाजामा-कुर्ता पहन लिया। मर्दाना लिबास में उसकी खूबसूरती पहले से अधिक निखर आई। वह ड्राइंगरूम में पहुंची तो दो कपों में चाय उड़ेलता अमित उसे ठगा सा देखता रहा गया।

फ्ऐसेक्या देख रहे हो?य् मोनाने इठलाते हुए एक बदनतोड़ अंगड़ाई ली।

फ्तुम बहुत खूबसूरत हो और...।य्

फ्और क्या?य् मोना ने उसकी आंखों में देखा।

फ्बहुत ज्यादा सेक्सी भी।य्

फ्सच...।य्

फ्एकदम सच मैंने तुम जैसी हसीन लड़की ताजिदंगी नहीं देखी, सच पूछो तो मुझे अभी तक यकीन नहीं हो रहा है कि स्वर्ग की एक अप्सरा मेरे सामने खड़ी है। मुझे सबकुछ स्वप्न जैसा प्रतीत हो रहा है।य्

फ्तुम मुझे बना तो नहीं रहे?य्

फ्बिल्कुल नहीं।य्

फ्पिफर तो तारीपफ करने के लिए शुक्रिया।य् मोना मुस्करा उठी।

फ्काश! तुम ताजिंदगी यूं ही मुस्कराती रहती और मैं तुम्हें निहारता रहता।य्

फ्और इस निहारने के चक्कर में चाय ठण्डी हो जाती।य् मोना ने कहा और हंस पड़ी।

फ्अरे चाय को तो मैं भूल ही गया था।य्

अमित ने एक कप तत्काल उसे पकड़ाया और दूसरा स्वयं उठा लिया। दोनों चाय पीने लगे, मगर इस दौरान भी अमित ललचाई नजरों से मोना के कपड़ों के भीतर छिपे उसके गुदाज बदन की कल्पना कर आनंदित होता रहा।

फ्बाई दी वे तुम्हारा नाम क्या है?य् मोना ने पूछा।

फ्अमित।य् वह बोला, फ्अमित कश्यप।य्

फ्हां तो मिस्टर अमित कश्यप जी आप ये बताइये कि कहीं आप मुझ पर लाइन तो नहीं मार रहे।य्

फ्तुम्हें ऐसा लगता है।य्

फ्जी हो, तभी तो पूछ रही हूं।य्

प्रतीक चित्र

फ्तो समझ लो ऐसा ही है, मैं सचमुच तुम पर लाइन मार रहा हूं, क्योंकि तुम्हारे इस सांचे में ढले बदन ने मुझे दीवाना बना दिया, काश! मेरी दीवानगी का कोई बेहतर सिला तुम मुझे दे पाती तो मैं ताउम्र तुम्हारा एहसानमंद रहता।य्

फ्गुड तुम्हारी सापफगोई मुझे पसंद आई, मुझे तुम्हारी दीवानगी भी पसंद आई, मगर यूं ही दूर-दूर से ही अपना प्रेम प्रगट करते रहोगे या करीब आकर भी कुछ...।य्

फ्सो स्वीट।य् अमि चहक उठा, आगे बढ़कर उसने मोना को अपनी बांहों में भर लिया, इस प्रक्रिया में उसने अपना चाय काप्याला सेंट्रल टेबल पर रखना पड़ा। उस स्थिति का पूरा पफायदा उठाया मोना ने, उसने अपनी अंगूठी का कैप उठाकर पाउडर जैसा कोई पदार्थ उसकी चाय में डाल दिया।

अमित बड़ी बेसब्री से उसके कुर्ते के अंदर हाथ डालकर उसकी नग्न-चिकनी पीठ को सहला रहा था।

फ्इतनी जल्दी भी क्या है डा²लग पहले हम चायतो खत्म कर लें।य्

फ्जिसके आगे सोमरस का प्याला हो वह चाय क्यों पीयेगा?य्

फ्क्योंकि मैं ऐसा कह रही हूं।य्

फ्ओके स्वीटहार्ट।य् कहकर अमित ने जल्दी से अपना कप खाली कर दिया। इसके बाद उसने मोना को पुनः अपनी बांहों में भर लिया और उसके गुलाबी होंठों को कुचलने लगा। मोना के मुख से पादक सिसकारियां निकलने लगी, वह अमित का पूरा साथ दे रही थी। देखते ही देखते अमित ने उसका कुर्ता उतार पेंफका और उसकी नुकीली तनी हुई छातियों को सहलाते हुए उसके अंग-अंग को चूमने लगा। अतिरेक से मोना ने उसका चेहरा अपनी छातियों से भींच लिया।

ठीक इसी वक्त अमित की पकड़ ढीली पड़ने लगी। पूरा कमरा उसे गोल-गोल घूमता प्रतीत होने लगा और कुछ ही पलों में बेहोश होकर पफर्श पर पसर गया।

फ्स्साला मुफ्रत का माल समझा था।य् बड़बड़ाती हुई मोना बेडरूम की ओर बढ़ गई।

करीब दो घंटे बाद अमित को होश आया तब तक मोना जा चुकी थी। हड़बड़ाहट में वह उठ बैठा और पूरे घर में पिफर गया। घर का सारा कीमती सामाना व नकद आठ हजार रुपये जो कि उसने अपने बटुए में रखा था, गायब थे। अमित को समझते देर न लगी कि वह ठगी का शिकार हुआ हुआ है। मगर अब वह कर भी क्या सकता था।

अभी अमित इस शाॅक जैसी स्थिति मे उबर भी नहीं पाया था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने बेमन से उठकर दरवाजा खोला और हैरान रह गया। दरवाजे पर मोना से कहीं ज्यादा खूबसूरत एक युवती भीगी हुई खड़ी थी।

फ्कहिए?य्

फ्जी बाहर तेज बारिश हो रही है क्या बारिश बंद होने तक यहां रुक सकती हूं?य्

सुनकर अमित के होंठों पर एक विषैली मुस्कान तैर गई। उसे समझते देन न लगी कि एक बार उसे ठगने की कोशिश की जा रही है। मन ही मन उसने युवती को मजा चखाने का पैफसला कर लिया और मुस्कराकर बोला, फ्जी हां भीतर आ जाइए।य्

युवती तत्काल कमरे में दाखिल हो गई।

फ्आप ऐसा कीजिए, पहले कपड़े बदल लीलिए वरना बीमार पड़ जायेंगी।य् कहकर उसने बेडरूम की ओर इशारा किया पिफर बोला, फ्तब तक मैं आपके लिए चाय बनाता हूं।य्

फ्जी थैक्यू!य् कहकर युवती बेडरूम की ओर बढ़ गई और अमित किचन की तरपफ।

किचन में पहुंचकर अमित ने चाय बनाई और उसमें नशीली गोली मिला दी। थोड़ी देर बाद जब वह चाय का कप लेकर ड्राइंगरूम में पहुंचा, तब तक युवती कपड़े बदलकर आ चुकी थी। वह अमित की जींस और शर्ट पहने थी। ये कपड़े उस पर खूब पफब रहे थे।

अमित ने चाय का प्याला उसकी ओर बढ़ा दिया। युवती चाय पीने लगी तो अमित एक बार पुनः मुस्करा उठा।

नशीली गोलियों ने जल्दी ही उस पर असर दिखाया और युवती अर्धबेहोशी की स्थिति में पहुंच गई। अमित ने तत्काल उसे बांहों में भर लिया और एक-एक कर उसके कपड़े उतार डाले। युवती उसका विरोध कर रही थी, मगर अमित को स्वयं से परे धकलने की ताकत उसमें नहीं थी।

अमित ने उसके नग्न बदन को अपनी बांहों में उठाया और बेडरूम में ले जाकर उसके कोमल अंगों को सहलाने लगा। युवती कराह उठी कुछ स्पुफट से शब्द उसके मुंह से निकले, फ्कमीने...घर में आई अकेली...लड़की से...अच्छा हुआ मैं अंजान बनकर तुमसे...यहां मिलने चली...आई वरना कहीं तुम जैसे शैतान से शादी हो जाती तो...देखना मैं तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगी।

उसकी आधी-अधूरी बात का मतलब भी अमित बखूबी समझ गया। उसकी खोपड़ी भिन्ना गई। उपफ! ये उसने क्या कर डाला, उसका दिल हुआ अपने बाल नोंचने शुरू कर दे। वह युवती और कोई नहीं बल्कि उसकी मंगेतर थी।

********
 
रिश्तों की डोर

रामू गांव के नाई का लड़का था। दो साल पहले उसकी मां आंधी में छत से गिरकर मर गई थी। अब घर की देखभाल उसकी बहन कमली करती थी। उसका ब्याह हो चुका था। गौना हो जाऐगा तो वह भी अपनी ससुराल चली जाएगी पर अभी तो घर का सारा बोझ उसी पर था। जजमानी में मां की जगह वही आती-जाती थी।

कमली जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी। उसका गोरा सालोना चेहरा, लचीला बदन देखकर लगता मानो वह किसी ऊचीं जाति की बेटी हो। वह लहंगा पहनती और रंग-बिरंगे दुपट्टे ओढ़ती थी। जब वह अंचल में हाथ में लिए, पैरों में बिछुए और कमर पर चांदी की करधनी पहनकर गांव की धूल भरी गलियों में नजर झुकाए धीरे-धीरे चलती तो मनचलों के दिल पर सांप लोटने लगता था।

इसी गांव के ठाकुर साहब को काई औलाद नही था। एक छोटा भाई था, वह भी किसी फौजदारी में मार दिया गया था। उसी के बेटी-बेटे को वह अपनी औलाद की तरह पाल-पोस रहे थे। भतीजी का अभी ब्याह नही हुआ था। भतीजा शेरसिंह पास के शहर में पढ़ रहा था। ठाकुर साहब कमली को बेटी की तरह मानते थे।

एक दिन कमली को घर ठाकुर साहब की नौकरानी ने आकर बताया, ‘‘कमली ठाकुराइनी अम्मा ने तुम्हारे बापू को अभी बुलाया है।’’

उस समय कमली बटलोई में दाल डालने जा रही थी। थाली हाथ में लिए हुए उसने बाहर आकर बताया, ‘‘बापू तो नगरा गए हैं। भैया भी ननिहाल गया हुआ है। ऐसा क्या काम है, जो अम्मां ने इसी वक्त बापू को बुलाया है। कहो तो मै हो आऊं?’’

नौकरानी बोली, ‘‘कोई जरूरी काम होगा.... तुम्ही चली जाओं।’’

दाल डालकर कमली ठाकुर के हवेली के फाटक पर पहुचकर तनिक ठिठकी। सिर का अंचल हाथ से ठीक किया और पैर साधकर आंगन तक आ गई। चारो तरफ संनाटा फैला था। किवाड़े आधे बन्द थे। चैखट पर लालटेन लटकी थी। कमली ने वही से पुकार लगाई, ‘‘अम्मा.... ’’

किसी ने जवाब नही दिया। कमली चारों ओर सिर घुमकर देखते हुए सोचने लगी, ‘‘कोई नही है क्या.... ’’ उसका कलेजा धक-धक करने लगा। तभी भीतर से किसी ने पुकारा, ‘‘कमली.... ’’

आवाज शेरसिंह की थी। कमली की जान में जैसे जान आ गई और वह आश्वस्त होकर बोली, ‘‘हां भैया.... ’’ कमली ने शांत स्वर में पूछा, ‘‘भैया, अम्मा कहां है? घर में कोई नही दिख रहा है।’’

शेरसिंह पास आते हुए बोला, ‘‘अम्मा हीरालाल के यहां टीके में गई है। आओ.... भीतर आ जाओ।’’

कमली ने लजा कर कहा, ‘‘चुल्हा जलता छोड़ आई हूं।’’

शेरसिंह उसकी बात अनसुनी करते हुए बोला, ‘‘आओ.... आओ न.... ’’

‘‘फिर आऊंगी भैया.... ’’

अब तक शेरसिंह कमली के आगे आकर उसकी गोरी कलाई पकड़ ली। कमली की सम्पूर्ण देह में झन्न से हो गया। वह कुछ बोल न सकी तो शेरसिंह का साहस बढ़ा और वह कमली की कलाई पकड़े हुए कांपते स्वर में बोला, ‘‘मुझे कब तक तड़पाओगी कमली....’’

पलक झपकते जैसे कमली का होश लौट आया और वह भयभीत स्वर में बोली, ‘‘भैया..... ’’

और जोर से झटका दिया कलाई छूट गई। फिर सम्पूर्ण साहस बटोरकर कांपते पैरों से वह दरवाजे की ओर बढ़ी तो शेर सिंह ने आगे बढ़कर कमली का रास्ता रोक लिया। कमली उसे अपने सामने इतने निकट देखकर थर-थर कांपने लगी। जीभ तालू से चिपट गई। कंठ सूख गया। जाने कैसे अजीब से स्वर में शेरसिंह बोला, ‘‘इतना मत सताओ.... मेरे दिल के टुकड़े-टुकड़े हो जाएगे.... ’’

कमली कठिनता से बोली, ‘‘भैया.... ’’

पर शेरसिंह ने उसका हाथ पकड़कर उसे अपने पास खीचने लगा। कमली के होश उड़ गए। शेरसिंह उसे पास खीचता गया सहसा बाहर के आंगन से किसी ने पुकारा, ‘‘अरे हरिया.... चैपाल पर रोशनी नही की तूने? कहां मर गया आभागे।’’

आवाज सुनते ही शेरसिंह ने कमली को छोड़ दिया और जाने किधर छिप गया। कमली ने इस घटना की चर्चा किसी ने नही की। कहती भी तो किससे? कहकर ठाकुर साहब के भतीजे शेरसिंह का क्या कर लेती। उल्टे कमली ही गांव भर बदनामी हो जाती। कमली के चुप रह जाने से शेरसिंह बहुत प्रसन्न था। अपनी प्यास बुझाने के लिए वह मौके की तलाश में रहने लगा जल्द ही उसे मौका मिल ही गया।

प्रतीक चित्र

उस दिन ठाकुर साहब के यहां रतजगा था। दरअसल बात यह थी कि तीन साल के बाद इस बार शेरसिंह ने हाईस्कूल पास किया था। इसी की खुशी मनायी जा रही थी। रतजगा में कमली को भी बुलाया गया था। वह जाना नही चाहती थी, पर जाना जरूरी था। शाम के समय जब वह निकलने लगी तो उसने रूककर अपने बापू से पूछा, ‘‘रात अधिक हो जाएगी अकेली मैं लौटूंगी कैसे?’’

बापू बोल, ‘‘क्यों.... ठाकुराइनी के पास सो जइयो, डर क्या है।’’

‘‘डर तो कुछ नही है.... ’’ आगे कमली कुछ नही कह सकी।

ठाकुर के हवेली का आंगन औरतों से भरा था। तड़ातड़ बज रहे ढोलक की तान पर मधुर गीत हो रहे थे। गानेवाली कही बाहर से आयी थी और राधाकृष्ण के बड़े सुन्दर-सुन्दर गीत सुना रही थी। कमली जैमंती के पास बैठी गीतों का आंनद ले रही थी। अचानक ठाकुराइनी ने कमली का कंधा हिलाकर जोर से कहा, ‘‘जरा उठो तो..... ’’

‘‘क्यों अम्मां, कोई काम है क्या?’’

