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माँ बेटी की मज़बूरी complete

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Guest
मेरे पड़ोस में एक अंकल हैं, जिनकी उम्र अभी 60 साल है। उनसे मेरी बहुत पक्की दोस्ती है, हम एक दूसरे से बहुत खुले हुए हैं और अपनी सभी बातें शेयर करते हैं। वो बहुत ही ठरकी किस्म के हैं, गाँव की जवान होती लड़कियों के बारे में बहुत सी बातें करते हैं।

उन्होंने मुझे अपनी जवानी की सच्ची घटना सुनाई जो मैं उन्हीं के शब्दों में लिख रहा हूँ।

मैं राजपुर गाँव के जमींदार प्रताप सिंह के यहाँ मुनीम का काम करता था। उस समय मेरी उम्र 40 साल थी। मुझे गाँव में सभी मुनीमजी कहते थे। गाँव में मेरी बहुत इज़्ज़त थी। मैं काम के सिलसिले में अक्सर शहर जाया करता था। गाँव से शहर बहुत दूर था। जहाँ से सुबह एक बस शहर जाती थी और फिर शाम को लौट आती थी।

एक दिन मैं गाँव के पंडित जी के घर से गुजर रहा था तो पंडित जी ने रोक लिया- मुनीम जी, आप शहर कब जा रहे हो? मुझे एक विश्वासी आदमी की जरूरत है। मेरी लड़की को औरतों वाली कोई बीमारी है। आपकी शहर में बहुत जान पहचान है। आप किसी जान पहचान वाले अच्छे डॉक्टर से मेरी लड़की को दिखा देना।

लड़की की बात सुनकर मैंने पंडितजी से बोल दिया- मैं कल ही शहर जाने वाला हूँ।

फिर पंडित जी ने आवाज लगाई- मानसी बेटी, ज़रा यहाँ आना!

तभी एक बेहद खूबसूरत लड़की बाहर आई। वो बेहद रूपवती थी, बदन ऐसा कि छूने से मैला हो जाए। चूचियां छोटी छोटी थी लेकीन बहुत कसी और बहुत नुकीली थी। उसे देखकर मेरी नीयत ख़राब हो गई।

मानसी- जी बाबा, आपने बुलाया?

पंडित जी- देखो बेटी, ये मुनीमजी हैं। कल तुम अपनी माँ के साथ सुबह वाली बस से शहर चले जाना। मुनीमजी भी साथ में जाएंगे और तुमको डॉक्टर से दिखा देंगे।

मानसी मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई और ‘जी बाबा!’ कहकर अंदर चली गई।

मैं भी उसकी रसीली जवानी के सपने देखता अपने घर आ गया। मुझे बहुत दुःख हुआ यह सुनकर कि मानसी के साथ उसकी माँ भी जायेगी। नहीं तो मैं सोच रहा था कि मानसी की रसीली जवानी को बहुत प्यार से चूसता लेकिन अब क्या हो सकता था।

अगली सुबह मैं अच्छे से तैयार होकर वहाँ पहुँच गया जहाँ से बस मिलती थी। मानसी अपनी माँ सुशीला के साथ पहुँच चुकी थी, वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई।

कुछ देर में बस आ गई। बस में बहुत भीड़ थी, हम लोग कैसे भी बस के अंदर पहुँच गए। मैं मानसी के पास खड़ा हो गया था। मैं बस में ही उसके रसीली जवानी को टटोल लेना चाहता था लेकिन उसकी माँ से बचकर!

कुछ ही देर में बस ने रफ़्तार पकड़ ली लेकिन गाँव का रास्ता सही नहीं था तो बस में झटके भी लग रहे थे। उसी का फायदा उठाकर मैंने अपनी कोहनी से मानसी की एक चूची को स्पर्श कर दिया। लेकिन जब मानसी ने कोई एतराज़ नहीं किया तो मैंने ज्यादा देर इन्तजार नहीं किया … और मानसी की चूची को धक्का मारना प्रारम्भ कर दिया। लंड का आनन्द बढ़ता जा रहा था … मैं आहिस्ता आहिस्ता कोहनी से उसकी चूची को धक्के मारने लगा.

एक बार उसने तिरछी नजर से मुझे देखा मगर हाथ थोड़ा तिरछा करके मेरी कोहनी को उसकी छाती पर छूने दी। मैं खुश हो गया। मुर्गी तो लाईन पर है!

मैंने अब हाथ उसकी पीठ पर रख दिया और उसकी पीठ सहलाने लगा. वो कुछ नहीं बोली। मैं उसका दूसरा हाथ अपने लंड पर रख दिया। वह पहले तो घबराई लेकिन धीरे धीरे बस की स्पीड के साथ मेरे लंड को सहलाने लगी। मेरा लंड तो जोश में आकर फड़फड़ाने लगा। मानसी टेढ़ी नजर से देख कर मेरे लंड को सहलाने लगी मगर कुछ नहीं बोली और मुझे रास्ता देने लगी. मैंने हाथ को थोड़ा ऊपर उठाया पर तभी सुशीला झुक कर देखने लगी कि मैं क्या कर रहा हूँ। मैं झट से हाथ पीछे ले लिया.
 
मानसी सब समझ गई, उसने अपनी ओढ़नी को उस तरफ कर दिया ताकि उसकी माँ को मेरा हाथ दिखाई न दे.

मैं बहत खुश हो गया.

मैं- बेटी हम एक बार डॉक्टर को देखने के बाद सारा शहर घूमेंगे।

मानसी- अच्छा चाचाजी … आप शहर घुमायेंगे।

कहकर खुशी से उछल पड़ी.

मैं अपने एक हाथ को उसकी चूची पर दबा दिया और दूसरे हाथ से अपने लंड को.

