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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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सोहनलाल ने जगमोहन से कहा।

“त किस सोच में है।"

"महाकाली के बारे में सोच रहा हूं।" जगमोहन ने सोहनलाल को देखा।

"क्या?"

“महाकाली ने खासतौर से हमारा ध्यान बुत की आंखों की तरफ क्यों करवाया?" ___

“वो तो उसने यूं ही...।" __

_“नहीं, यूं ही नहीं, अवश्य कोई खास बात है। मुझे तो लगता है कि वो आई ही इसी वास्ते थी, हमारा ध्यान बुत की आंखों की तरफ करवाने के लिए। इसके अलावा उसने कोई खास बात नहीं की और चली गई।"

सोहनलाल की निगाह जगमोहन के चेहरे पर टिक गई।

"सोहनलाल।" नानिया बोली-“तूने पहले नहीं बताया कि तेरा दोस्त वहम भी करता है।"

“चुप कर।"

“क्या?" नानिया ने सोहनलाल को देखा— “तूने मुझे डांटा।"

“डांटा नहीं, प्यार से कह रहा हूं कि थोड़ी देर के लिए चुप हो जा।” सोहनलाल बोला।

“अच्छा चुप। चुप हो जाती हूं।"

“कोई तो बात है।” जगमोहन ने पुनः सोच में डूबे कहा।

"हमें अपना ध्यान जथूरा की तलाश में लगाना चाहिए।" सोहनलाल बोला—“उसे ढूंढ़ते हैं।"

…………………………..

देवराज चौहान, नगीना, मोना चौधरी, बांके, रुस्तम, पारसनाथ, महाजन, मखानी, कमला रानी, तवेरा व रातुला पहाड़ से नीचे आ गए थे। सब थके-हारे और बुरे हाल में थे। गहरा अंधेरा था हर तरफ। दिन का उजाला फैलने में थोड़ा ही वक्त था। आसमान पर उजाले की सफेदी बिछनी शुरू हो गई थी। ___

“मेरी तो ना बोल गई।” महाजन बोला—“थकान से बुरा हाल हो गया है।" _

“हमें कुछ देर आराम कर लेना चाहिए। सबको नींद की जरूरत है।" नगीना कह उठी। ___

“म्हारे को भी आरामो की जरूरत होवे।"

पहाड़ के सामने उन्हें जंगल जैसी जगह दिखाई दे रही थी। पेड़ों के काले साये खड़े दिख रहे थे।

वे सब जंगल में प्रवेश कर गए। आगे जाकर मुनासिब जगह देखकर उन्होंने डेरा डाला। "जरूरत हो तो मैं रोशनी कर देती हूं।” तवेरा बोली।

“नहीं। ऐसे ही ठीक है। अंधेरे में कुछ देर नींद लेंगे। कुछ देर में दिन भी निकलने ही वाला है।"

फिर वे सब नींद लेने की चेष्टा करने लगे।

मध्यम-सी ठंडी हवा चल रही थी। वे थके हुए थे। फौरन ही नींद में डूबते चले गए।

परंतु मखानी को चैन कहां। मखानी सरकता हुआ कमला रानी के पास पहुंच गया। "ऐ कमला रानी।"

"मैं तेरा ही इंतजार कर रही थी।” कमला रानी बोली।

“मेरा इंतजार?" मखानी खिल उठा।

“हां। क्योंकि मुझे पता था कि तेरे में जो कीड़ा है वो हिलेगा और... "

“कीड़ा नहीं अंडा।"

“एक ही बात है। मैं हिलने वाली चीज की बात कर रही हूं कि तब तू मेरे पास अवश्य आएगा।"

"मुझे नहीं पता था कि तू मेरा इंतजार भी करती है।"

“इसलिए कि तू मेरी नींद न खराब करे।”

"तो चलें।"

"कहां?"

"अंडे का आमलेट बनाने ।”

"बहुत आग है मेरे में। मिनट में ही तेरे अंडे को आमलेट में बदल दूंगी, आ।"

“यहीं?"

"हां, यहां क्या है?"

"बाकी सब पास में हैं। शोर सुनकर वो जान जाएंगे कि हम आमलेट बना रहे हैं।"

“वो आमलेट नहीं बनाते क्या?"

“समझा कर, जरा साइड में आ जा। तसल्ली से सारा काम निबटा लेंगे।"

"चल मखानी। तेरी ये बात भी मानी।” कमला रानी उठ खड़ी हुई।

"चार बार आमलेट बनाएंगे।"

“पागल है क्या। एक बार ही बहत है।"

"इतने में मेरी तसल्ली नहीं होती। मना मत कर। कभी-कभी तो तू हाथ के नीचे आती है। चार बार।"

"नहीं।"

“मान जा मेरी जान।"

"दो बार।"

"अच्छा तीन। अब मना मत करना।"

“तू चल तो सही। एक ही बार में अंडे को चूर-चूर न कर दिया तो कहना।”

मखानी और कमला रानी पास के अंधेरे में गुम हो गए।
 
बांकेलाल राठौर ने पास में लेटे रुस्तम राव का कंधा हिलाकर कहा।

“छोरे। सुनो मेरी बातो।"

"नींद लेने दे बाप।”

"म्हारे को पैले ही शक था।" बांकेलाल राठौर धीमे स्वर में कह उठा।

“क्या बाप?"

“बलात्कारो हुओ ही हुओ।"

"किसका?"

"कमला रानी का। वो दोनों अंधेरों में खिसक गयो हो।”

“वो बलात्कार नहीं बाप। रजामंदी का सौदा होईला। सोने का है अब।"

“म्हारे को मौको न मिल्लो हो।"

“तुम उधर पैले से ही देखेला बाप।"

"म्हारे को शको हौवे कि मखानो गड़बड़ो करो ही करो।"

"तेरी मूंछों का, कमला रानी पर कोई असर नेई होईला बाप। वो मखानी की दीवानी होईला।” __

"म्हारे में कोई कमी तो न होवो छोरे।"

“वो उधर चने खाईला और तू इधर चने गिनेला बाप। सो जा अब।"

"म्हारे दिलो पे छुरो चलो हो।"

“मखानी तो उधर बोत कुछ चलाईला बाप।"

"तंम म्हारे को आग लगायो हो।"

“नेई बाप मलहम लगाईला।"

"म्हारो किस्मतो में तो कांटे ही लिखो हो। किधर भी मामलो फिटो न होवे।"

“कोशिश करता रह बाप।" ___

“अंम तो करो हो। पर कमलो रानी म्हारे पे कोशिशो न करो हो।"

"कभी तो दिन बदलेईला बाप। लगा रह।"