‘‘बेटी, जरा छत पर जाकर दो-चार कंडे लाकर आग सुलगा दे। यह ढोलक बजाने वाली बुढि़या तंबाखू पीती है। सारी रात उसे आग की जरूरत पड़ेगी।’’

कमली कंडे लेकर अंधेरे जीने से नीचे उतर रही थी कि उससे कोई टकराया तो वह डरकर पूछ बैठी, ‘‘कौन.... कौन है यहां?’’

‘‘मैं हूं.... शेरसिहं.... ’’ कहते हुए शेरसिहं ने अंधेरे में कमली का हाथ पकड़ लिया तो उसके हाथ से कंडे गिर गये और वह चेतना शून्य हो गयी। शेरसिंह लालसा भरे स्वर में फुसफुसाया, ‘‘आज मेरा कलेजा ठंडा कर दो, कमली.... ’’

कमली पागलों की तरह चिल्ला उठी, ‘‘अम्मा.... ओ अम्मा.... ’’

बाहर बज रहे ढोलक की शोर के चलते उसकी आवाज अंधेरे जीने में ही गूंजकर रह गयी। पलक झपकते ही शेरसिहं ने कमली को अपनी बांहों में कस लिया।

‘‘अरे छोड़ दे हरामी।’’

शेरसिंह ने उसे अपने कलेजे से सटा लिया।

‘‘अम्मा.... ओ अम्मा.... अरे कोई है.... बचाओ..... बचाओ’’ कमली चिल्लाती रही पर किसी ने उसकी करूण पुकार नही सुनी तो कमली मछली की तरह छटपटाती हुई दीन स्वर में गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘छोड़ दो भैया, मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूं.... भगवान के लिए छोड़ दो.... ’’

शेरसिंह पर कमली के रोने-गिड़गिड़ाने का कोई असर नही हुआ। उसने बुरी तरह छटपटाती कमली का मुंह दबाकर जमीन पर पटक दिया। इसके बाद उसने कमली को निर्वस्त्रा कर उसके दोनो उरोजो को बेदर्दी से मसलते हुए उस पर छा गया फिर उठा तभी जब उसके जिश्म का लावा फूटकर बाहर आ गया।

************
 
'काम'

रघुनी काम के लिए कोलकाता शहर के एक चैराहे पर सबेरे छः बजे से ही राजमिस्त्री एवं मजदूरों की कतार में बैठा था। काफी समय यूंही बैठे-बैठे कुछ सोचने लगा तो अचानक उसकी आंखों के सामने अतीत के कुछ पल चलचित्रा की तरह आने-जाने लगे।

उसे घर से भागे दो वर्ष गुजर गये थे। कोलकाता शहर में कदम रखते ही स्टेशन पर एक गिरहकट से पाला पड़ा और उसके प्राण जाते-जाते बचे थे। उस दिन महज दो-ढाई सौ रूपए उससे छीन लेने के चक्कर में कलकतिया गुंडे उसका खून कर देते। जैसे-तैसे माटी काटने का काम मिला। कई दिनों तक उसने काम किया। लेकिन जब मजदूरी की बात आयी तो ठेकेदार ने उसे उल्टा-सीधा समझाकर उसकी दो दिन की मजदूरी हड़प गया। बेचारा रघुनी मन मसोस कर रहा गया था।

कई माह तक उसने चूड़ा-चबेना फांक, फुटपाथ पर सोकर व्यतित किए थे। फिर उसने कई रात एक होटल के ढाबे में सोकर गुजारी थी। पहली रात तो उस ढाबे में उसका दम घुट गया था। उस रात मदोन्मत तीन वेश्याएं आकर उसके आस-पास ही सो गयी, जो रोज वहीं आकर सोती थी। बाद में तो जैसे आदत सी बन गयी, वेश्याएं आकर रघुनी के इर्द-गिर्द सो जाती थी और वह भडुए की भूमिका निभाने लगा।

वेश्याओं के इशारे पर ही एक रात उसने एक राही को लूटा और उसकी मरम्मत भी की थी। दिन मजे से बीत रहा था। कभी-कभी रात-रात भर शराब और सेक्स का दौर चलता रहता था फिर भी एकांत पाकर, उसका मन सिसकता था। इस शरीर की नश्वरता, आनंद की क्षणिकता पर तरस खाकर कल्याणकारी कार्यो की ओर भी उसने कुछ पग रखे और सोनागांछी के एक कोठे की जवान वेश्या लड़की को स्वीकार लिया।

लेकिन समाज सुधार का काम खाली पेट नही होता। गरीबी सब गुड़ गोबर कर देती है। आखिर वह लड़की एक दिन फिर से कोठे पर भाग गयी और वह चाहकर भी समाज सेवा नहीं कर सका। फिर घर भी रूपए भेजने है, बाल-बच्चों की चिन्ता। केवल अपना ही पेट नही भरना है। अपना पेट तो कुत्ता भी पाल लेता है। उसे बूढ़े कान्ट्रैक्टर की अट्ठाईस वर्षीया पत्नी की भी बात याद आ रही थी, जिसने रघुनी के हाथ में नोटों की गड्डियां रखते हुए, कहीं भाग चलने का प्रस्ताव रखा था।

उसने सुना था कि कलकत्ता की गलियों में रूपयों की वर्षा होती है। रघुनी के संजोए सपने ध्वस्त हो चूके थे। यहां आकर पता चला कि दूर के ढोल ही सुहावने होते है। घर की आधी रोटी ही भली थी। अचानक एक सेठ ने रघुनी का ध्यान भंग किया और एक मिस्त्री के साथ उसे लेकर अपने घर चला गया। सेठ के घर पहुंचकर रघुनी ने खैनी बनाई और मिस्त्री को एक चुटकी देकर खुद खाया फिर दोनों काम में जुट गए।

दोपहर एक बजे मिस्त्री ने आवाज लगायी, ‘‘सेठानी जी.... ओ सेठानी जी....’’

मिस्त्री की आवाज पर कुछ देर में एक युवती किंतु थुलथुल शरीर वाली गोरी महिला छत से झांकते हुए बोली, ‘‘क्या बात है राज मिस्त्री?’’

‘‘हम लोग खाना खाने जा रहे हैं मालकिन....’’

‘‘ठीक है मैं अभी आयी....’’

सेठानी गेट बंदकर ऊपर जाने को हुई तो युवा रघुनी जैसे उनसे मौन-मूक आंखों की भाषा में पूछता सोच लगा, मुश्किल से दस दिनों का यहां काम होगा और क्या? फिर न जाने किस घाट लगंूगा। यदि ऐसे सेठ का घरेलू नौकर हो जाता, तो कितना अच्छा होता। आलीशान महल, जर्सी गाय की देखभाल के अलावा और कोई विशेष काम भी नहीं है। लगता है सेठ निःसंतान है। बच्चों का भी कोई शोर-शराबा नहीं है। बढि़या-बढि़या खाना मिलता। इधर न तो दिन चैन न रात।

रघुनी एक दो दिन में ही सेठानी से काफी घुल-मिल गया था। एक दिन खाना खाने जाने से पहले उसने सेठानी से पूछा, ‘‘मलकिनी.... क्या मैं दोपहर में यहीं ठहर सकता हूं..... खाना खाने बहुत दूर जाना पड़ता है। इस लिए मैं अपने साथ सत्तू ले आया हूं।’’

‘‘कोई बात नहीं, आराम से रहो.... ’’

प्रतीक चित्र

कुछ देर बाद मिस्त्री भोजन करने बाहर चला गया तब सेठानी बगीचे का गेट एवं भवन का मुख्य दरवाजा बंदकर ऊपर चली गयी। सेठ जी को गोदाम पर खाना भिजवाने के बाद स्वयं भोजन कर निश्चिन्त हो नीचे रघुनी को सत्तू सानते देखने लगी।

रघुनी मन भर सत्तू खाकर ठंड़ा पानी पीया फिर जोरदार ढकार लिया तो सेठानी खिलखिलाकर हस पड़ी। रघुनी मुस्कराकर उनकी ओर देखते हुए बोला, ‘‘हसती क्यों हैं मालकिन.... जब पेट भर नहीं खाऊंगा तो खटूंगा कैसे?’’

कहकर वह अंगोछा बालू पर बिछाकर सोने लगा तो सेठानी बोली पड़ी, ‘‘ रघु.... बालू पर क्यों लेट रहे हो? ऊपर आकर चटाई पर आराम कर लो.... ’’

‘‘कोई बात नहीं मालकिन.... हम लोगों का तो बालू-माटी का काम ही है।’’

‘‘तो क्या हुआ, तुम ऊपर आ जाओ.... ’’

जब सेठानी कई बार कहती जिद कर बैठी तो वह ऊपर चला गया। चटाई पर लेटने के कुछ ही मिनटों बाद थका-मादा रघुनी अतीत की यादों के सागर में डूबता-उतरता झपकियां लेने लगा था।

इधर सेठानी बिल्कुल नई गुलाबी साड़ी पहनकर, सज-धज अपने कमरे से निकली और रघुनी के सिरहाने खड़ी बांस की सीढ़ी से ऊपर चढ़ने लगी। बिल्कुल ऊपर चढ़कर हसते हुए बोली, ‘‘रघु.... देख तो, मैं कैसी लग रही हूं?’’

रघुनी चैका और सेठानी को टकटकी लगाकर देखते हुए झट से जवाब दिया, ‘‘बहुत अच्छी.....नीचे आ जाइए मालकिन, आपके वजन से सीढ़ी लप रही है। कही टूट ने जाए।’’ कृत्रिम हसी बिखेरते हुए वह बोला।

‘‘लो आ गयी.... ’’ सीढ़ी से नीचे उतरकर रघुनी के सिर के पास बैठते हुए सेठानी ने पूछा, ‘‘अच्छा, यह बताओ, तेरी शादी हुई है या नही?’’

‘‘हो गई है.... तीन साल का एक लड़का भी है।’’

‘यहां कितने दिनों से हो?’’

‘‘करीब दो वर्षो से.....’’

‘‘बीवी की याद नहीं आती? कैसे इतने-इतने दिनों तक तुम लोग बाहर रह जाते हो?’’

‘‘याद आती है मालकिनी। मगर.... पेट के खातिर आदमी क्या-क्या नही करता। गांवों में रोजी-रोटी की गारंटी होती तो काहे को कीड़े-मकोडों की तरह जीने यहां आता? शहरों में झोपड़-पट्टियों की बाढ़ इन्हीं कारणों से हो रही है।’’

‘‘क्या रोना, रोने लगे जी..... ’’ कहती सेठानी उठकर अपने कमरे में गयी और वापस लौटकर तीन नम्बरी रघुनी को जबरन थमाती हुई बोली, ‘‘लो तीन सौ रूपए, कल अपने घर मनीआर्डर कर देना।’’

रघुनी सकपकाया-सा फटी निगाहों से सेठानी के सुन्दर चेहरे को देख ही रहा था कि सेठानी अपने फिरोजी होठों को चबाते हुए अधीर भाव से रघुनी के दायें हाथ को अपनी गोद में रखकर सहलाते हुए बोली, ‘‘तुम लोगों के बदन की कसावट इतनी अच्छी कैसे हो जाती है?’’

‘‘माटी-पानी और धूप में खटने वाले का शरीर है न.... आप लोगों की तरह मखमली सेज पर सोने वाला थोड़े हूं।’’

‘‘अच्छा तुम मेरा एक काम कर दोगे?’’ सेठानी अंगड़ाई लेकर हांफती हुई बोली, ‘‘बोलो करोगे न....।

‘‘एक क्या? दो, तीन कर दूंगा.... बोलिए न क्या काम है?’’ रघुनी झट से बोला।

‘‘औरतों का क्या काम होता है?’’

‘‘काम कुछ भी हो सकता है। बाजार से कुछ सामान खरीदकर लाना या घर में ही कोई सामान इधर से उधर रखना आदि.... मैं नही समझ पा रहा हूं।’’ रघुनी सेठानी की कुभावनाओं को भांपता बोला।

‘‘नही-नही.... यह सब काम नही हैे।’’ सेठानी अपना आंचल एक तरफ गिराते हुए बोली।

सेठानी का खुला आमंत्राण देख रघुनी भी कामग्नि से जलने लगा था। उसने सेठानी की कलाई थामी तो वह स्वयं ही कटे वृक्ष की तरह रघुनी की गोद में आ गिरी। फिर उसके हाथ सेठानी की नाजुक अंगों पर फिसलने लगा। सेठानी के तन-मन वासना की आग पहले से ही लगी थी। रघुनी का हाथ आग में घी का काम किया और सेठानी सब भूल अपना हाथ भी रघुनी के जिस्म पर फिसलाने लगी। कुछ देर तक दोनों एक दूसरे के जिश्म को नोंचते-खसोटते रहे। फिर रघुनी सेठानी को लिटाकर उन पर सवार होने के लिए उठा ही था कि खाना खाकर लौटे मिस्त्री ने दरवाजा खटखटाते हुए आवाज लगायी, ‘‘रघुनी.....ओ रघुनी.... ’’

मिस्त्री की आवाज पर रघुनी उठकर दरवाजा खोलने नीचे जाते हुए सोचने लागा कि पेट की आग और वासना की आग मुझे भस्म ही कर देगी क्या.... बाप रे, कैसा ये फेरा है? आसमान से गिरा तो खजूर में आ के अंटका..... पहले रोड की दुष्ट कुल्टाओं से जलता-झुलसता रहा और आज......?

