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मिस्टर & मिसेस पटेल (माँ-बेटा:-एक सच्ची घटना) complete

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अपडेट 66

मैं जब फिर से बैडरूम में आया तो तभी भी माँ बाथरूम में ही थी.

मैं मेरा मोबाइल और पर्स निकाल के कंप्यूटर टेबल की ड्रावर में रख दिया.

तभी पीछे से बाथरूम का डोर अनलॉक करके खोलने की आवाज़ आई. मैं पीछे मुडा तो देखा की माँ बाथरूम डोर को थोड़ा खोलकर मेरे ही तरफ देख रही है.

हमारा नज़र मिलतेही हम दोनों स्माइल किया.

माँ का मेहँदी किया हुआ राईट हैंड डोर को पकड़ी हुई है.

डोर थोड़ा सा ओपन के कारन उतनी छोटी गैप से उनका चेहरा पूरा नहीं दिख रहा है.

पर उनके भीगी जुल्फे उनके राईट साइड के गाल के ऊपर से लटक रही है.

उनके राईट शोल्डर का थोड़ा हिस्सा दिख रहा है उस गैप से.

गोरी गोरी मुलायम स्किन के ऊपर दो चार पानी की बून्द मोती जैसा चमक रहा है.

और आर्म के नीचे से टॉवल लपेटि हुई है और वह उनके स्तन के ऊपर पकड़ी हुई है, समझ में आरहा है.

माँ ब्लाउज वगेरा लेकर तो गयी थि,

शायद वह अभी तक पेहनी नहीं है.

मैं स्माइल करते हुए वहां खड़े खड़े उनको देख रहा था तो माँ को शर्म आ गयी.

माँ आँखों में प्यार और शर्म की एक अद्भुत मिश्रण लेकर स्माइल के साथ बोली

"जाइये यहाँ से..मुझे बाहर आना है"

मा के साथ धीरे धीरे थोड़ा सहज होना सुरु हो गया था.

इस लिए मेरे दिमाग में एक बदमाशी आइडिया आगया.

मैं होठ पे एक बदमाशी हसि लेकर उनको देखते देखते टेबल पे टेक लगाया.

माँ मेरा ईरादा समझ गयी. वह बस गले में थोड़ा अनुरोध का सुर लेकर प्यारी बीवी के जैसे फिर से बोली

"जाइये ना आप"

मुझे माँ को इस तरह सताने में मज़ा आरहा था.

मैं यहाँ खड़े रहूँगा तोह वह बाहर नहीं आयेगी.

और वह अब बाहर आना चाहती है.

माँ तोह अब मेरी बीवी है.

मैं उनको टॉवल में क्यों नहीं देख सकता.

ऐसा एक हल्का विचार मेरे दिमाग में घूम रहा था.

मैं उसमे बंध होकर माँ को देखते रह गया.

उनको उस तरह भीगे बालों में, शरीर में टॉवल लपेटे हुई भेष में थोड़ा दिदार करके और बाकि कल्पना में सोचके मेरे अंदर खुन दौड रहा था.

हम पति पत्नी बन्ने के बाद अभी तक एक दूसरे के पास पूरी तरह ओपन नहीं हो पाये.

पर हम दोनों ही कोशिश कर रहे है की हमारे बीच कोई ब्याबधान न रहे.

हम दो शरीर और एक आत्मा होजाए.

और हमे यह भी मालूम है की इनिशियल झिझकपन के बाद टाइम के साथ साथ सब ठीक हो जाएगा.

मेरा हिलने का कोई ईरादा न देख के माँ प्यार से धीरे धीरे एक अद्भुत अदाओ के साथ बोली

"आप यहाँ ऐसे खड़े रहेंगे तो में आ नहीं पाउँगी"

मै भी हास्के धीरे धीरे बोला

" क्यूं...तुम तो टॉवल पहनी हुई हो, आजाओ बाहर"

मेरी बात सुनकर उनका चेहरा शर्म से लाल हो गया.

वह अपनी नज़र झुका ली और डोर के ऊपर राईट हैंड को हल्का हल्का रब करती हुई फुसफुसाकर बोली

"नहि....मुझे शर्म आरही है"

मै समझ गया माँ मेरी बीवी बन गयी.

पर मेरे सामने पत्नी के जैसा पूरी तरह खुलकर आने में उनको समय लग रहा है.

वह चाहती है हम पति पत्नी की तरह बन जाये और उनके लिए उनके अंदर वह कोशिश भी दीखती है.

लेकिन अचानक माँ से बीवी बनना उनके लिए भी एक कठिन चैलेंज है.

और इसमें मुझे उनका साथ देना चहिये.

उनकी भावनाएं मेरे मन को छु के गयी.

मैं वहां से बाहर की तरफ जाने लगा. तब माँ पीछे से बोली

"बाहर जाकर पर्दा लगा डिजियेगा"

मैने मुड़के उनको एक स्माइल दिया.

वह मेरी नज़र में नज़र मिलाकर जैसे यह कह रही है की

"सॉरी जाणु, में तुम्हारे साथ ज़िन्दगी का हर पल एक साथ जीना चाहती हु, तुमको प्यार करके, तुम्हारा प्यार पाकर मेरी ज़िन्दगी को ख़ुशी के सागर में बहा देना चाहती हु,

लेकिन हमारे इस नयी रिश्ते में खुद को तुम्हारी पत्नी बनकर हमारे बीच की सारी बाधा को पार करने में थोड़ा वक़्त लग रहा है, प्लीज फॉरगिव मि"

उनके दिल की बाते महसुस करके मेरे मन में उनके ऊपर और प्यार आने लगा. और में एक स्माइल के साथ उनकी वह बाते समझके वहां से बाहर आगया.

