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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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पहले जहां चबूतरा था, वहां अब नीचे जाने को सीढ़ियां नजर आ रही थीं। नीचे रोशनी थी।

"हमें रास्ता मिल गया।” जगमोहन खुशी-भरे स्वर में कह उठा।

“आओ।” देवराज चौहान खाली हुई जगह की तरफ बढ़ता कह उठा—"हमने जथूरा को ढूंढ लिया है शायद।" ___

“शायद नहीं।”

मोना चौधरी आगे बढ़ी—“पक्का ढूंढ़ लिया

देवराज चौहान सीढ़ियां उतरने लगा। मोना चौधरी भी। बाकी सब उनके पीछे थे।

"चल छोरे। जथूरो को देखो हो कि वो किसो पोजिशन में हौवे।"

"चल बाप।” लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा भी आगे बढ़े।

"वो भूतना जिन्न भी पीछे-पीछे आ रहा है।" सपन चड्ढा बोला।

"हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा कमीना।"

"वो सुन रहा होगा हमारी बातें।” कहकर सपन ने पीछे देखा।

मोमो जिन्न उन्हें ही देख रहा था। परंतु चेहरे पर मुस्कान थी। ___

“अब तो मुस्करा रहा है साला। कहीं उसमें इंसानी इच्छाएं फिर से तो नहीं आ गईं।"

“पीछे मत देख, बला को दूर ही रहने दे।"

सब सीढ़ियां तय करके नीचे पहुंचे तो उन्हें ठिठक जाना पड़ा।

वो काफी बड़ा कमरा था। फर्नीचर के नाम पर टूटी-फूटी कुर्सियां पड़ी थीं।

जथूरा वहां मौजूद था।

उसकी दाढ़ी इस हद तक बढ़ी थी कि पूरी छाती तक फैल रही थी। ___ काली और सफेद थी उसकी दाढ़ी। शरीर पर मैली हो रही धोती लिपटी थी। ___

“जथूरा महान है।" मोमो जिन्न ने कहा और आगे बढ़कर उसके कदमों में झुक गया—“तुम जैसा दूसरा कोई नहीं जथूरा।"

जथूरा की आंखों में खुशी के आंसू चमक उठे। “तुम्हें देखकर प्रसन्नता हुई मोमो जिन्न। कितनी खुशी की बात है कि देवा-मिन्नो अपने पूर्वजन्म में आ गए और मुझे आजाद कराया।"

मोमो जिन्न उठ खड़ा हुआ।

"पिताजी।” तवेरा की रुलाई फूट पड़ी। वो दौड़ी और जथूरा के गले से जा लगी।

जथूरा की आंखों से आंसू बह निकले। “तवेरा, मेरी बेटी।”

"पिताजी।" "तू ठीक तो है ना मेरी बच्ची?"

“मैं ठीक हूं। पोतेबाबा ने पिता बनकर मेरा खयाल रखा।"

"ये तो कितनी अच्छी बात है।” जथूरा ने उसकी पीठ थपथपाकर, उसे अलग किया और देवराज चौहान, मोना चौधरी को देखकर खुशी-भरे स्वर में कह उठा__"मैंने तम्हें पहचान लिया है देवा-मिन्नो। तुम सबको पहचान लिया है, नील सिंह, परस, जग्गू, गुलचंद, बेला, भंवर सिंह, त्रिवेणी, तुम सब मेरे अपने तो हो।" ___

“मैं तुमसे बात करना चाहता हूं जथूरा।” देवराज चौहान ने कहा।

"कहो।”

"तुम्हें आजाद कराने की मेरी शर्त है।”

“आजाद तो पिताजी हो गए हैं।" तवेरा कह उठी।

"नहीं। अभी मैं आजाद नहीं हुआ।” जथूरा बोल पड़ा—“महाकाली का तिलिस्म अभी पूरी तरह टूटा नहीं।"

“क्या बाकी है पिताजी?"