सोचते-सोचते रघुनी ने दरवाज खोल दिया। मिस्त्री अंदर आ गया फिर दोनों काम में जुट गए।
 
‘और मैं कालगर्ल बन गई’

मैं वाराणसी खाते-पीते परिवार की अकेली औलाद हूं। मेरा नाम फरजाना है। वालिद के एक दुर्घटना में मारे जाने पर मां को एक लाख का क्लेम मिला साथ ही उन्हें वह नौकरी भी मिली जिस पर वालिद साहब थे। मेरी मां ने डेढ़-दो लाख का दहेज देकर एक सम्पन्न परिवार के ऐसे लड़के से मेरा निकाह किया जो एक मशहूर फैक्ट्री में वर्क मैनेजर था। आठ हजार तनख्वाह थी।

ससुराल में जेठ डिग्री प्राप्त डाक्टर थे। घर में सब उन्हें खान साहब कहते थे। उम्र तीस-पैंतीस की थी। अच्छी पै्रक्टिस के साथ नेतागीरि में भी उनकी खासी पकड़ थी। एम0एल0ए0 से लेकर एम0पी0 तक चुनाव लडे़ जमानतें जप्त हुई पर लखनऊ-दिल्ली में बैठे पार्टी नेताओं से अच्छे संबंध रहे। उनका विवाह नवाबी खानदान की एक लडकी से हुआ था। विवाह के तीन साल बाद एक बेटे को छोड़कर पत्नी जलकर मर गयी। कपड़ों में स्टोव की आग पकडने की वजह से वह सत्तर प्रतिशत जल गयी थी। हांलाकि अपने पति के पक्ष में बयान देकर मरी थी, फिर भी पुलिस ने केस दर्ज किया। क्योंकि लड़की के मायके वाले मौत को संदिग्ध मानते थे। दो-तीन साल की चक्करबाजी के बाद मामला बराबर हुआ।

मैं ब्याह कर आयी, काफी कद्र हुई। कद्र का वजह मेरा रूप और सौन्दर्य था। अच्छी कद-काठी, भरा-पूरा बदन, गोरा-चिट्ठा रंग, फूले गाल, कटीली आंखें। दिवंगत फिल्म अदाकारा दिव्या भारती की तरह थी। इसलिए सखियां मुझे दिव्या भारती कहकर पुकारती थी। मेरा शौहर अनवर मुझसे जरा हल्का पड़ता था। दुबले-पतला शरीर, झेंपू स्वभाव, देखने में खास खूबसूरत। सुहागरात को वह मेरे पास जरा झिझका-झिझका आया। मैंने पत्नि धर्म का निर्वाह किया। मगर ओस चाटकर प्यास न बुझने वाली बात हुई। उसने खुद मेरी खुशामद करते हुए कहा, ‘‘बेगम....दवा कर रहा हॅूं.... जल्दी सब ठीक हो जाएगा....मैं अभी विवाह करने को तैयार नही था। चालीस दिन का कोर्स हकीम जी ने बताया था। अभी दस दिन का ही कोर्स हो पाया कि घर वालों ने विवाह कर दिया। हकीम जी ने बताया है कि चालीस दिन के कोर्स में मैं अपनी खोई पौरूष शक्ति पूरी तरह से वापस पा लूंगा।’’

अनवर ने खुद ही बताया था कि गलत आदतों का शिकार होने की वजह से वह काफी हद तक नपुंसकता का शिकार हो गया था। उसके दिल में यह मनोवैज्ञानिक डर, इलाज करने वाले किसी हकीम ने बिठा दिया था कि वह अभी औरत के लायक नही है। वरना वह कुछ न बताता तो मैं नोटिस भी न लेती। यह मेरा पहला पुरूष संसर्ग नही था। शादी से पूर्व भी मैं यौन सुख भोग चुकी थी। दरअसल कुंवारेपन में अच्छा खान-पान व घर में कुछ काम न होने की वजह मेरा दिन हमउम्र लडकियों से बातें करते बीतता था। उनकी सेक्स और पुरूष आनंद की बातें मेरे जेहन में हरदम गूंजती रहती थी। साथ ही कुछ मासिक गडबड़ी तथा वालिद के इन्तकाल के कारण मैं दिमागी तौर पर अपसेट हो उठी और मुझे दौरे पड़ने लगे।

पास-पड़ोस की जाहिल औरतें मेरी खूबसूरती की वजह से कहने लगी कि मुझे पर जिन्नात का साया पड़ गया है। इधर-उधर के इलाज के बाद एक तांत्रिक शब्बीर शाह साहब को बुलाया गया। वे एक सप्ताह तक मेरे घर रहे। झाड़-फूंक के बाद उन्होंने बताया कि मुझ पर पीपल वाले जिन्नात का साया है। जिन्नात काफी सख्त है, धीरे-धीरे उतरेगा। वे न जाने क्या-क्या करते रहे। लोहबान, धूपबत्ती, फूल-माला, सिन्दूर, खोपड़ी रखकर अजीब-सा डरावना वातावरण पैदा करते। कभी चिमटा मार कर, कभी मेरे सिर पर झाडू फिराकर सुबह-शाम जिन्नात उतारते।

इस तरह दो दिन गुजरे, तीसरे दिन मुझे अकेले बन्द कमरे में ले गये। जहां पहले से ही खुटियों पर कुछ नाड़े बांध रखे थे। कुछ देर झाड़-फूंक करने के बाद वह मुझसे रौबदार आवाज में बोले, ‘‘नाड़ा खोलो।’’

मै खुटियों पर बंधे नाडे़ नही देख पायी थी। लिहाजा झट से मै अपनी शलवार का नाड़ा खोल बैठी। वो समझ गए कि मुझे पर कैसा जिन्नात है। आगे बढ़कर उन्होंने मुझे थामा। भींचा, चूमा और सीने से लगया...प्यार किया और जिन्नात उतारने वाले मंत्र बड़बडाते...जिन्नात से लड़ने वाले अन्दाज दर्शाते हुए बन्द कोठरीनुमा कमरे में मेरे साथ मेरा वास्तविक जिन्नात उतारते हुए खुद जिन्नात बनकर लिपट गए। मेरी कमीज उतार दी... ब्रा ढीली कर दी, फिर बेहद सुखदायक अन्दाज में मेरी नस-नस में तरंग जगाकर वे मुझसे संसर्ग कर बैठे।

शील-भंग होते समय मेरी हालत जरा खराब हुई, पर शाह साहब ने बड़े कायदे से प्यार कर-करके मुझे सम्भाला और वह आनन्द दिया कि मेरे रोम-रोम का नशा उतर गया। उस दिन उन्होंने पूरे दो घण्टे तक जिन्नात उतारा। दो घण्टे में तीन बार मेरे साथ जिन्नात बनकर लिपटे..... थका-थका कर मुझे बेहाल कर दिया। उनसे पाये आनन्ददायक सुख को मैं जीवन में कभी भूल नही सकती।

अगले चार दिनों तक सुबह-शाम घण्टे-दो घण्टे जिन्नात उतारने के बहाने वह मुझे कोठरी में ले जाते और सम्भोगरत होकर मेरी नस-नस ढीली कर देते।अब कहां को भूत, कहां का जिन्नात....। मैं पूर्ण स्वस्थ हो गयी क्योंकि मुझे जिस मर्ज की दवा चाहिए वह मिल गयी थी। एक दिन आनंद की क्षणों में मैं शाह साहब से बोली, ‘‘मैं आप पर मर मिटी हॅंू.... आप जाइएगा तो मेरा क्या होगा?’’

‘‘चालीस दिनों का समय बिताकर जाऊंगा। आगे एक महीने का कोर्स चलेगा। तुम्हारी बालदा हफ्ते में एक बार तुम्हें लेकर मेरे पास आती रहेगी। हमारा एक-दो दिन तक मिलन होता रहेगा। फिर कोई अच्छा सा रास्ता चुन लेगे।’’

ऐसा हुआ भी, मेरी मां मुझे उनके पास लेकर आती रही। उनके अपने घर में तो मां मेहमान थी। जिन्नात उतारने के बहाने शाह साहब तीन-तीन चार-चार ट्रिप लगा जाते। मेरे चेहरे पर लाली, रंगत वापस आने लगी तो मां को यकीन हो गया कि शाह की तांत्रिक शक्तियां जिन्नात पर काबू पाने में सफल हो रही हैं।

एक महीने तक मां मुझे उनके पास लेकर जाती रही। फिर मैं इन्तजार करती रही कि शाह साहब कोई युक्ति निकालेगें, लेकिन उन्होंने पलटकर भी नही देखा। माॅ ने बाद में बताया कि दस हजार रूपये खर्च करने पडे थे। पर वे सन्तुष्ट थी कि जिन्नत ने पीछा छोड़ा। उस समय मेरे सामने पैसों का कोई महत्व नही था। मुझे जो मर्ज था, दवा चाहिए थी मिल गयी थी।

मैंने छोटी उम्र में पढाई शुरू की थी। बी0ए0 उन्नीसवें साल में कर लिया। इस बीच मेरी शादी की चर्चा भी चल पड़ी। साल-डेढ़ साल शादी की चर्चा चलती रही.... मैं भावी शौहर की कल्पना में खोकर समय गुजारती रही। शौहर जैसा मिला, आपको बता ही चुकी हॅू।

प्रतीक चित्र

यहां मैं यह भी बता दूं कि मेरे विवाह की बात पहले मेरे जेठ से चली। पर मां ने उमर अधिक कहकर बात को टालते हुए दूसरे लड़के अनवर के लिए जोर डाला था। अनवर, मेरा शौहर, मुझसें उम्र में लगभग बराकर का है। जेठ के दिमाग में यह बात हमेशा रही कि अनवर के बजाय मुझें उसकी पत्नी होना चाहिए था।

घर में उनकी बात सबसे ऊपर रहती थी। अच्छी पर्सनाल्टी के साथ वह घर में सब पर रौब-दाब रखते है। मेरी ससुराल में मायके के मुकाबल परदा बस नाम का था। अतः ससुराली महौल में जेठ के सामने बगैर परदे, आने वाले मेहमानों के साथ बस आंचल ढककर सामने बैठना, चाय नाश्ता मुझे करना...पढ़ी लिखी होने के नाते उनके बीच बैठकर बातें करना, हसी-मजाक में दिन गुजारना.... चलता रहता था।

जेठ जी धीरे-धीरे मुझसे बेतकल्लुफ होने लगे। मुझे मुस्कराकर देखते, नर्म व्यवहार करते। घर में फल-फ्रूट जो भी लाते ‘फरजाना... फरजाना’ कहकर मेरे हाथ में ही थमाते, उस समय हाथ छू लेते.... मुस्करा देते।

वक्त गुजरता रहा, एक दिन मैं जेठ की दिवंगत पत्नी के छोटे बेटे बबलू को गोद में लेने के बहाने उन्होंने मेरी बाहें थाम ली। क्योंकि बबलू मेरी गोद से नही उतर रहा था। उनकी इस बेतकल्लुफी से मुझे लगने लगा था कि किसी-न-किसी दिन वह मुझसे कुछ करके ही मानेंगे।

उधर मेरे शौहर अनवर की हालत यह थी कि मर्दाना ताकत की दवाएं खाकर भी पूरा मर्द न बन पा रहा था। कभी मेरे दिल में जेठ के लिए बेईमानी आ जाती तो, मैं अपने आपको संभाल लेती थी। मेरे शौहर की नौकरी एक सप्ताह दिन, एक सप्ताह रात शिफ्ट में चलती रहती थी। जेठ को मुझ पर डोरे डालने के लिए दिन के साथ-साथ रात में भी काफी मौका मिलता था।

एक दिन सास-ससुर एक शादी में गए तो उनके साथ सब बच्चे भी चले गए। अनवर की दिन का शिफ्ट था। घर में मैं अकेली रह गयी थी। जेठ जी जैसे इसी दिन की तलाश में थे। उस दिन वह तबियत खराब होने का बहाना कर क्लीनिक से जल्दी घर आकर सीधे अपने कमरे में चले गए। शायद अपने इरादों को मजबूत बना रहे थे।

जेठ के इरादों से अंजान मै नहाने के लिए गुसलखाने में घुस गयी। लापरवाही या कहा जाए उनकी किस्मत से मै अंदर से कुंडी लगाना भूल गयी। पूरे कपड़े उतार कर जैसे ही मै नहाने को हुई, वह गुसलखाने का दरवाजा खोलकर अंदर आए और कुंडी बंद कर ली।

इस दशा में जेठ को देख मै मारे खौफ और शर्म के काठ होकर बैठी की बैठी रह गयी। मुझे निर्वस्त्र पाकर जेठ की दिवानगी पागलपन को पार कर गयी थी। उन्होंने मुझे खीचकर अपनी आगोश में ले लिया फिर मेरे उरोजों को मसल-मसल कर अपनीं दीवानगी का खुला प्रदर्शन करते हुए, गाल पर दांत गड़ा डालें। मैं खुशामदें करती रही, उन्होनें मुझे घसीट कर वहीं ठण्डे फर्श पर खुद गुसल करने की अवस्था में आकर पोजीशन सम्भाल ली। मेरे ‘ना-ना’ का कोई असर न हुआ।

उनकी मजबूत देह और जोशीली ताकत और मर्दाना ताकत देख मैं जलती शमा की तरह पिघल उठी तो मेरा विरोध हल्का पड़ गया। उन्होंने अपनी मनमर्जी की कर डाली। मेरे मन का सारा डर, संकोच मिटा डाला तो मेरी वाहे उनके कंधों पर जम गयी। वे मुझे लिपटाते.....प्यार करते....जोश में रहकर मेरे होश खराब करते कह उठे थे, ‘‘फरजाना... तुम्हे पाने की चाह में मैं कितने दिनों से तड़प रहा था, तुम हाथ ही न रखने देती थीं..... अपने आपको, अपनी जवानी को यूं ही मिटा रही थी।’’

‘‘यह गुनाह हैं..... ’’

‘‘मारो गोली गुनाह को..... ऐसा कुछ नही होता। इस मामले में तो मनमर्जी को सोदा होना चाहिए। अनवर इस मामले में नाकारा है। मुझे मालूम हुआ कि वह छुप-छुपाकर दवाऐं लेता है तो, मैने उस डाक्टर और हकीम से मिलकर मालूमात की तो पता चला वह अर्धनपुंसक है। तुम्हें क्या सुख दे पाता होगा! तुम गीली लकड़ी की तरह सलगती रहती होगी..... उसकी तीली में ऐसी सीलन है जो बार-बार घिसने पर जलती होगी....और जलकर फंूक से बुझ जाती होगी।’’

वह कह तो सही रहे थे। वाकही अनवर था ही ऐसा। वह आग लगाना तो जानता था बुझाना उसके बस का नही था। उस दिन गुसलखाने से निपटने के बाद पवूरा दिन जेठ ने मुझे ले जाकर अपने बैडरूम मे सताया। अनवर रात को आठ बजे ड्यूटी पर आया, तब तक मुझे थका-थका कर जेठ ने चूर-चूर कर डाला था।

उस दिन के बाद जब अनवर की ड्यूटी रात की होती तो, आधी रात के वक्त जेठ मेरे बैडरूम में घुस आते थे। मैं बीबी अनवर की थी पर पूरी भोग्या जेठ बन गयी थी। जल्द ही मैं उम्मीद से हो गयी तो अनवर को झटका लगा। क्योंकि तीन माह से वह लगातार इलाज करवा रहा था। इस दौरान उसे पत्नी के पास जाने की सख्त पाबन्दी थी और वह इस पर अमल भी कर रहा था।

मेरे पैर भारी हुए तो दब्बू और अर्ध नपुंसकता का शिकार अनवर एकदम मर्द बन गया। मुझसे सख्ती से पूछ-ताछ की। इससे पहले कि वह मुझ पर किसी बाहरी व्यक्ति से मुंह काला करने का इल्जाम लगा पाता, मैंने जेठ की करतूत का भाण्डा फोड़ कर दिया। वह चुप हो गया पर उसके मन के अन्दर एक तूफान मचलने लगा।

एक सप्ताह के अन्दर-अन्दर उसने फैक्ट्री एरिया में आवास के लिए दरख्वास्त लगायी और एक रिहायसी क्वाटर ले लिया। तीन कमरों को क्वाटर था। मुझे ले जाकर दिखाया। मुझे कमरा पसन्द आ गया तो मां-बाप से इजाजत लेकर वह मुझे लेकर यहां आ गया।

यहां आकर अनवर इस कोशिश में लग गया था कि वह मेरे गर्भ में पल रहे नाजायज बच्चे को गिरवा दे। मैं कुछ-कुछ रजामन्द भी हो चुकी थी, पर जेठ अनवर के ड्यूटी पर होने का फायदा उठाते हुए यहां भी मेरे साथ अय्याशी करते थे। उन्हें जब अनवर के इरादे की जानकारी हुई तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि मैं गर्भपात न कराऊ।

जेठ ने मेरे मन में एक तो यह डर पैदा किया कि कभी-कभी गर्भपात कराने के गर्भपात कराने से गर्भाशय में ऐसी खराबी आ जाती है कि जिन्दगी में दोबारा गर्भ ठहरना सम्भव नहीं हो पाता। फिर अनवर इस लायक नहीं कि मुझे मां बना सके। बच्चे के बगैर औरत को जीवन अधूरा है।