बाहर आकर में दरवाजे का पर्दा ठीक से खिचके बंद कर दिया.

मुझे समझ में आरहा है की माँ अंदर बाथरूम से बाहर अगयी.

उनके पायल की और बँगलेस की रुन-झुँन आवाज़ से में वहि खड़े खड़े सब समझ पा रहा था.

अगर में चाहु तो पर्दा क्रॉस करके रूम के अंदर दाखिल हो सकता हु.

लेकिन में उनके बिस्वास को तोडना नहीं चाहता.

वह चाहती तो खुद आकर दरवाजा लॉक कर सकती थी.

पर वह केवल मुझे पर्दा लगा ने के लिए बोलकर मेरे ऊपर के बिस्वास से उनके मन में एक भरोसा आया.

और उसमे वह खुद को मेरे पास सुरक्षित,

मेहफ़ूज़ महसुस कर रही है.

मैं वह नहीं तोड़ सकता. हर रिश्ते में बिस्वास और भरोसे के पिलर होते है.

उसी की बुनियाद के ऊपर विश्व संसार के सारे रिश्ते टिके हुए है.
 
अपडेट 67

आज उनके मन में मेरे ऊपर जो बिस्वास और भरोसा की बिल्डिंग बनना सुरु हुआ,

में खुद अपने हाथों से उसमे एक एक ब्रिक जोड़के उसको और स्ट्रांग और ऊँचा बनाना चाहता हु.

हमारे रिश्ते को और मजबुत और मेहफ़ूज़ बनाना चाहता हु.

वह उनकी तरफ से गाँठ बांध लिया.

अब मेरा बारी है उसकी सही तरह से हिफाजत करके आगे बढाने की.

मेरा बहुत मन कर रहा है माँ को, मेरी बीवी को उसी भीगी अबस्था में देखने के लिये.

फिर भी में मन को शांत करने की कोशिश करके बाहर हॉल में अटैच्ड बाथरूम में चला.

बाज़ार से आते टाइम मुझे बहुत एक नंबर वाली प्रेशर आरही थी. अब फिर से वह प्रेशर आई तो में टॉयलेट में जाकर सुसु करने लगा.

मेरा पेनिस को एक हाथ से पकड़ के रखा था मुझे मेरा पेनिस बहुत गरम मेहसुस हुआ.

कुछ दिन से मेरा पेनिस हमेशा थोड़ा थोड़ा फुला हुआ रह रहा था.

और आज तो शाम से एक दम सख्त होकर रह रहा था. मुझे उसकी तरफ देखके माँ के भीगे चेहरे पे गाल के ऊपर भीगे ज़ुल्फ़ों और गोरे शोल्डर पे थोडे पानी की बुन्दे , साथ में टॉवल लपेटके स्तन के ऊपर पकड़के रखने वाली तस्वीर नज़र के सामने आ गई. और मेरा पेनिस अचानक मेरे हाथ के अंदर ही तेजी से फुलने लगा.

मैं बस और थोडे वक़्त के इंतज़ार के लिए मन को समझाकर बाहर आया.

टॉयलेट से बाहर कदम रखतेहि बैडरूम से मेरे मोबाइल की रिंगिंग आवाज़ सुनाई दि.

मैं परदे के पास जाकर माँ को पुछा

"मेरा मोबाइल रिंग हो रहा है"

मै सीधे तरीके से अंदर जाने के लिए न बोलकर ऐसे पुछा.

माँने अंदर से जवाब दिया

"आके उठा लीजिये"

मै अंदर जाते ही माँ को देखा. वह ड्रेसिंग टेबल की मिरर के सामने खड़ी होकर उनके बाल कँघी कर रही थी.

उनके बाल बहुत लम्बे भी है घने भी.

बाल को सामने की तरफ ले जाकर वह प्यार से कँघी कर रही है.

मिरर के थ्रू मेरे से नज़र मिलते वह मुझे स्माइल देकर नज़र झुकाके कँघी करते रहि.

वह एक लाल रंग की ब्लाउज और मेरून-येलो-गोल्डन रंग का एक साड़ी पहनी हुई है.

माँ को डीप कलर के कपडे में देख के और उनके नहाये हुये फ्रेश चेहरे को देख के मुझे एक नयी कोई लड़की जैसी लग रही थी.

लग नहीं रहा था की वह मेरी माँ है,

जिसको बचपन से मेरे पास देखते आरहा था. उनके गले में मंगल सूत्र और उनके मन की ख़ुशी के रंग से उंनका बदन पूरी तरह अलग लग रहा है.

मैं स्माइल करके जाकर मोबाइल लिया.

मेरा मकान मालिक है.

मैं सरप्रीईसड हो गया. बूढ़े ने आज तक कभी फ़ोन नहीं किया.

हमेशा में ही फ़ोन करता था. रेंट भी ऑनलाइन ट्रांसफर करके में बता देता था. और आज किसलिये फ़ोन कर रहा है.

इस चिंता के साथ में फ़ोन रिसीव किया

"हल्लो" उधार से आवाज़ आया

"बेटा तुम आगये" मैने बोल "हान जी”. आज ही आया" उनहोने कहा

"बहु भी आयी है न साथ में?

"मुझे अब समझ में आया.

उनको पता था में शादी करके बीवी को लेके आरहा हु.

मैंने बोल "हान जी वह भी आयी है" "अछछ..च्चा...बढिया है”.