“म्हारो किस्मतो पर तो झाडू फिर गयो हो।” बांकेलाल राठौर ने कहकर गहरी सांस ली।

देवराज चौहान की आंख खुली।

सूर्य निकल आया था। पेड़ों से छनकर धूप उन तक पहुंच रही थी। उसने अंदाज लगाया कि करीब चार घंटे की नींद ली होगी। परंतु थकान अभी भी शरीर में कूट-कूट कर भरी थी। बदन दुख सा रहा था। बहरहाल इतना ही बहुत था कि सोने को चार घंटे मिल गए।

उसने सब पर निगाह मारी। सब गहरी नींद में थे।

देवराज चौहान उठा और चहलकदमी करने लगा। चेहरे पर सोचों के भाव थे।

इसी पल पारसनाथ की आख खुल गई। वो उठ बैठा।

“अब क्या करना है?" पारसनाथ ने पूछा।

"मंजिल का तो पता है, परंतु रास्ते से हम अंजान हैं।” देवराज चौहान ने कहा।

"तो?"

“जो रास्ता नजर आता है, उस पर आगे बढ़ते जाते हैं। देखते हैं कि अब क्या होता है।"

“सांभरा ने हमें सही रास्ते पर डाला है या गलत?"

“बांदा और सांभरा का, दोनों का ही कोई भरोसा नहीं, वे महाकाली के सेवक..."

“हममें एक आदमी ज्यादा है।” तभी पारसनाथ के होंठों से निकला।

"क्या?"

देवराज चौहान की निगाह सब पर गई।

आखिरकार उस पर जाकर टिक गई। जो औंधे मुंह घास पर गहरी नींद में पड़ा था।

“वो, वो हमारे साथ नहीं था।” पारसनाथ ने उसी व्यक्ति की तरफ इशारा किया।

देवराज चौहान उसकी तरफ बढ़ गया।

बातचीत की आवाज से एक-एक करके, वे सब नींद से जागने लगे।

पारसनाथ भी उठकर उसी तरफ बढ़ गया। "क्या हुआ?" मोना चौधरी ने पूछा।

"हममें एक आदमी ज्यादा है। वो जो औंधे मुंह नींद में है।" पारसनाथ ने कहा।

देवराज चौहान उसके पास जाकर ठिठका और झुककर उसे हिलाया।

वो फौरन उठ बैठा। प्रणाम सिंह था वो।

प्रणाम सिंह को यहां देखकर सब के माथों पर बल नजर आने लगे।

प्रणाम सिंह ने आंखें मलीं। चेहरे पर नींद के निशान थे। वो मुस्कराया।

"तुम यहां क्या कर रहे हो?" देवराज चौहान ने पूछा।

“सुबह यहां से निकल रहा था कि तुम लोगों को नींद में देखा तो ये सोचकर रुक गया कि इस अंजान जगह पर तुम लोगों को शायद मेरी जरूरत पड़े। कब तक इंतजार करता तुम लोगों के जागने का, आंख लग गई।"

“तुम खामखाह तो हमारे पास आए नहीं।"

“मैं कहां आया। मैं तो यहां से निकल रहा था कि... "

तभी बांकेलाल राठौर उठता हुआ बोला।

"तन्ने म्हारे को कुओं में फेंको हो। ईब अंम थारे को 'वड' दयो हो। आ छोरे।” बांके प्रणाम सिंह की तरफ बढ़ा।

“तुम उसकी गर्दन 'वडेला' बाप। आपुन गड्ढा खोदेला।”

इससे पहले बांके प्रणाम सिंह पर झपटता, देवराज चौहान ने उसे रोका।

"रुक जाओ बांके।"

"इसो ने म्हारे को कुओं में फेंको हो।

"वो बात पुरानी हो गई है अब।"

“यो म्हारे ब्याहो वकत दुल्हनो बनो के बैठो हो। यो म्हारे से ब्याह करो के भिड़ना चाहो।”

“चुप हो जाओ बांके।"

“तम म्हारे को बतायो कि वो आसमानो कपड़ो वाली किधर हौवे। उसो से ब्याह करो हो।” ।

प्रणाम सिंह ने गहरी सांस ली। "ईब का लड़ो हो थारे को?" “वो सब बांदा का कसर था।" प्रणाम सिंह ने कहा।

"तंम बाप-बेटो दोनों ही हरामो हौवे। म्हारे को खूबो बेवकूफो बनायो हो।" ___

“मैं तो बहुत शरीफ इंसान हूं।” प्रणाम सिंह मुंह लटकाकर बोला— “बांदा ही चालाकी करता है।" _

_“का चालाकी कियो हो वो थारे से?"

"मैंने जो भी किया उसी के कहने पर किया। कहता था कि मेरी बात मानकर..."

"तंम तो म्हारे से कुश्तो लड़ो हो। तंम तो...।"

“मुझे बांदा ने कहा ऐसा करने को। मेरा कोई कसूर नहीं।”

तभी बांकेलाल राठौर हड़बड़ा-सा उठा।

अन्यों की निगाह भी उस तरफ गई। उधर से बांदा आता दिखाई दिया।

“बांदा भी आईला बाप। इसे भी 'वड' देईला।"

"तंम म्हारे साथो हौवो न?"

“पक्का बाप।" देखते-ही-देखते बांदा पास आ गया।
 
"तेरी वजह से मैं बहुत बदनाम हो रहा हूं बांदा।” प्रणाम सिंह ने शिकायत-भरे स्वर में कहा।

"मैंने तो कुछ भी नहीं किया बापू।" बांदा बोला।

“तूने मुझे जो करने को कहा, मैंने किया। अब ये सब मुझे दोष दे रहे हैं।

"इनका क्या है। इनका तो जितना भी भला कर दो, ये एहसान नहीं मानते।"

देवराज चौहान मुस्कराया।

“तूने कहा इन्हें कुएं में फेंक दो। मैंने फेंक दिया। तूने कहा मैं दुल्हन बनकर..."

तभी देवराज चौहान कह उठा।।

"बस करो। इन बेकार की बातों से तुम लोग हमें बदल नहीं सकते।”

"तो क्या हम झूठे हैं?" प्रणाम सिंह बोला।

“शत-प्रतिशत।” देवराज चौहान पुनः मुस्कराया—“तुम लोग विश्वास के काबिल हो ही नहीं।”

“सुना बांदा। तूने तो मेरी पूरी इज्जत ही मिट्टी में मिला दी।"

“मैं तो आपका नाम रोशन करने की चेष्टा में था बापू।” बांदा दुखी स्वर में कह उठा_"ये तो उल्टा ही हो गया।"

' "तेरे से अच्छा तो बूंदी है।" .

