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| जगमोहन से बात करने के बाद पारसनाथ ने उसी पल सितारा को फोन किया।
“मेरे बिना दिल नहीं लग रहा परसू ।” उसकी आवाज सुनने पर, उधर से सितारा ने मजाक में कहा।
मोना चौधरी कहां है?” । ।
“वो तो मेरे आते ही चली गई। बेचारी राधा की हालत खराब है। मुंह सूजा हुआ है। महाजन का पता चला?”
“अभी नहीं। मोना चौधरी ने कुछ कहा कि वो किधर जा रही
| “ऐसी तो कोई बात नहीं हुई। क्यों क्या बात है। उसे फोन कर ले, कोई काम है तो ।”
पारसनाथ ने फोन काट दिया।
जगमोहन के पास मोना चौधरी ने कहा था कि उसका फोन भी उसके पास है। इसलिए पारसनाथ मोना चौधरी को फोन न करना चाहता था। वो कपड़े चेंज करके, कार पर मोना चौधरी के फ्लैट पर पहुंचा। रात के दो बज रहे थे। हर तरफ सुनसानी छाई हुई थी। पारसनाथ ने दरवाजे पर पहुंचकर कॉलबेल दबाई। । फौरन ही दरवाजा खुला। सामने मोना चौधरी थी।
तुम?” उसे देखते ही मोना चौधरी के होंठों से निकला फिर पीछे हट गई।
| उसे गहरी निगाहों से देखते पारसनाथ ने भीतर प्रवेश किया।
मोना चौधरी अभी तक बाहरी कपड़ों में थी।
जगमोहन को हमें जल्दी ही ढूंढ़ना है पारसनाथ।” मोना चौधरी बोली-“वो महाजन के साथ जाने क्या सलूक करे।”
पारसनाथ खामोश रहा।
मोना चौधरी ने उसे देखा फिर कह उठी।
कोई खास बात है पारसनाथ?
” नहीं। खास नहीं। तुम्हारा मोबाइल कहां है?”
मोबाइल?” मोना चौधरी के माथे पर बल पड़े–“वो सामने टेबल पर रखा है।”
पारसनाथ आगे बढ़ा और मोना चौधरी ने मोबाइल उठाया। उलट-पलटकर देखा। फिर अपना फोन निकाला और मोना चौधरी के फोन के नम्बर मिलाने लगा। मोना चौधरी की अजीब-सी निगाह पारसनाथ पर थी।
“क्या बात है पारसनाथ?” तभी मोना चौधरी का फोन बज उठा।
पारसनाथ के होंठ भिंच गए। उसने फोन काटा और वापस टेबल पर रखकर मोना चौधरी को देखा।
मोना चौधरी उसे ही देख रही थी।
कौन हो तुम?” ।
“मैं?” मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े–“तुम मुझे पूछ रहे हो कि मैं कौन हूँ?” ।
हां, तुम्हीं से...।”
“तुम्हें क्या हो गया है पारसनाथ?”
जवाब दो ।” पारसनाथ का खुरदरा चेहरा सपाट था।
“मैं-मैं मोना चौधरी हूं।”
इस बात का यकीन दिला सकती हो?” पारसनाथ ने सपाट स्वर में पूछा।
यकीन?” मोना चौधरी हैरत से भर गई–“तुम्हें ये यकीन दिलाना होगा कि मैं मोना चौधरी हूँ?”
हां ।
” क्या तुम मुझे यकीन दिला सकते हो कि तुम पारसनाथ हो?”
दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में झांका।
“मुझे राधा का फोन आया और उसने बताया कि जगमोहन महाजन को बेहोश करके कंधे पर डालकर ले गया है। मैं तुरंत महाजन के घर पहुंची तो, बाहर अंधेरे में मैंने जगमोहन को अपने इंतजार में पाया। मेरा उससे झगड़ा हुआ। उसने रिवॉल्वर निकालकर मुझे मारना चाहा, लेकिन बाजी पलट गई। वो भाग गया। मैं राधा के पास भीतर पहुंची तो राधा ने मुझे सब कुछ बताया, तब मैंने तुम्हें फोन करके, सितारा को, राधा के पास भेजने को कहा। सितारा आई तो मैं यहां आ गई। अब तुम यहां आकर मुझसे सबूत मांग रहे हो कि क्या मैं सच में मोना चौधरी हूं।”
पारसनाथ ने सिगरेट सुलगाकर कश लिया फिर गम्भीर स्वर में बोला।
“मैंने घंटा भर पहले मोना चौधरी से बात की है। वो मुम्बई में जगमोहन के पास थी, उसके साथ लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा भी थे। वो आठ बजे की फ्लाइट से, दोनों के साथ मुम्बई गई थी। उसका कहना है कि उसका फोन भी उसके पास है।”
“फ...फोन तो मेरे पास है, फिर उसके पास कैसे हो सकता है?” मोना चौधरी बोली।
“जो हुआ वो तुम्हें बता रहा हूं।”
“तुम्हारा मतलब कि महाजन को ले जाने वाला जगमोहन नहीं था। राधा झूठ बोल रही है?”
राधा झूठ क्यों बोलेगी?" ।
“तो फिर मुम्बई में जगमोहन कैसे हो सकता है। वो तो दिल्ली में...।”
“वो मुम्बई में भी है।” पारसनाथ की चुभती निगाह मोना चौधरी पर थी—“मैंने जगमोहन से भी बात की ।”
तुम पागल हो।”
“अभी तो नहीं हुआ।” पारसनाथ मुस्करा पड़ा-“अब तक के हालातों का निचोड़ है कि ये सब खेल, जथूरा की चाल है, वो हममें और देवराज चौहान में झगड़ा कराना चाहता है। मुझसे लड़ने वाला बांके नकली था। महाजन को उठा ले जाने वाला जगमोहन नकली था। परंतु मोना चौधरी कौन-सी असली है, ये मैं समझ नहीं पा रहा हूं। जथूरा हमें उलझा रहा है और हम उलझते जा रहे हैं।” पारसनाथ के स्वर में गम्भीरता थी।
मोना चौधरी मुस्कराकर कह उठी।
“मैं अपने फ्लैट पर हूं। मेरा फोन मेरे पास है। इसी से तुम्हें यकीन कर लेना चाहिए कि मैं ही...।” ।
“मैं आसानी से यकीन करके धोखा नहीं खाना चाहता। इस तरह मैं जथूरा के खेल का मोहरा नहीं बनना चाहता ।”
| “मोहरा तो तुम बन रहे हो, मुझ पर शक करके।” मोना चौधरी बोली।
सपन चड्ढा के बंगले पर फोन करो।” पारसनाथ बोला। | मोना चौधरी ने आगे बढ़कर फोन उठाया और सपन चड्ढा के बंगले का नम्बर मिलाने लगी।
बेल हुई। होती रही। मोना चौधरी ने फोन कानों से लगाए रखा।
पारसनाथ गम्भीर मुद्रा में टहलता कश लेता रहा।
हैलो ।” उधर से नींद भरा, नौकर का स्वर कानों में पड़ा। सपन साहब से मेरी बात कराओ।” मोना चौधरी बोली। मालिक से?
लेकिन आप कौन हैं?”
मोना चौधरी ।” ।
कमाल है। वो आपके साथ तो गए थे। सेठजी के दोस्त भी साथ में थे और अब आप...।”
मोना चौधरी ने फोन बंद करके कहा।
सपन चड्ढा, मेरे साथ वहीं गया है।”
अब समझीं तुम कि मुझे ये जानना है कि असली तुम हो या वो?” ।
“मैं हूँ पारसनाथ, मुझे पहचानो, मैं...।
” “कहने भर से कुछ नहीं होता।”
तो कैसे होता है?” मोना चौधरी का स्वर उखड़ गया। ऐसी कोई बात जिससे मुझे यकीन हो सके कि...” “तुम ही कहते हो कि ये सब चालें जथूरा चल रहा है और तुम ही उसकी चाल में फंसकर मुझे मोना चौधरी नहीं मान रहे ।”
“मेरे बिना दिल नहीं लग रहा परसू ।” उसकी आवाज सुनने पर, उधर से सितारा ने मजाक में कहा।
मोना चौधरी कहां है?” । ।
“वो तो मेरे आते ही चली गई। बेचारी राधा की हालत खराब है। मुंह सूजा हुआ है। महाजन का पता चला?”