मैं- क्यों नहीं बेटी, हमारी प्यारी मानसी को हम खरीदारी भी कराएँगे.

सुशीला गुस्से से- लेकिन तुम्हारे इलाज के लिए पैसे ठीक से नहीं होगा … उसमें खरीदारी के लिए पैसे कहाँ से आएंगे?

मैं- भाभीजीईईईई … आप भी न … चाचा के होते हुए भतीजी को पैसे की क्या जरूरत?

और हाथ थोड़ा ऊपर चूत के पास दबाया. मानसी की आँखें बंद हो गई मगर कुछ नहीं बोली.

क्या सेक्सी लड़की थी!

सुशीला- नहीं, हम किसी से पैसे नहीं लेंगे.

मैं- आपको थोड़े ही दे रहा हूँ … अपनी भतीजी को दे रहा हूँ.

सुशीला चुप हो गई और मानसी का ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा … इसी बहाने अब मैं अपने हाथ को चूत के ऊपर से सहलाने लगा था.

मानसी की हल्की सी सिसकारी निक़ल गई और सुशीला थोड़ा झुक के देखने लगी तब तक मैं हाथ निकाल चुका था। मुझे सुशीला के ऊपर बहत ग़ुस्सा आया। साली न ही ख़ाती है और न खाने देती है.

फिर थोड़ी देर बाद मेरा हाथ अपनी जगह पर पहुँच गया था और मानसी की चूत कुरेदने लगा था. इधर मेरा दूसरा हाथ मेरे लंड के ऊपर घिस कर अजीब गर्मी पैदा कर रहा था. दो जिस्म गर्मी से जल रहे थे और एक हड्डी बगल में बैठी थी.

मैंने अब मानसी की चूत को सहलाना शुरू किया. मानसी ने भी अच्छे से ओढ़नी से ढक ली ताकि उसकी माँ को उसके चेहरे के कामुक भाव दिखाई न दें.

मगर सुशीला को कुछ शक होने लगा था पर वो कुछ बोल ही नहीं पाती थी क्यूंकि उस समय मेरी ही जरूरत उनको थी.

मैं अब हाथ से अपने लंड को जोर से दबाने लगता और एक हाथ से उसकी चूत को! इधर मेरी धोती प्रिकम से भीगने लगी थी, उधर उसकी सलवार … वो बीच बीच में सेक्सी नजरों से मुझे देखने लगती.

वो एक बार बस के झटके के साथ ऐसे झुकी और मेरे लंड पर हाथ रख कर उसे पकड़ लिया जैसे वो गिरने से बचने के लिये मेरे लंड का सहारा ले रही हो अपने हाथों से!

मैं समझ चुका था कि लड़की नादान नहीं है … पहले से ही शातिर है … और मुझे फुल लाइन दे रही है।

हाथ उठाने से पहले उसने मेरे लंड को ऐसे कसके दबा दिया कि मेरे मुँह से भी जोर की सिसकारी निकलने वाली थी लेकिन मैंने रोक लिया नहीं तो सुशीला को शक हो जाता।

बस अभी शहर से थोड़ी ही दूर थी और हमारा खेल भी अन्तिम चरण में था, मैं झड़ने वाला था। उसके हावभाव से लगता था कि मानसी भी झड़ने वाली थी. मैं जोर से घिसना शुरु कर दिया … मेरे लंड को और उसकी चूत को … एक जोर की सिसकारी उसके मुँह से निकली और एक हाथ से मेरे हाथ को अपनी चूत पर उसने दबा दिया.

सिसकारी सुन कर उसके साथ की सीट वाला पीछे देखने लगा, सुशीला भी।

मेरा भी पानी छुट गया और मेरे मुँह से सिसकारी भी निकली मगर कोई कुछ समझ नहीं पाया. सुशीला को पूरा यकीन हो गया कि क्या चल रहा था. जब उसने मेरे मुँह की तरफ देखा तो आनन्द से मेरी आंखें बंद थी।

मैं बात को बदलाने के लिये बोला- शहर आ गया।

पर सुशीला की गुस्से भरी नजर कभी मुझे और कभी मानसी को देखती जा रही थी. बस आकर बस स्टोप पर रुकी, हम बस से उतरे … पर सुशीला कुछ बोल नहीं रही थी. मैं और मानसी भी चुप थे.
 
मैं आगे चल रहा था और वो दोनों मेरे पीछे पीछे … हम तीनों एक होटल के पास आ पहुंचे. मैंने जानबूझकर एक ही कमरा लिया. वेटर चाभी लेकर रूम खोल गया.

सुशीला- क्या एक ही कमरा?

मैं- हाँ …

सुशीला गुस्से से- एक ही कमरे में हम तीनों कैसे रहेंगे … पराये मरद के साथ तो मैं नहीं रह सकती.

मैंने मन ही मन सोचा … साली देख कैसे रुला रुला कर चोदता हूँ। पराया मरद कहाँ … उस पुजारी को छोड़कर मेरा आठ इंच का लंड एक बार ले ले, फिर इसका गुलाम बन जाएगी।

मैं- वो कमरे का किराया बहुत ही ज्यादा है. तुम तो बोल रही थी कि पैसा कम लाये हो। इसीलिए एक ही कमरा लिया। तुम अगर मेरे साथ सोना नहीं चाहती हो तब नीचे सो जाना … मानसी मेरे साथ सो जाएगी … क्यूं बेटी?

मानसी उछल कर- हाँ क्यों नहीं … मैं अंकल के साथ सो जाऊंगी।

सुशीला गुस्से से- नहीं तुम नीचे सोना!

उसके मुँह से निकल गया।

मैं- मुझे क्या एतराज हो सकता है।

वो थोड़ी देर सोचने लगी … फिर भी कुछ नहीं बोल पाई.

