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मा को चोदने के लिये बेकरार
मेरे घर मे सिर्फ मेरी मा और मै रहते थे. मेरे पिताजी एक दिन मा से झगडा करके हमे बेसहारा छोड कर चले गये थे, उनका कोई ठिकाना नही था. हमारा परिवार काफी अमीर था, खेती-बाडी, अच्छा बडा घर......पता नही पिताजी क्यू छोड गये थे. मैने एक दिन मा से पूछा था तो वो बहुत गुस्सा हुई थी. कुछ लोगोसे पता चला कि पिताजी का कोई बाहर का चक्कर था. घर मे और कोई ना होनेकी वजह से मुझपर घर की बहुत सारी जिम्मेदारिया बहुत जल्दी आ पडी थी जिसका मा को हमेशा दुख होता था. वो कहती थी, खेलने-कूदने की उमरमे ही तुम्हे यह सब काम करने पडते है. लेकिन मुझे उसका बुरा नही लगता था. मेरी मा ४४ साल की थी और मै २२ साल का जवान. मैने ग्रॅज्युएशन तो कर लिया था लेकिन घर के काम मे हाथ बटानेके लिये आगे नही पढ सकता था. वैसे नौकर तो थे लेकिन कई काम हमे खुद भी करने पडते थे.
हमारे गाव मे मेरे दोस्त कम थे, मै अक्सर मौका मिलनेपर शहर जाया करता था और फिल्मे देखकर मन बहलाया करता था. मेरी जिन्दगी बहुत सीधी थी, सुबह उठना, थोडीसी कसरत करके नाश्ता करना, फिर दिनभर खेतोमे काम करना, शाम को वापस घर आकर खाना खाकर सो जाना. कुछ साल पहले टीव्ही लगवा लिया था, लेकिन कई बार बिजली ना होनेकी वजह्से उसका भी कोई काम नही बनता था, खेतोमे काम करनेवालोसे और शाम को मा से बाते करकेही मै मन बहलाता था.
शहर जाता तो कभी कुछ किताबे ले आता, बस, उससे ज्यादा मनोरन्जन का कोई साधन नही था. मेरी सोच भी बिलकुल सीधी थी, न सेक्स के बारेमे मै खास कुछ जानता या जाननेकी कोशिश करता. हा टीव्ही-फिल्म देखकर मेरा लन्ड जरूर खडा होता था, तो मै बाथरूम जाकर अपनेही हाथसे अपनी सन्तुष्टी कर लेता था. लेकिन एक दिन मैने एक अजीबसे घटना देखी जिससे मेरा सोचनेका तरीका बदल गया.
खेतोसे मे थोडा देरसे लौटा, रास्तेमे हमारा एक नौकर बिरजू का घर पडता था, उसे कुछ काम बताने थे. मै उसके घर गया और दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई जवाब नही था, मुझे लगा कि वो पीछे आन्गन मे होगा इसलिये मै घर के पीछेकी ओर गया और वहा पहुचतेही मै चुप हो गया, बिरजू की बीवी वहापे खुलेमे नहा रही थी. पीछे कोई आयेगा इसका शायद उसे अन्दाजा नही था इसलिये वो पूरे कपडे उतारकर केवल अपने सायेको बदनपे बान्धकर बैठी थी, वो साया उसके शरीरपर चिपका था जिससे उसका गदराया जिस्म साफ दिख रहा था. वो मजेसे साबुन मल मलके नहा रही थी. वो नजारा देखकर मेरी लन्ड टाईट होने लगा, सास तेजीसे चलने लगी, मुह सूख गया. मै एक दीवारके पीछे छिपकर उसे निहारता रहा. मैने फिल्मोमे औरत का नन्गा जिस्म देखा था, शहर जा कर कभी मै ब्लू-फिल्मभी देखता लेकिन असली औरत का अध-नन्गा जिस्म देखनेका यह मेरा पहला मौका था. जबतक वो नहाती रही, मै चुपकेसे उसे देखता रहा. वो स्नान खतम करके घरके अन्दर चली गयी. मेरा मन कर रहा था कि किसी बहानेसे अन्दर जाए लेकिन मै डर रहा था कि कोई देख लेगा. तभी किसी के आने की आवाज आई और मै चुपचाप वहासे निकल पडा. आगे चलके देखा तो वो बिरजू था, अच्छा हुआ मै जल्दी निकला था. मैने उसे काम बताए और घर की ओर चल पडा.