“बूंदी को सब कुछ मैंने ही पढ़ाया है। वो मेरे से अच्छा कैसे हो सकता है।"

“कम-से-कम उसने मेरी इज्जत तो मिट्टी में नहीं... ।”

“बूंदी कौन है?" पारसनाथ बोला।

"मेरा छोटा बेटा है, जो कि इस वक्त जग्गू-गुलचंद के पास है।"

“जगमोहन-सोहनलाल कैसे हैं?" देवराज चौहान के होंठों से निकला।

"बहुत बढ़िया, वो तो महाकाली के किले में पहुंच चुके हैं, जहां पर जथूरा कैद है।” प्रणाम सिंह बोला।

“उन्हें जथूरा मिल गया?" नगीना ने पूछा।

“उन्हें कैसे मिलेगा। जथूरा की कैद में ताले पर तो तिलिस्म देवा और मिन्नों के नाम का बंधा है।" प्रणाम सिंह ने कहा।

“तुम हमें वहां पहुंचा सकते हो?"

“क्यों नहीं?" प्रणाम सिंह ने शराफत से कहा—“परंतु मैं ऐसा करूंगा नहीं।"

__ "क्यों?

“तुम लोग तो वहां पहुंचकर जथूरा को कैद से आजाद करा लोगे। महाकाली मुझ पर नाराज होगी कि मैंने तुम सबको वहां तक का रास्ता क्यों बताया। आखिर हूं तो मैं महाकाली का सेवक ही।"

“तुम तो कह रहे थे कि तुम हमारी सहायता करना चाहते हो।" मोना चौधरी बोली—“तभी यहां रुके।"

"ठीक तो कहा।"

"तो हमारी सहायता क्यों नहीं कर रहे?"

“कहिए क्या चाहिए आपको। खाना या... "

“हमें जथूरा तक पहुंचने का रास्ता चाहिए।"

“ये तो सम्भव नहीं।"

“बापू।” बांदा कह उठा—“तुम्हें इनकी कुछ सहायता तो करनी चाहिए।"

"चुप कर नालायक। तेरी बातों में आकर मैंने पहले ही अपनी इज्जत खराब कर ली है।"

“बापू तुम...।" बांदा ने कहना चाहा। "चला जा यहां से। दूर हो जा मेरी नजरों से।"

"बापू मेरी बात तो....।"

“जाता है या तेरे को भगाने के लिए मंत्र पढ़ दूं। मंत्र पढ़ा तो दस दिन के लिए तू बीमार हो जाएगा।"

बांदा ने कुछ नहीं कहा और खामोशी से एक तरफ चला गया। देखते ही देखते बांदा सबकी निगाहों से ओझल हो गया। प्रणाम सिंह ने मुस्कराकर सबको देखा।

अब सबकी निगाह प्रणाम सिंह पर टिक चुकी थी।
 
“मेरी बात मानो तो।" प्रणाम सिंह ने मुस्कराकर कहा—“उस रास्ते पर चले जाओ। उधर उत्तर दिशा है।”

“वहां क्या है?"

“वहां जाने पर, तुम लोगों की समस्या का कोई हल निकल सकता है।"

“समस्या यानी कि जथूरा?" महाजन बोला।

“हां, वो ही। इस वक्त तो तुम लोगों की समस्या जथूरा ही है।"

"तंम म्हारे साथो खेल खेलो हो।”

"वो कैसे?"

“तम म्हारे को जथूरो के बारो में क्यों बतायो। नेई बतायो तंम।" प्रणाम सिंह मुस्कराता रहा।

"तंम महाकालो की बातो मानो हो, म्हारे को गलत रास्ता दिखावो हो।”

"उत्तर दिशा में चले जाओ। वहां महाकाली मिलेगी।"

“महाकाली मिलेगी?” देवराज चौहान के होंठों से निकला। प्रणाम सिंह पलटा और एक दिशा में चल पड़ा।

"सुनो तो।” नगीना ने पुकारा। परंतु प्रणाम सिंह नहीं रुका।

"म्हारे को नखरो दिखावे हो।" । प्रणाम सिंह निगाहों से ओझल हो गया। तभी रातुला कह उठा

"वो पहाड़ गायब हो गया। उसकी जगह पर पानी बह रहा है।"

सबकी नजरें पहाड़ की दिशा की तरफ उठीं।

पहाड़ का नामोनिशान नहीं था। वहां तेज रफ्तार से पानी बहता दिखाई दे रहा था।

“सांभरो ठीको बोल्लो हो कि रातो के बादो पहाड़ो गायब हो जावो।" ___

“ये महाकाली की मायावी दुनिया है।” तवेरा बोली—“यहां कुछ भी हो जाना सम्भव है।"

मखानी और कमला रानी की नजरें मिलीं। मखानी मुस्कराया तो कमला रानी भी मुस्कराई। मखानी कमला रानी के पास खिसक आया। “अंडा फिर तैयार हो गया है।” मखानी ने कान में कहा।

"हाथ से फोड़ ले। खुद ही आमलेट बना ले।” कमला रानी ने दोनों बांहें उठाकर अंगड़ाई ली।

“मजाक करती है।” मखानी ने दांत फाड़े—“रात तीन बार तूने अंडे का आमलेट बनाया। कैसा लगा?"

"बढ़िया। तू कमाल का है।"

"लेकिन मेरा पेट अभी तक नहीं भरा।"

"तेरा क्या है, तेरा अंडा तो...।"

“मेरा कहां, उस पर तो तेरा नाम लिखा है। वो तेरा ही अंडा है।"

"बातें करना तो कोई तेरे से सीखे।"

“पहला मौका मिलते ही आ जाना। एक बार फिर आमलेट बनाना।"

"नहीं। "दिल मत तोड़।”

“चुप कर। हर वक्त अंडा लिए घूमता रहता है।” कमला रानी ने मुंह बनाकर कहा।

मखानी का चेहरा लटक गया। उधर मोना चौधरी कह उठी। “प्रणाम सिंह की बात का हमें जरा भी भरोसा नहीं करना चाहिए। वो हमें भटकाना चाहेगा।" ___

“भटके तो हम तब, जब हम सही रास्ते पर जा रहे हों। रास्ता तो हमें भी नहीं मालूम।” महाजन ने कहा।

“कम-से-कम हमें प्रणाम सिंह की बताई दिशा में नहीं जाना चाहिए।" मोना चौधरी ने पुनः कहा।

“क्या फर्क पड़ेला बाप । उत्तर दिशा हो या पश्चिम-दक्षिण हो। किसी तरफ तो बढ़ेला ही।”