“मेरी शुभ कामनायें है तुम लोगों के लिए बेटा,कुछ चीज़ का जरुरत है तो बता देना”. और पटेल साहब कैसे है”?

येह अंकल तो नानाजी का फैन बन गया एकदूम.

मैंने कहा."थैंक यू अंकल और नानाजी ठीक है."

"अच्छा अच्छा...वह आये तो मुझे मिलने के लिए जरूर कहना. चलो बेटा रखता हु, खुश रहो"

"जी अंकल"

बोलकर मेंने फ़ोन कट कर दिया.

माँ बालों को कँघी करते करते मुझे देख रही थी फ़ोन पे बात करते हुए. फ़ोन कट ने के बाद उन्होंने आँखों के इशारे से पूछि कौन था.

मैने मोबाइल रखते रखते बोल

" लैंड लॉर्ड"

माँ आँखों में एक सवाल को लेकर पुछी

"उनको मालूम है"

मैने कहा "हा..घर का कुछ काम करवाने के टाइम बोल दिया था की मेरी बीवी आरही है"

फिर माँ होठो की स्माइल दबाते हुये नज़र घुमा लि और मिरर में खुद को देखते रहि.

मैं माँ को एक सरप्राइज देणे के लिए धीरे से अलमारी के पास गया और लाकर खोल के मेरा उनके लिए ख़रीदा हुआ नेकलेस निकल के अलमारी बंद किया.

यहाँ से माँ ऐसे पोजीशन पे खड़ी है की ना वह डायरेक्टली मुझे देख पा रही है , न मिरर के थ्रू.

मैंने नेकलेस के केस को पीछे छुपाकर उनकी तरफ मुडा.

माँ तब झुक के ड्रेसिंग टेबल से कुछ उठा रही थी.

मैं धीरे धीरे उनके पास जाने लगा.

माँ मिरर में देखति हुई मांग में सिन्दूर लगा रही थी.

 
[अपडेट 68

और तभी वह मिरर के थ्रू उनके कंधो के पीछे से मुझे उनकी तरफ आते हुए देखि.

वह मुझे मिरर में देखते हुए एक प्यारी स्माइल के साथ मांग में मेरा नाम का सिन्दूर लगायी.

सिन्दूर लगाते हुए उनके आँखों में एक अद्भुत प्यार और इमोशन नज़र आया.

वह उसमे मेरी मंगल कामनायें और हमारे मैरिड लाइफ की परिपूर्णता के लिए एक निःशब्द वार्ता जैसे की भगवन को बता दी.

मेरा मन इस में एकदम उनके लिए, उनके सारी ख़ुशी के लिए एक निःशब्द प्रतिज्ञा से भर गया.

मैं धीरे से उनके पीछे जाकर खड़ा हो गया.

माँ मिरर के थ्रू मुझे देख रही है और थोड़ा थोड़ा ब्लश कर रही है.

मैं भी प्यार से हासके उनको देख रहा था. हम एक्चुअली बहुत कम बातें कर रहे थे.

एक दूसरे को हम जानते है.

एक दूसरे को बचपन से देखते आरहे है.

सो हमारे बीच कोई नयी चीज़ नहीं है.

इस लिए शायद बात चित कम कर रहे है,

केवल हम हमारे इस नयी रिश्ते को मेहसुस कर रहे है,

इसको ठीक तरीके से पालन करने की तैयारी कर रहे है,

और हमारे बीच छुपे हुये एक दूसरे के लिए एक अद्भुत प्यार को डिस्कवर कर रहे है.

और उसकी ख़ुशी से बंद होकर हम एक दूसरे के नज़्दीक आरहे है.

मैं माँ को देखते देखते पीछे से हाथ निकल के वह केस को आगे ले गया और उनके सामने पकड़के रखा.

माँ मेरे हाथ की तरफ देखि और हाथ में एक केस देख के थोड़ा सरप्रीईसड हो गयी और आँखों में एक सवाल लेकर नज़र उठाकर मिरर के थ्रू मेरी तरफ देखि.

मैं उनके जवाब में बस केवल हास्के धीरे से बोला

"तुम्हारे लिये"

मा समझ गयी की कोई ज्वेलरी होगा.

तो उन्होंने मिठी सी एक स्माइल देकर हाथ बढाकर मेरे हाथ में पकड़ा हुआ वह बॉक्स खोलने गयी.

फिर माँने नज़र उठाकर एकबार प्यार से मेरी तरफ देख के एक हाथ से वह बॉक्स ओपन किया.

उनके अंदर एक डायमंड नेकलेस था.

बहुत भारी और चौड़ी टाइप नहि.

स्लिम पर स्टाईलिस्ट. गोल गोल बॉल जैसे डायमंड स्टूडेड बिड्स का हार टाइप का है उनके नीचे एक लव साइन पेंडंट है जो बहुत सारे डायमंड और अलग अलग जेम्स स्टूडेड था. और जैसे ही माँ उस बॉक्स को ओपन किया वह एकदम सा सरप्रीईसड हो गयी और उनके मुह उस एक्सप्रेशन को प्रकट करते हुए थोड़ा खुल गया.

मैं उनके सामने वह बॉक्स पकड़के उनके पीछे खड़ा हु.

मेरी सांस उनके गर्दन को छु के जा रहा है.

माँ अपने राईट हैंड को लूस मुठ्ठी करके अपने खुली हुई होठो के पास लेकर थंब नेल को होठ को स्पर्श करवाके और मुठ्ठी से चिन को बीच बीच में टच करवाके कुछ पल उस नेकलेस को देखते रहि.

उनके मन में बहुत कुछ चीज़ों का तूफ़ान चल रहा होगा जरुर.