घरपे पहुचा तो मा किचन मे खाना बना रही थी, रसोई के सामने खडी होकर वो पराठे सेक रही थी. मै जैसेही किचन मे गया मुझे साईड पोझसे वो दिखाई दी और मेरा दिल फिरसे जोरसे धडकने लगा. मा साडी-ब्लाउझ पहनी थी और इस तरफसे उनकी चुची और पेट साफ दिखाई दे रहा था. किचनमे काम करनेसे उसे पसीना छूटा था जिसकी वजहसे ब्लाउझ थोडा गीला हुआ था, जिसकी वजहसे उनकी चुची का थोडा हिस्सा दिख रहा था, और वो नजारा काफी सेक्सी लग रहा था. मा मेरे आने की आहट से मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई और बोली
"आ गए तुम, आज देर क्यू हुई, कुछ तकलीफ तो नही है ना, आओ बैठो, मै खाना परोसती हू". मै हाथ मुह धोकर खानेके लिये बैठ गया, भूख तो लगी थी लेकिन आज मेरे दिमाग मे एक अलगसी भूख थी. बार बार मेरी नजर खाना बनाते हुए मा के शरीर पर जाती और हर बार मै अपने आप को दोषी मानता था. मेरी मा दिखने मे सुन्दर थी लेकिन पिताजी के इस बर्तावकी वजहसे हमेशा मायूस रहती थी. अभी कुछ सालोसे जबसे मैने घर की जिम्मेदारी सही तरीकेसे उठाई थी तब कही जाकर उनके चेहरे पे हसी लौट आई थी. उसका रन्ग सावला था लेकिन बाल बहुत घने और लम्बे थे जिन्हे वो एक जूडेमे बान्धती थी. हमेशा साडी और ब्लाउझ पहनती थी और अपने शरीर का कोई भी हिस्सा खुला नही छोडती थी. चेहरा अभी थोडा हसमुख हुआ था, आन्खे काली और बडी बडी जिनमे वो हमेशा काजल लगाती थी. होन्ट थोडे मोटेसे थे गाल भरे हुए. मा कभीभी मेक-अप नही करती थी, नहानेके बाद काजल और थोडीसी पावडर लगा लेती थी. उसके कन्धे भरे हुए थे. शुरुसेही मेहनतके और खेतीके काम करनेसे उसमे मोटापा बिलकुल नही था, एकदम सुगठित बदन था. अपने सीनेको वो पल्लुसे ढक लेती थी लेकिन आज मुझे अहसास होने लगा कि उसके पीछे उनकी चुचिया यकीनन मोटी और सुडौल होन्गी. मैने किचनमे आते आते उन्हे साईडसे देखा था. पेट ज्यादा फूला नही था, कमर नाजुक थी और उसके नितम्ब बहुत गदराए थे. आज उसका यह गठीला बदन देखकर मुझे पता चला कि हम लोग जब गाव मे चलते थे तो लोग मा को क्यू घूरत रहते थे. मै अब उनकी हाल-चाल पर ध्यान देने लगा. सचमुच मा जब चलती थी तो उसके नितम्ब ऐसे सेक्सी तरीकेसे हिलते थे कि बस देखते रहने का मन करता था. पीठपे ब्लाउझ कसा था जिससे उनकी ब्रेसिअरकी लाईन दिख रही थी.