तवेरा कह उठी। "हमें उत्तर की तरफ ही बढ़ना चाहिए।"

"क्यों?" देवराज चौहान ने उसे देखा।

"मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा।" तवेरा ने गम्भीर स्वर में कहा-“महाकाली हमारे रास्ते में ऐसी-ऐसी परेशानियां डाल सकती थी कि हम दस कदम भी न उठा पाते और जान गंवा बैठते। परंतु उसने ऐसा कुछ नहीं किया।”

"तुम कहना क्या चाहती हो?" ___ "मैं खुद भी हालातों को ठीक से नहीं समझ पा रही। परंतु हम उत्तर दिशा की तरफ ही जाएंगे। देखें तो सही कि महाकाली ने उस दिशा में हमारे लिए क्या तैयार कर रखा है। अभी तक महाकाली की तरफ से हमें नुकसान नहीं पहुंचा तो शायद आगे भी नहीं पहुंचेगा।"
 
देवराज चौहान ने मोना चौधरी की तरफ देखा। मोना चौधरी खामोश रही परंतु नगीना कह उठी। "ठीक है। हम उत्तर दिशा की तरफ ही जाएंगे।"

"हमने काफी आराम कर लिया।” तवेरा बोली-“अब हमें चल देना चाहिए।"

उसके बाद वे सब चल पड़े।

हरे-भरे पेड़ों से घिरा, जंगल जैसा इलाका था, परंतु रास्ता साफ था।

वे अभी कुछ ही आगे बढ़े कि सामने बांदा खड़ा दिखाई दिया। _"इससे बात करने की जरूरत नहीं है।" मोना चौधरी बोली—“ये खामखाह हमारा दिमाग खराब करेगा।"

वे बांदा के पास रुके नहीं। आगे बढ़ते चले गए। बांदा उनके साथ चलता कह उठा।

"मेरे से तुम लोग नाराज क्यों हो जाते हो। मैं तो तुम सबके भले के लिए ही हूं।" ___

"तंम म्हारे पासो आ जायो।" बांकेलाल राठौर बोला—“थारी-म्हारी बातो जमो हो।”

बांदा फौरन बांके पास पहुंचा और साथ चलते कह उठा। “तुम अच्छे इंसान हो भंवर सिंह।"

“और तंम महा हरामो हो। कमीनो हो। म्हारे को रास्तो से भटकावो हो।"

“मैं तो तुम लोगों को काम की बात बताने आया था।” बांदा जल्दी से बोला—“मैं जानता हूं कि प्रणाम सिंह, यानी कि मेरा बापू तुम लोगों को उत्तर दिशा में ही भेजेगा, वो....।" । -

"उत्तरो दिशाओ में लंगरो लागे हो। थारा बापू बोल्लो हो।" बांकेलाल राठौर ने तीखे स्वर में कहा।

“मेरी बात तो सुन लो।"

"बोल्लो, ईबो तको अंम थारी ही सुन्नो हो।"

“उत्तर दिशा में खतरा है तुम लोगों के लिए। बापू तुम सबकी जान ले लेना चाहता है।”

"औरो थारे को म्हारी बोत चिंतो हौवे।"

"हां, तभी तो मैं...।"

"म्हारे को ईक बात बतायो।”

"क्या?"

“वो आसमानो कपड़ो वाली छोरी किधरो रहो हो। उसो का घरो किधरो हौवे।"

"क्यों?"

"अंम ब्याह करो हो उसो से।"

“मैं तुम्हें खतरे से आगाह कर रहा हूं और तुम लड़की की बातें... ___

“पैले म्हारे जीवनो में छोरी आयो। फिरो खतरो आवो। बिना छोरी के खतरो किधरो से आवो हो?"

बांदा तेजी से चलता मोना चौधरी के पास जा पहुंचा।

“तुम मेरी बात का भरोसा करो। उत्तर दिशा में तुम लोगों के लिए खतरा है। मेरी बात मान लो।"

__ “तुम जैसे झूठे की बात मैं नहीं मान सकती।"

“पहली बार तो मैं सच कह रहा हूं।" बांदा के स्वर में आग्रह के भाव थे। ___

“हम उत्तर में इसलिए नहीं जा रहे कि तेरे बाप ने हमें इधर जाने को कहा। हमें कहीं तो जाना है, इसलिए हम जा रहे हैं।"

“मेरा विश्वास क्यों नहीं करते।" बांदा उखड़े स्वर में बोला। किसी ने बांदा की बात का जवाब नहीं दिया।

वे सब तेजी से आगे बढ़े जा रहे थे।

बांदा ठिठक गया। पीछे रह गया। फिर नजरों से ओझल हो गया। वे सब आगे बढ़ते रहे।

चलते-चलते दोपहर होने लगी थी। सूर्य सिर पर चढ़ आया था। अब गर्मी के साथ-साथ थकान भी उन्हें महसूस होने लगी। एकाएक उन्हें महसूस हुआ कि जिस रास्ते पर वे चल रहे हैं, वो ढलवा होने लगा है। ढलानी रास्ता होने की वजह से उनके कदम खुद-ब-खुद ही आगे को उठने लगे थे। तभी मोना चौधरी ने कहा।

"शायद ये रास्ता कहीं खत्म होने वाला है। क्योंकि ये ढलवा होता जा रहा है।"

“अम्भी पतो चल जावे।"

रास्ते पर उनके कदम खुद-ब-खुद ही उठे जा रहे थे।

बांकेलाल राठौर तेजी से चलता हुआ, कमला रानी के पास आ पहुंचा।
 
कमला रानी ने बांके को देखा तो मुस्करा पड़ी। बांकेलाल राठौर का हाथ मंछ पर पहंच गया और बोला।

"म्हारे को देखो के मुस्करायो औरों गुलाब-जामनो मखानो को खिलायो।”

“गुलाब जामुन?” कमला रानी बोली—“यहां गुलाब जामुन कहां है जो मैं मखानी को खिलाऊं।"

बांके का हाथ पूनः मूंछ पर जा पहुंचा। “अंम रातो को सबो कुछ देखो हो।"

“ओह।” कमला रानी मुस्कराई—“तो उसे तुम गुलाब जामुन कह रहे हो।"

“अंम शरीफो बंदो हौवे । गुलाब जामुनो ही बोल्लो हो।"

कमला रानी हंसकर बोली। “तुमने भी गुलाब-जामुन खाना है?"

"अंम तो कबो से बोल्लो हो, गुलाब जामुन खाणो वास्ते।"

“ठीक है तुम्हें भी खिला दूंगी।"

"कबो?"

"जल्दी ही।"

“वादो?"