मैं केवल उनको ही देखे जा रहा हु.

कुछ पल बाद माँ आँख उठाके मेरी तरफ एक अस्चर्य और अद्भुत प्यारी नज़र से देखते रहि.

मैं उस आँखों में उनके मन की सारी बात पड़ ली.

फिर भी मुझे ऐसे देख रही थी इस लिए हास्के पुछा

"क्या"

माँ कुछ न बोलकर केवल सर हिलाकर और आँखों में एक बार धीरे से पलक झपक के बोली की कुछ नहि.

लेकिन में जनता हु वह बहुत कुछा बताके गयी उन नज़रों से. मैं फिर बोला

"पसंद नहीं आया"

माँ मुझे देखते रहि. जैसे की वह बोल रहे है "पागल..मुझे केवल पसंद नहि, बहुत पसंद है",

लेकिन वह मुह से बोली की

"बाहुत"

मै हसकर धीरे से बोल

"पहनोना"

वह बस मुस्कुरा उठि और मेरे आँखों में एकबार देख के फिर नज़र झुका के फुसफुसाकर बोली

"आप पहना डिजिये"

मै मुह पे एक चौड़ी स्माइल लेकर वह बॉक्स से नेकलेस को निकल के माँ के गले में पीछे खड़े होकर पहना दिया.

माँ नज़र उठाकर मिरर में देखि पहले मेरे से नज़र मिला फिर नेकलेस को देखते देखते ब्लश कीया.

और अपने हाथ उठाके पेंडंट को सीधा करके उनकी गोरी और मुलायम छाती के ऊपर , क्लीवेज के लाइन पे प्यार से रखि.

मैं उनको देखते हुए उनके शोल्डर पे मेरा चिन टच करवाके धीरे से बोला

"बहुत सुन्दर दिख रही हो...और..."

बोलके में चुप हो गया. माँ मेरी तरफ देखते हुए हस पड़ी और आँखों में बहुत सारा प्यार लेकर धीरे से बोली

"और क्या”?

मै उनको देखते हुए कांन के पास फुसफुसाकर बोला

"और बहुत सेक्सी"

मा ब्लश कर के नज़र झुका ली और एक प्यारी अदा से बोली

" धत"

मै हॅसने लगा और मेरी गर्दन उनके कन्धा के ऊपर से थोड़ा आगे बढाके मेरा चेहरा उनके चेहरे के पास ले जाकर उनको किस करने गया तो माँ अचानक एक प्यार भरी अदाओ और मिठी सी आवाज़ से बॉली

"उऊंम्मम्.....पसीना है, जाइये जाकर नहाइये पहले"

मै माँ की यह बात सुनकर मन ही मन उछल पडा.

हाँ ..मेरा बदन पसीने से भरा हुआ है.

एक तो नहाया नहीं अभी तक.

फिर इस गर्मी में मार्किट जाकर आया.

उस के लिए पसिना तोह है, लेकिन माँ ने जिस तरह कहा इसमें में और खुश होगया.

मुझे उनके पास आने देणे में कोई हिचकिचाहट नहीं है.

इस लिए

'पेहले नहा लीजिये'

बोलके इशारा कर दिया की आजआज वह खुद को मेरे पास समर्पण करने के लिए एकदम तैयार है.
 
इस कहानी के मूल लेखक ने यह कहानी बीच मे ही छोड़ दी थी आप जो आगे पढ़ेंगे वह इसका विस्तारित स्वरूप है जो आपको जरूर पसंद आयेगा भाषा शैली जरूर अलग होगी आशा करता हु आप सब को जरूर पसंद आयेगी कमेंट जरूर करना

..........सलिल
 
अपडेट 69

मैं माँ को, मेरी मंजु को मेरी बीवी को बस देखता ही रहा.

‘जाइये न, नहा लीजिये’

मेरे होठो पे मुस्कान फैल गई ‘ जो हुकुम सरकार” बोल कर में बाथरूम की तरफ मुड गया.

‘रुकिए!’

माँ की कोमल मधुर आवाज़ ने मेरे कदम रोक दिये. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे कानों में मिश्री घोल दी गई हो.

ये मधुर आवाज, जो कभी मुझे लोरिया सुना के सुलाया करती थि, मुझे अच्छे बुरे का फरक समझाती थि, ये मधुर आवाज़ अब मेरी धरोहर हो गई है.

अब ये मधुर आवाज़ हर पल मेरे पास रहेगि, हर पल मेरे कानों में मिश्री घोलेगी.

कितना सकून मिलता है मुझे इस मधुर आवाज़ को सुन कर.

मैने मुड के देखा तो मेरी माँ मेरे लिए एक नया नाईट सूट निकाल रही थी.

वो धीरे धीरे चलति मेरे पास आई, उसकी पायल की रुनझुन मेरे जिस्म में संगीत की लहरें पैदा कर रही थी.

मेरा सारा धयान उस रुन झुन में चला गया ... वो रुन झुन जैसे कह रही थी ... ये संगीत आपका इंतज़ार कर रहा है ... जल्दी नहा कर आइये.

मा जैसे ही मेरे करीब आई, मेरे साँसों में उसंकी सुगंध फिर से बसने लगी और मेरा पेनिस इतना अकड गया की मेरे कपड़ों में उठा हुआ उभार जरूर माँ की आँखों ने देख लिया होगा.

मा ने मुझे वो नाईट सूट पकडाया, नाईट सूट पकड़ते हुए जब उनके कोमल उँगलियों ने मेरे हाथ को छूआ तो पूरा जिस्म झनझना गया ... शायद यही हालत माँ की भी थी.