जेठ की पढ़ाई पट्टी मैंने कुछ ऐसी पढ़ ली कि सारी बातें दिमाग के खाने में फिट बैठ गयी। एक दिन गर्भपात कराने के लिए अनवर जब अस्पताल चलने को कहा तो मैं साफ इनकार कर गयी। हमारी तकरार बढ़ी उसने मुझ पर हाथ छोड़ा। मुझे बदचलन, आवारा, छिनाल कहा। मैने उसे नार्मद कहा।

तनाव जबरदस्त बढ़ा तब वह मुझे ले जाकर मेरे मायके छोड़ आए। जेठ से उनकी काफी लड़ाई हुई। जेठ मेरा पक्ष ले रहा थे। वह मुझे लेने गये। मैं मां के कब्जे में थी। मां से मैंने अनवर की मार-पीट व ज्यादतियों के बारे में सब कुछ बता चुकी थी। इसलिए उन्होनें साफ मना करते हुए कहा, ‘‘अनवर मियां स्वयं आकर माफी मांगे कि आइन्दा वह लडकी से कभी मार-पीट नही करेगें तभी वह मुझे भेज सकती है।’’

अनवर न आया। मेरे गर्भ में बच्चा पलता रहा। जेठ जी बार-बार कोशिशें करते रहे पर सुलह न हो सकी। मेरे मायके के सभी लोग एकमत थे, उन्होंने अनवर के खिलाफ कानूनी नोटिस भेज दिया। मार-पीट और पेट में गर्भ होने की अवस्था में अमानवीय क्रूरता के साथ घर से निकाल देने का मुकदमा चला दिया। इस बीच मेरे जेठ का झुकाव मेरी ओर रहा, पर उसके और मेरे खानदान वालों में पूरी तनातनी और नाक की बात बन गयी थी। नौबत तलाक तक पहुंची। मेहर व सामान के साथ दफा 125 का खर्चा भी अनवर पर कोर्ट ने बांध दिया।

प्रतीक चित्र

मेरे मायके के लोग बाल से खाल इस बात की भी निकाल बैठे थे कि मेरे ससुराल वाले लालची रहे हैं। दहेज उत्पीड़न का मुकदमा चला। जिसमें जेठ की दिवंगत पत्नी का भी हवाला रखा गया कि उसे भी दहेज उत्पीड़न के कारण जलाकर मार डाला गया था।

मुकदमें के दौरान जेठ चाहता था कि मैं उसका पक्ष लूं। अपने मायके के दबाव की वजह से पक्ष लेना तो दूर, मैं उनसे बात भी न कर पा रही थी। सारी अदालती कार्यवाहियां मेरे पक्ष में जाती रही। यहां तक कि अनवर व मेरे जेठ को जेल जाना पड़ा, हाईकोर्ट से जमानतें करानी पड़ी।

वे जमानत पर छूटे। फिर कम्प्रोमाइज पर बात आयी। तलाक तो हो ही चुका था, कम्प्रोमाइज इस बात की कि आगे कोई किसी के खिलाफ पुलिस-कोर्ट केस न करे। मेरी मां भी कोर्ट-कचहरी से थक चूकी थी। विपक्षी झुक रहा था, लोगों को बीच में डालकर सुलह-समझौता हो गया।

मुकदमें के दौरान ही मेरी डिलीवरी हुई। लड़का हुआ था। वह अब तीन साल का है। मेरी मां पाल रही है। उसे कानूनी वैधता प्राप्त है कि वह अनवर की निशानी है।

ससुराल वालों की एक रिश्तेदरी मेरे घर के पास ही थी। मैं उन्हें शबीना खाला कहती थी। मेरा उनके यहां आना-जाना था। यही मैं मुकदमें के दौरान चोरी-छिपे अपने जेठ से मिलती रहती थी। बाद में भी मिलती रही। धीरे-धीरे जेठ ने मुझे इस बात पर राजी कर लिया कि मैं उनके साथ चलकर रहूं। क्यों कि अब मैं उनसे शादी करने को आजाद हूं। हमारा बच्चा भी हमारे प्यार को पाकर पलेगा। जेठ ने यह भी झांसा दिया कि वह अपने घर को छोड़कर, जहां मैं कहूं चलने को तैयार है।

मैं उनके फरेब में आ गयी। इस बात को भूल गयी कि अब वह मेरा जेठ नही। मेरे बच्चे का बाप होकर भी बाप नही बल्कि उस ससुराली दुश्मन का एक मेम्बर है, जिसकी मुकदमें में जबरदस्त नाक कटी थी। एक दिन सहेली की शादी में जाने का बहाना करके घर से दो जोड़ी कपड़े और कुछ जेवर लेकर जेठ के साथ टेªन में बैठकर दिल्ली आ गयी।

दिल्ली में उन्होंने मुझे एक होटल में रखा। रातें बितायी। उनके साथ ऐश के दिन-रात काटने से यादें ताजा हो आयी। वे इधर-उधर भाग-दौड़ कर यह साबित कर रहे थे कि वे अपनी प्रैक्टिस व रहने के लिए जगह तलाश रहे है। मैं उन पर विश्वास करती रही, बाद में पता चला कि वह सिर्फ मुझसे बदला लेने के फिराक में थे। मगर जब तक पता चला बहुत देर हो चुकी थी। वापसी के सारे रास्ते बंद हो चुके थे, मैं एक कोठे पर बेची जा चुकी थी।

कोठा मालकिन ने प्यार से, मनुहार से, धमकी देकर और फिर भी न मानी तो पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। मुझे कई-कई दिन भूखे रखा गया। मेरे साथ एक-एक दिन पांच-पांच मुस्चंडों ने बलात्कार किया। आखिर मैं हार गयी और कोठा मलकिन की लाडली बनकर रोज नये मर्दों के नीचे बिछने लगी। छह माह यूं ही गुजर गए, इस दौरान मैंने उनका विश्वास हासिल कर लिया और इसी विश्वास का फायदा उठाकर एक दिन वहां से फरार होने में कामयाब हो गयी।

कोठा छोड़ने के बाद ही मुझे इस बात का एहसास हुआ कि यह दुनिया अकेली औरत के लिए हरगिज नही है। जीने के लिए किसी मर्द की मजबूत बांहों का सहारा आवश्यक है। दो रातें मैने स्टेशन गुजारी और दिन में काम तलाशती रही। काम तो नही मिला कितुं एक हमदर्द मेहरबान अधेड़ जरूर मिल गया जो मेरी सारी कहानी जानने के बाद मुझे अपने घर ले गये।

उस रात बेटी-बेटी कहने वाले उस अधेड़ ने जबरन मेरे साथ संबंध बनाए। मैं बस नाम मात्र को ही उनका विरोध कर सकी थी। बाद में मालुम हुआ कि वह व्यक्ति कालगर्ल रैकेट चलाता है। उसने मुझे भी धंधे में लगा दिया। एक बार फिर हर रात मर्दों का बिस्तर गर्म करने लगी। लेकिन कोठे पर रहकर धंधा करने से यह कहीं ज्यादा बेहतर था। मैं कालगर्ल बन गयी, आज भी इसी धंधे में रमी हुई हूं। अब मैं इस धंधे से किनारा करने के बारे में सोचती तक नहीं।

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एक रात की कमाई



मई महीने की शुरूआत थी। स्कूल बैग पीठ पर लादे वह सफेद शर्ट और स्लेटी रंग की स्कर्ट में अपने उभरे हुए तन को छिपाये, बिना छत वाले बस स्टाफ पर खड़ी थी। चिलचिलाती धूप में वह पसीने से लथपथ हो चुकी। बार-बार रूमाल से चेहरे को रगड़ती वह दूर तक सड़क पर निगाह दौड़ा लेती थी। बस के जल्दी ने आने की वजह से वह काफी परेशान हो उठी। अब उसके मन में आटो से जाने का विचार पनपने लगा था किंतु पैसे बचाने की फिराक में वह कुछ देर और इंतजार कर लेना चाहती थी।

तभी एक कार आकर उसके सामने सड़क पर खड़ी हो गई। कार के भीतर एक मोटी किंतु आकर्षक नैन नक्स वाली महिला बैठी हुई थी। कार की खिड़की से इशारा करके उसने लड़की को अपने पास बुलाया। एक क्षण असमंजस में पड़ने के बाद लड़की कार के करीब गई।

‘‘कहां जाओगी बेटी।’’

‘‘कालका जी, क्या आप मुझे वहां तक छोड़ देगी।’’

‘‘हां-हां क्यों नही तभी तो बुलाया है, आ जाओ भीतर आ जाओ बेटी।’’ बड़े ही प्यार ओर अपनत्व से महिला ने उसे कार में बैठा लिया। कार चल पड़ी।

‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘प्रिया।’’

‘‘कौन सी क्लास में पढ़ती हो?’’

‘‘ग्यारहवी’’

‘‘पिता जी क्या करते है?’’

‘‘जी वो.....वो..।’’

‘‘हां-हां बोलो बेटी करते हैं तुम्हारे पिता जी?’’

‘‘जी वो...वो रिक्सा चलाते हैं।’’

‘‘अच्छा इसलिए बताने से हिचक रही थी।’’ महिला उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘बेटी कोई काम छोटा बड़ा नही होता। बस आदमी चोरी-डकैती न करे। तुम्हें असुविधा न हो तो थोड़ी देर के लिए मेरे घर चलो मेरी लडकियां तुमसे मिलकर बहुत खुश होगी। उनमें से एक-दो तो तुम्हारी ही उम्र की होगी

‘‘जी चलंूगी।’’

‘‘गुड!.. ड्राइवर गाड़ी घर की ओर ले लो।’’

थोड़ी देर बाद वह कार एक शानदार बंगले के पोर्च में जा खड़ी हुई। पहले महिला नीचे उतरी उसके पीछे वह लड़की जिसने अपना नाम प्रिया बताया था, कार से उतरकर बंगले की शोभा निहारने लगी। औरत ने उसका ध्यान भंग किया और उसे लेकर बंगले के भीतर दाखिल हुई।

वहां पहले से ही कई अन्य लड़कियां मौजूद थी। सबकी सब यूं सजी धजी थी मानो किसी वैवाहिक समारोह में शिरकत करने जा रही हों। सबकी सब बेहद खूबसूरत और सुशील दिखाई दे रही थी।

‘‘रेहाना...’’ महिला ने आवाज दी तो तत्काल एक जींस पैंट और टाप पहने युवती उसके सामने आ खड़ी हुई, ‘‘जी मम्मी।’’

‘‘बेटी यह प्रिया है, देखो कितनी थकी हुई है, इसे नाश्ता कराओ और अपना कोई कपड़ा पहनने को दे दो ताकि यह नहा कर फ्रेश महसूस कर सके।’’

‘‘जी मम्मी’’ कहकर वह युवती प्रिया की ओर घूमी, ‘‘आओ प्रिया मेरे कमरे में चलो।’’ उसने प्रिया का हाथ थामा और सीढि़या चढ़ गई।

रेहाना का कमरा बेहद सजा-धजा कमरा था। जरूरत की हर चीज वहां मौजूद थी। रेहाना ने उसे एक जोड़ी कपड़े दे दिए और गुसलखाना दिखा दिया। नहाकर वापस लौटी तो रेहाना नाश्ते पर उसका इंतजार कर रही थी। दोनों ने साथ-साथ नाश्ता करते हुए वार्तालाप भी जारी रखा। रेहाना अपनी बातों से उसका ध्यान एक खास दिशा की तरफ मोड़ना चाहती थी, जल्दी ही वह कामयाब भी हो गई, ‘‘बोलो न प्रिया क्या तुम्हारा कोई ब्वायफ्रैंड है?’’

‘‘नही मैंने यह रोग नही पाला अभी तक या यूं समझ लो कि यह सब अमरजादियों को ही शोभा देता है, वो किसी के साथ घूमें फिरें तो समाज उन्हें कुछ नही कहता जबकि गरीब लड़की को बहुत ही फंूक-फंूक कर कदम रखना पड़ता है।’’

‘‘ओ प्रिया ऐसा कुछ नही है। छोड़ो आओं मैं तुम्हें एक चीज दिखाऊ जो शायद तुमने पहले कभी नही देखी होगी।’’

‘‘क्या चीज?’’ प्रिया उत्सुक हो उठी, ‘‘दिखाओ तो जरा।’’

रेहाना एक एलबम उठा लाई। पहले फोटो पर निगाहें पड़ते ही प्रिया बिदक सी गई्र, ‘‘छी....कितनी गंदी तस्वीर है।’’

‘‘अभी आगे देखो मेरी जान...’’ प्रिया को अपनी बांहों में समेटती हुई्र रेहाना बोली, ‘‘आगे की तस्वीर देखकर तुम होश खो बैठोगी।’’

प्रतीक चित्र

और सचमुच उस तस्वीर को देखकर प्रिया भीतर तक गुदगुदा उठी, एक अजीव सी सिरहन उसके तन में ब्याप्त हो गई, आंखें एकदम से गुलाबी हो उठी। रेहाना उसके चेहरे के मनोभवों पर तीखी नजर रखे हुए थी, ज्योही उसने प्रिया के चेहरे पर हया देखी उसको कसकर सीने से लगा लिया ओर उसके उभारों को सहलाने लगी। अपने शरीर के नाजुक हिस्सों पर रेहाना की उंगलियों को एहसास पाकर प्रिया को एक अद्यभुत आनंद की प्राप्ति होने लगी। उसके समस्त शरीर में एक अजीब सा तनाव व्याप्त हो गया, अंग-प्रत्यंग में एक अनचाही भूख पैदा होने लगी। रेहाना उसके शरीर को जितना मसलती-रगड़ती उतनी ही उसके भीतर की कामना बढ़ती जाती। एक वक्त वह भी आया जब प्रिया खुद भी रेहाना के खिले हुए यौवन को सहलाने लगी। दोनों काफी देर तक यूं ही लिपटा-झपटी करते रहीं और जब अलग हुई तो पसीने से लथपथ बुरी तरह हांफ रही थी।

‘‘मजा आया?’’ रेहाना उसके कान में फुसफुसाई

‘‘हां! कहकर प्रिया ने शरमाकर आंखें बंद कर ली।’’

‘‘तुम अगर आज रात यहीं रूक जाओ, या कल फिर आने को वादा करो तो मैं तुम्हारे लिए इससे भी ज्यादा मजा का इंतजाम कर सकती हूं, बोलो रूकोगी रात भर।’’

‘‘हां।’’ कहकर प्रिया रेहाना से लिपट गई।

आघे घंटे बाद महिला उनके कमरे में दाखिल हुई।

‘‘मम्मी आज रात प्रिया हमारे साथ रहेगी, आप इसके लिए खास इंतजाम कर दो, यह तैयार है।’’

‘‘गुड अब तुम इसे हमारा बंगला घुमा दो और शाम होते ही इसका श्रृंगार कर देना, बड़ी प्यारी बच्ची है।’’ महिला चली गई।

रेहाना प्रिया को लेकर बंगले में विचरने लगी। कुछ बंद कमरों के पीछे से स्त्राी-पुरूष की उत्तेजित सिसकियां सुनाई दे रही थी, मगर प्रिया ने उस तरफ कोई ध्यान नही दिया। शाम घिरते ही रेहाना ने उसे दुल्हन की तरह सजा दिया। रात को उसे एक अंजान युवक के साथ कमरे में बंद कर दिया गया। युवक रात भर उसक तन को नोचता-खसोटता रहा और सुबह होने से पूर्व ही दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। प्रिया के अंग अंग से टीसें निकल रही थी, उस युवक ने पूरा बदन तोड़कर रख दिया था अब उसमे इतना भी साहस नही था कि वह उठकर कपड़े पहन सके अतः उसी हालत में गहरी नींद के हवाले हो गई।

सुबह जब उसकी आंख खुली तो रेहाना नाश्ते की टेª लिए उसके सामने खड़ी मुस्करा रही थी। प्रिया उठकर झटपट नित्यकर्मो से फारिग हुई और नाश्ता करके महिला के पास पहंुची।

‘‘बेटी तुम सचमुच बहुत प्यारी हो, बहुत अच्छा काम किया है तुमने, जब दिल हो आ जाया करना, यह लो तुम्हारा ईनाम पांच सौ रूपए।’’

‘‘मगर....’’ प्रिया तुनककर बोली, ‘‘यह तो बहुत कम है। इतना तो मैं घंटा भर में कमा लेती हूं पूरी रात के कम से कम दो हजार तो होने ही चाहिए।’’
 
नामर्द

मजदूरी करते जमुनी थकी नही थी, क्योंकि यही उसका पेशा था। बस सड़क की सफाई करते ऊब सी गई थी। अब वह किसी बड़े काम की तलाश में थी जहां से ज्यादा पैसा कमा सके जिससे वह अपने निठल्ले पति का पेट भरने के साथ ही उसकी दारू का भी इंतजाम कर सके।

शहर से कुछ दूर एक बहुमंजिला अस्पताल का निर्माण हो रहा था। जमुनी की नजर बहुत दिनों से वहां के काम पर थी। वहां अगर काम मिल जाए तो मजे ही मजे। एक बार काम से छुट्टी होने पर वह वहां पहुंच गई लेकिन बात नही बनी क्योंकि फिलहाल वहां किसी मरद की जरूरत थी। उस दिन देर से घर पहुंची तो प्रतिक्षारत माधो ने पूछ लिया, ‘‘इतनी देर कहां लगा दी?’’