“वादा।”

बांकेलाल राठौर का चेहरा खिल उठा।

“तंम म्हारे को गुलाब जामुनो खिलायो अंम थारे को रसमलाईयो खिलायो।"

“रसमलाई कहां है?"

“वो थारे को मौको परो ही बतायो।” कहकर बांकेलाल राठौर आगे बढ़ गया।

सब तेजी से ढलान पर नीचे को तेजी से चलते जा रहे थे। मखानी फौरन पास आ पहुंचा। “वो मुच्छड़ तेरे को क्या कह रहा था?" मखानी ने पूछा।

"यूं ही बात कर रहा था।"

“क्या बात?"

“कह रहा था मैं उसे गुलाब जामुन खिलाऊं।"

"ये ही बात की। कोई और तो बात नहीं की?" शंकित से मखानी ने पूछा।

"तेरी कसम मखानी। ये ही बात की। पर तू उससे चिढ़ता क्यों है?"

“वो मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता।” मखानी ने नाराजगी से कहा।

"क्यों?"

“वो तेरे से बात करने के चक्कर में रहता है। तेरे को ताड़ता रहता है।"

"तू घबरा मत। उसके ताड़ने से मैं पिघलने वाली नहीं। वो सिर्फ गुलाब जामुन खाना चाहता है मेरे से। वो तो खिला दूं न?". –

“हां-हां, मैंने कब मना किया है।” मखानी मुस्कराया फिर बोला—“वो मेरा अंडा।” ____

“चुप कर।” कमला रानी झल्ला उठी—“हर समय अंडा-अंडा लगाए रहता है।"

मखानी की मुस्कान झाग की तरह गायब हो गई। चेहरा लटक गया।

एकाएक वो ढलान चौड़े रास्ते का रूप लेने लगी।

रास्ते के आसपास पेड़ों की कतार नजर आने लगी। अब रास्ते पर घास नहीं थी। वो मिट्टी से भरा साफ रास्ता था।

देवराज चौहान ऊंचे स्वर में कह उठा। "हम किसी खास जगह पहुंचने जा रहे हैं।"

“मुझे भी ऐसा लगता है।" मोना चौधरी कह उठी—“ये अब स्पष्ट तौर पर रास्ता बनता जा रहा है।"

कुछ देर वे इसी तरह ढलवा रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ते रहे, फिर उन्हें बड़ी-सी इमारत दिखाई देने लगी। रास्ता उसी तरफ जा

रहा था।

“वो महल जैसा कुछ है।” नगीना बोली।

“किला लगता है।” पारसनाथ ने कहा—“लाल पत्थरों से बना हुआ।"

' "हम कहां जा रहे हैं। वो कैसी जगह है?" महाजन ने कहा। __

“महाकाली की मायावी नगरी में हमारे साथ कुछ भी हो सकता है।" तवेरा ने कहा—“हमें सावधान रहना चाहिए।" ____

"प्रणाम सिंह हमें यहीं भेजना चाहता है।” रातुला बोला—“तभी तो उसने हमें इस दिशा में आने को कहा।” __

“कहीं यहां पर हमारे लिए खतरा न हो।" तवेरा ने गम्भीर स्वर में कहा—“महाकाली जाने क्या खेल खेल रही है।"

कुछ ही देर में वो रास्ता उस किले पर पहुंचकर खत्म हो गया। वे सब किले के प्रवेश द्वार पर आ पहुंचे थे। ठिठक गए थे।

"ये कैसा किला है। सुनसान लगता है। लगता है जैसे बरसों से इसकी सफाई न हुई हो।"

किले का लोहे का गेट भी जाम जैसा लग रहा था। परंतु वो थोड़ा-सा, इतना खुला हुआ था कि एक आदमी सरककर भीतर जा सके। एक-एक करके सब भीतर प्रवेश कर गए।

भीतर सूखे-हरे पेड़ थे। नीचे हर तरफ सूखे-पत्ते बिखरे हुए थे। असीम शांति थी वहां। हवा इस तरह कानों के पास से निकल रही थी कि जैसे सरसराहट-सी गूंज रही हो। उनमें से कोई आगे बढ़ता तो सूखा पत्ता जूते के नीचे आकर चरमरा उठता। पत्ते के चरमराने की आवाज, किसी नगाड़े जैसी प्रतीत होती थी।

सबकी निगाहें सब तरफ जा रही थीं। परंतु कोई नजर न आया था। “किसका किला है ये?" महाजन बोला। "भीतर चलो।” मोना चौधरी ने कहा और आगे बढ़ गई।

सब चल पड़े।

पत्तों के चरमराने की आवाजें फिर सुनाई देने लगीं। ऐसी भयावह खामोशी में जरा-सी आवाज भी बहुत लग रही थी।

काफी खुली जगह पार करके वे किले के मुख्य द्वार पर जा पहुंचे।

वहां लकड़ी का बीस फुट चौड़ा और बीस फुट ऊंचा ही दरवाजा था। दरवाजे पर सोने की नक्काशी की गई थी। बेल-बूटियां बनी हुई थीं।

बीच-बीच में जरूरत के हिसाब से रंग-बिरंगे हीरे भी जड़े थे। दरवाजे के दोनों हैंडिल सोने और हीरे की नक्काशी से जड़े थे। दरवाजे की खूबसूरती देखते ही बनती थी।

"लगता है इस किले का निर्माण, बनाने वाले ने मन से किया है।” नगीना कह उठी।

परंतु दरवाजे के पल्लों पर धूल थी।
 
मोना चौधरी ने दरवाजे को हाथ से धकेलना चाहा। परंतु वो हिला तक नहीं।

"काफी लम्बे वक्त से दरवाजे को खोला नहीं गया। जाम हो गया लगता है।" मोना चौधरी ने कहा।

देवराज चौहान आगे बढ़ा और दरवाजे को धकेला। मोना चौधरी ने भी जोर लगाया।

थोड़ा-थोड़ा करके दरवाजा इतना खुल गया कि भीतर सरका जा सके।

“यो किलो किसको हौवे छोरे?"

“आपुन को उतना ही मालूम होईला, जितना तेरे को पता होईला बाप।" __

तभी बांके की निगाह कमला रानी पर पड़ी, जो उसे देख रही थी।

बांके का हाथ अपनी मूंछ पर पहुंच गया। कमला रानी ने मुस्कराकर मुंह फेर लिया। “अपणो गुलाब जामुनो तो पक्को हो गयो।"

"क्या बोला बाप?"