हाथ में नाईट सूट पकडे में उनकी मोहिनी सूरत का रसपान करने लग गया, शर्म के मारे माँ ने नजरें झुका ली और फिर एक कोमल ध्वनी मेरे कानो में पडी

“जाइये न अब”

मै जैसे सपनो की दुनिया से वापस लोटा और मुस्कराता हुआ बाथरूम में घुस गया तब भी कनखियों से में माँ को ही देख रहा था.

उनके होठो पे एक मुस्कान थी जिसकी चंचलता मुझे अपने और खिंच रही थी.

खुद को सँभालते हुए में बाथ रूम में घूसा पर दरवाजा खुला ही रहने दिया.

मेरी ये शरारत माँ भाँप गई और खुद ही दरवाजा बंद कर दिया ... शायद उनके होठो ने कुछ कहा

‘बहुत बेशर्म बन गए हैं आप’

कब में मन में सोचने लगा बेशरमी तो अभी दिखानि है ... में फ़टाफ़ट नहाने लगा और आने वाले क्षणो के बारे में सोच कर पुलकित होने लगा ... जो अनुभुति मुझे हो रही थी , शायद या यक़ीनन माँ को भी हो रही होगी ... जिस तरहा मेरे दिल की धड़कन क़ाबू में नहीं हो रही थी ... वही हाल माँ का भी होगा.

वो पल अब दूर नहीं था जब माँ मेरी बाँहों में होगी ... मेरी बीवी का रूप ले कर ... मेरी माँ मेरी बाँहों में होगी और में मेरी माँ को हर जगह छू सकूँगा ... ये अहसास वो था जिससे में शब्दों में शायद ही बयान कर पाउँगा क्या सोच रही होगी वो ... शायद यही की आज हम एक ऐसे रास्ते पे निकल पडेंगे जो हमारे प्यार को और भी परवान चढ़ायेंगा.

 
बहुत ही लाजवाब अपडेट है दोस्त

अपने साइलेंट पाठकों के लिए दुआ कि वो जल्दी से ठीक होकर कमेंट करने लग जाएँ और हमारा ये परिवार ( आरएसएस) आदर्श परिवार बन जाए

आपका दोस्त
 
अपडेट 70

हीतेश अंदर नहाने चले गए है, खाना तो में तैयार कर चुकी थि, और कोई काम था नहीं और खिड़की में आकर खड़ी हो गई . बाहर निचे लोग इधर से उधर जा रहे थे, किसे क्या पता था की आज एक माँ और उनके बेटे की सुहागरात है.

ये ख्याल आते ही मुझे कुछ होने लगा. कितना अजीब लगा था उस वक़्त जब माँ ने मुझे हीतेश से शादी करने को कहा था. कितना मुश्किल था मेरे लिए हा कहना. पर इतना में जानती थी की हीतेश मुझे बहुत प्यार करता है. मैंने उसकी आँखों में अपने लिए वो भाव कई बार देखे थे, पर उसने कभी ऐसी कोई हरकत नहीं की जिससे मुझे लगे की ये प्यार नहीं वासना है. शायद ये ही सबसे बड़ा कारन था की में शादी के लिए तैयार हो गई

दिल से हीतेश को अपना पति मान लिया है पर फिर भी कहीं दिल के किसी कोने में एक डर सा समाया हुआ है कितनी बड़ी हु में उम्र में उससे, आज नहीं तो कल ये फरक दिखने लगेगा, तब क्या होगा. क्या में उनका पूरा साथ दे पाउँगी. आज की ख़ुशी के साथ साथ आने वाला कल मुझे डरा रहा था.

ये डर कितना बेबूनियाद है में अच्छी तरहा जानती हु, क्यूँकि हमारा रिश्ता प्रेम के धागो से जुड़ा है, पर न जाने कयूं मेरे मन में एक उथल पुथल फिर भी मची रेहती है.

कीतने शरारती हो गए है, कैसी कैसी हरकतें करने लग गए है.

ओह वो चुम्बन अब भी मेरी साँसों में घुला हुआ है. अगर मम्मी का फ़ोन नहीं आता तो न जाने हम कितनी देर तक……. छि... छि….. ये क्या सोचने लग गई में.

अब मुझे खुद को पूरा बदलना है एक माँ की जगह एक पत्नी का रूप लेना है पर क्या वो माँ मर जायेगी क्या में सच में उस माँ का गाला घोट पाउंगी और सिर्फ एक पत्नी बन के रह पाउंगी कुछ समझ नहीं आ रहा ... शायद वक़्त के हवाले सब करना पड़ेगा ... वक़्त ने हमारी शादी कारवाई है और इस समस्या का हल भी वक़्त ही निकालेगा.

कतना तड़प रहे हैं मुझे छूने के लिए और में --- क्या में भी ... उफ़ ... शायद हाँ--- आज कितने बरसों के बाद ... कोई मुझे एक औरत समझ के प्यार करेगा --- कोई कहाँ ... मेरा अपना ही बेटा ... जो अब मेरा पति बन चुक्का है.मम्मी भी कैसे कैसे इशारे कर रही थी ... की अब में जल्दी माँ बन जाऊ ... शायद इस्लिये क्यूँकि मेरे पास वक़्त कम है ... उम्र जैसे जैसे बढ़ती है ... माँ बन्ने में कठिनाइयँ आने लगती है. ... क्या सब कुछ ठीक होगा ... है ... ये क्या सोच्ने लग गई में.

अभि तो हमें ... उफ़ ... कैसे कर पाउंगी ... जब वो मुझे ... न ... कितनी शर्म आ रही है ... दिल कितना जोरों से धड़क रहा है.