मै खानेपे बैठा तो था लेकिन मेरा लन्ड खडा हो रहा था. अच्छा हुआ कि हम टेबलपे बैठे थे जिससे मा को मेरी इस अवस्थाका पता नही चला. मा मेरे साथ खानेपे बैठ गयी और मुझसे दिनभर की बाते पूछने लगी, मै बस ‘हा, ना, ठीक...’ ऐसे जवाब दिये जा रहा था क्योन्कि मेरा मन इस अजीबसी उलझन मे फसा था. एक तरफ मै चाहता था कि मा की सुन्दरता निहारू और दूसरी तरफ इस विचारसे मुझे अपने आप से नफरत हो रही थी. मै मा से नजर नही मिला रहा था, उतनी हिम्मत नही थी मुझमे. मैने खाना खा लिया और अपने कमरे मे जाकर सो गया.
आगे कुछ दिन इसी उधेड-बुनमे गुजरे. घरमे मेरे सिवा बस दो नौकर औरते थी, एक साफाई किया करती थी और दूसरी मा को घर के कामो मे मदद करती थी, लेकिन उनके जाने के बाद हम दोनो मा-बेटेही घर मे रहते थे. मा घर मे काफी खुलकर पेश आती थी, घर पे उसे साडी के पल्लुका इतना खयाल नही होता था. इतने दिन मैने कभी यह देखा नही था लेकिन अब मेरी नीयत बदलनेकी वजहसे ये सारी बाते अब मुझे खटकने लगी थी. मै जब भी मौका मिले तब मा के शरीर को देखते रहता और मन मे उसे उन कपडोके बगैरभी देखता और कल्पनामे खोए रहता. अब मेरा पापी मन मुझे थोडे और खतरे मोल लेने के लिए कहने लगा. मैने मा को बाथरूममे देखनेकी कोशिश की लेकिन उस दरवाजेमे ना ही कोई दरार थी न कोई सुराख. फिर मा को काम करते हुए उनकी चुचिया देखना, खाना बनाते हुए उनके बदन की मादक चाल देखना मानो मेरा हमेशाका काम हो गया. हालाकि मै यह सब सिर्फ घरमे होने पर ही करता था, काम के कारण मै अक्सर घरके बाहर बहुत समय बिताता था. लेकिन वहापर भी मेरा मन मुझे चैनसे बैठने नही देता. खेतोमे काम करनेवाली कई औरते हमारे खेतोमेभी आती थी, उन्हे झुककर काम करते हुए उनकी चुची देखनेकी कोशिश करना, पीछेसे उनके चूतड देखना और उनके बदनके दिखाई देनेवाले हिस्सोको देखते रहना मानो मेरा शौक हुआ था. अब मै अपने आप को सन्तुष्ट करने के लिए अपने हाथका सहारा प्रतिदिन लेता था और कभी कभी तो दिन मे २ या ३ बार भी. बडी विचित्र स्थिती मे मै फस गया था, मेरे इर्द-गिर्द सारी औरते थी, मै अकेला ही मर्द और मै कुछ नही कर सकता था. जब हम गावमे किसी काम के लिए जाते तो लोग मा को घूरते हुए मुझे दिखते वो कभी कभी कुछ गन्दी बाते भी करते. मै सब सुनकर अनसुनी कर देता था, मा को तो आदत पड गई थी, वो कुछ बोले बिना निकल जाती थी. मुझे कभी कभी गलत लगता था कि मै अपनेही मा के बारे मे ऐसे सोच रहा हू.