“थारे कामो की बातो न होवे।”

फिर सब एक-एक करके दरवाजों के पल्लों से सरककर भीतर प्रवेश कर गए। __हर तरफ धूल ही धूल थी। जाले लगे हुए थे। फर्श पर धूल की मोटी परत थी।

“यहां लम्बे वक्त से कोई नहीं आया।” तवेरा बोली।।

उन्होंने खुद को खुली जगह में पाया, जहां से अलग-अलग दिशाओं की तरफ आठ राहदारियां जा रही थीं। भीतर, बाहर से

रोशनी पहुंच रही थी। रहस्यमय वातावरण था यहां का।

"हम यहां पर क्यों आए हैं?" महाजन कह उठा।

"ये तो हम भी नहीं जानते।" देवराज चौहान ने कहा।

“किला म्हारे रास्ते में पड़ा तो हम भीतर आ गए।” मोना चौधरी बोली। ___

“यो म्हारे रास्ते में न पड़ो हो, वो रास्तो म्हारे को इधर खींचो लायो हो।"

सोचों में डूबी नगीना कह उठी।

“हमारे सामने आठ रास्ते हैं। ऐसे में हमें किस तरफ जाना चाहिए?" ___

“हम सब एक साथ एक ही रास्ते पर जाएंगे।” देवराज चौहान ने कहा।

“किस रास्ते पर?” मोना चौधरी बोली—“हमें नहीं मालूम कि कौन-सा रास्ता किस तरफ जाता है।"

तभी उनके कानों में मध्यम-सी आहट पड़ी। वे चौंके। एक-दूसरे से नजरें मिलीं। फिर उनकी निगाहें उन आठों रास्तों पर जाने लगीं। हर तरफ शांति और गहरी खामोशी छाई हुई थी।

"ये आवाज किसी रास्ते से आई है।" मोना चौधरी ने धीमे स्वर में कहा।

"किस रास्ते से?" नगीना कह उठी।

“ये अंदाजा नहीं हो सका।” मोना चौधरी ने होंठ सिकोड़े कहा।

देवराज चौहान की निगाह हर तरफ घूम रही थी। कान पुनः आहट सुनने को बेताब थे।

“यहां हमारे अलावा भी कोई है।” महाजन ने कहा। हर कोई चुप-चुप सा था। कई पल इसी खामोशी में बीत गए।

वे इस माहौल में बोरियत महसूस करने लगे कि तभी पुनः आहट हुई। ___ चूंकि इस बार वे आहट सुनने को तैयार थे, इसलिए पता चल गया कि किस रास्ते से आवाज आई है।

“इधर आओ।” कहते हुए देवराज चौहान एक रास्ते में प्रवेश कर गया।

सब उसके पीछे हो गए। वहां उनके कदमों की मध्यम-सी आहटें गूंज रही थीं।

कुछ आगे जाने पर, उसी रास्ते में उन्हें बाईं तरफ एक रास्ता जाता दिखा।

देवराज चौहान ठिठक गया कि आगे जाए या इस रास्ते पर जाए।

पीछे से आते बाकी सब भी पास आ गए। “किधर चलेगा बाप?"

“अब हमारे सामने दो रास्ते... ।” देवराज चौहान ने कहना चाहा।

इसी पल पुनः आहट गूंजी।

आवाज नए रास्ते से आई थी, जो कि मुड़ रहा था।

देवराज चौहान ने सबको पीछे आने का इशारा किया और चल पड़ा।

कुछ आगे जाने पर दाईं तरफ एक खुला दरवाजा दिखा। देवराज चौहान ठिठका और सिर आगे करके भीतर झांका। अगले ही पल उसकी आंखें सिकुड़ गईं। लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा दिखे थे उसे। वे बातें कर रहे थे।

“अब हमें क्या मालूम कि जथूरा को महाकाली ने कहां कैद कर रखा है।" लक्ष्मण दास ने कहा।

"मोमो जिन्न तो पागल है साला तो हमें लिए घूमे जा रहा है। मेरा दिल करता है उसे जान से मार दूं।"

"चूप कर। हमारे कानों में उसने सैंसर लगा रखे हैं, वो सुन लेगा।"

“यही तो मुसीबत है कि हम बातें भी नहीं कर... "

"व...वो, देवराज चौहान।” लक्ष्मण दास के होंठों से निकला। सपन चड्ढा की नजरें घूमी। तब तक देवराज चौहान भीतर आ गया था।

"ओह देवराज चौहान तुम।” लक्ष्मण दास उसकी तरफ बढ़ता कह उठा—“तुम्हें यहां देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। आखिर तुम भी यहां आ गए। कुछ तो आस बंधी कि, शायद हमें मोमो जिन्न से छुटकारा मिल जाए।”
 
"तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?" तब तक बाकी सब भी भीतर आ गए।

"ये तो बहुत सारे लोग हैं।” सपन चड्ढा बोला—“मोना चौधरी भी है।" ____

“तुम्हारे कारण ही हम मुसीबत में फंसे हैं देवराज चौहान ।” लक्ष्मण दास कह उठा—“मैं तुम्हें जानता हूं, इसी बात को लेकर मोमो जिन्न ने मुझ पर अधिकार जमा लिया कि, तुम्हारे खिलाफ मुझसे मनचाहा काम लेगा। ये सपन तो खामखाह ही मेरे संग फंस गया। हमारे द्वारा मोमो जिन्न ने तुम्हारी और मोना चौधरी की लड़ाई करानी चाही, परंतु...।"

"ये पुरानी बातें हैं।” (विस्तार से जानने के लिए पढ़िए पूर्व प्रकाशित उपन्यास 'जथूरा' ।)

“ये कौन-सी जगह है?"

“महाकाली का किला है।"

“महाकाली का किला?"

"हां । महाकाली ने जथूरा को यहीं-कहीं कैद कर रखा है। वो कमीना मोमो जिन्न कहता है कि हम जथूरा को ढूंढें। भला हम...।"

“जगमोहन भी यहां है?" देवराज चौहान ने पूछा।

“हां। वो भी जथूरा को ढूंढ़ रहा है। साथ में सोहनलाल और नानिया भी हैं।"

देवराज चौहान ने राहत की सांस ली। चेहरे पर मुस्कान उभरी। “मुझे जगमोहन के पास ले चलो।"

“चलो। वो भी यहीं किले के किसी हिस्से में, जथूरा को ढूंढ़ रहा होगा—आओ।"

देवराज चौहान और जगमोहन गले मिले। ऐसे मिले कि आंखों में आंस आ गए। जगमोहन तो अलग होने का नाम नहीं ले रहा

था। देवराज चौहान ने उसे अलग किया। __

"कभी-कभी तो मुझे लगता था जैसे हम दोबारा मिल ही नहीं पाएंगे।” जगमोहन भीगे स्वर में कहा।

“सब ठीक है।” देवराज चौहान ने भर आई आंखों को साफ किया— “हम सब ही यहां आ पहुंचे हैं।"

जगमोहन सबसे मिला। मौका पाकर बांकेलाल राठौर, सोहनलाल के पास जा पहुंचा।

“सोहनलालो। मजे में हौवो?"