मैं- अब सामान इस कमरे में रख कर निकलो … डॉक्टर के पास जाना है।

सुशीला का मन थोड़ा शांत हुआ।

मेरा एक दोस्त जो मेरे कॉलेज में था, डाक्टरी की पढ़ाई करके अब उसी शहर में सिटी हॉस्पिटल में स्त्री रोग विशेषज्ञ था। हम उसके पास पहुँच गये।

उसका नाम दीपक था।

दीपक- क्या तकलीफ है आपकी बेटी को?

सुशीला ने इधर उधर देखा।

दीपक- घबराओ नहीं, रोग तो सभी को होती है। इसमेँ शरमाने की बात क्या है.

सुशीला- इसका मासिक दो महीने से बंद है।

दीपक- ठीक है, इसकी मैं कुछ जांच करता हूँ. आओ बेटी उधर लेटो बेड पर!

दीपक ने उसे एक कोने में बेड पर लेटाया और जांच शुरु कर दी.

कुछ देर के बाद वो आया और बोला- मैं कुछ टेस्ट लिख देता हूँ, करा देना और रिपोर्ट कल लाकर मुझे दिखाना।

मैं- ठीक है दीपक।

दीपक- तुम जरा रुकना … कुछ बात करनी है तुमसे … आप दोनों बाहर जाओ।

मैं कुछ समझ नहीं पाया और रुक गया। सुशीला और उसकी बेटी मानसी बाहर चले गई।

मैं अंदर रहा …

दीपक- तुम इन्हें जानते हो?

मैं- ऐसे ही गाँव के पुजारी की बीवी और लड़की है.

दीपक- ओह …

मैं- क्या हुआ?

दीपक- मुझे शक है कि उसके पेट में बच्चा है।

मैं- क्या!?

दीपक- टेस्ट के बाद मैं यकीन के साथ कह सकूंगा.

मैं- अच्छा … इसीलिये ये लड़की मुझे इतनी लाइन दे रही थी।

दीपक- लाइन देने का क्या मतलब?

मैं- सुन एक राज की बात बताने जा रहा हूँ … हमारे बीच रहनी चाहिए!

दीपक- हाँ बोल?

मैं- मैं सोच रहा था कि माँ बेटी को चोद दूंगा … और तुझे भी शामिल कर लूंगा इसमें!

दीपक- क्या ये हो सकता है?

मैं- हो सकता है क्या … तुमने तो मेरे काम को आसान कर दिया … उसकी पेट में बच्चा है। वो तो लाइन दे रही थी … पर उसकी माँ नहीं … जब उसके पेट में बच्चा होने की बात किसी को पता चलेगा तो पुजारी तो बदनाम हो जायेगा … और उसको गाँव में पूजा करने भी कोई नहीं देगा. इस बात लेकर अगर उसकी माँ को ब्लैकमेल किया जाये तो आसानी से हम दोनों को चोद लेंगे।

दीपक- उसकी माँ तो बेटी से भी सुन्दर दिखती है।

मैं- और बेटी कितने से चुदी है मालूम नहीं!

दीपक- तू कुछ इन्तजाम कर!

मैं- चिंता मत कर, अगर रिपोर्ट में उसकी गर्भवती की बात दिखे तो रेपोर्ट लेकर कल सुबह अप्सरा होटल में 69 रूम में आ जाना!

दीपक- ठीक है.

दीपक ने कम्पाउण्डर से बोल के उसका कुछ ब्लड और यूरीन टेस्ट करवाया … पर मैंने असली बात सुशीला और मानसी को नहीं बताई.

और हम सब वहाँ से निकल पड़े।
 
मैं तो बड़ा ही कमीना था, दीपक से पहले मैं दोनों को चोदना चाहता था तो मैं उन मां बेटी से बोला- रिपोर्ट तो कल आएगी, चलो शहर घूमते हैं.

मानसी- चलो।

सुशीला- नहीं … हम कमरे में चलते हैं।

मैं- चिंता मत करो भाभी, मेरे होते हुए कोई तकलीफ नहीं … यहाँ एक मेला लगा है, वहाँ घूम कर आते हैं।

सुशीला कुछ नहीं बोल पाई।

हम सब वहाँ गए। मैंने दोनों को दो आइसक्रीम खरीद कर दी. सुशीला के मना करने के बाबजूद मैंने उसे जबरदस्ती थमा दी।

मैं- चलो, यहाँ ऊँचा वाला झूला है, एक राउंड लगाते हैं।

मानसी खुश होकर बोली- चलो चाचू!

सुशीला- नहीं नहीं!

मैं- क्या भाभी, बच्ची को हर बात में टोकती हो … आप न जाना चाहें तो ना सही, पर बच्ची को तो मत रोको।

सुशीला और कुछ नहीं बोल पाई।

मानसी और मैं टिकट करके झूले में एक साथ बैठ गए। सुशीला नीचे देखती रह गयी.

झूला घूमने लगा. हम दोनों एक बक्से में थे. हमारे सामने दो सीट खाली थी। मेरा तो लंड खड़ा होने लगा था मानसी को अपने साथ अकेली पाकर! अन्धेरा भी होने लगा था।

मानसी- मुझे डर लगता है झूला नीचे आने के वक्त!

मैं- हम हैं ना, हम क्या तुमको गिरने देंगे. हमें कसके पकड़ लेना अगर डर लगे तो!

मानसी- ठीक है।

मेरा लंड और खड़ा होकर धोती से उछलने लगा. मानसी की नजर मेरे लंड के ऊपर पड़ी. उसे अब रोकने वाला कोई नहीं था. वो सीधे मेरे लंड को बड़े प्यार से देख रही थी।

मानसी- चाचाजी, आपका नूनू बहुत बड़ा है?