"देवा-मिन्नो जब मुझे छू लेंगे, तभी मैं पूरी तरह महाकाली की कैद से मुक्त हो सकूँगा।"

"ओह ।”

“तुम कहो देवा क्या कहना चाहते हो। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि तुम्हारी बात मान लूं।"

"दो शतें हैं तुम्हारी आजादी की। एक तो ये है कि तुम्हें अपने पिता से विरासत में मिली शक्तियों का बंटवारा अपने भाई सोबरा

से करना होगा। क्योंकि उनका हकदार वो भी है।"

“मैं ऐसा ही करूंगा।” जथूरा ने गम्भीर स्वर में कहा। __

“दूसरी शर्त ये है कि तू हादसों का निर्माण करके, उन्हें हमारी दुनिया में नहीं भेजेगा।”

"ये समस्या वाली बात है।” जथूरा कह उठा।

"क्यों?" __

"मैं हादसों का देवता हूं। मुझे अपना काम करते रहना होगा।" जथूरा बोला।

“आजादी चाहते हो तो तुम्हें ऐसा नहीं करना होगा।"

“हादसों का निर्माण करके, तुम्हारी दुनिया में भेजना मेरा काम है। मेरा कर्म है। इससे मैं पीछे नहीं हट सकता।” जथूरा ने सोच-भरे गम्भीर स्वर में कहा—“कोई बीच का रास्ता निकालो तो मैं हामी भर सकता हूं।"

“मैं बताती हूं बीच का रास्ता।" “बोल मिन्नो।”

जथूरा ने मोना चौधरी को देखा।

“तम नए हादसों का निर्माण बहुत कम करोगे।"

"ठीक है।"

"और पुराने हादसों को हमारी दुनिया में भेजने की रफ्तार भी बहुत कम कर दोगे।"

“ये भी ठीक है।” जथूरा ने सहमति से सिर हिलाया।

"ये बाद में अपनी बात से पीछे भी हट सकता है।” पारसनाथ ने कहा।

"नहीं परस। जथुरा जो बात कहता है, खरी कहता है।"
 
“तुम इतने ईमानदार होते तो अपने भाई सोबरा के साथ धोखा न करते।” नगीना बोली।

"मैं ईमानदार ही हूं।" जथूरा ने गम्भीर स्वर में कहा—“परंतु तब मुझे ताकतों की जरूरत थी। इसलिए मैंने सोबरा के साथ बे-ईमानी की। परंतु पचास साल की इस कैद से मुझे इस बात का पता चला कि जिंदगी कैसे जीनी है। अब आगे आओ देवा और मिन्नो। मुझे महाकाली की तिलिस्मी कैद से पूरी तरह आजाद कर दो, ताकि मैं वापस अपनी नगरी में जा सकू।"

देवा-मिन्नो आगे बढ़े। पास जा पहुंचे। “तुम अपने वादे पर कायम रहोगे जथूरा।" देवराज चौहान ने कहा।

"यकीनन मैं कायम रहंगा। मझ पर भरोसा रखो।"

देवराज चौहान और मोना चौधरी ने हाथ बढ़ाकर जथूरा को छुआ।

जथूरा के शरीर में जोरों का कम्पन उठा और फौरन ही सामान्य हो गया।

जथूरा ने गहरी सांस ली और मुस्कराकर बोला। “अब मैं फिर से अपनी नगरी जा सकूँगा। मैं महाकाली की कैद से आजाद हो गया। इससे बढ़कर मेरे लिए खुशी की दूसरी बात नहीं।" कहने के साथ ही जथूरा ने सामने नजर आते दरवाजे की तरफ देखा—

“जाओ, उसे भी आजाद करो। वो भी पचास बरसों से सुखी नहीं रही।"

"आप किसकी बात कर रहे हैं पिताजी?" तवेरा कह उठी।

सबकी निगाह जथूरा पर जा टिकी।

“महाकाली की बात कर रहा हूं।"