“एकदम बढ़िया।” सोहनलाल मुस्कराया।

"वो तो दिखो ही हो।" बांके की निगाह नानिया की तरफ उठी—“यो छोरी थारे साथो हो क्या?" ___

“हां। मैं उससे शादी करने वाला हूं।"

“करो। करो। मन्ने का रोको हो। ये बतायो कि छोरी को पटायो कैसो। म्हारे काबू में तो कोईयो आयो नेई । बोत ट्राई करो अंम।"

"फिर बताऊंगा। फर्सत में।"

“पक्को बता दयो। अंम भी कोई छोरी तलाशो हो।"

सबसे मिलने के बाद जगमोहन बोला।

"आओ। एक साफ कमरे में बैठने का इंतजाम है। वहां चलकर बातें करेंगे।"

सब चल पड़े। नानिया सोहनलाल से, देवराज चौहान की तरफ इशारा करके बोली।

“ये कौन है, जगमोहन जिसके गले मिला?"

“बड़ा भाई है। देवराज चौहान।"

"ओह, तो ये है देवराज चौहान । तुम्हारा क्या लगा?”

"दोस्त और बड़ा भाई।"

"मैं बात कर लूं इससे?"

"क्यों नहीं।” नानिया देवराज चौहान के पास जा पहुंची। सब एक धूल-भरी राहदारी पर आगे बढ़े जा रहे थे।

“नमस्कार भाई साहब।" नानिया ने प्रेम से हाथ जोड़कर कहा।

“नमस्कार।” देवराज चौहान मुस्कराया—“तुम नानिया हो।"

"आपने कैसे जाना?"

"बताया था किसी ने।"

“आपको पता है सोहनलाल और मैं, उसकी दुनिया में पहुंचकर शादी करने वाले हैं।" नानिया ने कहा।

“ये अब पता चला।"

“मैं सोहनलाल से शादी करूं, आपको एतराज तो नहीं?" ।

“एतराज कैसा। अगर हम ठीक-ठाक वापस पहंच गए तो तुम्हारी शादी के सारे इंतजाम मैं करूंगा। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ होगा।"

“धन्यवाद भाई साहब। आपको क्या लगता है कि हम ठीक-ठाक वापस अपनी दुनिया में नहीं पहुंच सकेंगे?"

“अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।" तभी सब ठिठके।

सामने मोमो जिन्न खड़ा था। देवराज चौहान और मोना चौधरी पर नजरें पड़ते ही वो मुस्करा पड़ा।
 
सामने मोमो जिन्न खड़ा था। देवराज चौहान और मोना चौधरी पर नजरें पड़ते ही वो मुस्करा पड़ा।

"देवा-मिन्नो को यहां देखकर मुझे कितनी खुशी हो रही है।"

“तुम मजे में हो?" देवराज चौहान मुस्कराया।

"जिन्न हमेशा मजे में रहते हैं।" मोमो जिन्न बोला।

“जथूरा का पता चला कि वो कहां है?"

“अभी तो नहीं। तुम और मिन्नो आ गए हो तो पता चलने में देर नहीं लगेगी।"

"आगे से हटो।” मोमो जिन्न एक तरफ हो गया। सब आगे बढ़ते चले गए। लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा की नजरें मोमो जिन्न से मिलीं तो दोनों ने गर्दनें अकड़ा लीं।

वे आगे निकल गए। मोमो जिन्न पीछे रहकर, उनके पीछे चल पड़ा।

बांकेलाल राठौर कुछ धीमा हुआ और मोमो जिन्न के करीब आकर बोला।

"ईक बातो म्हारे को बतायो।”

“क्या?"

"तंम, लक्ष्मणो और सपणो के साथ उसो दिन किधरो खिसक गयो थे?"

"जिन्नों से ऐसे सवाल नहीं पूछते।"

“का मतलब थारा?"

“जिन्नों का काम करने का अपना ढंग होता है। इस बारे में वे इंसानों को नहीं बताते।"

"जिन्नों का कामो प्राइवेटो हौवे?"

"हां। हमारी दुनिया तुम्हारी दुनिया से बहुत अलग है। जिन्न और इंसानों में बोत बड़ा फर्क होता है।" । __

"तंम म्हारे को जिन्न बनावो?"

“खबरदार । साधारण इंसान से जिन्न बनने का सफर बहत लम्बा और कष्ट-भरा है। मैं इस सफर को तय कर चुका हूं। जिन्न बनने की सोचना भी मत। इस सफर में ऐसे कई मौके आते हैं जब तकलीफों से घिरकर इंसान मौत मांगता है, परंतु मौत मिलती नहीं।"

“मश्किलो हौवे ।”

"बोत"

"फिरो तो अंम जिन्नो न बनो हो । इंसानो ही बेहतरो हौवे।” कहने के साथ बांकेलाल राठौर आगे बढ़ गया।

उस साफ-सुथरे कमरे में बैठकर उनकी जगमोहन और सोहललाल से सारी बातचीत हुई।

एक-दूसरे से सारे हालातों की जानकारी मिली। लम्बे समय के बाद वे सब आराम से बैठे थे। बातें हो जाने के पश्चात देवराज चौहान कह उठा।

"हमें वक्त बर्बाद करने की अपेक्षा जथूरा को ढूंढ़ना चाहिए कि यहां पर वो कहां पर कैद है।"

“तुम्हारे आने तक हम उसे ही ढूंढ़ रहे थे। अभी तक तो हमें सफलता नहीं मिली।” जगमोहन बोला।

“अब हमारी संख्या ज्यादा है। हम जथूरा को ढूंढ़ लेंगे।" सोहनलाल कह उठा।

उसके बाद वे किले में जथूरा को ढूंढने में व्यस्त हो गए। जथूरा की तलाश में वक्त बीतने लगा।

जाने कितना वक्त बीत गया। जथूरा की तलाश में बहुत वक्त बीत गया परंतु जथूरा नहीं मिला।

सारा किला छान मारा। थक-हारकर वे वापस उसी कमरे में इकठे हुए।

"हम सफल नहीं हो सके।" पारसनाथ ने कहा।

“जथूरा हमें नहीं मिलेगा।”

तवेरा बोली—“देवा-मिन्नो को ही मिलेगा।"

"क्यों?" नगीना ने उसे देखा।

“महाकाली ने जथूरा की कैद के ताले पर देवा-मिन्नों के नाम का तिलिस्म बांध रखा है। वो ही सबसे पहले जथूरा तक पहुंच सकेंगे।" .