मैं- वो तो है। पर अब नूनू नहीं रहा, लंड बन गया है … देखना चाहोगी?

मानसी- इसे?

मैं- इसे मत बोलो, लंड बोलो!

मानसी- हमें शर्म आएगी … इसे देखने में!

मैं- नाम लो उसका … किसको देखने में?

मानसी- लं … ड को …

और मुँह झुका लिया।

मैं- शर्म कैसी … बस में तो इसे पकड़ चुकी हो … और फिर पहले भी तुम इसका मजा उठा चुकी होगी।

मानसी- आपको क्या मालूम?

मैं- बेटी, हम तोहर चाचा है … यह बात भी नहीं जान पाएंगे कि बिटिया ने क्या किया है और क्या चाहती है।

मानसी शरमा के- चा … चू!

मैं- सच बोलना … क़िससे चुदाया है … कौन है वो लड़का … … हम किसी से नहीं बोलेंगे।

मानसी- छोड़ो चाचू।

मैं- बता ना … शरमाती क्यों है?

और उसके हाथ को लेकर अपने लंड पर रख दिया। जिससे किसी को दिखाई नहीं दे।

उसने पहले आहिस्ता से पकड़ा लंड को … तब हमारा बक्सा आसमान में सबसे ऊपर था और नीचे नए लोग चढ़ रहे थे।

मैं- पसंद है?

मानसी- चाचू!

मैं- चाचू चाचू क्या करती है? बोल पसंद है या नहीं … कैसा लग रहा है?

मानसी- बहुत बड़ा है … इतना बड़ा हमने कभी नहीं देखा।

मैं- अच्छा पहले जो देखा था कितना बड़ा था?

मानसी- वो तो आपके से आधा था।

कहकर मानसी ने मेरे लंड को दबा दिया।
 
“आह स्ससशह्ह्ह हाहाह…” मेरे मुँह से सिसकारी निकल गयी।

मैं- अच्छा … पर था किसका?

मानसी- वो हमारे घर के पास एक लड़का है न राजन … मेरे से दो क्लास ऊपर है.

मैं- अच्छा … कितनी बार चुद चुकी हो?

मानसी- यही कोई दस बारह बार!

मैंने मन में सोचा कि ‘साली पूरा चुदक्कड़ है … पेट में बच्चा करवा दिया है चुद चुद के!’

मैं- माँ को पता है?

मानसी- नहीं … किसी को पता नहीं पर तुम बताना नहीं!

मैं- मैं क्यों बताने लगा … हमारा लंड पसंद है?

मानसी शरमा के- हाँ!

मैं- अंदर लोगी?

मानसी- हाँ!

और उसने मेरे लंड को धोती के ऊपर से फिर से दबा दिया, फिर मेरे मुँह से सिसकारी निकल गयी।

मैं- पर तुम्हारी माँ तो कवाब में हड्डी बनी हुई है.

मानसी- मैं क्या कर सकती हूँ?

मैं- सुन, तू मेरा साथ दे … उसको भी एक बार चोद दूंगा तो फिर वो कभी तुम्हारे मेरे बीच हड्डी नहीं बनेगी।

मानसी- माँ को कैसे चोदोगे?

मानसी ने हैरत के साथ पूछा।

उसके मुँह से चोदने की बात सुनके मेरा लंड और फुंकार मारने लगा। मैं बोला- वो सब तुम मेरे ऊपर छोड़ दो। मैं कुछ भी करूँ तुम मेरा साथ देना, मुझसे डरने की जरूरत नहीं … और अभी झूला में बैठ के मजे लो।

अब चरखी घूमने लगी थी … उसका एक हाथ मेरे लंड पर था और दूसरे हाथ से मुझे जकड़े हुए थी. जब झूला नीचे आता तो सुशीला हम दोनों को जकड़े हुए देखती। उसके चेहरे से ग़ुस्सा साफ नजर आ रहा। पर हमें रोकने वाला कोई नहीं था. मैं भी ऊपर अँधेरा का फायदा उठा कर उसकी चूची एक हाथ से मसल देता … वो सिसकारी लेती थी ‘असस्स्स्श ह्ह्ह्ह …’ मगर झूले की आवाज में वो दब कर रह जाती थी.

मानसी भी कम शातिर खिलाड़िन नहीं थी। मेरे लंड को अब उसने पूरा जकड़ लिया था और झूले के हिलने के साथ वो भी उसे टाइट जकड़ लेती और झूले के हिलने के साथ ही उसका हाथ लंड के ऊपर जकड़ के ऊपर नीचे हो रहा था। मैं आनन्द में गोते लगा रहा था। जब झूला स्पीड से नीचे आता तब एक तो मेरे शरीर में सिहरनसी दौड़ जाती थी, उसके साथ उसकी मजबूत जकड़ लंड को सातवे आसमाँ पर पहुंचा देती थी। मेरी तो ऐसी इच्छा हो रही थी कि ऐसे ही हम जीवन भर झूलते रहें और वो मेरे लंड को ऐसे ही जकड़े रखे.

मेरी आँख आनन्द से बंद हो जाती थी और सिसकारी भी जोर की निकल जाती थी. ऐसे झूले पर आनन्द तो अद्भुत होता है. यह मुझे पहली बार मालूम हो रहा था … झूला जब नीचे जाता है तो मन में डर पैदा कर देता है इसीलिए इतने आनन्द के बाद भी लंड झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था. इस आनन्द को मैं भाषा में व्यक्त नहीं कर सकता.