“अभी नहीं। मोना चौधरी ने कुछ कहा कि वो किधर जा रही
| “ऐसी तो कोई बात नहीं हुई। क्यों क्या बात है। उसे फोन कर ले, कोई काम है तो ।”
पारसनाथ ने फोन काट दिया।
जगमोहन के पास मोना चौधरी ने कहा था कि उसका फोन भी उसके पास है। इसलिए पारसनाथ मोना चौधरी को फोन न करना चाहता था। वो कपड़े चेंज करके, कार पर मोना चौधरी के फ्लैट पर पहुंचा। रात के दो बज रहे थे। हर तरफ सुनसानी छाई हुई थी। पारसनाथ ने दरवाजे पर पहुंचकर कॉलबेल दबाई। । फौरन ही दरवाजा खुला। सामने मोना चौधरी थी।
तुम?” उसे देखते ही मोना चौधरी के होंठों से निकला फिर पीछे हट गई।
| उसे गहरी निगाहों से देखते पारसनाथ ने भीतर प्रवेश किया।
मोना चौधरी अभी तक बाहरी कपड़ों में थी।
जगमोहन को हमें जल्दी ही ढूंढ़ना है पारसनाथ।” मोना चौधरी बोली-“वो महाजन के साथ जाने क्या सलूक करे।”
पारसनाथ खामोश रहा।
मोना चौधरी ने उसे देखा फिर कह उठी।
कोई खास बात है पारसनाथ?
” नहीं। खास नहीं। तुम्हारा मोबाइल कहां है?”
मोबाइल?” मोना चौधरी के माथे पर बल पड़े–“वो सामने टेबल पर रखा है।”
पारसनाथ आगे बढ़ा और मोना चौधरी ने मोबाइल उठाया। उलट-पलटकर देखा। फिर अपना फोन निकाला और मोना चौधरी के फोन के नम्बर मिलाने लगा। मोना चौधरी की अजीब-सी निगाह पारसनाथ पर थी।
“क्या बात है पारसनाथ?” तभी मोना चौधरी का फोन बज उठा।
पारसनाथ के होंठ भिंच गए। उसने फोन काटा और वापस टेबल पर रखकर मोना चौधरी को देखा।
मोना चौधरी उसे ही देख रही थी।
कौन हो तुम?” ।
“मैं?” मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े–“तुम मुझे पूछ रहे हो कि मैं कौन हूँ?” ।
हां, तुम्हीं से...।”
“तुम्हें क्या हो गया है पारसनाथ?”
जवाब दो ।” पारसनाथ का खुरदरा चेहरा सपाट था।
“मैं-मैं मोना चौधरी हूं।”
इस बात का यकीन दिला सकती हो?” पारसनाथ ने सपाट स्वर में पूछा।
यकीन?” मोना चौधरी हैरत से भर गई–“तुम्हें ये यकीन दिलाना होगा कि मैं मोना चौधरी हूँ?”
हां ।
” क्या तुम मुझे यकीन दिला सकते हो कि तुम पारसनाथ हो?”
दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में झांका।
“मुझे राधा का फोन आया और उसने बताया कि जगमोहन महाजन को बेहोश करके कंधे पर डालकर ले गया है। मैं तुरंत महाजन के घर पहुंची तो, बाहर अंधेरे में मैंने जगमोहन को अपने इंतजार में पाया। मेरा उससे झगड़ा हुआ। उसने रिवॉल्वर निकालकर मुझे मारना चाहा, लेकिन बाजी पलट गई। वो भाग गया। मैं राधा के पास भीतर पहुंची तो राधा ने मुझे सब कुछ बताया, तब मैंने तुम्हें फोन करके, सितारा को, राधा के पास भेजने को कहा। सितारा आई तो मैं यहां आ गई। अब तुम यहां आकर मुझसे सबूत मांग रहे हो कि क्या मैं सच में मोना चौधरी हूं।”
पारसनाथ ने सिगरेट सुलगाकर कश लिया फिर गम्भीर स्वर में बोला।
“मैंने घंटा भर पहले मोना चौधरी से बात की है। वो मुम्बई में जगमोहन के पास थी, उसके साथ लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा भी थे। वो आठ बजे की फ्लाइट से, दोनों के साथ मुम्बई गई थी। उसका कहना है कि उसका फोन भी उसके पास है।”
“फ...फोन तो मेरे पास है, फिर उसके पास कैसे हो सकता है?” मोना चौधरी बोली।
“जो हुआ वो तुम्हें बता रहा हूं।”
“तुम्हारा मतलब कि महाजन को ले जाने वाला जगमोहन नहीं था। राधा झूठ बोल रही है?”
राधा झूठ क्यों बोलेगी?" ।
“तो फिर मुम्बई में जगमोहन कैसे हो सकता है। वो तो दिल्ली में...।”
“वो मुम्बई में भी है।” पारसनाथ की चुभती निगाह मोना चौधरी पर थी—“मैंने जगमोहन से भी बात की ।”
तुम पागल हो।”
“अभी तो नहीं हुआ।” पारसनाथ मुस्करा पड़ा-“अब तक के हालातों का निचोड़ है कि ये सब खेल, जथूरा की चाल है, वो हममें और देवराज चौहान में झगड़ा कराना चाहता है। मुझसे लड़ने वाला बांके नकली था। महाजन को उठा ले जाने वाला जगमोहन नकली था। परंतु मोना चौधरी कौन-सी असली है, ये मैं समझ नहीं पा रहा हूं। जथूरा हमें उलझा रहा है और हम उलझते जा रहे हैं।” पारसनाथ के स्वर में गम्भीरता थी।
मोना चौधरी मुस्कराकर कह उठी।
“मैं अपने फ्लैट पर हूं। मेरा फोन मेरे पास है। इसी से तुम्हें यकीन कर लेना चाहिए कि मैं ही...।” ।
“मैं आसानी से यकीन करके धोखा नहीं खाना चाहता। इस तरह मैं जथूरा के खेल का मोहरा नहीं बनना चाहता ।”
| “मोहरा तो तुम बन रहे हो, मुझ पर शक करके।” मोना चौधरी बोली।
सपन चड्ढा के बंगले पर फोन करो।” पारसनाथ बोला। | मोना चौधरी ने आगे बढ़कर फोन उठाया और सपन चड्ढा के बंगले का नम्बर मिलाने लगी।
बेल हुई। होती रही। मोना चौधरी ने फोन कानों से लगाए रखा।
पारसनाथ गम्भीर मुद्रा में टहलता कश लेता रहा।
हैलो ।” उधर से नींद भरा, नौकर का स्वर कानों में पड़ा। सपन साहब से मेरी बात कराओ।” मोना चौधरी बोली। मालिक से?
लेकिन आप कौन हैं?”
मोना चौधरी ।” ।
कमाल है। वो आपके साथ तो गए थे। सेठजी के दोस्त भी साथ में थे और अब आप...।”
मोना चौधरी ने फोन बंद करके कहा।
सपन चड्ढा, मेरे साथ वहीं गया है।”
अब समझीं तुम कि मुझे ये जानना है कि असली तुम हो या वो?” ।
“मैं हूँ पारसनाथ, मुझे पहचानो, मैं...।
” “कहने भर से कुछ नहीं होता।”
तो कैसे होता है?” मोना चौधरी का स्वर उखड़ गया। ऐसी कोई बात जिससे मुझे यकीन हो सके कि...” “तुम ही कहते हो कि ये सब चालें जथूरा चल रहा है और तुम ही उसकी चाल में फंसकर मुझे मोना चौधरी नहीं मान रहे ।”