“ओह, ये बात तो मुझे याद न रही।” नगीना ने सिर हिलाया।

"परंतु वो मुझे या मोना चौधरी को भी नहीं मिल रहा।” देवराज चौहान कह उठा।

"मिलेगा।” तवेरा ने गम्भीरता से कहा—“दिल से ढूंढो, मेहनत करो। अवश्य मिलेगा जथूरा।" __

"क्या पता हमें झूठ कहा गया हो कि यहां पर ही जथूरा है।" महाजन ने कहा। ___

“मेरे खयाल में जथूरा यहीं पर है। ये बात बूंदी ने भी स्वीकारी है और महाकाली की परछाई ने भी यही कहा है।”

 
मोना चौधरी ने सांभरा की दी गोली निकाली और हथेली पर रखकर उसे देखने लगी। वो छोटी-सी गोली भूरे रंग की, चमकदार, खूबसूरत और चिकनी थी। मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव तैर रहे थे।

"क्या कर रही हो?" देवराज चौहान ने पूछा।

"सोच रही हूं कि सांभरा ने ये गोली यूं ही तो दी नहीं होगी। इसका अवश्य कुछ तो महत्त्व होगा।" मोना चौधरी ने कहा।

देवराज चौहान सिर हिलाकर रह गया।

तभी जगमोहन आगे बढ़ा और पास पहुंचकर मोना चौधरी से बोला।

“मैं उसे देख सकता हूँ?"

"देख लो।"

जगमोहन ने मोना चौधरी की खुली हथेली से वो भूरे रंग की गोली उठाई और उसे ध्यान से देखने लगा। ___

“ऐसी एक मेरे पास भी है।” कहकर देवराज चौहान ने जेब से गोली निकाली।

जगमोहन ने देवराज चौहान से भी गोली ले ली। कुछ पलों बाद उसकी आंखें सिकुड़ीं और नजरें महाकाली के बुत की तरफ उठ गईं।

"मिल गया।” एकाएक जगमोहन के होंठों से निकला।

“क्या?" नगीना कह उठी।

“पता नहीं, लेकिन कुछ तो मिल ही गया।” जगमोहन ने उत्साह-भरे स्वर में कहा—“वो सामने छोटे-से चबूतरे पर महाकाली का बुत है, परंतु बुत की आंखों के बीच की भूरे रंग की पुतली का गोल दायरा नहीं है। ये दोनों गोलियां बुत की आंखों की पुतलियों के बीच लगने पर बुत की आंखें पूर्ण हो जाएंगी। जिसकी वजह से बत अधूरा लग रहा है।" कहने के साथ ही जगमोहन तेजी से चबूतरे की तरफ बढ़ गया। ___

सबकी उत्सुकता और उलझन-भरी निगाह जगमोहन पर थी।

__ चबूतरे पर चढ़कर जगमोहन ने हाथ में पकड़ी गोली को बुत की आंख पर, उस खाली जगह में लगाया, जहां पर आंख का भूरे रंग का गोला होना चाहिए था। वो गोली फौरन पुतली में फिट हो गई।

अब बुत की आंख पूर्ण दिखने लगी थी। __

“यही है।" जगमोहन आवेश में कह उठा___"इन गोलियों की जगह बुत की आंख की पुतली के बीच ही है।”

देवराज चौहान और मोना चौधरी की नजरें मिलीं।

जगमोहन ने दूसरी आंख की पुतली में भी गोली फिट कर दी।

अब बुत की आंखें पूर्ण हो गईं।

"देखा, मैं न कहता था कि ये गोलियां महाकाली के बूत की आंखों की हैं।” जगमोहन बोला—“पूरी फिट आई हैं।"

तभी मोना चौधरी उठते हुए बोली। "फिर तो इन गोलियों को आंखों में लगाने पर कुछ नया सामने आना चाहिए। क्योंकि जथूरा की कैद तिलिस्म से बंधी हैं।। ___

“महाकाली ने जथूरा की कैद का तिलिस्म हमारे नामों से बांधा है।” देवराज चौहान ने कहा।

“ओह। फिर तो गोलियों को हमें बुत की पुतलियों में लगाना चाहिए। तब नतीजा सामने आएगा।"

देवराज चौहान ने जगमोहन को देखकर इशारा किया। जगमोहन ने फौरन पुतलियों में फंसाई दोनों गोलियां निकाली।

तब तक देवराज चौहान और मोना चौधरी चबूतरे पर आ चढ़े थे। जगमोहन ने दोनों को एक-एक गोली थमा दी।

देवराज चौहान ने महाकाली के बुत की एक आंख में वो गोली फिट कर दी। ___

मोना चौधरी ने बुत की दूसरी आंख में वो गोली फिट कर दी।

बुत की दोनों आंखें पुनः पूर्ण दिखने लगीं। अगले कई पलों तक शांति रही। मोना चौधरी और देवराज चौहान की नजरें मिलीं।

"शायद अभी तक हम तिलिस्म के ताले तक नहीं पहुंचे।" देवराज चौहान ने कहा। _

"तो फिर सांभरा ने महाकाली के बुत की पुतलियों में फिट करने को ये गोलियां क्यों दीं?" ___

“सांभरा हमें ऐसा कुछ नहीं देगा कि जिसकी सहायता से हम जथूरा तक पहुंच सकें।" देवराज चौहान ने कहा।

“परंतु कुछ तो बात...।" मोना चौधरी के शब्द अधूरे रहे गए। उसी पल बुत में कम्पन हुआ।

"नीचे उतरो। कुछ हो रहा है।"

अगले ही क्षण मोना चौधरी, देवराज चौहान और जगमोहन चबूतरे से कूदकर नीचे आ गए।

बुत में मध्यम-सा कम्पन सबको साफ नजर आ रहा था।

सबकी उत्सुकता-भरी निगाह बुत पर थी कि तभी वो चबूतरा जो कि चार फुट ऊंचा और आठ फुट लम्बा चौड़ा था, एकाएक अपनी जगह से सरकने लगा।

“चबूतरो खिसको हो।" सबकी निगाह चबूतरे के नीचे खाली होती जगह पर थी।

बेहद मध्यम गति से चबूतरा खिसक रहा था। पांच मिनट लग गए चबूतरे को खिसककर थमने में। चबूतरे के खिसकने की मध्यम-सी आवाज भी थम गई।
 
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