वहाँ पर बहत सारे लोग थे। मगर सब समझ रहे थे कि हम डर से एक दूसरे को जकड़ कर बैठे है। कोई हम पर शक ही नहीं कर सकता था. पर वहाँ एक ही औरत जो सुशीला थी, उसे शक होने लगा था पर वो कुछ कर ही नहीं सकती थी. और हम मजा ले रहे थे … मैं अब उसकी मस्त चूचियों को उसके काँधे के ऊपर से हाथ डाल कर कसके मसल रहा था और वो मेरे लंड को … और फिर सबके सामने खुली भीड़ में ऐसे आनन्द लेने में बड़ा मजा भी आ रहा था. अगर वही पर चूत में लंड डालने की अनुमति मिल जाती तो और भी अच्छा होता.

हम दोनो के मुँह से सिसकारी निकलती मगर वो झूले के घूमने की आवाज की वजह से कोई नहीं सुन पाता था.

मैं- और जोर से दबाओ।

उसने ऐसा ही किया. और अब मैं स्वर्ग में था … आँख बंद करके … उसी हिसाब से मैंने उसकी चूची की निप्पल भी मसल दी.
 
अब मैं झड़ने वाला था- मजा आ रहा है!

मानसी- बहुत …

मैं- अब हाथ हटाओ मेरे लंड से … नहीं तो मैं झड़ जाऊँगा.

उसने मेरी बात मानकर लंड के ऊपर से हाथ हटा लिया.

मैं- अब तुम आनन्द लो …

यह बोल कर उसके काँधे से हाथ हटा कर उसकी जांघ के बीच रख दिया।

मानसी- कोई देख लेगा।

मैं- देखने दो … कौन पहचानता है यहाँ हमें!

और दो उंगली उसकी चूत पर भिड़ा दी. झूले के साथ ही उसकी चूत के दाने से मेरी उंगलियां टकराने लगी … अब उसे आनन्द आने लगा था, वो सिसकारी निकाल रही थी ‘आह स्सस …’ आंखें बंद करके!

जब नीचे झूला आया तो सुशीला को सब मालूम पड़ गया. मैंने उसे देख कर एक कुटिल मुस्कान दी और जोर से उसकी बेटी की चूत में उंगली दबा दी. कपड़ों के ऊपर से.

मानसी की जोर से सिसकारी किलकारी निकली … सब समझे कि मानसी झूले के कारण चिल्ला रही है और सिसकारी मार रही है.

मगर सुशीला को पता था कि वो किसलिये सिसकारी मार रही है।

मानसी- मैं झड़ने वाली हूँ!

मैं- अब हाथ मेरे लंड पे रख के सहलाओ, दोनों साथ में झड़ेंगे.

उसने ऐसा ही किया और मेरे लंड को जोर जोर से हिलाने लगी. और मैं उंगली जोर जोर से उसकी चूत में घुसाने लगा उसके कपड़ों के ऊपर से.

वो चिल्लाने लगी थी अब … मेरी भी अन्तिम आनन्द में आंखें बंद थी और सिसकारी निकल रही थी. हम दोनों का पानी बहने लगा था … मेरा लंड दो- तीन पिचकरी छोड़ कर शांत हो गया और हम दोनों हांफने लगे थे.

कुछ और देर घूमने के बाद झूला रुका … हम दोनों थक गये थे। हांफते हुए हम दोनों उस बक्से से उतरे और सुशीला के पास गए।

सुशीला की नजर हम दोनों को घूरती जा रही थी पर हम दोनों शांत थे, हमने सुशीला की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और चलने लगे जैसे सुशीला अकेली आयी हो।

मैं चलता जा रहा था साथ में मानसी और पीछे सुशीला।

कुछ देर के बाद मैं बोला- चलो कुछ खरीदते हैं मानसी मेले से!

सुशीला गुस्से से- नहीं हम कमरे में चलेंगे.

मैं- इतनी भी क्या जल्दी है? क्यूं मानसी?

सुशीला- नहीं, हमें कुछ नहीं खरीदना है. मानसी, जो बोला वो करो।

मानसी थोड़ा सहम गयी और चुपचाप खड़ी रही.

मैं- भाभी, तुम भी न … बच्ची को बेकार में डांट देती हो।

सुशीला- अब वो बच्ची नहीं रही … और तुम दोनों जो कर रहे हो … वो ठीक नहीं है.

मैं- लो भाभी जी, हमने क्या किया?

सुशीला- देखो मुनीम जी, तुम जो हमारे साथ कर रहे हो, वो ठीक नहीं है।

वो गुस्से से चिल्लाई.

मैं- मैंने ऐसा क्या किया? थोड़ा सा मानसी बिटिया से प्यार किया.

सुशीला- हमें मत समझाओ … तुम इस का गलत फायदा उठा रहे हो … हम गाँव में जाकर सब बता देंगे।

वो फिर गुस्से से चिल्ला कर बोली।

मैं गुस्से में- बोलिये क्या बोलोगी? जानती हो हम यहीं पर तुम दोनों को अगर रंडीखाने में छोड़ के चले जायेंगे … तो कोई पूछने वाला नहीं होगा। गाँव में बोल देंगे कि मेले में दोनों माँ बेटी खो गई.

सुशीला और मानसी थोड़ा सहम गई मेरी भाषा सुन के!

मैं- चलो चलते हैं कमरे में!

हम सब चुपचाप कमरे में चले आये.
 
कमरे में घुसकर मानसी चली गयी बाथरूम में नहाने … मेरे लिए यही मौका था … जब पानी गिरने की आवाज हुई बाथरूम में तो मैंने जाकर गुस्से से सुशीला को पकड़ लिया।

सुशीला- यह क्या कर रहे है मुनीम जी … आप तो बदतमीज़ी पर उतर आए।

मैं- बदतमीजी तो अभी की नहीं है, आगे देखती जाओ कि मैं क्या करता हूँ।

सुशीला- क्या कर रहे हो … अभी हम चिल्ला देंगे।

मैं- चिल्लाओ … क्या बोल रही थी कि हम मानसी की नादानी का फयदा उठा रहे हैं।

सुशीला- और नहीं तो क्या?

