मेघदूत - उत्तरमेघा
जिस अलकापुरीके महल अपनी उन-उन विशेषताओसे तुम्हारी समता करनेमे समर्थ है । जैसे-तुममे बिजली की चंचलता है तो महलोमे सुन्दरी रमणीयो की चेष्टाएँ । तुममे रंगबिरंगा इन्द्रधनु है उनमे रंगबिरंगे चित्र । तुम स्निग्ध गंभीर घोष करते हो तो वहाँ संगीतकलाका मृदंग बजता है । तुम्हारे भीतर जल भरा है तो उनके फ़र्श मणिमय है । तुम ऊँचाईपर हो तो उनकी भी छते गगनचुंबी है ॥१॥
जिस अलकाकी रमणियाँ छहो ऋतुओमे होनेवाले पुष्पोका सदा उपयोग करती है, जैसे-उनके हाथोमे लीला कमल है, जो कि शरदमे होते है । बालोमे कुन्द है जो हेमन्तमे होता है । मुखमे लोधके परागका चूर्ण मला गया है जो शिशिरमे होता है । जूडोमे कुरबकेके ( ताजे झिण्टिके ) फ़ूल है जो वसन्तमे होते है, कानमे शिरीष है जो ग्रीष्ममे खिलता है और मांगमे कदम्बका पुष्प है, मेघागम होनेपर वर्षामे खिलता है ॥२॥
जिस अलकामे वृक्षोपर सदा फ़ूल खिले रहनेसे मस्त भौरे गुंजायमान रहते है । बावडियोमे सदा कमल खिले रहते है और हंसोकी पंक्तियाँ करधनी-सी दिखती है । पालतू मोर सदा अपने चमकीले पंखोको फ़ैलाये हुए ऊपरको गर्दन उठाकर कूजते रहते है और जहाँकी सन्ध्याये सदा रहनेवाली चाँदनीसे अंधेरा नष्ट हो जानेके कारण रमणीय लगती है ॥३॥
जिस अलकामे रहनेवाले यक्षोके आँखोसे आँसू आनन्दमेही निकलते है, और किसी ( पीडा आदि ) कारणसे नही । प्रियजनोके समागमसे मिटने योग्य कामज तापके सिवा दूसरा कोई ताप उन्हे नही होता । प्रणयकलहके अतिरिक्त कभी प्रेमियोका विरहका अनुभव नही होता । यौवनके सिवा दूसरी अवस्था उनकी नही होती, अर्थात वे सदा युवा ही रहते है ॥४॥
जिस अलकामे यक्ष अपनी सुन्दरियोके साथ, स्फ़टिकमणिसे बनी हुई और आकाशके तारोके प्रतिबिम्ब ही जिसमे सजाये हुये फ़ूलोसे लग रहे है ऐसी, महलोकी अटारियोपर जाकर तुम्हारी तरह गम्भीर ध्वनिवाले मृदंगपुटोके बजनेपर कल्पवृक्षसे निकली हुई और कामोद्दीपक मदिराका सेवन करते है ॥५॥
जिस अलकामे, स्वर्गंगाका शीतलवायु जिनकी सेवा कर रहा है, मन्दारके वृक्षोकी छाया जिनपर पडती हुई धूपको रोक रही है और देवता जिनके लिये तरस रहे है, ऐसी यक्षबालाएँ सुनहरी बालूकी मुट्ठीयोमे रत्न छिपाकर उन्हे खोजनेके खेल कर रही है ॥६॥
जिस अलकामे अनुरागके कारण प्रेमियोके शरारती हाथो द्वारा कमरबन्दकी गांठ खोलदेनेसे शिथिल हुई साडियोको हटा देनेपर अत्यन्त लज्जित बिम्बोष्ठो लज्जित सुन्दरियाँ, अँधेरा करदेनेके विचारसे धूलकी मुट्ठी ऊँची लौवाले दीपकोपर फ़ेकती है, किन्तु उनका यह प्रयत्न व्यर्थ जाता है । क्योकि उन दीषकोसे अग्निकी ज्योति नही निकलती जो धूलसे बुझ जाय, वे तो रत्नोकी किरणे है जो तीव्र प्रकाश कर रही है ॥७॥