जमुनी एक नजर पति के चेहरे पर डालते हुए बोली, ‘‘अस्पताल गई थी।’’

‘‘काहे, बच्चा लेने?’’ खोखली हंसी हंसते माधो ने पूछा।

‘‘और का....अब तू तो बच्चा दे नही सकता, वहीं कहीं से लाऊंगी।’’ जमुनी ने भी मुस्कराते हुए उसी अंदाज में उत्तर दिया।

‘‘बड़ी बेशरम हो गई है री....’’ माधो ने खिलखिलाते हुए कहा।

‘‘चल काम की बात कर....’’

‘‘कब से तेरा रास्ता देखते आंखें पथरा गई। हलक सूखा जा रहा है भगवान कसम थोड़ा तर कर लूं। ला दे कुछ पैसे.... ’’ माधो बोला।

जमुनी बिना किसी हीला हवाली के अपनी गांठ खोल पांच रुपए का मुड़ा-तुड़ा नोट उसकी ओर बढाते हुए कहा, ‘‘ले मर....’’

खींस निपोरते हुए माधो नोट लेकर वहां से चला गया। थोड़ी देर में वह लौटा तो हमेशा की तरह नशे में धुत था। जमुनी मन मसोसकर रह गई और चुपचाप थाली परोसकर उसके सामने रख दी। भुखे जानवरों सा वह खाने पर टूट पड़ा। खाना खाते-खाते माधो ने एक बार फिर पूछा, ‘‘सच्ची बता री तू अस्पताल काहे गई थी?’’

जमुनी उसकी बेचैनी पर मुस्कराते हुए बोली, ‘‘क्यों पेट पिराने लगा? अरे मुए मैं वहां काम के जुगाड़ में गई थी। सुना है वहां जादा मजदूरी मिले है.... पचास रुपए रोज।’’

‘‘पचास रुपए?’’ माधो की बांछें खिल गई।

‘‘बोल करेगा तू काम? तेरे लिए वहां जगह है।’’ जमुनी ने पूछा।

माधो खिलखिला पड़ा, ‘‘मैं और काम.... काहे तू मुझे खिला नही सकती क्या?’’

‘‘अब तक कौन खिला रहा था, तेरा बाप?’’ जमुनी ने पलटकर पूछ लिया।

‘‘देख जमुनी सच बात तो यो है कि मेरे से काम न होए। तू तो जानत है हमार हाथ-पैर पिरात रहत हैं।’’

‘‘रात को हमरे साथ सोवत समय नाही पिरात? तेरे को बस एक ही काम आवे है वह भी आधा-आधूरा.... नामर्द कहीं का।’’ जमुनी उलाहना देते हुए बोली पर माधो पर इसका कोई असर नही हुआ।

‘‘ठीक है तू मत जा, मैं चली जाऊं वहां काम पर?’’ जमुनी ने पूछा।

नशे में भी माधो जैसे चिंता में पड़ गया, ‘‘कौन ठेकेदार है?’’

‘‘हीरालाल.... ’’

‘‘अरे वू.... वू तो बड़ा कुत्ता-कमीना है।’’ माधो बिफर पड़ा।

‘‘तू कैसे जाने?’’

‘‘मैंने उसके हाथ के नीचे काम किया है।’’ माधो ने बताया।

‘‘मुझे तो बड़ा देवता सा लागे है वो.... ’’ जमुनी ने प्रशंसा की।

‘‘हूं, शैतान की खोपड़ी है पूरा....’’ माधो गुस्से में बहका।

‘‘फिर ना जाऊं?’’ जमुनी ने पूछा।

माधो सोच में पड़ गया। उसके सामने पचास-पचास के हरे नोट फड़फड़ाने लगे और इसके साथ ही विदेशी दारू की रंग-बिरंगी बोतलें भी घूमने लगी। इसलिए उसने अनुमति के साथ चेतावनी भी दे डाली, ‘‘ठीक है चली जा पर संभलकर रहियो वहां, बड़ा बदमाश आदमी है हीरालाल।’’

एक दिन समय निकालकर और हिम्मत जुटाकर जमुनी फिर ठेकेदार हीरालाल के पास पहुंच गई। इस बार वह निर्माण-स्थल के बजाय उसके डेरे पर गई थी।

‘‘क्या बात है? फिर आ गई.... ’’ हीरालाल ने पूछा।

‘‘काम चाहिए और का?’’ जमुनी मुस्कराते हुए बोली।

प्रतीक चित्र

‘‘तेरे लिए काम कहां है? मेरे को चैकीदारी के लिए मरद चाहिए.... अब तुझे चैकीदार रखूंगा तो मुझे तेरी चैकीदारी करनी पड़ेगी।’’ जमुनी के जिश्म के उभारों पर ललचाई नजरें फिसलाते हुए हीरालाल भौड़ी हंसी में खिलखिला लगा।

‘‘मेरा मरद तो काम करना ही न चाहे।’’ जमुनी ने बताया।

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ हीरालाल लापरवाही से बोला।

जमुनी निराश नही हुई। उसे वहां काम करने वाली मजदूरनी की नसीहतें याद आ गई। उसने बताया था कि अगर तू थोड़ा गिड़गिड़ाएगी, मिन्नतें करेगी तो ठेकेदार पिघल जाएगा। जमुनी ने वही पैतरा अपनाया, ‘‘बाबूजी आप नौकरी नही देंगे तो हम भूखों मर जाएगें।’’

‘‘देख भाई इस दुनिया में सभी भूखे हैं। तू भूखी है तो मैं भी भूखा हूं। ऐसा कर तू मेरी भूख मिटा मैं तेरा और तेरे परिवार की भूख मिटाता हूं।’’ आॅख मटकाते हुए हीरालाल ने सीधा प्रस्ताव किया। जमुनी सोच में पड़ गई।

‘‘सोचती क्या है.... काम मेरे घर करना, हाजिरी वहां लग जाया करेगी।’’

‘‘अपने मरद से पूछकर बताऊंगी।’’ जमुनी ने कहा।

‘‘अरे उस माधो के बच्चे को मैं तैयार कर लूंगा।’’ हीरालाल ने विश्वास पूर्वक कहा।

अगले दिन ठेकेदार हीरालाल ने विदेशी शराब की एक पेटी माधो के पास भेज दी। इतनी सारी बोतलें एक साथ देख माधो निहाल हो गया। उसने सपने में भी नही सोचा था कि वह सपने में भी एक साथ इतनी सारी बोतलें पा जाएगा। हीरालाल तो सचमुच ही देवता आदमी निकला।

वायदे के मुताबिक हीरालाल ठेकेदार ने अपने जिस्म की भूख मिटाकर माधो की भूख-प्यास मिटाई। जमुनी को इस तरह तृप्त किया कि एक भावी मजदूर उसकी कोख में पलने लगा।

अपनी घर वाली का दिनों दिन पेट बढ़ता देख माधो को चिंता सताने लगी। उसने जरा सा छूट दी थी इसका मतलब यह थोड़े कि..... वह ठेकेदार हीरालाल के पास जाता कि विदेशी दारू की पेटी की एक और खेप उसके पास पहुंच गई। अंधा क्या चाहे दो आंखें..... उसके विचार बदलने लगे। हीरालाल तो देवता है, प्रसाद देगा ही..... जमुनी ही कुलक्षिणी है..... लेना भी न आया। आजकल तो इतने सारे साधन हैं कि.....

एक दिन नशे में धुत माधो जमुनी पर फट पड़ा। दिल की बात जुबान आ गई, ‘‘हरामजादी यह क्या कर आई?’’

जमुनी बेशरमी से अपने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बुढ़ापे में तेरी-मेरी देखभाल करने वाला ले आई हूं और का....?’’

पर यह हरामी का पिल्ला तो हीरालाल.....

जमुनी ने उसकी बात काट दी, ‘‘चीज किसी का हो, मेरी कोख में पल रहा है इसलिए यह मेरा बच्चा है। मेरा बच्चा यानि तेरा....’’

माधो जब कुछ देर तक कुछ नही बोला तो जमुनी उसकी ओर नजर उठाकर देखा। माधो नशे में एक ओर लुढका पड़ा था।
 
मुफलसी ने बनाया कालगर्ल



मेरा नाम नाजनीन है, घर में प्यार से मुझे सब नाजो कहकर बुलाते थे। मेरे वालिद रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पालते थे। मां अनपढ़, घरेलू और धार्मिक महिला थी। मुझसे पांच और तीन वर्ष बड़ी दो बहनें तथा मेरे बाद आठ और सात वर्ष छोटे दो भाई हैं। मैंने बचपना घोर निर्धनता में काटा। मैंने और मुझसें पांच वर्ष बड़ी बहन महजबी जिसे मैं बाजी कहती थी, ने पाचवीं तक पढाई की। घर के करीब ही नगर-महापालिका का सरकारी स्कूल था, अतः मामूली खर्च और फीस में हमने इतना पढ लिया था। प्राईमरी से आगे की पढाई का बोझ उठाने में घर वाले किसी भी तरह समर्थ न थे, अतः पढाई रूक गयी थी।

बाजी मेहनती स्वभाव की थी, पाचवीं पास करने के कुछ दिनों बाद बुक बाइडिंग के लिए फर्मे मोड़ने का कार्य घर लाकर करने लगी। मां भी हाथ बटाने लगी, घर में चार पैसे आने लगे। वक्त गुजरता रहा समय के साथ महजबी बाजी के पन्द्र्रह-सोलह साल की होते-होते मां-बाप ने अपने ही स्तर के एक मेहनतकश मजदूर पेशा, बिरादरी के युवक से बाजी का निकाह कर दिया।

निकाह के बाद कुछ समय तक बाजी की दुल्हा-भाई के साथ अच्छी कटी। तीन साल गुजर जाने के बाद भी बाल-बच्चा न हुआ तो सारा दोष मेरी बहन को दिया जाने लगा। इसी बीच दुल्हा भाई ज्यादा कमाई करने के चक्कर में दिल्ली जाकर रहने लगे। दिल्ली में वह झुग्गी-झोपडि़यों में रहकर गुजारा करते हुए कुछ आमदनी बढाने का जरिया खोजते-खोजते उनका झुग्गी-झोपड़ी की ही एक औरत से आंख लड़ गयी।

औरत से आंख लड़ने के बाद वह जहां हफ्ते-हफ्ते आकर बाजी को खर्च दे जाते थे। अब वह महीना-महीना तक पलटकर देखना भी बंद कर दिया। बाजी तंगी में रहने लगी तो वालिद को चिंता हुई। दुल्हा भाई के पते पर बाजी के साथ मुझे भी लेकर गए। हम दोनों को वहां पहुचा कर वालिद लौट आए। दुल्हा भाई की नजर तो फिर ही चुकी थी। बाजी से बचने के लिए हफ्तों-हफ्तों के लिए गायब हो जाते। धीरे-धीरे उनकी तबियत में बिल्कुल लापरवाही और निठल्लापन आता गया। लिहाजा खोली का भाड़ा, परचूनिये का हिसाब चढता रहा, लेनदार तकाजे कि लिए बाजी के पास आने लगे। उन्हीं में एक थे रमजानी मियां।

रमजानी मियां की उम्र चालिस के आस-पास थी। दुल्हा भाई के घर के पास ही उनकी लकडि़यों की टाल थी। अच्छी आमदनी थी। उनका खाना-पीना अच्छा था। सेहत अच्छी थी। धीरे-धीरे हमदर्दी बढाते-बढाते वह घर में फल-फ्रूट लाते और घंटा-घंटा बैठकर बाजी से मुस्कराकर बात करने के साथ बेतकल्लुफी भी बढानी शुरू कर दी थी।

रमजानी मियां की हमदर्दी ने बाजी पर ऐसा असर चढा़या कि वे समय-असमय उनकी लकड़ी की टाल पर किसी ने किसी जरूरत से जाने लगी। एक रात वह भी आयी जब मैं झुग्गी के पार्टीशन वाले कमरे में सो रही थी। वह जाड़े की रात थी, कोई दस बजे का समय रहा होगा। एक नीद मैं ले चुकी थी। दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई तो मैं समझी दुल्हा भाई चोरी से आये होंगे। सांकल खुली दबे पांव अन्दर आने वाले रमजानी मियां थे।

झुग्गी की पार्टीशन वाले कमरे को बांस का टहर और टाट के परदे लगाकर पार्टीशन का रूप दिया गया था। एक चारपाई भर की छोटी सी जगह थी। वहां बर्तन-भाड़े, कपड़े-लत्ते रखे जाते थे। इसी कमरे को गुसलखाने के रूप में भी इस्तेमाल में लाया जाता था। मुझे पिछले दो दिनों सो बाजी ने वहीं साने की सलाह दे रखी थी। वैसे भी जब दुल्हा भाई रात को देर-सवेर घर आते थे, मुझे वहीं पार्टीशन वाले कमरे में सो के लिए भेज दिया जाता था। बाजी व दूल्हा भाई झुग्गी में टिमटिमाता हुआ मरियल रोशनी फैलाने वाला बल्ब बुझाकर एक साथ सो जाते थे। रमजानी मियां रात दस बजे के बाद, चोरी से झुग्गी में आये तो मेरी उत्कठां बढ़ी। मेरे कान सजग हो गये। अनेकों प्रश्न मस्तिष्क में मंडराने लगे। आते ही उन्होनें बाजी से पूछा, ‘‘नाजो तो सो गयी होगी?’’