उसके आँखों से आँसू निकलने लगे थे।

मैं- सुन … तेरी बेटी मुँह काला कर चुकी है … उसके पेट में बच्चा है।

सुशीला चौंक गयी।

सुशीला- आ … प … झूठ बोल रहे हो। हमको फंसाने का नाटक है।

मैं- मैं नाटक कर रहा हूँ या तू … दो महीने से उसका मासिक बंद है। मालूम नहीं पड़ता क्या … कल रिपोर्ट आ रही है चिंता मत कर।

यह सुनकर सुशीला जोर से रोने लगी.

मैं- अब चिल्ला तू कितना चिल्लाती है … गाँव सबको बोल दूंगा कि उसके पेट में बच्चा है … और यह औरत भी कितने जगह मुँह काला कर चुकी है … मालूम नहीं। मेरे सामने सती सावित्री बनती है … देख दोनों को कैसे रगड़ रगड़ कर चोदता हूँ।

सुशीला के जोर से रोने की आवाज कमरे में गूंजने लगी … आवाज सुनकर मानसी ने पानी बंद कर दिया … वो बाथरूम से निकलने वाली थी।

सुशीला- हमारे साथ ऐसा मत करो। हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?

और रोने लगी.

मैं- अब आई ना लाइन पर … सुन उसको कितने चोद चुके हैं मालूम नहीं … मैंने और एक बार चोद लिया तो क्या फर्क पड़ता है। अगर तू चाहती है कि गाँव में किसी को तेरी बेटी के बारे में पता न चले तो उसके और मेरे बीच में रुकावट न बनना … अगर तू साथ देगी … तो कल उसका पेट साफ करके जाएंगे। किसी को पता नहीं चलेगा। नहीं तो गाँव में अपना काला मुँह तेरी बेटी किसी को नहीं दिखा सकेगी … समझी?

सुशीला रो रही थी वैसे दीवार से चिपकी हुई … मैं उसके गाल और कान को चूमने लगा वैसे ही उसे दीवार से दबाकर … वो खड़ी थी और मैं उसके चूतड़ मसल रहा था.

तभी बाथरूम का दरवाजा खोलकर मानसी निकली, मानसी अपनी माँ को इस हालत में देख कर थोड़ा डर गयी।

मानसी- क्या हुआ माँ? यह अवाज कैसी थी और तुम रो रही हो?

मैं सुशीला के कान में आहिस्ता से बोला- अपनी बेटी को कुछ मत बोलना … नहीं तो सबको बता दूंगा.

सुशीला रो रही थी, मैंने उसके गाल पर चुममा दिया और उसके चूतड़ को मसलते हुए बोला- मानसी, वो कुछ नहीं, तुम्हारी माँ हमसे थोड़ा प्यार कर रही थी न … इसीलिए।

मानसी ने और एक बार उसकी माँ की अवस्था पर नजर डाली … और देखा कि सचमुच वो मुझे कुछ बोल नहीं रही है और मैं उसके चूतड़ मसल रहा हूँ, गालों को चूम रहा हूँ.

तो मानसी गुस्से से बोली- अंकल जो बोल रहे थे, ठीक था … खुद तो इश्क लड़ाती हो और हमारे पर गुस्सा दिखाती हो सती सावित्री बनकर?

मैं- ठीक समझी तू मानसी, अब अपनी माँ का असली रूप तो देख चुकी हो। अब मैं जो बोलूँगा वो करना … समझी … अपनी माँ की तरह तुम्हें भी हक़ है मजा लेने का। क्यूँ मानसी?

और मैंने एक बार चूम लिया सुशीला के गाल को! वह अभी भी रोती जा रही थी सिसक कर!

मानसी- जी अंकल … मैं आपका पूरा साथ दूंगी.
 
अब दोनों मुर्गी मेरी मुट्ठी में थी … एक चुप और दूसरी फड़फड़ाती हुई। लेकिन उसके पर काटने में भी मुझे ज्यादा वक्त नहीं लगेगा, यह मैं जानता था.

मैंने सुशीला को छोड़ दिया, वो मुंह लटकाये हुए बेड पर बैठ गयी.

मैं- मानसी … अब देर किस बात की? चलो खेल शुरु करते हैं।

मेरा अब उसकी माँ के सामने उसे चोदने का अब प्रोग्राम था.

मानसी मेरे पास आयी और हम दोनों के प्यासे होंठ मिल गये। मानसी को तो लाइसेंस मिल गया था। अभी अभी वो नहा के आई थी। सुशीला हमें देखते ही रह गयी, वो गुस्से से दोनों को देख रही थी मगर कुछ बोल नहीं पा रही थी.

और मानसी ने मेरी धोती खींच दी … मेरा लंड फन लहराते हुए धोती से आजाद था … सुशीला की नजर एक बार उस पर पड़ी तो वो देखती ही रह गई.

मैं- क्या देख रही हो भाभी? लगता है कि पसंद आ गया?

सुशीला ने लाज से सर को दूसरी तरफ घुमा दिया।

मैं मन में- चिंता मत कर साली … तुझे भी चोदूँगा … मगर तड़पा तड़पा कर!

अब मैंने उसकी बेटी को उसके सामने बेड पर पटक दिया और चढ़ गया उसके उपर और उसके कपड़े उतार दिए.

मैंने अपना कुर्ता भी उतार कर फेंक दिया.

मानसी- क्या कर रहे हो मुनीम जी? आहिस्ता से … आपने तो मेरा ड्रेस फाड़ दिया?

मैं- चिंता मत करो … और दस खरीद लाएँगे.

मानसी- ठीक है … मगर आहिस्ते!