“वो, वो कैद है?" जगमोहन के होंठों से अजीब-सा स्वर निकला।

___ “उसके कर्मों ने उसे कैद कर लिया।" जथूरा गम्भीर स्वर में बोला—“जब मैं सोबरा के कालचक्र को कैद करने की सोच चुका था तो इस बात का एहसास था मुझे कि सोबरा भी कम नहीं, उसने अवश्य इस बात का कोई इंतजाम किया होगा कि अगर मैं कालचक्र पर कब्जा जमा लूं तो मुझे कोई-न-कोई सजा अवश्य मिले। इसलिए मैंने अपनी विद्या से अपने गिर्द ऐसा सरक्षा चक्र फैला दिया कि मेरा जो हाल हो, वैसा ही हाल उसका हो, जिसने मेरा बुरा हाल किया होगा। परंतु तब मैं ये नहीं जानता था कि सोबरा, मुझे कैद करने के लिए महाकाली की सहायता ले रहा है। ऐसे में जब मैंने कालचक्र पर अपनी ताकतों से कब्जा किया तो महाकाली ने अपनी ताकत से मुझे कैद कर लिया। लेकिन मेरे फैलाए सुरक्षा चक्र में महाकाली अंजाने में कैद हो गई। उसने नहीं सोचा था कि मैंने अपनी सुरक्षा का इंतजाम कर रखा है। उसने मुझे कैद किया तो वो स्वयं भी कैद हो गई। तब वो उस कमरे में थी। वो कैद में रहे, इसके लिए मेरे सुरक्षा चक्र ने उसका आधा शरीर पत्थर का बना दिया। वो वहीं की वहीं खड़ी रह गई। वो भी कैद में पड़ी है पचास बरसों से। मेरे से कम तकलीफ नहीं भोगी बेचारी ने। उसे भी आजाद कर दो।"

ये बात हैरान कर देने वाली थी। जथूरा को कैद करते ही महाकाली स्वयं भी कैद हो गई थी।

"लेकिन हमने तो कभी नहीं सुना कि महाकाली कैद में है।" तवेरा ने कहा।

“महाकाली ने अपने कैद में होने का प्रचार नहीं किया और अपनी परछाइयों के द्वारा सामान्य ढंग से अपने सारे काम करती रही। वो नहीं चाहती थी कि उसे कैद में जानकर, कोई इस बात का फायदा उठा ले।"

“आपको ये बातें कैसे पता?" तवेरा ने पूछा।

“महाकाली से मेरी बात होती रहती है। वो उस कमरे में, मैं इधर, हम बातें कर लेते हैं।"

"हम महाकाली को कैसे आजाद कराएंगे?” जगमोहन ने पूछा। ___

“देवा और मिन्नो के छूने भर से वो आजाद हो जाएगी। उसका शरीर सामान्य हो जाएगा।” जथूरा ने बताया।

तभी मोना चौधरी के होंठों से नीलकंठ की आवाज निकली। “अब मेरी जरूरत नहीं रही। मैं वापस जा रहा हूं।"

“तुम?" महाजन के होंठों से निकला—“तुमने किया ही क्या है, जो अपनी मौजूदगी के बारे में..."

“मुझे कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी।" मोना चौधरी के होंठों से नीलकंठ का मर्दाना स्वर निकल रहा था।

"क्यों?"

“क्योंकि जब तुम सबने महाकाली की मायावी पहाड़ी में प्रवेश किया, तभी मुझे इस बात का एहसास होने लगा कि महाकाली तुममें से किसी को नकसान नहीं पहुंचाना चाहती। उसकी इंकार में भी. हां है। वो स्वयं चाहती है कि तुम लोग आओ और जथूरा को आजाद करो। ताकि वो स्वयं भी आजाद हो सके । इसलिए मैंने महाकाली के मामले में दखल देना उचित नहीं समझा।”

__“ऐसा ही था तो प्रणाम सिंह-बूंदी और बांदा हमें भटकाने पे क्यों लगे रहे। वो महाकाली के इशारे पर काम कर रहे थे।" नगीना बोली। -

"इस बात का जवाब महाकाली से पूछो। अब यहां मेरा कोई काम नहीं। मैं जा रहा हैं।"

अगले ही पल मोना चौधरी सामान्य होती दिखी।
 
अगले ही पल मोना चौधरी सामान्य होती दिखी।

"नीलकंठ चला गया बेबी।" महाजन ने कहा।

"जानती हूं।” मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा— “मैंने सब सुना।"

“छोरे।” बांके बोला—“नीलकंठो तो गयो।"

“मालूम है बाप। सब सुनेला आपुन ।” तभी जथूरा ने कहा।

"आओ। महाकाली को आजाद करो। जब तक वो आजाद नहीं होगी, मुझे चैन नहीं मिलेगा।” कहकर जथूरा दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

सब उसके पीछे चल पड़े। मखानी कमला रानी के पास पहुंचकर बोला। “यहां तो सब ठीक हो गया कमला रानी। अब हमारा क्या होगा?"

