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होश आने पे वो हॉस्पिटल पहुँची & जब उस लाश को देखा तो उसकी चीख निकल गयी.चेहरा पूरी तरह जल कर खाक हो चुका था & बाकी बदन भी,बस दाएँ हाथ & कलाई का कुच्छ हिस्सा अधजला सा रह गया था जिसपे उसका दिया ब्रेस्लेट अभी भी चमंक रहा था.उसी से उसने राजा साहब की लाश को पहचाना था.उसके बाद क्या हुआ उसे कुच्छ होश नही.उसके माता-पिता फ़ौरन उसके पास पहुँच गये थे & उसकी मा तो अभी भी उसके साथ थी.लोग जो कहते वो बस चुप-चाप करती जाती...किसी ज़िंदा लाश की तरह.
वो 1 हाथ मे राजा साहब का ब्रेस्लेट लिए,कुच्छ काग़ज़ों को देख रही थी,ये वसीयत थी जिसमे राजा साहब ने सारी जायदाद उसके नाम कर दी थी & आज से वो कुँवारानी नही रानी साहिबा हो गयी थी.उसने उन काग़ज़ों को देखा & आज राजा साहब की मौत के बाद पहली बार ऑफीस जाने का फ़ैसला किया.
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राजा साहब की मौत की खबर सुनकर तो जब्बार खुशी से पागल हो गया था.उसने सोचा भी ना था कि बिना उसके कुच्छ किए तक़दीर उसे ऐसा तोहफा देगी.इस वक़्त वो मलिका के साथ कार ड्राइव करता हुआ शंकारगर्ह नाम की जगह से शहर आ रहा था.शंकारगर्ह से शहर का रास्त 1 जंगल से होकर गुज़रता था.आमतौर पे लोग शाम ढलने के बाद उस रास्ते का इस्तेमाल नही करते थे बल्कि थोड़ा घूम कर हाइवे से शहर जाते थे.पर जब्बार को इन सब बातों की कोई फ़िक्र नही थी.ठीक भी था-गुंडे कब से गुणडो से डरने लगे.इस वक़्त शाम के 8 बज रहे थे.
तभी ज़ोर की आवाज़ हुई & जब्बार ने ब्रेक लगाया.उसकी कार का कोई टाइयर पंक्चर हुआ था."धत्त तेरे की!",वो कार से नीचे उतरा & उसके उतरते ही 2 नक़ाबपोश किनारे की झाड़ियो से निकल कर आ खड़े हुए.उनमे से 1 ने जब्बार को पीछे से पकड़ कर उसकी गर्दन पे चाकू रख दिया & दूसरे ने मलिका को कार से खींच कर उतार दिया.
"सालो,,क्या चाहिए तुम्हे?पैसे?तो लो & निकलो..."
"चुप बेहन्चोद!पहले हम इस माल को लूटेंगे फिर तेरे पैसों के बारे मे सोचेंगे...चल!",उसने मलिका की तरफ इशारा किया & दोनो लुटेरे जब्बार & मलिका को झाड़ियो मे खींच जंगल मे ले गये.1 मलिका को गिरा उसपर सवार हो उसके कपड़े नोचने लगा तो मलिका चिल्लाने लगी.दूसरे ने 1 रस्सी से जब्बार को बाँध दिया & अपने दोस्त के साथ मलिका को नंगी करने मे जुट गया.
तभी झाड़ियों को चीर वाहा 1 और इंसान पहुँचा.उसने दोनो गुणडो को 1-1 हाथ से पकड़ा & मलिका के उपर से खींच लिया.वो 1 सरदार था & उसने उनसे अकेले ही लड़ना शुरू कर दिया.मलिका जैसे ही गुणडो के चंगुल से छूटी तो वो भाग कर जब्बार के पास पहुँची & उसके बंधन खोल दिए.अब जब्बार भी उस सरदार के साथ मिल उन गुणडो की पिटाई करने लगा.थोड़ी ही देर मे गुंडे वाहा से रफूचक्कर हो गये.
"शुक्रिया.",जब्बार हाँफ रहा था.