एक दिन मै सुबह नहाने बाथरूममे गया, मा पहलेही नहा चुकी थी. मै जल्दीमे था इसलिए जैसेही वो बाहर आई मै अन्दर घुस गया और दरवाजा अन्दरसे बन्द किया. मै जब मेरे कपडे उतारने लगा तो मैने देखा कि दरवाजेकी खून्टीपे मा के कपडे लटके हुए थे. मैने बडी उत्सुकतासे वो उठाए तो अन्दरसे एक सफेद ब्रेसिअर गिर पडी. वो मा की ही होगी यह सोचकर मेरा दिल धडकने लगा. मैने वो ब्रेसिअर उठाई, बिलकुल सिम्पल टाईपकी थी, लेकिन वो मा की है इस पापी विचारने मुझे बहुत उत्तेजित किया. मैने उसे सून्घा, उससे मा के बदन की खूशबू आ रही थी, जिसकी वजहसे मेरा लन्ड फनफनाने लगा. मैने बिना कुछ सोचे समझे वो ब्रेसिअर मेरे लन्डपे लपेटी और जोरसे मूठ मारने लगा. मै कल्पना कर रहा था कि मै मा के वक्षोके बीच मेरा लन्ड आगे-पीछे कर रहा हू. और कुछकी समयमे मेरा पानी छूटने लगा. मैने फिर बडे इत्मिनानसे स्नान खतम किया और बाहर आया. जैसेही मै बाहर आया मा बाथरूम मे गयी. मैने उसे पूछा
"इतनी क्या जल्दी है?" तो वो थोडी शरमाकर बोली
"कुछ नही, बस यूही.......मेरे कपडे अन्दर रह गये थे." और वो चली गयी. मै भी थोडा शरमा गया और वहासे निकल पडा. अगले कुछ दिनोमे मै अजीबसे खयालोमे खोया था. कभी कभी मुझे उस ब्रेसिअरकी खूशबूकी याद आती और मै उत्तेजित होता था तो कभी मुझे मा का प्यारभरा बर्ताव देखकर खुदपर गुस्सा आता था कि वो मुझे क्या समझती थी और मै उनके बारे मे क्या सोच रहा था, और इस विचारसे मै आत्मग्लानीका अनुभव लेता था. मेरा विवेक मुझे मा के बारेमे ऐसी सोच रखनेके लिए धिक्कारता था लेकिन मेरा गरम खून मुझे मा की ओर और ज्यादा आकर्षित करता था. मुझे यह बात समझ नही आ रही थी कि मै जो कर रहा हू वो सही है या गलत.
एक बार मेरे ममेरे भाई शहरसे गाव आए थे. मेरे मामा दूसरे शहरमे रहते थे, उनके दो बेटे थे, रवी और अनिल, लगभग मेरी ही उम्रके थे. मेरी उनके साथ खूब जमती थी. वो साल मे १-२ बार ही आते लेकिन जब भी आते, मामा मेरे लिए कई उपहार भेजते थे. यह दो भाई मेरे साथ मिलके खूब घूमते, बाते करते.
हम खेतोमे पास वाले पहाडपे सैर करने जाते थे. हम-उम्र होनेसे हम लोग एक दूसरेसे बिलकुल खुलकर बाते करते थे. वो दोनो शहरके रहनेवाले थे, वो अक्सर लडकियोके बारेमे बाते करते और मुझे कभी कभी छेडते भी थे. लेकिन वो सब हसी-मजाक हुआ करता था.
यह दोनो भाई खुद भी बहुत शरारती थे, औरतोके मामले मे काफी बेशरम थे. शायद शहरमे यह सब चलता होगा लेकिन गावमे हम दूसरी औरतोके साथ बात भी नही करते थे, छेडखानी करना तो दूरकी बात थी. लेकिन यह दोनो भाई जब भी मेरे साथ घूमने निकलते तो आती-जाती औरतोपर टिप्पणी करते रहते.
मा को इन दोनो भान्जोसे बहुत लगाव था वो दोनोभी ‘बुआ आज हमे ये चाहिए, आज हमे वो खिला दो’ इसप्रकारकी जिद करते थे और मा भी उनके हर जिद पूरी कर देती थी. इतने दिनोसे वो आते थे तो मुझे कभी महसूस नही हुआ लेकिन इस बार आए तो मुझे थोडी जलनसी होने लगी. मुझे ऐसा लगा कि वो मेरे और मा के बीचमे आ गए है. खैर मैने चेहरेपे ये बात जाहिर होने नही दी और उनके साथ मौजमस्तीमे शामिल हो गया.