"शौहरी से पूछ।"

“जब से हम इस दुनिया में आए हैं, शौहरी तो जैसे गुम हो गया। तू भौरी से क्यों नहीं पूछती?" .

“भौरी व्यस्त है, वो खुद ही बात करेगी, जब फुर्सत में आएगी।" कमला रानी बोली।

"तेरे को ये दुनिया कैसी लगी?"

"ठीक है, बुरी नहीं।”

"और वो अपनी दुनिया?"

"हमारी दुनिया ज्यादा मजेदार है। वहां हम दोनों पूरी तरह आजाद हैं। अपनी मर्जी कर सकते हैं।"

"लेकिन हम अपनी दुनिया में नहीं जा सकेंगे।" मखानी ने दुखी स्वर में कहा—“शौहरी और भौरी हमें नहीं जाने देंगे।"

दूसरे कमरे का नजारा देखने लायक था। सब ठिठक-से गए थे।

वो महाकाली ही थी। कमसिन-सी युवती लग रही थी। चेहरे पर ऐसी खूबसूरती कि जो देखे देखता ही रह जाए । काली साड़ी में थी वो। परंतु उसकी कमर का नीचे का हिस्सा पत्थर का हुआ पड़ा था।

महाकाली ने सबको देखा। कुछ पल खामोशी रही।

"मुझे खुशी है जथूरा कि तू आजाद हो गया।” महाकाली मुस्कराकर कह उठी।

"तेरे को भी आजाद करके ही जाऊंगा। तने तो मेरे से ज्यादा तकलीफ भोगी है। मैं कैद में चल-फिर तो सकता था, परंतु तू तो

आधी पत्थर की हो गई थी। तेरी तकलीफ ज्यादा है।"

तभी नगीना बोली। __ "मुझे समझ नहीं आता कि बूंदी-बांदा और प्रणाम सिंह रास्ते में हमें धोखे में रखने की चेष्टा क्यों करते रहे?" ___

“ऐसी बात नहीं है। महाकाली ने कहा- "चूंकि वो मेरे सेवक हैं और ये मायावी पहाड़ी मेरी है, इसलिए हम बाहरी लोगों को सीधे-सीधे सहायता नहीं कर सकते थे। मेरी विद्या का उसूल है। इसलिए बूंदी, बांदा और प्रणाम सिंह या सांभरा, सीधे-सीधे न कहकर, खामोशी से तुम लोगों की सहायता करते रहे और तुम सबको ऐसे रास्ते पर धकेलते रहे, जो कि मेरे इस किले की तरफ

आता था। उन्होंने तुम लोगों को कहीं भी तकलीफ नहीं होने दी। परंतु सीधे-सीधे बताकर वे तुम लोगों की सहायता करते तो मेरी तकलीफें और बढ़ जातीं।"

“ओह।"

“और हम सोचते रहे कि तुम हमें रोकना चाहती हो।”

"मैं रोकना नहीं चाहती थी। सिर्फ रोकने का दिखावा कर रही थी। जो कि मेरी विद्या के हिसाब से करना जरूरी था। वरना मेरी जमीन पर आकर, कोई मेरी मर्जी के बिना, दस कदम भी नहीं चल सकता।” कहते हुए महाकाली की निगाह कुछ दूर टेबल पर बोतल की तरफ गई। फिर बोली__“वक्त कम है। अपने को कैद में पाकर मैंने प्रलय के वक्त को पचास बरस पर तय कर दिया था कि अगर मैं पचास बरस तक कैद रहूं तो हर तरफ प्रलय आ जाए। कोई भी जिंदा न रहे। इसके लिए मुझे समय का ज्ञान रहे तो मैंने उस बोतल में पानी भरकर मंत्र पढ़ दिया कि उस बोतल का पानी पचास बरसों में समाप्त हो जाए और अब उस बोतल में पानी की आखिरी बूंद बची हुई है। वो कभी भी सूख सकती है। मैं नहीं चाहती कि अब प्रलय आए और हमारी सारी दुनिया तबाह हो जाए। मुझे जल्दी से आजाद करो।”