मैं पूरा जानवर बन गया था, मैंने मानसी को पलट दिया और उसकी गाण्ड में कस के लंड पेल दिया.

मानसी- मर गई … आहह आह!

सुशीला की भी आँखें फट के रह गयी. मैंने सुशीला की ओर देख कर और एक जोर का धक्का मारा और मानसी की गाण्ड से खून निकल आया। सुशीला देखती ही रह गयी … उसकी आँखें फट चुकी थी जैसे!

मेरे लंड पर मुझे मानसी की कसी गाण्ड का दबाव महसूस हो रहा था, मानसी की जवान गांड ने मेरे विशाल लंड को जकड़ लिया था.

मानसी- मुनीम जी, क्या कर रहे हो … मेरी तो गांड फट गई … इतना बड़ा लंड … मुझ पर दया करो मुनीम जी। इसे निकालो मेरी नाजुक गाण्ड से!

मैं- चुप कर यार … थोड़ी देर की बात है, तेरी गांड ढीली हो जायेगी तो मजा आयेगा.

उसने अपनी माँ के सामने ऐसे बात सुनकर बात बढ़ाना ठीक नहीं समझा।

मैं- और ले मेरी रानी!

और उसके चूतड़ को दोनों हाथ से दबा कर एक जोर का धक्का मारा … अब मेरा पूरा लंड अब मानसी की गांड के अंदर था। उसके मुँह से चीख निकल गई ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’

लेकिन मैंने उस पर थोड़ा भी रहम नहीं किया और लंड को थोड़ा बाहर निकाल के फिर से धक्का लगाया. वो सिर्फ चिल्लाती रह गयी … क्या मजा था … उसकी चीख में!

अब मैं उसकी चूचियों को जोर जोर से दबा रहा था और गांड में धक्का भी मार रहा था और सुशीला के चेहरे को देख के मुस्कुरा रहा था.

कुछ देर के बाद मानसी साथ देने लगी और चिल्लाना छोड कर सिसकारी भरने लगी. अब मैं भी जोश में आकर और स्पीड बढ़ाता गया- ले साली और ले … मेरी नयी नवेली रंडी!

सुशीला आंखें फाड़ कर वैसे ही देखे जा रही थी कि उसकी बेटी क्या कर रही है! उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करे!

थोड़ी देर बाद मैंने मानसी की गाण्ड में अपना पानी छोड दिया और उसके नंगे बदन के ऊपर लुढ़क गया.

हम दोनों हांफ रहे थे.
 
कुछ देर बाद मानसी ने मुझे अपने ऊपर से हटाया और बाथरूम में जाने को उठी।

मैं- चल रंडी … इसे चाट के साफ कर! जाती कहाँ है?

वो अब आँखें फाड़ कर मेरे लंड को देख रही थी, बोली- तुम तो राक्षस हो। मैं तो तुम्हारे इस घोड़े जैसा लंड का मज़ा लेना चाहती थी मगर तुमने तो मेरे ऊपर थोड़ा भी रहम नहीं किया.

मैं- चुप साली … ज्यादा बक बक मत कर और इसे चाट के साफ कर!

वो वही बेड के नीचे बैठी और मेरे लंड को चाटने लगी। मानसी अपनी माँ के सामने मेरे लंड को मुँह में लेकर आगे पीछे अच्छे से चाट रही थी.

मेरा लंड फिर से ताव में आ गया और मैंने उसके चोटी पकड़ लिया और उसके मुँह को चोदने लगा. उसके मुँह से ‘गु गूं हह गु गूं …’ की आवाज निकलने लगी. मैं कुछ सुना नहीं और उसके गले तक लंड घुसाने लगा. मेरी आँखें अभी भी सुशीला के चहरे पर ही टिकी थी. मैंने उसे एक संदेश देना चाहता था कि उसे भी ऐसे चोदने वाला हूँ.

वो मेरे आँखों में उसके लिए वासना देख कर डर गयी.

मैं सुशीला से बोला- देख साली, तेरी बेटी को कैसे चोद रहा हूँ.

और उसके गले तक लंड घुसा दिया. वो फिर तड़पने लगी ‘गू गूं गु …’ करके। उसकी आँखों से पानी बह निकला था. साथ ही वो उलटी करने लगी थी.

सुशीला बोली- मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ। उस पर रहम करो … वो अभी छोटी है.

मैं- हा … ह … हा … साली पूरी रंडी है। पाँच भी अगर इसे चोदें तो कुछ नहीं होगा इसका … ये तो मजा ले रही है. तुम अपनी सोचो … इसके बाद तुम्हारी बारी है.

और मैं जोर जोर से धक्के लगाने लगा. सुशीला को चोदने की सोच से मैं और गर्म होने लगा. अब मैं जानता था कि मैं और ज्यादा देर नहीं टिकूंगा।

मैंने मानसी को कहा- जो भी रस निकले, सब निगल जाना!

और दस बीस धक्के के बाद मैं सिसकारी मारके उसके मुँह में ही झड़ गया और वो सब निगल गई और वहीं जमीन पर खांसने लगी।

मानसी- मुझे तुमसे और चुदवाना नहीं है। तुम तो पूरे मादरचोद हो। जानवर हो तुम!

मैं- साली कितनों का लंड खा चुकी है और बोलती है चुदवाना नहीं है। देख थोड़ी देर में कैसे बोलेगी कि मुझे फिर से चोद दो जब तेरी चूत लंड मांगेगी.

मैंने यह बोल कर उसके दोनों पैर को दोनों तरफ फैला दिया और उसकी चूत थोड़ा फ़ैल गयी. मैंने झट से एक उंगली उसकी चूत में डाल दी और उसको आगे पीछे करने लगा. उसके मुँह से सिसकारियां निकलने लगी- आह उम्म्ह… अहह… हय… याह…

मैं तुरंत दो उंगलियाँ उसकी चूत में डाल दी और जोर जोर से फिंगर फक करने लगा. मानसी के मुँह से बड़ी बड़ी सिसकारियां निकलने लगी.