मेरे घर मे सिर्फ मेरी मा और मै रहते थे. मेरे पिताजी एक दिन मा से झगडा करके हमे बेसहारा छोड कर चले गये थे, उनका कोई ठिकाना नही था. हमारा परिवार काफी अमीर था, खेती-बाडी, अच्छा बडा घर......पता नही पिताजी क्यू छोड गये थे. मैने एक दिन मा से पूछा था तो वो बहुत गुस्सा हुई थी. कुछ लोगोसे पता चला कि पिताजी का कोई बाहर का चक्कर था. घर मे और कोई ना होनेकी वजह से मुझपर घर की बहुत सारी जिम्मेदारिया बहुत जल्दी आ पडी थी जिसका मा को हमेशा दुख होता था. वो कहती थी, खेलने-कूदने की उमरमे ही तुम्हे यह सब काम करने पडते है. लेकिन मुझे उसका बुरा नही लगता था. मेरी मा ४४ साल की थी और मै २२ साल का जवान. मैने ग्रॅज्युएशन तो कर लिया था लेकिन घर के काम मे हाथ बटानेके लिये आगे नही पढ सकता था. वैसे नौकर तो थे लेकिन कई काम हमे खुद भी करने पडते थे.
हमारे गाव मे मेरे दोस्त कम थे, मै अक्सर मौका मिलनेपर शहर जाया करता था और फिल्मे देखकर मन बहलाया करता था. मेरी जिन्दगी बहुत सीधी थी, सुबह उठना, थोडीसी कसरत करके नाश्ता करना, फिर दिनभर खेतोमे काम करना, शाम को वापस घर आकर खाना खाकर सो जाना. कुछ साल पहले टीव्ही लगवा लिया था, लेकिन कई बार बिजली ना होनेकी वजह्से उसका भी कोई काम नही बनता था, खेतोमे काम करनेवालोसे और शाम को मा से बाते करकेही मै मन बहलाता था.
शहर जाता तो कभी कुछ किताबे ले आता, बस, उससे ज्यादा मनोरन्जन का कोई साधन नही था. मेरी सोच भी बिलकुल सीधी थी, न सेक्स के बारेमे मै खास कुछ जानता या जाननेकी कोशिश करता. हा टीव्ही-फिल्म देखकर मेरा लन्ड जरूर खडा होता था, तो मै बाथरूम जाकर अपनेही हाथसे अपनी सन्तुष्टी कर लेता था. लेकिन एक दिन मैने एक अजीबसे घटना देखी जिससे मेरा सोचनेका तरीका बदल गया.
खेतोसे मे थोडा देरसे लौटा, रास्तेमे हमारा एक नौकर बिरजू का घर पडता था, उसे कुछ काम बताने थे. मै उसके घर गया और दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई जवाब नही था, मुझे लगा कि वो पीछे आन्गन मे होगा इसलिये मै घर के पीछेकी ओर गया और वहा पहुचतेही मै चुप हो गया, बिरजू की बीवी वहापे खुलेमे नहा रही थी. पीछे कोई आयेगा इसका शायद उसे अन्दाजा नही था इसलिये वो पूरे कपडे उतारकर केवल अपने सायेको बदनपे बान्धकर बैठी थी, वो साया उसके शरीरपर चिपका था जिससे उसका गदराया जिस्म साफ दिख रहा था. वो मजेसे साबुन मल मलके नहा रही थी. वो नजारा देखकर मेरी लन्ड टाईट होने लगा, सास तेजीसे चलने लगी, मुह सूख गया. मै एक दीवारके पीछे छिपकर उसे निहारता रहा. मैने फिल्मोमे औरत का नन्गा जिस्म देखा था, शहर जा कर कभी मै ब्लू-फिल्मभी देखता लेकिन असली औरत का अध-नन्गा जिस्म देखनेका यह मेरा पहला मौका था. जबतक वो नहाती रही, मै चुपकेसे उसे देखता रहा. वो स्नान खतम करके घरके अन्दर चली गयी. मेरा मन कर रहा था कि किसी बहानेसे अन्दर जाए लेकिन मै डर रहा था कि कोई देख लेगा. तभी किसी के आने की आवाज आई और मै चुपचाप वहासे निकल पडा. आगे चलके देखा तो वो बिरजू था, अच्छा हुआ मै जल्दी निकला था. मैने उसे काम बताए और घर की ओर चल पडा.