मोना चौधरी फौरन आगे बढ़ी और महाकाली को छू लिया।

देवराज चौहान ने भी आगे बढ़कर महाकाली को छुआ।

अगले ही पल सबके देखते-देखते महाकाली की कमर के नीचे का हिस्सा सामान्य होता चला गया।

दो पल में ही महाकाली सामान्य खड़ी थी सामने। महाकाली ने अंगड़ाई ली। मुस्कराई। फिर कह उठी।

“देवा और मिन्नो का मैं शुक्रिया अदा करती हूं कि मुझे तकलीफदेह कैद से छुटकारा दिलाया। परंतु साथ में ये भी कहूंगी कि पानी की आखिरी बूंद सूखने से पहले देवा-मिन्नो को इस दुनिया से बाहर निकल जाना होगा।"

“क्यों?” __

“क्योंकि पानी की आखिरी बूंद सूखते ही मेरे मारक मंत्र तबाही का रास्ता तलाशेंगे। परंतु जब उन्हें पता चलेगा कि देवा-मिन्नो की वजह से उन्हें कुछ करने का मौका नहीं मिला तो वो मंत्र क्रोध में तुम दोनों को खत्म कर देंगे। इसलिए तुम दोनों का इस दुनिया में अब रहना, खतरे से खाली नहीं। बेहतर है कि फौरन अपनी दुनिया की तरफ रवाना हो जाओ।" ।

"हम इतनी जल्दी नहीं निकल सकते।” मोना चौधरी ने कहा। ___

“उसकी फिक्र मत करो।” महाकाली ने कहा—"मैं तुम लोगों को पलों में ही तुम्हारी दुनिया में पहुंचा दूंगी।"

“वो कैसे?" देवराज चौहान बोला।

महाकाली गम्भीर स्वर में बोली।

“जो भी वापस अपनी दुनिया में जाना चाहता है वो आपस में हाथ पकड़ ले।"

फिर तो जैसे एक-दूसरे के हाथों को पकड़ने की होड़ लग गई।

देवराज चौहान का हाथ एक तरफ से नगीना ने पकड़ा, दूसरी तरफ से मोना चौधरी ने। _ उसके बाद सब एक-दूसरे का हाथ पकड़ते चले गए। रातुला तवेरा और मोमो जिन्न जथूरा के पास खड़े रहे।

मखानी और कमला रानी की नजरें मिलीं।

आंखों-ही-आंखों में इशारे हुए। दोनों जल्दी से आगे बढ़े और कमला रानी ने कतार के अंत में खड़े बांके लाल राठौर का हाथ थाम लिया।

बांके की मूछे फड़कीं। मुस्कराया वो। मखानी कमला रानी का हाथ पकड़ता कह उठा। “तूने मुच्छड़ का हाथ क्यों थामा?"

“चुप कर।” कमला रानी फुसफुसाई—“वापस अपनी दुनिया में जाना है कि नहीं।"

"जाना है।"

“तुम सबका भला हो जो मुझे और महाकाली को कैद से आजाद किया।” तभी जथूरा कह उठा।

उसी पल महाकाली ने आंखें बंद करके अपने दोनों हाथ छत की तरफ उठाकर, होंठों ही होंठों में मंत्र बड़बड़ाने लगी। इस दौरान कई बार उसने पांव भी पटका। चंद मिनट बाद महाकाली ने आंखें खोली तो सामने किसी को भी न पाया।

“वो सब धुआं बनकर गुम हो गए महाकाली।" जथूरा ने कहा।

“अब वो अपनी दुनिया में पहुंच गए होंगे।” महाकाली मुस्कराई।

"हम अब दोस्त बन गए हैं महाकाली। पचास बरसों से हम बातें करते रहे हैं सुख-दुख की।” जथूरा बोला।

महाकाली मुस्करा रही थी।

"ऐसी बात है तो तुम मुझे क्यों कहती थी कि मैं तुम्हारे साथ, तुम्हारे कामों में हाथ बंटाऊ?" पूछा तवेरा ने।

- “जरूरी था ऐसा कहना। मैं जानती थी कि तू मेरी ये बात कभी नहीं मानेगी। ऐसा कहकर मैं ये भ्रम बनाए रखना चाहती थी कि

.