मैंने सुशीला की ओर देख कर मानसी से पूछा- कैसा लग रहा है मेरी रंडी?

मानसी- बहुत अच्छा … आहह स स आ … चोदते रहो!

यह सुनकर सुशीला हैरानी में पड़ गयी और मैं उसे देख कर थोड़ा मुस्कुरा दिया. फिर मैंने मानसी की गर्म चूत से अपनी उंगलियाँ निकाल ली और अपना मुँह उसकी चूत से लगा दिया और चाटने लगा.

वह मुँह से और बड़ी बड़ी सिसकारियाँ छोड़ने लगी- उम्माह … अंकल और जोर से … आह आस्स मुनीम जी … आहह!

थोड़ी देर के बाद मैंने मानसी की चूत से मुँह उठा लिया तो मानसी गिड़गिड़ाती हुई बोली- मुनीम जी, रहम करो मेरे ऊपर … चाटते रहो!

मैं- रंडी, अभी तो तुझे चुदवाना नहीं था … अब क्या हुआ साली? अब अपनी माँ को दिखा तू कि तू कितनी बड़ी रंडी है। मेरे लंड के ऊपर आ जा और अपनी चूत में मेरा लंड लेकर अपनी गांड को उछाल उछाल के चुदवा!

यह बोल कर मैं बेड के ऊपर लेट गया.
 
मैं- रंडी, अभी तो तुझे चुदवाना नहीं था … अब क्या हुआ साली? अब अपनी माँ को दिखा तू कि तू कितनी बड़ी रंडी है। मेरे लंड के ऊपर आ जा और अपनी चूत में मेरा लंड लेकर अपनी गांड को उछाल उछाल के चुदवा!

यह बोल कर मैं बेड के ऊपर लेट गया.

मानसी अपनी माँ के सामने ही मेरे ऊपर चढ़ गयी और मेरे खड़े लंड को अपने चूत में घुसाने लगी. सुशीला आँखें फाड़ फाड़ कर देख रही थी।

मैंने सुशीला को कहा- देखा … जिसके लिए तुम रहम की भीख मांग रही थी, वो कैसे अपनी गांड उछाल उछाल के चुद रही है।

सुशीला कुछ बोल ही नहीं पायी, वो देखती जा रही थी कि उसके सामने उसके बेटी पूरी रंडी बनी हुई लंड चूत में लिए हुए उछल रही है, उसकी चुची उपर नीचे हो रही है उसके सामने … और उसके मुँह से मादक सिसकारियां निकल रही हैं। उसे अपनी माँ की ज़रा भी परवाह नहीं!

मैं- साली तुम माँ बेटी दोनों पूरी चुदक्कड़ हो … अभी देखना, मैं तुझे इससे भी बडी रंडी बनाता हूँ चोद चोद कर!

मानसी कुछ नहीं सुन रही थी और मेरे लम्बे लंड पर ऐसे उछल रही थी जैसे उसे बीस इंच का भी लंड कम पड़ेगा.

ऐसे ही थोड़ी देर चूत में लंड लेकर उछलने के बाद वो झड़ गयी … मैं भी उसकी चूत में ही झड़ गया। हम दोनों की सिसकारियों से पूरा कमरा गूंज उठा।

कुछ देर के बाद वो उठकर चली गयी बाथरूम की ओर … और मैं सुशीला की ओर चला गया. वो चौंक गई … मैं उसके होठों को चूम कर किस करने लगा.

सुशीला- आह … हमें छोड़ दो मुनीम जी, आपको पाप लगेगा … मैं शादीशुदा हूँ … पंडित की बीवी हूँ.

मैं- अपनी बेटी की चुदाई तो तू आँखें फाड़ के देख रही थी … पराये मर्द का लंड अपनी बेटी की चूत में देखकर तुझे मजा आ रहा था या नहीं? और अपनी बारी आई तो सती सावित्री बनने लगी. देखना तू इससे भी बड़ी रंडी बन कर मुझसे अपनी गांड उछाल उछाल कर चुदवायेगी. इधर देख, मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया है तेरे लिए … तेरी बेटी की गांड, मुंह और चूत चोद कर मेरा लंड तेरे लिए ही खड़ा हो रहा है, तेरी बेटी के लिये नहीं।

मैंने उसके हाथ को पकड़ कर मेरे कड़क लंड पर रख दिया और बोला- देख कितनी गर्मी है इसमें तेरे लिए, सिर्फ तेरे लिए यह खड़ा है और तू नखरे दिखा रही है?

और उसके हाथ को मैंने लंड के ऊपर अपने हाथ से जकड़ लिया.

वो उत्तेजित हो उठी लेकिन नारी सुलभ लज्जा के कारण बोली- छोड़ दो मुझे मुनीम जी!

मैं कहाँ छोड़ने वाला था … मैं उसके होंठों को चूम लिया, उसकी चूचियों को मसलने लगा.

अब सुशीला सिसकारियां छोड़ने लगी. तभी उसकी बेटी मानसी आ गयी और हम दोनों को देखने लगी.

मैं मानसी से बोला- देख तेरी माँ कितनी गर्म है।

मानसी कुछ नहीं बोली.

मैंने और थोड़ी देर मानसी की मम्मी को उसके सामने ही मसला कि तभी दरवाजे पर खटखट हुई।

मैं- कौन है।

वेटर- खाना साहब!

मैंने सुशीला को छोड़कर कपड़े पहन लिये. वेटर आकर खाना देकर चला गया. हम खाना खाके सो गये।
 
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