घरपे पहुचा तो मा किचन मे खाना बना रही थी, रसोई के सामने खडी होकर वो पराठे सेक रही थी. मै जैसेही किचन मे गया मुझे साईड पोझसे वो दिखाई दी और मेरा दिल फिरसे जोरसे धडकने लगा. मा साडी-ब्लाउझ पहनी थी और इस तरफसे उनकी चुची और पेट साफ दिखाई दे रहा था. किचनमे काम करनेसे उसे पसीना छूटा था जिसकी वजहसे ब्लाउझ थोडा गीला हुआ था, जिसकी वजहसे उनकी चुची का थोडा हिस्सा दिख रहा था, और वो नजारा काफी सेक्सी लग रहा था. मा मेरे आने की आहट से मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई और बोली
"आ गए तुम, आज देर क्यू हुई, कुछ तकलीफ तो नही है ना, आओ बैठो, मै खाना परोसती हू". मै हाथ मुह धोकर खानेके लिये बैठ गया, भूख तो लगी थी लेकिन आज मेरे दिमाग मे एक अलगसी भूख थी. बार बार मेरी नजर खाना बनाते हुए मा के शरीर पर जाती और हर बार मै अपने आप को दोषी मानता था. मेरी मा दिखने मे सुन्दर थी लेकिन पिताजी के इस बर्तावकी वजहसे हमेशा मायूस रहती थी. अभी कुछ सालोसे जबसे मैने घर की जिम्मेदारी सही तरीकेसे उठाई थी तब कही जाकर उनके चेहरे पे हसी लौट आई थी. उसका रन्ग सावला था लेकिन बाल बहुत घने और लम्बे थे जिन्हे वो एक जूडेमे बान्धती थी. हमेशा साडी और ब्लाउझ पहनती थी और अपने शरीर का कोई भी हिस्सा खुला नही छोडती थी. चेहरा अभी थोडा हसमुख हुआ था, आन्खे काली और बडी बडी जिनमे वो हमेशा काजल लगाती थी. होन्ट थोडे मोटेसे थे गाल भरे हुए. मा कभीभी मेक-अप नही करती थी, नहानेके बाद काजल और थोडीसी पावडर लगा लेती थी. उसके कन्धे भरे हुए थे. शुरुसेही मेहनतके और खेतीके काम करनेसे उसमे मोटापा बिलकुल नही था, एकदम सुगठित बदन था. अपने सीनेको वो पल्लुसे ढक लेती थी लेकिन आज मुझे अहसास होने लगा कि उसके पीछे उनकी चुचिया यकीनन मोटी और सुडौल होन्गी. मैने किचनमे आते आते उन्हे साईडसे देखा था. पेट ज्यादा फूला नही था, कमर नाजुक थी और उसके नितम्ब बहुत गदराए थे. आज उसका यह गठीला बदन देखकर मुझे पता चला कि हम लोग जब गाव मे चलते थे तो लोग मा को क्यू घूरत रहते थे. मै अब उनकी हाल-चाल पर ध्यान देने लगा. सचमुच मा जब चलती थी तो उसके नितम्ब ऐसे सेक्सी तरीकेसे हिलते थे कि बस देखते रहने का मन करता था. पीठपे ब्लाउझ कसा था जिससे उनकी ब्रेसिअरकी लाईन दिख रही थी.