"ये तो मेरा फ़र्ज़ था.बंदे को रविजित सिंग सोढी कहते हैं.",उस सरदार ने अपनी साँस संभालते हुए जब्बार से हाथ मिलाया.वो कोई 50 साल के आसपास की उम्र वाला लंबी कद-काठी का इंसान था.
"मैं जब्बार सिंग हू."
"आप दोनो मेरे साथ चलिए.शहर से पहले मेरा फार्महाउस है.रात वही गुज़ारिए.",उसने अपने कोट से मलिका के फटे कपड़ो से नुमाया हो रहे जिस्म को ढँक दिया.
"आपको खम्खा तकलीफ़ होगी."
"बिल्कुल भी नही.आइए,बैठिए...& अपनी कार की चिंता मत करिए.अभी थोड़ी देर मे अपने ड्राइवर & नौकरों से इसे मंगवा लेंगे."
कोई 1 घंटे बाद दोनो रविजित सिंग सोढी के साथ उसके फार्महाउस के ड्रॉयिंग रूम मे बैठे थे,मलिका 1 कमरे मे आराम कर रही थी.
"तो आप क्या करते हैं,जब्बार साहब?",उसने विस्की का 1 ग्लास बढ़ाया.
"मैं प्रॉपर्टी डीलर हू.और आप?",जब्बार ने ग्लास लेते हुए पूचछा.
"मैं तो एनआरआइ हू.जॅमेका मे मेरा बिज़्नेस है..",पेग ख़त्म कर वो दुबारा अपना ग्लास भर रहा था.
थोड़ी ही देर मे दोनो शराब के नशे मे खुल कर बातें करने लगे.
"उपरवाले का भी अजीब ढंग है,जब्बार साहब.पहले तो इंसान के दिल मे किसी चीज़ की चाह जगाता है & जब इंसान मेहनत-मशक्कत के बाद उस चीज़ को पाने के काबिल हो जाता है तो उपरवाला उस चीज़ का वजूद ही मिटा देता है.पिच्छले 26 सालों से मैं बस 1 ही मक़सद के लिए काम कर रहा था & आज जब उसे पूरा करने आया तो...."
"तो क्या,सोढी साहब?
"छ्चोड़िए.आप राजपुरा से हैं ना?"
"जी."
"तो आपको मेरी बात बुरी लग सकती है."
"क्यू?"
"क्यूकी जिस ख़ानदान की बात मे कर रहा हू,उसे आपके गाओं मे भगवान की तरह पूजा जाता है."
"आप राजकुल की बात कर रहे हैं?"
"जी,हाँ.राजकुल!जिसने मेरी ज़िंदगी का रुख़ मोड़ दिया."
"सोढी साहब,यकीन मानिए,जितनी नफ़रत आपके दिल मे उस परिवार के लिए है,उस से कही ज़्यादा मेरे सीने मे है."
"क्या?"
"जी,हाँ.सोढी साहब & अगर आप मुझे इतने भरोसे के काबिल समझते हैं कि आपका दर्द बाँट साकु तो मैं आपको अभी भी उस परिवार से बदला लेने की तरकीब बता सकता हू."
"ठीक है,जब्बार साहब.वैसे भी ये कोई बहुत गहरा राज़ नही है.आज से 26 साल पहले मैं राजपुरा आया था.मैं 1 बहुत ग़रीब परिवार से हू.पॉलिटेक्निक से पढ़ने के बाद मेरी नौकरी राजकुल शुगर मिल मे लगी.रहने के लिए वही गाओं मे 1 फ़ौजी के घर मे 1 कमररा ले लिया.फ़ौजी कभी-कभार ही घर आता था & यहा केवल उसकी बीवी रहती थी.वो बला की खूबसूरत थी.मैं नौजवान था & वो भी मर्द के जिस्म के लिए तड़पति रहती थी.थोड़े ही दीनो मे हुमारे ताल्लुक़ात बन गये.बात केवल जिस्मो की आग बुझाने से शुरू हुई थी पर जल्द ही हम 1 दूसरे को दिल-ओ-जान से चाहने लगे..",उसने ग्लास खाली कर दिया.