‘‘जवानी की नींद है, घोडे़ बेचकर सो रही होगी..... ’’ बाजी ने फुसफुसाकर बताया था। इस बात को सुनते ही रमजानी मियां बेधड़क बढ़कर बाजी को अपने बाहुपाश में ले लिया। फिर बाजी के कपोलों को चूमते हुए रमजानी मियां के हाथ बाजी के बेहद कामातुर, उन्नत वक्षों पर दौड़ने लगे।

यूं तो बाजी के तन्दरूस्त जिस्म का हर अंग भरा-भरा, गठीला और सुडौल था। पर उनके वक्ष कुछ ज्यादा ही ठोस और उभारदार थे। जिनके आकार को दुपट्टे के आवरण से भी छुपाया नही जा सकता था। मुझे लेकर जब वह बाजार जाती तो मर्दो की नजरें उनके वक्षों के उभार का जायजा लेती हुई वस्त्रों के पार तक टटोलने की चेष्टा करती रहती थी।

रमजानी मियां अपने हाथों को हरकतें देकर खुद को गरमाते हुए बाजी की भी ठंडक भगाने लगे। एक समय वह आया जब उन्होंने बाजी को पूरी तरह कपड़ों के कैद से आजाद कर दिया। अब बाजी की चिकनी मासल पीठ, सुडौल तना वक्ष रमजानी मियां के हाथों और मंुह की रहकतों से ठोस हो चुके यौवन की खूबसूरती मेरी आंखों में नाचने लगी।

मेरी खाट टटरे से लगी हुई बिछी थी। टाट के परदे के झरोखे से मैं सारा दृश्य देख रही थी। बाजी रमजानी मियां से बार-बार रोशनी बुझाने का आग्रह कर रही थी। जबकि रमजानी मियां कह रहे थे, ‘‘आज मैं तुम्हारे हुस्न और यौवन भरपूर नजरों से देखकर अपनी प्यास बुझाना चाहता हूं मेरी जान..... इतने दिनों से तो ऊपर-ऊपर से पत्ते फेटकर खुद को तसल्ली देता रहा हूं.... आज असली पत्ते फेटने का मामला ऐसे ही चलेगा... मैं तुम्हारे गुदाज, ठोस जिस्म के रेशे-रेशे को देखकर अपनी प्यास बुझाना चाहता हंू... ’’

‘‘हाय अल्लाह!’’ बाजी शरमा गयी थी।

प्रतीक चित्र

खैर मैं इस बात को तो समझ गयी थी कि दोनों के बीच खिचड़ी कई दिनों से पक रही है। मैने रमजानी मियां को जिस्मानी तौर पर जितना हृष्ट-पुष्ट देखा था। उतना ही वह अपने असली जोश में सुस्त रफ्तार के घोड़े साबित हुए थे। ऐसा घोड़ा जो चाबुक की मार या लगाम की खींच-तान पर ही दौड़ के लिए तैयार होता है। बाजी उनकी मेहरबानियों के बदले हर वह स्थान और युक्ति इस्तेमाल कर रही थी, जिसे रमजानी मियां चाह रहे थे। उनको खुश करते हुए बाजी अपने मतलब की बात पर आते हुए बोली, ‘‘आप हमारा कर्ज नही अदा कर सकते?’’

‘‘मैं सौ रूपए हफ्ता से तुम्हारी मदद कर सकता हंू। अपना किराया समझो मैने तुम पर छोड़ा, मगर तुम्हें मुझे बराबर खुश करते रहना होगा। एक मुश्त परचूनियां तथा दूसरों का डेढ़-दो हजार का कर्ज अदा करना फिलहाल मेरे लिए मुश्किल है।’’

‘‘सौ रूपए हफ्ता ही सही। मैं धीरे-धीरे लोगों का कर्ज उतारती रहूंगी।’’

‘‘अगर तुम मेरी मानो, अगर तुम दस दिनों तक पूरी रात मेरी टाल की कोठरी में आकर साने को तैयार हो जाओ तो मैं तुम्हारा सारा कर्जा उतारवाकर डेढ़-दो हजार रूपए अलग से कमवा सकता हूं।’’

‘‘हाय अल्लाह.... नही-नही आपसे तो बस दिल लग गया इसलिए..... वरना मैं ऐसी नही हूं। मेरी तो दुर्गति बन जाएगी।’’

‘‘एक मशवरा और है..... ’’ अपनी केलि-क्रीड़ा के मध्य कहा था रमजानी मियां ने, ‘‘गरीबी जादू की छड़ी के घुमाने की तरह दूर हो जायेगी.... हजारों-लाखों में खेलने लगोगी।’’

‘‘वह क्या?’’

‘‘अपनी बहन नाजों को घंघे में उतार दो। मेरे यहां जो ठेकेदार आता है.... ’’

‘‘शेखर बाबू.... ’’

‘‘हां.... उसने नाजों को देखा हैं। मुझसे कह रहा था उस छोकरी को पटा दो, एक रात का पांच हजार दे सकता हूं।’’

अपने विषय में रमजानी का प्रस्ताव सुन मेरा दिल धाड़-धाड़ करने लगा। जी चाहा रहा था कि रमजानी का मुह नोच लूं पर, उनकी उस समय की आनन्दमय क्रिया देखने के पीछे सब अहसास दब गए थे। बाजी का उत्तर सुनने के लिए मैंने सांसे रोक ली। वह कह रही थी।

‘‘अल्ला कसम रमजानी मियां, हमारे यहां यह सब नही चलता.... ’’

‘‘तुम मूर्ख हो.... ’’ रमजानी ने बाजी के गालों को थपकाकर चुटकियों से मसलते हुए कहा, ‘‘तभी घर में ठीक से चूल्हा नही जलता.... मैं तुम्हें झुग्गी-झोपड़ी का नही अपने खुद के मकान-मालिक होने का रास्ता बता रहा हूं। मेरे सम्पर्क में दर्जनों ऐसी हसीन, ऊंचे घराने की कहलाने वाली लडकियां है जो शराफत को चोला धारण किये रहती है, पर रात को दो-चार घंटे के लिए धंधे पर उतरती है और हजारों रूपए माहवार कमाकर ठाठ-बाट की जिन्दगी गुजारती है। मुझे भी कमीशन के तौर पर आमदनी कराती है।’’

रमजानी मियां ने ऐसा पटाया कि बाजी एकदम विरोध करने के बजाय सोच-विचार में पड़ गयी। बाजी को सोचते देख रमजानी मियां बोले, ‘‘बताया नही..... ’’

‘‘सोचकर बताऊंगी.... ’’ बाजी ने कहा, ‘‘पता नही नाजो राजी होगीे या नही.... ’’

‘‘मेरे पास घंटे-आधे घंटे के लिए भेजना आरम्भ कर दो। मैं उसे राजी कर लूंगा।’’

‘‘उसे भी खराब कर दोगे।’’

‘‘कसम से.. अपने लिए इस्तेमाल नही करूगा.. एकदम तैयार करके पांच हजार रूपए कमवाउगा।’’

खैर, अब मैं बाजी का मामला कुछ शब्दों के बाद ड्राप करती हूं। रमजानी मियां ने बाजी के हाथ मे दो सौ रूपये, तथा अलग से दो सौ मेरे नाम पर थमाते हुए कहा था, ‘‘नाजो को अच्छा सा कपड़ा बनवा देना। वह खुश हो जाएगी।’’

बाजी चार सौ रूपए खुशी-खुशी स्वीकार कर उन्हें रूखसत किया था। अगले दिन बाजी का व्यवहार मेरे प्रति बहुत बदल गया था। वह मेरा अधिक ख्याल रखते हुए रमजानी मियां के प्रसंशा के पुल बांध रही थी। एक दिन दोपहर के समय उन्होंने मुझे सूखी लकडि़या ले आने के बहाने रमजानी की टाल पर भेजा। उस दिन मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ था। सुबह से ही रह-रहकर बूंदा-बादी हो रही थी। मैं जल्दी-जल्दी टाल पर लकडि़या लेने गयी। टाल पर मौसम की खराबी की वजह से कोई ग्राहक नही था। इसलिए पूरी तरह सन्नाटा फैला हुआ था। टाल पर मुझे आया देख रमजानी मियां खिल उठे और मुस्कराकर स्वागत भाव दर्शाते हुए बोले, ‘‘ आजा..... आजा नाजो.... आज तो बड़ी अच्छी लग रही हो।’’

‘‘सूखी लकडि़यों के लिए बाजी ने भेजा है रमजानी मियां चाचा... ’’ मैं उन्हें रमजानी चाचा ही कहती थी।

‘‘हां..हां..क्यों नही.....उधर कोने में, शेड के नीचे की लकडियां पूरी तरह सूखी और पतली है...जितना चाहो निकाल लो।’’

मुझे उन्होंने टाल के ऊंचे चट्टे के पीछे भेजा। खुद गेट के पास जाकर गेट बन्द कर आये। मेरा दिल धक-धक कर रहा था। हकीकत यह थी कि मैं उस आनन्द की अनुभूति स्वयं करना चाहती थी, जिससे बाजी को गुजरते देख चुकी थी। टाल के ऊंचे चट्टों के पीछे, कुछ अंधेरा भी था, पर ऐसा नही कि कुछ दिखायी न देता हो। रमजानी मियां उस समय तहमत, बनियान में थे। ठीक मेरे पीछे आ गये। मुझे इशारा करके वह सूखी पतली लकडि़यां बताने लगे। मेरे हाथ लकडि़यां निकालने के लिए बढ़े तब पीछे से आकर वह मुझसे एकदम सटकर खड़े होते हुए लकडि़यां निकालने में मेरी मदद करते-करते उन्होंने मेरा हाथ थामते हुए कहा, ‘‘तू तो बड़ी ही खूबसूरत है नाजो.... ’’

मेरे दिल की धड़कने बढती जा रही थी। कुछ घबराहट हो रही थी। मैने हाथ छुड़ाना चाहा तो वे और निकट आकर मुझे पीछे से चिपटाकर बोले, ‘‘मैं तेरी जिन्दगी संवार दूगा, मैं चाहता हूं तू अपनी बाजी की तरह तंगी और अभावों में न जिये, ऐश कर ऐश.... ’’ कहकर वे मेरे उभारों को सहलाने लगे।

प्रतीक चित्र

मैं बार-बार नही-नही कहती रही, मगर उस नही में हर पल मेरी हां शामिल थी। यह बात वे भी जानते थे। तभी तो मेरे बराबर इंकार करने के बाबजूद वह मुझे उठाकर कोने में पडे़ गद्दा व तकिया लगे तख्त पर ले गये। मुझे लिटाकर चूमना आरम्भ किया तो मेरे तन-बदन में जैसे आग लग गयी थी फिर भी मैने इससे आगे उन्हें नही बढने दिया और अलग होकर उठ खड़ी हुई। उन्होंने कोई विरोध नही किया, पचास का नोट मेरे हाथ में पकड़ाते हुए बोले, ‘‘बाजी को मत बताना.... अपने ही ऊपर खर्च करना, फिर जब भी आओगी इतना ही मिलेगा।’’

मैं हवा में उड़ती घर पहुंची। बाजी ने कुछ पूछताछ नही की और मैंने भी अपनी तरफ से उन्हें कुछ बतना जरूरी नही समझा। अगली शाम फिर बाजी ने मुझे लकडि़यां लाने रमजानी के यहां भेजा और बोली, ‘‘अगर तुझे आने में देर हो जाय तो फिक्र मत करना, रमजानी मियां जो कहें कर देना, उनके बहुत एहसान है हम पर.... ’’

मैने सर हिलाकर हामी भर दी। मैं रमजानी के टाल पर पहंुची। मुझे दिखते ही वह खिल उठे और गेट बंद कर दिया। उस रोज टाल में एक मोटरसाइकिल भी खड़ी थी, जाने कौन आया था।

‘‘नाजो क्या तू नही चाहती तेरे पास खूब दौलत हो, जेवर हो, मकान हो.... ’’

‘‘चाहती क्यों नही, मगर चाहने से क्या होता है।’’

‘‘चाहने से ही होता है। अगर तू मेरा कहना मान तो दो हजार तो मैं तुझे आज ही दिलवा सकता हूं और आगे भी ऐसे ही मौके दिलवाता रहूंगा।’’

‘‘दो हजार.... ’’ मेरी धड़कने बढ़ गई। मैं चुप रही, मैं खुद भी किसी मर्द का साथ पाने को तड़प रही थी मगर वह मामला अटपटा लग रहा था। रमजानी मियां मुझे किसी अंजान व्यक्ति के साथ सुलाना चाहता था। जो ना मालूम किस तरह पेश आता। मै डर रही थी मगर दो हजार रूपयों के लोभ से मुंह मोड़ना मेरे लिए असम्भव था। फिर भी मैने रमजानी से आश्वासन ले लिया कि वह बगल के कमरे में मौजूद रहेगा। यही मेरे कालगर्ल जीवन की पहली शुरूआत थी।

उस दिन जिस युवक के बिस्तर पर मैने अपना कौमार्य लुटाया, वह मेरा परमानेंट ग्राहक बन गया। अगले दस दिनों तक लगातार वह रमजानी के टाल पर आता रहा। दस दिनों में बीस हजार रूपये की कमाई ने मेरा दिमाग खराब कर दिया। मैं धंधे में रमती चली गई। मैने वह सब कुछ पाया जिसकी मैने जीवन में आकांक्षा रखी थी। नहीं मिला तो सिर्फ शकून। आज हर वक्त मैं अपने भीतर एक अधूरेपन का एहसास महसूस करते हुए अकेले में आंसू बहाया करती हूं।

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हुस्न का जाल

‘‘हुजूर मेरा नाम गंगाबाई हैं।’’ बलिष्ठ मगर भोले से दिखने वाले युवक के साथ आई प्रोढ महिला ने ए.एस.आई. रावत के सामने पेश होते ही सिर झुका कर दबे लहजे में बताया था।

‘‘मेरी ससुराल रामगढ में और मायका दीनापुर में है।’’ फिर उसने अपने साथ आए युवक की ओर इशारा किया था, ‘‘यह मेरा भतीजा कालिया है हुजूर।’’

‘‘कहो...’’ उसे घूरते हुए रावत ने पुिलसिया अन्दाज में जानना चाहा था, ‘‘किस लिए आए हो यहां.... ?’’

उस वक्त सुबह के दस ही बजे रहे होंगे और रावत अभी कुछ ही देर पहले आफिस में आया था।

‘‘हुजूर इसके बाप रामा की मौत हो गई है। उसके दाह-संस्कार में हिस्सा लेने ही में सुबह ससुराल से आई हूं।’’ गंगाबाई रो पड़ी। ‘‘ कहने को तो वह मौत ही है हुजूर, मगर मुझे शक है कि मेरा भाई मरा नहीं है, बल्कि किसी ने उसे मार डाला है।’’

‘‘क्या उसकी किसी से दुश्मनी थी।’’

‘‘बाहर तो किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी, मगर उसकी अपनी बीबी से नहीं बनती थी और मुझे शक है कि उसी ने मेरे भाई को मारा है। वह मेरे भाई की दूसरी बीबी है।’’

‘‘क्यों.... ’’ रावत एकाएक उसकी बात का यकीन न कर सका था। ‘‘उस औरत को भला अपना सुहाग उजाड़ने की क्या जरूरत थी।’’

‘‘बताते हुए तो शर्म आती है हूजूर।’’ गंगाबाई का सिर पहले से भी ज्यादा झुक गया था, मगर सच को सामने लाने के लिए बताना ही होगा..... मेरी भाभी बदचलन और आवारा किस्म की औरत है हुजूर।’’

‘‘तुम यह कैसे कह सकती होे कि वह बदचलन और आवारा किस्म की औरत हैं।’’

रावत को उसकी बातों में कुछ-कुछ सच्चाई दिखाई देने लगी थी, ‘‘क्या इस बारे में कभी तेरे भाई ने तुम से कुछ कहा था?’’