जथूरा मेरी कैद में है और मैं आजाद हूं। मैं नहीं चाहती थी कि कोई जाने कि मैं भी कैद में हूं और इस बात का फायदा मेरा कोई दुश्मन उठाए और अपनी मनमानी करने लगे।”

"सच में, तुमने भी पचास बरसों में बहुत तकलीफें सहीं।" महाकाली मुस्कराकर बोली। “अब मैं खुश हूं कि देवा-मिन्नो की मेहरबानी से मैं आजाद हो सकी।"

“आओ महाकाली।” जथूरा बोला—“बाहर, आसमान देखें। पचास बरसों से जैसे मैं दुनिया ही भूल गया हूं।"

देवराज चौहान, मोना चौधरी, जगमोहन, सोहनलाल, नानिया, महाजन, पारसनाथ, नगीना, बांकेलाल राठौर, रुस्तम राव, कमला रानी, मखानी, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा ने खुद को मुम्बई के समुद्र तट के किनारे पर खड़े पाया। सबने अभी भी हाथ थाम रखे थे। शाम हो रही थी। सूर्य की तेज किरणें, पानी को चमका रही थीं, जिससे आंखें चौंधियाई जा रही थीं।

उन्होंने एक-दूसरे के थाम रखे हाथ छोड़े। वापस अपनी दुनिया में आया पाकर सबने राहत की सांस ली।

"आ गए वापस।” नगीना कह उठी।

“वापसी कितनी आसान रही।” सोहनलाल ने कहा।

"ये तुम्हारी दुनिया है सोहनलाल?" नानिया ने दूर बनी इमारतों पर नजरें दौड़ाते कहा।

"हां।"

“यहां तो कितने बड़े-बड़े घर हैं।” ।

"वो एक घर नहीं है। वहां पर हजारों लोग रहते हैं।” सोहनलाल ने बताया।

"हजारों लोग एक साथ रहते हैं?" नानिया आश्चर्य से बोली।

"एक साथ नहीं। सब अपने-अपने फ्लैट में रहते हैं। जो इतनी बड़ी इमारत देख रही हो, उसके भीतर छोटे-छोटे घर हैं।" ___

“ओह, अभी इस दुनिया की बातें मेरी समझ से बाहर हैं।

धीरे-धीरे समझंगी।"

“तुम्हें मैं समझा दूंगी।” नगीना ने प्यार से कहा।
 
नानिया ने देवराज चौहान से कहा।

"बड़े भैया, तुमने वादा किया था कि इस दुनिया में पहुंचकर, तुम मेरी शादी सोहनलाल से कराओगे।"

“मैं अपने वादे पर कायम हूं।” मुस्कराया देवराज चौहान।

"कायम क्या, ब्याह करा दो। देर किस बात की?" सोहनलाल ने आगे बढ़कर नानिया का हाथ पकड़ लिया। नानिया ने प्यार से उसे देखा।

"हम एक-दो दिन में शादी कर लेंगे। चलो तुम्हें अपना घर दिखाता हूं।"

"कहां है?"

"मेरे साथ आओ, पता चल जाएगा।"

"चलो-चलो, मैं अपना घर देखूगी। तुम्हारा घर मेरा ही तो हुआ अब।" इसके बाद नानिया ने बुरा-सा मुंह बनाकर जगमोहन को देखा फिर कह उठी—“तुम आना कभी मेरे घर । मेहमान बनकर।"

जगमोहन ने गहरी सांस लेकर मुंह फेर लिया।

“उसकी छोड़ो। उसे बुलाने की जरूरत नहीं। वो बिन बुलाए ही आ जाता है।" सोहनलाल बोला।

“अब ये सब नहीं चलेगा। अब तुम्हारे घर में औरत भी रहती है। इसे समझा दो कि कभी-कभी ही आए।”

"चलो भी।” सोहनलाल नानिया का हाथ पकड़े वहां से दूर होता चला गया।

नगीना देवराज चौहान के पास आकर बोली। "हम भी चलें?”