"..कहते हैं ना कि इश्क़ & मुश्क च्छुपाए नही च्छुपते.हुमारे इश्क़ की खबर भी फैल गयी & जब फ़ौजी आया तो उसने हुंगमा शुरू कर दिया.उसकी बीवी मेरे साथ जाना चाहती थी & मैं भी उसे ले जाने को तैय्यार था.पर बात फ़ौजी की आन की थी,वो सीधा राजा यशवीर के बाप राजा सूर्यप्रताप के पास फर्याद लेकर पहुँच गया & उसने अपना हुक्म सुना दिया.मुझे नौकरी से निकाल कर गाओं से बाहर फिकवा दिया.इतना ही नही,मुझे आवारा घोषित कर दिया & इस वजह से मुझे कही और नौकरी नही मिली."
"काई महीनो तक मैं खाक छानता रहा & फिर किसी ने मुझे जॅमेका मे 1 नौकरी दिलवाई.वाहा पहुँच कर मैने अपनेआप को हर तरह से मज़बूत कर लिया केवल 1 बात के लिए-मुझे सूर्यपरताप के बेटे यशवीर को उसके बाप के किए की सज़ा देनी थी,पर आया तो पता चला कि वो कार आक्सिडेंट मे मारा गया."
"अब बताइए अपनी तरकीब?"
"सोढी साहब.आप राजकुल की मिल्स क्यू नही खरीद लेते?आप पैसे लगाइए मैं उसे यहा चलाऊँगा.पार्ट्नरशिप कर लेते हैं & हर महीने आपको मुनाफ़े की रकम मिलती जाएगी.मेरे दिल को तो इसी बात से सुकून मिलता रहेगा कि राजा की मिल्स मेरे हाथों मे हैं."
"पर क्या मिल्स बिकाउ हैं?"
"अगर नही हैं तो हो जाएँगी.उसकी आप फ़िक्र मत करो."
"जब्बार भाई,आपने अभी तक अपनी कहानी नही सुनाई."
"सुनाउन्गा,सोढी साहब.ज़रूर सुनाउन्गा.वक़्त आने दीजिए.आपने हमे अपना राज़दार बनाया है तो मैं भी वादा निभाऊँगा."
"ठीक है.मैं भी आप पे भरोसा करता हू.",दोनो ने हाथ मिलाया.
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मेनका का दिल अब कही भी नही लगता था.ऑफीस मे उसने मन लगाने की बहुत कोशिश की पर उसमे कामयाब नही हुई.ऑफीस आते हुए 15-20 दिन गुज़र गये थे पर उसे सब बोझ जैसा लगता था.वो ऐसे ही कुर्सी पे बैठी काग़ज़ उलट-पलट रही थी & बीते दीनो को याद कर रही थी.....वो जब डील साइन करने उनके साथ गयी थी तो उनकी बहू बनकर & लौटी उनके दिल की रानी बनकर.वो होटेल के कमरे मे दोनो की पहली रात....फिर यहा....& तभी उसके दिमाग़ मे एरपोर्ट पे सपरू साहब से हुई मुलाकात का ख़याल आया.
सपरू साहब.हाँ..क्यू ना वो मिल्स मे अपना हिस्सा उन्हे बेच दे.फिर वो यहा से शहर रहने चली जाएगी.राजपुरा तो अब उसे काटने को दौड़ता था.उसने तुरंत सेशाद्री साहब से बात की.उन्हे भी ख़याल अच्छा लगा.मेनका काम पे ठीक से ध्यान दे नही रही थी & इस से अभी तक तो नुकसान नही हुआ पर आगे हो सकता था.दोनो ने जर्मन पार्ट्नर्स से बात की तो वो भी राज़ी हो गये.
मेनका फ़ौरन अपनी मा के साथ देल्ही रवाना हो गयी.वाहा सपरू साहब के सामने जब उसने अपना प्रपोज़ल रखा तो मानो उन्हे मुँह माँगी मुराद मिल गयी.देल्ही से वापस आते हुए मेनका की मा अपने घर चली गयी & मेनका शाम ढले राजपुरा पहुँची.
क्रमशः...................