‘‘कुछ दिन पहले जब वह मुझसे मिलने मेरी ससुराल आया था, तो उसने बातों ही बातों में कहा था कि मेरी भाभी बसंती अपने पड़ोसी संजय से बहुत ज्यादा हिल-मिल गई हैं।’’ गंगाबाई ने बताया था, ‘‘उसने यह भरी कहा था हुजूर कि उसे उन दोनों का मिलना पसन्द नही हैं।’’

‘‘यह संजय इस वक्त कहां मिल सकता है।’’

‘‘वह शहर में ठेकेदार राम मनोहर के पास मिस्त्राी का काम करता है हुजूर।’’ देर से खामोश खड़े कालिया ने पहली बार मुंह खोला था, ‘‘ पिछली बार जब वह गांव आया था तो उसने बताया था कि दूसरे मजदूरों के साथ वह भी रेलवे स्टेशन के पास वाले मैदान में झोपड़ी बनाकर रहता हैं।’’

‘‘तो क्या वह हर रोज वहां से तेरी मां से मिलने आया करता था।’’

‘‘वह हमारे गांव का ही है हुजूर।’’ उसकी बात तीर की मानिंद कालिया को चुभी तो थी, मगर वह अपनी मजबूरी से भी अन्जान नहीं था। अपमान को पी जाने में ही अपनी भलाई समझकर उसने बताया था, ‘‘अभी महीना भर पहले ही वह शहर गया है।’’

प्रतीक चित्र

‘‘अगर तेरा यह शक सही निकला कि तेरे भाई को मारा गया है।’’ रावत गंगाबाई की ओर देखता हुआ बोला था, ‘‘तो यह पता लगाना भी जरूरी है कि यह काम उसने अकेले ही किया था या उसके साथ कोई दूसरा भी था।’’ फिर उसने गंगाबाई को बोलने का मौका दिए बगैर ही कहा था, ‘‘तुम एक काम करो..... ’’

‘‘क्या हुजूर...... ’’

‘‘मुंशी जी के पास अपनी शिकायत दर्ज करवा दो..... मैं तेरे भाई के पोस्टमार्टम का इन्तजाम करता हूं।’’

उसी शाम करीब छः बजे पोस्टमार्टम के बाद डाक्टर ने रामा की लाश रावत की मौजूदगी में रामा के परिवार वालों को सौपते हुए कहा था, ‘‘रिर्पोट आपको चैथे दिन शाम को ही मिल सकेगी।’’

बसंती भी उस वक्त वहीं मौजूद थी। उसने रावत से बात भी करनी चाही थी, मगर रावत उसे अन्देखा करते आगे बढ़ गया था।

‘‘तेरा शक एकदम सही है।’’ चैथे दिन शाम को जब गंगाबाई कालिया को साथ लेकर रावत से मिलने गई्र थी, तो रावत ने उन्हें पोस्टमार्टम रिर्पोट के बारे में बताया था, ‘‘रामा को किसी कपड़े से गला घोटकर मारा गया था.... ’’

‘‘तो.... तो फिर..... ’’ गंगाबाई सच्चाई जानते ही उत्तेजित हो गई थी, ‘‘उस कुलटा को हिरासत में ले लीजिए हुजूर।’’

‘‘क्या तुम बसंती की बात कर रही हो?’’

‘‘हां.... उसी ने तो मारा है, मेरे भाई को.... ’’

‘‘फिलहाल मेरे पास उसके खिलाफ कोई सबूत नही है और सबूत के बिना किसी को भी दोषी करार नहीं दिया जा सकता।’’ रावत ने समझाया था, मेरे आदमी छानबीन कर रहे है। जैसे ही हमें किसी के भी खिलाफ कोई सबूत मिल गया। उसी वक्त हम उसे हिरासत में ले लेगें।’’

रावत के बाहर आते ही जग्गू उनके पास पहुंच गया। जग्गू को देखते ही रावत ने चहकते हुए पूछा, ‘‘क्या खबर लाए हो?’’

‘‘अपने खसम का दाह-संस्कार करने के बाद वह पेट दर्द का बहाना बनाकर अस्पताल में दाखिल हो गई है।’’

‘‘यह तो कोई खबर नही है?’’

‘‘खबर है..... इसलिए तो बताने आया हूं।’’

बिना कुछ कहे ही रावत सवालिया निगाहों से उसकी ओर देखता रहा।

‘‘उसी रात ग्यारह बजे वह अपने बिस्तर से उठ कर कहीं चली गई थी।’’ जग्गू ने रहस्यमय अन्दाज में बताया था, ‘‘और सुबह पांच बजे तक वापस नही आई थी..... यह बात सिर्फ उसी रात की नही हैं..... वह रात को अपने बिसतर से इसी तरह गायब रहती है।’’

‘‘अब यह खबर बनने लगी है।’’ रावत ने सिगरेट सुलगाने के बाद जिज्ञासा भरी निगाहें उसके चेहरे पर टिकाते हुए पूछा, ‘‘कहां जाती है वह रात को.... ’’ फिर उसने अपने सवाल का जबाब भी खुद ही सवालिया अन्दाज में दे डाला, ‘‘कहीं वह अपने किसी यार के साथ रंगरलियां मनाने तो नही जाती है?’’

‘‘मेरा भी यही ख्याल है कि वह अपने जिश्म की आग बुझाने के लिए ही रात भर अपने बिस्तर से गायब रहती है।’’

‘‘तूने उसका पीछा किया था?’’

‘‘नही..... ’’ जग्गु ने उसका पीछा न करने की वजह बताई थी, ‘‘एक तो गांव का मामला है साहब, दूसरे अपनी पोल खुल जाने के डर से वह अपने यार से मिलकर मेरी भी बोली बंदकर सकती है।’’ जग्गू धीरे से हंसा था, ‘‘और मैं अभी मरना नही चाहता हूं।’’

‘‘ठीक है, तुम जाओ।’’ सिगरेट के लम्बे-लम्बे कश लेते हुआ रावत उठ खड़ा हुआ, ‘‘ अब मैं देखता हूं कि मुझे क्या करना है।’’

उसी रात दस बजे के आस-पास रावत मेकअप में पहले अस्पताल जाकर इस बात का यकीन कर लिया कि बसंती अपने बिस्तर पर ही है। फिर वह अस्पताल के बाहरी गेट के पास ऐसी जगह छुप गया जहां से अस्पताल के अन्दर-बाहर आने-जाने वालों पर नजर रखी जा सकती थी।

प्रतीक चित्र

करीब आधे घंटे बाद ही उसे हल्की सी रोशनी में एक परछाई सी बाहर आती हुई दिखाई दी। रावत सावधान हो गया। जब वह परछाई गेट के पास पहंुची तो रावत को उसे पहचानने में जरा सी भी दिक्कत नही हुई। वह बसंती ही थी, गेट पर रूककर बंसती ने पलटकर पीछे के ओर देखा। जब उसे इस बात का यकीन हो गया कि उसका पीछा नही किया जा रहा है, तो वह तेज कदमों से एक तरफ बढ़ने लगी।

कुछ ही देर चलने के बाद बंसती एक झोपड़ी में दाखिल हो गई। इस बार उसने पलटकर देखने की भी जरूरत नही समझी, मानो उसे यकीन था कि न तो उस पर किसी को शक ही था और न ही कोई उसका पीछा कर रहा था।

रावत झोपड़ी के बाहर ही रूककर अन्दर से आने वाली आवाजों को सुनने की कोशिश करने लगा।

‘‘तुम से कितनी बार कह चुका हूं.... ’’ झोपडी में जलने वाला दीपक बुझा दिया गया था, भीतर से किसी मर्द की दबी हुई आवाज उभरी थी, ‘‘ .... कि यहां मत आया करो, अगर किसी को मामूली सा भी शक हो गया तो हमारा सारा खेल ही बिगड़ जाएगा।’’

‘‘अगर किसी को शक हो भी गया तो कोई हमारा क्या बिगाड़ लेगा।’’ बसंती ने उसे दिलसा दिया था।

‘‘मुझे तो वह पुलिस वाला..... ’’

रावत समझ रहा था कि यह बात उसी के बारे में कही जा रह थी।

‘‘वह भी आशिक मिजाज लगात है। अगर वह मुझे पहले मिल गया होता, तो उस बुड्ढे की बोली मैं उससे ही बंद करवाती..... अब भी कुछ नही बिगड़ा है। कल ही उससे मिलकर उसे ऐसे जाल में फंसा लूंगी कि साला सारी छानबीन करवाना भूलकर कुत्ते की तरह मेरे कदम चूमता फिरेगा।’’

‘‘और अगर वह न माना तो क्या होगा?’’

‘‘तब क्या होगा..... ’’ बसंती उसकी बातों से डरी नही थी, ‘‘यह तो मुझे नही मालुम है। हां यह जरूर बता सकती हूं कि अब क्या होगा..... ’’

‘‘अब..... अब क्या होगा?’’

‘‘वही..... ’’ बसंती चहकी थी, ‘‘जो हर रात को होता है।’’

इससे कुछ देर बाद ही चारपाई की चरमराहठ, बंसती की सिसकारियों के साथ युगलबंदी करने लगी थी। यह सुनकर रावत मुस्करा उठा।

अगले दिन शहर से लेडी पुलिस बुलाकर रावत ने बसंती और कालिया को हिरासत में ले लिया। पूछताछ के दौरान पहले तो दोनों अपने आप को बेगुनाह बताते रहे। लेकिन जब रावत ने पुलिसिया रूख अपनाया तो उन्होंने अपना गुनाह कबूल कर लिया। अगर गंगाबाई को उन पर शक न हो गया होता तो उम्र भर उनके गुनाह पर से पर्दा न उठ सका होता।

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हवस का भूत



कमल ने धड़कते दिल और उत्तेजना के अतिरेक से, कांपते हाथों से रमिया का हाथ पकड़ लिया जब उसने कोई विरोध नहीं किया तो वे रोमांचित हो उसे अपनी तरफ खींचने लगे। झिझकते हुए रमिया उनके इतने नजदीक आ गई कि उसकी गर्म सांसे उन्हें महसूस होने लगी। कमल ने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में भरते हुए अपनी तरफ किया और उसकी बड़ी-बड़ी आॅखों में झांकने लगे। रमिया ने लजाते हुए पलकें झुका लीं पर छूटने की कोशिश नहीं की। अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन पाकर कमले ने अपने कपकपाते ओठ उसके उभरे कपोल पर रखा दिए, तब भी रमिया ने कोई विरोध नहीं प्रदर्शित किया तो उन्होने उसे एक झटका देकर बिस्तर पर गिरा अपने आगोश में ले लिया। एक हल्की सी सीत्कार रमिया के मंुह से निकल गई।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई तो कमल की नींद खुल गई। देखा तो बिस्तर पर वे और उनकी तनहाई के अलावा उनके साथ कोई नहीं था। वे बुदबुदा उठे..... अभी ही आना था किसी को.... थोड़ी देर और नही रूक सकते थे। वे घड़ी देखकर मुस्करा दिए। सुबह हो चुकी थी। दोबारा दस्तक हुई तो उन्होंने उठकर दरवाजा खोल दिया। सामने सोनू खड़ा था अभिवादन करते हुए उसने पूछा, ‘‘अंकलजी, आंटी कब तक आएंगी? मम्मी पूछ रही है।’’

‘‘दो महीने बाद’’ कमल ने बताया।

‘‘थैक्यू अंकल’’ कहते हुए सोनू चला गया तो कमल भी अंदर आ गए।

जबसे उनकी पत्नी ललिता, लंबे समय से मायके गई थी वे बहुत अकेलापन महसूस कर रहे थे। शादी के दस वर्षो बाद भगवान ने उनकी सुनी थी। उनकी पत्नी गर्भवती हुई थी। वे कोई जोखिम नही उठाना चाहते थे इसलिए दो महीने पहले ही ललिता को मायके छोड़ आए थे। पिछले माह ही एक बालक ने जन्म लिया था। जच्चा-बच्चा के कमजोर होने के कारण उनकी सास ने फरमान जारी कर दिया था कि बच्चे के तीन महीने का होने तक वे ललिता को नहीं भेजेंगी। फलस्वरूप कमल इस वक्त ‘‘फोसर््ड-बॅचलर’’ का जीवन व्यतीत कर रहे थे।

पिछले कुछ दिनों से उनका चंचल मन अपने घर काम करने वाली रमिया पर आया हुआ था। युवा रमिया के आकर्षक नयन-नक्श और गदराए यौवन ने उनके रातों की नींद और दिन का चैन हराम कर दिया था। अब जब उनकी पत्नी भी साथ नहीं थी, रमिया का शरीर पाने के लिए वे अधीर हो उठे थे। कमल जानते थे रमिया बहुत गरीब है। कई घरों में काम कर के बड़ी मुश्किल से अपना घर चलाती है। आदमी मतकमाउ है और पत्नी की कमाई पर ऐश करना चाहता है। पैसा ही रमिया की सबसे बड़ी कमजोरी होगी और उसी के सहारे रमिया को पाया जो सकता है। कमल का सोचना था कि पैसे के लोभ में अच्छे-अच्छों का ईमान-चरित्रा डगमगा जाता है फिर रमिया की क्या औकात कि उन्हें हाथ न रखने दे.... हालांकि ललिता के रहते कभी उन्होंने रमिया की ओर आॅख उठाकर भी नहीे देखा था।

प्रतीक चित्र

मन ही मन कोई शातिर योजना बनाकर वे रमिया के आने की प्रतिक्षा करने लगे। जैसे ही रमिया आई वे अपने बिस्तर पर लेट गए। रमिया अंदर जाकर काम करने लगी। जब कमल को लगा कि अब काम खत्म होने को होगा उन्होंने आवाज दी, ‘‘रमिया....जरा सुनो तो....’’

‘‘जी बाबूजी....’’ रमिया साड़ी के पल्लू से हाथ पोछती आ खड़ी हुई।

‘‘काम हो गया?’’

‘‘जी बाबूजी....’’

‘‘इधर आओ मेरे पास’’ कमल ने कहा।

रमिया उनके सिरहाने आकर खड़ी हो गई, ‘‘क्या बात है बाबूजी?’’

‘‘सिरदर्द हो रहा है थोड़ा दबा सकती हो?’’ कमल ने कापती आवाज में पूछा।

रमिया घबरा गई, ‘‘मैं.....?’’

‘‘हां भाई! अब घर में तो कोई और नहीं है’’ कमल ने विवशता दर्शाते हुए कहा,

झिझकते हुए रमिया उनके माथे को आहिस्ता-आहिस्ता दबाने-सहलाने लगी। रमिया के ठण्डे कोमल हाथों का स्पर्श पाते ही कमल का पूरा शरीर उत्तेजना से ऐसे झनझनाने लगा जैसे विद्युत प्रवाहित बिजली का नंगा तार छू गया हो। टूटते हुए शब्दों में सहानुभूति घोलते हुए वह पूछने लगे, ‘‘रमिया तुम इतनी मेहनत करती हो फिर भी बड़ी मुश्किल से गुजारा होता होगा न?’’