क्यों एक नयी सी उमंग दिल में पैदा हो रही है ... आज में फिर से सुहागन बन गई हु ... फिर से सुहागण- शायद ही कोई ऐसी औरत होगी ... जो अपने ही बेटे की सुहागन बनती होगी ... लेकिन इन बातों को सोचने से अब क्या ... अब तो में सुहागन बन चुकी हु ... ये प्यारे प्यारे रंग जो मेरी जिंदगी से चले गए थे- हीतेश उन्हें फिर मेरी जिंदगी में ले आये. हीतेश मेरा बेटा ... मेरा पति- मेरा सब कुच.

क्या में साथ दे पाउंगी सुहाग रात में ... कितने सपने सजाये होंगे हीतेश ने ... कितने अरमान होंगे हीतेश के- क्या में उन्हें पूरा कर पाउंगी ... क्या में ... क्या वो मुझे समझ पाएँगे ... मेरे दिल की हालत ... एक अड़चन कहीं न कहीं अब भी दिमाग में रहती है .

छोड़ो ... देखते हैं क्या होगा ... मुझे विश्वास है वो मेरे दिल की बात जरूर समझ जायेंगे ... मुझे वक़्त देंगे अपने इस नये रूप में पूरी तरहा ढ़लने के लिये. दिल तो मेरा भी बहुत करने लगा है उनके बाँहों में समाने का ... पर एक डर भी लगता है.

कल में मम्मी पापा की शरण में थि, आज मुझे मेरा घर मिल गया ... मेरा घर ... मेरे हीतेश का घर ... हमारा घर . अब यही मेरा नया संसार है ... जो अनुभुति मुझे इस वक़्त हो रही है वो शायद में कभी शब्दों में बयान नहीं कर पाउँगी.

एक सुखद अहसास हो रहा है अपने इस नए घर में आने का ... मम्मी पापा से दूर होने का दुःख भी है पर ... आज मुझे ये भी मेहसुस हो रहा है अब में फिर से पूरी हो जाउँगी ... वो सुख जो हीतेश के पापा दिया करते थे ... वो सुख जिसे में भूल गई थी ... वो सुख जो हर नारि की तमन्ना होती है ... जो हर नारी को उनके पुरे होने का अहसास करता है ... वो सुख अब मुझे मेरा हीतेश देगा कितना खूबसूरत है हितेश बिल्कुल अपने पापा तरह जैसे वह फिर आ गये हो हितेश के रूप में ... में फिर से सपनो में उड़ने लगूँगी ... फिर से मेरी कामनाओ को पंख मिल जायेंगे ... फिर से मेरी जिंदगी में सपनो की बहार आ जायेगी ... फिर से मुझे कोई थाम लेगा ... मुझे एक नई दिशा देगा ... अपना पूरा प्यार देगा ... मेरा हीतेश फिर से मुझे पूरा कर देगा.

पता नही क्यों मेरे लब पे ये गीत आ गया ... “अब तो है तुमसे हर ख़ुशी अपनी” ---- में खो गई ... अब मुझे सड़क पे चल्ने वाले लोग नहीं दिख रहे थे ... ये गीत मुझे मेरे हीतेश के पास ले जा रहा था ... मेरा खुद पे बस ख़तम हो रहा था ... में उनका इंतजार कर रही थी कितना देर लगाते है नहाने में.
 
अपडेट 71

मेरे कानो में वो आवाज़ आणि बंद हो गई, और में ख़यालों से वापस निकल आया . माँ अभी भी खिड़की से बाहर देख रही थी.मुझ से अब रुका नहीं गया अब ये दो कदम का फ़ासला मुझे पूरा करना था, में अपने माँ के करीब होता चला गया ... करीब ... और करीब इतना की में उनके साथ पीछे से सट गया.जी ही में अपने माँ के जिस्म के साथ सटा था मुझे लगा की माँ के मुंह से एक सिसकि निकल पड़ी उनके जिस्म में कम्पन आ गया ... शायद उसने अपनी आँखें भी बंद कर ली होंगीं ... जो अनुभुति हमें उस वक़्त हो रही थी वो सिर्फ हम दोनों ही जान सकते हैं ... दोनों के दिल की धड़कन बढ़ गई ... यूँ लग रहा था जैसे हमारे दिल आपस में बाते कर रहे हो.

मेरा पेनिस इतना हार्ड हो गया की दर्द करने लगा ... माँ को जरूर मेरे पेनिस का अहसास हो रहा होगा मैंने धीरे से अपने हाथ माँ के कांधों पे रख दिए ... मुझे साफ़ मेहसुस हो रहा था माँ के जिस्म में उठती हुई कम्पन में धीरे धीरे अपने हाथ निचे उनके बाँहों पे सरकाता चला गया. माँ की दोनों मुठियाँ बंद थि, मेरी उँगलियों ने जैसे ही उन मुठियों को छूआ दोनों मुठियाँ खुल गई और मैंने उनकी उँगलियों में अपनी उँगलियाँ फसा डालि.

हम दोनों की उँगलियाँ आपस में कसती चलि गई और दोनों के हाथ फिर से मुठियों में बंध गये ... ये बंधन था हमारे प्रेम का ... हमने एकदूसरे को पूरा करने की शुरुवात की.मेरे नाक में माँ की सुगंध आने लगी में अपना मुंह माँ के बालों में फेरेने लगा मुझे लगा जैसे माँ अभी थोड़ा पीछे हुई है और मुझ से सट गई है. माँ के बालों को सुंघता हुआ में माँ की गर्दन पे आ गया ... माँ की साँसे तेज होने लगी ... और मेरी साँसे भी तेज होती जा रही थी.