मै खानेपे बैठा तो था लेकिन मेरा लन्ड खडा हो रहा था. अच्छा हुआ कि हम टेबलपे बैठे थे जिससे मा को मेरी इस अवस्थाका पता नही चला. मा मेरे साथ खानेपे बैठ गयी और मुझसे दिनभर की बाते पूछने लगी, मै बस ‘हा, ना, ठीक...’ ऐसे जवाब दिये जा रहा था क्योन्कि मेरा मन इस अजीबसी उलझन मे फसा था. एक तरफ मै चाहता था कि मा की सुन्दरता निहारू और दूसरी तरफ इस विचारसे मुझे अपने आप से नफरत हो रही थी. मै मा से नजर नही मिला रहा था, उतनी हिम्मत नही थी मुझमे. मैने खाना खा लिया और अपने कमरे मे जाकर सो गया.
आगे कुछ दिन इसी उधेड-बुनमे गुजरे. घरमे मेरे सिवा बस दो नौकर औरते थी, एक साफाई किया करती थी और दूसरी मा को घर के कामो मे मदद करती थी, लेकिन उनके जाने के बाद हम दोनो मा-बेटेही घर मे रहते थे. मा घर मे काफी खुलकर पेश आती थी, घर पे उसे साडी के पल्लुका इतना खयाल नही होता था. इतने दिन मैने कभी यह देखा नही था लेकिन अब मेरी नीयत बदलनेकी वजहसे ये सारी बाते अब मुझे खटकने लगी थी. मै जब भी मौका मिले तब मा के शरीर को देखते रहता और मन मे उसे उन कपडोके बगैरभी देखता और कल्पनामे खोए रहता. अब मेरा पापी मन मुझे थोडे और खतरे मोल लेने के लिए कहने लगा. मैने मा को बाथरूममे देखनेकी कोशिश की लेकिन उस दरवाजेमे ना ही कोई दरार थी न कोई सुराख. फिर मा को काम करते हुए उनकी चुचिया देखना, खाना बनाते हुए उनके बदन की मादक चाल देखना मानो मेरा हमेशाका काम हो गया. हालाकि मै यह सब सिर्फ घरमे होने पर ही करता था, काम के कारण मै अक्सर घरके बाहर बहुत समय बिताता था. लेकिन वहापर भी मेरा मन मुझे चैनसे बैठने नही देता. खेतोमे काम करनेवाली कई औरते हमारे खेतोमेभी आती थी, उन्हे झुककर काम करते हुए उनकी चुची देखनेकी कोशिश करना, पीछेसे उनके चूतड देखना और उनके बदनके दिखाई देनेवाले हिस्सोको देखते रहना मानो मेरा शौक हुआ था. अब मै अपने आप को सन्तुष्ट करने के लिए अपने हाथका सहारा प्रतिदिन लेता था और कभी कभी तो दिन मे २ या ३ बार भी. बडी विचित्र स्थिती मे मै फस गया था, मेरे इर्द-गिर्द सारी औरते थी, मै अकेला ही मर्द और मै कुछ नही कर सकता था. जब हम गावमे किसी काम के लिए जाते तो लोग मा को घूरते हुए मुझे दिखते वो कभी कभी कुछ गन्दी बाते भी करते. मै सब सुनकर अनसुनी कर देता था, मा को तो आदत पड गई थी, वो कुछ बोले बिना निकल जाती थी. मुझे कभी कभी गलत लगता था कि मै अपनेही मा के बारे मे ऐसे सोच रहा हू.