‘‘क्या करें बाबूजी मेरा मरद काम नहीं करता इसलिए तंगी होती है।’’ रमिया बोली।

‘‘तुम्हारा आदमी काम क्यों नहीं करता? क्या बीमार रहता है?’’ कमल ने पूछा।

‘‘वह तो खूब हट्टा कट्टा-मुस्टंडा है पर.....अब क्या बताउं बाबूजी नहीं बता सकती....’’ सकुचातें हुए रमिया चुप हो गई।

‘‘कितनी आमदनी हो जाती है तुम्हारी?’’ कमल ने पूछा।

‘‘एक हजार रुपए..... बस बाबूजी?’’ रमिया कमल के सिर से हाथ हटाते हुए बोली।

कमल ने तत्परता से कहा, ‘‘थोड़ा और दबा दे, अच्छा लग रहा है। औरत के हाथों में तो जादू होता हैं। एक बात बताओ रमिया! इतने कम पैसों में तुम्हारा घर कैसे चलता होगा?’’

रमिया खामोश रही तो कमल फिर बोले, ‘‘अगर इतने समय और काम में तुम्हें पंद्रह सौ रुपए मिलने लगे तो कैसा लगेगा?’’

रमिया मुस्करा उठी, ‘‘लगेगा तो अच्छा पर कौन देगा?’’

‘‘मैं दूगा’’ घड़कते दिल से कमल ने कहा और अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया, ‘‘अगर तुम चाहोगी तो मैं इससे भी ज्यादा दे सकता हॅंू।’’

प्रतीक चित्र

रमिया उनके चेहरे को आश्चर्य से देखने लगी। इस अप्रत्याशित दया की क्या वजह हो सकती है? उसने पूछा, ‘‘आप क्यों देगें बाबूजी?’’

कमल, रमिया को अपनी ओर खींचते हुए बोले, ‘‘रमिया मैं तुम्हारे सारे दुख दूर कर दूंगा, तुम्हारी गरीबी भी....तुम्हें गहने-कपड़ों से लाद दूंगा...बस मुझे तुम्हारा थोड़ा सा प्यार चाहिए....तुम्हारे साथ थोड़ी मौज-मस्ती चाहिए।’’

‘‘बीवीजी को पता लगेगा तो?’’ रमिया ने शंका व्यक्त की।

‘‘कैसे पता लगेगा? ऐसी बात कोई किसी को बताता है क्या?’’ कमल ने आश्वासन दिया। उनकी सांसे और शब्द बेकाबू हो चले थे।

‘‘मैं तैयार हूं पर मेरी एक शर्त है....’’ रमिया ने कहना चाहा, तो कमल ने उसे बोलने नहीं दिया, ‘‘अरे तुम तैयार हो तो.... मुझे तुम्हारी एक क्या सभी शर्ते मंजूर हेैं, बस मुझे खुश कर दिया करो।’’

‘‘पहले मेरी बात तो सुन लो बाबूजी....’’ रमिया थोड़ा रूखे लहजे से बोली।

कमल के सब्र का बांध टूट रहा था, वह उखडते स्वर में बोले, ‘‘चल जल्दी बता अब मुझसे रहा नहीं जाता....’’

‘‘दरअसल मेरे मरद को कोई बीमारी नहीं है...वह भी आपके समान आशिक मिजाज है। उसका दिल भी एक थाली से नही भरता.... वह यहां-वहां ताक-झांक करता रहता है। मुझे तो लगता है, सारी मरदजात एक सी होती है।’’

रमिया की बात से कमल खिसिया गए पर उन पर तो हवस का भूत सवार था। इसलिए वह कड़वी बात हजम करते बोले, ‘‘चल छोड़ कहा की बात ले बैठी, क्यों रंग में भंग कर रही है?’’

अपना हाथ छुड़ाने का प्रयास करते हुए रमिया बोली, ‘‘पहले मेरीे बात तो सुन लो। मेरी एक ही शर्त है.... जिस दिन आप मुझे बुलाएगें, उस दिन बीवीजी को मेरे मरद के पास भेजना पड़ेगा।’’

कमल तैश में आते हुए बोले, ‘‘जानती हो यह क्या कह रही हो तुम?’’

‘‘अदला-बदली की बात कह रही हूॅ। आपको क्या लगता है हम गरीबों की इज्जत इतनी सस्ती हो ती है कि कोई भी खरीद ले। अरे आप तो पांच सौ ज्यादा देने को कह रहें हैं। मैं आपको हजार रुपए महीना दंूगी.... इस हाथ दे उस हाथ ले.... क्यों बाबूजी?’’

कमल डांटते हुए बोले, ‘‘कैसी बातें कर रही है.... तुम छोटे लोगों की यही आदत खराब होती है कि अपनी औकात भूल जाते हो।’’

रमिया पूरी तरह से अलग हो आॅख दिखाते हुए बोली, ‘‘मैं तो आपकी औकात परख रही हूॅ बाबूजी!’’

कमल की इश्क का भूत अब पूरी तरह से उतर चुका था। ठंडा पसीना पोंछते, खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे की तर्ज पर कभी अपने को कभी जाती हुई रमिया को देख रहे थे।

 
‘‘जिसके प्यार में पागल

यौवन के व्रक्ष पर खूबसूरती के फूल खिले हो तो मंजर किसी कयामत से कम नहीं होता। यही हाल था दीपिका का। यूं तो खूबसूरती उसे कुदरत ने जन्म से तोहफे में बख्शी थी, लेकिन अब जब उसने लड़कपन के पड़ाव को पार कर यौवन की बहार में कदम रखा तो खूबसूरती संभाले नहीं सम्भल रही थी।

वह आईना देखती तो जैसे आईना भी खुद पर गर्व करता। उसकी सांस थम जाती और वह दुनिया में खूबसूरती के उदाहरण चांद को भी नसीहत दे डालता, ‘‘ऐ चांद, खुद पर न कर इतना गुरूर। तुझ पर तो दाग है। मगर मेरे वजूद में जो चांद सिमटा है, वह बेदाग है।’’

दीपिका मुस्कुराती तो लगता जैसे गुलाब का फूल सूरज की पहली किरण से मिलते हुए मुस्करा रहा है। अक्सर उसकी सहेलियां इस पर उसे टोक देतीं, ‘‘ऐसे मत मुस्कराया कर दीपिका, अगर किसी मनचले भंवरे ने देख लिया तो बेचारा जान से चला जाएगा। ’’

दीपिका खूबसूरत तो थी ही, साथ ही अच्छे संस्कार उसकी नस-नस में बसे थे। उसका व्यवहार कुशल होना, आधुनिकता और हंसमुख स्वभाव खूबसूरती पर चांद की तरह थे। दीपिका सयानी हो गई है। यह अहसास होते ही उसके मां इस अमानत को योग्य हाथों में सौंप देना चाहते थी। क्योंकि जमाना भी खराब है, फिर यह उम्र भी ऐसी है कि कदम भटकते देर नही लगती। इसलिए वह कहती, ‘‘कोई अच्छा सा घर-वर देखकर इसके हाथ पीले कर दो।’’

उसके पिता आधुनिक विचारों के थे। वह समय के साथ चलना चाहते थे। शुरू-शुरू में जब पत्नी कहती तो वह बात हंसकर टाल जाते थे, लेकिन जब दीपिका की मां कुछ अधिक ही गले पड़ने लगी तो वह उसके लिए घर-वर देखना शुरू कर दिया। जल्द ही उनकी मेहनत रंग लाई और सूर्यकान्त से उसकी शादी कर दी।

मधुर मिलन की रात्रि में सूर्यकान्त दीपिका के हुश्न और इष्क में इस तरह दीवाना हुआ कि उसे दीपिका की पलभर की जुदाई बर्दाश्त नहीं हो पाती। दोंनों ने महीनों खूब मौज-मजा किया। इस दौरान घूमने-फिरने और प्रेमके सिवा उनकी दुनिया में और कुछ भी नहीं था।

यूं ही समय खिसकता रहा काफी दिनों बाद भी जब सूर्यकान्त ने अपना काम-धाम नहीं शुरू किया तब घरवालों ने उसे काम करने को याद दिलाया तो वह जैसे नींद से जागा और पुनः अपने काम में लग गया। दीपिका भी ससुराल में आज्ञाकारी बहू की तरह दिन बिताने लगी। कुछ दिन तक तो ठीक-ठाक चला। धीरे-धीरे घर की जिम्मेदारियां दीपिका को भारी लगने लगी फिर तो वह उदास सी रहने लगी। पत्नी की उदासी जब सूर्यकान्त से नहीं देखी गई तो एक दिन पूछ बैठा, ‘‘क्या बात है दीपा, आजकल तुम कुछ अधिक ही उदास रहती हो?’’

सूर्यकान्त के पूछने पर दीपिका कहने लगी, ‘‘मेरा तो घर के अन्दर दम घुटने लगा है। मैं इतने प्रतिबन्ध में नहीं रह सकती हूँ।’’

‘‘प्रतिबन्ध……’’ सूर्यकान्त ने चौंकते हुए कहा, ‘‘प्रतिबन्ध कैसा दीपा? यह तो हर लड़की के साथ होता है। ससुराल में बड़ो का कहना मानना तो तुम्हारा फर्ज है, फिर तुम्हें किसी प्रकार का कोई रोक तो नहीं है, ऊपर से मैं भी तो तुम्हें घुमाता-टहलाता रहता हूँ। बहुत ज्यादा घर से बाहर रहना अच्छी बात थोड़े होती है।’’

सूर्यकान्त के समझाने पर दीपिका चुप हो गई, पर अब वह ज्यादातर अपने मायके में ही रहने लगी थी। जब वह ससुराल आती तो सूर्यकान्त से अनाप-सनाप चीजों की फरमाइश कर देती। इसी दौरान एक दिन दीपिका ने बीयर पीने की इच्छा जाहिर करते हुए बताया कि बीयर पीना तो उसका शौक है। तब सहसा सूर्यकान्त को दीपिका कीबात का यकीन ही नहीं हुआ।

सूर्यकान्त दीपिका को अपनी जान से भी अधिक चाहता था। उसके बीयर पीने की शौक सूर्यकान्त को नागवार लग रही थी, फिर भी पत्नी के प्रेम में अंधा सूर्यकान्त दीपिका का यह शौक भी पूरा करने लगा। जब कभी भी दीपिका बीयर पीती थी तब वह सूर्यकान्त के आगे खुली किताब हो जाती थी और मजा लेकर बताती थी कि उसके कितने ब्वायफ्रेन्ड थे। किन-किन के साथ वह घूमती और कहां-कहां जाती थी।

हालांकि पत्नी की बात सूर्यकान्त को बुरी जरूर लगती थी, पर यह सोचकर वह कुछ भी नहीं कहता था कि यह सब उसने शादी से पहले किया था। वह प्यार से दीपिका को समझाता, ‘‘देखो दीपा! अब तक तुम क्या करती थी इससे मुझे कोई लेना-देना नहीं है, पर अब तुम शादीशुदा हो इसका भी ध्यान देना।’’

प्रतीक चित्र

इस पर दीपिका नशे में झूमते हुए कहती, ‘‘छोड़ो यार! मुझे तो उन सब के साथ धुमने-फिरने, मौज-मजा करने में बहुत आनन्द आता है। तुम तो बस अब भी पुराने ख्यालात के लगते हो……’’

समय का चक्र चलता रहा सूर्यकान्त दीपिका को यह सोचकर कम ही मायके जाने देता था कि कही वह अपने पुराने यार-दोस्तों के साथ फिर से घूमना टहलना शुरू न कर दे। पति के बदले रवैये से दीपिका परेशान सी हो उठी थी। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? आखिर कुछ सोच कर वह भी सूर्यकान्त पर अपने मां-बाप व भाई से अलग रहने के लिए दबाव बनाने लगी। लेकिन जब सूर्यकान्त परिवार से अलग रहने के लिए साफ मना कर दिया तो दीपिका सूर्यकान्त से रूठकर मायके चली गई।

दीपिका की नाराजगी से सूर्यकान्त अन्दर ही अन्दर टूट गया था। वह उसे वापस घर लाने का काफी प्रयास भी किया लेकिन सफल नहीं हुआ और एक दिन बहन की तबियत खराब होने की जानकारी मिली तो दीपिका बहन के पास दिल्ली चली गई।

काफी मान-मनौवल के बाद रूठकर दिल्ली गई दीपिका सूर्यकान्त के पास आ गई। एक दिन बीयर पीने के बाद उसने एकान्त की क्षणों में बताया था कि दिल्ली में जीजाजी उसकी हर इच्छा पूरी करते थे। वहां एक दिन में हम सब तीन-तीन बोतल रम पी जाते थे। वाह-वाही झाड़ते हुए उसने यह भी बता दिया कि दिल्ली में रहने के दौरान वह कभी जीजा के साथ तो कभी उनके भाई के साथ तक सो जाती थी तो सूर्यकान्त का खून खौल उठा, भला कोई मर्द यह कैसे बर्दाश्त कर सकता है कि उसकी बीबी दूसरे के साथ सोई थी फिर भी सूर्यकान्त ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया।

अभी कुछ ही दिन बीते थे कि दीपिका का जीजा दिल्ली से इलाहाबाद आया । तब पति से जिद कर दीपिका ने एक दिन अपने जीजा को खाने पर बुलवाया। उस दिन सूर्यकान्त किसी जरूरी काम से कुछ देर के लिए बाहर चला गया। वापस लौटा तो कमरे में दीपिका अपने जीजा के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पड़ी थी। सूर्यकान्त के वापस आते ही दोंनों अलग हुए और अपने कपड़े ठीक कर बाहर निकल गए। अपनी आंखों से पत्नी का असली रूप देखकर सूर्यकान्त को अपने आप से घीन आने लगी और वह सोचने लगा कि जिसके प्यार में वह पागल है, वह उसकी बीबी होते हुए भी गैरों की बांहों में झूलने के लिए बेताब है। गुस्से में आकर उसने दीपिका को कई थप्पड़ रसीद कर दिया।

अब तक दीपिका के प्रेम में दीवाना सूर्यकान्त दीपिका से घ्रणा करने लगा था। वह सोचता था कि दीपिका कभी नहीं सुधरेगी और हमेशा ही अपने हुश्न के जाल में उलझा कर नए-नए लोगों के साथ मौज-मस्ती करती रहेगी। अन्ततः सूर्यकान्त को जब यकीन हो गया कि कि दीपिका उसकी बन कर नहीं रह सकती, वह किसी अन्य की बाहों में उसे नहीं देख सकता था। तब सूर्यकान्त ने हमेशा-हमेशा के लिए दीपिका को दुनिया से विदाकर देने का निर्णय ले लिया।

एक दिन रात में सूर्यकान्त बहाने से दीपिका को सूनसान स्थान पर ले जाकर गोली मार दी। अगले दिन सुबह-सुबह जल्दी उठ कर सूर्यकान्त ने दरवाजे पर ताला लगाया फिर चला गया। दोपहर बाद घर लौटा तो यहां-वहां दीपिका के बारे में पता लगाने लगा। इसी क्रम में उसने दीपिका के मायके भी पता किया। अन्ततः दीपिका को खोजने का नाटक करता गुमसूदगी दर्ज करवाने खुद थाने पहुंच गया। लेकिन पुलिस की तेज-तर्रार नजरो व सूझ-बूझ से सूर्यकान्त की चालाकी काम नहीं आई और उसने खुद अपना अपराध कबूल कर लिया।
 
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