मैने माँ की गर्दन को चूम लिया और मेरे मुंह से अपने आप निकल पड़ा

‘आई लव यु’

शायद बहुत ही हलके से माँ मुंह में बुदबुदाई “आई लव यू टू”

जिसे मेरे तड़पते हुए कानो ने पकड़ लिया ... मुझे आज अधिकार मिल गया था अपनी माँ को छूने का ... उसे प्यार करने का ... उसे फिर से पूरा करने का.

 
अपडेट 72

“मंजू” !’

‘’हम्म’

‘तुम बहुत खूबसूरत हो’ अब में माँ को अपने पत्नी के रूप में देखने लगा था हमेशा जो जुबान आप बोलती थी आज उनके मुंह से कितनी आसानी से तुम निकल गया. मैं समझ सकता था इस वक़्त माँ के दिल में क्या क्या आँधियाँ चल रही होंगीं ... आज में अपने पिता की जगह ले चुक्का था ... आज में माँ का पति था ... पर जिस विश्वास के साथ माँ ने मुझे अपनाया था उस विश्वास को मुझे कायम रखना था.

मै तड़प रहा था पर फिर मुझे खुद पे कण्ट्रोल रखना था ... यही वक़्त का तक़ाज़ा था ... इसी संयम से हमारा प्यार परवान चढ़ने वाला था.माँ कोई जवाब नहीं देती में फिर बोलपडताहु

‘आज में बहुत खुश हु”

“मुझे बहुत खुबसुरत, ‘बहुत सेक्सी बीवी मिली है’

माँ शर्मा कर गर्दन झुका लेती है और में माँ की गर्दन पे अपनी जुबान फेरने लगता हु.

‘जूठ कहते हैं आप ‘

‘ये तो में जानता हु सच क्या है”

“इधर आओ’ और में माँ को ऐसी ही साथ में लिपटाये हुए शीसे के सामने ले जाता हुं.

‘देखो सामने’

माँ सामने देखती है तो उसे अपना अक्स नजर आता है और उनके पीछे में उनके साथ चिपका खड़ा हु. शर्म से आँखें बंद कर लेती है. और में शीसे में माँ के सुन्दर रूप को निहारने लगता हुं.

‘देखो ना’

‘क्या?’

बहुत ही धीमे स्वर में जवाब देती है.

‘आंखे खोल के सामने देखो’

माँ गर्दन हिला के ना कर देती है.

‘मेरी कसम’

माँ फट से अपनी आँखें खोल देती है.

‘आप बहुत तंग करने लग गए हैं”

‘कसम क्यों दी?’

‘और क्या करता” ‘ऐसे तुम मान ही कहाँ रही थी, देखो सामने, अपने होठो को देखो’

माँ शरमाती हुई सामने देखति है लज्जा के मारे उनके गाल लाल सुर्ख़ हो जाते हैं होंठ थरथराने लगते है.

‘बिलकुल गुलाब की पंखुडियों की तरहा कोमल , सुन्दर और रस के भरे है.’

माँ की सांस तेज हो जाती है

‘अपनी आँखें देखो बिलकुल झील सी गहरी, जिसमे प्यार का सागर लहरा रहा है’

‘बस’

ओर माँ पलट के अपना सर मेरे सीने पे रख देती है.

‘क्या हुआ?’

‘बस कीजिये ना’ शर्माती हुई मेरे सीने से लगी माँ धीरे से बोलती है.

‘क्यों में तो अपने देवी की पूजा कर रहा हु, उसकी सुंदरता को पढ़ने की कोशिश कर रहा हु’

‘प्लीज बस कीजिये ना बहुत शर्म आ रही है’

मै माँ को अपनी बाहो में लप्पेट लेता हु मेरा सपना आज पूरा हो गया जो सपना में कब से देखता आ रहा था आज वो सच्चाई में बदल गया.

मेरी माँ आज मेरी पत्नी बनकर मेरी बाँहों में थी.

थोड़ि देर बाद माँ मुझ से अलग होने की कोशिश करती है,

लेकिन में उसे बाँहों की क़ैद से आजाद नहीं करता.

‘छोडिये न’

‘हमम हु’

‘प्लीज छोडिये न’

‘दूर होना चाहती हो?’

माँ ना में सर हिलाती है.

‘फिर?’

‘खाना नहीं खाएँगे क्या? ... छोडिये में खाना लगाती हु’

‘आज तो कुछ औरे खाने का मन है’

‘क्या?’

‘बताऊँ’

फिर ना में गर्दन हिलाती है.

‘प्लीज छोडिये ना ... बहुत भूख लगी है’

मेरे हाथ अपने आप माँ को बंधन से आज़ाद कर देते है.

मै खुद भूखा रह सकता था, क्यूँकि मुझे तो भूख ही माँ की लगी हुई थी, पर अपनी माँ को कैसे भूखी रहने देता. पर में अच्छी तरह जानता ना एक माँ अपने बेटे को भूखा रहने देती है और न ही एक पत्नी ... और माँ तो दोनों थी- फिर कैसे वो मुझे भूखा रहने देती.

‘आप बैठिये, में फ़टाफ़ट खाना लगाती हु’

‘रहने दो- में बाहर से लाता हु, तुम बहुत थक गई होगी, और आज क्यों किचन में खुद को झुलसाना चाहती हो’

‘नहीं इसमें मुझे सुख मिलता है,जो कल करना है वो आज क्यों नहीं’

अब मेरे मुंह से निकल ही नहीं पाया की आज हमारी सुहागरात है इस्लिये नहि

माँ किचन में चलि जाती है और में पीछे पीछे जा के उसे देखने लगता हु.