देवराज चौहान ने सहमति से सिर हिला दिया। नगीना ने मोना चौधरी को देखा, जो कि उसे ही देख रही थी।

“तुम जरा गुस्सा कम किया करो। जब भी देखो तुम देवराज चौहान से झगड़ा मोल लेने में लगी रहती हो। जब-जब भी ऐसा होगा तुम मुझे अपने सामने पाओगी।" नगीना ने कहा।

जवाब में मोना चौधरी मुस्करा पड़ी।

"चल जगमोहन।" नगीना बोली।

देवराज चौहान ने मोना चौधरी को देखा। दोनों की नजरें मिलीं। देवराज चौहान, नगीना और जगमोहन वहां से आगे बढ़ गए।

"हमें भी चलना चाहिए बेबी। एयरपोर्ट चलते हैं, वहां से दिल्ली की फ्लाईट लेंगे।" ____

“चलो।” मोना चौधरी बोली—“इस काम में खामखाह ही उलझ गए। ये अच्छा रहा कि महाकाली की अपनी दिलचस्पी थी कि हम कैद में पड़े जथूरा तक पहुंच जाएं। क्योंकि ऐसा होने पर महाकाली भी आजाद हो गई। अगर महाकाली की अपनी दिलचस्पी न होती तो उसने अपनी शक्तियों से हम सब को खत्म कर देना था।"

“जो भी हुआ, ठीक-ठाक वापस आ गए।” पारसनाथ बोला—“वरना पूर्वजन्म में तो खतरे भरे पड़े हैं।" ___

“चलो।” महाजन ने कहा और मोना चौधरी, पारसनाथ के साथ वहां से चल पड़े।

बांकेलाल राठौर और रुस्तम राव की नजरें मिलीं।

"बाप, अब आपुन का भी इधर कोई काम नेई होईला।"

“छोरे सोहनलाल किस्मतो वालो रहो। छोरी का साथो में ला आयो हो।” कहकर बांके ने गहरी सांस ली।

"बाप तुम्हारी मूंछे सलामत होईला न?" बांके ने फौरन मूंछों को छुआ।

“ठीको है। एकदमो कड़को।"

"तो छोरी की फिक्र क्यों करेला। आज नेई तो कल तो पक्का मिलेला।"

"म्हारी किस्मतो का तो बैंड बजो हो।"

"चल बाप।" बांके और रुस्तम भी चले गए।

मखानी और कमला रानी ने मुस्कराकर एक-दूसरे को देखा।

"कमला रानी हम अपनी दुनिया में आ गए।” मखानी बहुत खुश था—“यहां हम अपनी मजी से जी सकेंगे।" *

“ये तो कितनी अच्छी बात है मखानी।” कमला रानी बोली-“मुच्छड़ गुलाब जामुन खाना भूल गया।"

“गुलाब-जामुन?" “

मैंने मुच्छड़ से वादा किया था कि उसे गुलाब जामुन खिलाऊंगी। लेकिन वो भूल गया।”

“अच्छा हुआ।"

"अच्छा नहीं हआ।" कमला रानी ने मुंह बनाया—“गुलाब-जामुन के बदले उसने रस-मलाई खिलाने का वादा किया था।” ।

"वो तेरे को मैं खिला दूंगा।"

"तेरी रस-मलाई तो खाती ही रहती हूं, एक बार उसकी..."

"मैंने कब खिलाई तेरे को रस-मलाई?" मखानी एकाएक कह उठा।

कमला रानी ने मखानी को देखा फिर संभलकर कह उठी।

"नहीं खिलाई तो अब खिला देना। चल यहां से। कहीं पर रहने का ठौर ठिकाना भी ढूंढ़ना है। जीवन नए सिरे से शुरू करना है। तेरे को काम-धंधा भी करना पड़ेगा और... "

"कमला रानी।" मखानी ने प्यार से कहा।

.

“क्या है?" कमला रानी ने उसे देखा।

"सिर्फ एक बार, मना मत करना, बहुत मन है।"

“यहां?