आगे बढनेकी प्रेरणा देनेवाले वायुसे जिस अलकाके सातमंजिले महलोकी छतोपर ले जाये गये तुम जैसे मेघ, छोटी-छोटी पानीकी झुर्रियोसे वहाके भित्ति-चित्रोको विकृत करके पकडे जानेकी डरसे जैसे, धुएँ की तरह बनकर तत्काल रोशनदानोसे बिखर-बिखरकर निकल आती है ॥८॥
जिस अलकामे अर्द्धरात्रिके समय चन्द्र्माके सामनेसे तुम्हारे हट जानेपर विमल चाँदनीके सम्पर्कसे स्वच्छ जलकणोको टपकानेवाली, झालरोमे लटकती हुई चंन्द्रकान्त मणियाँ प्रियतमोकी भुजाओके गाढ आलिंगनोसे उसाँसे भरती हुई नायिकाओकी संभोगजन्य अंगग्लानीको दूर कर देती है ॥९॥
जिस अलकामे, अक्षयनिधियाँ जिनके घरोमे भरी है, ऐसे कामीजन अप्सरारुप गणिकाओके साथ बाते करते हुए, सुरीले कंठवाले और कुबेरका यश गाते हुये किन्नरोके साथ वैभ्राज नामक उद्यानका आनन्द ले रहे है ॥१०॥
जिस अलकामे, सुन्दरियोद्वारा रात्रिमे अपने प्रियतमोके पास जानेके मार्ग, सूर्योदय होनेपर स्पष्ट मालूम हो जाते है । क्योकि जल्दी चलनेमे शरीर हिलनेसे बालोपर लगे मन्दार पुष्प और कानोपरके सुनहरे कमलोकी पंखडियाँ उन मार्गोमे गिरी रहती है, जूडोपर की जालियोसे और उँचे स्तनोपर टकराकर टूटे हूये हारोसे मोती बिखरे रहते है ॥११॥
जिस अलकामे कुबेरके मित्र शंकरजीको प्रत्यक्षरुपसे वास करते जानकर डरके मारे कामदेव प्राय: अपने मौरोकी डोरीवाले धनुषका प्रयोग नही करता । उसका काम मटकती मौहोके साथ फ़ैकी गई बाँकी चितवनोवाले और कामिजनरुप निशानोपर अचूक, चतुर कामिनियोके हाव-भावोसे ही सिद्ध हो जाता है ॥१२॥
जिस अलकामे केवल कल्पवृक्षसेही रंग-बिरंगे वस्त्र, आंखोमे खुमारी लानेवाला मद्य, पल्लवीसहित पुष्प, विभिन्न प्रकारके आभूषण, कमल जैसे कोमल चरणोमे लगानेका आलता आदि स्त्रियोंकी सारी अलंकारसामग्री उत्पन्न हो जाती है ॥१३॥
उसी अलकामे कुबेरके घरसे उत्तरकी ओर इन्द्रधनुषके समान सुन्दर रंग-बिरंगे फ़ाटकसे जो दूरसे ही पहिचाना जाता है, ऐसा मेरा घर है । जिसके पासमे एक छोटासा मन्दार वृक्ष है । उसे मेरी प्रियाने पुत्र मानकर पाल-पोसकर बडा किया है और अब इतना बडा हो गया है कि उसके झुके हुए गुच्छे उपर हाथ उठाकर छुए जा सकते है ॥१४॥
उस मेरे घरमे एक बावडी भी है, जिसकी सीढियाँ मरकतमणिसे बनी है । जो चिकने वैंगूर्यमणिके समान डण्डीवाले, खिले हुये सुनहरे कमलोसे भरी रहती है और जिसके निर्मल जलमे आनन्द्से रहनेवाले हंस वर्षाकाल आनेपर भी समीपवर्ती मानससरोवरमे जानेकी व्यग्रता नही दिखलाते ॥१५॥