माँ के हाथ बिजली की गति से चल रहे थे. सब कुछ तो उसने तैयार कर रखा था बस सिर्फ गरम करना था.

मुझे याद आता है की मुझे तो सुहाग सेज तैयार करनी थी.

मैं फटाफट जा के वो छुपे हुए गुलाब की पंखुडियों का पाकेट निकालता हु और पुरे बिस्तर को गुलाब की पंखुडियों से सजा देता हु.

जब तक में इस काम से फ्री हुआ, माँ की आवाज़ आ गई

‘आइये खाना लगा दिया है’

मैने कमरे को पर्दा कर दिया और बाहर आ गया .माँ प्लेट में खाना दाल रही थी.

‘रुको’ मेरे मुंह से निकल जाता है.

माँ मुझे सवालिया नजऱों से देखति है.

इस से पहले में कुछ कहता वो शर्मा के चेहरा झुका लेती है और एक प्लेट रख देती है एक ही प्लेट में खाना डालती है. एक दूसरे के दिल की बात हम समझ जाते है.

 
अपडेट 73

मेरे मन में फिर से एक शरारत आ जाती है, में धीरे से चलते हुए टेबल तक पहुँचा और जैसे ही माँ के करीब हुआ मुझे लगा जैसे वो सिहर सी गई हो एक कम्पन हुआ उनके जिस्म में और मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गई

माँ शर्माकर निचे टेबल की तरफ देखति हुई खड़ी थि, खाना एक प्लेट में दाल चुकी थी.

सिर्फ दो ही कुर्सियाँ थी और एक छोटा टेबल, ज्यादा खरीद दारी तो मैंने की नहीं थि, क्यूँकि जगह ही इतनी थी.

मैने एक कुरसी साइड पे कर दी और एक पे बैठ गया, माँ तिरछी नजऱों से मुझे देख रही थी, उफ़ क्या शर्म आ रही थी माँ को, वो मेरी शरारत कुर्सी के हटते ही भांप गई थि, आखिर माँ थी वह मेरि, मेरे अंदर कब क्या ख्याल आते हैं उस से छुपा नहीं पाता. लज्जा से उनका गुलाबी चेहरा और भी लाल होता जा रहा था, साँसे और भी तेज हो गई थी.

मैने धीरे से माँ का हाथ पकड़ लीया, उसने मेरी तरफ देखा, उसकी नजऱों में मुझ से शरारत न करने की प्राथना थि, पर में कहाँ मानने वाला था आज तो मेरा दिन था मेर्री भी साँसे तेज हो चलि थी मैंने माँ को अपनी तरफ खिंचा और अपनी गोद में बैठने का इशारा किया माँ ने शर्मा कर ना में गर्दन हिलायी ... में उनका हाथ पकडे बस उसे ही देखे जा रहा था- उनके रूप और उसकी मादकता में खोता जा रहा था ... मेरी आँखों में भी एक प्राथना आ गई जिसे माँ ने भाँप लिया और सकुचति हुई धीरे से चलके मेरी गोद में बैठ गई

हम दोनों का ये स्पर्श हमें कहीं और ले चला ... भूल ही गये की खाना खाने बैठे है.

उनके जिस्म की खुशबु से में और भी मदहोश हो गया और मेरा पेनिस फुदकता हुआ जरूर उसे चुबने लगा होगा जो उसकी और भी तेज होती हुई साँसे मुझे इशारा कर रही थी.

यूं लग रहा था जैसे वक़्त की सुई यहीं पे रुक गई हो. और मेरे होंठ उनके ब्लाउज के उप्पर उसकी नंगी पीठ से चिपक गये

अअअअहहहह माँ सिसक पाडी.

शायद बड़ी मुश्किल से उनके मुंह से एक शब्द निकल पाया.

‘खाना’

मेरा ध्यान भंग हुआ. और मेरी नजर खाने की प्लेट पे चलि गई

‘ आज तक तुम मुझे खिलाती रही,आज में तुम्हें खिलाऊंगा’

माँ ने मुस्कुरा के मुझे देखा और धीरे से बोली

‘दोनों एक दूसरे को खिलायेंगे’

मुझे लगा की माँ की झिझक धीरे धीरे दूर हो रही है और मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गई

‘मैं चेयर पे बैठती हूँ ऐसे आपको तकलीफ होगी’

वह मुस्कुरा कर सर झुकाए हुये बोली.

‘नही कल में तुम्हारी गोद में बैठा करता था आज से तुम मेरी गोद में बैठोगी हम रोज ऐसे ही खाना खाया करेंगे’

‘धत्त!

“आप बहुत बेशर्म होते जा रहे है’

‘इसमें बेशरमी कहाँ से आ गई अपनी बीवी को अपने गोद में बिठा रहा हु, किसी और को थोड़े ही बिठा रहा हूँ’

‘उफ़ बहुत बोलने लगे हैं आप’

माँ ने एक निवाला मेरे मुंह में ड़ाला तो मैंने उनके ऊँगली भी काट ली.

”उइ”

मेरी हसि छूट गई और वो झूठा गुस्सा दिखाते हुए मुंह बनाने लगी.

फिर मैंने माँ को एक निवाला खिलाया तो उसने भी वही हरकत कर डाली.

”उफ”

ओर वो खिलखिला के हस् पड़ी उसकी हसी मे में खोता चला गया, और इसी तरह हम दोनों ने खाना ख़तम किया .

 
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