एक दिन मै सुबह नहाने बाथरूममे गया, मा पहलेही नहा चुकी थी. मै जल्दीमे था इसलिए जैसेही वो बाहर आई मै अन्दर घुस गया और दरवाजा अन्दरसे बन्द किया. मै जब मेरे कपडे उतारने लगा तो मैने देखा कि दरवाजेकी खून्टीपे मा के कपडे लटके हुए थे. मैने बडी उत्सुकतासे वो उठाए तो अन्दरसे एक सफेद ब्रेसिअर गिर पडी. वो मा की ही होगी यह सोचकर मेरा दिल धडकने लगा. मैने वो ब्रेसिअर उठाई, बिलकुल सिम्पल टाईपकी थी, लेकिन वो मा की है इस पापी विचारने मुझे बहुत उत्तेजित किया. मैने उसे सून्घा, उससे मा के बदन की खूशबू आ रही थी, जिसकी वजहसे मेरा लन्ड फनफनाने लगा. मैने बिना कुछ सोचे समझे वो ब्रेसिअर मेरे लन्डपे लपेटी और जोरसे मूठ मारने लगा. मै कल्पना कर रहा था कि मै मा के वक्षोके बीच मेरा लन्ड आगे-पीछे कर रहा हू. और कुछकी समयमे मेरा पानी छूटने लगा. मैने फिर बडे इत्मिनानसे स्नान खतम किया और बाहर आया. जैसेही मै बाहर आया मा बाथरूम मे गयी. मैने उसे पूछा
"इतनी क्या जल्दी है?" तो वो थोडी शरमाकर बोली
"कुछ नही, बस यूही.......मेरे कपडे अन्दर रह गये थे." और वो चली गयी. मै भी थोडा शरमा गया और वहासे निकल पडा. अगले कुछ दिनोमे मै अजीबसे खयालोमे खोया था. कभी कभी मुझे उस ब्रेसिअरकी खूशबूकी याद आती और मै उत्तेजित होता था तो कभी मुझे मा का प्यारभरा बर्ताव देखकर खुदपर गुस्सा आता था कि वो मुझे क्या समझती थी और मै उनके बारे मे क्या सोच रहा था, और इस विचारसे मै आत्मग्लानीका अनुभव लेता था. मेरा विवेक मुझे मा के बारेमे ऐसी सोच रखनेके लिए धिक्कारता था लेकिन मेरा गरम खून मुझे मा की ओर और ज्यादा आकर्षित करता था. मुझे यह बात समझ नही आ रही थी कि मै जो कर रहा हू वो सही है या गलत.
एक बार मेरे ममेरे भाई शहरसे गाव आए थे. मेरे मामा दूसरे शहरमे रहते थे, उनके दो बेटे थे, रवी और अनिल, लगभग मेरी ही उम्रके थे. मेरी उनके साथ खूब जमती थी. वो साल मे १-२ बार ही आते लेकिन जब भी आते, मामा मेरे लिए कई उपहार भेजते थे. यह दो भाई मेरे साथ मिलके खूब घूमते, बाते करते.
हम खेतोमे पास वाले पहाडपे सैर करने जाते थे. हम-उम्र होनेसे हम लोग एक दूसरेसे बिलकुल खुलकर बाते करते थे. वो दोनो शहरके रहनेवाले थे, वो अक्सर लडकियोके बारेमे बाते करते और मुझे कभी कभी छेडते भी थे. लेकिन वो सब हसी-मजाक हुआ करता था.
यह दोनो भाई खुद भी बहुत शरारती थे, औरतोके मामले मे काफी बेशरम थे. शायद शहरमे यह सब चलता होगा लेकिन गावमे हम दूसरी औरतोके साथ बात भी नही करते थे, छेडखानी करना तो दूरकी बात थी. लेकिन यह दोनो भाई जब भी मेरे साथ घूमने निकलते तो आती-जाती औरतोपर टिप्पणी करते रहते.
मा को इन दोनो भान्जोसे बहुत लगाव था वो दोनोभी ‘बुआ आज हमे ये चाहिए, आज हमे वो खिला दो’ इसप्रकारकी जिद करते थे और मा भी उनके हर जिद पूरी कर देती थी. इतने दिनोसे वो आते थे तो मुझे कभी महसूस नही हुआ लेकिन इस बार आए तो मुझे थोडी जलनसी होने लगी. मुझे ऐसा लगा कि वो मेरे और मा के बीचमे आ गए है. खैर मैने चेहरेपे ये बात जाहिर होने नही दी और उनके साथ मौजमस्तीमे शामिल हो गया.