"उधर चलते हैं। वहां कोई नहीं है। देख, मना मत करना। बहुत मन है।"

"रोता क्यों है, चल, तू भी क्या याद करेगा।" कमला रानी और मखानी हाथ थामे उस तरफ चले गए।

“लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा की नजरें मिलीं।

“सपन।” लक्ष्मण दास ने गहरी सांस ली—“यार विश्वास नहीं आ रहा कि हम अपनी दुनिया में वापस आ पहुंचे हैं।" ___

“मुझे अब थोड़ा-थोड़ा भरोसा होने लगा है।” सपन चड्ढा की आवाज में राहत के भाव थे।

“उस कमीने, उल्लू के पट्टे, हरामी मोमो जिन्न ने तो हमें पागल बना दिया था। लक्ष्मण दास बोला।

“बहुत रंग दिखाए उस मक्कार जिन्न ने। हमें कैसा कैसा वक्त नहीं देखना पड़ा।"

"कहता था हमें नंगा करके...।"

“याद मत दिला। वो वक्त याद करके दिल कांप उठता है। वो हमारा बहुत बुरा वक्त था।” ।

तभी लक्ष्मण दास को लगा पीछे कोई खड़ा है। वो फौरन घूमा। अगले ही पल उसकी सांसें जैसे थम-सी गईं। पीछे मोमो जिन्न खड़ा था। __

"स-स-पन।" लक्ष्मण दास के होंठों से घरघराता स्वर निकला—“म...मोमो जिन्न।"

सपन चड्ढा फौरन पलटा। मोमो जिन्न को देखते ही हड़बड़ा उठा और उसके होंठों से निकला

“जथूरा महान है। उस जैसा दूसरा कोई नहीं । मोमो जिन्न मुस्कराया और कह उठा। “तुम लोगों के पीछे-पीछे मुझे आना पड़ा।"

“अ...अच्छा किया।” लक्ष्मण दास लटके स्वर में बोला—“हम तुम्हें ही याद कर रहे थे।" –

"मैं तो तुम लोगों का धन्यवाद करने आया हूं। मेरे से तुम दोनों को कोई कष्ट हुआ हो तो माफी चाहता हूं।"

“माफी?" लक्ष्मण दास के होंठों से निकला।

“तुम दोनों ने मेरी बहुत सहायता की। उसका मैं आभारी हूं।" मोमो जिन्न बराबर मुस्करा रहा था।

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा की नजरें मिलीं।

“ये...ये कौन-सी भाषा बोल रहा है।" लक्ष्मण दास के होंठों से निकला।

“पता नहीं। अब तो ये पूरा पागल हो गया लगता है। ये हमसे इतने प्यार से तो नहीं बोलता था।"

मोमो जिन्न मुस्कराते हुए पुनः कह उठा।

"अब मुझे वापस जाना है। बहुत काम करने हैं मैंने अभी। जथूरा अपनी नगरी में पहुंचने वाला है। वहां मैंने खबर कर दी है। वो जथूरा के स्वागत की तैयारियां करने में व्यस्त है।" ____

“वहां...वहां हमारी जरूरत तो नहीं?" लक्ष्मण दास फंसे स्वर में कह उठा। __

“नहीं। तुम दोनों अब आजाद हो। मैं तुमसे फिर कभी नहीं मिलंगा।" मोमो जिन्न ने मुस्कराकर कहा अगले ही पल वो उनके देखते ही देखते धुआं बनकर इस तरह हवा में घुल गया, जैसे वहां कोई था ही नहीं। गायब हो गया था मोमो जिन्न।।

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा की नजरें मिलीं। दोनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं।

“सपन।" लक्ष्मण दास ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। "ह...हां।"

“व...वो गया?"

“पता नहीं, य...यहीं कहीं होगा।” सपन चड्ढा व्याकुल-सा आसपास नजरें दौड़ाता कह उठा।। ___

“वो चला गया है।" लक्ष्मण दास एकाएक चीखा—“भाग ले। वो पागल है। फिर आ गया तो हमारे लिए मुसीबतें खड़ी हो जाएंगी।"

अगले ही पल लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा बदहवास से वहां से भागते चले गए।

समाप्त
 
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